टाटा की शुरू की एयर इंडिया फिर टाटा के हाथ जाएगी?

संपादकीय
22 जून 2017


दुनिया किस तरह एक चक्कर लगाकर सफर पूरा करती है यह देखना हो तो भारत की सरकारी विमान सेवा एयर इंडिया को देखना चाहिए। आज केन्द्र सरकार एयर इंडिया के दसियों हजार या लाखों करोड़ के अब तक हो चुके घाटे को देखते हुए उसे बेचने की फिराक में है, और सरकार के लोगों को यह डर भी है कि इसके लिए पता नहीं सही दाम और सही ग्राहक मिलेंगे या नहीं। सरकारी संरक्षण और भारी तरफदारी के बावजूद एयर इंडिया की हालत बहुत खराब है, और इस खराबी की चर्चा करते हुए वह पुरानी सीएजी रिपोर्ट याद आती है जिसमें कहा गया था कि एयर इंडिया ने मुसाफिरों को मुफ्त दी जाने वाली पिपरमेंट की खपत छह सौ प्रति मुसाफिर बताई थी, जो कि चोरी-डकैती से कम कुछ नहीं हो सकता। खैर, एयर इंडिया उतनी ही भ्रष्ट होगी जितनी कि सरकार की बहुत सी और संस्थाएं होंगी। आज चर्चा के लायक बात यह है कि ऐसी खबरें हैं कि एयर इंडिया के आधे से अधिक शेयर खरीदने में टाटा ने दिलचस्पी दिखाई है। अब यह याद करने का मौका है कि 1932 में टाटा ने ही यह एयर लाईंस शुरू की थी, और आजादी के तुरंत बाद सरकार ने निजी कंपनियों के राष्ट्रीयकरण की सोच के चलते इस कंपनी के आधे शेयर खरीद लिए थे, और फिर कुछ बरस बाद इस पूरी कंपनी को ही अधिग्रहित कर लिया था। नेहरू के वक्त के सार्वजनिक उपक्रम के उस दौर में एयर इंडिया को एक सार्वजनिक उपक्रम बना दिया गया था, और बाद में सरकार के हर तबके ने इसे अपने-अपने तरीके से चूसा और दुहा। नतीजा यह निकला कि एकाधिकारवादी सरकारी कारोबार को भी सरकार ने डुबाकर रख दिया, और अब आज इस कारोबार को बचाने के लिए एक बार फिर टाटा से उम्मीद दिख रही है। करीब एक सदी बाद अब एयर इंडिया फिर घूम-फिरकर अपने संस्थापक के चरणों में जाकर लेट सकती है।
मौजूदा सरकार की सोच बहुत साफ है कि सरकार को कारोबार नहीं करना चाहिए, और कारोबार को नियंत्रित करके उसकी कमाई से तीस फीसदी टैक्स वसूल करना चाहिए। यह सोच मोदी सरकार की अपनी नहीं है, कांग्रेस की सरकार ने 90 के दशक में ही आर्थिक उदारीकरण का सिलसिला शुरू कर दिया था, और आरबीआई गवर्नर से लेकर वित्तमंत्री, और फिर प्रधानमंत्री के पद तक सम्हालते हुए मनमोहन सिंह ने इस उदारीकरण को लगातार बढ़ाया था। बहुत से सार्वजनिक उपक्रमों से सरकार ने उस वक्त घाटे के चलते हुए हाथ धो लिए थे, और अब एयर इंडिया शोकेस में रखा हुआ अगला सार्वजनिक उपक्रम दिख रहा है।
हम निजीकरण के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि अब खुली बाजार व्यवस्था में अगर सरकार अपने संस्थानों को बहुत ही खूबी और काबिलीयत से नहीं चला सकेगी, तो वह कारोबार से बाहर भी हो जाएगी, और ऐसे पब्लिक सेक्टर का दाम भी मिट्टी में मिल जाएगा। ऐसे में अगर सरकार काबिल कारोबारियों को सार्वजनिक उपक्रम के शेयर बेचती है, और वे ऐसे उपक्रमों को नियंत्रित करते हैं, तो सरकार वहां पर बेईमानी और चोरी-डकैती करने के लायक तो नहीं रहेगी, लेकिन सरकार के पास बचे हुए आधे से कम शेयरों के दाम भी आज के सौ फीसदी शेयरों के मुकाबले कई सौ फीसदी बढ़ जाएंगे, और सरकार फायदे में रहेगी। जब सत्ता का मिजाज ही अपने संस्थानों को लूटने का हो जाता है, तो उसे कारोबार से बाहर हो जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए दो बातों का बहुत ख्याल रखना चाहिए, पहली तो यह कि केवल ऐसे उपक्रम बेचे जाएं जो कि घाटे में चल रहे हैं, या कि जिनसे बहुत अधिक फायदा होने की संभावना है। सार्वजनिक उपक्रमों में काम करने वाले कर्मचारियों को यह नहीं सुहाता है कि संस्थानों का निजीकरण हो, क्योंकि इससे बहुत सी नौकरियां खत्म होती हैं, और निजी कारोबारी कम लोगों से बेहतर काम लेने का काम करते हैं। लेकिन नौकरियां बचाने के लिए सरकारी उपक्रमों को घाटे में चलाना ठीक नहीं है, क्योंकि यह पूरे देश का घाटा रहता है, महज सरकारी खजाने का घाटा नहीं रहता। इस देश  के औद्योगिक ढांचे का बेहतर इस्तेमाल अगर निजी कारोबारी कर सकते हैं, तो दुनिया भर में खुले मुकाबले के आज के इस दौर में सरकार को ऐसा करना भी चाहिए। करीब एक सदी बाद टाटा को अपना शुरू किया हुआ कारोबार अगर फिर से फायदे में चलाने की चुनौती मिल रही है, तो यह देश के सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के मामले में एक बड़ी मिसाल बन सकती है। फिलहाल ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार टाटा को यह कंपनी बेचकर कह रही हो, तेरा तुझको अर्पण, लाखों करोड़ डूबा मेरा...।

सनसनी पर उतारू मीडिया की सुनामी से घिरे लोग...

