विपक्षी प्यार की झप्पी के बाद इस एक मुद्दे पर एक साथ हों..

संपादकीय
21 जुलाई 2018


संसद में कल कांग्रेस के सांसद और पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने एक जोशीले भाषण के बाद पता नहीं क्या सोचकर जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्यार की झप्पी देने के अंदाज में गले लगाया, और आकर खुद ही उसका मजा लेते हुए बैठ गए। इसके बाद लोकसभा के भीतर के कैमरों ने यह भी दर्ज किया कि किस तरह खुद ही मुस्कुराते हुए राहुल गांधी अपनी पार्टी के किसी सांसद की तरफ देखकर आंख मार रहे हैं, मानो यह कह रहे हों कि कैसी रही? 
सत्ता और विपक्ष के बीच संसद में पिछले कुछ बरसों से जिस कदर की तनातनी चल रही है, उसे देखते हुए प्यार की यह झप्पी एक बड़ी अनोखी बात रही, और अटपटी बात भी रही। इसके कई मतलब निकाले जा सकते हैं, और राहुल गांधी ने खुद इसका एक मतलब बताया भी है कि वे मोदी के मन से नफरत हटाकर मोहब्बत भर देंगे, उन्होंने कहा कि आपके मन में मेरे लिए नफरत है, लेकिन मेरे मन में आपके लिए नफरत नहीं है। जो भी हो, संसद को छोड़कर जाने से बेहतर है गले लगना। और फिर मोदी तो गले लगने के ऐसे काम के भारी शौकीन हैं, और अब तक दुनिया के दर्जनों राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मोदी को अपने गले लगते पा चुके हैं। हमारा ऐसा ख्याल है कि मोदी दुनिया के सबसे अधिक गले मिलने वाले प्रधानमंत्री कबके बन चुके हैं यह एक अलग बात है कि देश के भीतर उनका आलिंगन लोगों को कम ही नसीब होता है। 
संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बहुत से दूसरे नेताओं के अलावा राहुल गांधी ने भी बहुत सी बातें कहीं, और उनके जवाब में मोदी और भाजपा के कई लोगों को कई गुना अधिक बोलने का मौका इसलिए भी मिला क्योंकि संसद में सदस्य संख्या के अनुपात में पार्टियों को वक्त मिलता है। इसलिए कांग्रेस के मुकाबले करीब दस गुना समय भाजपा को मिला होगा, और पार्टियों ने अपनी घोषित रीति-नीति के मुताबिक बहुत सी बातें कहीं। लेकिन बाकी बातों से परे जिस एक बात को हम देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण मान रहे हैं, वह है महिला आरक्षण। संसद सत्र शुरू होने के पहले राहुल गांधी ने बाहर ही कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री से कहा था कि वे महिला आरक्षण विधेयक लेकर आएं, उस पर मतदान करवाएं, और कांग्रेस उस पर साथ देगी। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि अभी पिछले पखवाड़े ही हमने इसी जगह इस मुद्दे पर लिखा था कि हिंदुस्तान में महिला आरक्षण विधेयक अब खबरों के भी बाहर हो गया है। अब इसे संसद में गुजरे भी दस बरस हो गए हैं। राज्यसभा ने इसे 2010 में पास कर दिया था लेकिन लोकसभा ने इस पर कभी वोट नहीं किया। जबकि इसी संसद ने देश की पंचायतों और म्युनिसिपलों के लिए महिला आरक्षण कानून 1993 में ही बना दिया। अब उसे पच्चीस बरस हो गए हैं। जिस देश की संसद जानती और मानती है कि देश के हर गांव में महिला पंच, दलित महिला पंच, आदिवासी महिला पंच ओबीसी महिला पंच मिल सकती है, उस संसद को विधानसभा सीट और लोकसभा सीट पर महिला प्रतिनिधि मिलने की उम्मीद नहीं है। यह संसद का एक मर्दाना पाखंड है। जिस संसद में इसी दौर में सोनिया गांधी, मायावती, ममता बैनर्जी जैसी महिला मुखिया रही हों, उस संसद ने महिला आरक्षण की चर्चा ही छोड़ दी। आज अगर ये तीन महिलाएं एक साथ उठ खड़ी हों, तो बाकी पार्टियों को भी महिला आरक्षण, मजबूरी में ही सही, मानना पड़ेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता की ताकत पाने के बाद भारत की महिला नेताओं के भीतर भी मर्दाना मिजाज कब्जा कर लेता है,और महिलाओं की चर्चा बंद हो जाती है।
इस देश ने समय-समय पर तरह-तरह के गैर राजनीतिक या बहुदलीय आंदोलन देखे हैं। आज जब अगला आम चुनाव एक बरस दूर है, तो ऐसे ही एक आंदोलन की जरूरत है जिसे 2018 का कोई जेपी, कोई अन्ना, कोई केजरीवाल, कोई भी शुरू करे। यह आंदोलन ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि मतदाता सिर्फ महिला उम्मीदवार को वोट करें। अगर किसी सीट पर दो महिलाएं हैं तो वे मर्जी से छांटें, अगर कोई अकेली महिला है, तो सिर्फ उसे वोट दें। एक बार अगर ऐसा आंदोलन जोर पकड़ लेगा तो अगले चुनाव के पहले महिला आरक्षण लागू हो चुका रहेगा। देश भर में लोग आज से सांसदों को घेरें, पार्टियों के नेताओं को घेरें और महिला आरक्षण पर सवाल पूछें, उन्हें मजबूर करें।
अपने इस तर्क को एक पखवाड़े के भीतर ही यहां पर दुहराते हुए हम यह कहना चाहते हैं कि कांग्रेस सहित वे तमाम पार्टियां जो महिला आरक्षण की हिमायती हैं, उन्हें संसद के इसी सत्र में इस विधेयक पर जोर देना चाहिए, और इस बार यह खुलकर साबित हो जाए कि कौन महिला आरक्षण के पक्ष में है, और कौन उसके खिलाफ। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जुलाई

