धर्म के हाथ हथियार देना इतना खतरनाक है, देखें...

संपादकीय
17 नवम्बर 2017


आतंक से ग्रस्त एक देश यमन पर सउदी अरब की अगुवाई वाले गठबंधन ने ऐसे आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं जिनसे वहां भुखमरी के शिकार लोग और तेजी से मरने लगेंगे। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यमन में दुनिया का सबसे बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया है, जहां 70 लाख लोग अकाल के खतरे में हैं, 10 लाख लोग बीमार हैं। ऐसे देश यमन के आसपास अरब दुनिया के जो देश हैं उन्होंने सउदी अरब की अगुवाई में तरह-तरह के प्रतिबंध लागू किए हैं जिनमें वहां के हवाई अड्डों, और वहां के बंदरगाह का इस्तेमाल भी बंद करवा दिया है। यमन में आतंकी संगठनों की हलचल के चलते अमरीका ने इस देश से लोगों के वहां आने पर भी रोक लगाई हुई थी।
आतंक का कारोबार अपने काबू के इलाके में आने वाले लोगों को कैदियों की तरह बनाए रखने, उन्हें भूखा मारने, उन्हें पढ़ाई और इलाज से दूर रखने से मजबूत होता है। इसके साथ-साथ धार्मिक आतंक करने वाले लोग तरह-तरह के धार्मिक रास्ते निकालकर लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार करने, उन्हें सेक्स-गुलाम बनाने, और उनकी बिक्री करने का काम भी कई देशों में कर रहे हैं। अरब देशों और लगे हुए अफ्रीका के देशों में धर्म के नाम पर हथियारबंद आतंकी-गुट इस तरह का काम लगातार कर रहे हैं, और इसकी वजह से उनके देश प्रतिबंध भी झेल रहे हैं। दुनिया धर्म के नाम पर चल रहे आतंक से यह इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी झेल रही है जहां दसियों लाख लोग शरणार्थी होकर अगल-बगल के देशों से और दूर तक योरप के देशों तक जा रहे हैं, और इससे कई देशों की सरकारों पर तनाव बढ़ रहा है, वहां पर उनकी स्थानीय जिंदगी भी प्रभावित हो रही है।
हथियारबंद आतंक जब राजनीतिक विचारधारा के लिए चलता है, तो उस पर काबू पाना कुछ आसान होता है। लेकिन जब यह धर्म के आधार पर चलता है, तो उसका साथ देने के लिए कई देशों की ताकतें अपनी दौलत लेकर खड़ी हो जाती हैं, और आम जनता के बीच भी उसकी पकड़ कुछ मजबूत रहती है। आज न सिर्फ अरब देशों में, बल्कि भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में भी धर्म को उसकी एक जायज जगह से बहुत अधिक जगह दी जा रही है, और लोगों की जिंदगी में निजी आस्था से बहुत आगे बढ़ाकर धर्म को एक हिंसक और आक्रामक रूप दिया जा रहा है। ऐसा करने वाले लोगों को लोकतंत्र से कुछ अधिक लेना-देना नहीं है, और वे किसी भी कीमत पर धार्मिक आक्रामकता का विस्तार चाहते हैं। सीरिया से लेकर यमन तक और सोमालिया तक धर्म और आंदोलन का जो मिलाजुला हत्यारा रूप चल रहा है, उसे देखते हुए बाकी दुनिया को भी सावधान होना चाहिए। धर्म को हिंसा की ताकत देना तो आसान है, लेकिन उससे फिर वे हथियार छीने नहीं जा सकते। आज जिस तरह सीरिया, यमन, सोमालिया जैसे कई देश ईश्वर के नाम पर किए जा रहे आतंक और हिंसा के हाथ अपनी आबादी का एक बड़ा हिस्सा खो रहे हैं। धर्म को निजी आस्था के रूप में, हिंसा से दूर, घर और धार्मिक स्थानों तक सीमित अगर नहीं रखा जाएगा, तो फिर ईश्वर के नाम पर बच्चियों से बलात्कार बिना हथियारों भी जगह-जगह होता था, और अब तो हथियारों के साथ यह काम इस हद तक बढ़ गया है कि इस्लामी आतंकवादी बच्चियों की, महिलाओं की खरीद-बिक्री भी कर रहे हैं, और इसे धर्म की मंजूरी भी बता रहे हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 November

