दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल

आसाराम जैसे बड़े मुजरिमों के लिए अलग कानून जरूरी

संपादकीय
26 अप्रैल 2018


कुछ महीने पहले हरियाणा में बाबा राम रहीम नाम के एक बलात्कारी की गिरफ्तारी के लंबा-चौड़ा नाटक चला, और उस बाबा के भक्तों ने गिरफ्तारी और सजा के दौरान जो अराजकता फैलाई उसमें कई लोग मारे गए थे, उसके पहले संत रामपाल नाम के एक आदमी को जब कई गंभीर अपराधों में गिरफ्तार करने की नौबत आई तो उसके समर्थकों ने उसके किले जैसे आश्रम की ऐसी हथियारबंद मोर्चेबंदी की कि सरकार को फौजी कार्रवाई करके उसे निकालना पड़ा, और अदालत के रास्ते जेल भेजना पड़ा। कल जिस आसाराम को सजा हुई है, उसे भी जब इंदौर के आश्रम से गिरफ्तार करने की नौबत आई थी तो बड़ा हंगामा हुआ था। 
ऐसे तमाम पाखंडियों, बलात्कारियों, और भ्रष्ट चोगाधारियों के पास किसी आश्रम के नाम से या किसी ट्रस्ट के नाम से हजारों करोड़ की दौलत जुट जाती है, और उसकी ताकत से वे अपने आपमें एक संविधानेत्तर सत्ता बन जाते हैं। देश में हर बरस कहीं न कहीं ऐसा कोई धर्म-आध्यात्म से जुड़ा जुर्म सामने आता है। इसके लिए भारत के कानून में एक फेरबदल करने की जरूरत है। आज भी ऐसे बाबाओं और आश्रमों की दौलत किसी न किसी रजिस्टर्ड ट्रस्ट के नाम से रहती है। ट्रस्टों को लेकर राज्य सरकारों से लेकर केन्द्र सरकार के इंकम टैक्स तक के नियम बड़े कड़े रहते हैं, और राज्य सरकारें किसी भी ऐसे ट्रस्ट को भंग करके उस पर प्रशासक बिठा सकती हैं। एक ऐसे कानून को लाने की जरूरत है कि जब कभी किसी ट्रस्ट के मुखिया या किसी सम्प्रदाय के मुखिया को इस किस्म की सजा हो, और उसके आश्रम जुर्म का अड्डा बन जाएं, तो सरकार जनहित में ऐसे ट्रस्टों की सारी दौलत जब्त करके उसे जनता के काम में लेकर आए। क्योंकि यह दौलत जनता से ही आती है, फिर चाहे वह अंधविश्वास में डूबी हुई भक्त जनता ही क्यों न हो। 
देश में जब बड़े-बड़े मंदिरों की सम्पत्ति पर सरकार प्रशासक बिठाती है, और वहां पर सरकारी ट्रस्ट बनाकर उनकी व्यवस्था करती है, तो ऐसे तमाम आश्रमों की सम्पत्ति को जब्त करने का कानून रहना चाहिए। जब लोकतंत्र में कुछ निजी लोगों का साम्राज्य इतना बड़ा हो जाता है कि वह कानून को आंख दिखाने लगता है, सड़कों पर हिंसा और उत्पात करने लगता है, जब वह राजद्रोह से परहेज नहीं करता, तब उस पर काबू के लिए अलग कानून की जरूरत है। ये तमाम ट्रस्ट सरकार से टैक्स रियायत पाने वाले रहते हैं, इनके लिए जमीनें भी कई जगह सरकारें रियायत पर देती हैं या मुफ्त भी देती हैं। ये तमाम कानूनों को तोड़ते हुए अवैध निर्माण करते हैं। इन सब बातों को देखते हुए सरकार के पास इनके अधिग्रहण का ऐसा अधिकार रहना चाहिए कि ऐसे सारे पाखंडी और मुजरिम साधु-संत अपने साम्राज्य को लेकर अतिआत्मविश्वास से भरे हुए न रहें। 
हिन्दुस्तान में जनता की वैज्ञानिक समझ को सत्ता के लोगों ने सोच-समझकर कमजोर बनाए रखा है। ऐसे में जनता इन पाखंडियों को अपने पैसे भी देती है, और अपने घर की लड़कियां-महिलाएं भी दे देती हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और चूंकि सामाजिक जागरूकता बहुत धीमी रफ्तार से आती है, इसलिए कानून बनाकर ऐसे तमाम मुजरिमों पर काबू करना चाहिए। देश में कानून में ऐसे फेरबदल की जरूरत भी है कि पाखंडी धर्मगुरूओं से परे भी अगर कोई दौलतमंद कोई जुर्म करते हैं, तो उन्हें भी कैद देने के साथ-साथ उनकी दौलत का एक हिस्सा सरकारी खजाने में ले लेना चाहिए। लोगों को लगने वाले जुर्माने की रकम तय नहीं करनी चाहिए, लोगों की आर्थिक क्षमता के मुताबिक उस अनुपात में उनसे जुर्माना लिया जाना चाहिए। एक मामूली हत्यारे को जितनी कैद होती है, एक खरबपति मनु शर्मा को भी महज उतनी ही कैद अगर होगी, तो वह इंसाफ नहीं होगा। ऐसे लोगों से उनकी संपत्ति का एक हिस्सा भी छीन लेना चाहिए। इंसाफ अंधा नहीं होना चाहिए, उसे मुजरिमों की दौलत को देखते हुए उसके एक हिस्से जितना जुर्माना लगाना चाहिए, और अगर वह दौलत कोई धार्मिक या सामाजिक ट्रस्ट है, तो वह पूरा ही ट्रस्ट सरकार को ले लेना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

