फौजी अफसरों के बयान अब साम्प्रदायिक और राजनीतिक भी

संपादकीय
22 फरवरी 2018


भारतीय थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत एक बार फिर अपने एक बयान को लेकर सुर्खियों और विवाद में हैं। उन्होंने असम के एक राजनीतिक संगठन एआईयूडीएफ का नाम लेकर कहा कि यह संगठन तेजी से आगे बढ़ रहा है, और जनसंघ के दिनों से लेकर आज तक भाजपा जिस रफ्तार से आगे बढ़ी है, उसके मुकाबले ऑल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम का यह संगठन आगे बढ़ा है। असम में यह संगठन मुस्लिमों की आवाज उठाता है। और जनरल रावत ने यह पूरी चर्चा इस संदर्भ में की कि पड़ोसी देशों से जिस तरह कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए आतंकी भेजे जाते हैं, उसी तरह उत्तर भारत में अशांति फैलाने के लिए अवैध आबादी को भारत में भेजा जाता है। उनके इस बयान के बाद भारत की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि सेना प्रमुख को राजनीतिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए, उनका काम किसी राजनीतिक पार्टी पर कमेंट करना नहीं है, लोकतंत्र और संविधान में सेना हमेशा जनता द्वारा निर्वाचित सरकार के तहत काम करती है। 
यह पहला मौका नहीं है जब एक बड़े फौजी अफसर ने राजनीतिक या विदेश नीति से जुड़े बयान दिए हैं। बल्कि कुछ दिनों पहले कश्मीर में आतंकी हमलावरों के हमले से शहीद होने वाले हिन्दुस्तानी सैनिकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक थे, और जब ओवैसी ने उनकी शहादत की चर्चा करते हुए कहा था कि भारत में मुस्लिमों के देशप्रेम को शक की नजर से देखा जाता है, और वे इस तरह देश के लिए शहादत देते हैं। इस पर थलसेना के एक दूसरे अफसर ने तुरंत ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर की थी कि सेना साम्प्रदायिक नजरिए से चीजों को नहीं देखती है, और जो लोग सेना के कामकाज, तौर-तरीकों को नहीं जानते हैं, वे ही ऐसी बातें कह सकते हैं। ओवैसी का यह बयान बड़ा साफ था, और वह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक नहीं था। वह बयान भाजपा के और हिन्दू संगठनों के कुछ नेताओं के कुछ दिन पहले के ही बयानों को लेकर था जिसमें यह कहा गया था कि मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान बनाया गया था, और उन्हें भारत छोड़कर पाकिस्तान या बांग्लादेश चले जाना चाहिए। इस घोर साम्प्रदायिक बयान के जवाब में जब ओवैसी ने हिन्दुस्तान के लिए मुस्लिमों की शहादत की चर्चा की, तो उसका जवाब एक फौजी अफसर की तरफ से आना केन्द्र सरकार की बहुत ही बड़ी चूक थी। केन्द्र सरकार कभी पाकिस्तान को कोई संदेश देने के लिए भारत के थलसेना या वायुसेना प्रमुख से विदेश नीति और फौजी तैयारियों के बयान दिलवा रही है, और अब तो देश के भीतर के धार्मिक, साम्प्रदायिक, और राजनीतिक मामलों पर ये अफसर खुलकर बोलने लगे हैं। 
भारतीय लोकतंत्र को जो लोग गहराई से नहीं समझते हैं, वे ही ऐसी चूक कर सकते हैं, या ऐसा गलत काम कर सकते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है, और किसी भी मजबूत लोकतंत्र को अपनी फौज को बैरकों में ही रखना चाहिए, और सरहद पर भी इन फौजों को केवल सरकार के हुक्म और फैसले से जाना चाहिए, न कि अपनी मर्जी से। इसके साथ-साथ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के साथ एक नाजुक फौजी संबंध के चलते हुए इस रिश्ते को लेकर कोई बयान फौजी अफसरों की तरफ से नहीं आना चाहिए। आज देश का माहौल ऐसा लग रहा है, कि वर्दीधारी फौजी अफसर भी देशप्रेम और राष्ट्रप्रेम के नाम पर सरकार और सत्तारूढ़ दल की तरफ से बयानबाजी कर सकते हैं, या कि देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के नजरिए से बयान दे सकते हैं। यह पूरा सिलसिला बहुत ही गलत, और बहुत ही खराब है। भाजपा या दूसरी राजनीतिक पार्टियों के पास लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक तरीके से बयानबाजी करने के लिए बहुत से लोग मौजूद हैं, और उनका काम किसी फौजी अफसर से करवाना, या कि उन्हें करने देना लोकतंत्र के लिए बड़ी घातक नौबत है। आज देश में राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह का उन्माद बढ़ाया जा रहा है, उसमें फौजी अफसरों की ऐसी बातों को उनकी फौजी जिम्मेदारियों का ही एक विस्तार मान लिया जाएगा, और यह देश की जनता में लोकतांत्रिक प्रशिक्षण की कमी का सुबूत भी है। हमाराख्याल है कि देश की भलाई के लिए, लोकतंत्र की भलाई के लिए फिक्रमंद लोगों को ऐसी गैरजरूरी और नाजायज बयानबाजी का खुलकर विरोध करना चाहिए ताकि आम जनता को यह समझ पड़ सके कि यह गलत है। लोकतंत्र में अलग-अलग किस्म की जिम्मेदारियों के अधिकार और किरदार दोनों बंटे हुए हैं। न तो राजनीतिक लोगों को सरहद पर जाकर गैरफौजियों के लिए जंग के फतवे देने चाहिए, और न ही फौजी लोगों को राजनीतिक या साम्प्रदायिक बातें करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 फरवरी

