काँव-काँव, 23 फरवरी

बात की बात, 23 फरवरी

दीवारों पर लिक्खा है, 23 फरवरी

कानून इतना अंधा भी न हो  कि वह इंसाफ देख न सके
संपादकीय ''दैनिक छत्तीसगढ़'' 23 फऱवरी : 2019


जंगलों से आदिवासियों और वहां बसे वनवासियों को निकालने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हिन्दुस्तान पूरी तरह विभाजित होने जा रहा है। जंगल की जमीन पर हजारों बरस से बसे हुए लोगों को हटाने का यह आदेश इस देश को शहरी, और वनवासी हिन्दुस्तान, ऐसे दो तबकों में बांट रहा है। अब यह बात खुलकर जाहिर हो रही है कि सुप्रीम कोर्ट में देश के सबसे पुराने, आदिवासी-वनवासी बाशिंदों को लेकर समझ की कमी है, और यही हाल केन्द्र और राज्य सरकारों का है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चल रहे इस मामले में इन तबकों के हितों का ध्यान नहीं रखा, और अदालत से एक ऐसा कड़ा आदेश आ गया है जिससे देश के दस-बीस लाख आदिवासी-वनवासी परिवार बेदखल किए जा सकते हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में वन्य प्राणियों के लिए दायर की गई एक जनहित याचिका को लेकर चल रहा था जिसमें इस संगठन ने वन अधिकार अधिनियम की वैधता को चुनौती दी थी। आज इस अधिनियम के तहत देश में एक वक्त के पहले से बसे हुए आदिवासियों को वहां पर जमीनों का पट्टा देने का प्रावधान है, और इस प्रावधान को चुनौती दी गई थी।
देश के आदिवासी इलाकों वाले प्रदेशों में लंबे समय से यह टकराव चले ही आ रहा है कि जंगल की जमीन पर बसे हुए लोगों को वहां पर पट्टे दिए जाएं, या नहीं। सरकार का पूरा अमला इसके सख्त खिलाफ रहता है, और एक आम सरकारी तर्क यह है कि आदिवासी खेती करने के लिए जंगलों को काट लेते हैं, वहां पर पेड़ों की जगह खेत बना लेते हैं, और फिर उस जमीन पर पट्टे की मांग करते हैं। सरकारी तर्क यह रहते आया है कि आदिवासियों की वजह से जंगल घट रहे हैं, खत्म हो रहे हैं, और जंगली जानवरों पर भी खतरा है। दूसरी तरफ आदिवासियों की वकालत करने वाले समूहों का यह कहना है कि देश में आज जितने भी जंगल बचे हुए हैं, वे आदिवासियों की वजह से बचे हैं, उनका तर्क यह है कि जंगल और आदिवासी, या दूसरे शब्दों में कहें तो वन और वनवासी एक-दूसरे के लिए बने हैं, और सहअस्तित्व उनकी जिंदगी की सोच है। वे हजारों बरस से इन्हीं पेड़ों के बीच रहते आए हैं, और इन पेड़ों से उनसे अधिक और कोई मोहब्बत नहीं कर सकते।
यह बात बहुत साफ है कि जहां खदानें हैं, उनमें से बहुत से इलाकों पर जंगल हैं। और जहां जंगल हैं, उनके बीच आदिवासी बसाहटें हैं। ऐसे में कारखानेदार, खदान मालिक, और लकड़ी के कारोबारियों की आंखों में आदिवासी जाहिर तौर पर किरकिरी की तरह खटकते रहते हैं। इनको जंगल से बेदखल करने का सिलसिला अंग्रेजों के वक्त से शुरू हुआ, और अवतार नाम की हॉलीवुड फिल्म में वह दूसरे ग्रहों पर जाकर भी जारी रहा। आदिवासियों के अधिकार महज हिन्दुस्तान में ही नहीं छीने गए, बल्कि अमरीका जैसे देश में वहां के मूल निवासियों से परे की सारी की सारी गोरी और काली आबादी बाहर से आई हुई है, और वहां आज भी मूल निवासियों के हक और मुद्दों की लड़ाई चलती ही रहती है। यह लड़ाई लैटिन अमरीकी देशों में भी चलती है जहां पर आदिवासियों को बेदखल किए बिना बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कई कारोबार आगे ही नहीं बढ़ सकते, ठीक उसी तरह जैसे कि ओडिशा में आदिवासियों को बेदखल किए बिना वेदांत का पहला कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता।
जो लोग देश से दस-बीस लाख आदिवासी-वनवासी परिवारों की बेदखली के खतरे को नहीं समझ रहे हैं, उनको हाल का सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला याद रखना चाहिए। अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए बनाए गए एसटी-एससी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट ने जो फेरबदल किया था, उस पर जो बवाल हुआ था, उसे देखते हुए संसद में कानून बदलकर उस प्रावधान को वापिस लागू करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट का बेदखली का यह आदेश एक शहरी सोच का संवेदनाशून्य आदेश है, जो कि जानवरों के हक को इंसानों के हक के ऊपर समझ रहा है, और यह एक ऐसा फैसला होने जा रहा है जो कि सरकारी अफसरों की साजिश के चलते अदालत में कमजोर तर्कों की वजह से आई हुई नौबत रहेगा। यह मामला इस देश के भीतर सरकारों को पलटने की ताकत भी रखेगा, और इस फैसले को लागू करना मुमकिन भी नहीं होगा। बहुत से जानकार लोगों का यह कहना है कि शहरी कानून की कम समझ रखने वाले, लेकिन जंगल पर सबसे अधिक हक रखने वाले आदिवासी-वनवासी तबकों को इंसान न मानने वाली यह सरकारी-अदालती सोच इस देश में एक नई हथियारबंद लड़ाई शुरू कर सकती है। कानून को इतना अंधा भी नहीं होना चाहिए कि वह इंसाफ को देख न सके।

