पोप के पाखंडी आंसू

संपादकीय
23 जनवरी 2018


पोप फ्रांसिस ने चिली में गिरजाघरों के पादरियों द्वारा दुष्कर्म और यौन शोषण के शिकार बच्चों से मुलाकात की और उनकी आपबीती सुनी। दर्दभरी दास्तां सुनते समय पीडि़त बच्चों के साथ पोप भी रो पड़े। बाद में उन्होंने कहा, यह पीड़ा और शर्म का विषय है। पोप ने बच्चों के कल्याण के लिए प्रार्थना की। चर्च पदाधिकारियों के उत्पीडऩ की घटनाओं से चिली में भारी गुस्सा है। सोमवार को पोप का दौरा शुरू होने से पहले लोगों ने विरोध स्वरूप दो चर्चों में आगजनी भी की। दौरे में यौन शोषण के शिकार लोगों से पोप की यह दूसरी मुलाकात है। इससे पहले 2015 में फिलेडेल्फिया की यात्रा में पोप फ्रांसिस यौन शोषण के शिकार लोगों से मिले थे। पोप की इस ताजा मुलाकात पर अर्जेटीना के बिशप की ओर से अटपटी टिप्पणी आई है। उन्होंने कहा, पोप हमेशा चर्च पदाधिकारियों के यौन शोषण की चर्चा करते हैं। वह राजनीतिज्ञों के ऐसे ही आचरण पर कभी नहीं बोलते।
अब सवाल यह उठता है कि क्या पोप के ऐसे आंसुओं की कोई कीमत है? जब तक किसी देश के कानून के खिलाफ जुर्म करने वाले ऐसे पादरियों को पुलिस, अदालत और जेल का सामना न करना पड़े, तब तक उनसे जख्मी हुए बच्चों के लिए आंसू बहाना एक फिजूल का पाखंड है। यह मामला अपने किस्म का अकेला नहीं है, और वेटिकन के तहत आने वाले ईसाई संगठनों में स्कूलों, हॉस्टलों, और चर्चों में पहले भी ऐसा होते आया है, और ऐसे हर बलात्कारी को चर्च बचाते भी आया है। अभी-अभी लंदन में कुछ मदरसों में बच्चियों के साथ ऐसा हुआ, और किसी धार्मिक संगठन ने उसके खिलाफ कुछ नहीं किया। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले भारत के बाहर सबसे मशहूर हिन्दू संगठन इस्कॉन के हॉस्टलों में इसी तरह बच्चों का यौन शोषण सामने आया था, और उस वक्त शायद इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का हर्जाना देकर अदालत के बाहर उस मामले को खत्म करवाया था। अमरीकी कानून इस तरह के जुर्म पर भी रूपयों से समझौता अदालत के बाहर करने देता है, लेकिन दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर यौन शोषण को हर्जाना देकर छोड़ा नहीं जा सकता।
हमारा यह मानना है कि पोप सरीखे दुनिया के सबसे अधिक अनुयायियों वाले अकेले धार्मिक मुखिया को इंसानियत और कानून इन दोनों के लिए कुछ अधिक सम्मान दिखाना चाहिए था। यह सिलसिला गलत है कि धर्म का चोगा पहनने वाले बलात्कारियों को अफसोस जाहिर करके और आंसू बहाकर छोड़ दिया जाए। इससे इस धर्म के बाकी संस्थानों में भी यह संदेश जाता है कि वे कुछ भी करके बच सकते हैं। ऐसे लोगों को पूरी जिंदगी के लिए धार्मिक संस्थानों से बाहर तो करना ही चाहिए, उन्हें कानून के हवाले भी तुरंत ही करना चाहिए।