बात की बात 16 November

दीवारों पर लिक्खा है 16 November

अयोध्या में रविशंकर को खारिज करने की जरूरत

संपादकीय
16 नवम्बर 2017


अयोध्या में मंदिर-मस्जिद के झगड़े में मध्यस्थता करने की घोषणा के साथ आध्यात्मिक गुरू होने का दावा करने वाले श्रीश्री रविशंकर उत्तरप्रदेश पहुंचे हैं, और वहां हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्षों की तरफ से उनकी मध्यस्थता का विरोध भी शुरू हो गया है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है कि शुरूआत में किसी वार्ताकार या मध्यस्थ का विरोध होने लगे, लेकिन रविशंकर की विश्वसनीयता कुछ भी नहीं है। जिस वक्त यूपीए सरकार को हटाने की नीयत से दिल्ली में केजरीवाल, अन्ना हजारे, और कर्नाटक से आए हुए रिटायर्ड जज संतोष हेगड़े एक बड़ा आंदोलन चला रहे थे, उस वक्त रविशंकर ने भी इस आंदोलन की हिमायत की थी। लेकिन वह वही दौर था जब कर्नाटक में येदियुरप्पा की भाजपा सरकार गले-गले तक भ्रष्टाचार के मामलों में डूबी हुई थी, और भाजपा के मंत्री, रेड्डी बंधु लौह अयस्क खदानों के भ्रष्टाचार के हजारों करोड़ के मामले में फंसे हुए थे, लेकिन कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में बसे हुए रविशंकर का मुंह भी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं खुला था। यह एक अलग बात है कि दिल्ली के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन का उन्होंने समर्थन किया था।
जो सचमुच ही महान लोग होते हैं, वे मुजरिमों के बीच फर्क नहीं करते हैं, फिर वे चाहे यूपीए सरकार के भ्रष्ट मंत्री हों, या कि येदियुरप्पा सरकार के भ्रष्ट मंत्री हों। लोगों को याद होगा कि उस दौर में रविशंकर से लेकर रामदेव तक, घुमा-फिराकर हिन्दू धर्म की ही बात को चुनावी हिसाब से कहने वाले कई लोग देश में सक्रिय थे। और लोगों ने यह अच्छी तरह देखा हुआ है कि यूपीए सरकार और कांग्रेस को हटाने के लिए अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठ गए थे, वे अन्ना हजारे मोदी सरकार के आने के बाद से लगभग पूरे वक्त अपने गांव में सोए हुए हैं, और दिल्ली में उस लोकपाल की कुर्सी पर किसी को बिठाया नहीं गया है, जिस लोकपाल को अन्ना हजारे और केजरीवाल लोकतंत्र की सारी बुराईयों के लिए रामबाण दवा मानते थे। इसलिए बुराई पर छांट-छांटकर वार करना कोई अच्छाई नहीं होती है, वह अच्छाई का पाखंड ही होता है, और वही काम रविशंकर अयोध्या जाकर कर रहे हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ दिन पहले हमने इसी मध्यस्थता की खबर आने पर रविशंकर को सुझाया था कि उन्हें पहले छत्तीसगढ़ आकर यहां पर उनके नाम की दुकान चलाने वाले लोगों द्वारा हजारों लोगों को जमीन के मामले में धोखा देने के मामले सुलझाने चाहिए, उसके बाद कहीं और जाकर मध्यस्थता करनी चाहिए। भूमाफियाओं को गले लगाकर दुनिया को आध्यात्म सिखाना, और जीने की कला सिखाना पाखंड छोड़ और कुछ नहीं है।
जितने धर्मों से जुड़े हुए इस किस्म के लोग रहते हैं, जो अपने आपको आध्यात्म से जुड़ा बताते हैं, या कि योग की दुकान चलाते हैं, वे सारे के सारे लोग धर्म की राजनीति करने वाले लोगों के हाथ मजबूत करने का काम करते हैं। जाहिर तौर पर वे अपने को राजनीति से अलग बताते हैं, लेकिन नाजुक मौके पर उनकी तमाम हरकतें अपने पसंदीदा नेताओं और पार्टियों को फायदा दिलाने की रहती हैं। रविशंकर अपने खुद के दिए हुए श्रीश्री के तमगे के साथ कुछ महीने पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का मखौल उड़ाते दिख रहे थे। यमुना को अपने कार्यक्रम के लिए कानून के खिलाफ जाकर बर्बाद करने, और उस पर ट्रिब्यूनल द्वारा सुनाए गए जुर्माने को न पटाने की सार्वजनिक घोषणा करने वाले रविशंकर कुछ महीनों के भीतर ही अयोध्या में किस तरह का कोई कानूनी रास्ता निकाल सकते हैं, यह किसी की समझ में नहीं आएगा। अपने खुद के मामले में जिसके मन में देश के कानून के लिए इतनी हिकारत हो, कि वो कानूनी संस्था के आदेश को कचरे की टोकरी में फेंकते हुए तरह-तरह की चुनौतियां सार्वजनिक रूप से देता रहे, उससे किसी तरह के न्यायसंगत और तर्कसंगत समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती। रविशंकर खारिज कर देने के लायक है, और अयोध्या जैसे जटिल मामले में यह आदमी जाकर और उलझन खड़ी करेगा। (Daily Chhattisgarh)