जरूरत पर चुप्पी और बिना जरूरत बयान...

संपादकीय
20 जुलाई 2018


कई बार लोगों की चुप्पी उनकी कही बातों से अधिक सिर चढ़कर बोलती है। पिछले दिनों ऐसे दो मामले सामने आए। असम की बेटी हिमा दास ने एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में देश के लिए पहला एथलेटिक गोल्ड मैडल हासिल किया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिमा के वीडियो के साथ ट्वीट किया। उन्होंने खेल में प्रदर्शन या गोल्ड मैडल पाने, इस कामयाबी को हासिल करने पर तो कुछ नहीं कहा, उनकी ट्वीट में महज यही था कि किस तरह यह खिलाड़ी जीतने के बाद राष्ट्रीय ध्वज ढूंढती-मांगती रही, और राष्ट्रगान के समय उसका उत्साह कैसा था। प्रधानमंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि वे ऐसे मौके पर खिलाड़ी के प्रदर्शन पर कुछ कहें, अगर ऐसी खिलाड़ी एक गरीब परिवार से आई है तो वहां से ऊपर उठने के बारे में कुछ कहें। लेकिन मोदी की ट्वीट महज राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय भावना के प्रतीक राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के गौरव तक सीमित रह गई। इन बातों के लिए तारीफ अच्छी लगती अगर वे इसके साथ-साथ खेल के बारे में भी कुछ कहते। खेल के बारे में चुप्पी खटकने की तरह दिखती रही। ऐसा ही दूसरा मामला ट्विटर पर ही सामने आया जिसमें एक वरिष्ठ पत्रकार ने स्वामी अग्निवेश पर हमले की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा कि वे एक वक्त हरियाणा में मंत्री भी थे, और सुषमा स्वराज उस वक्त उनकी डिप्टी मिनिस्टर थीं। इसके जवाब में सुषमा ने तुरंत ही लिखा कि वे कैबिनेट मंत्री थीं, और कभी किसी की डिप्टी नहीं रहीं। लेकिन अपने ही पुराने मंत्रिमंडलीय साथी और एक हिन्दू पर हुए ऐसे शर्मनाक हमले के बारे में सुषमा ने एक लाईन भी नहीं कही, और हमले पर उनकी चुप्पी सिर चढ़कर बोलने लगी, ट्विटर पर कुछ जिम्मेदार लोगों ने तुरंत इसके बारे में लिखा। 
जब देश में जुल्म हो रहा हो, तब लोग, इस देश के प्रमुख लोग अगर दूसरे देशों के मामलों पर तो हमदर्दी ट्वीट करें, लेकिन देश के मामलों पर चुप रहें, तो वह चुप्पी चीख-चीखकर बोलती हुई सुनाई देती है। भारत में इन दिनों ऐसा बहुत हो रहा है। एक बड़े नेता से जब प्रधानमंत्री की चुप्पी के बारे में एक अनौपचारिक चर्चा में पूछा गया तो उनका जवाब था कि अगर हमारी ही पार्टी के राज में कोई ऐसा मामला होता है, तो प्रधानमंत्री बोल भी क्या सकते हैं? क्या अपनी पार्टी की सरकार के खिलाफ बोलें? आखिर पार्टी भी तो चलानी है। 
यह सोच प्रधानमंत्री के ओहदे को, या किसी केन्द्रीय मंत्री, किसी मुख्यमंत्री के ओहदे को घटाकर महज एक पार्टी का छोटा सा तंगदिल नेता बनाकर रख देती है। लोगों को सार्वजनिक जीवन में आने के बाद बहुत तुरत नफा और नुकसान से परे भी सोचना चाहिए क्योंकि सार्वजनिक जीवन का यह तकाजा रहता है, और जब किसी ओहदे की संवैधानिक शपथ ली जाती है, तो लोगों को अपने पार्टी के स्वार्थ से ऊपर भी कुछ सोचने की जरूरत रहती है। ऐसा भी नहीं है कि आज के सोशल मीडिया के अतिसक्रियता के युग में किसी की चुप्पी दबी-छुपी रह जाए। आज कोई बात छुपती नहीं है, लोग किसी गलती को करके बच नहीं सकते हैं। फिर यह भी है कि अब लोगों के कामकाज और चाल-चलन पर कुछ कहने का हक महज परंपरागत मीडिया का एकाधिकार नहीं रह गया है, और अब हिन्दुस्तान के हर नागरिक को खुलकर बोलने का मौका मिल चुका है अगर उन्हें कुछ शब्द टाईप करना आता है, और उनके पास एक साधारण सा फोन भी है।
हिन्दुस्तान के इतिहास में ऐसे नेताओं को भी अच्छी तरह दर्ज किया गया है जिन्होंने अपनी पार्टी के हितों से परे जाकर भी देशहित या जनहित के काम किए। दूसरी तरफ ऐसे नेताओं को भी इतिहास अच्छी तरह दर्ज करता है जो कि देशहित और जनहित से ऊपर अपने पार्टी हित को मानते हुए कभी जरूरत के मौके पर चुप्पी साध लेते हैं, तो कभी गैरजरूरी मौके पर बोलने लगते हैं। इतिहास में नाम दर्ज कराने की हसरत जिस किसी में हो, उसे तंगदिली और तंगनजरिए से ऊपर उठना ही होता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जुलाई

