जब सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्था विज्ञान छोड़ दे तो...

संपादकीय
4 जुलाई 2020


इतिहास को मनचाहे तरीके से ढालने की ताकत जब आ जाती है, तो हसरत फिर वहीं नहीं थमती, वह आगे बढ़ते चलती है। हिन्दुस्तान में यह हसरत अब भविष्य को भी ढाल लेना चाहती है। भविष्य को गढ़ लेने तक तो बात ठीक थी, लेकिन भविष्य को ढाल लेने की हसरत खतरा खड़ा कर रही है। हिन्दुस्तान में इंडियन कौंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च, आईसीएमआर का काम पूरी तरह से वैज्ञानिक है। जैसा कि संस्था का नाम सुझाता है, यह भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की संस्था है जो कि भारत में चिकित्सा शोध को नियंत्रित करती है। अभी 2 जुलाई को इसने देश की एक दवा कंपनी भारत बायोटेक को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें कोरोना से बचाव के टीके के मानव-परीक्षण का जिक्र है। इसमें आईसीएमआर के डायरेक्टर ने लिखा है कि कोरोना की वैक्सीन के मानव परीक्षण के पूरे हो जाने के बाद 15 अगस्त तक इसे जनता के लिए उतार देने का अनुमान है। आपको इस क्लिनिकल ट्रॉयल के लिए चुना गया है, और जनता के स्वास्थ्य को देखते हुए कृपया यह सुनिश्चित करें कि 7 जुलाई तक परीक्षण के लिए मरीजों का पंजीयन हो जाए। 
अब सवाल यह है कि जिस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रॉयल की अभी शुरूआत भी नहीं हुई है और 7 जुलाई तक लोगों को इसके लिए छांटना है, क्या उसके लिए कोई वैज्ञानिक संस्था 5 हफ्तों का समय तय कर सकती है कि उसे 15 अगस्त तक लोगों के लिए इस्तेमाल करना शुरू हो जाए? जिन्हें विज्ञान की जरा सी भी बुनियादी समझ होगी वे इस तरह की बात सोच भी नहीं सकते। इंसानों की जिंदगी को प्रभावित करने वाला कोई ऐसा टीका जिसे दुनिया के सभी विकसित देश बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसे हिन्दुस्तान में लोगों के बीच उतारने के लिए पांच हफ्तों की एक बंदिश दे दी जाए। दुनिया के बहुत से विकसित देशों का यह अंदाज है उनके टीके जनता के काम में लाने के पहले कई महीनों का वक्त लग सकता है। कुछ देशों में मानव-परीक्षण शुरू हुए हैं, लेकिन किसी भी देश ने ऐसा कोई अनुमान सामने नहीं रखा है। 
यह दुनिया की सबसे अच्छी बात होगी कि हिन्दुस्तान सबसे पहले ऐसा कामयाब टीका बना सके। लेकिन देश के स्वतंत्रता दिवस पर इसे पेश करने की हड़बड़ी बहुत घातक हो सकती है, क्योंकि क्लिनिकल ट्रायल में डॉक्टर और बाकी विशेषज्ञ कर्मचारी लगते ही हैं, और अगर उनके मन में एक ऐसी राष्ट्रवादी भावना पैदा हो गई कि आजादी की सालगिरह पर देश को यह तोहफा देना ही है, और इस सोच ने अगर मेडिकल-परीक्षण को प्रभावित किया, तो देश एक बहुत बड़े खतरे में भी पड़ सकता है क्योंकि कोरोना का टीका मरीजों को नहीं लगना है, तमाम जनता को लगना है, और उतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले इस टीके के किसी प्रयोग में कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई जानी चाहिए। आईसीएमआर चिट्ठी को देखें तो यह बहुत खतरनाक अंदाज में लिखी गई है, और इसमें सामने रखा गया लक्ष्य किसी भी वैज्ञानिक परीक्षण को बर्बाद करने के लिए काफी दिखता है। हिन्दुस्तानियों को यह बात याद नहीं होगी कि अमरीका में गर्भवती महिलाओं के लिए बनाई गई एक दवा थेलिडामाइड को जब बाजार में उतारा गया, तो उसे जादुई करिश्मे जैसा माना गया था। लेकिन इस दवा को लेने वाली महिलाओं के जब बच्चे होना चालू हुए, तो वे बिना हाथ-पांव के थे। वह अमरीकी इतिहास का एक सबसे बुरा दु:स्वप्न था। लेकिन तब तक गर्भावस्था के दौरान ही सुबह होने वाली मितली रोकने के लिए लाखों महिलाएं यह दवा ले चुकी थीं। अमरीकी मेडिकल नियम भारत के मुकाबले अधिक कड़े हैं, उसके बावजूद वहां ऐसी चूक हुई थी। आज हिन्दुस्तान में पूरी आबादी को जो टीके लगने हैं, उन टीकों के मानव-परीक्षण के लिए पांच हफ्तों का वक्त तय किया जा रहा है, और चिकित्सा-वैज्ञानिकों को कह दिया जा रहा है कि 15 अगस्त को कामयाब टीका लेकर लालकिले पर पहुंच जाएं। 
हिन्दुस्तान में प्रकाशित होने वाली इतिहास की कुछ किताबों में इतिहास बदल देना एक अलग बात है, उससे हकीकत की बुनियाद नहीं बदल रही, और आज की इमारत गिरने नहीं जा रही। लेकिन आज की मेडिकल-रिसर्च और आज उसके लिए जरूरी मानव-परीक्षण में ऐसी हड़बड़ी करना एक ऐसी उन्मादी राष्ट्रवादी सोच की उपज है जो प्रयोगशाला की कुर्सी पर तो बैठी है, लेकिन जिसने विज्ञान की बुनियादी समझ को पूरी तरह उतारकर कूड़े के ढेर पर फेंक दिया है।
किसी देश के लिए विज्ञान से खिलवाड़ बहुत बुरा होगा, और ऐसे व्यापक उपयोग के एक टीके को आजादी की सालगिरह की तारीख दे देना हिन्दुस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी वैज्ञानिक चूक भी हो सकती है क्योंकि देश की पूरी आबादी इस टीके को लगवाने वाली रहेगी। इतनी बड़ी वैज्ञानिक संस्था की इतनी बड़ी अवैज्ञानिक चिट्ठी इतिहास में अच्छी तरह दर्ज रहेगी, और बाकी दुनिया के चिकित्सा विज्ञान में इस एक चिट्ठी से भारत की साख पर बट्टा लगेगा।
(Daily Chhattisgarh)