देश की अदालतों पर मेहरबानी भी करें...

संपादकीय
15 नवम्बर 2017


बैरूत की एक दिलचस्प तस्वीर इंटरनेट पर मौजूद है जिसमें एक इमारत एक मीटर से भी कम चौड़ाई की बनी हुई है। इसे देखकर हैरानी हो सकती है कि एक दीवार से जरा ही ज्यादा चौड़ी यह इमारत ऐसी क्यों बनाई गई है? तो वहां के बाशिंदे बताते हैं कि इसके पीछे की जमीन और उस पर मकान एक भाई के हैं, और उसे नुकसान पहुंचाने के लिए, वहां से समंदर तक जाने वाली नजर रोकने के लिए दूसरे भाई ने यह इमारत बना दी। अब यह कहानी पिछली आधी सदी से चली आ रही है, और हो सकता है कि इसमें कुछ नमक-मिर्च भी लगी हुई हो, लेकिन बैरूत के रिकॉर्ड में इस बिल्डिंग को ग्रज बिल्डिंग कहा जाता है, और ग्रज का हिन्दी मतलब द्वेष या घृणा, बैरभाव होता है।
यह दुनिया में पहला मौका नहीं है जब एक भाई दूसरे को नुकसान पहुंचाने के लिए अपना खुद का नुकसान करने को तैयार हो जाता है। एक वक्त भारत में अंबानी भाईयों के बीच की खाई कुछ ऐसी ही गहरी और चौड़ी थी, जिसे बाद में कहा जाता है कि इनकी मां ने बीच-बचाव करके पाटा। लेकिन ऐसे कई ऐतिहासिक झगड़े चले आ रहे हैं जिनमें भाई दूसरे भाई के खून का प्यासा हो जाता है। भारत की अदालतों में ऐसे लाखों मामले चल रहे हैं जिनमें परिवार की दौलत के बंटवारे के लिए भाई-बहन या भाई-भाई एक-दूसरे के सामने खड़े हुए हैं। दूर क्यों जाएं, भारत और पाकिस्तान एक ही देश से टूटकर दो बने, और इन दोनों के बीच की कड़वाहट इतनी अधिक है कि खुद कंगाल हो जाएं, लेकिन दूसरे के खिलाफ फौजी तैयारियों में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। कुछ इसी तरह का हाल भारत के राजनीतिक गठबंधनों का देखने मिलता है, जिसके दल जब अलग होते हैं तो एक-दूसरे के अव्वल दर्जे के दुश्मन हो जाते हैं।
कुल मिलाकर इस चर्चा का मकसद यह है कि वक्त रहते लोगों को हकों और जिम्मेदारियों का बंटवारा किस तरह कर देना चाहिए कि बाद में उसे लेकर अगली पीढ़ी के बीच नफरत और हिंसा की नौबत न आए। होता यह है कि जब भाईयों, या कि एक पीढ़ी के वारिसों के बीच झगड़ा होता है, तो उसकी आग में घी डालने के लिए लोग अपनी जेब से खर्च करके, बाजार जाकर घी लेकर आते हैं। चाहे परिवार हो, राजनीतिक दल हो, फर्म या कंपनी हो, या कि देशों का मामला हो, इसे अगर समझदारी से नहीं निपटाया गया, तो इनकी बड़ी सी ताकत एक-दूसरे के खिलाफ बर्बाद होती रहती है, और समंदर का नजारा रोकने के लिए दूसरे की जमीन के सामने  अपने पैसे की बर्बादी करते दीवार जैसी पतली इमारत बना देते हैं।
हिन्दुस्तान में हम बहुत से परिवारों में झगड़े की एक जड़ यह भी देखते हैं कि बहुत लोगों को संयुक्त परिवार में गौरव प्राप्त होता है। वे सदस्यों के असंतोष की कीमत पर भी परिवार को एक छत के नीचे जोड़े रखना चाहते हैं, और ऐसे में लोगों के मन में सुलगती बेचैनी आगे चलकर तरह-तरह के झगड़े भी पैदा करती है। अधिक समझदारी की बात यह होती है कि परिवार के मुखिया वक्त रहते ही अगली पीढ़ी का अलग-अलग हिसाब कर जाएं, और देश की अदालतों पर मेहरबानी भी करें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 नवंबर

