शाहिद कपूर के गाने पर नाचते-गाते बड़े-बड़े नेता

संपादकीय
18 अक्टूबर 2017


अभी पिछले कुछ घंटों से अमरीकी मीडिया इस बात पर उबल रहा है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने विदेशी मोर्चे पर शहीद हुए एक नौजवान सैनिक की पत्नी से फोन पर बात करते हुए एक से अधिक बार यह याद दिलाया कि जब उसने फौज की नौकरी की, तब भी उसे यह मालूम था कि उसके साथ क्या हो सकता है। जो लोग अमरीका में ट्रंप के आदतन-आलोचक नहीं हैं, वे लोग भी बुरी तरह से विचलित हैं कि एक ऐसे शहीद की पत्नी के साथ बात करते हुए राष्ट्रपति ने ऐसी ओछी और घटिया बात कही है जो कि अब तक शायद किसी राष्ट्रपति ने न की हो। यह वह शहीद है जो अपने पीछे दो बच्चे और गर्भवती पत्नी छोड़ गया है, और जो देश के लिए लड़ते हुए ऐसी बुरी मौत मरा है कि अंतिम संस्कार के पहले उसका ताबूत भी नहीं खोला गया, जाहिर है कि उसकी लाश देखने लायक भी नहीं रही होगी। ट्रंप अपनी उस जुबान के लिए कुख्यात हैं जिसे इंसानी जुबान में हैवानियत कहा जाता है, हालांकि न हैवान नाम की कोई चीज होती, और न ही कुछ हैवानियत होती, यह पूरा मिजाज इंसानों के मिजाज का एक हिस्सा है, जो कि समय-समय पर बेकाबू होकर बाहर आते रहता है। हैरानी इसमें बस यही है कि जब लोग देश या प्रदेश के किसी सबसे बड़े ओहदे पर पहुंच जाते हैं, तो उसके बाद भी अपने भीतर की हैवानियत पर उनका काबू ऐसा खोते रहता है, और यह हैवानियत सार्वजनिक रूप से इस तरह सामने आती रहती है।
हिन्दुस्तान में भी हम बहुत से ओहदों पर बैठे हुए लोगों को देखते हैं जो कि मुंह खोलते हैं, और गंदी, हिंसक, साम्प्रदायिक, अश्लील, और भद्दी बात करते हैं। इनमें से कुछ लोग तो धर्म का लबादा भी ओढ़े रहते हैं, बहुत से लोग अपने आपको किसी संस्कारी पार्टी या संगठन का कहते हैं, और वे गरीबों के खिलाफ, महिलाओं के खिलाफ और लड़कियों के खिलाफ गंदा कहना उसी तरह जारी रखते हैं जिस तरह किसी एक फिल्मी गाने में कोई किरदार यह गाता है- अब करूंगा गंदी बात, तेरे साथ...। भारत में हम महिला मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी से काम सम्हालते ही बलात्कार की शिकार एक महिला के बारे में यह सुन चुके हैं कि महिला की शिकायत राज्य सरकार को बदनाम करने की साजिश है। हम हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की चुनाव के पहले की यह बातें सुन चुके हैं कि जिन लड़कियों या महिलाओं को शाम के बाद बाहर निकलना हो वे बिना कपड़ों के नंगी होकर क्यों नहीं निकलतीं। अभी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में लड़कियों पर यौन हमले के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार के लोगों के तरफ से भी बहुत ही गंदी और ओछी बातें कही गईं। जेएनयू के विवाद के समय राजस्थान के एक भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने जेएनयू के अहाते में हर दिन तीन हजार इस्तेमाल हो चुके कंडोम और दो हजार शराब-बोतलें मिलने की बात कही थी। विधायक का नाम तो ज्ञानदेव है, लेकिन जिस विश्वविद्यालय में देश की होनहार लड़कियां भी पढ़ती हों, उसके बारे में गंदी बात कहते हुए इस विधायक का ज्ञान धरे रह गया।
हम ट्रंप के बारे में तो यह नहीं कहते, लेकिन हिन्दुस्तान के बारे में जरूर कह सकते हैं कि यह देश यौन-कुंठाग्रस्त देश है जिसके लोगों को स्वाभाविक और प्राकृतिक सेक्स भी आपत्तिजनक, वर्जित, और जुर्म लगता है। यह वही देश है जिसमें सदियों पहले खजुराहो जैसे मंदिरों पर बड़ी मेहनत से कलाकारों ने सेक्स-क्रिया की मूर्तियां उकेरी थीं, जहां पर सदियों पहले वात्सायन में दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण कहा जाने वाला सेक्स-ग्रंथ कामसूत्र लिखा था, जहां सदियों पहले शहरों में नगरवधुएं हुआ करती थीं, वहां पर आज किसी भी तरह की वयस्क बातचीत को जुर्म करार दे दिया गया है। यह यौन कुंठा महिलाओं के बारे में बात करते हुए, लड़कियों के बारे में बात करते हुए, प्रेमी जोड़ों के बारे में बात करते हुए उनके खिलाफ भारी हिंसा के साथ बाहर आती है। इस देश के बड़े पुराने-पुराने ग्रंथ इस जिक्र से भरे हुए हैं कि किस तरह राम की अयोध्या में, और कृष्ण के वक्त भी शहरों में वेश्याएं हुआ करती थीं, और वे राम के अयोध्या आने पर स्वागत करने भी पहुंचीं थीं। लेकिन आज उस इतिहास को मिटाने के लिए लोग आदमकद रबर (इरेजर) लेकर घूम रहे हैं, और जहां इतिहास पसंद नहीं आता, वहां उसे मिटाने पर जुट जाते हैं। कोई हैरानी नहीं कि इनमें से कुछ लोग कुछ बरसों के भीतर खजुराहो के मंदिरों को बम लगाकर उड़ा दें, और कामसूत्र की छपी हुई किताबों की बिक्री पर रोक भी लगवा दें। हमने बात शुरू की थी ट्रंप की गंदी बात से, फिर वह हिन्दुस्तानी नेताओं की गंदी बात पर आई, और हम आज की इस बात का अंत ऐसी गंदी बातों के पीछे की सोच की जड़ों पर लाकर खत्म कर रहे हैं। लोकतंत्र में लोगों को मुंह खोलने के पहले याद रखना चाहिए कि अब मुकरने के दिन खत्म हो चुके हैं, और उनकी कही गंदी बातों के सुबूत हमेशा के लिए दर्ज होते जाते हैं। एक वक्त आएगा जब हिन्दुस्तान में हिंसक और गंदी बातें कहने वालों को उसका दाम भी चुकाना पड़ेगा, नोटों की शक्ल में नहीं, वोटों की शक्ल में, और नेताओं के पेट पर जब मतदाता की लात पड़ेगी, तभी यह सिलसिला थमेगा। आज के डिजिटल जमाने में हमारा यह सुझाव है कि नेताओं की गंदी बातों को उनके चुनाव के वक्त उनके इलाकों में जमकर फैलाना चाहिए, और उन्हें निपटाना चाहिए, तभी लोकतंत्र की गंदी हवा साफ हो सकेगी, चाहे वह अमरीका हो, चाहे हिन्दुस्तान हो। 

सबको मालूम है लक्ष्मी की हकीकत लेकिन, दिल...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2017


