नवबर्बरतावाद जिन्हें सामान्य लग रहा है, उनके कुनबों का कल...

संपादकीय
23 जून 2018


दुनिया के इतिहास में कई ऐसे आंदोलन हुए जिनका नाम किसी पुराने आंदोलन के नाम के साथ नव शब्द जोड़कर बनाया गया। एक वक्त नाजी सोच योरप में लाखों लोगों को कत्ल कर रही थी, आज भी उसी सोच के लोग जहां पर सड़कों पर उतरते हैं, अपनी विचारधारा सामने रखते हैं, उसे नवनाजीवाद कहा जाता है। ऐसी नई बातों के लिए नए नाम कहीं कला में इस्तेमाल होते हैं, कहीं साहित्य में, और कहीं संस्कृति में भी। हिन्दुस्तान में इन दिनों एक ऐसी सार्वजनिक सोच सामने आ रही है जिसे नवबर्बरता कहा जाना ठीक होगा। लोकतंत्र आने के बाद में कानून का राज चलना चाहिए था, लेकिन हाल के बरसों में लोगों की भीड़ जिस तरह सड़कों पर हिसाब चुकता कर रही है, या बिना किसी हिसाब के भी कत्ल कर रही है, भीड़ न महज खुद इंसाफ कर रही है, बल्कि जानते-समझते हुए बेइंसाफी भी कर रही है, और कत्ल को हक मान रही है। ऐसे में यह दुनिया की सभ्यता शुरू होने के और पहले की बर्बरता का एक नया आंदोलन है जो कि बहुमत की बुनियाद पर, या कि भीड़ की ताकत की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है। 
इस नवबर्बरतावाद की मिसालें उन दर्जनों वारदातों में सामने आई हैं जिनमें भीड़ ने कहीं गाय मारने की तोहमत लगाने, कहीं गोमांस घर में रखने की तोहमत लगाकर, तो कहीं बच्चे उठाने की तोहमत लगाकर किसी बेकसूर को, अमूमन अकेले, अल्पसंख्यक, कमजोर, या विचलित को सड़कों पर मार डाला। और यह सिलसिला बेलगाम बढ़ते चल रहा है, और अब शायद हर कुछ हफ्तों में हिन्दुस्तान में नवबर्बर भीड़ किसी न किसी का कत्ल कर रही है। बात यहीं तक होती तो भी ठीक रहता, तो भी इस शब्द को उछालने की जरूरत नहीं पड़ती। अभी चार दिन पहले उत्तरप्रदेश में जो हुआ, वह और भी भयानक था। दो मुस्लिमों को भीड़ ने इतना पीटा कि एक की मौत हो गई और दूसरे को जख्मी हाल में अस्पताल में रखा गया है। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो तीन-तीन पुलिस अफसरों के साथ यह भीड़ उस जख्मी को हाथ-पैर से टांगकर ले जा रही थी, और पुलिस के चेहरे पर शिकन भी नहीं थी। ऐसी हिंसा और ऐसा बर्ताव अगर इस हद तक बर्दाश्त के लायक हो गया है, अगर यह एक सामान्य बात मान ली गई है, तो यह नवबर्बरता थमने वाली नहीं है। एक वक्त यह कहा जाता था कि अदालतों में देर की वजह से भीड़ ने सड़क पर ही सजा दे दी। ऐसी सजा किसी संदिग्ध को दी जाती थी। लेकिन अब भीड़ बिना किसी शक के भी किसी को छांटकर पीटती है, मारती है, और इसके वीडियो बनाकर फैलाती है, और इसके बाद अगर जेल भी जाना पड़े तो ऐसे लोग जेल से भी वीडियो बनाकर अपने जुर्म को जायज ठहराते हैं, उस वीडियो को खुलकर फैलाते हैं। ऐसी हिंसा बर्बरता है, लेकिन ऐसी हिंसा से गौरव हासिल करना और उसका महिमामंडन करना यह एक नवबर्बरता है जो कि लोकतंत्र के आधी या एक सदी पीछे चले जाने का मामला लगता है। 
आज समाज के एक बड़े तबके में अगर दूसरे धर्म के लोग, दूसरी जाति के लोग, दूसरे प्रदेश के लोग, या कि दूसरी सोच के लोग मारे जाने के खिलाफ बर्दाश्त इतना बढ़ गया है कि कहीं से कोई आवाज भी नहीं उठती, तो यह लोकतंत्र से पहले की एक पुरानी ऐसी हिंसा के पैदा हो जाने और पनपने का सुबूत है जो कि लोकतंत्र की नाकामयाबी है। यह नवबर्बरतावाद आज इस देश में धर्म, जाति, और क्षेत्रीयता के मुद्दों को लेकर बढ़ाई जा रही है, और दूसरी तरफ खानपान, पोशाक, संस्कृति, तहजीब, इन तमाम बातों को लेकर भी हिंसा को न्यायोचित ठहराया जा रहा है। यह सिलसिला जिन लोगों को आज ठीक लग रहा है, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि किसी दिन वे खुद, या उनके परिवार के लोग किसी ऐसी भीड़ के बीच फंस सकते हैं जिसकी सोच अलग हो, जिसकी जात अलग हो, जिसका धर्म अलग हो, और जिसे खानपान-पोशाक के कुछ दूसरे तरीके पसंद हों। हिंसा और बर्बरता का सिलसिला इस तरह अगर बढ़ते चलेगा तो यह थमने वाला नहीं है। इसे बढ़ावा देना आज अगर किसी समाज को अच्छा लग रहा है तो उन्हें याद रखना चाहिए कि वे अपनी मौजूदा पीढिय़ों और आने वाली पीढिय़ों के लिए एक बहुत खतरनाक कल छोड़कर जाएंगे। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जून