फिल्म के गाने के खिलाफ देश भर में कानूनी मुहिम

संपादकीय
21 फरवरी 2018


केरल की एक मलयालम फिल्म के कुछ सेकेंड के एक सीन से दुनिया भर में छा गई एक अभिनेत्री प्रिया प्रकाश और फिल्म के खिलाफ भारत में जगह-जगह मुस्लिम समाज के कुछ लोगों ने रिपोर्ट लिखाना शुरू किया कि इस गाने में मोहम्मद पैगंबर का अपमान हुआ है। ऐसी रिपोर्ट देश भर में बिखरे हुए इतनी अलग-अलग जगहों पर की गई कि इन लोगों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई कि अलग-अलग राज्यों की ऐसी रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट भी एक साथ सुने। इस पर अदालत ने राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि फिल्म में यह गाना गाते हुए दिखने वाली इस अभिनेत्री और फिल्म के निर्देशक के खिलाफ अब इसे लेकर और कहीं एफआईआर दर्ज न की जाए। फिल्म के डायरेक्टर का कहना है कि केरल का मुस्लिम समुदाय 40 बरस से इस गाने को गाते आ रहा है, और यह शादी के जलसों में गाया जाने वाला एक बेहद आम गाना है, इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है। लोगों को याद होगा कि अभी-अभी इस फिल्म के गाने में यह अभिनेत्री एक स्कूली छात्रा के किरदार में आंख मारते दिखती है, और कुछ सेकेंड का वह हिस्सा दुनिया भर में सबसे तेजी से मशहूर होने वाला वीडियो क्लिप बन चुका है। ऐसी चर्चा में आने के बाद इस तरह की फिल्मों खिलाफ अदालत तक दौड़ लगाने की कई वजहें हो सकती हैं, इनमें से एक वजह यह हो सकती है कि ऐसी पिटीशन लगाकर लोग खुद खबरों में आना चाहते हैं, एक दूसरी वजह यह हो सकती है कि फिल्म के निर्माता ही फिल्म को खबरों में बनाए रखने के लिए किसी से ऐसी पिटीशन लगवाएं, लेकिन इनके अलावा और भी वजहें हो सकती हैं। 
सुप्रीम कोर्ट ने आज ही पीएनबी घोटाले को लेकर दायर की गई एक पब्लिक इंटरेस्ट पिटीशन को देखकर कहा है कि यह पब्लिक इंटरेस्ट नहीं, पब्लिसिटी इंटरेस्ट पिटीशन दिख रही है। अदालत के इस रूख के अलग-अलग कम से कम दो किस्म के असर हो सकते हैं। पहला तो यह कि जनहित याचिका लेकर लोग अदालत तक कम जाएं, और जनहित के मुद्दे ऐसे में छूट भी सकते हैं। दूसरा असर यह हो सकता है कि जो लोग किसी बदनीयत को पीआईएल की खाल पहनाकर अदालत का वक्त खराब करते हैं, वैसे लोगों का हौसला पस्त भी हो सकता है। इस मलयालम फिल्म को लेकर दो बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि कोई मासूम सी हरकत किस तरह लोगों को छू सकती है, मशहूर हो सकती है। और दूसरी बात यह कि लोगों का बर्दाश्त कितना कम हो चला है कि मोहम्मद पैगंबर के लिए जो गाना दशकों से गाया जा रहा है, वह आज लोगों को अपमानजनक लगने लगा है, या लोग कम से कम ऐसा कह रहे हैं। जब देश भर में अलग-अलग जगह सैकड़ों या हजारों अदालतों में किसी मुद्दे को लेकर रिपोर्ट लिखाई जा सकती है, तो ऐसे में उसके खिलाफ किसी तरह की राहत महज सुप्रीम कोर्ट से ही मिल सकती है। फिल्म उद्योग से जुड़े हुए संपन्न लोग तो ऐसी दौड़ लगा सकते हैं, लेकिन अगर यह सोचें कि किसी छोटे अखबार या किसी छोटे लेखक के खिलाफ इसी तरह का अभियान धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता के तहत छेड़ दिया जाए, तो वैसे लोग तो सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने की ताकत भी नहीं रखते जहां आने-जाने का खर्च ही बहुत होता है, और वकीलों की फीस भी भारी-भरकम होती है। इसलिए लोकतंत्र में ऐसी मुकदमेबाजी के मुकाबले बेहतर नौबत तो यह रहती कि लोग कुछ तो अपना बर्दाश्त बढ़ाते, और कुछ ऐसा सामाजिक रास्ता भी निकलता जो कि मुकदमेबाजी से नीचे लोगों के टकराव को सुलझा सके। लोकतंत्र में जहां हर किसी को अदालत तक दौड़ लगाने की आजादी है, वहां पर हमारी यह बात कागजी अधिक लगेगी, लेकिन जिंदगी और दुनिया को बेहतर बनाने वाली हर सूझबूझ शुरूआत में कागजी ही लगती है, शायद कागजी ही रहती है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 21 फरवरी