अब गुजरात में सेक्स-सीडी की राजनीति हार्दिक के खिलाफ

संपादकीय
14 नवम्बर 2017


चुनावग्रस्त गुजरात में पिछले दो दिनों में ऐसी दो सेक्स-सीडी बाजार में आने की खबर है जिन्हें हार्दिक पटेल की बताया जा रहा है। हार्दिक एक नौजवान है, और शादीशुदा भी नहीं है। एक बंद कमरे में किसी महिला के साथ किसी एक नौजवान के बीच के देह संबंधों को चोरी-छुपे रिकॉर्ड करने वाली यह सीडी हार्दिक की बताते हुए कल जिसने इसे जारी किया है, वह गुजरात के एक भाजपा मंत्री का करीबी बताया जा रहा है, और आज सुबह तक मंत्री के साथ उस नौजवान की बहुत सी तस्वीरें भी सामने आ गई हैं। लोगों को याद होगा कि पिछले पखवाड़े ही छत्तीसगढ़ में भाजपा के एक मंत्री का नाम बताते हुए एक सेक्स-सीडी आई थी, और बाद में भाजपा ने उसे झूठा करार दिया, और एक दूसरी सीडी सामने आई जिसमें चेहरा बदलकर मंत्री का चेहरा जोडऩा बताया गया था। भाजपा ने इसे स्तरहीन और बिलो दि बेल्ट वार करना कहा था।
हमारा यह मानना है कि सेक्स-सीडी की राजनीति करना, हारे हुए लोगों का काम हो सकता है, जीते हुए लोग या जीतते हुए लोग ऐसा घटिया काम शायद न ही करते होंगे। जहां तक ऐसी वीडियो रिकॉर्डिंग हैं, हम पहले भी कई बार लिखते आए हैं कि जब तक ऐसी रिकॉर्डिंग में किसी जुर्म की बात न हो, तब तक उसे रिकॉर्ड करना ही जुर्म है। अगर दो वयस्क आपसी सहमति से बंद कमरे में कुछ कर रहे हैं, तो वहां पर जुर्म महज यह हो सकता है कि कोई बाहरी ताक-झांक करे, और उसकी रिकॉर्डिंग करे। अब एक दूसरा सवाल हमने पिछले एक पखवाड़े में ही इसी कॉलम में यह भी उठाया था कि राजनीति या सार्वजनिक जीवन के लोगों को बदनाम करने की नीयत से जो लोग ऐसी रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करते हैं, वे ऐसे देह संबंधों में भागीदार महिला को भी बदनाम करते हैं जो कि सार्वजनिक जीवन में नहीं भी हो सकती हैं। इसे एक बड़ा जुर्म मानते हुए ऐसी रिकॉर्डिंग फैलाने वाले तमाम लोगों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, चाहे वह छत्तीसगढ़ में हो या फिर वे गुजरात में हों।
आज देश और प्रदेशों में मुद्दों की कोई कमी नहीं है, और उन्हें छोड़कर निजी जिंदगी में दखल देते हुए ऐसे आपराधिक काम को किसी भी पार्टी या किसी भी नेता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। भारत का राजनीतिक इतिहास बताता है कि कांग्रेस छोड़ रहे जगजीवन राम के खिलाफ उनके बेटे के निजी जीवन की तस्वीरों पर एक पूरे का पूरा अंक ही मेनका गांधी ने अपनी पत्रिका का निकाला था। और जैसा बोएं वैसा काटें के कुदरती अंदाज में अभी कुछ समय पहले उनके बेटे वरूण गांधी की उसी किस्म की बहुत सी असली या नकली तस्वीरें चारों तरफ फैली थीं। हमारा यह मानना है कि लोगों का निजी जीवन अगर वह अपनी कुर्सी की ताकत का इस्तेमाल करते हुए, किसी का शोषण करते हुए नहीं है, तो उसके उजागर करने पर कड़ी सजा होनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है 14 November