एक बार फिर दीवाली सामने खड़ी है, और हिंदुस्तान का लगभग पूरा हिस्सा थोड़ा सा अधिक रौशन है। कुछ लोगों के मन में यह मलाल है कि पटाखों पर कहीं कुछ रोक लगी है, वहीं दूसरे बहुत से लोग हैं जिनके सामने यह फिक्र है कि इस त्यौहार को कैसे मनाएं, कैसे अपने बच्चों को बिना खर्च त्यौहार मनाने के लिए मनाएं। हर त्यौहार एक आर्थिक-सामाजिक खाई लेकर आता है और जितनी खुशियां लेकर आता है, उससे बहुत अधिक मलाल भी लेकर आता है। दीवाली की पूजा से जिस लक्ष्मी के खुश होने की धारणा है, वह लक्ष्मी अगर है, और वह किसी पर खुश होती है, तो वह चुनिंदा लोगों पर ही होती है, और ये वे लोग हैं जिनके पास पहले से वह लक्ष्मी मौजूद है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान में हाल के बरसों में दौलत का जो इजाफा हुआ है, वह पूरे का पूरा कुछ चुनिंदा लोगों के पास ही हुआ है, और बाकी लोगों का हाल इसी दौर में और बदहाल हुआ है। गरीब और गरीब होते चले गया है, कुपोषण का शिकार, भूख का शिकार, पड़ोस के बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक कुपोषित और भूखा रह गया है।
आज जब बाजार धनतेरस की शानदार, चकाचौंध भरी खरीददारी के लिए तैयार हो रहा है, हो चुका है, तब सुबह-सुबह यह खबर थी कि आधार कार्ड नाम का पहचान पत्र न होने से एक परिवार का नाम राशन कार्ड से कट गया, और राशन न मिलने से, स्कूल की छुट्टी होने से दोपहर का भोजन भी न मिलने से झारखंड में एक गरीब बच्ची भूख से मर गई। ऐसे में एक बच्ची की मौत सरकारों की धनतेरस, और उसकी मनतेरस पर सवाल खड़े करती है। इस देश में हर दीवाली पर यही लगता है कि यह किसकी दीवाली है, एक छोटे से तबके की दीवाली, या देश की दीवाली। कहने को गरीब से गरीब घर में दीवाली पर दो दिए जल जाते हैं, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था को ढोना है, और गरीब इस उम्मीद में भी रहते हैं कि दीवाली की लक्ष्मी पूजा से प्रसन्न लक्ष्मी उस पर मेहरबान होंगी, और उसकी गरीबी दूर होगी। लेकिन जैसा कि धर्म का मकसद था, उसे बनाने वालों का मकसद था, धर्म लोगों को ऐसे ही झांसे में रखता है, और गरीबों में बगावत को रोकने के लिए, अमीरों की हिफाजत करने के लिए यह एक हथियार बनाया गया था जो कि आज भी उतना ही कारगर है।
खर्च वाले हर त्यौहार के मौके पर यह बात और अधिक तल्खी से चुभती है कि भारत जैसे देश की उदार अर्थव्यवस्था किस तरह लक्ष्मी को समेटकर कुछ गिनेचुने लोगों तक ले जा रही है, और बाकी तमाम लोगों से उसे दूर कर रही है। फिर लक्ष्मी को भी इससे कोई परहेज नहीं है, वह भी इस इंतजाम में खुश है कि उसे बड़े-बड़े महलों, बड़ी-बड़ी तिजोरियों में रहने मिले, और कच्चे मकानों, झोपडिय़ों और बदबू से दूर रहने का मौका मिले। लक्ष्मी को कोई चुनाव तो लडऩा नहीं है कि वह किसी दलित के घर, किसी गरीब के घर जाकर रहे और खाना खाए, चाहे उस घर का, चाहे किसी रेस्त्रां से आया हुआ। लक्ष्मी की पूजा का यह त्यौहार धर्म की उसी गैरबराबरी वाली सोच पर बना और ढला हुआ है, इसे जो बना रहे हैं, उनकी हकीकत, और उनकी हसरत, सबके लिए हमारी बधाई। 

इतिहास पेंसिल से नहीं लिखा जाता कि रबर उठाया, और मिटा दिया...

संपादकीय
16 अक्टूबर 2017


एक गैरजरूरी और नाजायज बहस जो कि कुतर्कों पर आधारित हो, कभी-कभी बकवासियों को भारी भी पड़ सकती है। कुछ ऐसा ही हुआ है उत्तरप्रदेश के घोर साम्प्रदायिक और बड़बोले, हिंसक और आक्रामक भाजपा विधायक संगीत सोम के साथ। उत्तरप्रदेश इन दिनों शाब्दिक अर्थों में भी एक भगवाकरण से गुजर रहा है, और वहां की सरकारी बसों और इमारतों को भगवा रंगना तेजी से चल रहा है, प्रदेश के इतिहास का हिन्दू धर्मांतरण किया जा रहा है, और ताजमहल को इतिहास से मिटा दिया जा रहा है। ताजमहल को मौजूदा वक्त से मिटा पाना कानूनी रूप से योगी आदित्यनाथ की सरकार के हाथ में नहीं है, वरना बाबरी मस्जिद के गुंबदों की तरह उसे भी गिरा दिया जाता। ऐसे में जब उत्तरप्रदेश की पर्यटन पुस्तिकाओं से ताजमहल को हटाकर सीएम योगी के खुद के गोरखनाथ मंदिर को जोड़ा जा चुका है, साम्प्रदायिक दंगों के आरोप में जेल जा चुके भाजपा विधायक संगीत सोम ने कहा है कि देश का इतिहास अब तक बिगड़ा हुआ था उसे सुधारने का काम भाजपा कर रही है। ताजमहल कैसा इतिहास है, किस काम का इतिहास है, जिसमें अपने पिता को ही कैद कर डाला था, इन लोगों ने हिन्दुस्तान में हिन्दुओं का सर्वनाश किया था, अब भाजपा सरकार देश के इतिहास से बाबर, अकबर, और औरंगजेब की कलंक कथा को निकालने का काम कर रही है।
इस पर देश की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जवाब दिया है कि लाल किले को भी गद्दारों ने बनवाया था, क्या पीएम मोदी लाल किले से तिरंगा फहराना बंद कर देंगे? क्या मोदी-योगी देशी-विदेशी सैलानियों को ताजमहल जाने से मना करेंगे? क्या गद्दारों के द्वारा ही बनाए गए हैदराबाद हाउस में पीएम मोदी विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी बंद कर देंगे?
यह बहस इतिहास को मिटाने के अज्ञान भरे अहंकार से शुरू हो रही है, और इसका जैसा जवाब ओवैसी ने दिया है, उससे इस बकवासी विधायक की बोलती बंद हो जानी चाहिए। हिन्दुस्तान का इतिहास आज संगीत सोम और योगी की हसरत का मोहताज नहीं है, वह हिन्दुस्तान के बाहर हिन्दुस्तान से ज्यादा अच्छी तरह दर्ज हैं, और खुद हिन्दुस्तानियों द्वारा दर्ज किए गए इतिहास को भी योगी जैसे लोग मिटा नहीं सकते, वह इस पार्टी की सरकार के बाद भी कायम रहेगा, और आज पूरी दुनिया में ऐसे दकियानूसी और धर्मांध लोग जिस अंदाज में ताजमहल को मिटाने पर आमादा हैं, यह उन तालिबानों की सोच की ही शुरुआत है जिन्होंने अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की पर्वताकार प्रतिमाओं को खत्म किया था। धर्मांधता से इतिहास को खत्म करने की कोशिशें तो तानाशाहों की भी कामयाब नहीं होतीं, यह तो पांच बरस के लिए निर्वाचित सरकार है। और जिन मुस्लिम शासकों को गद्दार कहते हुए जिनके बनाए ताजमहल को पर्यटन की पुस्तिकाओं पर से मिटाया जा रहा है, उन गद्दारों के बनाए लाल किले से प्रधानमंत्री आजादी की सालगिरह पर देश और दुनिया के नाम पैगाम देते हैं। फिर मुस्लिम गद्दारों के बाद अंग्रेज गद्दारों की बारी आएगी, जिनके राज में लोग ईसाई भी बने, और अंग्रेज राज ने हिन्दुस्तानियों का शोषण भी किया था। तो क्या संगीत सोम और योगी मिलकर पूरे देश से रेल की पटरियां उखाड़ फेंकेंगे? रेलवे स्टेशनों को गिरा देंगे? देश भर में ईसाई संस्थाओं द्वारा बनाई गई अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों को गिरा देंगे? संसद भवन और राष्ट्रपति भवन को गिरा देंगे? और क्या वह पूरे देश को अफगानिस्तान और सीरिया की तरह खंडहर बनाकर छोड़ेंगे?
दिक्कत यह है कि भाजपा की तरफ से ऐसे धर्मांध बयानों पर कोई रोक भी नहीं लगाई जाती है। ऐसे लोग समय-समय पर रामजादा-हरामजादा जैसे फतवे जारी करते हैं, कभी मुस्लिमों के हाथ काटकर फेंक देने के फतवे जारी करते हैं, और जाहिर है कि इसकी प्रतिक्रिया में देश की हवा और अधिक जहरीली होती है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को दीवाली गुजर जाने के बाद, पटाखों का मुद्दा निपट जाने के बाद, अब इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि देश की एकता के खिलाफ, देश की सद्भावना के खिलाफ नफरत फैलाने वाले लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कब तक मिले? एक धर्म के मुकाबले दूसरा धर्म अगर यही करता चलेगा, तो एक की आंख फोडऩे के मुकाबले दूसरों की आंख फोड़ते-फोड़ते यह देश ही अंधा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी इसलिए समझनी चाहिए क्योंकि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं। आज सोशल मीडिया में लोग अपने असली नाम और असली चेहरे वाले अकाउंट से भी दूसरों को बलात्कार और हत्या की धमकियां दे रहे हैं, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं। यह सिलसिला जारी रहने देना लोकतंत्र के खिलाफ है। और लोकतंत्र अकेली सरकार का मोहताज नहीं रहता। जब कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, जब विधायिका बाहुबल का शिकार रहती है, और वह बिना दांत और नाखून वाले जानवर सरीखी बेअसर हो जाती है, तब जनता न्यायपालिका की तरफ देखती है। न्यायपालिका को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, देश में नफरत और हिंसा को फैलाते हुए जब-जब कानून तोड़ा जाता है उसे तब-तब खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों में इतनी ताकत संविधानप्रदत्त है। फिलहाल संगीत सोम को नहले पर दहला मिल गया है, और जहां तक तर्क की बात है, संगीत सोम के कुतर्क की बोलती बंद हो चुकी है। बकवास कोई कभी तक भी जारी रख सकते हैं।

