छोटी सी बात


विज्ञान की पढ़ाई जिन्होंने न की हो, वे भी वैज्ञानिक नजरिए से जिंदगी बेहतर बना सकते हैं। किसी भी चीज के बारे में अपनी सोच बनाने के पहले तमाम संभावनाओं पर विचार कर लें। विज्ञान के तरीके से तय करने के लिए देखें कि आप किसी भी संभावना को अनदेखा तो नहीं कर रहे।

छोटी सी बात



छोटी सी बातजो अखबार, टीवी चैनल, भरोसेमंद न हों, उनको पढऩा-देखना नुकसानदेह होता है। आपके दिमाग के किसी कोने में गलत या झूठी जानकारी बैठ जाती है और फिर आपकी सोच को प्रभावित करती रहती है। इसलिए झूठे ईमेल या एसएमएस भेजने वालों से बचें।

छोटी सी बात


जल्दी और जल्दबाजी में बड़ा फर्क होता है। काम को तेज रफ्तार से करना तो अच्छा है, लेकिन हड़बड़ी में करना अच्छा नहीं है। इसलिए किसी काम को इतना पीछे न धकेले कि जल्दी के बजाय जल्दबाजी करनी पड़े।

छोटी सी बात


बिजली का आना-जाना जब लगा रहे तो बैटरी से चलने वाले अपने सामान चार्ज करके रखें। पता नहीं कब कितने घंटे बिजली बंद हो जाए।

अमरीकी हैवानियत के खिलाफ इंसानियत को जगाने की जरूरत

30 मई 2011
अफगानिस्तान में कल नाटो के एक हमले में 14 बेकसूर फिर मारे गए। तालिबानी आतंकियों के शक में नाटो सेना के विमानों ने कुछ घरों पर हवाई हमले किए जिनमें  दो महिलाएं और 12 बच्चे भी मारे गए और इसके लिए अफसोस जाहिर करने के साथ-साथ नाटो ने यह दावा भी किया है कि कुछ आतंकी भी मारे गए हैं। पश्चिमी देशों के ऐसे हमले मध्य-पूर्व के देशों पर तो चल ही रहे हैं, भारत के पड़ोस में पाकिस्तान पर भी तरह-तरह के हवाई हमले बड़ी संख्या में बेकसूरों को मार रहे हैं और इसके चलते भी अमरीका और उसके गुर्गों के खिलाफ नफरत फैल रही है। यह नफरत देशों के बीच के टकराव के रूप में तो सामने नहीं आ पा रही क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े गुंडे से निपटने की ताकत किसी दूसरे देश में अब नहीं बची है लेकिन यह संस्कृतियों के टकराव और धर्मों के टकराव की शक्ल में बुरी तरह छा गई है।
पश्चिमी देश अपने अंदाज का लोकतंत्र, अपनी मनमर्जी की रफ्तार से, अपने मनचाहे बमों के साथ बांधकर दूसरे देशों पर गिराने के लिए एक तरफ तो सीआईए जैसी साजिश करने वाली कातिल खुफिया एजेंसी के हवाले से झूठे सुबूत गढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे बेबस देशों के मासूम बाशिंदों को अपने घर में जिंदा रहने का हक भी नहीं दे रहे। ये वे देश हैं जो पर्यावरण के नाम पर, जंगली जानवरों के नाम पर, बाल मजदूरों के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर अपने आपको परले दर्जे का जिम्मेदार साबित करते हुए बाकी तमाम देशों पर कभी आयात-निर्यात की शर्तें थोपते हैं तो कभी उनका आर्थिक बहिष्कार करते हैं। उनकी मर्जी पर न चलने वाले देश को वे घेरकर उसी तरह मारते हैं जिस तरह जंगल में हथियारबंद शिकारी हांका लगाकर घेरकर उन जंगलों के निवासी जानवरों को मारते हैं। पाक-अफगान सरहद पर तालिबानियों को मारने के नाम पर संदिग्ध तालिबानियों से कई-कई गुना अधिक मासूम लोगों को अमरीकी हवाई हमले मारे जा रहे हैं। दुनिया में इससे एक ऐसा टकराव खड़ा हो रहा है जिसके खतरे से अमरीकी और पश्चिमी जनता को डराकर उनसे तरह-तरह की फौजी कार्रवाई के लिए मंजूरी पाकर पश्चिमी सरकारें बाकी देशों के लाखों लोगों को मार रही हैं। यह एक किस्म से ऐसा जंगलराज हो गया है जिसमें सबसे ताकतवर के तो तमाम हक हैं, लेकिन उससे कमजोर लोगों का हक सिर्फ गुलाम बने रहने का है। जब अंग्रेजी साम्राज्यवाद दुनिया में फैला था तो वह नावों पर चढ़कर और घोड़ों पर चढ़कर गया था, और एक वक्त के बाद वह वापिस लौट गया था एक बहुत लंबी लहर के सैलाब की तरह। लेकिन आज अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी देशों का गिरोह जो कर रहा है वह कभी खत्म न होने वाली एक गुलामी के सिलसिले की शुरुआत है जिसके चलते ये पश्चिमी देश किसी देश को पानी के कुएं की तरह बनाकर रखेंगे तो किसी देश को तेल की कुएं की तरह। किसी देश को वे गुलामों के कैदखाने की तरह रखेंगे तो कहीं पर वे उस देश के कारखाने, कैदखाने के कारखाने की तरह चलाएंगे।
मनमोहन सिंह जैसे नेताओं और भारत के लोकतंत्र पर हावी बाजार व्यवस्था के चलते इस देश की लगाम थामे हुए लोग अमरीका के साथ वैसा ही बर्ताव कर रहे हैं जैसे एक तांगे की लगाम थामा हुआ इंसान उस पर सवार किसी शाही सवारी के साथ करता है। अमरीका के गुलाम की तरह जब मनमोहन सिंह हिन्दुस्तान की तरफ से यहां के लोगों की भावनाओं के नाम का 17 रूपए के नोट के तरह का एक नोट छापकर अमरीकी राष्ट्रपति को पेश करते हैं कि भारत की जनता उनसे बहुत मोहब्बत करती है तो उससे यह साबित होता है कि यह प्रधानमंत्री भारत की जनता से किस कदर कटा हुआ है। इराक पर अमरीकी हमले के वक्त जिस भारत का मुंह अब खुलने के लायक भी नहीं बचा, अफगानिस्तान में रोजाना बेकसूरों को मार डालने वाले नाटो हमलों के खिलाफ जिस भारत का मुंह खुलने लायक भी नहीं बचा, पाकिस्तान में आए दिन द्रोन हमलों से बेकसूरों को मारने के खिलाफ जिस भारत का मुंह खुलने लायक भी नहीं बचा, उस भारत का मुंह इतिहास में दिखने लायक नहीं बचेगा। नेहरू का यह देश जिसने कि दुनिया के हर बड़े मामले में उस वक्त अपनी दखल रखी, आज हाशिये पर हाथ बांधे खड़े एक ताबेदार की तरह हत्यारे बुश की तारीफ में चारण और भाट की तरह चापलूसी कर रहा है। यह उसी नेहरू की पार्टी का प्रधानमंत्री है जिसने अपने पूरे युग को प्रभावित किया, पूरे विश्व को प्रभावित किया। आज उस पार्टी ने न नेहरू की रीति का कोई नामलेवा है न उनकी नीति का।
ऐसे में हम भारत की जनता से जागने की अपील करते हैं कि वह ऐसी मुर्दा और कारोबारी, चापलूस और कायर सरकार से कोई उम्मीद किए बिना अपने बीच एक ऐसी जागरूकता खड़ी करे कि जिससे यह सरकार हिल जाए। मध्य-पूर्व के कई देशों में तरह-तरह आंदोलन अभी सामने आए हैं और उनके पीछे के कारण चाहे जो हों, उनको एक बहुत बड़ा जनसमर्थन मिला है। भारत में अमरीकी-गिरोह की हैवानियत के खिलाफ इंसानियत को जगाने और एकजुट करने की जरूरत है। यहां पर हम इंसानियत को एक आदर्श मतलब की शक्ल में इस्तेमाल कर रहे हैं, न कि आज प्रचलित इंसानियत के रूप में।

लिखना मुनासिब नहीं सिर्फ सोचना ठीक...

24 फरवरी 08


विज्ञान को लेकर भविष्य की कल्पनाएं जितना मुझे रोमांचित करती हैं, शायद औरों को भी उतना ही उत्तेजित करती होंगी, शायद कुछ अधिक। एक ताजा अंदाजा एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ का यह आया है कि अगले इक्कीस बरसों में मशीन मानव आज के इंसान जितना काबिल हो जाएगा। इस विशेषज्ञ का कहना है कि सन् 2029 तक मशीनों का मशीनी हिस्सा और उनके सोचने, समझने, भावनाएं महसूस करने का भीतरी दिल-दिमाग, इंसान के तन-मन के टक्कर के हो जाएंगे। इसी अनुमान के साथ यह भी जुड़ा है कि पिछली पूरी सदी में जितना तकनीकी विकास हुआ है, इस आधी सदी में उससे बत्तीस गुना अधिक प्रगति हो जाएगी। इसी रिपोर्ट में एक अनुमान यह है कि 2030 तक शरीरों में लगाई गई मशीनें इंसानी सेहत और उसकी क्षमता को बढ़ा देेंगे, जिनमें सोचने की, विश्लेषण करने की क्षमता भी रहेगी।
कुछ महीने हुए मैंने ऐसी ही एक वैज्ञानिक भविष्यवाणी पर लिखा था जिसमें 2050 तक इंसान और मशीनों की शादी का अंदाज लगाया गया था। अब ये नई भविष्यवाणी फिर मुझे कुछ सोचने का मौका दे रही है, इसी बीच पश्चिम के एक देश से आई यह खबर तो है ही कि वैज्ञानिकों ने तीन ऐसे एम्ब्रियो तैयार कर लिए हैं जो एक पिता और दो माताओं से लिए गए हिस्सों को मिलाकर बनाए गए हैं और इनमें से अनुवांशिकी (जेनेटिक्स) से आ जाने वाली बीमारियों को हटा दिया गया है। इनसे वे जब चाहें बच्चे बनाना शुरू कर सकते हैं, जो सही मायनों में डिजाइनर बच्चे होंगे।
आज ही दोपहर कॉलेज की एक लड़की की बात हो रही थी जिसका पर्चा इंटरनेट की मेहरबानी से बहुत अच्छा बना था। उसके विषय की अच्छी किताबें हैं ही नहीं और वह इंटरनेट पर जानकारी ढूंढकर बेहतर तैयारी कर पाई थी। यह तो बाहर से मदद करने वाली टेक्नालॉजी हुई, चश्मे की तरह की, जिससे आप अधिक दूर तक, अधिक बारीक, देख सकते हैं। जिन लोगों को ये चश्मे नहीं मिलते और नजरें कमजोर रहती हैं, वे बराबरी नहीं कर पाते। इसी तरह बिजली रहने और न रहने का फर्क पड़ता है।
लेकिन मैं तो उस टेक्नालॉजी और मशीन की बात सोच रहा हूँ जो बदन के भीतर घुसकर इंसान की मदद करेंगी। आज भी आँखों में लगने वाले लेंस, नकली दांत, कान के भीतर सुनाई बढ़ाने के उपकरण, दिल की धड़कन ठीक रखने वाला पेस मेकर, कटे हाथ-पैर की जगह काम करने वाले नकली, लेकिन स्नायुतंत्र से जोड़े जा चुके अंग, नकली दिल, हड्डिïयों के नकली जोड़ तो चलन में हैं ही। आज ही ऐसे इंसुलिन पंप बदन के भीतर लगना आम हो गया है जो डायबिटीज के मरीजों के खून में ग्लूकोज का स्तर खुद बनाए रखते हैं। कुछ और दवाईयां भी शरीर के भीतर ही लग जाती हैं।
लेकिन आगे की कल्पना मैं करता हूँ तो दिमाग से चलने वाला रिमोट कन्ट्रोल, जो फोन करने से लेकर कार को नियंत्रित करने का काम करेगा। आंखों ही आंखें में बहुत भारी भरकम तस्वीरें, आवाज एक दूसरे को उसी तरह देना जिस तरह से आज एक मोबाइल फोन दूसरे को दे देता है। आंखों से देखे गए पन्नों को उसी तरह दिमाग में याद रख लेने की तकनीक जैसे कि कोई फोटो कॉपी मशीन या कम्प्यूटर स्कैनर रख लेते हैं। किसी सुने हुए संगीत, देखी हुई फिल्म को उसी तरह दिमाग की बढ़ाई गई हार्डडिस्क में स्टोर कर लेना, जिस तरह आज कोई ऑडियो या वीडियो रिकॉर्डर करते हैं। दूर तक देखने वाले लेंस और बहुत बारीक पढ़ लेने वाले लेंस, अंधेरी रात में देख लेने वाले लेंस भी शायद आने वाली आँखें में लग सकें। खिलाडिय़ों की, फौजियों की ताकत बढ़ाने के लिए हो सकता है कि बदन के ऐसे जोड़ लगने लगें जिनसे किसी भी तरह की उछल-कूद, दौड़-भाग, तोड़-मरोड़ हो सके। हो सकता है कि कुछ नए कल-पुर्जों से लोग ऊंची और लंबी छलांग लगा सकें, आज की कार्टून फिल्मों की तरह।
व्यस्त शहरी से लेकर पर्वतरोही या फौजी तक, बहुत से पेशे के लोगों के लिए आज के इन्सुलिन पम्पों की तरह ऐसे भोजन पम्प पन जाएं जो महीने या साल भर तक बदन की सारी जरूरतों को तय किए गए वक्त पर दिन में कई बार छोड़ते रहें। इनसे खाने और निगलने दोनों का काम टाला जा सकेगा और शायद यही लंबी अंतरिक्ष यात्राओं की आज की एक जरूरत भी है। कोई दूसरी मशीन इसी दौरान बदन के पाचनतंत्र को धोखा देकर व्यस्त भी रख सकती है।
आज जिस तरह छुपे हुए माइक्रोफोन या खुफिया कैमरों से लोगों की रिकॉर्डिंग हो जाती है, कल शायद लोग दूसरों के दिल दिमाग की बातों में झांकने की तकनीक से लैस हो जाएं। किसी से निगाहें चार हुईं और दिल को भांप लिया। तब शायद ऐसे चश्मों का चलन होने लगे जो ऐसी ताका-झांकी को रोक सके, और फिर शायद आंखों में ही ऐसे फिल्टर लगने लगें- विजन गार्ड!!
कानों में शायद ऐसे फिल्टर लगने लगें जो गैर जरूरी आवाजों को दिमाग के कहे मुताबिक रोक दें। दिमाग के कहे मुताबिक नाक बदबू को फिल्टर करने रोक दे। दिमाग में शायद ऐसी झूठ पकडऩे वाली माइक्रोचिप्स लग सकें जो बताती चलें कि सामने वाले की बातों में क्या-क्या झूठ है और इससे मुकाबला करने के लिए आवाज में फेरबदल करने वाले चिप्स लगने लगें जिनसे आपका कहा झूठ भी सच लगने लगे।
आवाज को सुरीला या मोटा बनाना शायद आसान हो जाए और आने वाले टीवी-संगीत-मुकाबिलों में मानव, मशीन-मानव और मशीन, ऐसे तीन वर्ग बन जाएं और फिर इनमें आपस का मुकाबला भी हो।
इन कल्पनाओं में से दिल-दिमाग के भीतर काम करने वाली तकनीक शायद देर से विकसित हो, लेकिन बाकी बातें शायद पांच-दस बरस में होने लगें। वियाग्रा जैसी गोलियों की जगह शायद इंसुलिन पम्प की तरह बदन के भीतर ही कोई दूसरा पम्प लग जाए और अमीरी और गरीबी की यौन क्षमताओं में जमीन आसमान का फर्क होने लगे। लेकिन फिर लोगों को शायद मशीन मुक्त होने के प्रमाण-पत्र मिलने लगें, जैसे आज रासायनिक खाद, कीटनाशक से मुक्त ऑर्गेनिक फसल को मिलते हैं या जैसे जेनिटिक-फेरबदल से मुक्त फल, सब्जी, मांस को मिलते हैं, या जैसे शर्बत को रसायन-मुक्त होने के मिलते हैं। खालिस और शुद्घ, मशीन रहित इंसान बिस्तर से लेकर मैदान तक कुछ कम क्षमता वाला रहेगा, लेकिन वह प्राकृतिक रहेगा और छोटे आकार के ऑर्गेनिक फल-सब्जी की तरह उसकी एक अलग कदर होगी।
लोग अपने ही दिमाग में बैठा दी गई हार्डडिस्क से पसंद का संगीत भीतर ही भीतर सुन लेंगे, पसंद की फिल्म भीतर ही भीतर देख लेंगे, जीभ के बिना ही दिमाग में ही रसमलाई का स्वाद ले लेंगे और किसी पुरानी स्पर्श-स्मृति से बार-बार, जब चाहे साथी को छूने का मजा भी ले लेंगे। तो क्या नौ रस, सोलह श्रृंगार, छप्पन भोग अपनी जरूरत, अपना महत्व खोते चलेंगे? क्या लोग पसंद के मुताबिक स्वाद, स्पर्श, ध्वनि, दृश्य को घर बैठे बस सोचकर डाऊनलोड कर लेंगे और हर इस्तेमाल के हिसाब से भुगतान करेंगे?
क्या दुनिया के सबसे खूबसूरत सबसे चर्चित, सबसे सफल लोग अपने यौन संबंधों की, देहसुख की अनुभूतियों की रिकॉर्डिंग बेचने लगेंगे? जिनको खरीदकर लोग वैसे ही साथी के साथ का देह सुख पा सकेंगे? अकेले ही दिमाग के भीतर...। आज जिस तरह वयस्क मनोरंजन, उत्तेजना और देह सुख के लिए फिल्में, खिलौने और नकली देह मिलती हैं, क्या अगले बीस बरसों में यह सब दिमाग के भीतर ही होने का सामान बन जाएगा?
तो फिर बिना किसी दूसरे इंसान के जब इतना कुछ हो सकेगा तो सामाजिक संबंधों का क्या होगा? निजी संबंध और सामाजिक संबंध कितने रह जाएंगे? अमीरी और गरीबी के बीच की खाई कहां पहुंचेगी?
सब कुछ मैं अकेले ही क्यों सोचूं? इस चर्चा की कुछ ऐसी बातों के बारे में अधिक खुलासे से न सोचूं जिनके बारे में लिखना यहां मुनासिब न होगा।
-सुनील कुमार