जुर्म होने के पहले रोकना ही अकेला रास्ता, और कुछ नहीं

संपादकीय
19 जुलाई 2018


उत्तरप्रदेश के देवरिया की एक खबर है कि एक स्कूल में 7वीं की एक छात्रा ने पूरे स्कूल के दोपहर के भोजन में जहर मिला दिया, क्योंकि वह उसी स्कूल में कुछ समय पहले अपने भाई की हुई हत्या का बदला लेना चाहती थी। इस बच्ची को पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया, उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, और उसे बाल सुधार गृह भेजा जा रहा है। स्कूल में पढऩे वाली एक छोटी सी बच्ची के दिमाग में ऐसा भयानक ख्याल कैसे आया, यह अधिक फिक्र की बात है। दूसरी तरफ कल ही छत्तीसगढ़ में एक दूसरी भयानक खबर आई है जिसमें एक पति ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसके गुप्तांग में बिजली का तार डालकर उसे करंट से जलाकर मार डाला। इन दोनों हत्याओं को देखने पर एक बात एक सरीखी है कि ये किसी तैश में पल भर में की गई हत्याएं नहीं हैं, बल्कि सोच-समझकर की गई हैं, और इसीलिए इनके पीछे की कू्ररता अधिक भयानक है, अधिक फिक्र का सामान है। 
दुनिया में कई जगहों पर बड़ी संख्या में कत्ल इतिहास में दर्ज हैं। लेकिन ऐसे कत्ल जो कि पूरी तरह सोच-समझकर और पूरी क्रूरता से किए जाएं, वे एक जुर्म से अधिक भी होते हैं, और वे समाज के लोगों की संवेदनाशून्य सोच का सुबूत भी होते हैं। फिक्र इस बात की नहीं कि कुछ कत्ल हुए, फिक्र इस बात की कि कातिल इस कदर बेपरवाह हो गए हैं। और धीरे-धीरे यह क्रूरता बढ़ती चल रही है। बड़ों से अब यह बच्चों तक पहुंच रही है, और आदमियों से औरतों तक में, जो कि कम हिंसक मानी जाती हैं। ये हत्याएं और इस किस्म के कुछ दूसरे कत्ल और बलात्कार के मामले समाज में खूंखार जुर्म के लिए लोगों के बीच बढ़ते हुए बर्दाश्त को बताते हैं कि कैसे लोग परिवार की, या पड़ोस की, या अपने स्कूल की कुछ बरस या कुछ महीने की बच्ची के साथ बलात्कार कर लेते हैं, या किस तरह कुछ नाबालिग लड़के किसी नाबालिग लड़की को पकड़कर गैंगरेप करते हैं। 
दुनिया में कई किस्म के जुर्म ऐसे हैं जिनको होते हुए रोकना मुमकिन नहीं रहता, जब तक कि पुलिस ईश्वर न हो जाए। और जैसा कि पूरी दुनिया में चारों तरफ हो रहा बताता है, कि ईश्वर कहीं है नहीं, या है तो वह बेरहमी को खासा पसंद करता है। यह बात साफ रहनी चाहिए कि किसी की कत्ल की नीयत, या बलात्कार का इरादा उनके चेहरे पर लिखा नहीं होता, और ऐसे जुर्म अमूमन जब हो चुके रहते हैं, तब पुलिस के हाथ में अधिक से अधिक इतना ही रहता है कि वह ठीक से जांच करे, और सही मुजरिम को पकड़कर सजा दिलवाए। ऐसे में समाज को अपने भीतर चौकन्ना रहना होगा, और अपनी अगली-पिछली पीढिय़ों को भी हिंसा से दूर रखना होगा। समाज का ढांचा परिवारों से मिलकर बनता है, और लोगों को अपने परिवार के भीतर जुर्म और हिंसा से परहेज की सोच मजबूत करनी होगी। कोई भी मुजरिम एक मजबूत इरादों वाले और कानूनपसंद परिवार के बीच रहते हुए जुर्म के खतरे में कम ही पड़ते हैं। अगर पूरा परिवार आपसी बातचीत में जुर्म को बुरा मानकर, कानून की राह पर चलने पर अड़ा रहता है, तो परिवार के किसी सदस्य का मुजरिम बनने का खतरा खासा घट जाता है। फिर यह भी है कि हत्या या बलात्कार जैसा बड़ा और खूंखार जुर्म करने के पहले लोग आमतौर पर कई छोटे-मोटे जुर्म कर चुके रहते हैं, और जब परिवार उन मौकों पर अपने सदस्य पर काबू नहीं कर पाता, तब बात बेकाबू होती है। 
सरकार और समाज इन दोनों को मिलकर तमाम लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि एक जुर्म से मुजरिम तो जेल जाते ही हैं, लेकिन उनका पूरा परिवार भी जेल के बाहर बहुत किस्म की तकलीफें झेलता है, सामाजिक अपमान और प्रताडऩा झेलता है। बहुत से परिवार घर के किसी एक मुजरिम की वजह से तबाह भी हो जाते हैं। हमने हर महीने ऐसी खबरें देखी हैं जिनमें पति-पत्नी में से एक ने दूसरे का कत्ल किया, और खुद जेल चले गए। ऐसे में बच्चे बुजुर्ग दादा-दादी या नाना-नानी के हवाले रह जाते हैं, और उनकी हालत कई मामलों में अनाथ बच्चों जैसी रहती है। समाज के लोगों के बीच जुर्म के बाद के ऐसे हाल की गंभीरता बड़ी तल्खी के साथ पेश की जानी चाहिए। जुर्म के पहले लोगों को रोकना जरूरी है, जुर्म के बाद तो महज सजा की गुंजाइश बचती है, किसी किस्म की भरपाई नहीं हो पाती, न मुजरिम के परिवार की भरपाई हो पाती, और न ही जुर्म के शिकार, या उसके परिवार की भरपाई हो पाती। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जुलाई