भारत में हम लगातार देख रहे हैं कि धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए संगठनों ने तरह-तरह के बाबा और बापू लोग नाबालिग बच्चियों से बलात्कार को एक आदतन हरकत बनाकर चल रहे हैं, और यौन शोषण की भयानक कहानियां सामने आ रही हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और हमाराख्याल है कि जिस धर्म या आध्यात्म के संगठन या मुखिया ऐसे जुर्म करते पकड़ाते हैं, उनकी संस्थानों की दौलत जब्त करने का भी कानून बनाना चाहिए। फिलहाल पोप के आंसुओं पर महज रोया जा सकता है, क्योंकि वे एक पाखंड के अलावा कुछ नहीं हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी

रिश्तों की मजबूती की गारंटी

22 जनवरी  2018

पिछले कुछ दिनों से अपने बिल्कुल ही आसपास परिवार के भीतर हिंसा की असल जिंदगी की वारदातों को देखकर दिल हिला हुआ है। कभी-कभी तो किसी अखबार के एक ही पन्ने पर अगल-बगल तीन-तीन खबरें इसी इलाके की ऐसी छप रही हैं जिनमें एक में बाप ने दो बेटों को मार डाला, दूसरी खबर में मां ने बेटे को मार दिया, और तीसरी खबर में बेटे ने मां को मार डाला। ये खबरें देश के कुछ हिस्सों में चल रहीं उन ऑनर किलिंग से अलग हैं जिनमें परिवार के मर्जी के खिलाफ शादी करने पर लड़के-लड़कियों को बाप-भाई-चाचा मार डालते हैं। अभी की जो वारदातें दिल-दिमाग को हिला रही हैं, वे वारदातें सामाजिक प्रथाओं से परे, खालिस निजी हिंसा की हैं।
इसके साथ-साथ कुछ दूसरे किस्म की हिंसा और आत्मघाती वारदातों की खबरें भी अनायास बढ़ गई दिख रही हैं। स्कूल की एक लड़की स्कूल के ही छोटे बच्चे को इसलिए चाकू मार रही है कि स्कूल में छुट्टी हो जाए। ठीक ऐसी ही वारदात साल भर पहले भी, या कि कुछ महीने पहले भी आई थी जिसमें स्कूल की बड़ी क्लास के एक लड़के ने छोटी क्लास के एक लड़के का कत्ल कर दिया था, ताकि छुट्टी हो जाए। आज ही सुबह खबर है कि मेरे शहर के पास ही एक शादीशुदा, और बच्चों के बाप आदमी ने एक नाबालिग लड़की से प्रेम, या जैसे भी संबंध हों, के बाद शादी की संभावना न देखकर उसके साथ आत्महत्या की कोशिश की, वह लड़की मर गई, और यह आदमी फंदे पर झूलने के बाद भी बच गया। दो-तीन दिन पहले की ही खबर थी कि एक प्रेमी जोड़े ने एक साथ फांसी लगाई, और उसमें दोनों ही टंगे-टंगे मर गए।
ऐसी बहुत सी वारदातों को एक साथ देखने के बाद यह समझ पड़ता है कि परिवार का ढांचा उतना मजबूत शायद नहीं है जितना कि बाहर से दिखता है। ये तो मरने और मारने की कुछ ऐसी वारदातें हैं जो कि खबरों में आती हैं, लेकिन जो खबरों में नहीं आ पातीं, वैसी भी असल जिंदगी की अनगिनत भयानक कहानियां रहती हैं जो कि घर के किवाड़ों के भीतर ही दफन हो जाती हैं। परिवार के भीतर बच्चों के यौन शोषण, वयस्क लोगों के बीच अवैध कहे जाने वाले संबंध लोगों की कल्पना के मुकाबले अधिक आम हैं, और इन पर भरोसा करने को लोगों का दिल नहीं करता है, इसलिए इनको हकीकत मानने से इंकार कर दिया जाता है।
