मुख्यमंत्री की कुर्सी लंबे वक्त तक खाली रखना सही नहीं...

संपादकीय
19 सितंबर 2018


गोवा में कुछ महीने पहले जब विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा बहुमत में नहीं थी, और कांग्रेस की सरकार बनने का आसार दिख रहा था, लेकिन गठबंधन बनाने में कांग्रेस से शायद कुछ देर हो गई थी, और सरकार भाजपा ने बना ली थी। आंकड़ों के मुताबिक कुछ अस्थिर सा यह ढांचा चल रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर कैंसर के शिकार हो गए, और वे लंबे समय तक पहले तो अमरीका में इलाज कराते रहे, और फिर अब भारत में वे दिल्ली के एम्स में भर्ती हैं। भाजपा की यह मजबूरी हो सकती है कि ऐसी नाजुक सरकार में उसे ऐसे नाम पर बने रहने की मजबूरी है जो कि अधिक विधायकों को मंजूर हो, लेकिन इस राजनीतिक गणित से परे शासन-प्रशासन का गणित यह मांग करता है कि जिस तरह देश में एक कामकाजी प्रधानमंत्री होना चाहिए, उसी तरह प्रदेश में एक कामकाजी मुख्यमंत्री मौजूद होना चाहिए। गैरमौजूदगी के साथ सरकार चला पाना न तो मुमकिन है, और न ही जायज है। 
ऐसे में भारतीय लोकतंत्र में एक स्वस्थ परंपरा बननी चाहिए कि शासन प्रमुख चाहे वे म्युनिसिपल या जिला पंचायत में हों या फिर वे देश-प्रदेश में हों, उनकी लंबी नामौजूदगी की हालत में उनका विकल्प संवैधानिक ढांचे में ही तय कर दिया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था हो जाने पर राजनीतिक दल, और उनके भीतर के गुट विकल्प की सोचने के लिए तैयार भी रहेंगे। दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन में जो लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष चुनाव से जनता का विश्वास जीतकर सत्ता पर आते हैं, उनको खुद को भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि जिस जिम्मेदारी के लिए उनको चुना गया है, उसे अगर वे पूरा समय नहीं दे पाते हैं, तो उन्हें किसी और के लिए कुर्सी खाली करनी चाहिए। ऐसे ही मौके पर पार्टियों के सामने अपने किसी दूसरे नेता को मौका देने और उनको अपनी काबिलियत साबित करने देने का वक्त भी आता है, और इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानना चाहिए। जिस तरह किसी खेल की टीम में एक खिलाड़ी के घायल हो जाने पर उसकी जगह दूसरे को मौका मिलता है, और बहुत से नए खिलाड़ी ऐसी ही चुनौतियों के मौकों पर अपना हुनर दिखाकर आगे की टीम में जगह बना जाते हैं। 
राज्य हो या शासन-प्रशासन की कोई और इकाई, उसकी जिम्मेदारी को कम नहीं आंकना चाहिए। जब कभी ऐसी जिम्मेदारी को लेकर किसी कड़े फैसले का वक्त आए, तो फैसले की ताकत रखने वाले लोगों को, पार्टियों को, यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके पास जो अधिकार है, उससे कहीं अधिक उन पर जिम्मेदारी है, और उसे ध्यान में रखते हुए शासन-प्रशासन की सबसे अच्छी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें निरंतरता भी बनी रहे। मनोहर पर्रिकर भारत में सबसे सज्जन और सबसे सादगी वाले, ईमानदार छवि वाले नेता माने जाते हैं। वे चाहे जिस पार्टी में हो, उनके व्यक्तित्व के इन पहलुओं की वजह से उनकी पार्टी का सम्मान बढ़ता ही है। ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़कर एक और मिसाल कायम करनी चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 सितंबर

21वीं सदी की शिक्षा 19वीं सदी पहुंच गई..

