अन्ना का यह फिलहाल-अंत भारतीय लोकतंत्र के हित में


29 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
अन्ना का यह फिलहाल-अंत भारतीय लोकतंत्र के हित में

अन्ना हजारे ने भारत के लोकतंत्र के लिए, यहां के संविधान के लिए, यहां की संसद के लिए जो हिकारत दिखाई, लोगों के बीच इस देश के संस्थानों के खिलाफ जो अनास्था बोई और रात-दिन खाद-पानी देकर उस फसल को लहलहाने का भी काम किया, वह सब जनता को थका देने वाला था। एक वक्त ऐसा था जब एक तबके ने इस देश के लोगों को भड़का कर अयोध्या की तरफ रवाना कर दिया था और बाबरी मस्जिद को गिरवा दिया था। लेकिन दोबारा आज धर्मान्धता को, साम्प्रदायिकता को राजनीतिक मकसद से उस तरह कोई फिर इस्तेमाल कर सके, ऐसी कोई कल्पना भी नहीं करता, खुद मंदिरमार्गी भी नहीं करते। ऐसा ही तजुर्बा इमरजेंसी का रहा, और इस देश में कोई दोबारा वैसे दौर की कल्पना नहीं कर सकता। अन्ना हजारे ने भी देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन के नाम पर जो मनमानी की, नेताओं और अफसरों के सारे तबके को, संसद को जिस तरह से गालियां दीं, उनका एक न एक दिन इस देश की अमनपसंद जनता के बर्दाश्त से बाहर होना ही था, और वह बहुत जल्द हो गया। अन्ना के साथ एक दूसरी दिक्कत यह रही कि वे जिस लोकतंत्र और जनता की बात हर सांस के साथ बोल रहे थे, उसी जनता को उन्होंने तानाशाही के अपने साम्राज्य रालेगान सिद्धी में अपने गुलामों की तरह रखा। वहां उन्होंने पंचायत के चुनाव नहीं होने दिए, शराब पीने वालों को मंदिर में कसम दिलाने और खंभे से बांधकर कोड़े लगाने जैसे कानून बनाकर लागू किए, लोगों का टीवी पर मनोरंजन धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया और महिलाओं के बारे में घोर अपमान की जुबान का इस्तेमाल किया। उनकी जिस ताजा बात को लेकर अभी लोग हक्का-बक्का हैं, उसमें उन्होंने मुंबई के अनशन के माईक से ही कहा है- बांझ औरत प्रसूता की वेदना को क्या समझेगी?

यह बात इस देश में शोषण का शिकार चली आ रहीं महिलाओं के लिए पुरूष प्रधान समाज की आम हिकारत का ही एक सुबूत है। हमने दर्जन भर से अधिक बार इस जगह इस बात को लेकर अन्ना की आलोचना की है कि उन्होंने लोकपाल मसौदा कमेटी में सरकार के न्यौते पर अपने जिन सदस्यों को रखा, उनमें एक भी महिला नहीं थीं। वैसे तो उसमें एक भी दलित नहीं था, एक भी अल्पसंख्यक नहीं था और समाज के या तथाकथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों के रूप में पांचों कुर्सियों पर अन्ना की टोली का कब्जा पूरी तरह अलोकतांत्रिक और गांधी विरोधी था। लेकिन हम उस बात पर अभी नहीं जा रहे आज हमारी तकलीफ बिना संतान वाली किसी महिला पर अन्ना हजारे के ऐसे घटिया बात को लेकर है। एक महिला जिसे प्राकृतिक कारणों से कोई संतान नहीं हुई है, वह परिवार और समाज के बीच वैसे भी लोगों के ताने और उनकी हिकारत का शिकार होती ही है। इस बात को भारत जैसे समाज में हर कोई अच्छी तरह जानता है। और रात-दिन बोलने वाले अन्ना हजारे जितने बुजुर्ग और अनुभवी को तो यह बात अपने बचपन से ही देखने मिली होगी कि बेऔलाद औरत को एक गाली की तरह कैसे भारतीय समाज इस्तेमाल करता है। ऐसी ही अनगिनत बातों का नतीजा यह रहा कि देश की जनता का अन्ना हजारे के प्रति सम्मान कम होते-होते अब इस कदर घट गया कि वह मुंबई जैसे महानगर में कुछ हजार पर टिक गया। लोगों को याद होगा कि किस तरह अन्ना हजारे ने एक विचलित या प्रचारप्रेमी नौजवान द्वारा शरद पवार पर हमला करने पर खुशी जाहिर की थी। मानो उनकी वह वीडियो क्लिप उनके लिए पर्याप्त आत्मघाती नहीं थी, उन्होंने उसके बाद कई बार उस हमले को न्यायोचित ठहराने की कोशिश की और यहां तक कहा कि शरद पवार और उनके लोग उस थप्पड़ का बुरा क्यों मान रहे हैं? अपने गांव में अपने कद और अपनी शोहरत के आतंक तले तानाशाही चलाने वाले अन्ना हजारे को यह बात ठीक लग सकती है कि सरकार से नाराज या असहमत लोग सरकार को चला रहे लोगों पर हमले करें, लेकिन इस देश की हमारी समझ यह कहती है कि यहां की जनता हिंसक नहीं है और वह अभी भी उकसावे और भड़कावे के दौर में कभी चूक कर देने के अलावा लगभग हमेशा ही शांत रहती है। और कम से कम अन्ना हजारे जैसे महत्वोन्मादी, आत्मकेन्द्रित, तानाशाह और सिद्धांतों को लेकर पूरी तरह बेईमान के भड़कावे में वह बहुत लंबे समय तक नहीं रह सकती थी। इतिहास, और पिछले एक बरस का इतिहास इस बात का गवाह है कि अन्ना हजारे के सारे हमले सिर्फ केन्द्र सरकार और कांग्रेस पार्टी तक सीमित रहे। अपने ही साथी जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में कर्नाटक के भाजपा मुख्यमंत्री को हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार से जब जोड़ा गया तब भी अन्ना हजारे का मुंह एक बार भी भाजपा के किसी राज के किसी भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं खुला। इतना ही नहीं देश में दूसरी जगहों पर दूसरी पार्टियों के राज में होती बेईमानी पर भी उन्होंने अपना मुंह बंद रखा। और जिस अंदाज में छोटे बच्चों ने जनमोर्चा के दिनों में गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है, के नारे लगाए थे, उसी अंदाज में अन्ना हजारे लोकपाल विधेयक को लेकर लगातार राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर हमले करते रहे। देश ने यह साफ-साफ देखा कि सोनिया गांधी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने अन्ना हजारे की बातों को जिस तरह हफ्तों तक घंटों-घंटों सुना, और उसके बाद हर बार अन्ना की टोली बैठक से निकलकर सरकार को गालियां बकती रही, वह भी लोगों को, हमारे हिसाब से, निराश करने वाली बात थी। अन्ना हजारे ने इस विशाल देश की विविधता को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए अपने आंदोलन को, और उसके पहले की भी अपनी पूरी सोच को, पूरी तरह हिन्दूवादी रखा जिसमें कि अल्पसंख्यकों की, दलितों और आदिवासियों की, महिलाओं की कोई जगह नहीं थी। वे बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे घोषित रूप से हिन्दू विचारधारा के ही लिए काम करने वाले लोगों के साथ भागीदारी करते हुए देश भर के नेता बनने में लगे रहे।
 
अन्ना हजारे आज तक एक घोषणा को किए चल रहे हैं कि आने वाले चुनावों में वे कांग्रेस पार्टी के खिलाफ प्रचार करेंगे। यह उनका लोकतांत्रिक हक है कि वे क्या करेंगे, वे और उनकी टोली के लोग पिछले महीनों में ऐसा कर भी चुके हैं। और ऐसी चुनावी राजनीति में भागीदार होकर, कांग्रेस के खिलाफ एक साजिश चलाकर अन्ना हजारे ने जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी। जिनको राजनीति करना है उन्हें खुलकर राजनीति में आना चाहिए और भाड़े के भोंपुओं की तरह, गांधी टोपी की आड़ लेकर ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए। अन्ना हजारे के दो बड़े साथियों, किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल ने अपने निजी चाल-चलन में जिस तरह की बेईमानी की है, उसने भी लोगों की हमदर्दी को इस आंदोलन से दूर किया। किरण बेदी पूरी बेईमान और जालसाजी से अपने कार्यक्रमों में आने-जाने के लिए अधिक भाड़ा वसूलती रहीं और केजरीवाल सरकार को बकाया चुकाने से बचते रहे, और आखिरी में उन्होंने शहादत के अंदाज में वह काम किया जो कि किसी भी ईमानदार को बिना कानूनी घेरे के बरसों पहले खुद होकर करना चाहिए था।
 
हम इसे अन्ना का स्थायी अंत नहीं मानते, लेकिन यह आज की तारीख में उनके करिश्मे का फिलहाल अंत दिख रहा है। बहुत से लोग राख के ढेर से दोबारा उठकर खड़े होते हैं, और कल के दिन अन्ना हजारे भी भीड़ के बादशाह बन जाएं तो हम वैसी अविश्वसनीय लगती संभावना से इंकार नहीं करते। लेकिन आज इस अन्नातंत्री आंदोलन का यह हाल होना इस देश के लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है और भावनात्मक उकसावे से बाहर आकर अब लोग यह सीखने की कोशिश करें कि किसी जननायक को क्या-क्या नहीं करना चाहिए।

हुसैन को याद रखने की जरूरत


26 दिसंबर 2011
आजकल
हुसैन को याद रखने की जरूरत

पुराने कानूनों और नई टेक्नालॉजी ने दुनिया के साथ-साथ भारत के लिए कई किस्म की नई चुनौतियों खड़ी कर दी हैं। अमरीका जैसे कुछ देश जिन्होंने टेक्नालॉजी बदलने की रफ्तार से ही कानून भी बदल लिए, वे भी आज इन कानूनों के कई पहलुओं से रोज जूझ रहे हैं। इंटरनेट ने लोगों की जिंदगी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहुत से ऐसे नए पहलू जोड़े हैं जिनके बारे में कुछ बरस पहले तक मीडिया का एकाधिकार सा बने रहने की वजह से कभी सोचने की नौबत नहीं आई थी। अब बहुत मामूली से खर्च के साथ कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर जाकर वहां अपने मन की बहुत किस्म की बातें लिख सकते हैं, दूसरे लोगों को महान या घटिया बता सकते हैं। इस नई आजादी ने कल तक अखबारों के संपादक नाम की एक सेंसरशिप को खत्म कर दिया है और अब लोग सीधे-सीधे दूसरे लोगों तक पहुंच जाते हैं, पल भर में, सभी सरहदों को चीरकर।

भारत सरकार ने एक ताजा नोटिस इंटरनेट की बहुत सी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को देकर कहा है कि वे वहां से आपत्तिजनक सामग्री हटाएं। दूसरी तरफ दिल्ली की एक अदालत ने अभी दो दिन पहले ही ऐसा ही एक नोटिस इन वेबसाइटों को दिया है जो मोटे तौर पर पश्चिमी दुनिया से चलती हैं, और समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग देशों के प्रतिबंध झेलने की आदी हैं। फेसबुक, ट्विटर और इसी किस्म की दूसरी बहुत सी वेबसाइटें लोगों के बीच बातचीत, विचार-विमर्श और गाली-गलौज का रिश्ता मुहैया कराती हैं। पिछले एक बरस में भारत की सरकार को अपने भ्रष्टाचार के खिलाफ जितने किस्म के आंदोलन झेलने पड़े उनमें जनमत को तैयार करने और बात को फैलाने में इन वेबसाइटों ने खासी मदद की। नतीजा यह है कि सरकार इन पर लोगों की लिखी बातों से नाखुश है। लेकिन बात महज इतनी नहीं है। बिना किसी रोक-टोक के जब लोगों को अपनी किसी भी तरह की दिल-दिमाग की हालत के चलते लिखने और नेट पर डाल देने की सहूलियत है, और जब तक कोई कानूनी जांच न हो तब तक लोगों को एक यह छूट भी मिली हुई है कि वे बेनामी, गुमनामी के साथ, किसी नकली नाम से भी यह काम कर सकते हैं, तो नतीजा यह कि लोग किसी की वल्दियत पर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो किसी की मां के चाल-चलन की बात कर रहे हैं।

हमारा अपना अनुभव यह रहा है कि यह बेकाबू आजादी जितना भला कर रही है उतना ही एक ऐसा बुरा भी कर रही है जिसके खिलाफ किसी किस्म की कानूनी कार्रवाई इस टेक्नालॉजी के बेसरहद होने से मुमकिन भी नहीं है। भारत की सरकार अगर किसी वेबसाइट को रोक भी देगी, तो दुनिया के बहुत से देशों ने ऐसा करके देख लिया है, उससे कुछ नहीं थमता। तो ऐसे में इस मर्ज का इलाज क्या है?

दरअसल इंटरनेट लोगों को बिना अपनी शिनाख्त उजागर किए लिखने की एक ऐसी छूट देता है जो कि अब तक किसी ऐसे सार्वजनिक शौचालय के दरवाजे के भीतर की तरफ ही हासिल होती थी। उसमें भी पहले और बाद में उसी शौचालय में जाने वाले लोग तो यह अंदाज लगा ही सकते थे कि यह किसने लिखा होगा, लेकिन इंटरनेट पर जहां भारत के ही करोड़ों लोग हैं, और जहां बेचेहरा बने रहने की पूरी सहूलियत हासिल है वहां पर पखाने की इस दरवाजे के भीतर लिखने वाले का अंदाज भी लगाना मुमकिन नहीं है। कहने को तो यह भी है कि कम्प्यूटर, इंटरनेट और फोन पर भेजा गया एक शब्द भी इतनी जानकारियों के साथ दर्ज होता है कि उसे तलाश कर अदालत में साबित किया जा सकता है। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि कोलकाता के बॉटनिकल गार्डन के बिना ओर-छोर के अंतहीन फैले हुए बरगद के पेड़ पर टहलती हुई लाखों चीटियों में से किसी एक चींटी को कैसे तो कोई तलाशेगा और फिर कैसे उसके पदचिन्ह अदालत में साबित करेगा? कैसे कोई समंदर में रेत के एक कण को पहचानकर उसे कानून के कटघरे तक ले जाएगा? यह काम डॉन को पकडऩे से भी मुश्किल है।
दूसरी बात यह कि अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता को लेकर कानून अपने आपमें अभी कमजोर है, एक-एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट तक बहस गई हुई है, ऐसे में करोड़ों लोगों की रोजाना की अभिव्यक्ति को पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी कब तक पकड़ते रहेगी और अदालतों में लगी हुई मामलों की कतारों में ऐसे मामलों को कब जगह मिलेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे लोगों के अपने सम्मान, अपने निजी जीवन के हक, एक की धार्मिक भावनाएं और दूसरे की धार्मिक भावनाएं, एक के नैतिक मूल्य और दूसरे के नैतिक मूल्य, इन सबमें इतने किस्म की विविधता है, टकराव है कि कोई भी दूसरे की कही हुई बात को अपना अपमान मान सकते हैं, और अपने हक का दावा कर सकते हैं। दूसरी तरफ जो कहने वाले लोग हैं, लिखने और इंटरनेट पर डालने वाले लोग हैं उनके अपने ये तर्क हो सकते हैं कि अभिव्यक्ति की यह उनकी अपनी स्वतंत्रता है।

कहने के लिए भारत का मौजूदा, और नया-नया, सूचना तकनीक कानून इतना कड़ा है कि वह लोगों को छपी हुई बातों के मुकाबले, इंटरनेट पर डाली गई बातों के लिए अधिक आसानी से अधिक कड़ी सजा दिला सकता है। लेकिन सवाल यह है कि पहले से बोझ तले टूटी कमर वाली जांच एजेंसियों और अदालतों के पास ऐसे नए मामलों के लिए वक्त कहां से निकलेगा? कहने के लिए सरकार के पास पानी की जांच करने के लिए सहूलियत है, लेकिन अगर देश भर के हर नदी-तालाब के पानी की जांच हर हफ्ते करवाई जाए तो क्या इन प्रयोगशालाओं से कोई नतीजे निकल सकेंगे? इसलिए हम इस मौजूदा हाल को किसी आसान इलाज के लायक नहीं समझते। हम यहां पर अपनी तरफ से कोई बात इसलिए सुझाना नहीं चाहते क्योंकि दुनिया के लोगों की अभिव्यक्ति की जरूरतें अलग-अलग हैं। हमें तो आए दिन, या रोज-रोज लिखने का मौका मिल जाता है, जिन लोगों को तकलीफ हमसे ज्यादा है और कहने को जगह कहीं नहीं हैं, वे लोग अपनी भड़ास को, अपनी शिकायत या तकलीफ को अगर इंटरनेट पर नहीं निकालेंगे तो वह भड़ास उनके मन के भीतर इक_ा हो-होकर किसी अलग किस्म का धमाका करेगी।

यहां पर लगे हाथों हम भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक और पहलू पर भी बात करना चाहेंगे। यहां सेंसर हो चुकी फिल्में के पर्दे पर पहुंचने के पहले ही उनके खिलाफ अदालतों में मामले दर्ज होने लगते हैं, किसी की तस्वीर को लेकर मामला चलने लगता है तो किसी गाने को हटाने की मांग होने लगती है। धर्मों को लेकर सामाजिक तनाव इतना है कि खुलकर उस बारे में बात नहीं हो सकती और एक बहुत ही सतही जुर्म की तरह, एक थाने के स्तर पर ही किसी के लिखे के खिलाफ, किसी के कहे के खिलाफ यह जुर्म दर्ज हो जाता है कि उसने किसी और की धार्मिक भावनाओं को आहत पहुंचाई है। हजारों ईश्वरों वाले भारत जैसे देश में किसी एक के धार्मिक अधिकार भी किसी दूसरे की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले हो सकते हैं। एक धर्म पूरी तरह अहिंसा पर चलता है और उसके लोग यह दावा कर सकते हैं कि दूसरे धर्म के लोग जब बलि या कुर्बानी देते हैं, तो अहिंसा की उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंचती है। किसी धर्म या आध्यात्म के तहत महिलाओं से भेदभाव की व्यवस्था हो सकती है, और कोई दूसरा धर्म यह कह सकता है कि उनके देश में ऐसा भेदभाव उनकी धार्मिक भावना को आहत करता है। आज योरप के कई देशों में यह हो भी रहा है। मुस्लिम महिलाओं के बुर्के के खिलाफ फ्रांस और कुछ दूसरी जगहों पर जिस तरह के कानून बन रहे हैं उन्हें मुस्लिम अपने धार्मिक अधिकारों के खिलाफ मान रहे हैं और दूसरे लोग उसे अपने देश की संस्कृति के खिलाफ मान रहे हैं। तो ऐसे टकराव इंटरनेट के बिना भी चलते हैं जहां पर कि लोगों के चेहरे हैं, उनकी शिनाख्त है।

भारत के मौजूदा हाल में हमें कुछ बहुत ही खतरनाक किस्म की साम्प्रदायिक या आतंकी बातों के अलावा, इंटरनेट पर अधिक रोक-थाम की गुंजाइश इसलिए नहीं दिखती क्योंकि इस बात पर मतभेद बने रहेगा कि क्या आपत्तिजनक है, और क्या नहीं। लेकिन अभी भारत की सरकार ने और एक अदालत ने यह बात इंटरनेट कंपनियों से कही है, और अब करोड़ों लोग उत्सुकता से यह देख रहे हैं कि आपत्तिजनक और अभिव्यक्ति की कौन सी परिभाषाएं लागू होती हैं। दुनिया का अब तक का अनुभव तो यह रहा है कि कुछ बहुत हिंसक, बहुत आतंकी और बच्चों के सेक्स-शोषण जैसे जाहिर तौर पर पहचाने जा सकने जुर्म तो एजेंसियों के घेरे में आ जाते हैं लेकिन छोटी-मोटी गाली-गलौज और छोटा-मोटा चरित्र हनन रोकने के लायक माना नहीं जाता। लायक न मानने के यहां पर हमारे दो मतलब हैं, एक तो यह कि उन्हें इतनी अहमियत नहीं दी जाती कि उसे रोकने की कोशिश हो, दूसरी बात यह कि उसे रोकना कानूनी-तकनीकी रूप से मुमकिन ही न हो।

भारत में जो लोग आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लेना चाह रहे हैं, ले रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि हजार बरस पहले हिन्दुओं की बनाई नग्न प्रतिमाओं की तरह की कुछ पेंटिंग्स बनाने की वजह से मकबूल फिदा हुसैन को इस किस्म के इतने कानूनी मुकदमे झेलने पड़े कि बची जिंदगी सैकड़ों अदालतों में फेरे लगाने के बजाय उन्होंने इस देश को ही छोड़ देना बेहतर समझा। उन्हें तो दुनिया के कई देशों में जगह मिल गई, लेकिन बाकी लोगों की कही छोटी-छोटी बातों पर भी अगर उन्हें अदालतों में इस तरह खड़ा कर दिया जाएगा तो वे कैसे जिंदा रह पाएंगे? और यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है। अपनी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचने के तर्क के साथ ही लोग अगर देश भर की हर जिला अदालत में किसी एक के खिलाफ मामले दर्ज करेंगे तो अब कोई कितने जिलों में हर पेशी पर जा पाएगा? हम किसी भी नए कानून के बनाए जाने के पहले मौजूदा कानूनों पर अमल की नाकामयाबी पर सोच-विचार बेहतर समझते हैं। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें आज के कानून का इस्तेमाल न कर पाने वाले नालायक लोग नए कानूनों को बनाने की बात करते हैं ताकि उनकी आज की कमजोरियां, आज के कानून की कमजोरियां साबित की जा सकें।

इंटरनेट पर लोगों की लिखने की आजादी अब एक ऐसी हकीकत है जो वापिस नहीं जा सकती। एक संभावना ने जन्म जब ले लिया, तो फिर उसे मां के पेट में डाला नहीं जा सकता। अब वह कितनी अच्छी है और कितनी बुरी, उसके साथ किस तरह का बर्ताव किया जाए और कैसे निपटा जाए, यही बात हो सकती है और सच तो यह है कि आज इंटरनेट बिना किसी मां-बाप के, बिना किसी पालने वाले के, अपने आप पलने वाला माध्यम बन चुका है और उस पर नामुमकिन रोक-टोक की कोशिश भारत की आज की सरकार को ऐसा बताती है मानो उसके पास लुकाने-छुपाने को बहुत कुछ है।

हमारा यह मानना है कि इंटरनेट पर हमले उन्हीं लोगों पर होते हैं जो जिंदगी में कुछ बने हुए हैं। ऐसे लोग वहां पर झूठ का पर्दाफाश कर सकते हैं बजाय अदालतों के। लेकिन कुछ मामलों में अगर बदनीयत हमलावर कानून तोड़ते हुए कुछ लिखते हैं, तो वे अपनी मुसीबत का सामान खड़ा कर रहे हैं। अधिकार और जिम्मेदारी को मिला-जुलाकर ही देखा जा सकता है और ऐसा कुछ भी करते हुए हुसैन को याद रखना चाहिए।

लोकपाल और अब उसके बाद


28 दिसंबर 2011
संपादकीय
लोकपाल और अब उसके बाद

लोकसभा में लोकपाल विधेयक जिस मामूली फेरबदल के साथ कल बहुमत से मंजूर हो गया वह एक किस्म से सरकारी की कामयाबी रही और दूसरे किस्म से वह इस मायने में भाजपा की अगुवाई वाले विपक्षी खेमे के लिए नाकामयाबी रही कि इस लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की यूपीए की पहल को विपक्ष ने खारिज कर दिया। एक तरफ यूपीए सरकार चार दशकों से चली आ रही लोकपाल चर्चा को एक किनारे तक पहुंचाने वाली दर्ज हो गई और दूसरी ओर यह भी दर्ज हो गया कि इन दशकों में चार बार गैरकांगे्रसी सरकार भी केंद्र पर काबिज रहीं लेकिन उस वक्त लोकपाल नहीं बन पाया। कल का दिन यूपीए के नाम इसलिए लिखा जाना है क्योंकि उसके खिलाफ एक राजनीतिक अभियान छेडऩे वाले अन्ना हजारे कल अपनी बीमार हालत के बावजूद अनशन में देश में अकेले से पड़ गए और मुंबई-दिल्ली में अनशन की मौजूदगी जनता के बदले हुए तेवर का एक संकेत भी है। कल का दिन यूपीए, और खासकर कांगे्रस के लिए राहत का रहा होगा क्योंकि कोई आधे-पौन बरस में शायद यह पहला मौका रहा जब यूपीए अपने किसी काम में इस तरह कामयाब हुई।

कल लोकसभा की कार्रवाई में जब लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने वाली बात को भाजपा की सुषमा स्वराज के संशोधन के साथ खारिज किया गया तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पल भर में इसे राहुल गांधी की शिकस्त के रूप में दर्ज किया और कुछ इस तरह की हवा बांधने की एक कोशिश हुई कि यह बहुत बुरी हार है। एक तरफ तो कांगे्रस को इस बात के लिए गुनहगार ठहराया जा रहा था कि वह मजबूत लोकपाल बनाना नहीं चाहती। दूसरी तरफ जब लोकपाल को, चुनाव आयोग की तरह, एक संवैधानिक दर्जा देने की बात हुई तो सबसे मुखर चल रहे भाजपाई और वामपंथी पीछे हट गए। इसमें कांगे्रस की भला क्या हार हुई, जिसके बारे में यह भी कहा जाता रहा है कि वह एक मजबूत या असरदार लोकपाल लाना ही नहीं चाहती। या तो उसकी यह नीयत कामयाब हो गई, या फिर मजबूती की मांग करता विपक्ष नाकामयाब हो गया। एक ही तस्वीर के आगे-पीछे के दो पहलू एक साथ चस्पा करके कांगे्रस की कमजोरी का सुबूत नहीं बताए जा सकते। हमारा बहुत साफ मानना है कि लोकपाल को अगर संवैधानिक दर्जा दिया जाता तो शायद वह अधिक ताकतवर, अधिक आजाद होता लेकिन ऐसा हो नहीं पाया क्योंकि इसके लिए कांगे्रस के पास लोकसभा में वोट कम थे और भाजपा सहित कुछ और विपक्षी दलों ने वोटों की अपनी ताकत से इस राय को खारिज कर दिया। यह तो ठीक है कि गिनती को जुटाना विधेयक लाने वाली सरकार का काम होता है, भाजपा ने यही तर्क दिया है, लेकिन विपक्ष के इस तर्क के साथ-साथ उसके नाम के साथ अब यह भी चस्पा हो गया है कि उसने लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का विरोध किया।

हम अभी तुरंत ही लोकपाल के मौजूदा ढांचे पर बात करना जरूरी इसलिए नहीं समझते क्योंकि अभी इसकी तकनीकी बारीकियां सामने आएंगी, विधेयक के पारित होने के बाद संशोधनों सहित एक नया मसौदा सामने आएगा और उसका अधिक जानकार लोग विश्लेषण करेंगे। फिर अभी राज्यसभा से इस विधेयक को गुजरना है और वहां पर हमारा ऐसा ख्याल है कि कांगे्रस के सामने इसके पक्ष में बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती न रहकर, यह भाजपा के सामने बड़ी चुनौती रहेगी कि वह इसका समर्थन करे या इसका विरोध करे। इसका विरोध करने के बाद भाजपा जनता के बीच क्या जवाब दे सकेगी यह सोचना हमारे लिए कुछ मुश्किल है। इसलिए आज राज्यसभा से अगर यह विधेयक पास होकर कानून बन जाता है तो उसके बाद ही उन बारीकियों पर हमारा राय देना ठीक होगा जिनके बारे में अंगे्रजी जुबान में यह कहा जाता रहा है कि डेविल इज इन द डिटेल्स... (गड़बड़ी तो खुलासे में होती है)। लेकिन आज हम लिखना यह चाहते हैं कि पिछले कई महीनों से यूपीए सरकार जिस बात के लिए बाबा-अन्ना-श्रीश्री जैसे लोग कोसे चले जा रहे थे, और इन तीनों की राजनीतिक डिजाइनों से फायदा पाने वाली भाजपा बहुत खुश चल रही थी, आज उसके हाथ से लोकपाल का मुद्दा छिन गया और अब उसे उत्तरप्रदेश चुनाव के लिए भी एक नया मुद्दा ढूंढना होगा। दूसरी बात यह रही कि दिल्ली की मीडिया के बहुत से विश्लेषकों ने पिछले कुछ दिनों में यह बात लिखी, और कल भी संसद की कार्रवाई के बाद चल रहे विश्लेषण में यह बात कही कि लोकपाल के मुद्दे पर भाजपा का सरकारी रूख का अंधा विरोध करना कुछ ऐसा आभास पैदा करता है कि मानो अब भाजपा को दुबारा सत्ता में आने की फिक्र नहीं है। वह अन्ना-बाबा की फरमाईश पर इतने किस्म की अव्यवहारिक बातों को मानते और बढ़ावा देते हुए यहां तक पहुंच गई है कि सरकार चलाने की नौबत आने पर उसे खासी दिक्कत हो सकती है। और यह बात हम ऐसी किसी दिक्कत को ध्यान में रखकर नहीं छेड़ रहे। सुधार का कोई भी कानून किसी भी सरकार के लिए परेशानी खड़ी करता ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि मौजूदा सरकार की परेशानी बढ़ाने के लिए सत्ता का अनुभवी विपक्ष कई ऐसी फरमाईशों को मानने को तैयार हो जाए जो कि लोकपाल को एक दानव सा ताकतवर बनाकर रख दे जो कि लोकतंत्र के बाकी पायों पर भारी पडऩे लगे। एक तरफ तो भाजपा और वामपंथी कुछ इस तरह की मांग करते हुए अन्ना के मंच पर चले गए, और दूसरी तरफ भाजपा के राज्य उत्तराखंड के लोकायुक्त विधेयक की कमजोरियां कल संसद में कांगे्रस ने उजागर कीं। कांगे्रस ने जब उत्तराखंड का लोकायुक्त कानून पढ़कर बताया तो भाजपा भी चुप रह गई क्योंकि उसमें मुख्यमंत्री के खिलाफ तभी कुछ हो सकता है जब उस पर सौ फीसदी सहमति हो। इसके अलावा भी बहुत सी बातें सत्ता की बेईमानी को बचाने के हिसाब से रखी गई हैं।

कुल मिलाकर हम यही कहेंगे कि भाजपा और वामपंथियों ने इस मोर्चे पर साझेदारी से जो कुछ किया उसका कोई फायदा उन्हें नहीं मिल पाएगा बल्कि उनके कहने और करने का फर्क स्थापित हो गया। दूसरी तरफ लोकपाल में आगे चलकर जितने किस्म के संशोधनों की जरूरत पड़ेगी वे होते चलेंगे जैसा कि इसके पहले के भी कई कानूनों में होते आया है। आज देश को जंतर-मंतर और रामलीला से खड़े किए गए इस हव्वे से उबरने की जरूरत है कि यह देश भ्रष्टाचार में डूब चुका है। ऐसी निराशा और ऐसी भड़ास के साथ कोई काम नहीं चलता। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई बहुत से मोर्चो पर बहुत किस्म से जारी रहनी चाहिए और उसके लिए देश के मौजूदा कानून और नए बनने जा रहे लोकपाल का पूरा इस्तेमाल लोगों को करना चाहिए, बजाय भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर एक तानाशाही को, एक अराजकता को स्थापित करने के।

पोस्‍ट यहॉं पेस्‍ट करें

पार्टी व्हिप में बंधे सांसद और संविधान सभा वाला इतिहास


27 दिसंबर 2011
विशेष संपादकीय
पार्टी व्हिप में बंधे सांसद और संविधान सभा वाला इतिहास

भारतीय संसद में अगले कुछ दिनों में लोकपाल और कुछ दूसरे मुद्दों पर जो बात होनी है, उसे लेकर आज चाहे कोई पार्टी यह कहे कि वह अपने पत्ते संसद में खोलेगी, संसद की यह आने वाली बहस कितनी अहमियत की होगी इसे लेकर एक बड़ा शक पैदा होता है। सत्ता और विपक्ष ये दो खेमे अपनी-अपनी गिनती की ताकत का इस्तेमाल करते हुए वहां पर अपने सांसदों के लिए फतवे जारी करेंगे ताकि वोटों की, आम हो चली, खरीद-फरोख्त न हो और पार्टियों की नीतियों के मुताबिक वोट डलें। न सिर्फ वोट बल्कि वोट से पहले की बहस भी पार्टी की नीतियों के आधार पर ही सांसद वहां पर करते हैं और भारत के संसदीय लोकतंत्र में मतदाता का चुनाव कुछ हद तक नाकामयाब हो जाता है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि लोग पार्टी के निशान पर एक प्रत्याशी को वोट देते हैं। यह वोट पार्टी को दिया हुआ भी होता है, और प्रत्याशी को दिया हुआ भी। संसद या विधानसभाओं में जब पार्टी व्हिप जारी होता है और लोग पार्टी के कहे मुताबिक किसी मुद्दे पर किसी एक तरफ वोट डालते हैं तो मतदाताओं का प्रत्याशी का चुनाव वहां बेमायने हो जाता है और सिर्फ पार्टी का फैसला मतदान में वोट डालता है।
 