आसाराम की दौलत भी जब्त करके लड़कियों में जागरूकता बढ़ाने पर खर्च करना चाहिए...

संपादकीय
25 अप्रैल 2018


हजारों करोड़ की दौलत के मालिक, और करोड़ों अनुयायियों वाले आसाराम को अदालत ने एक नाबालिग छात्रा के साथ बलात्कार का मुजरिम करार दिया है, और इस फैसले का बड़ा इंतजार किया जा रहा था। यह छात्रा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में आसाराम के ही एक स्कूल के हॉस्टल में रहती थी, और इस मुकदमे की जानकारी के मुताबिक उसे देह शोषण की साजिश के तहत आसाराम के पास भेजा गया था। इस छात्रा का परिवार आसाराम का भक्त था। इसके बाद पिछले कुछ बरस से आसाराम जेल में ही बंद रहा क्योंकि जमानत की हर कोशिश हर अदालत से खारिज होती चली गई। इसकी वजह शायद यह थी कि आसाराम के खिलाफ इस मुकदमे में जितने गवाह थे उनकी एक-एक कर हत्या होती गई, या रहस्यमय मौत हो गई। नतीजा यह निकला कि जेल में रहते हुए आसाराम की मदद के लिए बाहर अगर कोई ऐसा कर रहे थे, तो जेल के बाहर रहने पर आसाराम और क्या नहीं करते, शायद इसीलिए आसाराम को जमानत नहीं मिल पाई। 
इक्कीसवीं सदी के भारत को हिन्दू धर्म के सबसे बड़े जनाधार वाले लोगों में से आसाराम एक है, और वह आसाराम बापू नाम से मशहूर रहा, सत्ता से जुड़े हुए लोग उसके पैरों तले ऐसे बिछे रहते थे कि उन पैरों पर खड़े बदन के ऊपर का दिमाग बददिमाग हो जाना जायज ही है। लेकिन मामला अकेले आसाराम का नहीं था, आसाराम के बेटे नारायण सांई पर भी इसी किस्म के आरोप लगे, और गिरफ्तारी हुई। बाप-बेटे दोनों के बलात्कारी होने के मामले सामने आए, बाप के खिलाफ साबित हो गया, लेकिन इनके भक्तों का हाल यह है कि अभी कुछ दिन पहले तक वे देश भर में आसाराम की तस्वीरें लेकर रैली निकालते आए हैं, आसाराम के समर्थन में पर्चे बांटते आए हैं, और इसे पाकिस्तानी, मुस्लिम, और विदेशी साजिश करार देते आए हैं। 
नाबालिग के साथ बलात्कार की सजा अभी आसाराम को सुनाई नहीं गई है, लेकिन वह शायद दस बरस से अधिक हो। वकीलों ने आसाराम की अधिक उम्र का हवाला देते हुए सजा कम करने की मांग की है, लेकिन दोषी करार देने के बाद किसी एक जैन धर्मगुरू की प्रतिक्रिया टीवी की खबरों पर आ रही थी कि बलात्कार के वक्त भी तो आसाराम की उम्र अधिक थी, उस वक्त तो अधिक उम्र की वजह से वह हरकत नहीं टली। इस जैन धर्मगुरू ने कहा कि यह सजा दूसरे साधु-संतों और ऐसे धर्मगुरूओं के लिए एक सबक भी रहेगी। अभी कुछ महीने पहले ही एक दूसरे स्वघोषित धर्मगुरू बाबा गुरमीत राम रहीम इंसान को भी बलात्कार में सजा हुई है, और हर कुछ हफ्तों में देश में कोई न कोई ऐसा भगवा या दूसरे धर्म का रंग ओढ़ा हुआ इंसान बलात्कार में गिरफ्तार होते दिखता ही है। 
