नवरात्रि का धार्मिक जमावड़ा जागरूकता फैलाने का मौका

संपादकीय
28 मार्च 2017


भारत के बहुत बड़े हिस्से में आज से 9 दिनों तक देवी की पूजा होगी, और समारोह चलते रहेंगे। करोड़ों लोग उपवास भी करेंगे, और देवी दर्शन के लिए जगह-जगह मंदिरों में भी जाएंगे। यह मौका धार्मिक भावनाओं से भरा होता है, और समाज के साथ-साथ सरकार को भी इसका इस्तेमाल करना चाहिए। एक तो भारत में महिलाओं की जो बुरी स्थिति है, उसे देखते हुए लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि इस देश की संस्कृति में महिलाओं के लिए कितना सम्मान रहते आया है, और आज जब समाज का एक बड़ा तबका अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कायम रखने पर आमादा है,तब यह भी समझने की जरूरत है कि आज समाज में लड़कियों और महिलाओं के साथ जुल्म करते हुए, या जुल्म देखते हुए ऐसी किसी संस्कृति का कोई महत्व नहीं रह जाता। यह मौका देवियों की प्रतिमाओं की पूजा करने के साथ-साथ जीवित देवियों का सम्मान सिखाने का भी होना चाहिए।
लेकिन इसके साथ-साथ ऐसे हर धार्मिक या सामाजिक मौके पर कई और तरह की जागरूकता भी फैलाई जा सकती है। देवी-मंदिरों में पॉली बैग पर रोक लगाकर लोगों को ऐसे प्रदूषण के खिलाफ जागरूक किया जा सकता है। इस मौके पर लोगों को यह भी सिखाया जा सकता है कि किस तरह पूजा-पाठ के बाद का धार्मिक-कचरा सड़कों के किनारे न फेंका जाए, नदियों और तालाबों में ना डाला जाए। मंदिरों के बाहर लोगों में जागरूकता के पर्चे भी बांटे जा सकते हैं, और धर्मगुरूओं से भी अपील की जा सकती है कि वे जागरूकता के मुद्दों पर अपनी आवाज में रिकार्डिंग करवाएं, जिन्हें कि जगह-जगह सुनाया जा सके। जहां कहीं बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं, उनके बीच जनजागरण के लिए सरकार को भी पहले से तैयारी करके रखनी चाहिए, और छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार जिस तरह प्रचार-वैन का इस्तेमाल कर रही है, उन्हें भी ऐसे मंदिरों के आस-पास लगाकर उनकी स्क्रीन पर जागरूकता के मुद्दों को दिखाया जा सकता है। आमतौर पर समाज या सरकार किसी नसीहत या सलाह को देने के लिए बड़ा खर्च करके ही लोगों तक पहुंच सकते हैं, लेकिन जब खुद होकर ऐसी भीड़ जुटती है, तो उसका मुफ्त इस्तेमाल समझदारी की बात होगी।
पिछले बरसों में छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर ऐसे मौकों पर वन विभाग पौधे बांटने का काम करता है ताकि लोग लौटकर जाकर अपने घरों के आसपास पेड़ लगाएं। ऐसे मौकों पर स्वास्थ्य विभाग, म्युनिसिपल-विभाग भी साफ-सफाई के लिए पर्चे बांट सकते हैं। सरकार के हर विभाग के पास लोगों को समझाने के लिए, बताने के लिए कई बातें रहती हैं, और किसी भी धर्म या समाज के ऐसे आयोजनों के पहले विभागों को अपनी योजना बना लेनी चाहिए।

