जेएनयू में फौजी टैंक की सोच हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद

संपादकीय
25 जुलाई 2017


समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र जैसे बहुत से विषयों पर अपनी एक मौलिक और उदार सोच के साथ ऊंचे दर्जे की पढ़ाई और शोध कार्य के लिए विश्वविख्यात जेएनयू को उग्र राष्ट्रवाद का निशाना बनाया जा रहा है। एनडीए सरकार के आने के बाद वहां कुलपति बने जगदेश कुमार अब चाहते हैं कि विश्वविद्यालय कैंपस में भारतीय फौज का कोई रिटायर्ड युद्धक टैंक लाकर खड़ा किया जाए ताकि वहां के छात्रों के बीच फौज के लिए पे्रम उपज सके। जगदेश कुमार पिछले कुछ अरसे से वामपंथी रूझान वाले छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों से लगातार टकराव लिए हुए चल रहे हैं, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि जेएनयू की पहचान एक वामपंथी रूझान वाले शिक्षा केंद्र के रूप में बनी हुई है। वहां के छात्र-छात्राओं को बदनाम करने के लिए दो बरस पहले छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को झूठे मामलों में झूठे वीडियो सुबूत गढ़कर फंसाया गया था, लेकिन ऐसी साजिश करने वाले दिल्ली पुलिस अदालत में खड़ी नहीं हो पाई। लेकिन तब तक पूरे देश में वामपंथ-विरोधियों ने कन्हैया कुमार और जेएनयू को देशद्रोही करार देने का अभियान छेड़ दिया था, जो कि अब तक जारी है, और विश्वविद्यालय ने फौजी टैंक खड़ा करने की सोच इस अभियान का ही एक हिस्सा है।
जेएनयू किसी भी कार्रवाई के लिए पुलिस और दूसरी एजेंसियों के सामने उतना ही खुला हुआ है जितना कि देश का कोई भी दूसरा विश्वविद्यालय। ऐसे में एक उत्कृष्ट शिक्षा संस्थान को मौलिक सोच से परे करने का काम भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को भी चौपट करेगा, कर रहा है, क्योंकि देश के बाहर चाहे आईआईटी-आईआईएम के लोगों को रोजगार अधिक मिलता हो, सामाजिक विज्ञान से जुड़े तमाम पहलुओं पर देश की साख जेएनयू से ही है। अब वामपंथ-विरोधियों को यह भी सोचना चाहिए कि पूरी दुनिया में कहीं भी मौलिक सोच के लिए लोगों को वामपंथियों की ओर ही क्यों देखना पड़ता है? दक्षिणपंथियों में स्तर के विद्वान, लेखक, या प्राध्यापक क्यों नहीं पनप पाते हैं? इस आत्ममंथन से परे अगर देश के शिक्षा संस्थानों का हिंदूकरण या हिंदुत्वकरण करने, उन्हें राष्ट्रवाद के कारखाने बना देने का काम अगर किया जाएगा, तो हिंदुस्तानियों की पूरी पीढ़ी ही इसका नुकसान झेलेगी।
हम छत्तीसगढ़ में ही बनाए गए कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय को देखते हैं कि पिछले कई बरस से इस विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के बजाय राष्ट्रवादिता का अभियान चलते आया है, और उसी का नतीजा है कि देश के तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकारों के नाम पर बहुत ही औसत दर्जे के लोगों को बुला-बुलाकर गैरमीडिया मुद्दों पर राष्ट्रवादी कार्यक्रम करवाए गए, और यहां से मीडिया के पेशे में बहुत ही कम लोग आए पाए। नतीजा यह निकला कि इतने बरस गुजर जाने के बाद भी यह विश्वविद्यालय महज कुछ सौ छात्र-छात्राओं तक सीमित है, और राष्ट्रवादी इसे अपने रंग में रंगने के एक कारखाने की तरह चला रहे हैं जिसका मीडिया में योगदान शून्य है।
हर सत्तारूढ़ पार्टी की अपनी विचारधारा के मुताबिक बहुत से ओहदो को भरने का विशेषाधिकार रहता है। लेकिन न तो लोगों का कोई भला हो, और न ही संस्थान की साख बची रहे, ऐसे मनोनयन लोगों को पांच बरस की सहूलियत और मर्जी के लोगों को बाकी नौकरियां देने में तो काम आ सकती है, लेकिन इन संस्थानों की खोई हुई प्रतिष्ठा लंबे समय तक वापिस नहीं आ पाएगी, और बाकी की दुनिया के विद्वान लोग भारत को हिकारत की नजर से जरूर देखेंगे। जेएनयू में टैंक खड़ा करना एक हिंसक और हमलावर राष्ट्रवाद की सोच है, और इसमें यह देश झुलसकर रह जाएगा।

जुर्म करने की भड़ास निकालने का मौका देने वाली रोबो-डॉल!