धर्म और जुर्म, न सिर्फ उच्चारण में मिलते-जुलते हैं, बल्कि इनका मेल भी बहुत दिखता है। बहुत से लोगों के जुर्म के लिए धर्म एक किस्म की बुलेटप्रूफ जैकेट की तरह काम आता है कि कानून की गोलियां उन तक पहुंच नहीं पातीं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विख्यात चंबल के इलाके का एक धर्मगुरू ऐसा है जिसके आश्रम से डकैतों और मुजरिमों को भाड़े पर हथियार मिलने की जानकारी आम हैं, लेकिन इस बात के लिए कुख्यात होने पर भी पुलिस और जजों के बीच खासा लोकप्रिय यह गुरू सार्वजनिक रूप से विख्यात ही बना हुआ है। धर्म का कुल मिजाज देखें, तो वह लोकतंत्र, कानून, इंसानियत कहे जाने वाले शब्द, इन सबके ठीक खिलाफ रहता है। धार्मिक रंग ओढ़े हुए लोगों के भक्तों ने जितने ताकतवर लोग जितनी संख्या में रहते हैं, उतनी ही बददिमागी उनमें आ जाती है, और उतने ही जुर्म वे करने लगते हैं। लोगों को यह बात ठीक से याद नहीं कि एक भक्त परिवार की नाबालिग छात्रा से आसाराम ने यह बलात्कार 56 महीने पहले 15 अगस्त 2013 को किया था, आजादी की सालगिरह पर। और गिरफ्तारी से लेकर अब तक उसके जुर्म के कई गवाह या तो मार डाले गए, या वे लापता हो गए। 
लेकिन इस मौके पर देश के तमाम लोगों को सावधान भी हो जाना चाहिए कि वे किसी भी बाबा या संत-पाखंडी के पास अपने परिवार के लोगों, अपने बच्चों को भेजने के पहले सावधान हो जाएं कि वहां उन पर सेक्स-हमला भी हो सकता है, उनके दिमाग को किसी साजिश में फंसाया भी जा सकता है, और उन्हें एक किस्म के सम्मोहन में फांसकर स्थायी रूप से अपना भक्त बनाकर घर-परिवार से दूर भी किया जा सकता है। लोगों को धर्म और आध्यात्म से जुड़े पाखंडियों से दूर रहना चाहिए, और अपने परिवार को भी दूर रखना चाहिए। ईश्वर अगर कहीं है, तो वह ऐसा कारोबारी तो हो नहीं सकता कि वह अपने तक लोगों को लाने के लिए दलाल तैनात करे। आसाराम को मिली सजा से पहले ही उसकी गिरफ्तारी के वक्त से उसका बापू का स्वघोषित दर्जा खत्म हो गया था, और उसका बचाखुचा करिश्मा अब कमजोर पडऩा चाहिए। जिन लोगों को इस सजा के बाद भी आसाराम में भलाई दिखती है, उन्हें लेकर देश के कानून में यह इंतजाम रहना चाहिए कि उनके बच्चों की देखरेख सरकार भी करे, सरकार भी ऐसे गैरजिम्मेदार मां-बाप के बच्चों पर निगरानी रखे, उन्हें सुरक्षित रखने के लिए। यह फैसला बहुत ही अच्छा फैसला है, और इतने ताकतवर एक बलात्कारी-पाखंडी की सारी लोकप्रियता के बावजूद जांच एजेंसियों से लेकर अदालत तक पर कोई असर न पडऩा एक बड़ी बात है। जिन पैरों पर मुख्यमंत्रियों से लेकर प्रधानमंत्री तक गिरे पड़े दिखते आए हैं, उन पैरों में बेडिय़ां लगना कानून की कामयाबी है। आसाराम के इस जुर्म के बाद उसकी दौलत के जब्त होने की संभावना भी कानून में ढूंढनी चाहिए, और ऐसा न होने पर सरकार को एक नया कानून बनाकर भी ऐसा करना चाहिए। और हजारों करोड़ की उसकी दौलत का इस्तेमाल लड़कियों में जागरूकता बढ़ाने के लिए करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अप्रैल