दिल्ली सीएम की बैठक में सीएस पर हमला?

संपादकीय
20 फरवरी 2018


दिल्ली सरकार में वैसे तो अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक लगातार केंद्र सरकार और एक विशेष दर्जे के इस राज्य में अधिक अधिकारों से संपन्न लेफ्टिनेंट गवर्नर के साथ उनका टकराव चलते आ रहा है, लेकिन कल रात जो हुआ वह आजाद हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार हुआ है। मुख्य सचिव के आरोप के मुताबिक मुख्यमंत्री के घर रात में एक बैठक में उनकी पार्टी के विधायकों ने उनसे न सिर्फ बदसलूकी की, बल्कि उनसे हाथापाई भी की। यह आरोप लगाते हुए राज्य के तमाम आईएएस अफसर हड़ताल पर चले गए, और आम आदमी पार्टी ने इस आरोप को गलत बताया है कि उसके विधायकों ने मुख्य सचिव पर कोई हमला किया। अब इस तनातनी के बीच यह बात उठ रही है कि मुख्यमंत्री-निवास पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग की जांच की जाए। मुख्यमंत्री निवास की रिकॉर्डिंग जारी की गई है जिसमें मुख्य सचिव इत्मीनान से निकलकर जाते दिख रहे हैं। इस एक घटना को लेकर दोनों पक्षों के अलग-अलग बयान हैं, जिनकी हकीकत अधिक जांच से साबित हो सकेगी, लेकिन एक दूसरा मुद्दा जो सामने है वह यह कि मुख्यमंत्री, मंत्री, या विधायकों के सवालों का जवाब देने से मुख्य सचिव ने मना कर दिया था, और कहा था कि वे केवल लेफ्टिनेंट जनरल के प्रति जवाबदेह हैं, और उन्हें ही रिपोर्ट करेंगे। ऐसा कहा जा रहा है कि इसके बाद वे बैठक से उठकर जाने लगे और सत्तारूढ़ विधायक उन्हें रोकने लगे, तो जो स्थिति बनी उसे मुख्य सचिव ने हाथापाई बताया और उसकी रिपोर्ट की।
दिल्ली सरकार का बुनियादी ढांचा ऐसा है कि वहां के अधिकतर स्थानीय काम निर्वाचित म्युनिसिपलों के मार्फत होते हैं, वहां की पुलिस केंद्र सरकार के मातहत है, वहां शहरी ढांचे के कई बड़े प्रोजेक्ट केंद्र सरकार के तहत आते हैं, और सुप्रीम कोर्ट तक टकराहट पहुंचने पर भी यही स्थापित हुआ है कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार को दूसरे राज्यों की तरह पूरे अधिकार हासिल नहीं हैं। ऐसे में जब केंद्र सरकार और उसके मनोनीत एलजी के साथ राज्य सरकार और उसके मुख्यमंत्री के वैचारिक मतभेद लगातार चलते हों, तो यह एक राज्य की व्यवस्था चलने लायक नौबत नहीं कही जा सकती। यह टकराहट केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन से चली आ रही है, और इसका कोई भी अंत उसी दिन होते दिखता है जब दिल्ली की पूर्ण राज्य के दर्जे की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो। दिक्कत यह है कि जो पार्टी दिल्ली सरकार में रहती है, वह तो यह मांग करती है, लेकिन जब वही पार्टी केंद्र में चली जाती है तो वह दिल्ली पर से अपना काबू छोडऩे के लिए राजी नहीं होती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। इतने टकराव के साथ कोई राज्य काम नहीं कर सकता, और दिल्ली के खास हालात गिनाते हुए उसके हक केंद्र अपने पास बनाए रखे, उसका भी कोई जायज तर्क नहीं बनता। यह कहना कि देश की राजधानी की पुलिस राज्य के काबू में नहीं छोड़ी जा सकती, ठीक नहीं है। केंद्र और दिल्ली में चाहे जिन पार्टियों की सरकारें रहें, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना ही चाहिए, और दिया ही जाना चाहिए। फिलहाल कल रात की घटना को लेकर मुख्य सचिव और आम आदमी पार्टी के बयानों में से सच्चाई किसमें है, इसकी जांच के लिए मुख्यमंत्री निवास पर लगे कैमरों की सारी रिकॉर्डिंग जब्त कर लेनी चाहिए। अगर सच में ऐसा हमला हुआ है, तो वह बहुत शर्मनाक बात है, और इसे लेकर न केवल हमलावर विधायकों की तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए, बल्कि उनकी विधानसभा की सदस्यता बर्खास्त भी होनी चाहिए। और अगर यह आरोप झूठा है, तो ऐसी ही कार्रवाई आरोप लगाने वाले अफसर या अफसरों के खिलाफ भी की जानी चाहिए। फिलहाल हम इस मामले की सच्चाई पर दूर बैठकर कोई अटकल लगाना नहीं चाहते, और इसकी ईमानदारी से जांच होनी चाहिए। और आगे ऐसी नौबत न आए उसके लिए फिलहाल कड़ी कार्रवाई के साथ-साथ आगे के लिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भी देना चाहिए। यह भी हैरानी की बात है कि आमतौर पर बड़बोले रहने वाले केजरीवाल इतने गंभीर आरोपों के कई घंटे बाद भी चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि हालात का तकाजा है कि वे अपने घर की, अपनी बुलाई हुई बैठक पर लगाए गए इतने गंभीर आरोपों पर तुरंत सामने आकर सब कुछ साफ करें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 फरवरी

जनता का कोंच-कोंचकर पांच बरस मजाक उड़ाना!