हिंदुस्तानी राजनेताओं को लातविया भेजने की जरूरत

संपादकीय
22 जून 2018


योरप की एक खबर है कि वहां के एक देश लातविया के लोग बहुत कम बोलना पसंद करते हैं। और ऐसा किसी एक-दो लोगों की आदत नहीं है, वहां की अधिकतर आबादी कम बोलने वाली है। वहां लोग बड़े रचनात्मक होते हैं, लेकिन कम बोलते हैं। यह बात भारत को देखें तो बड़ी अटपटी लगती है जहां पर लोग बिन मौके भी इस अंदाज में बोलते हैं कि अगर न बोलें तो लोग इस गलतफहमी न रह जाएं कि उनके मुंह में जुबान ही नहीं है। हिंदुस्तान में नेताओं और फिल्मी सितारों में ऐसे लोगों की भरमार है जो कि जब तक कुछ उटपटांग बोलकर अपने लिए मुसीबत खड़ी न कर लें, उन्हें खाना ही नहीं पचता।

खासकर राजनीति में हिंदुस्तानी शायद इसीलिए अधिक आते हैं कि यहां अधिक बकवास की खासी गुंजाइश रहती है। राजनीति में वे खूब हिंसा की बात करते हैं, खूब नफरत की बात करते हैं, खुलकर झूठ बोलते हैं, और खासा बोलते हैं। लंबा-लंबा बोलते हैं जिसे लोग लंबी-लंबी छोडऩा भी कहते हैं। लेकिन लोगों का भारतीय राजनीति में आत्मविश्वास इतना अधिक है कि वे दमखम के साथ झूठ बोलते हैं, लगातार बोलते हैं, बार-बार बोलते हैं, और सुनने वाली जनता से वाहवाही, तालियों, और हामी, इन सबकी उम्मीद करते हैं। भारत के बहुत से नेता यह मानकर चलते हैं कि किसी झूठ को अगर बहुत अधिक बार बोला जाए, तो लोग उसे सच ही मान लेते हैं। अब ऐसे हिंदुस्तानियों को अगर लातविया जैसे किसी देश में रहकर काम करना पड़े, तो मुंह बंद रखने की सांस्कृतिक मजबूरी की वजह से ही हो सकता है उनका दम घुट जाए, और वे चल बसें। दूसरी तरफ लातविया से अगर कोई हिंदुस्तान आकर टीवी पर राजनेताओं को सुने, तो यह समझ ही न पाए कि वे नेता हैं या किसी धर्म और सम्प्रदाय के प्रवचनकर्ता। 
यहां पर एक दिक्कत मीडिया के साथ भी है जिसे आज लोगों की कही हुई बातों की वीडियो रिकॉर्डिंग भी हासिल है, और डिजिटल कतरनें भी। लेकिन इसके बाद भी मीडिया लोगों की कही हुई अलग-अलग बातों को साथ रखकर उनसे सवाल करने से कतराता है, और अब मानो धीरे-धीरे यह जिम्मा सोशल मीडिया को देकर मेनस्ट्रीम कहे जाने वाले मीडिया ने अपना जिम्मा छोड़ ही दिया है। मेनस्ट्रीम का मेन काम अब कारोबार रह गया है, और जब सोशल मीडिया पर कोई खबर बहुत ही ज्यादा फैल जाती है, तो मुख्य मीडिया उसे फैली हुई खबर की तरह ले लेता है। 
हिंदुस्तान के नेताओं को कुछ दिनों के लिए लातविया भेजना चाहिए ताकि उनका बोलना कम हो सके, और उनकी रचनात्मकता बढ़ सके। (dailychhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जून