वक्त की लहर और बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी

संपादकीय
24 अप्रैल 2018


इन दिनों इंटरनेट और क्रेडिट-डेबिट कार्ड रखने वाले लोगों को सौ-दो सौ रूपए के सामान भी खरीदने होते हैं, तो वे पहले ऑनलाईन परखते हैं। वहां से मिले रेट को जब लोकल बाजार से मिलाकर देखते हैं, तो बाजार महंगा लगता है। नतीजा यह है कि लोगों की ऑनलाईन खरीदी बढ़ते चली जा रही है। लेकिन अभी भारत के ऑनलाईन शॉपिंग वालों को लेकर हुए दो सर्वे बताते हैं कि लोगों को उनके मंगाए गए सामानों में से एक तिहाई सामान नकली मिले। यह अनुपात बड़ा चौंकाने वाला है क्योंकि बड़ी-बड़ी शॉपिंग वेबसाइटें मॉल के खरे होने के बड़े-बड़े दावे भी करती हैं, और सामान वापिस करने की सहूलियत भी देती हैं। 
आज भारत ही नहीं बाकी दुनिया में भी ऑनलाईन शॉपिंग लगातार इस तरह बढ़ गई है कि ब्रिटेन की आज की खबर बताती है कि वहां पर कार के ताले तोडऩे के औजार तक इंटरनेट पर बिक रहे हैं, और पुलिस इसे रोकने की कोशिश कर रही है जो कि हो नहीं पा रहा। इंटरनेट लोगों को बेचेहरा और बेनाम रहने की एक बड़ी सहूलियत देता है जिसके चलते लोग तरह-तरह की धोखाधड़ी भी करते हैं। अब सवाल यह है कि बाजार जाने की जहमत से बचने के लिए बहुत से लोग ऑनलाईन खरीदी कर रहे हैं क्योंकि शहरों में ट्रैफिक जाम रहता है, बाजारों में गाडिय़ां खड़ी करने की जगह नहीं रहती है, और बाजार के खुलने के घंटे सरकार के काबू में रहते हैं। दूसरी तरफ इंटरनेट पर खरीददारी चौबीसों घंटे की जा सकती है, और लोग बाथरूम में बैठे हुए भी फोन से दुनिया जहां की चीज खरीद डालते हैं। 
कुछ बरस पहले जब हिन्दुस्तानी शहरों में बड़े-बड़े मॉल खुले, उनमें सुपर बाजार खुले, तो मोहल्लों की किराना दुकानों से लेकर बाजार के ब्रांडेड सामानों के शोरूम तक का धंधा कमजोर हो गया। मॉल्स में लोगों को एक साथ कई कंपनियों के सामान देखने और खरीदने मिल जाते हैं, और शहरी बाजारों की धूल-धुएं भरी धक्का-मुक्की के मुकाबले मॉल्स आरामदेह भी रहते हैं। अब भारतीय शहरों में मॉल्स आने के दस-बीस बरस के भीतर ही ऑनलाईन बाजार ने मॉल्स को पीटना शुरू कर दिया है। एक वक्त लोग जिस फास्टफूड को खाने के लिए बाजार या मॉल्स जाते थे, अब लोग उसे घर बैठे बुलाने लगे हैं। इससे कारोबार और रोजगार, इन दोनों में बड़ी रफ्तार से एक फर्क आया है, कई किस्म के रोजगार घटे हैं, वहीं घर तक सामान पहुंचाने वाले लाखों-करोड़ों रोजगार हिन्दुस्तान जैसे देश में पैदा भी हुए हैं। कुरियर कंपनियों के नौजवान ऑनलाईन खरीदी के सामानों से लेकर लोकल फास्टफूड तक पहुंचाते हुए दिखते हैं, और जहां दुकानों का धंधा मंदा हुआ है, यह एक नई नौकरी, नए किस्म का रोजगार बढ़ गया है। 
इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि कारोबार हो या रोजगार, लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि नई टेक्नालॉजी, और बाजार के नए तरीके मिलकर जरा सी देर में किसी कारोबार को ठप्प कर सकते हैं, किसी रोजगार को बेकार कर सकते हैं। आने वाले वक्त में ड्रोन से घर-दफ्तर तक सामान पहुंचाना बढ़ते चले जाएगा, और वैसे वक्त आज के डिलीवरी ब्वॉय फिर कोई नया काम ढूंढने में लग जाएंगे। आज लोगों में इतने चौकन्नेपन की जरूरत है कि वे किसी काम के लिए, किसी कारोबार के लिए, अपने को तैयार करते हुए दस-बीस बरस का अंदाज लगाएं। टेक्नालॉजी बड़ी रफ्तार से रोजगार-कारोबार खत्म भी करती है, खड़े भी करती है। वक्त की लहर और उसके बहाव के साथ तैरना सीखना जरूरी है, आज, कल जिंदा रहने के लिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अप्रैल

बहादुरी चाहे न रही हो, ईमानदारी तो है ही...

