दीवारों पर लिक्खा है, 20 अक्टूबर 2020


 

सरकार और कारोबार संग मीडिया की कदमताल...

 इन दिनों कोई फिल्म रिलीज होने वाली रहती है, या कोई टीवी सीरियल या रियलिटी शो शुरू होने वाला रहता है तो उससे जुड़े ढेर सारे समाचार एक साथ सैलाब की तरह टीवी और प्रिंट मीडिया की वेबसाईटों पर छा जाते हैं। मीडिया का जो हिस्सा सिर्फ डिजिटल है, वह शायद और तेज रहता है, और एक फिल्म या एक शो के अलग-अलग कलाकारों के बारे में अलग-अलग फिल्म इतने सुनियोजित ढंग से सब छापा जाता है कि किसी आर्केस्ट्रा पार्टी में कोई गाना बजाया जा रहा हो। पूरे का पूरा मीडिया मनोरंजन को लेकर, खेल को लेकर, या राजनीति को लेकर ओलंपिक में होने वाली सिंक्रोनाइज्ड स्वीमिंग की तरह बर्ताव करने लगता है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के मुख्यमंत्री रहते हुए जब चुनाव हुआ, तो महाराष्ट्र के बड़े-बड़े अखबारों में सरकार की स्तुति में एक सरीखे परिशिष्ट निकाले, जिनमें कामयाबी की एक जैसी कहानियां थीं, और मजे की बात यह है कि सभी का शीर्षक अशोक पर्व था। अब मानो दीवाली-पर्व हो, या होली-पर्व हो, वैसा ही अशोक-पर्व मनाने में बड़े-बड़े कामयाब-कारोबार वाले अखबार टूट पड़े थे। बाद में प्रेस कौंसिल ने उस पर एक बड़ी सी रिपोर्ट भी बनवाई थी, जो कि सबकी सहूलियत के लिए बखूबी दफन कर दी गई, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

 
बहुत पहले जब मीडिया प्रिंट तक सीमित था, टीवी महज सरकारी दूरदर्शन था, और इंटरनेट था नहीं, तब गिने-चुने अखबारों को भी इस तरह से मैनेज नहीं किया जा सकता था जिस तरह आज मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से को खर्च करके मैनेज किया जा सकता है। वह एक वक्त था जब मीडिया में कोई भी जानकारी बिना हवाले के नहीं छपती थी कि वह कहां से मिली है, किसका कहना है, और अमूमन ऐसी जानकारी के साथ सवाल भी पूछे जाते थे। आज वह सब कुछ खत्म हो गया है। आज सरकार या नेता के स्तुति गान के बड़े-बड़े सप्लीमेंट बिना किसी हवाले के छपते हैं, खबरों की तरह छपते हैं, और उनका इश्तहारों की तरह सरकारी भुगतान भी हो जाता है। बीते दस-बीस बरसों में समाचार-विचार का इश्तहार से फासला खत्म कर दिया गया है, और अब इश्तहार समाचार के कपड़े पहनकर खड़े हो जाते हैं, मेहनताना भी पाते हैं। 

लेकिन इस मुद्दे पर लिखने से क्या होगा? क्या यह तस्वीर कभी बदल सकती है? अब तो हाल के कुछ बरसों में देखने में यह आ रहा है कि कारोबार और सरकार का साथ देने के लिए मीडिया जिस अनैतिक तरीके को बढ़ाते चल रहा है, वह अनैतिक तरीका अब चरित्र-हत्या के लिए, साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए, जातियों के संघर्ष को बढ़ाने के लिए, किसी धर्म को बदनाम करने के लिए, और आज की कारोबारी जुबान में कहें तो परसेप्शन मैनेजमेंट के लिए बढ़ते चल रहा है। अब सरकारों या राजनीतिक दलों से परे, बड़े-बड़े कारोबार मीडिया के इतने हिस्से को अपनी गोद में या अपनी पैरों पर रखते हैं कि उनसे मनचाहा जनधारणा-प्रबंधन हो जाए। अभी लगातार बलात्कार और लगातार साम्प्रदायिक घटनाओं से जब उत्तरप्रदेश की बदनामी सिर चढक़र बोलने लगी, तो यूपी सरकार ने एक नामी-गिरामी जनसंपर्क एजेंसी को रखा है ताकि देश-विदेश में होती सरकार की बदनामी कम हो, उसे यह जिम्मा दिया गया है।
 
एक वक्त जिस तरह इश्तहार की एक ही डिजाइन हर अखबार में एक साथ दिखती थी, और अब अखबारों के अलावा टीवी चैनलों पर भी वीडियो-इश्तहार एक साथ दिखते हैं, कुछ उसी तरह का मामला खबरों को लेकर, कुछ चुनिंदा मुद्दों और विषयों पर एक साथ लेख को लेकर, कदमताल करते हुए इंटरव्यू को लेकर हो गया है। अब मीडिया का सत्ता या कारोबार के साथ ऐसा कदमताल इस हद तक बढ़ गया है कि वह जलते-सुलगते जमीनी मुद्दों की तरफ से ध्यान को भटकाने के लिए उसे किसी एक्ट्रेस के बदन पर ले जाता है, या किसी की की हुई बकवास पर बाकी लोगों की जवाबी बकवास को दिखाने में जुट जाता है। हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में कई बार लिख चुके हैं, लेकिन पांच-दस दिन गुजरते हुए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया की सोची-समझी कदमताल फिर इतनी दिखने लगती है कि अपनी सलाह दोहराने को जी करता है कि अखबारों को मीडिया नाम के इस दायरे से बाहर निकलना चाहिए, और प्रेस नाम का अपना पुराना और अब तक थोड़ा सा इज्जतदार बना हुआ लेबल फिर से लगाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

बिना कुदाल, महज जुबान से अपनी कब्र खोदने में माहिर कांग्रेस के नेता

 सार्वजनिक जीवन में जो लोग लंबे समय से हैं, और खासकर राजनीति जैसे बेरहम पेशे में जिन्होंने जिंदगी गुजारी है, वे किसी तरह की मासूमियत का दावा नहीं कर सकते। वे लोग कहे हुए शब्दों के खतरे समझते हैं, जनता की भावनाओं को समझते हैं, और अपने देश-प्रदेश की संस्कृति को भी अच्छी तरह जानते हैं। ऐसे में जब मध्यप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और भावी मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए, कमलनाथ जब एक दलित भाजपा महिला नेता को आइटम कहते हैं, तो वे किसी रियायत के हकदार नहीं हैं। ऐसे ओछे बोल के लिए जो भी सार्वजनिक सजा हो सकती है, उन्हें होनी चाहिए, और अगर यह दलित महिला ऐसी ओछी बात को लेकर कमलनाथ के खिलाफ अदालत भी जाती है तो भी वह नाजायज नहीं होगा। ऐसा नहीं कि इस तरह की अवांछित बातें कहने वाले सिर्फ कांग्रेस पार्टी में हैं, दूसरी पार्टियों में खासकर, भाजपा में तो लोग बलात्कारियों से प्रेम उजागर करने में एक-दूसरे से मुकाबला करते दिखते हैं, जातिवाद की हिंसक बातें करने में, कानून के खिलाफ बोलने में भाजपा के सांसद और विधायक इस अंदाज में मुकाबला करते हैं कि कहीं वे दूसरे से पीछे न रह जाएं। लेकिन कांग्रेस पार्टी चूंकि अपने आपको सबसे पुरानी पार्टी, नेहरू और गांधी की पार्टी, दो-दो महिला कांग्रेस अध्यक्ष वाली पार्टी करार देती है, इसलिए सार्वजनिक जीवन में उससे उम्मीदें भी कुछ अधिक की जाती हैं। दूसरी कई पार्टियों में धर्मांधता की बातें, साम्प्रदायिकता की बातें, हिंसा, और संविधान के लिए हिकारत की बातें  होती ही रहती हैं, इसलिए उन्हें लोग गौर से नहीं देखते, लेकिन कांग्रेस के कई नेताओं में बेमौके अटपटी या ओछी बातें करके माहौल अपनी पार्टी के खिलाफ कर देने की अपार क्षमता है, और बेहद हसरत भी है। 

ऐसे हसरती लोग देश की प्रचलित भाषा और राजनीति में बातों को तोडऩे-मरोडऩे के अंतहीन खतरों को देखते हुए भी बेमौके अटपटी बात करते हैं, और फजीहत खड़ी करते हैं। बहुत पहले एक कहानी थी। एक आदमी के तीन बेटे थे, और तीनों ही तोतले थे, इस वजह से उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। ऐसे में जब तीन कन्याओं का एक पिता रिश्ते की बात करने आता है तो लडक़ों का पिता उन्हें खूब धमकाकर तैयार करता है कि वे विनम्र बने रहेंगे, और मुंह भी नहीं खोलेंगे, जो बात करनी होगी वह पिता करेगा। इसके बाद की कहानी सभी ने सुनी हुई है और खाने की थाली के आसपास मंडराते चूहे को देखकर एक-एक करके तीनों बेटे अपना तोतलापन उजागर करते हैं, और उनका पिता अपना सिर पीट लेता है। कांग्रेस पार्टी में यह काम पिछले बहुत सारे बरसों से दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर कुछ इसी किस्म का बड़बोलापन दिखाते हैं, और अपनी पार्टी को एक निहायत गैरजरूरी मुसीबत में डालते हैं। आज जब बिहार में चुनाव होना है, और देश में राजनीतिक ताकतें घरेलू मुद्दों के बजाय सरहदी, और सरहद पार के मुद्दों की तलाश में हैं, तब शशि थरूर पाकिस्तान जाकर वहां के किसी कार्यक्रम में भारत के बारे में कुछ कहकर भाजपा को हमला करने का मौका देते हैं। अब सवाल यह है कि जो संयुक्त राष्ट्र संघ में बरसों काम कर चुका है, जो भारत में यूपीए सरकार में विदेश राज्यमंत्री रह चुका है, उसे आज भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव का अंदाज नहीं है, दोनों तरफ एक-दूसरे के खिलाफ भडक़ाई जाने वाली भावनाओं का अंदाज नहीं है? जब भाजपा बिहार में कांग्रेस के एक उम्मीदवार को लेकर उसका जिन्ना-कनेक्शन स्थापित करने की कोशिश कर रही है, तब शशि थरूर को क्या पड़ी थी कि वे पाकिस्तान जाकर किसी प्रोग्राम में शिरकत करते, और वहां पर भारत के बारे में ऐसा कुछ कहते जिसका बेजा राजनीतिक इस्तेमाल होने का खतरा हमेशा ही रहता है। शशि थरूर अपनी निजी जिंदगी के हादसों और कहानियों को लेकर वैसे भी पार्टी के लिए शर्मिंदगी की वजह बनते रहे हैं, और ऐसे में अपनी जुबान से इस शर्मिंदगी की आग में ईंधन झोंकना किसी किस्म की मासूमियत नहीं हो सकती। 

दिग्विजय सिंह कांग्रेस के भीतर एक किनारे पर किए जा चुके नेता हैं, और आज मध्यप्रदेश के मिनी आम चुनाव में भी वे अधिक दिख नहीं रहे हैं। हो सकता है कि पार्टी में या मध्यप्रदेश के चुनाव-प्रभारी कमलनाथ ने सोच-समझकर उन्हें किनारे रखा हो ताकि उनके किसी बयान से हिन्दू वोटों का बहुतायत भडक़ न जाए। मुस्लिम समाज के प्रति हमदर्दी रखना न सिर्फ कांग्रेस बल्कि कई राजनीतिक दलों की घोषित नीति है। लेकिन इस हमदर्दी को इस अंदाज में लोगों के बीच रखना कि उससे गैरमुस्लिमों के बीच एक बेचैनी खड़ी हो जाए, नाराजगी खड़ी हो जाए, यह कम से कम चुनावी लोकतंत्र में जरूरी नहीं है, और जायज नहीं है। और तो और मनमोहन सिंह जैसे देश के एक सबसे संतुलित और कम शब्दों में बोलने वाले नेता ने जब यह कहा कि देश के साधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है, तो वे शब्द भी निहायत गैरजरूरी थे। उन शब्दों से जितना नुकसान कांग्रेस का हुआ, उतना ही नुकसान मुस्लिमों की संभावना का भी हुआ कि वे एक पल में बाकी देश की आंखों की किरकिरी बन गए। 

मणिशंकर अय्यर अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले बयान देने के मामले में उतने ही माहिर हैं जितने कि उनके गृहराज्य तमिलनाडू से आने वाले भाजपा सांसद  सुब्रमण्यम स्वामी हैं। मणिशंकर तो अभी कुछ अरसा पहले अपनी अनर्गल बातों के लिए कांग्रेस से निलंबित भी किए जा चुके हैं, और सुब्रमण्यम स्वामी को निलंबित करना भाजपा के लिए उतना आसान काम नहीं है क्योंकि देश के बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लडऩे का जो ठोस काम स्वामी ने किया है, उसे अनदेखा करके उन्हें छेडऩे का हौसला शायद भाजपा में नहीं है। 

उत्तरप्रदेश में अनगिनत बलात्कारों और दूसरे वैसे ही जुर्मों की वकालत करते हुए भाजपा के सांसद-विधायक जिस तरह के वीडियो पर कैद हैं, वह भयानक है। कांग्रेस उनके मुकाबले प्रायमरी स्कूल में ही हैं। लेकिन भाजपा के लोग सोशल मीडिया पर अपनी संगठित फौज के साथ पल भर में सक्रिय हो जाते हैं, और कांग्रेस नेताओं के कहे एक भी गलत शब्द पर बवाल खड़ा कर देते हैं। कांग्रेस पार्टी ने ऐसी कोई क्षमता विकसित नहीं की है, और भाजपा के नेता अपने सबसे हिंसक बयानों के साथ भी बच जाते हैं। 

फिलहाल वही पार्टी अपने नेताओं की अवांछित बातों की फिक्र कर सकती है जिसे इनसे नुकसान पहुंचता है। भाजपा के बारे में सबका तजुर्बा है कि ऐसे हिंसक बयान सोच-समझकर दिए जाते हैं, और उनसे फायदा उठाया जाता है। कांग्रेस पार्टी अपनी सोचे, फिलहाल तो मध्यप्रदेश में एक दलित महिला नेता के मानहानि के मुकदमे से कमलनाथ कैसे बचेंगे, उनके वकीलों को इसकी फिक्र करनी चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अक्टूबर 2020


 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 अक्टूबर 2020


 

अब फिर लगातार हाथियों की मौतें, जिम्मेदार कौन?

  कुछ महीने पहले जब प्रदेश में एक के बाद एक हाथी मरने लगे तो प्रदेश के वन्य जीवन प्रमुख, राज्य के सबसे सीनियर आधा दर्जन आईएफएस में से एक अतुल शुक्ला की बलि चढ़ाई गई। वे इस कुर्सी पर रहते हुए जंगली जानवरों के मरने पर पूरे प्रदेश में दौड़-भाग कर रहे थे, ईमानदारी से मेहनत कर रहे थे, लेकिन हाथियों ने एक के बाद एक मरकर, और इंसानों ने उन्हें मारकर अतुल शुक्ला को कुर्सी से बेदखल कर ही दिया। अब पिछले चार दिनों में तीन हाथियों की मौत हो गई है जिनमें एक हथिनी है, और दो छोटे बच्चे हैं। अब लगातार हो रही मौतों की वजह से क्या फिर वन्य जीवन प्रमुख को हटाया जाएगा, या इस बार बारी और जिम्मेदारी उसके ऊपर किसी तक जाएगी? 

जिम्मेदारी तय करते हुए सरकारें अपनी इमेज बचाने के लिए इस तरह के कई काम करती हैं। प्रदेश के वन्य जीवन प्रमुख को हटाकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वनमंत्री मो. अकबर ने जिम्मेदारी पीसीसीएफ वाइल्ड लाईफ अतुल शुक्ला पर तय कर दी थी। अब किस पर तय होगी? इस कुर्सी पर बैठे नरसिंह राव पर, या मंत्री पर? 

लोगों को याद होगा कि जब के.एम. सेठ राज्यपाल थे, और आर.पी. बगई मुख्य सचिव थे, तब पीएससी में गड़बड़ी की खबरें आईं, और राजभवन के सामने प्रदर्शन हुआ। सडक़ पर लग रहे नारे भीतर तक पहुंचे। ये दोनों लोग रिटायर्ड फौजी थे, और रोज शाम की राजभवन की महफिल के संगवारी भी थे। शाम के सुरूर में तय किया गया कि पीएससी चेयरमेन अशोक दरबारी को हटाकर यह दिखा दिया जाए कि पीएससी में गड़बड़ी के जिम्मेदार दरबारी थे। जबकि हकीकत यह थी कि उनके बहुत मातहत लोगों ने अपने नीचे के स्तर पर गलत काम किया था जिसकी कोई जिम्मेदारी दरबारी की नहीं थी। अब नैतिक आधार पर अगर संस्था के प्रमुख को जिम्मेदार ठहराना है तो हर बात के लिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराना बेहतर होगा ताकि हर विधायक को एक बार मुख्यमंत्री बनने मिले, और हर सांसद को एक बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल जाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह का वह पहला कार्यकाल था, और इन दो फौजी लोगों के दबाव में आकर उन्होंने दरबारी को हटा दिया। उस वक्त भी इस अखबार में जमकर लिखा गया था कि सरकार यह गलत काम कर रही है, और उसे मुंह की खानी पड़ेगी। दरबारी सुप्रीम कोर्ट तक गए, और सुप्रीम कोर्ट से जीतकर आए। लेकिन उस फैसले के पीछे के न सेठ यहां हैं, न बगई, और रमन सिंह भी, बाकी अच्छे-बुरे मुद्दों से इतने घिरे रहे कि छत्तीसगढ़ के बाहर बसे अशोक दरबारी उनके लिए स्थाई अपमान नहीं खड़ा कर पाए।
 
जब किसी की जिम्मेदारी कहीं तय करनी होती है, तो हर बात की एक सीमा होनी चाहिए। वरना एक थानेदार की तैनाती भी वैसे तो सरकार राज्यपाल के नाम से करती है, तो क्या थानेदार बलात्कार में पकड़ा जाए तो जिम्मेदारी राज्यपाल तक जाएगी? मैदानी इलाकों में जब अवैध बिजली चारों तरफ फैलाकर रखी जाती है, ताकि जंगली जानवर फसल खराब न कर सकें, तो राजधानी में बिठाए गए प्रदेश स्तर के अफसर को क्या उसके लिए जिम्मेदार ठहराकर सजा दी जा सकती है? जब जिम्मेदारी तय करने की एक जायज सीमा तय नहीं होती, तो ऐसे ही नाजायज काम होते हैं। अब कल एक दिन में ही दो अलग-अलग जगह मारे गए हाथी-शिशुओं के लिए क्या फिर से वन्य जीवन प्रमुख को बेदखल किया जाएगा? सरकार में बैठे लोगों को गलत मिसालें कायम करने से बचना चाहिए। पूरे प्रदेश में अगर बिजली का करंट फैलाकर जंगली जानवरों को खेतों से दूर रखा जा रहा है, तो यह पहली जिम्मेदारी तो बिजली विभाग की है, दूसरी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की है, और वन विभाग की जिम्मेदारी तो इतने हिस्से में कहीं आती नहीं है। 

जब नाजायज तरीके से किसी बड़े सिर की बलि देने की नीयत से ऐसी कोई कार्रवाई की जाती है, तो उससे ईमानदार और मेहनती, जिम्मेदार और काबिल अफसरों का मनोबल टूटता है, गलत मिसालें कायम होती हैं, और असली जिम्मेदार बच निकलते हैं। चूंकि मरने वाले जंगली जानवर थे, इसलिए बाकी विभागों को जिम्मेदारी से परे करके केवल जंगली जानवरों के लिए तैनात अफसरों को बलि चढ़ाना एक गलत सिलसिला था। आज तो सारे अफसर बदल दिए गए हैं, और सरकार ने जो इलाज किया था, उसके बाद भी हाथियों की लगातार मौतों की यह बीमारी बनी हुई है।
 
फैसला लेने वाले नेताओं के आसपास ऐसे अफसर भी रहने चाहिए जो कि नेताओं की गलत मर्जी या फैसले की चूक के खिलाफ मुंह खोल सकें। लेकिन आज दिक्कत यह है कि बड़े-बड़े अफसर सत्तारूढ़ नेताओं के पांव छूने को ऐसे लपकते हैं कि वे नेता की गलती पर उसका हाथ थामकर उसे भला क्या रोक पाएंगे। समझदार नेता वे होते हैं जो कि पांव छूने वालों के बजाय हाथ पकडऩे वालों को करीब रखते हैं। यह एक अलग बात है कि सत्ता या राजनीति में नेताओं के पैरों को हर कुछ देर में कोई न कोई उंगलियां छूते रहना चाहिए, वरना पैर बेचैन होने लगते हैं। ऐसे बेचैन पैर ही गलत फैसले लेते हैं।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अक्टूबर 2020


 

फ्रांस के टीचर का सिर काटने से सीखने की जरूरत बाकी देशों को भी

 फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक हमलावर ने एक स्कूल शिक्षक का सिर काट दिया। वह तो कत्ल करने में कामयाब हो गया, लेकिन पुलिस की गोली से इस हमलावर की मौत हो गई। वहां से खबर आई है कि इस शिक्षक ने अपनी क्लास अभिव्यक्ति की आजादी समझाते हुए उन कार्टूनों की मिसाल दी थी, और कार्टून दिखाए थे जो मोहम्मद पैगम्बर पर बनाए गए थे, और जिन्हें प्रकाशित करने वाली एक पत्रिका पर हमले में दर्जन भर से अधिक लोग मारे भी गए थे। शार्ली एब्दो नाम की इस पत्रिका ने कुछ बरस पहले उन्हें छापा था और इसे लेकर उस पर इस्लामी आतंकियों ने बड़़ा हमला किया था जिसमें पत्रिका के कई लोग मारे गए थे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अभी शिक्षक के कत्ल को इस्लामिक आतंकी हमला बताया है और इसे कायराना हरकत कहा है। राष्ट्रपति उस जगह पर भी पहुंचे जहां इस शिक्षक का सिर काटा गया। उसे रोकते हुए ही पुलिस ने हमलावर को गोली से मार दिया। जब इस शिक्षक ने कक्षा में अभिव्यक्ति की आजादी समझाते हुए मिसाल के तौर पर ये कार्टून दिखाए थे तो कुछ मुस्लिम मां-बाप ने स्कूल से इसकी शिकायत की थी। और अब यह हमला हुआ। 

शार्ली एब्दो पर हुए हमले के पीछे के 14 लोगों के खिलाफ अभी मुकदमा शुरू हुआ है और फ्रांस में एक बार फिर ये कार्टून खबरों में हैं। इस पत्रिका ने अभी फिर से इन्हें प्रकाशित किया है जिन्हें लेकर फ्रांस के बाहर भी कुछ जगहों पर आतंकी हमले हुए थे। अब यह लोकतंत्र और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच का एक जटिल अंतरसंबंध है जो जगह-जगह टकराहट की वजह बनता है। न सिर्फ फ्रांस में बल्कि दुनिया के कई देशों में धार्मिक आतंकी अपने धर्म को देश के कानून और लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं। हिन्दुस्तान में कई लोगों को यह मिसाल खटकेगी, लेकिन हकीकत यह है कि 1992 में जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद गिराने का अभियान छेड़ा था, और जिन लोगों ने उसे गिराया था, उन तमाम लोगों की आस्था अपने धर्म पर देश के संविधान के मुकाबले अधिक थी। उन्होंने संविधान और कानून का राज इन दोनों को खारिज करते हुए बाबरी मस्जिद को गिराया था, और उसके पहले से मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा चले आ रहा था, जबकि मामला अदालत में था। लोगों को उस वक्त के बड़े-बड़े नेताओं के बयान याद होंगे जो कि धर्म को संविधान से ऊपर करार देते थे। और इन सब बातों ने देश के माहौल को ऐसा हमलावर बना दिया था कि लाखों लोग मस्जिद गिराने के लिए एकजुट हो गए थे।
 
अलग-अलग देशों में अलग-अलग धर्मों की संवेदनशीलता भी अलग-अलग रहती है, और वहां सरकारों की सोच भी कानून के मुताबिक, या अराजकता को बढ़ावा देने वाली रहती है। लेकिन एक बात हर जगह एक सरीखी रहती है कि धार्मिक आतंक सबसे पहले अपने धर्म का नाम ही खराब करता है, और लोकतंत्र को कमजोर करता है। आज हिन्दुस्तान में धर्मान्धता और धार्मिक कट्टरता के खतरे उसी रास्ते पर बढ़ रहे हैं जिस रास्ते पर आगे जाकर फ्रांस सहित दुनिया के कई देशों में ऐसे हमले होते हैं। 

फ्रांस योरप का एक विकसित और संपन्न देश है, वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में से एक भी है। वहां पर मुस्लिम समाज का लंबा इतिहास रहा है, और फ्रांस की राजधानी पेरिस के कई इलाके तो सिर्फ बुर्कों और दाढ़ी-टोपी से घिरे हुए दिखते हैं। लंबे समय से फ्रांस के समाज में इस धर्म के मानने वाले लोग बसे हुए हैं, और वे दूसरे धर्मों के लोगों के साथ रहना सीख चुके थे। ऐसे में वहां ताजा धर्मान्ध हमलों ने बाकी मुस्लिम समाज के लिए भी एक बड़ी दिक्कत खड़ी कर दी है। लेकिन जो देखने लायक बात है वह यह है कि फ्रांस की सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ खड़ी हुई है, और वह देश के इस बुनियादी हक के ऊपर धर्मान्धता को हावी नहीं होने दे रही है। न सिर्फ फ्रांसीसी सरकार, बल्कि वहां की संसद ने भी इस हमले के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे ऊपर माना है।
 
किसी लोकतंत्र की परिपक्वता और उसका विकास इमारतों से और आसमान छूते बुतों से साबित नहीं होता। लोकतांत्रिक विकास देश के बुनियादी सिद्धांतों के सम्मान के लिए डटकर खड़े रहने से होता है। हम अभी किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम लोकतांत्रिक सरकारों के रूख की बात कर रहे हैं, देशों के लोकतांत्रिक मिजाज की बात कर रहे हैं। फ्रांस उन देशों में से है जहां किसी भी धर्म को लेकर व्यंग्य किया जा सकता है, किसी भी नेता को लेकर लिखा जा सकता है, और वहां की आम जनता में ऐसे तमाम लिखने और गढऩे को लेकर बहुत बर्दाश्त भी है। यह बात पश्चिम के बहुत से देशों पर लागू होती है। अमरीका की बात करें तो वहां सार्वजनिक रूप से किसी धर्मग्रंथ को जलाने के खिलाफ भी कोई कानून नहीं है। लेकिन अब दुनिया में जिन धर्मों के लोग आतंक के रास्ते दूसरे धर्मों को खत्म करना चाहते हैं, जिन्होंने कई देशों में गृहयुद्ध की नौबत खड़ी कर दी है, उन धार्मिक आतंकी संगठनों के रास्ते पर कई दूसरे गैरआतंकी संगठन भी चल निकले हैं, और इन दोनों के बीच का आतंक का फासला खत्म सा हो गया है। 

हिन्दुस्तान ने अपने अड़ोस-पड़ोस में पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, इन तमाम जगहों पर धर्म के आतंक और धर्म के हमलावर तेवरों का नुकसान देखा हुआ है। दुनिया के बाकी देशों में जहां-जहां किसी धर्म के लोगों ने आतंकी हमले किए हैं, वहां-वहां उस धर्म के बसे हुए आम लोगों को नुकसान हुआ है, आतंकी या तो आत्मघाती हमले में खत्म हो जाते हैं, या कहीं छुप जाते हैं, या फरार हो जाते हैं। वे हमलों के बाद अपने धर्म के लोगों का नुकसान करके ही जाते हैं, कोई फायदा करके नहीं। इसलिए दुनिया के जिस-जिस देश में जिस-जिस धर्म के लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हैं, वे कुछ लोगों को जरूर मार पा रहे हैं, लेकिन वे सबसे बड़ा नुकसान अपने धर्म के लोगों का कर रहे हैं। फ्रांस में आज अगर सरकार अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता के साथ खड़ी हुई है, और एकजुट होकर खड़ी है, अपने दर्जन भर लोगों को खोने वाली पत्रिका आज भी अपनी सोच के साथ खड़ी है, और दुबारा कार्टून छाप रही है, वहां की अदालतें इस आजादी के साथ हैं, तो हम दूर बैठे हुए वहां के संविधान की इन बुनियादी बातों का विश्लेषण करना नहीं चाहते। योरप के लोकतंत्रों में आजादी की बुनियाद सैकड़ों बरस पहले की है, और धार्मिक आतंक उनके मुकाबले इन देशों में कुछ नया है।
 
फ्रांस की इस घटना पर हिन्दुस्तान में लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि जो देश धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं, धर्मोन्माद को देश की जमीनी दिक्कतों को ढांकने का एक पर्दा बना लेते हैं, उन देशों में इस किस्म का आतंक खड़ा हो सकता है। किसी भी देश की सरकार को यह समझना चाहिए कि सरकार के तख्ता पलट के लिए ही किसी फौज की जरूरत पड़ती है, आतंकी हमले के लिए तो किसी भी धर्म के मुट्ठी भर लोग काफी होते हैं, और ऐसे हमलों को हमेशा रोका नहीं जा सकता, फिर चाहे वे दुनिया के सबसे विकसित देश ही क्यों न हों।
 
सरकारों से परे भी समाज को यह सोचना चाहिए कि वे अपने लोगों के बीच लोकतांत्रिक परिपक्वता कैसे ला सकते हैं, कैसे दूसरे धर्मों का सम्मान जरूरी है, और कैसे उसके साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जोडक़र देखा जाना चाहिए। उन देशों को खासकर फिक्र करनी चाहिए जहां आज धार्मिक तनाव इस हद तक हिंसक नहीं हुआ है। भारत में धार्मिक तनाव कई वजहों से जिस तरह बढ़ा हुआ है, उससे बढ़ रहे खतरों को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि धर्मान्धता ने पड़ोस के कई देशों को जिस तरह तबाह किया है, वह एकदम ताजा इतिहास है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अक्टूबर 2020


 

जिन्हें बांग्लादेश मिसाल के तौर पर बुरा लगता है...

 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अभी एक अनुमान बताया है कि जिस रफ्तार से बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी बढ़ रही है, और भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी की जो बदहाली चल रही है, जल्द ही बांग्लादेश भारत से बेहतर अर्थव्यवस्था बन सकता है, इस एक पैमाने पर वह आगे निकल सकता है। इस बात को लेकर कई अर्थशास्त्री सहमत हैं कि 1971 में पैदा हुए बांग्लादेश ने भारी दिक्कतें, फौजी हुकूमत, राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता, और प्राकृतिक विपदाओं को झेलते हुए भी धीमी लेकिन निरंतर गति से जैसी तरक्की की है, वह अहमियत रखती है, और बांग्लादेश दुनिया के कारोबारियों में एक भरोसेमंद जगह बन चुका है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के पिछले छह बरसों को लेकर राहुल गांधी ने आईएमएफ के ताजा अनुमान का हवाला देते हुए लिखा है कि भाजपा सरकार के पिछले छह बरस के नफरत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे ठोस उपलब्धि यही रही है कि बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोडऩे वाला है।

 
किसी तर्क के रूप में कोई मिसाल देना खतरनाक होता है क्योंकि लोग तुरंत ही इस पर उतर आते हैं कि भारत और बांग्लादेश में कौन-कौन से फर्क हैं जिनकी वजह से यह मिसाल ही नाजायज है। किसी तर्क को पटरी से उतारना हो तो ही कोई मिसाल देनी चाहिए। लेकिन अब एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अगर एक पैमाने पर भारत, बांग्लादेश, और नेपाल सबके आंकड़े दिए हैं तो लोग तुलना कैसे न करें? मिसाल कैसे न दें? हिन्दुस्तान में आज वह पीढ़ी अभी रिटायर हो रही है जिसने अपने कॉलेज के दिनों में बांग्लादेश से आए हुए शरणार्थियों के गुजारे के लिए इंदिरा सरकार द्वारा लागू किए गए शरणार्थी टैक्स का पैसा हर सिनेमा टिकट पर दिया था। बांग्लादेश 1947 के पहले तक अविभाजित भारत का ही एक हिस्सा था, जो विभाजन में पहले पाकिस्तान में जाकर पूर्वी पाकिस्तान बना, और फिर इंदिरा गांधी के हौसले से उस हिस्से को पाकिस्तान से तोडक़र बांग्लादेश बनाया गया। अब भारत के ही बनाए हुए ऐसे बांग्लादेश में महज इंसानों की मेहनत से अगर अर्थव्यवस्था इस तरह बेहतर होती चली जा रही है तो फिर तुलना के लिए इस पड़ोसी से बेहतर और कौन सा देश हो सकता है? फिर बांग्लादेश ने यह मिसाल भी सामने रखी है कि अपनी महिलाओं को हुनर सिखाकर, कामकाज में लगाकर किस तरह पूरी दुनिया के बड़े-बड़े फैशन ब्रांड के कपड़े बांग्लादेश में सिले जा सकते हैं। अपनी मानव शक्ति का ऐसा इस्तेमाल करके इस देश ने अगर एक मिसाल सामने रखी है, तो हिन्दुस्तान में झंडा-डंडा थमाकर फर्जी मुद्दों पर झोंक दी गई कई पीढिय़ों के बारे में सोचना चाहिए कि उनसे देश की एकता के टुकड़े-टुकड़े होने के अलावा और क्या हासिल हो रहा है? 

बात राहुल गांधी ने कही है, या कि एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन से आई है, या कि पड़ोस के एक ऐसे गरीब और छोटे देश की है जिसके साथ ‘गर्व से कहो हम भारतीय’ लोग अपनी तुलना नहीं चाहते हैं। इसलिए आज यह हिन्दुस्तान कश्मीर से 370 के खात्मे, राम मंदिर बनने, बाबरी मस्जिद केस में सबके रिहा हो जाने की खुशी में ऐसा डूबा है कि पड़ोस का गरीब मेहनत करते-करते कब उससे आगे निकल गया, यह उसे न पता लगा, और न ही वह इस हकीकत को देखना ही चाहता है। दरअसल किसी भी देश-प्रदेश की सरकार के लिए आर्थिक आंकड़े सबसे बड़ी चुनौती होते हैं, और सबसे बड़ी कसौटी भी होते हैं। ये आंकड़े अगर ईमानदारी से जुटाए जाते हैं, तो ये धोखा देने के काम नहीं आते, और सवाल बनकर मुंह चिढ़ाते हैं। ऐसे में आज भारत में किसी भी किस्म के आर्थिक सर्वे, आर्थिक विश्लेषण,  और उनसे जुड़े सवालों से मुंह चुराया जा रहा है। असली आंकड़े झंडों-डंडों से नहीं डरते, उन्हें भीड़ पीट-पीटकर मार भी नहीं सकती, वे न थाली-ताली से खुश होते हैं, और न ही दीयों की लौ से डरकर भागते हैं। अगर कोई चीज सबसे स्थाई होती है, तो वह असल और सच्चे आंकड़े होते हैं। ऐसे में बांग्लादेश की कामयाबी को चुनौती की तरह लेने के बजाय, उससे सबक लेने के बजाय, अपनी नाकामयाबी की लकीर छोटी करने के बजाय बांग्लादेश को एक मिसाल के रूप में भी खारिज कर देना अधिक आसान समझा जा रहा है। हकीकत से इस हद तक मुंह चुराकर दुनिया में कोई भी तरक्की नहीं कर सकते। आज बांग्लादेश में एक-एक महिला लाखों की सिलाई मशीनों पर दुनिया के महंगे ब्रांड के कपड़े सिलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक साख बना रही है, और हिन्दुस्तान ऐसी संभावनाओं को अनदेखा करते हुए अपने लोगों को नारों और कीर्तन में झोंक रहा है। यह सिलसिला अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में जारी नहीं रह सकता, क्योंकि उनके पास इस देश में दबाए गए, छुपाए गए आंकड़ों से परे भी जानकारियां हैं।
 

हिन्दुस्तान आज जिस आर्थिक बदहाली से गुजर रहा है, उससे उबरने का रास्ता मुंह छिपाने से होकर नहीं गुजरता। उससे उबरना तभी हो सकता है जब हकीकत का सामना किया जाए, समस्या को माना जाए, और उन बातों के बारे में भी सोचा जाए जो तरक्की के रास्तों पर रोड़ा हैं। एक देश जो अपने नामौजूद इतिहास के झूठे गौरव के नशे में मदमस्त रखा जा रहा है, वैसे देश का पिछडऩा तय है। और लोग हैं कि भूखे पेट उन्हें ऐसे झूठे गौरव का नशा और अधिक चढ़ रहा है। 

(Daily Chhattisgarh)