नफरत की वजहें कुछ और, हिंसा का उफान कहीं और...

संपादकीय
24 मार्च 2019



अभी तीन दिन पहले देश के बलात्कार-राजधानी सरीखे मध्यप्रदेश से एक ऐसी खबर आई कि जिसके बाद इंसानियत, रिश्ते-नातों, इन सभी से भरोसा पूरी तरह उठ ही जाता है। ऐसा भी नहीं कि ऐसी कोई वारदात पहली बार हुई हो, लेकिन इसकी भयावहता अनोखी है। एक नाबालिग बच्ची के साथ उसके तीन भाईयों और एक चाचा ने बलात्कार किया। जब उसने इसकी शिकायत पुलिस में करने की बात कही, तो उसकी चाची ने हंसिए से उसका सिर काटकर अलग कर दिया। इन दो वाक्यों के बाद अधिक खुलासे की जरूरत बचती नहीं है। जम्मू के कठिया में तो एक खानाबदोश बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले लोगों में पुलिस भी थी, और एक बाप-बेटे भी थे। लेकिन इस मामले में तो तीन भाई, एक चाचा, और एक चाची! 
इधर छत्तीसगढ़ में भी लगातार कोई न कोई ऐसी खबर आ रही है जिसमें परिवार के भीतर ही भाई बहन पर गोली चला रहा है, पत्नी पति की हत्या कर रही है, पति पत्नी को मार रहा है, और बाप बेटे की हत्या कर रहा है, बेटा बाप को मार डाल रहा है। इन सबको देखकर यह लगता है कि पुराने जमाने से जो कहावत चली आ रही है कि अपना खून अपना ही होता है, या फिर हिन्दी फिल्मों में जो एक घिसापिटा डायलॉग चले आ रहा है कि उसकी रगों में भी वही खून दौड़ता है जो कि मेरी रगों में दौड़ता है, ये तमाम बातें लतीफा लगने लगती हैं। फिर जहां तक इंसानियत की बात है, तो हम बार-बार यह लिखते हैं कि लोग अपने भीतर की अच्छी खूबियों को तो इंसानियत कह लेते हैं, और उन्हें अपना मान लेते हैं। लेकिन अपने भीतर की हिंसक-खामियों को वे हैवानियत कहकर एक अवांछित बच्चे की तरह किसी और का बताने लगते हैं। हकीकत यह है कि यह तथाकथित इंसानियत, और यह गाली की तरह इस्तेमाल होने वाली हैवानियत, दोनों ही हर इंसान के भीतर मौजूद हैं, मौलिक हैं, और इंसानों की अपनी हैं। अब लोगों की भलमनसाहत यही होती है कि वे अपने भीतर के हैवान को काबू में रखकर, दबाकर, उसे खत्म करके अपने भीतर के इंसान को ताकतवर बनाते चलते हैं, और समाज को बेहतर बनाते हैं। दूसरी तरफ बुरे लोगों के भीतर हैवान वाला हिस्सा सिर चढ़कर बोलता है, और उनके भीतर के भले इंसान वाले हिस्से को कुचलकर रख देता है। 