संपादकीय
18 सितंबर 2018


भोपाल विश्वविद्यालय की खबर है कि वहां आदर्श बहू बनाने का एक कोर्स चलाया जाने वाला है। इसके बारे में कुलपति ने बताया कि वहां ऐसी बहुएं तैयार की जाएंगी जो पूरे परिवार को साथ लेकर चल सकें। इसके अलावा आदर्श बहू की कई ऐसी खूबियां भी गिनाई गई हैं जो कि भारतीय संस्कृति के लिए एक खास नजरिए के हिसाब से संस्कारी कही जा सकेगी। कुलपति का कहना है कि एक विश्वविद्यालय के तौर पर उनकी समाज के प्रति भी जिम्मेदारी है, और उनका मकसद ऐसी दुल्हनें तैयार करना है जो परिवारों को जोड़कर रख सकें। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कुछ विश्वविद्यालय अपना मखौल उड़ाने का सामान खुद ही जुटाकर दे रहे हैं। कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के बारे में खबर आई और छपी थी कि वहां पर हनुमान पर दो दिन का एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ। अभी भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की खबर आई है कि वहां पर ज्योतिष, मीडिया, और विश्वसनीयता विषय पर एक व्याख्यान हुआ जिसमें एक चर्चित ज्योतिषी का भाषण हुआ। इस भाषण में ज्योतिष और आध्यात्मिकता के रिश्ते पर भी चर्चा हुई और इसी किस्म के कुछ दूसरे पहलुओं पर भी।
आज जब भारत के विश्वविद्यालयों का हाल पढ़ाई के स्तर को लेकर चौपट हो रहा है, तब विश्वविद्यालय अपना मकसद छोड़कर भारतीय संस्कृति की एक खास तस्वीर को आगे बढ़ाने में राष्ट्रवादी इरादों से जुट गए हैं। धीरे-धीरे विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पीछे की सीट पर जाकर बैठ गए हैं, और उनके बाद सामाजिक विज्ञान भी करीब-करीब क्लास के बाहर निकाल दिया गया है। जिस मकसद से पत्रकारिता विश्वविद्यालय बनाए गए हैं, वे मकसद भी टीसी देकर बाहर कर दिए गए हैं, और अब धर्म, आध्यात्म, राष्ट्रवाद, राष्ट्रभाषा, भारतीय संस्कृति जैसे पहलुओं ने पूरे  कैंपस पर राज शुरू कर दिया है। 
धर्मांधता और राष्ट्रवाद से किसी का भला नहीं होता है। कहने के लिए जिन शिक्षण संस्थाओं को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है, उनके सोचने का दायरा विश्व छोड़, हिंदुस्तान छोड़, एक खास धर्म से जुड़ी संस्कृति तक सीमित कर दिया गया है, इससे खोखले होते इस धर्म को एक आक्रामक ताकत तो मिल सकती है, लेकिन इससे विश्वविद्यालय का लेबल लगी हुई पढ़ाई का कोई भला नहीं हो सकता। पत्रकारिता विश्वविद्यालय जैसे संस्थान एक पेशे के लिए लोगों को तैयार करने के लिए बनाए गए थे। अब वे हनुमान चालीसा पढ़ाकर उसे दुनिया का सबसे अच्छा संचार साबित कर रहे हैं। यह सोच उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वैज्ञानिक सोच के स्तर की तो है कि हमलावर बंदरों को भगाना हो तो हनुमान चालीसा पढ़ी जाए। कुछ इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ का पत्रकारिता विश्वविद्यालय हनुमान चालीसा पढ़ाता है कि पत्रकारिता का ज्ञान कहीं आसपास फटक भी रहा हो, तो वह दूर भाग जाए। 
आज की 21वीं सदी में यह देश एक आदर्श बहू बनाने का कोर्स तो चलाना चाह रहा है, लेकिन वह लड़कों और आदमियों के लिए ऐसा कोई कोर्स चलाने की नहीं सोचता कि वे बलात्कारी न बनें। इस देश की उच्च शिक्षा 21वीं सदी से रिवर्स गेयर में चलती हुई 19वीं सदी तक पहुंची हुई दिख रही है, और बहुत सी सदियां पीछे जाना अभी बाकी भी हैं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 सितंबर

जायज हक, या नाजायज काबू?

