दाऊद-प्रेमी मंत्री-विधायक पर भाजपा कुछ करेगी?

संपादकीय
26 मई 2017


महाराष्ट्र की खबर कुछ परेशान करती है कि वहां कुख्यात मुजरिम दाऊद इब्राहिम के परिवार की शादी में महाराष्ट्र के एक मंत्री, कुछ विधायक, और कई पुलिसवाले शामिल हुए। दाऊद की पकड़ और उसकी ताकत हमेशा से इतनी रहती आई है कि ऐसे बहुत से लोग और बहुत से फिल्मी कलाकार, गायक, दाऊद के जन्मदिन पर दुबई जाकर नाचते-गाते रहे हैं, और देश के बड़े-बड़े क्रिकेट सितारे दाऊद की मेहमाननवाजी पाते रहे हैं। लेकिन महाराष्ट्र का एक भाजपा मंत्री और भाजपा के कई विधायक, स्थानीय नेता, और पुलिसवाले दाऊद के घर की दावत में पहुंचते हैं, तो भाजपा और शिवसेना के हाथ से दाऊद के खिलाफ एक मुद्दा निकलता है और देश के अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिमों के पाकिस्तान-परस्त होने के हिन्दूवादी हमले खारिज होते दिखते हैं।
सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उनके अगल-बगल मंच पर आकर कोई खड़े हो जाएं तो यह अलग बात है, लेकिन जब ऐसे प्रमुख लोग किसी समारोह में जाकर शामिल होते हैं, तो यह नहीं माना जा सकता कि वे उस परिवार की साख से अनजान रहे होंगे। जब दाऊद के सारे रिश्तेदारों पर नजर रखी जा रही है तो ऐसे में महाराष्ट्र के इतने नेता-अफसर इस रिश्तेदारी से अनजान नहीं हो सकते। ऐसे में कांग्रेस के एक प्रवक्ता को देश को यह याद दिलाने का मौका मिल गया है कि एक तरफ तो ब्रिटेन मैनचेस्टर में अभी हमला करने वाले एक मुस्लिम नौजवान के रिश्तेदारों को भी दो दिनों में लीबिया से पकड़कर ला चुका है, और दूसरी तरफ दाऊद इब्राहिम को पकडऩे के सारे दावों के बावजूद अब तक भारत सरकार उसकी पाकिस्तान में मौजूदगी भी साबित नहीं कर पाई है। मोदी सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर महाराष्ट्र में उसके लिए यह बड़ी शर्मिंदगी की बात है कि उसके नेता देश की भावनाओं की इस कदर अनदेखी कर रही है। कुछ लोगों का यह तंज कसना भी जायज है कि अगर महाराष्ट्र के इस हिन्दू भाजपाई मंत्री और हिन्दू भाजपा विधायकों की जगह किसी और पार्टी के मुस्लिम नेता अगर दाऊद के परिवार की दावत में पहुंचे होते, तो उन्हें और उनकी पार्टी को देश के गद्दार करार देकर पाकिस्तान जाने के लिए कह दिया जाता।
यह बात सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं है, और सिर्फ भाजपा के साथ नहीं है, पूरे देश में अधिकतर पार्टियों के नेताओं के आसपास सत्ता के दलाल, तरह-तरह के मुजरिम, और तरह-तरह की संदिग्ध साख वाले लोग ही अधिक मंडराते दिखते हैं। छत्तीसगढ़ में ही हम देखते हैं कि कई मंत्रियों के निजी स्टॉफ के लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के अंधाधुंध मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन उन मंत्रियों को ऐसे ही निजी सहायक पसंद आते हैं, और मीडिया या जनचर्चा को हिकारत से देखते हुए मंत्री या दूसरे नेता अपने निजी सहायकों को कायम रखते हैं। आम चर्चा यह भी रहती है कि ऐसे कर्मचारी दलालों की तरह काम करने लगते हैं, और कुछ बरस पहले यह भी सुनाई पड़ा था कि भाजपा संगठन ऐसे निजी कर्मचारियों को हटाने वाली भी थी, लेकिन हमें ऐसा एक भी कर्मचारी हटते नहीं दिखा। सत्ता का मिजाज ही कुछ ऐसा रहता है कि उसके इर्द-गिर्द सत्ता के दलाल जुट जाते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि गुड़ के टुकड़े पर मक्खियां मंडराने लगती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को चाहिए कि पूरे देश में अपनी पार्टी के लोगों के चाल-चलन को लेकर एक आचार संहिता बनाएं, और दलालों-मुजरिमों से अपनी सरकारों को बचाकर रखें। सत्ता के तीन बरस पूरे होने पर भाजपा देश भर में कम से कम यह एक बड़ा और कड़वा फैसला ले सकती हैं। अभी भी भाजपा के भीतर सच या गलत, पता नहीं जैसी भी हो, ऐसी साख है कि मोदी और शाह की नजर देश भर में पार्टी के लोगों पर बनी रहती है। महाराष्ट्र के दाऊद-प्रेमी अपने नेताओं, और देश भर के अपने दलाल-प्रेमी मंत्रियों पर तीन बरसके बाद भी अब तक उनकी नजर पड़ी हो ऐसा दिखता नहीं है।