पेट्रोल और आग करीब आने से धर्म-आध्यात्म का ब्रम्हचारी साम्राज्य डांवाडोल हो रहा है...

संपादकीय
15 अक्टूबर 2017


मध्यप्रदेश में एक जैन मुनि को एक भक्त परिवार की युवती के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पैंतालीस बरस के जैन मुनि पर 19 बरस की युवती ने बलात्कार का आरोप लगाया था और उसके बाद मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद यह गिरफ्तारी हुई। अभी पिछले कुछ बरसों से देश लगातार आध्यात्मिक और धार्मिक नेताओं, संत-स्वामियों के बलात्कार के मामलों को देख रहा है। ऐसे में कुछ बुनियादी सवाल भी उठते हैं कि ऐसी नौबत क्यों आती है?
एक बात तो यह है कि बहुत से धर्मों में संत, मुनि, साध्वी, पोप, मौलवी जैसे ओहदों पर बैठे लोगों या उपाधियों से सजे हुए लोगों के साथ यह शर्त रहती है कि वे ब्रम्हचारी रहें। इंसान की देह का इतिहास धर्मों के इतिहास से लाखों, या शायद दसियों लाख साल पुराना है। इसलिए देह की जरूरतें धर्म से ऊपर रहती हैं। अब जो लोग धर्म या आध्यात्म के अनुशासन में जाते हैं, वे शुरुआत से ही अपने तन और मन के साथ एक संघर्ष करते हैं, और यह संघर्ष जिंदगी के आखिरी दिन तक चलता है। यह बात महज धर्म और आध्यात्म के लोगों के साथ नहीं है, महात्मा गांधी जैसे लोग भी ब्रम्हचर्य के प्रयोग करते रहे, और कई किस्म के अनैतिक तरीकों को इस्तेमाल करके भी उन्होंने अपने बदन पर काबू का इम्तिहान लेने का एक लंबा सिलसिला चलाया, और बाद में उस बारे में खुद ही लिखा भी। इसलिए चाहे किसी भी तरह के धार्मिक अनुशासन की वजह से लोगों को ब्रम्हचर्य के तहत रहना पड़ता है, उनके बारे में यह बात समझ लेना चाहिए कि वे आखिरी सांस तक के एक अंतहीन संघर्ष में पड़ते हैं, और यह संघर्ष कम कठिन नहीं होता। पौराणिक कहानियां पढऩे वालों को याद होगा कि किस तरह ऋषि विश्वामित्र की साधना को एक सुंदरी मेनका ने भंग कर दिया था।  पूरी दुनिया में ऐसे मामले हैं, और ईसाई चर्च के तो सैकड़ों-हजारों मामले बच्चों के साथ सेक्स के भी सामने आए हैं जिन्हें लेकर अदालती मुकदमे तक चले हैं। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त भी इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि इंडोनेशिया में एक ईसाई बिशप को एक महिला से अनैतिक रिश्ता रखने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा।
ऐसी नौबत में हमारा यह मानना है कि जब आसाराम पर एक नाबालिग लड़की से बलात्कार का मामला चल ही रहा है, राम-रहीम कई नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामले में सजा काट ही रहा है, तो बाकी धर्मों और सम्प्रदायों के भक्तों-अनुयायियों को चाहिए कि वे अपने परिवार सम्हाल कर रखें, और बलात्कार की ऐसी नौबत, ऐसे खतरे से उनको दूर रखें। दूसरी तरफ धर्म और सम्प्रदाय के जिम्मेदार लोगों को भी चाहिए कि वे अपने ब्रम्हचारी लोगों के लिए अनुशासन का कुछ ऐसा इंतजाम रखें कि वे ऐसी किसी नौबत में न फंसें। लोगों को वह पुरानी कहावत याद रखनी चाहिए कि आग और घी को साथ-साथ नहीं रखना चाहिए। आज के वक्त में कहा जा सकता है कि पेट्रोल के कनस्तर को आग के करीब रखना आगे-पीछे खतरे का सामान बनता ही है। इसलिए जिस किसी धर्म और सम्प्रदाय को ऐसी बदनामी से बचना है, उन्हें समय रहते अपने मुखिया या उनके नीचे के सेवकों को लेकर नियम-कायदे की एक परंपरा कायम करनी चाहिए। इसके बिना बड़ी संख्या में बलात्कार होते रहेंगे, और उनमें से कोई एक-दो भी पुलिस तक पहुंचकर पर्याप्त बदनामी दे देंगे।
हम यह नहीं मानते कि लोग धर्म और आध्यात्म को छोड़ ही देंगे। लोगों को अपने मन की कमजोरी की वजह से हमेशा ही ऐसे सहारे की जरूरत पड़ते रहेगी। लेकिन उनके ऐसे सहारे जेल में न रहें, इसके लिए उनको खुद को चौकन्ना रहना होगा। यह बात याद रखनी होगी कि एक किसी बलात्कारी बाबा या स्वामी, साधु या मुनि के चलते जब ऐसा कोई भांडाफोड़ होता है, तो उसके हजारों-लाखों अनुयायी और भक्त भी तरह-तरह का सामाजिक अपमान झेलते हैं, और उनके परिवार भी तरह-तरह से ताने झेलते हैं। इसलिए अपनी आस्था के उतने ही करीब जाना चाहिए जितने करीब जाने से तन और मन पर काबू टूटने न लगे। आज पूरे देश में आस्था के खिलाफ अनास्था का एक माहौल चल रहा है। इससे एक फायदा भी हो रहा है कि और लोग ऐसे खतरों में फंसने से बचेंगे, और बच रहे हैं। लेकिन यह जागरूकता बढऩी चाहिए, उसके बिना धर्म और आध्यात्म का साम्राज्य डांवाडोल है।

प्रणब-मनमोहन की दरियादिली, और देश की जहरीली हवा...