17 सितंबर  2018

इन दिनों ऐसे तमाम लोगों की जिंदगी बिना इंटरनेट नहीं गुजरती जिनके पास किसी तरह की डिजिटल तरकीब है, और जो मुफ्त या तकरीबन मुफ्त मिलने वाले इंटरनेट के ग्राहक हैं। शहरी आबादी में तो अब मजदूर तक इंटरनेट का इस्तेमाल करते दिखते हैं, और ऐसे में यह सोचना भी नामुमकिन है कि इंटरनेट पर लोगों की दौड़ अगर बंध जाएगी, तो उनकी जिंदगी ऐसी ही चलती रहेगी। खासकर उन लोगों की जिंदगी जो अपनी पढ़ाई, अपने रिसर्च, अपने कामकाज, इनके लिए इंटरनेट पर जरूरत की तलाश करते हैं।
इस बात पर चर्चा की जरूरत इसलिए आ गई है कि पिछले हफ्ते यूरोपीय संसद ने एक ऐसे नए डिजिटल कॉपीराइट कानून पर चर्चा की है जिसके आने से गूगल, फेसबुक, या यूट्यूब जैसे तमाम प्लेटफॉम्र्स को अपनी कमाई उन तमाम लोगों के साथ बांटनी होगी जहां की खबरें उनके प्लेटफॉर्म पर दिखती हैं, या जिनका लिखा हुआ, गढ़ा हुआ, गाया या बजाया हुआ इन पर सर्च करने पर दिखता है। यह नया कानून ऐसे तमाम सर्च इंजन और प्लेटफॉर्म को इस बात के लिए जवाबदेह बनाने जा रहा है कि उन पर ढूंढी हुई जो चीजें भी किसी की कॉपीराइट हैं, उन लोगों को भुगतान देना इनको वहां देखा नहीं जा सकेगा।
इस प्रस्तावित कानून के आलोचकों का यह कहना है कि कानून में सर्च इंजनों और सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स की जिम्मेदारी इतनी बढ़ा दी गई है कि इससे इंटरनेट की एक किस्म से मौत भी हो सकती है, और हो सकता है कि ऐसे कॉपीराइट-फिल्टरों की वजह से आज के आजाद इंटरनेट पर एक सेंसरशिप लागू हो जाएगी।
अब इसके बारे में जरा ध्यान से सोचें, तो आज की इंटरनेट की हालत यह है कि वह एक तरफ तो सड़क किनारे रखे पीकदान जैसा हो गया है, जिसमें आते-जाते कोई भी थूककर चले जा सकते हैं, बिना किसी परेशानी के। दूसरी तरफ यह इंटरनेट गांव का एक ऐसा तालाब भी हो गया है जिसमें लोग अपना पखाना धोने से लेकर अपने जानवरों को नहलाने तक, और अपने ईश्वरों को विसर्जित करने तक का सारा काम बिना किसी जवाबदेही के कर सकते हैं, और उसके पानी का मनचाहा इस्तेमाल कर सकते हैं, बिना किसी भुगतान के।
किसी सार्वजनिक संपत्ति का कैसा इस्तेमाल हो सकता है यह अगर देखना हो तो इंटरनेट को देखना ठीक होगा जिसे कम लोग नेक काम के लिए या अपने पेशे के कामकाज के लिए, पढ़ाई और शोध के लिए इस्तेमाल करते हैं, और अधिक लोग उसे फिजूल की बातों के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन यूरोपीय संसद का यह नया प्रस्तावित कानून इन दो किस्म के इस्तेमाल की वजह से नहीं बन रहा है, यह बन रहा है कि जिन लोगों की मेहनत से कोई खबर बनती है, तस्वीर