उत्तरप्रदेश के हाईवे पर फिर मुसाफिरों से गैंगरेप, हत्या

संपादकीय
25 मई 2017


उत्तरप्रदेश में कुछ महीने पहले एक हाईवे पर कार रोकी गई थी, और लूटने के अलावा मुजरिमों ने कार में सफर कर रही महिलाओं से बलात्कार भी किया था। उस वक्त वहां समाजवादी पार्टी का राज था, और उस पर अपराधों को लेकर बेअसर होने की तोहमतें लगी थीं। अब उत्तरप्रदेश में भाजपा का योगीराज है, और पुलिस के अफसर भी दर्जनों के भाव में बदले जा चुके हैं, लेकिन अभी फिर वैसा ही एक जुर्म हुआ, और एक गाड़ी के चक्के पर गोली मारकर उसे रोका गया, बंदूक की नोंक पर चार महिलाओं से बलात्कार हुआ, उन्हें लूटा गया, और साथ में चल रहे परिवार के एक आदमी ने जब विरोध किया, तो उसका कत्ल कर दिया गया।
यह नौबत देश के किसी भी हिस्से के लिए बहुत भयानक है, क्योंकि सड़कों के रास्ते जो लोग सफर करते हैं, वे तो रात-दिन किसी भी वक्त किसी भी प्रदेश से गुजरते हुए आते-जाते हैं, और अगर ऐसे जुर्म देश के बाकी हिस्सों में बाकी लोगों के साथ होने लगें, तो लोगों की आवाजाही ठप्प ही पड़ जाएगी। दूसरी तरफ हरियाणा में भाजपा के राज में ही पिछले बरस जब जाट आंदोलन चल रहा था, तो उसमें रास्ते रोके गए थे, और एक कार से महिलाओं को उतारकर ले जाकर खेत में उनके साथ बलात्कार किया गया था। सरकार ने सरकारी मिजाज के मुताबिक बहुत समय तक ऐसे बलात्कार का खंडन किया था, लेकिन आखिर में जाकर सभी तरह की जांच में यह कायम हुआ, और बलात्कार की शिकार महिलाएं अपनी शिकायत पर कायम भी रहीं।
समाज में कमजोर तबकों को सबक सिखाने के लिए, उनका अपमान करने के लिए, किसी जाति से टकराव के चलते, या किसी धर्म से नाराजगी की वजह से हिन्दुस्तान में जगह-जगह बलात्कार को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसे पारिवारिक बदला निकालने के लिए, या कि जमीन-जायदाद के झगड़े के चलते हुए भी हथियार बनाया जाता है। लोगों को याद होगा कि उत्तरप्रदेश में एक कुख्यात डकैत रही, और बाद में सांसद बनी फूलन की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी कि पहले उसके साथ बलात्कार किया गया था, और फिर इसका बदला चुकाने के लिए उसने डकैत गिरोह बनाकर बलात्कारी-समुदाय की महिलाओं से थोक में बलात्कार करवाया था, हत्याएं करवाई थीं। यह बात सिर्फ हिन्दुस्तान में हो, ऐसा भी नहीं है। बहुत से देशों के बीच जब लड़ाईयां होती हैं, तब दुश्मन कहे जाने वाले देश की महिलाओं के साथ फौजियों का ऐसा सुलूक आम है। जो दुश्मन नहीं हैं, उनके साथ भी कई बार फौज इसी तरह का बर्ताव करती हैं। फौज के अलावा सुरक्षा बलों पर भी ऐसे आरोप लगते हैं, और भारत में भी मणिपुर से लेकर मिजोरम तक, और कश्मीर से लेकर बस्तर तक सुरक्षा बलों पर बलात्कार के आरोप लगते हैं कि उन्होंने हथियारबंद आंदोलनकारियों के हमलों का हिसाब चुकता करने के लिए स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार किया।
यह भारत और बाकी दुनिया की महिलाओं के प्रति सोच का एक सुबूत और संकेत है। महिलाओं को बदला लेने के लिए एक सामान की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और हिसाब चुकता किया जाता है। लोकतंत्र तो आ गया, लोगों में यह खुशफहमी भी आ गई कि वे सभ्य हो गए हैं, लेकिन उनके भीतर की मर्दानी-हिंसा कहीं नहीं गई, और जगह-जगह बलात्कार हो रहे हैं। और तो और अभी हमने सीरिया और इराक जैसे देशों में यह देखा है कि ईश्वर और धर्म का नाम लेकर आतंक करने वाले इस्लामी संगठन लगातार महिलाओं को गुलाम बनाकर उनके साथ बरसों तक बलात्कार को धर्म के मुताबिक काम साबित करते हैं। और दुनिया भर में होने वाले ऐसे अनगिनत बलात्कार के पीछे धर्म की कायम की हुई उस व्यवस्था का भी बहुत बड़ा हाथ है जिसके तहत मर्द को औरत से बेहतर और ऊपर बताया जाता है। दुनिया में एक भी शंकराचार्य, एक भी पोप, एक भी मुल्ला-मौलवी महिला नहीं हैं, और धर्म ने महिलाओं को शोषण के सिवाय कुछ दिया भी नहीं है। यही वजह है कि धर्म को मानने वाले लोगों की नजरों में औरत हमेशा से ही दूसरे दर्जे की नागरिक रहती हैं, और यह सोच धीरे-धीरे बलात्कारी होने लगती है, जरूरी नहीं है कि यह धार्मिक रीति-रिवाज के साथ, और धर्म की चर्चा के साथ किया गया आईएस जैसा बलात्कार हो, किसी आम मुजरिम का किया हुआ बलात्कार भी धर्म से उपजी उसकी मर्दाना सोच की वजह से होता है, और जब तक दुनिया में धर्मान्धता को बढ़ाया जाता रहेगा, तब तक लोकतंत्र का, इंसाफ का, महिलाओं का इसी तरह का नुकसान जारी रहेगा।
उत्तरप्रदेश का यह ताजा सामूहिक बलात्कार बताता है कि वहां सरकार तो बदल गई है, लेकिन मुजरिमों के हौसले नहीं बदले हैं, वे उसी तरह कायम हैं, और अब कई और किस्म के धार्मिक मुजरिम बढ़ जरूर गए हैं जो कि अपने धर्म और संस्कृति को दूसरे लोगों पर थोपने के लिए उनके तरह-तरह के हिंसक और पाखंडी रूप का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की साख के लिए एक बड़ी चुनौती है, और इससे उत्तरप्रदेश की साख चौपट भी होती है, वहां जाने, बसने, काम करने के पहले लोग सौ बार सोचेंगे कि अपने परिवार को खतरे में क्यों डालें।

छंटनी के इन दिनों में कर्मचारियों को सलाह

संपादकीय
24 मई 2017


भारत में सरकार के दावे चाहे जो हों चारों तरफ से छंटनी की खबरें आ रही हैं। कुछ तो अमरीका की वजह से आईटी से जुड़ी नौकरियां वहां भी कम हो रही हैं, और उसके असर से हिन्दुस्तान में भी कम हो रही हैं, लेकिन वही अकेली जगह नहीं हैं। आज खबर आई है कि टाटा मोटर्स मैनेजमेंट के स्तर पर पंद्रह सौ लोगों की छंटनी कर रहा है। और यह छंटनी मजदूरों की नहीं है, मैनेजरों की है। इससे परे भी बहुत सी छोटी और मझली कंपनियों और दूसरे तरह के कारोबार में लगातार नौकरियां घट रही हैं, बढ़ तो कहीं नहीं रहीं। ऐसे में सभी कामगारों को अपने काम को बचाने की फिक्र करनी चाहिए।
दरअसल किसी भी संस्थान में जब किसी को नौकरी से हटाने की बात आती है, तो जो सबसे निकम्मे कर्मचारी रहते हैं, उनकी बारी सबसे पहले आती है। इसलिए सारे कामगारों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि अगर नौकरी उनके लिए मायने रखती है, तो उनको मेहनत और ईमानदारी से मैनेजमेंट के सामने अपनी ऐसी साख बनाए रखना चाहिए कि उनकी नौकरी जाने की बारी सबसे आखिर में आए। अब अगर किसी कंपनी ने उत्पादन ही घट जाए, कारोबार ठंडा हो जाए, तो एक अलग बात है, लेकिन ऐसा न होने पर काबिल लोगों को निकालने के बारे में कोई मैनेजमेंट नहीं सोचता है। नौकरी के साथ, और खासकर भारत जैसे देश में जहां पर लोग रातों-रात हटाए नहीं जा सकते, वहां पर कर्मचारियों की सोच नौकरी के हमेशा जारी रहने की हो जाती है। और ऐसा होता नहीं है। देश के मजदूर कानून बहुत मजबूत नहीं है, तो कमजोर भी नहीं है। लेकिन कानूनों पर अमल इतना कमजोर है कि मैनेजमेंट लोगों को आसानी से निकाल देता है, और बरसों तक कर्मचारी अपना बकाया भी वसूल नहीं कर पाते, मुआवजा तो दूर की बात है।
नौकरी लंबी होने से और उसकी निश्चिंतता होने से एक दिक्कत यह होती है कि कर्मचारी अपने काम को बेहतर बनाने को भूल ही जाते हैं। आज किसी भी कामकाज में टेक्नालॉजी का दखल इतना बढ़ रहा है, और लगातार बदल रहा है, कि जो लोग नई मशीनों पर, नए कम्प्यूटरों पर काम करना नहीं सीख पाते, उन्हें मैनेजमेंट अपनी छाती पर बोझ मानकर चलता है। यह सिलसिला बहुत लंबा नहीं चल पाता और ऐसे लोग जो कि वक्त के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पाते हैं, वे नौकरी खो बैठने का खतरा पाले रखते हैं। आज दुनिया में तेल का भाव जमीन पर है, इसलिए बाकी बहुत से कारोबार अभी भी ऊंचाई पर हैं। अगर पेट्रोलियम महंगा होगा, तो भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी, और ऐसे बुरे वक्त के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए, नौकरी देने वालों को भी, और नौकरी पाने वालों को भी। बुरे वक्त में अच्छे-अच्छे मालिक का हौसला जवाब दे जाता है, और कर्मचारियों को कहीं भी काम नहीं मिल पाता। इसलिए हर किसी को अपने काम को बेहतर बनाकर अपनी नौकरी की गारंटी बनाकर रखना चाहिए।

कश्मीर के जख्मों पर हिंदू-राष्ट्रवादी नमक

संपादकीय
23 मई 2017


ट्विटर पर लगातार हिंदू आक्रामकता के साथ लिखने वाले फिल्म अभिनेता परेश रावल ने कल ही यह कहा कि कश्मीर में जिस तरह जीप के सामने पत्थरबाज को बांधा गया था, उसके बजाय लेखिका अरुंधति राय को बांधना चाहिए था। उनकी इस ट्वीट पर बड़ा बवाल हुआ, लेकिन घोर साम्प्रदायिकता, और आक्रामक राष्ट्रवाद के हिमायती इस बात पर बड़े खुश हो गए। अरुंधति राय पर यह आरोप लगते हैं कि वे नक्सलियों की साथी हैं, और कश्मीर के विभाजन की हिमायती हैं। खैर अरुंधति का जो कहना है, वह तो पूरा का पूरा मंच और माईक से कहा हुआ है, या कि लिखा हुआ है। लेकिन जब देश का कानून अब तक अरुंधति को कोई सजा नहीं दे पाया है, या कि ये कहें कि देश की या प्रदेश की सरकारें अरुंधति को सजा नहीं दिला पाई हैं तो क्या उनके बारे में ऐसी हिंसक बात लिखना ठीक है? और दूसरी बात यह भी कि परेश रावल की कही हुई यह बात एक किस्म से कश्मीर में फौज की उस कार्रवाई को सही भी ठहराती है जिसमें उसने एक कश्मीरी नौजवान को जीप के सामने बांधकर आक्रामक पत्थरबाजों के बीच से सुरक्षित निकलने का काम किया था। इसके बाद फौज की इसको लेकर आलोचना हुई थी, लेकिन सरकार ने इस कार्रवाई को सही ठहराया था, और दुनिया को हैरान करते हुए भारतीय सेना ने ऐसा करने वाले अपने मेजर का कल एक पदक देकर सम्मान भी किया है।
यह पूरा सिलसिला बहुत घातक है, और परेश रावल जैसे कमअक्ल वाले बड़बोले-बकवासी चर्चित व्यक्ति जैसी ही समझ वाली फौज का सुबूत भी है। एक तरफ तो फौज अपनी सारी ताकत के बावजूद कश्मीर को काबू में नहीं रख पा रही है, और दूसरी ओर हालत यह है कि कश्मीर के जख्मों पर एक तरफ आक्रामक हिंदुत्ववादी ऐसा नमक छिड़क रहे हैं कि वह बाकी भारत से कभी मन न मिला पाए, दूसरी तरफ जो फौज कश्मीर में तैनात है, वह खुद अपनी ऐसी अलोकतांत्रिक और हिंसक कार्रवाई करने वाले अफसर को सम्मानित कर रही है। हो सकता है कि यह सम्मान किसी और बहादुरी की वजह से हो, लेकिन यह सम्मान कश्मीर को और जख्मी करने वाला है, उसे और अलग-थलग करने वाला है।
देश के बहुत से समझदार और अलग-अलग तबकों का यह मानना है कि कश्मीर को जोड़कर रखने के लिए कोई जरूरी बात तो हो नहीं रही है, लगातार उसे बाकी देश से तोडऩे की हरकत चल रही है। कश्मीर हिंदुस्तान की धरती का एक टुकड़ा भर नहीं है, वह इंसानों की आबादी भी है, और वह पाकिस्तान के साथ जुड़ी हुई सरहद पर बसा हुआ प्रदेश है जो कि बाकी तमाम बातों से परे, हिंदुस्तानी फौजी जरूरतों के हिसाब से भी बहुत अहमियत रखता है। भारत सरकार को तुरंत अपनी कश्मीर-नीति के बारे में सोचना चाहिए, देश के बहुत से जानकार लोगों का यह मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के बाद कश्मीर का इतना खराब हाल बीच में कभी नहीं था।

भ्रमचारी-बलात्कारियों का हौसला ठंडा करने का तरीका कुछ हिंसक जरूर है...

आजकल
22 मई 2017
केरल से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है कि बाईस बरस की एक युवती ने अपने घर पर आए हुए एक हिन्दू, भगवाधारी स्वामी के बलात्कार से थककर चाकू से उस स्वामी का गुप्तांग काट दिया, और मर्दानगी की उसकी शान को चौपट कर दिया। इसके बाद उसने खुद होकर पुलिस को खबर की, और अब उसे केरल के जागरूक समाज से लेकर मुख्यमंत्री तक की वाहवाही मिल रही है। इस स्वामी का उस घर में दाखिला इस लड़की के पिता के इलाज के नाम पर हुआ था, और वह पिछले आठ बरस से इससे बलात्कार करते आ रहा था। जाहिर है कि यह सिलसिला तब शुरू हुआ जब यह लड़की नाबालिग बच्ची रही होगी, और जब उसका बर्दाश्त जवाब दे गया, तब उसने आत्मरक्षा में यह हिंसक कार्रवाई की है। इस स्वामी को केरल के एक बहुत ताकतवर हिन्दू संगठन से जुड़ा हुआ बताया गया है और सुबूत में ऐसी दर्जनों तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आ रही हैं जिनमें यह स्वामी इस हिन्दू ऐक्य वेदी नाम के संगठन के लोगों को लेकर वहां के मुख्यमंत्री से भी मिल रहा है, और इस संगठन के दूसरे कार्यक्रमों में भी शामिल है।
यह मामला महज हिन्दू धर्म तक सीमित नहीं है क्योंकि हम लगातार ऐसी खबरें भी देखते और छापते आ रहे हैं जिनमें पश्चिम के देशों में जहां कानूनी जागरूकता और अधिकार अधिक हैं, वहां पर चर्च के पादरी छोटे-छोटे बच्चों का देह-शोषण करते हैं, और जब ऐसे मामले उजागर भी होते हैं, तो कैथोलिक समुदाय के दुनिया के मुखिया पोप की तरफ से उन्हें माफी भी मिल जाती है, और चर्च उन्हें कानून के हवाले नहीं करता। अमरीका की एक दूसरी घटना को भी इसी सिलसिले में याद करना जरूरी है जिसमें इस्कॉन नाम के बहुचर्चित हिन्दू संगठन के एक हॉस्टल में बच्चों का देह-शोषण किया गया, और उसके एवज में अदालत से बाहर मामले को निपटाने के लिए इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का भुगतान किया।
दरअसल धर्म से जुड़े हुए संगठनों के साथ यह दिक्कत हमेशा इसलिए बनी रहेगी कि बहुत से धर्मों में बहुत किस्म के काम करने वाले स्वामी, पादरी, या इसी तरह के दूसरे लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे ब्रम्हचारी रहेंगे, शादी नहीं करेंगे, और पूरा जीवन, पूरी ताकत ईश्वर की सेवा में लगा देंगे। धर्म से परे कुछ एक आध्यात्मिक संगठन, या कि योग-ध्यान से जुड़े हुए कुछ संगठनों में भी ऐसे लोग रहते हैं जो कि शादी नहीं करते।
हमारा तजुर्बा यह है कि ऐसे लोग शादी तो नहीं करते, लेकिन बर्बादी बहुत करते हैं। और चूंकि इनकी पहुंच पेशेवर वेश्याओं तक नहीं रहती, इसलिए ये लोग आसपास के बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं, या कि आस्थावान महिलाओं को दबोचते हैं। ब्रम्हचर्य की पूरी की पूरी सोच प्रकृति के खिलाफ है। करोड़ों साल से विकसित होकर बना हुआ मानव शरीर कई तरह की जरूरतों को लेकर इस शक्ल में आया है, और इनमें से भूख और प्यास की तरह ही सेक्स एक बड़ी जरूरत है। जो कोई ब्रम्हचर्य मानने की बात तय करते हैं, उनको खुद को इस बात का अंदाज नहीं रहता कि उनके इस फैसले के खिलाफ उनके तन-मन कब-कब बागी हो जाएंगे, और किस हद तक उनको परेशान करेंगे। लेकिन होता यह है कि सार्वजनिक रूप से जब एक बार सांसारिकता को छोड़कर लोग धर्म या आध्यात्म में शामिल हो जाते हैं, अलग-अलग रंग के चोले पहन लेते हैं, तो फिर उन्हें वहां से बाहर निकलना आसान भी नहीं लगता , क्योंकि वह बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात होगी।
हमारा यह भी देखा हुआ है कि जिन धर्मों में जिन भूमिकाओं के लिए लोगों की शादी पर रोक नहीं होती है, वैसे लोग बलात्कार या यौन शोषण कम करते हैं, उनके मामले कम सामने आते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि प्रकृति ने तन-मन की जो जरूरतें बनाई हैं, उनके पूरे होने का कोई साधन उनके पास रहता है, और अपनी न्यूनतम जरूरतों के पूरा होने पर अगर वे संतुष्ट रह पाते हैं, तो यह संभावना अधिक रहती है कि वे अपने आप पर अधिक काबू भी पा सकें। दूसरी तरफ जिन लोगों को ब्रम्हचारी रहने की मजबूरी रहती है, उनके तन-मन उन्हें ईश्वर या आध्यात्म से परे दूसरी तन की तरफ धकेलते रहते हैं, और मासूम बच्चे उनके शिकार होते हैं, अपने परिवार या जीवन से निराश होकर आई हुई आस्थावान महिलाएं अपनी कमजोर या नाजुक मानसिक हालत की वजह से जल्द ही उनकी शिकार हो जाती हैं।
धर्म सेक्स के खिलाफ बहुत सी बातें कहता है, वह सेक्स को मोटे तौर पर केवल मानव जीवन के आगे बढ़ाने के काम के रूप में देखता है, और बाकी तमाम जरूरतों को अनदेखा करता है। हर धर्म में काम वासना के खिलाफ बहुत सारी बातें लिखी जाती हैं, और हिन्दू धर्म सहित बहुत से धर्मों में तो प्रार्थनाओं से लेकर प्रवचन तक में यह बात खुलकर कही जाती है कि अगर किसी को स्वर्ग पाना है, ईश्वर को खुश करना है, तो उसे अपने आपको काम वासना से दूर रखना चाहिए। एक तरफ तो ईश्वर की ऐसी तस्वीरें और ऐसी कहानियां हिन्दू धर्म में भरी पड़ी हैं जिनमें ईश्वर एक से ज्यादा महिलाओं की तरफ खिंचे रहते हैं, किसी दूसरे की पत्नी पर भी हाथ डाल देते हैं, अपने आसपास के वर्जित रिश्तों के साथ भी बलात्कार कर देते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं देवताओं की पूजा करने वालों को प्रकृति के खिलाफ जाकर सेक्स से दूर रहने की धार्मिक नसीहत दी जाती है।
यह पूरा सिलसिला सेक्स को तो नहीं घटा पाता, सेक्स अपराधों को जरूर बढ़ा देता है। ब्रम्हचर्य की असली शक्ल भ्रमचर्य की है, वे ब्रम्ह को तो हासिल नहीं कर पाते, ब्रम्ह को पाने के भ्रम को जरूर हासिल कर लेते हैं। जो लोग लगातार अपने जीवन को सेक्स से दूर रखने के संघर्ष में लगे रहते हैं, उनसे यह उम्मीद करना एक दिमागी पाखंड है कि वे ईश्वर के करीब जाने का संघर्ष कर रहे होंगे। जब किसी ब्रम्हचारी या साध्वी-सन्यासी, या कि पादरी का जीवन प्रकृति के खिलाफ संघर्ष से भरा हुआ हो, तब उनके पास इतना वक्त कहां हो सकता है कि वे ईश्वर के करीब जाने का संघर्ष करें।
इस बात को एक दूसरी मिसाल से समझा जा सकता है कि बहुत से धर्मों में बहुत से त्यौहारों पर तरह-तरह से उपवास रखने की प्रथा है। किसी ईश्वर ने ऐसा कहा हो कि उसके लिए उपवास रखें, ऐसा तो नहीं लगता, लोगों ने तरह-तरह की तकलीफें पाने, तरह-तरह से अपने पर काबू पाने को धर्म, और ईश्वर तक पहुंचने का जरिया मान लिया है। जब धार्मिक उपवास चलते हैं, तो यह जाहिर है कि लोगों का ध्यान इस बात पर लगे रहता है कि भूखे रहने के घंटे कब खत्म होंगे, और कब उन्हें खाने को क्या-क्या मिलेगा, और ऐसे घंटों के लिए लोग तरह-तरह की चीजों का इंतजाम भी करके रखते हैं, उपवास के बाद के तरह-तरह के पकवान तैयार किए जाते हैं। ऐसे लंबे उपवासों के दौरान जब उपवास करने वाले लोग आपस में मिलते हैं, तो उनके बीच बहुत कम ही चर्चा ईश्वर के बारे में होते दिखती है, उनकी अधिक चर्चा उपवास और उपवासी पकवान तक सीमित रहती है, कि क्या-क्या खाया जा सकता है, कैसे-कैसे पकाया जा सकता है।
मतलब यह कि जिस चीज से दूर धकेलने की कोशिश होती है, खासकर प्रकृति की जरूरतों के खिलाफ जाकर जो करने की कोशिश होती है, उस दौरान लोगों के तन-मन उसी तरफ जाने की कोशिश करते हैं। जब लोगों के मन खाने में फंसे हों, तो बिना भोजन भजन आखिर कैसे हो सकते हैं? जब लोगों को मजबूरी में सेक्स से दूर रहना पड़े, तो जाहिर है कि उनके तन-मन उन्हें सेक्स की संभावनाओं की तरफ खींचते और धकेलते रहेंगे, और ईश्वर की बारी तो इस जरूरत के पूरे होने के बाद कभी आएगी तो आएगी।
दूसरी बात यह कि हर किस्म के धर्म में किसी भी पाप से मुक्ति पाने के लिए प्रायश्चित के कई तरह के रास्ते बना दिए गए हैं। धर्म को जब शोषण के सबसे बड़े और सबसे दीर्घकालीन हथियार की तरह डिजाइन किया गया, तो उसी साजिश के दौरान यह भी समझ लिया गया था कि इंसान तो इंसान ही रहेंगे, और उनकी इंसानी जरूरतें भी कायम रहेंगी। अगर पाप करने वाले लोगों को धर्म से निकाल देने का सिलसिला शुरू होगा, तो ईश्वर और उसके एजेंट पोप-पुजारी ये सब भूखे ही मर जाएंगे। इसलिए तमाम किस्म के मुजरिमों और पापियों को धर्म में बनाए रखने के लिए प्रायश्चित नाम की एक ऐसी लॉंड्री खोली गई जहां अपनी आत्मा लाकर लोग कुछ बिल चुकाकर उसे साफ करवा सकते हैं, और फिर छाती पर किसी बोझ के बिना बाकी दुनिया में जाकर एक बार फिर से पाप करना शुरू कर सकते हैं।
पश्चिमी देशों में ईसाई धर्म को मानने वालों के बीच अधिकतर जगहों पर लोकतंत्र कुछ अधिक विकसित है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान वहां पर धार्मिक भावना के मुकाबले कम नहीं है। इसीलिए अमरीका से लेकर फ्रांस और जर्मनी तक लोगों को धार्मिक पुस्तकों को जलाने की आजादी है, अलग-अलग धर्मों के ईश्वरों को लेकर कार्टून बनाने की आजादी है, और तरह-तरह के लतीफे गढऩे की आजादी है। ईसाईयों के बीच पश्चिमी देशों में चर्च के कन्फेशन चेम्बर को लेकर अनगिनत लतीफे हैं कि किस तरह लोग वहां जाकर अपने पाप की स्वीकारोक्ति करते हैं, और किस तरह उसके बाद दूसरी तरफ बैठा हुआ पादरी उन पापों को माफ करता है। इस चेम्बर को लेकर पादरियों के सेक्स को लेकर अब तक लाखों लतीफे और कार्टून बन चुके हैं कि वे किस तरह अपराधबोधग्रस्त लोगों का फायदा उठाते हैं, और खुद अपने लिए सेक्स की संभावनाएं ढूंढ लेते हैं।
बहुत से देशों में बहुत से धर्म अपनी खामियों और अपने पाखंड की चर्चा से परहेज करते हैं, न मजाकिया चर्चा, न ही गंभीर चर्चा। नतीजा यह होता है कि वहां पर पाखंड और पनपते चलता है, और उसे दबाकर, छुपाकर रखा जाता है। लोगों को याद होगा कि बहुत से स्वामियों के सेक्स की वीडियो रिकॉर्डिंग पिछले बरसों में सामने आई है, और हमने अपने खुद के इलाके में प्रदेश के सबसे बड़े कुछ मठों के महंतों की सेक्स की कहानियां सुनते-सुनते ही जिंदगी गुजारी है। यह सार्वजनिक चर्चा रहती है कि ब्रम्हचारी जीवन गुजारने वाले ऐसे महंत के सेक्स संबंधों से उनकी कौन-कौन सी संतानें हैं, और उन्हें मठ की जमीनों में से कौन-कौन सी जमीनें दी गई हैं। यह सिलसिला अनंत है, और चूंकि धर्म को बहुत से लोग कानून और तर्क से परे की चीज मान लेते हैं, इसलिए ऐसे भ्रमचर्य पर भी कोई चर्चा नहीं हो पाती है। ऐसी नौबत में ऐसे भ्रमचर्य का एक आसान और अच्छा इलाज यही है कि तेज धार वाला एक चाकू या उस्तरा रखा जाए, और धर्म की मर्दानगी का ऐसा विसर्जन कर दिया जाए। हमारा ख्याल है कि देश का कानून भी धर्म के बलात्कार के खिलाफ आत्मरक्षा के लोगों के अधिकार का सम्मान करेगा, केरल में जनता और मुख्यमंत्री ने यह सकारात्मक रूख दिखाया है, और शायद यही तरीका बाकी भ्रमचारी-बलात्कारियों का हौसला ठंडा कर सकेगा। 

जंगली जानवर कहीं मर रहे कहीं मार रहे, सोचना जरूरी

संपादकीय
22 मई 2017


छत्तीसगढ़ में आज लगातार दूसरा दिन है जब हाथियों के पैरों तले दो महिलाओं की मौत हो गई है। राज्य के जिन इलाकों में हाथी हैं, वहीं पर जंगल भी है, और वहां पर गांवों की अर्थव्यवस्था जंगलों पर टिकी हुई है। कभी महुआ बीनने, तो कभी तेंदूपत्ता के लिए गांव के लोग जंगल जाते हैं और हाथियों का शिकार हो जाते हैं। दूसरी तरफ लगातार इस प्रदेश में भालू मरते हुए दिख रहे हैं और आए दिन कहीं न कहीं भूख-प्यास से मरते हुए भालुओं की तस्वीरें आती हैं। इन दोनों के अलावा कई जगहों पर लोगों पर हमला करते हुए भालू की खबरें भी आती हैं, और लोग कहीं बिजली के तार बिछाकर तो कहीं जहर डालकर जानवरों को मारते हुए दिखते हैं।
इंसान और जानवरों का यह टकराव नया मुद्दा तो नहीं है, लेकिन यह बढ़ता हुआ मुद्दा जरूर है। छत्तीसगढ़ में जंगली जानवरों के हक को लेकर लोग हाईकोर्ट भी गए हुए हैं और सरकार वहां पर जवाब देने के लिए खड़ी हुई है। इस दिक्कत को देखें तो यह बात साफ समझ आती है कि जानवरों के हक के जंगलों पर जैसे-जैसे इंसान का कब्जा बढ़ा, वैसे-वैसे उनके पेड़ कटे, और उनके पीने के लिए पानी भी नहीं बचा। नतीजा यह होता है कि जंगल से जानवर आसपास की बस्तियों में कभी पालतू जानवरों के शिकार के लिए आ जाते हैं, तो कभी पानी पीने आ जाते हैं। और अगर इंसान यह सोचते हैं कि वे जंगलों पर काबिज होते जाएंगे, जंगलों के बीच से सड़कें निकालेंगे, वहां खदानों को खोदते रहेंगे, और पेड़ काटते रहेंगे, तो इसे बर्दाश्त करके जानवर चुप भी नहीं बैठेंगे। यह टकराव बढ़ते चलेगा, और हो सकता है कि धीरे-धीरे जानवर मिट ही जाएं। आज तो जहां जंगल बचे हुए हैं, वहीं पर जानवर हैं। और कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यह कहा था कि पड़ोसी राज्यों से हाथियों के छत्तीसगढ़ आने का यही मतलब है कि यहां पर जंगल अभी बचे हुए हैं। अगर जंगल न होते तो हाथी अपना इलाका छोड़कर यहां क्यों आते? लेकिन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच बरसों से हाथी-गलियारे की बात भी चल रही है, और ऐसा न होने पर हाथियों और इंसानों का टकराव होते चल रहा है, जिसमें आमतौर पर जान इंसानों की जा रही है, और ऐसे इंसानों की जा रही है जो कि जंगल गए बिना जिंदा रह नहीं सकते।
हमारा मानना है कि जंगलों में शहरों को घुसना बंद करना होगा। आज टेक्नालॉजी ने शहरों को आसमान की तरफ ऊपर उठने की सहूलियत दी है। शहरों को अपनी जमीन पर ऊंची इमारतें बनानी होगी, और जंगलों की तरफ जाना बंद करना होगा। इसके बिना यह तबाही नहीं रूकेगी, और जंगलों का मिटना महज जंगली जानवरों के लिए खतरा नहीं है, धरती के पर्यावरण के लिए भी खतरा है, और पेड़ों के घटते चले जाने से बारिश का पानी जड़ों के आसपास की मिट्टी को भी नदियों में ले आएगा, उनमें गाद भर देगा, नदियों की पानी की क्षमता घट जाएगी, और कुल मिलाकर जमीन के नीचे का पानी घट जाएगा। इसलिए जंगलों को बचाना जानवरों के लिए जरूरी नहीं है, यह इंसान के खुद के लिए जरूरी है, और आज जानवरों की बदहाली को एक संकेत और सुबूत मानना चाहिए कि इंसान अपने काम के जंगलों को खत्म कर रहा है, खत्म कर चुका है। इस मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार को बेबस करने के लिए वन्य प्राणी संगठनों और पर्यावरणवादियों को लगातार दबाव बढ़ाना होगा। 

मोदी सरकार के तीन बरस और भाजपा की रीति-नीति

संपादकीय
21 मई 2017


नरेन्द्र मोदी की सरकार के तीन साल पूरे होने के मौके पर राजनीतिक और सरकारी दोनों किस्म के मोर्चों पर बहुत तरह के विश्लेषण होने शुरू हो गए हैं, और ये कई दिनों तक चलते रहेंगे। आर्थिक मोर्चे के अधिक जानकार लोग उस बारे में लिखेंगे, और विदेश नीति के जानकार लोग उस बारे में। लेकिन बहुत सी साधारण बातें हैं जिन पर लिखने के लिए एक साधारण समझ काफी होती है, और न्याय की सोच जरूरी होती है। इनमें से एक, राजनीतिक पैमाने पर तौला जाए तो नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रधानमंत्री बनने के पहले से जिस तरह देश के जनमत को झकझोर कर रख दिया था, और एक ऐतिहासिक जीत के  साथ वे भाजपा को सत्ता पर लेकर आए थे, उस पर तो लिखा जा चुका है, लेकिन उस राजनीतिक जीत की जो निरंतरता बनी हुई है, वह हैरान करने वाली है। एक के बाद दूसरा राज्य जीतकर भाजपा ने अपनी ताकत और अपनी जमीनी पकड़ को उसकी अपनी उम्मीद से बहुत अधिक बढ़ा लिया है। और देश के दूसरे राजनीतिक दलों के सामने यह बात न सिर्फ एक मिसाल की तरह खड़ी हो गई है, बल्कि एक ऐसी चुनौती भी बन गई है जिसका कोई मुकाबला 2019 के आम चुनावों में भी लोगों को नहीं दिख रहा है।
हम कुछ बुनियादी बातों पर चर्चा करना चाहते हैं कि भाजपा की इस बुलंदी की क्या वजहें रही हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की गुजरात के कार्यकाल की जोड़ी दिल्ली में आकर पहली बार काम कर रही है, और उसने दिल्ली सहित पूरे देश के अपने संगठन को कुछ इस तरह मजबूत पकड़ में ले लिया है कि उनसे परे भाजपा में कुछ बचा हुआ दिखता नहीं है। अब कुछ लोगों को यह लग सकता है कि दो लोगों के हाथों में सत्ता का इतना इक_ा हो जाना लोकतांत्रिक नहीं है, लेकिन देश की अधिकतर पार्टियां तो ऐसी हैं जिनमें दो नेता भी नहीं, महज एक ही कुनबे के हाथ में पूरी ताकत है, ऐसे में दो लोगों के हाथों में ताकत को अलोकतांत्रिक कैसे कहा जाए? दूसरी बात यह कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने खुद अविश्वसनीय किस्म की रोजाना की मेहनत लगातार जारी रखी है, और उनकी पार्टी के जिला स्तर के नेताओं का भी यह कहना है कि जिस तरह पार्टी में एक वक्त संघ के प्रचारक आकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता का काम करते थे, आज उसी तरह भाजपा के हर सदस्य से पूर्णकालिक मेहनत करवाई जा रही है, और साल भर पार्टी के कार्यक्रम चल रहे हैं।
तीसरी बात यह कि भाजपा ने इन तीन बरसों में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लेकर गोहत्या या नौजवानों के प्रेम जैसे बहुत से भावनात्मक मुद्दों को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचाने से कोई परहेज नहीं किया, और पार्टी के कुछ नेता अहिंसक बातें करते रहे, और कुछ दूसरे नेता घोर हिंसक और साम्प्रदायिक बातें करते हुए ही केन्द्रीय मंत्री, और राज्य के योगी सरीखे मुख्यमंत्री भी बनते रहे। देश की जनता के बीच एक धुंध सी कायम रही, और दोनों तरह के नेताओं की जगह बनाकर भाजपा ने हिन्दुओं के बीच अपने पांव पहले के मुकाबले बहुत अधिक फैला लिए। इसके साथ-साथ भाजपा ने बहुत सारी चीजों को लेकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद का नारा भी लगा दिया। जिस तरह की तकलीफदेह नोटबंदी रही, और उसमें तकलीफ पाते हुए लोग जिस तरह उस तकलीफ को देशभक्ति से जोडऩे के लिए उत्साही दिखे, वह एक अविश्वसनीय किस्म की बात रही। लोगों ने जब एक नामौजूद राष्ट्रीय जरूरत के नाम पर नोटों की अपनी सहूलियत, और रोज की अपनी कमाई को भूल जाने को भी बुरा नहीं माना, तो वह भाजपा के लिए उम्मीद से अधिक उपलब्धि थी।
लेकिन दूसरे राजनीतिक दलों को सीखने और समझने के लिए जो जरूरी है, वह भाजपा की मेहनत और उसका तौर-तरीका है। उसकी बहुत सी नीतियां गलत हो सकती हैं, लेकिन उसकी मेहनत और उसकी रणनीति ने उन गलतियों और उन गलत कामों को दबा दिया। जनता के बीच अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचने और उन्हें प्रभावित करने की भाजपा की रणनीति से दूसरे राजनीतिक  दलों को सीखने की जरूरत है। भाजपा की आलोचना तो ठीक है, लेकिन देश के चुनावी लोकतंत्र में जिसे भी भाजपा से अगला चुनाव लडऩा है, वे भाजपा से कम से कम कुछ सीख भी लें।

कुछ के तलुए सहलाना और कुछ को पैरोंतले कुचलना...

संपादकीय
20 मई 2017


छत्तीसगढ़ में जनता की दिक्कतों को जानने के लिए चल रहे लंबे लोकसुराज कार्यक्रम में अभी एक जिले में लगातार दो दिन वहां के कलेक्टर पर भाजपा के दो नेता बरसे। एक भूतपूर्व मंत्री थे, और एक वर्तमान मंत्री। इन दिनों हर किसी के हाथ में मोबाइल फोन रहता है इसलिए इन दोनों घटनाओं की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तैर रही है। कुछ लोगों को लग सकता है कि नेताओं ने अफसर के साथ बुरा सुलूक किया है, कुछ लोगों को यह लग सकता है कि जनता की दिक्कतों की बात करने वाले सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेताओं के साथ बात करते हुए कलेक्टर का व्यवहार ठीक नहीं था। लेकिन इन दोनों में से जो भी बात सही हो, यह बात तो अपनी जगह सही है ही कि जिसके हाथ अधिक ताकत रहती है, उसका बर्ताव अपने से कमजोर लोगों के साथ अमूमन खराब रहता है। लोगों का बर्ताव अपने से बड़े ओहदे वाले, या कि अधिक ताकत वाले लोगों के साथ तो चाहते हुए, या कि मजबूरी में अच्छा रहता है, लेकिन जहां अपने से कमजोर लोग सामने आए, लोग अपने असली रंग में आने लगते हैं, और बदसलूकी शुरू हो जाती है।
आज ही महाराष्ट्र की एक खबर है कि किस तरह वहां जेल में बंद एक विधायक ने अदालत जाने के लिए गाड़ी लेट होने पर पुलिस को धमकाया और गालियां देते हुए कहा कि पुलिस उसे जानती नहीं है क्या? यह विधायक तीन सौ करोड़ के घोटाले में 19 महीने से जेल में है, लेकिन ऐंठ अभी तक गई नहीं है। पुरानी कहावत है कि रस्सी जल गई, लेकिन बल नहीं गया। ऐसा ही इस विधायक के बर्ताव से दिखाई पड़ता है, और महाराष्ट्र से परे कम से कम पूरे हिन्दुस्तान में तो यह दिखता ही है कि ताकत सिर चढ़कर बोलती है, और कमजोरी लोगों को पैरों पर गिरा देती है। अब अगर इसके पीछे की मानसिकता को देखें, तो इसकी एक बहुत अच्छी मिसाल इन दिनों हिन्दुस्तानी टीवी पर बड़े मशहूर हुए कपिल के कॉमेडी शो में देखने मिलती है।
जिन लोगों ने यह कार्यक्रम देखा है उन्होंने भी इस बात का एहसास नहीं किया होगा कि पूरे का पूरा कार्यक्रम इस सोच पर बनाया गया है कि इसका मुख्य किरदार कपिल शर्मा, अपने से कमजोर तमाम लोगों की खिल्ली उड़ाकर, उनको बेइज्जत करके, उनके साथ परले दर्जे की बदसलूकी करके लोगों को हंसाता है। दूसरी तरफ कार्यक्रम में आने वाले प्रमुख कलाकारों से वह शुरू से आखिर तक महज चापलूसी करता है, और मानो उनके तलुए सहलाता है। इस कार्यक्रम को अगर देखें तो यह इंसानी सोच के दो बिल्कुल अलग-अलग पहलुओं के बीच बना हुआ है। ताकतवर के तलुए सहलाओ, और कमजोर को पैरोंतले कुचलो। एक-दो बरस से लगातार यही करते-करते इस कामयाब कॉमेडियन की अपनी सोच यह हो गई कि कुछ महीने पहले उसने अपने ही साथियों से एक विमान में नशे में धुत्त होकर भारी बदसलूकी की, और उसके घमंड को देखकर वे कलाकार कार्यक्रम छोड़ गए।
शोहरत और कामयाबी की ताकत किस तरह सिर चढ़कर सब कुछ तबाह करती है, इसकी इससे बड़ी कोई मिसाल हाल के बरसों में हमें याद नहीं पड़ती। और कॉमेडी शो से लेकर राजनीति तक, सरकार तक, और सार्वजनिक जीवन तक लोगों का बर्ताव इन्हीं दो ध्रुवों के बीच कभी इधर तो कभी उधर खिसकते रहता है। बहुत से लोग तो ठीक इसी कॉमेडी शो की तरह, कुछ मिनट चापलूसी में लग जाते हैं, और कुछ मिनट दूसरे लोगों को दुत्कारने में। इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार को सत्तारूढ़ नेताओं और सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों के बर्ताव तय करने के लिए मेहनत करनी चाहिए। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के एक मंत्री महज तौलिया लपेटे हुए कुर्सी पर पसरे दिख रहे थे, और सामने उनके दरबार में बहुत सी बेबस महिलाएं अपनी अर्जियां लेकर खड़ी थीं। हमारा ख्याल है कि ऐसे बर्ताव चाहे वे मंत्रियों के हों, या कि अफसरों के हों, इसके खिलाफ जनता को भी उठ खड़ा होना चाहिए, और इसे जमकर धिक्कारना चाहिए, क्योंकि सरकारी कामकाज जनता के पैसों पर चलता है, वह किसी निजी टीवी कंपनी का बनाया हुआ कॉमेडी शो तो है नहीं। सरकार अगर खुद नहीं सुधरती, तो उसके लोगों की बदसलूकी के खिलाफ जनता को उठना चाहिए। सरकार की ताकत की ऐसी ही बददिमागी के चलते हुए दो दिन पहले बिलासपुर में एक गरीब औरत बच्चे को जन्म देने दो सरकारी अस्पतालों से भगा दिए जाने के बाद सड़क किनारे के किसी खंडहर में बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर हुई थीं। यह मामला खबरों से हटा नहीं है कि आज एक और तस्वीर छपी है कि किस तरह 92 बरस की एक बुजुर्ग महिला को वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए सरकारी दफ्तर में बुलाया गया, और उसके परिवार का एक आदमी उसे ठेले पर लिटाकर भरी धूप में वहां लेकर गया। सरकार अगर संवेदनशील नहीं होती, तो ऐसे मामलों को लोगों को उठाना चाहिए, और इनके लिए जिम्मेदार अफसरों या नेताओं के नाम दूसरों के सामने बार-बार दुहराने चाहिए।

भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए

संपादकीय
19 मई 2017


आज देश भर में कारोबारियों के बीच महज एक बात की चर्चा है कि नए लागू होने वाले जीएसटी से क्या-क्या फर्क पड़ेगा। बाजार का दोनंबरी हिस्सा इस बात को लेकर भी फिक्र में है कि क्या इससे बिना बिल, बिना टैक्स का धंधा करना मुश्किल हो जाएगा? लेकिन इन सबसे परे एक मजे की बात यह है कि यूपीए सरकार के पूरे दस बरस जीएसटी का पूरी ताकत से विरोध करने वाली एनडीए ने आज सरकार में रहते हुए इसे लागू किया है, और यूपीए ने विपक्ष के अपने हक का इस्तेमाल करते हुए पिछले ढाई बरस इसका विरोध किया, लेकिन अब साथ देकर संसद में जीएसटी बिल पास करा लिया, क्योंकि यह जीएसटी बिल यूपीए का ही बनाया हुआ था।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ सहित भाजपा वाले राज्यों के वित्त और वाणिज्य मंत्रियों ने यूपीए की बुलाई हुई राज्यों की बैठकों में लगातार जीएसटी का जमकर विरोध किया था, और अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद अपने सारे विरोध को वापिस लेकर वित्तमंत्री अरूण जेटली मानो दूसरे पक्ष की तरफ से अदालत में जिरह करने लगे, और जीएसटी पास कराने के लिए पसीना बहाने लगे। लेकिन ऐसा सिर्फ इसी एक मामले को लेकर नहीं हुआ है, यूपीए सरकार का एक और बहुत बड़ा कार्यक्रम था आधार कार्ड का, जिसे एनडीए ने देश के लिए तबाही करने वाला, और गोपनीयता, निजता खत्म करने वाला करार दिया था, और घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर एनडीए की सरकार आधार कार्ड को खत्म कर देगी। लेकिन सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री से आधार कार्ड के जन्मदाता, कांग्रेस में शामिल हो चुके नंदन निलेकेणि ने मुलाकात की, और एक ही मुलाकात में नरेन्द्र मोदी आधार कार्ड पर कुछ ऐसे फिदा हुए कि सुप्रीम कोर्ट की सारी रोक-टोक के खिलाफ जाकर भी हर बात के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया, और अब तो भारत में आधार कार्ड को लेकर लतीफे और कॉर्टून बनते हैं कि इसके बिना लोग क्या-क्या नहीं कर सकते।
हम जीएसटी पर चर्चा के लिए आज यहां नहीं लिख रहे, हमारा मकसद राजनीति के इस पहलू पर लिखना था कि बहुत सी बड़ी योजनाओं और बड़ी नीतियों पर भारत की राजनीति में विरोध के लिए विरोध का जो माहौल है, उससे बड़ा नुकसान भी होता है। राजनीतिक दलों के बीच कटुता इतनी हावी हो जाती है कि जनकल्याण के लिए भी सत्ता और विपक्ष के बीच बातचीत नहीं हो पाती। एनडीए सरकार ने कश्मीर में भाजपा की पुरानी सारी कश्मीर-नीति या कश्मीर-रणनीति को किनारे धर दिया है, और अपने सारे सिद्धांतों को छोड़कर वह वहां पर राज्य सरकार में हिस्सेदार हो गई है। हम ऐसी बातों को याद दिलाकर एनडीए या भाजपा को कोई ताना देना नहीं चाहते क्योंकि भारत जैसे संसदीय-चुनावी लोकतंत्र में बहुत से मुद्दे चुनावों के साथ खत्म हो जाते हैं। जो नरेन्द्र मोदी पूरे चुनाव में नवाज शरीफ को मनमोहन सरकार की खिलाई बिरयानी को गिनाते हुए आमसभाओं में यह दावा करते थे कि किस तरह एक हिन्दुस्तानी फौजी के सिर के बदले दस या कितने सिर पाकिस्तानी सैनिकों के लेकर आएंगे, वही नरेन्द्र मोदी खुद होकर नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाने पाकिस्तान गए, उनके परिवार के लिए तोहफे लेकर गए, और उनके परिवार से मोदी की मां के लिए आए हुए तोहफों को मंजूर भी किया।
भारतीय राजनीति में थोड़ी सी परिपक्वता बढऩे की जरूरत है। सत्ता और विपक्ष इन दोनों में रहते हुए तर्क और न्याय को छोडऩा नहीं चाहिए। देश के हित में क्या है, और दुनिया के हित में क्या है यह ध्यान में रखकर ही चुनावी राजनीति करनी चाहिए। यह एक अच्छी बात है कि यूपीए के बनाए हुए बहुत से कार्यक्रमों को, बहुत से नीतियों को, एनडीए लागू कर रही है, जारी रखे हुए हैं, और उनके लिए अंधाधुंध बजट भी दे रही है, जैसे कि आधार कार्ड के लिए, या कि मनरेगा की मजदूरी के लिए। भारत के संसदीय लोकतंत्र में अंधा विरोध खत्म होना चाहिए, और उसकी वजहें, महज कुछ ही वजहें हमने यहां गिनाई हैं।

किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव

संपादकीय
18 मई 2017


हरियाणा के मुख्यमंत्री रहते हुए ओमप्रकाश चौटाला पर शिक्षक भर्ती में बड़े घोटाले का मुकदमा चला, और दो बरस पहले अदालत से उन्हें दस बरस कैद मिली। वह कैद अब तक जारी है इससे यह जाहिर होता है कि उन्हें ऊपर की किसी अदालत से अधिक राहत नहीं मिल पाई। चौटाला परिवार के ऊपर सत्ता की ताकत से अंधाधुंध कमाई के राजनीतिक आरोप भी लगते रहे, और जब किसी को ऐसी सजा मिल जाती है, तो यह जाहिर रहता है कि उनके खिलाफ आरोप संदेहों से परे साबित हो चुके हैं। वरना हिन्दुस्तानी अदालतों से ताकतवर तो आमतौर पर बाहर अपनी कार तक लाल कालीन बिछाकर लौटते हैं, और वहां से जेल महज गरीब और कमजोर ही जाते हैं। लेकिन सत्ता पर बैठकर भ्रष्टाचार पर लिखने को नया कुछ भी नहीं है, चौटाला पर लिखने का मौका एक दूसरी वजह से है कि 82 बरस की उम्र में ओमप्रकाश चौटाला ने जेल के भीतर से बारहवीं की परीक्षा पास की है, और फस्र्ट डिवीजन में पास की है। अब इसके बाद वे कॉलेज की पढ़ाई करना चाहते हैं। परिवार ने बताया कि वे एक पारिवारिक शादी के लिए पैरोल पर घर आए थे, लेकिन परीक्षा देने के लिए फिर जेल लौट गए।
अब यह बात बड़ी दिलचस्प है कि 82 बरस की उम्र में, जब अगले आठ बरस जेल में और रहना है, तब कोई ताकतवर आदमी मेहनत से पढ़े, और इम्तिहान दे। इस बात को हम इस भरोसे के साथ लिख रहे हैं कि जिस भ्रष्टाचार की वजह से चौटाला जेल में है, वैसा कोई भ्रष्टाचार उन्होंने जेल के भीतर इस परीक्षा को पास करने के लिए नहीं किया होगा। अभी तक की खबरें बताती हैं कि उन्होंने मेहनत से पढ़ाई की है, और यह मेहनत, यह लगन, दूसरों के लिए कुछ सीखने की बात भी हो सकती है। एक अरबपति परिवार का एक बुजुर्ग, मुख्यमंत्री रहने के बाद 80 बरस की उम्र में जेल जाए, और वक्त का इस्तेमाल करके पढ़ाई करे, तो इससे जेल के भीतर के बाकी लोग, और जेल के बाहर के आजाद लोगों को भी यह सीखने का मौका मिलता है कि समय का कैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।
आज जेल के बाहर भी हिन्दुस्तान में दसियों करोड़ ऐसे नौजवान हैं जो स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई के बाद निठल्ले बैठे हुए हैं, और उन्हें अपनी नालायकी, या निकम्मेपन को सही ठहराने के लिए कुछ तर्क भी हासिल हैं। अगर वे अनारक्षित तबके के हैं, तो वे आरक्षित तबकों को कोस लेते हैं, अगर वे गरीब हैं, तो उनके पास यह तर्क है कि सरकारी नौकरी तो बिना रिश्वत मिलती नहीं है। लेकिन खाली बैठे हुए लोग अंग्रेजी सीखें, कम्प्यूटर सीखें, तौर-तरीके सीखें, सामान्य ज्ञान बढ़ाएं, तो जीवन में उनकी सभी तरह की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान की आबादी के एक बड़े हिस्से में लोगों के मन में चुनौतियों के लिए कोई सम्मान नहीं है, और बच्चे यह उम्मीद करते हैं कि मां-बाप उन्हें पढ़ाएं-लिखाएं, और उसके बाद उनके लिए एक नौकरी भी खरीद दें। और जब तक नौकरी न खरीदी जा सके, तब तक एक मोबाइल और एक मोबाइक जरूर खरीद दें। दूसरी तरफ दुनिया के जो विकसित और संपन्न देश हैं, उनमें खरबपतियों के बच्चे भी अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में जेब खर्च निकालने के लिए कहीं वेटर की तरह काम कर लेते हैं, कहीं कार धो लेते हैं, तो कहीं किसी और किस्म की मजदूरी कर लेते हैं। विकसित सभ्यताओं में उन बच्चों को हिकारत के साथ देखा जाता है जो अपने संपन्न मां-बाप के पैसों पर पलते हुए बिना कोई काम करते हुए कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में मेहनत को हिकारत से देखा जाता है, और यहां के नौजवान यह मानकर चलते हैं कि पढ़-लिख लेने के बाद थोड़े समय के लिए भी मेहनत का कोई काम करना उनका बड़ा अपमान होगा।
लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा, और यह सोचना होगा कि फिजूल गुजारा हुआ वक्त कभी दुबारा नहीं आता। घड़ी के कांटे उल्टे नहीं घूमते, और न ही चलती हुई घड़ी के कांटे थमकर यह इंतजार करते हैं कि उसे बांधे हुए लोग पहले कुछ और कर लें, तब फिर घड़ी आगे बढ़ेगी। लोग अगर यह सोचें कि हर दिन का एक तिहाई वक्त तो सोने में जाता है, बाकी वक्त में कुछ घंटे रोज के जरूरी कामों में जाते हैं। इस तरह किसी के पास भी जिंदगी में आधे से कम वक्त ही कुछ करने के लिए बचता है। इसलिए रोज एक घंटे बर्बाद करने वाले लोग भी रोज के पूरे समय में से दो घंटे बर्बाद कर लेते हैं। यह सोचकर लोगों को वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए, और इसकी संभावनाएं बहुत हैं। बयासी बरस की उम्र में एक अरबपति जेल में रहते हुए मेहनत करके पढ़ रहा है, और अगर बाकी की आठ बरस की कैद पूरी गुजारनी पड़ी, तो हो सकता है कि ओमप्रकाश चौटाला एमए-पीएचडी होकर जेल से निकलें। एक किसी बुरे इंसान से भी कुछ भली बातें सीखना संभव होता है।