अकेले प्रियंका का क्यों, राजधानियों से ऐसे हजारों बंगले खाली कराए जाएं..

संपादकीय
3 जुलाई 2020


दिल्ली में कांग्रेस महासचिव और सोनिया परिवार की, प्रियंका को सरकारी मकान खाली करने का नोटिस मिला है क्योंकि उनका सुरक्षा दर्जा कुछ समय पहले घटा दिया गया था, और एसपीजी की सुरक्षा को सिर्फ प्रधानमंत्री तक सीमित किया गया था। ऐसे में भूतपूर्व प्रधानमंत्री की बेटी होने के नाते प्रियंका को भी सुरक्षा घट गई थी, और अब सरकारी मकान खाली करने को नोटिस दिया गया है। कहने को नोटिस में 30 दिनों का वक्त है, लेकिन साथ में यह भी है कि बाजार भाव पर भाड़ा देकर वे वहां और भी रह सकती हैं। जैसी कि उम्मीद थी दिल्ली की कांग्रेस नेताओं ने तुरंत ही सरकार के इस नोटिस के खिलाफ बयान देना शुरू कर दिया, और इसे सरकार की बदले की कार्रवाई बताया। लेकिन बहुत से ऐसे पत्रकार जो आमतौर पर मोदी सरकार के आलोचक रहते हैं, उन्होंने तुरंत ही यह ट्वीट किया कि प्रियंका गांधी को सुरक्षा घटते ही सरकारी बंगला खाली कर देना था, और दिल्ली में अपने परिवार के निजी बंगले में चले जाना था, लेकिन वे इस मौके को चूक गईं।
 
हमारा ख्याल है कि इस मामले को कांग्रेस पार्टी जितना कुरेदेगी, उतना ही उसका राजनीतिक नुकसान होगा। जनता का जो तबका किसी नेता या पार्टी का समर्थक है, या नहीं भी है, सबके बीच एक बात को लेकर भावना एक सरीखी है कि नेता सरकारी बंगलों का बेजा इस्तेमाल करते हैं। यह बात तमाम पार्टियों के तमाम नेताओं पर एक सरीखी लागू होती है, और महज वामपंथी नेता इससे परे के हैं जिनके सरकारी मकानों का एक बड़ा हिस्सा पार्टी अपने दूसरे कार्यकर्ताओं और पार्टी के दूसरे संगठनों के लिए आबंटित करती है। लोगों को याद होगा कि प्रियंका गांधी जिस उत्तरप्रदेश की राजनीति में पूरा समय दे रही हैं, उसी उत्तरप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों के सरकारी बंगले खाली करवाने के लिए लोगों को अदालत तक जाना पड़ा है, और उसके बाद अलग-अलग राज्यों ने केबिनेट में फैसले लेकर ऐसी कानूनी व्यवस्था कर दी है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और भूतपूर्व विधानसभा अध्यक्ष सरकारी बंगलों के हकदार बने रहें। एक गरीब देश में यह सिलसिला बहुत भयानक है। दुनिया के जो सबसे विकसित और लोकतांत्रिक देश हैं, वहां भी सरकारी मकानों की ऐसी कोई पात्रता नहीं रहती, और लोग जब तक किसी पद पर रहते हैं, उन्हें किराए की पात्रता अगर रहती है, तो उस सीमा के भीतर वे खुद ही मकान ढूंढकर किराए पर रह लें। 
यह देश कितना गरीब है यह इससे भी पता लगता है कि बहुत से प्रदेशों की मांग के बाद जब केन्द्र सरकार ने अभी मुफ्त राशन की व्यवस्था बढ़ाई, तो उसके आंकड़े बताते हैं कि 80 करोड़ लोग गरीबी की इस सीमा में आते हैं। इस बात में बहुत बड़ा विरोधाभास है कि देश की आबादी की आधे से अधिक हिस्से को मुफ्त राशन जरूरी हो, और पूरे देश में केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के बंगलों का बेजा इस्तेमाल जारी रहे। सरकारी बंगले में एक बार पहुंच जाने के बाद लोग जिंदगी के आखिर तक उसे खाली करना नहीं चाहते। और अगर नाम जगजीवनराम और मीरा कुमार हो, तो गुजर जाने के बाद भी उस बंगले में स्मारक बनाने की जिद जारी रहती है। यह पूरा बेजा इस्तेमाल खत्म होना चाहिए। राज्यों की राजधानियों में भी सरकारी मकान खत्म होने चाहिए, और हर ओहदे के साथ एक किराए की पात्रता जुड़ी रहनी चाहिए जिससे लोग मर्जी के मकान में रहें, और पद से हटते ही वह किराया मिलना खत्म हो जाए।
 
हमारा ख्याल है कि सरकार के विवेक के सारे अधिकार अलोकतांत्रिक होते हैं कि किन लोगों को सरकारी मकान मिलें, और कितने बड़े मिलें। सरकार की अपनी कोई जेब नहीं होती है, वह जनता के पैसों पर पलती हैं, और उसके बेजा इस्तेमाल का हक किसी को नहीं होना चाहिए। आज हालत यह है कि बड़े-बड़े सरकारी बंगलों को लोग पहले तो आबंटित करा लेते हैं, और फिर उनके रख-रखाव के लिए, वहां सब्जी उगाने से लेकर कुत्ते नहलाने-घुमाने तक के लिए, वहां सफाई के लिए अंधाधुंध सरकारी कर्मचारियों की तैनाती करवा लेते हैं। निजी कंपनियों में किसी अधिकारी या कर्मचारी पर कंपनी का होने वाला कुल खर्च कॉस्ट टू कंपनी कहलाता है। आज बड़े अफसरों और मंत्रियों को देखें तो उनके बंगलों पर तैनात कर्मचारियों की सरकारी लागत इन अफसर-मंत्री की सरकारी लागत से बहुत अधिक होती है। जितनी तनख्वाह वे पाते हैं, उससे कई गुना अधिक तनख्वाह का अमला उनके निजी काम के लिए तैनात रहता है। राज्यों में तो हमारा देखा हुआ है कि सरकारी अमला विपक्ष के निर्वाचित विधायकों के घर भी तैनात कर दिया जाता है, ताकि वे विधानसभा में कुछ नर्मी बरतें। यह सब कुछ जनता के मुंह के निवाले को छीनकर ही हो पाता है, जनता के इलाज के हक, उसके बच्चों के पढ़ाई के हक में से छीनकर ही हो पाता है। 
इस फिजूलखर्ची को हिन्दुस्तान की कोई भी बड़ी अदालत शायद ही फिजूल माने क्योंकि देश की बड़ी अदालतों के जज खुद भी अपने पर ऐसी ही सरकारी फिजूलखर्ची करवाते हैं। एक-एक जज के साथ दो-दो, तीन-तीन सरकारी गाडिय़ों, सुरक्षा कर्मचारियों का काफिला चलता है जो सायरन बजाते हुए लोगों को हटाता है, जानवरों को हटाता है। जजों के बंगलों पर भी सरकार का बहुत खर्च होता है। ऐसे में जनता के बीच से ही ऐसे खर्च के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए, और अदालतों तक मामलों को ले जाना चाहिए ताकि अगर जजों का पूर्वाग्रह जनहित याचिकाओं को खारिज भी करता है तो कम से कम वह कानून की किताबों में बुरी मिसाल की तरह दर्ज तो हो जाए।
 
प्रियंका गांधी का मामला अकेला नहीं है। पूरे देश में हर राजधानी में ऐसे सैकड़ों मामले हैं, और दिल्ली में भी ऐसे दर्जनों और मामले होंगे। इन सब पर एक तरह की सख्ती और कड़ाई से कार्रवाई होनी चाहिए। धीरे-धीरे सरकार को निजी बंगलों का सिलसिला खत्म ही कर देना चाहिए। आज सत्ता में ऊपर बैठे हुए लोगों पर यह खर्च बड़े सामंती दर्जे से भी अधिक का होता है, और उन पर अघोषित खर्च उससे भी अधिक होता है। राजनीतिक दलों में से वामपंथियों के अलावा कोई भी इस मुद्दे को नहीं उठाएंगे क्योंकि ऐशोआराम में हर कोई भागीदार हैं। इसके खिलाफ एक जनजागरण की जरूरत है ताकि जनता ही सवाल करे। 
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 जुलाई 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 2 जुलाई 2020

अर्नब अकेले काफी वजह है कि अखबार प्रेस नाम की छतरीतले लौट जाएं...

संपादकीय
3 जुलाई 2020


असम उच्च न्यायालय ने अभी एक आदमी को अपनी पत्नी से तलाक लेने की इजाजत दे दी। अदालत का यह मानना था कि एक हिन्दू शादीशुदा महिला सिंदूर लगाने और चूड़ी पहनने से इंकार करती है तो यह तलाक का पर्याप्त आधार है। निचली अदालत ने इस आधार पर पति को तलाक की इजाजत नहीं दी थी और माना था कि ऐसा करके पत्नी ने उसके साथ कोई क्रूरता नहीं की। अभी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चूड़ी पहनने और सिंदूर लगाने से इंकार करना पत्नी को अविवाहित दिखाएगा, या फिर यह दर्शाएगा कि वह पति के साथ इस शादी को स्वीकार नहीं करती। अदालत ने कहा कि पत्नी का यह रवैया इशारा करता है कि वह पति के साथ दाम्पत्य जीवन स्वीकार नहीं करती है। 
तलाक के इस मामले में और भी बहुत सारे पहलू थे लेकिन दो जजों की हाईकोर्ट बेंच की ये टिप्पणियां भयानक है। भारतीय, और खासकर हिन्दू समाज में, एक महिला के ऊपर पुरूषप्रधान समाज की लादी गई उम्मीदों का यह एक नायाब नमूना है। एक शादीशुदा महिला के लिए भारत में चूड़ी, सिंदूर, बिंदी जैसे कई प्रतीक सैकड़ों-हजारों बरस से लादे गए हैं। और शादीशुदा आदमी बिना किसी प्रतीक के खुले सांड की तरह घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह पूरा सिलसिला औरत के साथ गैरबराबरी के बर्ताव का है जिसमें प्रतीकों और रस्मों को अनिवार्य रूप से उसके शोषण से जोड़ा जाता है, और उसके दूसरे दर्जे की सामाजिक स्थिति की गारंटी भी इनसे की जाती है। एक महिला के लिए कुमारी या श्रीमती लिखकर अपनी वैवाहिक स्थिति का खुलासा करना जरूरी किया जाता है, लेकिन मर्द के लिए ऐसी कोई बंदिश किसी सरकारी कागज में नहीं रहती। एक महिला को शादी के बाद अनिवार्य रूप से सरकारी और अदालती कागजों में अपने नाम के साथ पति का नाम भी जोडऩा पड़ता है, लेकिन उसके पति पर ऐसी कोई बंदिश नहीं रहती, और वह अपने नाम के साथ पिता का नाम लिए हुए ही मर सकता है। वह अगर पहले मर गया, और आंकड़ों को देेखें तो उसे अनिवार्य रूप से पहले ही मरना है, तो उसके बाद हिन्दू समाज में उसकी पत्नी से और कई किस्म की उम्मीदें की जाती हैं कि वह इसके बाद चूड़ी न पहने, बिंदी न लगाए, रंगीन कपड़े न पहने, परिवार में किसी खुशी के समारोह के वक्त दूर कहीं पीछे बैठी रहे, और सामने न आए, मांस-मछली, अंडा-प्याज-लहसुन न खाए, अपनी कोई जिंदगी न जिए। मतलब यह कि अब कानूनी रूप से किसी औरत को मरे हुए पति के साथ सती करना आसान नहीं रह गया है, इसलिए उसे जीते-जी एक दर्शनीय सती बना दिया जाए कि उसकी जिंदगी अब उजड़ गई है। दूसरी तरफ पत्नी के गुजरने के बाद पति पर इस किस्म की कोई बंदिश नहीं हैं। हमने ऊपर पति के पहले गुजरने की बात आंकड़ों के आधार पर इसलिए लिखी है कि हिन्दुस्तान में आमतौर पर पुरूष अपने से पांच बरस या और अधिक छोटी महिला से शादी करना पसंद करते हैं ताकि बुढ़ापे में सेवा करने के लिए बीवी के हाथ-पैर चलते रहें। फिर ईश्वर ने भी मानो औरत को इसी मकसद से अधिक मजबूत बनाया है कि वह बच्चों, पति, और पति के परिवार की सेवा कर सके, और उसकी औसत उम्र भारत के औसत पुरूष की उम्र से तीन-चार बरस ज्यादा रहती है। इस तरह पांच बरस छोटी महिला से शादी, और महिला की जिंदगी तीन-चार बरस अधिक होने के जनगणना के तथ्य को जोडक़र देखें, तो औसत भारतीय महिला को आखिर के कई बरस अकेले रहना होता है। ऐसे में हिन्दुस्तान का एक हाईकोर्ट उसके माथे पर सिंदूर, और हाथ में चूड़ी को एक बेड़ी-हथकड़ी की तरह पहनाने पर आमादा है कि यह शादीशुदा जिंदगी की एक अनिवार्य कानूनी शर्त है। यह फैसला बहुत ही खराब फैसला है, और हमारा पक्का भरोसा है कि यह सुप्रीम कोर्ट में जरा भी खड़ा नहीं हो पाएगा। 
अभी चार दिन पहले ही इसी जगह पर हमें कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज की की गई टिप्पणी पर लिखना पड़ा था जिसमें जज ने बलात्कार की शिकायत करने वाली एक महिला के खिलाफ ही बहुत सी अवांछित बातें कहीं थीं। वहां के जज, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित ने अपने फैसले में शिकायत करने वाली महिला के चाल-चलन के बारे में कई किस्म के लांछन लगाए। उन्होंने इस महिला के बारे में कहा- महिला का यह कहना कि वह बलात्कार के बाद सो गई थी, किसी भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है। महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करती हैं। 
यह कहते हुए जज ने आरोपी की अग्रिम जमानत मंजूर कर दी। जज ने इस मामले में कई ऐसी टिप्पणियां कीं जिनका आरोप से कोई संबंध नहीं है, और जिनसे महिला के चाल-चलन के बारे में एक बुरी तस्वीर बनती है। जस्टिस दीक्षित ने कहा- शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया है कि वे रात 11 बजे उनके दफ्तर क्यों गई थीं, उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने पर एतराज नहीं किया, और उन्हें अपने साथ सुबह तक रहने दिया। शिकायतकर्ता का यह कहना कि वह अपराध होने के बाद थकी हुई थीं, और सो गई थीं, भारतीय महिलाओं के लिए अनुपयुक्त है। हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करतीं। शिकायतकर्ता ने तब अदालत से संपर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उन पर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था? 
यह सोच चूंकि हाईकोर्ट जज की कुर्सी से निकली है, इसलिए बहुत भयानक है। इस कुर्सी तक बलात्कार के शायद तीन चौथाई मामलों पर आखिरी फैसले हो जाते हैं, और इसके ऊपर की अदालत तक शायद बहुत कम फैसले जाते होंगे। ऐसे में बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति, बलात्कार के साथ उसके सामाजिक और आर्थिक संबंधों की बेबसी की कोई समझ अदालत के इस अग्रिम-जमानत आदेश में नहीं दिखती। जज की बातों में एक महिला के खिलाफ भारतीय पुरूष का वही पूर्वाग्रह छलकते दिखता है जो कि अयोध्या में सीता पर लांछन लगाने वाले का था। एक महिला के खिलाफ भारत में पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि उसके पास अपने सच के साथ धरती से फटने की अपील करते हुए उसमें समा जाने के अलावा बहुत ही कम विकल्प बचता है। 
एक फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट का, और एक यह असम का, ये दोनों मिलकर 21वीं सदी में भारत के हाईकोर्ट के जजों की सोच बता रहे हैं, और ये एक हिंसक सोच है जो कि सदियों से महिलाओं के खिलाफ चली आ रही सोच का ही एक विस्तार है। 
इससे एक और बात भी उठती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को न सिर्फ इस मामले में बल्कि कई दूसरे किस्म के मामलों में भी उनके पूर्वाग्रह से परे कैसे रखा जा सकता है? यह बात तो तय है कि किसी के पूर्वाग्रह आसानी से नहीं मिटाए जा सकते। लेकिन यह तो हो सकता है कि पूर्वाग्रहों की अच्छी तरह शिनाख्त पहले ही हो जाए, और फिर यह तय हो जाए कि ऐसे जजों के पास किस तरह के मामले भेजे ही न जाएं। 
जिन लोगों को अमरीका में जजों की नियुक्ति के बारे में मालूम है वे जानते हैं कि बड़ी अदालतों के जज नियुक्त करते हुए सांसदों की कमेटी उनकी लंबी सुनवाई करती है, और यह सुनवाई खुली होती है, इसका टीवी पर प्रसारण होता है। और यहां पर सांसद ऐसे संभावित जजों से तमाम विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दों पर उनकी राय पूछते हैं, उनसे जमकर सवाल होते हैं, उनके निजी जीवन से जुड़े विवादों पर चर्चा होती है, और देश की अदालतों के सामने कौन-कौन से मुद्दे आ सकते हैं उन पर उनकी राय भी पूछी जाती है। कुल मिलाकर निजी जीवन और निजी सोच इनको पूरी तरह उजागर कर लेने के बाद ही उनकी नियुक्ति होने की गुंजाइश बनती है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में रखी है, और वहीं से नाम तय होकर प्रस्ताव सरकार को जाते हैं। ऐसे में जजों की सामूहिक सोच से परे किसी और तरह की सोच आने की गुंजाइश नहीं रहती।

हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में जजों के सारे पूर्वाग्रह पहले ही उजागर हो जाने चाहिए। और इसके साथ ही यह भी दर्ज हो जाना चाहिए कि उन्हें किस किस्म के मामले न दिए जाएं, या कि उन्हें नियुक्त ही न किया जाए। हमारा यह भी मानना है कि देश के सुप्रीम कोर्ट को अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट के फैसलों की ऐसी व्यापक असर वाली बातों का खुद होकर नोटिस लेना चाहिए, और इसके लिए कौन सा सुधार किया जा सकता है उसका एक रास्ता निकालना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 जुलाई 2020

कर्नाटक हाईकोर्ट के बाद अब असम हाईकोर्ट ने भी दिखाई कट्टर मर्दाना सोच..

संपादकीय
1 जुलाई 2020


असम उच्च न्यायालय ने अभी एक आदमी को अपनी पत्नी से तलाक लेने की इजाजत दे दी। अदालत का यह मानना था कि एक हिन्दू शादीशुदा महिला सिंदूर लगाने और चूड़ी पहनने से इंकार करती है तो यह तलाक का पर्याप्त आधार है। निचली अदालत ने इस आधार पर पति को तलाक की इजाजत नहीं दी थी और माना था कि ऐसा करके पत्नी ने उसके साथ कोई क्रूरता नहीं की। अभी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चूड़ी पहनने और सिंदूर लगाने से इंकार करना पत्नी को अविवाहित दिखाएगा, या फिर यह दर्शाएगा कि वह पति के साथ इस शादी को स्वीकार नहीं करती। अदालत ने कहा कि पत्नी का यह रवैया इशारा करता है कि वह पति के साथ दाम्पत्य जीवन स्वीकार नहीं करती है। 
तलाक के इस मामले में और भी बहुत सारे पहलू थे लेकिन दो जजों की हाईकोर्ट बेंच की ये टिप्पणियां भयानक है। भारतीय, और खासकर हिन्दू समाज में, एक महिला के ऊपर पुरूषप्रधान समाज की लादी गई उम्मीदों का यह एक नायाब नमूना है। एक शादीशुदा महिला के लिए भारत में चूड़ी, सिंदूर, बिंदी जैसे कई प्रतीक सैकड़ों-हजारों बरस से लादे गए हैं। और शादीशुदा आदमी बिना किसी प्रतीक के खुले सांड की तरह घूमने के लिए छोड़ दिया जाता है। यह पूरा सिलसिला औरत के साथ गैरबराबरी के बर्ताव का है जिसमें प्रतीकों और रस्मों को अनिवार्य रूप से उसके शोषण से जोड़ा जाता है, और उसके दूसरे दर्जे की सामाजिक स्थिति की गारंटी भी इनसे की जाती है। एक महिला के लिए कुमारी या श्रीमती लिखकर अपनी वैवाहिक स्थिति का खुलासा करना जरूरी किया जाता है, लेकिन मर्द के लिए ऐसी कोई बंदिश किसी सरकारी कागज में नहीं रहती। एक महिला को शादी के बाद अनिवार्य रूप से सरकारी और अदालती कागजों में अपने नाम के साथ पति का नाम भी जोडऩा पड़ता है, लेकिन उसके पति पर ऐसी कोई बंदिश नहीं रहती, और वह अपने नाम के साथ पिता का नाम लिए हुए ही मर सकता है। वह अगर पहले मर गया, और आंकड़ों को देेखें तो उसे अनिवार्य रूप से पहले ही मरना है, तो उसके बाद हिन्दू समाज में उसकी पत्नी से और कई किस्म की उम्मीदें की जाती हैं कि वह इसके बाद चूड़ी न पहने, बिंदी न लगाए, रंगीन कपड़े न पहने, परिवार में किसी खुशी के समारोह के वक्त दूर कहीं पीछे बैठी रहे, और सामने न आए, मांस-मछली, अंडा-प्याज-लहसुन न खाए, अपनी कोई जिंदगी न जिए। मतलब यह कि अब कानूनी रूप से किसी औरत को मरे हुए पति के साथ सती करना आसान नहीं रह गया है, इसलिए उसे जीते-जी एक दर्शनीय सती बना दिया जाए कि उसकी जिंदगी अब उजड़ गई है। दूसरी तरफ पत्नी के गुजरने के बाद पति पर इस किस्म की कोई बंदिश नहीं हैं। हमने ऊपर पति के पहले गुजरने की बात आंकड़ों के आधार पर इसलिए लिखी है कि हिन्दुस्तान में आमतौर पर पुरूष अपने से पांच बरस या और अधिक छोटी महिला से शादी करना पसंद करते हैं ताकि बुढ़ापे में सेवा करने के लिए बीवी के हाथ-पैर चलते रहें। फिर ईश्वर ने भी मानो औरत को इसी मकसद से अधिक मजबूत बनाया है कि वह बच्चों, पति, और पति के परिवार की सेवा कर सके, और उसकी औसत उम्र भारत के औसत पुरूष की उम्र से तीन-चार बरस ज्यादा रहती है। इस तरह पांच बरस छोटी महिला से शादी, और महिला की जिंदगी तीन-चार बरस अधिक होने के जनगणना के तथ्य को जोडक़र देखें, तो औसत भारतीय महिला को आखिर के कई बरस अकेले रहना होता है। ऐसे में हिन्दुस्तान का एक हाईकोर्ट उसके माथे पर सिंदूर, और हाथ में चूड़ी को एक बेड़ी-हथकड़ी की तरह पहनाने पर आमादा है कि यह शादीशुदा जिंदगी की एक अनिवार्य कानूनी शर्त है। यह फैसला बहुत ही खराब फैसला है, और हमारा पक्का भरोसा है कि यह सुप्रीम कोर्ट में जरा भी खड़ा नहीं हो पाएगा। 
अभी चार दिन पहले ही इसी जगह पर हमें कर्नाटक हाईकोर्ट के एक जज की की गई टिप्पणी पर लिखना पड़ा था जिसमें जज ने बलात्कार की शिकायत करने वाली एक महिला के खिलाफ ही बहुत सी अवांछित बातें कहीं थीं। वहां के जज, जस्टिस कृष्ण एस. दीक्षित ने अपने फैसले में शिकायत करने वाली महिला के चाल-चलन के बारे में कई किस्म के लांछन लगाए। उन्होंने इस महिला के बारे में कहा- महिला का यह कहना कि वह बलात्कार के बाद सो गई थी, किसी भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है। महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करती हैं। 
यह कहते हुए जज ने आरोपी की अग्रिम जमानत मंजूर कर दी। जज ने इस मामले में कई ऐसी टिप्पणियां कीं जिनका आरोप से कोई संबंध नहीं है, और जिनसे महिला के चाल-चलन के बारे में एक बुरी तस्वीर बनती है। जस्टिस दीक्षित ने कहा- शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया है कि वे रात 11 बजे उनके दफ्तर क्यों गई थीं, उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने पर एतराज नहीं किया, और उन्हें अपने साथ सुबह तक रहने दिया। शिकायतकर्ता का यह कहना कि वह अपराध होने के बाद थकी हुई थीं, और सो गई थीं, भारतीय महिलाओं के लिए अनुपयुक्त है। हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसा व्यवहार नहीं करतीं। शिकायतकर्ता ने तब अदालत से संपर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उन पर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था? 
यह सोच चूंकि हाईकोर्ट जज की कुर्सी से निकली है, इसलिए बहुत भयानक है। इस कुर्सी तक बलात्कार के शायद तीन चौथाई मामलों पर आखिरी फैसले हो जाते हैं, और इसके ऊपर की अदालत तक शायद बहुत कम फैसले जाते होंगे। ऐसे में बलात्कार का आरोप लगाने वाली एक महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति, बलात्कार के साथ उसके सामाजिक और आर्थिक संबंधों की बेबसी की कोई समझ अदालत के इस अग्रिम-जमानत आदेश में नहीं दिखती। जज की बातों में एक महिला के खिलाफ भारतीय पुरूष का वही पूर्वाग्रह छलकते दिखता है जो कि अयोध्या में सीता पर लांछन लगाने वाले का था। एक महिला के खिलाफ भारत में पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि उसके पास अपने सच के साथ धरती से फटने की अपील करते हुए उसमें समा जाने के अलावा बहुत ही कम विकल्प बचता है। 
एक फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट का, और एक यह असम का, ये दोनों मिलकर 21वीं सदी में भारत के हाईकोर्ट के जजों की सोच बता रहे हैं, और ये एक हिंसक सोच है जो कि सदियों से महिलाओं के खिलाफ चली आ रही सोच का ही एक विस्तार है। 
इससे एक और बात भी उठती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को न सिर्फ इस मामले में बल्कि कई दूसरे किस्म के मामलों में भी उनके पूर्वाग्रह से परे कैसे रखा जा सकता है? यह बात तो तय है कि किसी के पूर्वाग्रह आसानी से नहीं मिटाए जा सकते। लेकिन यह तो हो सकता है कि पूर्वाग्रहों की अच्छी तरह शिनाख्त पहले ही हो जाए, और फिर यह तय हो जाए कि ऐसे जजों के पास किस तरह के मामले भेजे ही न जाएं। 
जिन लोगों को अमरीका में जजों की नियुक्ति के बारे में मालूम है वे जानते हैं कि बड़ी अदालतों के जज नियुक्त करते हुए सांसदों की कमेटी उनकी लंबी सुनवाई करती है, और यह सुनवाई खुली होती है, इसका टीवी पर प्रसारण होता है। और यहां पर सांसद ऐसे संभावित जजों से तमाम विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दों पर उनकी राय पूछते हैं, उनसे जमकर सवाल होते हैं, उनके निजी जीवन से जुड़े विवादों पर चर्चा होती है, और देश की अदालतों के सामने कौन-कौन से मुद्दे आ सकते हैं उन पर उनकी राय भी पूछी जाती है। कुल मिलाकर निजी जीवन और निजी सोच इनको पूरी तरह उजागर कर लेने के बाद ही उनकी नियुक्ति होने की गुंजाइश बनती है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में रखी है, और वहीं से नाम तय होकर प्रस्ताव सरकार को जाते हैं। ऐसे में जजों की सामूहिक सोच से परे किसी और तरह की सोच आने की गुंजाइश नहीं रहती।

हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान में जजों के सारे पूर्वाग्रह पहले ही उजागर हो जाने चाहिए। और इसके साथ ही यह भी दर्ज हो जाना चाहिए कि उन्हें किस किस्म के मामले न दिए जाएं, या कि उन्हें नियुक्त ही न किया जाए। हमारा यह भी मानना है कि देश के सुप्रीम कोर्ट को अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट के फैसलों की ऐसी व्यापक असर वाली बातों का खुद होकर नोटिस लेना चाहिए, और इसके लिए कौन सा सुधार किया जा सकता है उसका एक रास्ता निकालना चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)