दीवारों पर लिक्खा है, 24 नवंबर 2020


 

देश में कांग्रेस को देखना चाहिए छत्तीसगढ़ मॉडल

 कुछ हफ्ते पहले जब करीब दो दर्जन बड़े कांग्रेस नेताओं ने कांग्रेस पार्टी के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए थे, और पार्टी के अनमने मुखिया राहुल गांधी की लीडरशिप का नाम लिए बिना यह बुनियादी सवाल उठाया था कि पार्टी इस तरह कैसे चल सकती है, तो उसके तुरंत बाद कांग्रेस संगठन की सबसे बड़ी कमेटी, कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक थी, और उसमें कुछ नहीं किया गया। इतना जरूर हुआ कि सवालिया नेताओं को बागी मानते हुए उनमें से कुछ के पर कतरे गए। लेकिन लोग चुप रहे क्योंकि पार्टी में सुधार की बात करने को बगावत मान लिया गया, और भाजपा के हाथ मजबूत करना करार दिया गया। लेकिन आग दबी भर थी, बुझी तो नहीं थी, इसलिए अभी कपिल सिब्बल ने फिर से यह सवाल उठाया है कि देश की सबसे पुरानी और इतनी बड़ी पार्टी डेढ़ बरस से बिना अध्यक्ष किस तरह रह सकती है? एक सवाल गुलाम नबी आजाद ने भी उठाया है कि फाईव स्टार होटलों से बैठकर चुनाव नहीं लड़े जा सकते।

कुल मिलाकर कांग्रेस में आज पार्टी के तौर-तरीकों को लेकर तीखे सवाल उठ खड़े हो रहे हैं, और जो लोग इन 23 लोगों की चि_ी में दस्तखत करने वाले नहीं थे, उनके मन में भी सवाल उठ रहे हैं। ये सवाल हर उस कांग्रेसी के मन में उठ रहे हैं जिसे कांग्रेस की फिक्र है, और कांग्रेस की हालत आज बहुत बड़ी फिक्र के लायक ही रह गई है। इस पार्टी से देश में सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ एक गठबंधन बनाने की उम्मीद की जाती है क्योंकि एनडीए के अलावा पूरे देश में मौजूदगी वाली यही एक पार्टी है। जिस यूपीए गठबंधन के तहत पिछला आम चुनाव लड़ा गया था, उसमें सिर्फ कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसकी मौजूदगी पूरे देश में है। और एनडीए और यूपीए से परे भी कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाले एनडीए के सामने खड़ी हो सके, और कुछ राज्यों में जिसका अस्तित्व हो। अधिकतर पार्टियां एक या दो राज्यों में मौजूदगी वाली हैं, और उन राज्यों से परे किसी और का भरोसा बैठना नहीं है।

दूसरी तरफ एक और बात को समझने की जरूरत है कि यह चर्चा हिन्दुस्तान के इस ऐसे दौर में हो रही है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा के मातहत एनडीए चुनाव जीतने वाली एक ऐसी मशीन बन चुकी है जो या तो मतदान केन्द्र में जीत जाती है, या फिर राजभवन और विधानसभा में। देश में यह तस्वीर अभूतपूर्व है, हिन्दुस्तान के चुनावी इतिहास के 10 बरस पहले तक के दौर में किसी ने ऐसे चुनावी माहौल की कल्पना भी नहीं की थी, जब एक-एक करके तमाम पार्टियां किनारे कर दी जाएंगी, और देश में सिर्फ कमल ही खिलने का माहौल रह जाएगा। आज एनडीए की दूसरी पार्टियां भी देश में जगह-जगह भाजपा की पीठ पर सवार होकर सत्ता तक पहुंच रही हैं, और पूरे देश की चुनावी राजनीति न सिर्फ भाजपा-केन्द्रित हो गई है, बल्कि मोदी-केन्द्रित हो गई है। ऐसे दौर में यूपीए नाम के गठबंधन की मुखिया कांग्रेस पार्टी की लीडरशिप अगर चुनावी मैदान से और देश की राजनीति से गायब सरीखी हो गई है, रोजाना एक या दो ट्वीट तक सीमित हो गई है, तो यह न सिर्फ गैरएनडीए विपक्ष के लिए खतरे की बात है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी खतरे की बात है। किसी भी मजबूत लोकतंत्र में सत्ता जितनी जरूरी होती है उतनी ही जरूरी मजबूत विपक्षी पार्टियां भी होती हैं।