ऐसी हरकत से धर्म का भला तो हो सकता है, योग का नहीं

संपादकीय
21 जून 2018


अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर संयुक्त राष्ट्र से लेकर चीन तक, दुनिया भर में योग किया गया, और भारत में भी अधिकतर राज्यों में सरकारों ने ही इसका आयोजन किया। लेकिन बिहार की खबर है कि वहां सरकारी आयोजन में भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या उनकी पार्टी जदयू के मंत्री-नेता शामिल नहीं हुए। पार्टी की तरफ से अनौपचारिक रूप से यह कहा गया कि योग एक निजी काम है, जो कि घर में किया जाता है, और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राजनीति जनधारणा की चीज होती है, और राजनीतिक विश्लेषक इसे प्रधानमंत्री मोदी के बढ़ाए हुए एक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अभियान से अपने को अलग करने के नीतीश कुमार के फैसले को एक किस्म की शुरुआत मान रहे हैं। ऐसी चर्चाएं खबरों में हैं कि दलितों, महादलितों, और पिछड़ों के बीच अपना जनाधार कमजोर होता देखकर जदयू ऐसा फैसला ले सकता है कि वह अगला चुनाव भाजपा के साथ मिलकर न लड़े। जदयू के कुछ नेताओं की तरफ से यह बात सामने आई है कि भाजपा ने योग को एक धर्मविशेष से इस तरह जोड़ दिया है कि दूसरे धर्मों के लोग इससे कतराने लगे हैं, और ऐसे योग-प्रदर्शन से जुडऩे का मतलब, उन तबकों का साथ खोना भी हो सकता है। और जैसा कि हमने कुछ दिन पहले इसी जगह लिखा था कांग्रेस ने नीतीश पर डोरे डालना शुरू भी कर दिया है। 
लेकिन राजनीति पर लिखना आज का मकसद नहीं है। आज हम योग के बारे में लिखने जा रहे हैं जो कि निर्विवाद रूप से तन और मन को सेहतमंद रखने में मददगार है, और भारत की एक बहुत पुरानी विद्या या जीवनशैली है। यह न तो हिन्दू धर्म तक सिमटी हुई है, और न ही इसका रंग भगवा है। देश में बहुत से ऐसे योग गुरू हुए जिन्होंने फुटपाथी मदारियों की तरह ताबीज बेचने के अंदाज में कभी काम नहीं किया, न ही उन्होंने योग का नाम लेकर कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया, और जिन्होंने बहुत गंभीरता से इसे एक गंभीर निजी जीवनशैली बनाया। लेकिन आज ब्रांड और मार्केटिंग का जमाना है, इसलिए आज योग को हिन्दुत्व के भगवे-केसरिया रंग की पैकिंग में बाजार में पेश किया गया है, और इस छाते तले रामदेव जैसे कारोबारियों ने दसियों हजार करोड़ का धंधा खड़ा कर लिया। इससे परे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने, और उनके दूसरे नेताओं या प्रदेश की सरकारों ने योग को एक धर्म के साथ, एक रंग के साथ जोड़कर पेश किया, तो बहुत से दूसरे लोग इससे कतरा गए। योग का फायदा अगर दुनिया के लोगों तक पहुंचाने की बहुत साफ नीति हो, तो उसे धर्म से अलग रखना होगा, चाहे उसे शुरू करने वाले व्यक्ति किसी धर्म के ही क्यों न हो। आज जब धर्म को एक आक्रामक हथियार बनाकर दुनिया भर में बहुत से धर्मों के लोग हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे हैं, या बिना हथियारों के भी हिंसा कर रहे हैं, साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, कट्टरता कर रहे हैं, तब जरूरत इस बात की है कि योग को स्वास्थ्य विज्ञान की तरह ही पेश किया जाए, और उससे धार्मिक रंग को हटाया जाए। 
कई बार किसी एक लोकप्रिय चीज का फायदा उठाने के लिए कोई पार्टी, कोई संगठन, कोई धर्म या कोई सम्प्रदाय अपने आपको उस चीज का वारिस बताते हुए उस पर एकाधिकार जताने लगते हैं। और ऐसे में ही उस चीज, बात, या तकनीक का सामाजिक योगदान सीमित हो जाता है। आज भारत में योग को अगर एक धर्म के एक हिस्से की तरह दूसरों पर थोपा जाएगा, तो बहुत से लोग इसकी प्रतिक्रिया में इससे दूर रहेंगे। जिस तरह लोगों पर वंदे मातरम को थोपा जाता है, तो लोग इस थोपने का विरोध करते हैं, न कि वंदे मातरम का। जब लोगों पर राष्ट्रगान के दौरान खड़ा होना थोपा जाता है, तो लोग इस खड़े रहने का विरोध करते हैं, न कि राष्ट्रगान का। दूसरी तरफ ऐसे ही विरोध को देशद्रोह का रंग देकर पेश कर दिया जाता है, और एक हमले की बुनियाद बना दिया जाता है। यह समझने की जरूरत है कि जो लोग योग को एक थोपे हुए धार्मिक रंग के साथ पसंद नहीं करते, वे न तो योग विरोधी हैं, न ही उस धर्म के विरोधी हैं, और न ही वे देशद्रोही हैं। आज भारत में जरूरत इस बात की है कि योग को धर्म से परे ही रखा जाए। वरना ऐसी हरकत से किसी धर्म का तो भला हो सकता है, योग का नहीं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 जून