19 फरवरी  2018

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता के बीच अच्छे दिन लाने और आने का वायदा करते हुए इस कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता साफ किया था। इसके बाद कुछ अरसा गुजरा और उनके एक बड़े सहयोगी ने यह साफ कर दिया कि देश के लोगों की मोदी से उम्मीदें एक जुमले पर टिकी हैं, और यह जायज नहीं है। उन्होंने कहा कि मोदी की वह बात महज एक जुमला थी, हकीकत बदलने का वायदा नहीं। तब से अब तक मोदी के अनगिनत साथी देश के लोगों को अच्छे दिनों से और अधिक दूर ले जाने का काम करने में लगे हुए हैं। और अब सवाल यह उठता है कि पंजाब नेशनल बैंक के इस ताजा घोटाले के बाद अच्छे दिन आए किसके हैं?
रोजगार तो यह भी है, लेकिन क्या ये अच्छे दिन भी हैं?
चुनाव के दौरान बहुत से नारे लगते हैं जिनका हकीकत से अधिक लेना-देना नहीं रहता, लेकिन इन नारों को भुला देना तो ठीक है, लोगों से यह उम्मीद रखना कि वे भी चुनावी वायदों को भूल जाएं, यह भी जायज है क्योंकि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र कुछ इसी किस्म का फरेबी-चुनावी लोकतंत्र है। लेकिन लोगों को कोंच-कोंचकर यह एहसास कराना कि वे अच्छे दिनों को भूल जाएं क्योंकि अच्छे दिन महज गिने-चुने पसंदीदा लोगों के लिए आए हैं, आ रहे हैं, और कायम रहेंगे, यह कोंचना कुछ ज्यादती है। लोकतंत्र ऐसी ज्यादती के खिलाफ कोई कानून तो नहीं सुझाता है, लेकिन जनता के मन में ऐसा कोंचना छाप जरूर छोड़ जाता है, और वह छाप आसानी से मिटती नहीं है।
अच्छे दिनों की बात लोग धीरे-धीरे भूलने लगते, अगर खुद नरेन्द्र मोदी खुद होकर यह नहीं कहते कि पकौड़ा बेचना भी एक रोजगार है। इस बात में गलत कुछ भी नहीं है कि यह न सिर्फ एक रोजगार है, बल्कि एक मुनाफे का रोजगार भी है, और इसमें किसी पशु-पक्षी की जिंदगी भी नहीं ली जाती, शराब या तम्बाखू जैसा कोई नुकसानदेह सामान भी नहीं बेचा जाता, और लोगों को खाने को कुछ अच्छा बेचकर भी अपने घर-परिवार के लिए खाना जुटाया जा सकता है। लेकिन मोदी के राजपथ और उनके जनपथ के किनारे बैठकर अच्छे दिनों के आने की राह तकते थके हुए लोगों के लिए यह बात कुछ चुभने वाली थी, और लोग इससे आहत हुए।
पकौड़ा बेचना एक रोजगार तो है, लेकिन रोजगार तो देश में बहुत किस्म के हैं।  नाली और गटर साफ करते हुए उसके भीतर तकरीबन हर कुछ दिनों में दम तोडऩे वाले लोगों का रोजगार भी रोजगार है, और ऐसे सफाईकर्मी उन्हीं नाली और गटर के भीतर से मानो अपने घर-परिवार के लिए रोटी निकालकर लाते हैं। अब कल के दिन कोई कहे कि नाली साफ करना भी रोजगार है, तो उसमें जाहिर तौर पर तो कुछ गलत नहीं है, लेकिन अच्छे दिनों के सपने दिखाकर वोट हासिल करने वालों से नाली साफ करके कुछ नोट हासिल करने को लोग अच्छे दिन शायद न भी गिनें।
लेकिन बात मानो मोदी की इस नई बात पर खत्म करना उनके आसपास के लोगों को ठीक नहीं लगा, तो फिर लोगों ने उसे एक नए जुमले की तरह आगे बढ़ाना शुरू किया, बिना यह कहे या माने हुए कि यह एक और जुमला है, असल नीयत से कही बात नहीं है। देश भर में मोदी के लोगों ने जगह-जगह पकौड़े बेचने की बात को आगे बढ़ाया, जो कि मोदी को तो खुश कर सकती है, लेकिन इन लोगों ने यह नहीं सोचा है कि क्या अच्छे दिनों की उम्मीद में बैठी जनता को भी अपनी औलाद को पकौड़े बेचने वाला बनाना अच्छा लगेगा?