अब मुद्दे की बात पर आएं तो कांग्रेस पार्टी को जिस एडहॉक तरीके से हांका जा रहा है, उससे वह किसी मंजिल तक नहीं पहुंच रही है। जब मोदी की लीडरशिप में भाजपा ने इस देश के चुनाव प्रचार, राजनीतिक और सामाजिक एजेंडे, धार्मिक मुद्दे, और चुनाव प्रचार के तरीके, इन सबके नए पैमाने गढ़ दिए हैं, जब जनधारणा को चिकनी गीली मिट्टी की तरह मोडक़र मनचाहा आकार देना मोदी के बाएं हाथ का खेल हो चुका है, तब कांग्रेस पार्टी इस तरह अपने एक हाथ पर दूसरा हाथ धरे बैठी रहे, तो वह हाशिए के सिरे पर पहुंच जाने से बस दो ही कदम तो दूर है। कांग्रेस पार्टी आज एक बहुत ही अजीब से मुहाने पर पहुंची हुई है, वह सोनिया-परिवार की लीडरशिप को बचाए रखे, या कि कांग्रेस पार्टी को बचाए रखे, यह मुद्दा तय करना है। हम लंबे समय से चली आ रही कुनबापरस्ती की तोहमतों के इतिहास में जाना नहीं चाहते, लेकिन आज हकीकत यह है कि अगर कांग्रेस पार्टी अपने अनमने और अघोषित मुखिया राहुल गांधी से परे कुछ नहीं सोच पाती है, तो उसके पास बहुत जल्द खोने को कुछ नहीं बचेगा।

हम जिस छत्तीसगढ़ में बैठकर यह बात लिख रहे हैं यहां पर हमने पिछले 15 बरसों के भाजपा शासन के दौरान कांग्रेस को संघर्ष करते देखा है। और खासकर आखिरी के शायद 5 बरसों में भूपेश बघेल की अगुवाई में प्रदेश कांग्रेस ने यहां जितनी धारदार और हमलावर विपक्षी लड़ाई की थी, वह देखने लायक थी। और ये हमारे विशेषणों की बात नहीं है, पिछले विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में जिस तरह कांग्रेस ने भाजपा को अपना रोड रोलर चलाकर चपटा कर दिया था, उसे 15 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया था, वह कांग्रेस की एक दमदार मेहनत के बिना नहीं हुआ था। हिन्दुस्तान बहुत बड़ा देश है, इसलिए यह कल्पना करना आसान या जायज नहीं होगा कि कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में ऐसी लड़ाई लडऩे वाला दमदार मुखिया चाहिए जैसा पिछले विधानसभा चुनाव के पहले छत्तीसगढ़ कांग्रेस को हासिल था। यह बात भूपेश बघेल के खिलाफ इस्तेमाल भी की जा सकती है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की काबिलीयत के पैमानों में भूपेश बघेल के विपक्ष के कार्यकाल का जिक्र किया जा रहा है। कांग्रेस देश भर में से जिसे चाहे उसको अध्यक्ष बनाए, लेकिन उस व्यक्ति को चौबीसों घंटे राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर चौकन्ना रहना होगा। कांग्रेस पार्टी, और उसके अगुवाई वाला गठबंधन आज देश में ऐसी हालत में नहीं हैं कि एक गैरगंभीर मुखिया के तहत वे जिंदा भी रह सकें। बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस लीडरशिप के तौर-तरीकों पर गठबंधन के भागीदार दूसरे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए हैं। उन्हें सार्वजनिक रूप से उठाना जायज था या नहीं, उस पर हम नहीं जाते, लेकिन वह सवाल तो जायज था। इसलिए इसके पहले कि यूपीए के बाकी साथी ऐसे सवाल उठाएं, वे इधर-उधर तितिर-बितिर हो जाएं, उसके पहले कांग्रेस को अपना घर सम्हालना चाहिए और पार्टी को सोनिया परिवार से बाहर का एक अध्यक्ष देना चाहिए। ऐसा करना राहुल गांधी के साथ भी इंसाफ होगा जिन्होंने पिछले डेढ़ बरस में अपने आपको पार्टी की औपचारिक लीडरशिप से अलग कर रखा है, और रोजाना एक ट्वीट, और बिहार चुनाव में तीन दिन प्रचार तक सीमित रखा है। कांग्रेस को एक पूर्णकालिक, महत्वाकांक्षी, मेहनती, और लीडरशिप की बाकी खूबियों वाला नेता चाहिए। जब पूरा देश नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के कदमोंतले रौंदा जा रहा था, उस वक्त भी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने यह साबित किया था कि 15 बरसों की विपक्षी कंगाली के बावजूद वह सत्तारूढ़ भाजपा को, मोदीछाप पार्टी को नेस्तनाबूत कर सकती है। आज देश भर में कांग्रेस को इसी किस्म की मेहनत की जरूरत है, एक विश्वसनीय नेता की जरूरत है जिस पर लोगों को यह भरोसा हो सके कि वे हर वक्त मोर्चे पर डटे रहेंगे, पार्टी के लोगों को हासिल रहेंगे। कांग्रेस पार्टी के मुसाहिबों को यह बात खल सकती है, खलेगी ही, लेकिन सच तो यह है कि पार्टी को एक जीवाश्म (फॉसिल) बनाकर सोनिया परिवार को उसका लीडर बनाए रखना समझदारी नहीं होगी। 

(Daily Chhattisgarh)


दीवारों पर लिक्खा है, 23 नवंबर 2020


 