संपादकीय
14 अक्टूबर 2017


देश की आम हवा से परे कल दिल्ली में दरियादिली और बड़प्पन का एक ऐसा नजारा देखने मिला जिससे लगा कि हिन्दुस्तान अभी बाकी है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब, द कोलिशन इयर्स, का विमोचन होना था, और इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो थे ही। इस कार्यक्रम के पहले एक इंटरव्यू में प्रणब से पूछा गया कि जब सोनिया ने उनकी जगह मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया, तो उन्हें कैसा लगा? उन्होंने कहा कि वे जरा भी निराश नहीं हुए, क्योंकि उनकी अयोग्यता की सबसे बड़ी वजह यह भी थी कि वे अधिकतर वक्त राज्यसभा के सदस्य थे, महज 2004 में लोकसभा जीती थी। वे हिन्दी नहीं जानते थे, और ऐसे में बिना हिन्दी जाने किसी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए। इसके बाद कार्यक्रम में जब मनमोहन सिंह के भाषण का वक्त आया तो उन्होंने कहा- 'प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा एक बेहतर विकल्प थे जो कि अपनी मर्जी से राजनेता बने थे, लेकिन मेरा राजनेता बनना एक इत्तफाक था।Ó
एक ही पार्टी में देश की सबसे ताकतवर एक ही कुर्सी के लिए सबसे दिग्गज दो नामों के बीच ही जब घोषित या अघोषित, चाहा या अनचाहा, ऐसा मुकाबला हो, और उसके बाद भी दो लोग तंज और रंज के बिना एक-दूसरे के प्रति न सिर्फ मंच और माईक से, बल्कि बाकी वक्त भी इस तरह दरियादिली दिखा सकें, तो उससे भारतीय राजनीति की गंदी साफ होती है। हम किसी एक पार्टी के भीतर वैचारिक असहमति को गलत नहीं मानते, लेकिन आज बहुत सी पार्टियों में, पार्टियों के बीच भी, सरकारों के बीच, नेताओं के बीच, विचारधाराओं के बीच जिस बुरी हद तक कड़वाहट घुल चुकी है, बातचीत के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, वह लोकतंत्र के लिए एक डरावनी नौबत है। लोकतंत्र असहमतियों का सम्मान करने, उन्हें समझने, महत्व देने, और उनसे सीखने का नाम होता है। आज भारत का लोकतंत्र पार्टियों की खेमेबंदी में, विचारधाराओं के ध्रुवीकरण में, और साम्प्रदायिक आधार पर इस तरह खंडित-विखंडित हो गया है कि लोकतंत्र में महज चुनावी जीत ही मानो सबकुछ रह गई है। यह देश और यह लोकतंत्र अब पूरी तरह से, और बुरी तरह से चुनाव केन्द्रित कर दिया गया है, और वह चुनाव भी धार्मिक ध्रुवीकरण के बहुमत पर।
आज यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि देश की जनता लोकतंत्र की परिभाषा को समझ पा रही है, या कि वह महज चुनावी बहुमत को लोकतंत्र मान रही है? विविधताओं से भरे हुए इस देश में एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे तबके के लिए, एक-दूसरे की विचारधारा के लिए जो परस्पर सम्मान होना चाहिए, उसकी एक मिसाल प्रणब-मनमोहन में देखने मिली, और उसी वजह से देश का बाकी माहौल कुछ अधिक खटकने भी लगा, और उस पर लिखने की जरूरत महसूस हो रही है। असहमति का असम्मान करके, अप्रिय लगती आवाजों को अनसुना करके अगर ध्रुवीकरण से चुनावी जीत हासिल की जाती है, तो वह लोकतंत्र की जीत नहीं हो सकती। जिस पार्टी के पास लोकतंत्र का सम्मान करते हुए भी बहुमत हासिल करने की संभावना हो उसका तंगदिल हो जाना खुद उसकी शिकस्त है। दुनिया के इतिहास में लोगों का मूल्यांकन चुनाव आयोग के नतीजों के अंकगणितीय विश्लेषण तक सीमित नहीं रहता है। ये आंकड़े ताक पर धरे रह जाते हैं, चुनावी नतीजे महज थोड़ी सी जगह पाते हैं, और लोकतंत्र की कसौटी पर जीत या हार को इतिहास विस्तार से दर्ज करता है। अगर प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन-मंत्रिमंडल के मंत्री रहते हुए अपना वक्त सत्ता पलटने की साजिश में लगाया होता, तो आज इतिहास में उनका सम्मान नहीं होता। दूसरी तरफ अगर मनमोहन सिंह ने तीन चौथाई से अधिक मंत्री-समूहों का मुखिया प्रणब को न बनाया होता, तो मनमोहन भी तंगदिली की तोहमत झेलते। यह उदारता लोकतंत्र में पार्टियों के बीच भी कायम रहना चाहिए। एक-दूसरे का ओछा और अंधा विरोध लोकतांत्रिक नहीं होता। भारत की राजनीतिक हवा में इतना जहर घुल गया है, और वह लगातार बढ़ाया भी जा रहा है, इस हद तक कि वह दिल्ली के पटाखों के प्रदूषण को मात कर रहा है। दिक्कत यह है कि इस पर रोक कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं लगा सकता, महज जनता लगा सकती है। और जनता के बीच चुनाव और लोकतंत्र में फर्क की जागरूकता लानी होगी। वरना यह बात तो दुनिया में समझदार लोग बहुत पहले से कह गए हैं कि लोकतंत्र में लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार पाने के हकदार वे होते हैं।