आजकल
24 जुलाई 2017
जैसे-जैसे विज्ञान और टेक्नालॉजी अपनी सारी तरक्की लेकर लोगों की निजी जिंदगी को सहूलियतों से भरने में जुट गए हैं, समाज के तौर-तरीके और लोगों की अपनी सोच भी सामानों के साथ बदल रही है। एक वक्त जिन लोगों के बीच ओहदों या उम्र, या रिश्तों के फासलों का लिहाज रहता था, आज वे वॉट्सऐप पर एक-दूसरे को कोई उत्तेजक तस्वीर या फिल्म भेजने में पल भर भी नहीं सोचते। एक कमरे में बैठकर लोग टीवी पर ऐसे प्रोग्राम तो देखते हुए अब एक पीढ़ी गुजार चुके हैं जिन्हें किसी वक्त दो पीढिय़ां एक साथ नहीं देख पाती थीं। अब कम ही चीजें बिल्कुल अकेले वाली रह गई हैं।
टेक्नालॉजी ने बढ़ते-बढ़ते अब मशीनी इंसान बना लिए हैं, और मशीनी मजे की जिंदगी शुरू हो गई है। आज दुनिया भर में सेक्स-डॉल्स का बाजार खुल गया है और लोग बाजार से एक पुतला लेकर आ सकते हैं जो कि बड़े जटिल कम्प्यूटर से लैस भी है, और उससे अपने हमबिस्तर साथी की तरह मजा भी ले सकते हैं। अब यह मजा बढ़ते-बढ़ते इंसान की तमाम जरूरतों को पूरा करने जा रहा है। इन जरूरतों में लोगों की अपनी सेक्स की पसंद-नापसंद का ख्याल तो रखा ही जा रहा है, लेकिन इससे परे भी कुछ ऐसी बातों का भी ख्याल रखा जा रहा है जो कि जुर्म की दर्जे में आती हैं।
अभी कल की ही खबर है कि एक ट्रू कम्पेनियन नाम की कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर जो नए सेक्स रोबो बिक्री के लिए रखे हैं, उनमें उस रोबो के मूड की सेटिंग में एक ऐसी सेटिंग भी रखी गई है जो कि उसे सेक्स में दिलचस्पी न लेने वाली बना देती है। अब ऐसी गुडिय़ा जो बर्फीली मिजाज की कही जाएगी, उसके साथ सेक्स एक किस्म से बलात्कार जैसा होगा, और इसी मकसद से यह नई सेटिंग जोड़ी गई है। इस तरह इंसान की एक सामान्य सेक्स की जरूरत को पूरा करने के बाद अब उसके असामान्य और हिंसक सेक्स को पूरा करने के लिए उसे एक ऐसी मशीनी लड़की दी जा रही है जिससे वह बलात्कार की तरह का सेक्स कर सकता है।
आज हिन्दुस्तान जैसे देश सेक्स-अपराधों के शिकार हैं, और यह सिलसिला बढ़ते ही चलते दिख रहा है। दूसरी तरफ जिन देशों में इंसानी समाज ने अपने तौर-तरीके उदार रखे हैं, और लोगों को अपनी निजी जिंदगी के शारीरिक और मानसिक फैसले तय करने का पूरा हक दिया है, वहां पर सेक्स-जुर्म घटते भी जा रहे हैं, कहीं-कहीं खत्म सरीखे भी हैं। दूसरी तरफ जापान जैसे देश में निजी जिंदगी भी मशीनों पर इस कदर टिकती जा रही है कि लोग नए भावनात्मक या शारीरिक रिश्ते बनाने से डरने और कतराने लगे हैं, और उन्हें मशीनों से रिश्ता रखना ज्यादा महफूज लगने लगा है। लोग समाज में उठना-बैठना कम करने लगे हैं, शादियां घट गई हैं, प्रेम-संबंध और सेक्स-संबंध तेजी से घटते जा रहे हैं, और ऐसे ही समाज से मशीनी सेक्स की टेक्नालॉजी निकल रही है।
कुछ बरस पहले अमरीका के एक सबसे प्रमुख विश्वविद्यालय एमआईटी के वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला था कि जिस रफ्तार से मशीनी इंसान बन रहे हैं, और वे असली इंसानों के करीब आ रहे हैं, सन् 2050 तक इंसानों और मशीनों में कानूनी शादियां होने लगेंगी। अभी इस दिन को 30 से अधिक बरस बचे हैं, और इंसान ने बलात्कार के लायक रोबो भी तैयार कर लिए हैं, और इस हद तक तैयार कर लिए हैं कि वे बाजार में हैं, महज प्रयोगशाला में नहीं। अब बाजार के अपने कायदे रहते हैं, और वह दिन भी अधिक दूर नहीं है जब कम उम्र के रोबो बनते-बनते ऐसे छोटे बच्चों जैसे रोबो सेक्स के लिए बनने लगेंगे जिस पर आज कड़ी सजा है। और फिर समाज यह सोचने लगेगा कि क्या सेक्स-रोबो की सहूलियत समाज में सेक्स-अपराधों को घटा भी सकती है? मशीनें निजी सोच और सामाजिक सोच को किस तरह बदलती हैं, यह टीवी और मोबाइल फोन ने दिखा दिया है, और आगे यह सिलसिला और भी देखने मिलते रहेगा।
दो और छोटी-छोटी खबरें अभी सामने आईं, एक खबर में न्यूयार्क में एक सुरक्षा-रोबो इमारत में बने पानी के एक टैंक में गिर गया, तो पल भर में पूरी दुनिया में उसकी तस्वीरें फैल गईं कि रोबो ने खुदकुशी कर ली। अधिकतर लोगों ने इसे मान भी लिया। लेकिन इसी के आसपास एक दूसरी खबर निकलकर आई कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से विकसित रोबो या मशीनें अगर किसी समय इंसानों को मारने पर उतारू हो जाएंगे, जैसे कि फिल्मों में आज हर दिन ही देखने मिलता है, तो इंसान उन्हें कैसे रोकेंगे? कैसे उन मशीनों के दिमाग को हिंसा से दूर रखने की कोशिश हो सकेगी? एक तीसरी खबर कुछ ही दिन पहले आई कि किस तरह एक घर में पति-पत्नी के बीच कुछ हिंसक बातें हो रही थीं, और उस घर में लगे हुए एक उपकरण ने उन बातों को सुनकर हिंसा रोकने के हिसाब से पुलिस के नंबर पर खुद ही फोन लगा लिया, पुलिस वक्त पर पहुंच गई, और हिंसा को रोक दिया। अब यह बात उठ रही है कि घर के मामूली काम करने के लिए, लाईट या टीवी शुरू-बंद करने के लिए लगे ऐसे उपकरण अगर आसपास की बात सुनकर खुद फोन लगाकर पुलिस या किसी और को खबर करने लगें, तो ऐसी टेक्नालॉजी कौन-कौन सी संभावनाएं, और कौन-कौन सी आशंकाएं खड़ी करती है।
एक बार फिर जापान की एक मिसाल देना ठीक है जहां पर बाजारों में ऐसे पार्लर बने हुए हैं जिनके भीतर जाकर लोग भुगतान करके अपनी भड़ास निकाल सकते हैं। वे कुछ सामान भी खरीद सकते हैं, और एक खाली कमरे में जाकर उन सामानों को तोड़कर अपना गुस्सा उतार सकते हैं, अपनी कुंठाओं से मुक्ति पा सकते हैं। दूसरी तरफ जापान में ही ऐसी सेक्स-सेवा मौजूद है जो सेक्स-कामगारों को स्कूली पोशाक में मौजूद रखती है क्योंकि बहुत से जापानी आदमी स्कूली छात्रा को अधिक उत्तेजक पाते हैं। इस तरह आज बाजार का कारोबार और टेक्नालॉजी इन दोनों की सोच लोगों की जरूरतों को पूरा करने की है। और जिस तरह आज लोगों की मोबाइल-ऑनलाईन जिंदगी के चलते निजी दोस्तों की जरूरत घट गई है, और दोस्ती की सामाजिकता कमजोर होती जा रही है, उसी तरह आज देह-सुख के लिए, और हो सकता है कुछ बरस जाकर मानसिक शांति के लिए भी लोग मशीनी साथियों के साथ हमबिस्तर होना बेहतर समझेंगे।
जापान पर अभी बनी एक गंभीर डॉक्यूमेंट्री फिल्म में वहां के बहुत से लोगों ने कहा कि उन्हें इंसानों से रिश्ते बनाने में जटिलताओं की वजह से घबराहट होती है। कई लोगों ने यह कहा कि रिश्तों का बोझ ढोना उन्हें मुमकिन नहीं लगता है। जाहिर है कि ऐसा समाज ही जीवन साथी जैसे रोबो बनाने में उत्साह दिखा रहा है, और यह सिलसिला जापान से परे भी हर उस समाज तक पहुंचेगा जो कि ऐसे रोबो खरीदने की ताकत रखेगी। मशीनों के साथ लोगों को यह सहूलियत होगी कि साथी का सच्चा या झूठा ऐसा बहाना सुनना नहीं पड़ेगा कि आज वे बहुत थक गए हैं, या कि सिर दर्द हो रहा है।

बीवी बेचने का फतवा देने वाले बददिमाग अफसर...