हमको पकौड़े बेचने का काम अच्छा लगता है, इज्जत का लगता है, लेकिन जहां तक जनता का नजरिया है तो हिन्दुस्तान में मेहनत करके रोजी-रोटी कमाने को इज्जत का काम नहीं माना जाता। हमारे सरीखे गैरजुमलेबाज लोग तो लोगों को सुझा सकते हैं कि रिश्वत देकर सरकारी नौकरी पाने के बजाय चाय-पकौड़े बेचकर अपनी मर्जी के मालिक रहना बेहतर है, लेकिन जो लोग चुनावी-राजनीति में हैं, उनको जनधारणा और जनभावना को तौले बिना महज जुमलेबाजी नहीं करना चाहिए।
फिर मोदी को खुश करने पर उतारू उनके लोगों ने बात को आगे बढ़ाया, और यह साबित करने की कोशिश की कि पकौड़े बेचने से और नीचे का काम भी अच्छे दिनों में ही गिनाएगा। भाजपा से जुड़े हिन्दू संगठन आरएसएस के एक बड़े नेता इन्द्रेश कुमार ने कहा पकौड़े तलना देश के पन्द्रह करोड़ से ज्यादा लोगों का व्यवसाय है, और भीख मांगना भी देश के बीस करोड़ लोगों का रोजगार है। यह छोटा काम नहीं है। उन्होंने वैसे तो पकौड़े तलने को हीन काम न मानने की वकालत करते हुए यह बात कही लेकिन अगर इस देश की पन्द्रह फीसदी से अधिक आबादी भीख मांगकर जिंदा है, तो यह किस तरह के अच्छे दिन कहे जाएंगे?
लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान में जगह-जगह बड़े-बड़े नेता बलात्कार को लेकर लोगों के जख्मों पर नमक-मिर्च छिड़कने जैसे काम करते हैं, बयान देते हैं, और अब अच्छे दिनों को लेकर, पकौड़े बेचने को लेकर बात को भीख मांगने तक पहुंचा दिया गया है। लोकतंत्र इतना लचीला रहता है कि वह लोगों को अलग-अलग किस्म की सोच को सामने रखने का मौका देता है, आजादी देता है। लेकिन जो लोग किसी पार्टी, संगठन, या विचारधारा से जुड़े रहते हैं, उनका मुंह खोलना उनके संगठन या उनकी विचारधारा को भी बताता है। ऐसे में लोगों के मुंह से अगर नमक-मिर्च ही झरना तय है, तो फिर वे मुंह बंद क्यों नहीं रख सकते?
लोकतंत्र में जनता किसी एक सरकार, पार्टी, और नेता के बारे में अपनी सोच पांच बरस में एक बार ही जाहिर कर पाती है, इसके पहले, इसके बीच में होने वाले चुनावों में किसी दूसरी सरकार, और किन्हीं दूसरे उम्मीदवारों को वोट देने की नौबत आ सकती है, लेकिन उसकी तुलना पिछले चुनाव से नहीं की जा सकती। ऐसे में लोग अगर उन्हें कुर्सी तक पहुंचाने वाली जनता के सब्र को इतना अधिक नहीं आजमाना चाहिए कि वह टूट ही जाए। एक कानूनी बहस और नुक्ताचीनी की शक्ल में जुमलेबाज यह भी सही ठहरा सकते हैं कि पखाना साफ करना भी रोजगार है। लेकिन ऐसी बातों से लोगों को बार-बार कोंच-कोंचकर यह याद दिलाना समझदारी नहीं है कि उन्होंने पिछला वोट जुमलों के झांसे में दिया था, और इसलिए अब कुर्सी पर बैठे लोगों को यह हक मिल जाता है कि वे पांच बरस तक लोगों को उन तमाम किस्मों के रोजगार सुझाएं जो कि जनता की नजरों में इक्कीसवीं सदी के अच्छे दिन में नहीं गिनाते।  (Daily Chhattisgarh)