आभासी दुनिया के बंदरगाह में सुरक्षित बंधे जहाज की तरह

13 नवंबर  2017

इन दिनों कोई भी शहरी, शिक्षित, संपन्न, सक्रिय शायद ही ऐसे हों जो कि सोशल मीडिया पर न हों। नतीजा यह है कि लोगों का सामाजिक दायरा जमीनी दायरे से हटकर एक ऐसा आभासी (वर्चुअल) दायरा बन गया है जिसमें वे अपनी पसंद के लोगों के साथ वॉट्सऐप पर बातें शेयर करते हैं, बहुत से समूहों में रहकर बिना खुद कुछ लिखे उस समूह के लोगों की पोस्ट पढ़ते हैं, और इसी तरह फेसबुक पर वे अपनी पसंद के दायरे के साथ रहते हैं। नतीजा यह होता है कि एक नापसंदी पड़ोसी के पड़ोस में रहने जैसा जमीनी तजुर्बा आजकल बहुत से लोगों को अपनी इस आभासी दुनिया में नहीं हो पाता। इस सोशल मीडिया पर उन्हें पल भर में अनसोशल और एंटीसोशल हो जाने की सहूलियत रहती है, वे जब चाहें किसी को अनफॉलो करके उसके पोस्ट देखना बंद कर सकते हैं, उसे अनफ्रेंड करके यह भी बंद कर सकते हैं कि वे लोग उसकी पोस्ट देख सकें, या उस पर टिप्पणी कर सकें।
इसके नफे और नुकसान दोनों हैं। घर के पड़ोस में रहने वाले पड़ोसी को जाकर पल भर में यह नहीं कहा जा सकता कि आज से तू मेरा पड़ोसी नहीं। लेकिन यह बात सोशल मीडिया पर हो सकती है। पड़ोसी के लिए अपने घर के सामने का रास्ता बंद नहीं किया जा सकता, लेकिन सोशल मीडिया पर ऐसा हो सकता है। और ऐसे हो सकने ने लोगों की सोच को बड़ी दूर तक बदलकर रख दिया है। असल जिंदगी की सोच जिस तरह शुरूआती दिनों में आभासी जिंदगी को बदल देती है, उस पर असल डालती है, उसी तरह अब आभासी जिंदगी के पल भर के फैसले असल जिंदगी को भी उसी तरह देखना चाहते हैं। ऐसा हो नहीं पाता, और इससे लोग एक बिल्कुल नई किस्म की दुविधा में जीते हैं, एक ऐसी दुविधा जो कि अभी कुछ बरस पहले तक लोगों को परेशान करने के लिए मौजूद नहीं थी।
असल जिंदगी में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी पीढिय़ां एक ही घर में गिने-चुने पड़ोसियों के साथ उसी इलाके में गुजर जाती हैं, लेकिन आभासी जिंदगी में, सोशल मीडिया पर लोग आए दिन नए लोगों से मिल सकते हैं, मिलते हैं। ऐसे में लोगों के पास पीढिय़ों से एक ही घर में रहते हुए भी हर दिन नए मुहल्ले का तजुर्बा पाने का एक नया मौका आया है, और इसके बारे में चौकन्ना होकर कुछ सोचने की जरूरत भी रहती है। ऐसी संभावना जमीनी जिंदगी में नहीं रहती, लेकिन सोशल मीडिया की एक अभौतिक दुनिया में ऐसा जरूर रहता है।