कश्मीर पर भाजपा लीक से परे के अपने फैसले से वापिस लौटी

संपादकीय
20 जून 2018


जम्मू-कश्मीर की सरकार चल बसी। भाजपा ने यह तय किया कि उसे वहां के सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर जाना है, और उसके बाद पीडीपी की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के सामने इस्तीफा देने के अलावा और कोई चारा नहीं था। जिस वक्त भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी थी, उस वक्त भी यह एक बड़ा ही अप्राकृतिक गठबंधन था, और भाजपा ने पूरे देश में अपने विस्तार के एक व्यापक एजेंडे के तहत कश्मीर में अपनी भागीदारी की सरकार का फैसला लिया था। लेकिन लगातार तनाव के बीच चल रही इस सरकार ने अगले आम चुनाव के एक बरस पहले दम तोड़ दिया। इसकी बहुत सी वजहें हैं, जिनमें से कुछ के बारे में ही यहां पर चर्चा हो सकती है। 
कश्मीर में उस पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के भाजपा के फैसले को हम गलत नहीं मानते जिसे चुनावी सभाओं में मोदी ने वंशवाद से लेकर अलगाववाद तक के लिए कोसा था। जो राज्य अशांति और अहिंसा के लंबे दौर से गुजर रहे हैं, वहां पर लोकतांत्रिक ताकतों को कई किस्म के अस्वाभाविक और अप्राकृतिक समझौते और गठबंधन देश-प्रदेश के व्यापक हित में करने पड़ते हैं, और करने भी चाहिए। किसी भी प्रदेश में राष्ट्रपति या राज्यपाल शासन से बेहतर एक निर्वाचित सरकार होती है क्योंकि निर्वाचित सरकार का न होना एक निलंबित-लोकतंत्र होता है। कश्मीर न सिर्फ हिंसाग्रस्त और अशांत राज्य है, बल्कि वह अलगाववाद का शिकार भी है, वहां की घटनाओं को लेकर देश में एक साम्प्रदायिक तनाव भी बने रहता है, और वह एक ऐसा सरहदी राज्य है जो कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से से लगा हुआ है। कश्मीर में आज भी ऐसे लोगों की गिनती कम नहीं है जो कि भारत से अलग होना चाहते हैं, पाकिस्तान में मिलना चाहते हैं, या कि वे एक आजाद कश्मीर अलग से चाहते हैं जो कि दोनों देशों के बीच रहे। ऐसी जटिल स्थितियों वाला यह प्रदेश जब भारत में शामिल हुआ उसी वक्त कई ऐतिहासिक शर्तों के साथ ही यह विलय हो पाया था। उन शर्तों को पूरी तरह खारिज करना मुमकिन नहीं है, और भाजपा ने धारा 370 जैसी शर्तों को बिना छुए हुए कश्मीर में गठबंधन सरकार में रहना मंजूर किया था, जो कि हमारे हिसाब से अडऩे के बजाय एक अधिक लोकतांत्रिक फैसला था। वह कामयाब प्रयोग चाहे न हो सका, लेकिन इन बरसों में जब भाजपा ने धारा 370 जैसे मुद्दों को अलग रख दिया था, तो वह कश्मीर के हित में था। यह एक अलग बात है कि कश्मीर में यह नर्मी बाकी देश में भाजपा के समर्थकों की गर्मी की शक्ल में सामने आ रही थी, और ऐसा माना जा रहा था कि कश्मीरी जनता के एक तबके की पत्थरबाजी से, दूसरे आतंकी हमलों से, अलगाववादियों के प्रति कश्मीर सरकार के रूख से, और सरहद पर लगातार हिन्दुस्तानी फौजियों की मौत से भाजपा के परंपरागत समर्थक बाकी देश में बहुत ही असुविधा महसूस कर रहे थे, असंतुष्ट थे। अपने वोटर समुदाय को अगले आम चुनाव के पहले नाराजगी से बाहर लाने के लिए भी भाजपा का यह फैसला उसके अपने हित का है, और यह कहना अतिसरलीकरण होगा कि यह फैसला कश्मीर के हितों के खिलाफ है। राज्य में सरकार से बाहर होने का फैसला देश में अपने किस्म का अकेला फैसला नहीं है, कई राज्यों में कई पार्टियां गठबंधन के बाहर जाती हैं, और वहां सरकारें नए गठबंधनों के साथ बचती हैं, या गिर जाती हैं। इसलिए भाजपा ने लीक से हटकर यह काम नहीं किया है, बल्कि गठबंधन सरकार में रहना उसके लिए लीक से हटकर एक काम था जो कि उसने अब अपनी परंपराओं के हिसाब से ठीक कर लिया है। यह बात जाहिर है कि महज कश्मीर तक सीमित एक प्रादेशिक पार्टी पीडीपी, और एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा की कश्मीर नीतियां एक सरीखी हो नहीं सकती थीं, और इनके बीच टकराव, मतभेद या विरोधाभास अंतरनिहित ही चले आ रहे थे। 
कश्मीर में फिलहाल कोई राजनीतिक समीकरण किसी स्थाई और असरदार सरकार के आसार नहीं बताते। वहां पर भाजपा से परे की तीन पार्टियां हैं, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, और कांग्रेस। इनके बीच कोई तालमेल आसान नहीं दिखता, और ऐसा भी नहीं लगता कि राज्य में आज दुबारा चुनाव कराने पर कोई पार्टी स्थाई सरकार बनाने की नौबत में आ जाएगी। ऐसे में यह राज्य एक बार फिर निर्वाचित सरकार खो रहा है, और आने वाला वक्त बताएगा कि आज के वहां के बहुत ही तजुर्बेकार गवर्नर एन.एन.वोहरा किस तरह सरकार चला पाते हैं। वे 2008 से वहां राज्यपाल हैं, और उनको मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया था। वे शायद ऐसे अकेले ही राज्यपाल हैं जो उस समय से और उस सरकार के बनाए हुए, आज तक चल रहे हैं, और जारी रहेंगे ऐसे आसार है। उनके अलावा ईएमएस नरसिम्हन भी एक पूर्व अफसर रहे हैं जिन्हें यूपीए सरकार ने छत्तीसगढ़ का राज्यपाल बनाया था और जो बाद में आन्ध्र के विभाजन के दौर से अब तक आन्ध्र-तेलंगाना दोनों के राज्यपाल बने हुए हैं। कश्मीर के बारे में आने वाले दिनों में लिखने के लिए और बहुत सी बातें रहेंगी, लेकिन आज की आखिरी बात यह कि अगले आम चुनाव के एक बरस पहले भाजपा ने एक और क्षेत्रीय पार्टी का साथ खो दिया है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जून

पुलिस-परिवारों का आंदोलन सरकार आनन-फानन नतीजे न निकाले, मुद्दों पर गौर करे

संपादकीय
19 जून 2018


छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव को बस कुछ ही महीने बाकी हैं, और कर्मचारियों के तमाम किस्म के संगठन अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर हैं क्योंकि यह किसी दूर की जगह जाने वाली रात की आखिरी बस जैसा हाल है, अभी नहीं, तो (इस सरकार में) कभी नहीं। मुख्यमंत्री ने भी कुछ दिन पहले यह कहा है कि चुनाव का साल है इसलिए सभी लोग आंदोलन तो करेंगे ही। लेकिन बाकी कर्मचारी-आंदोलनों से परे एक नए किस्म का आंदोलन एकदम से सुलग रहा है जो कि कुछ हैरान करने वाला है। पुलिस कर्मचारी चूंकि नियम-कानून के मुताबिक कर्मचारी संघ नहीं बना सकते, और आंदोलन नहीं कर सकते, इसलिए उनके परिवारों के लोग उनके हक की मांग करते हुए आंदोलन कर रहे हैं, और प्रदेश के कई शहरों में पुलिस कर्मियों की पत्नियों को धरना देते, मांग पत्र देते, नारे लगाते देखा गया है। राजधानी रायपुर में भी पुलिस-परिवारों ने धरने की इजाजत मांगी है। 
अब यह स्थिति कुछ जटिल है क्योंकि परिवारों के ऊपर तो कोई शासकीय सेवा नियम लागू होते नहीं हैं। और कल इस बारे में राज्य सरकार की एक सर्वोच्च स्तरीय बैठक के बाद गृहमंत्री ने यह बयान दिया है कि इस आंदोलन को कुछ बर्खास्त और कुछ निलंबित पुलिस वाले हवा दे रहे हैं। इतनी जल्दी गृहमंत्री का किसी नतीजे पर पहुंचकर, और ऐसा बयान देना कुछ अटपटा भी है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि इसी गृहमंत्री ने कुछ हफ्तों पहले सरगुजा के इलाके में शुरू हुए आदिवासियों के पत्थलगड़ी आंदोलन को लेकर भी आनन-फानन यह बयान दिया था कि यह धर्मांतरण करने वाले लोगों का शुरू किया हुआ आंदोलन है। लेकिन अब इन कुछ हफ्तों में ही आदिवासियों की एक व्यापक भागीदारी इस आंदोलन में सामने आई है जो कि ईसाई बने हुए आदिवासियों से परे की भी है। और इसे महज ईसाई-आदिवासियों का आंदोलन करार देना सही साबित नहीं हुआ है। आज पत्थलगड़ी आंदोलन को खुलकर ऐसे आदिवासी नेता सम्हाल रहे हैं जो कि गैरईसाई हैं। इसलिए राज्य सरकार में बैठे लोगों को इस बात से थोड़ा सा सबक लेना चाहिए कि बंद कमरे में उनके निष्कर्ष चाहे जो हों, उन्हें सार्वजनिक बयान देते हुए जटिल मुद्दों के अतिसरलीकरण से बचना चाहिए, और जहां पर कोई व्यापक समुदाय जुड़ा हुआ हो, वहां पर किसी छोटे से तबके को निशाना बनाते हुए सब पर तोहमत नहीं लगानी चाहिए। 