बारातों के सामने बेबस शासन-प्रशासन का हाल

संपादकीय
19 फरवरी 2018


छत्तीसगढ़ के कई शहरों में कल शादियों की भरमार थी। सड़कों पर इतनी बारातें थीं, कि शहर आरपार कर लें, तो भी लाउडस्पीकर और भयानक रौशनी फेंकने वाली लाईटों से पार पाना मुमकिन नहीं था। राजधानी रायपुर में शादी के हर महूरत की तरह कल भी कुछ इलाकों में घंटों ट्रैफिक जाम था। और यह सब तब था जब शोरगुल के खिलाफ न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट बड़े कड़े हुक्म दे चुके हैं, बल्कि राज्य सरकार का पर्यावरण विभाग भी बार-बार अफसरों को चेता चुका है। दूसरे लोगों की जिंदगी बर्बाद करते हुए जब लोग अपने घर की खुशी के मौके पर ऐसी गुंडागर्दी दिखाते हैं, तो उनका बावलापन तो समझ में आता है कि उनका पैसा और उनकी ताकत सिर चढ़कर बोल रहे हैं, लेकिन यह समझ नहीं पड़ता है कि पुलिस और प्रशासन को कानून तोडऩे वालों के साथ ऐसी रियायत की नरमी क्यों सूझती है? बात-बात पर एक-एक गरीब ठेले को मशीनों से उठाकर फेंक देने वाले अफसर ताकतवर बारातों को छू भी नहीं पाते, और ताकतवर विवाहस्थलों को चेतावनी देते-देते जिंदगी गुजार देते हैं। कल ही राजधानी से लगे हुए दुर्ग जिले में एक महिला पुलिस अफसर ने जब सड़क पर लाउडस्पीकरों के साथ होते हंगामे को रोका, तो घराती-बाराती थाने पहुंच गए, वहां बड़ी-बड़ी राजनीतिक धमकी दीं, गालियां दीं, और पूरा थाना सिर पर उठा लिया। आज सुबह की खबरें हैं कि ऐसा हंगामा करने वालों को छुड़वाने के लिए बड़े ताकतवर मंत्री, सांसद, दूसरे नेता सभी जुट गए, और उनकी ताकत को देखते हुए पुलिस ने उन्हें जाने भी दिया। इस मौके की जो वीडियो रिकॉर्डिंग बाहर आई है, उसमेंं नशे में धुत्त लोग सूटबूट में मुख्यमंत्री को गालियां देते दिख रहे हैं, और पुलिस ऐसे लोगों को छोड़ रही है। 
हिन्दुस्तान में लोग जब तक अकेले रहते हैं, तब तक वे इंसान की तरह बर्ताव करते हैं, एक से दो हुए तो वे मनमानी करने वाली टोली हो जाते हैं। दो से चार हुए तो उनका बर्ताव गुंडों के गिरोह जैसा हो जाता है, और अगर ऐसे लोग किसी बारात, किसी शवयात्रा, किसी धार्मिक या राजनीतिक जुलूस में हैं, तो वे एक अराजक और हिंसक तेवर अख्तियार कर लेते हैं। और तो और, जब पुलिस या फौज के लोग ट्रेन में सफर करते हैं, तो उनकी गिनती अधिक होने पर उनका बर्ताव भी बाकी मुसाफिरों के साथ मवालियों जैसा हो जाता है। भीड़ के बारे में जो बात कही जाती है कि उसमें सिर तो बहुत होते हैं, दिमाग कोई नहीं होता, कुछ उसी किस्म का हाल हिन्दुस्तानियों के किसी छोटे जत्थे के साथ भी रहता है, और अगर जत्था बड़ा हो गया, मौका सुख या दुख का हुआ, तो फिर बात ही क्या है। 