अब अगर देखें कि जहां पर पल-पल में दोस्त बनाने या दोस्ती छोडऩे की गुंजाइश है, जहां पर दोस्ती के बिना भी सिर्फ कुछ दायरों की एक झलक रोज पाने की सहूलियत है, वहां पर लोग अपने वक्त का, अपनी भावनाओं का बेहतर इस्तेमाल कैसे करें? जैसे लोग असल जिंदगी में चौकन्ने रहते हैं, उसी तरह बहुत से लोग हैं जो कि सोशल मीडिया को अपने परिचित दायरे के संपर्क का एक जरिया बनाकर रखते हैं, और उससे परे या बाहर कम ही जाते हैं। इनका नफा या नुकसान भी सीमित रहता है। ये एक किस्म से उस जहाज की तरह होते हैं जो कि एक बंदरगाह पर बंधा हुआ है, और वहां पर लंगर के साथ वह बड़ा महफूज भी है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहाज बंदरगाहों पर डेरे के लिए नहीं बने होते, वे बेचैन समंदर के तूफानों को झेलने के लिए बने होते हैं, और सात समंदर पार करने के लिए भी। इसलिए उस जहाज की जिंदगी भी भला क्या जिंदगी है जिसने अधिक वक्त बंदरगाह पर ही गुजार दिया हो?
इसलिए जो लोग जिंदा लोगों की तरह रहते हैं, सोचते हैं, और कुछ करने का हौसला रखते हैं, उन्हें अपने कम्फर्ट-जोन से बाहर निकलने की जहमत भी उठानी होती है। भरोसेमंद यारों के मखमली दायरे तक तो सब अच्छा रहता है, लेकिन इसके बाहर निकलने पर ही कुछ किया जा सकता है, और ऐसा करते हुए कुछ हो भी सकता है, और ऐसा होना जरूरी नहीं है कि हर बार खुशनुमा ही हो। जो लोग सोशल मीडिया पर वैचारिक या किसी और किस्म की बहस में उलझते हैं, उन्हें कुछ तो समझदार प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, और कुछ प्रतिक्रियाएं ऐसी भी मिलती हैं जैसी कि फुटपाथ पर आते-जाते लोगों की रहती हैं, तकरीबन बेचेहरा, तकरीबन गुमनाम सरीखी, और तकरीबन गैरजिम्मेदार भी। ऐसे में बहुत से लोग कुछ कोशिशों के बाद ही दुस्साहस छोड़कर एक किस्म से घर बैठ जाते हैं कि असल जिंदगी के झगड़े क्या कुछ कम हैं कि सोशल मीडिया पर और पंगा लिया जाए?