हो सकता है कि पुलिस के कुछ निलंबित और बर्खास्त कर्मचारी इस आंदोलन के पीछे हों, लेकिन राज्य सरकार को इस आंदोलन के मुद्दे देखना चाहिए, और पुलिस परिवारों की तकलीफों के बारे में भी देखना चाहिए। मुद्दों पर किसी चर्चा के बिना उनके पीछे के लोगों और उनकी नीयत भर की बात करना न तो राजनीतिक समझदारी है, और न ही किसी जिम्मेदार और जनकल्याणकारी सरकार को ऐसा करना चाहिए। यह बात जाहिर है कि देश के और बहुत से राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी पुलिस कर्मचारियों के काम की स्थितियां मुश्किल हैं, और अमानवीय हैं। वे अपने परिवारों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, और बाकी देश की तरह यहां भी पुलिस परिवारों के बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं, और बहुत से मामलों में बिगड़ भी जाते हैं। काम के घंटे असीमित रहते हैं, काम की स्थितियां खतरनाक रहती हैं, सड़कों पर धूल, धुआं, और धूप झेलते हुए काम करने से लेकर बस्तर में नक्सल-मोर्चे पर शहादत तक, अनगिनत ऐसी दिक्कतें और खतरे पुलिस कर्मचारी ही झेलते हैं, जो कि सरकार के किसी और दूसरे विभाग के लोग नहीं झेलते। इसलिए सरकार को पुलिस-परिवारों की मांगों पर आक्रामक होने के बजाय यह सोचना चाहिए कि राज्य शासन का गृहविभाग समय रहते इन दिक्कतों को अब तक सुलझा क्यों नहीं पाया, और आज जब ये मांगें सामने हैं, तो इनको न्यायसंगत और तर्कसंगत पैमाने पर तौलना चाहिए। 
यह एक अभूतपूर्व स्थिति है कि किसी कर्मचारी-तबके के परिवारों ने आंदोलन किया है। और जिन शहरों से यह शुरू हुआ है, उनमें मुख्यमंत्री का अपना चुनाव क्षेत्र राजनांदगांव भी शामिल है। हमारा ख्याल है कि सरकार को जवाबी बयान देने से बचना चाहिए, और आंदोलन के मुद्दों पर गौर करने के लिए तुरंत एक कमेटी बनानी चाहिए जो कि आंदोलनकारियों और उनके परिवार के पुलिसकर्मियों, दोनों को ही राहत दे सके। आज जनता से लेकर नक्सलियों तक, जिस किसी का पहला वार सरकार पर होता है, उसे झेलने के लिए पुलिस ही सामने रहती है। अभी कुछ समय पहले हमने इसी जगह पर पुलिस कर्मचारियों के बेजा इस्तेमाल के बारे में लिखा था कि किस तरह उन्हें नेताओं और अफसरों की निजी चाकरी में लगा दिया जाता है। जिस वक्त हमने यह बात लिखी थी, उस वक्त तो पुलिस-परिवारों की न कोई मांग थी, और न ही ऐसे आंदोलन के कोई संकेत थे। फिर भी हमने पुलिस की सामान्य स्थितियों को लेकर उनके साथ हो रही बेइंसाफी पर लिखा था। सरकारी बंगलों पर पुलिसकर्मियों से निजी नौकरों की तरह काम लेना एक बड़ी ही आम बात है। ऐसे अपमानजनक काम से उनका आत्मविश्वास भी खत्म होता है, और वर्दी का गौरव भी जाते रहता है। इसलिए सरकार को आंदोलनकारियों के मुद्दों से परे भी खुद होकर पुलिस की हालत सुधारनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार

खुदकुशी के जिम्मेदार ये भी...