बेटी की हत्या की तोहमत से बरसों बाद आजाद मां-बाप

संपादकीय
13 अक्टूबर 2017


(मई 2012 में इसी जगह हमने आरूषि हत्याकांड के तमाम पहलुओं को लेकर जो लिखा था, आज उसे फिर से प्रकाशित कर रहे हैं, सिर्फ इसका शीर्षक नया है-संपादक)
आज से अदालत में फिर आरूषि हत्याकांड की सुनवाई तेजी से आगे बढऩे वाली है। यह मामला दिल्ली का होने की वजह से खबरों में जरूरत से हजार गुना अधिक रहा और पूरे देश में इस पर चर्चा भी जरूरत से हजार गुना रही। नतीजा यह हुआ कि अखबारों में और टेलीविजन पर इस हत्याकांड में मां-बाप की गिरफ्तारी और उन पर सीबीआई का चलाया जा रहा मुकदमा खबरों में इस कदर रहा कि देश भर में बच्चों से लेकर बड़ों तक को मानसिक तनाव झेलना पड़ा। अभी भी बहुत से बच्चे इस तनाव में जीते हैं कि उनके मां-बाप भी उन्हें मार सकते हैं। भारत में चूंकि बच्चों के मानसिक तनाव को लेकर किसी किस्म की चर्चा या सलाह-मशविरे का रिवाज नहीं है इसलिए कोई यह अंदाज लगाने वाले नहीं हैं कि दो कत्लों की यह खबर देश में कितना सामाजिक तनाव खड़ा कर गई है और बच्चों के दिल-दिमाग पर इन खबरों का कितना बुरा असर पड़ा है। इस बात पर आज यहां लिखना इसलिए भी ठीक और जरूरी लग रहा है क्योंकि सीबीआई ने इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ हासिल बताया है उसमें इस बच्ची के कत्ल के लिए मां-बाप के खिलाफ और कोई सुबूत नहीं दिखे हैं, केवल यही सुबूत दिखा है कि किसी और के खिलाफ कोई सुबूत नहीं हैं। पहली नजर में अभी तक कि सीबीआई की कही बातें ये हैं कि चूंकि और कोई कत्ल करने की हालत में नहीं था, किसी और की लाशों तक पहुंच नहीं थी, इसलिए मां-बाप ने ही यह किया होगा। हम अभी इस केस पर अधिक जाना नहीं चाहते क्योंकि वह तो अदालत में तय होगा, लेकिन एक बात पर बहुत तकलीफ के साथ लगती है कि हत्या के चार बरस बाद भी आज हर कुछ दिनों में मां-बाप अदालत में घसीटे जाते हैं, मीडिया के कैमरे उनको हर बार बाकी देश के सामने पेश कर देते हैं, और चार बरसों के लंबे अरसे के बाद भी अभी यह तय नहीं है कि केस मां-बाप के खिलाफ कितना वजनदार है।
अब हम सिर्फ बहस के लिए एक ऐसी नौबत सोचते हैं जिसमें कि इस बच्ची के मां-बाप अदालत से बरी हो जाते हैं। आगे चलकर अगर ऐसा होता है, तो इन बीते चार बरसों में, या इनकी गिरफ्तारी के बाद के ढाई-तीन बरस में इनकी जो प्रताडऩा हुई है, उसकी भरपाई कैसे होगी? जब भारतीय न्याय-व्यवस्था की भावना यह है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए, तो ऐसे में कत्ल की शिकार लड़की के मां-बाप की बरसों तक चली जांच और बरसों तक चली प्रताडऩा हमें एक बड़ी बेइंसाफी लगती है। मां-बाप पर शक करने की अगर कोई वजह है तो भी या तो यह जांच कुछ जल्दी होनी चाहिए थी, या फिर मां-बाप को इतने लंबे समय तक मुकदमे की सुनवाई के पहले जांच और अदालत की प्रताडऩा से दूर रखना चाहिए था। हो सकता है कि ऐसी नौबत देश में बहुत से दूसरे लोगों के सामने भी आती हो, लेकिन उन सबके बारे में भी हमारा यही मानना है कि जुर्म साबित होने के पहले की प्रताडऩा, सामाजिक सजा की लंबाई कम होनी चाहिए। क्योंकि आज जिस रफ्तार से यह प्रताडऩा और सजा इस बच्ची के मां-बाप पा रहे हैं, वह न्याय की भावना के हिसाब से बहुत ही नाजायज है। किसी भी मां-बाप को इतनी लंबी प्रताडऩा से नहीं गुजारना चाहिए। यह कहते हुए हम यह भी जानते हैं कि इसी देश में तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं मां-बाप अपने बच्चों का कत्ल करवाते पकड़ा रहे हैं, और बहुत से मामले सही भी साबित हो रहे हैं। लेकिन ऐसे तमाम मामलों में जांच के दौरान की बरसों की जेल ठीक नहीं है। जांच एजेंसियों के सुबूत और गवाह तेजी से जुटाकर उनकी हिफाजत का इंतजाम कर लेना चाहिए और फिर संदिग्ध रिश्तेदारों को जमानत मिलने देना चाहिए जो कि उनका हक भी है।
यह मौका मीडिया के लिए यह सोचने का भी है कि दिल्ली में टीवी चैनलों के कैमरों की अंधाधुंध मौजूदगी की वजह से क्या इतना बड़ा कवरेज ठीक है जिससे कि बाकी देश पर एक बुरा असर पड़े? एक वक्त भारत में अपराध की कहानियों वाली कुछ पत्र-पत्रिकाएं देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिकाओं से भी अधिक बिकती थीं। आज टीवी के समाचार चैनल या तो पुलिस के हुलिए में, या किसी अपराधी के हुलिए में अपने स्टूडियो से अपराध की घटनाओं को उसी तरह पेश करने लगे हैं। ऐसे बुलेटिनों से परे भी जब मुख्य समाचार बुलेटिन हत्या के शक में गिरफ्तार मां-बाप को जरा-जरा सी अदालती घट-जोड़ के लिए दिखाते चलते हैं तो यह भी एक भयानक नौबत है। इस पर सभी तबकों को सोचना चाहिए।

पुराने सामानों का दान तो अच्छा है लेकिन किफायत से जीना और अच्छा

संपादकीय
12 अक्टूबर 2017


दीवाली का मौका घर, दुकान, या दफ्तर की सफाई का भी रहता है, और जो लोग बहुत तंगदिल नहीं रहते, वे ऐसे मौके पर अपना कुछ फालतू का सामान आसपास के जरूरतमंद लोगों को बांट भी देते हैं। लोगों की यह दरियादिली उनके करीब काम करने वाले लोगों की मदद तो हो जाती है, लेकिन वह सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंच जाए, ऐसा नहीं हो पाता है। ऐसा करने के कुछ अलग-अलग तरीके हैं जो कम या अधिक हद तक कारगर हैं। इनमें से एक तरीका दुनिया के कई देशों में नेकी की दीवार के नाम से चल निकला है, और शहर में लोग अपने गैरजरूरी कपड़े ले जाकर उस दीवार पर टांगने लगते हैं, और जरूरतमंद लोग वहां से ले जाने लगते हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सारे लोग सामाजिक सरोकार की जिम्मेदारी को समझ सकें, और जरूरत रहने पर ही कपड़ों को वहां से ले जाएं। यह निगरानी मुमकिन भी नहीं है, और इसके बिना भी शायद कुछ लोगों को तो कपड़े या दूसरे सामान यहां से मिल जाते हैं।
अभी कुछ दिन पहले अमिताभ बच्चन के शो, केबीसी पर एक ऐसे समाजसेवी को बुलाकर उससे लंबी चर्चा की गई थी जो कि देश भर में इस तरह का काम अधिक संगठित और व्यवस्थित रूप से कर रहा है। लेकिन इसके लिए किसी परमाणु तकनीक की जरूरत नहीं है, और लोग अपने-अपने स्तर पर, अपने-अपने शहर में भी ऐसा कर सकते हैं। कपड़े और दूसरे सामान इकट्ठा किए जा सकते हैं, उनमें कोई मामूली काम हो तो वह किया जा सकता है, और जरूरतमंद लोगों तक उसे पहुंचाने का भी कोई एक रास्ता निकाला जा सकता है। लेकिन इसी मुद्दे पर कल सोशल मीडिया में अमरीका में बसे एक भारतवंशी ने दो बातें लिखी हैं। उन्होंने लिखा कि पुराने कपड़ों को दान देना अधिक खतरनाक हो सकता है, क्योंकि ऐसे में लोग अपनी जरूरत से बहुत अधिक कपड़े खरीदते जा सकते हैं, और उन्हें इस्तेमाल करने के बाद दूसरों को दे सकते हैं, और आत्मसंतुष्टि भी पा सकते हैं। इसके बजाय धरती के लिए बेहतर यह होगा कि लोग खुद ही कम कपड़े खरीदें, उनका अधिक से अधिक इस्तेमाल करें, और धरती पर सामानों का बोझ न बढ़ाएं।
यह बात एक नया नजरिया पेश करती है कि अपने गैरजरूरी सामान दूसरों को देना तो अच्छा है, लेकिन अपने इस्तेमाल के जरूरी सामानों के बाद और अधिक सामानों को लेना, धरती और पर्यावरण को बड़ा नुकसान पहुंचाना होता है। इसलिए लोगों के मन में दान देने की संतुष्टि अपने सामानों को बढ़ाते जाने के बाद उन्हें लोगों में बांटने से आना काफी नहीं है। अपने इस्तेमाल में किफायत बरतने के बाद दूसरों की मदद सीधे करना, उन गरीबों के भी अधिक काम का होगा, और धरती को भी उससे नुकसान घटेगा। और ऐसा भी नहीं है कि संपन्न लोगों में कुछ लोग ऐसी सोच के नहीं रहते हैं। कई बरस पहले गोदरेज कंपनी के मालिकान में से एक छत्तीसगढ़ आए थे, और वे फटे-पुराने सरीखे कपड़े पहने हुए थे, और वे साल भर अलग-अलग शहरों में जाकर वहां के समाज सेवा के अच्छे काम करने वाले संगठनों को दान देने का ही काम करते थे। भारत की दो-तीन सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों को बनाने वाले अजीम प्रेमजी या नारायण मूर्ति जैसे लोग विमान में साधारण दर्जे में सफर करते हैं, और गिने-चुने सामान का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के बहुत से ऐसे खरबपति हैं जिन्होंने पिछले कई दशक महज दो जोड़ी जूतों में निकाल दिए हैं। दो सबसे बड़ी कम्प्यूटर कंपनियों के मालिकों को देखें, तो एप्पल बनाने वाले, अब गुजर चुके, स्टीव जॉब्स और आज फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग एक ही रंग की टी-शर्ट, और एक ही तरह की जींस में अपने सबसे बड़े समारोहों में मंच पर दिखते आए हैं। इनके पास और किस्म के कपड़े भी बहुत सीमित हैं या थे।
अपने अतिरिक्त सामानों को दूसरों को बांट देने की तसल्ली तो ठीक है, लेकिन अपनी जरूरतों को किफायत के साथ इस्तेमाल करना अधिक समझदारी है, और धरती का सम्मान करना भी है। अभी दुनिया में कई लोग ऐसे प्रयोग भी कर रहे हैं कि छह महीने या साल भर का वक्त वे कुल पचास सामानों के साथ गुजार रहे हैं, और एक भी दूसरा सामान इस्तेमाल नहीं करते। भारत में तो जैन धर्म से लेकर गांधी तक बहुत किस्म की सोच किफायत की जिंदगी सुझाती है, और लोगों को इस बारे में सोचना भी चाहिए। फिलहाल लोग जो सामान ले चुके हैं, और इस्तेमाल करके थक गए हैं, उनको दीवाली के मौके पर अपनी छाती से बोझ कम करना चाहिए। 