या कार्टून बनते हैं, उपन्यास या कहानी लिखी जाती है, कोई संगीत तैयार होता है, उसका इस्तेमाल होने पर इंटरनेट कंपनियों के मुनाफे में से उनको भी हिस्सा मिले। आज लोगों को नेट पर सर्च करना तो मुफ्त हासिल है, लेकिन जिन वेबसाइटों के मार्फत वे सर्च करते हैं, उन वेबसाइटों को तो बाजार से, इश्तहार से, ग्राहकों का डेटा बेचकर कमाई होती है। लेकिन इस कमाई का कोई हिस्सा उन लोगों तक नहीं जाता जिन लोगों की मेहनत से वह सामग्री तैयार होती है जिसे ढूंढकर लोग अपनी जरूरत पूरी करते हैं।
इस नजरिए से अगर देखें तो यह नया कानून सेंसरशिप तो नहीं सुझाता, यह महज मुफ्त की कमाई करने वाली इंटरनेट कंपनियों पर इतनी जिम्मेदारी ही लादता है कि ये कंपनियां लोगों के कॉपीराइट वाले कंटेंट के एवज में उनके साथ अपनी कमाई का एक हिस्सा बांटे।
अब चूंकि इंटरनेट और सोशल मीडिया, और तरह-तरह की वेबसाइटों से दुनिया का लोकतंत्र इस तरह जुड़ गया है, कि आज अगर कोई लोगों से यह उम्मीद करे कि वे किसी खबर का लिंक ट्विटर या फेसबुक पर पोस्ट करते हुए, या कहीं और वह लिंक आगे बढ़ाते हुए उसके लिए भुगतान करें, तो इसका एक मतलब यह निकलेगा कि जो लोग ऐसा भुगतान करने की ताकत रखते हैं, महज वही लोग अपनी पसंद के विचार को, अपनी पसंद की सामग्री को आगे बढ़ा सकेंगे, और इससे दुनिया में विचारों पर, सोच पर, एक किस्म का परोक्ष नियंत्रण लद जाएगा क्योंकि आज समाचार-विचार और सामग्री का जो उन्मुक्त आदान-प्रदान मुफ्त में चल रहा है, वह इस कानून के बाद हो सकता है कि भुगतान-आधारित हो जाए। इसे कुछ और खुलासे से समझें, तो हो सकता है कि गरीबों के बुनियादी मुद्दे आगे बढऩा घट जाए, और रईसों के गैरजरूरी मुद्दे आगे बढ़ते चले जाएं। इससे दुनिया मेें असल लोकतांत्रिक तस्वीर से परे एक ऐसी तस्वीर बन सकती है जिसके लिए रंग और ब्रश खरीदना अधिक संपन्न के लिए अधिक मुमकिन हो पाएगा।
यह तो एक आशंका की एक नाटकीय कल्पना है, लेकिन यह तय है कि जब टेक्नालॉजी और बाजार मिलकर कुछ करते हैं, तो लोकतंत्र उसका एक बड़ा शिकार हो जाता है, बड़ी रफ्तार से। पहली नजर में यूरोप का यह प्रस्तावित कानून इस मायने में ठीक लगता है कि इससे सामग्री तैयार करने वालों को मेहनताना और मुआवजा मिल सकेगा, लेकिन इसके कुछ दूसरे किस्म के असर भी होंगे, जिनका पूरा अंदाज अभी आसान और मुमकिन नहीं है। आज इसकी चर्चा जरूरी इसलिए है कि जिंदगी को प्रभावित करने वाली जो बातें कल होने जा रही हैं, उनके बारे में अगर आज सोचा नहीं जाएगा, तो सरकार और कारोबार जिंदगी को इतना बदल सकते हैं कि उसे पहचाना न जा सके।  (Daily Chhattisgarh)

किसानों की दिक्कत को महज सब्सिडी से निपटाना असंभव

संपादकीय
17 सितंबर 2018


बस्तर के सैकड़ों किसान तीर-कमान के साथ पदयात्रा करते हुए 18 सितंबर को रायपुर पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य सरकार से काफी अपेक्षाएं थी, लेकिन सरकार खरी नहीं उतरी। कर्ज के बोझ तले आज वे पूरी तरह से डूब चुके हैं। किसानी आज घाटे का सौदा बन गया है। शासन ने किसानों के हित में अनेक योजनाएं तो जरूर बना दी लेकिन इन योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर पर उन्हें मिल रहा है या नहीं इसे देखने वाला कोई नहीं है, वे बिचौलियों के हाथों लूटे जा रहे हैं। 
राजधानी तक का  221 किमी का सफर शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा है। पाठकों को याद होगा कि जब देश में कहीं जाट आंदोलन में तो कहीं और किसी जाति के आंदोलन में हफ्तों तक पटरियों पर ट्रेन बंद हो जाती है, सड़कों पर गाडिय़ां जलाने के साथ-साथ मुसाफिरों से बलात्कार होने लगते हैं, तो इसी देश के भीतर दूसरे हिस्सों तक ये खबरें पहुंचती हैं, और वहां भी आंदोलन हिंसक होने लगते हैं। लोगों को ऐसा भी लगता है कि जब तक आंदोलन हिंसक नहीं होंगे, तब तक उनकी सुनवाई नहीं होगी। इसलिए जब राज्यों में चुनाव करीब रहते हैं, तो हर कर्मचारी संगठन के आंदोलन होने लगते हैं कि उनकी पुरानी मांगों पर आंदोलन से सुनवाई हो सकती है। भारतीय लोकतंत्र में प्रदर्शन के दौरान हिंसा को दोनों तरफ से एक किस्म से अनिवार्य या अपरिहार्य मान लिया गया है, और देश भर में जगह-जगह सड़कों पर हिंसा और तोडफ़ोड़ दर्ज होती है।
किसानों की मांगों को देश के बाकी हालात से काटकर नहीं देखा जा सकता। आज जब ग्राहक हर बार अपनी पिछली गाड़ी से बड़ी गाड़ी, अपने पिछले टीवी से बड़ा टीवी, और अपने पिछले मोबाइल फोन से अधिक बड़ा या अधिक महंगा फोन लेने में तकलीफ महसूस नहीं करते, तब आलू-प्याज, या अनाज के दाम देते हुए लोगों की जान निकलने लगती है। जबकि हकीकत यह है कि खेती अब बहुत महंगा कारोबार हो चुकी है। खेतिहर मजदूर बहुत महंगे हो गए हैं क्योंकि गांवों में सरकारी मजदूरी का रेट बहुत ऊपर चले गया है, और उतनी मजदूरी देकर किसान को कुछ कमाई बचना शायद नामुमकिन रहता है। इसके अलावा किसानों के परिवार के सारे लोग पहले खेती में उतरते थे, और वे खुद मजदूर की तरह भी काम कर लेते थे, लेकिन आज तो किसान की अगली पीढ़ी किसान बनना ही नहीं चाहती। और नौबत अगर सचमुच इतनी खराब न होती, तो इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या क्यों करते?
अब अगर हम इस समस्या के समाधान की बात अगर करें, तो केन्द्र सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर किसानों की मदद के लिए कुछ फैसले लेती आई हैं। सस्ता खाद, सस्ती बिजली, सस्ते बीज, और उपज का अधिक समर्थन मूल्य, इन सबसे किसान कुछ हद तक जिंदा बच पाए हैं। कहीं-कहीं कर्जमाफी या ब्याजमाफी भी देखने में आती है, और उससे भी कुछ आत्महत्याएं रूकती हैं। लेकिन एक बड़ी बात यह है कि लगातार सरकारी अनुदान या मदद से चलने वाला कारोबार अपने खुद के पैरों पर खड़ा रहना भूल जाता है। इसलिए जरूरी यह है कि किसान की जिंदगी में मुमकिन कई दूसरी बातों को बढ़ावा दिया जाए ताकि कुल मिलाकर किसान का जिंदा रहना हो सके। जिसमें डेयरी या दूसरे किस्म के पशुपालन के काम हो सकते हैं, सब्जी या फल-फूल की खेती हो सकती है, मधुमक्खी पालन हो सकता है, और गांवों में हो सकने वाले कई तरह के कुटीर उद्योग हो सकते हैं जिनसे कि किसान को मजदूरी की तलाश में दूसरे राज्यों में न जाना पड़े, और खुदकुशी न करनी पड़े। लेकिन इनमें से कोई पहल होने के बजाय पिछले दिनों हुआ यह है कि गाय, गोवंश, और बाकी कुछ जानवरों को कटने से बचाने के नाम पर ऐसे कानून बनाकर लागू कर दिए गए हैं जिनसे बूढ़े या कमजोर जानवर खुद भूख से मर जाएंगे, और उनके मालिक किसान जहर से। जानवरों की खरीद-बिक्री, और उनके कटने का सिलसिला खेती के समय से ही चले आ रहा है, और उसे रातोंरात इस तरह से बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट किया जा रहा है, और इसके भयानक नतीजे सामने आएंगे। जानवरों का इंसान की जिंदगी में एक उपयोग होता है, और वह उपयोग निपट जाने के बाद उन पर इंसान तभी कुछ खर्च कर पाते हैं, जब वे खुद का पेट भर पाते हैं, और कुछ बचा पाते हैं। अगर किसान से जानवरों की खरीद-बिक्री का हक इस तरह से छीन लिया जाएगा, तो खेती की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट लगेगी।
किसानों के बहुत से मुद्दे हैं, और उनको महज किसानी-सब्सिडी से नहीं निपटाया जा सकता। गांवों की अर्थव्यवस्था को ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योग की मदद से बढ़ाना होगा, उसके बिना कोई सीधा इलाज नहीं है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 सितंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 16 सितंबर

चुनाव से कालाधन हटाना मुश्किल नहीं, नामुमकिन

संपादकीय
16 सितंबर 2018


मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने कुछ राज्यों में आने वाले चुनाव के ठीक पहले दो-तीन खतरे गिनाए हैं जो कि भारत के चुनाव कानून के तहत बेकाबू हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल से निपटने के लिए मौजूद कानून नाकाफी हैं। इसके साथ-साथ उन्होंने मतदाताओं के बारे में सोशल मीडिया और दूसरे जरियों से डेटा जमा करने का खतरा भी गिनाया और फेक न्यूज से जनमत को खतरे का जिक्र भी किया। 
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग पिछले महीनों और बरसों में लगातार एक मुद्दे पर चर्चा करते आ रहे हैं कि चुनावी राजनीति से मुजरिमों को किस तरह दूर और बाहर रखा जाए। लेकिन बात किसी किनारे शायद इसलिए भी नहीं पहुंच पा रही है कि बहुत से राजनीतिक दलों के अपने-अपने पसंदीदा मुजरिम हैं, और उनमें से कोई भी इनसे छुटकारा नहीं चाहते। अपनी पार्टी से किस मुजरिम या संदिग्ध को, कटघरे में खड़े हुए, या कि जमानत पर छूटे हुए को टिकट दी जाए या नहीं, पार्टी में कोई ओहदा दिया जाए या नहीं, यह तो पार्टी की अपनी मर्जी पर रहता है। लेकिन किसी को जुर्म से परहेज दिखता नहीं है। नतीजा यह होता है कि हर किस्म के मवाली राजनीतिक ताकत से भी लैस होकर कभी किसी को गोली मारते हैं, तो कभी किसी सांसद को कत्ल की धमकी देते हैं, तो कहीं रेत और जंगल-माफिया बनकर सरकारी कर्मचारियों की हत्या करते हैं। इन सबके बाद भी अपराधियों से छुटकारा पाना बहुत से राजनीतिक दलों की नीयत में दिखता ही नहीं है। कर्नाटक के पिछले चुनाव में यह साफ देखने मिला कि जब बदनाम और कुख्यात हो चुके खदान-माफिया रेड्डी-बंधुओं को भाजपा ने टिकट नहीं दिया, तो उनके चुनिंदा आधा दर्जन से अधिक लोगों को टिकट दी, ताकि वे अपनी अथाह संपत्ति से उन्हें जिताकर ले आएं।
ठीक इसी तरह चुनावों में कालेधन का इतना बड़ा बोलबाला हो गया है कि कई राजनीतिक दल औपचारिक रूप से टिकट मांगने वालों से पूछते हैं कि उन्हें चुनाव में पार्टी से आर्थिक सहायता लगेगी या नहीं। और यह सवाल चुनाव आयोग की छोटी सी खर्च-सीमा के बारे में नहीं रहता, बल्कि दो नंबर के पैसों के सैलाब के बारे में रहता है जिनसे बहुत से चुनावों का संतुलन बदल जाता है। भारत के चुनावों में जगह-जगह खर्च का असर देखने मिलता है, और उससे जमीन-आसमान का फर्क चाहे न पड़ता हो, उससे पलड़ा दूसरी तरफ झुक जरूर जाता है, और चुनाव की जीत-हार तो एक वोट से भी होती है। 
जनता के बीच कम से कम एक तबका ऐसा है जो कि ऐसे भ्रष्ट को चुनना चाहता है जो कि चुनाव के बाद अगले पांच बरस भी जरूरत के वक्त, या कोई मौका आने पर लोगों की नगद-मदद करते रहें। लोग बिल्कुल दीन-हीन या पूरी तरह ईमानदार को मुश्किल से ही चुनते हैं क्योंकि ऐसे नेता बाद में क्या मदद करेंगे? इसलिए चुनावों में ऐसे रॉबिनहुड कहे जाने वाले नेता जीत की बड़ी संभावना रखते हैं जो कि पांच बरस तक जमकर लूटते हैं, और साथ-साथ उसका एक हिस्सा अपने इलाके के वोटरों पर खर्च भी करते चलते हैं। अब जैसा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है, और चुनाव के दौरान जब्त होने वाली मोटी रकमों से भी साबित होता है, चुनाव से कालेधन को अलग करना मौजूदा कानून के तहत नामुमकिन है। भारत में निष्पक्ष चुनाव, महज एक बेबुनियाद नारा है, और बहुत से मामलों में जीत सीधे-सीधे खरीदी जा सकती है, खरीदी जाती है। ऐसे में चुनाव कई बार महज यही साबित कर पाते हैं कि सबसे काबिल चुनाव-मैनेजर कौन हैं, और सबसे अच्छा भुगतान करने वाले कौन हैं। ऐसी चुनाव व्यवस्था पर खुशफहम लोकतंत्र उसी रफ्तार से खोखला होते चल रहा है, जिस रफ्तार से संसद और विधानसभाओं में अरबपति-खरबपति बढ़ते चल रहे हैं।
-सुनील कुमार

(Daily Chhattisgarh)

इस देश का मिजाज ही है गंदगी में जीने का...