संपादकीय
23 अप्रैल 2018


अमरीका में एक रेस्त्रां में घुसकर अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक गोरे नौजवान ने चार लोगों को मार डाला, और बहुत से लोगों को जख्मी कर दिया। यह नौजवान पहले से आत्मघाती मिजाज का था, और उसके परिवार ने एक बार पहले पुलिस को खबर भी की थी। पिछले बरस उसे राष्ट्रपति भवन के पास एक सुरक्षा घेरे को लांघने के जुर्म में गिरफ्तार भी किया गया था। लेकिन इसके बावजूद अमरीकी कानून के मुताबिक उसे कई तरह के हथियार रखने की छूट दी, और वह एक ऑटोमेटिक रायफल लेकर इतवार की सुबह रेस्त्रां में घुसा, और गोलीबारी की। अमरीका में हर नागरिक के पास कितने भी हथियार हो सकते हैं, और ये हथियार आत्मरक्षा के हथियार जैसे न होकर, हमला करने के हथियार भी रहते हैं, और हर कुछ दिनों में वहां गोलीबारी के बाद हथियारों पर काबू की मांग उठती है, लेकिन हथियार कंपनियां सरकार पर अपने दबाव के चलते ऐसा होने नहीं देती। अमरीका की कुख्यात गन-लॉबी बहुत सी पार्टियों, और बहुत से उम्मीदवारों को चुनाव में बहुत सा पैसा देती है, और उनके कारोबार पर रोक नहीं लग पाती। 
लेकिन आज इस गन कंट्रोल की मांग पर लिखने का मकसद नहीं है, बल्कि इस हादसे में हीरो की तरह सामने आए एक नौजवान पर लिखना है जिसने इस बंदूकबाज पर कब्जा किया, और बाकी बहुत सी जिंदगियों को बचाया। एक अश्वेत नौजवान उस वक्त जिस रेस्त्रां में ही था, और वह ठीक हमलावर की तरह 29 बरस का ही था। उसने मौका मिलते ही इस बंदूकबाज को दबोचा, उसका हथियार छीना, और उससे वहां मौजूद बाकी लोगों की जिंदगियां बचीं। लेकिन जब अमरीकी मीडिया और वहां मौजूद लोग जख्मी हो गए इस अश्वेत नौजवान को एक हीरो की तरह मानकर उसका शुक्रिया अदा कर रहे हैं, तो उसने कहा कि- सब लोग जो कह रहे हैं उसे मान लेना बहुत स्वार्थी बात होगी, मैंने जो कुछ किया वह अपने आपको बचाने की कोशिश थी, मेरे सामने एक मौका आया और मैंने हथियार छीनने की कार्रवाई की। 
अब एक नौजवान को खबरों में हीरो बनने का यह मौका बिना मांगे मिला, पुलिस से लेकर प्रेस, और पब्लिक तक लोगों ने उसे हीरो माना, और वह अपने मन की बात को उजागर करके इस तारीफ के हक को नकार रहा है। यह विनम्रता आसान नहीं है। आज दुनिया में लोग किसी तरह का सम्मान या पुरस्कार पाने के लिए सौ किस्म के झूठ गढ़ते हैं, इतिहास को बदल डालते हैं, और सम्मान को एक किस्म से खरीद लेते हैं। हमने अपने आसपास ही ऐसे पुलिस वाले देखे हैं जो कि बहादुरी के किस्से गढऩे के लिए झूठी मुठभेड़ को असली बताकर प्रदेश की राजधानी से लेकर देश की राजधानी तक जलसों में मैडल पाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी रहते हैं जो अपने गुजर चुके मां-बाप को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित करने के लिए कई तरह के किस्से गढ़ लेते हैं, और गवाह भी जुटा लेते हैं। ऐसे में अगर अमरीका में किसी अश्वेत नौजवान के सामने बहादुर कहे जाने का मौका खुद चलकर आया, और उसे वह बहादुरी नहीं, महज आत्मरक्षा कह रहा है, तो यह ईमानदारी और विनम्रता सोचने-समझने लायक बातें हैं। 
दुनिया में अधिकतर लोग ऐसे मौकों पर चुप रहकर तारीफ को ले लेते, और उनके अपने दिल-दिमाग पर यह बोझ भी नहीं रहता कि उन्होंने कुछ झूठ कहा, कुछ गलत कहकर यह सम्मान हासिल किया। लेकिन अपने खुद के तात्कालिक हितों के खिलाफ जाकर सिर्फ खुद को मालूम सच को इस तरह सामने रखने के लिए इंसान में एक महानता की जरूरत होती है। चाहे इस नौजवान ने महज अपने आपको बचाने के लिए हमलावर का हथियार छीना हो, लेकिन उसने इस तारीफ को जिस विनम्रता से नकारा है, उस विनम्रता के लिए तो वह सम्मान का अधिकारी है ही। यह बात बहुत छोटी सी है, लेकिन लोगों को यह सोचना चाहिए कि ऐसे कितने मौके उनके सामने आ सकते हैं, जब वे ऐसी ही सच्चाई और ईमानदारी से घर पहुंची शोहरत और तारीफ को विनम्रता से लौटा सकें कि वे उसके हकदार नहीं हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 अप्रैल

भूली-बिसरी यादों वाला स्कूल

23 अप्रैल 2018

मेरे शहर में कुछ दिन पहले खबर आई कि सड़क के किनारे लगने वाले एक इतवारी बाजार में लगने वाली भीड़ को देखते हुए अब उसे सड़क से हटाकर उस इलाके के एक स्कूली मैदान पर लगाया जाएगा। यह स्कूल म्युनिसिपल का स्कूल है जिसमें अमूमन आसपास के इलाकों के गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चे ही पढ़ते हैं। इस स्कूल का मैदान पहले भी छोटा था, बाद में जिस तरह म्युनिसिपल ने अपने खर्च निकालने के लिए हर स्कूल के सामने सड़क किनारे दुकानों की चाल बनाई, इस स्कूल के सामने भी दुकानें बन गईं। बाद में इसके बगल से बहने वाली एक नहर की जगह पर एक सड़क बनाई गई, तो स्कूल की दीवार और पीछे चली गई क्योंकि सड़क को चौड़ा होना था। कुछ इमारतें स्कूल के भीतर की जगह पर और बनानी पड़ीं क्योंकि कमरे कम पड़ रहे थे, और बच्चे बढ़ रहे थे। नतीजा यह निकला कि एक छोटा सा मैदान बच गया था, और अब वहां इतवार को बाजार भरेगा।
इस स्कूल की बात इसलिए भी ध्यान खींच गई क्योंकि मैं ग्यारह बरस इसी स्कूल में पढ़ा, और मेरे पढ़ते-पढ़ते इसका नाम शहीद स्मारक स्कूल रखा गया। वे शहीद शायद 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग के शहीद थे। उस वक्त भी इस स्कूल के मैदान पर खेलने के लिए आसपास चारों तरफ बसी हुई घनी बस्तियों के बच्चे पहुंचते थे क्योंकि पूरे इलाके में मैदान वही एक था। था तो स्कूल के बच्चों के लिए, लेकिन स्कूल के बाहर के बच्चे भी छुट्टियों के दिन में भी वहां आकर खेलते थे। पैंतालीस से अधिक बरस गुजर चुके हैं, और इस तकरीबन आधी सदी में आसपास की आबादी कम से कम दो गुना अधिक घनी तो हो ही गई होगी, और ऐसे में उसके बीच की अकेली स्कूल के अकेले मैदान को इतवार के दिन बाजार के लिए दिया जा रहा है, खेलने की गुंजाइश खत्म, और हो सकता है कि इतवार के पहले और बाद भी वहां पर कचरा और गंदगी छोड़कर जाए यह बाजार।
कुछ इसी किस्म का हाल दूसरी सरकारी स्कूलों के साथ भी हुआ है। रायपुर की एक सबसे पुरानी स्कूल, सप्रे स्कूल, वहां का मैदान सड़कों को चौड़ा करने के लिए दोनों तरफ से संकरा किया गया, और अब उसका सड़क-इस्तेमाल न होकर महज महंगी कारों के लिए पार्किंग का इस्तेमाल हो रहा है, बीच का मैदान बेशक्ल होकर किसी भी टूर्नामेंट के लायक नहीं रह गया। एक वक्त था जब इमरजेंसी के खिलाफ विजय लक्ष्मी पंडित की आमसभा इसी मैदान पर हुई थी, और देश के तमाम बड़े नेताओं ने कभी न कभी इस मैदान पर लोगों से रूबरू बात की थी, यहां लगातार खेल और टूर्नामेंट होते थे, लेकिन सड़क चौड़ी करने के नाम पर इस मैदान को खत्म कर दिया गया। यह लिखते हुए याद पड़ता है कि एक वक्त शहर के दूसरे सिरे पर रहने वाले मेरे पिता घंटे भर चलकर इसी स्कूल तक पढऩे आते थे, और लौटते हुए कपड़े की एक पुरानी बड़ी दुकान में कुछ घंटे नौकरी करते हुए लौटते थे। अब उस स्कूल का मैदान भी पहले की तरह के किसी खेल या टूर्नामेंट के लायक रह नहीं गया।