योगी के दो फैसलों के बाद स्वामी अग्निवेश का साथ

आजकल
27 मार्च 2017 
भारत में आर्य समाज से जुड़े रहे और बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के काम में लगे स्वामी अग्निवेश ने बीती रात फेसबुक पर यह लिखा है कि उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अवैध बूचडख़ानों को जो बंद करने का अभियान चलाया है उससे हो सकता है कि कुछ लोगों को दिक्कत हो, लेकिन उसमें एक वरदान छिपा हो सकता है। उन्होंने लिखा कि इससे मांसाहार घटेगा, और शाकाहार को बढ़ावा मिलेगा। पशु-पक्षियों की जान बचेगी, और लोगों की सेहत अच्छी होगी। उन्होंने मोटेतौर पर प्राणियों को बचाने में इस फैसले से मिलने वाली एक परोक्ष मदद की बात लिखी है।
योगी आदित्यनाथ के फैसले को लेकर दो राय नहीं हो सकती कि जो भी अवैध बूचडख़ाने हैं, उनको तो बंद किया ही जाना चाहिए था, और इनके अलावा भी जो भी अवैध कारोबार कहीं भी चलते हों, उन्हें बंद करवाना राज्य सरकार, या कि उसके मातहत स्थानीय प्रशासन का जिम्मा रहना चाहिए। इस हिसाब से यह फैसला अपने आपमें, और पहली नजर में सही लगता है, लेकिन जिस तरह लोकतंत्र में, या कि इंसानी जिंदगी और समाज में कोई भी फैसले टापू की तरह अलग-थलग नहीं होते, और उनसे कई दूसरे मुद्दे भी जुड़े रहते हैं, इसलिए बूचडख़ाने बंद करने के इस फैसले को बहुत सी दूसरी बातों के साथ जोड़कर ही समझा जा सकता है।
उत्तरप्रदेश से दूर बैठे हुए अभी हमको यह जानकारी नहीं है कि ये बूचडख़ाने महज मुस्लिमों के थे, या कि इन्हें चलाने वालों में कुछ हिन्दू भी थे। दूसरी बात यह कि यहां का मांस खाने वाले महज मुस्लिम थे, या कि उनमें हिन्दू भी थे। तीसरी बात यह कि मांस के कारोबार के साथ जुड़ी हुई दूसरी कई किस्म की मजदूरियां भी रहती हैं, और दूसरे कई रोजगार भी साथ-साथ चलते हैं। बूचडख़ानों से जुड़े हुए चमड़े के कारोबार में मुस्लिमों के अलावा बड़ी संख्या में दलित भी काम करते हैं, और उत्तरप्रदेश में चमड़ा उद्योग अनपढ़, गरीब जातियों के रोजगार का एक बड़ा साधन भी है। ऐसे में एक झटके में हुए ऐसे फैसले से रोज कमाने-खाने वाले लोगों की अगले दिन की कमाई कहां से आएगी, इस फिक्र की कोई जगह सीएम योगी के फैसले में नहीं दिखती है। दूसरी बात यह भी नहीं दिखती है कि मांसाहार करने वाले लोग इन बूचडख़ानों के बंद होने के बाद कहां से मांस पाएंगे, इस फैसले के पहले इस पर भी नहीं सोचा गया है।
लोकतंत्र में किसी शाकाहारी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को भी खान-पान की अपनी पसंद को दूसरों पर लादने की छूट नहीं मिलती। सीएम योगी का यह फैसला उनकी निजी मान्यताओं से निकला दिखता है, और योगी सहित उनके साथियों का जो रूख मुस्लिमों के लिए बरसों से रहा है, उसे देखते हुए ऐसा न मानने के कोई कारण नहीं दिखते कि यह फैसला मुस्लिमों पर हमला करने के लिए भी लिया गया है। कुछ महीने पहले यह वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आई थी जिसमें योगी आदित्यनाथ के संगठन के उनके एक साथी मंच और माईक पर से यह आव्हान कर रहे थे कि दफन की गई मुस्लिम महिलाओं को कब्र से निकालकर उनके साथ बलात्कार करना चाहिए। इस बात पर योगी का कोई विरोध या उनकी कोई असहमति सामने नहीं आई थी, इसलिए यह मानने की पर्याप्त वजह है कि वे इसे सहमत भी थे। अब खुद योगी के दिए हुए सैकड़ों भड़काऊ बयानों को साथ जोड़कर देखें तो मुस्लिमों के चलाए जा रहे अवैध बूचडख़ानों को पल भर में बंद करवाने के उनके फैसले के पीछे की नीयत भी साफ होती है।
लेकिन योगी की नीयत तो पहले से साफ है, आज जब उनके इस फैसले के बचाव में स्वामी अग्निवेश एक बयान देते हैं, तो वह बयान अपने शब्दों से परे जाकर, उनसे आगे जाकर, एक मासूमियत के मुखौटे के पीछे से योगी की साम्प्रदायिकता का बचाव भी करते दिखता है, और ऐसा करते हुए स्वामी अग्निवेश अपनी उस साख को खोते हैं जो कि हिन्दू समाज के भगवा चोले में रहते हुए भी पाखंड के खिलाफ आर्यसमाजी तेवरों से एक लड़ाई के लिए उन्होंने एक वक्त पाई थी। एक घोर साम्प्रदायिक नेता के बचाव के लिए स्वामी अग्निवेश आज अगर शाकाहार और उसके फायदों को तरह-तरह से गिना रहे हैं, तो यह किसी कातिल के कत्ल की चर्चा होने पर उस कातिल के एक अच्छा पेंटर होने, या अच्छा चित्रकार होने की चर्चा छेडऩे की तरह की बात है।
जब बहस का मुद्दा एक बुनियादी मुद्दा हो, तो उसके केन्द्र को छोड़कर उसके दूर के किनारे के आसपास के इन्द्रधनुष की चर्चा करना न तो मासूमियत की बात होती, और न ही इंसाफ की बात होती। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनगिनत बड़े हत्यारे हुए हैं जिनमें कला या साहित्य की कोई खूबी भी थी, लेकिन जब उनके लहू सने हाथों पर चर्चा होती हो, तब उनकी लाल रंग की किसी पेंटिंग की चर्चा छेड़ देना एक साजिश भरी नीयत साबित करती है।
भारत में लोगों को खान-पान की आजादी है। अलग-अलग राज्यों में गाय या गोवंश को कटने से बचाने के लिए कई तरह के कानून बनाए हैं। उत्तरप्रदेश में भी गाय काटने पर पहले से रोक लगी हुई है। लेकिन वहां के बूचडख़ाने ऐसे जानवरों को भी काटते थे जो कि कानून के दायरे में काटे जा सकते हैं, और उनका कुसूर यह जरूर था कि वे बिना लाइसेंस के चल रहे बूचडख़ाने थे, और उनको शर्तें पूरी करके लाइसेंस के तहत यह काम करना था। लेकिन उत्तरप्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के राज वाले गोवा में भाजपा के ही मुख्यमंत्री साफ-साफ यह घोषणा करते आए हैं कि उनके राज्य में गोहत्या या गोमांस पर कोई रोक नहीं लगेगी।
बूचडख़ानों के अलावा जो दूसरा फैसला सीएम योगी का आया, वह पूरे प्रदेश में पुलिस के रोमियो-दस्ते बनाने का है जिन्होंने अपना काम शुरू भी कर दिया है, और बाग-बगीचों में, सार्वजनिक जगहों पर बैठे हुए लड़के-लड़कियों को पकड़कर भगाना, धमकाना, सजा देना शुरू कर दिया है। इसे लेकर पूरे देश में अलग-अलग जागरूक तबकों ने योगी के खिलाफ जमकर लिखा, और चूंकि पुलिस की कार्रवाई गैरकानूनी भी चल रही थी, इसलिए भी योगी को दो दिन के बाद यह घोषणा करनी पड़ी कि जो जोड़े सहमति से बैठे हैं, उन्हें पुलिस परेशान न करे। यह फैसला किसी को छेडख़ानी से बचाने वाला नहीं है, यह फैसला योगी की पहले की दर्जनों बार की ऐसी सार्वजनिक घोषणाओं के सिलसिले की एक कड़ी है जिसमें वे यह कहते आए हैं कि मुस्लिम नौजवान हिन्दू लड़कियों को बरगला ले जाते हैं, और शादी करके मुस्लिम बना लेते हैं। उन्होंने अपने भाषणों में पहले यह कहा है कि ऐसी एक भी हिन्दू लड़की के मुस्लिम बनाए जाने पर उसके खिलाफ सौ-सौ मुस्लिम लड़कियों को हिन्दू बनाया जाएगा। अब मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके लिए हुए फैसले को उनके ही ऐसे बयानों की रौशनी में देखना ठीक रहेगा, और हमारा ख्याल यह था कि रोमियो-दस्तों की ऐसी कार्रवाई के खिलाफ अदालत खुद होकर दखल दे सकती है, लेकिन इसके पहले ही मुख्यमंत्री ने अपने फैसले को सुधारा।
सीएम योगी से लोगों को किसी हृदय परिवर्तन की उम्मीद नहीं है, लेकिन लोकतंत्र के भीतर इतनी उम्मीद तो हर किसी से रखनी ही चाहिए कि या तो वे देश के संविधान का सम्मान करें, या फिर देश की अदालतें संविधान को बचाने के लिए ऐसे लोगों के फैसलों में दखल दें। उत्तरप्रदेश की शक्ल में आज देश में एक ऐसा राज्य सामने आया है जो कि संविधान की शपथ लेकर काम करने वाले घोर साम्प्रदायिक नेता के काम को दर्ज करने जा रहा है। कल तक तो देश का संविधान अपने लचीलेपन के साथ योगी को साम्प्रदायिक-भड़काऊ बातें कहने देता था, और यह संविधान देश की अदालतों को ऐसे जुर्म को अनदेखा करने की छूट भी देते रहता था। लेकिन आज जब योगी के फैसले महज बयान नहीं रहेंगे, और उनकी बहुत सी बातें सरकारी कार्रवाई की शक्ल में भी सामने आएंगी, तो उत्तरप्रदेश की न्यायपालिका, और उसके बाद देश की सबसे बड़ी अदालत, इन दोनों का एक बहुत बड़ा जिम्मा यह रहेगा कि जहां कहीं मुख्यमंत्री संविधान के खिलाफ जाएं, वहां अदालतें दखल दें। किसी पार्टी को चुनाव में बहुमत मिल जाने, और उस पार्टी की पसंद के मुख्यमंत्री बन जाने का यह मतलब नहीं रहता कि वहां पर संविधान पांच बरस निलंबित रहेगा। एक बहुमत की सरकार भी संविधान पर चलने के लिए बाध्य रहती है, और अदालतों के लिए जवाबदेह भी रहती है। योगी का अब तक का रूख देखते हुए उत्तरप्रदेश में जितना जिम्मा सरकार का है, उतने का उतना जिम्मा अदालत का भी है, और उसे बारीकी से ऐसी सरकार की निगरानी करते चलना चाहिए। हमें ऐसा दिन ज्यादा दूर नहीं दिखता है जब अदालत को दखल देनी पड़े।
आखिर में हम फिर स्वामी अग्निवेश पर लौटते हैं। और हम यह मानते हैं कि अग्निवेश बूचडख़ानों पर रोक के अलावा रोमियो-दस्तों की खबर को भी पढ़ चुके होंगे। इस देश में आर्य समाज ने हिन्दू धर्म के प्रेमी जोड़ों को मर्जी से शादी करने के लिए सबसे बड़ी सहूलियत दशकों से उपलब्ध कराई हैं। ऐसे प्रेम-विवाहों की वजह से ही देश में जाति व्यवस्था की कट्टरता कमजोर पड़ रही है। और नौजवान लड़के-लड़कियों के मिलने-जुलने पर भी पुलिसिया जुल्म लादने वाले योगी आदित्यनाथ का एक दूसरे मामले में बचाव करने के पहले स्वामी अग्निवेश को आर्य समाज में होने वाले प्रेम-विवाहों के सामाजिक योगदान के बारे में भी याद रखना चाहिए था।

म्युनिसिपलों की क्रेडिट रेटिंग में छत्तीसगढ़ का नाम भी नहीं

संपादकीय
27 मार्च 2017


केन्द्र सरकार ने देश के शहरों की म्युनिसिपलों की क्रेडिट रेटिंग जारी की है जिनके मुताबिक ये शहर अपने आपको स्मार्ट बनाने के लिए बाजार से कर्ज उठाने के लिए बॉंड जारी कर सकते हैं। अभी देश में जिन पांच सौ शहरों को स्मार्ट सिटी मिशन, और ऐसी ही एक दूसरी अमृत योजना के लिए छांटा गया है, उनमें से ऊपर के 94 पाए गए शहरों की क्रेडिट रेटिंग जारी हुई है। देश के 55 शहर ऐसे पाए गए हैं जिन्हें पूंजीनिवेश के लायक दर्जा मिला है और इसके नीचे के शहरों को यह नसीहत दी गई है कि वे अगले एक बरस में अपनी हालत को सुधारें ताकि वे क्रेडिट रेटिंग पैमानों पर बेहतर साबित हो सकें। छत्तीसगढ़ का इस लिस्ट में हाल यह है कि जिन 14 राज्यों के 94 शहर इस लिस्ट में हैं, उनमें से छत्तीसगढ़ का कोई नहीं है, और प्रदेश का नामोनिशान नहीं है। दूसरी तरफ नया राज्य तेलंगाना, सबसे गरीब समझा जाना वाला राज्य पश्चिम बंगाल, छोटा राज्य गोवा, मिजोरम, झारखंड, ओडिशा, ऐसे कई राज्यों के शहर इस लिस्ट में हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पर राज्य बनने के बाद के इस डेढ़ दशक में हजारों करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। रायपुर के अलावा बिलासपुर ऐसा शहर है जहां लंबे समय से नगरीय प्रशासन मंत्री चले आ रहे अमर अग्रवाल विधायक हैं और वहीं बसे हैं, और वहां पर शहर की योजनाओं पर हजारों करोड़ खर्च भी हुआ है। यही हाल दुर्ग-भिलाई का है, जहां खर्च खूब हुआ है, ताकतवर मंत्री इन तीनों शहरों में बसते हैं, लेकिन नगर निगम की अपनी हालत खस्ता बनी हुई है। क्रेडिट रेटिंग के पैमानों पर शहरों की म्युनिसिपलों को इसलिए आंका जाता है कि अपने विकास के लिए कौन-कौन से शहर कर्ज पाने की क्षमता रखते हैं, इसे देखा जाए, और इस आधार पर शहरों को बॉंड लाने की इजाजत दी जाए। अभी की लिस्ट में हालत यह है कि बॉंड के लिए अपात्र माने गए करीब 45 शहरों के नीचे भी छत्तीसगढ़ का नाम नहीं है।
छत्तीसगढ़ में म्युनिसिपलों के साथ दिक्कत यह है कि राज्य सरकार उन पर अपना काबू कम करना ही नहीं चाहती। जब किसी स्थानीय प्रशासन को अपने पैरों पर खड़ा होना है, तो उसे कई तरह की स्वायत्तता भी मिलनी चाहिए। उसे अपने खर्च करने, अपनी कमाई के साधन जुटाने, और अपनी पसंद के टैक्स लगाने की छूट मिलनी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के म्युुनिसिपल सरकार द्वारा मिलने वाली मदद के इंतजार में बरस-दर-बरस गुजार देते हैं, और राज्य शासन के रहमोकरम के मोहताज बने रहते हैं। दूसरी तरफ यहां की कई म्युनिसिपलों में ऐसी पार्टी के महापौर चुनकर आए जो कि राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के विपक्षी रहे, और नतीजा यह हुआ कि उनके साथ सरकार द्वारा तैनात कमिश्नरों का टकराव ही चलते रहा, या फिर म्युनिसिपल के भीतर राजनीतिक पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे से निपटने में लगे रहे, शहर की दिक्कतों से निपटने के बजाय। सरकार की सोच में भी स्थानीय निकायों को आजादी देना नहीं है, और कई बार तो राज्य शासन के स्तर पर बड़ी महंगी-महंगी मशीनें खरीदकर म्युनिसिपलों पर थोप दी जाती हैं, जो कि कबाड़ का बोझ बने हुए अखबारों में खबरें बनती रहती हैं।
दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्र में स्थानीय निकायों को इतना महत्व मिलता है कि कई जगहों पर पुलिस विभाग भी उनके मातहत काम करता है। वे स्थानीय स्तर पर सरकार का दर्जा रखते हैं, और वहां से निकला हुआ नेतृत्व आगे चलकर प्रदेश और देश के भी काम आता है। इसके अलावा स्थानीय जरूरतों को समझते हुए जब म्युनिसिपल अपने स्तर पर फैसले लेने और काम चलाने की आजादी रखते हैं, तब फिर वे निर्वाचत करने वाली जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भी पूरी कर सकते हैं। आज स्थानीय निकायों को छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में केवल राज्य शासन के अनुदान, या अलग-अलग मद में उनसे दूसरे किस्म की मंजूरी पर जिंदा रहने की मजबूरी है। इसके चलते हुए म्युनिसिपलों का अपना खुद का ढांचा लापरवाह और जर्जर हो गया है। जब हर काम के लिए राज्य के मंत्रालय जाकर खड़ा रहना है, तो निर्वाचित नेता भी अपनी जिम्मेदारी से कतराने लगते हैं। यह सिलसिला किसी शहर की म्युनिसिपल के दफ्तर में सुधरने का नहीं है, इसके लिए राज्य शासन के स्तर पर इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है कि स्थानीय नेतृत्व पनपने दिया जाए, न कि उससे डरा जाए, उसे दबाया जाए, और उसे काबू पाने के लिए अफसर तैनात किए जाएं। अभी केन्द्र सरकार की क्रेडिट रेटिंग की लिस्ट छत्तीसगढ़ सरकार को हकीकत समझाने के लिए काफी है। ऐसा न होने पर स्थानीय निकाय कमजोर बने रहेंगे, और स्थानीय निकायों की नाकामयाबी की जिम्मेदारी पूरी तरह राज्य सरकार की होगी, जैसी कि आज है।

एक दिन पेट्रोल-डीजल बिना रहने के लिए जरूरी है...

संपादकीय
26 मार्च 2017


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज अपने मन की बात में लोगों से हफ्ते में एक दिन डीजल-पेट्रोल इस्तेमाल न करने की अपील की है। यह वैसे तो एक अच्छी सलाह है जिससे देश की विदेशी मुद्रा बचेगी, सड़कों पर भीड़ बचेगी, प्रदूषण घटेगा, और पैदल या पैडल की वजह से लोगों की सेहत भी बेहतर होगी। जो लोग सार्वजनिक साधनों पर चलेंगे, उनकी बचत भी होगी। लेकिन भारत के संदर्भ में इस सलाह में दो बड़ी बातें आड़े आती हैं, और ये दोनों ही बातें सरकारों से जुड़ी हुई हैं, जिनके सुलझाए बिना इस सलाह पर अमल करना अधिक मुमकिन नहीं है।
लोगों को कामकाज के लिए बाहर निकलना ही होता है, और अगर मेट्रो या बस जैसी सहूलियत न हो, तो लोगों को अपने ही दुपहिए या चौपहिए पर जाना पड़ता है। ब्रिटेन जैसे विकसित और संपन्न देश में करोड़पति भी अपनी मर्जी से साइकिलों पर निकल पड़ते हैं, और ऐसा हाल योरप के बाकी देशों में भी है, और अमरीका में भी है। इन देशों में ट्रेन से लेकर ट्राम और बसों तक साइकिलों को लेकर जाने की सुविधा रहती है, और लोग एक देश से दूसरे देश साइकिल ले जाते हैं, और वहां उतरकर सीधे रवाना हो जाते हैं। हिन्दुस्तान तो ऐसा गरीब देश है जहां पर आबादी का एक बड़ा हिस्सा मजबूरी में साइकिल चलाता है, और उसे तो ऐसी नसीहत की जरूरत भी नहीं है। लेकिन साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित सड़कों की जरूरत जरूर है जो कि हिन्दुस्तान में बिल्कुल भी नहीं हैं। लोगों को याद होगा कि देश की एक सबसे प्रमुख पर्यावरण विशेषज्ञ सुनीता नारायण कुछ बरस पहले दिल्ली में साइकिल से अपनी दफ्तर जा रही थीं, और एक कार उन्हें मारकर भाग निकली थी। बुरी तरह जख्मी हालत में वे अस्पताल में रहीं। जब सड़कों पर बड़ी गाडिय़ों की रफ्तार पर काबू नहीं होगा, तब तक साइकिल चलाने वाले लोग कुचले जाते रहेंगे, और ऐसे खतरे लोगों को साइकिल के इस्तेमाल से रोकते हैं।
दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में यह देखा है कि मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर दिल्ली की मेट्रो और कोलकाता की मेट्रो तक, जहां-जहां सार्वजनिक परिवहन लोगों को मिलता है, लोग उसका खूब इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जब शहरीकरण के ढांचे में बसों या मेट्रो का इंतजाम नहीं होता है, तो लोगों की आदत अपनी गाडिय़ों पर निर्भर रहने की होने लगती है, और उसके बाद उनसे बसों पर चलने की उम्मीद बेकार रहती है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को एक मिसाल की तरह देखते हैं, और पिछले सोलह बरसों के राज्य के अस्तित्व में इस शहर पर हजारों करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। लेकिन सार्वजनिक परिवहन के लिए बसों की सुविधा आज भी बहुत सीमित है, और शहर के कई हिस्सों में बसों के भरोसे नहीं जाया जा सकता। ऐसे में लोग निजी गाडिय़ों पर मजबूर होते हैं। दूसरी तरफ रायपुर शहर प्रदूषण में देश और दुनिया में सबसे ऊपर के शहरों में आता है, और प्रदूषण में एक बड़ा हिस्सा सड़कों पर गाडिय़ों से निकलने वाला धुआं भी है। इसलिए हिन्दुस्तानी शहरों को एक बड़ी प्राथमिकता के आधार पर सार्वजनिक परिवहन को बड़े घाटे के साथ भी बढ़ावा देना होगा, और जैसे-जैसे लोगों को इस ढांचे पर भरोसा होते जाएगा, वैसे-वैसे घाटा दूर भी होता जाएगा। दूसरी तरफ दुनिया में कहीं भी शहरों के सार्वजनिक परिवहन को नफे-नुकसान से जोड़कर नहीं देखा जाता है, क्योंकि इससे लोगों की सेहत, पर्यावरण, लोगों का वक्त, और देश की उत्पादकता इन सभी का बड़ा फर्क पड़ता है।
मोदी ने चूंकि यह बात छेड़ी है इसलिए उनकी सरकार को यह पहल करनी चाहिए, और हर राज्य के बड़े शहरों को यह बढ़ावा देना चाहिए कि राज्य सरकारें बसों का जाल बिछाएं। आज भी केन्द्र सरकार की ऐसी योजना है और छत्तीसगढ़ की कुछ शहरों में ऐसी बसें चल भी रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में ही ऐसे शहर हैं जहां केन्द्रीय पैसों से आई हुई बसें महीनों से खड़ी हुई हैं, और सरकार उसे चलाने का इंतजाम नहीं कर पा रही है। ऐसी सारी दिक्कतों को दूर करके तेजी से बसों को बढ़ाना पड़ेगा, तभी लोगों का पेट्रोल-डीजल का निजी गाडिय़ों का खर्च थमेगा। और फिर साइकिलों को बढ़ावा अगर देना है, तो सड़कों को सुरक्षित बनाना पड़ेगा, जो कि आज बिल्कुल भी नहीं है। हिन्दुस्तानी सड़कों पर दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें दुनिया में सबसे अधिक हैं, और ऐसे में कोई साइकिल चलाने की हिम्मत नहीं कर सकते, जब तक कि साइकिल चलाना उनकी मजबूरी न हो।

जिंदा कौमों वाला लोहिया का बयान चुनाव व्यवस्था में महज कागजी

संपादकीय
25 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से सोशल मीडिया पर हिन्दुस्तान के बहुत से लोग उबले पड़े हैं कि ऐसी साम्प्रदायिक सोच रखने वाले को मुख्यमंत्री बनाया गया है। इसे लेकर हिटलर की मिसाल भी दी जा रही है, और कुछ ऐसे कार्टून-पोस्टर बनाए गए जिन्हें फेसबुक ने भी हिटलर के चेहरे की वजह से हटा दिया। कुछ ऐसा ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जीतकर आने के बाद हुआ कि अमरीका के दर्जनों शहरों में उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए और लोग इन नारों की तख्तियां लिए हुए थे- ये मेरा राष्ट्रपति नहीं है।
लोकतंत्र में हर बात की एक सीमा होती है। उत्तरप्रदेश सहित बाकी राज्यों के चुनाव के पहले हर राजनीतिक दल और हर विचारधारा के सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के पास अपने-अपने प्रचार का पूरा मौका था। और ऐसे ही मौके के चलते उत्तरप्रदेश में एक सुनामी की तरह भाजपा आई, लेकिन पास के पंजाब में वही भाजपा अपने बड़े भागीदार अकाली दल के साथ मानो सुनामी में बह गई, और विपक्ष में भी दूसरे नंबर पर पहुंची। ऐसे में लोकतंत्र में सिवाय इसके और कोई विकल्प नहीं है कि निर्वाचित व्यक्ति को, या कि निर्वाचित लोगों के बहुमत के छांटे हुए किसी व्यक्ति को सरकार पर काम करने का मौका दिया जाए। वह व्यक्ति खराब हो सकता है, बहुत खराब हो सकता है, लेकिन उसकी खराबी भी अगर उसे चुनाव लडऩे के लिए अपात्र नहीं ठहराती, तो फिर जीतकर आने के बाद उसे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, या मंत्री बनने के लिए भला कैसे अपात्र ठहराया जा सकता है? लोगों को यह लग सकता है कि यह देश की साम्प्रदायिक-सद्भावना के खिलाफ है, देश के लिए खतरा है, देश का लोकतंत्र इससे खत्म हो सकता है, लेकिन ये तमाम बातें मतदाता के फैसले के पहले तक की हैं। एक बार मतदाता ने जब चुन लिया, तो लोगों को अपनी हसरतों को विचार के रूप में ही सामने रखने की संभावना मिलती है, और भारत में वह चल भी रहा है।
अमरीका सहित पश्चिम के बहुत से अखबारों ने योगी को मुख्यमंत्री बनाने को बहुत बड़ा खतरा बताते हुए इसे मोदी से निराशा बताई है, लेकिन देश के भीतर के ही अखबारों के विचार क्या मायने रखते हैं? और फिर यह देखें कि चुनाव में अखबार क्या मायने रखते हैं, मीडिया क्या मायने रखता है, तो इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो अमरीका में ट्रंप का जीतकर आना है क्योंकि ट्रंप तो वहां हिलेरी क्लिंटन और मीडिया दोनों से ही एक साथ लड़ रहे थे, और इस बात को बार-बार बोल भी रहे थे। हम अमरीकी मीडिया के रूख के खिलाफ नहीं हैं, उसने दबे-छुपे कुछ नहीं किया, उसने खुलकर ट्रंप का विरोध किया, और उस विरोध के बावजूद अमरीकी जनता ने एक ऐसे ट्रंप को राष्ट्रपति बना दिया जिसे लेकर उसे वोट देने वाले मतदाता भी अगले ही दिन हक्का-बक्का रह गए। हो सकता है आने वाले दिनों या हफ्तों में योगी के ऐसे फैसले रहें जिन्हें लेकर उत्तरप्रदेश की जनता को अफसोस हो कि यह उसने किसे चुन लिया था, किस पार्टी को चुन लिया था, लेकिन लोकतंत्र में जनता के पास विकल्प सीमित हैं। वह मतदान के दिन घर बैठकर बाद में पांच बरस झींक सकती है, वह गलत पार्टी या नेता को चुनकर पांच बरस तक मलाल कर सकती है, लेकिन वह एक बार चुन लेने के बाद किसी को वापिस नहीं बुला सकती, हटा नहीं सकती। इसलिए लोहिया की कही हुई यह बात भारतीय संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में महज एक भावना है कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। यह बात चुनावी व्यवस्था के ढांचे में किसी काम की नहीं है, और उत्तरप्रदेश के आने वाले बरस ही वहां के मतदाताओं को खुशी या गम दे सकते हैं कि उन्होंने किसे मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता बनाया। फिलहाल तो लोगों को चुपचाप इंतजार करना है अगले चुनाव का, और तब तक वे चाहें तो अपने विचारों को लोहिया के कहे मुताबिक चारों तरफ उठा सकते हैं, ताकि जनजागरूकता कम से कम पांच बरस बाद तैयार रहे।

बिना समझ ज्ञान बेकार

संपादकीय
24 मार्च 2017


भारत में इम्तिहान शुरू होने और नतीजे निकलने शुरू होते ही जगह-जगह से बच्चों की आत्महत्या की खबरें आने लगती हैं। देश में सबसे अधिक कड़े मुकाबले वाली जगहों में से एक आईआईटी में पढ़ाई और मुकाबले के दबाव के चलते हर बरस कुछ छात्र-छात्राएं आत्महत्या कर लेते हैं और छोटी-छोटी स्कूलों में जहां पर बिना अधिक दबाव वाली साधारण पढ़ाई होती है वहां से भी दिल दहलाने वाली ऐसी खबरें आती हैं। इस देश में मनोचिकित्सक और मनोपरामर्शदाताओं का अकाल है और आज इस विशेषज्ञता के लिए चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान की जो पढ़ाई जरूरी है, वहां पर सीटों का ही अकाल है, इसलिए आने वाले दशकों तक यह कमी खत्म नहीं होने वाली है। ऐसे में देश के बच्चों और नौजवान पीढ़ी के सामने मौजूदा शिक्षानीति और मां-बाप की उम्मीदों नाम के दो पाटों के बीच पिसना ही नियति है। इसके अलावा जरा-जरा सी बात पर मां-बाप से नाराज होकर कुछ बच्चे आत्महत्याएं कर रहे हैं जिनमें मोबाईल फोन न मिलने, या फोन पर अधिक बातचीत से रोके जाने पर बच्चे ऐसे फैसले ले रहे हैं।
ऐसी खबरें जब आती हैं तो हमें यह लगता है कि इन खबरों को कितना छापें, कितना न छापें? क्या ऐसी खबरों से और बच्चों को ऐसा आत्मघाती फैसला लेने की राह दिखने लगेगी या फिर उनके मां-बाप और उनके शिक्षक ऐसी खबरों से चौकन्ने होकर अपना व्यवहार सुधारेंगे और अपने बच्चों की बेहतर देखभाल करेंगे? यह फैसला मुश्किल होता है और हम ऐसे खतरों के कम होने के आसार देख भी नहीं रहे। एक तरफ स्कूल और कॉलेज, तकरीबन हर जगह पढ़ाई का मतलब परीक्षा हो गया है और परीक्षा का मतलब अगली पढ़ाई के लिए दाखिला-परीक्षा हो गया है। पढ़ाई से किसी का ज्ञान बढऩा अब जरूरी नहीं रह गया, अब अगर बच्चे बड़ी-बड़ी, ऊंची और महंगी पढ़ाई तक पहुंचने का रास्ता बनाते चलते हैं तो मां-बाप भी उनसे खुश रहते हैं और स्कूलों में शिक्षकों के बीच भी बच्चों की साख ठीक बनी रहती है। कुछ मां-बाप जो इससे भी अधिक महत्वाकांक्षी हैं और जिंदगी में बहुत बुरे-बुरे समझौते करके, गलत काम करके अपने बच्चों को 'आगे बढ़ाने' में लगे रहते हैं, अभी कुछ बरस पहले  छत्तीसगढ़ में ही चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में जालसाजी करते कुछ बच्चे पकड़े गए। लाखों रूपये खर्च करके जब कुछ मां-बाप अपने बच्चों के लिए पर्चे खरीदने का इंतजाम कर लेते हैं, नंबर बढ़वाने का इंतजाम कर लेते हैं, तो उनसे काबिल जिन हजारों बच्चों का हक छिनता है, वे भी हताशा और निराशा में आत्महत्या की कगार पर पहुंच सकते हैं।
यह एक बहुत भयानक नौबत है जहां पर दुनिया की भौतिक सुविधाओं को, इम्तिहानों में कामयाबी को ही सब कुछ मान लिया गया है और शायद ही कुछ फीसदी मां-बाप अपने बच्चों को एक बेहतर इंसान बनाने में अधिक दिलचस्पी लेते हैं। जिंदगी और दुनिया में जिन दूसरी बातों का अधिक महत्व होना चाहिए वे तमाम हाशिए पर हो गई हैं।
कुछ बरस पहले ऐसे एक छात्र ने  अपने दो मोबाईल फोन के बाद एक तीसरे मोबाईल की फरमाईश पूरी न होने पर आत्महत्या कर ली और अपने पिता के लिए एक चि_ी छोड़ गया  कि वे बाजार से दूसरा बेटा खरीद लें। ऐसी खबरों के बाद  मां-बाप अपने बच्चों पर कितना काबू करने का हौसला कर पाएंगे? इसलिए जरूरी यह है कि पढ़ाई और मुकाबले से परे हर मां-बाप अपने बच्चों को उनकी जिंदगी की शुरूआत से ही सही और गलत, जरूरी और गैरजरूरी, नैतिक और अनैतिक की नसीहत देते चलें, और ऐसा करते हुए उन्हें अपनी खुद की जिंदगी को एक मिसाल के तौर पर बच्चों के सामने रखना होगा। इतनी सावधानी रखते हुए मां-बाप अपनी खुद की जिंदगी को भी बेहतर बना पाएंगे क्योंकि वे अगर बच्चों को गुड़ खाने से रोकना चाहेंगे तो उन्हें खुद भी गुलगुलों से परहेज करना होगा। यह करना इसलिए जरूरी है कि आत्महत्या से कम भी, जब बच्चे खबरें नहीं बनते हैं और तनाव या कुंठा में जीते हैं, हीन भावना के शिकार हो जाते हैं तो उनकी अपनी जिंदगी आगे जाकर बहुत तकलीफदेह रहती है। इसलिए बच्चों का सिर्फ आत्महत्या न करना, और जिंदा रहना काफी नहीं है। जरूरी तो यह है कि बच्चे जिंदगी और दुनिया के लिए अच्छे मूल्यों वाला नजरिया अपने भीतर विकसित कर पाएं, और कामयाबी के भी पहले वे बेहतर इंसान बनने को अधिक जरूरी समझें। मां-बाप को और स्कूल-कॉलेज को यह समझना जरूरी है कि दुनिया के बहुत से महान लोग किताबों के मामले में बहुत असफल रहे, परीक्षाओं में फेल हुए, लेकिन उन पर दुनिया में हजारों किताबें लिखी गईं। किताबों और उम्मीदों, नासमझी और लापरवाही तले अपने बच्चों को दम न तोडऩे दें और पहली कोशिश उन्हें समझदार और बेहतर इंसान बनाने में लगाएं। यह समझना चाहिए कि ज्ञानी और समझदार में से समझदार बेहतर होता है। बिना समझ ज्ञान किसी काम का नहीं होता।

मोहब्बत से नफरत का एजेंडा, पराजित होता भारतीय लोकतंत्र

संपादकीय
23 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश में नई योगी सरकार ने अपनी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र और आमसभाओं में किए गए वायदे के मुताबिक पुलिस के रोमियो दस्ते बनाए हैं जो कि लड़कियों को छेडख़ानी और प्रताडऩा से बचाने का काम करेंगे। इस कार्रवाई में दो दिक्कतें हैं। पहली बात तो यह कि रोमियो के नाम को इस तरह की बातों से जोडऩा प्रेम के महत्व को खत्म करना है, और प्रेम को अपमानित करना भी है। शेक्सपियर की कहानी में रोमियो और जूलियट के बीच शुद्ध प्रेम रहता है, किसी तरह की छेडख़ानी या ज्यादती, या जुल्म या बलात्कार जैसी कोई बात नहीं रहती है। लेकिन जिस देश की संस्कृति मूर्खों जैसा बर्ताव करने पर आमादा हो, उन्हें रोमियो-जूलियट की कहानी पढ़ाने से भी उनकी समझ में कुछ नहीं आएगा। जिस तरह प्रेम के प्रतीक वेलेंटाइन डे का विरोध भारत का एक धर्मान्ध तबका इसलिए करता है कि वह एक पश्चिमी परंपरा है, ईसाई परंपरा है, और उसे खत्म करना चाहिए। वेलेंटाइन डे को खत्म करते-करते उसके विरोधी यह भी भूल जाते हैं कि कृष्ण की कहानियों से लेकर कालीदास के साहित्य तक प्रेम और श्रृंगार रस की चाशनी बिखरी हुई है, और उसे धर्मान्ध लोग सारी मेहनत करके भी धो नहीं पाएंगे। इस देश में ऐसा बर्ताव करना कि लड़के-लड़की के बीच प्रेम अनैतिक है, अपराध है, यह एक ऐसा दकियानूसी पाखंड है जो न अपने बीते कल को मानने को तैयार है, न ही आने वाले कल पर इस जिद के बुरे असर को मानने को तैयार है, और वह आज हिंसा पर आमादा महज इसलिए है कि उसके इलाके की सत्ता से उसे ऐसी हिंसा की रियायत मिली हुई है।
हिन्दुस्तान को एक पढ़े-लिखे, जानकार, और सभ्य देश की तरह बर्ताव करना चाहिए, और सरकारों को कहीं रोमियो के नाम पर, तो कहीं मजनूं के नाम पर ऐसे दस्ते बनाने की परले दर्जे की बेवकूफी छोडऩी चाहिए जो कि इतिहास की कहानियों में प्रेम जैसी पवित्र भावना का अपमान भी है, और देश में प्रेम के खिलाफ नफरत पैदा करने का एक जुर्म भी है। एक दूसरी दिक्कत उत्तरप्रदेश में यह हो रही है कि ऐसे रोमियो दस्ते बाग-बगीचे में बैठे लड़के-लड़कियों को पकड़-पकड़कर सड़कों पर उनसे उठक-बैठक करवा रहे हैं, धमका रहे हैं, और उनको बेइज्जत कर रहे हैं। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि नौजवान पीढ़ी की भावनात्मक जरूरतों के भी खिलाफ है। यह अजीब पत्थरयुग का वक्त आ गया है जब नफरत को तो वाहवाही मिलती है, लेकिन प्रेम को पीछा करके, घेरकर मारा जाता है। हमारे हिसाब से यह मामला तुरंत ही अदालत की दखल का बनता है, और चाहे उत्तरप्रदेश हो, चाहे कोई और राज्य, ऐसी सरकारी हिंसा और अराजकता के खिलाफ अदालत को खुद मामला शुरू करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में भी इसी तरह की नैतिक-चौकीदारी के लिए पुलिस ने ऑपरेशन मजनूं चलाया है, जिनमें पुलिसकर्मी जाकर लड़के-लड़कियों को पकड़कर सजा देने का काम करते हैं। इसमें पुलिस को लड़के-लड़कियों को पीटते हुए भी कैमरे में कैद किया जा चुका है।
यह असभ्य देश अपनी नौजवान पीढ़ी को कुंठा में डालकर उसकी सभी तरह की संभावनाओं को खत्म कर रहा है। आज जब दुनिया के विकसित देश अपने लोगों के बुनियादी अधिकारों का सम्मान करते हुए अधिक से अधिक उदारता की तरफ बढ़ रहे हैं, तब कृष्ण प्रेमकथाओं के इतिहास से संपन्न यह देश यह साबित करने में जुट गया है कि इसके इतिहास में प्रेम कभी रहा ही नहीं। यह शुद्धतावादी, कट्टरतावादी, पवित्रतावादी सोच इतनी हिंसक हो चल रही है कि इसके झांसे में आकर बहुत से मां-बाप अपनी ही आल-औलाद को मारकर फेंक रहे हैं क्योंकि उन्हें किसी से प्रेम हो गया। मोहब्बत के खिलाफ नफरत इस पूरे देश को ऐसा नुकसान पहुंचा रही है जो कि पीढिय़ों तक दूर नहीं हो सकेगा। उत्तरप्रदेश में इस नफरत के पीछे यह सोच भी है कि कोई मुस्लिम लड़का किसी हिन्दू लड़की को मोहब्बत के जाल में फंसाकर मुस्लिम आबादी में इजाफा न कर ले, लेकिन छांट-छांटकर ऐसी निगरानी हो नहीं सकती, और इसके चक्कर में पूरी की पूरी नौजवान पीढ़ी एक ऐसे अंत की तरफ धकेली जा रही है जिसमें वह इस देश-प्रदेश से नफरत करने लगे, और दुनिया के किसी सभ्य देश में जाकर बसने की सोचने लगे। भारत का लोकतंत्र विकसित होने के बजाय पराजित होते चल रहा है।

गंगा-यमुना बचाने आया फैसला एक आदिवासी सोच से उपजा हुआ

संपादकीय
22 मार्च 2017


उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अभी एक फैसले में देश की दो प्रमुख नदियों, गंगा और यमुना को इंसानों जैसे अधिकार देते हुए यह कहा कि इनको प्रदूषित करना उसी तरह अपराध माना जाए जिस तरह किसी इंसान या जानवर के साथ जुल्म करना अपराध होता है। हाईकोर्ट ने कहा कि अब गंगा-यमुना को वही अधिकार हैं जो देश का कानून और संविधान किसी भी नागरिक को देता है। अदालत ने इस संबंध में न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी का भी उदाहरण दिया जिसे इस तरह का दर्जा दिया गया है। न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक संघर्ष करता रहा। माओरी समुदाय वांगानुई नदी को अपना पूर्वज मानता है। इस नदी पर उसकी आस्था अगाध है।
यह फैसला आज के हिन्दुस्तान में एकदम अनोखा है क्योंकि अब भारत की सरकार और अधिकतर राज्यों की सरकारें लगातार कुदरत पर मार करते चलने में भरोसा रख रही हैं। कारखानों के लिए जमीन और खनिज, खदानों के लिए जंगल, और कारखानों से लेकर शहरों तक के लिए पानी, इन तमाम मुद्दों पर सरकार और कारखानेदार का मिलाजुला रूख कमाई के आंकड़ों का रहता है, और धरती के साथ इस रफ्तार से, इस परले दर्जे की ज्यादती हो रही है, कि उसे धरती माता कहना भी अब ठीक नहीं लगता। कोई बहुत बुरी औलाद ही मां के साथ इतने जुल्म कर सकती है जितने कि हिन्दुस्तान जैसे देश के लोग, और खासकर यहां की सरकारें, कुदरत के साथ कर रही हैं। पांच बरस के कार्यकाल को पूरा करने के पहले ही अगले चुनाव को जीतने की तैयारी में सरकारें और राजनीतिक दल, इन दोनों का रूख कमाई के आंकड़े पेश करने में रहता है, और धरती का अगले हजारों बरस का जो नुकसान हो रहा है, वह किसी की फिक्र का सामान नहीं बनता। नतीजा यह है कि जिन नदियों के किनारे दुनिया भर में बसाहट हुई और संस्कृतियां विकसित हुईं, उन तमाम नदियों का हाल आज यह है कि उनमें डुबकी लगाना भी खतरनाक हो गया है। जिन नदियों को मां कहा जाता है, जिस गंगा के पानी को मरते इंसान के मुंह में टपकाकर हिन्दू यह मानते हैं कि मरते-मरते गंगाजल सीधे स्वर्ग ले जाएगा, उसी गंगा में उसी हिन्दू धर्म के लोग न सिर्फ पूजा-पाठ का भयानक प्रदूषण छोड़ते हैं, बल्कि उसके किनारे लाशों को जलाते हुए अधजली लाशें भी बहा देते हैं। नदियों के किनारे के शहर अपनी गंदगी को बिना साफ किए हुए सारा पानी और पखाना सीधे इन्हीं गंगा-यमुना में छोड़ देते हैं, और इनमें शहरी आबादी में हिन्दुओं का जितना हिस्सा होता है, कम से कम गंदगी में भी उतना हिस्सा तो उनका होता ही है। दूसरी तरफ कारखानों की गंदगी नदियों में इस रफ्तार से मिल रही है कि मरते के लिए गंगाजल लाने को शायद सीधे गंगा के उद्गम गोमुख पर जाना होगा।
इसलिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस फैसले को हम एक कानूनी अमल की संभावना से परे भी एक सोच की तरह देखते हैं कि लोगों को यह याद पड़े कि भयानक भ्रष्टाचार के लिए दसियों हजार करोड़ खर्च करके गंगा को साफ करने का एक धार्मिक-भावनात्मक अभियान तब तक किसी काम का नहीं है, जब तक उसमें गंदगी को रोजाना जोडऩा न घटे। जब तक सरकार और समाज इन दोनों की नजरों में गंगा पूजा से परे, जिंदा रहने देने लायक इंसान न मान ली जाए, तब तक गंगा का कुछ भला नहीं होना है, और नदियों के किनारे बसे इस देश का भी कोई भला नहीं होना है। जब तक गंगा को एक धार्मिक प्रतीक मानकर उसे एक धार्मिक नारे की तरह बचाया जाएगा, तबतक उसका बचना वैसे ही होगा जैसे कि किसी देवी की प्रतिमा को नौ दिनों तक बचाना होता है, और दूसरी तरफ उसी समाज में जिंदा देवियों के साथ बलात्कार होता है, और उनकी ऑनरकिलिंग होती है। किसी का सम्मान करने के लिए उसके साथ किसी पौराणिक कहानी को जोडऩे की जरूरत नहीं होनी चाहिए, महज एक इंसान को इंसानियत से देखने की सोच काफी हो सकती है, जैसी कि पूरी दुनिया में आदिवासियों की होती है। कुदरत के तमाम हिस्से, जंगल, पेड़, नदी, पहाड़, जमीन, और पशु-पक्षी, इन सबके लिए आदिवासियों का नजरिया पूरी दुनिया में सबसे अधिक लोकतांत्रिक होता है, इंसाफपसंद होता है, और पर्यावरणप्रेमी होता है। इन्हीं आदिवासियों की जमीनों पर आज सरकार से लेकर कारखानेदार तक टूट पड़े हैं, और उनको उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, उनके पेड़ काटे जा रहे हैं, और पेड़ कटने से मिट्टी बनकर नदियों तक पहुंचकर उनमें गाद भर रही है, और पूरी धरती चौपट हो रही है। शहरों से निकली, शहरों में बसी, शहरी सोच में ढली, और शहरियों के लिए फिक्रमंद सरकारें पर्यावरण को बचाने का नारा तो जानती हैं, लेकिन आदिवासी और प्रकृति के बीच के सबसे मजबूत और अनंतकालीन रिश्ते को वे नहीं समझ पातीं। इसलिए उत्तराखंड ने जब न्यूजीलैंड के आदिवासियों की सोच का बखान करते हुए यह फैसला दिया है, तो इसे देखते हुए नदियों को धर्म से परे देखने की जरूरत है, उन्हें इंसानों की तरह देखने की जरूरत है, और संविधान में इंसानों को दिए गए अधिकार इन नदियों को भी देने की जरूरत है। और यह देना कोई देना भी नहीं है, यह तो नदियों और इस कुदरत से अपनी आने वाली हजारों पीढिय़ों के लिए एक बेहतर कल लेना है, और इस लेने की गारंटी के लिए धर्म के अवैज्ञानिक पाखंड से परे एक लोकतांत्रिक-वैज्ञानिक सोच की जरूरत है, और हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ही उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस एक दार्शनिक फैसले को काट नहीं सकेगी।

अयोध्या पर वार्ता संभव नहीं, सुप्रीम कोर्ट फैसले से न बचे

संपादकीय
21 मार्च 2017


कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह लिखा था कि बड़े-बड़े मामलों में भारत की अदालतें झिझक जाती हैं। कुछ ऐसा ही आज सुप्रीम कोर्ट ने किया जब उसने अयोध्या के बाबरी मुद्दे को अदालत के बाहर निपटाने की सलाह दी, और कहा कि दोनों पक्ष अगर मानें तो सुप्रीम कोर्ट अपने किसी जज को मध्यस्थता के लिए भी बिठा सकता है, और उच्च न्यायाधीश ने कहा कि जरूरत रहे तो वे खुद भी मध्यस्थ बनने को तैयार हैं। यह मामला आधी सदी से उत्तरप्रदेश के अयोध्या में चल रहा है कि जहां बाबरी मस्जिद थी, वहां पर क्या राम का जन्म हुआ था, और क्या बाबर ने उसी मंदिर की जगह पर मस्जिद बनाई थी? अदालत में इस मामले के चलते हुए भी 1992 में उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा सरकार ने मस्जिद को गिर जाने दिया था, और अदालत से किए गए अपने वायदे को नहीं निभाया था। इसके बाद की घटनाएं सब लोगों को याद हैं कि किस तरह देश भर में दंगे हुए, मुंबई बम धमाके हुए, गोधरा हुआ, और गुजरात दंगे हुए।
यह मामला निचली अदालत से लेकर उत्तरप्रदेश के हाईकोर्ट तक चलने में ही कई दशक लग गए। और हाईकोर्ट के फैसले के बाद उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील को भी कई बरस हो गए, लेकिन अदालत इस पर फैसले से एक किस्म से कतराती हुई दिखती है। यह बात किसी धर्म के मानने वाले तो कर सकते हैं कि आस्था किसी भी अदालत से ऊपर है, लेकिन अदालत का अपनी जिम्मेदारी से कतराना ठीक नहीं है। ऐसा भी नहीं कि सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी नहीं है कि इसके पहले भी मध्यस्थता की बहुत कोशिश हो चुकी है, और बात किसी किनारे नहीं पहुंची है। इस बीच बाबरी मस्जिद को गिराने का मामला अदालत में चल ही रहा है, और चौथाई सदी बाद भी सबसे छोटी अदालत से भी किसी को सजा नहीं हुई है।
एक बात बड़ी साफ है कि बाबर ने अपने वक्त में जो किया होगा, उस वक्त तो इस देश में लोकतंत्र नहीं था, किसी संविधान का राज नहीं था, और सभी धर्मों के लिए बराबरी का दर्जा भी उन दिनों में नहीं था। इसलिए बीसवीं सदी में आकर, आजाद भारत की आधी सदी पूरी हो जाने के वक्त अगर बाबरी मस्जिद को सार्वजनिक उकसावे और भड़कावे से गिराया गया था, और जिसके नतीजे के रूप में हजारों जानें गई थीं, तो उस जुर्म का निपटारा तो जमीन के विवाद और मंदिर-मस्जिद के निपटारे से परे भी होना चाहिए था जो कि दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। ऐसा भी नहीं कि देश की सर्वोच्च अदालत को अलग-अलग मामलों में अलग-अलग महत्व समझ न आता हो, सुप्रीम कोर्ट संजय दत्त से लेकर सुब्रत राय सहारा तक के मामले अंधाधुंध रफ्तार से सुनने के लिए बैठ जाता है, और कई मामलों के लिए विशेष अदालत बना देता है, विशेष जांच दल बना देता है, अपनी निगरानी में जांच करवाता है, लेकिन ऐसी कोई भी प्राथमिकता बाबरी मस्जिद गिराने के मामले को देना सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी नहीं समझा, और इसके आरोपियों को केंद्रीय मंत्री बन जाने दिया, राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल बन जाने दिया, और अदालत को ऐसी कोई जल्दी नहीं दिखती है कि आजाद भारत के इस एक सबसे बड़े जुर्म पर इंसाफ हो जाए। ऐसा सुप्रीम कोर्ट आज हाईकोर्ट के सुनाए गए फैसले पर फैसला लेना से कतरा रहा है, और फिर एक ऐसी मध्यस्थता की बात कर रहा है कि जिसके चलते फिर कई दशक लग सकते हैं, और मस्जिद गिराने वाले जिंदगी पूरी जीकर चैन से आजाद चल बस सकते हैं। यह सिलसिला ठीक नहीं है, और अदालत को अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए। अभी पहली प्रतिक्रिया यह आई है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने किसी बातचीत से इंकार कर दिया है, और सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह फैसला सुनाए। इसके बाद अदालत के पास और कोई रास्ता नहीं बचता है, बजाय इसे निपटाने के। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट की सारी बातें केवल जमीन के हक के मुकदमे की रहीं, और उससे परे एक दूसरा मुकदमा मस्जिद गिराने का भी है, वह तो एक आपराधिक मामला है, और उसमें किसी मध्यस्थता की कोई गुंजाइश नहीं है, इसलिए देश की सबसे बड़ी अदालत को इंसाफ की अपनी नीयत साबित करनी चाहिए। बहुत से फैसले कड़वे होते हैं, और कड़े मन से करने पड़ते हैं, लेकिन जो भी ताकत और फैसला की कुर्सी पर बैठते हैं, उन्हें कई बार अप्रिय काम भी करना पड़ता है, और सुप्रीम कोर्ट को इससे कतराने की अब कोई इजाजत नहीं मिल सकती क्योंकि एक पक्ष ने किसी बातचीत से इंकार कर दिया है।

सार्वजनिक पदों के लोग आस्था घर पर रखें

संपादकीय
20 मार्च 2017


उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर एक बार फिर सरकारी पद पर किसी धर्म से जुड़े ऐसे व्यक्ति के बैठने का मुद्दा उठ रहा है जिसकी राजनीति धर्म के आधार पर चल रही हो। लेकिन यह ऐसा पहला मौका नहीं है। ठीक उन्हीं की तरह की भगवाधारी उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, और लोगों को याद है कि किस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री-दफ्तर के अपने टेबिल पर ही मूर्तियों और मालाओं से मंदिर सा बना लिया था। दूसरी तरफ उत्तर-पूर्व में मिजोरम जैसे राज्य में लगभग सौ फीसदी ईसाई आबादी के चलते हुए सरकार पर चर्च का बेहद दबदबा हमेशा से दर्ज रहा है। पंजाब में अकाली दल सिख पंथ से जुड़ा हुआ है, और धार्मिक मामले वहां सरकारी कामकाज पर हमेशा से हावी रहे हैं। कुछ और संन्यासी या साध्वियां केंद्र और राज्यों में मंत्री रहते आए हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ में संत-कवि पवन दीवान भी शामिल थे।
भारत के लोकतंत्र में संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोगों को सैद्धांतिक रूप से ऐसा होना चाहिए कि सभी धर्मों के लोगों की, और आस्तिकों को भी, ऐसे मंत्री-मुख्यमंत्री, ऐसे जज-अफसर पर भरोसा होना चाहिए। यह काम थोड़ा सा मुश्किल इसलिए है कि लोगों को किसी ओहदे पर रहते हुए भी अपनी धार्मिक या आध्यात्मिक आस्था को मानना जारी रखने की पूरी आजादी है, और इसके अलावा लोग जातियों के संगठन में भी सक्रिय रह लेते हैं। सरकारी दफ्तरों में लोग धर्म-आध्यात्म से जुड़ी हुई तस्वीरों को दीवारों पर और मेज के कांच के नीचे सजाकर रख लेते हैं, और अपनी गाडिय़ों में भी ऐसी तस्वीरें लगा लेते हैं। ऐसे बहुत से काम सरकारी खर्च पर भी होते हैं, और मध्यप्रदेश तो याद है कि उमा भारती ने मुख्यमंत्री निवास के अहाते में एक मंदिर भी बनवा लिया था।
हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन में जनता के पैसों पर चलने वाले ऐसे ओहदों पर बैठे लोगों को अपनी आस्था घर पर रखनी चाहिए, और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र लचीला जरूर है, वह लोगों को कई तरह की छूट भी देता है, लेकिन नियमों से परे वह जिम्मेदारियों के कई तरह के तकाजे भी करता है, जिनके बिना लोकतंत्र, लोकतंत्र नहीं रह जाएगा। लोग महज अपने लिखित अधिकार का दावा करते रहें, और अपनी अलिखित जिम्मेदारी को मानने से इंकार करते रहें, या कतराते रहें, तो यह जनता के बीच अविश्वास पैदा करता है। अब हम नेहरू के जाने के आधी सदी बाद इस देश में नेहरू जैसे निरपेक्ष नेता की तो उम्मीद नहीं करते, क्योंकि ऐसे नेता तो खुद उनकी कांग्रेस पार्टी में भी नहीं रह गए हैं, लेकिन फिर भी इस मुद्दे पर चर्चा बंद नहीं होनी चाहिए। चारों तरफ अगर धर्मांधता का अंधेरा छा गया हो, तो भी लोकतंत्र की रौशनी की कोशिश खत्म नहीं करनी चाहिए। देश में यह चर्चा जरूर होनी चाहिए कि जनता की तनख्वाह पर बैठे लोग अपनी आस्था अपने घर पर रखें, और जनता के बीच एक भरोसा कायम रखें।