परिवार के भीतर की इस तरह की जानलेवा या आत्मघाती हिंसा एक मानसिक रूप से बीमार समाज का संकेत है। जिस तरह बीमारी के कुछ लक्षण होते हैं, कि बदन तपता है, या खांसी आती है, या चक्कर आता है, ठीक उसी तरह जान ले लेने, या जान दे देने, किसी नाबालिग या मासूम बच्ची से बलात्कार कर लेने की हिंसा जब एक वारदात की शक्ल में सामने आती है, तो उसका यह मतलब भी रहता है कि वह समाज के बदन के भीतर कई ऐसी छोटी-छोटी हिंसक और हैवानी वारदातों की शक्ल में जारी रहती है, जिंदा रहती है, जो कि खबरों में नहीं आ पातीं। ऐसी वारदातें परिवार के भीतर ही दबा दी जाती हैं, बर्दाश्त कर ली जाती हैं, या माफ कर दी जाती हैं। लेकिन चर्चा में आने वाली हर वारदात के पीछे हजार-हजार ऐसी और छोटी-छोटी वारदातों की बुनियाद रहती है जिन पर बड़ी वारदात की इमारत खड़ी होती है, और पुलिस या अदालत तक पहुंचने पर वह दिखती है। कुल मिलाकर आज की बात का मकसद यह है कि ऐसी हिंसा से भरा हुआ समाज सिर्फ एक परिवार के हिंसक होने का लक्षण नहीं है, वह समाज के बड़े हिस्से के बीमार या हिंसक होने, या दोनों ही होने का सुबूत है। ऐसे जुर्म का पुलिस जांच और अदालत के रास्ते जेल में इलाज इसलिए काफी नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा तो महज उतने ही लोगों के साथ हो सकता है जितने लोग पकड़ में आते हैं। आज जब दुनिया भर में यह चर्चा चल रही है कि कौन सा देश कितना खुश रहता है, तो यह समझने की जरूरत है कि पारिवारिक और सामाजिक सुरक्षा पाकर और हिंसा से बचे रहकर लोग कितने खुश रह सकते हैं। मानसिक रूप से बीमार या हिंसक को मानसिक परामर्श या मनोचिकित्सा की सलाह दी जाती है। लेकिन हिन्दुस्तान की तरह जो मानसिक रूप से बीमार और हिंसक समाज है, उसके लिए कोई डॉक्टरी नुस्खा नहीं है। दिक्कत यह है कि साम्प्रदायिक या राजनीतिक कारणों से, चुनावी या कारोबारी वजहों से जिस तरह नफरत और हिंसा का खौलता लावा पूरे देश में फैलाया जा रहा है, उससे महज चुनिंदा किस्म की हिंसा नहीं बढ़ती, उससे कई किस्म की और हर किस्म की हिंसा बढ़ती है। आज इस देश में अगर परिवार के भीतर भी एक-दूसरे से रिश्तों में देह के भीतर का हैवान फैसले ले रहा है, हिंसा कर रहा है, तो इस हैवान को बढ़ावा देने में देश की राजनीतिक नफरत भी जिम्मेदार है, और साम्प्रदायिक नफरत भी। इन दो बातों का रिश्ता जोडऩा कुछ लोगों को एक अटपटी बात लगेगी, लेकिन समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के जानकार इन बातों को जानेंगे कि धर्मान्धता ने हाल के बरसों में कुछ मुस्लिम देशों में ऐसी-ऐसी हिंसा करवाई है जो कि उन्हीं लोगों के धर्म में सबसे बुरी सजा के लायक करार दी गई है। जब किसी देश या समाज की सोच में नफरत और हिंसा की बोतलों को सुई से दिल-दिमाग की रगों में डाला जाता है, तो फिर वैसे दिल-दिमाग अपने काबू के बदन से कई किस्म की हिंसा करवाते हैं। 