संपादकीय
15 सितंबर 2018


गांधी जयंती, दो अक्टूबर तक देश भर में स्वच्छता अभियान छिडऩा एक बार फिर खबरों में आ रहा है। टीवी पर अमिताभ बच्चन लगातार विज्ञापनों और कार्यक्रमों के रास्ते स्वच्छता अभियान को बढ़ावा दे रहे हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री टीवी और रेडियो पर आकर, पूरे देश से वीडियो कांफे्रंस करके बार-बार इसकी जरूरत को याद दिला रहे हैं।  कुछ बरस पहले जब मोदी ने इसे शुरू किया था, तब समारोहपूर्वक केन्द्र और राज्य सरकारों के मंत्री और अधिकारी सफाई अभियान चलाते हुए और झाड़ू लगाते हुए दिखते थे।  हो सकता है कि जनता को इस अभियान में हिस्सेदारी में कुछ समय लगे, और यह भी हो सकता है कि लोग अपना घर भी साफ रखना न सीख पाएं, लेकिन यह मुद्दा देश के लिए, या किसी भी दूसरे देश के लिए बहुत अहमियत रखता है।
भारत जैसे देश में जहां पर कि शहरीकरण इतना बेतरतीब हुआ है, कि न तो गंदा पानी बाहर निकलने का पूरा शहरी ढांचा है, और न ही ठोस कचरे के निपटारे में शहरी म्युनिसिपल कामयाब हो पाए हैं। ऐसे ढांचे वाले देश में जब जनता एकदम ही गैरजिम्मेदार हो जाती है, तो वह घर के सामने की नाली को घूरे की तरह इस्तेमाल करती है, और अपने घर के कचरे को कोशिश करके सड़़क के दूसरी तरफ फेंकती है। हम अपने आसपास के रोज के तजुर्बे को देखें, तो शहरों में लोग मकानों को तोडऩे से निकला हुआ मलबा भी घूरों पर फेंकते हैं, और इतना ठोस कचरा-मलबा उठा पाना किसी भी म्युनिसिपल के बस का नहीं रह जाता है।
आज सरकारी दफ्तरों की खुद की सफाई बहुत अधिक मायने नहीं रखती, और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुरू किया हुआ एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम अधिक है कि पहले अपना घर साफ करें, फिर शहर को साफ करने निकलें। लेकिन असल गंदगी शहरों के सार्वजनिक हिस्सों में है, जो कि अनुपात में इतनी अधिक है कि उसका निपटारा लोगों की आदतें सुधरने के साथ-साथ ठोस इंतजाम से ही हो सकेगा। हम सरकार की क्षमता और सीमा को समझते हैं, किसी भी देश या शहर की सरकार गंदे लोगों की गंदगी फैलाने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसे में महात्मा गांधी को याद करना जरूरी है जिन्होंने पौन सदी पहले इस देश में सफाई को जिंदगी की एक शैली बनाने को अच्छी तरह स्थापित किया था, और अपने आश्रमों के पखानों की सफाई खुद करना, अपने परिवार से करवाना भी शुरू किया था। यह सिलसिला भी जरूरी है, इसलिए कि जब लोग किसी जगह को खुद साफ करेंगे, तो लोग उसे गंदा करने से हिचकेंगे भी।
लेकिन शहरीकरण के साथ-साथ कचरा इतना अधिक पैदा होता है, और बदमिजाज लोगों की आबादी के बीच में वह इस कदर फैला और बिखरा रहता है, कि उसे उठाना और ठिकाने लगाना खासा महंगा पड़ता है। और हाल के बरसों में हमने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल का बदलता हुआ मिजाज देखा है, उनको नाली, पानी, सफाई, रौशनी की बुनियादी शहरी जरूरतों को पूरा करने के बजाय सैकड़ों करोड़ के निर्माण के ठेके-टेंडर में दिलचस्पी अधिक होने लगी है, बड़े-बड़े कॉम्पलेक्स बनाना अच्छा लगने लगा है, और ऐसा क्यों होता है, यह सबको मालूम है। इस देश के शहरों में म्युनिसिपलों के तौर-तरीकों को, उनकी सोच को, और उनके काम के दायरे को बाजारू सोच से बाहर लाने की जरूरत है, उसके बिना कचरे का निपटारा वैसा ही ढीला पड़े रहेगा, जैसा कि पिछले एक बरस से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देखने मिल रहा है।
आने वाली गांधी जयंती तक सरकारी कार्यक्रमों में झाड़ू लगाते हुए बड़े-बड़े लोग तस्वीरें तो खिंचवा लेंगे, लेकिन यह अभियान, और इसका नारा, किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि उस पर अमल किस तरह से हो पाएगा, किस हद तक हो पाएगा। लेकिन अपनी तमाम आशंकाओं के साथ हम इस पहल का स्वागत करते हैं कि सौ मील का सफर भी शुरू तो पहले कदम से ही होता है। प्रधानमंत्री ने जो पहल की है, वह अगर इस देश के लोग आगे बढ़ाते हैं तो यह देश बाकी सभ्य और साफ-सुथरे देशों की हिकारत से बच सकेगा। आज तो हाल यह है कि प्रवासी भारतीय भी अपनी जन्मभूमि की गंदगी को देखते हुए यहां लौटकर बसना ठीक नहीं समझते। हिन्दुस्तानियों का मिजाज ही गंदगी में जीने का दिखता है।  (Daily Chhattisgarh)