सुषमा-निर्मला की इंसानियत फौज से अधिक ताकतवर...

संपादकीय
11 अक्टूबर 2017


भारत की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पहली बार भारत-चीन सरहद पर पहुंचीं, तो चीनी हिस्से में वहां के सैनिक भी खड़े हुए थे। सिक्किम में वे भारतीय सैनिकों से मिलने गई थीं, लेकिन नाथू ला चौकी पर अपने इलाके में उत्सुकता के साथ खड़े हुए चीनी फौजी अफसरों से भी उन्होंने बात की। उन्हें नमस्ते किया, और नमस्ते का मतलब समझाया, नफरत और तनाव से दूर विनम्रता और मित्रता की जुबान में अनौपचारिक चर्चा की, और फिर इसका वीडियो खुद रक्षा मंत्रालय ने जारी किया। एक जरा सी दरियादिली और इंसानियत ने सरहद के दोनों तरफ लोगों का दिल जीत लिया, और भारत के साथ-साथ चीन के मीडिया ने भी निर्मला सीतारमण की बड़ी तारीफ की।
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन दिन पहले ही हमने इसी जगह भारत के वायुसेना अध्यक्ष के उस भड़काऊ बयान के खिलाफ लिखा था जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों पर हमला करने की भारतीय वायुसेना की क्षमता का जिक्र किया था। पड़ोस के देशों से संबंध अच्छे और बुरे रखने में कुछ बुनियादी फर्क रहते हैं। रिश्ते अच्छे हों तो फौजी तैयारियों पर खर्च घटता है, और रिश्ते खराब हों, तो गरीबों के मुंह का निवाला छीनकर हथियारों के कारखानों को दौलतमंद बनाया जाता है, सरहद के गांव तनाव में जीते हैं, लोग अपनी जिंदगी खोते हैं, और देश का ध्यान अपने असल और बुनियादी मुद्दों को छोड़कर जंग की सनक पर खर्च होता है। भारत के दो तरफ चीन और पाकिस्तान ऐसे देश हैं जिनके साथ पहले जंग हो चुकी है, और आज इन तीनों देशों की जंग की तैयारियों में कम से कम भारत और पाकिस्तान तो ध्यान में रहते ही हैं, पाकिस्तान की चीन के खिलाफ, और चीन की पाकिस्तान के खिलाफ कोई तैयारी नहीं रहती।
फौजी अफसर चाहे जिस देश में हो, उनको जंग का रास्ता इसलिए सुहाता है कि उन्हें अपने बची हुई नौकरी में जंग का एक तमगा मिलने की हसरत रहती है। लेकिन दूसरी तरफ हम देखें कि भारत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आए दिन यह ट्वीट करती हैं कि पाकिस्तान के किस परिवार को भारत में जीवनरक्षक ऑपरेशन के लिए वीजा दिया गया, और ऐसे परिवार इलाज के पहले या इलाज के बाद उनसे मिलकर शुक्रगुजार भी होते हैं। अब निर्मला सीतारमण ने भी वैसी ही इंसानियत वाली यह बहुत छोटी सी पहल की है, और देशों के बीच बंद कमरों की बड़ी-बड़ी बातचीत के मुकाबले इस छोटी सी बात ने सबको जीत लिया। इसलिए फौजी तैयारियां धरी रह जाती हैं, पेशेवर डिप्लोमेसी धरी रह जाती है, और आखिर में इंसानियत ही असरदार होती है। हम ऐसी छोटी-छोटी दोस्ताना बातों की अहमियत इसलिए बहुत मानते हैं कि इनके बढऩे से देशों के बड़े-बड़े खर्च घटते चलेंगे, और उसी की जरूरत भी है।
यह बात हर किसी को समझना चाहिए कि दुनिया भर में हथियारबंद आंदोलनों से लेकर देशों के बीच जंग तक को भड़काने में सबसे बड़ी दिलचस्पी हथियारों के कारखानेदारों की होती है। वे एक तरफ बागियों को हथियार बेचते हैं, और दूसरी तरफ उन देशों की सरकारों को। इसके साथ-साथ देशों की सरहद पर किसी तनाव के होने पर ये कारखानेदार दोनों ही देशों को हथियार खरीदने की तरफ धकेलते हैं, और खुद मोटा मुनाफा कमाकर उन देशों को कंगाल बनाते हैं। भारत, पाकिस्तान, और चीन को समझदारी दिखाते हुए सरहद के तनाव को घटाना चाहिए, आपस में दोस्ताना रिश्तों को बढ़ाना चाहिए, और जंग की हसरत पालने वाले अफसरों को काबू में रखना चाहिए। हम कई बार इस बात को लिखते हैं कि जंग की बातें उनको अधिक सूझती हैं, जो सरहदों से दूर राजधानियों में बसते हैं, और वहां बैठकर फैसले लेते हैं। यह बात भी समझनी चाहिए कि जंग का फैसला लेने वाले कभी भी सरहद पर नहीं मारे जाते, कभी भी किसी जंग में भी नहीं मारे जाते हैं, जंग में शतरंज की बिसात सरीखे छोटे प्यादे ही मारे जाते हैं, वजीर तो राजधानियों में बैठे हुए हथियार खरीदी में कमीशन खाते रहते हैं। हर देश में वहां की जनता को ही पड़ोसी देशों की जनता के साथ दोस्ताना रिश्ते इतने बढ़ाने चाहिए कि सरकारों को अपनी जनता को अनदेखा करना मुमकिन न रह जाए। हम सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण के ऐसे सकारात्मक कदमों का स्वागत करते हैं, और जनता को भी खुले दिल से, राजनीति को अलग रखकर अमन की तरफ बढ़ाए जाते ऐसे कदम की तारीफ करनी चाहिए ताकि ऐसे नेताओं का हौसला बढ़ सके।