आज ही सुबह मेरे शहर के बगल के दो मामले सामने आए, इनमें से एक मामले में दस बरस पहले प्रेम-विवाह करने वाली एक महिला अपनी दो छोटी बच्चियों और पति को छोड़कर किसी एक ऐसे बदनाम मवाली किस्म के आदमी के पास चली गई जिससे कि वह रात-रात जागकर फोन और सोशल मीडिया में चैट किया करती थी, पति के समझाने के बावजूद। अब यह कल्पना करना लोगों को थोड़ा सा मुश्किल होगा कि दस बरस पहले का प्रेम-विवाह दो बच्चियों के होने के बाद ऐसा नाकामयाब क्यों हो रहा है कि एक महिला जानते-बूझते हुए एक शादीशुदा, मुजरिम, और मवाली के पास चली जा रही है, और वहां से अपने पति को धमकी दिलवाकर बच्चों को मांग रही है। एक दूसरा मामला इसी सुबह ऐसा आया है जिसमें एक धर्म की लड़की ने दूसरे धर्म के लड़के से तब शादी की, जब उस लड़की की सगाई हो चुकी थी। और अब वह आदमी उसे रोज पीट रहा है, और प्रताडि़त कर रहा है। कुछ महीनों के भीतर ही प्रेम या झांसा इस तरह हिंसा में तब्दील हो गया है।
ऐसे मामलों में परिवार, समाज, और पुलिस से लेकर अदालत तक का बहुत सा सरकारी वक्त जाया होता है, और सरकार का खर्च भी होता है। तो ऐसे मामलों से बचने के लिए आखिर क्या किया जाए? क्या परिवारों के और समाज के परंपरागत रीति-रिवाजों के तहत मां-बाप को शादियां तय करने दी जाएं? या फिर लोग अपनी मर्जी से शादी करें, और समाज के बंधनों को किनारे कर दें? ऐसी वारदातों को देखें तो इनमें एक बात उभरकर सामने आती है कि लोगों के बीच परिवार के ढांचे को तोड़कर निकलने की हिम्मत नहीं रहती, और लोग घुट-घुटकर भी परिवार के भीतर ही बने रहते हैं। चाहे वह आल-औलाद मां-बाप के साथ रहती हो, या फिर पति-पत्नी एक-दूसरे को ढोते हों।
संयुक्त परिवार से अलग होने कई किस्म की दिक्कतों और खतरों का एक ईलाज हो सकता है, और न पटने पर पति-पत्नी का अलग होना बहुत किस्म की हिंसा को टाल सकता है। लेकिन देश और समाज भी सांस्कृतिक और सामाजिक सोच परिवार के विघटन को बुरा मानती है। शादी के तुरंत बाद अगर बेटा-बहू अलग रहने लगते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि बहू ने आती ही बेटा छीन लिया। दूसरी तरफ पति-पत्नी अगर अलग होते हैं तो उसे एक सामाजिक दाग मान लिया जाता है, और जिंदगी में आगे उनके दुबारा घर बसाने में दिक्कतें होती हैं, या कि मान लिया जाता है कि दिक्कतें होंगी।
अभी यह लिखा ही जा रहा है कि मेरे शहर ही की एक खबर आ रही है कि एक बूढ़ी मां को घर में कैद करके इमारत के चौकीदार को चाबी देकर उसके बेटे अपने नए घर में रहने चले गए।
