वोट का हक न चूकें

संपादकीय
19 नवम्बर 2018


अठारह बरस पहले राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ इस बार सबसे अधिक संघर्ष वाला चुनाव देख रहा है जिसमें पहली बार एक तीसरी शक्ति भी मैदान में है। अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से कांग्रेस और भाजपा ही दो पार्टियां रही हैं, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ के एक जुझारू नेता अजीत जोगी ने बसपा की मायावती के साथ हाथ मिलाकर एक अलग तस्वीर पेश कर दी है। बहुत सी सीटों पर वोटों की गिनती काफी कुछ हो जाने तक तस्वीर शायद साफ नहीं रहेगी। लेकिन दूसरी तरफ तकरीबन तमाम मीडिया ने, और राजनीतिक विश्लेषकों ने छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के इस पहले दाखिले को अनदेखा कर दिया है, और उसे महत्वहीन माना है। लेकिन हकीकत इससे काफी अलग भी हो सकती है, और यह हो सकता है कि कुछ सीटों पर आम आदमी पार्टी को मिलने वाले वोट जीत-हार का फैसला करने वाले वोटों से काफी अधिक भी हों। छत्तीसगढ़ में विद्याचरण शुक्ल ने एक वक्त कांग्रेस से नाराज होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बैनरतले चुनाव लड़ा था, और उन्हें प्रदेश में सात फीसदी वोट मिले थे जो कि जोगी को सरकार से बेदखल करने के लिए काफी था। लेकिन उसके बाद से हर चुनाव में प्रदेश स्तर पर पार्टियों की जीत-हार के वोटों का फासला घटते गया। आज हालत यह है कि इतने कम वोटों से कई सीटों पर फैसला हो सकता है कि बाद में वहां के वोटरों को यह मलाल है कि वे अगर सुस्ती छोड़कर चले गए होते तो शायद उनके चहेते उम्मीदवार जीत जाते। 
जब धुंध इतनी छाई हुई हो, और टक्कर कांटे की हो, तो लोगों को अपनी जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभानी चाहिए। हम इसी जगह पर मतदाताओं से पहले भी कई बार यह अपील कर चुके हैं कि उन्हें न केवल खुद वोट डालने जाना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने आसपास के कुछ और लोगों को भी साथ ले जाना चाहिए ताकि अगली सरकार चुनने के फैसले में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी हो। अभी छत्तीसगढ़ चुनाव के पहले दौर की जिन अठारह सीटों पर मतदान हुआ है, उनके आंकड़े देखें तो हैरानी होती है कि किस तरह वे पिछले चुनाव के आंकड़ों के एकदम आसपास रहे, जबकि हालात इस बार काफी कुछ अलग थे। पहले दौर में आदिवासी और नक्सल प्रभावित इलाकों की सीटें अधिक थीं, लेकिन अब होने वाले मतदान में शहर-कस्बों के इलाके अधिक हैं, और ऐसे में कोई नक्सली बम-धमाके का खतरा भी नहीं है, इसलिए अधिक से अधिक लोगों को वोट डालने निकलना चाहिए। 
दरअसल जब वोटर उतने के उतने बने रहते हैं, तो राजनीतिक दलों पर भी चर्बी चढ़ जाती है, और वे भी जनता के बीच एक सीमा तक मेहनत करके बैठ जाते हैं। जैसे ही छत्तीसगढ़ में दो पार्टियों से तीन पार्टियां हुईं, और चौथी आम आदमी पार्टी भी मैदान में उतरी, तो नजारा कुछ बदला है। दोनों बड़ी पार्टियों के लोगों को यह आशंका होने लगी है कि जोगी, बसपा, आप, सीपीआई, सीपीएम, और पार्टियों के बागी पता नहीं कितने वोट ले जाएंगे, और उससे हाथ आई हुई जीत किस तरह निकल जाएगी। ऐसे में सभी को अधिक से अधिक वोटरों के बीच जाने की मजबूरी समझ में आ रही है। वोटरों को भी अपने हक और अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए, और उन्हें खूब मेहनत करके खुद भी निकलना चाहिए, और आसपास के कुछ और लोगों को लेकर जाने की कोशिश करनी चाहिए। लोग वोट डालने न निकलें, और बाद में पांच बरस सरकार को कोसते रहें, वह लोकतंत्र में अच्छी नौबत नहीं है। यह मौका छत्तीसगढ़ की जनता को अगले पांच बरस के लिए अपने पसंद की सरकार चुनने का है, और इसे चूकना नहीं चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 नवंबर

चुनाव की तैयारी महज महीने भर का काम नहीं, 5 बरस का

संपादकीय
18 नवम्बर 2018


छत्तीसगढ़ में दो दिन बाद जनता के हाथ से सरकार चुनने का मौका निकल जाएगा। तीन कार्यकाल की रमन सरकार ने पिछले एक बरस में अपने तमाम कामों को जनता के सामने तरह-तरह से रखा है, और भूपेश बघेल की शक्ल में कांग्रेस को आक्रामक तेवर वाला एक ऐसा प्रदेश अध्यक्ष मिला है जिसने राज्य सरकार पर हमला बोलने का एक भी मौका नहीं चूका। सरकार ने खूब काम भी किए हैं, खूब गड़बडिय़ां भी हुई हैं। सीडी के मामले में भी दोनों तरफ का स्कोर बराबर हो गया है, और हैरानी की बात यह है कि मतदान के पहले के दो दिनों में सीडी का कोई जिक्र भी अब बाकी नहीं है क्योंकि लोग थक गए हैं। अब न कोई सेक्स-सीडी की असली या नकली शक्ल देखना चाहते, और न ही दबे-छुपे कैमरों से रिकॉर्ड की हुई बातों पर लोगों का अधिक भरोसा है। यह सब देखकर लोग अब गंभीरता से उन मुद्दों को देख रहे हैं जो कि राष्ट्रीय स्तर के नेता यहां आकर राज्य स्तर के चुनाव में उठा रहे हैं। 
ऐसी जानकारी है कि रमन सरकार ने संगठन के हिस्से का भी बहुत सा काम किया है, और सरकार के किए गए अच्छे कामों को मतदान केन्द्र स्तर पर दर्ज करके ऐसी वोटर लिस्ट तैयार की है जिसके घर-घर को मिला हुआ फायदा एक नजर में दिख जाता है। जाहिर है कि पन्द्रह बरस से विपक्ष में बैठी कांग्रेस को न तो ऐसी सहूलियत थी कि वह अपनी किसी कामयाबी को दर्ज कर सके, और न ही उसके पास ऐसी क्षमता ही थी। फिर भी विपक्ष में रहते हुए सरकार की खामियों को गिनाने का जो एक बेहतर मौका रहता है, कांग्रेस ने समय रहते उसका इस्तेमाल करके पूरी तैयारी की हो ऐसा लगता नहीं। नतीजा यह है कि दिल्ली से आए हुए भाजपा के नेता कुछ आधारहीन बातें भी छत्तीसगढ़ में कर जा रहे हैं, तो उसे पकडऩे की फुर्ती कांग्रेस के पास आज नहीं है। 
कुछ दिनों पहले इसी बात को छूते हुए हमने इसी जगह लिखा था कि विपक्ष का काम सरकार पर नजर रखने का जितना पैनेपन का होना चाहिए, उतना भारतीय राजनीति में दिखाई नहीं पड़ता है। आज अगर कोई पिछले पांच बरस की अखबारी कतरनों को लेकर भी बैठें तो भी सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की जीत को मुश्किल में डाल सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की वैसी तैयारी है नहीं, और न ही राज्य में इस बार उतरी तीसरी पार्टी जोगी की है। आखिरी का पूरा हफ्ता ठोस मुद्दों से परे गंगाजल और गीता-कुरान की कसम जैसी बातों पर सरक गया है, और मतदाता को इस रफ्तार से भावनाओं के सैलाब में बहाना मुमकिन नहीं है क्योंकि लोग अब समझदार भी हो चुके हैं। सच पूछा जाए तो आज चुनाव के ठीक पहले का माहौल देखकर भी यह लगता है कि पांच बरस इस प्रदेश में मीडिया ही मुख्य विपक्ष था जिसने तमाम किस्म के मुद्दे उठाए थे। अब चुनाव के वक्त पर उसकी धार कुछ कम जरूर हो गई है, लेकिन इतने बरस के मीडिया के रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके विपक्ष एक शानदार तैयारी कर सकता था। लेकिन यह चर्चा दो दिन बाद गैरजरूरी नहीं हो जाएगी क्योंकि अगली सरकार प्रदेश में जो भी बने, उसका एक विपक्ष तो रहेगा ही, और वह चौकन्ना रहेगा, तो लोकतंत्र बेहतर तरीके से चल सकेगा। 
एक दूसरी जरूरत छत्तीसगढ़ में ऐसे जनसंगठनों की लगती है जो कि चुनाव के हिसाब से राज्य की सत्ता, और राज्य के विपक्ष से भी हिसाब मांग सकें, और जनता के मन के मुद्दों को उठा सकें। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव, सिर्फ विधानसभा या संसद, सिर्फ घोषणा पत्र नहीं होता है, लोकतंत्र इन सबसे बढ़कर तमाम जनता की जिंदगी तक फैला रहता है, और उसके मुद्दों को अगर राजनीतिक दल ठीक से नहीं उठा पाते, तो देश के और संगठनों को, और लोगों को इस काम में मदद करनी चाहिए। अगर छत्तीसगढ़ या किसी दूसरे प्रदेश का विपक्ष पांच बरस जमकर तैयारी करेगा, तो शायद कोई भी सत्ता लगातार दुबारा जीतकर न आ पाए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 नवम्बर

छत्तीसगढ़ की अगली सरकार को दिखानी होगी बाजीगरी...

संपादकीय
17 नवम्बर 2018


छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश और राजस्थान में अलग-अलग पार्टियों के चुनावी वायदों को देखें तो यह समझ पड़ता है कि मतदाताओं को सीधे तोहफा, फायदा, और रियायत देने की घोषणाओं में सभी पार्टियों का गलाकाट मुकाबला चल रहा है। ये सारी रियायतें सुनने में भली लगती हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद जब इन पार्टियों पर इन वायदों को पूरा करने की जिम्मेदारी आएगी, तो उसके बाद शायद प्रदेश के एक समझदार बजट की गुंजाइश खत्म ही हो जाएगी। पार्टियों के राजनीतिक-अकाऊंटेंट यह हिसाब लगाते हैं कि फायदा पाने के वायदे से कोई तबका छूट तो नहीं जा रहा है, और फिर उसी हिसाब से वायदे तैयार किए जाते हैं, उनका असली अर्थव्यवस्था से और असली संभावनाओं से कोई लेना-देना नहीं रहता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ उन राज्यों में से है जो विधानसभा चुनाव के छह महीने बाद लोकसभा चुनाव झेलेगा, और उसके छह महीने बाद म्युनिसिपल-पंचायतों के चुनाव। इस तरह पांच में से करीब दो बरस इस राज्य में तोहफों और, और अधिक तोहफों के वायदों में गुजर जाते हैं, यह एक अलग बात है कि पिछले पन्द्रह बरस में डॉ. रमन सिंह अकेले ऐसे रहे हैं जिन्होंने तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तीन स्थानीय संस्था चुनाव में अपनी पार्टी को बहुमत दिलवाया, और वायदे भी शायद कुछ हद तक पूरे किए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने किसी वायदे को पूरा करने की नौबत आई ही नहीं, और वही हाल पहली बार चुनाव में उतरने वाली जोगी कांग्रेस का है।
अब सवाल यह है कि राज्य की अर्थव्यवस्था की व्यापक समझदारी से परे हटकर जब आम जनता को सीधे मिलने वाले सरकारी फायदे से सत्तारूढ़ पार्टी का दुबारा सत्ता पर आना जुड़ जाता है, तो फिर किसी सरकार को लुभावने फैसले लेने से कैसे रोका जा सकता है? अब ऐसे में छत्तीसगढ़ में काफी हद तक एक संतुलन दिखाया है कि उसने इन पन्द्रह बरसों में लुभावनी योजनाओं, और वोटर-तोहफों के अलावा राज्य का मोटे तौर पर विकास भी किया है। लेकिन बात अकेले छत्तीसगढ़ की नहीं है, और न ही महज इस चुनाव की है। अगले एक बरस में यह राज्य दो चुनाव और देखेगा, उन दोनों के आने तक सरकार बनाने वाली पार्टी के सामने अपने अभी के वायदों को पूरा करना शुरू करने का दबाव भी रहेगा। मतलब यह कि अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगडऩे की शुरुआत सरकार बनते ही शुरू हो जाएगी, और अर्थव्यवस्था से परे भी जनता पर किसी कड़े अनुशासन को लागू करने जैसा अप्रिय काम भी सरकार नहीं कर पाएगी। एक बरस पूरा होने के बाद ही छत्तीसगढ़ की सरकार चुनावमुफ्त हो सकेगी, और एक संतुलित समझदारी का मौका आ सकेगा। 
सरकारों की सारी की सारी लुभावनी योजनाएं फिजूल नहीं होती हैं, उनमें से कुछ ऐसी भी रहती हैं जो कि जनता के सबसे गरीब, सबसे कमजोर, और सबसे जरूरतमंद तबके की जिंदगी बदल पाती हैं। लोगों को याद होगा कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री, सामंती पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले अर्जुन सिंह ने व्यापक जनहित के, खासकर गरीब हित के चार ऐसे फैसले लिए थे जिन्हें उनके बाद का कोई मुख्यमंत्री भी नहीं बदल पाया। जो जहां बसा है, उसे उस जमीन पर रिहायशी पट्टा, एकबत्ती कनेक्शन, रिक्शे का मालिकाना हक, और आदिवासियों को तेंदूपत्ता का मालिकाना हक, इन चार फैसलों से मध्यप्रदेश में एकमुश्त करोड़ों गरीबों की जिंदगी में फर्क आया था, और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यहां भी रमन सरकार ने जिस तरह सबसे गरीब के लिए तकरीबन मुफ्त चावल का जैसा इंतजाम किया, उससे भुखमरी झेलने वाले इस प्रदेश में जनता की जिंदगी बदली थी। लोग दो वक्त पेट भर खाने लगे हैं, कुपोषण घटा, और जिंदगी बेहतर हुई। इसलिए कुछ बुनियादी जरूरतों में सामाजिक न्याय लाने के लिए अगर चुनावी या गैरचुनावी तोहफे दिए जाते हैं, तो वे इंसाफ अधिक हैं, लुभावने तोहफे कम। छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती का साल लेकर आने वाला है, और आने वाले दो चुनावों तक सरकार को अर्थव्यवस्था सम्हालने के साथ-साथ वायदों को पूरा करने की एक बाजीगरी दिखानी होगी।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 नवम्बर

दीवारों पर लिक्खा है, 16 नवंबर

छत्तीसगढ़ का नक्शा बताता है बड़े दिलचस्प रूझान...

संपादकीय
16 नवम्बर 2018


कई बार अपने इलाके या अपने मुद्दों को देखने के लिए बाहर के लोगों का नजरिया भी बड़े काम का होता है। छत्तीसगढ़ के चुनावी नजारे को देखने के लिए आए देश के एक सबसे बड़े टीवी पत्रकार, एनडीटीवी के प्रणब रॉय ने इस राज्य के नक्शे के साथ जो तस्वीर सामने रखी है, वह बड़ी दिलचस्प है और राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने में बड़ी मदद करती है। इसके हिसाब से प्रदेश का दक्षिणी आदिवासी इलाका करीब 60 फीसदी आदिवासी आबादी वाला बस्तर है, और उसके बाद नक्शे के बीच में एक ऐसा मध्य हिंदू बेल्ट है, जिसमें 11 फीसदी आदिवासी हैं। इसके बाद का एक हिस्सा अनुसूचित जाति का जिसमें 12 फीसदी आदिवासी हैं। और सबसे उत्तर-पूर्व का हिस्सा सरगुजा है, जिसमें 47 फीसदी आदिवासी हैं। इसी नक्शे में बस्तर को देखें तो उसमें दलित वोटर कुल 4 फीसदी हैं, बीच के हिन्दू बेल्ट में वे 16 फीसदी हैं, सरगुजा के पहले के दलित सीटों वाले एक हिस्से में 22 फीसदी हैं, और सरगुजा के आदिवासी इलाके में वे 8 फीसदी हैं। इस तरह यह नक्शा बतलाता है कि किस तरह राज्य के उत्तर और दक्षिण सिरों पर आदिवासी आबादी घनी है, और इनके बीच एक हिस्सा घनी हिन्दू आबादी का है, और उसके बाद का एक हिस्सा घनी दलित आबादी का है। 
कहने के लिए छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य बना और बड़े राज्य मध्यप्रदेश से उसे अलग किया गया था। लेकिन आज इस छोटे से राज्य के भीतर आबादी को जातियों के आधार पर देखें तो इसमें बड़े साफ-साफ चार हिस्से दिखाईं पड़ते हैं, और इनके बीच का फर्क चुनावों में भी साफ-साफ दिखाई पड़ता है। दक्षिण के आदिवासी और उत्तर के आदिवासी लोगों का जातियां अलग हैं, उनके इलाकों के मुद्दे भी अलग हैं, लेकिन फिर भी आदिवासियों के बीच कोई ऐसी लहर रहती है, जो कि इन दोनों इलाकों में मतदाताओं का फैसला एक सरीखा रखती है। इसी तरह दलित सीटों पर फैसला एक सरीखा रहता है और वह बताता है कि जाति के आधार पर बनी हुई समाज व्यवस्था में सामाजिक और आर्थिक हालात भी उन जातियों के आधार पर ढल जाते हैं। छत्तीसगढ़ जातीय विविधता का एक खूबसूरत नमूना है और चुनाव के वक्त जब इसे राजनीतिक दलों के साथ पसंद या नापसंद के नतीजों के मिलाकर देखा जाए, तो यह एक दिलचस्प सामाजिक अध्ययन का सामान भी रहता है। 
लेकिन राजनीतिक दलों को यह तमाम हकीकत मालूम रहते हुए भी वे किसी इलाके को एकमुश्त किस तरह पा या खो सकते हैं, वह देखना हक्का-बक्का करता है। खासकर छत्तीसगढ़ के उत्तर और दक्षिण के आदिवासी इलाकों में जिस तरह वोटरों का रूझान एक सा दिखता है, जिस तरह पिछले चुनाव में तमाम दलितों सीटों का रूझान एक सरीखा दिखा, वह देखने लायक था। और ऐसा भी लगता है कि कोई समझदार राजनीतिक दल अगर पांच बरस लगातार जातियों के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर मेहनत करे तो  उसके नतीजे उसे खुद को भी चौंका सकते हैं। यह नौबत बताती है कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा राजनीतिक दल चुनाव के अपने परंपरागत पैमानों से परे किसी गंभीर अध्ययन में अपनी मेहनत नहीं लगाते, वरना वे वोटरों की नब्ज बेहतर समझ पाते। 
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM

चुनाव विकास से जीता जाता है या मैनेजमेंट से, या दोनों से?

संपादकीय
15 नवम्बर 2018


भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति, या राजनीतिक चुनाव एक ऐसा जटिल समीकरण हैं कि जिसका जोड़-घटाना, जिसका गुणा-भाग लोगों के सिर के ऊपर से निकल जाता है। हर प्रदेश में सरकारें अपनी राजनीतिक विचारधारा और वायदों के मुताबिक अलग-अलग किस्म से काम करती हैं। कहीं वे कम बेईमान होती हैं, और कहीं पर अधिक बेईमान भी। गिनी-चुनी एक-दो सरकारें ऐसी भी रहती हैं जो बेईमानी से परे रहती हैं, लेकिन फिर भी वे पश्चिम बंगाल या त्रिपुरा की तरह सत्ता से बाहर कर दी जाती हैं। दूसरी तरफ बहुत सी जगहों पर भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट पार्टियां चुनाव जीत भी जाते हैं। लोगों को अविभाजित मध्यप्रदेश के आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कही हुई एक बात याद पड़ती है, और खटकती भी है, कि चुनाव विकास से नहीं, मैनेजमेंट से जीता जाता है। दिग्विजय सिंह की मैनेजमेंट की समझ कमजोर रही होगी जो वे दस बरस मुख्यमंत्री रहकर मध्यप्रदेश खो बैठे, और ऐसा खोए कि उनकी पार्टी तब से अब तक सत्ता पर वापिस नहीं आ सकी। 
लेकिन कुछ दूसरे प्रदेशों में ऐसा भी देखने में आया है कि सरकार ने खूब जमकर काम किया, जनकल्याण का काम भी किया, और प्रदेश का विकास भी किया। और इसके साथ-साथ चुनाव के वक्त पर जमकर तैयारी की, और जमकर खर्च भी किया। मैनेजमेंट भी अच्छा किया, और इन सबसे सत्ता में वापिसी भी हुई। इसलिए भारत के प्रदेशों में राज्य सरकारों का चुनाव कई बार समझ से परे भी हो जाता है कि जिसके जीतने की उम्मीद रहती है, वह पार्टी निपट जाती है, और पीछे चल रही पार्टी को लोग घोड़ी पर बिठाकर दूल्हा बना देते हैं। 
छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, हिन्दी भाषी भारत के ये तीन राज्य अभी चुनाव से गुजर रहे हैं। इन तीनों में भाजपा की सरकार हैं, और इन तीनों राज्यों का वोटरों का मिजाज अलग-अलग किस्म का माना जाता है। इन तीनों में सरकार के मुखिया, मुख्यमंत्रियों के तौर-तरीके अलग-अलग माने जाते हैं, दिखते हैं। तीनों राज्यों में मुद्दे अलग-अलग हैं, और एक तरफ जहां राजस्थान आंदोलनों का शिकार रहा है, जहां पर मुख्यमंत्री का मिजाज राजसी है, जहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष से टकराव भी लेते रहती हैं, वहां पर सत्ता जाने की खबर सुनाई पड़ रही है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश है जहां पर भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने गरीबों के कल्याण के दिखने वाले अनगिनत कार्यक्रम लागू किए, अपने आपको खुद होकर प्रदेश की महिलाओं का भाई, बच्चियों का मामा घोषित किया, जहां एक आक्रामक हिन्दुत्व का एजेंडा सामने रखा, और बुरी चर्चाओं से घिरे हुए साधुओं को भी मंत्री का दर्जा दिया, लेकिन प्रदेश जातिवाद और साम्प्रदायिकता से उठ नहीं पाया। अब इस दौर का तीसरा राज्य छत्तीसगढ़ है जहां मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने एक सज्जन आदमी की छवि पाई है जो कि लोगों से राजनीतिक बदला नहीं लेता। उन्होंने पिछले पन्द्रह बरस में पार्टी के भीतर बेमिसाल और बेचुनौती लीडरशिप भी पाई है, और सबसे गरीब लोगों के लिए लागू की गई योजनाओं में अभूतपूर्व कामयाबी भी दर्ज की है। लेकिन बाकी दोनों राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी सत्तारूढ़ नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं, सरकारी मशीनरी में भी ईमानदारी कम है, और हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद राज्य में बेमिसाल ढांचा विकसित हुआ है। छत्तीसगढ़ में अधिक करीब से देखने पर यह भी दिखा है कि सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार ने मिलकर मौजूदा चुनाव के साल भर पहले से मिलकर जमकर तैयारी की है, और शायद इससे अधिक कोई चुनावी तैयारी हो नहीं सकती है। ऐसी चर्चा जरूर है कि पार्टी ने मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ बहुत से ऐसे लोगों को टिकट दिया है जिनके जीतने पर खतरा है। लेकिन यहां पर दिग्विजय सिंह की वह बात लागू होती है कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, और छत्तीसगढ़ में सत्ता में यह मैनेजमेंट खूब कर रखा है। पन्द्रह बरस से विपक्ष में रही कांग्रेस पार्टी के पास इस मैनेजमेंट के मुकाबले की क्षमता नहीं है, तैयारी नहीं है, लेकिन कांग्रेस जनता के भरोसे है कि वही अगर सत्ता पर बिठाने पर आमादा हो जाएगी, तो उसे कौन रोक सकता है। छत्तीसगढ़ के चुनाव शुरू हो चुके हैं, और आज से हफ्ते भर के भीतर आखिरी वोट भी डल चुका होगा। इतने जटिल समीकरण वाले भारतीय चुनाव के नतीजों का कई किस्म से विश्लेषण किया जा सकेगा कि किन बातों की वजह से कौन सी पार्टी या कौन से नेता जीते या हारे। फिलहाल छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से डॉ. रमन सिंह ने दिग्विजय के शब्दों में मैनेजमेंट तो पूरा किया ही है, लेकिन दिग्विजय को गैरजरूरी लगने वाला विकास भी उन्होंने खूब किया है, अब देखना यह है कि पन्द्रह बरस के बाद जनता पर सत्तारूढ़ पार्टी, उसके उम्मीदवारों, और उसके कामकाज का मिलाजुला असर वोटों में तब्दील करने का मैनेजमेंट कामयाब होता है या नहीं। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 नवम्बर