दलबदल के अपने अलग नुकसान थे और एक वक्त हरियाणा जैसे राज्य में जब आयाराम-गयाराम की भाषा राजनीति में शुरू हुई तो दलबदल कानून बनाने की जरूरत भी लोगों को लगी। लेकिन जैसा कि हर कानून के साथ होता है, इस नए कानून के तहत पार्टी व्हिप के मुताबिक वोट डालते हुए सांसद अपने दिल और दिमाग, अपने मतदाताओं से अगर कोई सलाह-मशविरा किया हो तो, ऐसी किसी बात का ख्याल नहीं रख पाते। नतीजा यह होता है कि एक बार चुनाव हो जाने के बाद पांच बरस तक जनता की राय पूरी तरह से पार्टी के कब्जे में चली जाती है और अलग-अलग सांसदों की संभावित अलग-अलग सोच की गुंजाइश खत्म हो जाती है। संसद के भीतर होने वाली बहस में शब्दों और छोटी-मोटी बातों के फर्क को छोड़ दें तो मोटे तौर पर पहले से यह अंदाज रहता है कि कौन से सांसद क्या कहेंगे। अपनी-अपनी पार्टी की घोषित नीति, या छुपाकर रखे गए पत्तों के तहत वे चाल चलते हैं और यह बाजी पहले से अंदाज लगा लेने के लायक ही रहती है। अब सवाल यह उठता है कि इस देश की संसद में बैठे हुए लोगों की अपनी-अपनी सोच क्या उनकी पार्टी की नीति से परे, कम से कम बहस के लिए सामने नहीं आनी चाहिए? जिन लोगों ने भारत के संविधान को बनाने के लिए बनी संविधान सभा की कार्रवाई पढ़ी है वे जानते हैं कि पार्टियों की खेमेबाजी से परे कितने तरह की बातें वहां पर होती थीं और घोर ब्राम्हणवादियों से लेकर डॉ. भीमराव अंबेडकर पर, इस्लामी कट्टरपंथी सोच के लोगों से लेकर नेहरू जैसे उदार विचारों वाले नेताओं तक, कितने ही लोगों ने वहां पर खुलकर बातें नहीं की थीं? उसी का नतीजा था कि संविधान सभा की वह बहस आज भी पढऩे लायक है और आज अगर संसद की बहस को कोई सुने तो बोलने के अंदाज और लालू-लतीफों से परे कोई फलसफा वहां ऐसा सुनने नहीं मिलता जो कि पार्टी के प्रवक्ता संसद से बाहर बोल न चुके हों।
 
अभी पिछले हफ्ते ही संसद में किसी एक सदस्य ने बहस के दौरान ही यह कहा था कि लोकपाल पर पार्टियां व्हिप जारी करने के बजाय सदस्यों को अपनी अंतरात्मा की आवाज से वोट देने को देकर तो देखे, तो पता चल जाएगा कि लोकपाल को कोई नहीं चाहता। यह बात इस हिसाब से भी सही है कि जिस संसद में एक से अधिक बार कई लोग अपनी आत्मा और अपनी आवाज को कोठे पर बेचने के अंदाज में बेचते हुए रंगे हाथों पकड़ाए हुए हैं, संसद से निकाले जा चुके हैं, जेल जा चुके हैं, और संसद के विशेषाधिकार के चलते अपराध साबित हो जाने के बाद भी बचे हुए हैं, उस संसद में किसकी अंतरात्मा की आवाज पर कितना दाम चस्पा होगा इसका अंदाज कैसे लगेगा? तो इस संसद और इसके सांसदों का हाल यह है कि अगर व्हिप जारी न हो तो कांगे्रस जैसी पार्टी जितनी जरूरत हो उतनी अंतरात्माएं खरीद लेंगी, और अगर व्हिप जारी होगा तो वहां सिर्फ पार्टियों की आवाज गूंजेगी। इनके बीच का कौन सा रास्ता आसान हो सकता है यह हम नहीं जानते। लेकिन आज इस मुद्दे को छेडऩे का हमारा मकसद यह है कि संसद के बाहर जितने किस्म की बकवास लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर चल रही है उससे परे इस संसद को एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी के तहत खुलकर बहस करनी चाहिए, खुलकर विचार करना चाहिए, और अगर इस संसद के, इस सरकार के अनचाहे ही एक लोकपाल बनाना अब बेबसी हो गई है तो उस लोकपाल पर बात उसी तरह होनी चाहिए जिस तरह इस संसद के पुरखे के रूप में संविधान सभा ने एक वक्त बात की थी। पार्टियों की अपनी-अपनी नीतियों और रणनीतियों का दौर लोकपाल और उससे जुड़ी बहसों के शुरू होने तक खत्म हो जाना चाहिए और उसके बाद लोकतांत्रिक ढांचे की संभावनाओं और सीमाओं के भीतर खूबियों और खामियों की चर्चा खुलकर होनी चाहिए। हम इस विधेयक को लेकर संसद के बाहर चल रही किसी टोपीधारी बदनीयत हड़बड़ी और जिद्द की बात भी संसद के ध्यान में लाने की बात नहीं करते। संसद को अपने-आपको इस बहस के शुरू होने के बाद बाहर की दुनिया से अब तक पाए गए असर को काफी मानते हुए आगे की चर्चा इस विधेयक पर करनी चाहिए वरना यह संसद संसदीय जिम्मेदारी के बजाय चुनावी-राजनीतिक मतलबपरस्ती का अखाड़ा बन जाएगी।
 
बहुत से ऐसे मौके होते हैं जब लोग या पार्टियां अपनी जीत के बजाय देश की जीत को अधिक महत्व दे सकते हैं। खेल में कई बार यह कहा जाता है कि कुछ महान खिलाड़ी अपने रिकॉर्ड की परवाह किए बिना अपनी टीम के भले के हिसाब से खेलते हैं। कुछ उसी किस्म की जरूरत हमें आज संसद में लग रही है कि इस विधेयक के पास होने या न होने से परे, अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लोग देश के सामने एक खरी लोकतांत्रिक बहस रखें, क्योंकि देश की जनता संसद के पक्ष और विपक्ष में से किसी को ईमानदार या बेईमान जैसा दर्जा नहीं देती और देश का माहौल यह है कि संसद का एक बड़ा हिस्सा बेईमान है। इस बात को हम चाहे जनधारणा से अधिक वजनदार न भी मानें, संसद के लिए यह जरूरी है कि वह एक खोई हुई इज्जत को दुबारा पाने की कोशिश करे, और अब भी अगर उसके भीतर बैठे सांसदों, उनकी पार्टियों के मन में देश की भलाई है, तो उन्हें राजनीतिक नफे-नुकसान से परे लोकपाल बिल या भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए दूसरे मुद्दों पर संसद में बात करनी चाहिए। इस मौके पर जो लोग ओछी राजनीति करेंगे, या जो पार्टियां देश के बजाय अपनी राजनीति को अधिक महत्व देंगी वे भी रोजाना अपनी गैरजिम्मेदारी उजागर करती रहेंगी। 
देश अब संसद के भीतर कही जाने वाली बातों की राह देख रहा है।

पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत होने की जरूरत


26 दिसंबर 2011
संपादकीय
पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत होने की जरूरत

भारत और पाकिस्तान के बीच आज-कल दो दिन फिर बातचीत होने वाली है। जिसमें जम्मू कश्मीर, मिसाइल परीक्षण और सीमा पार व्यापार और यात्रा को बढ़ावा देने के उपायों पर चर्चा होगी। परमाणु और आपसी विश्वास बहाली के उपायों पर पिछली बैठक अक्टूबर 2007 में हुई थी। मुंबई में 2008 में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर ए तैबया की ओर से किए गए आतंकी हमलों के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच ठप पड़ी वार्ता इस वर्ष की शुरूआत में शुरू हुई थी। यह बातचीत ऐसे वक्त होने जा रही है जब पाकिस्तान एक नई अस्थिरता में घिरते दिख रहा है। वहां पर सरकार और सेना के बीच गहरे मतभेद और तनाव की खबर आ रही है और सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ इमरान खान की पार्टी खुलकर खड़े होते भी दिख रही है और लोकप्रियता पाते भी दिख रही है। किसी भी देश में एक मजबूत विपक्ष में कोई बुराई नहीं है, इससे लोकतंत्र मजबूत ही होता है, लेकिन पाकिस्तान जैसे कमजोर और जर्जर हो चुके लोकतंत्र में आज किसी भी फेरबदल का मौका आने पर कभी आतंकी, कभी सेना, कभी खुफिया एजेंसियां, कभी विदेशी ताकतें, फेरबदल को प्रभावि करने की खुली या ढंकी-छुपी कोशिश करने लगते हैं। ऐसे बाहरी असर मतदाता के फैसले को या तो मतदान के पहले प्रभावित करते हैं या फिर मतदान के बाद सरकार बनाने के समय इनका असर दिखता है।

पाकिस्तान की किसी भी किस्म की बदहाली से भारत में लोगों का एक तबका खुश सा होते दिखता है। इसमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने मुम्बई हमले जैसे बहुत से जख्म खा-खाकर पाकिस्तान से नफरत करना जरूरी समझ लिया है। इसमें ऐसे लोग भी हैं जिनको पाकिस्तान पर हमले के बहाने मुसलमानों पर हमला करना एक आसान मौका लगता है और वे इससे नहीं चूकते। बहुत से ऐसे साधारण लोग इन दोनों तबकों के बाहर के ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि भारत को एक हमला करके पाकिस्तान नाम के सिरदर्द को मिटा देना चाहिए। इसमें हमें अधिक हैरानी इसलिए नहीं होती कि एक जटिल अंतरराष्ट्रीय मामले की समझ तो बहुत अधिक लोगों में होने की उम्मीद करना सही नहीं होता, किसी भी मामले में समझदार लोगों की गिनती गिनी-चुनी होती है और बेसमझ, कमसमझ या अनजान लोग ही अधिक होते हैं। भारत में पाकिस्तान के बारे में जो जनमत है, उसमें ऐसे लोग ही अधिक हैं। हम संदेह का लाभ देते हुए यह मानते हैं कि इनमें बहुतायत अनजान लोगों की ही है।
 
पाकिस्तान की आज की हालत भारत के लिए बहुत फिक्र की बात भी है। हमारी सरहद से लगे हुए दो ही परमाणु देश हैं जिनमें से पाकिस्तान ऐसा है जो कि सरकार के काबू से बाहर की नौबतें झेलता है और वहां पर आतंकियों का एक तबका, फौजी तानाशाही में भरोसा रखने वाला एक तबका, और हथियारों के सौदागरों के सत्ता में बैठे हुए दलाल ऐसे हैं जो कि युद्धोन्माद को बढ़ावा देने में भरोसा रखते हैं। ऐसे में एक बड़े देश के रूप में, सफल लोकतंत्र के रूप में भारत की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह पाकिस्तान को लोकतंत्र की पटरी पर लौटने में मदद करे और उसका हौसला बढ़ाए। जिस तरह फिलीस्तीनियों को यह मानकर चलना चाहिए कि इजराइल अब एक हकीकत बन चुका है और उसे मिटाने की शर्त पर कोई बात आगे नहीं बढ़ सकती। इसी तरह भारत के युद्धोन्मादियों को यह मान लेना चाहिए, समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान को मिटाना अब मुमकिन नहीं है, न ही ऐसी कोई हरकत सही भी होती, होगी। ऐसे में उसे अमरीका की जेब से निकलकर चीन की जेब में जाने देना भारत के फौजी हितों के खिलाफ होगा। अंतरराष्ट्रीय संबंध दो और दो चार की तरह, या शतरंज की तयशुदा चालों की तरह नहीं बढ़ते। ऐसे संबंध बहुत सी बातों को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं, और हम ऐसी बातों के बीच भी बजाय देश के हितों को ही ध्यान में रखकर काम करने के, पूरी दुनिया के, पूरे मानव समाज के हितों को ध्यान में रखकर काम करने पर अधिक भरोसा रखते हैं। ऐसे में पाकिस्तान की आज की अस्थिरता और वहां चल रहे तनाव को कम करने की जरूरत है क्योंकि एक परिपक्व लोकतंत्र, स्थायी लोकतंत्र भारत के हित में है। इतने पड़ोस में बसा हुआ कोई देश अगर आतंकियों से अपने आपको नहीं बचा पा रहा है तो वह कल के दिन वहां से भारत आकर हमला करने वाले आतंकियों को, अगर चाहेगा तो भी, कैसे रोक पाएगा? और अगले किसी मुम्बई हमले की नौबत आने पर भी भारत के लिए यह आसान नहीं होगा कि वह पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर मारे। वैसे भी चीन जैसे नए दोस्त की ताकत जब पाकिस्तान के साथ आज भी है तब यह शक्ति संतुलन ऐसे किसी बड़े हमले की संभावना पैदा नहीं होने देगा। इसलिए आज भारत के लोगों को यही मनाना चाहिए कि पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हो।

धर्म और कर्म की कुछ चर्चा


25 दिसंबर 2011
संपादकीय
धर्म और कर्म की कुछ चर्चा

ईसाई धर्म से जुड़ी हुई संस्कृति में क्रिसमस के मौके पर एक काल्पनिक सांता क्लॉज रात में आकर बच्चों के लिए तोहफे छोड़ जाता है। शायद यह रिवाज इसलिए शुरू किया गया है कि ऐसे तोहफे अच्छे बच्चों को ही मिलने की बात उनके ध्यान में डाली जाती है और ऐसा बताया जाता है कि खराब काम करने वाले बच्चों को सांता क्लॉज कोई तोहफे नहीं देता। धर्म से जुड़ी हुई बहुत सी बातें इस किस्म की होती हैं जो लोगों को सपनों में जीने का मौका देती हैं। कहीं पर पूर्वजन्म के किए का फल इस जन्म में, और इस जन्म में किए का फल अगले जन्म में पाने की बात सिखाई जाती है तो कहीं यह सिखाया जाता है कि जिनको कम मिल रहा है, वह उनके कर्मों का फल है। सांता क्लॉज की धारणा तो कम नुकसानदेह है क्योंकि यह ईसाई संस्कृति में या पश्चिमी जीवन-शैली में समारोह को मनाने के एक तरीके के रूप में इस्तेमाल की जाती है और छोटे बच्चों को तोहफे देने का यह एक रास्ता होता है। लेकिन धर्म जब बहुत सी दूसरी बातों को कर्म से अलग करके स्थापित करने की कोशिश करता है तो वह कार्ल माक्र्स के शब्दों में अफीम की तरह लोगों को सुस्त और मंद करके सोचने और संघर्ष करने से दूर कर देता है। 

हम किसी एक धर्म के त्यौहार के मौके पर इस चर्चा को नहीं छेड़ रहे हैं क्योंकि बहुत से धर्मों में, या शायद सभी धर्मों में, धर्म लोगों को कर्म से दूर रखने का एक जरिया रहता है, और इस कर्म में जागरूकता और संघर्ष भी शामिल रहते हैं। यह सिलसिला भारत सहित बहुत से देशों में बहुत खतरनाक हद तक लोगों को ऐसा भाग्यवादी और ऐसा निराश बना देता है कि लोग अपने साथ हो रहे किसी भी किस्म के अन्याय को अपनी किस्मत मान बैठते हैं और उसके लिए जो अच्छा-बुरा कहना रहता है वह ईश्वर को कहकर, उसके लिए असल जिम्मेदार इंसानों को बख्श देते हैं, जिससे कि समाज के भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष की संभावना खत्म हो जाती है। धर्म को बनाया इसी हिसाब से गया है कि वह ताकतवर शोषक को कमजोर बहुसंख्यक तबके का निशाना कभी न बनने दे। इसलिए हम भारत में लगातार देखते हैं कि जनता को, देश को और धरती को लूटने वाले सबसे बड़े लोगों से किसी धर्मगुरू को कोई परहेज नहीं होता और उनके प्रवचनों में, धार्मिक अनुष्ठानों में हर किस्म के अपराधी ताकतवर लोग सबसे ऊपर, सबसे सामने जगह पाते हैं और एक किस्म से प्रवचन करने वाले गुरू ऐसे लोगों का सम्मान करते भी दिखते हैं, इन्हीं के डेरों में महीनों गुजारते हैं। यह पूरा सिलसिला माक्र्स की जुबान की अफीम की तरह लोगों को सामाजिक और आर्थिक शोषण और अन्याय को समझने से भी दूर रखता है और इस तरह धर्म, और उसकी एक दूसरी शक्ल आध्यात्म, में पूंजी निवेश करके ताकतवर, अत्याचारी और शोषक तबके उसी तरह एक बीमा पॉलिसी और चौकीदार खरीद लेते हैं जिस तरह वे अपने कारखानों और दुकानों के लिए खरीदते हैं।

ईश्वर को न मानने वाले हमारे किस्म के नास्तिक इतने कम हैं, और उनकी प्रचार की ताकत इतनी कम है कि वे ईश्वर की धारणा का भांडाफोड़ नहीं कर पाते। दूसरी बात यह कि ईश्वर की धारणा, धर्म की बातें दिमाग पर जोर नहीं डालतीं, वे चूंकि तर्कों से परे की होती हैं इसलिए वे लोगों को कीर्तन में सिर हिलाने की तरह का आसान काम लगती हंै। धर्म पर सवाल खड़े करना, उसकी वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक उपयोगिता के बारे में बात करना बहुत तकलीफ का काम होता है। और किसी भी जगह किसी भी आबादी या भीड़ में यह न तो लोकप्रिय काम होता और न ही लुभावना काम। लेकिन हम ऐसा काम करने से परहेज नहीं करते और लोगों को धर्म के बजाय कर्म की तरफ देखने को सलाह देते रहते हैं। धर्म का राज जब तक समाज के लोगों के दिल-दिमाग पर चलता रहेगा तब तक समाज के सबसे ताकतवर लोग सबसे कमजोर तबकों पर राज करते रहेंगे, उनके हक लूटते रहेंगे। कबीलों के जमाने से लेकर आज की 21वीं सदी तक धर्म ने कमजोर लोगों को लूटने का, लुटवाने का काम ही किया है, और जब हिटलर ने लाखों को मारा, तब भी पोप चुप ही रहा। कहने को यह बात कही जा सकती है कि ईश्वर, धर्म और धर्मगुरूओं में फर्क है। किसी तर्क से बचने के लिए, किसी बहस से बचने के लिए धर्म के झंडाबरदार अक्सर यह तर्क उठा लेते हैं कि धर्म का यह बिगड़ा हुआ चेहरा ईश्वर नहीं है। लेकिन समाज पर राज तो धर्म का बिगड़ा हुआ चेहरा ही करता है। यह चर्चा हमने छेड़ी तो आज है लेकिन इसका किसी एक धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और हर धर्म के लोग अपने-अपने भीतर यह झांक सकते हैं कि वहां पर किस-किस किस्म का शोषण उनके ईश्वर और धर्म के बैनर तले चल रहा है, चलता रहेगा।

मीडिया के कार्पोरेट कारोबार और सरोकार पर चर्चा


24 दिसंबर 2011
संपादकीय
मीडिया के कार्पोरेट कारोबार और सरोकार पर चर्चा

जिंदगी के बहुत से असल मुद्दों पर लगातार लिखने वाली एक महिला पत्रकार दोस्त ने आज लिखा कि वह एक स्थानीय अखबार में पढ़ रही थी कि किस तरह हाथियों ने एक बस्ती में तोड़-फोड़ की। और साथ यह लिखा कि ऐसी खबरों के बाद उसे शाहरूख खान के डॉन-2 के बारे में पढऩे की क्या जरूरत है? यह बात रोज ही हमारे सामने आती है क्योंकि अखबार के कई पन्ने रोज तैयार करते हुए दिन की शुरूआत से लेकर रात काम खत्म होने तक दुविधा खत्म ही नहीं होती। अखबार पढऩे वालों की उम्मीदों के मुताबिक अखबार निकाला जाए, या उन्हें उनकी उम्मीदों के बारे में कुछ सलाह देता हुआ अखबार निकाला जाए, अखबार का मकसद कारोबार हो, या सरोकार हो? ऐसे बहुत से सवाल बहुत सी खबरों को लेकर और उन खबरों से छांटे गए किसी मुद्दे पर इस तरह का, इस जगह पर संपादकीय लिखते हुए सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जब हम जिंदगी की तकलीफों और समाज में बेइंसाफी के बारे में लिखते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि लिखने को कोई अच्छी बात बची ही नहीं है क्या? कुछ अखबारों ने अपनी यह नीति बना रखी है कि वे पहले पन्ने पर दुख-तकलीफ की कोई खबर नहीं छापते हैं, जब तक कि वह किसी बड़ी ताजा घटना की खबर न हो, और जिसे छोड़ देना लापरवाही लगे। 

जो जुबान खबरों को छांटने के लिए इस्तेमाल होती है वह बहुत दिलचस्प है। हिंदुस्तान में हिंदी में अंगे्रजी के बहुत से शब्द घुल-मिल चुके हैं और ऐसा ही एक शब्द अखबारनवीसी में इस्तेमाल होता है-पब्लिक इंटरेस्ट। बारीकी से देखें तो हिंदी में इसके दो अलग-अलग मायने निकलते हैं, एक तो इसका मतलब जनहित होता है और दूसरा मतलब जनरूचि होता है। अखबार की खबरें तय करते हुए, विचारों के मुद्दे और विचारों को तय करते हुए, इन सबकी प्राथमिकताएं और इनका महत्व तय करते हुए जब बात पब्लिक इंटरेस्ट की होती है तो कारोबारी अखबार (बिजनेस न्यूजपेपर नहीं, बिजनेस के लिए फिक्रमंद न्यूजपेपर) उसे जनरूचि मानकर एक ऐसा अखबार पाठकों के सामने रखता है जैसा कि दस-बीस बरस पहले एक तांत्रिक अंगूठी के इश्तहार में दावा किया जाता था-जो मांगोगे वही मिलेगा। और पब्लिक इंटरेस्ट का यह मतलब अखबार की रगों में दौडऩे वाले इश्तहार वाले फायदे की बात भी होती है। दूसरी तरफ जो लोग अखबार को कारोबार से कुछ अधिक और सरोकार से जुड़ा हुआ मानते हैं, वे पब्लिक इंटरेस्ट के जनहित वाले अर्थ को ढोकर चलते हैं, जो कि खासा भारी होता है और कमर भी तोड़ देता है। हम अभी बात मोटे तौर पर अखबारों की इसलिए कर रहे हैं कि देश का लंबा अनुभव इन्हीं के बारे में अधिक है और टीवी के समाचार चैनलों को आए कम दिन हुए हैं और उनका सरोकारों से, जनहित से लेना-देना उसी वक्त जरा सी देर के लिए शुरू होता है जब कोई स्टिंग ऑपरेशन उनके हाथ ऐसा लग जाता है जो लोगों को टीवी के सामने कुछ देर बांध सके। भारत के समाचार चैनलों को हम आज के इस गंभीर विश्लेषण में जोडऩे की कोशिश करने पर भी नहीं जोड़ पाएंगे। 

आज इस बात पर लिखने की कुछ जरूरत इसलिए भी लग रही है कि पाकिस्तान में एक कमजोर और खतरे में चल रहे लोकतंत्र के भीतर वहां के मीडिया को लेकर खुली बहस चलती है और लोग जिस तरह उसकी आलोचना भी करते हैं, वह बात हिंदुस्तान में शायद इसलिए कम है क्योंकि यहां मीडिया उस तरह के किसी फौजी, खुफिया, आतंकी और कट्टरपंथी हमलों का शिकार नहीं है। अधिक आजादी ने भारत के मीडिया को आत्ममंथन से परे कर दिया है और तरह-तरह के दबावों के तले पाकिस्तानी मीडिया चर्चा का सामान बनता है। अखबारों के पन्नों के लिए रोजाना धरती के अनगिनत पेड़ कटते हैं, ये पन्ने कम से कम ऐसे तो हों कि वे पेड़ों की कुर्बानी को सही ठहरा सकें! पे्रस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने अपनी कुछ बातों को लेकर मीडिया के बीच एक हलचल खड़ी की है, और एक नाराजगी भी। लेकिन 'उनकीÓ बातों को लेकर उन्हें भला-बुरा कहने के साथ-साथ, उनके नाम को अलग करके 'उनÓ बातों पर चर्चा की जरूरत क्या आज नहीं है? न सिर्फ उनकी कई बातें खरी हैं, बल्कि मीडिया में आज जो खोट है उसे लेकर आपस में ही कुछ खरी-खोटी करने की जरूरत है ताकि अगर किसी किस्म की बेहतरी मुमकिन है तो वह तो हासिल हो सके। 

अखबारों के बाजारू मुकाबले के चलते कुछ ऐसी हरकतें हो रही हैं जो कि हमारी इस फिक्र को जायज और जरूरी ठहराती हैं। किसी का नाम लेकर उसे बुरा कहने या बदनाम करने का आज कोई मौका नहीं है इसलिए बिना नाम दो अलग-अलग मामलों की चर्चा यहां करना हमें माकूल लग रहा है। एक शहर में एक बड़े अखबार का स्थानीय संस्करण शुरू होने को था। वहां पहले से निकल रहे एक अखबार को यह फिक्र खड़ी हो गई थी कि नए अखबार के आने से लोग उसकी तरफ ध्यान न दें। उसने नए अखबार के पहले ही दिन, अपने अखबार में शहर की एक इतनी सनसनीखेज खबर छापी कि जिस पर पूरा देश हिल उठा। और तीन हफ्ते बीतते न बीतते देश के एक तीसरे, बड़े और जिम्मेदार अखबार ने यह रिपोर्ट छापी कि वह सनसनीखेज रिपोर्ट पूरी की पूरी झूठी थी, और सोच-समझकर उसे सच से दूर महज सनसनीखेज बनाया गया था। एक दूसरा प्रदेश और दो दूसरे अखबारों के बीच का मुकाबला। वहां भी पुराने जमे हुए अखबार ने नए अखबार के पांव न जमने देने के लिए एक इतनी बड़ी खबर छापी, जिसे पढ़कर लोग हिल जाएं। एक बेटे ने अपने मां को मारकर, काटकर, पकाकर खा लिया। इससे बड़ी खबर किसी इलाके के लिए और क्या हो सकती है? और फिर वहां शायद चौथाई या आधी सदी से निकलते अखबार में अगर यह सबसे बड़ी सुर्खी हो, तो फिर लोग और क्या पढऩा चाहेंगे? कम से कम इसके मुकाबले किसी नए अखबार को तो पढऩा नहीं ही चाहेंगे। नतीजा यह हुआ कि नया अखबार बुरी तरह से पिटा हुआ सा लगने लगा। लेकिन उस प्रदेश के पाठकों की हैरानी की कोई सीमा न रही जब नए अखबार ने उस औरत को लाकर पुलिस और पाठकों के सामने पेश कर दिया जिसे कि मार, काट, पकाकर खा चुका गया बताया गया था।
 
लेकिन मीडिया के ऐसे झूठ पर बात आमतौर पर तभी होती है जब बाजार में मुकाबले के लिए किसी को किसी दूसरे अखबार को नीचा दिखाना हो। लेकिन जहां कोई बाजारू टकराव न हों, और जहां अखबारी परंपरागत जुबान के मुताबिक, कुत्ता, कुत्ते को न काट रहा हो, वहां पर लोगों को झूठ की ऐसी साजिशों का क्या पता लगेगा? हम उसी बात पर लौटें, जिस बात से हमने आज लिखना शुरू किया था। जनहित और जनरूचि के फर्क को लेकर मीडिया पर अगर बात नहीं होगी तो यह तो वैसे भी संसद की परसों की बहस के मुताबिक कार्पोरेट हाऊसों का एक कारोबार बन ही चुका है। कार्पोरेट कारोबार की जुबान में सरोकार सिर्फ हाथीदांत की तरह का होता है। यहां पर चलते-चलते हम एक और अखबार और उसकी खबर का जिक्र करना चाहेंगे। टाईम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली के संस्करण में नोएडा इलाके के लिए निकलने वाले पन्नों पर फरवरी 2008 में एक खबर छपी थी जिसमें एक कार दुर्घटना में मारे गए एक युवक और एक युवती के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें थीं। इस पर अखबार ने अपनी कुछ जानकारियों का खंडन उसी बरस अक्टूबर के महीने में कर दिया था। लेकिन अभी इस खबर को लेकर एक बड़ा सा माफीनामा अखबार ने एक रिपोर्ट की तरह छापा है कि उसकी खबर में कौन-कौन सी बातें झूठी थीं। एक मीडिया वेबसाईट ने हिसाब लगाया है कि करीब सवा दो सौ वर्ग सेंटीमीटर जगह में छपे इस माफीनामे का इस अखबार के विज्ञापन रेट से बिल बनता तो वह करीब आठ लाख रूपए का होता। हम अभी रूपयों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन हम मीडिया की गलतियों, उसके गलत कामों, और उनमें सुधार की ऐसी मिसालों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

टोपी से मुंदी हुई आंखों के लिए


23 दिसंबर 2011
संपादकीय
टोपी से मुंदी हुई आंखों के लिए

भारत का लोकतंत्र इस मामले में बहुत अनोखा है और बहुत कामयाब भी है कि जब इसके तीन घोषित स्तंभों और पे्रस नाम के चौथे अघोषित स्तंभ में से कोई कमजोर पड़ता है तो बाकी तीन में से कोई न कोई लडख़ड़ाते हुए उस स्तंभ को उसी अंदाज में थाम लेते हैं जिस अंदाज में पिए हुए या चक्कर खा रहे किसी साथी को कोई दूसरा थाम लेता है। आज शोहरत की जिस शराब के नशे में अन्ना हजारे और उनके साथी अपने-आपको इस विशाल और महान लोकतंत्र के अकेले भाग्यविधाता मान बैठे हैं और इसे हांकने के लिए रालेगान सिद्धि से कोड़ा लेकर निकले हुए हैं, उस शराब के नशे को आज मुंबई हाईकोर्ट ने ठंडा पानी डालकर उतारने की कोशिश की है। उसने अन्ना हजारे की ओर से मुंबई में मुफ्त मैदान पाने के लिए लगाई गई याचिका पर जो कुछ कहा है वह हम आज के ही पहले पन्ने पर खुलासे से दे रहे हैं इसलिए उस पूरी बात को यहां दुहराना ठीक नहीं है और यह संपादकीय पढऩे वाले लोग उस खबर को पढऩे के बाद ही इसे पढ़ें।
 
मुंबई हाईकोर्ट अपनी जागरूकता के लिए, नागरिक अधिकारों के लिए पहले से एक लंबी परंपरा के साथ चल रहा है। लेकिन उसने जो कड़े सवाल टीम अन्ना के सामने खड़े किए हैं वे इस देश की जनता के एक मंत्रमुग्ध तबके की आंखें खोलने के लायक तो हैं, अब शराब का नशा कितना टूटता है और यह मोह कितना टूटता है यह देखने की बात है। अदालत ने यह साफ किया कि जब बिल संसद में पेश हो चुका है और संसद में जब इस पर बहस हो रही है तो इस पर समानांतर आंदोलन की क्या जरूरत है? हाईकोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से संसद को काम करने दीजिए।  यह बात हमारे पाठकों को याद होगी कि हम लगातार उठाते आ रहे हैं और कल संसद में दिन भर जो बहस चली है उस बहस में लालू यादव जैसे लोगों ने जिस धाकड़ अंदाज में अन्ना हजारे के तौर-तरीकों पर वार किया है वह सुनने लायक था। कुछ वामपंथी नेताओं ने भी कल जो मुंह खोला है वह भी उनकी पार्टियों के कुछ नेताओं के उस रूख के खिलाफ था जो कि उन्होंने अन्ना के आंदोलन में शामिल होकर सामने रखा था और जिसके खिलाफ हमने कुछ दिन पहले यह लिखा था कि यह वामपंथियों की एक और ऐतिहासिक गलती के रूप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज किया जाएगा। लेकिन कल संसद में जिस तरह से अन्ना हजारे के आंदोलन की धज्जियां उड़ाई गईं उससे हमारे सरीखे आलोचक का कलेजा ठंडा हुआ है और हमें यह भी लगा कि अपनी सोच में हम पूरी तरह अकेले नहीं हैं। कल की संसद के बाद आज का मुंबई हाईकोर्ट और राहत लेकर आया है। 

हम पाठकों से यह बात फिर कहना चाहेंगे कि संसद की पूरी जिम्मेदारी और पूरे हक को खारिज करते हुए जिस तरह से आज अरविंद केजरीवाल का एक बयान सामने आया है कि उन्हें संसद पर कोई भरोसा नहीं है, इस खतरे को जनता को समझने की जरूरत है। एक वक्त था जब आपातकाल लगाने के लिए संजय गांधी और इंदिरा गांधी के मातहत गिरोह ने इंदिरा इज इंडिया का नारा लगाया था और भारतीय लोकतंत्र पर विदेशी हाथ के खतरे का फर्जी नारा देते हुए देश के लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए थे। उस दौर में भाजपा सहित जिन पार्टियों ने जेल काटी थी, वे लोग आज अन्ना हजारे नाम की एक दूसरी ऐसी तानाशाही का साथ दे रहे हैं जो कि आज तो कांगे्रस और यूपीए के लिए तो परेशानी का सबब बनी हुई है लेकिन कल वह अपने-आपमें लोकतांत्रिक संस्थाओं के हत्यारे के रूप में गलत परंपराओं के साथ अगली सरकार के सामने भी खड़ी रहेगी। भाजपा को आज अगर संसद के भीतर कांगे्रस और यूपीए की फजीहत अच्छी लग रही है तो उसे यह याद रखना चाहिए कि उसके भीतर भी आने वाले कल में किसी सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया बनने की संभावनाएं हैं और उसकी राजनीति किसी मंजिल को लेकर चल रही है। कुछ दिन पहले हमने एक दूसरे नामीगिरामी पत्रकार की बात यहां लिखी थी कि भाजपा के आज के तौर-तरीके ऐसे लग रहे हैं मानो अब वह सत्ता में नहीं आने वाली है। हम तो अन्ना नाम के खतरे को सिर्फ सत्ता पर खतरा मानकर नहीं चलते, हमारा मानना है कि यह पूरे लोकतंत्र पर एक खतरा है, और आज मुंबई हाईकोर्ट ने जो कहा है उसे लोगों को ध्यान से पढऩा चाहिए और उसके बारे में सोचना चाहिए। गांधी टोपी में एक तह मुड़ी हुई होती है। जिन सिरों पर से टोपी की यह तह खिसककर नीचे आकर आंखों को ढाक चुकी है, उन सिरों को भी किसी और से खबर में हाईकोर्ट की आज की फटकार पढऩी चाहिए।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
22 दिसंबर 11
रिश्तों की लंबाई कोई मायने नहीं रखती, लंबाई चाहे कम हो, गहराई अधिक होनी चाहिए।

संसद को अपनी जिम्मेदारी और अपने हक के अहसास की जरूरत

22 दिसंबर 2011
संपादकीय
संसद को अपनी जिम्मेदारी और अपने हक के अहसास की जरूरत
लोकपाल विधेयक अभी कुछ देर में संसद में पेश होने जा रहा है और उसे लेकर लालू यादव-मुलायम सिंह जैसे कई लोगों का विरोध खुलकर सामने आ रहा है। हम अभी इस बात पर नहीं जा रहे कि इनमें से कौन कैसी साख वाले हैं, अभी मुद्दा यह है कि संसद के भीतर जिन लोगों को इस पर बहस का हक है, वे पार्टियां और वे सांसद इस बारे में खुलकर बात करें। यही संसद बहुत से दूसरे मामलों को, जैसे महिला आरक्षण को दशकों से किनारे रखते चल रही है और देश में कोई भी उस बुनियादी हक के लिए सड़कों पर इस तरह से निकलकर नहीं आया है जिस तरह से लोकपाल के लिए भीड़ सड़कों पर आई है, इसकी एक दूसरी वजह यह है कि सिर्फ महिलाओं के लिए जो मुद्दा है, उसमें देश के पुरूषों की दिलचस्पी सीमित है, और लोकपाल का मुद्दा भ्रष्टाचार की चर्चा की वजह से हर किसी तक पहुंचा हुआ है। खैर, अभी बात महिलाओं की नहीं लोकपाल की हो रही है और संसद को भी इसी पर बात करना है। इस बारे में आज हम इसलिए लिख रहे हैं कि अब संसद को दलगत राजनीतिक के साथ-साथ अपनी एक ऐसी संसदीय जिम्मेदारी भी पूरी करनी है जिसे कोई संसदीय अधिकार या एकाधिकार मान सकता है। हम इसे एक एकाधिकार या विशेषाधिकार के रूप में भी मानने को तैयार हैं, बजाय इस संसदीय हक को फुटपाथ को दे देने के। हमारी यह सोच नई नहीं है और हम पिछले कुछ महीनों में बार-बार यह लिख रहे हैं कि संसद का काम संसद को ही करना चाहिए, और बैनर-पोस्टर, अखबारी सुर्खियों और टीवी चैनलों की पट्टियों से परे, हकीकत यही है कि लोकपाल विधेयक को संसद ही तय करेगी। इसे लेकर देश में जितनी अराजकता पिछले महीनों में फैलाई गई है, और आज भी जारी है, उसे हम लोकतंत्र पर एक बड़ा हमला मानते हैं और ऐसी तानाशाह ताकतों को भारत के लोकतंत्र का इतिहास आगे जाकर दर्ज करेगा जिन्होंने अपने कुछ राजनीतिक और कुछ रहस्यमय इरादों के साथ पूरे लोकतंत्र पर से लोगों की आस्था को खत्म करने की कोशिश की, भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख दिया और संसद के महत्व को कूड़ादान में डालने की कोशिश की। हम किसी भी अच्छे मकसद से किसी अच्छी मंजिल तक पहुंचने के ऐसे खूनी रास्ते से सहमत नहीं हो सकते जो तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या करते हुए तय किया जाए।
आज समय है कि संसद अपनी जिम्मेदारी पूरी करे और सड़क-फुटपाथ पर उठाए गए मुद्दों को जनमत का एक हिस्सा मानते हुए उसका जितना नोटिस लेना हो उतना जरूर ले, लेकिन अराजकता के ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर अगर संसद खुलकर इस मामले में बहस नहीं करेगी तो यह भी याद रखने की जरूरत है कि भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के दस्तावेज जिस तरह से आज भी यह दर्ज करके बैठे हैं कि किसने क्या कहा था, वैसा ही लोकपाल पर भी इस संसद में दर्ज होने जा रहा है। संसद के गंभीर भाषणों से चुनावों में वोट कम या अधिक जितनी भी दूर तक प्रभावित होते हों, उनसे परे इतिहास इन बातों को दर्ज करेगा कि भारत की लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था के इस दौर में किस पार्टी ने और किस नेता ने क्या कहा। हम आज यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि हाड़-मांस और चमड़ा जोड़कर शेर बनाकर उसमें जान फूंकने की जो कहानी हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, उसी किस्म का एक ऐसा लोकपाल बनाने की मांग चल रही है जो इस देश के लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के ऊपर एक राक्षसी ताकत वाला हो और जो बेकाबू होने पर पूरे लोकतंत्र को निगल जाने की ताकत रखता हो। जिन लोगों को देश के मौजूदा भ्रष्टाचार को देख-सुनकर थकान हो गई है उन्हें ऐसा राक्षस भी आज सुहा सकता है लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि अमरीका में भी एक वक्त कुछ एजेंसियां ऐसी ताकतवर बना दी गई थीं कि उन्होंने देश की सरकार के खिलाफ ही साजिशें शुरू कर दी थीं और अमरीकी लोकतंत्र खतरे में पड़ गया था। इतिहास से सबक की नौबत आम लोगों तक आसानी से नहीं पहुंचाई जा सकती, दूसरी तरफ भावनात्मक भड़कावे से लोगों को इस बात के लिए सहमत कराया जा सकता है कि लोकतंत्र बहुत फिजूल हो चुका है और इसे उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है। आज यह अराजकता जिन लोगों को सुहा रही है उन लोगों को देखकर हमें इमरजेंसी के वे दिन याद पड़ रहे हैं जब भारत की शहरी आबादी के एक तबके को आपातकाल, अनुशासन पर्व लगता था। आने वाले दिनों में अन्ना नाम की तानाशाही और अराजकता, अहंकार और जिद्द को इतिहास कैसे दर्ज करेगा यह देखने के लिए आज की भारत की जनता का अधिकतर हिस्सा जिंदा रहेगा।

छोटी सी बात


छोटी सी बात
21 दिसंबर
किसी बदनीयत से बहस करना, कीचड़ में सुअर से कुश्ती लडऩे जैसा होता है। जब तक लोगों के दिमाग खुले हुए न हों, तब तक बहस में न उलझें। कड़े खोल वाले साबुत बेल से कोई स्वाद नहीं आता।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
20 दिसंबर
अपने काम के व्यस्त समय में काम का हर्जा करने के बजाय मुलाकातियों से माफी मांग लेना बेहतर है। इसमें कोई बदतमीजी नहीं होती।

यूपीए का मुंह कभी अमरीका जाकर खुलता है कभी रूस...

21 दिसंबर 2011
संपादकीय
यूपीए का मुंह कभी अमरीका  जाकर खुलता है कभी रूस...
केंद्र की यूपीए सरकार जिन बहुत बड़ी-बड़ी लपटों से अभी घिरी हुई है, उनकी चर्चा हम न भी करें, तो भी इन लपटों के बाद का आग का जो घेरा इस सरकार के इर्दगिर्द बन गया है, उससे निपटना भी इसके लिए भारी है। एक तरफ कश्मीर में सेना को मिले हुए विशेष अधिकार हटाने की मांग चल रही है और ऐसी ही मांग को लेकर मणिपुर में आर्थिक नाकेबंदी जाने कितने महीनों से वहां की अर्थव्यवस्था और जिंदगी को तबाह किए हुए है। उत्तरप्रदेश के चार टुकड़े करने के मायावती के चुनावी-राजनीतिक दांव का कोई जवाब कांगे्रस के पास राजनीतिक स्तर पर नहीं है और वह अपने बाबुओं के मार्फत उत्तरप्रदेश को यह गिना रही है कि उसका प्रस्ताव किस तरह तर्कों और तथ्यों के बिना भेज दिया गया है। तर्कों और तथ्यों को लेकर अगर बात की जाए तो यूपीए और कांगे्रस के पास गिनाने के लिए हासिल कुछ भी नहीं है। सरकार का एक बड़ा हिस्सा अदालत के कटघरे में खड़ा है और बाकी हिस्सा जनता की अदालत के कटघरे में। नतीजा यह है कि साख पूरी तरह खो चुका यूपीए आज देश की लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था को अन्ना हजारे के हमले से बचाने की ताकत भी खो चुका है। नतीजा यह भी है कि एक तानाशाह की शक्ल ले चुके अन्ना हजारे को यह देश गांधीवादी मान रहा है। दरअसल किसी भी मोर्चे पर दोनों तरफ की साख की तुलना की जाती है और ऐसे में अन्ना हजारे की खामियां लोगों को दिख नहीं रहीं क्योंकि यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी खूबियां खो चुकी हैं।
हम फिर ठोस बात पर लौटें तो आंध्र में तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की अपनी अधकचरी घोषणा को कांगे्रस किसी किनारे तक नहीं पहुंचा पा रही और अगर चिदंबरम का कोई राजनीतिक ताबूत बनेगा तो उसमें पहली कील उनकी तेलंगाना बनाने की घोषणा रहेगी। इस राज्य में कांगे्रस के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उसके पिछले मुख्यमंत्री वाइएसआर के गुजर जाने के बाद उनका बेटा किस तरह सैकड़ों या हजारों करोड़ की दौलत के साथ सीबीआई की जांच के घेरे है। आज कांगे्रस से बागी होकर उसके खिलाफ खड़े हुए जगन मोहन रेड्डी का किसी मामले में फंसना चाहे कांगे्रस को राजनीतिक रूप से सुहा रहा हो, लेकिन इस बात का क्या जवाब है कि उसके मुख्यमंत्री का कुनबा हजारों करोड़ का मालिक बन जाता है। देश के दक्षिण के दो राज्य तमिलनाडु और केरल एक बांध को लेकर आमने-सामने है और संघीय ढांचे के भीतर ऐसे किसी टकराव पर केंद्र सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है। केरल में कांगे्रस की अपनी सरकार है और तमिलनाडु में कांगे्रस से पूरी तरह तिरछे-तिरछे चल रही, बागी तेवरों वाली जयललिता की सरकार है। ऐसे मेें कांगे्रस की अगुवाई वाला यूपीए किस तरह बीच बचाव कर पाएगा, यह बहुत मुश्किल बात है। और तमिलनाडु में, जहां पर कि कांगे्रस ने अपने एक प्रधानमंत्री की जिंदगी खोई थी, जहां पर श्रीलंका के साथ किसी भी तरह के तनाव को लेकर केंद्र और राज्य के बीच टकराव आए दिन खड़े हो जाता है, वहां पर कांगे्रस जयललिता की विरोधी डीएमके को भी केंद्र के घोटालों के चलते लगभग खो चुकी है। मजबूरियां करूणानिधी को सोनिया के साथ जोड़कर चल रही हैं, लेकिन दिलों में दरार पड़ चुकी है।
इस तरह की कई दिक्कतें यूपीए के सामने खड़ी हैं और एक बड़ी चीज यह है कि इसके तीन सबसे बड़े कांगे्रसी नेताओं, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी में राजनीतिक मुद्दों का सीधा-सीधा सामना करने और सामने खड़े हुए सवालों का जवाब देने का माद्दा नहीं दिखता है। मतलब यह कि वे पहले से तय की हुई बातें कर सकते हैं, पहले से तैयार किए गए किसी अभियान में एक कटआऊट की तरह खड़े होकर भाषण दे सकते हैं, लेकिन इससे अधिक इन तीनों से कोई भी सोच देश को सीधे-सीधे नहीं मिल पा रही है। और कांगे्रस पार्टी, यूपीए सरकार की तरफ से कभी प्रवक्ता, कभी मंत्री और कभी इन दोनों से ऊपर के दिग्विजय सिंह इस किस्म की बातें कर देते हैं कि उनसे झगड़े-टंटे बोने का काम अधिक हो रहा है और इस फसल को काटने की हालत सोनिया गांधी की नहीं दिख रही है। हम सस्ती और फूहड़ राजनीति करने वालों के सत्ता पर काबिज होने के खिलाफ हैं, लेकिन जहां जनहित के मुद्दे, देशहित के मुद्दे सामने खड़े हों वहां पर सुरक्षा घेरे में कैद मौनी बाबा, बीबी को भी हम लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं मानते। हमें हैरानी इस बात की भी है कि भारत में जिस परमाणु बिजलीघर के खिलाफ लोग आंदोलन कर रहे हैं उस आंदोलन पर मनमोहन सिंह को अपना पहला कड़ा बयान देने की नौबत मास्को जाकर मिली। इस देश की बातों पर यहां का प्रधानमंत्री कभी अमरीका जाकर मुंह खोले और कभी रूस जाकर, यह एक शर्मनाक नौबत है।

सदन के भीतर से सुषमा का राष्ट्र के नाम संदेश

20 दिसंबर 2011
संपादकीय
सदन के भीतर से सुषमा का राष्ट्र के नाम संदेश
भारतीय जनता पार्टी ने रूस में हिंदू धर्म ग्रंथ भगवत गीता पर एक शहर की अदालत द्वारा लगाई गई रोक के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए आज संसद में यह मांग की कि भारत इस किताब को राष्ट्रीय गं्रथ घोषित करे।
आज जब हिंदुओं की भावनाएं रूस में इस कार्रवाई से आहत हैं तो ऐसी बात भाजपा को एक लोकप्रियता दिला सकती है, लेकिन हकीकत तो यह है कि ऐसा कहने के साथ-साथ भाजपा इस बात को अच्छी तरह जानती है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य ऐसा कोई काम नहीं कर सकता। उत्तरप्रदेश के चुनावों को लेकर कोई मुसलमानों को मोहने का काम कर रहा है तो कोई दलितों को। भाजपा का यह ताजा नारा उत्तरप्रदेश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को प्रभावित करने की एक कोशिश हो सकती है लेकिन इसके पीछे एक राजनीतिक ईमानदारी नहीं है। लोकतंत्र की सीमाओं और भारत के ढांचे को ध्यान में रखते हुए कोई भी जानकार ऐसी कोई मांग नहीं कर सकता जो कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म पर चढ़कर बैठ जाने की इजाजत दिलाए। हम कांगे्रस या वामपंथियों की तो बात ही नहीं करते, भाजपा अपनी एक पुरानी साथी, अकाली दल से इस मुद्दे पर कोई समर्थन पा सकेगी? पल भर के लिए हम यह कल्पना भी करें कि ऐसा कोई प्रस्ताव संसद में औपचारिक रूप से मतदान के लिए आएगा, तो क्या अकाली दल अपने धर्म के गुरू माने जाने वाले गुरू ग्रंथसाहब को छोड़कर भगवत गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने की मांग का साथ देगा? फिर इस देश में बहुत से और धर्म भी हैं जिनके हक बराबरी के हैं। और रविशंकर प्रसाद से लेकर अरूण जेटली तक इतने बड़े-बड़े कानून के जानकार भाजपा में हैं कि वे अच्छी तरह यह जानते हैं कि भारत के पूरी तरह हिंदू राष्ट्र बन जाने के पहले तक सुषमा स्वराज की यह मांग सिर्फ संसद के बाहर के हिंदू बहुसंख्यक मतदाताओं में से सिर्फ उन्हीं लोगों को ध्यान में रखकर उठाई गई है जो संविधान से ऊपर धर्म को मानते हैं और जो बाबरी मस्जिद गिराने को सही मानते हैं।
हमें सुषमा स्वराज की इस मांग पर अफसोस इसलिए हो रहा है कि आज जब भारत का लोकतंत्र अपने पूरे अस्तित्व में सबसे अधिक मुद्दों से एक साथ जूझ रहा है, जब उसके सामने असल मुद्दों की भरमार है, जब अदालत से लेकर सीएजी तक और संसद से लेकर चुनाव आयोग तक सभी ने तरह-तरह के ऐसे पहलू सभी के सामने खड़े कर दिए हैं, जिनमें से अधिकतर में कांगे्रस और यूपीए कटघरे में है, तब एक भावनात्मक मुद्दे को इस तरह सामने रखकर यूपीए के लिए फजीहत खड़ी करने की कोशिश हम अपरिपक्व भी मानते हैं और ईमानदारी से परे भी। देश की संसद को भावनाओं में हिलाने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह संसद वैसे भी तरह-तरह के अपराधों के मामलों की चर्चा से घिरी हुई है और वही इन दिनों भारतीय लोकतंत्र के लिए काफी है। जब एक गैरजरूरी और नाजायज मांग उठाई जाती है तो उससे देश का और लोगों का ध्यान असल मुद्दों की तरफ से हट जाता है। हम संसद से लेकर विधानसभाओं तक कुछ सांसदों और विधायकों की ऐसी हरकत देखते हैं कि जब कोई बहुत महत्वपूर्ण चर्चा चलती रहती है तो वे खड़े होकर कोई ऐसा शिगूफा छोडऩे लगते हैं कि माहौल की संजीदगी पूरी तरह खत्म हो जाए।
भाजपा एनडीए के अपने साथियों के साथ मिलकर भी न तो राम मंदिर को किसी किनारे पहुंचा पा रही और न ही राम मंदिर की खुली मांग को लेकर अकेले किसी चुनाव में जाने की उसकी हिम्मत है। दरअसल उसे इस बात की अच्छी तरह समझ है कि इस देश के किसी भी आम चुनाव को मंदिर के मुद्दे पर जनमत संग्रह में तब्दील नहीं किया जा सकता। इसलिए इस किस्म की धार्मिक चर्चाओं को समय-समय पर छेड़कर वह अपने समर्थक मतदाताओं में से एक तबके को खुश रखने का काम करती है। लेकिन हमें ऐसी किसी भी चर्चा के समय छत्तीसगढ़ के भाजपाई मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान इस अखबार के एक सवाल के जवाब में कही बात याद आती है। उनसे जब पूछा गया था कि वे मंदिर, मस्जिद,  धर्मांतरण जैसे किसी भी भावनात्मक मुद्दे को चुनाव में क्यों नहीं उठा रहे तो उनका कहना था कि विकास के काम और जनकल्याण के अलावा उन्हें किसी और मुद्दे की जरूरत नहीं है। और उनका अंदाज सही भी साबित हुआ। पूरे देश में हम आज किसी तरह से धार्मिक धु्रवीकरण की जरूरत नहीं देखते और संभावना भी नहीं देखते। ऐसे में संसद की गंभीरता को खत्म करते हुए अगर सुषमा स्वराज एक ऐसी पूरी तरह अव्यवहारिक और अलोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मांग करती हैं तो हर कोई इस बात को समझ सकता है कि वे सदन को यह बात नहीं सुना रहीं, वे जनता के एक तबके को सुना रही हैं।

आज का यह संपादकीय अदम गोंड़वी की कलम से

संपादकीय
19 दिसंबर 2011
आज का यह संपादकीय अदम गोंड़वी की कलम से
एक जाने माने शायर अदम गोंड़वी के गुजरने से भी उनकी मौत नहीं हुई। अपनी लिखी बातों को लेकर वे हिंदुस्तान के बहुत तकलीफजदा लोगों की आवाज बनकर हमेशा बने रहेंगे। उनकी गज़लें और उनके शेर किसी दूसरे शायर से अलग, पूरी तरह लोगों के दुख-दर्द से उपजे हैं और दो-दो लाईनों में तकलीफ को इस कदर साफ-साफ बयां करना हमारे लिए भी आसान नहीं है। कमोबेश इसी किस्म की बातें हम आए दिन इस कॉलम में लिखते हैं और आज हमें यह लग रहा है कि हम एक दिन में इतनी जगह में इतनी बातें और किस तरह कह सकते हैं, बजाय अदम गोंड़वी को यह जगह दे देने के। हम उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हैं और जुड़े हुए हैं, इसलिए आज का संपादकीय उन्हीं का लिखा हुआ है।
सौ में सत्तर आदमी, फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है।
कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है।
सत्ताधारी लड़ पड़े है आज कुत्तों की तरह
सूखी रोटी देखकर हम मुफ्लिसों के हाथ में!
जो मिटा पाया न अब तक भूख के अवसाद को
दफन कर दो आज उस मफ्लूज पूंजीवाद को।
बूढ़ा बरगद साक्षी है गांव की चौपाल पर
रमसुदी की झोपड़ी भी ढह गई चौपाल में।
जिस शहर के मुन्तजिम अंधे हों जलवामाह के
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है।
जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
रोशनी वो गांव तक पहुँचेगी कितने साल में।
——-
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
——-
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है।।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी।
सुबह से फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।।
बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल की सूखी दरिया में।
मैं जब भी देखता हूँ आँख बच्चों की पनीली है।।
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास वो कैसे।
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है।।
——-
ढो रहा है आदमी काँधे पे ख़ुद अपनी सलीब
जि़न्दगी का फ़लसफ़ा जब बोझ ढोना हो गया
——-
ज़ुल्फ़-अंगडाई-तबस्सुम-चाँद-आईना-गुलाब
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब
पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद में किसको फुर्सत है पढ़े दिल की कि़ताब
——-
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
ये बन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
——-
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है
लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है
——-
सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे
——-
बेचता यूँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को
सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
——-
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है
रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है
——-
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ्ऩ है जो बात, अब उस बात को मत छेडि़ए
गऱ ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेडि़ए
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेडि़ए
छेडि़ए इक जंग, मिल-जुल कर गऱीबी के खिलाफ़
दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेडि़ए

छोटी सी बात

18 दिसंबर
छोटी सी बात
कागज के एक तरफ खाली पन्नों, इस्तेमाल हो चुके लिफाफों का भी कुछ अनौपचारिक इस्तेमाल हो सकता है। ऐसी कोशिश से ही धरती बच पाएगी।

अक्ल की जगह कैमरा-माईक

18 दिसंबर 2011
संपादकीय
अक्ल की जगह कैमरा-माईक
राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत सी बातें मीडिया में रोज ऐसी आती हैं जिन्हें देख-सुनकर, पढ़कर आम समझ रखने वाले लोग भी यह अंदाज लगा पाते हैं कि मामले में कितना वजन है। फिर जिन लोगों का भरोसा एक प्राकृतिक न्याय पर रहता है और जो लोग तर्कसंगत और न्यायसंगत बात करने और सुनने जितनी समझ रखते हैं वे लाईनों के बीच का भी न लिखा हुआ पढ़ लेते हैं जो कि आमतौर पर बयान देने वालों की नीयत रहती है और छापने या दिखाने वालों की हड़बड़ी रहती है। हमें अधिक हैरानी इस बात पर होती है कि बड़े-बड़े दिग्गज अखबारनवीस या टेलीविजन पत्रकार लोगों की कही हुई भारी सनसनीखेज बातों को उसी अंदाज में लिखकर या रिकॉर्ड करके अपने पाठकों और दर्शकों के सामने पेश कर देते हैं जिस अंदाज में डिक्टेशन लेने वाले एक स्टेनोग्राफर से उम्मीद की जाती है। अगर काम ऐसे ही करना है तो रिपोर्टर की महंगी तनख्वाह के बजाय बहुत कम तनख्वाह पर स्टेनोग्राफर मिल सकते हैं जो कि डिक्टेशन लेने में चूक भी नहीं करेंगे। एक वक्त जब टीवी के कैमरे नहीं रहते थे, तो अखबारों के लोग भी अधिक मेहनत करते थे क्योंकि उन्हें शब्दों से ही सब कुछ पेश करना होता था। अब वह गंभीरता कम होते-होते खत्म सी हो गई है और आज ऐसा सोचने और इस मुद्दे पर लिखने के हमारे पास कुछ ठोस कारण हैं।
आज हम यहां अन्ना हजारे से बात की शुरूआत कर रहे हैं लेकिन हम उनके बारे में कुछ लिखना नहीं चाह रहे, हम मीडिया के बारे में लिखना चाह रहे हैं। पिछले कई महीनों से लगातार अन्ना हजारे यह बात कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो ठीक हैं लेकिन उन पर काबू रखने वाला रिमोट कंट्रोल खराब है। अभी कई हफ्तों से वे राहुल गांधी के बारे में कह रहे हैं कि लोकपाल बिल में फेरबदल राहुल गांधी की दखल से करके उसे कमजोर किया गया है। यह कहते हुए वे सोनिया के घर के बाहर धरने की बात भी कह रहे हैं। कुछ महीने पहले वे कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरू गए थे और वहां उस वक्त तक जेल न गए हुए भाजपाई मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को पूरी तरह अनदेखा करते हुए जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट को पूरी तरह अनदेखा करते हुए सिर्फ यूपीए और कांगे्रस पर हमला करते हुए वे लौट आए थे। जस्टिस हेगड़े अन्ना के साथ के ही लोकपाल मसौदा कमेटी के सदस्य थे और उनकी जांच रिपोर्ट के आधार पर इस मुख्यमंत्री को हटना पड़ा था और जेल जाना पड़ा था। हम अन्ना हजारे के बारे में आज कुछ भी कहना नहीं चाहते लेकिन किसी व्यक्ति, खासकर जो व्यक्ति आदर्श की कुतुबमीनार को एफिल टॉवर की ऊंचाई तक ले जाना चाह रहा हो, उससे कुछ सवाल करने की जिम्मेदारी मीडिया की बनती है या नहीं? वे अगर बिना किसी बुनियाद के किसी को रिमोट कंट्रोल कहते हैं, किसी को लोकपाल में दखल देने वाला कहते हैं, कल यह कहते हैं कि लोकपाल होता तो यह चिदंबरम जेल में होता, तो ऐसी बातों पर उनकी रिकॉर्डिंग करने वाले मीडिया के लोग उनसे उनके इन आरोपों की बुनियाद क्यों नहीं पूछते? हमें देश के किसी भी चैनल पर और किसी भी अखबार में बेंगलूरू में अन्ना हजारे से पूछे गए ऐसे किसी सवाल को देखना या पढऩा नसीब नहीं हुआ। एक व्यक्ति अगर आत्ममुग्ध, आत्मकेंद्रित, अहंकारी और महत्वोन्मादी होकर रात-दिन बेबुनियाद आरोप लगा रहा है तो हमें यह लगता है कि लोकतंत्र के इस नए अंदाज के सामने क्या मीडिया अपने-आपको भी पेश करना चाहेगा? काम के बाद मीडिया के जो लोग शराब पीते हैं, क्या वे लोग अपने-आपको अन्ना के कोड़ों के सामने खड़ा करेंगे? क्या जिन लोगों के चैनल धर्म के अलावा कुछ दूसरी बातें भी दिखाते हैं, उन सबको अन्नाराज के गांव में बंद हो जाना पसंद होगा?
लोगों की आशंकाएं या उनकी बदनीयत अगर ज्यों की त्यों खबर बन रही है क्योंकि वह टीवी समाचारों की जरूरत के मुताबिक पांच-दस सेकंड के एक टुकड़े में आपत्तिजनक और सनसनीखेज बात कह देती है, तो क्या ऐसे तमाम नारे बिना किसी सवाल के सीधे-सीधे खबर हैं? अन्ना की सारी बातें नारों की शक्ल में हैं और नारों के लिए तुकबंदी काफी होती है, किसी किस्म की सच्चाई की जरूरत नहीं पड़ती। यह सिलसिला हम इसलिए शर्मनाक मानते हैं कि आज मीडिया में दिमाग की जगह कैमरों और माइक्रोफोन ने ले ली है। एक वक्त था जब अखबारनवीसी में लोग सवाल तैयार करके जाते थे और लोगों को अपने सवालों से परेशान करके, पाठक के मन में उठने वाले सारे सवालों के जवाब लेकर आना अपने पेशे की जिम्मेदारी समझते थे। उस वक्त की हमें एक याद है कि अविभाजित मध्यप्रदेश के एक सबसे बड़े पत्रकार, और प्रकाशक भी, स्व. मायाराम सुरजन से तत्कालीन मुख्यमंत्री ने यह शिकायत की थी कि उनके एक संवाददाता प्रेस कांफे्रंस में उन्हें परेशान करने वाले सवाल करते हैं। इस पर उन्होंने शिकायत से जुड़ी हुई खबरों को देखा था और मुख्यमंत्री को रूबरू कहा था- 'हमारे अखबार के संवाददाताओं को कहा जाता है कि वे सवाल तैयार करके जाएं और उन्हें पूछकर आएं, इसलिए मुझे इन सवालों में कोई गलती नजर नहीं आ रही है।Ó यह कहते हुए उन्होंने इतना जरूर कहा था कि अगर संवाददाता के बोलने के लहजे में कोई गड़बड़ी थी तो वे उसे यह दुरूस्त करने के लिए जरूर कहेंगे। लेकिन वह दौर उनके जैसे पत्रकारों के साथ खत्म हो गया है और आज न वैसे सवाल पूछने वाले संवाददाता बहुत अधिक रहते और न ही पाठक को उसकी उम्मीद के, जरूरत के सवालों के जवाब मिलते। यह सिलसिला कैसे सुधरेगा, कैसे मीडिया अपनी इस बहुत साधारण सी तकनीकी काबिलीयत का इस्तेमाल करेगा, पता नहीं।

भूख और लूट

17 दिसंबर 2011
संपादकीय
भूख और लूट
देश में इनकमटैक्स का जो बकाया है उसका नब्बे फीसदी हिस्सा कुल एक दर्जन लोगों से वसूला जाना है। इनमें बड़े-बड़े जालसाज, शेयर बाजार के धोखेबाज शामिल हैं और देश के सीएजी की रिपोर्ट में इन आंकड़ों के साथ यह भी कहा गया है कि इस वसूली के कोई आसार नहीं हैं। सरकार को 1.96 लाख करोड़ रुपये टैक्स वसूल करना है, और यह लगभग पूरे का पूरा सिर्फ दर्जन भर लोगों का डुबाया हुआ है। यह किस तरह का लोकतंत्र है जिसमें कुछ लोग इस कदर ताकतवर हो जाते हैं कि वे अपनी पूरी जिंदगी देश की दौलत को, सरकार को, जनता के हक को लूटने में लगाए रखते हैं और सरकार, कानून, और बाकी की संवैधानिक संस्थाएं मानो स्टेडियम की कुर्सी पर बैठे हुए एक सर्कस का मजा लेती रहती हैं। ऐसे देश में कुछ लोग अगर बंदूक उठाकर ऐसे लोकतंत्र के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, तो उसमें गलत चाहे जितना हो, हैरानी का क्या है? आज ही सुबह अरब दुनिया के लोकतांत्रिक आंदोलनों में लगे हुए किसी एक ने लिखा- ''अपने तमाम आक्रोश के बावजूद आज मेरी हालत पिंजरे में बंद एक चूहे जैसी है।ÓÓ
हमें लगता है कि अरब देशों से लेकर हिंदुस्तान तक साधारण इंसान की हालत अपने तमाम आक्रोश के बावजूद पिंजरे में बंद चूहे जैसी ही है। जिन देशों में आज क्रांति होते दिख रही है वहां का सच भी आगे चलकर इतिहास में क्या दर्ज होगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन भारत में आज बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोगों के तानाशाह और बदनीयत, पक्षपाती राजनीति वाले आंदोलनों से लोग अगर जुड़े हैं तो यह उनकी एक भड़ास का ही नतीजा है। पिंजरे में बंद चूहों को अगर एक जगह जुटने का मौका मिलता है, और वे एक जगह जुट जाते हैं तो फिर वे बंधनों को किस तरह काट सकते हैं, इसको लेकर दुनिया के हर देश में छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी कहानियां प्रचलित हैं। हम तो बिना गलती शायद ही 1.96 लाख करोड़ की संख्या लिख पाएं, लेकिन आज सुबह जब सामने यह खबर तभी अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की यह खबर भी सामने है कि राजधानी के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में छह महीने पहले मरे दो बरस के एक बच्चे के मां-बाप पर अब पुलिस ने मामला दर्ज किया है कि उन्होंने लापरवाही से, भूख से उस बच्चे की मौत की नौबत लाई थी। यह पूरा सिलसिला भयानक है और जब इस देश में ऐसी मौतों की नौबत आ रही है तभी इस देश में तथाकथित लोकतांत्रिक सत्ता जिस तरह गिरोहबंदी और साजिश से जनता के हक पर डाका डाल रही है, उसके खिलाफ जंगलों से परे के शहर पता नहीं कब तक नक्सलियों वाले होने से बचे रहेंगे। पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हमने इसी जगह कर्नाटक के सोना खदान वाले जिले रायचूर के बारे में लिखा था जहां पर छह बरस से कम उम्र के छब्बीस सौ बच्चे पिछले दो बरस में ही कुपोषण का शिकार होकर मरे हैं। ये आंकड़े राज्य के ही महिला एवं बाल कल्याण विभाग के दिए हुए थे। यही पर एक दूसरी खबर अभी हमारे हाथों में है कि छत्तीसगढ़ से छोटे-छोटे बच्चों को इसी कर्नाटक में ले जाकर बेचकर या भाड़े पर देकर, उनको नशा कराकर किस तरह उनसे जबरिया भीख मंगवाई जाती थी और अभी किस तरह से वे वहां से आजाद किए जा रहे हैं। कल सबसे पहले हमने ही इस बारे में रिपोर्ट छापी और आज वहां दो दर्जन से अधिक बच्चों की तो छत्तीसगढ़ी होने की शिनाख्त हो चुकी है। यह अपराध का एक अलग मामला है लेकिन हम दूसरी तरफ यह देखते हैं कि इतने छोटे बच्चों को अगर कोई खरीदकर या भाड़े पर लेकर जा रहा है और उन पर ऐसी ज्यादती कर रहा है, तो इसके पीछे देश की गरीबी भी जिम्मेदार है, और यह गरीबी इस देश के हर्षद मेहताओं जैसे लुटेरों की भी खड़ी की हुई है। जब भारत की सरकार इतनी बड़ी रकम ऐसे लोगों से नहीं वसूल कर पा रही है तो वह कैसे लोगों का हक लुटेरों को दे रही है यह बात जाहिर है। जब कर्नाटक के कुपोषण के शिकार बच्चे, छत्तीसगढ़ से बिककर दूसरे प्रदेशों में जाकर भीख मांगने में लगाए गए बच्चे, ऐसी जिंदगी जी रहे हैं, और ऐसी मौत मर रहे हैं तब इस देश का नब्बे फीसदी आयकर बकाया अगर कुल एक दर्जन लोगों के पास डूब रहा है, तो हमारे पास यह मानने की कोई वजह नहीं है कि इन एक दर्जन लुटेरों के साथ सत्ता की भागीदारी नहीं है। सत्ता की हिस्सेदारी के बिना इतनी बड़ी लूट नहीं हो सकती, और ऐसी सत्ता के खिलाफ देश के बाकी हिस्सों में भी खड़े होने में नक्सलियों, या दूसरे हथियारबंद लोगों को और कितना वक्त लगेगा?

हितों के टकराव ऐसे दिग्गज वकील न समझें, तो कौन समझेगा?

16 दिसंबर 2011
संपादकीय
हितों के टकराव ऐसे दिग्गज वकील न समझें, तो कौन समझेगा?
जिन लोगों को ज्योतिष और भविष्यवाणी पर भरोसा हो वे कह सकते हैं कि यूपीए, कांगे्रस और चिदंबरम के दिन ठीक नहीं चल रहे। जिन लोगों को ऐसे पाखंड के बजाय कुदरत पर अधिक भरोसा हो, वे कह सकते हैं कि जो जैसा बोता है, वो वैसा काटता है। जिन लोगों को सार्वजनिक जीवन में नैतिकता पर अब भी भरोसा हो वे नेहरू-गांधी को याद कर सकते हैं कि एक वक्त उनकी रही पार्टी का आज ऐसा बुरा हाल हो गया है। लेकिन हम साफ-साफ लफ्जों में अगर लोकतंत्र और कानून के हिसाब से कड़ी और खड़ी बात करें तो गृहमंत्री पी. चिदंबरम एक बात के गुनहगार हैं कि उन्होंने अपनी वकालत के वक्त के मुवक्किलों में से एक के खिलाफ मामला वापिस लेने की नौबत अपने मंत्रालय में आने दी। पूरी जांच के पहले हम अभी उन्हें सोच-समझकर ऐसा करने का गुनहगार तो नहीं कहेंगे लेकिन यह बात साफ है कि जो लोग किसी एक पेशे में रहते हैं, उन लोगों को कोई भी सार्वजनिक पद संभालते हुए यह याद रखना चाहिए कि बीते कल तक वे जिस धंधे में थे, उस धंधे का कोई नफा-नुकसान तो आज उनके दफ्तर से, उनके मातहतों के हाथों से नहीं हो रहा?
हमारे पाठकों को याद होगा कि दो-तीन बरस पहले जब अर्जुन सिंह केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री थे तब उनके मंत्रालय में स्कूली बच्चों के दोपहर के भोजन की योजना में गर्म पके भोजन के बजाय कारखानों से बने पैकेटबंद बिस्किट देने की एक साजिश चली थी। बिस्किट कारखानादारों ने इसके लिए सभी पार्टियों के सांसदों के बीच एक बड़ी लॉबिंग की थी। अर्जुन सिंह के मंत्रालय में उनकी बेटी ने जाकर एक आईएएस अफसर से बात की थी जिसने इस बात को फाईल पर दर्ज कर दिया था। वह एक मामला एक नेता के विभाग में हितों के टकराव का मामला था जिसमें तेरह हजार करोड़ रूपए से अधिक की यह सालाना योजना दसियों करोड़ बच्चों के सेहत को बेचकर धंधेबाजों को कमाई करवाने की कोशिश थी। ऐसे मेें मंत्री का परिवार किसी भी तरह से अगर दखल देता है तो विभाग का फैसला उससे खराब हो सकता है। ऐसा ही हितों का टकराव हम चिदंबरम के इस मामले में देखते हैं। केंद्र सरकार में आने के बाद किसी भी बड़े वकील को यह चाहिए कि वह अपने पुराने मुवक्किलों की एक फेहरिस्त बनाकर सरकार को दे दे ताकि उनसे जुड़े हुए कोई भी मामले सामने आने पर वे अपने को उस फैसले से अलग रखें।
सरकारों में यह जगह-जगह सामने आता है कि नेता या अफसर अपने से जुड़े हुए मामलों, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और भागीदारों के मामलों को भी खुद देखते रहते हैं। हमारा मानना है कि किसी भी पद की जो शपथ ली जाती है, या फिर सेवा-शर्तों के तहत जो लोग नौकरी करते हैं उन सबसे यह पूरी तरह हलफनामे पर ले लेना चाहिए कि किसी भी मामले में उनके दूर के भी संबंध होने या उनके हित प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े होने पर वे खुद होकर उसकी घोषणा करेंगे और अपने-आपको फैसले से अलग कर लेंगे। अदालतों में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है कि हर जज को यह घोषणा करनी होती है कि उनके कौन से संबंधी वकालत करते हैं। इसी तरह अपनी पुरानी फर्म के मामलों को वे जज नहीं देख सकते। एक बड़े कमाऊ वकील रह चुके चिदंबरम से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वे अपने से जुड़े हुए मामलों को लेकर यह बात पहले ही सरकार के सामने साफ कर देते कि वे कहां किस चीज से जुड़े रहे हैं। ऐसा न करके उन्होंने एक अनैतिक काम तो किया ही है, आगे जाकर जांच में यह भी साबित हो सकता है कि उन्होंने एक पक्षपाती काम भी किया। यह उनकी पार्टी और उनके गठबंधन के लिए भी एक शर्मनाक बात होगी, आज भी है।
और यह बात सिर्फ उन्हीं के बारे में हम नहीं लिख रहे, देश और सभी प्रदेशों में लोगों को यह साफ-साफ उजागर करना चाहिए कि कहां-कहां उनके निजी हित जुड़े हुए हैं और वे अपने-आपको कुछ मामलों से अलग क्यों रखें। इन दिनों छत्तीसगढ़ में एक ऐसी चर्चा चल रही है कि एक जज का परिवार कहीं और वकालत कर रहा है, इधर जज के सामने सरकार के खिलाफ कई मामले हैं, और उधर जज के संबंधी को सरकार ने अपना वकील बनाया है। अगर ऐसी बातें सच साबित होती हैं तो ये इन तीनों पक्षों के लिए एक शर्मिंदगी की बात हो सकती है।

शराब कारोबार, जरूरत से अधिक रोक-टोक से किसी दिन बंगाल जैसी नौबत न आए...



संपादकीय
15 दिसंबर
शराब कारोबार, जरूरत से अधिक रोक-टोक से किसी दिन बंगाल जैसी नौबत न आए...

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का पीछा बड़े-बड़े हादसे छोड़ ही नहीं रहे हैं। देश में सबसे अधिक मेहनत करने वाली मुख्यमंत्रियों में से एक और शायद सबसे अधिक सादगी से रहने वाली ममता को अस्पतालों में छोटे बच्चों की थोक में मौत झेलनी पड़ रही है, अस्पताल की आग देखनी पड़ रही है और अब नकली या जहरीली शराब से पूरे सौ लोग एक साथ मारे गए हैं। देश में हाल फिलहाल में शराब से होने वाली यह सबसे बड़ी मौत है। हम इस घटना से सबक लेते हुए छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बात करना चाहते हैं जहां पर राज्य सरकार पिछले करीब एक बरस में शराब कारोबारियों पर तगड़ा वार करके उनका धंधा मुश्किल कर दिया है, और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि शराब माफिया की मनमानी बंद कर दी है। जब तक कोई धंधा सरकार के दिए हुए लाइसेंस से चलता है, और जब तक उसमें कोई अपराध नहीं पकड़ाता है तब तक उसे माफिया कहने से हम सहमत इसलिए नहीं रहते क्योंकि उससे इस शब्द की गंभीरता खत्म हो जाती है। पूरी दुनिया का इतिहास गवाह है कि शराबबंदी जिस देश में या जिस प्रदेश में रही, वहां पर माफिया पनप गए और अमरीका में करीब आधी-पौन सदी पहले शराब पर रोक के चलते उस कारोबार भूमाफिया जिस तरह काबू में रखता था और पुलिस के साथ जिस तरह उसकी खुली मुठभेड़ होती थी, उस पर ढेरों फिल्में भी बनी हुई हैं। भारत में ही गुजरात का हाल देखें तो वहां लंबे समय से चली आ रही शराबबंदी के बाद भी हर तरह की शराब आसानी से मिलती है और फर्क सिर्फ यही है कि उस शराब के असली या नकली होने की कोई गारंटी नहीं होती और वह मनमाने दाम पर बिकती है जिस पर सरकार को कोई टैक्स तो नहीं मिलता लेकिन सरकार का अमला इस माफिया कारोबार के चलते इस कदर भ्रष्ट हो चुका है कि मुंह लगा हुआ यह खून शायद ही कभी छूट पाए।
हम छत्तीसगढ़ की चर्चा करना चाहते हैं। यहां सरकार ने पिछले एक-दो बरस में लगातार छोटे गांवों से शराब दुकानों को हटा दिया है और कई गांवों को 15-20 किलोमीटर दूर ही शराब दुकान पड़ती है। लोगों का शराब पीना इससे कम होगा ऐसा सरकार का मानना है, लेकिन जिनको इसकी आदत है, या जरूरत है, वे लोग किसी दूसरे की लाई हुई शराब या शराब माफिया की स्मगलिंग की शराब पर टिके रहेंगे। नतीजा यह है कि लोग शहरों में तो एक किलोमीटर पर शराब पा जा रहे हैं, गांवों में लोग 20 किलोमीटर तक जाने को बेबस किए जा रहे हैं और राज्य सरकार की यह घोषणा है कि आने वाले बरसों में वह और अधिक गांवों से शराब दुकानों को हटा देगी। शराब एक बुरी चीज है यह गांधी के समय से लेकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह  तक हर कोई कह रहा है। लेकिन शराब के जो दूसरे विकल्प नशे के आदी लोग ढूंढ लेंगे, और आज भी दबे-छुपे ढूंढ रहे हैं वे शराब से कई गुना अधिक खतरनाक हैं। तरह-तरह के नशे लोगों को खत्म कर सकते हैं। जिस अमरीका में शराब पूरी तरह खुली है, वहां पर भी अब डॉक्टरी सलाह से भांग और गांजा जैसे कम नुकसानदेह नशे को कानूनी दर्जा देकर तरह-तरह से लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है कि अगर किसी मजबूरी में उन्हें नशा करना ही है तो वे कम नुकसानदेह नशा करें, बजाय खतरनाक दवाईयों के। छत्तीसगढ़ की शराब नीति अगर बिना किसी विकल्प के, बिना किसी जागरूकता के और बिना व्यवहारिकता के सिर्फ सरकारी अमले के दम पर लागू की जाएगी तो चारों तरफ बिना शराबबंदी वाले राज्यों से शराब आना तो आज भी हो सकता है, और कल हो सकता है कि जहरीली शराब आकर बिके, और खतरनाक नशे के सामान आकर बिकें। हम हर बात पर सरकार के प्रतिबंध को जरूरी या सही नहीं मानते। लोगों के बीच में उनके अच्छे और बुरे के लिए एक जागरूकता पैदा करना अधिक जरूरी है, बजाय उन्हें एक खतरनाक जगह पर छोड़ देने के, जहां सरकार उनके दूसरे रास्तों पर कभी काबू नहीं कर पाएगी। आज तो चार-छै बोतलों को लेकर जाने वाले छोटे-छोटे शराब तस्करों को पकड़कर सरकार उनके खिलाफ बहुत कड़े कानून लागू कर रही है, जेल भेज रही है, लेकिन जेब की पुडिय़ा में रखकर जब लोग नशे का धंधा करेंगे तो उन्हें पकडऩा इतना आसान नहीं रहेगा।
छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के समय से शराब के कारोबार को सरकार इस कदर अपने काबू में रखती है कि वह जब चाहे किसी कारोबारी को माफिया साबित कर सकती है और इस धंधे से सत्ता जब चाहे तब जितनी चाहे उतनी वसूली भी दशकों से करती चली आ रही है। जरूरत से अधिक नियम और रोक-टोक, मनमानी, पक्षपात और भ्रष्टाचार सबको बढ़ाते हैं। इस राज्य में शराब के कारोबार को तर्कसंगत तरीके से तय करने की जरूरत है, आज सरकार की नीति लोगों का भला करने की नीयत से चाहे बदली जा रही हो, किसी दिन यहां पश्चिम बंगाल के आज के हादसे जैसा हादसा हो सकता है।

उनकी बेशर्मी जीतेगी या हमारा बर्दाश्त?

14 दिसंबर 2011
संपादकीय
उनकी बेशर्मी जीतेगी या हमारा बर्दाश्त?
राजस्थान के भंवरी देवी मामले को लेकर हमने एक पहलू पर अभी कल-परसों ही लिखा है कि लोगों को खुफिया कैमरों और माइक्रोफोन के इस जमाने में किस तरह चौकन्ना रहना चाहिए। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू और है। कांगे्रस सरकार का एक ताकतवर मंत्री इस महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लापता होने, और शायद मारे जाने, के मामले में गिरफ्तार है और आज सुबह सीबीआई ने कांगे्रस के एक विधायक के घर छापा मारा है जिसके बारे में इस गायब महिला के पति ने सीबीआई को ऐसा बयान दिया है कि यह विधायक उसकी पत्नी के एक बच्चे का पिता है। आज के भारत के सामाजिक पैमानों के मुताबिक यह मामला कुछ अधिक ही कालिख से घिरा हुआ होते जा रहा है। और यह सिलसिला कोई एक दिन में तो खड़ा हुआ नहीं होगा, लंबे समय से किसी बदचलन की हरकतें ब्लैकमेलिंग से लेकर हत्या तक की ऐसी नौबत तब पहुंची होंगी।
अब सवाल यह उठता है कि कांगे्रस को या कोई और राजनीतिक दल, जब पार्टियां गांव-कस्बों तक अपने लोग होने का दावा करती हैं, करोड़ों में सदस्यता बताती हैं तो अपनी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के ऐसे चाल-चलन उनकी नजरों में पहले क्यों नहीं आते? जब घड़ा इतना भर चुका होता है कि उसके सिर पर फूटने से पूरा बदन गंदगी से लथपथ हो जाता है, तब भी अदालत के कटघरे तक पहुंचने के पहले पार्टियां अपने कुकर्मियों को बर्दाश्त करते रहती हैं और उन्हें अपने सिर पर बिठाकर रखती हैं। जिस देश में नैतिकता के पैमानों को चौराहों पर टांगकर रखा जाता है, वहां पर राजनीतिक दलों के सामने चोरी, डकैती, बलात्कार, भ्रष्टाचार जैसे तमाम मामलों में गले-गले तक डूबे हुए नेताओं को सजा के पहले तक सजाकर रखने की क्या बेबसी होती है? किसी को पद से हटा देने, चुनाव में टिकट न देने, पार्टी में कोई कुर्सी न देने को सजा तो नहीं कहा जा सकता? तो ऐसे दागी लोगों को अदालत से बरी हो जाने तक पार्टी हाशिए पर क्यों नहीं रख सकती? यह पूरा सिलसिला बताता है कि पार्टियों की सोच जब बहुत घटिया होती है तो ही वे अपने अपराधियों को ढोती हैं। एक अपराधी को अपराधी साबित होने में अदालत में दस-बीस-पचीस बरस लग सकते हैं। लेकिन अपराधों से अच्छी तरह वाकिफ और तजुर्बेकार पार्टियां तो पल भर में अपने मवालियों को पहचान सकती हैं और पार्टी के दफ्तर में बैठकर तुरंत ही अंदाज लगा सकती हैं कि वे कितने बड़े मुजरिम हैं। इसके बाद वे अगर ऐसे लोगों को राजनीति और सावर्जनिक जीवन की मूलधारा से अलग करके उन्हें व्यक्तिगत रूप से बच जाने का एक स्वाभाविक मौका दें तो उसमें कोई बात नाजायज नहीं होगी। लेकिन पार्टियों का हाल यह है कि वे अपने बदन के ट्यूमर की तरह अपने कुकर्मियों को ढोते चलती हैं। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का तकाजा अब न नेताओं को छूता है और न उनकी पार्टियों को। एक-दूसरे के देखा-देखी अब पार्टियां खुलकर दूसरी पार्टी के मवालियों की मिसालें देती हैं और यह सवाल करती हैं कि मेरा मुजरिम तुम्हारे मुजरिम से अधिक बुरा कैसे?
अभी कल ही हमने इसी पेज पर अमरीका में बसे अपने एक छत्तीसगढ़ी पाठक का भेजा पत्र छापा है जो कि इंटरनेट पर रोज इस अखबार को देखकर अक्सर अपनी राय भेजते हैं। इस अखबार के एक संपादकीय के बारे में उन्होंने लिखा है-''कोई डेढ़ सौ अपराधी और दागी लोग भारतीय संसद और विभिन्न विधानसभाओं में जनता के प्रतिनिधि बनकर घुस आये हैं। और जैसा कि आपने लिखा है इनमें से कई लोग तो सत्ता का मजा भी ले रहे हैं। चारा-घोटाला कांड में जेल की सजा काटकर भी लालू प्रसाद यादव पांच साल तक रेल मंत्री रहे इससे दुखद और हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है। गंभीरता से सोच कर देखें तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सबसे पहली गलती तो दागी लालू को रेल मंत्री बनाकर ही की थी। राजा ने तो बाद में बाजा बजाया, प्रजा को चौपट किया और उसे चूना लगाया। अमरीका में उन्हें भी (लालू को) 14 साल से कम की सजा न होती और यहां की सुप्रीमकोर्ट उनके चुनाव लडऩे पर हमेशा के लिए रोक लगा देती। जैसा कि आपने लिखा है कि यदि रावण के किए की सजा राम उसे बीस बरसों बाद देते / सीता को स्वतंत्र कराते तो उनका क्या हाल होता।ÓÓ
भारत की सत्ता की राजनीति में कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब किसी न किसी पार्टी के बारे में हमें ऐसा न लगे कि इस पार्टी के नेताओं को दिखता नहीं है या वे जुर्म के फायदों में भागीदार हैं? सच तो यह है कि खबरों को रोज देखकर दिल बैठने लगता है और लोकतंत्र पर से भरोसा खत्म होने लगता है। अब इस दौड़ में पहले लोकतंत्र की जिम्मेदार संस्थाएं पूरी तरह खत्म हो जाती हैं या उसके पहले हमारा हौसला, हमारे जैसे लोगों का हौसला उसी तरह खत्म हो जाता है जिस तरह बरसों पहले से नक्सलियों का हो चुका है?

जिनका हक नहीं है, वे खुद होकर सरकारी रियायत का लालच छोड़ें

13 दिसंबर 2011
संपादकीय
जिनका हक नहीं है, वे खुद होकर सरकारी रियायत का लालच छोड़ें
केंद्र सरकार के पेट्रोलियम राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह ने संपन्न तबके से कहा है कि उसे खुद होकर रियायती रसोई गैस नहीं खरीदना चाहिए और पूरे दाम की गैस लेना चाहिए क्योंकि वह रियायत का हकदार नहीं है। आज के इस देश के माहौल में ऐसी महीन बातों के लिए हवा में कोई गुंजाइश नहीं बची है क्योंकि जनता यह मानकर चल रही है कि अगर कोई मंत्री है तो उसने सैकड़ों करोड़ों का घपला किया ही होगा और नौ सौ चूहे खाने के बाद अब बिल्ली प्रायश्चित करने चली है। हम इस सोच को मंत्री के नाम से अलग करके उस पर बात करना चाहते हैं। कोई बुरा व्यक्ति भी अगर कोई भली बात कहता है तो उस बात के भलेपन को तो आगे बढ़ाना ही चाहिए। हम ही यहां पर हर दिन कई किस्म की नसीहतें देते हैं, लेकिन जाहिर है कि बहुत सी कमजोरियों के साथ जीते हुए हम उनमें से हर किसी पर पूरी तरह अमल नहीं कर पाते होंगे। लेकिन हमारे जैसे कमजोर लोगों के नाम को अलग करके उस सोच को अपने-आपमें मजबूत मानकर उस पर बात करनी चाहिए।
देश की कोई भी रियायत नैतिक रूप से जरूरतमंद, और लगभग अनिवार्य रूप से गरीबों के लिए होती है और होनी चाहिए। ऐसे में सरकार का इंतजाम अगर अपनी अमल की सीमाओं के तहत यह फर्क नहीं कर पाता है कि गैरगरीबों को रियायत से दूर कैसे रखा जाए तो ऐसे ताकतवर तबके को खुद ही होकर रियायतों से बाहर हो जाना चाहिए। पिछले कुछ महीनों से, जब से पेट्रोलियम के दाम बढऩे का हल्ला हुआ है तब से हमने कई-कई बार यह लिखा है कि रियायत का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों तक जाता है जहां तक सरकार कोई छन्नी लगाकर मलाईदार तबके को फायदे से दूर नहीं कर पाती। ऐसे में रियायत का एक बड़ा बेजा इस्तेमाल हो जाता है जो कि गरीबों से लबालब इस देश में गरीबों के हक को छीनकर ही दिया जाता है। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए और हमारा यह मानना है कि एक सीमा से अधिक तनख्वाह वाले लोग, एक आयवर्ग के लोग रियायतों से बाहर कर दिए जाने चाहिए। जिस बात से हमने शुरू किया है, वैसे नैतिकता अब कम बची है इसलिए पता नहीं ऐसे कितने लोग मिलेंगे जो कि उस पर खुद होकर अमल करें, इसलिए सरकार को इस रियायत को इन तबकों तक पहुंचने के लिए रोकने से ऐसी सरहद तय करनी चाहिए।
कल-परसों ही हमने पर्यावरण पर बोझ बनने वाले, बड़ी खपत वाले लोगों और देशों पर खपत के अनुपात में एक टैक्स लगाने की सलाह दी थी, रियायत से ऐसे लोगों को दूर रखना तो उसके भी पहले होना चाहिए। दरअसल आर्थिक मंदी की बहुत बड़ी मार जिस देश या जिस प्रदेश पर नहीं पड़ती है, वह देश और प्रदेश किफायत में जीना नहीं सीख पाते और बर्बादी से बचना नहीं सीख पाते। जब इंसानों के खाने को दाने नहीं बचते तो फिर लोग चूहों के पेट में जाते हुए गोदाम की फिक्र करते हैं। भारत में अभी किफायत को लेकर चौकन्नापन नहीं आ रहा है, और हम यही बात छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के बारे में भी कहना चाहते हैं जो कि अपनी अतिसंपन्नता के चलते हुए किफायत की तरफ से बेफिक्र सा है। राज्य की चर्चा होने पर हमें एक बात यह भी याद पड़ती है कि केंद्र सरकार की तरह-तरह की रियायत की योजनाएं आखिरकार राज्य सरकारों को ही अमल में लानी पड़ती है और अगर राज्य की मशीनरी लापरवाही बरतती है तो वह रियायत चोरों के पेट में बहुत रफ्तार से पहुंच जाती है। छत्तीसगढ़ में ही हम लगातार इस बात को देखते हैं कि किस तरह रियायती गैस सिलेंडरों का इस्तेमाल धड़ल्ले से होटलों और कारखानों में हो रहा है। केंद्र सरकार भारत के संघीय ढांचे के तहत खुद होकर इस रियायत को लोगों तक नहीं पहुंचा सकती। इसलिए अब एक यह सोच तैयार हो गई है कि कुछ किस्म की रियायत गरीबों के बैंक खातों में सीधे जमा कर दी जाए ताकि राज्यों में रियायत को पहुंचाने में हो रहे भ्रष्टाचार से बचा जा सके। अनाज की रियायत को लोगों तक नगद पहुंचाने के खिलाफ जानकार और संवेदनशील विशेषज्ञों के एक तबके का विरोध भी है कि ऐसे पैसों का पूरा इस्तेमाल परिवार के खाने के लिए नहीं हो पाएगा। ऐसी नौबत से कैसे बचा जाए, यह एक अलग सोच की बात है जिस पर केंद्र और राज्य के सभी जिम्मेदार लोगों को मेहनत करनी चाहिए, दूसरी तरफ हम उस बात को फिर उठाना चाहते हैं कि जो तबके रियायत के हकदार नहीं हैं, उन्हें खुद होकर ऐसी रियायत की लालच से बचना चाहिए।

छोटी सी बात

12 दिसंबर
छोटी सी बात
किसी और की पसंद के टीवी कार्यक्रम देखते बैठ जाने के बजाय उससे दूर, अपनी पसंद की किताब पढ़ते बैठें, कुछ समझदार इसलिए अधिक पढ़ पाते हैं कि घर के बाकी लोग टीवी पर कूड़ा देखते रहते हैं।

खुफिया कैमरों के साए में

12 दिसंबर 2011
संपादकीय
खुफिया कैमरों के साए में
राजस्थान का भंवरी देवी केस अपने किस्म का बहुत अनोखा नहीं है। हाल के बरसों में अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सेक्स कांड से लेकर, आंध्र के राजभवन से निकली नारायण दत्त तिवारी की वीडियो क्लिप से होते हुए खबरें अब राजस्थान तक पहुंची हैं। लेकिन इसमें न तो कोई नई शुरूआत है, और न ही कोई अनहोनी। सत्ता के इर्दगिर्द इस तरह की कई बातें जुट ही जाती हैं। सच्चे प्रशंसकों से लेकर चापलूसों तक, और खरीदे गए सेक्स से लेकर, तोहफे में जुटाकर दिए गए सेक्स तक, बहुत से मौके ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को मिलते हैं, और उनमें से कई मौकों पर लोग अपना आपा चाहे-अनचाहे खो बैठते हैं, और खुफिया कैमरों के इस जमाने में वे आगे की अपनी जिंदगी, मतलब राजनीतिक या सार्वजनिक जिंदगी, पूरी ही तरह गंवा बैठते हैं। ब्रिटेन और अमरीका में हर बरस एक-दो सांसद या वैसे ही महत्व के दूसरे लोग राजनीति और सार्वजनिक जीवन, सरकार और कुर्सी से दूर हो जाते हैं क्योंकि उनकी सेक्स जिंदगी की कुछ बातें सामने आ जाती हैं।
राजस्थान की बात करें तो जो मंत्री वहां की एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता महिला के साथ कैमरों की गिरफ्त में आया बताया जा रहा है, और उस महिला के गायब हो जाने के बाद गिरफ्तार लोगों में यह मंत्री भी शामिल है। गांधी टोपी लगाए हुए साठे पर पाठा बना हुआ यह मंत्री फिलहाल जेल में पड़ा है और इस महिला के इर्दगिर्द सीबीआई ने जो जानकारी जुटाई है वह ब्लैकमेलिंग की एक मजबूत साजिश का सुबूत है। एक ही कमरे में बहुत से लोगों के साथ सेक्स की खुफिया रिकॉडिंग और उसके बाद उससे करोड़ों की उगाही की साजिश पहली बात तो यह बताती है कि यह महिला किसी शोषण का शिकार नहीं थी, बल्कि हो सकता है कि उसके साथ इन छुपे कैमरों के सामने बंद कमरे में कैद हुए ताकतवर लोग साजिश का शिकार हुए हों। अब जब यह पूरी तरह स्थापित हो चुका है कि यह महिला एक गिरोहबंदी के साथ बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेताओं को फांसकर अपने साथ उनकी रिकॉर्डिंग कर रही थी, तो वह अपने लिए एक खतरा भी खड़ा कर रही थी। लोगों को इस तरह फांसने के बाद और ऐसी रिकॉर्डिंग से करोड़ों कमाने की कोशिश में हो सकता है कि यह महिला मारी गई हो। लेकिन यहां हम जुर्म की इस वारदात पर चर्चा करने नहीं बैठे हैं, हमें लगता है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले, सरकारी कुर्सियों पर बैठने वाले, चुनाव में जनता के सामने जाने वाले लोगों को बीच-बीच में यह भी सोचना चाहिए कि वे किस खतरे में पड़ रहे हैं। न सिर्फ सेक्स को लेकर, बल्कि किसी भी तरह की गैरकानूनी या नाजायज समझी जाने वाली बात के लिए, काम के लिए लोगों को इतना चौकन्ना तो रहना चाहिए कि फंसने पर उनके सामने कहने को, सफाई देने को क्या रहेगा?
आज की आसान रिकॉर्डिंग कल और भी अधिक आसान हो जाएगी, ताकतवर लोगों को फांसने की साजिशें और भी बढ़ जाएंगी और भंवरी देवी जैसे मामले भी शायद कई जगहों पर रिकॉर्ड में आने लगेंगे। आज इस चर्चा को हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि जिन लोगों की भी जिंदगी कुछ लोगों के निशाने पर होती है, उन्हें सावधान भी रहना चाहिए और सही भी रहना चाहिए। आज मामूली सुबूतों के साथ भी अगर कोई ताकतवर गलत दिखने लगता है तो लोग उसे सीधे-सीधे गलत मान भी बैठते हैं। ऐसे में अगर कोई चर्चित व्यक्ति किसी सेक्स कांड में फंसता है तो वह अपनी तमाम संभावनाओं को बुरी तरह खो सकता है। न सिर्फ भारत में, बल्कि अमरीका सरीखे खुले माने जाने वाले देश में भी लोग शादीशुदा लोगों की बेवफाई को बर्दाश्त नहीं करते और न ही सत्ता पर बैठे लोगों का अपनी ताकत का ऐसा इस्तेमाल बर्दाश्त करते। पहले सुबूतों के साथ ही किसी भी प्रमुख व्यक्ति के ताबूत में कील ठुक जाती है। न सिर्फ संपन्नता, बल्कि सभी किस्म की ताकत से देश के कमजोर और साधारण तबके की नफरत इन दिनों देखते ही बनती है। नतीजा यह है कि लोग मानो इंतजार करते बैठे हैं कि अगला बुत किस चबूतरे से किसका गिराने मिलेगा। ऐसे में लोगों की नजरों में जो लोग हैं उनका अपना चाल-चलन ठीक रहना ही एक गारंटी हो सकती है, या फिर कुछ लोग अपनी हसरतों को पूरा करने के लिए दूसरे शहर या दूसरे देश के अनजान बदन खरीदना अधिक सुरक्षित समझते हैं। कुल मिलाकर हमारी सलाह यह है कि हर किसी को हर वक्त कैमरों और माइक्रोफोन की नजरों में होने का खतरा ध्यान में रखना चाहिए और अपने तौर-तरीके उसी हिसाब से रखने चाहिए।