कुछ कह कर चुप रह जाने के लिए

17 फरवरी 08


अमरीका की वर्जीनिया टेक यूनिवर्सिटी में कुछ महीने पहले जब एक छात्र ने बंदूक लेकर 32 लोगों को मार डाला और खुद अपने आपको भी, तो पीछे की पड़ताल से पता लगा कि वह रचनात्मक लेखन की क्लास में भी बहुत हिंसक लेखन के नमूने पेश करते आया था। कुछ लोगों को यह मलाल भी हुआ कि उसकी खूंखार दिमागी हालत को देखते हुए ऐसी किसी संभावित हिंसा का अंदाज लगाकर उसका पहले ही कोई इलाज किया जाना था। लेकिन एक एशियाई मूल से आया हुआ, दिखने में अच्छा नहीं, यह छात्र अपने दायरे में उपेक्षा का शिकार रहा और वही तिरस्कार या अकेलापन उसे आगे ले जाकर, चर्चा में आने की लालसा पर चढ़कर सामूहिक हत्या तक ले गया। लेकिन यह सब तो कई महीने पहले की बात है, अभी उस पर लिखने की जरूरत इसलिए लगी कि अमरीका की पत्र-पत्रिकाओं में अभी यह दुविधा चली कि उसका उस वक्त का हिंसक लेखन अभी छापा जाए या नहीं? आखिर में एक पत्रिका ने एक लेख इस हत्यारे नौजवान और उसके लेखन पर छापा है जिसका एक हिस्सा इंटरनेट पर मौजूद है, बाकी हिस्सा चूंकि ग्राहक बनने पर ही पढ़ा जा सकता है, मैं उसे देख नहीं पाया। लेकिन आज की इस धुंधली चर्चा के लिए उतना पढऩा काफी था।
दरअसल कुछ हफ्तों पहले जब हमारे अखबार 'छत्तीसगढ़Ó में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और नक्सली प्रवक्ता के बीच बहस छिड़ी तो उससे विचलित होकर एक भाजपाई-लेखक ने एक दूसरे अखबार में लिखा था कि हम पर नक्सलियों को जगह देने के लिए विशेष जनसुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। तभी से मैं इस मुद्दे पर लिखना चाह रहा था कि अपराधों में लगे या उनसे जुड़े लोगों के लिखे का क्या करना चाहिए? नक्सलियों के लिखे को लेकर यह कोई बड़ी दुविधा नहीं थी क्योंकि उनके बारे में काफी सोचविचार के बाद मैंने अपना मन बना लिया था कि क्या करना है। लेकिन और कई तरह के अपराधी, अभियुक्त या संदिग्ध लोग जब लिखते हैं तो उनका क्या करना चाहिए।
यहां पर आकर मेरे सामने कुछ मिसालें हैं और कुछ मेरी अपनी सोच,  लेकिन कुल मिलाकर आखिर में एक साफ नतीजा नहीं दिखता, धुंध दिखती है। मैं अपनी थोड़ी बहुत पढ़ी किताबों और बातों को याद करूं तो सबसे अधिक छूने वाला मामला मुझे याद पड़ता है नाथूराम गोडसे की लिखी किताब, जिसका नाम शायद- 'मैंने गांधी को क्यों माराÓ है। इस किताब में गोडसे ने गांधी हत्या के पूरे षडय़ंत्र के साथ-साथ अपनी सोच को भी सौ-पचास पन्नों पर लिखा है और भाजपा-संघ परिवार के एक बड़े आयोजन के बुक स्टॉल से खरीदी यह किताब मुझसे कोई ले गया इसलिए उसके हिस्से में यहां नहीं दे पा रहा हूं। लेकिन जब भाजपा की छत्तीसगढ़ की पत्रिका के संपादक ने पुलिस के जवाब में नक्सली बयान छापने के लिए हम पर कार्रवाई की मांग की तो मुझे याद आने लगा युगधर्म।
अखबार नवीसी के अपने शुरूआती बरसों में ही मुझे संघ परिवार के अखबार युगधर्म की याद है जिसमें लालकिला केस की सुनवाई एक लंबे धारावाहिक के रूप में हफ्तावार छपती थी शायद हर बार आधा-आधा पेज। आज के हमारे नियमित लेखक बबन प्रसाद मिश्र युगधर्म के संपादक थे और उनसे मैंने पुरानी कॉपियां मांगी भी थीं। लाल किले में गांधी हत्याकांड की सुनवाई एक विशेष अदालत में हुई थी और गोडसे ने गांधी को क्यों मारा, इसके तर्क और इसके पीछे की सोच नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की कलम से हफ्तावार छपते रहती थी।
मुझे गोडसे की इसी किताब या किसी और किताब में गांधी के एक बेटे द्वारा नाथूराम गोडसे को लिखे गए लंबे, सम्मानपूर्ण, पत्र भी छपे हैं, जिनमें उन्होंने यह जानना चाहा था कि गोडसे ने उनके पिता को क्यों मारा। यह पत्र व्यवहार कुछ बार तो चला ही था और दोनों के बीच शिष्टïाचार आखिर तक कायम रहा। जब हमारे अखबार में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और नक्सल प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी के बीच के सवाल-जवाब में शिष्टïाचार पर भी भाजपाई-संपादक ने आपत्ति की, तो मुझे गोडसे को गांधी-पुत्र द्वारा लिखे पत्रों की याद आ रही थी।
लेकिन अपने अखबार का जवाब यहां देना मकसद नहीं है। मैं इसे अमरीका से शुरू हुई एक दुविधा के संदर्भ में लिख रहा हूँ। मुझे एक-दो बरस पहले छत्तीसगढ़ के ही अमित जोगी की जेल डायरी याद पड़ रही है जो अखबारों में छपी थी। यह जेल यात्रा अमित जोगी को जग्गी हत्या कांड के अभियुक्त की हैसियत से करनी पड़ी थी जिसमें बाद में निचली अदालत ने उन्हें बरी किया और अब हाईकोर्ट ने फिर उन्हें अदालत में खड़ा किया है। अमित जोगी ने शायद बाद में भी इंटरनेट पर अपनी बेगुनाही की बात लिखी और वह कुछ और जगहों पर छपी।
अपराधों में फंसे लोगों ने दुनिया के बहुत से देशों में लिखा, कभी वह छापने लायक समझा गया, तो कभी नहीं छापा गया, किसी ने उसे छापा, किसी ने नीतिगत रूप से उसे नहीं छापा। कई बार लोग अपने अपराध को न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं तो कभी-कभी उसे अपनी उपलब्धि बताने का काम भी। मैंने आज लिखना शुरू करते हुए ही धुंध का जिक्र किया है। मैं अभी ऐसे मामलों के लिए कोई सीधा पैमाना नहीं सोच पाता लेकिन मुझे लगता है कि देश और काल के मुताबिक हर मामले में, उस वक्त, अपने पाठक, दर्शक, श्रोता को देखते हुए जनहित और जनरूचि के मिले-जुले पैमाने पर हर लेखन को आंकना होगा।
नीतिगत और सैद्घांतिक बहस को छोड़ दें, तो मुझे लगता है कि जान-बूझकर लिखे गए झूठ को जानते हुए भी छापना गलत है और अपराधी को अपने अपराध को महिमा मंडित करने का मौका देना भी गलत है। मुझे याद पड़ रहा है कि जब एक बड़े पश्चिमी अखबार ने एक बहुत चर्चित अपराधी से उसके अपराध के बारे में लिखने के लिए मेहनताना देने का इरादा किया तो उसका बड़ा विरोध हुआ। यह वैसा ही होता जैसा हर्षद मेहता का अपने शेयर घोटाले पर लिखकर किसी पत्र-पत्रिका से मेहनताना पाना होता। अपने अपराध से कोई कमाए यह हर जगह गलत माना जाता है, चाहे वह लूटकर हो या लिखकर।
लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के तहत तो हिटलर की आत्मकथा भी हिंदी में बिक रही है कल को नरेन्द्र मोदी भी गुजरात दंगों पर लिखेंगे तो वह किताब छपने और बिकने की आजादी होगी। आपातकाल के दलालों ने भी उस दौर के बारे में लिखा और वह बिकने की छूट रही, और किताब आपातकाल की जेलों में बंद नेताओं की जेल डायरी के साथ-साथ दूकानों पर बिकी।
लेकिन यहां मैं एक अलग तर्क की जरूरत भी देखता हूं। किताब मीडिया का हिस्सा नहीं है और उसे लिखना, उसका छापना और बेचना, एक अलग आजादी है। लेकिन मीडिया एक अलग कानून के तहत, अलग रीति-नीति के तहत काम करता है, इसलिए उससे अलग पैमानों पर उम्मीदें की जाती हैं। मीडिया के सामने बुलेटिन के समय से लेकर अखबार के पन्नों तक आकार की सीमा भी रहती है और पाठक की व्यापक रूचि और उसकी व्यापक जरूरत की सीमाएं भी रहती हैं। इन सबको इश्तहारों की सीमाएं भी झेलनी पड़ती हैं और उस दिन की बाकी घटनाओं, बाकी खबरों को सैलाब को भी। मीडिया का आपसी गलाकाट मुकाबला भी उसके फैसले तय करता है और पाठकों का दबाव भी। किताबों की दुनिया इनमें से बहुत सी तंग सीमाओं से आजाद रहती है।
मुझे फिर लाल किला केस की सुनवाई का किस्सा याद पड़ता है जो किताब में छपने के चौथाई सदी बाद युगधर्म ने शायद सालभर तक आधा पेज हर हफ्ते छापी थी। वह वक्त शायद मध्यप्रदेश में जनसंघ घटक के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार का था। हो सकता है कि उस समय का वह फैसला गांधी हत्या के बाद देश में पहले गैर कांगे्रस शासन के आने से प्रभावित रहा हो। लेकिन सत्ता ने कब मीडिया के फैसले प्रभावित नहीं किए?
आज की यह बात बहुत सी और बातों तक खिंच सकती है, लेकिन मैं तो इस मुद्दे पर लोगों का सोचना शुरू करने के लिए कुछ कहकर चुप रह जाना चाहता हूँ।

-सुनील कुमार

आज क्यों हवा हो गया?

27 जनवरी 08


देश भर में एक लंबी बहस चल रही है। अपने बचपन से मैं सेक्स शिक्षा की बात अखबारों में पढ़ते आ रहा हूँ और शायद स्कूल के आखिरी बरसों में गुप्त ज्ञान नाम की एक ऐसाी वीभत्स फिल्म देखने मिली थी जो सेक्स शिक्षा पर बनी पहली फिल्म कही गई थी। एकदम ही घटिया फिल्मों के लिए जाने हुए फिल्म निर्माता-निर्देशक बी.के. आदर्श ने वह फिल्म बनाई थी जिसने सेक्स की शिक्षा तो नहीं थी, थी एक बच्चे के जन्म को बहुत फूहड़ तरीके से दिखाकर सेक्स के प्रति अरूचि पैदा की थी, जो शायद उसके पहले से भारतीय समाज के एक तबके में जारी थी और अब तक बढ़ती ही जा रही है।
लेकिन दो-चार दिन पहले गुजरात के भावनगर में पैदा हुई एक खबर ने एक बार फिर सेक्स शिक्षा के लिए सोचना शुरू हुआ। वहां एक नई फिल्म 'तारे जमीं परÓ करीब सवा हजार शिक्षकों को दिखाई गई जिसके बाद शिक्षकों और पालकों के दिक्कत की बीमारी डिसलोक्सिया के शिकार बच्चों के बारे में एक नई समझ पैदा हुई। फिल्मों के असर को देखना हो तो अहिंदीभाषी दक्षिण भारत को देखें जहां हिंदी की सबसे बड़ी शिक्षा मुम्बईया फिल्मों से होती है। भारत की हालत देखें जहां रामायण, महाभारत या गंाधी, पटेल की जानकारी लोगों को फिल्म और सीरियलों से ही सबसे अधिक हुई। यह जानकारी सतही हो सकती है, कुछ हद तक अवैज्ञानिक हो सकती है, लेकिन अशिक्षित, अर्धशिक्षित, किताबों से दूर बसे लोगों के फिल्म और टीवी से बहुत सी जानकारी मिलती है।
'तारे जमीं परÓ फिल्म से मुम्बई के एक संवेदनशील कलाकार अमीर खान ने इस बीमारी या कमजोरी की जानकारी देश के सामने रखी और रोते हुए दर्शकों ने दो घंटे में वह समझ लिया जिसे वे अपनी पचास बरस की उम्र में भी नहीं समझ पाए थे। मुझे इस असर को देखकर यह सूझा कि सेक्स शिक्षा के लिए एक या अधिक फिल्में क्या ऐसी नहीं बनाई जा सकतीं जिनसे पहले तो शिक्षकों और पालकों, और भगवों को यह समझ मिल सके कि सेक्स शिक्षा से नई-पुरानी पीढ़ी का क्या भला हो सकेगा? पहली फिल्म इस अधेड़ या बुजुर्ग तबके के लिए बनाकर फिर आगे की फिल्में किशोरवस्था के बच्चों के लिए बनाई जा सकती हैं ताकि पहली फिल्म से उपजी जागरूकता समझ और बर्दाश्त के बाद फिल्मों से ही वह सेक्स शिक्षा हो जाए जिसे रोकने के लिए स्कूलों के दरवाजों पर झंडों-डंडों के साथ रंगे सियार खड़े हो जाते हैं।
सेक्स शिक्षा के ही एक और बारीक पहलू के बारे में मुझे लगता है कि भारतीय समाज को बच्चों के यौन शोषण की हकीकत का यकीन दिलाने के लिए भी कुछ फिल्में मददगार हो सकती हैं। इसी तरह से कन्या भू्रण हत्या के खिलाफ माहौल बनाने के लिए बेटियों की अहमियत बताने वाली एक कहानी गूंथी जा सकती है और भारतीय विवाहित समाज में सेक्स के लिए असामाजिक अरूचि हो जाने के खतरों की कहानी भी शायद परदे पर आ सकती है। भारतीय जोड़ों में बड़ी संख्या में यह खतरा रहता है, इसलिए ही धर्म और प्रवचन सेक्स की स्वाभाविक जरूरत को नकारते हुए  वासनाओं पर काबू रखने की ही नसीहत मंचों और चैनलों से फैला रहे हैं। अध्यात्मिक संगठन भी पीछे नहीं है, एक दूकान तो पति-पत्नी को भाई-बहन की तरह रहने की नसीहत देती है, तो फिर अपनी प्राकृतिक शारीरिक जरूरत के लिए ये पति-पत्नी क्या कहीं और झांकें?
सेक्स को एक गंदा शब्द स्थापित करने वाले धर्म दरअसल इस जन्म में वासना से दूर रहकर, भरने के बाद जन्नत की हूरों का वायदा करते हैं। जन्नत की हकीकत तो सबको पता है, ये धर्म और आध्यात्म के प्रवचनकर्ता जिंदगी को सेक्सविहीन बनाने के फेर में अनैतिक, अवैध या विवाहेतर कहे जाने वाले संबंधों की ही जरूरत पैदा करते हैं। क्या इस आत्मघाती, सर्वनाशी पाखंड पर कोई बात नहीं हो सकती? एक फिल्म क्यों पति-पत्नी को स्थितियां बेहतर करके, बेहतर समझ और तालमेल बनाने के महत्व और फायदे पर नहीं बन सकती? जो बात समाज सीख या सिखा नहीं पा रहा है, उसके लिए, उनके लिए, मुझे अब फिल्म एक आसान जरिया दिख रही हैं। मानो गिलहरी के हाथ बेर लगा और वह हकीम बन बैठी। मुझे आमीर खान की शक्ल में एक नया समाज सुधारक दिखने लगा है, यह एक और बात है कि मैंने पन्द्रह बीस बरसों में दो-चार छोड़कर कोई फिल्म देखी नहीं है सिर्फ उनके बारे में पढ़ा-सुना है। लेकिन 'तारे जमीं परÓ देखकर हिले हुए लोगों को देख-सुन कर सहज ही अहसास होता है कि एक बहुत ही अनाकार्थक मुद्दे से भी लोगों को बांध जा सकता है।
फिल्मों के असर का इस्तेमाल बाजार तो अपने लिए कर लेता है सामानों को बेचने के लिए विज्ञापनदाता फिल्मों में अपने सामान गूंथ देती है, लेकिन समाज की भलाई के मुद्दे पर भी इस ताकतवर माध्यम का इस्तेमाल कम ही लोग सोचते हैं, और जब सोचते हैं तो उसके असर से तारे भी जमीं पर दिखने लगते हैं।
मैं फिर अपनी बात पर लौटूं कि छोटे बच्चों को देह शोषण से बचाने से लेकर किशोरों को यौन शिक्षा देने और जवान से अधेड़ जोड़ों तक को सेक्स संबंध जारी रखने की अहमियत बताने जैसे कई मुद्दों पर फिल्मों की जरूरत है। बरस में महज एक फिल्म बनाने के लिए बदनाम आमीर खान अगर अभी से शुरू करेंगे तो शायद एक पूरी पंचवर्षीय योजना भारत के सेक्स पर फिल्मों पर उन्हें बनानी पड़ेगी। एक बहुत फूहड़ और वीभत्स फिल्म ने तीस-पैंतीस बरस पहले जो हौसला दिखाया था, वह आज क्यों हवा हो गया है?