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के इसी शहर में सरकार की एक सबसे पुरानी स्कूल के मैदान को सड़क चौड़ी करने के नाम पर काटकर छोटा किया गया। इसी गवर्नमेंट स्कूल में भारत के एक भूतपूर्व उपराष्ट्रपति जस्टिस हिदायतुल्लाह भी पढ़े थे, लेकिन वैसी यादें भी कि स्कूल को सरकारी नजरों से बचा नहीं पाई। शहर के तकरीबन हर सरकारी स्कूल और कॉलेज के मैदानों का यही हाल हुआ है, और लंबाई-चौड़ाई में संकरा करने के बाद अब बची हुई जगह को साल में अधिक से अधिक दिन किसी न किसी बाजारू बिक्री-प्रदर्शनी के लिए भाड़े पर दे दिया जाता है जो कि पूरे मैदान में स्थायी गड्ढे छोड़कर जाती हैं।
हिन्दुस्तान के कुछ शहरों में स्थानीय इंजीनियरों, आर्किटेक्टों, और टाऊन प्लानरों के ऐसे एक्टिविस्ट-समूह रहे हैं जिन्होंने शहर के भीतर सरकार या म्युनिसिपल के ऐसे फैसलों का विशेषज्ञता के तर्कों के आधार पर जमकर विरोध किया, अदालती दखल भी दी, और इन पर अमल रोका। लेकिन हिन्दुस्तान के जिस इलाके, छत्तीसगढ़, में मैं बसा हुआ हूं, वहां पर इस तरह की कोई जनजागरूकता नहीं है, और न ही राज्य सरकार से लेकर म्युनिसिपल तक, किसी में भी इतनी जवाबदेही है कि ऐसे फैसलों के पहले जनता से राय मांगी जाए, जानकार लोगों से सलाह ली जाए। निर्वाचित नेताओं, उनके चापलूस अफसरों, और नीतियां-प्रोजेक्ट बनाने वाले ठेकेदारों ने मिलकर स्थानीय शहरी हितों के खिलाफ एक ऐसा बरमूडा ट्रैंगल बना दिया है जिसमें सारे सार्वजनिक हित डूब जाते हैं। इन संस्थाओं पर काबिज नेताओं और अफसरों को हर बड़े प्रोजेक्ट के पीछे इतनी कमाई दिखती है कि इंच-इंच खुली जगह पर कैसे कांक्रीट की कई मंजिलें खड़ी की जाएं, इसी फिक्र में इनके पांच बरस निकल जाते हैं या इनकी पोस्टिंग निकल जाती है।
गरीब बच्चों के एक स्कूल के मैदान पर छुट्टी के दिन तो आसपास के लोग भी खेल लेते हैं, लेकिन उस पर बाजार लगाकर म्युनिसिपल उनका बुनियादी हक छीन रही है। अगर किसी के पास अदालत जाने की ताकत हो, तो ऐसा फैसला पल भर में खारिज हो जाएगा। लेकिन ऐसे फैसले तो खेल के हर मैदान को लेकर रोज लिए जा रहे हैं, रोज वहां पर किसी धर्म के लिए, किसी यज्ञ के लिए, किसी बाजार की प्रदर्शनी के लिए मैदान किराए पर दिया जा रहा है, और खेल ताक पर धर दिया जाता है। मजे की बात यह है कि राज्य सरकार के मुख्यमंत्री, बहुत से मंत्री, अफसर, मेयर, बार-बार यह घोषणा करते हैं कि खेल के मैदान का कोई भी गैरखेल इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन रात-दिन होता यही है।
सरकार और म्युनिसिपल की दिलचस्पी बड़े-बड़े करोड़ों के स्टेडियम बनाने में रहती है जिसमें खूब कांक्रीट लगता है, खूब बड़ा बिल बनता है, खूब कमाई होती है। लेकिन सवाल यह है कि जब छोटे-छोटे बच्चों के खेलने के लिए मैदान ही नहीं रहेंगे, जब छोटे-छोटे टूर्नामेंट के लायक मैदान नहीं बचेंगे, तो बड़े-बड़े स्टेडियम के बड़े-बड़े मैच में तो बच्चे महज दर्शक होकर ही जा सकेंगे, खेल तो नहीं सकेंगे। राज्य सरकार अगर चाहे तो पूरे प्रदेश का एक सोशल ऑडिट सरकार से परे करवा सकती है कि राज्य बनने के बाद स्कूली मैदानों का आकार घटकर कितना रह गया है।  (Daily Chhattisgarh)

सीजेआई हो या कोई और, लोकतंत्र में कोई भी कैसे हो सकते हैं सवालों से परे?