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 18 जुलाई : स्वामी अग्निवेश पर हमले की महज जांच काफी नहीं

संपादकीय
18 जुलाई 2018


झारखंड में आदिवासियों के एक कार्यक्रम में पहुंचे स्वामी अग्निवेश को सत्तारूढ़ भाजपा के युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने खुली सड़क पर दिनदहाड़े पीटा, उनके कपड़े फाड़ दिए, और उनके साथ की गई मारपीट का एक हिंसक वीडियो भी बनाया गया। जिसे फैलाया भी गया। यह सब कुछ उस वक्त हुआ जब हिन्दुस्तान का सुप्रीम कोर्ट भीड़ द्वारा हत्या के खिलाफ एक कड़ा दिखने वाला फैसला दे रहा था, जो कि हकीकत में एक दिखावे का फैसला है, सुप्रीम कोर्ट की अपनी इज्जत को बचाने के लिए। स्वामी अग्निवेश एक सक्रिय हिन्दू हैं जो कि सुधारवादी आर्य समाज से जुड़े रहे, और फिर उससे भी अलग होकर वे राजनीति में, सामाजिक आंदोलनों में, बंधुआ मजदूरों की मुक्ति में काम करते-करते देश-विदेश में मशहूर हुए। वे नक्सलियों से भी लोकतांत्रिक बातचीत के हिमायती हैं, और इसीलिए बहुत से लोग उन पर नक्सल-समर्थक होने की तोहमत लगाते हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा की मौजूदा सरकार के चलते हुए ही जब वे 2011 में बस्तर गए थे, तब वहां पुलिस अफसरों के भड़कावे पर कुछ स्थानीय हिंसक शहरियों ने अग्निवेश पर हमला किया था, और उनका मुंह काला किया था। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अग्निवेश का विरोध हुआ था, और उसमें खुलकर सत्तारूढ़ भाजपा के आक्रामक नौजवान शामिल थे। यह याद रखने की बात है कि स्वामी अग्निवेश खालिस छत्तीसगढ़ी हैं, जो बहुत बचपन में ही आन्ध्र से छत्तीसगढ़ आए थे, और यहीं के होकर रह गए थे। बाद में वे आर्य समाज आंदोलन में शामिल हुए, और फिर उससे अलग राजनीतिक दल हरियाणा में बनाया, चुनाव लड़ा,  और मंत्री भी बने। लेकिन छत्तीसगढ़ आना-जाना लगे रहा, और बस्तर में पुलिस हिंसा के शिकार आदिवासियों की मदद करने जब वे आए, तो उन पर पत्थर से हमला करवाया गया। 
सुप्रीम कोर्ट का जिक्र हम इस सिलसिले में इसलिए कर रहे हैं कि भीड़ द्वारा हत्या को लेकर वह केन्द्र सरकार से संसद में एक कानून बनाने की बात कर रहा है। इससे बोगस और क्या बात हो सकती है कि जब मौजूदा कानूनों के तहत हत्यारी भीड़ को सजा दिलाने के लिए ढेरों वीडियो सुबूत रहते हुए भी जब सरकारें कार्रवाई न करे, और केन्द्र और राज्य के मंत्री हत्यारों को माला पहनाकर उनका सम्मान करे, तो नया कानून कौन सा तीर चला लेगा? सुप्रीम कोर्ट