18 जून 2018

ऑस्ट्रेलिया की खबर है कि दुनिया भर में किसी समुदाय में नौजवानों की आत्महत्या सबसे अधिक है, तो यह वहां के एक आदिवासी समाज में है। वहां के मूल निवासी, एबओरिजिन, ऑस्ट्रेलिया के गैरमूल निवासियों के मुकाबले चार गुना अधिक आत्महत्या करते हैं। अब यह हैरानी की बात है क्योंकि आदिवासियों के बारे में यह माना जाता है कि वे कुदरत के करीब रहते हैं, और कम सहूलियतों के बीच भी वे अधिक संतुष्ट रहते हैं। ऐसे में लोग कुछ हैरान हैं, कुछ परेशान हैं कि इस समुदाय के नौजवान इतनी आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? आदिवासी बुजुर्गों का मानना है कि वे अपनी जमीन और अपनी परंपरागत संस्कृति से कटने की वजह से ऐसा कर रहे हैं।
खैर, यह तो हिन्दुस्तान से कुछ दूरी का मुद्दा है, लेकिन अपने करीब अगर देखें तो छत्तीसगढ़ में कल एक दिन में दो नौजवान मीडियाकर्मियों ने खुदकुशी की है। एक युवक जो सरगुजा में एक समाचार चैनल में काम करता था, उसने आत्महत्या की, और एक युवती जो बस्तर के एक अखबार में काम करती थी, उसने भी फांसी लगाकर आत्महत्या की।
कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने अभी कुछ देर पहले ट्वीट किया है कि पंजाब में दो और किसानों ने 16 जून को आत्महत्या कर ली। दो और किसान राजस्थान में मर गए, और एक मध्यप्रदेश में।
अमरीका के न्यूयॉर्क में अभी एक फैशन डिजाइनर केट स्पेड की आत्महत्या से भी बहुत से लोग सदमे में हैं क्योंकि वे एक बड़ी कामयाब फैशन डिजाइनर थीं, लेकिन लंबे समय से बेचैनी और निराशा की शिकार हुई थी। लोगों ने इस खबर के साथ अमरीका के राष्ट्रीय आत्महत्या निरोधक हॉटलाईन का नंबर भी पोस्ट किया है।
अब एक सवाल उठता है कि कहीं कामकाजी नौजवान, तो कहीं कर्ज में लदे बुजुर्ग किसान, तो कहीं प्रकृति के बीच रहते आदिवासी, तो कहीं न्यूयॉर्क की एक बड़ी फैशन डिजाइनर, हर किस्म के लोग आत्महत्या करते दिखते हैं, तो आखिर इस मर्ज की दवा क्या है?
एक तो इस मोर्चे पर अच्छी बात यह हुई है कि भारत की सुप्रीम कोर्ट और संसद, सरकार, इन सबने देश में यह कानून सुधार दिया है जिसमें आत्महत्या की कोशिश को या आत्महत्या को जुर्म करार दिया जाता था। आत्महत्या कोई शौक से तो करते नहीं, और जब कोई ऐसी कोशिश में कामयाब हो जाएं, तो उन्हें सजा देने की ताकत किसी कानून में है नहीं। ऐसे में जो लोग आत्महत्या की कोशिश करते बच जाते थे, वे उसके बाद मुकदमा भी झेलते थे। अब वह सिलसिला खत्म हुआ, और देश को यह अक्ल आई कि आत्महत्या जुर्म नहीं है। लेकिन बेवक्त खत्म होने वाली जिंदगियों का आखिर क्या होगा? कैसे इन्हें बचाया जा सकता है?
आत्महत्या के साथ एक दिक्कत यह भी है कि बहुत से लोग इन्हें बीमारी, गरीबी, मानसिक रोग, या इस किस्म की कुछ गिनी-चुनी बातों से जोड़कर देखते हैं, और इनके पीछे की बाकी वजहें धरी रह जाती हैं। ऐसे में जरूरत आत्महत्या को रोकने पर फोकस करने के बजाय जिंदगी जीने की वजहें बढ़ाने की है। और यह काम कुछ अधिक मुश्किल है क्योंकि यह सरकार या देश और समाज, इन सबसे बहुत बड़ी मशक्कत मांगता है। आज निराशा की वजहें बहुत हैं, आसान है, गली-गली हर घूरे पर बिखरी हुई हैं, लेकिन जीने की वजहें हैं तो उससे अधिक, लेकिन दिखती कम है। ठीक उसी तरह जैसे कि तालाब में पानी बहुत रहता है, लेकिन पहली नजर में उस पर तैरता चाहे थोड़ा सा ही क्यों न हो, कचरा सबसे पहले दिखता है। इसी तरह जिंदगी में जिंदा रहने की वजहें, खुश रहने की वजहें काफी रहती हैं, लेकिन लोग अपने दुख-तकलीफ को ही सब कुछ मानकर उससे परे देखना बंद कर चुके रहते हैं।