मतदान के लिए दुविधा खड़ी करने वाले


चुनाव के वक्त अकसर मन में एक बात उठती है कि अच्छी पार्टी के बुरे कैंडीडेट और बुरी पार्टी के अच्छे कैंडीडेट गर आमने-सामने हों तो किसे वोट दिया जाए? यह दुविधा तब भी कोई कम नहीं होती जब एक तरफ साम्प्रदायिक विचारधारा की पार्टी का कोई अच्छा जनसेवक उम्मीदवार हो और दूसरी तरफ घोषित रूप से अपने को धर्म निरपेक्ष पार्टी का कहनो वाला, लेकिन भीतर से उतना ही साम्प्रदायिक, भू-माफिया या भ्रष्टï उम्मीदवार हो। जिन लोगों को विचारधारा की फिक्र होती है उनकी भावनाओं से भी जब पार्टी खिलवाड़ करते हुए बहुत ही लुच्चे को पार्टी प्रत्याशी बनाती है, तो वह मतदाताओं की संवेदनशीलता को चुनौती होती है।
यह बात अभी दो घटनाओं से और एक बहस से सामने आई। प. बंगाल में लोगों ने देखा कि राजधानी कोलकाता में लगी शहरी आग चार दिनों तक बेकाबू रही हजारों दूकानें जल गईं और अरबों का नुकसान हुआ। दूसरा इसी राज्य में बर्ड फ्यू फैला, चार तारीख से मुर्गियों की मौतों की जानकारी राज्य सरकार को मिली लेकिन केन्द्र सरकार को ग्यारह तारीख की शाम पांच बजे खबर की गई। एक तो मुर्गियों का धंधा वैसे ही नाजुक धंधा रहता है जिसमें सभी लोग चौकन्ना रहते हैं और प. बंगाल में तो सत्तारूढ़ वाममोर्चे के दलों के लोग शासन-प्रशासन को गांव-गांव तक कब्जे में रखते हैं। मोबाइल फोन से  इन दिनों  पल भर में खबर फैलती हैं, ऐसे में बर्ड-फ्लू के  समाचार को कोलकाता या दिल्ली पहुंचाने के लिए सात दिन लगे! इस बीच की तस्वीरें इतनी भयानक हैं कि राज्य सरकार के पास इस संक्रमण से लोगों को बचाने का कोई इंतजाम नहीं था और मरी मुर्गियां लेकर लोग घूम रहे थे, बिना मास्क, बिना दस्ताने। जहां पर केन्द्र सरकार से आए तकनीकी कर्मचारी अंतरिक्ष यात्रियों की तरह की सील बंद पोशाकों में यह काम कर रहे थे, बंगाल की बेखबर जनता खुले हाथों से बिना नकाब।
इन दो बातों के अलावा भी बीच-बीच में खबरें आती हैं कि वहां राशन के इंतजाम में कैसी बदहाली है। हमने कुछ समय पहले अपने अखबार 'छत्तीसगढ़Ó में रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह वहां बीस हजार राशन दूकानें हैं और फूड विभाग में अठारह हजार कर्मचारी हैं। इंतजाम इतना खराब कि माक्र्सवादी शिकंजे वाले गांव-कस्बों में भी भूखे ग्राहकों ने राशन दूकानें लूटना शुरू किया। अभी एक ओर दिल दहलाने वाली खबर, दूसरी खबरों के सैलाब में दब गई। नंदीग्राम में जहां उद्योग बनने को लेकर लगातार खूनी संघर्ष चल रहा था, वहां पर बड़ी संख्या में दबी हुई लाशें मिलीं। क्या सत्तारूढ़ वाममोर्चे के स्थानीय दबंगों की जानकारी के बिना ऐसा हो सकता था? और जब बंगाल की ही बात हो रही है तो वहां के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री बुद्घदेव भट्टïाचार्य का नंदीग्राम संघर्ष के दौरान दिया गया वह भयानक बयान मुझे नहीं भूलता जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी की हिंसा को जायज ठहराया था। उसी वक्त हमने गुजरात में सत्तारूढ़ मोदी द्वारा अपनी पार्टी अपने संगठनों के हिंसा की छूट को याद किया था। क्या साम्प्रदायिक हिंसा और धर्मनिरपेक्ष हिंसा को जायज ठहराने वाली सरकारों में से किसी का जुर्म कम गिना जा सकता है? एक धर्म के मतभेद पर टिकी हिंसा है तो दूसरी राजनीति के मतभेद पर टिकी हुई।
लेकिन पहले लिखे जा चुके इन तर्कों से परे अब एक बात लगती है कि क्या विचारधारा प्रशासन का विकल्प हो सकती है? क्या मोदी के अच्छे प्रशासन की सफलता को अनदेखा किया जा सकता है? गुजरात में मोदी के आने के पहले जो प्लेग फैला था सूरत में, उस सूरत की मोदी ने सूरत बदलकर रख दी। अभी वह देश का सबसे साफ शहर ठहराया गया है। लोगों को याद होगा कि इसी सूरत में प्लेग के दौरान आने वाली रेलगाडिय़ों में आगे के स्टेशनों में लोग चढऩा नहीं चाहते थे। दक्षिण गुजरात में बाढ़ आई तो लोगों का कहना है कि मोदी ने बहुत काबिलीयत से इससे जूझकर दिखाया।
दो साल पहले जब सूरत समेत दक्षिण गुजरात में बाढ़ से भारी तबाही हुई तो जान-माल के भारी नुकसान के साथ ही आम नागरिकों को समझ नहीं आ रहा था कि जीवन को पटरी पर कैसे लाया जाए। बाढ़ का पानी उतरा तो घरों में छत की ऊंचाई तक कीचड़ जमा था। अनाज, पानी सामान तो खराब हुआ पर घरों को रहने लायक साफ करना भी मुश्किल हो गया क्योंकि उस समय सूरत में मजदूर एक घर साफ करने की मजदूरी 35-40 हजार रुपए मांग रहे थे। ऐसे समय में राज्य सरकार ने सूरत म्युनिसिपल और आरएसएस समेत अनेक समाजसेवी संगठनों के साथ मिलकर घरों की सफाई की, कचरे की निकास और स्वास्थ्य सेवा का काम बखूबी किया। सूरत वासियों को प्रशासनिक दक्षता का जो अनुभव हुआ यह उसी का नतीजा था कि सूरत और उसके आसपास चुनाव में सोनिया-राहुल के दौरे का कोई असर नहीं हुआ और बीजेपी यहां भारी बहुमत से जीती।
वैसे भी साम्प्रदायिक दंगों के जख्मों के ऊपर, गुजरात एक अच्छी सरकार और अच्छा प्रशासन देख रहा है। राज्य बहुत से कांगे्रसी और वामपंथी राज्यों के मुकाबिले बेहतर शासन-प्रशासन पा रहा है। विचारधारा साम्प्रदायिक न होती तो और भी बेहतर होता, लेकिन धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के साथ किसी राज्य में बुरे प्रशासन का क्या तर्क बन सकता है? क्या धर्म निरपेक्षता कहती है कि नालायकी और निकम्मेपन से काम करो? यह भी कोई तर्क हो सकता है कि हम नालायक हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्ष हैं?
विचारधारा और प्रशासन, इन दोनों मोर्चों पर लोग अच्छे हो सकते हैं। कोई-कोई राज्य टुकड़ों में ये दोनों काम कर दिखाते हैं। अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने गरीबों को तीन रुपए किलो चावल देना शुरू किया तो भाजपा विरोधी हिल गए। इस योजना की हमने तारीफ की तो कुछ लोगों ने कहा कि भाजपा की सरकार को आप क्या वापिस लाना चाहते हैं? अब अगर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार जनकल्याण की एक बड़ी योजना लागू करना चाहती है तो इसके बाद जनता तय करेगी कि उसे किसे वोट देना है। अगर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में राशन व्यवस्था, केन्द्र सरकार के मुताबिक, वामपंथी बंगाल से बहुत बेहतर है, तो क्या इसके लिए हम भाजपा की नीतियों को कोसें?
यह वही धान का कटोरा है जिसे चालीस से अधिक बरस भोपाल में बैठी सरकारों ने लूटा, जिसमें दो तो छत्तीसगढ़ से गए कांगे्रसी मुख्यमंत्री भी थे। राज्य बनने के बाद हमने देखा कि किस कदर हमारे हक, बाकी मध्यप्रदेश के पेट में जा रहे थे। ऐसे में आज अगर यह खुशहाल राज्य अपने तमाम भ्रष्टïाचार के बीच भी गरीबों को सस्ता चावल दे रहा है तो क्या इस मौके पर भी भोपाली-कांगे्रसी शोषण की तारीफ की जाए?
लोगों को यह फर्क समझाना होगा कि अच्छा प्रशासन और अच्छी विचारधारा, इनमें से कोई एक-दूसरे का विकल्प नहीं हो सकता। और अगर चुनावी हिसाब से जनता को कोई गलतफहमी होती भी है तो वह अच्छे प्रशासन के पक्ष में ही होती है। अच्छा प्रशासन सिर चढ़कर बोलता है और मोदित्व का खतरा उस तरह सतह पर नजर नहीं आता।
मेरा यह भी मानना है कि धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली ताकतों की आसमान छूती असफलता से ही देश में कोई राज्य जातिवादियों के हाथ गया तो कोई साम्प्रदायिक लोगों के। अपनी नीयत की बेईमानी और अपने भ्रष्टïाचार, अपनी नालायकी को जनता की नासमझी कहकर टाला नहीं जा सकता। लोकतंत्र में चुनाव महज सिद्घांतों के आधार पर नहीं लड़े जाते, अच्छा शासन-प्रशासन भी मायने रखता है, शायद अधिक ही।
ऐसे में मतदाता के लिए दुविधा खड़ी करने वाले असफल ही होंगे, इनकी कोई क्या मदद कर लेगा।

- सुनील कुमार

पढऩा, लिखना और दहशत




पुलिस के एक बड़े अफसर हमारे अखबार में कई बार लिखते हैं। इससे सरकार में बैठे कई लोग खासे परेशान हो गए हैं कि इस आदमी को और कुछ काम नहीं है क्या, जो लिखते रहता है। कुछ लोगों ने सरकार के सबसे ऊपर के लोगों को कहा कि नक्सली मुद्दे पर इस अफसर के लिखने से उनको पुलिस की रणनीति पता लग जा रही है इसलिए उनको लिखने से रोका जाए। कुछ का कहना था कि सरकार में जब और लोग नक्सली मुद्दे पर बोलने से बचते हैं तो इस अफसर को इतने खुलासे से क्यों लिखना चाहिए। मैंने सुझाया कि लोकतंत्र में जनता को जानने का हक है कि सरकार क्या कर रही है तो उनका कहना था कि अब तो सूचना का अधिकार लागू हो गया है जो सरकार के दिमाग पर लागू नहीं है, इसलिए जिसको जो जानना हो, कागजों की फाइलों की कॉपियां मांग लें।
राजनीति और सरकार में लिखना-पढऩा काफी कम हो गया है इसलिए हफ्ते में एक घंटे में एक लेख लिख लेने वाले से भी लोग यह धोखा खा जाते हैं कि वह लिखने के अलावा हफ्ते भर और कुछ करता ही नहीं। फिर चाहे ऐसा लिखने वाला अफसर या नेता रोज शाम कुछ घंटे दारू पीते बैठे, रिश्वत खाते न बैठे। ऐसे कमजोरियों से मानो किसी के काम पर कोई फर्क ही नहीं पड़ता, महज लिखने-पढऩे से पड़ता है।
सिर्फ सरकार या राजनीति में नहीं, पढ़े-लिखे लोगों के पेशे, अखबारनवीसी में भी गंभीर पढऩा-लिखना फैशन के बाहर है। कम लोग हैं जो पढ़ते हैं। पढऩे का एक नुकसान यह होता है कि लिखने में सावधानी बढ़ती है, गलतियां घटती हैं और इससे उत्पादकता एकदम कम हो जाती है। बिना जानकारी लिखने वाले अधिक लिख लेते हैं (वैसे मैं खासा अधिक लिखता हूं) क्योंकि उनके सामने बाधा-दौड़ की रोक की तरह के बैरियर नहीं लगे रहते।
लेकिन यहां बात सरकार और राजनीतिक की चल रही थी जहां पढऩे और लिखने के वक्त की बरबादी माना जाता है और यह सोच लिया जाता है कि इसके पास कोई और काम नहीं है। सत्ता को चलाने के लिए काबिलीयत और तजुर्बे को पूरी तरह गैरजरूरी मान लिया गया है। संजय, राजीव, सोनिया, राहुल, बिलावल, राबड़ी, कोई भी सत्ता चला सकता है। सरकार में कुछ विभागों को अधिक महत्वपूर्ण मान लिया जाता है उनके बारे में कभी आला अफसरों से बात होती है तो कोई भी सामाजिक यथार्थ, गांधीवाद, पे्रमचंद या गरीबी के अर्थशास्त्र को पढऩे समझाने की जरूरत नहीं समझाता। सरकार मानो समाज से ऊपर, कुछ फासले से काम करने वाली मशीनरी है जिसको चलाने के लिए उस पेशे की स्थापित तरकीबें मानो काफी हैं और समाज की समझ की कोई जरूरत नहीं है।
लिखने को तो बहुत से लोग आपत्तिजनक मानते ही हैं, पढऩे को भी उतने ही लोग गैर जरूरी मानते हैं। पढऩा मानों एक वामपंथी काम है जिससे सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को दूर रहना चाहिए, नेताओं को भी। नेताओं में लगीाग सभी को यह अति आत्मविश्वास रहता है कि वे जमीन से इनते जुड़े हुए हैं कि उन्हें कुछ और पढऩे की जरूरत नहीं है। काफी लोग पढऩे को एक किताबी बोझ मानते हैं और डूबने की गारंटी भी। उनके पास एक मिसाल रेडिमेड रहता है कि फलां सांसद या विधायक को देखे, बहुत पढ़ता-लिखता था, चुनाव में निपट गया।
काफी लोगों या यह रोना रहता है कि पढऩे का वक्त ही कहां मिलता है? देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पूरी दुनिया का पढ़कर, पूरी दुनिया के बारे में लिखने का वक्त भी रहता था और सभी मुख्यमंत्रियों को शायद हर महीने वे चि_ïी भी लिखते थे। गांधी तो गांव-गांव के पटवारी-पंच तक की चि_िïयों के जवाब लिखते थे। लेकिन आज की राजनीति में, सरकार चलाने में इसे बोझ मान लिया गया है।
ऐसे माहौल में लिखने-पढऩे वाले अफसर बिना इरादे भी बहुत से दूसरे लोगों को बेइज्जत कर देते हैं। लेकिन क्या इससे डरकर लोग लिखना-पढऩा ही बंद कर दें? या यह सफाई देते फिरें कि उनके पढऩें और लिखने में सरकारी नौकरी वाला हिस्सा नहीं लगता। निजी जिंदगी में जिस तरह से कोई कीर्तन करता है, कोई संगीत सुनता है, कोई पेंटिंग करता है, वैसे ही कोई लिखता-पढ़ता है। लेकिन कुछ चुनिंदा लोग ही लिख-पढ़ पाते हैं इसलिए वे बाकी लोगों में दहशत पैदा करते हैं।
छत्तीसगढ़ के एक नामी-गिरामी वकील कनक तिवारी से हम दो बरस से अपने लिए लिखने को कह रहे थे, वे अब मेहरबान हुए। हमने उनको कांगे्रस विचारधारा से जुड़ा हुआ तो उन्होंने साफ किया कि वे नेहरू की विचारधारा से जुड़े हुए हैं, कांगे्रस से नहीं। इस बारीक फर्क को देखना हो तो देश के सबसे अधिक पढ़े-लिखे नेताओं में से सबसे महान जवाहरलाल नेहरू को देखना होगा और आज उनकी पार्टी पर वकील अनपढ़ों को। आज कांगे्रस में कोई लिखने-पढऩे की बात भी नहीं करता और विचारों को लेकर ऐसी पहाड़ सी दुविधा इस पार्टी में है कि पार्टी पांच दिनों तक पराठे की तरह पलटी खाती रही कि सोनिया ने मौत का सौदागर मोदी को कहा था या नहीं। नेहरू को शायद अपनी पूरी जिंदगी में बात न पलटनी पड़ी हो।
लेकिन बात कनक तिवारी की हो रही थी। जिन मुद्दों पर वे लिख रहे हैं उनसे उनकी वकालत का कोई लेना देना नहीं है और एक लेख के लिए पढऩे और लिखने के समय में वे लाख-पचास हजार रूपए की वकालत कर लेते। लेकिन रोजी-रोटी से ऊपर भी इंसान की जरूरत होती है, खासकर अगर आप सोचते-विचारते हों, रचना करते हों, आपमें कल्पनाएं हों और आपके सरोकार हों।
बहुत से लोगों को ऐसे शोधकर्ता सिरफिरे लगते हैं जो सात समंदर पार से आकर हिन्दुस्तान के जंगल-पहाड़, गांव-नदी तक जाकर कोई रिसर्च करते हैं। पंछी देखने के लिए जो लोग दूरबीन लिए जंगल या सरोवर किनारे लंबे घंटे बैठे रहते हैं, उनके दिमाग पर कई लोग तरस भी खाते हैं और उनको बदनसीब समझते हैं।
मैं लोगों को उकसाता हूं कि अपनी पसंद या नापसंदगी को लिखें। नाम से न लिख सकते हों तो बिना नाम के लिखें, लेकिन कम ही लोग ऐसा करते हैं। बहुत से लोगों को देखकर मुझे लगता है कि ये जिस जगह पर हैं, जितनी बातें आज इनके सामने आती हैं, उस अनुभव के बाद वे लोगों के लिए कुछ विचारोत्तेजक बातें लिख सकते हैं जिनसे बात आगे तक जाए, लोगों के बीच बात-चीत और बहस शुरू हो और लोकतंत्र विकसित हो। आज पेशेवर लिखने वालों की एक छोटी बिरादरी ऐसी है जो (मेरी तरह) बहुत सा लिखते हैं, लेकिन बहुत बड़ी एक मौन बिरादरी हाथ बांधे कुछ दूर खड़े हैं, महज पढ़ते हुए, जो कि बहुत सी नई बहस छेड़ सकती है।
सच तो यह है कि इस पत्रिका को शुरू करने के पहले जिस अखबार 'छत्तीसगढ़Ó को हमने शुरू किया, उसके बारे में पहले दिमाग में था कि इसे समाचार-पत्र की जगह विचार-पत्र बनाया जाए। लेकिन फिर कुछ करीबी जानकार लोगों ने हौसला काबू में किया कि इतने विचार आएंगे कहां से और उन्हें पढ़ेगा कौन? इन दो बरसों में वह अकाल दोनों तरफ कुछ कम होते दिख रहा है और आगे की बात तो आने वाला वक्त की बताएगा।
-सुनील कुमार

यह तो सचमुच ईडियट बनाकर छोड़ेगा...


