आरक्षित तबकों में मलाईदार सोच को दिखती हैं माल्या में खूबियां...

16 जुलाई  2018

केन्द्र सरकार में आदिवासी मामलों के मंत्री जुएल उरांव ने पहले राष्ट्रीय जनजातीय उद्यमी सम्मेलन में अपनी बिरादरी के आदिवासियों के सामने विजय माल्या की तारीफ करते हुए कहा कि वह एक स्मार्ट आदमी है। उसने कुछ अक्लमंदों को काम पर रखा, फिर बैंकों, नेताओं, और सरकार को अपने प्रभाव में लिया। इसके बाद मंत्रीजी का कहना था कि आपको ऐसा स्मार्ट बनने से कौन रोकता है? आदिवासियों से किसने कहा है कि सिस्टम पर अपना असर मत दिखाओ? किसने कहा है कि बैंकों को प्रभावित मत करो।
जाहिर है कि आदिवासी समुदाय से निकला हुआ यह नेता अब सत्ता में इतने ऊपर तक पहुंच गया है कि अब उसे विजय माल्या में कोई खामी न दिखकर, महज खूबियां दिख रही हैं। यह पहला मौका नहीं है जब किसी आरक्षित या कमजोर तबके से निकले हुए किसी नेता से अपनी ही बिरादरी की बेइज्जती करने वाली ऐसी बातें सुनने मिल रही हों, जो कि जाहिर तौर पर उस बिरादरी के हितों के खिलाफ है, और उसकी साख को भी खराब करती हैं। दरअसल आरक्षित या कमजोर तबकों से, आरक्षण या विशेष संरक्षण का फायदा पाकर जो लोग ऊपर पहुंचते हैं, सत्ता की ताकत उनकी चाल और उनके चलन को बदलकर रख देती है। सत्ता के शिखर पर पहुंची हुई महिलाएं, महिला आरक्षण का नाम लेना भूल जाती हैं, वहां पहुंचे हुए दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक अपने तबकों की फिक्र उसी वक्त करते हैं जब उन्हें नोट या वोट पाने के लिए अपने खुद के इन तबकों का होने का सुबूत देना होता है। लेकिन इससे परे ऐसे तकरीबन तमाम लोग उस वर्गहित से परे हो जाते हैं, जिस वर्ग से वे आते हैं।
हिन्दुस्तान में बाकी दुनिया के आदिवासियों की तरह, सबसे सरल, सबसे सीधे, और सबसे ईमानदार लोग इसी तबके में हैं। ये मोटेतौर पर कुदरत के अधिक करीब रहते हैं, और कुदरत से ईमानदारी सीखते हैं। इन्हीं में से जब कुछ लोग राजधानियों में पहुंच जाते हैं, और महलों से मकानों में रहने लगते हैं, और एक मौसम के लिए बचाने की अपनी आदिवासी-आदत से परे हटकर जब सौ पीढिय़ों के लायक बचाने लगते हैं, तो वे उस कुदरती ईमानदारी से दूर भी हो जाते हैं। इसलिए एक आदिवासी मंत्री को अपने दूसरे आदिवासी लोगों को यह सिखाने में कुछ बुरा नहीं लगा कि उन्हें विजय माल्या जैसा बनना चाहिए, और सरकार से लेकर बैंकों तक पर अपना असर बनाना चाहिए।
आरक्षित तबकों के भीतर मलाईदार तबका आरक्षण के फायदों से बाहर करने की वकालत करते हमें लंबा वक्त हो गया। इसकी एक वजह तो यह है कि आरक्षित तबकों का सारा फायदा उन तबकों के भीतर के इस छोटे से मलाईदार तबके के ही काम का रह गया है, क्योंकि वे अपने तबके के भीतर मुकाबले के लिए अधिक तैयार रहते हैं, और उनकी बेहतर तैयारी उन्हें अपने ही तबके के अधिक जरूरतमंद, अधिक कमजोर लोगों को पीछे छोडऩे की ताकत दे देती है। ऐसे में जिस मकसद से आरक्षित तबके को आरक्षण का हक दिया गया था, वह हक अब आरक्षित तबके के भीतर, उसके अपने गैरमलाईदार तबके को ही मिलना चाहिए। मलाईदार जिंदगी जीते हुए लोगों की सोच इसी किस्म से बदलती है। राजनीति में, सरकार या न्यायपालिका में पहुंची हुई महिलाएं, हिन्दुस्तान की आम महिलाओं की तरह की तकलीफों से ऊपर उठ जाती हैं, और धीरे-धीरे उन्हें यह अहसास भी नहीं रहता कि इस देश में एक वक्त महिला आरक्षण का नारा उन्होंने भी लगाया था।
देश में आदिवासी उद्यमियों या दलित उद्यमियों के अलग से संगठन बनने में कुछ बुरा नहीं है क्योंकि उस तबके की अपनी दिक्कतें हो सकती हैं जो कि उद्योग-व्यापार के बाकी आम संगठनों के बीच चर्चा में न सुलझ सकें। इसलिए सरकारी कर्मचारियों के भीतर ही आरक्षित तबकों के कर्मचारियों के अलग-अलग संगठन होते हैं, और इस देश में दलितों की वर्तमान राजनीति के सबसे बड़े नेता-जन्मदाता कांशीराम ने आरक्षित-कर्मचारियों के बीच से ही अपना आंदोलन शुरू किया था। लेकिन उनका शुरू किया हुआ आंदोलन आज उनकी सबसे करीबी राजनीतिक सहयोगी रही, और आज देश की सबसे बड़ी दलित नेता मायावती तक पहुंचा है जो कि अपने आपमें अरबों की अनुपातहीन दौलत की वजह से खबरों और अदालतों दोनों में हैं। वर्गचरित्र से उबरकर, और वर्गहित को महज जुमले की तरह इस्तेमाल करके वर्गों के नेता अपना एक अलग ही वर्ग बना लेते हैं, और उन्हें विजय माल्या की मिसालों में कुछ गलत नहीं लगता है।
हम अपने अधिक आसपास भी देखते हैं तो दलित-आदिवासी तबकों के जो नेता आरक्षण का फायदा पाकर सत्ता की ताकत, और संपन्नता, इन दोनों के आसमान तक पहुंचे हुए हैं, और अब इस आसमान को चीरकर संपन्नता के अंतरिक्ष तक पहुंचने की कोशिश में लगे हैं, वे पार्टी और सरकार के भीतर तो अपने वर्ग का होने के हक का दावा करते हैं, लेकिन अपने वर्ग के लिए कुछ नहीं करते। ऐसे तबकों से बने हुए मंत्री अपने इलाकों में, अपने समुदायों के बीच कुछ करने के बजाय ठेकों में उलझे रहते हैं, तबादला उद्योग में लगे रहते हैं, और अपने तबकों का होने का फायदा पाते हुए पार्टी और सरकार के सामने कोई विकल्प भी नहीं छोड़ते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह बात कोई अटपटी नहीं रह जाती कि वे विजय माल्या या हर्षद मेहता जैसे लोगों की मिसालें दें। लोगों को याद होगा कि पी.वी. नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे और हर्षद मेहता नाम का एक शेयर दलाल शेयर मार्केट की समंदरी लहरों पर उसी तरह राज करता था जिस तरह एक काबिल सर्फर सचमुच की लहरों पर लहराता है। तब उस वक्त लाखों करोड़ के शेयर घोटाले का भांडा फूटने के ठीक पहले तक इस देश में कई लोग यह वकालत करने लगे थे कि हर्षद मेहता जैसा व्यक्ति इस देश का वित्त मंत्री होना चाहिए। इसलिए आज जब एक आदिवासी केन्द्रीय मंत्री विजय माल्या की मिसाल देता है, और अपने आदिवासी उद्यमियों को वैसा होने का फतवा देता है, तो वह यह भी साबित करता है कि वह किस तरह अब अपने वर्ग का नहीं रह गया है।
खुद दलित या आदिवासी, या किसी और आरक्षित तबके की अपनी भलाई के लिए यह जरूरी है कि उसमें आरक्षण का किसी भी किस्म का फायदा महज एक पीढ़ी को मिलना चाहिए, और मलाईदार तबके का न होने तक ही मिलना चाहिए। दूसरी-तीसरी और चौथी पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देना, या कि करोड़पति हो जाने पर भी आरक्षण का फायदा देना यह बड़ा नुकसान करता है कि उन तबकों के सचमुच के जरूरतमंद लोगों की कोई पहुंच आरक्षण के फायदे तक हो ही नहीं पाती। सतह पर  तैरता हुआ मलाईदार तबका एक फौलादी परत सरीखा हो जाता है, जिसे चीरकर कोई कमजोर हाथ ऊपर नहीं आ पाते। इस केन्द्रीय मंत्री की जगह पहली बार सांसद बना हुआ कोई केंद्रीय मंत्री होता, तो उसे माल्या में इतनी खूबियां दिखना शुरू नहीं हुई होतीं। (Daily Chhattisgarh)

देश को प्रधानमंत्री देने वाले राज्य की बदहाली

संपादकीय
16 जुलाई 2018


उत्तरप्रदेश की एक जेल में जिस तरह एक खूंखार माफिया कैदी को गोलियों से भूनकर रख दिया गया है, उससे वहां जेल के बाहर का हाल भी उजागर होता है। अब खबर यह है कि इस हत्या की जांच शुरू हो, उसके पहले ही उसी जेल में बंद एक दूसरे खूंखार अपराधी का बयान आया है कि उसने किस तरह यह हत्या की थी। जांच करने के लिए जिस पुलिस अफसर को जेल जाना था, उसने बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के वहां से जाने के लिए मना कर दिया, और उसकी हिफाजत के लिए ऐसी जैकेट पहनाकर उसे भेजा गया। दूसरी तरफ अब खबरें आ रही हैं कि इस तरह के कई माफिया सरगना जेल के भीतर से बड़े-बड़े सरकारी कंस्ट्रक्शन ठेके ले रहे हैं, और रेत की खदानों का सौ-सौ करोड़ तक का ठेका ले रहे हैं। एक खबर यह भी है कि जेल में मारे गए माफिया सरगना के गुर्गे बाहर लोगों से अभी भी उसके नाम पर उगाही कर रहे हैं कि जेल के भीतर हत्यारे की हत्या करवानी है, उसके लिए रकम चाहिए। 
उत्तरप्रदेश का यह हाल रातोंरात नहीं हुआ है, और न ही योगी सरकार आने के बाद हालत कुछ सुधरी है। वहां पहले समाजवादी पार्टी की सरकार रहते हुए जिस तरह का जातिवाद पुलिस से लेकर बाकी सरकारी अमले मेें चला उससे ईमानदार और काबिल, जिम्मेदार और मेहनती कर्मचारियों और अफसरों के बीच काम करने की हसरत खत्म ही हो चुकी थी। अखिलेश यादव के पहले मायावती के राज में भी उत्तरप्रदेश का कुछ ऐसा ही हाल था, और वहां पर ठेकेदारी, रंगदारी, और राजनीति का ऐसा बुरा मिलाजुला धंधा दशकों से चल रहा है कि वह जेल के भीतर एक बड़ी चर्चित हत्या से तो खबरों में आया है, लेकिन उससे परे लोगों को वह दिखता नहीं है। इस प्रदेश में नए भाजपाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने से बदला केवल यही है कि एक जाति के अफसरों की जगह दूसरी जाति के अफसर आ गए हैं, या कि एक पार्टी से जुड़े हुए अफसरों की जगह दूसरी पार्टी से जुड़े अफसरों ने मलाईदार कुर्सियां पा ली हैं। कुछ महीने पहले जब उत्तरप्रदेश में लगातार मुठभेड़ में कुख्यात लोगों को, या निगरानी बदमाशों को मार गिराया गया, तो उसके बाद भी जो दहशत खड़ी हुई उसमें बाकी लोगों की जानबख्शी के लिए और अधिक उगाही होने की भी खबरें हैं। 
किसी प्रदेश में जब जुर्म का बोलबाला इतना हो जाता है कि जेलों की भीतर से सांसद और विधायक भी अपने-अपने गिरोह चलाते हैं, और पेशेवर मुजरिम किसी और को ठेकों में बोली नहीं बोलने देते, तो उस राज्य का कोई भला नहीं हो सकता। बिहार में भी दशकों तक ऐसा ही हाल था, और शायद वहां नीतीश कुमार ने हालात कुछ सुधारे हैं। उत्तरप्रदेश साख के मामले में बहुत कमजोर साबित हो रहा है। ताजमहल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश या पर्यावरण के कानून मानने से लेकर आम जनता की जिंदगी की हिफाजत तक सभी का बुरा हाल है। जब राज्य सरकार इमारतों को रंगने को अपनी प्राथमिकता समझ लेती हैं, तो फिर उसका ध्यान बाकी जरूरी चीजों की तरफ जाए तो जाए कैसे? राज्य में सांसद और विधायक लगातार साम्प्रदायिक बातें करते घूमते हैं, और किसी को मुजरिमों से परहेज दिखता नहीं है। दिल्ली से लगा हुआ यह राज्य भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, और निकम्मेपन का शिकार होकर अपनी उस साख को पूरी तरह खो बैठा है कि यह राज्य देश को लगातार प्रधानमंत्री देता था। आज यह राज्य देश को जुर्म की और साम्प्रदायिकता की सबसे बुरी खबरें देता है। 
किसी राज्य के ऐसे हाल को देखकर बाकी राज्यों को भी यह नसीहत लेनी चाहिए कि वे राजनीति, और खासकर चुनावी राजनीति के फेर में अगर मुजरिमों को बढ़ावा देते हैं, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, या हिंसा को बढ़ावा देते हैं तो उस राज्य का ऐसा हाल होता है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जुलाई

हिन्दुस्तानी बारूद के ढेर को है बस एक मैसेज की चिंगारी का इंतजार

संपादकीय
15 जुलाई 2018


भारत में सरकार और समाज दोनों के लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि किस तरह सोशल मीडिया या मैसेंजरों पर पोस्ट की गई बातों से नफरत और हिंसा में बढ़ोत्तरी हो रही है। आज जब इस पर हम लिख रहे हैं, तब कर्नाटक में एक इंजीनियर की लाश गिरी हुई है जिसे वॉट्सऐप पर फैलाई गई एक अफवाह के बाद लोगों ने मार डाला है। बच्चे चुराने की एक जागरूकता वाली पाकिस्तानी वीडियो को असल घटना बताकर भारत भर में इस बात की अफवाह फैलाई गई कि  लोग बच्चे चुरा रहे हैं और भीड़ ने जगह-जगह, अब तक शायद आधा दर्जन प्रदेशों में तमाम बेकसूर लोगों को मार गिराया है, जिनमें से एक भी बच्चाचोर नहीं था। ऐसे में वॉट्सऐप में एक पूरे पेज का इश्तहार देकर लोगों को आगाह किया है कि वे अफवाहें आगे बढ़ाने से बचें और कैसे बचें। लेकिन दूसरी तरफ आज देश का मुख्य धारा का मीडिया लगातार इसी किस्म की बातों को बढ़ाने में लगा हुआ है, और अभी जब दिल्ली में एक परिवार ने दर्जन भर लोगों ने रहस्यमय हालात में एक साथ खुदकुशी की, तो कुछ चैनलों ने इसे भुनाने के लिए तांत्रिकों और बाबाओं को लेकर उस घर में जाकर वहां से प्रसारण करने की हरकत की। शायद उस इलाके के उबलते हुए लोगों ने ऐसे मीडिया को वहां से खदेड़ दिया। 
लेकिन आज वॉट्सऐप जैसे मैसेंजरों, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के साथ परंपरागत मीडिया का एक बड़ा बुरा मुकाबला चल रहा है। अब जैसे कोई कैंसर के इलाज का दावा करे, तो उससे एक भी सवाल किए बिना देश का सबसे प्रमुख मीडिया भी इस अंदाज में खबर को फैलाने में जुट जाता है कि मानो कैंसर का इलाज खोज लिया गया है। चार लाईन के दावे के साथ चालीस लाईन की किताबी जानकारी अपनी तरफ से जोड़कर ऐसी रिपोर्ट को बहुत बड़ा बना दिया जाता है, और उसे बहुत बड़ी विश्वसनीयता दे दी जाती है। यह सिलसिला कम होने का नाम नहीं ले रहा है, और सरकार झूठी खबरों को फैलाने पर जिस सजा का इंतजाम करने जा रही है, वह सजा भी ऐसी झूठी बातों पर शायद लागू नहीं होगी जिसके पीछे लोगों की कोई बदनीयत न हो, और लोग अज्ञानी बनकर जिसे आगे फैलाने में जुट जाते हों। 
दरअसल ऐसी नौबत के पीछे इंसान का वह मिजाज है जो कि सनसनी फैलाने से हासिल होने वाली खुशी का है। लोग अगर हकीकत को साफ और सपाट तरीके से अपने आसपास के लोगों को रूबरू बताएंगे, या कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करेंगे, तो शायद ही कोई उस पर ध्यान देंगे। दूसरी तरफ जब बातों को अविश्वसनीय हद तक चटपटा बनाकर, सनसनीखेज बनाकर फैलाया जाता है, तो आसपास के लोग तुरंत ध्यान देते हैं। मनोविज्ञान के हिसाब से ऐसे लोग अटेंशन-सीकर कहलाते हैं, यानी लोगों का ध्यान खींचकर संतुष्टि पाने वाले लोग। ऐसे लोग गणेश की दूध पीने की अफवाह को चारों तरफ फैलाते हैं, और फिर मजे से देखते हैं कि किस तरह लोग उनकी बताई राह पर चल रहे हैं, और लोटा-चम्मच लेकर मंदिर जाकर गणेश के सामने कतार लगा रहे हैं। लोगों की अपनी जिंदगी में जब कुछ रोचक नहीं होता है, तो भी लोग ऐसी हरकतों में लग जाते हैं जिससे उन्हें दिमागी संतुष्टि हो, जिससे उन्हें यह लगे कि उन्हें किसी तरह की कामयाबी हासिल हो रही हो। बड़े-बड़े इलाज के बड़े-बड़े दावों को चारों तरफ प्रसाद की तरह बांटते हुए लोगों को कभी यह नहीं लगता कि वे खुद भी उसे एक बार परख लें या कि अब हर फोन में हासिल गूगल पर उसे तलाशकर उसका सच-झूठ जान लें। 
जब देश मेें, खासकर भारत जैसे देश में लोगों के बीच में वैज्ञानिक सोच को सिलसिलेवार तरीके से घटाया गया है, और पौराणिक कथाओं से लेकर एक फर्जी, कभी मौजूद न रहने वाले इतिहास तक की कहानियां सुनाकर लोगों को इस बात पर भरोसा दिलाया गया है कि तमाम किस्म के चमत्कार इस देश में आम बात रहे हैं, तो फिर लोग उसी चमत्कारी दुनिया में उसी तरह जीना चाहते हैं जिस तरह कि बाहुबली नाम की फिल्म के कल्पना लोक में डूबे हुए लोग अपनी तर्कशक्ति छोड़कर महज नजारों को देखते रह जाते हैं। ऐसे हालात इस देश में आज जो हिंसा करवा रहे हैं, उसे हजार गुना अधिक बढ़ाना चुटकी बजाने जैसा आसान रह गया है, और किसी भी दिन इस देश में धर्म और जाति के नाम पर ऐसे दंगे फैलाए जा सकते हैं जिन्हें फिर सरकार की तरफ से कितने भी संदेेश भेजकर रोका नहीं जा सकेगा। इसलिए आज समझदार लोगों के बीच जरूरत इस बात की है कि जब कहीं, जहां कहीं उन्हें कोई झूठी जानकारी तैरते दिखे, तुरंत ही उस पर सच को ढूंढकर पोस्ट करें, या लोगों को जवाब में भेजें। ऐसी बातों को देखते हुए भी चुप रहने का मतलब यही होगा कि आने वाले वक्त को एक हिंसक झूठ के हवाले कर देना, और लोगों को विरासत में ऐसा मिजाज देना जो कि बारूद के ढेर की तरह का हो, एक चिंगारी की तरह के मैसेज के इंतजार में। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 जुलाई

सोना पाने वाले प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण अंग्रेजी?