संपादकीय
24 जुलाई 2017


बिहार के एक कलेक्टर का एक वीडियो कल से टीवी चैनलों पर चल रहा है जिसमें वे एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच और माईक से गरीबों को लताड़ते हुए, गाली देने के अंदाज में चीखते हुए कह रहे हैं कि अगर शौचालय बनाने का पैसा न हो, तो बीवी को बेच दो, और शौचालय बनाओ। अगर इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो अक्सर अपनी कही बात को तोड़-मरोड़कर छापने या दिखाने की तोहमत लगा देता, और बच निकलता। हालांकि अभी तक राज्य सरकार ने इस अफसर पर कोई कार्रवाई नहीं की है, लेकिन ऐसी उम्मीद की जाती है कि गरीबों की ऐसी बेइज्जती करने वाले तानाशाह अफसर को तुरंत ही मैदानी कुर्सी से हटाकर पिछवाड़े के किसी दफ्तर में बिठाया जाएगा।
यह बात हर कुछ दिनों में किसी न किसी प्रदेश से सामने आती है कि किस तरह ताकत की कुर्सियों पर बैठे अफसर जनता को, या मातहत कर्मचारियों को अपना गुलाम मानकर उनके साथ सामंती सुलूक करते हैं। आमतौर पर जिला कलेक्टरों की कुर्सी पर बैठे हुए अफसरों के बीच से ऐसी बददिमागी कुछ अधिक दिखती है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण कहे जाने वाले जिले इंदौर के कलेक्टर पर बनी एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की खबर सामने आई है जिसमें उस अफसर की महानता की स्तुति भरी हुई है, और उसके गुणगान की बातों में उस अफसर और उसके परिवार से बातचीत भी शामिल है। जाहिर है कि उस अफसर की मर्जी और संभवत: उसकी पहल पर ही यह स्तुति तैयार हुई है। छत्तीसगढ़ में भी हम इस तरह के बहुत से आत्ममुग्ध अफसरों को देखते हैं जो कि अपने प्रचार के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, और अपनी निजी बातों को भी सोशल मीडिया पर तस्वीरों सहित फैलाने में लगे रहते हैं। लोकतंत्र में इस तरह के प्रचार से बचकर अफसरों को अपने नाम और अपनी तस्वीरों को पीछे रखकर सरकार को आगे रखना चाहिए, लेकिन अफसर अपनी वाहवाही से बच नहीं पाते हैं, और बहुत से मामलों में तो वे सरकारी खर्च पर भी अपने और परिवार के प्रचार में लगे रहते हैं।
हमने पहले भी इसी कॉलम में यह सुझाया था कि अंग्रेजों के वक्त टैक्स कलेक्ट करने का काम होता था, और इसलिए जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अफसर को कलेक्टर कहा जाता था। अब तो सरकार जिलों से ऐसा कोई बड़ा टैक्स इकट्ठा करती नहीं है, और टैक्स इकट्ठा करने वाले विभाग अलग काम करते हैं। ऐसे में अंग्रेजों के वक्त का यह नाम खत्म करना चाहिए। लेकिन इससे परे इस कुर्सी के एक नाम और चलता है जिलाधीश, इस नाम से भी मठाधीश जैसी बू उठती है और यह नाम अफसरों में एक सामंती अहंकार पैदा कर देता है। छत्तीसगढ़ सरकार इस बात की पहल कर सकती है कि कलेक्टरों और जिलाधीशों के पदनाम बदलकर जिला जनसेवक जैसा एक नाम बनाएं ताकि अफसरों को हमेशा यह ध्यान रहे कि उनकी बुनियादी जिम्मेदारी क्या है। आज तो छत्तीसगढ़ के बहुत से अफसर अपने जिलों से अपनी ऐसी तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं जिनमें वे महंगी-निजी गाडिय़ों को किराए पर लेकर उस पर कलेक्टर या कमिश्नर के नाम की तख्ती लगाकर उसका इस्तेमाल करते हैं, और कहीं उसका किराया कोई अफसर घोषित या अघोषित रूप से देते हैं, या फिर कोई सरकारी ठेकेदार उसका भुगतान करते हैं। राज्य सरकार को अफसरों की ऐसी मनमानी को तुरंत खत्म करना चाहिए, वरना बिहार के इस कलेक्टर की तरह छत्तीसगढ़ का भी कोई अफसर गरीबों को बेटी-बहू या बीवी बेचने का फतवा इसी तरह मंच से देने लगेगा। लोकतंत्र में अफसरों की भूमिका नीति-निर्धारण करने वाले विधायकों और सांसदों, और उनमें से चुनकर मंत्री बने लोगों के मातहत ही होनी चाहिए। इसके अलावा अफसरों का अपना कोई एजेंडा नहीं होना चाहिए, सिवाय लोकतंत्र के संवैधानिक दायरे के भीतर आने वाली सत्तारूढ़ पार्टी की नीतियों पर बने सरकारी कार्यक्रमों पर अमल करने के। हर राज्य की सरकार को अपने-अपने प्रशासनिक ढांचे में तुरंत ही एक लोकतांत्रिक बर्ताव लाना चाहिए, वरना सत्तारूढ़ पार्टी को अगले चुनाव में हराने की पर्याप्त क्षमता बददिमाग अफसरों के बर्ताव में रहती है। 

विशेषाधिकारों के खतरों की ताजा मिसाल है ट्रंप

संपादकीय
23 जुलाई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जिस तरह से जीतकर आए थे, उस पर भी अमरीका सहित दुनिया के बहुत से देशों के समझदार लोग हक्का-बक्का थे। लोगों को लग रहा था कि ऐसा नफरतजीवी और युद्धोन्मादी, सिद्धांतहीन, और बदसलूकी से भरा हुआ आदमी किस तरह चुनकर आ गया। अमरीकी जनता के एक मुखर हिस्से ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन भी किया था कि यह उनका राष्ट्रपति नहीं है। तब से लेकर अब तक लगातार ट्रंप के बारे में विचलित करने वाली बातें सामने आती रही हैं, और अब तो ट्रंप सरकारी, कानूनी, और संसदीय जांच से बुरी तरह घिरे हुए दिख रहे हैं कि उनके चुनाव अभियान के दौरान उनके बेटे, दामाद, और सहयोगियों ने रूस के उन लोगों के साथ मुलाकात की, और तालमेल बनाया जिन्होंने हिलेरी क्लिंटन के खिलाफ नुकसान पहुंचाने वाली जानकारी देने का वादा किया था। अब जब यह लग रहा है कि ट्रंप परिवार जांच के ऐसे घेरे में है जो कि मजबूत दिखता है, और खुद ट्रंप ऐसे हाल में संसद में महाभियोग में घेरे जा सकते हैं, तो ऐसी खबरें आ रही हैं कि वे राष्ट्रपति के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके अपने परिवार को, सहयोगियों को, और अपने आपको भी क्षमादान दे सकते हैं।
यह एक बहुत ही भयानक सोच दिखती है जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति को मिले हुए इस विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल वह अपने ही परिवार को बचाने के लिए कर सकता है, और खुद अपने आपको बचाने के लिए। जब इस बारे में ट्रंप से पूछा गया तो उनका कहना है कि उन्हें किसी को भी माफी देने का पूरा हक है। अमरीकी संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति लोगों को उनका जुर्म साबित हो जाने के बाद, या उन पर कोई मुकदमा शुरू होने के पहले भी, किसी भी वक्त उन्हें माफी दे सकते हैं। आमतौर पर अमरीकी राष्ट्रपति कुछ बहुत ही चुनिंदा मामलों में, दूसरे देशों की सरकारों की अपील पर उन देशों के नागरिकों को माफी देते आए हैं, और कभी-कभी अमरीका के कुछ लोगों को भी। लेकिन ऐसी नौबत कभी नहीं आई कि इस अधिकार का उपयोग कोई अमरीकी राष्ट्रपति अपने परिवार और अपने खुद के जुर्म को खत्म करने के लिए करे, लेकिन आज अमरीका इसी मोड़ पर खड़ा हुआ दिख रहा है। अपने अनैतिक आचरण या गैरकानूनी काम के लिए संसद में महाभियोग का सामना करना अमरीका के लिए एकदम अनोखा भी नहीं है। दो चर्चित अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, और बिल क्लिंटन अपने सरकारी और निजी फैसलों की वजह से संसद में महाभियोग झेल चुके हैं, लेकिन किसी ने भी कभी अपने आपको माफ करने जैसा शायद सोचा भी नहीं था। यह कुछ उसी किस्म का होगा कि मानो भारत में राष्ट्रपति के परिवार ने, या खुद राष्ट्रपति ने कोई जुर्म किया, और फिर खुद ही उसे माफी दे दी। हालांकि भारतीय लोकतंत्र इस मामले में अमरीका के मुकाबले अधिक परिपक्व है, और यहां पर राष्ट्रपति को अदालत के आखिरी फैसले हो जाने के बाद, और वह भी महज मौत की सजा के मामलों में की गई रहम की अपील पर माफी देने का हक है, न उसके पहले, और न ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश के बिना। अमरीका ने अपने राष्ट्रपति को अधिक हक दिए हुए हैं, और अब वह इनके बेजा इस्तेमाल का गवाह भी बन सकता है।
दरअसल ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही अमरीका कई तरह के हितों के टकराव के खतरे में पड़ गया है। बहुत से देशों के साथ ट्रंप के परिवार के कारोबारी रिश्ते हैं, वहां के व्यापारियों से भी, और वहां की सरकारों से भी। खुद अमरीका के भीतर ट्रंप परिवार के कारोबार और सरकार के बीच हितों के टकराव के कई मामले सामने आए हैं, और इन पर ट्रंप को यह सफाई देनी पड़ी है कि ट्रंप-होटलों को सरकार से मिलने वाले किसी भी भुगतान की रकम वे दान में दे देंगे, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप के साथ औपचारिक रूप से उनके बेटे-बेटी-दामाद जुड़े हुए हैं, और उन सबके अपने-अपने कारोबारी हित हैं जो कि राष्ट्रपति भवन के प्रभाव का इस्तेमाल करते दिखते हैं, और जो ट्रंप के साथ दुनिया के दूसरे देशों में सफर भी करते हैं। अब ऐसी जटिलता के बीच आज ट्रंप अगर यह सोचते हैं कि वे अपने परिवार और सहयोगियों को उनके किसी जुर्म, या कि संभावित जुर्म से माफी दे देंगे, तो अमरीकी राष्ट्रपति के ओहदे की साख चौपट हो जाएगी, और अमरीकी जनता के बीच से यह मांग भी उठने लगेगी कि राष्ट्रपति का ऐसा संवैधानिक अधिकार खत्म किया जाए।
फिर अमरीका से परे बाकी देशों को भी सोचना चाहिए कि वे किसी भी पद को किए गए विशेषाधिकारों को किस तरह से खत्म करें। लोकतंत्र और विशेषाधिकार ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। लोकतंत्र को खत्म करने की कीमत पर कुछ चुनिंदा कुर्सियों को असीमित अधिकार देना एक भ्रष्ट और बुरी तानाशाही को खड़ा करना ही हो सकता है, और ट्रंप इसकी ताजा मिसाल हैं।

कार्टूनिस्ट की बनाई पार्टी को व्यंग्य जरा भी बर्दाश्त नहीं !

संपादकीय
22 जुलाई 2017


मुंबई में अभी स्थानीय म्युनिसिपल की असहिष्णुता का एक दूसरा चर्चित मामला सामने आया है। कुछ महीने पहले कॉमेडियन कपिल शर्मा ने म्युनिसिपल अफसरों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था, और जवाब में म्युनिसिपल ने उनका दफ्तर नापकर अवैध निर्माण निकाल दिया, और तोडऩे का नोटिस भेज दिया। अभी दूसरा मामला सामने आया है वहां एक रेडियो जॉकी मलिश्का मेंडोंसा ने शहर की सड़कों की गड्ढों को लेकर एक बड़ा मजेदार और मजाकिया गाना गाया और उसका वीडियो पोस्ट कर दिया। यह गाना एक लोकप्रिय मराठी गाने की धुन पर बनाया गया था और मुंबई की सड़कों के कुख्यात गड्ढों को लेकर म्युनिसिपल का मजाक था। नतीजा यह निकला कि मुंबई महानगरपालिका पर राज करने वाली शिवसेना ने इस वीडियो के आते ही मलिश्का के घर की जांच की, और वहां पर डेंगू फैलाने वाले मच्छरों का लार्वा मिलना बताकर उसे एक नोटिस थमा दिया। शिवसेना के सत्तारूढ़ पार्षद इस रेडियो जॉकी के खिलाफ मानहानि के मुकदमे की मांग करने लगे। महाराष्ट्र की राजनीति में राज्य में एक साथ सत्तारूढ़ भाजपा और शिवसेना के बीच तनातनी चलते रहती है, और शिवसेना के इस कदम पर भाजपा ने म्युनिसिपल पर हमला भी किया है और मलिश्का पर की गई कार्रवाई को व्यक्तिगत आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला भी बताया है।
शिवसेना के इस तरह आपा खो देने को देखते हुए यह याद पड़ता है कि इसके संस्थापक बाल ठाकरे एक वक्त कार्टूनिस्ट थे, और अच्छे तेज-तर्रार कार्टूनिस्ट थे। अब एक कार्टूनिस्ट की पार्टी भी एक व्यंग्य या मजाक पर इस तरह बौखलाकर कार्रवाई करती है तो यह उस पार्टी के लिए शर्मनाक बात है। लोगों को याद होगा कि आपातकाल के दौरान भारत की एक बहुत प्रतिष्ठित कार्टून पत्रिका शंकर्स-वीकली को उसके संपादक और कार्टूनिस्ट शंकर ने बंद कर दिया था कि जब लोगों की सहनशक्ति खत्म हो गई है, और सेंसरशिप लागू की जा रही है, तो वे इसे चलाने के बजाय बंद कर देना बेहतर समझते हैं। अब अगर देश की कारोबारी राजधानी की सड़कों पर वहां करोड़ों लोग भुगतते हैं, तो क्या लोगों को मजाक उड़ाने का भी हक नहीं है?
अमरीकी अखबारों को देखें और वहां पर ताजा मामलों पर बने हुए कॉमेडी के कार्यक्रमों को देखें तो समझ में आता है कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या होती है। देश के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति की बातों को लेकर जिस तरह की खिल्ली उनकी उड़ाई जाती है उसका एक फीसदी भी कोई हिन्दुस्तानी नेता शायद ही बर्दाश्त करे। और उसी से समझ में आता है कि जनता के बीच लोकतांत्रिक समझ कैसे विकसित होती है, और कैसे लोगों के बीच अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पनपती है। मुंबई के इस ताजा मामले को लेकर हमारा मानना है कि वहां के हाईकोर्ट को तुरंत इस मामले में दखल देना चाहिए और महानगरपालिका को पूछना चाहिए कि इस गायिका के घर पर डेंगू का लार्वा तलाशने के लिए जाने की उन्हें कैसे सूझी थी? मुंबई में दसियों लाख मकान हैं, और आनन-फानन किसी एक घर के भीतर का लार्वा म्युनिसिपल को अपने दफ्तर बैठे दिख गया? यह सरकारी गुंडागर्दी की एक मिसाल है, और हकीकत तो यह है कि ऐसी ओछी और अलोकतांत्रिक गुंडागर्दी से मुंबई महानगरपालिका ने अपनी ही नालायकी और निकम्मेपन को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
यह पूरा सिलसिला सिर्फ एक म्युनिसिपल का मानकर चलना ठीक नहीं है। देश में जहां-जहां ऐसी अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है, उसे तुरंत कुचलना जरूरी है, और अगर मुंबई का हाईकोर्ट इस पर पहल नहीं करता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ेगा।

बच्ची से बलात्कार और अनगिनत सवाल

संपादकीय
21 जुलाई 2017


चंडीगढ़ की एक अदालत ने दस बरस की एक बच्ची को गर्भपात की इजाजत नहीं दी है। उसका मामा उससे लगातार बलात्कार करते आया था, और अब वह 26 हफ्तों की गर्भवती है। भारत में कानून 20 हफ्तों से अधिक के गर्भ के बच्चे को खत्म करने की इजाजत नहीं देता। लेकिन इस मामले में अदालत के साफ रूख से परे, डॉक्टरों के सामने यह समझ नहीं है कि दस बरस की बच्ची का मां बनना मां-बच्चे दोनों की जिंदगी के लिए अधिक खतरनाक है, या उसका गर्भपात। दोनों ही मामलों में इस लड़की की जिंदगी और सेहत दोनों बहुत बुरी तरह खतरे में रहना तय है। अब इस सिलसिले में इस बच्ची के इलाके की जनता उबली पड़ी है कि इस बच्ची को बलात्कार के इस नतीजे को जिंदगी भर पालना पड़ेगा। हमारे सामने इस मामले से जुड़े कई पहलू हैं जो एक-दूसरे से जुड़े हुए नहीं हैं, लेकिन जिन पर दो-दो पल सोचने की जरूरत है।
सबसे पहली बात यह कि किसी परिवार में सबसे करीबी रिश्तेदारों से बच्चों को सुरक्षित मानना ठीक नहीं है। इसी हादसे की और जानकारी ढूंढने के लिए अभी हमने इंटरनेट पर इस खबर को ढूंढा तो इसके साथ-साथ अनगिनत ऐसी और खबरें आ गईं जिनमें मामा, चाचा, पिता और भाई जैसे करीबी रिश्तेदार बच्चों से बलात्कार करते आए हैं। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों मामलों में से कोई एक ही पुलिस और खबरों तक पहुंचता है। बाकी तमाम चीखें घर के भीतर ही दबा दी जाती है। इसलिए मां-बाप की पहली जिम्मेदारी अपने बच्चों को देह शोषण के बारे में जागरूक करना और उन्हें हिफाजत से रखना है। रिश्तों की जिम्मेदारी का नैतिक बोझ इंसानों के भीतर की हवस को हमेशा दबाकर नहीं रख पाती।
दूसरा पहलू कानून के बेअसर होने का है जिसके बारे में कल ही हमने इसी इलाके के एक पड़ोसी राज्य में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार और फिर उसकी हत्या को लेकर भारी तनाव बना हुआ है। जांच एजेंसियों से लेकर अदालतों तक की कमजोरी और व्यापक भ्रष्टाचार के चलते लोगों को अब न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं रह गया है और लोग सड़कों पर इंसाफ चाहने लगे हैं। मुजरिम को सजा दिलाने का काम अगर बेहतर और असरदार नहीं हो पाएगा तो समाज में अराजकता भी बढ़ती जाएगी और मुजरिमों का हौसला भी।
भारत में जहां अब तकरीबन हर बच्चे को स्कूल भेजने की कोशिश होती है, वहां स्कूलों-बच्चों को देह शोषण के बारे में सावधान और जागरूक करने के लिए सबसे अच्छी जगह हो सकती है लेकिन पाखंडी सोच वाले इस देश में जैसे ही सेक्स-शिक्षा शब्द भी हवा में आता है, भारतीय संस्कृति के हिंसक ठेकेदार डंडे-झंडे लेकर इस शब्द को हवा में ही मारने में जुट जाते हैं। ऐसे में कोई बच्चे अपनी देह को लेकर जागरूक नहीं हो पाते। केन्द्र और राज्य सरकारें खुद होकर तो सेक्स-शिक्षा की सोचेंगी नहीं, किसी को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए ताकि सत्तारूढ़ पार्टियां अदालती आदेश की आड़ लेकर सेक्स-शिक्षा लागू कर सकें।
एक आखिरी सवाल हमें सुझाता है ईश्वर के बारे में। जो कण-कण में मौजूद माना जाता है, जो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान माना जाता है, जो सबका भला करने वाला माना जाता है, जिसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता, वह ईश्वर छोटे-छोटे बच्चों के साथ बलात्कार के वक्त कहां रहती है? क्या देखता है? क्या सोचता है? और कुछ करता क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है कि धर्म का नाम लेकर, धार्मिक चोगा पहनकर आसाराम से लेकर पादरियों तक और मौलवियों तक को बच्चों से बलात्कार में शामिल पाया जाता है। नास्तिक लोग तो ईश्वर की हकीकत जानते हैं और अपने बच्चों की खुद हिफाजत करते हैं। लेकिन जो आस्तिक और आस्थावान ईश्वर पर भरोसा करते हुए बैठे रहते हैं, उनको ऐसे मामलों को लेकर अपने-अपने ईश्वरों से सवाल जरूर करना चाहिए।

निराश हिंसक भीड़ का इंसाफ लोकतंत्र खारिज कर देता है

संपादकीय
20 जुलाई 2017


हिमाचल के शिमला में एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के आरोप में फंसे एक नौजवान ने इसी आरोप में फंसे दूसरे नौजवान की पुलिस हिरासत में हत्या कर दी। लेकिन इससे परे भी हिमाचल का शांत इलाका इस बलात्कार-हत्या पर उबला हुआ है, कई दिनों से शिमला बंद चल रहा है, और लोग सड़कों पर हैं। देश में कई और जगहों पर बलात्कार के आरोप में फंसे लोगों पर भीड़ ने हमले किए हैं, कहीं-कहीं हत्या भी कर दी है, और सड़कों पर लोग फैसले कर रहे हैं।
यह पूरा सिलसिला भारत की निचली अदालतों की बेअसर व्यवस्था, और वहां पर मुकदमे ले जाने वाली जांच एजेंसियों की नाकामयाबी का बहुत बड़ा सुबूत है। आज किसी जुर्म को लेकर लोगों के मन में यह भरोसा ही नहीं रहता है कि मुजरिम को सजा हो पाएगी। जांच एजेंसियां भ्रष्ट हैं, उनका काम बहुत कमजोर है, और अदालतों में बिना शक किसी जुर्म को साबित करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। नतीजा यह है कि बलात्कार के मामलों में कुछ फीसदी लोग ही सजा पाते हैं, और बाकी छूट जाते हैं। आम लोगों का, खासकर गरीब और कमजोर लोगों का भारत की निचली न्याय व्यवस्था पर कोई भरोसा नहीं है और इसीलिए लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं। कुछ हफ्ते पहले ही उत्तर भारत की ही एक खबर आई थी कि किस तरह बलात्कार की शिकार जब थाने पर शिकायत करने पहुंची तो उस पर कार्रवाई करने के लिए थाने के लोगों ने उससे सेक्स की मांग की। और यह घटना अकेली नहीं है, जुर्म के शिकार लोगों से रिश्वत की उम्मीद आम बात है, और लोग यह भी जानते हैं कि राज्यों की पुलिस आमतौर पर दोनों पक्षों से वसूली करने में लगी रहती है, और उसी हालत में वह कार्रवाई करती है जब सुबूत चीख-चीखकर बोल रहे हों, और उन्हें अनदेखा करना मुमकिन न हो। इसके बाद निचली अदालतों में खूब भ्रष्टाचार रहता है, और उनकी रफ्तार ऐसी धीमी रहती है कि बरसों तक चलने वाले मुकदमों में बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की लगातार मानसिक यातना चलती है।
जब कानून अपना काम नहीं कर पाता, तब भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेती है। राज्यों को यह देखना होगा कि उनकी पुलिस और जिला स्तर की अदालतें अपना काम ठीक से करें, वक्त पर करें, और जुर्म के शिकार लोगों को इंसाफ मिल सके, और मुजरिमों को सजा मिल सके। जब दस-बीस बरस तक मुजरिमों को सजा नहीं मिल पाती है, तो समाज के बाकी लोगों का भी हौसला जुर्म के लिए बढ़ जाता है। ऐसे में निराश हिंसक भीड़ का इंसाफ लोकतंत्र को खारिज कर देता है, यह एक खतरनाक नौबत है।

गो-हिंसा पर राज्यों को केन्द्र की नसीहत बेमतलब दिखावा

संपादकीय
19 जुलाई 2017


केन्द्र सरकार ने राज्यों को आदेश या निर्देश दिया है कि गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा पर एफआईआर दर्ज की जाए। देश के लिए आज शर्मिंदगी की सबसे बुरी और सबसे बड़ी वजह बन चुकी यह गो-हिंसा क्या ऐसी कागजी बात से थमेगी? यह मामला शर्मनाक है लेकिन फिर भी केन्द्र सरकार के इस निर्देश पर हंसी आती है। इसे एक महान कार्रवाई कहा जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि ऐसी कोई भी हिंसा होने पर हर राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी पुराने चले आ रहे कानूनों के मुताबिक भी बनती ही है कि उन पर एफआईआर कायम हों, और मुजरिमों को पकड़कर केस चलाया जाए। ऐसी हिंसा के मामले में राज्य सरकारों का यह अधिकार ही नहीं है कि वे इसे अनदेखा कर सकें, या बिना कानूनी कार्रवाई मुजरिमों को छोड़ सकें। इसका मतलब यह हुआ कि केन्द्र सरकार का यह कागज महज रद्दी की टोकरी के लायक है। यह कुछ उसी तरह का है कि केन्द्र सरकार राज्यों को लिखकर भेजें कि उनके राज्य में सुबह सूरज निकलेगा, और शाम को डूब जाएगा, सरकारें इस बात का ध्यान रखें।
आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त संसद में एक बड़े वकील रहे हुए एक सांसद इस बात को उठा रहे हैं, और यही तर्क दे भी रहे हैं। केन्द्र सरकार को एक तो समय रहते अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही है। दूसरी तरफ अलग-अलग राज्यों में जब किसी हिंसा के लिए कोई राज्य सरकार या कोई राजनीतिक दल जिम्मेदार रहते हैं, तो केन्द्र सरकार का रूख ऐसे मामलों में अलग-अलग रहता है, और उसमें साफ-साफ भेदभाव दिखता है। अगर गो-हिंसा, गो-गुंडागर्दी, गो-हत्या, गो-अपराध होते हैं, और राज्य सरकारों के मंत्रियों के ऐसे बयान आते हैं जो कि मुजरिमों पर कार्रवाई के बजाय घुमा-फिराकर हिंसा के शिकार लोगों पर और हिंसा के लायक दिखते हैं, तो केन्द्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह राज्यों को फटकार लगाए। लेकिन खुद केन्द्र के मंत्री ऐसी गैरजिम्मेदारी करते दिखते हैं, और शब्दों से परे केन्द्र सरकार का रूख किसी कड़ी कार्रवाई का नहीं है।
जब सड़कों पर गौरक्षा के नाम पर हत्याएं हुए हफ्ते या महीने गुजर जाते हैं तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दार्शनिक अंदाज के कुछ मसीहाई शब्द सामने आते हैं, जो कि तब तक बेअसर हो चुके रहते हैं। लेकिन जब ऐसा चलते रहता है, जब कत्ल के बाद कफन-दफन के बीच का वक्त रहता है, तब प्रधानमंत्री का कोई बयान नहीं आता, उनकी कोई ट्वीट नहीं आती। ऐसे ही रूख के बारे में हम पहले भी यहां लिख चुके हैं कि जब हफ्तों-महीनों बाद वे कुछ कहते हैं, तो वह बहुत कम, और बहुत देर से कहा हुआ पूरी तरह बेअसर बयान रहता है। संसद का सत्र आने के ठीक पहले प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में इस बारे में अफसोस जाहिर करते हुए राज्यों से कार्रवाई के लिए कहा था, लेकिन यह तो वैसे भी राज्यों की जिम्मेदारी बनती थी। आज जब संसद में इस पर बहस चल रही है, तो उसी वक्त विश्व हिन्दू परिषद का एक बयान आ रहा है जिसमें वह गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से इस्तीफा मांग रही है क्योंकि पर्रिकर ने बीफ के बारे में अभी यह कहा था कि वे अपने प्रदेश में बीफ की कमी नहीं होने देंगे। पर्रिकर के अलावा तकरीबन पूरा उत्तर-पूर्व भी बीफ के हक को छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं, और इसके लिए वहां के भाजपा के नेता पार्टी भी छोड़ दे रहे हैं। इस बहस के बीच केन्द्र सरकार के सामने यह दिक्कत भी खड़ी है कि पशु कारोबार की उसकी अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक दिया है।
कुल मिलाकर बात यह है कि केन्द्र की सत्तारूढ़ भाजपा जिस अंदाज में देश भर में बीफ पर रोक को लागू कर रही है, उससे एक हिंसक हौसला पाकर गौरक्षा के नाम पर कत्ल करने वाले मुजरिम खुलकर सड़कों पर हैं, और करोड़ों दलित-अल्पसंख्यक बेरोजगार हो रहे हैं, दहशत में जी रहे हैं, हिंसा का शिकार हो रहे हैं। केन्द्र सरकार की गाय इस देश की अर्थव्यवस्था को दिक्कतों की वैतरणी पार कराते नहीं दिख रही है, बल्कि वह मंझधार में इस देश के साथ-साथ खुद भी डूब मर रही है। भूखे और आत्महत्या करते किसानों के पास अपने जानवरों को खिलाने का पैसा भी नहीं बचा है, क्योंकि वे आखिर में जाकर उन्हें अब बेच भी नहीं सकते। गो-हिंसा के तमाम मामले सरकारी रूख से उपजे हुए हैं, और राज्यों को एफआईआर की नसीहत देने का कोई असर होने वाला नहीं है, और इस दिखावे की कोई जरूरत भी नहीं है।

पेड़ लगाने के साथ-साथ यह हिसाब गिनाने की जरूरत कि पिछले पेड़ों का क्या हुआ?

संपादकीय
18 जुलाई 2017


बारिश का मौसम आता है और पूरे हिंदुस्तान में जगह-जगह पेड़ लगाने का अभियान शुरू हो जाता है। साल में कभी पेड़ लगाने का अभियान चलता है तो कभी साल में एक बार पर्यावरण पर फिक्र का जलसा होता है। और साल के हर दिन उसको बर्बाद करने का सिलसिला चलता है। एक बड़ी अजीब सी बात है कि पर्यावरण की बात करें तो पहली तस्वीर दिमाग में जंगल की बनती है, और आज पर्यावरण सबसे अधिक बर्बाद इंसान के जंगली रूख से हो रहा है। जंगल का रूख जंगल के जानवरों के लिए ठीक रहता है। वहां पर सबसे ताकतवर अपने से नीचे के लोगों को काबू में रखते हैं, और अपनी जरूरत के मुताबिक उनको खाते-पीते हैं। जो जानवर दूसरे जानवरों को नहीं खाते, वे भी घास-पत्तों को खाते हैं, और उनकी बिरादरी में भी ताकत का बोलबाला होता है। इंसान ने जंगल के जानवरों से सबसे ताकतवर के राज वाला रूख तो ले लिया है, लेकिन उसे जब इंसानी हवस के साथ जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है, तो धरती तबाह हो जाती है, हो रही है, हो चुकी है।
आज सबसे संपन्न और सबसे ताकतवर देश और इंसान दुनिया के प्राकृतिक साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के सबसे गरीब और कमजोर देशों और लोगों का धरती पर जो बराबरी का हक होना चाहिए, उसे मानो जंगल के ताकतवर जानवरों के अंदाज में संपन्न लोग छीन लेते हैं, और धरती को निचोड़कर रख देते हैं। आज अमरीका में सामानों की प्रति व्यक्ति खपत को देखें, तो अफ्रीका और भारत जैसे देशों के सौ-सौ लोगों जितनी खपत अमरीका के एक-एक इंसान की होगी। और अब जंगलों को, तेल के कुओं को, जमीन और पानी को जंगल सरीखे बाहुबल से हासिल करने की जंग चल रही है, फर्क यही है कि जंगल के जानवर अपनी अगली पीढिय़ों के लिए इमारतें नहीं छोड़ जाते। इंसान अपने दिमाग का खूंखार इस्तेमाल करते हुए दूसरों से छीने हुए हकों से अपनी तिजोरियां भी भरते हैं।
पर्यावरण की सारी बातें अपने से नीचे के लोगों को पर्यावरण बचाने की नसीहत देने वाली होती है। अपने इस्तेमाल को कम करने वाले लोग कम ही होते हैं, कम से कम ताकतवर तबकों में तो बिल्कुल ही नहीं होते। नतीजा यह होता है कि ताकत से हासिल अधिक से अधिक साधन और सुविधाओं के अधिक से अधिक इस्तेमाल से खपत आसमान पर पहुंच जाती है, और धरती लहूलुहान हो जाती है। मुंबई में मुकेश अंबानी का 27 मंजिला घर बनता है और उसमें इतनी बिजली लगती है कि गरीबों की दर्जनों बस्तियां उतने में रौशन हो जाएं। भारत जैसे लोकतंत्र में जब कोई कारखानेदार कंपनियों के खर्च पर, तो सरकारों में बैठे लोग जनता की जेब से हिंसक अंदाज में अपने लिए साधन जुटाते हैं, तो वे जरूरत से कई गुना अधिक फिजूलखर्ची करते हैं। और यह सब दुनिया में फैल चुकी पूंजीवादी व्यवस्था के गुलाम बने लोकतंत्र में बढ़ते ही चल रहा है।
दुनिया के प्राकृतिक साधनों पर जब कोई देश फौजी हमले से फिल्म अवतार की तरह कब्जा करने में लगा हुआ है, तो ऐसी जंग के बाद कब्जे में आए प्राकृतिक साधनों को और अधिक बेदर्दी से खर्च किया जाएगा। अमरीका जैसे पर्यावरण के दुश्मन देश अपने फौजी विमानों से बमों के साथ जिस लोकतंत्र को दूसरे देशों पर बरसाते हैं, वे उन गरीब देशों, या असहमत देशों की कुदरती दौलत को कब्जाने की नीयत से ऐसा करते हैं। जंग के बाद भी लूट के माल को बेरहमी से ही खर्च किया जाता है। इसलिए आने वाले दिन कमजोर देश और लोग पर्यावरण की चर्चा करते गुजारेंगे, और बाहुबली देश और लोग पर्यावरण पर, प्राकृतिक साधनों पर दूसरों के हकों को छीनकर बेहिसाब फिजूलखर्ची के साथ गुजारेंगे।
इस माहौल में पर्यावरण की सालाना फिक्र के जलसे की क्या अहमियत है, और सजावटी पेड़ों को लगा-लगाकर उन्हें मरने के लिए छोड़कर क्या हासिल किया जा सकेगा? छत्तीसगढ़ में अभी सरकार पूरे प्रदेश में पेड़ लगाने का अभियान शुरू कर रही है। इस मौके पर उसे पहले तो एक श्वेतपत्र प्रकाशित करना चाहिए कि राज्य बनने के बाद से अलग-अलग बरस में कितने पेड़ लगाए, और आज उनमें से कितने बचे हैं? इसके साथ-साथ इंसानों को यह भी सोचना पड़ेगा कि सामानों की फिजूलखर्च और धरती की बर्बादी की उसकी रफ्तार को क्या तस्वीरें खिंचवाने के लिए लगाए जाते पेड़ रोक पाएंगे? इस मौके पर यह याद दिलाना भी गलत नहीं होगा कि सजावटी और बाहरी नस्लों के महंगे पेड़ लगाने के बजाय सरकार को सिर्फ देशी और स्थानीय नस्लों के बड़े पेड़ लगाने चाहिए जो रख-रखाव नहीं मांगते और लंबा जिंदा रहते हैं। यह भी सोचने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में जगह-जगह बनाए जा रहे ऑक्सीजोन नाम के सघन वृक्षारोपण से पैदा होने वाली ऑक्सीजन शहरी गाडिय़ों के अंतहीन धुएं के साथ कब तक मुकाबला कर पाएंगी?

सरकारी कॉलेज में यौन शोषण, सरकार, महिला आयोग चुप

संपादकीय
17 जुलाई 2017


छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी महिला महाविद्यालय में बहुत सी छात्राओं की यह शिकायत सामने आई है कि एक प्राध्यापक लगातार उनसे लंबे समय से अश्लील व्यवहार करते आ रहे हैं। अब बहुत सी छात्राओं की शिकायत के बाद जोगी कांग्रेस ने इसे एक आक्रामक आंदोलन के रूप में उठा लिया है, और रोज प्रदर्शन हो रहे हैं। दूसरी तरफ खबर है कि इस मुद्दे पर कॉलेज एक जनसुनवाई कर रहा है ताकि जिन लड़कियों को शिकायत हो वे सामने आ सकें।
लड़कियों या महिलाओं के यौन शोषण की शिकायतों पर कॉलेज का यह रूख समझ से परे है। पहली बात तो यह कि अगर लंबे समय से किसी एक प्राध्यापक के खिलाफ ऐसी शिकायतें चली आ रही थीं तो इसके पहले कॉलेज में कार्रवाई क्यों नहीं की? देश का कानून इस बारे में बड़ा ही सख्त है, और पहली शिकायत पर ही वह जांच कमेटी को अनिवार्य कर देता है। ऐसे में किसी मामले को महज इसलिए टालते जाना कि प्राध्यापक के बड़े ऊंचे राजनीतिक रिश्ते हैं, यह सत्तारूढ़ पार्टी के लिए एक बड़ी बदनामी और शर्मिंदगी की बात भी है। दूसरी हैरानी यह है कि सत्तारूढ़ भाजपा के छात्र संगठन, उसका महिला मोर्चा भी अब तक चुप बैठे हुए हैं। राज्य की महिला आयोग तक शिकायत पहुंचीं, लेकिन उसकी भी कोई कार्रवाई अब तक सुनाई नहीं पड़ी है। फिर अगर कॉलेज किसी प्राध्यापक द्वारा की जा रही यौन प्रताडऩा या यौन शोषण की शिकायतों को सच में ही सुनना चाहता है तो उसे तो गोपनीय रूप से बंद कमरे में ही सुना जा सकता है, ये शिकायतें बिजली-पानी की बिल की शिकायतें नहीं हैं जिसके लिए जनसुनवाई की जाए। ऐसी शिकायतों को कौन सी लड़की या महिला एक कार्यक्रम में पहुंचकर सामने रख सकती हैं, और कैसे कॉलेज इन शिकायतों को एक आयोजन में सुन सकता है? यह बताता है कि प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी महिला महाविद्यालय भी महिलाओं के शोषण के मामले में पूरी तरह से गैरजिम्मेदार है।
हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार, प्रदेश की हाईकोर्ट, और राष्ट्रीय स्तर पर महिला आयोग को दखल देना चाहिए, क्योंकि प्रदेश का महिला आयोग कुछ करते दिख नहीं रहा है। इस मामले को एक राजनीतिक आंदोलन की तरह कॉलेज के गेट पर रोज चलने देना शर्मनाक है। ऐसी शिकायतों पर कॉलेज को तुरंत ही प्राध्यापक को छुट्टी पर भेज देना चाहिए, और उच्च शिक्षा विभाग को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए प्राध्यापक को तुरंत हटा देना चाहिए। इसके बाद पुलिस और सरकार की दूसरी एजेंसियों की भी जिम्मेदारी है कि वे लड़कियों के इस हौसले को देखते हुए जरूरी कानूनी कार्रवाई करें। एक तो भारत में महिलाओं और लड़कियों के लिए ऐसा माहौल नहीं रहता कि वे इस तरह की शिकायतें करने का हौसला दिखाएं, और जब ऐसी शिकायत पर महज राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई नहीं होती है, तो उससे आगे फिर दूसरी लड़कियों या महिलाओं का शिकायत का हौसला खत्म हो जाता है। प्रदेश में महिला मुद्दों को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाने वाले लोगों को आगे की कानूनी पहल करनी चाहिए।