लापरवाह राजा-प्रजा पर भरोसा न करे सुप्रीम कोर्ट

 सुप्रीम कोर्ट कोरोना-मृतकों के अंतिम संस्कार को सम्मानपूर्ण तरीके से करने के मुद्दे पर खुद होकर सुनवाई कर रहा है। बहुत सी जगहों से खबरें आती हैं कि कोरोना से मरने वाले लोगों का अंतिम संस्कार या उनका कफन-दफन ठीक से नहीं हो रहा है, या परिवार के लोगों को आखिरी बार चेहरा देखने नहीं मिल रहा है। यह लोगों का, और मरने वालों का भी एक बुनियादी हक है, और इसलिए अदालत ने इस पर खुद सुनवाई शुरू की है।

लेकिन कोरोना-मृतकों के अंतिम संस्कार से बहुत से मानवीय पहलू सामने आ रहे हैं। बहुत से मामलों में घरवाले अंतिम संस्कार से इंकार कर दे रहे हैं, और सरकार के इंतजाम में मृतक के धार्मिक रिवाज के मुताबिक अंतिम संस्कार हो रहा है। कई जगहों पर तो सरकार के जो अफसर इस काम में लगे हैं, वे दर्जनों लाशों का अंतिम संस्कार करवाते हुए खुद भी कोरोनाग्रस्त हो रहे हैं। अभी एक वीडियो सोशल मीडिया पर आया है जिसमें जाहिर तौर पर मुस्लिम दिख रहे कई सामाजिक कार्यकर्ता शव वाहन से हिन्दू शव उतार रहे हैं, और हिन्दू विधि से अंतिम संस्कार कर रहे हैं, परिवार के लोग दूर खड़े देख रहे हैं। महामारी ऐसी भयानक है कि परिवार का डरना भी नाजायज नहीं है, और अपनी जिंदगी खतरे में डालकर सरकार या समाज के जो लोग यह काम कर रहे हैं, उनकी बेबसी को भी समझना चाहिए कि वे मृतक का चेहरा दिखाने जैसा अतिरिक्त खतरा उठाने की हालत में नहीं हैं।

फिर भी आज यहां हम मृतकों के बारे में नहीं लिख रहे हैं, जो अब तक मृतक नहीं बने हैं उनके बारे में लिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सुनवाई के दौरान दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, और असम की राज्य सरकारों से जवाब मांगा है कि वे इस महामारी की रोकथाम के लिए क्या कर रही हैं। वे अदालत ने कहा है कि गुजरात में हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। अदालत की इस फिक्र से परे भी पिछले कई हफ्तों से हमारा यह अंदाज था कि आने वाले महीनों में हिन्दुस्तान में कोरोना की एक दूसरी लहर आएगी। दरअसल दुर्गा पूजा से लेकर दीवाली तक, और छठ से लेकर कुछ और त्यौहारों तक लोगों ने जिस तरह जमकर लापरवाही दिखाई है, भीड़ में धक्का-मुक्की की है, बाजार पर टूट पड़े हैं, और फिर दीवाली मिलन से लेकर छठ के घाट तक जितनी बेफिक्री दिखाई गई है, उससे कोरोना भी शायद हक्का-बक्का हो गया होगा कि उसकी इज्जत जरा भी नहीं बची है। कल की ही मध्यप्रदेश की तस्वीरें हैं, सत्तारूढ़ भाजपा का एक छोटे से जिले में दीवाली मिलन हो रहा है, और शासन के कोरोना नियमों के मुताबिक दो सौ से अधिक लोग किसी आयोजन में नहीं जुट सकते, लेकिन भाजपा के इस कार्यक्रम में हजार से अधिक लोग थे। और वहां के लोगों ने इसे दीवाली मिलन के बजाय कोरोना मिलन करार दिया है, और अब तस्वीरों के सुबूत के साथ उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन कार्रवाई करेगा। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी निवास पर पोला-तीजा की पूजा की थी, और सैकड़ों महिलाओं की भीड़ वहां जुटी थी। बात किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है या किसी एक प्रदेश की नहीं है, जब सरकारी नियमों से हिकारत दिखाने की बात आती है तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत में एक असाधारण एकता दिखने लगती है। यह देश वैसे तो क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, जैसी कई सरहदों से बंटा हुआ है, लेकिन जब सरकारी नियम तोडऩे की बात आती है तो हर तबके के लोग, राजा और प्रजा, तकरीबन सारे ही लोग हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, आपस में सब भाई-भाई बन जाते हैं। (हम इस प्रचलित वाक्य को इस असहमति के साथ लिख रहे हैं कि इसमें बहनों की कोई जगह नहीं रखी गई है)।