दरअसल हिन्दुस्तान में दिक्कत इस सोच की है कि लोगों का अलग रहना परिवार के ढांचे का कमजोर होना होता है। बहुत से मामलों में होता यह है कि लोग कुछ दूर रहने लगते हैं, अलग रहने लगते हैं, तो उनकी जिंदगी कुछ बेहतर भी हो सकती है। लोगों को यह समझना होगा कि हिंसक टकराव के साथ एक साथ रहने के बजाय बेहतर यह होता है कि लोग बिना टकराव दूरी पर रहें, और आड़े वक्त एक-दूसरे के काम आ सकें। ऐसा तनाव से गुजरने वाले पति-पत्नी भी कर सकते हैं, प्रेमी-प्रेमिका भी कर सकते हैं, और परिवार की दो पीढिय़ां तो कर ही सकती हैं। लेकिन लोगों के बीच सामाजिक दबाव के चलते जब ऐसी जिद हावी रहती है, या ऐसी मजबूरी रहती है कि उन्हें साथ रहना है, तो ऐसी नौबत हिंसा तक पहुंचने का एक बड़ा खतरा रहता है।
शादी-शुदा लोगों के अवैध कहे जाने वाले विवाहेतर संबंधों के बारे में यह समझने की जरूरत है कि ऐसे संबंध आम इंसानी मिजाज के मुताबिक ही हैं, उनसे अलग नहीं हैं। सामाजिक परंपराएं लोगों को एक ही जीवन-साथी के साथ बंधे रहने को बेबस सा करती हैं, लेकिन हकीकत में इंसान एक जीवन-साथी से हमेशा बंधा रहे, ऐसा जरूरी नहीं रहता, ऐसा कई मामलों में हो नहीं पाता है। इसलिए ऐसी तमाम नौबतों के बारे में सोचकर लोगों को दो बातें करनी चाहिए, पहली बात तो यह कि ऐसी आशंका को नकारना बंद कर देना चाहिए, और दूसरी बात यह कि ऐसी आशंका की सोचकर अपनी तैयारी भी रखनी चाहिए। जो महिलाएं अधिक आत्मनिर्भर होती हैं, आर्थिक रूप से सक्षम होती हैं, वे अपने साथ होने वाली ऐसी किसी बेइंसाफी को अधिक दूर तक झेल पाती हैं, उनसे उबर पाती हैं। लेकिन जो महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होतीं, उनके साथ बड़ी बुरी गुजरती है।
ऊपर की तमाम बातें अलग-अलग किस्म की कतरा-कतरा बातें हैं, लेकिन इनमें एक बात एक सरीखी है कि परिवार और समाज, आपसी रिश्तों के ढांचे को फौलाद सरीखा मजबूत मानना एक बड़ी चूक होती है। दूसरी बात यह कि एक दूसरे का दम घोंटते हुए साथ रहने के नुकसान के बजाय लोगों को अलग रहने के नफे समझने चाहिए। तीसरी बात यह कि लोगों को अपने भले के लिए अपने मर्जी के कुछ काम करने का हौसला भी जुटाना चाहिए। लेकिन ये बातें जटिल सामाजिक तनाव के इलाज के लिए कोई रामबाण दवा नहीं हैं, ये महज एक चर्चा है जिससे कि लोग अपनी-अपनी जिंदगी, और अपने-अपने दायरे के तनावों को समझ सकें, और उससे बचने, उससे निपटने के रास्ते सोच सकें।
लोगों को रिश्तों और जिंदगी को हमेशा के लिए मजबूत मानकर नहीं चलना चाहिए, और ऐसे में ही लोग आत्मनिर्भर हो पाएंगे, और अपना इंतजाम अधिक सुरक्षित कर सकेंगे। जैसे-जैसे लोगों के अपने निजी इंतजाम अधिक सुरक्षित हो सकेंगे, वैसे-वैसे उनके रिश्ते तनाव कम झेलेंगे। बहुत से तनाव खड़े ही इसलिए हो पाते हैं क्योंकि उन्हें झेलने वाले लोग उसके लायक तैयार नहीं होते। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि आत्मनिर्भरता बहुत किस्म के रिश्तों की मजबूती की गारंटी भी रहती है। (Daily Chhattisgarh)

निजी फायदे, निजी अस्तित्व, और राष्ट्रीय जिम्मेदारियां...

संपादकीय
22 जनवरी 2018


दिल्ली में आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों को संसदीय सचिव का दर्जा पाने की वजह से चुनाव आयोग ने विधायकी से अपात्र घोषित कर दिया, और आयोग के इस फैसले को राष्ट्रपति ने मंजूरी भी दे दी। इसलिए फिलहाल जब तक, और अगर, कोई कानूनी राहत नहीं मिलती है, तो आम आदमी पार्टी विधानसभा में बीस सदस्य खो चुकी है। और ऐसे मौके पर दिल्ली की कांग्रेस पार्टी ने आम आदमी पार्टी पर एक हमला भी बोला है। नतीजा यह है कि दिल्ली राज्य की तस्वीर में अब आम आदमी पार्टी एक तरफ है, और कांग्रेस-भाजपा दोनों ही अलग-अलग सही, लेकिन दोनों ही आप के खिलाफ हैं। वैसे तो यह एक राज्य का मामला है, लेकिन इससे देश की राजनीति में कांग्रेस का एक रूख भी उजागर होता है कि उसके सामने आज चुनौती भाजपा को शिकस्त देने के बजाय अपने हस्ती को बनाए रखने की अधिक है।
इस बात को समझने की कोशिश करें तो आज पूरे देश में भाजपा और उसके सहयोगी दल एक तरफ हैं, और बाकी तमाम पार्टियां एक तरफ हैं। एनडीए की बाहर की पार्टियों का साफ मानना है कि देश को भाजपा की नीतियों से बचाना है, लेकिन भाजपा को साम्प्रदायिक कहने वाली इन पार्टियों के बीच आपस में जितने किस्म के तनाव और मतभेद चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह बात बहुत आसान नहीं लग रही है कि ये पार्टियां अपने-अपने निजी अस्तित्व को कुछ देर के लिए भूलकर एक व्यापक वैचारिक-सैद्धांतिक गठबंधन के लिए साथ आ पाएंगी। कहने को यह भी कहा जा सकता है कि अभी आम चुनावों में खासा वक्त बाकी है, और ऐसा गठबंधन चुनाव के करीब ही उभर पाता है। लेकिन आज दिल्ली को अगर देखें तो यह बात साफ है कि आम आदमी पार्टी की मुसीबत की इस घड़ी पर अगर कांग्रेस पार्टी उसके ऊपर हमलावर बनी रहेगी, तो आगे जाकर गैरभाजपाई किसी गठबंधन की संभावनाएं कमजोर ही होंगी।
यह कांग्रेस या किसी दूसरी पार्टी की राजनीति में कोई नई या अनोखी बात नहीं है क्योंकि महाराष्ट्र में हम रात-दिन यह देख रहे हैं कि किस तरह सत्ता में भागीदार और एनडीए गठबंधन की हिस्सेदार शिवसेना लगातार भाजपा पर हमलावर बनी रहती है, और दोनों के बीच रिश्ते कई बार टूटते दिखते हैं, और फिर वे टूटते-टूटते बचते भी दिखते हैं। ऐसा ही कांग्रेस के कुछ गठबंधनों के साथ भी हो सकता है, लेकिन आज देश में भाजपा के तेवर ऐसे हैं कि वे दूसरी पार्टियों और दूसरे गठबंधनों में पैदा होने वाले किसी भी तनाव को अपने पक्ष में भुनाने में एक महारथ हासिल कर चुकी है। कई प्रदेशों में उसने ऐसा कर दिखाया है, कहीं नीतीश कुमार लालू को छोड़कर भाजपा के साथ आ गए, तो कहीं कांग्रेस छोड़कर बड़े-बड़े नेता सीधे भाजपा जा रहे हैं। ऐसे माहौल में कांग्रेस को अगर देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के अपने दावे को प्रासंगिक बनाए रखना है, और भारतीय-चुनावी राजनीति में हाशिए पर जाने से बचना है, तो उसे एक राष्ट्रव्यापी और बड़ी पार्टी होने की जिम्मेदारी निभानी होगी। जब एक मुखिया की तरह कोई जिम्मेदारी पूरी करनी रहती है, तो कई बार निजी नुकसान झेलकर भी बिरादरी का मुखिया बनने का जिम्मा पूरा करना पड़ता है। कांग्रेस को आज अगर पूरे देश में भाजपा के खिलाफ, साम्प्रदायिकता के खिलाफ, अलोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ कोई एक व्यापक वैचारिक गठबंधन तैयार करना है, तो उसे छोटी पार्टियों और दूसरे नेताओं की मुसीबत में उनका साथ देने की भी सोचना होगा। हो सकता है कि किसी एक राज्य में कांग्रेस की किसी दूसरी पार्टी से अस्तित्व की लड़ाई चल रही हो, लेकिन जब देश भर में भाजपा-एनडीए के मुकाबले एक विकल्प बनने या बनाने की बात करनी होगी, तो कांग्रेस को तंगदिली और तंगनजरिया छोडऩा होगा। दिल्ली कांग्रेस के नेता अजय माकन का पूरा अस्तित्व आम आदमी पार्टी के विरोध पर जिंदा हो सकता है, लेकिन क्या देश भर में कांग्रेस पार्टी अपने क्षेत्रीय छत्रपों के अस्तित्व का ख्याल रखते हुए अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी कर पाएगी?
हालांकि हम जो बात कह रहे हैं उसके खिलाफ भी बहुत सी मिसालें भारतीय राजनीति में हैं, और इनमें से कुछ तो हाल के बरसों में भाजपा ने ही पेश की हैं कि जब, जहां जीत के लिए जरूरत हो, किसी भी पार्टी या नेता को लाकर, अपने पुराने लोगों को दरकिनार करके एक चुनाव जीत लिया जाए। लेकिन कांग्रेस-यूपीए में न तो आज इस तरह की क्षमता दिख रही है, और न ही ऐसी संभावना फिलहाल बाकी दिख रही है। इसलिए एक विचार के रूप में देश के गैरभाजपाई दलों को हमारी आज की बात पर सोचना चाहिए कि क्या अपने थोड़े-थोड़े निजी फायदों को किनारे धरकर वे एक व्यापक गठबंधन या व्यापक तालमेल बना सकते हैं?  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी

म्युनिसिपल का हमला किसी बड़े पर नहीं, महज गरीबों पर

संपादकीय
21 जनवरी 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नए पुलिस कप्तान के आने के बाद ट्रैफिक को सुधारने की जोरदार कोशिश शुरू हुई है। इसमें म्युनिसिपल भी हिस्सा ले रही है, और जैसा कि आमतौर पर होता है, सड़कों के किनारे से अवैध कब्जे हटाने के नाम पर जो अभियान चल रहा है, उसका पहला और अकेला हमला उन ठेले-खोमचे वालों पर हो रहा है जिनका पूरा कारोबार महज एक ठेले जितनी जगह पर चल रहा था, और अब मशीनों से उन ठेलों को ले जाकर उनकी रोजी-रोटी खत्म कर दी गई है। दूसरी तरफ बाजार में सड़कों के किनारे बड़ी-बड़ी दुकानों का सामान दूर तक सजाकर रखा जाता है, और ऐसा करने वाले वे कारोबारी हैं जिनके पास खासी बड़ी जगह अपने धंधे के लिए है। इसके बावजूद वे बाहर इतनी जगह घेरकर रखते हैं जितने पर ठेले-खोमचे वाले अपना पूरा रोजगार चलाते हैं। दरअसल यह सोच एक ऐसी अफसरशाही है जो कि जमीन से बिल्कुल ही जुड़ी हुई नहीं है। और जो निर्वाचित नेता म्युनिसिपल में पार्षद हैं, या तो उनकी कुछ चलती नहीं है, या उन्हें भी अब धीरे-धीरे करके, महंगे चुनाव लड़कर, महंगी गाडिय़ों में चलकर बड़े दुकानदारों की ही फिक्र बाकी रह गई है।
एक तरफ तो देश में लोगों को स्वरोजगार के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है, और दूसरी तरफ जो गरीब जरा सी जगह पर बिना किसी कब्जे के रोज का कारोबार करते हैं, उनको बेदखल किया जा रहा है, बिना किसी दूसरे इंतजाम के। अफसरों की यह सोच भयानक है, और दुनिया के किसी भी सभ्य और विकसित देश में म्युनिसिपल अपने स्थानीय लोगों को इस तरह से कुचलते हुए नहीं चलती हैं। सड़कों के किनारे से कब्जे हटाने की शुरूआत जब करनी हो, तो सबसे पहले उनके कब्जे हटाने चाहिए जिनके पास खुद की बाकी जगह है, लेकिन जिनकी नीयत अपने शटर के भीतर तक सीमित नहीं रह पाती। शहर के हर बड़े बाजार, हर व्यस्त सड़क पर बड़ी दुकानों के ऐसे कब्जे आम बात हैं, और उन पर पिछले बरसों में कोई जुर्माना भी हुआ हो, ऐसा पढऩे में नहीं आता।