लेकिन कुछ ऐसे दुस्साहसी भी होते हैं जो कि आए दिन दोस्ती का दायरा अनजाने लोगों तक बढ़ाते हैं, असहमत लोगों के साथ बातचीत जारी रखते हैं, बंधे-बंधाए दायरे में छंटाई कुछ उसी तरह करते हैं जिस तरह की एक माली पौधों के कुछ पत्तों को, कुछ डालियों को काटकर नए पत्तों के लिए रास्ता साफ करते हैं। यह बात तय है कि सात समंदर से अरबों गुना बड़े इस सोशल मीडिया पर अगर माली की तरह छंटाई नहीं की गई, तो नए दोस्तों, नई बातों के लिए रास्ता ही नहीं निकलता। ऐसे में यह भी होता है कि पुराने दोस्तों, या कि दायरे के आम लोगों की उन्हीं बातों से सोच पर एक किस्म से काई जमते चलती है, और सोशल मीडिया उनके लिए दोस्तों और परिवार की तस्वीरों के बढ़ते हुए एलबम जितना होकर रह जाता है। ऐसे लोगों के लिए मुझे कुछ नहीं कहना है।
लेकिन सोशल मीडिया पर जो लोग सामाजिक और राजनीतिक रूप से जिंदा लोग हैं, और जो दुनिया को कल भी जिंदा रखने के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हें सोशल मीडिया पर पसंदीदा दोस्तों और चहेते लोगों के दायरे से बाहर निकलकर कुछ ऐसे लोगों को भी जोडऩा चाहिए जो कि नए हों, जो कि अलग हों, और जो कि असहमत भी होते हों। कम से कम कुछ अरसे तक ऐसे नए-नए लोगों को आजमाते जाना चाहिए कि वे आपकी इस आभासी दुनिया में कुछ जोड़ रहे हैं, कि आपका सुख-चैन महज तोड़ रहे हैं। और फिर इनके बारे में फैसला लेने की सहूलियत तो आभासी दुनिया में रहती ही है। लोगों को हर दिन कुछ नए लोगों से जुडऩा चाहिए, और हर दिन कुछ पुरानी डालियों की कटौती करनी चाहिए। यह काम बहुत से लोगों के लिए बहुत आसान भी नहीं होगा क्योंकि जब लोग अनजानी पगडंडियों पर चलते हैं, तो उन्हें सपाट, जानी-पहचानी सड़क की तरह की सहूलियत नहीं होती। लेकिन लोग दुनिया में आगे बढ़ पाते हैं नई पगडंडियों से ही, सैलानियों के लिए बनी किताबों को लेकर सफर करने वाले पर्यटक कभी खोज का इतिहास नहीं रच पाते।
आभासी दुनिया में लोगों को अपने दायरे में लगातार फेरबदल करना इसलिए भी जरूरी है कि धीरे-धीरे लोग अपने पसंदीदा दायरे के उसी तरह आदी हो जाते हैं जिस तरह कि अपने पसंदीदा गाने को बार-बार सुनने के आदी हो जाते हैं। ऐसे में नए गायक, नए संगीत, नए देश की नई विधा को जानने-समझने का काम तकलीफदेह लगने लगता है। लेकिन जिन लोगों ने नई-नई चीजों को जानने की कोशिश नहीं की, उन लोगों को नई मंजिल भी नहीं मिलती। वे बंदरगाह पर लंगर से बंधे हुए जहाज की तरह रह जाते हैं, सुरक्षित तो रहते हैं, लेकिन दुनिया नहीं देख पाते। (Daily Chhattisgarh)