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दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 24 मार्च

कांग्रेस के बड़बोलेपन से नुकसान सिवा कुछ नहीं

संपादकीय
23 मार्च 2019



अब जब देश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, तारीखें आ चुकी हैं, और उम्मीदवार भी तकरीबन आते जा रहे हैं, तब कांग्रेस के लोग अनर्गल बातें कहकर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का सिलसिला चलाए हुए हैं। इस बार मानो दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, और शशि थरूर कहीं आगे न बढ़ जाएं इसलिए सैम पित्रोदा ने पुलवामा के आतंकी हमले को लेकर एक ऐसी गंभीर तर्कसंगत और बेमौके की बात कह दी है कि जिससे पार्टी को नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होगा। भारत पर होने वाले आतंकी हमलों की सजा पूरे पाकिस्तान को नहीं दी जानी चाहिए, यह एक तर्कसंगत और न्यायसंगत बात हो सकती है। लेकिन चुनाव के मौके पर बिना किसी बहस के खुद होकर ऐसी चर्चा छेडऩा और ऐसी बात कहना जिसका विरोधी दल तुरंत ही एक जायज या नाजायज फायदा उठा लें, कहां की समझदारी है? 
कांग्रेस पार्टी के यह बेहतर होगा कि वह पाकिस्तान के साथ रिश्तों को लेकर अपने अधिकृत प्रवक्ताओं को ही बोलने की इजाजत देती, और बाकी नेताओं से कहती कि वे अपने दायरे की बात करें। ऐसा करते हुए कांगे्रस अपने प्रवक्ताओं को एक छोटा प्रशिक्षण दिला सकती थी कि भारत की जनभावनाओं को नुकसान पहुंचाए बिना किस तरह सच बोला जा सकता है। यह बात किसी बेईमानी की नहीं है, गांधी भी यही कह गए थे कि सच कहो, लेकिन कड़वा मत कहो। अब भारत में इस चुनावी माहौल में जब भाजपा ने पूरी हवा को एक ऐसी आक्रामक राष्ट्रवाद में केसरी कर रखा है कि अक्षय कुमार की फिल्म भी इस तौले गए मौके पर आकर भी इस माहौल से कम ही केसरी दिख रही है, तब बाकी पार्टियों को राष्ट्रवाद के इस खतरे को समझना चाहिए जो कि चुनाव के रूख को पूरी तरह मोड़ सकता है। आज इस देश में सबसे अफसोस की बात यह है कि पांच बरस की मोदी सरकार अपने पिछले चुनावी घोषणापत्र से लेकर पिछले बरसों में नोटबंदी और जीएसटी सरीखे बहुत से फैसलों का चुनाव में जिक्र भी करने की हालत में नहीं है। और ऐसे में अगर नए ढूंढे गए सर्जिकल स्ट्राइक जैसे नारों में कांग्रेस और बाकी भाजपा-विरोधी उलझकर रह जाते हैं, बिन मौके की अटपटी बात कहते हैं, तो इससे मोदी को नफा छोड़ और कुछ नहीं है।
मनमोहन सिंह सरीखे सबसे कम बोलने वाले, और सबसे समझदारी से बोलने वाले प्रधानमंत्री ने भी एक बार बिना जरूरत यह कहा था कि देश के साधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है। किसी प्रधानमंत्री को ऐसा कहने की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि सरकार के हाथ में किसी समुदाय के कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाना रहता ही है। फिर भी वे ऐसा कह बैठे, और इसका कांग्रेस के खिलाफ भरपूर इस्तेमाल भी हुआ। दूसरी तरफ भाजपा और उससे जुड़े हुए लोग भी ऐसी भरपूर बातें करते हैं, लेकिन उनके पास उसकी भरपाई के लिए अपने दूसरी भावनात्मक और राष्ट्रवादी नारे हैं। कांग्रेस अगर आने वाले दिनों में बयानबाजी में ऐसी ही लापरवाह रहेगी, तो वह उसका खासा दाम चुकाएगी। कम बोलना कोई कमजोरी नहीं रहती, और सैम पित्रोदा जैसे लोग जो कि तकरीबन तमाम वक्त देश के बाहर ही रहे हैं, उन्हें कम ही बोलना चाहिए, और बाकी लोगों को भी। सैम की कही बात पर हाथों-हाथ भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने प्रेस कांफे्रंस भी ले ली है, और कांग्रेस के पास जनभावना के अनुकूल इसका कोई जवाब मुश्किल होगा।

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दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 23 मार्च

बात की बात, 19 मार्च

दीवारों पर लिक्खा है, 19 मार्च

छत्तीसगढ़ भाजपा का यह ब्लड ट्रांसफ्यूजन या किडनी ट्रांसप्लांट?