ठंड के मौसम को लेकर पहले से यह आशंका थी कि कोरोना इस मौसम में अधिक आक्रामक हो सकता है। दिल्ली की एक अलग दिक्कत यह है कि वहां पर ठंड और प्रदूषण दोनों मिलकर लोगों का जीना हराम कर देते हैं, और बहुत से मरीजों को तो दिल्ली छोड़ देने की सलाह दी जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को डॉक्टरी सलाह पर दिल्ली से बाहर चले जाना पड़ा है। अब दिल्ली से बाकी पूरे देश का सरकारी और कारोबारी रिश्ता ऐसा जुड़ा हुआ है कि वहां अगर महामारी की नौबत खतरनाक होती है, तो वहां से बाकी पूरे देश तक उसके जाने का खतरा रहता है। और बाकी देश वैसे भी आज कोई कोरोनामुक्त है नहीं। पिछले एक महीने में अगर कोरोना पॉजिटिव की गिनती कुछ कम बढ़ी थी, तो इसकी एक वजह त्यौहार भी थे। लोग त्यौहारों की खरीदी और बिक्री में लगे थे, ऐसे में वे जांच कराना नहीं चाहते थे, और कोरोना के आंकड़े थोड़े से टले थे, कहीं गए नहीं थे। इस दौरान एक खतरनाक बात यह जरूर हुई कि बिना जांच के कोरोनाग्रस्त लोग घूमते रहे, बाजारों में, मंदिरों और दूसरे धर्मस्थलों में धक्का-मुक्की की नौबत रही, और इन सबका असर अब देखने मिल रहा है, और दिल्ली शहर में लगातार तीन दिन से सौ से अधिक लोग रोज कोरोना से मर रहे हैं।

हिन्दुस्तान में कोरोना को लेकर जो वैज्ञानिक चेतना लोगों में आनी चाहिए थी, जो सावधानी रहनी चाहिए थी, वह कहीं नजर नहीं आ रही। ताली-थाली, दिया-मोमबत्ती जैसे अवैज्ञानिक तरीकों को लोगों ने कोरोना से निपटने का जरिया मान लिया, और महामारी के खतरे की तरफ से बेफिक्र हो गए। धर्म वैसे भी अपने हथियार पर धार करने के बाद सबसे पहले अपने पैदाइशी दुश्मन, विज्ञान को मारने निकलता है। इन दोनों का अस्तित्व साथ-साथ रहना खासा मुश्किल होता है, और हिन्दुस्तान में लोगों की समझ आज विज्ञान से इतनी दूर कर दी गई है, धर्म के रंग में इतनी रंग दी गई है कि लोगों को महामारी के खतरे दिखना बंद हो गया है। कुछ हफ्ते पहले मुस्लिम समाज का एक बड़ा त्यौहार पड़ा तो ट्रकों पर सवार होकर हजारों लोगों का ऐसा जुलूस निकला जिसमें दो-चार फीसदी लोग भी मास्क लगाए नहीं दिख रहे थे। धर्म ने वैज्ञानिक समझ का कीमा बनाकर रख दिया था।

आज जब दुनिया के बहुत सारे देश, हिन्दुस्तान के मुकाबले बेहतर इलाज वाले देश कोरोना की दूसरी, और शायद तीसरी, लहर झेल रहे हैं, तब हिन्दुस्तान एक बड़े खतरे के मुहाने पर पहुंच गया है। बिहार में तो पूरे प्रदेश में चुनाव थे, लेकिन देश के कई प्रदेशों में उपचुनाव थे, और वहां जमकर लापरवाही बरती गई। भारत में महामारी के नियमों को लागू करने का रोजाना का जिम्मा राज्यों का है, इनमें केन्द्र की दखल कम रहती है। और आने वाले महीनों में देश के कई प्रदेश कोरोना की बहुत बुरी मार झेलते दिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट राज्यों से जवाब मांगकर एक सैद्धांतिक बहस करे, उससे बेहतर यह है कि पूरे देश से मीडिया में आ रही तस्वीरों और वीडियो बुलवाकर सीधे कुछ हजार लोगों को जेल भिजवाए, ताकि बाकी लोग कुछ सावधान भी हो सकें। वोटों से बनने वाली, और वोटरों की दहशत में चलने वाली सरकारों से किसी कड़े अमल की उम्मीद नहीं की जा सकती। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर यह सुनवाई शुरू की है, इसलिए उसे सरकारों के हलफनामों पर अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए। उसे पुरानी कई मिसालों के मुताबिक ऐसे जांच कमिश्नर बनाने चाहिए जो सरकार से परे सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करे। कुल मिलाकर देश की जनता अगर अपने स्तर पर सावधान नहीं रहेगी, तो शायद चिकित्सा विज्ञान, सरकार, और अदालतें सब मिलाकर भी उसे कोरोना-मौत से नहीं बचा पाएंगी। 

(Daily Chhattisgarh)


हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट में आम और खास के बीच इतना फर्क कभी न था..

 हाल के बरसों में हिन्दुस्तानी की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने अनगिनत मामलों में एक ऐसा रूख दिखाया है जो कि देश की सत्ता सम्हाल रहे लोगों की पसंद की फिक्र करते दिखता है। सरकारी एजेंसियों या सरकार के तर्क मानने के लिए अदालत कुछ उत्साही दिखती है, और अदालत की अवमानना का खतरा खड़ा हो जाएगा अगर यह लिखा जाए कि बहुत से मामलों में अदालतें सरकार की असली पसंद के लिए लीक से हटकर भी सुनवाई करने को एक पैर पर खड़ी दिखीं, और एक गाना सा दिल्ली की अदालती हवा में गूंजता सुनाई देता रहा- हो तुमको जो पसंद, वही बात करेंगे। 

बहुत से चर्चित मामलों को लेकर जब देश की जनता यह उम्मीद कर रही थी कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के अधिकारों के बेजा दिखते इस्तेमाल को रोकने के लिए, उस पर सवाल खड़े करने के लिए तनकर खड़ी रहेगी, सुप्रीम कोर्ट के जजों का रूख, फैसलों का अंदाज इस बेजा का हिमायती दिखा। लोकतंत्र में संसद, सरकार, और अदालत, इन तीनों के बीच जो शक्ति संतुलन बनाया गया है, वह खोने में हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ने खासा योगदान दिया दिखता है। सरकार की मनमानी पर काबू की जिम्मेदारी संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को दी थी, लेकिन एक के बाद दूसरे, और दूसरे के बाद तीसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट सरकार को मानो अपनी पहुंच से ऊपर का मान बैठी है। इस बारे में देश के बहुत से लोग बहुत कुछ बोल चुके हैं, और लिख भी चुके हैं, हम आज यहां जो लिख रहे हैं, वह पूरी तरह मौलिक और पहली बार नहीं है, लेकिन यह लिखना जरूरी इसलिए है कि लोगों को लोकतंत्र की इस जन्नत की हकीकत समझ पडऩा चाहिए।

हुआ यह है कि हिन्दुस्तान में कोई 45 बरस पहले आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका का फतवा दिया था। उस वक्त इंदिरा के झंडाबरदार इस नारे की गूंज को आगे बढ़ाते रहे। उसकी ठोस वजह भी थी, इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया था, और सत्ता पर बने रहने के लिए इंदिरा को इमरजेंसी लगानी पड़ी थी, और उस वक्त इंदिरा सरकार की आत्मरक्षा के लिए उसे यह लगना स्वाभाविक था कि न्यायपालिका सरकार के प्रति प्रतिबद्ध रहनी चाहिए। उस वक्त तो बहुत अधिक जज इंदिरा की मनमानी के खिलाफ अपना हौसला नहीं दिखा पाए थे, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट के एक-दो जज तो थे ही जो कि इंदिरा की मनमानी के खिलाफ खुलकर फैसला दे रहे थे। आज जब अर्नब गोस्वामी जैसे तथाकथित पत्रकार की जमानत अर्जी पर सुनवाई की बात आती है, या अर्नब के दूसरे मामले पर अर्जी लगती है, तो सुप्रीम कोर्ट के कोई जज आधी रात घर से सुनवाई को तैयार हो जाते हैं, तो किसी और जज को लगता है कि अर्नब के मामले में सुनवाई में एक दिन की भी देर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। दूसरी तरफ इस देश में सैकड़ों पत्रकार अलग-अलग राज्यों में महीनों से जेलों में सड़ रहे हैं, सामाजिक आंदोलनकारी मौत की कगार पर पहुंच हुए भी जमानत नहीं पा रहे हैं, और इस देश के अर्नबों को रातोंरात जमानत मिल जाती है। हो सकता है कि जज उनके मामले को लेकर सचमुच ही संतुष्ट हों कि उन्हें जमानत का हक है, लेकिन जाहिर तौर पर देश यह देख रहा है कि दूसरे पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और शिक्षक किस तरह महीनों और बरसों तक जेलों में बंद रखे जा रहे हैं, और उनके खिलाफ आखिर में चाहे सरकार की हार क्यों न हो जाए, इतने बरस कैद की सजा तो वे भुगत ही चुके रहेंगे। इसलिए देश के लोगों के बीच आजादी का हक जिस हद तक जजों की मर्जी, सत्ता की पसंद-नापसंद, और सबसे महंगे वकीलों को रखने की ताकत पर टिक गया है, वह हक्का-बक्का करता है। लोगों ने अभी यह भी लिखा है कि देश के सबसे महंगे वकील को रखने की ताकत किस तरह जमानत की संभावना को बढ़ा देती है। लोगों ने सुप्रीम कोर्ट को ही सीधे खुलकर अपने नाम से यह लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट को पसंद लोगों को आनन-फानन सुनवाई का मौका देकर अदालत बाकी आम लोगों के हक का मजाक उड़ा रही है। जिस तरह एक वक्त ताजमहल को लेकर एक शायर ने लिखा था कि इक शहंशाह ने बनवा  के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक..., उसी तरह आज सुप्रीम कोर्ट में महंगे वकीलों को रखने वाले शहंशाहों को बिजली की रफ्तार से मिलने वाले उनके पसंदीदा इंसाफ को देखकर यही लगता है कि यह उन बाकी तमाम गरीबों का मजाक है। 

दुनिया में हमेशा से यह माना जाता रहा है कि इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। आज लगता है कि सुप्रीम कोर्ट देश के सबसे महंगे वकीलों के क्लाइंट, सत्ता की असली पसंद, और खुद सुप्रीम कोर्ट के जजों के प्रति इंसाफ को फिक्रमंद रह गया है। अपनी अवमानना को लेकर सुप्रीम कोर्ट जितना संवेदनशील हो गया है, उसे ट्विटर पर अपना अपमान देखते हुए उसके ऊपर-नीचे के ऐसे ट्वीट दिखाई नहीं पड़ते जिनमें इसी देश की महिलाओं को अलग-अलग विधियों से बलात्कार करने की धमकियां दी जाती हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट इस देश में इज्जत का हकदार एक ऐसा टापू बन गया है जिसके इर्द-गिर्द समंदर में डूबकर मर जाने के लिए बाकी तमाम नागरिक आजाद हैं? ट्वीट पढऩे के शौकीन सुप्रीम कोर्ट को देश की महिला आंदोलनकारियों, पत्रकारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बलात्कार की खुली धमकियों को अनदेखा करने की जो आदत है, वह आदत बताती है कि सुप्रीम कोर्ट की असली पसंद क्या है। 

देश की सबसे बड़ी अदालत में खास और आम के बीच ऐसी गहरी और चौड़ी खाई पहले शायद कभी नहीं रही, और जिसे सत्ता नापसंद करती हो, जो देश के सबसे महंगे वकील रखने की औकात न रखते हों, उनके प्रति न्यायपालिका की अनदेखी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज हो गई है, लेकिन अदालत को इतिहास से अधिक अपने भविष्य की फिक्र है जो कि लोगों को दिख रही है, समझ पड़ रही है, लेकिन अदालत इसकी तरफ से बेफिक्र है। 

(Daily Chhattisgarh) 


दीवारों पर लिक्खा है, 21 नवंबर 2020


 

जुर्म के सामने घुटने टेकता कर्नाटक सीएम का फैसला

 कर्नाटक सरकार का एक फैसला सामने आया है कि वहां समाज कल्याण विभाग उन गांवों में सरकारी सैलून चालू करेगा जहां दलितों को सैलून में जाने से रोक दिया जाता है। देश भर के गांव-गांव में नाई की दुकान में भेदभाव की शिकायतें आती हैं, और उसका यह आसान इलाज कर्नाटक की भाजपा सरकार ने निकाल लिया है कि ऐसे सरकारी दलित-सैलून में सिर्फ दलितों के बाल काटे जाएंगे और उनकी हजामत की जाएगी। खबर बताती है कि उत्तर और मध्य कर्नाटक के कई जिलों में ऐसे मामले सामने आए हैं जब दलितों के बाल काटने से मना कर दिया गया। सरकार का कहना है कि जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए यह किया जा रहा है। यह फैसला मुख्यमंत्री बी.एस.येदियुरप्पा की अगुवाई में एसटीएससी अत्याचार अधिनियम समीक्षा बैठक में लिया गया है।

पहली नजर में यह फैसला दलितों के साथ इंसाफ और उन्हें एक सहूलियत देने वाला दिखता है। लेकिन दूसरी तरफ यह फैसला अपने पर अमल के पहले भी एक प्रस्ताव की शक्ल में जब सामने आया, तभी इसने यह साबित कर दिया कि भारतीय लोकतंत्र में दलितों को इंसाफ मिलना मुमकिन नहीं है। उनके बाल तभी कट सकते हैं जब सरकार उनके लिए अलग से दलित-नाई की दुकान खोले। यह फैसला सरकार का अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराना भी है क्योंकि ऐसा भेदभाव करने वालों को गिरफ्तार करके उन्हें सजा दिलाना सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है, और उसे किनारे धकेलकर यह जातिवादी, छुआछूत से भरा सरकारी फैसला लिया जा रहा है। इस फैसले का मतलब तो यही है कि जिन गांवों में दलितों को कुएं से पानी भरने नहीं मिलता, वहां दलितों के लिए अलग कुआं खुदवाने को एक इलाज मान लिया जाए। तो धीरे-धीरे दलितों के लिए अलग थाना, अलग कलेक्ट्रेट, अलग अदालत, और अलग मुख्यमंत्री क्यों न हो? अगर सरकार ही जातिवादी छुआछूत को कुचलने के बजाय उसे मान्यता देकर नीची समझी जाने वाली जातियों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर उनके लिए अलग दलित-सैलून खोले, तो इसका मतलब है कि कानून ने अराजकता के सामने हथियार डाल दिए, हथियार तो क्या हाथ भी डाल दिए। 

जो सरकार इस तरह का फैसला ले रही है, उसकी समझ कहीं भी दलितों के साथ इंसाफ की नहीं है। उसकी समझ अपने संवैधानिक दायित्व की भी नहीं है जिसकी कि शपथ लेकर वह सत्ता में आई है। हम कर्नाटक के मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्रियों-अफसरों की जाति नहीं जानते, लेकिन यह बात साफ है कि इन लोगों को भारतीय समाज में जाति आधारित छुआछूत की समझ नहीं है, और इस छुआछूत को खत्म करने की इनकी नीयत भी नहीं है। सरकारों के साथ यह आम दिक्कत रहती है कि किसी जटिल समस्या वे एक लुभावना समाधान ढूंढकर उसका अतिसरलीकरण कर देते हैं, और ऐसे में सामाजिक गुनहगार बच जाते हैं। इस सिलसिले का कोई अंत नहीं होगा। आगे चलकर स्कूली बच्चों को दोपहर के भोजन में दलित बच्चों का खाना अलग बनने लगेगा, दलितों के हाथ का पका खाना दूसरी जाति के बच्चे नहीं खाएंगे, कहीं पर कोई सरकार या प्रशासन दलित बच्चों के लिए अलग आकार की थाली का इंतजाम कर देंगे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकारी जमीन पर सरकार ने दलितों के लिए एक सभागृह बनवाया है, लेकिन चूंकि उसके बगल के सरकारी बंगले में 20 बरस से मंत्री रहते आए हैं, इसलिए दलितों की शादी तो इस भवन में हो सकती है, उसमें संगीत नहीं बज सकता। इस तरह एक समुदाय के सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक जगह को इस आधार पर संगीत से वंचित कर दिया गया।
 
सरकार की जिम्मेदारी भेदभाव को कड़ाई से खत्म करने की है क्योंकि संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने बहुत से ऐसे फैसले दिए हैं जिनमें दलित-आदिवासी तबकों की विशेष सुरक्षा और उनके विशेष अधिकारों की बात की गई है। मध्यप्रदेश में जहां दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढऩे नहीं मिलता वहां पर सरकार इसका एक आसान इलाज ढूंढ सकती है। वह दलित बारातियों के लिए सौ-दो सौ हेलमेट का इंतजाम कर सकती है, और दलित दूल्हे के लिए पुलिस लाईन से घोड़ी का इंतजाम कर सकती है, इसके बाद पुलिस के घेरे में बारात निकाली जा सकती है। लेकिन क्या यह हिफाजत लोकतंत्र की नाकामयाबी का सुबूत नहीं रहेगी? कर्नाटक सरकार का यह फैसला भारी शर्मिंदगी का एक कलंक है, सरकारों को जुर्म के सामने इस तरह घुटने टेकते देखना इस लोकतंत्र में शर्मनाक नौबत है। आने वाले दिनों में हमें उम्मीद है कि भारत में दलितों की हकीकत को समझने वाले कुछ सामाजिक कार्यकर्ता जरूर इस मुद्दे को उठाएंगे, और अगर इसे कोई अदालत तक ले जाए तो यह सरकारी फैसला खारिज होना तय है क्योंकि यह भेदभाव को मान्यता देता है, और उस पर कार्रवाई के बजाय उसके रास्ते से हटकर छुपकर आगे निकल जाने वाला है। यह देखना भी दिलचस्प हो सकता है कि यह फैसला लेने वाली कर्नाटक की कमेटी ने किस दर्जे के कितने दलित थे, और उन्होंने बैठक में क्या राय रखी थी? 

दीवारों पर लिक्खा है, 20 नवंबर 2020


 

गाय-मंत्रिमंडल, और लवजेहादविरोधी कानून

 मध्यप्रदेश में उपचुनाव में दो तिहाई सीटें जीतकर अपनी सरकार बचाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आधा दर्जन मंत्रालयों को मिलाकर एक गाय-मंत्रिमंडल बनाया है। पशुपालन, वन, पंचायत, ग्रामीण विकास, गृह, और किसान कल्याण विभागों का गाय के मुद्दे से कुछ न कुछ लेना-देना रहता है, इसलिए इनको मिलाकर एक काऊ-कैबिनेट बना दी गई है ताकि मध्यप्रदेश में गायों की रक्षा हो सके। 

पिछले बरसों में देश के अलग-अलग राज्यों ने गोवंश को बचाने की लुभावनी नीति बनाते हुए ऐसे कड़े कानून बनाए कि लोगों के लिए जानवर खरीदकर लाना-ले-जाना, बूढ़े और अनुत्पादक हो चुके जानवरों को बेचना नामुमकिन सा हो गया है। अगर सरकारी विभागों की निगरानी से किसी तरह लोग बच भी निकलते हैं, तो सडक़ों पर गौरक्षक नाम के हिंसक और हथियारबंद जत्थे मौके पर ही भीड़त्या के लिए तैयार रहते हैं। कुल मिलाकर भारत के किसानों से, दूध उत्पादकों से जानवरों का जो रिश्ता था उसे खतरे का एक सामान बना दिया गया है। अब मध्यप्रदेश की सरकार दूसरे राज्यों से गौरक्षा के मामले में आगे बढ़ते हुए एक गाय-मंत्रिमंडल बना रही है। इस प्रदेश में लड़कियों और दलितों को अगर हिफाजत से जीना है, तो उन्हें भी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उन्हें गाय बना दे। 

हिन्दुस्तान चुनाव जीतने में मदद करने वाले भावनात्मक और लुभावने मुद्दों से घिरते चल रहा है। अभी 20 बरस पहले तक मध्यप्रदेश का हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ में भी गाय से जुड़े कुछ फैसले किए गए हैं, लेकिन वे ग्रामीण विकास और रोजगार से जुड़े हुए अधिक हैं, यह एक अलग बात है कि आरएसएस ने जाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तारीफ की है कि गाय की रक्षा के लिए उन्होंने जो फैसले लिए हैं, उनके लिए संघ आभार और अभिनंदन करता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने अपनी परंपरागत लीक से हटकर धर्म और हिन्दुओं से जुड़ी हुई गाय को लेकर काफी कुछ किया है। राम के वनवास के दौरान उनके छत्तीसगढ़ से भी गुजरने की जो प्रचलित कहानी है, उसके मुताबिक भूपेश सरकार राम वन गमन पथ को पर्यटन के मुताबिक विकसित कर रही है। गाय का गोबर खरीद रही है, गाय और दूसरे दुधारू पशुओं को गांवों में गौठान बनाकर रखने की एक मौलिक और महत्वाकांक्षी योजना पर काम बहुत बढ़ चुका है। अब देखना यह है कि हिन्दुओं के इन भावनात्मक मुद्दों पर सरकार की जो रकम खर्च हो रही है, क्या उसका कोई उत्पादक इस्तेमाल भी हो रहा है, या यह सरकारी खर्च पर चलने वाली एक लुभावनी योजना ही रह जाएगी? 

आज हिन्दुस्तान में हिन्दू-मुस्लिम प्रेमियों के बीच गिनी-चुनी शादियां होती हैं। अगर परिवार और समाज बवाल न करें, राजनीतिक दल मुद्दा न बनाएं, तो ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं कि अंतरधार्मिक शादियों से किसी एक धर्म का नुकसान हो रहा है, या किसी दूसरे धर्म की आबादी बढ़ रही है। लेकिन इसे लवजेहाद का जुबानी तमगा देकर एक के बाद दूसरा भाजपाशासित राज्य इसके खिलाफ कानून बनाने की बात कर रहा है। अभी हमें ऐसे किसी कानून की संवैधानिकता समझ नहीं पड़ी है क्योंकि भारत का संविधान बालिग लोगों को मर्जी से शादी की छूट देता है, और उन्हें कानूनी संरक्षण देता है। ऐसे में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच किसी शादी को लेकर कैसे कोई कानून बन सकता है, यह समझ से थोड़ा परे है। और फिर यह भी हो सकता है कि सरकारें ऐसे किसी कानून की संवैधानिकता की कमजोरी जानते हुए इस पर आगे बढ़ रही है क्योंकि यह बहुसंख्यक समुदाय को खतरा बताकर हिफाजत देने का एक लुभावना काम हो सकता है। जो भाजपा-सरकारें अपने प्रदेशों की हिन्दू लड़कियों को मुस्लिम लडक़ों से शादी करने से रोकना और बचाना चाहती हैं, वे सरकारें अपने प्रदेशों में हिन्दुओं के हाथों हिन्दू लड़कियों, और दूसरे धर्मों की लड़कियों पर बलात्कार रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं कर रही हैं। बहुत से मामलों में तो भाजपा के सांसद और विधायक बलात्कारियों का साथ देते खड़े दिखते हैं। अब सवाल यह है कि लड़कियों को बलात्कार से बचाना प्राथमिकता नहीं है, बल्कि लड़कियों को अपनी मर्जी से शादी करने देने से रोकना राज्य सरकारों की बड़ी प्राथमिकता बन गई है। खुद भाजपा के बड़े-बड़े नेता ऐसे हैं जिन्होंने खुद ने, या परिवार के लोगों ने दूसरे धर्मों में शादियां की हैं, बहुत सी शादियां मुस्लिम युवकों से हिन्दू युवतियों की भी हुई हैं। लेकिन एक सामाजिक खतरा बताते हुए, एक धार्मिक मुद्दा बनाते हुए लवजेहाद नाम के एक शब्द को गढक़र हिन्दू वोटरों के बीच अपनी पैठ बढ़ाई जा रही है। जब कभी किसी अदालत में कुछ कहने की बात आती है, या इन्हीं सरकारों से कोई सूचना के अधिकार में पूछते हैं, तो सरकार का जवाब होता है कि उसके रिकॉर्ड में लवजेहाद नाम का कोई शब्द नहीं है। लेकिन अब कानून बनाकर इसके खिलाफ कुछ करने की मुनादी बहुत से भाजपा राज्यों ने कर दी है। 

हम इन दो मुद्दों को एक साथ इसलिए उठा रहे हैं कि गाय का मामला, और हिन्दू लड़कियों का मुस्लिमों से शादी का मामला, ये दोनों ही मामले सरकारों के लोक-लुभावने धार्मिक मुद्दों को कानूनी जामा पहनाने की एक कोशिश अधिक दिख रही है, अपने प्रदेशों में जलते-सुलगते असल मुद्दों से निपटने की कोशिश नहीं दिख रही है। लेकिन जब तक हिन्दुस्तान के वोटरों का एक बड़ा तबका ऐसे ही भावनात्मक मुद्दों पर सरकारें बना रहा है, चतुर पार्टियों को इसी एजेंडा को आगे बढ़ाने में समझदारी दिख रही है। 

फिलहाल मध्यप्रदेश में गाय-मंत्रिमंडल बनने के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वहां के घूरों पर जिंदा गाय को अब बेहतर क्वालिटी का पॉलीथीन खाने मिलेगा ताकि उसके पेट में जमा होने वाले पॉलीथीन की घटिया क्वालिटी से उसे नुकसान होना बंद हो सके। 

(Daily Chhattisgarh)