इकत्तीस दिसंबर को बाहर किसी दावत में जाने का कभी मिजाज नहीं रहा। लोग नशे में, या बिना नशे के भी, जिस तरह जानी-अनजानी भीड़ के बीच नाच-गा लेते हैं। उनकी उस क्षमता को देखकर मुझे हैरानी होती है। लेकिन मेरी किस्म का कुछ सख्त पसंद नापसंद वाला इंसान ऐसी ही हैरानी का हकदार होता हे, नए साल की पूर्व संध्या पर भी। जिन लोगों के स्वभाव में लचीलापन अधिक होता है, जो एक शाम को महज एक शाम की तरह जीते हैं, वे हर बात का, हर मजे का अधिक लुत्फ उठा पाते हैं।
ऐसे में गलती एक ही हो गई कि मैं टेलीविजन के भरोसे बैठ गया। देश की एक बहुत बड़ी मनोरंजन और जश्न का मौका होता है। लोग उम्मीद करते हैं कि उनको एक से बढ़कर एक कार्यक्रम देखने मिलेंगे। लेकिन यह देखकर मैं हक्का-बक्का रह गया कि एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, दर्जन भर से अधिक समाचार और मनोरंजन चैनलों पर दो-दो साल पुराने फूहड़ और पिटे हुए लतीफों की पुरानी रिकॉर्डिंग जोड़-जोड़कर दिखाई जा रही थी, एक ही दिन पहले शाम-रात को दिखाया जा चुका मंच का एक कार्यक्रम दिखाया जा रहा था, दसियों बार देखी या दिखाई जा चुकी एक फिल्म दिखाई जा रही थी और कुछ शहरों में चल रहे कार्यक्रमों का बहुत धुंधला जीवंत प्रसारण चल रहा था।
टेलीविजन के सौ पचास चैनल मिलकर भी जब एक शाम को मनोरंजक न कर पाएं तो उसे क्या कहा जाए? सुगम संगीत, गजलों या शास्त्रीय संगीत का, लोकसंगीत का, कोई चैनल नहीं? कोई साफ-सुथरा और ताजा मनोरंजन नहीं! यह टेलीविजन नाम के सूचना और मनोरंजन उद्योग का बाजारूकरण भी नहीं है क्योंकि बाजार तो बिकने लायक कुछ परोसता है। यह हलवाई तो दो बरस पुरानी सूखी बालूशाही सजाकर बैठा था जिन पर फफूंद अलग से लगा था।
छत्तीसगढ़ की राजधानी में, करीब दस लाख की आबादी के बीच भी एक भी ऐसा सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं था जिसमें साधारण या शांत स्वभाव के लोग परिवार सहित बैठकर सरल संगीत सुन सकते। सरकार को भी समारोह वाले ऐसे दिन के लिए किसी अच्छे कार्यक्रम की कल्पना नहीं होती। फिर पूरे शहर के लिए एक बड़े कार्यक्रम को छोड़ भी दें, बाहरी  कलाकारों को छोड़ भी दें, स्थानीय कलाकारों वाले कुछ कार्यक्रम तो शहर को दर्जन-दो दर्जन सभाभवनों में हो ही सकते थे। बहुत कम लागत वाले ऐसे कार्यक्रम आस-पास की बस्तियों में रहने वाले मध्यम वर्गीय लोगों के काम के हो सकते थे, लेकिन वह भी नहीं हुआ। ऐसी कोई कोशिश भी होते नहीं दिखी।
कल चार-छह घंटे टेलीविजन चैनलों से संघर्ष करने के बाद यह मलाल रहा कि किसी अच्छी फिल्म की सीडी ही लाकर रखी होती तो मनोरंजन के उन घंटों का इस्तेमाल हो जाता।
देश के मनोरंजन और समाचार चैनलों की हालत बहुत खराब है। और अखबारी पन्नों पर इनको कितना कोसा जाए? एक किस्म का मीडिया दूसरे किस्म के मीडिया पर गैर जरूरी रफ्तार से या किसी बदनीयत से हमला कर रहा है, ऐसा लगने लगेगा। लेकिन मैं मीडिया की थोड़ी सी समझ रखने के कारण सोचता हूं कि सालभर पहले से नववर्ष की पूर्व संध्या का आना तो तय रहता है। फिर भी सैकड़ों करोड़ की लागत वाले ये चैनल कोई मौलिक, दिलचस्प और मनोरंजक कार्यक्रम तैयार नहीं कर पाते! जिस सालाना शाम विज्ञापनों से लदे इन चैनलों में आपस में कड़ा मुकाबला होना था, तो एक से बढ़कर एक पिटे हुए साबित हो रहे थे। निजी चैनलों से तो अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वे सनसनी, अपराध कथाओं, चुम्बन कथाओं, भविष्यवाणियों और फूहड़ हंसी में लगे हुए हैं। दूरदर्शन को ही संगीत का ऐसा चौबीस घंटों का चैनल शुरू करना चाहिए जिस पर लोकसंगीत, सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत लगातार दिखाया जाता रहे। साफ-सुथरे मनोरंजन की गुंजाइश कम हो चली है और दर्शक स्तरहीन कार्यक्रमों में से ही किसी-किसी को छांटने में मजबूर हो जाते हैं।
एक तरफ सरकार या तो ऐसा चैनल शुरू नहीं कर पा रही या फिर उसे केबल वाले दिखाते नहीं हैं। दूसरी तरफ जनता के बीच भी खुद की पहल से ऐसे कार्यक्रम कम हो चले हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बोझ से दबे मंचों पर कोई कार्यक्रम होना और टिकना वैसे भी मुश्किल रहता है॥ टीवी की चकाचौंध के सामने स्थानीय कार्यक्रम फीके ही लगेंगे। लेकिन इन सबका मतलब क्या यह नहीं होगा कि सितारों की झिलमिल के आगे प्रतिमाओं को कहीं खड़े होने की जगह मिलेगी?
टीवी पर अच्छे कार्यक्रमों की कमी और स्थानीय मंचों पर स्थानीय प्रतिमाओं के लिए गुंजाइश की कमी, इन दोनों को देखें तो इनके हित आपस में टकराते भी लगते हैं। लेकिन इस टकराव में तब तक कोई बुराई नहीं है जब तक दोनों में उत्कृष्टïता का मुकाबला चलता रहे। आज पहली बात तो यह कि उत्कृष्टïता रह नहीं गई और मुकाबला प्रतिमा-प्रदर्शन का नहीं रह गया, अब वह एसएमएस जुटाने का रह गया है। ऐसे गलत मुकाबले के दौर में सरकार को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। उसे कुछ अच्छे चैनल शुरू करने, उनका प्रसारण या उन्हें दिखाना इस तरह से करना होगा कि उनसे लोगों को कुछ बेहतर मिले। घटिया सामानों के मेले से देश के लोग जो भी खाकर निकलेंगे, वह घटिया ही हो होगा।
रेडियो पर तो एक सैटेलाईट रेडियो सर्विस पर संगीत के कई तरह के कार्यक्रम सुनने मिल जाते हैं, लेकिन टीवी तो सच में ही ईडियट बनाकर छोड़ेगा।

छत्तीसगढ़ का सनसनी-शो




छत्तीसगढ़ के पिछले मुख्यमंत्री, भोपाल के मशहूर इंजीनियरिंग कॉलेज के एक सफल छात्र अजीत जोगी ने कल गुरु घासीदास जयंती पर कहा कि उनकी दुर्घटना सामान्य नहीं थी, इसके लिए जादू-टोना करवाया गया था। जोगी सतनामी समाज के बीच खासे लोकप्रिय नेता हैं और जाहिर है कि इस सालाना जलसे में भारी भीड़ रही होगी। उनका बोलने का अंदाज भी असर डालने वाला होता है और कल वहां मौजूद बहुत से लोग यह पक्का मानकर लौटे होंगे कि जादू-टोना करके किसी का एक्सीडेंट करवाया जा सकता है, बुरा किया जा सकता है। वैसे यह मानने के लिए छत्तीसगढ़ की आबादी के एक बड़े हिस्से को किसी जोगी की जरूरत नहीं है क्योंकि यहां हर बरस कोई दर्जन भर महिलाएं तो टोनही करार देकर मार ही डाली जाती हैं। इनसे परे प्रताडि़त होने वाली महिलाएं हजारों में होंगी।
अभी चार दिन पहले ही कांगे्रस पार्टी के एक कार्यक्रम में अजीत जोगी ने अपनी कई बार की कही बात माइक से फिर दुहराई थी कि कांगे्रस की चुनावी टिकट के लिए किसी को मेहनत नहीं करनी चाहिए क्योंकि जिसके माथे पर लिखा है जिसकी किस्मत है, उसी को टिकट मिलेगी। उस दिन भी यह पढ़कर मुझे कुछ अजीब सा लगा था क्योंकि भाग्यवादियों के बारे में मेरा यह मानना है कि अपनी निजी आस्था से परे जब वे मेहनत करते हैं तभी उन्हें सफलता मिलती है, फिर चाहे वे खुद भी भाग्य को उसका श्रेय देते हैं। मुझे यह भी लगता है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को अपनी निजी आस्था के प्रदर्शन के पहले यह सोचना चाहिए कि ऐसा करके, ऐसा कहके वे अपने असर के दायरे में क्या करने जा रहे हैं।
जिस छत्तीसगढ़ में जादू-टोने पर भरोसा करने वालों के हाथों गाँवों की कमजोर महिलाएं मारी जाती हैं, उस छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति अगर अपनी निजी दुर्घटना को जादू-टोने का असर बताएगा, तो अंधविश्वास से रखने वाली जनता के मन में तो बात और पुख्ता हो जाएगी।
हो सकता है कि छत्तीसगढ़ के लाखों और अंधविश्वासी लोगों की तरह जोगी सचमुच ही इसे सच मानते हों, लेकिन इंजीनियरिंग की शिक्षा, आईएएस की नौकरी, काँगे्रस की सदस्यता और मुख्यमंत्री का पद मिलकर भी अगर उनके इस निजी अंधविश्वास या इस अंधविश्वासी बयान, को खत्म न कर सके, तो फिर छत्तीसगढ़ में नियमित रूप से मारी जाने वाली बेकसूर महिलाओं की मौतें तो जारी ही रहेंगी।
यह बात अजीत जोगी शायद पहले भी सार्वजनिक रूप से बोल चुके हैं लेकिन अभी मुझे इस पर लिखना इसलिए जरूरी लगा कि एक प्रमुख राष्टï्रीय समाचार चैनल के साथी पत्रकार ने दो दिन पहले ही मुझसे सवाल किया कि क्या टोनही होती हैं? वे एक रिपोर्ट तैयार कर रहे थे और मुझे इस विषय का जानकार मानकर वे कुछ जवाब रिकॉर्ड कर रहे थे। मैंने इस सवाल को आज के जमाने में अप्रासंगिक कहा था और गैर जरूरी भी। लेकिन उसके चौबीस घंटे के भीतर अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से अब तक का सबसे अधिक शिक्षित-प्रशिक्षित मुख्यमंत्री जादू-टोने को स्थापित करने में लगा था!!
इस कांगे्रस पार्टी के आज तक के सबसे बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू को यूं तो पूरी पार्टी ने ही ताक पर धर दिया है। अपना आनंद भवन अब राष्टï्र को कोई नहीं देता, राष्टï्रीय भवनों में स्थायी आनंद मनाना ही कांगे्रस की संस्कृति हो गई है। रूढिय़ों से लदे इस देश में नेहरू ने जो वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात कही थी उसे जोगी और उन जैसे बहुत से और कांगे्रसी नेताओं ने पूरी तरह घूरे पर डाल दिया है अवांछित बच्चे की तरह? जोगी के राजनीतिक गुरू अर्जुन सिंह तो अपने गुरू और अपने पूजा-पाठ को निजी आस्था के दायरे में रखते आए लेकिन जोगी ने भीड़ के बीच एक सनसनी की तरह अपने इस निजी अंधविश्वास को घातक अंदाज में पेश किया।
मेरा ख्याल है कि सार्वजनिक जिम्मेदारियों वाले लोगों को यह ध्यान करना चाहिए कि उनकी बातों का क्या असर होगा? कल जब गुरू घासीदास जयंती के कार्यक्रम में जोगी अपनी सड़क दुर्घटना के पीछे षडय़ंत्र पूर्वक जादू-टोना करवाने की बात कही तो उन्होंने अपने अनगिनत विरोधियों पर एक गंभीर तोहमत भी लगाई और छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास भी फैलाया। ये बात भी आज की राजनीति की और अनगिनत महीन बातों की तरह आई गई हो जाएगी, न कोई इसके आलोचना करेगा, न दूसरे लोग इससे परहेज करेंगे, इतना जरूर होगा कि जिन तबको की जो महिलाएं टोनही करार देकर मारी जाती हैं, उनको मारने वाले हाथों में अब एक नया हथियार होगा जोगी का दिया हुआ।
जादू-टोने पर आस्था के खिलाफ देश में कुछ कानून हैं। मेरा ख्याल है कि नेता या कोई और ऐसे बयान न दें इसके लिए कानूनी विचार विमर्श भी होना चाहिए। इसी छत्तीसगढ़ में डॉ. दिनेश मिश्र जैसा एक नौजवान लगातार अंधश्रद्घा के खिलाफ अभियान चला रहा है। जोगी की कही बात को लेकर अभी मैं फोन पर कानून के एक जानकार से बात कर रहा था तो उनका कहना था कि जोगी लंबे समय से कानून बनाने वाली संस्था संसद में रहे हैं जिसने जादू-टोने को स्थापित करने उस नाम पर किसी को प्रताडि़त के खिलाफ कानून बनाया है। ऐसे में अपनी सड़क दुर्घटना को किसी के षडय़ंत्रपूर्वक जादू-टोने का नतीजा बताना, संसंद की भावना के खिलाफ भी जाता है। इस संवैधानिक संस्था की सोच और उसके एक सदस्य की सोच में एक विरोधाभास दिखता है, जिससे संसद का अहित हो न हो, छत्तीसगढ़ की अनगिनत महिलाओं का अहित इससे जरूर होगा।
-सुनील कुमार

कुछ लोग इसे भी फैलाएं




कल एक मोबाइल फोन पर पन्द्रह मिनट लंबा एक सेक्स सीन देखने मिला। उत्तर भारत के शहरी इलाके के सम्पन्न सवर्ण लगते एक लड़के और लड़की के बीच का सेक्स दिन दहाड़े सड़क किनारे एक कार में मोबाइल फोन के मूवी कैमरे से रिकॉर्ड किया गया। कार के शीशों पर लगी फिल्म के कारण शायद भीतर यह जोड़ा बेफिक्र था कि लोग उन्हें देख नहीं रहे हैं लेकिन इस रिकॉर्डिंग में कार के भीतर से बाहर, बगल से गुजरते लोग साफ दिख रहे थे।
पूरी फिल्म में लड़की इस बात की शिकायत कर रही थी कि लड़का उसके चेहरे की भी तस्वीरें ले रहा है और वह पिछली बार की तरह बदनाम हो जाएगी। लड़का उसे तरह-तरह की कसमें देकर आगे बढ़ता जा रहा था इस भावनात्मक ब्लैक मेलिंग के साथ ही वह ऐसा नहीं करेगी तो वह जिंदगी में कभी दुबारा नहीं मिलेगा। सेक्स के अंत में लड़की को गर्भवती होने की फिक्र भी होती है। लेकिन न बीमारी न गर्भ, किसी भी फिक्र से कंडोम का इस्तेमाल होता।
एक लड़का, एक लड़की, एक बंद कार या कमरा या सूना मैदान और एक मोबाइल फोन। एक-दूसरे को एड्स लेने-देने, लड़की के गर्भवती होने, दोनों के एक-दूसरे से या एक साथ ब्लैक मेल होने, ब्लैक मेलिंग के चलते वेश्यावृत्ति में धकेले, जाने, शादियां टूटने, हत्याएं या आत्महत्याएं होने, सबको सामान इस छोअे से फोन में जुट गया था।
यह जोड़ा देश के ऐसे करोड़ों जोड़ों की तरह का है जो इस किस्म के खतरे में पड़ सकते हैं। और इस वीडियो क्लिप में तो सिरे से ही मूर्ख एक लड़की अपने तमाम कपड़े उतारकर सारे खतरे में अपने को खुले कैमरे के सामने खड़ा कर चुकी थी, बहुत से मामलों में तो कैरा और माइक्रोफोन छिपा हुआ भी हो सकता है।
इस एकदम साफ वीडियो क्लिप को देख-सुन कर मैं बेचैन था कि हमारे अपने बच्चे अगर इस तरह फोन, इंटरनेट और कम्प्यूटरों पर दिख रहे हों तो क्या हो? आज कौन से मां-बाप, कौन से टीचर अपने बच्चों को खुलासे से इन खतरों के बारे में समझाते हैं? एक तरफ टेक्नालॉजी खतरनाक बीमारी की रफ्तार से निजी जिंदगी में घुसपैठ कर चुकी है, दूसरी तरफ बेकाबू बीमारियां ऐसी हो गई हैं कि जिन पर टेक्नालॉजी का कोई बस नहीं है। ऐसे खतरे जितने बढ़े हैं, नई और पुरानी पीढ़ी सबमें दुस्साहस भी उतना ही बढ़ गया हे। सारे प्रचार के बाद भी कंडोम अब तक एक फिजूल का सामान माना जा रहा है। लगभग हर कोई यह मानकर चल रहा है कि एड्स कुछ ही लोगों को होता है और वह इससे परे, सुरक्षित है।
पिछले कुछ हफ्तों से एक-दो मेडिकल कंपनियों के इश्तहार जोरों पर हैं जो ऐसी गोली बेच रहे हैं जिसे सेक्स के एक-दो दिन बाद लेकर भी गर्भ से बचा जा सकता है। इसके बाद गर्भधारण से बचने के लिए कंडोम एक किस्म से गैर जरूरी माना जा सकता हे और बीमारी वाला खतरा तो लोग अनदेखा करके ही चलते हैं। जिंदगी और मौत के बीच की दुनिया की इस सबसे महीन दीवार को इस एक गोली ने आधा तो ढहा ही दिया है और बचा आधा हिस्सा तो एक-दूसरे के एकदम करीब आने की चाह में लोग खुद लांघ लेते हैं।
क्या आज के मोबाइल युग में नौजवान पीढ़ी अपनी हिफाजत के लिए सचमुच तैयार है? क्या स्कूलों और कॉलेजों में, घरों और दोस्तों के बीच, बचाव की नसीहत मिलती है? या फिर नसीहतों की जगह ऐसी मोबाइल फिल्में हवा में तैर रही हैं जो बताती हैं कि किस तरह एक लड़का या लड़की, उसका परिवार, ब्लैकमेलिंग, सामाजिक अपमान या मौत के कगार पर खड़े हैं।
ह पूरा सिलसिला अधिक खतरनाक होते दिख रहा हे। जिस तरह भावनात्मक ब्लैकमेलिंग के सामने कम या अधिक उम्र के लोग कपड़े उतारते हैं, तस्वीरें खिंचवाते चलते हैं वह भयानक हे। डिजिटल टेक्नालॉजी के उपकरण इतने शानदार होते जा रहे हैं और उनके इस्तेमाल के खतरे इतने भयानक होते जा रहे हैं कि वे देखते ही बनते हैं। फिर एक फोन से दूसरे फोन पर पन्द्रह मिनट की वीडियो क्लिप दो-तीन मिनट में बिना किसी तार चली जा रही है। जिसके ऐसे बदनीयत कैमरे के सामने लापरवाही दिखाई उसके मानो पोस्टर ही छप गए।
कल्पना करें कि एक गलती से एक लड़की या महिला एड्स पा सकती है और एड्स का शिकार बच्चा भी। फिर उसकी फिल्म उसके घर-शहर के लोग देखेंगे और वह गली की मोबाइल दूकानों पर दस-दस रुपयों में डाऊन लोड होने लगेगी। परिवार अगर बहुत बेशर्म होगा तो वह बस्ती छोडऩे बेबस हो जाएगा और अगर शर्म वाला हुआ तो शायद दुनिया छोडऩे को बेबस हो जाएगा।
मैं इस बात को खुले और कड़े शब्दों में इसलिए लिख रहा हूं कि लोग इसे बेझिझक अपने आसपास के लोगों को पढ़वाएं। बड़ों को भी, और बच्चों को भी। जिस तरह कुछ लोग एड्स फैला रहे हैं, कुछ लोग ऐसी वीडियोक्लिप फैला रहे हैं, कुछ लोग तो सावधानी की नसीहत भी फैलाएं।
-सुनील कुमार

फिक्र किसी सर में माथे पर बल कहीं और

धरती को बचाने की फिक्र कई शक्लों में सामने आती है। कुछ लोगों ने अमरीका में फेंके गए खाने के सामानों पर गुजारा करना शुरू किया है जिनको 'फ्रीगनÓ कहा जाता है। ये लोग ऐसा नहीं कि खाना खरीदने का खर्च नहीं उठा पाते, धरती पर बोझ घटाने के लिए ये सामान बचाते हैं और कुछ महीने पहले ऐसे लोगों के बारे में नहीं लिखा भी गया था। फिर ऐसी गाडिय़ां आने लगी जो डीजल या पेट्रोल के बजाय बैटरी से चलती हैं और उनसे प्रदूषण सड़कों पर बहुत कम होता है। लेकिन अभी चीन से एक नइ्र फिक्र सामने आई है कि ऐसी गाडिय़ों की बैटरी चार्ज करने के लिए जो बिजली लगती है उसे बनाने के लिए बिजलीघरों से भारी प्रदूषण होता है। दूसरा बड़ा प्रदूषण है ऐसी गाडिय़ों की बैटरियों से। हर दो बरस मे ये बैटरियां बेकार हो जाएंगी और इनके ढेर से निपटने का कोई जरिया नहीं होगा। बैटरियों पर ढेर पेट्रोलियम के प्रदूषण से कहीं बढ़कर होगा।
गांधी ने उस समय किफायत की बात शुरू की जब पर्यावरण को बचाने की बात की भी जरूरत शुरू नहीं हुई थी। गांधी को छोड़ें तो जैन धर्म ने तो और पहले ही संचय के खिलाफ नसीहत दी थी। इस धर्म के कार्यकर्ता न अधिक खाते, न अधिक सामान इस्तेमाल करते और न ही इक_ïा करते। पर्यावरण के लिए इससे बड़ी कौन सी बात हो सकती थी? यह एक अलब बात हे कि इस धम्र को मानने वालों की दावतों में सामानों की सम्पन्न बरबादी देखते ही बनती है, और संचय की नसीहत से परे ही इस धर्म का पालन करने वाले दिखते हैं। लेकिन बाकी मजहबों की नसीहत का हाल इससे बहुत बेहतर होता हो ऐसा भी नहीं, लेकिन आज बात यहां मजहब की नहीं करनी है।
बाजार से सामान खरीदते हुए जहां जरूरत न हो फैली बैग के लिए मना करते हुए हमारे मन को यह तसल्ली हो जाती है कि हमने धरती पर बोझ नहीं बढ़ाया। अभी दो ही दिन पहले मैं प्रोडक्ट और पैकिंग डिजाइनिंग की बात करते हुए सोच रहा था कि ऐसी पैकिंग जिसका दुबारा सार्थक उपयोग न हो सके, उस पर अतिरिक्त टैक्स क्यों न लगाया जाए? क्यों न डिजाइनिंग के पाठ्यक्रमों में इसकी किफायत और इसके दुबारा उपयोग की संभावनाओं को एक पूरे डिप्लोमा या डिग्री के रूप में शामिल किया जाए?
अपने आस-पास मुझे जब रंग-पेंट और तेल-ग्रीस से खाली हुई बाल्टियां बरसों इस्तेमाल होते दिखती हैं तो कुछ तसल्ली होती है। लेकिन साथ-साथ जब प्लास्टिक के सामानों की दुकानों पर जग, ग्लास और कटोरे दिखते हैं तो लगता है कि चाय, कॉफी, बोनविटा या अचार जैसे सामान ऐसी पैकिंग में क्यों नहीं आते?
लेकिन आज एक ऐसी फिक्र के बारे में यहां लिखना है कि जिसे सुनकर लोगों को अजीब लगेगा।
अमरीका की एक युवती, टोनी वर्नेली ने तय कर रखा था कि वह कभी मां नहीं बनेगी, क्योंकि उसे लगता था कि धरती को अगर बचाना है तो इसका दोहन करने वाली आबादी कम रखनी होगी। वह एक नई जिंदगी, एक नए बच्चे को पर्यावरण पर सबसे बड़ा बोझ मानती थी। पन्द्रह बरस की उम्र में उसने मांसाहार छोड़ दिया था क्योंकि मांसाहार के पशु-पक्षी तैयार करने का उद्योग बहुत अधिक पानी मांगता है और मांस के लायक होने तक पशु धरती पर बोझ रहते हैं।
उसकी एक लंबी कहानी अभी अमरीका में छपी है लेकिन हम अपने काम का हिस्सा उसमें से निकालें तो वह यह है कि वह गर्भवती हो गई और दहशत में जाकर उसने गर्भपात करवाया। फिर बरसों तक डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ा कर उसने नसबंदी करवाई। सत्ताईस बरस की युवती की नसबंदी करने कोई डॉक्टर तैयार नहीं हुआ। क्योंकि इनको लगता था कि किसी दिन उसका इरादा बदल सकता है। लेकिन आखिर में एक डॉक्टर ने उस पर यह अहसान किया।
टोनी ने अपने पुरुष मित्रों से, पति से, सबसे यह बात साफ कर दी कि वह कभी मां नहीं बनेगी, यह जानकार कुछ लोग उसके साथ रहे, कुछ चले गए। उसने बाद में अपने पति के साथ यह भी तय किया कि वे लोग साल में सिर्फ एक बार हवाई यात्रा करेंगे क्योंकि उससे बहुत प्रदूषण होता है।
इस लंबी कहानी से एक तो धरती के लिए फिक्र की गंभीरता का एक नया पैमाना सामने आता है जिस पर सोच विचार की जरूरत है। दूसरी बात यह कि एक नई जिंदगी को धरती पर बोझ मानने की अमरीकी या सम्पन्न तबके की वजहं अलग हैं जो भारत की आधी, गरीब, आबादी जैसे तबकों से बिल्कुल अलग है।
कुछ महीने पहले एक विदेशी फोटोग्राफर परिचित ने मुझे कवर्धा के बैगा इलाके की कुछ तस्वीरें भेजीं। इनमें बच्चे ऐसे पुराने टायर से खेलकर खुश थे जिसकी गाड़ी को किसी और ने ही इस्तेमाल किया होगा। इनकी महिलाएं तेल के खाली डिब्बों में पानी भर रही थीं, जाहिर है कि दस-पन्द्रह किलो तेल एक साथ तो इनकी बस्ती मिलकर भी न खरीद सके। इनमें से एक बच्चा या बूढ़ा शहरी सफारी पहना हुआ था, जो कि जाहिर है कहीं से इस्तेमाल होती हुई यहां तक पहुंची थी।
अमरीकी युवती टोनी का बच्चा पैदा होते ही रोज आधा दर्जन नैफीज (भारी भरकम लंगोट) इस्तेमाल करके फेंकता, उसके लिए पुरा कमरा सजाता, हर सामन की पैकिंग आती, और मरने तक वह अमरीकी कागज, कपड़ा, प्लास्टिक, ईंधन, बिजली (कोयला) की शक्ल में शायद दस-बीस किलो रोज खर्च करता।
पर्यावरण की फिक्र बहुत अच्छी है लेकिन भारत के गरीब तबके के संदर्भ में हालत बहुत अलग भी हैं। यहां की आधी आबादी की खपत इतनी कम है और गढऩे, पैदा करने, बनाने की क्षमता उसकी इतनी अधिक है कि वह धरती पर बोझ नहीं है। वह धरती की संभावनाओं को इस तरह से इस्तेमाल करना जानता है कि उससे धरती को नुकसान नहीं पहुंचता जैसे एक गरीब किसी पेड़ पर अपने दस बच्चों को चढ़ाकर अपने काम के फल-फूल, पत्ते तोड़ते चलता है, उससे पेड़ का नुकसान नहीं होता। लेकिन जब एक अमीर अपने घर के लिए, फर्नीचर के लिए एक पेड़ को कटवाता है या कटी लकड़ी को खरीदता है, तो वह हजार गरीबों से हजार गुना अधिक बोझ बन जाता है।
गरीब को पर्यावरण शब्द पढऩा नहीं सीखना होता। वह जिंदगी के अपने बेबस-किफायत के अंदाज के चलते पर्यावरण पे्रमी रहता ही है। दूसरी तरफ बड़े होटलों के एयरकंडीशंड कमरों में रूककर वहां के आलीशान हॉल में बैठक करने के लिए प्लेन और कार से आने-जाने वाले शहरी पर्यावरण-प्रेमी अपनी इस फिक्र से सिलवटें धरती के माथे पर डालते हैं।
ऐसी फिक्र देखकर मुझे अक्सर लगता है कि समाज की फिक्र और सरोकार के तमाम कामों से ऐशो आराम की तमाम फिजूलखर्ची को खत्म करने की बात सामाजिक संगठनों के स्तर पर क्यों नहीं होती? क्यों इनके  नारों के मुताबिक ही सामाजिक ऑडिट इनके आयोजनों का नहीं होता कि इनके फिक्र-कीर्तन से धरती पर बोझ कितना बढ़ा?
फिर मेरा खून खौलता है सरकार चलाते उन लोगों को देखकर जिन्होंने आबादी की ताकत के इस्तेमाल ही योजनाएं बनाकर जनता और धरती दोनों की दिक्कतें तो दूर नहीं कीं, जो बढ़ती आबादी को अपने सारे निकम्मेपन की आसान वजह पाकर निठल्ले बैठे हैं। अगर गांधी की सुझााई ग्रामीण, हाथ के उद्योगों की अर्थव्यवस्था को जिंदा ही रहने दिया जाता तो भी देश की गरीब आबादी देश की ताकत होती। लेकिन इस पर नेता-अफसर-ठेकेदार के त्रिशूल ने विदेशी टेक्नालॉजी, मशीनें बेचने के लिए ऐसा हमला किया कि हाथ निहत्थे हो गए।
न तो अलग से परिवार कल्याण कार्यक्रम पर खर्च करने की जरूरत थी, न ही पर्यावरण को बचाने के लिए खर्च करना होता, अगर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की सस्ती योजनाएं बनतीं, उन पर गांधीवादी ईमानदारी से अमल होता, तो ये दोनों विभाग बेरोजगार हो गए होते।
धरती पर जहां खपत का खतरनाक अंदाज है वहां तो टोनी की तरह की फिक्र जरूरी है, लेकिन यहां तो स्टेशनों पर फेंकी गई पानी की खाली बोतल को गरीब बरसों इस्तेमाल करता है, सैकड़ों-हजारों बार। वह एक लिटर की बोलत लेकर जाता है और फारिग होकर आ जाता है। शहरों में सम्पन्न तबका जितनी बार शौचालय या मूत्रालय जाता है, ऐसी दस बोतलें एक साथ, एक-एक बार में फ्लश कर आता है।
लेकिन इन तमाम बातों पर फिक्र भी जरूरी है। मैं सुबह घर से दफ्तर जाता हूं तो रास्ते में महंगे राजकुमार कॉलेज पहुंचते बच्चों की बड़ी-बड़ी कारें लगभग कतार में चलते दिखती हैं। मुझे लगता है कि क्यों कॉलेज ही पहल करके बच्चों के ऐसे समूह नहीं बनवा देता जो बारी-बारी से एक-एक की कार में आ सकें? क्यों आरामदेह बसें नहीं हो सकतीं, जिनके बार-बार कॉलेज आने पर एक फीस वसूल की जाए? क्यों हर शहर अपने को सुधारने के बारे में स्थानीय दिक्कतें नहीं पहचानता और क्यों उनका इलाज नहीं ढूंढता? क्यों राज्य सरकारें बहुत से सालाना सम्मानों को देने के लिए स्तरहीन चेहरे ढूंढने के बजाय ऐसी ठोस बातों के लिए पुरस्कार और सम्मान रखती जिनसे सचमुच ही धरती का भला हो?
क्यों समाज रात की शादियों को दोपहर में नहीं लाता ताकि बिजली बच़े क्यों पार्टियों में प्लास्टिक पर रोक नहीं लगती? क्यों पेड़ों की जगह शहरों में होर्डिंग्स फल-फूल रहे हैं? क्यों कोई संगठन लोगों के घरों में बेकार पड़े सामानों के इस्तेमाल का कोई आंदोलन छेड़ता?
ऐसे कई सवाल इस मुद्दे पर सोचते हुए परेशान करते हैं। कल जब छत्तीसगढ़ विधानसभा में अपने दफ्तर में बैठे नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा अस्थमा से निपटने का इनहेलर लें चुके तो उन्होंने मुझसे कहा कि वे आज सदन में बोल नहीं पाएंगे क्योंकि अभी उनकी एंजियोप्लास्टी हुई है और बोलते हुए वे उत्तेजित हो जाते हैं।
मैं अस्थमा या एंजियोप्लास्टी से तो बचा हूं लेकिन लिखते हुए उत्तेजित जरूर हो जाता हूँ। शायद इसलिए कि मेरी इस फिक्र से उन माथों पर कोई बल नहीं पड़ते जहां खुद ब खुद पडऩे चाहिए थे। और फिक्र करने वाले जो पेशेवर माथे हो गए हैं, उनके ऐशो-आराम की फिजूलखर्ची देख धरती के माथे पर बल पड़ते हैं। धरती भी सोचती है- जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसको दुश्मन की क्या दरकार।
-सुनील कुमार

पत्रकार, पक्षकार और पक्षकार-पत्रकार


चार दिन पहले छत्तीसगढ़ की एकमात्र मराठी पत्रिका ''इये मराठीचिये नगरीÓÓ की ओर से एक व्याख्यान का आयोजन था। इसके न्यौते में लिखा गया था कि नागपुर के वरिष्ठï पत्रकार एवं प्रखर वक्ता श्री माधव गोविंद वैद्य  ''मीडिया का बदलता परिदृश्य और राष्टï्रवादी पत्रकारिताÓÓ  पर वक्तव्य देंगे।
इस निमंत्रण को दूसरी बार पढऩे के पहले तक मैं सोच रहा था कि कार्यक्रम में जाऊं, लेकिन फिर समझ में आया कि यह संघ परिवार का  वक्तव्य रहने जा रहा है। किसी सुपरिचित विचारधारा को सुनने में क्या दिलचस्पी हो सकती है, इसलिए मैंने जाना रद्द कर दिया। वैसे भी किसी कार्यक्रम में जाने-आने और वहां गैर जरूरी रस्मों को झेलने में खासा वक्त लगता है  और हासिल उतना ही आता है जितना एक टेलीविजन समाचार बुलेटिन में काम का निकलता है।
मैंने अगले दिन खबरों में अपने अंदाज को सही पाया कि ये पत्रकार राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। उनकी वरिष्ठïता का एक जिक्र भी उसमें था कि वे संघ की राष्टï्रीय कार्यकारिणी के आमंत्रित सदस्य थे। 
जिस तरह हर विचारधारा को अपने अस्तित्व का हक है, दक्षिणपंथ या वामपंथ को भी यह हक है। इनको अपने समर्पित मुखपत्रों का भी हक है और हर बड़ा राजनीतिक दल या, वैचारिक संगठन, अपने बयान के रूप में पत्र-पत्रिका प्रकाशित भी करते हैं। दिल्ली में दो बरस पहले संघ के अखबार 'ऑर्गनाइजरÓ के प्रधान संपादक से मुझे घंटों बात करने का मौका भी मिला। कुछ और राजनीतिक दलों की पत्रिकाओं के 'पत्रकारÓ भी कभी-कभार मिलते हैं।
इनको मैं 'पत्रकारÓ इसलिए लिख रहा हूं कि जब मैं पत्रकारों की बात करता हूं तो इनको पक्षकार पाता हूं, पत्रकार नहीं। इनको पैरवीकार भी लिखा जा सकता है लेकिन इनको पत्रकार लिखने के पहले मेरा मन कचोटता है।
या तो इनके अखबार इनकी मैगजीन के साथ, इनके कॉलम के साथ इनके संगठन का जिक्र रहे, या फिर यह खुलासा रहे कि ये किसके प्रवक्ता हैं। इसके बिना उनकी बात को किस रौशनी में देखा या समझा जा सकता है?
यूं तो अखबारों की जिस तरह, तरह-तरह की विचारधारा और नीति हो सकती है, उसी तरह यह भी हो सकता है कि कोई नीति न होना भी एक नीति हो। छत्तीसगढ़ में पहले और पिछले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बार-बार कहा था कि इस राज्य की कोई संस्कृति नीति नहीं होगी। वर्तमान सरकार में संस्कृति नीति में मुख्यमंत्री के किसी दखल के बिना संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने एक टैंकर भगवा रंग लेकर सरकार की सारी संस्कृति नीति का भगवाकरण कर दिया। ऐसे ही अखबारों और पत्रकारों की अपनी नीतियां, विचारधाराएं और प्रतिबद्धता हो सकती है। इनके खुलासे से उनके पाठक या दर्शक उनकी बातों को सही संदर्भ में देख सकते हैं।
प्रतिबद्धता के साथ जो लोग पत्रकारिता करते हैं, उन्हें किस तरह कोई पत्रकार कह सकता है इसे लेकर मेरे मन में अकसर एक बड़ी असुविधा खड़ी होती है। यह असुविधा तब और बढ़ती है जब पत्रकार कहे जाने वाले या समझे जाने वाले ऐसे लोग किसी संगठन या सत्ता का सीधा हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि आई सर्जन या न्यूरो सर्जन की तरह एक विशेष तबका ऐसे लोगों के लिए बनना चाहिए जिन्हें प्रतिबद्ध पत्रकार कहा जाए या समर्पित पत्रकार कहा जाए।
ऐसे लोग अपनी सहूलियत से अपने को वामपंथी-पत्रकार, संघी-पत्रकार भी कह सकते हैं। लेकिन महज पत्रकार लिखने से इनका परिचय पूरा नहीं हो पाता। वैसे ही जैसे किसी टैक्सी का चालक ही जब मालक हो तो उसे मालक-चालक कहा जाता है। अखबार में भी संपादक जब मालिक हो या मालिक संपादक हो तो उसे भी मालक-चालक जैसा एक दर्जा अलग से मिलना चाहिए।
एक समय इस देश में जिंदा श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन में इसके सदस्यों के लिए यह शर्त थी सिर्फ पत्रकारिता से होने वाली आय हो। उस परिभाषा के तहत मालक-चालक तबके के लोग उसमें नहीं जा सकते थे। और शायद उस तबके को तब खुशी भी हुई होगी जब इस आंदोलन दम तोड़ दिया।
प्रतिबद्ध-पत्रकारों की बात जिनको समझ न आए उनको आपातकाल के संस्मरण पढऩे चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने उस समय प्रतिबद्ध न्यायपालिका की बात कही थी। जिसका मतलब था कि अदालतें और जज सरकार, मतलब सत्तारूढ़ दल के प्रति प्रतिबद्ध रहें। आज पाकिस्तान में न्यायपालिका का जो हाल है, वही हाल भारत में लोकतंत्र के इस स्तंभ का कांग्रेस पार्टी करना चाहती थी। उस दौर के अखबार उठाकर देखें तो ढेर-ढेर पत्रकार और मालक-चालक शादी में बिन बुलाई बेडि़नियों की तरह नाच रहे थे।
सेंसरशिप का डंडा जहां नहीं भी चल रहा था, वहां भी अखबार खुद होकर प्रतिबद्ध हो गए थे और विनोबा की गटरमाला की तरह रोज एक सौ आठ बार अनुशासन पर्व लिखकर प्रतिबद्धता दिखाते थे।
ऐसी प्रतिबद्धता पर किसी को पत्रकार कैसे माना जा सकता है? राजनीतिक, वैचारिक, आध्यात्मिक या सामाजिक प्रतिबद्धता जिनके लिखने और संपादन पर स्थायी रूप से हावी हो, उन लोगों को अपने-आपको पक्षकार-पत्रकार या एक्टिविस्ट जर्नलिस्ट या प्रतिबद्ध-पत्रकार जैसा एक लेबल लगा लेना चाहिए।
इसमें कोई बुराई इसलिए नहीं है कि बाजार में तिल का तेल भी है और अलसी का भी, बिनौले का भी है और सूरजमुखी का भी। इस तेल की शिनाख्त अगर उजागर हो तो वह ग्राहक के भले की बात रहती है।
अमरीका ने जब इराक पर हमला किया तो उसकी फौज के साथ जो पत्रकार गए उन्हें इम्बेडेड जर्नलिस्ट (जड़े हुए पत्रकार) कहा गया। जैसे अंगूठी में हीरा जड़ा जाता है और फिर वह वहीं बने रहता है, वैसे ही ये पत्रकार स्थायी रूप से अमरीकी सेना के साथ थे। चूंकि उन्हें दूसरी सेना के करीब जाने या रहने की गुंजाइश नहीं थी, इसलिए उन्हें अमरीकी सेना में जड़ा गया पत्रकार कहा गया। इससे उनके देखे और लिखे का खुलासा होता था कि वे किस तरफ थे।
भारत में भी मुझे पक्षकार-पत्रकार नाम का एक लेबल सही जान पड़ता है ताकि लोग पक्षपात करते हुए भी ईमानदार रह सकें। हर किसी को अपनी प्रतिबद्धता साफ रखनी चाहिए। वामपंथी होने में कोई बुराई नहीं है और न ही दक्षिण पंथी होने में। बुराई है अपने आप को वक्त जरूरत के मुताबिक गलत कतार में खड़ा करने में ताकि काउंटर तक कटोरा लिए तेजी से पहुंचें।
मैं यह भी नहीं कहता कि किसी का राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर ही लेबल पाना जरूरी है, कुछ और किस्म के सरोकार और पक्षपात भी दूसरी कतारें गढ़ सकते हैं। अतिवामपंथी संगठनों को देखें तो उनमें छोटे-छोटे गुटों का जन्म किसी के समर्थक, लेकिन किसी के विरोधी होने के आधार पर हो जाता है।
जैसे अमरीका है, अपनी जमीन पर अपने लोगों के बीच पूरी तरह लोकतांत्रिक, लेकिन अपनी सीमा से बाहर विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, हमलावर, तानाशाह। ऐसे ही कई मालिक मिलेंगे जो अपने नौकरों के शोषण पर फल-फूलकर बाहर मजदूर-अधिकारों के हिमायती हो जाएंगे। ऐसे लोगों के लिए भी कुछ लेबल ढूंढे जा सकते हैं।


-सुनील कुमार

रिश्ते में पूरी ईमानदारी चाहिए तो...




मेरे एक परिचित खासे उदास बैठे थे। उनके मन का बोझ कुछ हल्का कर सकूं इस इरादे से मैंने पूछा कि क्या बात हे, कोई परेशानी?
उनका कहना था परेशानी कुछ नहीं, बस कुछ मन ही खिन्न हे। अपने आप पर कोसते हुए उन्होंने कहा कि एक लड़के को पढऩे में उन्होंने खुद होकर मदद की, कॉलेज का खर्च उठाया, पढऩे को विदेश गया तो उसे स्कॉलरशिप तो मिली लेकिन बाकी कई तरह की मदद उन्होंने की। लौटकर आया तो बंगलौर में एक विदेशी कंपनी में काम करने लगा, लाखों रुपए महीने की कमाई लगा, लाखों रुपए महीने की कमाई है, लेकिन तबसे अब तक कई बार मुलाकात हो चुकी, कभी एक डॉटपेन तक लाकर देने की उसे नहीं सूझी। यहां तक भी बात ठीक थी लेकिन अब उन्हें कुछ लोगों ने आकर कहा कि वह उनके बारे में चर्चा छिडऩे पर कहता है कि दो नंबर का पैसा रहा होगा जो कुछ लोगों की मदद कर देते हैं या फिर टैक्स बचाने का कोई जरिया निकाल लिया होगा।
सुनकर मेरा मन भी टूट गया। दुनिया में ईमानदारी और इंसानियत से जब ऐसा बलात्कार देखता हूँ तो बाकी मासूम दिखती दुनिया के लिए भी कुछ करने की चाह पल भर को ठिठक जाती है। ऐसा ही नहीं कि उनकी बात से मैंने इंसानों का यह रंग पहली बार देखा। मन में कालिख वाले लोग खासी गिनती में हैं। मुझे जब दावतों में लोग, शाम का मेरा पसंदीदा रंग, काला पहने देखते हैं और उसके बारे में कुछ कहने या पूछते हैं तो मैं कहता हूँ कि डॉक्टर ने मुझे मेरे दिल के रंग के कपड़े पहनने की पर्ची लिखकर दी है।
यह बात आधी हकीकत आधा फसाना किस्म की रहती है। कभी मैं सामने या साथ खड़े किसी के बारे में सुनाने के लिए ऐसा कहता हूँ, तो कभी इनमें से किसी के बारे में मेरे मन की उस पल की सोच के मुताबिक कहता हूँ।
दूसरे की मदद करके या उसका साथ देकर, और अब उदास बैठे अपने उस परिचित की तकलीफ को हल्का करने के लिए मैंने उनको अपने कुछ अनुभव बताए। किस तरह कुछ दोस्तों और कुछ परिचितों की मदद के लिए उनकी जरूरत के वक्त मैंने अपने आप को झोंक दिया, फिर बरसों बाद कभी मेरी जरूरत पड़ी तो उनमें से कुछ काम आए कुछ ने मुंह मोड़ लिया। कुछ बिल्कुल ही नए और अनजान ऐसे लोग मदद करने, साथ देने आगे आए जिनको पहले कभी मेरी जरूरत पड़ी भी नहीं थी और आगे तुरंत कोई जरूरत सामने थी भी नहीं।
मेरा मन अधिक मलाल से इसलिए नहीं भरा रहता कि कुछ लोगों ने मेरी पूरी जिंदगी की भलमानसाहत के जवाब में धोखा दिया तो बहुत से और लोगों ने मेरे किसी उपकार के बिना मेरे लिए बहुत कुछ किया।
लेकिन उस पल की तकलीफ मेरी नहीं, मेरे परिचित की थी और इतनी जायज थी कि मुझे भी उससे बिना हैरानी वाली तकलीफ हुई थी। हैरानी इसलिए नहीं कि कई बार इंसान इसी तरह मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है, तख्ती लिए हुए- ''मैं ऐसा ही हूँ।ÓÓ
लेकिन मेरा मन इंसानियत पर से उठ जाए इसके पहले कुछ भले लोग भी आकर खड़े हो जाते हैं, तख्ती लिए हुए- ''मैं हूँ ना...ÓÓ।
अपने परिचित को मैंने अपनी तकलीफों में से कुछ एक गिनाईं, बिना कि उनके काम आते वक्त मैंने उनसे मोलभाव तो किया हुआ नहीं था कि इसके एवज में वे मेरे आड़े वक्त क्या करेंगे। मेरी बात खत्म होने तक उनका मन हल्का हुआ हो या न हुआ हो, मेरा मन इतना भारी हो गया कि मैंने दो बरसों में बीसवीं बार तय किया कि किसी की गमी को हल्का करने के लिए भी मैं अपने मातमी जख्म लेकर नहीं बैठूंगा। लेकिन मन को भी कुछ बातों की लत पड़ी रहती हे, आज फिर मैं उसी पुरानी टीस को लेकर बैठ गया।
इस थोड़ी-बहुत जिंदगी का सबक मुझे यह मिला है कि किसी महान विद्वान की इस बात पर अमल हो सके तो ही किसी के काम आना चाहिए- नेकी कर, दरिया में डाल।
मतलब यह कि कोई भी नेक काम करो तो उसे तुरंत भूल जाओ। एक दूसरी जुबान में ऐसी ही बात कही गई है- गुप्तदान महाकल्याण।
यहां दान का बहुत तंग मतलब धार्मिक दान या भिखारी को दान निकाल लेना गलत होगा।
नेकी उतनी ही करो, उसी के लिए करो, जिसके नाशुकरे होने जाने पर भी मलाल न हो। हो भी तो भी वह बंजारों सा कुछ दिन रहे और आगे बढ़ ले। मजबूत सीमेंट के इश्तहार की तरह पक्का मकान बनाकर बस न जाए मन में।
लेकिन इतना काबू जिसका मन पर हो जाए, वह तो वैसे ही अलौकिक सुख पाने लगेगा। धर्मालु लोगों की जुबान में वह ईश्वरीय आनंद पाने लगेगा।
मैंने अपने भीतर इस लगभग असंभव अलौकिक सुख को भी महसूस किया है और अपने शाम के कपड़ों के रंग वाले मन को भी। इनके बीच में शटल ट्रेन की तरह आते-जाते मैंने पाया है कि जब मन काला होता है तो मेरे आज और आने वाले कल, दोनों पर अंधेरा छा जाता है, केवल बीते हुए कल पर रौशनी रहता है, जख्मों पर, ऑपरेशन टेबिल के ऊपर से गिरती तेज रौशनी की तरह।
एक दिक्कत मुझे यह लगी अपने खुद के साथ कि कुछ प्रभावित, कुख्यात अहसान फरामोशों की जरूरत के वक्त उनके काम आते हुए मुझे लगते रहा कि वैसी मक्कारी शायद वे मेरे साथ न करें। लेकिन यह कुछ वैसी ही खुशफहमी थी जैसी एक खतरनाक औरत के साथ सोने की उत्तेजना में आतुर मर्द की रहती है कि एड्स उसे नहीं होगा। यह आत्मविश्वास, यह दुस्साहस अक्सर गलत साबित होता है। किसी के लिए जी-जान देने के पहले, अपनी सीमा से अधिक उसका भला करने के पहले यह जरूर सोच लेना चाहिए कि उस इंसान ने अपनी जिंदगी में अपने दोस्तों, अपने पे्रमी या प्रेमिकाओं, पति या पत्नी, भाई-बहनों, मां-बाप, अपने मालिक या नौकर, अपनी नौकरी या पेशे के साथ कितनी ईमानदारी या बेईमानी की है।
किसी संदिग्ध औरत या मर्द के साथ सोने के पहले यह तौल लेने की जरूरत रहती है कि उसे अपने किन जगहों पर, किन हालातों में, किस हालत में, कैसे लोगों के साथ, कितनी बार, देखा है? इनसे अपने तय करना चाहिए कि उसके साथ हमबिस्तर होना कितना सुरक्षित और सही होगा, कितना खतरनाक और गलत होगा।
ऐसे ही कुछ लोगों ने सदियों पहले एक टुकड़ा बात सही की है कि कुपात्र को दान देना पाप होता है। दाऊद इब्राहीम के यतीमखाने को दिया चंदा किस काम आएगा यह जो न समझे वह इंसानियत का नुकसान ही करेगा।
घूम-फिरकर मैं शुरू की बात पर आऊं तो किसी का अहसान करना मुझे इंसानियत की सबसे बड़ी खूबी लगती है और अहसनफरामोश होना सबसे बड़ी खामी। इन दो शब्दों को मैं आपसी इंसानी रिश्तों के दायरे से बाहर भी देखता हूँ। जो अपनी धरती के अहसान मानेगा, अपने मां-बाप के अहसान मानेगा, दोस्त दुनिया के अहसान मानेगा, अपने मालिक या नौकर का अहसान मानेगा, वह एक अच्छा इंसान होगा। धरती और दुनिया अगर बेहतर बनेंगे तो ऐसे ही भले इंसानों से बनेंगे भगवानों से नहीं। आज होता यह है कि इंसान हर बात के लिए ईश्वर का अहसानमंद होकर रह लेता है क्योंकि वह सस्ता पड़ते है, एक नारियल या चादर से ईश्वर के धरती के अहसानों को एक मानेंगे तो उनका चुकारा खासा महंगा पड़ता है।
मैंने अब धीरे-धीरे अपने दु:खों से किनारा करना शुरू कर लिया है। जो शिनाख्तशुदा अहसानफरामोश हैं उनके कटे पर मूतने के बजाय मैं कह देता हूँ कि आज सुबह से पानी ही नहीं पिया हे। इस पेशाब के जाने से कोई नुकसान नहीं होता लेकिन खाली टंकी में मलाल भर जाता तो पूरी जिंदगी में कई बार सिर उठाकर मुंह चिढ़ाता।
जिंदगी इतनी छोटी होता है मानो छोटी तनख्वाह वाले की छोब्ी बचत। और दुनिया में अहसानफरामोश शेयर बाजार की फर्जी कंपनियों की तरह भरे पड़े हैं। ऐसे में कहां इंसान के पास गुंजाइश हो सकती है कि वह फर्जी कंपनियों के शेयरों पर निवेश करे? जाने-पहचाने अहसानफरामोश के जले पर फूंकने से बेहतर है अनजान मरीज को खून देकर आ जाना। मन में अफसोस तो नहीं रहेगा।
इस सबके बीच एक बात पहले शब्द से लेकर अब तक मन में कौंध रही है और मैं डर भी रहा था कि अंत तक इसे भूल न जाऊं-
''रिश्ते में पूरी ईमानदारी चाहिए तो कुत्ता पाल लो।ÓÓ
-सुनील कुमार

फंदों के बीच कुछ बेबस, कुछ ईडियट



कल फिर बच्चन कुनबा किसी दरगाह पर था। जब इस कुनबे का जिक्र हो तो जाहिर है कि अमरसिंह तो साथ होंगे ही। इस बरस शायद यह पचीसवां ऐसा मौका रहा होगा जब इस कुनबे की धार्मिक यात्राएं टीवी समाचार बुलेटिनों का गला घोंटते वहां लदी हुई थीं। और गला घोंटने का यह काम बच्चन परिवार का खुद का किया हुआ नहीं है, यह फंदा समाचार चैनलों ने अपने दर्शकों की अक्ल के गले में डालकर उस अक्ल को टांग दिया है।
अपने शहर के इकलौते केबल ऑपेटर की मर्जी से मुझे जिन समाचार चैनलों को देखने की इजाजत है, उनमें इन दिनों मुझे बाजार और उद्योग का सीएनबीसी सबसे ईमानदार लगता है जो अपने नाम के मुताबिक काम करता है और जिस पर ज्योतिष नाम का पाखंड, फिल्मी गुपचुप या फिर जुर्म के विशेषांक देखने की बेबसी नहीं होती। इनके अलावा हंसी के पहले आ चुके कार्यक्रमों को दस-दस बार फिर से दिखाना, संगीत के हो चुके मुकाबिलों को फिर से दिखाना, मानो समाचार चैनलों की बैसाखी बन गया है। एक अखबार मानो चौबीस पेज में से बारह पेज, पेज थ्री निकालने लगे, फिल्मी गॉसिप और ग्लैमर की चकाचौंध के पन्ने।
मैंने आज सुबह कोशिश की कि इस हफ्ते का यह कॉलम लिखने के पहले समाचार चैनलों पर कुछ पा जाऊं, लेकिन एक पर अपराध चल रहे थे, एक पर फिल्म, एक पर सरकारी प्रचार फिल्म और एक पर एक महिला भविष्यवक्ता मूर्खों को उनका दिन बताते बैठी थी। उसकी बातें सुनकर लोगों का भविष्य अच्छा होगा या उसके उघड़े भरे-पूरे बदन को देखकर लोगों का वर्तमान अच्छा हो रहा होगा, इस बारे में मेरा सोचना साफ है।
जो कुरूप, वीभत्स, राक्षसों से लगते पुरुष ज्योतिषी भविष्य बताते हैं, उनकी बात सुनकर भविष्य कैसा भी हो, वर्तमान तो तबाह हो ही जाता है। ऐसे में खुले कपड़ों में जब कोई महिला ज्योतिषी सुबह से बन-ठनकर लोगों का वर्तमान ठीक करने बैठती है तो मुझे वह रूसी समाचार चैनल याद आता है जिसमें एक मादक युवती समाचार पढ़ते हुए हर समाचार के साथ एक-एक कपड़ा उतारते जाती है और दर्शक बंधे रह जाता है कि आज घटनाएं अधिक निकलेंगी या कपड़े!
भारत की ऐसी उदार महिला ज्योतिषी भी बारह (बारह ही होती हैं न?) राशियों में से एक-एक का दिन बताते हुए ऐसी कोई उदारता सोच सकती है, उससे बहुत से लोग रात देर तक जागने के बजाय सुबह जल्द उठना शुरू कर देंगे।
अखबार के धंधे में होने के कारण मैं सुखी हूँ कि जो बुलेटिन तीन-चौथाई से अधिक कूड़े से भरे हों, उनसे छपे हुए शब्दों को खतरा नहीं है। इसीलिए भारत में अखबारों का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है और लोग टीवी की खबरों से, दूरदर्शन, बीबीसी जैसे एक-दो जिम्मेदार चैनलों को छोड़कर, हिकारत जाहिर करने लगे हैं। जो ईडियट नहीं हैं, वे अब पहले के मुकाबिले अखबार अधिक पढऩे लगे हैं, यह शायद बिना प्रयास की प्रतिक्रिया है इस हिकारत को जाहिर करने के लिए।
मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के एक-दो समाचार चैनलों से मिलने वाली इक्का-दुक्का सूचनाओं की चाह न हो तो मैं पलभर में किसी कंपनी की डीटीएच सेवा ले लूं और केबल ऑपरेटर द्वारा नियंत्रित जिंदगी जीना बंद कर दूं। और अब घटिया भारतीय समाचार चैनलों का मानो विरोध करने के लिए मैं इस फेर में हूँ कि वह टीवी सर्विस लूं जिसमें कुछ समझदार टीवी चैनल साफ-सुथरे दिखें, और दिखें।
टेलीविजन चैनलों का व्यापार अपनी दर्शक संख्या साबित करने के लिए टीआरपी नाम का कोई पैमाना इस्तेमाल करता है। अखबारों की प्रसार संख्या और पाठक संख्या स्थापित करने के लिए भी ऐसे ही कुछ फर्जी पैमाने हैं जिनमें बेईमानी, रिश्वतखोरी देखते  अब मेरी जिंदगी गुजरने आ गई है। बाजार की दौड़ में जो अखबार एक-दूसरे का गला काटने को उतारू हैं, उनका भला करके प्रसार और पाठक तय करने वाली एजेंसियां अपना कैसा भला करती हैं उसे मीडिया के धंधे के गैर धंधेबाज लोग भी जानते हैं।
लेकिन इस खूनी मुकाबिले से परे भी अखबारों के पाठक ऐसे हैं जो अच्छे और बुरे में फर्क करना जानते हैं। ये लोग आज की बिपाशा के मुकाबिले प्रेमचंद की निर्मला की अहमियत को जानते हैं और जो टीवी के मुकाबिले अखबारों का महत्व समझते हैं। अखबारों के बीच भी अच्छे और बुरे का फर्क करने वाले लोग हैं जिनकी वजह से एक अच्छा अखबार जिंदा भी रह सकता है।
अच्छे और बुरे अखबार चूंकि बाजार में केबल ऑपरेटर के एकाधिकार के बिना भी बंट जाते हैं इसलिए बाजार में खड़े भी रह जाते हैं। गलाकाट मुकाबिले में एक बाहुबली, दबंग, अखबार आस-पास पहुंचते अखबार को कुचलने की कोशिश कर सकता है, लेकिन उसे खत्म नहीं कर सकता है। टेलीविजन केबल पर समाचार चैनल (शायद बाकी भी) जिस तरह ऊपर-नीचे होते हैं, जिस तरह शुरू और बंद होते हैं, वह देखते ही बनता है।
मेरी बात टीवी और प्रिंट, केबल और डीटीएच, अच्छे ओर बुरे के बीच भटक रही है, लेकिन इन सबके बीच कोई सीधे रास्ते नहीं हैं, बिना पगडंडी वाला खुला मैदान ही है जिस पर टहलते हुए आपको पता नहीं होता कि आप किस तरफ मुड़े और कितना आगे बढ़े। इस चर्चा को हर कुछ हफ्तों में छेडऩे का मेरा मकसद यह है कि लोग अच्छे और बुरे में फर्क करना सीखें। उन्हें जो अच्छा लगता हो उसे भी वे लोगों को बताएं और जो बुरा लगता हो उसे भी। जब तक दुनिया में फलों के रस के फायदे लोगों की समझ नहीं आएंगे, लोग पीने की खराब चीजों से बंधे भी रहेंगे। अच्छा अखबार, अच्छी पत्रिका, अच्छे चैनल को जिंदा रखने के लिए यह जरूरी है कि आप उस बारे में औरों को बताएं। इसी तरह जो खराब लगता है उस बारे में भी लोगों को बताएं। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए कि बबूल के बारे में लोगों को सावधान न करते चलें तो आम के लिए कहीं जगह ही न बचे।
केबलों के बीच, चैनलों के बीच, अखबारों के बीच अच्छों को छांटना शुरू नहीं करेंगे तो मीडिया की हालत तो आज ही देश की दबंग, बाहुबली होती संसद सरीखी हो चली है। यह क्या हाल हो गया है टीवी का कि एक भविष्यवक्ता एक मादक, उघड़े वर्तमान के सहारे लोगों को बांधकर रख रही है। वैसे पाठक अखबारों में भी ऐसी डोरियों की शिनाख्त करें जो फंदे की शक्ल में ईडियटों को टांगने के लिए टंगी हैं और उनकी गिनती का आंकड़ा अखबार की सफलता का पैमाना भी है।
-सुनील कुमार

हमारे हजारों हिस्से के किसी एक छोटे हिस्से के अंधेरे की कहानी




सुबह-सुबह सेटेलाइट रेडियो पर बीबीसी की हिंदी में खबरें आ रही हैं। इस वक्त श्रोताओं के पूछे सवालों के जवाब दिए जा रहे हैं। पहली ही जानकारी थी कि दो लोगों के बीच डीएनए कुल दशमलव एक फीसदी (एक फीसदी का दसवां हिस्सा) अलग होता है बाकी पूरा एक सा होता है। मतलब यह कि वैज्ञानिक स्थापित कर चुके हैं कि दुनिया के लोग निन्यानवे दशमलव नौ फीसदी (99.9त्न) एक से हैं और सारा फर्क कुल 0.1 त्न है।
अब हैरानी यह है कि गोरे-काले, लंबे-नाटे, हिंदू-मुस्लिम, शिया-सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेंट, इनके बीच जहां कहीं तना-तनी चलती है, वह शरीर के हजारों हिस्से के फर्क को लेकर है। अगर कोलकाता में इन दिनों एक हिंदू लड़की से मुसलमान लड़के की शादी के बाद लड़के की संदिग्ध मौत की सीबीआई जांच चल रही हे तो वह पूरी की पूरी एक हजारवें हिस्से के फर्क से उपजी है। नौ सौ निन्यानवे हिस्सा समानता काम नहीं आई और एक हिस्सा शायद एक जान ले बैठा।
ईश्वर या कुदरत, जिस किसी ने इंसानी नस्ल बनाई है, उसने सोने के इस गहने में यह कैसी हजारवां हिस्सा खोट डाली है कि सारा सुनहलापन खो गया और खोट ही खोट दिखने लगी? यह कौन सा हजारवां हिस्सा हे जो लोगों के बीच लहू बिखरा रहा है जो 99.9त्न एक सा है। शायद साधारण जांच इनके बीच का फर्क भी नहीं बता सकें, लेकिन एक खून कब दूसरे खून का प्यासा हो जाता है यह देखना हैरानी खड़ी करता है।
दूसरी बात अभी मुझे लग रही है कि नारियल खाने के पहले हमें उसके लगभग तीन चौथाई हिस्से को निकाल फेंकना होता है तब जाकर जरा सा हिस्सा काम आता हे। सीताफल खाएं तो छिलका और बीज मिलकर तीन-चौथाई हो जाते हैं। इंसान खुद अपने बदन का कुछ हिस्सा नाखूनों और बालों की शक्ल में लगातार निकाल फेंकता है। इंसान क्या, बदन ही इसे निकाल फेंकता है। लेकिन फिर भी यह हजारवां हिस्सा खीरे की कडूवाहट की तरह नहीं निकल पा रहा। कितना भला होता कि इंसान के सिर के बालों के साथ-साथ उसके दिमाग का यह फर्क का जहर भी निकल जाता? यह सिर ऐसी जमीन सा लगता है जिसके भीतर दिमाग नाम की कंद जमी हुई है, बालों की फसल को पैदा किए जा रही है लेकिन हजारों हिससे वाला यह जहर बिल्कुल भी बाहर नहीं जाने दे रही।
यह कैसा तिकड़मी, शातिर और छुआ-छूत मानने वाला हजारवां हिस्सा है जो बाकी समानताओं पर लात धरकर राज करता है और बाकी नौ सौ निन्यानवे समानताओं को आपस में लड़वाता है! और यह पूरा हजारवां हिस्सा भी नफरत, तिकड़म में नहीं लगे रहता क्योंकि इसी हजारवें हिस्से का फर्क तो रूप-रंग, कद-काठी, चेहरे-मोहरे का भी फर्क करता है, मतलब यह कि इंसान के भीतर-बाहर की बहुत सी ऐसी मौन बातें हैं जो उसके अपने भीतर कोई नफरत पैदा नहीं करतीं, हजारवें हिस्से में से इन तमाम मौन विविधताओं के घटा देने के बाद हजारवें का और जो छोटा सा हिस्सा बचता होगा, उसी के भीतर कहीं एक दुष्टï छिपा है!!
मैं जब इस फर्क की कल्पना कर रहा हूँ, और इसे लिख पाना मेरे लिए आसान नहीं है, मैं कल्पना के हजारों हिस्से से भी कम को बयां कर पा रहा हूँ। हजारों हिस्से का एक हिस्सा उत्तर भारत के कुछ इलाकों में लगातार पे्रमी जोड़ों की हत्या कर रहा है क्योंकि वे अलग-अलग जातियों के हैं। हर बरस ऐसी कुछ दर्जन हत्याएं होती हैं। मध्यप्रदेश कुछ करीब है इसलिए वहां की खबरों पर कुछ अधिक नजर पड़ती है, वहां आए दिन दबंग दलितों पर ज्यादती करते दिखते हैं। ये दबंग अनिवार्य रूप से ऊंची समझी जाने वाली जातियों के होते हैं क्योंकि उनकी मौजूदगी में दलित तो दबंग हो भी नहीं सकता।
गुजरात में नरेन्द्र मोदी के भीतर के हजारों हिस्से के किसी छोटे हिस्से ने ऐसी हजारों जानें ले लीं जो 999 मामलों में नरेन्द्र मोदी जैसी ही दीं। वह फर्क सिर चढ़कर हिंसा करवाने लगा और अपने ही बदन से और बदन काट डाले गए।
गुजरात के मेरे कुछ मित्र मुझे बार-बार कहते हैं कि मुझे अब इस मुद्दे पर लिखना बंद कर देना चाहिए क्योंकि गुजरात अब उन जख्मों से उबर गया है। मेरे ये मित्र वहां के मोदी वाली हजारवें हिस्से जैसे हैं जिन्होंने सत्ता की हिंसा में कुछ खोया नहीं है। सत्ता के कड़े बूटों तले, कहीं गहराइ्र में सुलगते जख्मों की गर्मी नहीं आती, लेकिन उससे वह सुलगना खत्म तो नहीं होता। जब तक हिंसा करने वाले एक हजारवें हिस्से को सजा न मिले, तब तक वह सत्ता में हो या सत्ता के बाहर हो, समाज तो सौ फीसदी असुरक्षित रहेगा।
यह कैसा हजारवां हिस्सा हे जो दलितों को अछूत मानता है? जिस हजारवें हिस्से को साधारण आंखें देख भी नहीं पातीं, उसी हिस्से से पैदा रूप-रंग, कद-काठी का फर्क ऐसा सिर चढ़कर बोलता है कि सारे सामाजिक संबंधों को वही तय करने लगता है, सामाजिक हिंसा लगभग सौ फीसदी इसी पर टिक जाती है।
इस हजारों हिस्से की शिनाख्त और उसकी मरम्मत जरूरी है। मरम्मत शब्द का इस्तेमाल दो किस्म का होता है, एक तो पीटना, दूसरा सुधारना। इस हजारवें हिस्से को पीट-पीटकर सुधारने की जरूरत है। इसे खत्म नहीं करना है क्योंकि इंसानों के बीच यह हजारवें हिस्से का फर्क भी नहीं रह जाएगा तो फिर समाज तो बाल्टी के कारखाने के गोदाम सा हो जाएगा लेकिन इस हजारवें हिस्से से जहर को उसी तरह निकाल फेंकने की जरूरत है जिस तरह खीरा किनारे से काटकर उसके टुकड़ों को रगड़कर कड़वाहट को निकाल दिया जाता है और तब खीरा तरावट देने वाला हो जाता है।
और इस हजारवें हिस्से की फितरत देखनी हो तो दो अलग-अलग बिरादरियों तक जाने की भी जरूरत नहीं है। एक घर के भीतर भी औरत और मर्द के रिश्तों को देखें तो समझ आ जाता है कि मर्द के इस हजारवें हिस्से के भीतर एक दबंग बैठा है और दूसरी तरफ औरत के इस हजारवें हिस्से के भीतर एक दबा-कुचला सहमा सा बैठा है। इन दिनों चारों तरफ दीवाली के दियों की रौशनी बिखरी है, एक कोई किरण इस हजारों हिस्से के उस किसी काले-अंधेरे हिस्से तक जाकर उसे आईना दिखा पाएंगी कि उसका जहर किस तरह पूरे खीरे को खराब किए जा रहा है?

-सुनील कुमार

किस्सा लायकों का और नालायकों का




अपने आस-पास देखकर कभी-कभी हैरान होता हूँ कि लोग बिना काम किए या कम काम करके किस तरह रह लेते हैं। बदनाम हो चुकी सरकारी नौकरी के लिए तो यह आम बात मानी जाती है कि सुरक्षित कुर्सी पर पहुंच जाने के बाद काफी लोग काम नहीं करते, लेकिन निजी काम में, अपनी निजी जिंदगी में भी लोग दिखते हैं जो बिना काम किए, या पर्याप्त काम किए बिना भी चैन से रह लेते हैं।
हो सकता है कि मुझे काम करने की लत कुछ अधिक बुरी हो और छुट्टिïयों की आदत जरा भी न हो, लेकिन अधिक काम करना कम काम करने से मुझे फिर भी बेहतर लगता है। मैं यह भी पाता हूँ कि जरूरत से अधिक काम करने वाले उतने बीमार नहीं होते जितने कि जरूरत से कम काम करने वाले होते हैं। शायद इंसान का तन-मन कुदरत ने कड़ी मेहनत के मुताबिक ढाला है और जब लोग बहुत आराम मतलब जिंदगी गुजारते हैं तो वे तरह-तरह की बीमारियां पा लेते हैं क्योंकि मिहनत से ताकतवर होने वाला शरीर का बचाव तंत्र कमजोर हो जाता है।
लेकिन काम न करने के अलग-अलग कई तरह के दर्जों को मैं परले दर्जे का संक्रामक पाता हूँ। आरामतलब, आलसी, कामचोर, निकम्मा या निठल्ला, जितने किस्म के भी विशेषण इस्तेमाल होते हैं, वे बेहद असर करने वाले होते हैं। जिस तरह सर्दी, आंखों का कंजक्टीवाइटिस या एचआईवी फैलते हैं, उसी तरह ये तमाम विशेषण भी आस-पास तेजी से असर करते हैं। किसी को कमरतोड़ मेहनत करते देख खुद भी मेहनत करने की राह सौ में से एक को ही सूझेगी, लेकिन किसी नालायक, निकम्मे या कामचोर के आस-पास के लोगों में से शायद आधे से अधिक लोग उसके साथ गप्प मारने, क्रिकेट या सीरियल देखने या भजिए बनने की तरह तकते बैठ जाएंगे।
अधिक मेहनत और अधिक जिम्मेदारी से काम करने वाले का असर कम होता है लेकिन ऐसा काम करने का कोई सोचे तो उसके इरादे और मकसद को पटरी से उतारने का काम कोई आसानी से कर लेता है। ऐसा करते हुए कम मेहनत का आदी यह भी नहीं सोचता कि वह किसी की जिंदगी को यह किस तरफ मोड़े दे रहा है।
जिम्मेदारी से काम न करने के शौकीन या आदी लोगों का यह असर देखते ही बनता है। मेरे मन में ये तमाम बातें बरसों से एक अजीब सी घुटन अपने आस-पास के लिए पैदा करते आई हैं, इस बीच अमरीका में बसे एक सफल छत्तीसगढ़ी, वेंकटेश शुक्ला को दो दिन पहले इंटरव्यू किया तो उन्हें सफलता के लिए टाईम मैनेजमेंट की जैसी अहमियत बताई उसे सुनकर मुझे खुद पर शर्म आने लगी। सुबह से देर रात तक काम की आदत के बीच रोज एक-दो घंटे तो मैं भी ऐसे बरबाद कर देता हूँ जिनका कोई फायदा, कोई इस्तेमाल नहीं होता। कभी आस-पास के किसी करीबी के आग्रह पर वक्त ऐसे बरबाद कर बैठता हूँ कि जिसका कोई फायदा न उसे होता न मुझे होता। न ही वक्त की ऐसी बरबादी के दौरान मुझे कोई मजा ही आता क्योंकि अपनी मारा-मारी के बीच किसी और के कहे मैं कहीं बैठ जाता हूँ और खासे समय बाद खाली हाथ उठता हूँ।
आज भी मुझे आस-पास कुछ ऐसे लोग दिखते हैं, जो वक्त का पल-पल इस्तेमाल भी करते हैं और आराम या मनोरंजन के लिए रखे गए वक्त का पल-पल मजा भी लेते हैं। जो लोग मेहनत से काम नहीं करते, वो लोग आराम के वक्त का मजा भी नहीं ले पाते।
लेकिन आस-पास देखकर तकलीफ पाने के बीच मैं यह बात भूलने लग जाता हूँ कि अधिक लोग औसत के नीचे की खूबियों वाले रहते हैं और कम ही लोग उन पैमानों पर खरे उतरते हैं जिसकी सीढिय़ों पर ऊपर जाने के लिए मैं लगातार लगे रहता हूँ। लेकिन अलग-अलग देश-प्रदेश, शहर-तबके को देखता हूँ तो लगता है कि खूबियों को पाने के लिए मेहनत और समय के बेहतर इस्तेमाल से ही लोग अपने लिए सामान्य रूप से संभव ऊंचाईयों से ऊपर जाकर असामान्य सफलताएं पा सकते हैं।
निराश मैं उस वक्त होता हूँ जब अधिकांश मां-बाप, परिचित-दोस्त किसी का वक्त खराब करने में तो खासे लापरवाह रहते हैं, लेकिन बेहतरी का रास्ता सुझाने के लिए अपनी जिम्मेदारी के वक्त, बेफिक्र रहकर टीवी देखते भजिया खाने में व्यस्त और मस्त रहते हैं।
एचआईवी जैसे संक्रामक रोग से बचने के लिए तो दुनिया में सावधानियों की बात खूब फैलाई जाती है लेकिन निकम्मेपन और कामचोर के संक्रमण से बचने के चौकन्नेपन की तरफ से लोग पूरी तरह बेपरवाह और बेफिक्र रहते हैं। सफल समाज और असफल समाज के बीच मुझे एक बड़ा फर्क दिखाई पड़ता है लोगों के जीने के अंदाज का। जिन बिरादरियों में नौजवान पीढ़ी रोज घंटों पान ठेलों पर, चाय ठेलों पर दिखती है, कैरम खेलते या सीढी पर लूडो खेलते दिखती है, रोजाना चबूतरों पर बैठे गप-शप और चाट-कचौरी में शाम गुजारती है, वह बिरादरी कहां से आगे बढ़ेगी? आज हाल यह है कि ऐसे गैजरूरी, जंग लगाने वाले कामों में उम्र गुजारने पर आमादा पीढ़ी से सरकार भी खुश है कि झंडा-बैनर लेकर उसकी देहरी पर धरना देने के बजाय यह पीढ़ी साल में सौ से कम दिन, रोज दो घंटे से कम कॉलेज में रहे और बाकी वक्त बरबाद करती रहे। कम से कम अगले चुनाव तक। लेकिन क्या निकम्मों-निठल्लों को आस-पास के सफल-मेहनतकश बिल्कुल ही नहीं दिखते?
-सुनील कुमार

सोने का अंडा देने वाली मुर्गी के खिलाफ कारोबार की कहानी




राजकपूर पर उनकी बेटी की लिखी या तैयार की गई किताब बहुत कम दाम पर बाजार में लाई गई है। बेटी का तर्क है कि पिता पर किताब को अधिक से अधिक लोग ले सकें इसलिए ऐसा किया गया। मैं इस मौके पर कपूर खानदान पर टीवी समाचार बुलेटिनों के बिछ जाने की चर्चा में जगह खराब करना नहीं चाहता, किताबों के बारे में बात करना चाहता हूँ।
किताबों के दाम ऐसे हैं कि आम लोग किताबें खरीदने की सोच भी नहीं सकते। अभी हिन्दी का एक उपन्यास लेने को जी किया तो ढाई सौ रुपए का था। किसी से लेकर पढ़ लिया क्योंकि एक जीवन में एक उपन्यास को एक बार से अधिक पढऩे का काम भी क्या पडऩा है? दाम इतना कम भी नहीं था कि उसे खरीदकर, पढ़कर औरों को दे देता।
यह मेरे लिखने का खासा पुराना मुद्दा है। एक किताब की टाइपिंग, प्रूफ रीडिंग, छपाई और बाइंडिंग मिलकर अगर हजार प्रतियों की लागत पचास रुपए प्रति कॉपी आती है तो उसे प्रकाशक बाजार में ढाई-तीन सौ रुपए में लाता है। लेखक का दस फीसदी की प्रचलित रायल्टी के मुताबिक वह सो प्रतियां दे देता है और उम्मीद करता है कि लेखक उस किताब पर गोष्ठिïयां करवाएगा, उसकी समीक्षा छपवाएगा। प्रकाशक सरकारी या संस्थागत खरीदी के अपने बंधे5बंधाए कारोबार के तहत किताब की प्रतियां खपा देता है और लिखित-अलिखित कमीशन देने के बाद भी वह खासी कमाई कर लेता है।
तीन सौ की किताब में लिखित अलिखित कमीशन सौ रुपए, लेखक की रॉयल्टी और छपाई की लागत सौ रुपए और प्रकाशक की कमाई सौ रुपए। शायद ऐसा ही हिसाब बैठता होगा। मुझे इन सबकी कमाई के अनुपात से शिकायत नहीं है सिवाय इसके कि इससे पाठक किताबों से दूर भाग रहा है।
किताब का दाम आज के प्रचलित बाजार से आधा कर दिया जाए तो संभावित खरीददार दुगुने नहीं, चार गुना हो जाएंगे। खरीदने की ताकत का पिरामिड कुछ ऐसे ही अनुपात में बढ़ता होगा। लेकिन प्रकाशक किताब के महंगे लाइबे्ररी संस्करण छपवाकर पहले से पहचाने गए खरीददारों के बीच उसे खपाकर मानो चैन की नींद सोता है। नए खरीददार तबके की तलाश में वह कहां धूप-बारिश में भटकेगा?
इसलिए किताबों का बाजार सिमटते चल रहा है। लोगों के पास मनोरंजन के बहुत से और जरिए हो गए हैं जो अधिक लुभावने और संस्ते भी हैं। इनसे दिमाग पर जोर भी कम पड़ता है और आस-पास के दायरे में उस पर बात करने वाले भी अधिक मिलते हैं।
लेकिन प्रकाशन व्यवसाय ने धीरे-धीरे ऐसे हालात पैदा हो जाने दिए हैं या पैदा कर दिए कि किताबों के खरीददार एक सम्पन्न, शिक्षित, कुलीन तबको के लोग ही रह जाएं। सरकारी या संस्थागत खरीदी पर टिक गया किताब-कारोबार लेखक और पाठक, दोनों का नुकसान कर रहा है और मेरा मानना है कि खुद का भी। आबादी में जब किताबों के खरीददारों का अनुपात घटता चला जाए ओर उस पर किसी को फिक्र न हो, तो मैं इसे व्यापार के रूप में भी घाटे का काम मानता हूँ। ग्राहकों का आधार छोटा करते चलने से उस पर बहुत बड़ी इमारत तो कभी भी खड़ी नहीं हो सकती।
हिंदी साहित्य में किताबों का जो आम आकार है, उसमें दस पैसे प्रति पेज से अधिक की लागत नहीं आती। उसे एक रुपए प्रति पेज बेचने का क्या तुक है? साहित्यकारों में से कुछ को मैंने समझाने की कोशिश की कि वे प्रकाशक पर दबाव क्यों नहीं डालते कि उनकी किताबों के सिर्फ पेपर-बैक छापे जाएं, सस्ते कागज पर, ताकि उन्हें अधिक से अधिक लोग पढ़ें। लेखकों का कहना था कि प्रकाशन व्यवसाय पर उनका बस नहीं चलता।
मैंने उनसे कहा कि हम खुद अपनी किताबें छापने जा रहे हैं और इसमें और लेखकों की कुछ किताबें भी छापी जा सकती हैं तो उनका कहना था कि हमारा बाजार का नेटवर्क सीमित रहेगा ओर पुस्तक-प्रकाशक पूरे देश में किताब बेचने की ताकत रखता है। इस बात पर मेरे पास कहने को सचमुच कुछ नहीं था।
देश की अलग-अलग भाषाओं में लेखकों ने सस्ती किताबों के कुछ प्रयोग शायद किए होंगे। कुछ प्रकाशकों ने भी सस्ती किताबें छापी हैं, लेकिन कम से कम हिंदी पाठक के लिए बात कुछ बनी नहीं है। मैं हिंदी के लेखक के भूखों मरकर शहादत देने की वकालत नहीं कर रहा। मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि खरीददार और पाठक बढऩे से लेखक का भला होगा। आज उसके लिए पारखी, मोटे तौर पर सिर्फ प्रकाशक रह गया है। कल अगर पाठक दस गुना हो जाएंगे तो लेखक के लिए उत्कृष्टïता की चुनौती भी बनी रहेगी और संभावनाएं भी अधिक रहेंगी। हो सकता है कि बहुत से लेखक, प्रकाशक के मौजूदा तंग दायरों वाले इंतजाम में अपने को अधिक सुरक्षित पाते हों, लेकिन जो लेखक आगे बढऩा चाहते हैं उनको प्रकाशक की बारी-बारी रफ्तार से आगे भी निकलना होगा, उसकी उंगली छोड़कर।
देश और दुनिया के बहुत से हिस्सों में लेखक अपनी किताबें बेचते घूमते भी हैं। हिंदी में ीाी ऐसा हो तो कोई बुराई नहीं है। ऐसी दस-बीस फेरियों में ही उन्हें समझ आ जाएगा कि पढऩे में दिलचस्पी रखने वालों के लिए किताबें खूब महंगी हैं और जो आसानी से उन्हें खरीद सकते हैं, उनके पास किताबों से अधिक लुभावने बहुत से विकल्प हैं।
ग्राहक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह का हो सकता है रोज एक किताब खरीदकर, लेकिन उसे किताबों के कारोबारी एक बार मैं ही हलाल करने के फेर में रहते हैं। एक इंसान या दफ्तर की अलमारी में सज जाने वाली महंगी साजिल्द किताब के बजाय सस्ती पेपर बैक किताब बेहतर होगी, उसे बिना दर्द और बिना आशंका लोग दूसरों को पढऩे भी दे सकेंगे कि वापिस न भी आई तो ढाई-तीन सौ की चपत नहीं पड़ेगी।

बड़ा खतरा यह कि खतरा ही नहीं लगता




पिछले दो दिनों में दो मामले सामने आए। दिल्ली के कनॉट प्लेस इलाके में दस बरस पहले पुलिस अफसरों ने दो बेकसूरों को आतंकवादी बताकर रूबरू मार डाला था और फिर फोरेंसिक एक्सपर्ट ने भी झूठी रिपोर्ट देकर पुलिस को बचाया था। दस अफसरों को इन हत्याओं के लिए अदालत ने कसूरवार करार दिया है और अगले हफ्ते इनकी सजा तय होगी।
दूसरा मामला कोलकाता का है जहां एक मुसलमान लड़का एक हिंदू उद्योगपति की बेटी से शादी करने के कारण दबाव झेल रहा था। उद्योगपति की ताकत के कारण उसे प्रताडि़त किया जा रहा था और जब उसकी लाश पड़ी मिली तो पुलिस ने आनन-फानन इसे आत्महत्या करार दे दिया।
इस मामले में अदालत की लताड़ के बाद प. बंगाल की वाममोर्चा सरकार को लगा कि उसके अफसरों से गलती हो गई। सरकार ने पुलिस कमिश्नर सहित कुछ और आला अफसरों का कोलकाता से तबादला कर दिया।
दो और घटनाएं छत्तीसगढ़ की हैं। अभी-अभी एक सरकारी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री और मंत्रियों की मौजूदगी में एक बड़ा अफसर विभाग की उपलब्धियों को इतने खुलासे से इतनी देर तक बखान करता रहा कि बाद में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के कहने को कुछ रह नहीं गया। लेकिन जिन लोगों से यह हक छिना, उनको भी इस स्थिति में कुछ अटपटा नहीं लगा।
आखिरी बात, जिससे आज इस मुद्दे पर लिखना तय किया, आज सुबह के एक अखबार में छपा है। छत्तीसगढ़ से दक्षिण कोरिया प्रशिक्षण पाने गए एक दल ने लौटकर कहा कि वे वहां अफसरों को मिली आजादी देखकर अभिभूत हो गए। जाहिर है कि इस टीम में अफसर ही रहे होंगे। छत्तीसगढ़ के दोनों प्रमुख दल आधा दर्जन आईएएस अफसरों के यह सोचते लौटने को देख सहम जाएंगे। बारी-बारी से दोनों दलों के लोग सरकार पर यह तोहमत तो लगाते ही रहते हैं कि उस पर अफसर शाही हावी है और फिर यहां के अफसर कोरिया का गुणगान करते लौटें कि वहां अफसरों को बहुत अधिक आजादी हे, तो इस पर नेताओं और पार्टियों के कान खड़े होने चाहिए।
लेकिन गले तक मालाओं के आने-जाने से घिसे हुए कानों पर जूं रेंगने का अहसास नेताओं को नहीं हो पाता। कान वे संवेदनशीलता खो न चुके होते तो नेताओं को दिखता कि अफसर कहां-कहां उनका हक छीन रहे हैं, वाहवाही पाने के कौन से मौके पर माला पहन तस्वीर खिंचाने में मंत्री को पीछे धकेल अफसर आगे हो जा रहे हैं।
दिल्ली में एक काउंटर में बेकसूरों का कत्ल, कोलकाता में बड़े उद्योगपति की मर्जी पर नाचते बड़े अफसर, छत्तीसगढ़ में एक तरफ वाहवाही लूटते अफसर तो दूसरी तरफ और अधिक वाहवाही की चाह रखने वाले अफसर।
अफसरशाही अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराकर, अब तक न मिले अधिकारों पर लार टपकाते खड़े हैं। इनकी आखिरी मंजिल वह होगी जाह ंमंत्री सचिव को सर-सर कहते हुए खड़ा होगा। आज भी बहुत से कमजोर मंत्री ऐसा करते हैं और उनको ऐसा करने से रोकने वाला अपुसर एक आध ही कोई होगा।
लोकतंत्र एक लचीली व्यवस्था है। इसमें जब-जब राजनीतिक नेतृत्व का जोर आ जाता है, तब-तब अफसरशाही हावी हो जाती हे। चाहे वह काम गलत रहा हो, प्रधानमंत्री के रूप में जब एक भरी पे्रस कांफे्रंस में राजीव गांधी ने विदेश सचिव को हटाने की बात कही थी, तो बाकी नौकरशाही समझ गई थी कि अब उनका राज नहीं चलेगा, उन्हें काम करना पड़ेगा। अविभाजित मध्यप्रदेश के दिनों में मिट्टïीतेल की कालाबाजारी को लेकर मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रायपुर की आमसभा में संभागीय कमिश्नर को हटाने की घोषणा की थी।
अफसरों को प्रताडि़त करना ठीक नहीं लेकिन सरकार की उपलब्धियों पर सार्वजनिक वाहवाही पाने के मौकों पर अफसरों का अवैध कब्जा ठीक नहीं। जनता और विपक्ष की गालियां तो सत्तारूढ़ नेता ही खाते हैं, इसलिए वाहवाही के मौके भी उन्हीं को मिलने चाहिए। लेकिन लोकतंत्र की यह व्यवस्था तब गड़बड़ाती है जब नेता अपने काम को सीखने में और उस पर मेहनत करने में भरोसे के बजाय महज राजनीति करते रह जाते हैं या इन्हीं अफसरों के सामने नंगे होकर, भागीदारी में कमाई करने लगते हैं। भ्रष्टïाचार में हम बिस्तर लोगों में कौन किस पर हावी होता है इस पर क्या कहा जा सकता है।
मंत्री तो औसतन कुछ बरस के लिए ही आते और चले जाते हैं, अफसर पूरी नौकरी सरकार में रहते हैं। फिर मंत्रियों को उनके अनुभव और जानकारी के मुताबिक तो विभाग मिलते नहीं, कितनी ताकत उस मंत्री की है उस हिसाब से कमाई वाला विभाग ही उसे मिलता है। ऐसे में अधिकांश मंत्री काफी मामलों में अपने अफसरों की जुबान बोलने लगते हैं। नीतियां बनाने का अपना काम भी छोड़कर वे अफसरों की बताई नीतियों पर अंगूठा लगाने को उतारू दिखते हैं।
कुछ मंत्री तो अफसरों के बताए तरीके से राजनीतिक व्यवहार भी करना शुरू कर देते हैं राजनीतिक-लोकतांत्रिक जरूरतों को समझना छोड़कर।
बंदूकबाज पुलिसियों से लेकर बिना वर्दी वाले नौकरशाहों तक, लोकतंत्र पर एक अलोकतांत्रिक बोझ बुनकर ये बैठ गए हैं। जिनको लोकतंत्र में पानी की तरह बनकर, बिना कोई स्वाद जोड़े, घुल जाना था, वे लोग इमली, मिर्च, नमक या शक्कर जैसे अपने स्वाद जोड़ रहे हैं।
लेकिन बड़ा खतरा ये है कि नेताओं को ये खतरा भी अब नहीं लगता।
-सुनील कुमार

कानून हाथ में लें...


कुछ समय से हम अपने अखबार में जन जागरण अभियान के तरह लोगों को कानून अपने हाथ में लेने के लिए उकसा रहे हैं। एक विज्ञापन अभियान हम डिजाइन करते हैं जिसमें सामाजिक जागरूकता के मुद्दों के लिए हम लोगों को सोचने पर मजबूर करने वाली बात उठाते हैं। जब ट्रकों पर रोक का वक्त होता है और भ्रष्टï पुलिस रिश्वत लेकर ट्रकों को घूसने देती है जिनसे कुचलकर लोग मरते हैं, तो हम लोगों को उकसाते हैं कि वे कानून अपने हाथ में लें। प्रतिबंधित समय में घुसी ट्रकों को घेरकर रोकें और फिर प्रशासन से शिकायत करें।
लेकिन बोलचाल और फिल्मों की जुबान के चलते कानून हाथ में लेने का एक खास किस्म का मतलब स्थापित हो चुका है कि कानून को तोडऩे के लिए हाथ में लेना। जबकि कानून को हाथ में लेना उस वक्त भी ठीक या जरूरी हो जाता है जब कोई और उसे कुचल रहा हो। लोग जब कानून को तोड़ रहे हैं, कुचल रहे हैं तो उसे आप अपने हाथ में लिए बिना और केसे बचा सकते हैं? एक पाठक ने ईमेल करके मुझसे पूछा कि देश में जगह-जगह लोग अपराधियों को या जिन पर महज शक हो उनको पीट-पीटकर मार डाल रहे हैं। ऐसे में कानून को हाथ  में लेने की हमारी सलाह कितनी सही है? इस पाठक ने मुझसे इस पर जवाब भी मांग था लेकिन लिखने का मौका अब जाकर मिला।
प्रचलित भाषा के मतलब से परे कानून के हाथ में लेना कई मौकों पर जरूरी भी हो जाता है। जब कानून के रखवाले उसे बेच खाने पर उतारू हो जाते हैं तब उसे उनके हाथ से छीनकर बचाने का काम कानून विरोधी नहीं होता। आज दिल्ली में ब्लू लाईन बसों के कहर की खबरें टेलीविजन समाचार चैनलों पर लदी हुई हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित इसके लिए अपनी सरकार को नहीं, ट्रैफिक पुलिस को जिम्मेदार करार दे रही हैं जो कि दिल्ली के मामले में केंद्र सरकार के मातहत है, ये एक और बात है कि वह सरकार भी शीला दीक्षित की पार्टी को ही है।
यह इसलिए हो रहा है कि खूनी रफ्तार से दौड़ती बसों ने पुलिस या ट्रांसपोर्ट विभाग को खरीद रखा है। ऐसे में जब अदालत ठंडा भी बेअसर, कपास की पानी सा साबित हो रहा है तो जनता खुद बेकाबू बसों को काबू न करे? उनकी गूंडागर्दी की --- के लिए रफ्तार जांचने वाले उपकरण खुद क्यों न लागए? पीछा करके आप घेरकर उन बसों को क्यों न रोके? मैं नहीं जानता कि ऐसा करने में लोग कौन सा कानून न तोड़ेंगे?
कानून को लेकर यह बेबसी भी लोकतांत्रिक नहीं है कि कानून का जिनको रखवाला बनाया गया है, कानून उनके रहमोकरम पर --- क्या जाए। यह वैसा ही होगा कि अपने बच्चे को हॉस्टल में दाखिल कर देने के बाद उसे प्रताडि़त होते देखना कि हॉस्टल का जिम्मा वार्डन पर है। कानून को भी अपनी ही बच्चा समझना चाहिए और उसे बचाने के लिए लीक से हटकर कोशिश भी करनी चाहिए।
लोग अदालतों या सरकारी दफ्तरों में जाकर स्ट्रिंग ऑपरेशन करने से सहमते हैं। मेरा मानना है कि अदालतों में जजों के ठीक सामने बैठे बाबू जब आने वाले हर व्यक्ति से वसूली करते हैं, तो उसका भांडाफोड़ करना कानून तोडऩा नहीं कानून बचाना होगा। अदालती अवमानना ने हमको आतंक से जकड़ रखा है, इस हद तक कि अदालती भ्रष्टïाचार के खिलाफ एक स्ट्रिंग ऑपरेशन भी अब तक नहीं हुआ। अदालती कमरों में घुसकर इसे करना कानून को बचाना होगा, तोडऩा नहीं, वेसे भी सरकारी या अदालती कुर्सियों पर बैठने वालों को अपने दफ्तरी काम-काज के बारे में गोपनीयता का कोई हक क्यों मिलना चाहिए जब तक कि उनके काम को गोपनीयता का कोई दर्जा हासिल न हो?
अदालतों में, खासकर बड़ी अदालतों में जज अपने लिखे हुए आदेश से परे भी बहुत सी जुबानी बातें करते हैं। इनमें वह खड़े लोगों के साथ कई बार बड़ी बेइंसाफी की बातें भी होती हैं। लेकिन जब मैंने लोगों से कहा कि वे इसकी रिकॉर्डिंग क्यों न ईमेल से तो अदालत द्वारा अवमानना समझ लिए जाने के आतंक से दहशत में थे।
कैसे कोई जज अपनी कुर्सी पर बैठकर किए काम को पारदर्शिता से परे रखने पर अड़ सकता है? यह कानून को बचाना नहीं होगा, कानून तोडऩे को बचाना होगा। जब रिश्वत लेने वाले अफसर की रिकॉर्डिंग करवाने के बाद ही एंटीकरप्शन विभाग उस पर हाथ डालता है तो ऐसी रिकॉर्डिंग अदालतों में गलत कैसे कही जा सकती है? एक नागरिक के रूप में जब मेरे कुछ अधिकार सरकारी दफ्तर में हैं, तो अदालत जाने पर वे क्यों जाएंगे? अदालतों को पारदर्शिता से मुक्त रहने की ऐसी छूट क्यों मिलनी चाहिए?
देश की संसद और विधानसभा के जो कि अदालतों के लिए कानून बनाती हैं, उनकी कार्रवाई का पल-पल दर्ज होता है और एक-एक शब्द छपकर उनकी लाइबे्ररी में रख दिया जाता है, मीडिया में छपता है। संसदीय जांच समितियों या बाकी समितियों की सारी कार्रवाई भी रिकॉर्ड होती है और जनता के सामने रख दी जाती है। ऐसे में अदालतों में सुर्खाब का कौन सा ऐसा पर लगा है कि वहां का भ्रष्टïाचार, वहां की अन्यायपूर्ण टिप्पणियां रिकॉर्ड न की जा सकें़ यह ढाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और संसद को, अगर जरूरत हो तो, इसे जल्द से जल्द खत्म करना चाहिए?
इस बीच मेरा मानना है कि सरकारी, संसदीय या अदालती भ्रष्टïाचार, अहंकार रिकॉर्ड करने के लिए लोगों को कानून उसी तरह हाथ में लेना चाहिए जिस तरह कि लोग कानून तोड़ती ट्रकों या बसों को घेरकर रोक सकते हैं और फिर सरकार को मजबूर कर सकते हैं कि वह कार्रवाई करे।
समय-समय पर बहुत से कानून चुनौती झेलने के बाद उससे हारकार ही बदले हैं। गांधी का भारत हो या नेल्सन मंडेला का दक्षिण अफ्रीका, रंगभेदी, गुलामी की व्यवस्था का अमरीका रहा हो या महिलाओं को मताधिकार से दूर रखने वाला ब्रिटेन हो, चुनौती पाने के बाद, सड़क को लड़ाई के बाद ही मौजूदा हालात में फेरबदल हो पाया। लोकतंत्र आ जाने के बाद भी संघर्ष की यह जरूरत खत्म नहीं हो जाती, वह जारी रहती है।
मेरा यह भी मानना है कि जनता को मौजूदा कानूनों या उसकी सत्ता द्वारा की गई व्याख्याओं को चुनौती देनी चाहिए। सायरन, लालबत्ती, या बड़े से काफिले में चलने वाले नेता अफसर या जजों के इस हमलावर, अलोकतांत्रिक अहंकार को चुनौती देनी चाहिए। इनसे पूछना चाहिए कि ये क्या दिन भर आग बुझाने को यूं दौड़ भाग करते हैं?
किसी भी देश प्रदेश या समाज के लिए भ्रष्टïाचार उतना बुरा नहीं होता जितना कि जनता में भ्रष्टïाचार के लिए पनप चुका बर्दाश्त होता है। जब लोग बेइंसाफी को सहन करने लगते हैं तो वे अधिक बेइंसाफी, बड़ी बेइंसाफी लिए स्वागत में पलक पावले न बिछा देते हैं। यह सहनशीलता थमनी चाहिए। कानून को बचाने के लिए कानून को हाथ में लेना ही होगा, खासकर तब जब ताकतवर बूट उस कानून को कूचलने को अपना हक मान चुके हैं।
- सुनील कुमार