को नए कानून की चर्चा तो तब करने का हक रहता जब वह हत्यारों का सम्मान करने वाले मंत्रियों को नोटिस देकर कटघरे में खड़ा करता। जब वह राज्य सरकारों के अफसरों को कटघरे में खड़ा करता, और हत्यारी भीड़ पर कड़ी कार्रवाई न करने पर सवाल करता। अपने आपकी महानता साबित करने का यह एक राजनीतिक नुस्खा है जिसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट भी कर रहा है। जब मौजूदा कानून पर अमल की राजनीतिक शक्ति न बचे, तो सरकारें आमतौर पर नए कानून बनाकर अपनी इज्जत बचाती हैं। आज जब देश का माहौल खुलकर ऐसा लग रहा है कि सरकारों में बैठे लोग भीड़-हत्याओं के लिए लोगों को उकसा रहे हैं, तो सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय केन्द्र सरकार को एक फिजूल की नसीहत दे रहा है कि वह नया कानून बनाए। ऐसी भीड़ को तो आज के कानून के तहत भी उम्रकैद दी जा सकती है। 
जहां तक स्वामी अग्निवेश पर हमले का सवाल है, तो वे हमेशा से धर्मान्ध और कट्टर हिन्दू हमलावरों की आंखों की किरकिरी बने रहे हैं। वे धर्म के भीतर एक विनम्रता के हिमायती हैं, वे भारत की संस्कृति के मुताबिक धर्मनिरपेक्षता के हिमायती हैं, और वे हिन्दू धर्म के भीतर पाखंड के खिलाफ और सुधार के हिमायती हैं। आज देश में गोमांस पर चल रही बहस पर उन्होंने लोगों के गोमांस खाने के हक पर बयान दिया था, और उसे लेकर वहां भाजपा के संगठनों के नौजवान बिखरे हुए थे। वे लोकतंत्र के भीतर सभी तबकों के साथ बातचीत के हिमायती भी हैं, और ऐसे तबकों में नक्सलियों से लेकर दूसरे ऐसे तबके भी शामिल हैं जो कि लोकतंत्र पर भरोसा नहीं रखते। अपनी इसी प्रगतिशील और उदार सोच की वजह से, पाखंड के खिलाफ सक्रियता की वजह से वे अलोकतांत्रिक और हिंसक धर्मान्ध लोगों के निशाने पर रहते हैं। लेकिन जिस राज्य में जिस पार्टी की सरकार है उस पार्टी के लोग अगर सड़कों पर ऐसी हिंसा करते हैं, तो यह उस पार्टी के लिए भी धिक्कार की बात है, और उसे राष्ट्रीय स्तर पर अपने लोगों की ऐसी हरकत पर जवाब देना चाहिए। झारखंड की भाजपा सरकार ने इस हमले की जांच के आदेश दिए हैं, और डेढ़-दो दर्जन लोग गिरफ्तार भी किए गए हैं, लेकिन इस हमले का वीडियो भाजपा को पूरी दुनिया में जैसी बदनामी दिला रहा है उसके चलते उसे एक राष्ट्रीय पार्टी होने का जिम्मा भी निभाना चाहिए, और इस पर बयान देना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जुलाई

भारत में बच्चे रेप के शिकार, और बलात्कारी भी बन रहे, पर यौन शिक्षा का हौसला नहीं!