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी

तथागत रॉय पर राष्ट्रपति जिम्मेदारी से मुंह चुरा रहे

संपादकीय
22 फऱवरी 2019



मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय सोशल मीडिया पर लगातार घोर साम्प्रदायिक, भड़काऊ, और हिंसक बातें लिखते रहते हैं। लेकिन उनकी ताजा बात देश में हिंसा भड़काने की एक बड़ी वजह बन सकती है जिसमें भारतीय सेना के एक रिटायर्ड अफसर की अपील से अपनी सहमति जताते हुए उसे री-ट्वीट किया है जिसमें कहा गया है कि कश्मीर न जाएं, दो बरस अमरनाथ भी न जाएं, कश्मीर एम्पोरियम से कोई सामान न खरीदें, कश्मीरी फेरीवालों से कोई सामान न खरीदें, और हर कश्मीरी चीज का बहिष्कार करें। 
तथागत रॉय राज्यपाल के संवैधानिक पद पर हैं, और संविधान की शपथ लेकर ऐशोआराम के इस ओहदे पर काबिज हैं, और इस संवैधानिक दर्जे की वजह से उन पर कोई मुकदमा भी नहीं चलाया जा सकता है। लेकिन आज जब देश में जगह-जगह कश्मीरी छात्रों पर, कश्मीरी कारोबारियों पर, फेरीवालों पर हमले हो रहे हैं, तब भाजपा का यह नेता और राज्यपाल ऐसी हिंसक बात कहकर भी कुर्सी पर बना हुआ है। इसे लेकर देश में बहुत से लोग यह बात उठा रहे हैं कि राज्यपाल की ऐसी असंवैधानिक बात को लेकर राष्ट्रपति कब उन पर कार्रवाई करेंगे? संविधान के मुताबिक राज्यपाल राष्ट्रपति की मर्जी से नियुक्त होते हैं, और वे कब तक के लिए ही नियुक्त रहते हैं, जब तक राज्यपाल की मर्जी हो। लेकिन देश के बहुत से भाजपा-एनडीए विरोधी लोगों द्वारा की जा रही आलोचना के बीच आज एनडीए में भाजपा के एक सबसे पुराने साथी अकाली दल ने राज्यपाल से मांग की है कि वे तथागत रॉय के कश्मीर बहिष्कार की ट्वीट पर तुरंत कार्रवाई करें। इस पार्टी के सांसद और वरिष्ठ नेता नरेश गुजराल ने कहा है कि 1980 के दशक में सिक्ख समुदाय को पंजाब के आतंक की वजह से जिस तरह अलग-थलग किया गया था, उसका दुहराव आज कश्मीरियों के साथ नहीं होना चाहिए। गुजराल ने कहा कि कश्मीरी समुदाय के कुछ लोग आतंक में शामिल हो सकते हैं, और सरकार को उन पर कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरे कश्मीरी समुदाय का ही बहिष्कार कर दिया जाए। गुजराल का कहना है कि यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि तथागत रॉय जैसे लोग राज्यपाल बनाए गए हैं, ऐसे लोग हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों पर एक धब्बा हैं। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच अघोषित युद्ध पंजाब में शुरू किया गया था, और यह डेढ़ दशक चलते रहा, जिसमें 40 हजार से अधिक बेकसूर जिंदगियां खत्म हुईं, लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान तब हुआ जब पूरे सिक्ख समुदाय को शक की नजर से देखा गया, और 1984 के दंगों में उन्हें मारा गया। नरेश गुजराल ने राष्ट्रपति से कहा है कि तथागत रॉय की हिंसक बातों को देखकर तुरंत उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। 
हम इस सिलसिले में जो कहना चाहते हैं, वह तकरीबन पूरे का पूरा उस एनडीए के एक सबसे पुराने और खांटी भागीदार अकाली दल ने कह दिया है इसलिए हम उन्हीं तर्कों को यहां दुहराना नहीं चाहते। लेकिन अगर राष्ट्रपति देश के ऐसे माहौल में न लोगों से खुद कोई अपील कर रहे हैं, न एक राज्यपाल द्वारा फैलाई जा रही भड़काऊ हिंसा पर कोई कार्रवाई कर रहे हैं, तो ऐसी चुप्पी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज होने जा रही है। यह बात कोई दबी-छुपी नहीं है, और न ही चर्चा के लिए नाजायज है कि राष्ट्रपति देश के उस दलित समुदाय से आए हैं जो कि एक समुदाय के रूप में सैकड़ों बरस से हिन्दुस्तान में ऐसी ही हिंसा झेल रहा है, बहिष्कार झेल रहा है, सामाजिक छुआछूत झेल रहा है। एक दलित के रूप में उनकी समझ सामाजिक बहिष्कार की तकलीफ को समझने वाली होनी चाहिए, फिर चाहे वह एक दलित का बहिष्कार हो, किसी मुस्लिम का बहिष्कार हो, या किसी प्रदेश के व्यक्ति का बहिष्कार हो। राष्ट्रपति उस उत्तरप्रदेश के हैं जिसने मुम्बई में लंबे अरसे से शिवसेना के फतवों में बहिष्कार झेला है, और हिंसा झेली है। यह तमाम तजुर्बा राष्ट्रपति को देश में आज कश्मीरियों पर खतरा, और उन्हें हिफाजत देने की समझ देने वाला होना चाहिए। तथागत रॉय की साम्प्रदायिक और हिंसक बातों से केन्द्र की मोदी सरकार को कभी कोई परहेज नहीं रहा, और इसीलिए मेघालय के राजभवन से निकला नफरत का लावा सोशल मीडिया के रास्ते देश भर में फैलते रहता है। लेकिन  अब पानी सिर के ऊपर निकल गया है, और अब भी अगर राष्ट्रपति चुप रहते हैं तो उसका यही मतलब होगा कि सत्ता और सुख पाने के बाद उनके भीतर का तमाम दलित-तजुर्बा भुलाया जा चुका है, और वे अपनी आज की संवैधानिक जिम्मेदारी से मुंह चुरा रहे हैं।


(Daily Chhattisgarh) 

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दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी

बात की बात, 21 फरवरी

काँव-काँव, 21 फरवरी

पिक्सटून, 21 फरवरी