संपादकीय
21 जून 2017


भाजपा-एनडीए ने अपने राष्ट्रपति पद प्रत्याशी का नाम घोषित किया तो लोग उनकी जाति की चर्चा पर उतर आए। और इसमें कुछ अस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि ऐसे किसी फैसले और चुनाव के पीछे धर्म या जाति या क्षेत्रीयता का पैमाना तो रहता ही है। इसलिए अगर रामनाथ कोविंद एक दलित हैं, तो उनका दलित होना भारत की राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा में अनदेखा नहीं रह सकता। लेकिन कोई अगर यह समझे कि महज उनके दलित होने की वजह से ही उन्हें प्रत्याशी बनाया गया है, तो उन्हें यह भी देख लेना चाहिए कि राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में कोविंद का लंबा इतिहास है। वह अच्छा है या बुरा है, यह एक विश्लेषण का मुद्दा हो सकता है, लेकिन उन्हें महज दलित होने की वजह से राष्ट्रपति बनाया जा रहा है, ऐसे नतीजे पर पहुंचना थोड़ी ज्यादती होगी। लेकिन मीडिया लोगों की सोच को एक अतिसरलीकरण की तरफ धकेलता है। कोविंद के बारे में पहले ही घंटे से यह बात कही जाने लगी कि वे भाजपा-एनडीए के प्रतिभा पाटिल हैं। दरअसल जब मीडिया ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाया था तो उनके खिलाफ बड़ी आक्रामक जुबान में यह कहा जाता था कि उनकी योग्यता महज इंदिरा गांधी के घर खाना बनाने जितनी थी। और उसी अपमानजनक मिसाल को लोग आज कोविंद पर फिट कर रहे हैं।
दरअसल हिन्दुस्तान में अब टीवी चैनल लोगों की सोच को तय करते हैं। और टीवी की अपनी मजबूरी यह है कि दर्शकों की सीमित संख्या को झपटकर अपने कब्जे में करने के लिए उसे सबसे सनसनीखेज, फिर चाहे झूठी ही क्यों न हो, सुर्खियों को दिखाना पड़ता है और लोगों को बांधकर रखना पड़ता है। अब टीवी को देख-देखकर प्रभावित हो चुके दर्शकों के सामने जब अखबारों को आना पड़ता है, तो वे भी टीवी की सनसनी से अछूते नहीं रह पाते, और उनके सामने भी प्रसार संख्या को बढ़ाने का गलाकाट मुकाबला रहता ही है। ऐसे माहौल में जब अच्छे-भले गंभीर और बड़े अखबारों की वेबसाइटों को देखें तो दिखाई पड़ता है कि सबसे सेक्सी, सबसे बुरे स्कैंडल वाली, सबसे अधिक नंगेपन वाली सुर्खियों के लिंक डाल-डालकर ये वेबसाइटें इंटरनेट-ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं, और जिस तरह टीवी टीआरपी के पीछे भागते हैं, अखबार प्रसार संख्या के पीछे भागते हैं, उसी तरह इंटरनेट के पेज हिट्स की तरफ भागते हैं। यह सिलसिला गैरजिम्मेदारी को बढ़ाते चलता है, और लोग तथ्यों के बजाय विशेषणों की बैसाखियों पर दौडऩे की कोशिश करने लगते हैं, कर रहे हैं। अब ऐसे में सनसनी की आग में घी या मिट्टीतेल डालने के लिए सोशल मीडिया पहुंच गया है, और इसमें गैरजिम्मेदार, भड़काऊ लोगों की भीड़ तो है ही, बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता भी पूरी गैरजिम्मेदारी से भड़काऊ झूठ को बढ़ावा देते रहते हैं। इसकी ताजा मिसाल उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का फेसबुक पेज है जहां पर असम की एक पुरानी तस्वीर को बंगाल की ताजा तस्वीर बताते हुए पोस्ट किया गया है, और इसमें एक आदिवासी महिला के कपड़े फाड़े हुए दिख रहे हैं, और अभी खबर आई है कि इसे लेकर योगी के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई है कि उन्होंने एक आदिवासी महिला की नग्नता को इस तरह उजागर किया, और झूठ के साथ उजागर किया।
दरअसल आज का वक्त सूचना के सैलाब का, बल्कि सूचना की सुनामी का है, और इसके थपेड़ों में लोगों की आंखों में रेत भी जा रही है, और नमकीन पानी भी जा रहा है। लोगों को सच दिखना बंद हो रहा है, और इन लहरों में उतराते-चढ़ते लोग सैलाब के साथ कहीं के कहीं पहुंच जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि अखबारों में जो कुछ लोग अब तक गंभीर बचे हुए हैं, उन्हें जब तक रोजी-रोटी चलती रहे, तब तक गंभीर बने रहना चाहिए, ईमानदार बने रहना चाहिए, हालांकि यह बात दिन-ब-दिन अधिक और अधिक मुश्किल होती जा रही है। सनसनीखेज और चटपटे झूठ के बाजार में खालिस तपाए हुए सच की पूछ-परख बड़ी कम है, और लोकतंत्र में लोग इस नौबत के लंबे दाम चुका रहे हैं।

योग के फायदे तो अनगिनत पर सरकार पहले जगह तो दे

संपादकीय
20 जून 2017


भारत की सदियों पुरानी जीवनशैली का एक हिस्सा, योग अब पूरी दुनिया में एक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में अधिक प्रचलित होते चल रहा है। वैसे तो भारत में दिलचस्पी रखने वाले लोग जमाने से योग सीखने भारत आते थे, और बहुत सी पुरानी तस्वीरें बताती हैं कि आधी-पौन सदी पहले भी पश्चिम में योग का प्रचलन था। लेकिन नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह अंतरराष्ट्रीय दिवस भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्रसंघ से घोषित हुआ और आज भारत के तकरीबन हर हिस्से में योग का सार्वजनिक अभ्यास हुआ। टेलीविजन पर ऐसा बहुत समय बाद हुआ कि सुबह के दो घंटे हत्या और बलात्कार से आजाद रहे, और सिर्फ योग और उसके फायदों पर चर्चा होती रही। कुछ भाजपा विरोधी पार्टियों के राज वाले राज्यों को छोड़ दें, तो बाकी सारे देश में सरकार ने इस दिन इस समारोह को सरकारी स्तर पर किया, और स्कूल-कॉलेज के बच्चों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
बिना किसी खर्च के, बिना बिजली और बिना किसी मशीन के जो योग हो सकता है, वह लोगों को बहुत सी बीमारियों से बचाता है। हम बाबा रामदेव जैसे कुछ नाटकीय योग की बात नहीं करते, जिसके फायदे को लेकर डॉक्टरों को कई तरह के शक हैं, और जिससे होने वाले नुकसान को लेकर कई तरह आशंकाएं भी हैं, हम भारत के परंपरागत योग की बात करते हैं जो कि रामदेव के पैदा होने के सदियों पहले से बिना किसी बाजारू नाटकीयता के चल रहा है, और आज भी मुंगेर जैसे विश्वविख्यात योग संस्थानों से लेकर दक्षिण भारत के कई योग गुरुओं तक ने बिना साबुन और नूडल्स बेचे सिर्फ योग को फैलाया है। यह अलग बात है कि आज रामदेव भारत के राजकीय योग गुरु बने बैठे हैं, और सरकारी मंच से शोहरत पाते हुए अपने हजारों करोड़ के कारोबार को दसियों हजार करोड़ का कर रहे हैं।
लेकिन इन सबसे परे अगर हम पते की बात पर सीधे आएं, तो राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थानों को साफ-सुथरी, खुली और हवादार जगहों पर योग का इंतजाम करना चाहिए जिससे कि भारत की आबादी में बढ़ते चल रहे डायबिटीज सरीखे रोग पर काबू हो सके। अभी-अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने यह घोषणा की है कि हर जिला मुख्यालय में योग उद्यान बनाया जाएगा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इसी जगह इसी कॉलम में बरसों से यह मांग करते आ रहे हैं कि योग उद्यान बनाकर जनता को सेहतमंद रखने की एक लगभग मुफ्त कोशिश करनी चाहिए ताकि सरकार पर बीमार और इलाज का खर्च न आए। कई किस्म की गंभीर बीमारियां भी इस मुफ्त की जीवनशैली से घट सकती हैं, जिंदगी बढ़ सकती है, और चुस्त-दुरुस्त रहने से इंसान की उत्पादकता भी बढऩे की गारंटी रहती है। आज दिक्कत यह है कि खुली हुई जितनी जगह सरकार के पास है, उस पर स्थानीय संस्थाएं और सरकारी संस्थाएं सिर्फ कारोबार के कॉम्पलेक्स बनाने पर आमादा रहती हैं, और जनता की जरूरत के लायक मैदान और बाग-बगीचे बच नहीं जा रहे। देश में सरकार ही जमीनों की सबसे बड़ी मालिक है, इसलिए जमीन तो उसे ही देनी होगी, लेकिन समाज योग प्रशिक्षकों को जुटाने में मदद कर सकता है, और बहुत मामूली से खर्च से लोगों की जिंदगी को बहुत ही सेहतमंद बनाया जा सकता है, बीमारियों से लोगों को बचाया जा सकता है जो कि आगे चलकर सरकारी खर्च में बचत का एक तरीका भी साबित होगा। छत्तीसगढ़ में अभी हम शहरों की सार्वजनिक जगहों पर म्युनिसिपल द्वारा लगाई गई कसरत की मशीनों को देखते हैं जिन पर लोग दिखते ही हैं। जो लोग कसरत करते हैं, उनके लिए योग को अपनाना आसान भी रहता है, और राजधानी रायपुर के बगीचों में ये दोनों काम साथ-साथ करते हुए लोगों की भीड़ दिखती है। योग उद्यान बनाने के साथ-साथ जो मौजूदा उद्यान हैं, उनमें भी सरकार को थोड़ी सी पहल करके जनता के बीच के लोगों में से ही वालंटियर योग प्रशिक्षक तलाशने चाहिए। दूसरी तरफ स्कूल और कॉलेज भी खेलकूद के साथ-साथ योग को अपना सकते हैं, और इससे नफा छोड़ कोई नुकसान नहीं होगा।
अभी हमारे सामने 31 मार्च 2012 का संपादकीय है जिसमें हमने लिखा था-'....हम समाज और सरकार दोनों के स्तर पर एक सेहतमंद जीवनशैली के लिए जागरूकता के एक बड़े अभियान को तुरंत शुरू करने की मांग करते हैं। इसके तहत हर शहर और कस्बे में लोगों के लिए साफ हवा में घूमने-फिरने, कसरत करने, बीमारियों से बचाव की जानकारी पाने, योग और प्राणायाम के विवादहीन तरीकों को बढ़ावा देने का इंतजाम करना चाहिए। एक योजना के तहत सरकार ही जिला स्तर से शुरू करके बाद में और नीचे के स्तर तक ऐसे प्राकृतिक केंद्र विकसित कर सकती है जिनमें पेड़ों के बीच साफ और खुली हवा में ऐसे तमाम काम चल सकते हों। यह बात हम पहले भी सरकार को सुझा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जहां पर कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं, और मंत्रिमंडल में बहुत से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हैं, वहां पर फिर ऐसी जरूरत के लिए जागरूकता आसानी से आनी चाहिए। समाज अपने-आपमें इतने बड़े प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र खुद तो नहीं बना सकता, लेकिन वह सरकार को इसके लिए  तैयार जरूर कर सकता है...'

भाजपा का राष्ट्रपति प्रत्याशी घोषित, विपक्ष का पता नहीं

संपादकीय
19 जून 2017


राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के मौजूदा राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करके भाजपा ने एनडीए के भीतर और बाहर यह जाहिर कर दिया है कि उसे बहुमत या सर्वमत की कोई जरूरत नहीं है, और वह बाकी साथियों के बिना भी अपनी मर्जी से राष्ट्रपति बनवा सकती है। एक पढ़े-लिखे, वकालत किए हुए, और दो बार राज्यसभा सदस्य रहे एक दलित नेता को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने मुख्य विपक्ष कांग्रेस-यूपीए के सामने भी यह दिक्कत खड़ी की है कि वह एक दलित के नाम का विरोध कैसे करे? और यह बात तो है ही कि विपक्ष के पास अभी तक किसी एक नाम पर व्यापक सहमति का आसार भी नहीं दिख रहा है। यह एक अलग बात है कि विपक्ष के बीच किसी नाम पर गंभीरता से चर्चा भी सुनाई नहीं दे रही है।
राष्ट्रपति के नाम पर इस जगह बहुत कुछ लिखने का नहीं है, लेकिन इससे दो बातें साफ होती हैं, एक तो यह कि एनडीए के भीतर भाजपा को किसी सहमति की अब खास जरूरत नहीं लगती है, यह महज इस फैसले से साबित नहीं होता, बल्कि भाजपा के पूरे रूख से उसका यह नया आत्मविश्वास दिखाई देता है। दूसरी तरफ खाली बैठे हुए विपक्ष के पास किसी सहमति तक पहुंचने की ताकत भी नहीं दिख रही है, और अब तक तो गैरएनडीए पार्टियों की कोई ऐसी महत्वपूर्ण बैठक भी नहीं हुई है जिसमें किसी उम्मीदवार के नाम पर कोई चर्चा हो सके। कुल मिलाकर, घूम-फिरकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आसपास कुछ लोग जुटते हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी खो चुकी ताकत के बाद अब कोई वजन भी नहीं रखती। राष्ट्रपति चुनाव के इस मौके पर देश में दो बड़े गठबंधनों के बीच शक्ति संतुलन का एक नया सुबूत सामने आया है, और भाजपा का एक नया राजनीतिक भविष्य भी इससे साफ दिखाई देता है। इस चुनाव के बाद विपक्ष को भी इस देश में विपक्ष की भूमिका के बारे में सोचना चाहिए कि अगर वे राष्ट्रपति चुनाव के वक्त भी एक होकर नहीं बैठ सकते, तो फिर वे देश के चुनाव में किस तरह कोई गठबंधन बना पाएंगे। आज जिस तरह राहुल गांधी कांग्रेस के भीतर कांग्रेस की संभावनाओं पर एक बड़ा स्पीड ब्रेकर हैं, ठीक उसी तरह देश में विपक्ष की एकजुटता की संभावना में कांग्रेस एक बाधा दिखाई पड़ रही है। इस नौबत से उबरे बिना देश में भाजपा-एनडीए का विकल्प खड़ा नहीं होने वाला है।
भाजपा के अध्यक्ष सहित कई लोगों का यह रूख पिछले दिनों सामने आया कि वह महज सहमति की कोशिश कर रही है, उसे किसी अनुमति की जरूरत नहीं है। लोगों को याद होगा कि लंबे समय तक देश और प्रदेशों में कांग्रेस का राज चलते रहा, और वह पार्टी अपनी मर्जी से कई ऐसे राष्ट्रपति बनाते रही जो कि शर्मनाक साख वाले थे। लेकिन जिस तरह पुरानी कहावतों में कहा जाता है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, संसदीय लोकतंत्र में भी गिनती ऐसे ही मायने रखती है कि जिसके सांसद-विधायक, उसी का राष्ट्रपति।

राहत, मदद, और मुआवजे का राजनीतिक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए

संपादकीय
18 जून 2017


जब कोई डॉक्टर स्नायुतंत्र की जांच के लिए लोगों की हड्डियों के जोड़ पर रबर का एक हथौड़ा मारते हैं, तो घुटनों पर इसके पड़ते ही पूरा पैर एक झटके से हिलता है। अंग्रेजी में इसी बात को नी जर्क रिएक्शन कहते हैं कि घुटने पर पड़ा तो बिलबिलाते हुए तुरंत प्रतिक्रिया की। इन दिनों भारत की सरकारें कुछ ऐसा ही कर रही हैं। देश और प्रदेशों में जब कोई ऐसा आंदोलन चलता है जिससे कि मतदाताओं के एक संगठित तबके की सोच पर बड़ा फर्क पड़ सकता है तो सरकारें तुरंत कार्रवाई करती हैं, और उससे भी अधिक कार्रवाई करती हुई दिखना चाहती हैं। मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर पुलिस गोली से तीन मौतें हुई थीं, तो आनन-फानन भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मरने वालों के लिए एक-एक करोड़ रूपए मुआवजे की घोषणा कर दी थी। इसी वक्त उनकी पार्टी के दूसरे मंत्री और नेता यह बयान दे रहे थे कि मरने वाले किसान नहीं थे, वे अराजक तत्व थे जो कि किसान आंदोलन में घुस गए थे। न तो शिवराज सिंह ने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व से ऐसे अभूतपूर्व मुआवजे पर चर्चा की थी, न ही यह सोचा था कि इससे बाकी प्रदेशों, और खुद मध्यप्रदेश पर अभी ऐसी पुलिस-गोली-मौत पर मुआवजे का कैसा दबाव पड़ेगा। यह नी जर्क रिएक्शन दूसरे प्रदेशों में भी जगह-जगह देखने मिल रहा है, और जनमत की नाराजगी से बचने के लिए सरकारें तुरंत हरकत में आई हुई दिखने की कोशिश में ऐसे फैसले लेती हैं जो कि लंबे वक्त में जनता के ही खिलाफ हो जाते हैं।
जनलुभावने फैसले, और जनहित, ये दोनों हमेशा साथ-साथ नहीं चलते। बहुत से ऐसे मौके रहते हैं जिनमें ये दोनों एक बराबरी से कंधे से कंधा टकराते हुए, कदम से कदम मिलाते हुए चलते हैं, लेकिन बहुत से मामलों में ये एक-दूसरे के ठीक खिलाफ भी हो जाते हैं। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम समाज के भीतर मर्दों को खुश करने के लिए एक अकेली शाहबानो को कुचलने का कानून बना डाला था, वह उस वक्त मुस्लिम मर्दों के बीच लुभावना मान लिया गया था, लेकिन वह जनहित के ठीक खिलाफ था। ठीक इसी तरह आज देश भर में गाय और बीफ को लेकर बनाए गए कानून, और गैरकानूनी हिंसा को मौन मंजूरी के मामले हैं। ये एक शाकाहारी, हिन्दू, और ऊंची समझी जाने वाली जातियों के बीच लुभावना कानूनी-गैरकानूनी काम तो हो सकता है, लेकिन यह जनहित के ठीक खिलाफ है। ऐसा ही मामला एक करोड़ का मुआवजा देने का है। सरकार के हाथ जनता का खजाना रहता जरूर है, लेकिन वह किसी बादशाह की मर्जी पर गले से उतारकर दी गई मोतियों की माला की तरह का नहीं रहता है, वह एक लोकतांत्रिक और सरकारी समझ के साथ, नियमों के भीतर, और दीर्घकालीन सोच का रहना चाहिए।
देश में जगह-जगह केन्द्र और राज्य सरकारें किसी कुदरती या इंसानी हादसे के बाद तरह-तरह के मुआवजों का ऐलान करती हैं। देश में एक मुआवजा नीति बनाई जानी चाहिए जिसे संघीय ढांचे के तहत व्यापक सहमति के दायरे में लाने की जरूरत है। इससे मुआवजे की लुभावनी घोषणा करके मतदाता-तबके के बीच राजनीतिक-लोकप्रियता पाने का सत्तारूढ़ नेताओं का उतावलापन काबू में आएगा। केन्द्र और राज्य के बीच, और अलग-अलग राज्यों के बीच भी अलग-अलग जिंदगियों की कीमत, या कि राहत तय करने के स्पष्ट पैमाने बनने चाहिए, वरना आज तो कई हताश-निराश किसान ऐसे भी हो सकते हैं जो कि किसी आंदोलन में अपनी जान देकर परिवार को एक करोड़ रूपए का मुआवजा दिलवाने को अपनी जिंदगी से बेहतर मान लेंगे। हमारा ख्याल है कि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर हर इंसानी जिंदगी का कई तरह का बीमा भी करवा सकती हैं, और अलग-अलग मुआवजों के बजाय लोगों को अपने हक से बीमे का दावा-भुगतान पाने दे सकती है। दुर्घटनाओं को लेकर पहले से ऐसे बीमे रहते हैं, और बाकी हादसों के लिए भी इसका इंतजाम होना चाहिए। ऐसी कोई तर्कसंगत वजह नहीं हो सकती कि किसी सड़क हादसे में अकेले मरने वाले के परिवार को किसी मुआवजे का हकदार न माना जाए, और जब दर्जन भर लोग एक हादसे में एक साथ मर जाएं, तो उन सबके परिवारों को मुआवजे का ऐलान सरकार करे। ऐसी मौत अकेले हो, या औरों के साथ हो, परिवार पर उनका असर एक जैसा ही पड़ता है।
फिलहाल देश भर में किसान आंदोलनों के चलते हुए मौत पर मुआवजे से परे भी तरह-तरह की कर्जमाफी की घोषणा हो रही है, अगले चुनावों के घोषणा पत्र अभी से घोषित किए जा रहे हैं कि किसी पार्टी की सरकार आने पर किसानों के लिए क्या-क्या किया जाएगा। ऐसी बिलबिलाहट से उपजी ऐसी प्रतिक्रिया से देश के दूसरे तबकों के भीतर भी यह बात घर कर जाती है कि हिंसक आंदोलन बिना कोई मांग पूरी नहीं हो सकती, या कि बड़ी संख्या में आत्महत्याओं के बाद भी सरकार के कानों पर जूं रेंगना शुरू करती हैं। सरकारें चूंकि पांच बरस की निरंतरता के साथ आती हैं, और राजनीतिक दलों को ऐसे एक कार्यकाल से अधिक के लिए भी सोचना पड़ता है, या कम से कम सोचना चाहिए, फिर बड़े राजनीतिक दल एक से अधिक राज्यों के लिए एक सरीखी जवाबदेही का बोझ भी ढोते हैं, इसलिए राहत, मदद, और मुआवजे की नीतियों का राजनीतिक-लुभावनीकरण नहीं किया जाना चाहिए, इससे देश बर्बाद होता है। किसानों को बचाना हो, या किसी और तबके को पैरों पर खड़ा करना हो, उन्हें लगातार बैसाखियों से बांधकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए लंबी सोच के साथ ठोस योजनाएं बनानी चाहिए जो कि उतनी लुभावनी नहीं लगेंगी जितनी कि एक करोड़ के मुआवजे की मुनादी लगती है, लेकिन वैसी आत्मनिर्भरता ही उन तबकों और बाकी देश, सबके भले की होगी।

शौचालय तो अच्छे हैं, लेकिन हत्या करके लागू करना वैसा ही है जैसा इमरजेंसी में नसबंदी...

संपादकीय
17 जून 2017


राजस्थान में खुले में शौच रोकने के लिए एक म्युनिसिपल के लोग शौच करती महिलाओं की तस्वीरें खींच रहे थे, और इनका विरोध करने पर एक सामाजिक कार्यकर्ता को पीट-पीटकर मार डाला गया। देश में खुले में शौच को रोकने का एक बड़ा अभियान चल रहा है जिसमें प्रधानमंत्री से लेकर अमिताभ बच्चन तक सभी जुटे हुए हैं, और सरकारें खूब बड़ी रकम खर्च करके गांव-गांव में, घर-घर में शौचालय बना रही हैं। शौचालय बनाने के आंकड़े जिले के अफसरों को प्रधानमंत्री के हाथों सम्मान और पुरस्कार दिलवा रहे हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में दर्जनों जगहों से खबरें आई हैं कि रिकॉर्ड बनान के लिए, अपने जिले या अपने म्युनिसिपल को ओडीएफ घोषित करवाने के लिए अफसरों ने फर्जी आंकड़े गढ़ लिए, और अधूरे पड़े शौचालयों को इस्तेमाल होते बता दिया, पूरा बना हुआ बता दिया।
खुले में शौचालय एक सामाजिक शर्मिंदगी की बात भी है, और यह सेहत के लिए खराब भी है। इंसान की न्यूनतम प्रतिष्ठा के लिए भी यह जरूरी है कि उसे खुले में शौच न करना पड़े, और खासकर बेबस होकर न करना पड़े। यह एक अलग बात है कि गांवों में लोगों का खेत या मैदान जाना, या नदी-तालाब जाना सामाजिक संपर्क और संबंध का एक जरिया भी रहता है, लेकिन फिर भी यह तो मानना ही होगा कि शौचालय न होने की वजह से ऐसा होना शर्मिंदगी भी है, और खतरनाक भी है। बहुत सी महिलाएं रात-बिरात खुले में शौच के लिए आबादी के बाहर आते-जाते बलात्कारी मर्दों के हमले का शिकार भी होती रहती हैं। इसलिए सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना अच्छी है, और जनता को सरकार से पूरी की पूरी रकम की मदद भी मिल रही है।
लेकिन किसी भी, और कितनी भी अच्छी योजना को लागू करने के तौर-तरीके उस योजना को बुरा बनाने में देर नहीं करते। लोगों को याद होगा कि किस तरह इमरजेंसी में संजय गांधी के लगाए नारे को पूरा करने के लिए देश भर की सरकारी मशीनरी झोंक दी गई थी, और आबादी पर काबू पाने के लिए नसबंदी का अभियान चलाया गया था। आबादी घटाना बुरी बात नहीं है चाहे वह देश की हो, चाहे वह परिवार की हो। और गरीब परिवारों में अगर बच्चे कम रहें, तो उनकी जिंदगी बेहतर होती है इसमें भी कोई शक नहीं है। लेकिन इस अच्छे नारे पर इतना बुरा अमल हुआ था कि नसबंदी इस देश के इतिहास में एक बदनाम और हैवान शब्द हो गया, और संजय गांधी इसी एक बात को लेकर देश के सबसे बड़े खलनायक हो गए। सरकारी अमले ने सरकार के दिए हुए टारगेट को पूरा करने के लिए राह चलते कुंवारे लड़कों को भी पकड़-पकड़कर उनकी नसबंदी करवा दी थी, और देश में सेंसरशिप की वजह से ऐसी ज्यादती की खबरें भी नहीं आती थीं। नतीजा यह हुआ कि जब तक इंदिरा-संजय को जनता पर जुल्म का अंदाज लग पाता, उसके पहले उनकी हार तय हो चुकी थी।
आज शौचालय न रहने पर जगह-जगह अफसर लोगों का रियायती राशन बंद कर रहे हैं, उनके किसी भी तरह के सरकारी कामकाज पर रोक लगा रहे हैं, और शौच पर जाती महिलाओं की तस्वीरें खींचना, उन पर टॉर्च की रौशनी डालना जैसे बहुत से घटिया तौर-तरीके इस्तेमाल किए जा रहे हैं। अभी घर-घर में शौचालय से आने वाली दो दिक्कतों का अंदाज भी नहीं लगाया गया है कि इनके लिए पानी कहां से आएगा, और जब इनके नीचे बने टैंक भर जाएंगे, तो उनकी सफाई कौन करेंगे? ये दो बुनियादी सवाल बेजवाब खड़े हुए हैं, और कुछ दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह भी मानना है कि इसके बाद तो पूरी जिंदगी के लिए भारत के गांव-गांव में सिर पर मैला ढोना जारी रहने की गारंटी हो गई है। शहरों में तो म्युनिसिपल की मशीनें आकर पखानों के टैंक साफ कर जाती हैं, लेकिन गांव-गांव में जहां पानी नहीं है, वहां ऐसी मशीनें कहां से आएंगी? फिर यह भी समझने की जरूरत है कि जिन जगहों पर मीलों दूर से सिर पर पानी लेकर आना घर की महिला की मजबूरी रहती है, उन जगहों पर ऐसे पखानों में खुले मैदान की शौच के मुकाबले कई गुना पानी लगेगा, और वह पानी भी पूरे परिवार के लिए महिला ही ढोकर लाएगी। पानी का ढांचा विकसित हुए बिना शौचालयों की ऐसी आक्रामक और हिंसक अनिवार्यता जनता के बुनियादी हक को कुचलना भी है। अगर स्थानीय अधिकारियों की ऐसी हैवानियत किसी भी अदालत में जाएगी, तो अधिकारी सजा पाएंगे। फिलहाल राजस्थान में सामाजिक कार्यकर्ता को सरकारी अमले ने जिस तरह पीट-पीटकर मार डाला है, उससे सबकी आंखें खुलनी चाहिए, और सरकारों को चाहिए कि अपने मैदानी अमले को कानून के भीतर रहकर काम करने की समझाईश दें। शौचालय अच्छी बात है, यह बात ठीक वैसी ही है कि तानाशाही के मुकाबले लोकतंत्र अच्छी बात है। लेकिन इराक में लोकतंत्र कायम करने के लिए अमरीकी बमबारी से जिस तरह लाखों लोगों की मौत हुई है, वह लोकतंत्र लाने का सही तरीका नहीं है। इसी तरह लोगों की शौच करते तस्वीरें खींचना, और विरोध करने वालों को मार डालना, शौचालय को बढ़ावा देने का तरीका नहीं है, और केन्द्र से लेकर राज्यों तक हर सरकार को अपने तौर तरीके तुरंत दुबारा जांचने चाहिए।

राष्ट्रपति के लिए जरूरी बहुमत से आगे बढऩा बुरा नहीं होगा...

संपादकीय
16 जून 2017


राष्ट्रपति चुनाव को लेकर देश में गहमागहमी बनी हुई है, और कुछ लोग इसे आम सहमति या सर्वसम्मति बनाने का एक मौका देख रहे हैं, तो कुछ लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा-एनडीए अगर अपने बहुमत से अपनी पसंद के किसी को राष्ट्रपति बना सकती है, तो उसे सर्वसम्मति की कोशिश क्यों करनी चाहिए? इस मौके पर एनडीए गठबंधन के भीतर भी शिवसेना शतरंज की बिसात पर ढाई घर चलने वाले घोड़े की तरह दिख रही है, दूसरी तरफ विपक्ष के पास अब तक कोई सर्वसम्मत नाम नहीं दिख रहा है जिसे कि एनडीए उम्मीदवार के सामने खड़ा किया जा सके। एनडीए के मुकाबले देश के सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी से दो बड़े ताकतवर केन्द्रीय मंत्री, राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू, जाकर मिले भी हैं, और उनसे यूपीए की किसी पसंद के बारे में पूछा। लोकतंत्र में आम सहमति का बड़ा महत्व होता है, और लोगों को विरोधियों के साथ की जरूरत न हो, तब भी उन्हें साथ रखने की कोशिश करनी चाहिए, और हो सकता है कि एनडीए या भाजपा के भीतर ऐसी सोच वाले भी कुछ लोग हों। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे लोग भी जरूर होंगे जो कि यह मानकर चल रहे होंगे कि सर्वसम्मति बनाने का बोझ हमेशा भाजपा के सिर पर क्यों आना चाहिए, और जब जनता ने एनडीए को विशाल बहुमत से जिताया है, राज्यों में भी उसे सत्ता दी है, तो फिर सर्वसम्मति की अधिक परवाह क्यों करनी चाहिए?
पिछले तीन बरस में मोदी सरकार के कामकाज में बहुत सी ऐसी बातें आई हैं जिनमें उसे अपनी पुरानी राजनीतिक घोषणाओं के खिलाफ जाकर पिछली यूपीए सरकार की बड़ी-बड़ी नीतियों को मानना पड़ा, उन पर अमल करना पड़ा, और उसके लिए एक बार फिर यूपीए का साथ लेना पड़ा। ऐसे दो सबसे बड़े मामले आधार कार्ड और जीएसटी के हैं। आधार कार्ड का भाजपा-एनडीए ने जमकर विरोध किया था, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी को जब आधार कार्ड योजना के संस्थापक नंदन निलेकेणि ने इस बारे में समझाया, तो एक बैठक के बाद ही प्रधानमंत्री इसके दीवाने हो गए, और उन्होंने इस योजना को यूपीए के मुकाबले कहीं आगे बढ़ाने की कोशिश की, और सरकारी काम के, सार्वजनिक जीवन के, और निजी जिंदगी के हर पहलू में इसे अनिवार्य बना दिया। यहां तक कि केन्द्र सरकार आधार कार्ड की अनिवार्यता के लिए सुप्रीम कोर्ट से टकराव ले रही है, जबकि यह सत्ता में आते ही इसे खारिज करने वाली थी। ऐसा ही दूसरा मामला जीएसटी का है। भारत के इतिहास का यह सबसे बड़ा टैक्स कानून यूपीए का बनाया हुआ है, और भाजपा ने इसका जमकर विरोध किया था, भाजपा के राज्यों से आए हुए मंत्री उस वक्त मनमोहन सरकार के साथ बैठकों में इसे देश को तबाह करने वाला कानून बताते थे। लेकिन अब केन्द्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने यूपीए के सांसदों को मनाकर, पार्टियों से अपील करके इस कानून को लागू करवाने में कमरतोड़ मेहनत की, और अब यह लागू होने जा रहा है।
इसलिए लोकतंत्र में आम सहमति या सर्वसम्मति का अपना एक महत्व होता है, सत्ता के बाहुबल का बहुमत साथ हो, तो भी लोगों को एक लोकतांत्रिक सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए। राष्ट्रपति का भारत में ऐसे तो रोजमर्रा के किसी काम में कोई दखल नहीं होता है, लेकिन बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें विपक्ष भी राष्ट्रपति तक अपनी मांगों या शिकायतों को लेकर पहुंचता है, और वैसे में अगर राष्ट्रपति सबके भरोसे के हैं, तो पक्ष-विपक्ष का टकराव घटने के आसार रहते हैं। एनडीए को आज चाहिए कि वह बहुमत के बाद भी अधिक से अधिक लोगों की सहमति जुटाने की कोशिश करे, और संसद के भीतर, या विधानसभाओं में उसे अपनी पसंद के राष्ट्रपति के लिए चाहे और वोटों की जरूरत न हो, उसकी पसंद को अगर जरूरत से ज्यादा वोट मिलते हैं, तो यह एनडीए की लोकतांत्रिक-कामयाबी होगी। देश में ऐसी चर्चा है कि एक दलित या आदिवासी महिला को भाजपा राष्ट्रपति पद के लिए पसंद कर सकती है, अगर ऐसा होता है, या कि किसी दूसरे भले नाम को आगे बढ़ाया जाता है, तो विपक्ष को भी बहुमत की पसंद का साथ देना चाहिए।

कामयाबी के ताजमहल बनाने के मुकाबले, और आम काम

संपादकीय
15 जून 2017


भारत के दो दर्जन से अधिक राज्यों में अब तो आधे राज्यों पर भाजपा की सरकार हो गई है, लेकिन एक वक्त था जब शायद दर्जनभर अलग-अलग पार्टियों की सरकारें राज्यों में रहती थीं, और उनके बीच एक राजनीतिक मुकाबला भी चलता था, और इन राज्यों के बड़े अफसरों के बीच भी अपने कामकाज को बेहतर दिखाने के लिए दिल्ली में भारत सरकार की बैठकों में एक मुकाबला होता था। अलग-अलग राज्यों की स्थितियां और अर्थव्यवस्था अलग-अलग रहती हैं, और उनकी चुनौतियां भी अलग-अलग रहती हैं, लेकिन फिर भी राज्यों की तुलना तो होती ही है। भारत सरकार के आंकड़ों में राज्यों की स्थितियों की तुलना तो एक बात रहती है, जनता के बीच यह भी गिना जाता है कि किस राज्य में किस पार्टी या नेता ने कितने बार सत्ता हासिल की है। ऐसे में अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के कामकाज को भी आंका जाता है, और छत्तीसगढ़ जैसे नए बने हुए राज्य की तुलना उसी के साथ राज्य बने हुए उत्तराखंड और झारखंड से कई पैमानों पर होती है। अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के कामकाज की अलग-अलग शैली भी होती है, और शायद ऐसी विविधता ही भारत के लोकतांत्रिक-संघीय ढांचे को बेहतर बनाने में काम भी आती है। राज्यों और नेताओं को एक-दूसरे से सीखने के लिए बहुत कुछ रहता है, और पार्टी के भीतर भी अलग-अलग नेता अपनी कायम की हुई मिसालों को लेकर एक-दूसरे को अघोषित चुनौती देते हुए भी खड़े रहते हैं।
सत्ता पर बैठे कुछ नेता और अफसर उदारता से दूसरे लोगों की कामयाबी को देखकर उसे मंजूर भी कर लेते हैं, और उनसे सीखने की कोशिश भी करते हैं। कई बार सीखकर किए हुए काम और बेहतर भी हो जाते हैं। राज्य के भीतर भी कई जिलों के अफसर अपनी मेहनत से बाकी जिलों के सामने एक चुनौती खड़ी करते हैं, और छत्तीसगढ़ में हम अफसरों के बीच ऐसा मुकाबला देखते भी आए हैं। ऐसे ही मंत्रियों के बीच भी अपने चुनाव क्षेत्र में काम करवाने को लेकर मुकाबला चलता है, और काबिल और कामयाब मंत्री अपने विभाग के कामकाज को दूसरे विभागों से बेहतर बनाने के लिए मेहनत करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नेता या अफसर के लिए सबसे बड़ी कामयाबी क्या हो सकती है?
कामयाबी के साथ एक दिक्कत यह है कि जब तक उसकी शिनाख्त न हो सके, जब तक वह अलग हटकर न दिखे, तब तक वह दिखती ही नहीं है। नतीजा यह होता है कि नेता और अफसर अलग हटकर किए जाने वाले कामों को लेकर इतनी मेहनत करते हैं कि जो न दिखने वाले आम काम रहते हैं, वे अनदेखे रह जाते हैं। चुनाव के वक्त लोगों को गिनाने के लिए कुछ बड़े काम जरूरी रहते हैं, बहुत से छोटे-छोटे कामों की कामयाबी न तो गिनाई जा सकती, और न ही वह लोगों को प्रभावित करती है। अफसरों के मामलों में भी यह है कि उन्हें चुनाव तो नहीं लडऩा पड़ता, लेकिन आज प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी प्रधानमंत्री के स्तर पर मिलने वाले पुरस्कार और सम्मान को पाने के लिए एक होड़ रहती है, और उनके जिलों या उनके शहरों की बाकी छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने पर किसी तरह का कोई सम्मान नहीं रहता है। ऐसे मुकाबले के चलते हुए माहौल कुछ इस तरह का रहता है कि स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में किसी की दिलचस्पी पास होने से अधिक की नहीं रहती, और आगे बड़े कॉलेज में दाखिले के मुकाबले में कामयाबी सबके लिए मायने रखती है। स्कूलों की पढ़ाई धरी रह जाती है, और प्रवेश परीक्षाओं के कामयाब लोग वाहवाही पाते हैं।
लेकिन यह लोकतंत्र के लिए एक घातक स्थिति भी है कि लोकप्रियता के पैमानों पर ऊपर पहुंचने के लिए, और कामयाबी के कुछ चुनिंदा मुकाबलों में जीतने के लिए लोगों की ताकत अनुपातहीन तरीके से लग जाती है, और जनता की जिंदगी में मायने रखने वाले छोटे-छोटे काम धरे रह जाते हैं। होना तो यह चाहिए था कि जनता चुनाव के वक्त ऐसे छोटे-छोटे कामों को भी याद रखती, लेकिन इंसानी मिजाज ऐसा रहता है कि वह बड़े-बड़े गिनाने लायक कामों को तो याद रखता है, बाकी चीजों को याद नहीं रखता। मतदाता की परिपक्वता जब तक नहीं बढ़ेगी, तब तक यह नौबत बनी रहेगी कि नेता और अफसर अपनी कामयाबी के ताजमहल बनाने में लगे रहेंगे, और नालियां भरी रहेंगी, घूरे पहाड़ बनते रहेंगे। लोकतंत्र में जनता की जागरूकता और उसकी समझ में कमी के चलने तक यह नौबत सुधरने की नहीं है।

केंद्र सरकार की अवैज्ञानिक सोच की मिसालें खतरनाक

संपादकीय
14 जून 2017


केंद्र सरकार के एक मंत्रालय की बुकलेट में गर्भवर्ती महिलाओं को सेक्स और मांसाहार से दूर रहने की सलाह दी गई है ताकि उनके बच्चे अच्छे हो सकें, उनकी सेहत ठीक रह सके। आयुष मंत्रालय ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वस्थ्य जच्चा और सेहतमंद बच्चे के लिए सलाह दी है कि गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान इच्छा, क्रोध, लगाव, नफरत और वासना से खुद को अलग रखना चाहिए। साथ ही बुरी सोहबत से भी दूर रहना चाहिए। हमेशा अच्छे लोगों के साथ और शांतिप्रिय माहौल में रहें। आयुष मंत्रालय ने मदर एंड चाइल्ड केयर नामक बुकलेट जारी की है जिसमें, ये सलाह दी गई हैं।
आयुष मंत्रालय की सलाह यहां तक सीमित नहीं रही। मंत्रालय आगे कहता है कि यदि आप सुंदर और सेहतमंद बच्चा चाहती हैं तो महिलाओं को इच्छा और नफरत से दूर रहना चाहिए, आध्यात्मिक विचारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। अपने आसपास धार्मिक तथा सुंदर चित्रों को सजाना चाहिए। केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने पिछले सप्ताह इस बुकलेट को नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय स्वास्थ्य संपादकों के एक सम्मेलन में जारी किया था।
यह केंद्र सरकार में बैठे हुए लोगों की अवैज्ञानिक सोच की ताजा मिसाल है जिसमें लोगों के खानपान को प्रभावित करने की कोशिश भी है, धर्म को लादने की भी कोशिश है, और यह निहायत झूठी बात फैलाई जा रही है कि गर्भवती महिला को सेक्स से दूर रहना चाहिए। इस रिपोर्ट के आते ही भारत के बड़े-बड़े डॉक्टरों ने खुलकर इस झूठ का खंडन किया है और इसे पूरी तरह अवैज्ञानिक बताया है। यह बात किसी आम समझ के इंसान के भी गले नहीं उतर सकती कि सरकार के खर्च पर अवैज्ञानिक बातों को इतनी बेशर्मी के साथ कोई कैसे फैला सकते हैं?
आज देश में वैज्ञानिक सोच न होने से जगह-जगह महिलाओं की हत्या हो रही है क्योंकि आसपास के लोगों को उनके टोनही होने का शक रहता है। रायपुर में ही आज एक नौजवान ने इसी शक में अपनी मां की हत्या कर दी, इसी प्रदेश के एक दूसरे शहर में एक महिला के बदन में मिर्च डाल दी गई, और झारखंड की रिपोर्ट है कि वहां कितनी ही महिलाएं डायन कहकर मार डाली जा रही हैं। जब देश में अंधविश्वास इतना फैला हुआ हो, तो सरकार को न सिर्फ वैज्ञानिकता को बढ़ावा देना चाहिए, बल्कि समाज में चली आ रही बुरी बातों को खत्म करने के लिए एक आधुनिक सोच को भी बढ़ाना चाहिए। ऐसे में धर्म को बढ़ावा देना, मांसाहार के खिलाफ मुहिम चलाना, इन सबके लिए सरकार का इस्तेमाल करना, देश में अंधविश्वास के खतरे को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं है।
एक तरफ तो भारत चिकित्सा विज्ञान में इतना आगे बढ़ गया है कि दुनिया के विकसित देश के लोग भी सर्जरी कराने हिंदुस्तान आ जाते हैं क्योंकि यहां पर उत्कृष्टता विश्वस्तर की है, और खर्च बहुत कम है। दूसरी तरफ इस तरह का पाखंड, इस तरह का अंधविश्वास बढ़ाते चलना सरकार की दिमागी कमजोरी भी बताता है। इस बुकलेट के हिसाब से तो किसी नास्तिक महिला का बच्चा सेहतमंद हो ही नहीं सकता क्योंकि वह महिला आसपास धार्मिक वातावरण क्यों रखेगी? सरकार को तो यह सोचना चाहिए कि आज देश में जितने तरह की हिंसा हो रही है और जो टीवी के परदों के रास्ते गर्भवर्ती महिलाओं को भी देखनी पड़ रही है, उसे कम कैसे किया जाए?

पुलिस और हिंसक भीड़, दोनों पर नजर रखने वर्दी-कैमरे हों

संपादकीय
13 जून 2017


मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन में शामिल कांग्रेस की एक महिला विधायक का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे भीड़ से थाने में आग लगाने को कहते दिख रही हैं। इसे लेकर उनके खिलाफ पुलिस ने जुर्म कायम किया है। ऐसा देश भर में जगह-जगह बहुत से नेताओं के मामले में होता है कि वीडियो रिकॉर्डिंग रहने पर वे फंस जाते हैं, और अदालत तक सुबूतों में घिरे-घिरे पहुंच जाते हैं। लेकिन अधिकतर मामलों में सार्वजनिक जगहों पर जुर्म करने वाले, हिंसा भड़काने वाले लोग अगर कैमरों में कैद नहीं है, तो बच निकलते हैं।
इसका एक आसान तरीका भारत की पुलिस को इस्तेमाल करना चाहिए जो कि बहुत से विकसित देशों में अनिवार्य रूप से हो रहा है। हालांकि पुलिस या सत्ता इसे पसंद नहीं करेंगे, लेकिन मानवाधिकार आयोग या सर्वोच्च न्यायालय इसका हुक्म दे सकते हैं। पश्चिमी देशों की पुलिस की वर्दी पर सामने एक बॉडी-कैमरा लगा होता है जो उनकी लोगों से बातचीत को भी रिकॉर्ड करता है, और सामने के नजारे को भी। ऐसे में जब पुलिस पर ज्यादती के आरोप लगते हैं, तब भी इन कैमरों की रिकॉर्डिंग काम आती है, या कि जब किसी मुजरिम या किसी गवाह से पुलिस बातचीत करती है, तो उस बातचीत की रिकॉर्डिंग भी अदालत में सुबूत की तरह काम आती है। आज टेक्नालॉजी इतनी सस्ती हो गई है कि ऐसे कैमरे कुछ हजार रूपए में मिल जाते हैं, और इनके इस्तेमाल से पुलिस का अपना चाल-चलन, उनका व्यवहार, इन सबमें भी सुधार आना तय है।
भारत में भी दफ्तरों से बाहर सड़कों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर लोगों के बीच काम करने वाली पुलिस को ऐसे कैमरों से लैस किया जाना चाहिए। और आज तो संचार सुविधा भी इतनी सस्ती हो गई है कि इन कैमरों की रिकॉर्डिंग सीधे ही पुलिस कंट्रोल रूम में दर्ज की जा सकती है, और बाद में भीड़ और पुलिस पर लगने वाले अलग-अलग आरोपों का निपटारा आसान हो सकता है। सत्ता शायद ऐसा पसंद न करे क्योंकि उसकी मर्जी के मुताबिक काम करते हुए भी पुलिस कई बार हिंसा या ज्यादती करती है, और कई बार पुलिस अपनी मर्जी से भी हिंसा पर उतारू हो जाती है, लेकिन ऐसे कैमरे पुलिस की हिंसा को भी काबू करेंगे, और भीड़ की हिंसा के सुबूत भी दर्ज करते चलेंगे।
मानवाधिकार की रक्षा करने के लिए भी ऐसी टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जरूरी है, और इससे बयान और सुबूत के लंबे-चौड़े काम में भी पुलिस को मदद मिलेगी, और यह निपटारा जल्द हो सकेगा। मध्यप्रदेश में जिन लोगों के ऊपर हिंसा भड़काने के लिए मुकदमे दर्ज हुए हैं, उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों, उनके लिए उनके वीआईपी दर्जे के मुताबिक अधिक कड़ी सजा का इंतजाम किया जाना चाहिए, आम इंसान को ऐसी सार्वजनिक हिंसा पर अगर चार बरस की कैद मिलना है, तो विधायक को छह बरस और सांसद को आठ बरस की सजा मिलनी चाहिए। ऐसी सजा दिलाने में भी पुलिस के वर्दी-कैमरे कारगर साबित होंगे। और यह बात तो है ही कि ऐसी किसी भी नई टेक्नालॉजी के उपकरणों की खरीदी में सरकार में बैठे बहुत से लोगों का बड़ा उत्साह रहता है, कम से कम उसके चलते ही ऐसे कैमरे आ जाएं।