दूसरी बात यह कि जिन लोगों के पास खूब सारा कालाधन होता है, और जो शादी-ब्याह या दूसरे किस्म के जलसों पर उसे उड़ाने पर उतारू रहते हैं, उनकी बददिमागी इन पैसों की वजह से आसमान पर पहुंची हुई रहती है। और फिर ऐसे कालेधन वालों में जो लोग प्रशासनिक या राजनीतिक ताकत वाले होते हैं, वे गुंडागर्दी, मनमानी, और अराजकता को अपनी शान दिखाने के लिए बहुत ही जरूरी भी समझते हैं। बददिमागी का यह पूरा सिलसिला कमजोर सरकार और मजबूत मुजरिमों का एक ऐसा मेल है जिसमें अफसर गुंडागर्दी का मुंह देखते रह जाते हैं क्योंकि किसी को छूने का मतलब अपनी वर्दी उतरवाना भी होता है। किसी भी प्रदेश की राजधानी में ऐसी बददिमागी का घनत्व उसी अनुपात में कई गुना हो जाता है जिस अनुपात में वहां सत्ता की ताकत वाले लोग रहते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इसकी एक उम्दा मिसाल है जहां पर सरकार आए दिन कोलाहल के खिलाफ बड़े कड़े हुक्म निकालती रहती है, जहां छोटे से राज्य का हाईकोर्ट कई तरह के हुक्म देते रहता है, और लोगों की जिंदगी लाउडस्पीकरों की वजह से, आतिशबाजी और पटाखों की वजह से हराम रहती है। 
छत्तीसगढ़ सरकार में पर्यावरण सचिव अमन सिंह देश के सबसे ताकतवर आधा दर्जन अफसरों में गिने जाते हैं, सरकार पर उनकी मजबूत पकड़ से सब वाकिफ हैं, और उनकी काम करने की क्षमता के सब कायल भी हैं। लेकिन पूरे प्रदेश में लाउडस्पीकरों का प्रदूषण लगातार बढ़ते चल रहा है, आतिशबाजी पर रोक बेअसर है, धर्मस्थलों पर चौबीसों घंटे लाउडस्पीकर बजते हैं, इतना जरूर है कि मंत्रियों और अफसरों के इलाके, राजभवन और जजों के बंगले ऐसे शोरगुल से अलग रखे जाते हैं, यानी शोरगुल को इन चुनिंदा जगहों पर दूर रखा जाता है। इस प्रदेश में सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर शोरगुल और बाराती-रौशनी के अंधाधुंध प्रदूषण की चुनौती सामने है, और हम यहां पर पर्यावरण सचिव का जिक्र इसीलिए कर रहे हैं कि सरकार के एक सबसे प्रमुख अफसर के नाते यह पूरी तरह उनकी सीमा में है, वे ध्यान दें तो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के अनगिनत आदेशों पर अमल हो सकता है, और लोगों की जिंदगी बर्बाद होना थम सकता है। पूरे प्रदेश में ऐसा प्रदूषण तुरंत कड़ाई से रोकने की जरूरत है, और ऐसा करने में लगे कारोबारियों, गाडिय़ों, सामानों को जब्त करके गुनहगारों को जेल भेजना शुरू होगा, तो यह सिलसिला थम जाएगा। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फरवरी