हमारे सरीखे कुछ लोगों को यह भी लगता है कि अगर अपने से अधिक तकलीफदेह जिंदगी को देखा जाए तो अपनी तकलीफ का एहसास घटने लगता है, और जिंदगी से निराशा भी उतनी अधिक नहीं रह जाती। कई बार लगता है कि जिनको अपनी जिंदगी से बड़ी शिकायतें हों, उन्हें एक बार किसी बड़े सरकारी अस्पताल में, वहां के जनरल वार्ड में, वहां के बरामदों और अहातों में जीते लोगों को देखना चाहिए, मरीजों को देखना चाहिए, तो अपनी दर्दभरी जिंदगी अनायास ही चमकीली सुनहरी लगने लगेगी। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें दूसरों का उतना अधिक दुख-दर्द देखकर निराशा और अधिक बढ़ जाए। इसलिए कोई एक नुस्खा सभी लोगों को रामबाण दवा की तरह असरदार नहीं हो सकता।
दूसरी बात यह भी समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान जैसे गरीब देश में मनोचिकित्सक बहुत ही कम लोगों को नसीब होते हैं। उनके पास भीड़ इतनी अधिक होती है कि वे मन का इलाज करने के बजाय तगड़ा असर करने वाली दवाओं को देकर मरीजों की भीड़ से एक किस्म से फारिग होते हैं। और चिकित्सा से परामर्श वाला हिस्सा गायब हो जाता है, क्योंकि परामर्श जितने समय में मनोचिकित्सक चार और मरीज देख सकते हैं।
सरकार से जिंदगी में खुशहाली की जो उम्मीद की जाती है, वह खासी बड़ी है, और उसका पूरा होना लगभग असंभव रहता है। इसलिए बात घूमफिरकर समाज और परिवार पर, दोस्तों और करीबियों पर आ जाती है अपने बीच के किसी को आत्महत्या से कैसे रोका जाए? ऐसा रोक पाना हो सकता है कि अधिकतर मामलों में मुमकिन न हो, लेकिन फिर भी जितने लोगों को बचाया जा सके, उतने लोगों की जिंदगी कम कीमती तो होती नहीं। इसलिए लोगों को अपने आसपास की निराशा को, तनाव को भांपकर उसे कम करने की कोशिश करनी चाहिए।
लेकिन एक दूसरा बड़ा जिम्मा समाज और मीडिया पर आता है जो कि चारों तरफ नकारात्मकता को बढ़ाने के जिम्मेदार हैं। भारत जैसे चुनावी-लोकतंत्र में अब नेताओं और पार्टियों के बीच, धर्मान्धों और कट्टर पाखंडियों में नकारात्मकता जिंदा रहने के लिए चारा-पानी सरीखी हो गई है, और यह जहर हवा में चारों तरफ फैल रहा है। जिस तरह दिल्ली की हवा में अब हर बरस कई बार कई किस्म का जहर जिंदगी को थाम रहा है, उसी तरह पूरे वक्त, चारों तरफ हिंसा और निराशा की बातें जिंदगी में लोगों के भरोसे को थका दे रही हैं। भारतीय लोकतंत्र में बहुत लोगों को जिंदा रहने की बहुत सी वजहें दिखना अब कम हो चला है। लोग अपनी निजी दिक्कतों से परे भी, सामाजिक और सामुदायिक दिक्कतें देखकर एक निरंतर-निराशा में जीते हैं, और जब वे आत्महत्या की सोचते हैं, तो निजी वजहों के साथ-साथ, ऐसी सामुदायिक या सामाजिक वजहें भी रहती हैं, अपने देश की वजहें भी रहती हैं।
इसलिए जिन लोगों के मुंह के सामने माईक अधिक रहता है, जिनके चेहरों पर कैमरे अधिक टिके होते हैं, जिनका लिखा हुआ अधिक छपता है, अधिक दिखता है, अधिक बिकता है, उन सब पर यह एक अधिक बड़ी सामुदायिक जिम्मेदारी भी आती है कि महज अपने जिंदा रहने के लिए, अपना अस्तित्व बनाए और बचाए रखने के लिए वे इतनी निराशा-हिंसा न फैलाएं कि लोगों में उसकी वजह से जिंदा रहने की हसरत ही घटती चले। ये लोग किसी खुदकुशी के सीधे-सीधे जिम्मेदार कभी नहीं ठहराए जा सकेंगे, लेकिन ये जिम्मेदार रहते जरूर हैं। (Daily Chhattisgarh)