इसी शहर में बाजार में ऐसे बड़े-बड़े अवैध निर्माण धड़ल्ले से हुए हैं जिनमें सड़क किनारे की जमीन पर कई मंजिलों की इमारत खड़ी कर दी गई हैं। म्युनिसिपल इनको आखिरी नोटिस तक दे चुकी है, लेकिन इसके बाद कार्रवाई उन पर कुछ नहीं होती। ऐसे में रोज कमाकर खाने वाले करीब ठेले-खोमचे वालों पर म्युनिसिपल की मशीनों की ऐसी फौलादी कार्रवाई पूरी तरह अलोकतांत्रिक है, और जनविरोधी है। यह नौबत स्थानीय शासन में निर्वाचित लोगों की भूमिका खत्म हो जाने का एक बड़ा सुबूत भी है चाहे उसे अफसर खत्म कर रहे हों, चाहे उसे निर्वाचित प्रतिनिधि खुद ही छोड़कर फायदे के दूसरे कामों में लग रहे हों। जनकल्याणकारी सरकार में किसी कमाते-खाते मेहनतकश गरीब को बिना दूसरे इंतजाम के बेदखल नहीं करना चाहिए, और बेदखली का सिलसिला उन बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए जिनकी दुकानों के पुतले और सामान सड़कों को दूर तक घेरकर रखते हैं।
ट्रैफिक को सुधारना या सड़कों को चौड़ा खाली रखना दोनों ही अच्छी बातें हैं, लेकिन यह काम बड़े लोगों से शुरू होना चाहिए, उन गरीब लोगों से नहीं जिनकी कमाई का पूरा जरिया ही सरकारी ट्रकों पर लादकर ले जाकर फेंक दिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि राज्य में प्रदेश स्तर के मंत्रियों या सांसद-विधायकों में भी गरीबों के लिए दर्द अब बाकी नहीं रह गया है, वरना ऐसी बेदखली की तस्वीरें देखकर सरकार लोगों का रोजगार छीनने से परहेज करती। जिस किसी शहर में महज गरीबों को निशाना बनाकर अवैध कब्जा हटाने की बात कही जा रही है, उसका जमकर विरोध होना चाहिए। लोगों को बेरोजगार बनाकर कोई शहर सुविधा-संपन्न या सुंदर नहीं हो सकता। शहर को स्मार्ट बनाने के लिए लोगों की रोजी-रोटी छीनना एक कमअक्ली का काम है, और गरीब जनता आने वाले किसी भी चुनाव में जनप्रतिनिधियों से इसका हिसाब चुकता जरूर करेगी। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जनवरी

हिंसक फतवों पर सरकारें चुप, सुप्रीम कोर्ट सीधे दखल दे...

संपादकीय
20 जनवरी 2018


राजस्थान में राजपूत महिलाओं के एक संगठन ने धमकी दी है कि अगर देश में कहीं भी पद्यावत फिल्म रिलीज होती है, तो वे चित्तौडग़ढ़ के किले में जाकर जौहर का इतिहास दुहराएंगी। इतिहास या कहानी के मुताबिक इस किले में राजपूत महिलाओं ने आग में कूदकर जान दी थी, जिसे उस वक्त की प्रथा के मुताबिक जौहर कहा जाता है। अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने इस फिल्म को पूरे देश में रिलीज होने देने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाली है, और कहा है कि कानून व्यवस्था को सम्हालना उनकी जिम्मेदारी है, और इस पर किसी भी तरह की रोक लगाने से इंकार कर दिया है। दूसरी तरफ राजस्थान में राजपूतों के एक संगठन ने कहा है कि इस फिल्म को इजाजत देने वाले सेंसर बोर्ड के चेयरमैन को जयपुर साहित्य महोत्सव में आने पर राजस्थान में ही घुसने नहीं दिया जाएगा। इधर छत्तीसगढ़ में भी एक राजपूत संगठन की यह चेतावनी सार्वजनिक रूप से सामने आई है कि अगर इस फिल्म को रिलीज किया जाता है तो सिनेमाघरों और मॉल में आग लगा दी जाएगी।