बड़ी-बड़ी कामयाबियों के बीच छोटी-छोटी दिक्कतों का अंबार

संपादकीय
10 अक्टूबर 2017


छत्तीसगढ़ में सरकार एक-एक फैसले पर हजार-हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है, और कहीं किसानों को धान-बोनस दिया जा रहा है, तो कहीं गरीबों को स्मार्ट फोन देने के लिए हजार करोड़ से अधिक इस बरस के बजट में रखा गया है। यहां के शहरों को देखें तो उन पर बड़ी रकम खर्च हो रही है, और लोग अगर दस बरस बाद राजधानी रायपुर आ रहे हैं तो वे इसकी शक्ल को पहचान नहीं पा रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक भी दिन का अखबार ऐसा नहीं होता जिसमें कहीं न कहीं बीमार को या लाश को खाट पर, कुर्सी पर, या ठेले पर लेकर जाते हुए लोग न दिखते हों। और अगर ऐसी एक तस्वीर सामने आती है, तो शायद उसके पीछे दर्जन भर ऐसे मामले और रहते होंगे जिनके आसपास कोई कैमरा न रहता हो। कमोबेश यही हाल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों का है, और उन सरकारी दफ्तरों का है जहां पर गरीबों का काम अधिक पड़ता है। ऐसी जगहों पर जब लोगों के काम नहीं होते हैं, तो उसी का नतीजा होता है कि लोग मुख्यमंत्री के जनदर्शन में पहुंचते हैं, और उनसे नीचे अब कलेक्टरों के जनदर्शन में भी सैकड़ों लोग पहुंचने लगे हैं।
एक तरफ तो मुख्यमंत्री या कलेक्टर अपने ऐसे जनदर्शन की भीड़ को, उसमें आने वाली समस्याओं के समाधान को एक बड़ी कामयाबी मान सकते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ यह भीड़ सबसे पहले तो इस बात का सुबूत है कि सरकार की नियमित व्यवस्था काम नहीं कर रही है, और इसीलिए लोग पूरे प्रदेश से चलकर मुख्यमंत्री निवास पहुंचते हैं, या कि पूरे जिले से चलकर कलेक्टर से मिलने आते हैं। यहां पहुंचे हुए लोगों की भीड़ उन निराश लोगों में से एक फीसदी से अधिक नहीं हो सकती जो कि सरकारी दफ्तरों के, अस्पतालों के, चक्कर काट काटकर थक चुके हैं। इसके साथ-साथ अगर पुलिस के पास पहुंचने वाली शिकायतों को देखें, तो उनमें से हर दिन कोई न कोई एक ऐसी आत्महत्या, या आत्महत्या की कोशिश की खबर आती है जिसमें कहीं कोई लड़की छेडख़ानी की शिकार है, और उसकी शिकायत पर गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। बहुत सी शिकायतें ऐसी भी रहती हैं जिसमें कोई लड़की या महिला बलात्कार की शिकायत के बाद पुलिस कार्रवाई का इंतजार करते-करते मरने की धमकी-चेतावनी देती है, तब जाकर कोई कार्रवाई होती है। हर हफ्ते शायद ऐसी खबर आती है कि सरकार की कार्रवाई के इंतजार में थक चुके आम नागरिक या सरकारी कर्मचारी ने इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी है।
हम दो बातों को जोड़कर एक साथ आज यहां इसलिए लिख रहे हैं कि एक तरफ तो सरकार जनसुविधाओं पर बहुत बड़ा खर्च कर रही है, और जनकल्याण के लिए लोगों को सीधे फायदा भी दे रही है। और दूसरी तरफ सरकरार के इस विशाल ढांचे, और विशाल खर्च के बावजूद सबसे कमजोर तबके के लोग किसी कार्रवाई या किसी इंसाफ के लिए भटकते रहते हैं। इससे एक बात खुलकर दिखती है कि सरकार का अपना ढांचा जवाबदेही से परे है, सरकार में काम करते लोग संवेदनाशून्य से हैं। और दिक्कत यह है कि बड़ी-बड़ी कामयाबी की खबरों के बीच बहुत छोटी-छोटी, लेकिन बहुत बड़ी संख्या में नाकामयाबी की खबरें दब जाती हैं। सत्ता पर बैठे हुए लोग एक किस्म से आत्मसंतुष्ट भी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कितना कुछ किया है, और इस करने के मुकाबले न की गई, या कि न की जा सकीं चीजें कितनी छोटी-छोटी हैं। ये चीजें छोटी जरूर हैं, लेकिन संख्या में बहुत बड़ी हैं।
हमारा यह भी मानना है कि सरकारी कामकाज में बेहतरी को लेकर कई बार इस्तेमाल होने वाला शब्द, प्रशासनिक-सुधार, यह एक कारगर शब्द तो हो सकता है, अगर इसे अच्छी नीयत और पक्के इरादे के साथ लागू किया जाए। लेकिन अभी तक का हमारा अनुभव यह है कि राज्य में मुख्य सचिव रह चुके लोगों को प्रशासनिक सुधार का काम दिया जाता है, और अगर उनमें प्रशासनिक सुधार की क्षमता होती, तो राज्य के प्रशासनिक मुखिया रहते हुए इसे करने का पूरा मौका उनके पास था, और वे उसे नहीं कर पाए, या कि वह करना उनकी क्षमता और दिलचस्पी से परे का था। ऐसे चुक चुके लोगों को ऐसी जिम्मेदारी देने का मतलब उनके लिए किसी पुनर्वास का इंतजाम तो हो सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह के प्रशासनिक सुधार की संभावनाओं को खत्म कर देता है। सरकार को अगर सचमुच ही प्रशासनिक सुधार करना है तो उसे सरकार के बाहर के लोगों से राय मांगनी होगी, और जब तकलीफ पाकर भुक्तभोगी बने हुए लोग कोई सुझाव देंगे, तो उसे सुनने, उनमें से सही सुझावों को मानने, और उन पर ताकत से अमल करवाने से ही कुछ अच्छा हो सकता है। सरकार का विशाल ढांचा, विशाल बजट, उसकी बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं ये अगर जनता की बहुत ही नियमित, बहुत ही उजागर, छोटी-छोटी दिक्कतों को दूर करने के बारे में कुछ नहीं कर पाते, तो यह जनता को निराश करने वाली नौबत ही रहती है। 

नाम में क्या रखा है ! ?

9 अक्टूबर  2017

कुछ लोगों के लिए नाम में इतना कुछ रखा होता है कि बड़े-बड़े पंडित-पुरोहित नाम के पहले अक्षर तय करते हैं, और फिर साहित्य या संस्कृति के जानकार लोगों से पूछा जाता है कि इस अक्षर से शुरू होने वाला कोई अच्छा नाम बताएं। एक अखबारनवीस होने की वजह से मुझसे भी कई बार यह पूछा जाता है कि इस तरह के मतलब वाला और इस अक्षर से शुरू होने वाला कोई अच्छा सा नाम सुझाऊं, लेकिन मैं इसमें नाकामयाब हो जाता हूं क्योंकि साहित्यिक या पौराणिक जड़ों वाला कोई नाम मुझे सूझ नहीं पाता। लोगों के जब अच्छे-भले नाम रख दिए जाते हैं, तो फिर उन्हें कोई अंक ज्योतिषी आकर ऐसे हिज्जे सुझाने लगते हैं जिससे नाम के कुल अंक बदलकर कुछ और हो जाएं। ऐसा करके भी बहुत से लोगों को राहत मिलती है कि अब उनका भाग्योदय हो जाएगा। पता नहीं इससे किस्मत चमकती है या नहीं, लेकिन नाम में क्या रक्खा है?
अब अगर आज दुनिया के कुछ सबसे कामयाब नामों को देखें, तो इंटरनेट की शुरुआत में ही एक बड़ी कामयाब कंपनी रही, याहू। अब याहू शब्द शायद जंगल में टार्जन नाम के एक किरदार की लगाई गई आवाज से शुरू हुआ होगा, हालांकि अंग्रेजी भाषा का इतिहास बताता है कि गुलीवर की कहानियों में जिन यात्राओं का जिक्र है उनमें एक नस्ल या जाति का नाम अठारहवीं सदी में, 1726 में, याहू लिखा गया था। अब जो भी हो एक इंटरनेट कंपनी ने अपना नाम याहू रखा, तो यह नाम ऐसा चल निकला कि खासे अरसे तक यह कंपनी इंटरनेट की सबसे कामयाब कंपनी रही, जब तक कि बाजार के गलाकाट मुकाबले में गूगल जैसी दूसरी कंपनी ने उसे पीछे न छोड़ दिया, और धीरे-धीरे बाजार के बाहर न कर दिया।
भारत के एक रेलवे स्टेशन का नाम 28 अक्षरों का है.
 अब हम गूगल की ही देख लें, तो इस शब्द का कोई मतलब तो था नहीं, और जब इस कंपनी ने अपना यह नाम रखा, तो उसके पहले शायद किसी ने यह शब्द सुना नहीं था। लेकिन आज गूगल नाम से बढ़कर एक शब्द बन गया है जो कि किसी भी चीज की तलाश के लिए इस्तेमाल होने लगा है। आज लोग बातचीत में यह नहीं कहते कि इंटरनेट पर ढूंढो, लोग यह कहते हैं कि गूगल कर लो। एक नाम ब्रांड नाम से एक जेनेरिक नाम हो गया। ठीक उसी तरह जिस तरह कि हिन्दुस्तान में एक समय घर के किसी बच्चे का नाम टुल्लू होता था, और बाद में एक कंपनी ने अपने एक छोटे वॉटर-पंप का नाम टुल्लू रख दिया। बाद में यह ब्रांड नाम इस तरह चल निकला, और घरेलू इस्तेमाल में इस ब्रांड नाम का ऐसा एकाधिकार कायम हो गया कि अब म्युनिसिपलें नल में पंप लगाकर पानी खींचने के खिलाफ जो कानूनी नोटिस जारी करती हैं, उस नोटिस में पंप की जगह टुल्लू पंप लिखा जाता है, मानो कि दूसरी कंपनी के पंप लगाकर पानी चोरी करना कानूनी है।
भारत के एक रेलवे स्टेशन का नाम 2 अक्षरों का है।
अब एप्पल जैसा साधारण शब्द, जो अंग्रेजी में सेब के लिए है, उस नाम से आज दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर-सामान बनाने वाली कंपनी खड़ी हो गई है। और मजे की बात यह है कि इस कंपनी के मार्के में सेब पूरा भी नहीं दिखता है, और उसका एक हिस्सा खाया हुआ दिखता है, फिर भी यह जूठा सेब आज दुनिया का सबसे कामयाब और सबसे प्रतिष्ठित मार्का हो गया है, इसके मुकाबले कोई दूसरा ब्रांड आज दुनिया में नहीं है। अब भला किसी कम्प्यूटर कंपनी के नाम का एक सेब से, और वह भी एक जूठे सेब से क्या लेना-देना हो सकता था? लेकिन नाम चल निकला तो चल निकला।
आज हिन्दुस्तान की सड़कों के किनारे देखें, तो जो दो ब्रांड सबसे अधिक चमकते दिखते हैं, वे ओप्पो और विवो हैं। इन दोनों नामों का हिन्दुस्तान में न तो कोई मतलब है, और न ही कभी उनका चलन रहा, लेकिन रातों-रात ये नाम ऐसे चल निकले कि अब खबरें आती हैं कि कुछ लोग अपने बच्चों का नाम इन मोबाइल फोन ब्रांड पर रखने लगे हैं। इसलिए नामों का महत्व कहीं होता भी होगा, और बहुत से मामलों में नामों का कोई महत्व नहीं रह जाता।
अब ब्रांड और कंपनी से हटकर अगर इंसानों को देखें तो गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे के तो नाम में ही राम था। उसके नाम के बीचों-बीच राम बसे थे। लेकिन उसका काम राम सरीखे गांधी की हत्या करना था। अभी कुछ समय पहले हमने एक खबर छापी थी कि सामूहिक बलात्कार के एक मामले में पकड़ाए गए कई लोगों के नामों को देखें, तो उसमें यह बलात्कारी गिरोह सर्वधर्म का लगता था, उसमें हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी नामों के लोग थे, और आधा दर्जन लोग ऐसे थे जिनके नाम ईश्वर के नाम पर रखे गए थे। अब उनके नाम का उन पर क्या असर हुआ?
ऐसा भी नहीं कि नाम की कोई अहमियत नहीं होती। आज हिन्दुस्तान के किसी गांव में पैदा, गांव में पले-बढ़े हुए लोग भी पूरी दुनिया के किसी भी देश में पहुंच जाते हैं। और ऐसे में उनके नाम, उनके पारिवारिक नाम, इन सबका उन देशों की भाषाओं में क्या मतलब होता है, उन भाषाओं में इन नामों के क्या हिज्जे होते हैं, कैसा उच्चारण होता है इसको समझ लेना भी जरूरी है। यहां प्रचलित एक नाम ऐसा है जिसके अंग्रेजी हिज्जे, और अंग्रेजी उच्चारण इन दोनों का मतलब महिला के शरीर का एक हिस्सा होता है, और मैं यह कल्पना भी नहीं कर पाता हूं कि ऐसे नाम वाली कोई भारतीय लड़की किसी अंग्रेजी देश में जाकर वहां किस तरह की शर्मिंदगी और परेशानी झेलेगी। इसलिए आज लोगों को अपने बच्चों के नाम रखते हुए कम से कम अंग्रेजी दुनिया में तो उसके हिज्जे और उच्चारण के बारे में सोच ही लेना चाहिए।
भारत में बहुत से लोग अपने बच्चों के नाम साहित्य, संस्कृति, पुराण, इस तरह की कई बातों के चक्कर में ऐसा रख देते हैं कि उन बच्चों की जिंदगी न सिर्फ अंग्रेजी वालों को अपने नाम के हिज्जे बताने में गुजर जाती है, बल्कि हिन्दी वालों को भी अपने सही हिज्जे बताते हुए वे थक जाते हैं। ऐसे क्लिष्ट और ऐसे गरिष्ठ नाम अपने बच्चों को देना उनके सिर पर बाकी पूरी जिंदगी के लिए एक टोकरे के वजन भर देने सरीखे होता है। इसलिए नाम रखते हुए देस-परदेस में उसके मतलब, उसके हिज्जे, उसके उच्चारण के बारे में सोच लेना चाहिए या फिर इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि अपने राजा बेटे प्रद्युम्न का नाम अमरीका पहुंचते ही पैडी हो जाएगा, यानी धन उसके पास बाद में आएगा, वह धान (पैडी) पहले हो जाएगा।
इसलिए कंपनियों के नाम बताते हैं कि नाम में कुछ नहीं रखा है, कामयाबी ही सब कुछ है, दूसरी तरफ इंसानों के नाम बताते हैं कि उनके नाम में ईश्वर बसे हों, तो भी वे दुनिया के इतिहास के सबसे बुरे हत्यारे और सबसे बुरे बलात्कारी हो सकते हैं। इसलिए आज के इस कॉलम की हैडिंग में प्रश्नवाचक चिन्ह भी है, और विस्मयबोधक चिन्ह भी है, आप अपने हिसाब से मतलब निकालते रहिए।