संपादकीय
22 अप्रैल 2018


देश में संसद ठप्प पड़ी है, सरकार पर संसद से परे और तो कोई काबू रहता नहीं है सिवाय न्यायपालिका के। लेकिन इन दिनों न्यायपालिका को लेकर जिस तरह से जनता का विश्वास हिल गया है, वह लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक नौबत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आधा दर्जन राजनीतिक दलों के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी एक महाभियोग लेकर आ रही है, उसने राज्यसभा के सभापति को इसका प्रस्ताव दिया है, और इसे लेकर सत्तारूढ़ पार्टी के साथ खासी खींचतान के आसार दिख रहे हैं। लेकिन इस बीच एक दूसरी बात यह हुई है कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों ने मुख्य न्यायाधीश के तौर-तरीकों और विवेक के उनके फैसलों पर सवाल उठाते हुए उन्हें अदालत की साख कम करने वाला ठहराया। और इसी तरह की सोच रखने वाले कुछ वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश के अधिकारों को चुनौती देते हुए एक याचिका लगाई जो कि खारिज कर दी गई। इसी दौर में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह कहा कि मुख्य न्यायाधीश अपने आपमें एक संस्था होते हैं, और उस पर शक या सवाल नहीं उठाए जा सकते।
इसी न उठाए जा सकने को लेकर आज हम यहां पर लिखना चाहते हैं कि लोकतंत्र में किसी को भी सार्वजनिक ओहदे पर रहते हुए जवाबदेही से परे क्यों होना चाहिए? राष्ट्रपति हो, या प्रधानमंत्री, या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज, जहां तक उनके कामकाज को लेकर सवाल पूछे जाते हैं, उन पर संदेह खड़ा होता है, तो उन्हें पारदर्शिता के साथ तथ्यों को सामने रखकर एक जवाब देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपने जजों की सम्पत्ति की जानकारी सूचना के अधिकार में देने से मना कर चुका है, और सरकारी कर्मचारियों से सरकार को जितने किस्म की जानकारियां मिलती है, उस तरह की जानकारी देने से भी जज मना करते रहे हैं। जजों ने अपनी एक अलग दुनिया बना रखी है जिसमें अपने लिए सम्मान जुटाते हुए वे बहुत किस्म के पाखंडी काम करते हैं। पिछले दिनों हमने इसी जगह लिखा भी था कि जब सरकारी विज्ञापनों से मुख्यमंत्री तक की तस्वीरों को बाहर कर दिया गया था, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर विज्ञापनों में देने की छूट दी थी। 
अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अखबारों के इश्तहार में अपनी तस्वीर क्यों देनी चाहिए? जब जनता के पैसों की बर्बादी मानते हुए विज्ञापनों में मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों तक की तस्वीरें रोक दी थीं, तब भी मुख्य न्यायाधीश की तस्वीर को छूट दी गई थी। जजों के बाकी अंदाज अगर देखें, तो सफर के दौरान, सार्वजनिक जगहों पर, दूसरे शहरों में ठहरने पर उनके इंतजाम करने वाले लोग एक किस्म से दहशत में आए हुए दिखते हैं, और सड़कों को भी बड़े जजों के लिए आम जनता के ट्रैफिक से खाली कराया जाता है। 
हम मुख्य न्यायाधीश को लेकर उठे बाकी सवालों के न्यायोचित होने या न होने पर कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन हम इस बात के खिलाफ हैं कि मुख्य न्यायाधीश को एक संस्था मान लिया जाए, और उस संस्था को सवालों से परे कर दिया जाए। लोकतंत्र में जिस किसी को सवालों से परे किया जाता है, वहां पर भ्रष्टाचार पनपने का खतरा खड़ा हो जाता है। जो अदालत देश में तमाम लोगों को जानकारी देने के लिए बेबस कर सकती है, वह अदालत अपने खुद के मामलों में लुकाछिपी करते अच्छी नहीं लगती। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को उन पर लग रहे तमाम आरोपों को देखते हुए अपने आपको कुछ किस्म के मामलों से अलग कर लेना चाहिए। ऐसा तो देश में कई बार होता है कि किसी एक जज के फैसले कुछ पार्टियों को पसंद न आएं, लेकिन हर वक्त हर जज को हटाने की बात नहीं होती है। आज के मुख्य न्यायाधीश को लेकर पहले से भी कुछ अप्रिय विवाद चलते आए हैं, और अब तो उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव आया है। ऐसे में उनको सावधानी से अपने आपको विवादास्पद मामलों से अलग रखना चाहिए जिनको लेकर उन पर और अधिक तोहमतें लग सकती हैं। (Daily Chhattisgarh)