संपादकीय
14 जुलाई 2018


कल ही इसी जगह पर भारत की एक होनहार एथलीट, हिमा दास, के बारे में लिखा गया था जिसने एक अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में विश्व चैंपियनशिप जीतकर गोल्ड मैडल हासिल किया। असम के एक गरीब किसान की गांव की इस बेटी की यह कामयाबी मानो काफी नहीं थी, इसलिए एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने अपने एक ट्वीट में लिखा कि सेमीफाइनल में जीत के बाद हिमा दास ने मीडिया से बातचीत की, उसकी इंग्लिश अच्छी नहीं थी, फिर भी उसने अपना बेस्ट दिया। इसे लेकर फेडरेशन को सोशल मीडिया पर अच्छा जमकर लताड़ा गया है कि एक खिलाड़ी के प्रदर्शन से अधिक फिक्र फेडरेशन को उसकी अंग्रेजी की है। 
भारत में अंग्रेजी के भक्तों का जवाब देने के लिए एक बात लंबे समय से कही जाती है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजी छोड़ गए। कहने के लिए राष्ट्रभाषा का झंडा लेकर चलने वाले इस देश के बड़े-बड़े आंदोलनकारी ऐसे रहे हैं जिन्होंने अपनी औलादों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना बेहतर समझा। ईसाई मिशनरियों के खिलाफ बड़बोले नेताओं के बच्चों को भी हमने ईसाई स्कूलों में पढ़ते देखा है। यह पाखंड इस देश में लोगों के मिजाज में ही है, और जगह-जगह, तरह-तरह से सामने आता है। इसलिए जब खेल संघ खिलाड़ी के लाए हुए सोने से संतुष्ट नहीं हैं, और उसकी अंग्रेजी पर मलाल जाहिर कर रहे हैं, तो उसका एक ही मतलब है कि इन लोगों का खेल संघों में रहने का कोई हक नहीं है। दूसरी तरफ इस देश को अंग्रेजी के अपने बावलेपन को लेकर भी दुबारा सोचना चाहिए। 
हम तो अंग्रेजी के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं हैं, और इस हिन्दी अखबार में भी अंग्रेजी के लेख गाहे-बगाहे छापते रहते हैं। लेकिन हिन्दी को मातृभाषा मानकर जिन लोगों को उसकी मां की तरह सेवा करना जरूरी लगता है, हम उस बावलेपन के भी खिलाफ हैं। एक भाषा महज भाषा होती है, एक औजार की तरह। उसका इस्तेमाल अगर अच्छा होता है, उससे कोई कामयाबी हासिल होती है, तो वह भाषा भी मायने रखती है, और उसका भी सम्मान बढ़ता है। दुनिया में नाकामयाब लोगों की भाषा का कोई नाम लेने वाले भी नहीं रहते। इसलिए हिन्दी को एक भाषा के रूप में अगर कामयाब नहीं बनाया जा सकता, तो इस देश में अंग्रेजी का आज का मौजूद बोलबाला इसी तरह जारी रहेगा। दुनिया में ऐसा भी नहीं है कि सभी कामयाब देश अंग्रेजी के बलबूते ही कामयाब होते हैं। चीन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस जैसे अनगिनत देश हैं जो कि अपनी खुद की भाषा में पढ़ाई-लिखाई, कामकाज, साहित्य, इन सबको इतना संपन्न कर चुके हैं कि वे अंग्रेजी के मोहताज नहीं हैं। जिन लोगों को इन देशों से बात करनी होती है, वे इनकी भाषा को सीखकर भी बात करते हैं। 
भारत में हिन्दी को कामकाज की एक कामयाब भाषा बनाने के बजाय उसकी सेवा करने की बात होती है, उसे मां बना दिया जाता है, और उसके साथ लोगों का रिश्ता भावनात्मक बनाकर उसे एक आक्रामक राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में किसी भाषा का कोई भला नहीं हो सकता। दूसरी तरफ जहां अंग्रेजी की जरूरत है, या कि अंग्रेजी के बिना जहां काम नहीं चल सकता है, वहां पर अंग्रेजी से नफरत को एक आड़ बनाकर लोगों को उसे सीखने से रोका जाता है। इन सबके बाद जिनको अंग्रेजी नहीं आती उनको नीची निगाहों से देखा जाता है, और उन्हें हीनभावना में डाला जाता है। भारत को अपने इन तमाम पहलुओं के पाखंडों से बाहर निकलना होगा, तभी क्षेत्रीय भाषाओं की इज्जत बढ़ेगी, हिन्दी को उन पर लादना खत्म होगा, और जरूरत के मुताबिक अंग्रेजी सीखने को बढ़ावा भी देना होगा। जहां लोगों के बीच बातचीत और संवाद-संपर्क की एक औजार भाषा भावनात्मक रूप से देखी जाती है, वहां उससे किसी का भला नहीं होता, सिवाय राष्ट्रवाद के फतवों के। भारत के भीतर ही जिन राज्यों में अपनी क्षेत्रीय भाषा को इतना संपन्न बना लिया है कि वे अपना सारा कामकाज उसी भाषा में कर लेते हैं, वे हिन्दीभाषी प्रदेशों के मुकाबले अधिक कामयाब भी हैं। इसलिए लोगों को जरूरत के मुताबिक भाषा सीखनी चाहिए, और जब तक वे किसी भाषा को सीख न लें, उसे लेकर किसी किस्म की हीनभावना नहीं रखनी चाहिए। एक कामचलाऊ दर्जे की भाषा भी कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि उससे यह तो पता लगता ही है कि कोई उस भाषा को सीखने की कोशिश कर रहे हैं। 
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 जुलाई

गरीब किसान की बेटी दुनिया में अव्वल आकर सोना लाई

संपादकीय
13 जुलाई 2018


फिनलैंड में चल रहे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भारत के असम की एक गरीब खिलाड़ी हिमा दास ने गोल्ड मेडल हासिल करके सबको चौंका दिया। यह किसी एथलेटिक मुकाबले में भारत को मिला अपने किस्म का पहला गोल्ड मैडल है, और यह खिलाड़ी उस असम से आई है जहां पर एथलेटिक्स का ज्यादा चलन नहीं है, और वहां से ऐसे अधिक खिलाड़ी आते भी नहीं हैं। वह एक गरीब किसान की बेटी है, और महज कोच के दिए हौसले से उसने शहर में रहकर यह तैयारी की। उसके लिए शहर के हॉस्टल में जगह भी नहीं थी लेकिन उसे खास रियायत देकर वहां रखा गया, और उसने यह कामयाबी पाई। आज जब विश्वकप फुटबॉल में 40 लाख की आबादी वाला क्रोएशिया फाइनल में पहुंचता है, तो दुनिया के बड़े-बड़े देशों के लिए सोचने की बात हो जाती है। भारत में फुटबॉल खासा खेला जाता है, और इस देश की आबादी में दर्जनों क्रोएशिया समाए हुए हैं, लेकिन इस देश की पूरे विश्वकप फुटबॉल मुकाबलों में कोई भी जगह नहीं है, इसका दाखिला भी वहां नहीं है। भारत फीफा रैंकिंग में पहले सौ में बड़ी मुश्किल से आ पाया है, और उसकी रैंकिंग 99 नंबर की है। 
लेकिन यह मामला बहुत आसान भी नहीं है। किसी देश में खेलों की कामयाबी बहुत सी बातों पर टिकी होती है। चीन की खेलों की तैयारी देखें तो सुनाई पड़ता है कि किस तरह ओलंपिक के लिए जिम्नास्ट तैयार करने वहां के खेल प्रशिक्षक और अफसर गली-गली घूमते हैं, और खेलते हुए बच्चों में से संभावनाओं को छांटकर ले आते हैं, और उन्हें बरसों तक केवल ट्रेनिंग देते हैं। यही वजह है कि चीनी जिम्नास्ट ढेर सा सोना ले जाते हैं। दूसरी तरफ अमरीका या रूस, ब्रिटेन या फ्रांस ऐसे देश हैं जहां पर स्कूलों के स्तर से ही खेलों को बढ़ावा दिया जाता है, सारी सहूलियतें दी जाती हैं, मैदान या इमारतें बनाई जाती हैं, सारे खेल उपकरण दिए जाते हैं, उम्दा दर्जे का प्रशिक्षण मौजूद रहता है, और वहां के बच्चे हर किस्म के मुकाबले में आगे बढ़ते हैं। भारत चूंकि अंग्रेजों का गुलाम रहा है इसलिए क्रिकेट यहां पर एक ऐसा वटवृक्ष हो गया है जिसके तले दूसरे खेलों की कोई अहमियत नहीं लगती है। बाजार का प्रायोजन का सारा पैसा मानो केवल क्रिकेट के लिए रहता है, और क्रिकेट ने अपने आपको एक साम्राज्य की तरह बना लिया है जो कि सरकार या सुप्रीम कोर्ट के काबू से भी बाहर हजारों करोड़ का धंधा हो गया है। इस देश में क्रिकेट का प्रशंसक होना स्कूल-कॉलेज के बच्चों के बीच खिलाड़ी होने की विकल्प की तरह रच-बस गया है। 
लेकिन हम राज्यों में देखते हैं, तो बहुत से राज्यों से ऐसी खबरें आती है कि वहां के खिलाडिय़ों को न मैदान मिलते, न सामान मिलते, न ट्रेनिंग मिलती, न मुकाबलों में जाने-आने, रहने-खाने का इंतजाम मिलता। अधिकतर राज्यों में खिलाडिय़ों का सम्मान तब होता है जब वे जीतकर आ जाते हैं। लेकिन मैडल के पहले की तैयारी में तरह-तरह की दुखभरी कहानियां सुनाई पड़ती हैं, और सरकार में बैठे हुए लोग, या कि खेल संघों की राजनीति पर काबिज बड़े-बड़े नेता और अफसर ऐसे रहते हैं जिनके लिए खिलाडिय़ों की बुनियादी सहूलियतें मायने नहीं रखतीं। सरकारों में बैठे हुए लोगों की अधिक दिलचस्पी करोड़ों के खर्च वाले मुकाबलों में दिखती है, या कि करोड़ों-अरबों की लागत के बड़े-बड़े स्टेडियम बनाने में दिखती है। ऐसे में अगर देखा जाए तो दुनिया भर से मैडल लाने वाले हिन्दुस्तानी खिलाड़ी ऐसे अफसरों और खेल संघों की वजह से जीतकर नहीं आते हैं, उनके बावजूद जीतकर आते हैं। 
छोटे-छोटे से, बित्ते भर के देश पूरी दुनिया के मुकाबले में फाइनल पर पहुंचते हैं, और हिन्दुस्तान शुरू की 98 टीमों में भी नहीं है। यह नौबत रातों-रात बदली नहीं जा सकती, लेकिन इसे सुधारने के लिए यह जरूरी है कि खेलों को खेल संघों की राजनीति, आयोजनों के ठेके, और कांक्रीट के बड़े-बड़े ढांचों से परे होकर सोचना होगा। जब कभी भारत के किसी गरीब खिलाड़ी को मौका मिलता है, तो वे बहुत से खेलों में बहुत आगे तक बढ़कर दिखाते हैं, लेकिन यहां की अधिकतर आबादी के बच्चे गली-मुहल्ले के खेलों से आगे बाकी खेलों से पूरी तरह अछूते रह जाते हैं। इस नौबत को सुधारने का कोई आसान रास्ता यहां सीमित शब्दों में नहीं सुझाया जा सकता, लेकिन इस बारे में बहुत से स्तरों पर सोचने-विचारने की जरूरत है। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 जुलाई