संपादकीय
20 मार्च 2019



आम चुनाव के पहले छत्तीसगढ़ के लिए जो सबसे बड़ी खबर बन सकती थी, वह शायद बन चुकी है, अगर भाजपा कल शाम की अपनी इस मुनादी पर कायम रहे कि पिछले चुनाव में उसके जीते हुए दस सांसदों में से किसी को दुबारा उम्मीदवार नहीं बनाया जा रहा है। जिस ग्यारहवीं सीट पर कांग्रेस जीती थी, वहां के हारे हुए भाजपा उम्मीदवार की बात सोचना तो वैसे भी फिजूल होगा क्योंकि पार्टी ने तमाम ग्यारह सीटों पर नए चेहरों को लाने की घोषणा कर दी है। छत्तीसगढ़ के इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा चुनावी फैसला है कि तकरीबन तमाम सीटों पर जीती हुई पार्टी ने तमाम नए चेहरों का फैसला लिया है। विधानसभा चुनावों में भाजपा की शर्मनाक हार का हाल यह था कि वह ग्यारह लोकसभा सीटों के तहत आने वाली विधानसभा सीटों के आंकड़ों के मुताबिक एक भी लोकसभा सीट पर पहली पार्टी नहीं थी। जोगी-बसपा गठबंधन की मेहरबानी से वह महज एक लोकसभा सीट, बिलासपुर, पर कांग्रेस से आगे थी। विधानसभा की नब्बे सीटों में से पन्द्रह बरस की सत्तारूढ़ भाजपा कुल पन्द्रह सीटों पर सिमट गई थी, पिछली बार की अपनी सीटों से एक तिहाई से भी कम सीटों पर। और आंकड़े बताते हैं कि अगर आगी-बागी या बसपा-जोगी का सहारा न रहता, तो भाजपा कुल तीन सीटों पर जीती होती। 
भाजपा हाईकमान का यह फैसला सही या गलत तो चुनावी नतीजों के बाद ही साबित हो पाएगा, फिलहाल यह एक साहसी फैसला है जो कि छत्तीसगढ़ में भाजपा की खराब किडनी को देखते हुए उसके ब्लड-ट्रांसफ्यूजन जैसा है, या क्या ऐसा कहना बेहतर नहीं होगा कि पार्टी यहां पर किडनी ट्रांसप्लांट ही कर रही है? पार्टी के बार बदन का पूरा खून बदल दे रही है, और इससे वह एक नई जिंदगी की उम्मीद कर रही है। आज जब चुनाव के नामांकन शुरू हो चुके हैं, तो यह बात मायने नहीं रखती कि मौजूदा सांसद कैसे थे, उन्होंने काम ठीक से किया या नहीं। अब मायने सिर्फ यही बात रखती है कि किसकी जीत की कितनी संभावना है। और जाहिर है कि भाजपा अपने सांसदों की जीत को लेकर जरा भी भरोसे में नहीं थी, इसलिए पूरे के पूरे बल्ब एक साथ बदल डालूंगा वाले इश्तहार की तरह भाजपा ने छत्तीसगढ़ में तमाम चेहरों को बदल डालने का फैसला सुनाया है। जहां तक पिछले पांच बरस में संसद में छत्तीसगढ़ के लोकसभा सदस्यों की कही हुई बात का सवाल है, तो जिस किसी को एक भी सांसद की कही एक भी बात याद हो, उसे एक बड़ा ईनाम दिया जाना चाहिए। ये तमाम सांसद राज्य और केन्द्र की भाजपा सरकारों पर परजीवियों की तरह बैठे हुए पेट भरते रहे, और पार्टी को ऐसी बदहाली में लाकर छोड़ दिया है। राज्य की भाजपा सरकार, और प्रदेश का भाजपा संगठन तो इस बदहाली के लिए जिम्मेदार थे ही, संसद में मौनव्रत रखे हुए छत्तीसगढ़ी सांसद भी इस हाल के लिए जिम्मेदार थे जिनका सदन में कहा हुआ एक-एक शब्द शायद देश को दस-दस हजार रूपए का पड़ा होगा। 
चूंकि भाजपा इस फैसले के साथ एक बड़ा हौसला दिखा रही है, इसलिए उसे यह भी सोचना चाहिए कि वह वंशवाद से किस तरह छुटकारा पा सकती है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने-आपको परिवारमुक्त नेता बताते हैं, दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का परिवार भी चुनाव में राजनीति से परे है, ऐसे में भाजपा को छत्तीसगढ़ में अपने मटियामेट होने की वजहों में वंशवादी राजनीति के योगदान को भी आंकना चाहिए, और इसे खत्म करना चाहिए। अगर भाजपा में मोदी-शाह वंशवाद को घटा न सके, तो फिर उनके मंत्री किस मुंह से पप्पू की पप्पी जैसी घटिया जुबान बोलकर बच सकते हैं? भारतीय राजनीति में जिस कुनबापरस्ती को लेकर जनसंघ के जमाने से भाजपा कांग्रेस को कोसती आ रही है, वह कुनबापरस्ती छत्तीसगढ़ में भाजपा में भी सिर चढ़कर बोल रही है, और इस मौके पर भाजपा उसको भी किनारे कर सकती है। आज ही सुबह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने ब्लॉग पर लिखा है कि वंशवाद की राजनीति से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को नुकसान हुआ है। यह मौका है जब वे नुकसान घटाने की जिम्मेदारी में अपना हिस्सा बंटा सकते हैं, और छत्तीसगढ़ सहित बाकी देश में टिकटें बांटते हुए इसकी शुरुआत कर सकते हैं। आज जब यह लिखा जा रहा है, तभी खबर आ रही है कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा सभी दस भाजपा सांसद आज शाम प्रदेश के सबसे वरिष्ठ भाजपा सांसद रमेश बैस के घर पर इकट्ठा हो रहे हैं, और यह मजमा ब्लड ट्रांसफ्यूजन या किडनी ट्रांसप्लांट के काम में कैसे अड़ंगा डाल सकता है, यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा। फिलहाल पहली नजर में भाजपा का यह फैसला प्रदेश के संगठन को हिला गया है, ठीक उसी तरह जिस तरह छत्तीसगढ़ में कल अपने गठबंधन के भागीदार अजीत जोगी से चर्चा बिना, उनको बताए बिना, मायावती ने अपने उम्मीदवार घोषित करके हिला दिया था। चुनाव वैसे भी नाटकीय उठापटक का दौर होता है, और छत्तीसगढ़ में ये नाटक पारसी थियेटर के अंदाज में पांव पटक-पटककर, जोर-जोर से बोलकर चल रहे हैं। बिना मनोरंजन टैक्स के इन नाटकों का मजा लें।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM