माणिक सरकार को अब त्रिपुरा के बाहर बाकी दुनिया ने भी पढ़ा

संपादकीय
16 अगस्त 2017


अबकी बार स्वतंत्रता दिवस की सालगिरह पर भारत में पहली बार एक बात हुई जो कि शायद इसके पहले कभी नहीं हुई थी। त्रिपुरा के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री माणिक सरकार का भाषण दूरदर्शन ने रिकॉर्ड करने और प्रसारित करने से मना कर दिया, और मुख्यमंत्री को बता दिया गया कि उन्होंने जो बातें लिखी हैं उनके साथ उसे प्रसारित नहीं किया जा सकता। दूरदर्शन को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार की स्वायत्तशासी संस्था प्रसार भारती की तरफ से मुख्यमंत्री को बताया गया कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों के भावनाओं के अनुरूप बनाएं। माणिक सरकार ने अपने भाषण में कोई फेरबदल करने से मना कर दिया। अब उनकी पार्टी ने वह भाषण सार्वजनिक किया है, और उसके मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए।
त्रिपुरा के एक दुर्लभ साख वाले, बहुत ही किफायत और सादगी से चलने वाले, ईमानदारी के लिए मशहूर मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने अपने भाषण में आज देश में फैलाई जा रही साम्प्रदायिकता, और गाय के नाम पर अल्पसंख्यकों और दलितों पर किए जा रहे हमलों की चर्चा की है। उन्होंने अनेकता में एकता वाली भारत की संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा कि आज कुछ ताकतें देश को तोडऩे की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने बिना किसी पार्टी या संगठन का नाम लिए हुए यह लिखा जो लोग आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे, बल्कि अंग्रेजों के साथ मिलकर जिन्होंने आजादी के आंदोलन का विरोध किया था, आज वे लोग देश की जड़ों पर हमला करके देश को तोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। उनके भाषण में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के नाम पर देश में फैलाए जा रहे तनाव के खिलाफ पूरी तरह से अहिंसक और शांतिवादी बातें कही गई हैं।
केन्द्र सरकार के हाथ महज इतना ही तो है कि दूरदर्शन या आकाशवाणी पर किसी मुख्यमंत्री के भाषण को रोक दे। इससे अधिक तो सरकार कुछ कर नहीं सकती। केन्द्र का यह रवैया भी हैरान करने वाला है जिसमें एक मुख्यमंत्री को कहा गया है कि वे अपने भाषण को स्वतंत्रता दिवस और लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं। यह तो अपना-अपना नजरिया है, भाजपा के कोई मुख्यमंत्री अपने नजरिए से कोई बात कह सकते हैं, वामपंथी मुख्यमंत्री का अपना नजरिया हो सकता है, और कश्मीर में महबूबा की बात किसी तीसरी तरह की हो सकती है। अगर यह कहा जाए कि वे अपने भाषण को लोगों की भावनाओं के अनुरूप बनाएं, तो यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि किन लोगों की भावनाओं के अनुरूप? माणिक सरकार का भाषण देश के अल्पसंख्यक तबके, दलित और आदिवासी तबके, गरीब और धर्मनिरपेक्ष तबके की भावना के अनुरूप है, और यह आबादी ही देश में आधी से अधिक आबादी है। देश में एक बहुत छोटी आबादी बाकी पूरी आबादी के खान-पान, उसकी देशभक्ति के पैमाने, उसकी भाषा, और उसके पहरावे पर काबू पाने में लगी है। ऐसी ताकतों के बीच माणिक सरकार ने देश को बचाने और एक बनाए रखने की एक समझदारी की बात कही है, जो कि सरकारी रेडियो-टीवी के बिना भी अहमियत रखती है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता से यह सलाह मांगते दिख रहे थे कि वे लालकिले से आजादी की सालगिरह पर अपने भाषण में कौन सी बातों को शामिल करें। और दूसरी तरफ जब देश के एक सबसे अच्छे मुख्यमंत्री ने देश को एक रखने की बात कही, तो उसके भाषण को ही रोक दिया गया! प्रधानमंत्री को यह सोचने की जरूरत है कि उन्होंने सलाह मांगने का जो सार्वजनिक आव्हान किया था, उसका क्या हुआ? देश के संघीय ढांचे में एक राज्य के मुख्यमंत्री की अहिंसक और धर्मनिरपेक्ष बातों को रोक देने का अधिकार केन्द्र को कैसे मिला है, इस बारे में भी प्रधानमंत्री को इसलिए बात करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने लालकिले से भारत के ढांचे को एक कोऑपरेटिव फेडरलिज्म कहा है। अब एक मुख्यमंत्री के भाषण को रोकना किस तरह से एक सहकारी-संघवाद कहा जा सकता है? दरअसल माणिक सरकार की सोच तो उनके राज्य में लोग अच्छी तरह जानते हैं, अब उनके भाषण को रोककर केन्द्र सरकार ने पूरी दुनिया को उनकी वामपंथी सोच को जानने का मौका दिया है। इससे सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों का हुआ है जिन्हें आलोचना से बचाने के लिए केन्द्र सरकार ने माणिक सरकार को रोका।

गोरखपुर की मौतों से निकलते हुए सबक

संपादकीय
14 अगस्त 2017


गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत के मामले में पिछले दो दिनों से हमने काफी कुछ लिखा है, लेकिन आज कुछ और बातें हैं जिन पर लिखना जरूरी है। उत्तरप्रदेश के सांसद वरूण गांधी ने इस हादसे को देखते हुए अपने संसदीय क्षेत्र सुल्तानपुर में सांसद निधि के पांच करोड़ रुपये देकर तुरंत ही एक बाल चिकित्सा केंद्र का काम शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि वे इस काम के लिए अलग-अलग कंपनियों के सामाजिक सरोकार मद से पांच करोड़ रुपये  और जुटाएंगे। इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि गोरखपुर न केवल उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मठ वाला शहर है, बल्कि वे लगातार पांच बार वहां से सांसद रहे और अब सांसद रहते-रहते मुख्यमंत्री भी बने। अब अगर वे ताजा मौतों को लेकर यह सफाई दे रहे हैं कि यह इलाका हमेशा से ही बीमारियों की वजह से ऐसी मौतों वाला रहा है, तो सवाल यह उठता है कि इतने बरसों तक लगातार सांसद रहते हुए वे अब तक इस बारे में पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं कर पाए थे? उनके पांच बार के सांसद कार्यकाल में तो पहले भी छह बरस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार केंद्र में थी, और वाजपेयी खुद भी उत्तरप्रदेश से ही सांसद थे। अब अगर सत्ता की इतनी ताकत के रहते हुए योगी आदित्यनाथ अपने ही शहर के लिए कुछ नहीं कर पाए थे, तो इससे उनकी क्षमता पता लगती है। वे सांसद रहते हुए भी हिंदू-मुस्लिम पे्रम संबंधों के खिलाफ एक हिंसक और हमलावर अभियान के अगुवा रहते आए हैं, और उनका निजी संगठन आज भी भाजपा सरकार के रहते हुए भी अलग से एक साम्प्रदायिक और हिंसक कार्रवाई चलाते रहता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनका एक साम्प्रदायिक एजेंडा चल रहा है जिसके तहत उत्तरप्रदेश के हर मदरसे को आजादी की सालगिरह पर झंडा फहराकर अपनी देशभक्ति का वीडियो सुबूत बनाकर सरकार को देना है। जाहिर है कि अपने इलाके के बीमार बच्चों, या कि वहां हर बरस फैलने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के बजाय योगी का ध्यान हिंदुत्व को लागू करवाने में लगा हुआ था। आज ही एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह गोरखपुर में ही इंसेफलाइटिस से विकलांग मरीजों के इलाज और पुनर्वास के लिए बने विभाग के ग्यारह कर्मचारियों को सत्ताईस महीने से वेतन नहीं मिला, और वहां से तीन डॉक्टर नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। यह हाल केंद्र में मोदी की पार्टी की सरकार आने के तीन बरस बाद का है, उत्तरप्रदेश से नरेन्द्र मोदी के सांसद बनने के ढाई बरस बाद का है, और योगी के मुख्यमंत्री बन जाने के आधे बरस बाद का तो है ही।
हम वरूण गांधी की खबर को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि किसी एक जगह अगर आग लगती है, तो बाकी लोगों को भी अपने-अपने घर संभाल लेने चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी सरकार को अपनी सरकारी अस्पतालों की बदहाली को सबसे पहले तो मान लेना चाहिए, और उसके बाद फिर उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए। आज बहुत सारे लोगों का देश भर में यह मानना है कि गोरखपुर की मौतों जैसे मामले इस देश में सरकारी इलाज की जिम्मेदारी से सरकार के हाथ खींच लेने के एक बहाने जैसे भी हैं। इसके बाद हो सकता है कि सरकार निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने के लिए और स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से निजी अस्पतालों की कमाई बढ़ाने के लिए जुट जाए। छत्तीसगढ़ में सरकारी इलाज की बदइंतजामी को देखते हुए ऐसा लगता है कि इसके पीछे एक सोची-समझी चाल भी है कि सरकारी अस्पतालों की साख खत्म की जाए और निजी अस्पतालों को बढ़ाया जाए। मीडिया और विपक्ष को भी इस बारे में आंखें खुली रखनी चाहिए। हर सांसद और विधायक अपने-अपने इलाके में इलाज को बेहतर बनाने का जिम्मा भी उठाना चाहिए।

परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है..

संपादकीय
13 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से साठ या अधिक बच्चे दो-चार दिनों में मारे गए हैं, वह मामला एक न्यायिक जांच से कम का नहीं है, लेकिन न तो उत्तरप्रदेश सरकार इसकी परवाह कर रही, न ही उत्तरप्रदेश में हाईकोर्ट ने खुद होकर इसका कोई संज्ञान लिया, सरकार से जवाब मांगा, या कि किसी जांच का आदेश दिया। केन्द्र सरकार का रूख भाजपा के राज वाले प्रदेशों में बड़ा साफ है कि जितनी मौतों पर प्रधानमंत्री दुनिया के किसी और देश के लिए भी हमदर्दी ट्वीट कर देते हैं, उससे दस गुना मौतें भी अगर भाजपा राज में हो जाएं, तो वे चुप्पी साधे रहते हैं। यह सिलसिला देश के लोगों को बहुत विचलित कर रहा है, और परंपरागत मालिकाना हक वाले मीडिया से परे आज देश और दुनिया में बागी तेवरों वाला और अभूतपूर्व आजादी वाला जो सोशल मीडिया अतिसक्रिय है, वह इन बातों पर गौर कर रहा है। उस पर बागी तेवर भी दिखते हैं, बिके हुए तेवर भी दिखते हैं, और गुलाम तेवर भी देखते हैं। इन तमाम पहलुओं के पूर्वाग्रहों के साथ सोशल मीडिया पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह सत्ता और मीडिया के एकाधिकार को एक बड़ी चुनौती है, और बेजा इस्तेमाल के तमाम खतरों के बीच भी सोशल मीडिया आजादी की ताजी हवा का एक झोंका बना हुआ है।
जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय लोकतंत्र में मतदाता के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है, और भाजपा के अश्वमेधी घोड़े की लगाम थामने को अब हाथ नहीं बचे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि चुनावों से परे लोकतंत्र इतिहास दर्ज करते चलता है। चुनाव का इतिहास तो चुनाव आयोग दर्ज कर देता है, वह बहुत मेहनत का काम भी नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र की बाकी बातों, बाकी पहलुओं का इतिहास बहुत सी ताकतें, और सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब बहुत से कमजोर तबके भी, लिखते हैं, और लिख रहे हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि किस तरह कल लाशों के बीच किसी एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती मंच पर जोर-जोर से हॅंस रहे थे। लाशों के बीच की यह हॅंसी महज एक तस्वीर से ही दर्ज हो जाती है, और उसके लिए वामपंथी या दक्षिणपंथी इतिहासकारों की जरूरत नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि ऐसी ही हॅंसी बिलासपुर की नसबंदी मौतों की लाशों के बीच उस वक्त के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी दर्ज हुई थी, और मुख्यमंत्री जब दम तोड़ती महिलाओं से बात कर रहे थे, तब सरकारी अस्पताल के वार्ड में स्वास्थ्य मंत्री देर तक जोरों से हॅंसते जा रहे थे। उस वीडियो को किसी और टिप्पणी या इतिहास लेखन की जरूरत नहीं थी।
लेकिन सोशल मीडिया की सारी मौजूदगी के बीच भी हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के मंत्रियों से लेकर केन्द्र सरकार के भाजपा मंत्रियों तक के पास इस बात का भारी हौसला बचा है कि गोरखपुर में बच्चों की लाश थामे रोते-बिलखते मां-बाप के दिलों के जख्म पर और नमक छिड़कें। इन मंत्रियों और नेताओं के बयान अगर सुनें, तो ऐसा लगता है कि जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह तो इनके भीतर बाकी ही नहीं है, और वह सामान्य समझ भी बाकी नहीं है कि इस चुनावी दुनिया में जिंदा रहने के लिए जिस जनता की जरूरत इंदिरा से लेकर मोदी तक हर किसी को पड़ती है, उस जनता की भावनाओं को बिना वजह अपने बूटों से कुचलते जाना समझदारी नहीं है। इतिहास ऐसी छोटी-छोटी वीडियो क्लिप भी अब सम्हालकर रख रहा है, प्रधानमंत्री सहित बाकी लोगों की चुप्पी को सम्हालकर रख रहा है, और दम तोड़ते बच्चों की सांसों की कीमत पर आक्सीजन-कमीशनखोरी करते योगी के अफसरों को भी दर्ज कर रहा है। इन मौतों के कुछ ही घंटे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी के कुछ महीने बाद भारत आने की तारीख तय होने पर ट्वीट करके उनका स्वागत किया था। गोरखपुर में दर्जनों नवजात बच्चों की ऐसी अकाल मौत पर हमदर्दी ट्वीट न करके वे उत्तरप्रदेश की अपनी सरकार की मदद नहीं कर रहे हैं, खुद अपनी चुप्पी को अपने ही हाथों इतिहास में दर्ज कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया के मार्फत लिखा जा रहा इतिहास अब तक के परंपरागत इतिहासकारों के मुकाबले अधिक काबिल और अधिक असरदार है।

उप्र में ऑक्सीजन दलाली के चलते दर्जनों मौतें, हत्यारे कौन?

संपादकीय
12 अगस्त 2017


उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने शहर के सरकारी मेडिकल कॉलेज हास्पिटल में ऑक्सीजन सप्लायर का भुगतान नहीं हुआ तो उसने कई नोटिसों के बाद ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी, और इस वजह से वहां भर्ती तीन दर्जन बच्चों की मौत पिछले दो दिनों में हो चुकी है, और कुल मिलाकर पिछले चार-पांच दिनों में साठ के करीब मौतों का अंदाज है। खुद भाजपा के सांसद और नेता इसे सरकारी लापरवाही मान रहे हैं, और हत्या का मुकदमा चलाने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ और लोगों का यह भी कहना है कि सप्लायर से कमीशन और दलाली पर मुख्यमंत्री के करीबी लोग मोल-भाव कर रहे थे और इसी की वजह से भुगतान रोका गया था, और बड़ी संख्या में यह मौतें हुईं। यह मामला इतना भयानक है कि दो दिन बाद आजादी की सालगिरह उत्तरप्रदेश में मनाई जाए या न मनाई जाए, इस बारे में सोचना चाहिए। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप से देश की जनता से यह मांग रहे हैं कि वे किन-किन मुद्दों पर लालकिले से बोलें, इस पर जनता राय दे। इससे बड़ी और राय क्या हो सकती है कि देश में भाजपा के राज वाले कई राज्यों में अस्पतालों में थोक में ऐसी मौतें हुई हैं, वे कम से कम अपनी पार्टी के राज पर तो बोल ही दें।
दरअसल सरकारी अस्पतालों का हाल अधिकतर राज्यों में कुल मिलाकर ऐसा ही है। सरकारी डॉक्टर अपनी निजी प्रैक्टिस पर पूरा ध्यान देते हैं, और अस्पतालों में खानापूर्ति के लिए चले जाते हैं। दवाईयां कई गुना दाम पर खरीदी जाती हैं, और नकली खरीदी जाती हैं। ऐसी मशीनें खरीद ली जाती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं रहता, जिन्हें चलाने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सक-कर्मचारी नहीं रहते, और वे मशीनें जंग खाते-खाते खराब हो जाती हैं। छत्तीसगढ़ में अभी कल ही बर्खास्त हुए एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए हमारे ही अखबार ने सबसे पहले ये रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह उनके कार्यकाल में नकली मशीनें खरीदी गईं, बिना जरूरत खरीदी गईं, बिना प्रशिक्षित कर्मचारियों के खरीदी गईं, और उनका करोड़ों का भुगतान भी किया गया। बाबूलाल अग्रवाल तो अब जाकर बर्खास्त हुए हैं, लेकिन उस फर्जी और नकली मशीन-घोटाले पर आज तक किसी को सजा नहीं मिली है।
छत्तीसगढ़ के अस्पतालों में, और राजधानी रायपुर के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी मरीजों की बदहाली, और सरकारी डॉक्टरों-कर्मचारियों की आपराधिक लापरवाही रोज अखबारों में दिखती है, लेकिन किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होती, और प्रदेश की जनता अच्छी तरह जानती है कि यह भ्रष्टाचार किसकी छत्रछाया में चल रहा है। वह दिन दूर नहीं है जब बिलासपुर के नसबंदी कांड की तरह फिर छत्तीसगढ़ में किसी सरकारी अस्पताल में ऐसा कोई मानवनिर्मित हादसा होगा, और दर्जनों लोगों की जानें जाएंगी। मौतें तो आज भी हो रही होंगी लेकिन चूंकि वे थोक में नहीं हो रही, इसलिए किसकी जानकारी में नहीं है। प्रधानमंत्री को पूरे देश के राज्यों को सचेत करना चाहिए, और खासकर अपनी पार्टी के राज वाले प्रदेशों को तो सबसे पहले। आज उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ इसमें लगे हुए हैं कि वहां के मदरसे तिरंगा फहराते हैं या नहीं, और उसका वीडियो बनाकर अपनी देशभक्ति का सुबूत भेजते हैं या नहीं। हमारे हिसाब से ऑक्सीजन के दलाल हत्यारों से कम नहीं हैं, देशद्रोही से कम नहीं हैं, और उन्हीं को पहले सजा हो जाए, मदरसों की देशभक्ति बाद में नापी-तौली जाए।

सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती होती है

संपादकीय
11 अगस्त 2017


हरियाणा के भाजपाध्यक्ष का बेटा दारू के नशे में साथियों के साथ कार में एक  लड़की का पीछा करने और उसके अपहरण की कोशिश में गिरफ्तार है, और हरियाणा के मुख्यमंत्री की शुरुआती प्रतिक्रिया मुजरिम दिखते शराबी नौजवान के खिलाफ होने के बजाय उसके पिता को बेकसूर ठहराने वाली सामने आई है। यह बात अपनी जगह सही है कि किसी बालिग औलाद के लिए मां-बाप जिम्मेदार नहीं होते, लेकिन यह बात भी सही है कि संविधान की शपथ लेकर सरकार चलाने वाले किसी इंसान को मुजरिम को सजा दिलाने की बात कहनी चाहिए, उसे बचाने वाली नहीं।
लेकिन यह बचाना बड़ा आम हो चुका है। देश में जगह-जगह कई पार्टियों के लोग अपने नेताओं को, और अपने कुनबों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं। पड़ोस के मध्यप्रदेश को ही देखें, तो वहां वेश्याएं मुहैया कराने के सेक्स-कारोबार में फंसे हुए और गिरफ्तार हुए भाजपा नेता से लेकर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करते गिरफ्तार भाजपा नेताओं तक एक लंबा सिलसिला सामने आया है, लेकिन भाजपा ने अपने इन कुलकलंकों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा है। ऐसा न कहना उनको बचाने सरीखा है। दूसरी तरफ अगर ये काम करने वाले कोई मुस्लिम होते, तो उन्हें मध्यप्रदेश के भाजपा नेता कूद-कूदकर पीटते और देशद्रोही करार देते, भारत की संस्कृति तबाह करने वाला बताते। लेकिन गोमांस बेचने वाले भी कुछ लोग भाजपा के निकले हैं, कुछ लोग नकली नोट छापने और चलाने वाले भी निकले हैं, लेकिन पार्टी ने इनके खिलाफ कुछ नहीं कहा। मोटेतौर पर यही हाल बाकी पार्टियों का है, और ऐसे में यह देखकर हैरानी होती है कि किस तरह सीपीएम ने बंगाल में अपने एक नेता को इसलिए निलंबित कर दिया कि वह एक महंगा मोबाइल इस्तेमाल करता था। आज तो बाकी किसी भी पार्टी में लोग लाखों-करोड़ों की घडिय़ां पहनकर घूमें तो भी उनकी पार्टी को उससे कोई दिक्कत नहीं होती, वे एयरपोर्ट या दूसरी जगहों पर सरकारी कर्मचारियों को पीटें तो भी उनको कोई दिक्कत नहीं होती है।
ऐसी बददिमागी, गुंडागर्दी, और जुर्म के लिए जो हौसला सत्ता से मिलता है, वही हौसला लोगों को तबाही तक ले जाता है। पूरे देश में जगह-जगह राजनीतिक दलों के नेताओं ने भ्रष्टाचार की छूट मिलने को इतने बड़े-बड़े भ्रष्टाचार किए कि वे उनकी अगली पूरी सदी की राजनीतिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से अधिक की दौलत और जायदाद जुटाने वाले रहे, और उसी चक्कर में वे जेल भी पहुंच गए, सजा भी काट रहे हैं। जिस चौटाला कुनबे की अरबों-खरबों की दौलत है, उसके मुख्यमंत्री रहे हुए मुखिया जेल में सजा काट रहे हैं, तमिलनाडू की शशिकला कर्नाटक की जेल में बंद हैं। राजनीति में भ्रष्ट पैसे की कुछ जरूरत तो हो सकती है, अगर ईमानदारी से चुनाव लडऩे का हौसला न हो तो। लेकिन ऐसी मजबूरी किसी की नहीं रहती। ऐसे में सत्ता की बददिमागी सिर चढ़कर बोलती है, और मां-बाप भ्रष्ट रहते हैं, आल-औलाद गुंडागर्दी पर उतर आती है, और सौ में से चाहे एक ही सही, सारी ताकत के बावजूद जेल की कैद तक पहुंच ही जाते हैं। अगली सौ पीढ़ी के लिए जमा की गई दौलत धरी रह जाती है, और एक मामले में पुख्ता सुबूत, ईमानदार जज आ जाने से वह पूरी दौलत किसी ताकत की नहीं रह जाती।
जो लोग सत्ता की ताकत से जुर्म करते चलते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि अगर कानून एक बार भी ठीक से काम कर बैठा हो, तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे। लेकिन सत्ता से ऐसी बददिमागी आती है कि लोगों को यह लगता ही नहीं कि उनके बुरे दिन भी कभी आ सकते हैं, कभी उनके मामलों पर कार्रवाई करने वालों अफसर या जज ईमानदार भी निकल सकते हैं, या कि कोई ऐसे गवाह भी हो सकते हैं जिन्हें धमकाना या खरीदना मुमकिन न हो। मध्यप्रदेश में सत्ता की सारी ताकत मिलकर भी व्यापम घोटाला फूटने से रोक नहीं पाई। सत्ता के कई लोग सरकार की लाख कोशिश के बावजूद जेल चले गए, हालांकि सत्ता से जुड़ी रहस्यमय ताकतों की इतनी कामयाबी तो सामने आई कि इस मामले से जुड़े हुए पचास लोग अब तक रहस्यमय तरीके से मर चुके हैं, या कि मार डाले गए हैं। इस पूरे सिलसिले से हम केवल यही एक नतीजा निकालना चाहते हैं कि सत्ता की बददिमागी लोगों के लिए आत्मघाती साबित होती है।

शरद यादव के सामने आ खड़ा है एक ऐतिहासिक मौका

संपादकीय
10 अगस्त 2017


बिहार में सत्तारूढ़ जदयू के भीतर की बेचैनी अब किसी किनारे लगते दिख रही है। वहां पर पार्टी के सबसे ताकतवर नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, इसलिए सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार भाजपा के साथ उनकी ताकत तो कम नहीं होगी, लेकिन पार्टी के सबसे बड़े राष्ट्रीय स्तर के वैचारिक स्तंभ शरद यादव अगर पार्टी के बाहर निकलकर भाजपा-एनडीए विरोधी विपक्ष के लिए खुला काम करते हैं, तो इससे एक वैकल्पिक विपक्ष मजबूत होकर सामने आने की संभावना बन सकती है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही इन्हीं नीतीश कुमार को मोदी के मुकाबले संयुक्त विपक्ष का एक संभावित नेता माना जा रहा था, फिर अचानक बिहार की सत्ता से लालू को बाहर करने के लिए नीतीश ने भाजपा का दामन थाम लिया, और कुछ घंटों के भीतर ही वे सीएम की कुर्सी छोड़कर फिर सीएम की कुर्सी पर बैठ गए, और दलबदल या सत्ता पलट की एक बिल्कुल ही अभूतपूर्व मिसाल पेश की थी, और उनकी पार्टी के ही शरद यादव इस फैसले को टीवी पर ही देख पा रहे थे, रूबरू नहीं। ऐसे में शरद यादव ने अपने कुछ तेवर नीतीश के फैसले के खिलाफ दिखाए हैं, और गुजरात के राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ कांग्रेस को वोट देने के लिए अपने समर्थक जेडीयू विधायक को कहा।
शरद यादव एनडीए सरकार में रह चुके हैं, नीतीश कुमार के साथ-साथ। इसलिए यह कहना तो ठीक नहीं होगा कि वे भाजपा से ऐसे परहेजी हैं कि उसके साथ बैठ भी नहीं सकते, लेकिन भारत की राजनीति यह बताती है कि पिछली एनडीए सरकार के वक्त की वाजपेयी की भाजपा, और आज मोदी-शाह की भाजपा में लोग बड़ा फर्क देखते हैं। बिहार में ही नीतीश कुमार ने पिछले चुनाव के वक्त भाजपा से नाता तोड़कर अपने धुरविरोधी लालू यादव से गठबंधन इसी मुद्दे पर किया था कि वे मोदी को बर्दाश्त नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने कोई ऐसी एंटी एलर्जिक दवा पा ली है कि अब वे मोदी को भारत का अगला भविष्य भी देख रहे हैं, और शरद यादव इस नौबत को मान नहीं पा रहे हैं। ऐसे में वे अब तक ऐसी संभावनाओं की चर्चा का लालच छोड़कर बाहर बैठे हुए हैं कि बिहार के गठबंधन के केन्द्र में विस्तार के रूप में उन्हें भी केन्द्रीय मंत्री बनाया जा सकता है। शरद यादव सत्तर बरस की उम्र में अब सत्ता के मोह को छोड़कर सैद्धांतिक राजनीति भी कर सकते हैं, और उनके आगे आने से एनडीए-विरोधी एक मजबूत विपक्षी गठबंधन बन सकता है, जो कि आज कांग्रेस की अगुवाई में नहीं बन सकता। नीतीश कुमार ने बहुत ही पाखंडी नारों के साथ भाजपा से गठबंधन किया है कि वे लालू के भ्रष्टाचार के साथ रह नहीं पा रहे थे, यह अलग बात है कि एनडीए में बादल कुनबा वैसी ही साख वाला कुनबापरस्त और भ्रष्टाचारजीवी परिवार है, और उससे भी बढ़कर अब जया-शशिकला का अन्नाद्रमुक भी एनडीए में आते दिख रहा है।
देश की राजनीति में गठबंधनों का ध्रुवीकरण लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है, और शरद यादव के सभी दलों के साथ ऐसे दोस्ताना संबंध हैं कि कांग्रेसियों से लेकर वामपंथियों तक, और छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों तक से वे बात कर सकते हैं। हमारा ख्याल है कि देश की राजनीति पर एनडीए और मोदी के एकाधिकार के मुकाबले ऐसी एक राजनीतिक एकजुटता लोकतंत्र के शक्ति संतुलन में मदद करेगी, और आज शरद यादव के अलावा किसी दूसरे में ऐसी संभावना नहीं दिख रही है। यह उनके सामने एक ऐतिहासिक मौका है, और यह बात पहली बार हम नहीं लिख रहे हैं, बल्कि कुछ और राजनीतिक विश्लेषक लिख चुके हैं कि नीतीश देश के दूसरे जयप्रकाश नारायण बन सकते हैं जो खुद सत्ता में न आकर देश की सत्ता के खिलाफ एक बहुत बड़ा जनमोर्चा खड़ा करने का इतिहास बना चुके हैं। जब भी किसी की मिसाल किसी दूसरे पर लागू की जाती है, तो वह खतरे भी खड़े करती है, इसलिए हम ऐसी मिसाल पर जोर देने के बजाय बस इतना ही कहना चाहते हैं कि शरद यादव को उनके सामने अनायास पेश हो गए इस मौके पर भारतीय लोकतंत्र के लिए अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी चाहिए।

गुजरात की राज्यसभा सीट, एक अनैतिक और अवांछित लड़ाई में भाजपा की शिकस्त

संपादकीय
9 अगस्त 2017


गुजरात की एक राज्यसभा सीट के लिए भाजपा ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रदेश में इतना बड़ा दांव लगाया था कि उस बाजी की शिकस्त पार्टी के मुंह में कड़वाहट छोड़ गई है। विधानसभा के भीतर विधायकों की गिनती के मुताबिक भाजपा से दो लोगों को राज्यसभा के लिए चुना जाना था, और वे अमित शाह और स्मृति ईरानी रहे। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दशकों के राजनीतिक सचिव रहे और लंबे समय से राज्यसभा में बने आ रहे अमहद पटेल को राज्यसभा में आने से रोकने के लिए भाजपा ने मानो अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यह पार्टी के लिए एक बहुत ही खोखला कदम था कि कांग्रेस से बगावत करके बाहर आने वाले एक विधायक को भाजपा ने आनन-फानन अपना राज्यसभा उम्मीदवार बना दिया। यह एक वैचारिक और सैद्धांतिक दीवालियापन भी था, और आज अपने को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भाजपा की एक बहुत ही सतही और सस्ती अवसरवादिता भी थी। देश की संसद के जिस उच्च सदन को देश के सबसे अच्छे लोगों की सेवाएं पाने के लिए बनाया गया था, उसकी दुर्गति तो कोई नई बात नहीं है, लेकिन कल के कांग्रेस विधायक और आज के भाजपा राज्यसभा प्रत्याशी, चौबीस घंटे के भीतर बदले ये राजनीतिक रंग बहुत ही स्तरहीन थे, और इन्हें भाजपा ने सोच-समझकर एक बड़े दांव की तरह खेला था। इसके बाद की विधायकों की खरीद-फरोख्त को हम अधिक वजन नहीं देते क्योंकि वामपंथियों के अलावा देश की अधिकतर पार्टियां ऐसी खरीदी करती रही हैं, और अधिकतर पार्टियों के सांसद और विधायक अंतरात्मा की ऐसी बिक्री करते आए हैं। ऐसे में भाजपा की इस मंडी में अगर आज के सबसे बड़े खरीददार की तरह थैली लिए खड़ी थी, तो वह ऐसा करने वाली न तो पहली पार्टी थी, और न ही आखिरी पार्टी रहेगी। लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा के संदर्भ में सैद्धांतिक शुचिता की बात अडवानी-युग के साथ चल बसी है, और प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए भाजपा अपने ही दिग्गजों को छोड़कर कल के दलबदलू को आज सिर पर बिठाने को बेताब है, अगर इससे उसे कोई तात्कालिक फायदा होता है। और भाजपा ने यह रूख जगह-जगह अलग-अलग राज्यों के चुनावों में दिखाया है, और म्युनिसिपल चुनावों तक उसने अपनी पार्टी के पुराने निष्ठावानों को कचरे की टोकरी में डालकर नवजात दलबदलू को सिर पर बिठाया है। यह बात भाजपा को आनन-फानन सीटें तो दिला पाई है, लेकिन इससे एक राष्ट्रीय पार्टी की नैतिकता की इज्जत मिट्टी में मिल गई है। लेकिन अब गुजरात में नैतिकता भी गई, और दांव भी डूब गया। यह एक अलग बात है कि यह पूरे का पूरा दांव दूसरी पार्टी के बेईमानों और दगाबाजों के भरोसे पर लगाया गया था।
गुजरात में जिस अंदाज में भाजपा ने कांग्रेस में तोडफ़ोड़ करवाई, या कि उसमें हुई बगावत को दुहने की कोशिश की, उसमें उसे एक बड़ी मात हुई है। अगर वह अपनी सारी ताकत के साथ अहमद पटेल को हरा भी देती, तो भी सोनिया गांधी, कांग्रेस, और अमहद पटेल की उतनी बेइज्जती न हुई होती, जितनी आज एक पूरी तरह अवांछित लड़ाई को छेड़कर भाजपा ने हासिल की है। और देश में कांग्रेस के बहुत से शुभचिंतकों का यह मानना है कि अगर अहमद पटेल हार गए होते, तो कांग्रेस जीत जाती, और सोनिया गांधी को शायद कोई ऐसा दूसरा सलाहकार बनाना सूझता जो कि पार्टी को और गर्त में डूबने से बचा पाता। लेकिन अहमद पटेल की वापिसी से कांग्रेस की पुनर्जीवन की संभावनाएं भी खत्म हो गई है।
लोकतंत्र में एक राजनीतिक दल की इज्जत महज जीत नहीं होती है, ईमानदारी और सिद्धांतवाद की जीत उसके लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में तमाम अनैतिक तरीकों के इस्तेमाल से इस देश की राजनीति में एक वक्त कांग्रेस जो करती थी, भाजपा अब उससे सौ कदम आगे बढ़कर कर रही है। यह सिलसिला गुजरात की इस एक राज्यसभा सीट से कहीं आगे की शर्मिंदगी भाजपा को दिला चुका है, और इस पार्टी को गंभीरता से अपनी साख सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। कांग्रेस की राजनीति में सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द अहमद पटेल को सत्ता का एक सबसे बड़ा सौदेबाज माना जाता रहा है, और राजनेता के रूप में उनकी साख फूटी कौड़ी की नहीं रही। जब कांग्रेस की अगुवाई की सरकार रही तो उसके सबसे बड़े आर्थिक फैसलों की राह अहमद पटेल से होकर ही गुजरती थी, और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष को भी लोग महज गिनने वाला मानते थे, बड़े लेन-देन के लिए अहमद पटेल का ही नाम रहता था। इन बातों की हकीकत सोनिया और पटेल ही बता सकते हैं, लेकिन वामपंथियों को छोड़कर देश की तमाम पार्टियों में कोई न कोई अहमद पटेल तो रहते ही हैं। इसलिए ऐसा काम करने वाले को हराने के लिए भाजपा का इतना बड़ा दांव बेकार गया, यह पूरी तरह अवांछित था, और इसमें जीत से भी भाजपा की बदनामी ही होती कि उसने खरीद-बिक्री करके या धमकाकर विधायकों को मोड़ा, और इस बाजी में हारकर तो भाजपा की बड़ी ही किरकिरी हुई है। यह बात बाकी राजनीतिक दलों के सामने भी एक सबक की तरह खड़ी है कि लोगों को अनैतिक और अवांछित लड़ाई नहीं छेडऩी चाहिए, जीतने के लिए भी नहीं। आज नौबत यह है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी दोनों राज्यसभा सीट जीतकर भी खुशी मनाने की हालत में नहीं हैं।

विश्व आदिवासी दिवस पर दो तकलीफदेह मामले

संपादकीय
8 अगस्त 2017


कल नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है, और दुनिया के तमाम देशों में मूल निवासियों के मुद्दों पर चर्चा होगी। लेकिन यह छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरा संयोग है, या कि दुर्याेग है कि राज्य के दो आदिवासी-मामलों पर मीडिया में अप्रिय चर्चा चल रही है। इनमें से एक तो अभी कल की ही है जब आदिवासी बस्तर के नक्सलग्रस्त दंतेवाड़ा जिले के एक गांव में कन्या छात्रावास में प्रशासन और पुलिस के लोग सीआरपीएफ के जवानों को ले गए ताकि छात्राएं उनको राखी बांध सकें, और उन्हें यह भरोसा हो कि सुरक्षा बल उनकी रक्षा करते हैं। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा, और छात्राओं ने यह शिकायत दर्ज कराई है कि उनके पीछे-पीछे सीआरपीएफ जवान शौचालय में पहुंच गए, और उनका यौन शोषण किया। यह बहुत ही गंभीर मामला इसलिए है कि राखी का यह पाखंड अफसरों द्वारा प्रायोजित था, और उनकी निगरानी में हो रहा था। ऐसे में यह जाहिर है कि अकेले में मिलने वाली लड़कियों या महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों द्वारा शारीरिक बदसलूकी करने की शिकायतों में से कुछ तो सही होती ही होंगी। बस्तर में नक्सलग्रस्त इलाकों में मुसाफिर बसों में चलने वाली महिलाओं की भी यह शिकायत रहती है कि सुरक्षा बल बसों में घुस जाते हैं और तलाशी लेने के नाम पर उनके बदन टटोलते हैं। यह बहुत ही अप्रिय मौका है जब प्रदेश को आदिवासी मुद्दों पर कोई सकारात्मक चर्चा करनी थी, और ऐसी नकारात्मक खबरों से मीडिया पटा हुआ है।
दूसरी घटना जेल के एक मंझले दर्जे के आदिवासी अफसर की है जिसे विभाग ने अभी चार दिन पहले निलंबित कर दिया है। इस पर यह तोहमत है कि उसने अपने फेसबुक पेज पर यह पोस्ट किया था कि हर आदिवासी नक्सली नहीं होते। इस बात को राज्य सरकार की आलोचना मानते हुए इसे नोटिस दिया गया, और जवाब न मिलने की बात कहते हुए इसे निलंबित कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि कुछ महीने पहले जेल की एक और नई-नई अफसर को भी निलंबित किया गया था जिसने जेलों में लाकर बंद की जाने वाली और नक्सल होने के आरोप वाली महिलाओं के साथ सुरक्षा बलों के बलात्कार की आपबीती घटनाओं को लिखा था। इसे भी सरकार की कड़ी आलोचना मानते हुए इसे निलंबित किया गया था। हमने इस निलंबन के मौके पर भी लिखा था कि इस महिला अधिकारी को उसे पता लगी बातें सरकार की जानकारी लानी चाहिए थीं, बजाय उन्हें पहले सोशल मीडिया पर लिखने के।
अब उस महिला अधिकारी का निलंबन तो हो गया, लेकिन उसकी कही बातों पर कोई जांच राज्य सरकार ने शुरू नहीं की, जो कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारी बनती है। जब भी कोई ऐसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, और खासकर एक सरकारी अफसर ने उसे बताई हुई बातों को लिखा था, तो यह सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बनती थी कि उन बातों की जांच करवाई जाती। लेकिन उस अफसर को निलंबित करने के साथ मानो वह पूरा मामला खत्म हो गया था, और उसके उठाए मुद्दे भी दफन हो गए।
राज्य सरकार ने आदिवासी मुद्दों को लेकर संवेदनशीलता की जरूरत है। अपने अफसरों को निलंबित करना तो ठीक है, लेकिन सरकार को इस हकीकत को मानना होगा कि जुल्म और ज्यादती के, हत्या और बलात्कार के आरोपों को अनसुना करके सरकार आदिवासियों को नक्सलियों की तरफ धकेलने के अलावा और कुछ नहीं कर रही। बस्तर में सीआरपीएफ या बाकी सुरक्षा बलों की जनता में साख खराब है, और उन्हें कन्या छात्रावास में ले जाने का अफसरों का फैसला ही गलत था। इसके बाद जब वहां पर सुरक्षा कर्मचारी छात्राओं का यौन शोषण करने लगे, तो भी शुरू में बड़े अफसरों ने इस मामले को दबाने की कोशिश की। कल आदिवासी दिवस पर अगर कोई सार्थक चर्चा इस प्रदेश में होनी है, तो वह आदिवासियों पर ऐसे जुल्म को रोकने केे बारे में होनी चाहिए। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ की संवैधानिक संस्थाओं से लेकर बस्तर के आदिवासी मंत्री-सांसद और विधायकों तक ने गजब की चुप्पी साध रखी है, और ऐसा लगता है कि मानो मीडिया ही लोकतंत्र की जिम्मेदारी पूरी कर रहा है।

रक्षाबंधन, गैरबराबरी के रिवाज से निकली परंपरा

संपादकीय
7 अगस्त 2017


आज देश भर में जगह-जगह लोग धर्म और जाति से परे, और पारिवारिक रिश्तों से भी परे राखी का त्यौहार मना रहे हैं। राखी का शायद किसी धर्म में कोई उल्लेख नहीं है, और यह मोटे तौर पर एक सामाजिक परंपरा के रूप में चले आ रहा त्यौहार है। राखी, या रक्षाबंधन, यह भाई-बहन के बीच का रिश्ता पुख्ता करने का एक मौका रहता है जिस दिन कोर्ट-कचहरी में आपस में मुकदमा लड़ रहे भाई-बहन भी एक साथ जुट जाते हैं, और बहन इस उम्मीद के साथ भाई को राखी बांधती है कि वह मुसीबत में उसकी रक्षा करेगा। भारत की सामाजिक व्यवस्था में आमतौर पर यह भी चले आता है कि बूढ़े मां-बाप बेटे के पास रहते हैं क्योंकि अधिकतर समाजों में बेटियां शादी के बाद ससुराल चली जाती हैं। ऐसे में मां-बाप से लेकर बहन तक से रिश्ता रखना भाई के जिम्मे ही आता है। यह एक अलग बात है कि बहुत से बूढ़े मां-बाप ऐसे रहते हैं जिनका ख्याल रखने के लिए केवल बेटियां ही रह जाती हैं, और बेटे जिम्मेदारी से हाथ धो लेते हैं। ऐसे बेटों से उनकी बहनों को भी किस तरह की हिफाजत या मद मिल सकती है, यह सोचना अधिक मुश्किल नहीं है। आज ही इसी वक्त मुंबई की एक खबर आ रही है कि अमरीका से आया एक बेटा जब अपनी बूढ़ी और अकेली रह गई मां से मिलने के लिए घर पहुंचा तो पता लगा कि मां तो कई दिनों की मरी पड़ी है। दरवाजा तोड़कर मां को ऐसे हाल में देखने वाले बेटे ने पिछले डेढ़ बरस से मां से फोन पर भी बात नहीं की थी। यह एक अलग बात है कि अब मां का करोड़ों का मकान बेटे का ही होगा।
दरअसल राखी को लेकर सदियों से चली आ रही यह सोच आज सामाजिक समानता के पैमाने पर अटपटी लगती है कि भाई ही बहन की हिफाजत करेगा। इस रिवाज की एक बड़ी खामी यह है कि महिला को कमजोर माना जाता है, और यह माना जाता है कि उसकी हिफाजत के लिए बाप-भाई, या पति जैसे किसी एक पुरूष की जरूरत होती है। रक्षाबंधन अगर दोनों के बीच एक-दूसरे की बराबरी से हिफाजत का बंधन होता, तो शायद यह एक बेहतर रिवाज होता। लेकिन जिस तरह भारत में महिला को सुहाग की निशानी के नाम पर सिंदूर से लेकर मंगलसूत्र तक, और तरह-तरह की चूडिय़ों से लेकर बिंदी तक सबको ढोना पड़ता है, उसी तरह उसे भाई या किसी और पुरूष से हिफाजत की गारंटी भी लेकर चलना पड़ता है। इस रिवाज में यह फेरबदल करने की जरूरत है क्योंकि आज बहुत सी बहनें भी अपने बेरोजगार, या बीमार भाई की जिम्मेदारी ढोती हैं, और उस भाई की सामाजिक जिम्मेदारी, माता-पिता को भी ढोती हैं।
भारत के अधिकतर रीति-रिवाज महिलाओं को कमजोर या आश्रित बनाने वाले रहते हैं। उनकी बुनियाद इस बात पर रखी जाती है कि वे पुरूषों से कमजोर रहती हैं, और उन्हें लगातार पुरूष की हिफाजत चाहिए ही चाहिए। लोगों को याद होगा कि जिस हरियाणा में दो दिन पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के बेटे ने एक युवती से छेडख़ानी करके खतरनाक अंदाज में उसका पीछा किया, उसी हरियाणा में मुख्यमंत्री बने मनोहर लाल खट्टर ने अपने चुनाव प्रचार में यह कहा था कि जिन महिलाओं को रात में बाहर निकलने का शौक है, वे नंगी क्यों नहीं निकल जातीं? ऐसी सोच वाले हरियाणा में जाहिर है कि सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े नेता, प्रदेशाध्यक्ष, का बेटा यह मानकर चल रहा होगा कि रात में अगर कोई लड़की कार से भी अकेले जा रही है, तो उसे नंगा करना उसका बुनियादी हक है। आज वही मुख्यमंत्री वहां की बच्चियों से राखी बंधवा रहे हैं, और उन्हें एक तरह से उनकी रक्षा की जिम्मेदारी ले रहे हैं। संस्कृति के ऐसे ठेकेदार पूरे राज्य के संवैधानिक जिम्मे को उठाने का हक तो रखते नहीं, आज वे राखी जरूर बंधवा रहे हैं। इस तरह जब निजी संबंधों के एक धागे का सार्वजनिककरण कर दिया गया है, तो उसका महत्व भी खत्म कर दिया गया है। रक्षाबंधन को आज के हालात देखते हुए दुबारा परिभाषित करने की जरूरत है।

न चीन की तरह सस्ता, न ही एप्पल की तरह बढिय़ा...

संपादकीय
6 अगस्त 2017


अमरीका की एक खबर है कि वहां एप्पल कंपनी का मुनाफा बढऩे से किस तरह उसके शेयर रखने वाले दुनिया के एक सबसे बड़े पूंजीनिवेशक वारेन बफे को रातों-रात दसियों अरब की कमाई हो गई। एप्पल न सिर्फ अमरीका बल्कि दुनिया की उन कंपनियों में से है जो बिना किसी एकाधिकार के, खुले बाजार के मुकाबले में एक के बाद एक बेहतरीन सामान लाकर बड़ा मुनाफा कमाती है, और उसके सामानों के प्रति निष्ठावान बने रहने वाले ग्राहक उसके हर सामान के अगले मॉडल का इंतजार भी करते हैं।
दूसरी तरफ इससे ठीक उल्टा हाल चीन की कुछ कंपनियों का है जो कि सामान इतना सस्ता बनाती हैं कि वह सामान कमजोर और अविश्वसनीय रहता है, और जाने कब तक चले, कब खराब हो जाए। चीनी सामानों की घटिया क्वालिटी को लेकर तरह-तरह के मजाक चलते रहते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वहां से भारत आने वाले बहुत से सस्ते सामानों ने भारत के उसी किस्म के सामानों के कारखाने बंद करवा दिए हैं। चीन में सामान अच्छे भी बनते हैं, और घटिया भी। लेकिन वहां के सस्ते सामान इतने सस्ते रहते हैं कि वे दुनिया के अधिकतर देशों में जाकर वहां के स्थानीय सामानों को पीटकर रख देते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वहां पर लागत इतनी कम आती है, उत्पादन इतना अधिक होता है कि सामान सस्ते बनते हैं। दूसरी तरफ भारत में बनने वाले बहुत से सामान घटिया चीनी सामानों जितने ही घटिया रहते हैं, लेकिन वे महंगे बनते हैं, क्योंकि कामगार हुनरमंद नहीं हैं, मशीनें अच्छी नहीं है, बिजली का ठिकाना नहीं है, और कंपनियां उत्पादन ठीक से नहीं कर पातीं।
अब ऐसे में जब भारत की सरकार लगातार यह ताकत लगा रही है कि मेक इन इंडिया को कामयाब बनाया जाए, तो उसके कुछ रास्ते हैं। पहली बात तो यह कि भारत में सामानों का उत्पादन बेहतर क्वालिटी का हो, और इसके लिए कामगारों का हुनर बेहतर हो। चीन में यह नौबत रातों-रात बेहतर कर ली जाती है, और भारत में कौशल विकास के नाम पर राज्यों में अंधाधुंध लूटपाट और धांधली चलती रहती है। ऐसे में दुनिया के दूसरे देश तो दूर रहे, भारत के भीतर भी सस्ते चीनी सामानों का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी तरफ भारत में अधिक कमाई वाला एक तबका ऐसा है जो कि दुनिया का सबसे महंगा एप्पल कम्प्यूटर या फोन लगातार इस्तेमाल करता है, और वह क्वालिटी के लिए अधिक से अधिक दाम देने को भी तैयार रहता है। भारत में ही सॉफ्टवेयर का काम करने वाली कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों से खुला मुकाबला करती हैं, वे क्वालिटी में भी अच्छी हैं, और उनके दाम भी बाजार के मुकाबले के हैं। लेकिन भारत का भविष्य बेहतर मानने वाले लोगों को यह भी समझ लेना चाहिए कि इस देश में आज कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खदानों और खनिजों से जुड़े हुए ऐसे उद्योगों का है जो कि भारी प्रदूषण फैलाते हैं, और जिन्हें दुनिया के विकसित देश अपने घर पर चलाना नहीं चाहते। ऐसे उद्योगों पर टिकी हुई भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर यह भावनात्मक सोच तो ठीक है कि भारत सब कुछ खुद बनाने लगेगा, और दुनिया में अव्वल हो जाएगा, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि यह देश न तो चीन की तरह का सस्ता बना पा रहा, न ही दुनिया के बहुत से देशों की नामी कंपनियों जैसा अच्छा बना पा रहा है। इन दोनों मामलों में आगे बढऩे की कोशिश के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है।