इंसानियत को रौंदते हुए हैवानियत का जुलूस

संपादकीय
18 फरवरी 2018


जम्मू-कश्मीर के जम्मू इलाके में एक बंजारा बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, और उसकी हत्या कर दी गई। जब उसकी तलाशी जारी थी तब ढूंढने वाली पुलिस ने एक पुलिस कर्मचारी शामिल था, और बाद में उसे पुख्ता सुबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया गया। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन दीपक खजूरिया नाम के इस पुलिस वाले की गिरफ्तारी के खिलाफ जम्मू में हिन्दू एकता मंच और भाजपा के नेताओं ने जुलूस निकाला, और उसे तुरंत रिहा करने की मांग की। इस जुलूस में बड़े-बड़़े तिरंगे झंडे लेकर लोग चल रहे थे, और नारे लगा रहे थे। यह नजारा देखकर कश्मीर में भाजपा की भागीदारी में राज्य सरकार चला रहीं मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती हैरान और हक्का-बक्का रह गईं, और उन्होंने ट्विटर पर पोस्ट किया कि राष्ट्रीय ध्वज का ऐसा इस्तेमाल देखकर वे भयभीत हैं। 
अब इस देश में एक हत्यारे और बलात्कारी को भी बचाने के लिए धर्म और राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल शुरू होते दिख रहा है। फिर एक हिन्दू संगठन के साथ-साथ इस प्रदर्शन में राज्य भाजपा के महासचिव शामिल थे, और उन्होंने खुलकर इस आरोपी की रिहाई की मांग की है। जिस प्रदेश में सत्ता में भाजपा की भागीदारी है, जिस सरकार में भाजपा के मंत्री हैं, वहां पर अगर एक हत्यारे-बलात्कारी की गिरफ्तारी से असहमत होकर राष्ट्रीय ध्वज लेकर हजारों लोग सड़कों पर हैं, तो सवाल यह उठता है कि कानून अपना काम कैसे करेगा? और यह बात महज जम्मू तक सीमित नहीं रहेगी, यह बात धीरे-धीरे दूसरे प्रदेशों में भी जोर पकड़ेगी, और भाजपा इसे लेकर देश के प्रति आज ही जवाबदेही झेल रही है। 
अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार को इस बात के लिए फटकारा है कि उसने बलात्कार की शिकार को साढ़े 6 हजार रूपए का मुआवजा दिया। अदालत ने सदमे में आकर सरकार से पूछा है कि क्या वह भीख दे रही है? अब इस तरह के सरकारी बर्ताव के साथ-साथ अगर किसी देश-प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी एक बच्ची के बलात्कार और हत्या के बाद अगर किसी गिरफ्तारी का ऐसा विरोध करती है, तो फिर कानून के राज की कोई जगह बचती नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुओं के नाम पर कोई संगठन अगर ऐसी हरकत करता है, तो यह बाकी हिन्दू समाज के लिए भी जिम्मेदारी दिखाने का एक मौका है कि कौन-कौन इस हरकत से असहमत हैं। भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में भी तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, और उसके जम्मू-कश्मीर संगठन की वेबसाइट पर जो महासचिव दिख रहे हैं, वे अगर ऐसे जुलूस की लीडरशिप कर रहे हैं, तो पार्टी को अपना घर सुधारना चाहिए। गनीमत यह है कि यह मामला अभी तक साम्प्रदायिक नहीं दिख रहा है, और जिस बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या की गई है, वह भी एक हिन्दू बंजारा लड़की है जो कि गरीब भी है, और कमउम्र भी है। कोई भी संगठन, कोई भी पार्टी ऐसे मौके पर अगर अपना साफ रूख जाहिर न करे, तो उसकी चुप्पी दर्ज हो जाती है। जिस प्रदेश में भाजपा सत्ता में भागीदार है, जहां पर उसकी बड़ी भागीदार मुख्यमंत्री महबूबा इस प्रदर्शन को लेकर अपने आपको डरा-सहमा बता रही हैं, वहां पर माहौल सचमुच बहुत खराब दिख रहा है। ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रीयता के झंडे तले, धर्म के झंडे तले इंसानियत को रौंदते हुए हैवानियत का जुलूस निकला है। लोगों को चाहिए कि इस जुलूस के उसी जगह कुचल दिया जाए, ताकि यह बाकी देश में आग न लगा सके। (Daily Chhattisgarh)