संपादकीय
17 जुलाई 2018


पश्चिम के जिन देशों में स्कूली बच्चों को यौन शिक्षा दी जाती है, वहां की एक शिक्षिका ने कमउम्र बच्चों के पूछे गए सवालों की एक लिस्ट तैयार की है। उनके सवाल बताते हैं कि जिन समाजों में बच्चों को सेक्स की वैज्ञानिक जानकारी देने से परहेज नहीं किया जाता, वहां भी बच्चों के मन में कितने किस्म की अधूरी या गलत जानकारी रहती है, और इस बारे में क्लास में पढ़ाना थोड़ा अटपटा होते हुए भी उन बच्चों के लिए इसे समझना कितना जरूरी होता है। भारत में पिछली आधी सदी से यह चर्चा ही चर्चा है कि बच्चों को यौन शिक्षा दी जाए, और इसके लिए स्कूल की बड़ी कक्षाओं के बच्चों से लेकर कॉलेज पहुंचे बच्चों तक के बारे में सोचा जाता रहा है, लेकिन समाज के एक दकियानूसी तबके के हमलावर तेवरों के चलते हुए यह कभी मुमकिन नहीं हो पाया। यहां तक कि जीव विज्ञान की कक्षा में बच्चों को मानवीय देहविज्ञान के बारे में पढ़ाने पर लोग झंडा-डंडा लेकर उसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए सड़कों पर उतर आते हैं। भारत पिछले बरसों में ऐसे भी बहुत से आंदोलन देखे जिसमें सिर्फ लड़कियों की क्लास को सेनेटरी पैड के बारे में बताने को भी भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया गया और स्कूलों पर प्रदर्शन किया गया। 
इस विषय पर आज लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि पश्चिम के जिन बच्चों की चर्चा से आज यहां लिखा जा रहा है, उनके मन में भी सेक्स को लेकर, बच्चे पैदा करने को लेकर कई किस्म की ऐसी उत्सुकता है जिसे सुनकर शिक्षक-शिक्षिका पहले तो हँसते हैं, फिर उन्हें अच्छी तरह वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर समझाते हैं। जाहिर है कि भारत जैसे देश में भी बच्चों के मन में बहुत किस्म की उत्सुकता-जिज्ञासा रहती है, लेकिन सेक्स के बारे में कुछ भी जानने-समझने के लिए उनके पास गैरकानूनी रूप से भारत में लाए गए विदेशी अश्लील साहित्य या इंटरनेट पर मौजूद बहुत ही कू्रर और हिंसक पोर्नो ही रहते हैं। इससे परे सेक्स की पहली और आखिरी जो चर्चा बच्चों को सुनाई पड़ती है, वह बलात्कार की रहती है, और ऐसे अप्राकृतिक और हिंसक सेक्स की चर्चा से उनके दिल-दिमाग पर जाहिर तौर पर बुरा असर पड़ता है। 
भारत को अपने पाखंड से बाहर निकलना चाहिए कि बच्चों को या किशोरों को सेक्स की बातें समझाना भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। हकीकत तो यह है कि यह देश दुनिया के कुछ सबसे पुराने सेक्स-ग्रंथों का जन्मदाता है, यहां पर किशोरों को सेक्स की बातों को समझने के लिए नगरवधुओं के पास भेजा जाता था, और इसे इसी किस्म से वर्जित विषय नहीं माना जाता था। आज हिंदुस्तान में नाबालिग बच्चे गिरोह बनाकर किसी नाबालिग लड़की से बलात्कार करते पकड़ा रहे हैं। हर दिन कहीं न कहीं से ऐसी खबर आती है। निर्भया सहित कई ऐसे चर्चित बलात्कार कांड हुए हैं जिनमें बालिगों के साथ-साथ नाबालिग बलात्कारी भी हिस्सेदार थे, और देश की अदालतों से लेकर संसद तक को यह सोचना पड़ रहा है कि क्या ऐसे जुर्म में हिस्सेदार नाबालिगों को सजा के मामले में बालिग ही माना जाए? जब समाज लगातार छोटे-छोटे बच्चों के साथ बलात्कार देख रहा है, और नाबालिग बच्चों को बलात्कार करते भी देख रहा है, तो अब हिंदुस्तानी समाज को अपने बच्चों को सावधान करने के लिए, और वैज्ञानिक जानकारी देने के लिए कम से कम स्कूल की बड़ी कक्षाओं से तो सेक्स-शिक्षा, यौन-शिक्षा, या देह-शिक्षा शुरू करनी चाहिए। इसके बिना अज्ञान में कई बच्चे सेक्स-अपराध के शिकार हो रहे हैं, और सेक्स-अपराध कर भी रहे हैं। यह देश जागने में जितनी देर करेगा, उसके बच्चों पर उतना ही अधिक जुल्म होगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जुलाई