हमारा ख्याल है कि यह देश धर्म और जाति के नाम पर एक ऐसी कट्टरता की तरफ बढ़ रहा है जिस पर काबू पाने का हौसला अदालत के अलावा और किसी जिम्मेदार संवैधानिक संस्था में दिख नहीं रहा है। संसद देश के जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर बेअसर हो गई है, और वहां पर सत्ता और विपक्ष की गिनती के बीच एक पंजा-कुश्ती सी चलती रहती है। टीवी चैनलों पर अलग-अलग पार्टियों और संगठनों के लोग कानून को चुनौती देते हुए देश में आग लगाने और फैलाने के बयान देते हैं, और उन पर उनसे जुड़े राजनीतिक दल भी कुछ नहीं कहते, उनसे जुड़े नेता भी कुछ नहीं कहते। इन सबके चलते हुए देश एक ऐसी कट्टरता में गहरे धंसते जा रहा है जो कि शायद उस इतिहास में भी न रही हो जिसके हकीकत होने का दावा करते हुए आज बहुत सी जातियों और बहुत से धर्मों के संगठन अपनी ठेकेदारी कायम करने में लगे हुए हैं।
आज देश में जो माहौल बन रहा है उसमें सुप्रीम कोर्ट को सीधे दखल देने की जरूरत है। लोगों को याद होगा कि उत्तरप्रदेश के एक बड़बोले समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने बलात्कार की शिकार एक महिला के बारे में गंदी जुबान से एक बयान दिया था, और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कटघरे में खड़ा करके उनके उगले गए हिंसक शब्द वापिस निगलने पर मजबूर किया था। आज प्रदेशों की सरकारें अगर अपने-अपने इलाकों में हिंसा के फतवे देने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई करने की इच्छा ही नहीं रखती हैं, कोई कार्रवाई कर ही नहीं रही हैं, तो अब जिम्मेदारी केवल अदालत पर आ जाती है। हिंसा के फतवे जारी करने वाले लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट सीधे भी दे सकता है, और राज्य सरकारों को भी कटघरे में खड़ा कर सकता है कि ऐसे सार्वजनिक-हिंसक बयानों के बावजूद सरकार ने अपनी जिम्मेदारी पूरी क्यों नहीं की? वोटरों के तलुए सहलाने के फेर में सत्ता पर काबिज राजनीतिक पार्टियां कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करती हैं। ऐसे में देश में कानून का राज कायम करवाने का जिम्मा अदालत का है, और चूंकि राज्यों के हाईकोर्ट भी ऐसे हिंसक फतवों पर कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर दखल देनी चाहिए, और आत्मदाह या जौहर सरीखे आत्मघाती फतवों पर भी कार्रवाई करनी चाहिए, और दूसरों के साथ हिंसा की धमकियों पर भी।
आज बहुत से बकवासी-ठेकेदारों को मीडिया में बने रहकर अपनी हस्ती बचाए रखने की बड़ी फिक्र रहती है, लेकिन वे ऐसा करके देश में हिंसा और नफरत का, अराजकता का एक ऐसा माहौल बनाते हैं जिसका इस्तेमाल दूसरे समुदायों के लोग भी करते हैं। इसलिए हमारा ख्याल है कि अदालत को ऐसे सिलसिले को खत्म करना चाहिए, ऐसी हिंसक बकवास करने वाले लोगों को सीधे कटघरे में खड़ा करना चाहिए, और सामाजिक अराजकता फैलाने के जुर्म में सीधे जेल में डालना चाहिए। यह एक तकलीफ की बात है कि हिन्दुस्तान कुछ बरस पहले एक बेहतर लोकतंत्र था, और उसमें इतने फतवों की जगह नहीं थी, लेकिन हाल के बरसों में इसमें अराजक और साम्प्रदायिक हिंसा का माहौल बढ़ गया है, जिसे तुरंत कुचलना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी