बाबूलाल के भ्रष्टाचार से राज्य को सबक की जरूरत

संपादकीय
21 फरवरी 2017


बिलासपुर के कुख्यात नसबंदी कांड की हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई में यह बात सामने आई कि ऑपरेशन में हुई मौतों के वक्त डो डॉक्टर सरकारी नौकरी में था, उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी नहीं ली गई थी, यह नहीं मिली थी, और इस वजह से अदालत में यह मामला आगे नहीं चल सकता। यह ऐसे बहुत से और दूसरे मामलों की कतार में एक और मामला दिखता है, जिसमें सरकार किसी कुसूरवार दिखते अफसर पर मुकदमे की इजाजत नहीं दे रही है। इसके साथ-साथ अभी दूसरी खबर यह आ रही है कि प्रदेश के सबसे भ्रष्ट कार्यकाल वाले स्वास्थ्य विभाग के सचिव रहे, और आज राज्य सरकार के प्रमुख सचिव बने हुए बाबूलाल अग्रवाल को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है, और उनपर यह आरोप है कि उन्होंने सीबीआई में उनके खिलाफ दर्ज एक मामले को वहां से राज्य के एसीबी में भिजवाने के लिए डेढ़ करोड़ रुपए रिश्वत का सौदा किया था और शायद आधी रकम दे भी चुके थे।
यह अफसर भ्रष्टाचार को लेकर बरसों से कुख्यात था, और उसके बावजूद यह सचिव से प्रमुख सचिव पदोन्नत किया गया था। इसके खिलाफ नकली चिकित्सा-जांच मशीनों की खरीदी से लेकर कई तरह के आरोप लगते रहे, आयकर का छापा पड़ा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, और अभी उच्च शिक्षा सचिव रहते हुए ऐसे ही आरोपों का सिलसिला जारी था। अब यहां सोचने की एक बड़ी बात यह है कि इस भ्रष्ट अफसर ने सीबीआई के नाम पर दलाली करने वालों को डेढ़ करोड़ रुपए देना इसलिए तय किया कि उसका केस सीबीआई से राज्य के एसीबी को भेज दिया जाए। वैसे तो राज्य का एसीबी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाया गया है, लेकिन यहां पर अगर किसी रियायत की उम्मीद न होती तो एक भ्रष्ट अफसर अपने मामले को यहां लाने की ऐसी कोशिश क्यों करता कि आधा करोड़ से अधिक की रकम जा चुकी है, और खुद पत्नी के भाई के साथ जेल पहुंच चुका है। अभी हम राज्य की एसीबी या किसी दूसरी जांच एजेंसी की साख पर कुछ नहीं कह रहे हैं, लेकिन एक भ्रष्ट और जानकार, राज्य के एक प्रमुख सचिव की कैसी उम्मीदें थीं, यह तो सीबीआई ने अपनी जांच में पकड़ ही लिया है, और मीडिया के सामने घोषित भी किया है।
किसी भी सरकार के बजट का बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में खत्म हो जाता है, और यह भ्रष्टाचार महज कमीशनखोरी के कमीशन जितना नहीं रहता है, बल्कि घटिया काम, घटिया सामान, घटिया सेवा से पूरा का पूरा बजट ही तबाह हो जाता है। बाबूलाल अग्रवाल राज्य में अपने भ्रष्टाचार के लिए हमेशा से कुख्यात रहा ऐसा अफसर है जो कि अब तक जेल के बाहर रहकर दूसरों को हैरान करता था, और ईमानदार लोगों को निराश करता था। जब यह घड़ा पूरा भर गया, तब अब जाकर यह फूटा है, और इसे लेकर राज्य सरकार को ऐसे बाकी लोगों के मामले में सबक लेना चाहिए। 

मोहब्बत से कई गुना रफ्तार से दुनिया में बढ़ रही है नफरत...

आजकल
20 फरवरी 2017  
इन दिनों सोशल मीडिया पर समाज के हालात को आंकने का एक पैमाना मान लिया जाता है क्योंकि जो बिल्कुल ही अनपढ़ हैं, या कि इंटरनेट और कम्प्यूटर से दूर हैं, उनके अलावा बाकी लोग सोशल मीडिया से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर भारतीय प्रधानमंत्री तक, और आईएस जैसे आतंकियों से लेकर दूसरे किस्म के धर्मान्ध लोगों तक, किसी का भी काम सोशल मीडिया के बिना चलता नहीं है। दो दिन पहले ही फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने यह लिखा है कि फेसबुक के इस्तेमाल से किस तरह चुनाव जीता जा सकता है, उन्होंने सोशल मीडिया को लेकर और भी बहुत सी बातें लिखी हैं।
ट्विटर पर लोग छोटे-छोटे एक-दो वाक्य में ही अपनी बात कह लेते हैं, और साथ में अपनी पसंद की कोई तस्वीर भी पोस्ट कर लेते हैं। अभी इस बहुत ही लोकप्रिय सोशल मीडिया को लेकर एक अध्ययन का यह नतीजा है कि 2012 से लेकर अब तक ट्विटर पर श्वेत नस्लवादी-राष्ट्रवादी लोग आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन के मुकाबले भी अधिक रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं, और इन चार बरसों में वे छह गुना हो चुके हैं। यह बात जानने के लिए हिन्दुस्तान के लोगों को अमरीका के इस अध्ययन को जानने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हिन्दुस्तान के भीतर भी सोशल मीडिया पर गांधी के हिमायती जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, उससे कई गुना रफ्तार से नफरतजीवी, गोडसेवादी बढ़ते जा रहे हैं। साम्प्रदायिक नफरत को बढ़ाने और फैलाने में हिन्दुस्तान के कई संगठन उसी अंदाज में जुटे हैं।
अब पश्चिमी देशों को अगर देखें, तो वहां पर हिटलर के समर्थक और नस्लवादी लोग, कट्टरतावादी और युद्धोन्मादी लोग लगातार अधिक मुखर और हमलावर होते चल रहे हैं, और वे सोशल मीडिया पर अपनी नफरत फैलाने में खासा वक्त भी लगाते हैं, और अपनी नस्ल के दूसरे नफरतजीवियों को साथ में जोड़ते भी चलते हैं। देखकर यही लगता है कि दुनिया में मोहब्बत जितने लोगों को जोड़ सकती है, उससे कई गुना अधिक जोडऩे का काम नफरत कर सकती है, जो कि नफरतजीवियों को आसपास ले आती है।
लोगों को याद होगा कि अभी एक-दो हफ्ते पहले ही ऐसी खबर आई है कि एक नई डेटिंग वेबसाईट ऐसी बनी है जो कि लोगों को नापसंद के आधार पर, नफरत के आधार पर एक-दूसरे से जोड़ती है। हेटर्स नाम की यह वेबसाईट उस पर आने वाले लोगों से हर छोटी-बड़ी चीज के लिए उनकी नापसंद पूछती है, और ऐसे करीब तीन हजार पैमाने और सवाल इसकी वेबसाईट पर रहते हैं, और लोग जितने चाहें उतने सवालों के जवाब देकर अपने व्यक्तित्व की बारीकियों को, अपनी सोच को वहां दर्ज करवा लेते हैं। इसके बाद वेबसाईट का कम्प्यूटर नापसंद और नफरत के आधार पर लोगों को जोड़ीदार सुझाता है, और एक सी नफरत रखने वाले लोग आसानी से एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
जिस तरह सच और अफवाह के बीच एक बड़ा फासला रहता है कि सच जब तक अपने जूतों के तस्में बांधते रहता है, तब तक अफवाह शहर का फेरा लगाकर लौट आती है, ठीक उसी तरह का हाल मोहब्बत और नफरत का रहता है। खादी को पसंद करने वाले चार लोग एक-दूसरे से जब तक मिलने की सोचें, तब तक गोडसे  के हिमायती गांधी की गढ़ी हुई फर्जी तस्वीरों से उनको बदचलन साबित करते हुए सोशल मीडिया पर बमबारी कर चुके रहते हैं। नेहरू की वल्दियत को लेकर, राजीव गांधी और संजय गांधी की वल्दियत को लेकर इंटरनेट सोचे-समझे और गढ़े हुए झूठों से पटा हुआ है, और नफरतजीवी लोग अपने असली सोशल मीडिया अकाऊंट से भी ऐसी बातों को फैलाने में जरा भी नहीं झिझकते।
जिस तरह भारतीय लोकतंत्र में यह कहा जाता है कि बुरे लोग चुनावों में इसलिए जीतकर आ जाते हैं क्योंकि अच्छे मतदाता वोट डालने नहीं जाते, और घर बैठे रह जाते हैं। ठीक वैसा ही हाल सोशल मीडिया पर भी है, भारत में इंसानियत और लोकतंत्र का भला चाहने वाले लोग भले वोटरों की तरह घर बैठे रहते हैं, और नफरत फैलाकर जंग का रास्ता साफ करने में लगे हुए लोग सोशल मीडिया पर समर्पित भाव से ओवरटाईम करते रहते हैं।
खुद फेसबुक इस बात को लेकर परेशान है कि उस पर पोस्ट होने वाली झूठी खबरों पर वह किस तरह काबू करे। वह इसके तकनीकी रास्ते भी ढूंढ रहा है, और उसके कर्मचारी भी इसमें लगे हैं कि फेक-न्यूज कही जाने वाली खबरें जब फेसबुक पर आएं, तो उनकी किस तरह शिनाख्त हो, और उन्हें किस तरह हटाया जाए। आज दिक्कत यह भी है कि परंपरागत मीडिया के अखबार भी अपने को चटपटा बनाने के लिए सोशल मीडिया पर तैरती हुई फर्जी और फरेबी खबरों और तस्वीरों के शिकार हो जा रहे हैं, और बड़े-बड़े अखबारों में भी इंटरनेट का झूठ बड़ी इज्जत की जगह पा लेता है।
आज यह वक्त अमरीका में लोगों की जागरूकता को देखकर उससे कुछ सीखने का है। वहां सत्ता पर आ गए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नफरतभरी बातों के खिलाफ, फैसलों के खिलाफ आम अमरीकी जनता जिस बड़े पैमाने पर चारों तरफ यह आंदोलन कर रही है कि यह राष्ट्रपति उनका नहीं है, वह देखने लायक है। लोकतंत्र में वोटरों का बहुमत किसी को सत्ता पर तो ला सकता है, लेकिन आबादी के कम या अधिक लोगों के पास यह हक फिर भी कायम रहता है कि वे सत्ता के फैसलों का खुलकर विरोध कर सकें। आज अमरीका में जनता और मीडिया इन दोनों ने मिलकर न सिर्फ वहां की सरकार के गलत फैसलों का जबर्दस्त विरोध किया है, बल्कि समाज के भीतर भी जो लोग नफरत बढ़ाने का काम कर रहे हैं, उनके खिलाफ अमन-पसंद लोग एक होकर लाखों की संख्या में सड़कों पर आ रहे हैं, जिससे कि समाज में बेहतरी की संभावनाएं जिंदा रह सकें।
आज दुनिया में हर समझदार और जिम्मेदार की यह जिम्मेदारी है कि इंटरनेट या किसी और जगह पर अगर जहर घोला जा रहा है, तो उसके खिलाफ वे सच की मदद से हवा साफ करने की कोशिश करें। अगर लोग आज जहर का विरोध नहीं करेंगे, तो वे आने वाले पीढ़ी को पिछली सदी का जर्मनी बनाकर जाएंगे, जब हिटलर ने नस्ल के आधार पर लाखों लोगों का कत्ल किया था। नफरत का जहर हवा में इतना घना छाता चला जाएगा, तो वह अगली कई पीढिय़ों को अपना शिकार बनाएगा। इसलिए आज जो लोग अपनी अगली पीढ़ी के लिए मकान-दुकान छोड़कर जाना काफी समझते हैं, उनको यह भी समझना चाहिए कि इसके साथ-साथ, और बल्कि इससे अधिक जरूरी यह है कि अपने बच्चों के लिए नफरत के जहर वाली हवा छोड़कर न जाएं, बल्कि अपनी पूरी कोशिश इस जहर को साफ करने और खत्म करने में लगाएं। 

वोटों के लिए भी प्रधानमंत्री को बड़प्पन नहीं खोना चाहिए...

संपादकीय
20 फरवरी 2017


उत्तरप्रदेश की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब यह कहा कि राज्य सरकार जहां कब्रिस्तान बनाती है, वहां श्मशान भी बनाना चाहिए, और अगर ईद पर बिजली रहती है, तो दीवाली पर भी रहना चाहिए। उनके शब्द कुछ आगे-पीछे हो सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनका निशाना मुस्लिम और हिन्दू समाज के बीच का फर्क था, और वे यह साबित कर रहे थे कि राज्य सरकार चला रही समाजवादी पार्टी हिन्दू और मुस्लिम में फर्क कर रही है। उनकी इस बात को देश में बहुत से तबके एक साम्प्रदायिक भड़कावा मान रहे हैं, और यह भी मान रहे हैं कि अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में यह हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश।
प्रधानमंत्री की यह बात गलत और अटपटी दोनों लग रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उनकी पार्टी भाजपा उत्तरप्रदेश में या तो सत्ता में रही है, या फिर विपक्ष में। ऐसे में अगर समाजवादी पार्टी ने सचमुच ही कब्रिस्तान और श्मशान के बीच ऐसा कोई फर्क किया था, और हिन्दू त्यौहारों पर अंधेरा रखा था, और मुस्लिम त्यौहारों को रौशन किया था, तो हमको तो पिछले दस बरसों में भाजपा की उठाई हुई ऐसी कोई बात याद नहीं पड़ती है। भाजपा उत्तरप्रदेश में बड़ी मजबूत है, और भाजपा के वहां पर भगवा नेता इतनी हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करने के लिए कुख्यात हैं कि बार-बार उनके खिलाफ कभी चुनाव आयोग को चेतावनी देनी पड़ती है, तो कभी पार्टी को सफाई देनी पड़ती है। रात-दिन खबरों के बीच बैठे हुए भी हमें ऐसी कोई खबर याद नहीं पड़ रही है कि भाजपा के किसी भी नेता ने उत्तरप्रदेश में ऐसा कोई बयान दिया हो। और यह बात साफ है कि अगर साम्प्रदायिकता के आधार पर, धर्म के आधार पर उत्तरप्रदेश में ऐसा हुआ रहता तो अब तक संसद में भी यह बात गूंज जानी चाहिए थी। फिर आज तो प्रधानमंत्री खुद उत्तरप्रदेश के सबसे धार्मिक शहर के सांसद हैं, और पार्टी की उत्तरप्रदेश इकाई की पहुंच भी उन तक अच्छी खासी होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में धर्म के इस्तेमाल को लेकर जो फैसला दिया है, प्रधानमंत्री का बयान उस फैसले के दायरे में तो आता है और वह फैसले की भावना के खिलाफ भी दिखता है, लेकिन यह एक अलग बात है कि तकनीकी आधार पर मोदी का बयान सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बच सकता है। लेकिन हमारा यह मानना है कि अदालत के किसी फैसले या उसकी भावना से परे भी प्रधानमंत्री को एक बड़प्पन के साथ भाषण देना चाहिए, और चुनाव के मौके पर भी प्रधानमंत्री पार्टी के नेता भर नहीं रहते, वे प्रधानमंत्री भी रहते हैं, इस नाते उन्हें सुरक्षा और सहूलियत भी मिलती है, और लोकतंत्र का तकाजा यह है कि प्रधानमंत्री को अपने पद की गरिमा के अनुकूल बड़प्पन की बात करनी चाहिए, और ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए जिसे उकसावा और भड़कावा करार दिया जा सके। हमारी तो देश के किसी भी प्रधानमंत्री से यही उम्मीद रहेगी कि वे वोटों के लालच में भी अपने पद की जिम्मेदारी को न भूलें।

शौच के तरीके के साथ-साथ सोच के तरीके को भी बदलें

संपादकीय
19 फरवरी 2017


आज पूरे देश में खुले में शौच खत्म करवाने के लिए करोड़ों शौचालय बनवाए जा रहे हैं। यह एक अलग बात है कि जैसा कि किसी भी सरकारी योजना में होता है, भारत में भी अलग-अलग राज्यों में जिला स्तर से राज्य सरकारों के पास फर्जी आंकड़े पहुंच रहे हैं, और हकीकत उतनी अच्छी नहीं है, जितनी कि बताई जा रही है। लेकिन यह बात सिर्फ शौचालय के मामलों में हो, ऐसा भी नहीं है, सरकार की तो हर योजना में फर्जी आंकड़े सामने आते ही हैं, और बाद में जब कोई जांच होती है, तो पता लगता है कि जनता का पैसा बर्बाद होते रहता है, और नेता-अफसर झूठ पेश करके वाहवाही पाते रहते हैं।
ऐसे में इस मामले से जुड़ी हुई एक दूसरी खबर है जो कि आंकड़ों के झूठ से परे एक अच्छी तस्वीर भी पेश करती है। केन्द्र सररकार के स्वच्छता सचिव परमेश्वरन अय्यर अभी तेलंगाना पहुंचे, और वहां एक गांव जाकर दूसरे बहुत से बड़े आईएएस अफसरों के साथ मिलकर अलग-अलग शौचालयों के गड्ढों में उतरे, और वहां भरा हुआ पखाना जो कि खाद में तब्दील हो गया था, उसे अपने हाथों साफ करके निकाला, और गांव के लोगों के सामने यह हकीकत रखी कि शौचालयों के गड्ढे भरने के बाद कुछ महीनों में ही उनमें मलमूत्र सूखकर सूखा पावडर सरीखा खाद बन जाता है, और उसे बाहर निकालने में कोई दिक्कत नहीं होती। देश के इन कुछ सबसे बड़े अफसरों ने ऐसा करके लोगों की वह हिचक खत्म करने की कोशिश की कि शौचालयों के टैंक जब भर जाएंगे, तब उन्हें साफ कौन करेगा? क्योंकि आज देश में यह कानून लागू है कि किसी भी सफाई कर्मचारी से दूसरों का पखाना नहीं उठवाया जाएगा, और वह जुर्म होगा। ऐसे में बहुत से लोगों के बीच यह सवाल है कि खुले में शौच बंद करवाकर आज हर कहीं पखाने तो बन जा रहे हैं, लेकिन उनके टैंक भर जाने के बाद उनकी सफाई कौन करेगा? इन अफसरों ने बताया कि दो-दो टैंक इसीलिए हर शौचालय के साथ बनते हैं कि जब एक भर जाए, तो उसे बंद करके सूखने दिया जाए, और फिर लोग खुद कुछ महीनों में उसे खाली करके खाद का इस्तेमाल कर लें।
यह बात कहने में जितनी आसान लगती है, हकीकत में इस पर अमल उतनी आसान नहीं रहेगी, मलमूत्र की सफाई आज भी भारत में छुआछूत की एक वजह है, और लोग अपने घर के पखाने की सफाई भी खुद नहीं करते। ऐसे में शौचालयों के भरे हुए और सूखी खाद से भरे हुए टैंक की सफाई के लिए लोग उसके भीतर उतरेंगे, और उसे निकालकर खेतों में इस्तेमाल करेंगे, इस राह में सामाजिक सोच एक बड़ा अड़ंगा साबित होगी। इसलिए यह भी जरूरी है कि जिस बड़े पैमाने पर शौचालयों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी बड़े पैमाने पर सफाई की जिम्मेदारी की सामाजिक-नसीहत भी लोगों को दी जाए। शौचालय को ईंट-गारे से बनाना तो आसान है, लेकिन लोगों की हिचक को खत्म करना इसके मुकाबले बहुत मुश्किल है। यह अच्छी बात है कि भारत सरकार के इतने बड़े अफसरों ने दूसरों के शौचालयों के टैंक साफ करके लोगों के सामने एक मिसाल रखी है, और दूसरे प्रदेशों में भी लोगों को आज से ही ऐसी सामाजिक जागरूकता फैलाना शुरू करना चाहिए, वरना टैंकों के भरने के बाद रातों-रात लोगों की सोच नहीं बदली जा सकेगी। शौच के तरीके के साथ सोच के तरीके को भी साथ-साथ ही बदला जाए।

ताकतवरों की कैद और सुनवाई दूसरे राज्यों में होना जरूरी हो...

संपादकीय
18 फरवरी 2017


बिहार के बाहुबली कहे जाने वाले, और अनगिनत जुर्म के मामलों से घिरे हुए एक नेता शहाबुद्दीन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बिहार की जेल से दिल्ली के तिहाड़ जेल लाया जा रहा है क्योंकि बिहार में जेल के भीतर भी इस आदमी का राज चलता है, और उसके खिलाफ चल रहे मामलों में गवाह और सुबूत दोनों ही खत्म होते चलते हैं। ऐसे में उसकी करवाई बताई जाती एक हत्या के मुकदमे में वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से यह अपील की थी कि इसे बिहार से बाहर की जेल में रखा जाए।
देश में ऐसे बहुत से ताकतवर लोग हैं जो जेल के भीतर भी राज करने जितना दमखम रखते हैं, या उतना खर्च कर सकते हैं। कुछ दूसरे तरह की ताकत आसाराम जैसे लोग रखते हैं जिनके बलात्कार के मामले के बावजूद लोग उनके भक्त बने हुए हैं, और जेल से लेकर अदालत तक हर बार सड़कों पर भीड़ लगाकर हंगामा भी करते हैं। ऐसे सारे लोगों को उनके राज्य के बाहर की जेलों में रखना चाहिए, और साथ ही इनके मामले तुरंत ही इनके प्रभामंडल के इलाकों से बाहर की अदालतों में, दूसरे प्रदेशों की अदालतों में भेज देने चाहिए, तभी जाकर किसी तरह की सही सुनवाई हो सकती है। न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में जेलों के भीतर मुजरिमों का ही राज चलता है, और जब ऐसे मुजरिम सत्ता या पैसों की ताकत से लैस होते हैं, तो वे वहां से फोन पर बाहर की दुनिया में अपना कामकाज भी चलाते रहते हैं, और गवाहों और सुबूतों को खत्म भी करते रहते हैं। इसी शहाबुद्दीन का हाल यह है कि जब अभी जेल से वह पैरोल पर बाहर निकला था, तो उसे लेने के लिए बिहार के कई मंत्री-विधायक पहुंचे थे। अब आज अगर शशिकला को कर्नाटक के बजाय तमिलनाडू की जेल में रखा गया होता, तो उनके चरण धोने के लिए रोज पहुंचने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री को देखते हुए जेल के कर्मचारी उन पर कौन से नियम लागू कर सकते थे?
भारत की न्याय व्यवस्था में मामले की शुरुआत पुलिस या इस तरह की दूसरी जांच एजेंसी से शुरू होती है, और उसके बाद गवाह और सुबूत जुटने पर मामले अदालत में पहुंचते हैं, इसके बाद जांच रिपोर्ट, गवाह, सुबूत, अदालती कर्मचारी, सरकारी वकील, और जज, इनमें से जो-जो बिकाऊ हों, उन सबको खरीदने का सिलसिला शुरू होता है। इस खरीदी के बाद अगर मामले में कोई दम बचता है, तो ही वह आगे घिसटता है, और मुजरिमों की ताकत मामले के पैरों में बेडिय़ां बांध देती है ताकि वह पैदल चाल से भी न चल सके। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक ऐसा नियम बनाना चाहिए कि मंत्री, सांसद, विधायक, और बड़े अफसर, एक सीमा से अधिक संपन्नता वाले लोग, ऐसे तमाम लोगों को प्रदेश के बाहर की जेल में ही रखा जाए, और गवाह या सुबूत खत्म होने की शिकायत आने पर उनके मुकदमे ही दूसरे प्रदेश में भेज दिए जाएं। गुजरात में मुठभेड़-हत्याओं के मामलों में दिग्गज आईपीएस अफसर बंजारा का ऐसा ही किया गया था।
लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि मध्यप्रदेश के जिस व्यापम घोटाले की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने अभी पिछले कुछ दिनों में ही सैकड़ों मेडिकल छात्रों का दाखिला खारिज किया है, उस मामले में किस तरह इसी भाजपा सरकार के मंत्री से लेकर अफसर तक, और कई ताकतवर नेता तक शामिल थे, और जेल में बंद रहने के बाद जब ऐसे मंत्री बाहर निकले तो उनकी भव्य शोभायात्रा निकाली गई थी, बड़ा स्वागत किया गया था। और इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान इससे जुड़े हुए गवाह, छोटे-मोटे अभियुक्त, और जांच अफसर मिलाकर शायद चार दर्जन के करीब लोग रहस्यमय तरीके से मारे गए। यह ऐसा ही एक मामला था जिसमें सत्ता की सीधी भागीदारी एक बड़े जुर्म में साबित हो रही थी, फिर भी उसे मध्यप्रदेश में ही चलाया गया, मध्यप्रदेश में ही उसकी जांच की गई, और लोगों को अपनी ही सरकार की जेल में रखा गया।
हमने ऐसे ही खतरों के बारे में एक बार पहले यह भी लिखा था कि जब किसी राज्य में सत्ता पर बैठे लोगों पर ही किसी जुर्म में शामिल होने के आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच अपने आप केन्द्र सरकार की किसी जांच एजेंसी को देने की एक व्यवस्था करनी चाहिए। आज केन्द्र की जांच एजेंसी सीबीआई तभी तस्वीर में आती है जब राज्य सरकार ऐसी जांच की सिफारिश करती है, और राज्य सरकारें आमतौर पर यह चाहती हैं कि जांच उनके कब्जे की पुलिस से परे न जाए। भारत में न्याय की किसी भी संभावना के खत्म होने की यह एक बड़ी वजह रहती है, और इसके खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट को कोई आदेश देना चाहिए।

राज्य सरकार के भ्रष्टाचार पर निगरानी की खुफिया एजेंसी हो

संपादकीय
17 फरवरी 2017


छत्तीसगढ़ में कल फिर एंटी करप्शन ब्यूरो ने पौन दर्जन अफसरों पर छापे मारे, और उनसे एक अरब से अधिक की जमीन-जायदाद, गहनों और रूपयों की बरामदगी बताई है। हर कुछ महीनों में ब्यूरो की ऐसी कार्रवाई होती है, और फिर महीनों तक उससे जुड़ी खबरें आती हैं, और फिर लोगों को यह भी पता नहीं लगता कि ये मामले अदालत तक पहुंचे या नहीं, या वहां से क्या फैसला हुआ। प्रदेश में एसीबी की आज तक की सबसे बड़ी कार्रवाई, नागरिक आपूर्ति निगम से सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार का दावा किया गया था, लेकिन उससे जुड़े हुए दो सबसे बड़े आईएएस अफसर अब तक किसी भी कार्रवाई से परे आजाद हैं, सरकार विधानसभा में बार-बार कह चुकी है कि कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है।
प्रदेश की जनता ऐसे रहस्य सुलझा नहीं पाती है कि भ्रष्टाचार का घड़ा भरते हुए जब हर किसी को दिखता है, तो भी खुद सरकार को क्यों नहीं दिखता है, और फिर जब भ्रष्टाचार पकड़ में आ भी जाता है, तो भी दस-बीस बरस तक भ्रष्ट लोग कुर्सियों पर जमे रहते हैं, और आगे भ्रष्टाचार जारी रखने के अधिकारों से लैस भी रहते हैं। शायद ही किसी भ्रष्ट को यह खतरा दिखता हो कि उस पर कोई कार्रवाई होगी, और ऐसी कार्रवाई होगी कि उसकी नौकरी जाएगी, और वे खुद जेल जाएंगे। ऐसे खतरे के बिना लोग बेफिक्र होकर कमाते हैं, और कभी उन पर कार्रवाई होती भी है, तो उनकी कमाई का एक बड़ा ही छोटा हिस्सा छापे में पकड़ाता है, और इस हिस्से को भी वे अपनी जायज कमाई साबित करने में अदालत तक पहुंचते हुए कामयाब हो जाते हैं। भारत में न्यायपालिका में मुजरिमों को संदेह के आधार पर रियायत देने की जो सोच है,  उसके चलते सौ गुनहगारों में से दो-चार ही सजा पाते होंगे।
हम बार-बार छत्तीसगढ़ के सिलसिले में यह लिखते आए हैं कि सरकार को भ्रष्टाचार पकडऩे वाली एजेंसी से परे एक ऐसी खुफिया एजेंसी भी विकसित करनी चाहिए जो कि भ्रष्टाचार शुरू होते ही उस पर जल्द ही नजर रख सके, और इसकी जानकारी समय रहते भ्रष्टाचार पकडऩे वाली एजेंसी को दे सके। जिस तरह केन्द्र सरकार से लेकर राज्यों तक दूसरे कई मामलों के लिए खुफिया विभाग रहते हैं जो कि खुद कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, लेकिन नजर रखकर जानकारी जुटाते हैं, और उनकी जानकारी के आधार पर कहीं आतंकी हमले थमते हैं, तो कहीं किसी और तरह के जुर्म। ऐसी ही एजेंसी राज्य सरकार को अपने भीतर के भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए बनानी चाहिए, और जब एसीबी जैसी एजेंसी कोई कार्रवाई करती है, तो पकड़ाए हुए अफसरों के खिलाफ मुकदमे की इजाजत का लंबा और थका देने वाला सिलसिला खत्म करना चाहिए। इसके साथ-साथ राज्य सरकार को यह भी चाहिए कि भ्रष्टाचार या अनुपातहीन सम्पत्ति के मामलों में पकड़ाए गए अधिकारी-कर्मचारी किसी भी काम में न लगाए जाएं, और उन्हें निलंबन के दौर में आधी तनख्वाह देना या बिना काम बिठाए रखना राज्य के अधिक हित में होगा।
आज देश और प्रदेश में अदालतें भ्रष्टाचार पर सरकार के ढीले-ढाले रवैये के खिलाफ तरह-तरह की दखल दे रही हैं। खुद छत्तीसगढ़ में हाईकोर्ट ने सरकार से उसकी ढिलाई पर बहुत तरह के जवाब-तलब किए हैं। ऐसे में सरकार को भ्रष्ट लोगों को बचाना छोड़कर इस प्रदेश को बचाना चाहिए, क्योंकि ऐसे लुटेरों के पकड़ाने के बाद भी उन्हें आगे लूटने के लिए कुर्सियों पर बनाए रखना खुद सरकार की साख को चौपट करता है।

इसरो की कामयाबी तो ठीक है, पर बाकी देश क्या उससे कुछ सीखने की जहमत भी उठाएगा?

संपादकीय
16 फरवरी 2017


भारत के अंतरिक्ष संस्थान इसरो की एक और कामयाबी ने कल सुबह-सुबह देश का सिर ऊंचा किया। यह चारों तरफ की नकारात्मक खबरों के बीच एक सकारात्मक खबर थी कि दुनिया के कई विकसित देशों के 104 उपग्रह लेकर भारतीय रॉकेट किस तरह अंतरिक्ष गया। अलग-अलग देशों और कंपनियों के सौ से अधिक उपग्रह एक साथ भेजने का यह विश्व रिकॉर्ड बना है। इस बड़े ही तकनीकी मामले पर वैसे तो हमको किसी विचार के लिखने की जरूरत नहीं होनी थी, लेकिन फिर भी एक सरकारी संस्थान इस देश की आम सरकारी संस्कृति के बीच भी किस बखूबी काम कर सकता है, यह देखने की जरूरत है। बुरी बातों पर लिखने का मौका तो दिन में चार बार मिलता है, लेकिन सरकार में किसी अच्छी बात पर लिखने के मुद्दों का अकाल बने रहता है।
यह इसरो केन्द्र सरकार के पैसों पर चलने वाला संस्थान ही है, और इसमें वे हिन्दुस्तानी वैज्ञानिक और तकनीशियन काम करते हैं, जिनकी राष्ट्रीयता के बारे में बहुत से लोग यह मानकर चलते हैं कि हिन्दुस्तानी बुनियादी रूप से भ्रष्ट हैं, वे काम नहीं करते हैं, सरकार के हर काम में बड़ा भ्रष्टाचार रहता है, वगैरह-वगैरह। दूसरी दिलचस्प बात यह कि पिछली बार जब मंगल ग्रह के लिए भारत का यान रवाना हुआ, तो पहली बार यह बात सामने आई कि इसरो के उस अभियान से कितनी बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ी हुई थीं। आमतौर पर महिलाओं का मखौल बनाने के लिए यह कहा जाता है कि वे एक कार भी ठीक से पार्क नहीं कर सकतीं, और वे ही महिलाएं इसरो में काम करते हुए मंगलयान को भी मंगल पर ठीक से पार्क कर चुकी हैं। यह इसरो सरकारी खरीदी पर ही काम करता है, इसके वैज्ञानिक वे ही लोग हैं जिन्हें कि दुनिया के दूसरे देशों में इससे दस-बीस गुना बड़ी तनख्वाह मिल सकती है, और इस पर सरकार की वैसी ही राजनीति चल सकती है जैसी कि किसी भी दूसरे सरकारी संस्थान पर चलती है या चल सकती है। लेकिन ऐसी ही तमाम सीमाओं के बीच इतनी बड़ी महिला-भागीदारी के साथ इसरो ने जो कामयाबी पाई है, उसे देखकर इस देश को यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी हर कोने पर थूकने या मूतने से बेहतर भी बहुत से काम कर सकते हैं, और करते हैं।
किसी देश के लिए राष्ट्रीय गौरव बहुत जरूरी होता है। इसरो हर बरस एक से अधिक बार देश को ऐसा मौका देता है। ऐसा ही एक दूसरा संस्थान अमूल है जो कि सहकारी क्षेत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें डेयरी चलाने के साथ-साथ आइसक्रीम से लेकर चॉकलेट तक, और दूध से लेकर मक्खन तक बनाकर अपने ब्रांड से बेचने में अमूल ने भारत में काम कर रही सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पछाड़ दिया है। और इस अमूल की एक खूबी यह भी है कि दशकों से इसके ऐसे कॉर्टूननुमा पोस्टर हर चर्चित घटना पर आते हैं, और सरकारी क्षेत्र की सहकारी संस्था होने के बाद भी ये पोस्टर सरकार का मजाक उड़ाने में कभी पीछे नहीं रहते। गौरव का एक और संस्थान दिल्ली का मेट्रो था जिसे कि एक इंजीनियर-अफसर श्रीधरन ने बेमिसाल कामयाबी से बनाया था, और सरकार के भीतर रहते हुए शानदार काम करके दिखाया था। देश में ऐसी मिसालें कई जगह सामने आती हैं, और जनता से लेकर सरकार तक सभी को यह सोचना भी चाहिए कि कामयाबी की ऐसी मिसालें और कहां-कहां बढ़ाई जा सकती हैं। आज अगर कोई यह सोचे कि इसरो के रॉकेट में, या उसके उपग्रह में घटिया सामान सरकारी सप्लाई से खरीदकर लगाया गया होता, तो क्या आज इसरो मंगल पर पहुंचा होता? क्या वह दुनियाभर के देशों के लिए काम करता होता?
अंतरिक्ष में भारत की सफलता पूरी तरह से घरेलू तकनीक पर गढ़ी हुई है, और भारत को अपने बाकी सरकारी क्षेत्रों के बारे में यह सोचना चाहिए कि वहां ऐसी कामयाबी पाने के लिए क्या किया जा सकता है। कामयाबी के ये एक-दो टापू भारत में भ्रष्टाचार और राजनीति की गंदगी के समंदर के बीच भी पनपे हैं, और इनसे बाकी देश को भी सीखना चाहिए।

निजी-पारिवारिक हिंसा रोकने परामर्शदाता तैयार किए जाएं

संपादकीय
15 फरवरी 2017


अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक आदमी ने अपनी पत्नी के चाल-चलन पर शक करते हुए उसे और दो बेटियों को मार डाला, और दो बच्चे बाहर रहने की वजह से बच गए। कुछ दिन पहले प्रदेश के एक दूसरे हिस्से में इसी तरह की हिंसा हुई, और आज दिल्ली की खबर है कि वहां अपने छोटे बच्चों के सामने ही एक आदमी ने पत्नी की डंडे से पीट-पीटकर हत्या की, और उसकी लाश के साथ सोते रहा। हर कुछ दिनों में ऐसी पारिवारिक हिंसा सामने आती है, और वह महज एक पुलिस का आंकड़ा बनकर अदालत तक पहुंचती है, खबर बनती है, फैसले के बाद कैद होती है, और परिवार इस दौर में तबाह हो जाता है।
अब सवाल यह उठता है कि निजी जिंदगी की ऐसी हिंसा को दुनिया की कोई भी पुलिस जाकर वक्त रहते नहीं रोक सकती, क्योंकि किसी के दिल में परिवार के लोगों के खिलाफ ही अगर कोई हिंसक भावना है, तो उसकी शिनाख्त का तो कोई जरिया हो भी नहीं सकता। अब ऐसे में ऐसी हिंसा से बचाव कैसे किया जाए? और ऐसी पारिवारिक हिंसा न महज परिवार पर भारी पड़ती है, बल्कि पूरे समाज पर भारी पड़ती है, और जांच से लेकर अदालत और जेल तक, सरकार की जेब पर भी बोझ बनती है। इसलिए समाज को ऐसी हिंसा से बचाव के रास्ते देखने चाहिए, कोशिशें करने पर ऐसी हिंसा चाहे पूरी तरह बंद न हो, कम जरूर हो सकती है, और उसी के लिए कोशिश करनी चाहिए।
परिवार के भीतर की ऐसी अधिकतर हिंसा एक तनाव के बढ़ते चले जाने और उसके हद से गुजर जाने के बाद होती है। इसके पहले परिवार के लोगों के बीच टकराव को रोकने के लिए, तनाव को रोकने के लिए, परिवार के दूसरे लोग भी मददगार हो सकते हैं, रिश्तेदार और पड़ोसी भी काम आ सकते हैं, दोस्त और सहकर्मी भी इस्तेमाल के हो सकते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि किसी भी निजी हिंसा के पीछे आसपास के करीबी लोगों में से कम से कम कुछ लोगों की अनदेखी और लापरवाही भी जिम्मेदार रहती है, जो कि समय पर दखल देने से बचने वाले लोगों की रहती हैं। लेकिन यहां तक तो बात समाज की है, सरकार की भी एक जिम्मेदारी बनती है जिस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए।
आज देश-प्रदेश में लोगों के भीतर बढ़ते हुए तनाव को लेकर, उनकी कुंठाओं और उनकी हताशा को लेकर, नाकामयाबी से उपजे उनके मानसिक अवसाद को लेकर समाज के एक बड़े हिस्से को परामर्श की जरूरत है। और यह बात हम आज पहली बार नहीं लिख रहे हैं, पहले भी बहुत बार लिख चुके हैं कि कभी इम्तिहान देते बच्चे तनाव में आत्महत्या कर लेते हैं, तो कभी मनपसंद मोबाइल फोन न मिलने पर किसी गरीब घर की लड़की टंग जाती है। ऐसे सारे मामलों में स्कूल-कॉलेज, और पड़ोस के किसी संगठन से समय रहते अगर सलाह मिल जाए, तो आत्महिंसा या हिंसा की ऐसी नौबत टल सकती है। यह काम सररकार को ही शुरू करना होगा। अभी जैसे स्कूली इम्तिहान शुरू होने के ठीक पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पत्नी के साथ एक सरकारी स्कूल गए, और बच्चियों का हौसला बढ़ाकर आए। यह तो एक स्कूल की बात हुई, लेकिन प्रदेश भर में ऐसे हजारों परामर्शदाताओं की जरूरत है जो कि बारी-बारी से अलग-अलग स्कूल-कॉलेज में जाकर, अलग-अलग बस्तियों और मुहल्लों में जाकर लोगों के बीच सकारात्मक भावनाओं को बढ़ा सकें।
इसके लिए सररकार को प्रदेश के विश्वविद्यालयों में सामाजिक-मानसिक परामर्श के पाठ्यक्रम शुरू करने होंगे जो कि मनोविज्ञान की पढ़ाई के बाद के होंगे। ऐसे लोग सीधे-सीधे सरकारी नौकरी चाहे न पा सकें, लेकिन इन्हें भत्ता देकर भी काम में लगाया जा सकता है, जिस तरह कि आज शिक्षाकर्मी काम करते हैं, मितानिनें काम करती हैं। समाज के भीतर टीवी और अखबार मिलकर इतनी हिंसा बढ़ा रहे हैं, और लोगों की जिंदगी के तनाव इतने अधिक हो चुके हैं, कि उन्हें घटाने के लिए ऐसी मेहनत जरूरी है। पूरे देश में ही कॉलेज की पढ़ाई के बाद शायद दो-चार फीसदी लोगों को ही उनकी पढ़ाई की वजह से रोजगार या कारोबार मिल पाता है। अगर ऐसी पढ़ाई के बाद परामर्शदाता निकलेंगे, तो हो सकता है कि समाज का एक हिस्सा उन्हें कुछ फीस देकर भी अपने बच्चों की या अपने मन की उलझनों को सुलझाने की कोशिश करे। लेकिन जब तक ऐसे परामर्श की सुविधा हासिल नहीं होगी, लोग खुद होकर अपने तनाव पूरी तरह से नहीं घटा सकते, और ऐसी सुविधा के लिए सरकार को ही विश्वविद्यालयों में ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करवाने की पहल करनी होगी। जिस तरह स्कूलों में खेल शिक्षक होते हैं, उसी तरह कम से कम हर शहर या कस्बे में एक-एक स्कूली-परामर्शदाता भी होने चाहिए, और ऐसा होने पर बच्चों का देह शोषण रोकने में भी मदद मिल सकती है। 

मुजरिम नेताओं को फास्ट फूड डिलीवरी जैसा तेज इंसाफ मिले

संपादकीय
14 फरवरी 2017


तमिलनाडू में गुजर चुकीं मुख्यमंत्री जयललिता और उनकी सहयोगी शशिकला पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में निचली अदालत की सुनाई हुई सजा को आज सुप्रीम कोर्ट ने सही करार दी, और चूंकि जयललिता को तो अब पेश होने का आदेश दिया नहीं जा सकता था, इसलिए शशिकला को ही तुरंत समर्पण करने को कहा गया है। आज इस वक्त तक वहां के अन्नाद्रमुक पार्टी के तकरीबन सारे विधायकों को अपने साथ लेकर बैठीं शशिकला के लिए तो यह एक सदमा है ही कि चार बरस की कैद से बचने का अभी तुरंत कोई जरिया नहीं है, लेकिन चेन्नई से आ रहीं ताजा खबरें बता रही हैं कि शशिकला के मुकाबले रीढ़ की हड्डी लेकर खड़े हुए मौजूदा मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम को शशिकला ने पार्टी से निकलवा दिया है, और अपनी जगह एक दूसरे विधायक को अगला मुख्यमंत्री निर्वाचित करवा दिया है। ऐसा लगता है कि विधायक दल अभी उनके ही कब्जे में है, या उनके साथ है, और तमिलनाडू की सरकार अभी एक अस्थिरता में फंसी है, और आने वाले घंटों या दिनों में मामला साफ होगा। लेकिन हम अभी इस मामले पर न लिखकर, इससे जुड़े हुए उस बुनियादी मुद्दे पर लिखना चाहते हैं जिसकी वजह से आज शशिकला को चार बरस की कैद हुई है, और दस करोड़ रूपए जुर्माना पटाने को कहा गया है।
अब यह याद रखने की जरूरत है कि आज तमिल राजनीति में इतनी ऊंचाई और इतनी ताकत की जगह पर पहुंची हुई शशिकला मुख्यमंत्री जयललिता की एक घरेलू सहयोगी रहीं, और वह जयललिता की सबसे करीबी, सबसे विश्वस्त, और सबसे ताकतवर भी रहीं। ऐसे में भ्रष्टाचार की काली कमाई का अथाह खजाना इकट्ठा करके जया और शशिकला दोनों ही अदालत के कटघरे में पहुंचे, जेल पहुंचे, और अब कैद जारी रहने वाली है। भारत की राजनीति में भ्रष्ट नेताओं को सजा मिलते हुए कितना वक्त लगता है, यह इस खबर से पता लगता है जिसमें अठारह बरस से यह मुकदमा चल रहा था, और देश के एक तीखे तेवर वाले नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बिना थके हुए देश की छोटी से लेकर सबसे बड़ी अदालत तक इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, और आज वह आखिरी मुकाम तक पहुंची है। अब इसके साथ ही यह खबर भी आई है कि बिहार के चारा घोटाले के चलते गिरफ्तार, सजायाफ्ता, और अभी ऊंची अदालत में अपील के चलते जमानत पर छूटे हुए पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले की वजह से परेशान हैं। अब सवाल यह उठता है कि लालू यादव भ्रष्टाचार के इस मामले के बाद अपनी गृहिणी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर एक किस्म से बिहार को हांकते रहे। तब से लेकर अब तक उनकी बेटी सांसद बन गई, दो बेटे बिहार में मंत्री हैं, और वे खुद बेताज बादशाह हैं, और यह सब देखकर बिहार की वे गाय-भैंस सदमे में मर चुकी हैं जिनके चारे के घोटाले में लालू को सजा हुई थी।
भारत की राजनीति यह साबित करती है कि भ्रष्टाचार हो, या कि किसी और किस्म का जुर्म हो, लोग अगर सत्ता या विपक्ष की राजनीति में ताकतवर हैं, तो दशकों तक वे अपने जुर्म की सजा से बचे रह सकते हैं। यही वजह है कि हिन्दी में ऐसी बहुत सी फिल्में सामने आई हैं जिनमें कोई ईमानदार पुलिस अफसर भ्रष्ट मंत्री-मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से पीट-पीटकर जेल में डालता है, कानून अपने हाथ में लेता है, हिंसा करता है, और लोग ऐसे नजारे देखकर ताली बजाते हैं क्योंकि हिन्दुस्तान में ऐसे ताकतवर नेताओं को महज ऐसे फिल्मी किरदार ही सजा दे पाते हैं। भारत में लोकतंत्र राजनीति के मुजरिमों को सजा देने के मामले में एकदम ही खोखला और बेअसर साबित हुआ है। कभी-कभार दस-बीस बरस की मुकदमेबाजी के बाद हजारों में से कोई एक नेता सजा पाते हैं, और आमतौर पर वे सजा के पहले जयललिता जैसे अंत को पहले पा लेते हैं, राजकीय सम्मान के साथ ऊपर रवाना होते हैं, और इसके साथ ही उनकी सजा की आशंका खत्म भी हो जाती है।
हम पहले भी बार-बार यह लिखते रहे हैं कि सत्ता की अलग-अलग दर्जे की ताकत पाए हुए लोगों के लिए अलग से अदालत होनी चाहिए, और उनके जुर्म के लिए उनके ऊंचे दर्जे के अनुपात में ही अधिक कड़क सजा का भी इंतजाम होना चाहिए। जब तक हिन्दुस्तानी नेताओं के जुर्म पर फास्ट फूड डिलीवरी जैसी तेज रफ्तार से इंसाफ की डिलीवरी नहीं होगी, और वाघ-बकरी ब्रांड की चाय की तरह कड़क सजा नहीं होगी, तब तक भारतीय राजनीतिक सत्ता भ्रष्ट लोगों से दबी रहेगी, और भ्रष्ट बनी रहेगी।

न ज्ञान, न समझ, बच्चे महज इम्तिहानों की अंधी दौड़ में..

संपादकीय
13 फरवरी 2017


राजस्थान की एक खबर है कि वहां सरकारी स्कूल में बोर्ड परीक्षा में सौ फीसदी नतीजे लाने के लिए, और मेरिट में जगह पाने के लिए बच्चों को रात-दिन पढ़ाया जा रहा है, और उनके लिए स्कूल में ही रजाई-बिस्तर का इंतजाम कर दिया गया है। शिक्षक भी रात भर उनको पढ़ाने के लिए स्कूल में ही रूक रहे हैं। कुछ हफ्ते पहले एक दूसरी खबर आई थी कि कहीं और एक स्कूल में रिकॉर्ड बनाने के लिए सुबह 4 बजे से शिक्षक निकलते हैं, और बच्चों को जगाकर लेकर आते हैं। इस स्कूल में साल के हर दिन क्लास लगने की भी बात उस खबर में थी।
पढ़ाई के लिए हिन्दुस्तान में बावलापन मोटे तौर पर इम्तिहान में बेहतर नतीजे पाने के लिए बावलेपन में बदल गया है। मां-बाप से लेकर स्कूल तक बच्चों को मानो कोल्हू में बैल की तरह जोत देते हैं कि उनका कितना अधिक तेल निकाला जा सकता है। और यह हाल तो तब है जब राजस्थान के कोटा जैसे प्रवेश-परीक्षा तैयारी के कारखाने की बात नहीं की जा रही है। कोटा में तो आईआईटी जैसी परीक्षाओं में कामयाब करने के लिए स्कूल के आखिरी कई बरस बच्चे झोंक दिए जाते हैं, और हर बरस इनमें से कई बच्चे खुदकुशी कर लेते हैं।
स्कूल की पढ़ाई को हिन्दुस्तान में सब कुछ मान लिया जाता है। और यह पढ़ाई भी ज्ञान और समझ पाने के लिए नहीं होती, यह इम्तिहान में पास होने और अधिक नंबर पाने के लिए ही रहती है, और नतीजा यह होता है कि अंकसूची को ज्ञान मान लिया जाता है। बच्चों की जिंदगी के स्कूली बरस सबसे अधिक असर डालने वाले होते हैं, और इन बरसों में उन पर मां-बाप की उम्मीदों से लेकर स्कूल के दबाव तक का हाल ऐसा रहता है कि हर बरस उन्हें गिनाया जाता है कि जिंदगी में इस बरस के इम्तिहान में नंबर पाना ही सब कुछ है, और उसके अलावा जिंदगी में कुछ भी नहीं है। जबकि दुनिया का इतिहास बताता है कि जो सबसे कामयाब महान लोग हुए हैं, वे स्कूलों में पढ़ाई में बहुत मामूली रहे हैं, और बहुत से तो मुश्किल से पास हुए। अभी-अभी दुनिया की एक सबसे कामयाब चीनी कम्पनी अली बाबा के संस्थापक जैक मा ने किसी भाषण या इंटरव्यू में कहा है कि वे अपने बच्चों को बहुत अधिक नंबर पाने के किसी दबाव में नहीं रखते, उनका मानना है कि ठीक-ठाक नंबर मिल जाएं वही बहुत है। वे खुद एक बहुत गरीब स्कूल में पढ़े और यहां तक पहुंचे।
हिन्दुस्तानी मां-बाप और स्कूलों को यह समझना चाहिए कि बच्चों की जिंदगी के ये बरस दुबारा नहीं आने वाले रहते। और इन बरसों में न सिर्फ किताबी पढ़ाई जरूरी है, बल्कि खेलकूद भी जरूरी है, जैसा कि जापानी स्कूलों में होता है, बच्चों का अपने आसपास की सफाई का काम करना भी जरूरी है, उनमें रचनात्मकता, कल्पनाशीलता, और लीडरशिप की संभावनाओं को देखना भी जरूरी है। और इन सबके लिए इन बच्चों के दिल-दिमाग से पढ़ाई के बोझ को घटाना भी जरूरी है। हर दिन बच्चों के पास कुछ घंटे उनकी हॉबी के लिए, सामान्य ज्ञान के लिए, उन्हें बेहतर इंसान बनाने के लिए, उन्हें सामाजिक सरोकार सिखाने के लिए, और उन्हें किताबों से परे की समझ देने के लिए भी लगाने चाहिए। भारत में इम्तिहानों में एक-एक नंबर को लेकर, और क्लास में या स्कूल में अव्वल आने को लेकर जिस तरह का दबाव बच्चों पर डाला जाता है वह उनके शारीरिक-मानसिक विकास, और उनके व्यक्तित्व-विकास सभी को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में स्कूली इम्तिहान में नंबरों के बजाय ग्रेड देने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि बच्चे एक-एक नंबर के मुकाबले में न लगे रहें, और बचपन से किशोरावस्था तक की उम्र में वे दुनिया की दूसरी बहुत सी अच्छी बातों को समझ और सीख भी सकें। भारत पहले पढ़ाई के इम्तिहान में उलझा रहता है, और उसके तुरंत बाद किसी जगह दाखिले के मुकाबले के इम्तिहान में। यह देश अपने बच्चों को न तो ज्ञान दे पा रहा है, न समझ दे पा रहा है, इन्हें महज एक मुकाबले में लगातार जोतकर रख रहा है, यह नौबत किसी का भला नहीं करती।