छोटी सी बात

छोटी सी बात
आस-पास बच्चे हों, तो अपनी बातों के मुद्दे, अपनी जुबान, अपने टीवी चैनल, सबका ध्यान रखें। आपका बच्चा बार-बार आपसे जूते मारने की बात सुनते हुए, जूते चला भी सकता है। इसलिए आप बात किसी से भी करें, अपनी जुबान, अपने साथ बैठे लोगों की जुबान, टीवी की जुबान पर ध्यान दें। आप ध्यान ना भी दें, तो भी बच्चे तो ध्यान देते ही हैं।

जागरूक और सेहतमंद

30 जून 11
न्यूयॉर्क में अभी कोई एक सेलून में बाल कटाने पहुंचा तो वहां साथ-साथ उसका ब्लडपे्रशर भी लेकर उसे बताया गया कि वह बिल्कुल तंदरुस्त है। पूरे अमरीका में सेलून और ब्यूटीपॉर्लर जैसी जगहों को मेडिकल जांच के लिए इस्तेमाल करने का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। चूंकि बाल काटने वाले लोग अपने ग्राहकों के करीब रहते हैं और काफी देर तक उन पर काम करते हैं इसलिए अमरीका में यह माना गया कि लोगों की सेहत के लिए जागरूकता में वे मददगार हो सकते हैं। वहां यह बात भी सामने आई कि लोग अपने रक्तचाप की जांच जैसे मामूली काम के लिए डॉक्टर के पास जाने में तो लापरवाही बरत सकते हैं लेकिन हर कुछ हफ्तों में जब उन्हें अपने नाई के पास जाना होता है तो वे वहां ऐसी जांच लगे हाथों करवा सकते हैं।  दरअसल इलाज के लिए बीमे पर टिकी हुई अमरीकी जिंदगी में बीमा कंपनियां भी यह चाहती हैं कि बीमारी बढऩे के पहले ही उसके ग्राहकों को इसका पता लग जाए और शुरुआत में इलाज सस्ता पड़ता है।
सेहत के लिए जागरूकता से लोगों की खुद की और सरकार की भी बहुत बड़ी बचत हो सकती है। जब किसी तकलीफ की शिनाख्त शुरुआत में ही जल्द हो जाती है तो उसका इलाज आसान रहता है, सस्ता भी रहता है। जैसे-जैसे मर्ज बढ़ते जाता है वैसे-वैसे उसके ठीक होने की गुंजाइश घटती है और इलाज की लागत बढ़ती रहती है। इसलिए अमरीका में इस नई पहल से नसीहत लेकर हिंदुस्तान में भी ऐसी जगहों को पहचाना जा सकता है जहां पर लोगों का ब्लडपे्रशर नापा जा सके। बिना किसी लागत वाली ऐसी जांच अगर कुछ खतरनाक आंकड़े बताती है तो उसके बाद लोग डॉक्टर के पास जा सकते हैं। आज भारतीय समाज में बहुत ही छोटा हिस्सा समय रहते मेडिकल जांच करवाता है। इस सिलसिले को बदलने के लिए कई किस्म की नई तरकीबें सोचना चाहिए। हम पहले भी कुछ किस्तों में अलग-अलग समय पर सेहत को बचाने और बीमारी को समय रहते पहचानने के बारे में इसी जगह लिख चुके हैं। एक तो यह कि शादी के समय कुंडलियां और ग्रह नक्षत्र मिलवाने के बजाय दोनों परिवारों को जोड़े की खून की ऐसी जांच जरूर करवाना चाहिए जिससे एचआईवी, थैलेसीमिया, सिकलसेल एनेमिया जैसी बीमारियों का पता लग जाए और फिर डॉक्टरी सलाह पर रिश्ता तय हो, या तय न हो। दूसरी तरफ हमने यह भी सुझाया था कि लोगों को सेहतमंद बने रहने के लिए सरकार और समाज से लगातार सुझाव मिलने चाहिए। आज जब बगीचे और मैदान या तो घटते जा रहे हैं या फिर पैदल घूमने लायक सड़कें गंदगी से भरी हुई हैं, उनमें गाडिय़ों का धुआं छाए रहता है, गड्ढे, गोबर और धूल के चलते जहां चलना मुश्किल होता है, वहां पर सुबह-शाम लोग सैर कर सकें, योग या दूसरे किस्म की कसरत कर सकें, खेलकूद सकें ऐसा इंतजाम होना चाहिए। शहरी योजनाओं में कागजों पर तो ऐसा हो जाता है लेकिन जब हर इलाके के बीच ऐसी साफ-सुथरी और खुली हवा वाली जगह की बात करें तो ये घटती चल रही हैं। सरकार या समाज को एक बड़े पैमाने पर योग और साधारण कसरत की मुफ्त ट्रेनिंग देने का इंतजाम भी करना चाहिए ताकि लोग इस पर अमल करें और सेहतमंद रहें।
चीन की कुछ तस्वीरें पहले हमने छापी थीं जिनमें सड़क किनारे फुटपाथ पर कसरत के लिए कुछ ऐसी साधारण मशीनें सरकार ने लगा रखी थीं जो मौसम की मार झेल सकती हैं और बस या ट्रेन का इंतजार करते हुए लोग उन मशीनों पर मामूली कसरत कर सकते हैं। कुछ महीने पहले अमरीका में भी सड़क किनारे ऐसे पूरे कसरत-बगीचे की तस्वीर हमने छापी थी जो कि खुली हवा की एक व्यायाम शाला जैसी थी। ऐसी बहुत सस्ती और मजबूत मशीनें आसानी से जगह-जगह लगाई जा सकती हैं जो लोगों का उत्साह बढ़ाए। इस बात की पहचान बहुत आसानी से हो सकती है कि लोगों को कहां-कहां इंतजार में समय खराब करना पड़ता है और इस खाली वक्त का इस्तेमाल लोग किस तरह की कसरत में या किस तरह की जानकारी-जागरूकता पाने में कर सकते हैं। इस देश में लोगों का कतार में लगे रहना एक किस्म से आए दिन का काम है। छोटे-छोटे फास्टफूड रेस्त्रां ग्राहकों की कतार लंबी होने पर एक डिजिटल काउंटर लगाकर लोगों को कतार से छुटकारा दिला देते हैं और लोग अपना नंबर आने पर काउंटर पर पहुंचते हैं। यह काम सरकारी अस्पतालों, गैस सिलेंडर की कतारों या दूसरे सरकारी काउंटरों पर क्यों नहीं हो सकता? जब लोगों को आए दिन लाईन में घंटों खड़ा होना पड़ता है तो सरकार के खिलाफ उनकी नाराजगी भी बढ़ती है। हमारा यह भी मानना है कि देश के विकास के साथ-साथ अब गैरजरूरी तरीके से कतारों में लोगों को खड़े रखने को मानवाधिकार का हनन भी मानना चाहिए और भीड़ की ऐसी तमाम जगहों को लोगों की सेहत और जानकारी की बेहतरी के लिए काम में लाना चाहिए। भारत जैसे लोकतंत्र में जनता के इलाज का जिम्मा आज भी कुछ हद तक तो सरकार का है ही और फिर यह बात अपनी जगह है कि अगर लोगों की सेहत ठीक नहीं रहती तो देश की उत्पादकता पर भी उसका असर पड़ता है।
सरकार और समाज को कुछ ऐसा इंतजाम भी करना चाहिए कि रक्तदान करने वाले लोगों के खून की कुछ किस्म की जांच मुफ्त करके उन्हें रिपोर्ट दे दी जाए। इससे एक तो लोगों का रक्तदान का उत्साह बढ़ेगा और दूसरी तरफ बीमारियों की शिनाख्त जल्दी हो सकेगी। लेकिन संपादकीय की यह जगह ऐसी बहुत सी जानकारियों के लिए कम पड़ती है और हमारी सलाह यह है कि संगठित संस्थाओं के, तबकों के लोग अपने स्तर पर भी और सरकार की ताकत को शामिल करके भी ऐसा इंतजाम करें ताकि लोग जागरूक भी हों और सेहतमंद भी रहें। यह बात मामूली लग सकती है लेकिन यह देश और उसके नागरिकों दोनों की सेहत के लिए बहुत अहमियत रखती है।


 

छोटी सी बात


29 जून
कोई छोटा व्यक्ति कभी आपके बड़े काम नहीं आ सकता यह सोचना गलत होता है। बिजली के फ्यूज में लगने वाला तार इंसान के बाल सरीखा होता है, लेकिन जरूरत के वक्त वह न मिले तो अंधेरा दूर नहीं हो सकता। इसलिए बिना जरूरत भी छोटे लोगों के अपमान से बचें। फिर दुनिया ने तो राजा को रंक और रंक को राजा होते भी देखा है।

छोटी सी बात

आपके आस-पास अधिक कामयाब लोग जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसे सीखना चाहिए, और अपने बच्चों को सिखाना भी चाहिए, किसी भाषा से परहेज करके सिर्फ मूर्ख या कामयाब जी सकते हैं।

प्रधानमंत्री की सोच का मामला नेहरू से लेकर अब तक...

29 जून 11
21वीं सदी में जब छोटे-बड़े नेता, कारोबारी, अखबारनवीस, खिलाड़ी और फिल्म कलाकार जैसे हर दर्जे के लोग इंटरनेट पर ट्विटर जैसी सुविधा का इस्तेमाल करते हुए अपने दिमाग को मिनट-मिनट पर मोबाईल फोन से भी दुनिया के सामने रख रहे हैं तब भारत में कल से यह बहस चल रही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब जो मीडिया से बातचीत का नया सिलसिला शुरू करने जा रहे हैं उसके पीछे की वजहें क्या हैं और इस बातचीत से राजनीति और लोकतंत्र पर क्या फर्क पड़ेगा? कुछ लोगों का मानना है कि यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी अपने अकेले और इतने बड़े बेदाग नेता के दामन को बैनर की तरह तानकर अपनी तस्वीर सुधारने की कोशिश कर रही है। इस एक तर्क पर हमारा यह मानना है कि ऐसी निजी ईमानदारी किसी काम की नहीं होती जिनमें चोरों का सरदार अपने हाथ साफ बताते चले और अपनी निजी जरूरतों को एक सब्जी, दाल, दही और रोटी तक सीमित रखे। हम इसके बजाय बेहतर मानते कि रोज थोड़ी दारू पीने वाला, रोज मुर्गा खाने वाला और हल्की-फुल्की बेईमानी करने वाला प्रधानमंत्री देश को बड़े-बड़े घपलों से बचाकर रखता है। इसलिए कांगे्रस पार्टी की इस चतुर-चाहत को हम जनता के सामने ठीक से उजागर कर देना चाहेंगे कि वह अपनी तमाम कालिख के ऊपर यह मनमोहक-मुखौटा लगा रही है।
लेकिन इस राजनीतिक बदनीयती या चतुराई से परे अगर हम मुद्दे पर आएं तो वह यह है कि देश का प्रधानमंत्री मीडिया के मार्फत देश से बात करने जा रहा है। आज की किसी पीढ़ी को यह बात याद नहीं होगी कि किस तरह पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बिना टीवी वाले उस युग में अपने दिमाग को देश और दुनिया के सामने रोजाना एक से अधिक बार खोलकर रख देते थे। हर महीने तो शायद वे देश के सभी मुख्यमंत्रियों को एक चि_ी लिखकर देश और दुनिया के मुद्दों पर अपने दिल-दिमाग की बात उनके सामने रखते थे। इससे परे वे इतना लिखते थे कि नेहरू की किताबें आज तक  इंदिरा परिवार को इतनी रायल्टी देती हैं कि उसका घर खर्च उससे चल सकता है। वैसे प्रधानमंत्री से लेकर इंदिरा तक और बाद में बहुत से ऐसे नेता इस देश पर राज करते रहे जिनकी सोच हर बारे में देश के सामने रहती थी। लेकिन मनमोहन सिंह की शक्ल में इस देश को एक भूतपूर्व अर्थशास्त्री, भूतपूर्व अफसर और भूतपूर्व प्राध्यापक ऐसा मिला जिसने बोलने का काम पार्टी और अपने सहयोगी मंत्रियों पर छोड़ रखा था क्योंकि राजनीतिक बातचीत न तो उनकी खूबी कभी रही और न ही उनकी दिलचस्पी सक्रिय राजनीति में रही। हम इसे कोई बहुत अटपटी बात नहीं मानते क्योंकि न सिर्फ कांगे्रस पार्टी ने बल्कि यूपीए ने भी अपना एक मुखिया चुन रखा है और कांगे्रस के घोषित और दिग्विजयी प्रवक्ता रात-दिन बोलते ही रहते हैं। इनके अलावा अब यूपीए सरकार ने तीन-चार मंत्रियों को भी कुछ महीने पहले से सरकार का प्रवक्ता बना दिया है और वे भी रोजाना मीडिया से बात करते हैं। इस तरह मनमोहन सिंह भारत के पहले लगभग गैरराजनीतिक दिखने वाले प्रधानमंत्री माने जा रहे हैं।
हम इससे सरकार के चलने में तो कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं देखते क्योंकि वामपंथी दलों के राज में भी फैसले तो सत्तारूढ़ गठबंधन ही लेते थे और सरकार चलाने का काम उन फैसलों के मुताबिक एक मुख्यमंत्री के जिम्मे रहता था। फर्क सिर्फ यह है कि ऐसे मुख्यमंत्री खुद भी सक्रिय राजनीति में सक्रिय रहते थे और चुनाव में उनकी बात का असर कैसा रहता था यह केरल में जाहिर है जहां पर कि वामपंथी मुख्यमंत्री जीत की दहलीज के करीब तक पहुंच ही गए थे। इससे परे देश का प्रधानमंत्री आज चुप बैठा एक ऐसा आदमी है जिसके इर्दगिर्द सवालों की फसल खड़ी है और वह बिना बोले फाईलों पर सिर झुकाए एक टेबिल चलाने को देश चलाना मान रहा है। यह सिलसिला हम लोकतंत्र के लिए खतरनाक इसलिए मानते हैं कि पार्टी या गठबंधन की नीतियों के मुताबिक सरकार चलाना तो ठीक बात है लेकिन खुद होकर देश से बात करना, देश की बात सुनना भी प्रधानमंत्री के लिए उस गठबंधन के एक नेता के रूप में तो जरूरी है ही।
इस देश में पिछले बरसों में मनमोहन सरकार के हाथों हुए इतने किस्म के जुर्म आज अदालतों में खड़े हैं और यह देश उनके राज में इस बुरी तरह लुट गया है कि बेहतर होता कि वे आज रोजाना जनता को जवाब देते होते। हमारा यह भी मानना है कि अगर वे अक्सर मीडिया से बात करते तो इतने बड़े-बड़े अपराधों का गुलदस्ता तैयार हो जाने के पहले ही एक-एक कांटा उन्हें हर हफ्ते चुभता और वे अपनी सरकार के पांव संभाल पाते। अब जब वे मीडिया से बात शुरू कर रहे हैं और ऐसा बताया जा रहा है कि वे हर हफ्ते कुछ संपादकों से बात करेंगे तो यह एक अच्छी शुरुआत है और पुरानी बातों को बहुत ज्यादा पीटते रहने के बजाय हम इस नए मौके के इस्तेमाल करने के लिए मीडिया के साथ-साथ जनता को भी चौकस रखना चाहेंगे। आज मीडिया के तमाम प्रमुख लोग मुफ्त के माध्यम, इंटरनेट-ईमेल से तमाम पाठकों और जनता से जुड़े रहते हैं। इसलिए जनता भी अलग-अलग सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात सामने रख सकती है और अपने पसंदीदा पत्रकारों से पूछ भी सकती है कि उन्होंने प्रधानमंत्री से यह क्यों नहीं पूछा? यह सिलसिला आगे बढऩा चाहिए और यह सुझाते हुए हमें महात्मा गांधी के अखबार यंग इंडिया और हरिजन याद पड़ते हैं जिनमें पाठकों के पत्र के लंबे जवाब गांधी खुद लिखते थे। आज जब देश के औने-पौने नेता भी लंबे-चौड़े ब्लॉग लिखते हैं, फुटपाथ पर खड़े हुए भी ट्विटर पर अपनी बात रखते हैं तो इस देश का प्रधानमंत्री भी अपनी ऐसी वेबसाईट शुरू करे जिसमें जनता के सवालों के जवाब रोज के रोज उनकी तरफ से दिए जाएं। फिलहाल वे शायद हर हफ्ते कुछ संपादकों से बात करेंगे और हम उम्मीद करते हैं कि वे आज के जमाने के बाकी औजारों का इस्तेमाल भी इस विशाल लोकतंत्र की जनता के साथ अपनी सोच को बांटने के लिए करेंगे।




ऐसा सुधार खतरनाक

28 जून 11
महाराष्ट्र में कल पुलिस ने छापा मारकर नशे की एक पार्टी में मौजूद सैकड़ों युवक-युवतियों को गिरफ्तार किया। इनके साथ-साथ वहां पुलिस की नशा विरोधी शाखा का एक इंस्पेक्टर भी मौजूद था जिसे निलंबित कर दिया गया है और माना जा रहा है कि उसी की देखरेख में यह पार्टी हो रही थी। इस पार्टी से पुलिस को कई किलो नशीले सामान मिले हैं। इसके पहले भी महाराष्ट्र के ही कुछ दूसरे शहरों में ऐसे छापों में सैकड़ों छात्र-छात्रा पकड़ाए हैं। इस घटना को महाराष्ट्र में अभी नए बने एक कानून के साथ जोड़कर देखना होगा जिसके तहत अब पच्चीस बरस से कम उम्र के लोग शराब नहीं पी सकते। इस कानून के आते ही इसके खिलाफ वे तमाम लोकतांत्रिक अधिकारवादी लोग खड़े हो गए हैं जो कि निजी जीवन के फैसलों में सरकार की अधिक दखल के खिलाफ हैं।
शराब पीने पर लगी रोक के खिलाफ तर्क यह है कि जब लोग अठारह और इक्कीस बरस की उम्र में शादी कर सकते हैं, अठारह बरस की उम्र में सरकार चुन सकते हैं, कर्ज ले सकते हैं तो वे शराब क्यों नहीं पी सकते? यह तर्क देने वाले लोगों में ऐसे लोग भी हैं जो कि शराब नहीं पीते या शराब पीने के बहुत खिलाफ हैं, लेकिन उसके बाद भी उनका यह मानना है कि जब सरकार जिंदगी के किसी एक मामले में दखल देती है तो फिर यह सिलसिला बढ़ते चलता है। आज सरकार एक महत्वहीन से लगते मामले में दखल दे रही है, कल हो सकता है कि किसी दूसरे मामले में दखल देने लगे। लेकिन इससे परे भी एक बड़ा तर्क और है जो शराब पर ऐसी, या किसी और तरह की रोक के खिलाफ जाता है। जहां-जहां कम नुकसानदेह नशा पाने में दिक्कत होती है वहां-वहां लोग कोई अधिक खतरनाक नशा पाल लेते हैं। कल के छापे में ही महाराष्ट्र में एक पार्टी में जितने किलो नशा मिला है, वह बताता है कि वहां पर नशा मिलना मुश्किल नहीं है। महाराष्ट्र की जिस समुद्री सीमा को पार करके पाकिस्तान के आतंकी थोक में पहुंच गए थे वहां से, और दूसरी सरहदों से नशा नहीं पहुंच पाएगा ऐसा कोई नासमझ ही मान सकता है। इसलिए हम शराब पर रोक को एक खतरनाक कदम मानते हैं कि इससे ड्रग्स का कारोबार पनपेगा।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हमने करीब से देखा हुआ है कि शराब के व्यापारी बहुत चौकन्ना रहकर अपने इलाके में कोई नशीला सामान बिकने नहीं देते क्योंकि इससे उनके ग्राहक कम दाम वाले अधिक गहरे नशे की तरफ खिंच सकते हैं और इससे उनके पेट पर लात पड़ सकती है। कम नुकसानदेह नशे की जगह अगर महाराष्ट्र में अधिक नुकसानदेह नशा बढ़ जाता है तो सरकार की यह रोक उल्टी पड़ जाएगी। हमने महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले का भी विरोध किया जिसमें डांस बार बंद करवाए गए थे। वहां ऐसे बार में काम करने वाली दसियों हजार लड़कियां इसके बाद कुछ और अधिक बुरा पेशा करने के खतरे में पड़ गई थीं, और वयस्क मनोरंजन के लिए ऐसी जगहों पर जाने वाले लोग कुछ और खतरनाक बालिग तफरीह की तरफ मुड़ गए। यह सिलसिला इसलिए खतरनाक है क्योंकि इसका सही-सही अंदाज लगना नामुमकिन है क्योंकि भारत में समाज और सरकार इस हकीकत को मानने से ही इंकार कर देते हैं कि इस देश में वेश्यावृत्ति मौजूद है। जब कभी वयस्क मनोरंजन को खत्म किया जाएगा, ऐसी जरूरत वाले वयस्क लोग किसी अधिक गंभीर बुराई की तरफ मुड़ेंगे। जब चकलाघरों पर पुलिस के छापे बढ़ जाते हैं या बाजार में शरीर का मिलना मुश्किल होने लगता है तो बलात्कार या छेडख़ानी, या देहशोषण के मामले बढऩे लगते हैं। शुद्धतावादियों की सोच जिस तरह के सामाजिक सुधार का दावा करती है वैसा सुधार होने के बजाय समाज का नुकसान अधिक होता है। महाराष्ट्र देश का सबसे विकसित और आधुनिक राज्य माना जाता है लेकिन उस राज्य में शिवसेना जैसी सोच के चलते कई राजनीतिक ताकतों के मन में शुद्धतावादी होने की बात उड़ान भरने लगती है। लेकिन यह सिलसिला खतरनाक है और निजी पसंद-नापसंद की आजादी के खिलाफ है ही।

छोटी सी बात

बच्चों को मोबाइल फोन का शौक न लगने दें। फोन कंपनियों की लॉबिंग के चलते अभी रेडिएशन के खतरे ठीक से सामने नहीं आ रहे हैं, लेकिन बच्चों को दूर रखें।

जादू की छड़ी की उम्मीद

27 जून 11
मुंबई में एक प्रमुख अखबार मिड-डे के एक बड़े पत्रकार की हत्या के बाद महाराष्ट्र से लेकर देश की राजधानी तक बहुत हलचल हुई। यह पत्रकार पिछले दस-बीस बरसों से मुंबई के अंडरवल्र्ड की रिपोर्टिंग कर रहा था और अपराधियों के साथ उसका लगातार संपर्क बना हुआ था। जब बड़े-बड़े माफिया गिरोह मुंबई में हजारों करोड़ रुपए महीने के नफे का कारोबार करते हैं तो जाहिर है कि इंसानी जिंदगी अगर रोड़ा बनकर उनकी राह में आती है तो उसे हटाने में उन्हें कोई अधिक सोचने की जरूरत नहीं होती। जो अखबारनवीस खतरों से इतने करीब रहकर इतने समय तक काम करते रहा, उसके सिर पर तब तो कोई खतरा मंडराना ही था जब उसकी किसी खबर से माफिया का कोई बड़ा नुकसान हो सकता था, ऐसी नौबत के बीच जब यह हत्या हुई तो मीडिया और उनके हमदर्द बनकर खड़े हुए राजनीतिक दलों ने सरकार पर एक बड़ा दबाव खड़ा किया कि अपराधियों को तुरंत पकड़ा जाए। वैसे भी मीडिया की नाराजगी से बचने के लिए सरकार और उसके मातहत पुलिस कोई कसर तो रखने वाली थी नहीं, एक बड़ा सा ईनाम और घोषित किया गया और आज हफ्ते-दस दिन के भीतर गिरफ्तारी हो गई।
देश में चल रही बहुत सी दूसरी घटनाओं के बीच हमें इस पर लिखने का समय नहीं मिला लेकिन आज जब पांच-सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है और जब माफिया के एक सरगना छोटा शकील ने यह बयान दिया है कि पुलिस ने कातिलों का पता लगाने के लिए उससे भी संपर्क किया था, तब यह सोचने की जरूरत है कि क्या किसी अपराध को सुलझाने के लिए, अपराधियों को पकडऩे के लिए सरकार पर ऐसा कोई दबाव जांच में मदद करता है या जांच को गलत तरफ मोड़ भी सकता है? इस देश में बहुत से मामलों में लोगों का पुलिस का यह अनुभव तो हो सकता है कि बिना दबाव वह कोई काम नहीं करती। लेकिन एक दूसरा अनुभव यह भी रहा है कि जुलूस, धरना, प्रदर्शन और बंद के चलते कई बार इन सबको बंद करवाने के लिए पुलिस आनन-फानन जो हाथ लगे उसी को अपराधी साबित कर देना आसान काम समझती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब एक बच्ची श्वेता शर्मा की हत्या के बाद बंद कुछ अधिक होने लगे और शहर कुछ अधिक खौलने लगा तो पुलिस ने कुछ बेकसूर लड़कों को पड़कर अपराधी बताकर शहर को शांत कर दिया। ये लड़के अदालत की एक पेशी में ही छूट गए और असली अपराधी कभी नहीं पकड़ा पाए।
मुंबई के मामले में कुछ हैरानी इसलिए भी हुई कि अपराधियों के समंदर में पुलिस को जाल डालकर घंटों में ही किसी को पकड़ लेने की बात मीडिया भी करते रहा और राजनीतिक दल भी। अपराधों की जांच कई बार इतनी मुश्किल होती है कि दिल्ली में आज तक आयुषी तलवार के कत्ल का मामला सुलझ नहीं रहा। मां-बाप गिरफ्तार करके जेल में डाल दिए गए लेकिन अदालत में कुछ साबित नहीं हो पा रहा। मुंबई में हाईकोर्ट ने इस पत्रकार की हत्या पर लगाई गई एक याचिका पर पुलिस को नोटिस जारी करके उससे एक रिपोर्ट भी मांगी। हत्या के किसी मामले में अदालत की ऐसी दखल पहले कभी देखी-सुनी याद नहीं पड़ती। यहां पर ब्रिटेन के सबसे माहिर पुलिस-जांच विभाग स्कॉटलैंड यार्ड की कहानियां याद पड़ती हैं कि किस तरह चौथाई या आधी सदी की मेहनत के बाद भी इसके जासूस कई अपराधों को सुलझा ही नहीं पाए। वहीं की एक दूसरी खबर बहुत बरस पहले आई थी कि मौत की सजा दिए जाने के अठ्ठावन बरस बाद यह साबित हुआ कि एक बेकसूर को अदालत ने मौत दे दी थी।
किसी तबके का एक इंसान मार डाला जाए तो उस तबके का विचलित होना और सड़कों पर आना जायज है। लेकिन ऐसे में भी हमारा यह मानना है कि अखबारनवीसों के अनुभवी तबके को यह याद रखना चाहिए कि हड़बड़ी में किस तरह जांच गलत होती है। और इस एक मामले से परे दूसरे बहुत से मामलों में भी हम यही रूख देखते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि म्युनिसिपल चुनाव के दौरान राजधानी में एक भाजपा नेता गायब हो गया था और उसके अपहरण से लेकर उसकी हत्या तक के आरोप दूसरे दल पर लगते रहे, यह सत्तारूढ़ पार्टी सड़कों पर रही, शायद शहर भी बंद करवाया गया और बाद में पता लगा कि विरोधियों को मतदान के पहले बदनाम करने के लिए एक साजिश के तहत यह छोटा नेता गायब हो गया था। इस देश में चूंकि ऐसी चुनावी साजिशों पर बाद में कोई कार्रवाई होती नहीं है इसलिए बार-बार लोग तरह-तरह से ऐसी हरकत करते रहते हैं।
तरह-तरह की इन वारदातों को देखते हुए हमारा यह मानना है कि पुलिस या सरकार को कार्रवाई करने के लिए एक ठीक-ठाक समय देना चाहिए और उससे जादू की छड़ी घुमाने की कोई उम्मीद नहीं करना चाहिए।

अब बताएं इंसानियत के मायने क्या हैं?

27 जून 11
कई बार हम यह बात लिखते हैं कि किस तरह नेपाल की छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियां वहां से लाकर मुंबई में चकलाघरों में दिन में कई-कई बार बेची जाती हैं।  भारत और महाराष्ट्र में समय-समय पर हिन्दूवादी पार्टियों का भी राज रहा लेकिन दुनिया के अकेले हिंदू देश नेपाल की बच्चियों का यहां बिकना न बंद हुआ, न कम हुआ। एक बहुत जमे-जमाए जुर्म के कारोबार के तहत वहां की गरीब बच्चियों को लाकर मुंबई और हिन्दुस्तान के कई दूसरे शहरों के चकलों में बेचा जाता है। इनकी यहां पर हालत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि देह के ग्राहक कई बार अपने एड्स को लेकर आते हैं और इस खुशफहमी को लेकर भी आते हैं कि किसी कुंवारी लड़की के साथ बिना कंडोम सेक्स से उनका एड्स उस लड़की में चले जाएगा। इसलिए कम उम्र की बच्चियों को सौ-सौ बार कुंवारा बताकर भी बेच दिया जाता है।
अमरीका के टीवी चैनल सीएनएन ने कल इन बच्चियों पर एक डाक्यूमेंट्री प्रसारित की है-नेपाल्स स्टोलन चिल्ड्रन। इसे हॉलीवुड की एक अभिनेत्री डेमी मूर ने बनाया है और इसके केंद्र में इन बच्चियों को बचाने के लिए मेहनत कर रही एक नेपाली सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा कोइराला है। सीएनएन की यह कोशिश उसके फ्रीडम प्रोजेक्ट के तहत हो रही है जिसमें वे आज की दुनिया में गुलामी पर ऐसी डाक्यूमेंट्री बना रहे हैं। इस फिल्म का अंदाज है कि हर बरस कोई 15 हजार नेपाली बच्चियां भारत में स्मगल करके यहां देह के धंधे में धकेल दी जाती है।
एक दूसरी खबर अभी दिल दहलाकर थमी भी नहीं है जिसमें अफग़ान सरकार का कहना है कि दक्षिणी अफग़ानिस्तान में पुलिस पर हमला करने के लिए चरमपंथियों ने आठ साल की जिस लड़की का इस्तेमाल किया था, उसकी धमाके में मौत हो गई है। चरमपंथियों ने लड़की को एक पैकेट दिया और कहा कि वो उसे लेकर पुलिस की गाड़ी तक जाए। जैसे ही लड़की गाड़ी तक पहुंची चरमपंथियों ने रिमोट कंट्रोल से उसमें धमाका कर दिया। इस घटना में और किसी की मौत नहीं हुई है।
इस खबर के बाद बस्तर में नक्सल मुठभेड़ में पुलिस के हाथ लगे ऐसे वीडियो याद पड़ते हैं जिनमें नक्सली अपने हमलों में बच्चों को साथ लेकर चलते हैं और हमलों के बाद लूटे गए हथियार ढोने के लिए इन बच्चों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे वीडियो खुद नक्सली अपने हमलों को दस्तावेज करने के लिए बनाते हैं। दुनिया के कुछ दूसरे देशों में भी आतंकी या बागी लोग मोर्चों पर बच्चा का सैनिकों की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अपनी बात लिखने के पहले मैं उत्तरप्रदेश को एक बार और याद कर लेना चाहता हूं जहां इन दिनों कोई सूरज नाबालिग पर बलात्कार या सामूहिक बलात्कार की खबर के बिना शायद ही निकल पा रहा है। ऐसी बहुत सी बच्चियों की, किसी की आंख फोड़ दी जा रही है तो किसी को जला दिया जा रहा है और ऐसी बहुत सी बच्चियां वहां की महिला मुख्यमंत्री मायावती की हमजात भी हैं।
इस दुनिया में जो लोग मानवीय मूल्यों की बात करते हैं उन्हें अपनी जुबान पर एक बार फिर गौर करना चाहिए। इंसानियत शब्द से जो कागजी मतलब निकलते हैं उन्हें इंसानों की सच्ची पहचान मान लेना पूरी तरह झूठ होगा। इंसान ने अपने-आपको अपनी असलियत से बेहतर दिखाने के लिए एक हैवान की तस्वीर गढ़ी और तमाम बुराईयों को उसमें ठूंसकर इस तरह अपने-आपको उससे अलग कर लिया मानो जलाने के लायक सिर्फ दशहरे का रावण है, या होली पर जलाई जाने वाली होलिका। कुछ दूसरे धर्मों में शैतान को पत्थर मारने का रिवाज है या कहीं पर कोई और तरीका होगा बुराई के सीने में सलीब ठोंक देने का।
कुल मिलाकर बात इतनी है कि बुराई के प्रतीक के रूप में कुछ प्रतिमाएं चबूतरों पर खड़ी करके इंसान अपने-आपको उससे बिल्कुल अलग साबित करने की कोशिश जाने कबसे कर रहा है। यह एक तरफ तो अपने-आपको धोखा देने की बात है और दूसरी तरफ दूसरों को धोखा देने की बात है। यह इंसान के धोखेबाजी के मिजाज के कई पहलुओं में से एक है। वह अपने-आपको मानवीय बताते चलता है और बात-बात पर इंसानियत का उलाहना देते चलता है।
इंसानियत का एक काफी बड़ा हिस्सा उन तमाम बातों से भरा हुआ है, लबालब है जिसे हम हैवानियत कहकर पत्थर मारते हैं। ऊपर बच्चों के साथ जो सुलूक गिनाया गया है, उसे अगर कुछ आगे ले जाकर या कुछ पीछे ले जाकर देखें तो ऑस्ट्रेलिया की स्टोलन जनरेशन याद पड़ती है। वहां के मूल निवासियों (भारत की जुबान में आदिवासी) के बच्चों को वहां की गोरी और शहरी सरकार ने उनके मां-बाप से छीनकर लाकर शहरी गोरे परिवारों के साथ या चर्च के हास्टलों में रखने का जुर्म किया था ताकि उन बच्चों को सलीका सिखाया जा सके। यह एक और संपन्न, शहरी, कुलीन सोच है जो किसी लहू को नीला कहती है और किसी सांवले रंग से नफरत करते हुए गोरे बनने की क्रीम का बाजार बढ़ाती है।
चौथाई या आधी सदी के ऐसे प्रयोग के बाद अभी कुछ बरस पहले जब ऑस्ट्रेलिया में एक आत्मचिंतन, आत्ममंथन और आत्मग्लानि के बाद सरकार को लगा कि दुनिया के इतिहास में उसका नाम नफरत के साथ लिखा जा रहा है तो उसने इन समुदायों के लोगों को वहां की संसद में बुलाकर उनसे इतिहास के इस अपराध के लिए माफी मांगी।
बड़े जुल्मों की ऐसी दिल दहलाने वाली कहानियों को अगर छोड़ भी दें तो हिंदुस्तान के घर-घर में ऐसे छोटे बच्चे काम करते मिल जाते हैं जिन्हें स्कूल में होना चाहिए और कुछ मामलों में तो वे इतने छोटे होते हैं कि उन्हें सिर्फ गोद में होना चाहिए।
बच्चों की बात करते ही छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश के समय से चली आ रही बाल आरक्षक की एक प्रथा याद आती है और इसके बारे में मैं पहले कई बार अलग-अलग सिलसिले में लिख भी चुका हूं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां आजादी का स्मारक, जयस्तंभ बना हुआ है, वहीं पर अभी कुछ बरस पहले तक रेल्वे पुलिस का दफ्तर था। वहां पर एक पांच बरस का बच्चा पुलिस की भारी-भरकम वर्दी पहने, बड़े बक्कल वाला मोटा बेल्ट लगाए और टोपी पहने ड्यूटी करते दिखता था। दफ्तर में वह कागज इधर-उधर लाने-ले जाने का काम करता था और बाहर पान ठेले पर जाकर दिन भर सिगरेट-बीड़ी, गुटका लाने का काम भी करता था। वहां मैंने जब उसकी फाईल निकलवाकर देखी तो गोद के बच्चे जैसे मासूम चेहरे वाले उसके फोटो के साथ उसकी पढ़ाई का जिक्र था, शैक्षणिक योग्यता केजी-वन।
इस बच्चे के पिता की पुलिस की ड्यूटी में रहते हुए मौत हो गई थी और मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में पुलिस में यह इंतजाम है कि ऐसे गुजर गए कर्मचारियों के किसी भी उम्र के बच्चे को पुलिस बाल आरक्षक बना सकती है। इससे उन्हें सिपाही की तनख्वाह का आधा हिस्सा मिलता है और अपनी मां सहित पुलिस लाईन में घर में रहने भी मिलता है। इसके एवज में उन्हें एक दिन की आड़ से ड्यूटी करनी होती है और बाकी दिन वे स्कूल जा सकते हैं। मुझे अपने बचपन की स्कूल याद है जहां हमारी क्लास में ऐसा एक बाल आरक्षक था और थाने के बगल से आते-जाते हम उसे वर्दी में देखने के आदी हो गए थे। वह चूंकि एक दिन की आड़ से ही स्कूल आता था इसलिए पढ़ाई में उसका कमजोर रहना जायज था और इसके लिए वह गुरुजी की मार खाते ही रहता था।
यह बात आधी सदी से कुछ कम पहले की है और अभी इस छोटे बच्चे को देखे भी पांच बरस से कुछ ही अधिक वक्त हुआ होगा। कुल मिलाकर बात यह कि चालीस बरसों का यह अरसा भी बच्चों की हालत को बहुत अधिक बदल नहीं पाया। यह नया बाल आरक्षक सरकार के बड़े ही हैवानी नियमों के तहत जकड़ा हुआ था और सरकार की जुबान उसे मानवीय आधार पर दी जा रही रियायत गिन रही थी। जब इस बच्चे के पिता की मौत हुई तो वह छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सवा सौ किलोमीटर दूर बिलासपुर में तैनात था। नियमों के मुताबिक उसके पांच बरस के बेटे को वहीं पर तैनाती मिली, लेकिन बाल आरक्षकों को एसपी के दफ्तर से नीचे अब तैनात नहीं किया जाता इसलिए इस बच्चे को रेल्वे के एसपी के दफ्तर आना पड़ता था जो कि रायपुर में था। एक दिन की आड़ से यह लड़का बिलासपुर में घर से स्टेशन आता था, वहां से रेल्वे के किसी दूसरे आते-जाते सिपाही के साथ ट्रेन से रायपुर पहुंचता था और फिर यहां रेल्वे स्टेशन से कोई चार-पांच किलोमीटर दूर रेल्वे एसपी के ऑफिस आकर ड्यूटी करता था।
नियम तो ऐसे ही थे लेकिन बाद में पुलिस के कुछ बड़े अफसरों से मैंने बात की, कुछ उनके मन में खुद भी रहम पैदा हुआ था और उन्होंने इस बच्चे को इस ड्यूटी से धीरे-धीरे रियायत देना शुरू किया।
हमारे घर के जिस उम्र के बच्चे को सिर्फ गोद, आइसक्रीम और चॉकलेट का हकदार माना जाता है उस उम्र का, पिता खो चुका बच्चा अपनी मां से दूर सवा सौ किलोमीटर आता था और सवा सौ किलोमीटर जाता था।
लेकिन फिर भी लोकतंत्र की यह कू्ररता मुंबई के चकलों के मुकाबले कुछ नहीं है, अफगानिस्तान और बस्तर के आतंकियों के मुकाबले कुछ नहीं है।
अब बताएं इंसानियत के मायने क्या हैं?

छोटी सी बात

अगर आप अपने शहर, प्रदेश और देश-दुनिया के गंभीर मुद्दों के लिए अपना कुछ वक्त नहीं निकालते हैं, तो उसका मतलब है कि आप अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए गंभीर नहीं हैं। विरासत में सिर्फ घर-दूकान छोड़कर जाना काफी नहीं है। एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाना भी जरूरी है।

छोटी सी बात


दूसरों की खुशी में खुश होना अगर आप नहीं जानते तो आपका हाल धीरे-धीरे जले हुए खाने जैसा हो जाता है।
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पुट्टपर्थी से बाकी देश के लिए भी संदेश

26 जून 11
पुट्टपर्थी में सत्य सांई बाबा के गुजरने के बाद सैकड़ों करोड़ की उनकी सम्पत्ति में अब ट्रस्ट के लोगों द्वारा चोरी की खबर है। ऐसा एक मामला तो रंगे हाथों पकड़ाया है और वहां के लोग आश्रम के सामने धरने पर बैठ गए हैं कि बेईमान ट्रस्टियों को हटाया जाए। इन ट्रस्टियों में सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज सहित बाबा के कुछ रिश्तेदार भी हैं। इस सिलसिले में भारत के एक वामपंथी दल ने मांग की है कि राज्य सरकार इस ट्रस्ट को अपने नियंत्रण में ले ले। राज्य सरकारों का किसी ईमानदारी का कोई लंबा-चौड़ा रिकॉर्ड तो नहीं है लेकिन फिर भी वे अदालत, संसद और विधानसभा तथा जनता के प्रति जवाबदेह तो रहती ही हैं। इसलिए चोरी कर रहे लोगों वाले ट्रस्ट के मुकाबले सरकार को हम बेहतर मानते हैं और सरकार के साथ-साथ उसमें दूसरे निर्विवाद और बेदाग मौजूदा ट्रस्टी भी रखे जा सकते हैं।
धर्मों और आध्यात्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए ट्रस्ट, वक्फबोर्ड और चर्चों के तहत आने वाली जमीन-जायदाद को लेकर हमेशा से यह सुनाई पड़ता है कि किस तरह लोग उसे लूट-खा रहे हैं। ईश्वर का कोई अस्तित्व होता तो वह अपने नाम पर दिए गए दान को बदमाशों से बचाता भी। लेकिन ईश्वर का सिर्फ नाम है, सिर्फ एक धारणा है इसलिए उसके नाम पर जुटी सम्पत्ति में चोरी करने में भी उसके नामलेवा ट्रस्टी जरा भी नहीं हिचकते हैं। देश में शायद ही ऐसे कोई धार्मिक ट्रस्ट हों जिनमें चोरी, बेईमानी न हो रही हो। छत्तीसगढ़ में हम लगातार यह देखते हैं कि किस तरह चर्च की लंबी-चौड़ी जमीन को समाज के ही प्रमुख लोग जालसाजी-धोखाधड़ी से खरीद लेते हैं। जो लोग एक धर्म के गुरू के आगे-पीछे घूमते हैं, वे ही अपने धर्म की जायदाद हो या किसी दूसरे धर्म की, उसे बेईमानी से खरीदने में जान लगा देते हैं। ऐसे मामले सरकारी दफ्तरों से लेकर अदालतों तक पटे हुए हैं। इसके अलावा दान के पैसों से चलने वाले बहुत से और ऐसे ट्रस्ट हैं जिनमें समाज सेवा के नाम पर इंसानी हरामखोर पल रहे हैं। किसी नेक काम के नाम पर, ईश्वर या गुरू के नाम पर, जाति या आध्यात्म के नाम पर दान जुटाया जाता है और उस पर ट्रस्टी ऐश करते हैं। उनकी सामाजिक और राजनीतिक ताकत इतनी होती है कि सरकार भी आमतौर पर उनके खिलाफ कुछ करने से कतराती है। अब सूचना का अधिकार आने के बाद इतना तो हुआ है कि ऐसे कई छल-कपट उजागर होने लगे हैं। लेकिन अदालत या सरकार से कार्रवाई होने में बहुत वक्त लग जाता है, अगर कोई कार्रवाई हो पाती है तो। कल तक जिस बाबा रामदेव को लेने के लिए केन्द्रीय मंत्रियों की टोली दिल्ली के विमानतल पर बिछी हुई थी और उनके साथ दिल्ली के सबसे आलीशान होटल में घंटों बैठक हुई, वही रामदेव अपनी कंपनियों और ट्रस्टों के लिए आज सरकारी जांच के घेरे में हैं। हमारा यह सवाल है कि ऐसी कोई जानकारी रातों-रात तो सरकार के पास आई नहीं होगी, और जब तक सरकार से उनकी बातचीत ठीक चल रही है तब तक तो किसी ट्रस्ट पर कोई कार्रवाई न हो, और जब बातचीत टूट जाए, वे सरकार पर हमले करने लगे तो फिर रातों-रात ऐसे ट्रस्ट निशाने पर आ जाएं। सरकार का यह रूख ठीक नहीं है और सार्वजनिक सम्पत्ति के लिए एक बेहतर इंतजाम देश में होना चाहिए।
न सिर्फ सत्य सांई बाबा का ट्रस्ट बल्कि देश-प्रदेश के बाकी तमाम ट्रस्ट भी पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और उनमें सरकार के प्रतिनिधि होने चाहिए और उसका सारा हिसाब-किताब खुला होना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि किसी की निजी सम्पत्ति को लेकर धोखाधड़ी और जालसाजी की जो सजा है उससे बहुत अधिक सजा सार्वजनिक सम्पत्ति या समाजसेवा के लिए मिले पैसों में धोखाधड़ी पर दी जानी चाहिए। ऐसा हाल हम खादी ग्रामोद्योग आयोग से लेकर गांधी के नाम पर बनी संस्थाओं तक देखते हैं। खादी के नाम पर सरकार से एक अनुदान मिलता है। यह अनुदान तमाम किस्म के गैर खादी कपड़ों पर ले लिया जाता है और टैक्स की चोरी इस पर अलग से होती है।
हमारा यह भी मानना है कि ऐसे ट्रस्टों में किसी एक व्यक्ति या उसके परिवार के लोग, उसके रिश्तेदार, उसके कर्मचारी, इनके रहने की एक सीमा होनी चाहिए। जब वे वहां पर अपनी जड़ें बहुत अधिक जमा लेते हैं तो किसी बेईमानी की ताकत भी पा लेते हैं। इसलिए ट्रस्टों के नियमों में फेरबदल करके पीढ़ी-दर-पीढ़ी के ऐसे कब्जे को खत्म करना चाहिए। सत्य सांई बाबा के परिवार के लोग इस ट्रस्ट में हैं और ऐसे में वहां सरकार का नियंत्रण जरूरी है क्योंकि रिश्तेदार एक अलग किस्म की ताकत वहां रख सकते हैं। और इसी से सबक लेकर पूरे देश में सरकारों को अपने-अपने इलाके के ट्रस्टों को ईमानदार रखने लायक फेरबदल करने के लिए नियमों में बदलाव कर लेना चाहिए।

राष्ट्रपति की कही दो बातें

25 जून 11
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने कल छत्तीसगढ़ विधानसभा में विधायकों के बीच कहा कि विधानसभा सत्रों के बीच का वक्त उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की आकांक्षाओं को जानने में लगाना चाहिए और बाद में उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। आज उन्होंने रायपुर नगर निगम की नई ईमारत के उद्घाटन के मौके पर शहरी गरीबों की याद दिलाते हुए शहरी संपन्न तबके को उसका जिम्मा समझाया कि उसे कमजोर और वंचित तबके के हितों का ध्यान रखना चाहिए और उसके लिए रहने, इलाज और पढ़ाई की सहूलियतें जुटाने चाहिए। ये दोनों ही बातें उनके सरकारी भाषण की लंबाई-चौड़ाई के बीच भी अलग से नगीने की तरह दिखती हैं। इन दोनों ही जरूरतों को लेकर ऐसा नहीं कि लोगों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है। लेकिन इस जिम्मेदारी को बहुत कम लोग पूरा कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रपति का इस बारे में याद दिलाना हम एक नसीहत जैसा मानते हैं और उम्मीद करते हैं कि सरकार और समाज इस बारे में सोचेंगे।
पाठकों को याद होगा कि कुछ समय पहले जब लोकपाल मसौदा कमेटी को लेकर हमने कई संपादकीय लिखे तो उनमें यह भी लिखा कि सांसदों-विधायकों या राजनीतिक दलों अलग-अलग जगह बैठकें रखकर अपने इलाके की जनता की राय इस बारे में जाननी चाहिए ताकि बाद में संसद या विधानसभा में इस पर चर्चा होने पर वे जनभावनाओं से परिचित रहेंगे। यह बात सिर्फ लोकपाल के मामले में लागू नहीं होती, सभी मामलों में लागू होती है और राष्ट्रपति ने उसी नजरिए से जनता की नब्ज पर हाथ बनाए रखने की बात कही है। हम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को आज की तमाम नकारात्मक हवा के बाद भी एक तबके के रूप में देश के बहुत से दूसरे तबकों के मुकाबले अधिक जिम्मेदार मानते हैं। इसकी एक वजह यह है कि वे जनता के बीच जीतकर आते हैं और चुनाव की तमाम खामियों के बावजूद वे जनता के प्रति पांच बरस बाद के चुनाव में जवाबदेह तो रहते ही हैं। इसलिए यहां पर हम आज की चर्चा के इस मुद्दे को भी जोड़कर रखना चाहेंगे कि अन्ना-बाबा के मुकाबले निर्वाचित सांसद-विधायक जनता के प्रति अधिक जवाबदेह रहते हैं और वे ही यह दावा कर सकते हैं कि जनता उनके साथ है। आज जो प्रचारतंत्र यह साबित करने पर उतारू रहता है कि किसी एक बाबा, गुरु या गांधीवादी के साथ पूरा देश खड़ा है, उस प्रचारतंत्र के पास न तो खुद परखने की कोई तरकीब होती कि कितने लोग किसके साथ खड़े हैं। बस मीडिया की मेहरबानी से किसी के भी साथ पूरा देश खड़ा दिख जाता है और कभी गिने-चुने लोग किसी के साथ गिनाए जाते हैं। लेकिन यह एक अलग चर्चा का मुद्दा है और हम आज यहां पर राष्ट्रपति की कही बातों पर ही बात आगे बढ़ाना चाहते हैं।
छत्तीसगढ़ की आर्थिक संपन्नता की चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने इस राजधानी की अलग से चर्चा की है और उसी के साथ उन्होंने यहां के संपन्न तबके की जिम्मेदारियां गिनाई हैं। शासन और प्रशासन के दबाव में यहां के उद्योगपति किसी तालाब या नदी की सफाई के काम में तो अनमने तरीके से कुछ किराए की मशीनें लगा देते हैं लेकिन स्थानीय विकास में कोई ठोस योगदान नहीं रहता। और फिर बात सिर्फ उद्योगपतियों की नहीं है, सारे संपन्न तबके की है जिसे कि स्थानीय टैक्स देने से परे भी अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए। पूर्वी भारत में टाटा के चाय बगान हैं। इसलिए कोलकाता में टाटा ने अभी सैकड़ों करोड़ रुपए खुद के लगाकर एक कैंसर अस्पताल बनवाया है और उसके पूरे हो जाने के बाद अब टाटा ने बाकी लोगों से भी सहयोग की अपील की है। छत्तीसगढ़ में हम सिर्फ यह देखते आते हैं कि किस तरह संपन्न तबका सरकारी नियमों के तहत अधिक से अधिक रियायत के लिए कोशिश करते रहता है और अपनी जिम्मेदारियों के बारे में चर्चा भी नहीं करना चाहता। राष्ट्रपति की नसीहत ऐसे ही तबके के बारे में अधिक है।
अब हम प्रतिभा पाटील की कही हुई दोनों बातों को जोड़कर देखते हैं तो लगता है कि अगर निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों की भावनाओं को समझते होते तो वे संपन्न तबके से अपने चुनावी चंदे से परे जनहित के काम भी करवाते। और जनहित के कामों से हमारा मतलब किसी बगीचे या किसी सभा भवन से नहीं है। जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा है कि हम सबसे कमजोर तबके के इलाज, उसके रहने और उसकी पढ़ाई की बात कर रहे हैं कि इनमें से कौन सी बातों को वह संपन्न तबका पूरा कर सकता है जिसे कि राष्ट्रपति ने सभ्य तबका भी कहा है। भारत की आम बोलचाल की भाषा में संपन्न को सभ्य भी मान लिया जाता है हालांकि राष्ट्रपति ने बहुत विस्तार से संपन्नता और विपन्नता के बीच के फासले को गिनाया है और संपन्न की जिम्मेदारी गिनाई है। क्या इसी बात को लेकर छत्तीसगढ़ के कुछ बहुत संपन्न लोग एक बैठक करके उस तरह की कोई पहल कर सकते हैं जैसी कि अमरीका में बिल गेट्स ने पिछले कुछ बरसों से शुरू की है, जिसके तहत संपन्न लोग अपनी आधी दौलत समाज के लिए दे रहे हैं। हम इन दो दिनों में राष्ट्रपति की कही इन दो बातों को उनके साधारण रहने पर भी बहुत प्रासंगिक मानते हैं और अब गेंद यहां के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और संपन्न लोगों के पाले में है।

हिंदुस्तान की सबसे बड़ी और खूबसूरत झील का बचना जरूरी

25 जून 2011
सुनील कुमार


एक हफ्ते के कश्मीर में सबसे फिक्र की बात डल झील रही। आज सुबह ही एक खबर में आंकड़े आए हैं कि पिछले 20 बरसों में यह बरस सबसे कम आतंकी हमलों वाला रहा। कश्मीर के लिए तो यह राहत की बात तो है ही, कश्मीर के बाहर बसे आम हिन्दुस्तानी के लिए भी यह राहत की बात है क्योंकि जो तबका घूमने-फिरने पर खर्च कर सकता है वह कश्मीर को इस देश के भीतर की सबसे बड़ी सैर मानता है। आतंकी हमले चलते रहें तो बहुत से लोग यहां घूमने का सपना नहीं देख पाते। लेकिन एक दूसरी जो बात तय है कि कश्मीर का प्रतीक वे शिकारे हैं जो डल झील में चलते हैं और अगर यह झील बर्बादी की तरफ बढ़ी तो कश्मीर से सैलानियों का कारोबार भी बर्बाद हो जाएगा।
शंकराचार्य मंदिर की पहाड़ी से मैंने भी कुछ तस्वीरें डल झील की ली हैं, लेकिन किसी भी जगह की सबसे अच्छी तस्वीरें साल के हर दिन या हर मौसम में या दिन के हर वक्त नहीं आ पातीं। इसलिए इस जगह की यह तस्वीर मैं इंटरनेट पर विकीपीडिया से लेकर दे रहा हूं जो कि मेरी खींची तस्वीरों से बेहतर है लेकिन अफसोस यह है कि इसके साथ फोटोग्राफर का नाम नहीं है। डल झील के बारे में एक वैज्ञानिक अंदाज यह है कि अगर इसे बचाने के लिए बड़े पैमाने पर कोशिशें न हुईं तो डेढ़ सौ बरसों में यह पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।
इनवायरमेंट सर्विसेस एंड रिसर्च ऑगनाइजेशन की एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है कि डल झील 1880 में 75 वर्ग किलोमीटर की थी जो कि 2004 में 10.5 वर्ग किलोमीटर रह गई है। इसमें अब हर बरस 250 से 300 लाख लीटर गंदगी मिल रही है।
इस झील पर सौ से अधिक बस्तियां हैं जिनमें एक लाख से अधिक लोग बसे हैं। तीन हजार से अधिक परिवार कच्चे मकानों में हैं और 6 हजार परिवार पक्के मकानों में हैं। इन सबकी रोज की गंदगी सीधे इस झील में जा रही है। शहर के बीचों-बीच इस बस्ती पर बसे हुए लोगों में से अधिकांश की रोजी-रोटी वहीं पर चलती है। वहां शिकारे वाले हैं, वहां फल और सब्जियां उगाने वाले हैं, वहां कागज की लुग्दी से तरह-तरह के हस्तशिल्प बनाने वाले लोग हैं, सैलानियों के लिए बाजार हैं।
इन सबको वहां से हटाकर किसी दूसरी जगह बसाने का एक मतलब उनकी रोजी-रोटी से उन्हें अलग करना और पीढिय़ों से पानी के बीच रहने की अपनी संस्कृति से भी उन्हें अलग करना होगा। लेकिन जैसा कि इस तस्वीर से दिख रहा है डल झील के किनारे का एक बड़ा हिस्सा इस तरह कब्जों में और बसाहटों में, हाउसबोटों में दब गया है कि वहां पानी कम दिखता है। वहां पर हजार के करीब हाउसबोट हैं जिन पर सैलानियों के रहने के लिए होटलों जैसे कमरे हैं। उन्हीं बोट पर उनका खाना बनता है और वहीं पर उनके शौचालय हैं। इस झील पर बसे लोग अपने छोटे-छोटे शिकारों से चारों तरफ तुरंत जा सकते हैं और शहर के हर किनारे तक की दूरी कम रहती है। विस्थापन के बाद ये जहां कहीं बसाए जाएंगे वह जगह उनके काम की जगह से भी दूर होगी और भावनात्मक रूप से भी ये लोग बची पूरी जिंदगी शरणार्थी से बने रहेंगे।
लेकिन इनमें से कोई भी बात इतनी ताकतवर नहीं है कि डल झील को इसी तरह रहने दिया जाए। इसका अगर कायाकल्प नहीं किया गया तो इस देश के नक्शे से कुदरत का यह बेमिसाल तोहफा मिट ही जाएगा। यही सोचकर सन् 2000 में कश्मीर के एक मानवाधिकार वकील और एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिस पर इस झील को बचाने के लिए अदालत से एक असाधारण कदम उठाते हुए दखल देने की अपील की गई थी। यह मामला अभी चल ही रहा है लेकिन इस बीच अदालत के आदेश से और खुद होकर भी केंद्र सरकार ने कुछ काम किए हैं। इस झील को बचाने की कोशिशें सुप्रीम कोर्ट और उसके निर्देश पर लगाई गई एक दूसरी याचिका के आधार पर जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा चल रही हैं। लेकिन जैसा कि सरकारी ढर्रा होता है, अदालती नोटिसों के बावजूद न विस्थापन हो पाया और न पुनर्वास की नौबत आई।
डल झील के सैलानियों वाले हिस्से से परे जब बस्तियों से घिरे बाकी हिस्से को भीतर जाकर देखा जाए तो यह लगता है कि किसी भी कीमत पर इस झील को चारों तरफ से अगर खुला बनाया जा सके तो वह हिन्दुस्तान के लिए एक बहुत बड़ी बात होगी। लेकिन एक लाख लोगों की दुबारा बसाहट के लिए बहुत बड़ी रकम भी लगेगी और बहुत बड़ी राजनीतिक हिम्मत भी। केंद्र सरकार इस काम के लिए कुछ हजार करोड़ रुपए आसानी से अलग कर सकती है और उसका जो असर कश्मीर के पर्यटन पर पड़ेगा उससे अगले कुछ बरसों में उसकी भरपाई भी हो जाएगी, फिर चाहे वह राज्य की जेब में जाए।
सुप्रीम कोर्ट का कुछ महीने पहले का एक अलग मामले में आया फैसला डल झील पर भी लागू होता है। इस फैसले में सभी चारागाह, तालाब या ऐसी दूसरी सार्वजनिक उपयोग की जगहों को खाली कराकर उनके मूल्य स्वरूप में वापिस लाने का आदेश दिया गया है। इसके चलते भी डल झील के लोगों को हटाने के बारे में अदालती रूख साफ है। लेकिन इतने लोगों को उनके रहने और कमाने-खाने की जगह से अचानक कैसे दूर किया जा सकता है?
इसी झील में तैरती एक बड़ी बोट पर पोस्ट ऑफिस चल रहा है। यहीं किसी बोट पर शिकारा चलाने वाले लोगों के लिए खाने की दूकान चल रही है। यहां हाउसबोटों में ठहरे हुए लोगों को किनारे लाकर छोडऩे वाले शिकारे सुबह दर्जनों दिखते हैं और उनसे अपना सामान लेकर उतरते हुए सैलानी भी। कुछ इतने बूढ़े लोग शिकारा चलाते दिखे कि कुछ हैरानी भी हुई। लेकिन वहां की जिंदगी ऐसी है कि शिकारे पर चलना ठीक वैसा है जैसा कि बाकी जगहों पर पैदल चलना। कुछ महिलाएं, कुछ बच्चे सांस लेने की तरह सहज तरीके से शिकारे चलाते घूम रहे थे। 
लेकिन यहां एक तस्वीर मुझे ऐसी भी मिली जिसमें डल झील के किनारे के फुटपाथ पर इक_ा कचरा दर्जनों बोरों में भरकर ले जाने की तैयारी की जा रही थी। हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से के लोगों में यह बेहद ताकत है कि वे कितनी भी साफ जगह को कूड़ेदान में तब्दील कर सकते हैं। चारों तरफ सैलानियों का कचरा है या कचरा सैलानी बनकर आया है?
कश्मीर और डल की कहानी यहां पर आज पूरी। और कभी आगे बढऩे के लिए। (समाप्त)

छोटी सी बात


किसी से उसका महंगा सामान लेकर इस्तेमाल करना आसान लग सकता है। लेकिन अगर सामान गुम गया तो लौटाना कितना महंगा पड़ेगा यह भी सोच लें।

कमजोर नेता और कमजोर अफसर

24 जून 11
उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार पुलिस के मुखिया और प्रशासन प्रमुख, इन दोनों को जिस बेरहमी से अपनी राजनीति में इस्तेमाल कर रही हैं वह देखने लायक है और इससे भी अधिक देखने लायक बात यह है कि अखिल भारतीय सेवा के ये बड़े-बड़े अफसर दिन में कई बार दो-दो बार मीडिया के सामने मायावती की राजनीति को बढ़ावा देते हुए राजनीतिक बयानबाजी करते दिखते हैं। यह वह दौर है जब लोकतंत्र में कोई सरकार या पार्टी चलाने के लिए मीडिया से रूबरू होना या तो सफल सरकार की राजनीति की रणनीति होती है या बुरी तरह नाकामयाब सरकार की बेबसी। जो भी नौबत हो हर सरकार को या पार्टी को मीडिया के मार्फत जनता तक अपनी बात रखनी ही होती है। इन दिनों जब कांगे्रस जैसी बड़ी पार्टी अपने घोषित प्रवक्ताओं से परे दिग्विजय सिंह जैसे अघोषित प्रवक्ताओं को रणनीति का एक बड़ा हिस्सा बनाकर चल रही है, जब यूपीए सरकार यह तय कर चुकी है कि उसके सरकारी मामलों की जानकारी मीडिया को देने के लिए केंद्र सरकार के नियमित अधिकारियों के बजाए उसके मंत्री यह काम करेंगे और वे मंत्री ही यह काम पिछले कुछ महीनों से कर रहे हैं, तब मायावती पहाड़ की चोटी पर बैठी हुई एक अकेली नेता की तरह दिखती है।
जिस अंदाज में मायावती उत्तरप्रदेश के सबसे बड़े अफसरों का बेजा इस्तेमाल कर रही है उससे उन अफसरों के किसी चुनाव लडऩे की गुंजाइश तो पैदा होती है लेकिन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर नेताओं और अधिकारियों के बीच की सीमा रेखा इससे खत्म हो रही है। मायावती की यह बेबसी हो सकती है कि एक व्यक्ति की इस पार्टी के भीतर वे किसी दूसरे नेता को आगे बढऩे देना नहीं चाहतीं और वे खुद एक लिखे हुए बयान को पढऩे से अधिक कुछ नहीं कर पाती हैं इसलिए मीडिया के सवालों के जवाब देना उनके लिए भारी भी पड़ सकता है या नामुमकिन हो सकता है। ऐसे में चतुर अधिकारियों को सामने रखकर मायावती अपनी सरकार या पार्टी से जुड़ी कड़वी बातों को सीधे-सीधे अपने ऊपर आने देने से भी रोकती हैं और उत्तरप्रदेश की बुरी खबरों पर जब ये अफसर दमखम से सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी का बचाव करते हैं तो वे खुद भी अपने इन बयानों को सही साबित करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसलिए सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के अपराधों को मीडिया के सामने घटाकर या मिटाकर बता देने के बाद अपने दफ्तर लौटकर ये वैसा ही करने में जुट भी जाते होंगे ऐसा हमारा मानना है।
एक राजनीतिक दल के रूप में मायावती की पार्टी बसपा का यह बुरा हाल दिखता है। एक पार्टी का ढांचा अगर ठीक से विकसित नहीं होता तो उसमें सब कुछ कुल एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित हो जाता है और वह बाल ठाकरे, लालू यादव, मुलायम सिंह, ममता बैनर्जी, फारूख अब्दुल्ला, चन्द्रा बाबू की पार्टी जैसी स्थिति में आ जाती हैं। भारत में कई प्रदेशों में इस तरह का चलन है लेकिन हम छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश,  राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल जैसे बहुत से राज्य देखते हैं जिनमें कि बड़ी पार्टियां सरकार या प्रमुख विपक्षी दल हैं और वहां पर एक नेता की सनक के मुकाबले अधिक अक्ल इस्तेमाल होते दिखती है। कांगे्रस के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि उसकी अकेली मुखिया सोनिया गांधी हैं, लेकिन एक बात सोनिया गांधी की लीडरशिप के इस पूरे दौर में सामने आई है कि वे अपने आसपास के बहुत से लोगों से बातचीत करने के बाद ही कोई फैसला लेती हैं और उनकी पार्टी में सनक की एक भी मिसाल सामने नहीं आती। इसे हम एक पार्टी की ताकत ही मानते हैं कि वहां पर मुखिया आशंकाओं से घिरी हुई नहीं है और अपने बहुत से नेताओं को वह ताकत की अलग-अलग जगहों पर बिठाने के बाद भी बेफिक्र है। ऐसी बेफिक्री मायावती की जिंदगी में नहीं दिखती।
लेकिन लगे हाथों हम एक दूसरी बात पर भी आना चाहते हैं। भारत में न सिर्फ गठबंधन की राजनीति पिछले कुछ दशकों से हकीकत बन चुकी है बल्कि क्षेत्रीय दलों की ताकत भी पहले के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ गई है। उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, बंगाल जैसे बड़े-बड़े कई राज्य बिना गठबंधन के सरकार बनाते नहीं दिख रहे, या तो गठबंधन या पूरी तरह क्षेत्रीय दल। और ऐसे गठबंधन भी देखें तो उनमें एक ही राज्य में जमीन वाले शिवसेना, एनसीपी, तेलुगू देशम, तृणमूल कांगे्रस जैसे बहुत से क्षेत्रीय दल शामिल रहते ही हैं। अब यहां पर एक पुरानी बहस पर कुछ और वक्त बर्बाद करने की नौबत आती है। क्षेत्रीय दलों के बारे में बार-बार यह कहा जाता है कि उनकी अपनी जरूरत और उनकी समझ, सोच सब कुछ अपने प्रदेश के लायक रहती है और वहीं तक सीमित भी रहती है। हम इसे कुछ हद तक सही मानते हैं और इसके थोड़े बहुत अपवाद भी देखने मिलते हैं। लेकिन क्या अमरीका की तरह पूरे भारत में दो पार्टियों की राजनीति के दिन कभी लौट सकते हैं? क्या कभी ऐसा होने पर वह आज के मुकाबले ज्यादा अच्छा होगा? इस बहस को हम महत्वपूर्ण इसलिए मानते हैं कि भारतीय लोकतंत्र एक लगातार चुनाव वाला देश है और लोगों के रूझान में कई नाजुक मौकों पर ऐतिहासिक फेरबदल भी देखने मिला है। ऐसे में देश और प्रदेश दोनों में सत्ता अगर दो राष्ट्रीय गठबंधनों के बीच किसी तरह केंद्रित हो जाए तो उससे लोकतंत्र का क्या भला होगा और क्या बुरा यह भी सोचने की जरूरत है। आज की यह चर्चा हम किसी राय पर ले जाकर छोडऩा नहीं चाहते लेकिन लोगों को इस पर चर्चा करते देखने की उम्मीद जरूर करते हैं।
मायावती से बात शुरू हुई थी और हम फिर वहीं पर लेकर जाना चाहते हैं। अफसरों का ऐसा इस्तेमाल ठीक नहीं है इससे सिर्फ एक बात साबित होती है कि जितने कमजोर ऐसे निर्वाचित और सत्तारूढ़ नेता हैं, उतने ही कमजोर अफसर भी हैं।

एक शिकारे वाले ने बताया सियासत का नया मतलब...


24 जून 2011
सुनील कुमार
आज शायद इस सफरनामे की आखिरी किस्त होगी क्योंकि रोज के काम की भाग-दौड़ के बीच हर सुबह ऐसा लिखना भारी भी पडऩे लगता है और अखबार की अपनी तंग सीमाएं भी होती हैं। लेकिन यह लिखते हुए इन दिनों कश्मीर की खबरों पर नजरें कुछ अधिक जाती हैं और पहली बार के देखे कश्मीर से मेरी जानकारी और सोच पर पड़े फर्क से लगता है कि राज्य या केंद्र सरकार को अधिक से अधिक अखबारनवीसों को अधिक से अधिक प्रदेश देखने को भेजना चाहिए जिससे कि विविधताओं से भरा हुआ यह देश सबको बेहतर समझ आए, और ऐसा अनुभव देश की एकता बढ़ाने में बहुत कारगर साबित हो सकता है।
कश्मीर में अपने घर 68 बरस बाद लौटने वाले कबीर शाह और उनके परिवार के मन में भारत के वीजा नियमों को लेकर जो नाराजगी है वह कश्मीर के बहुत से लोगों में है। हो सकता है कि यह पाकिस्तान में भी उन लोगों के मन में हो जिनकी जड़ें किसी वक्त हिन्दुस्तान में थीं या यहां बाद में उनके किसी तरह के रिश्ते बने। हैदराबाद की सानिया मिर्जा की पाकिस्तान में शादी तो बहुत खबरों में आई लेकिन कश्मीर जो कि भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद से बंटा हुआ है, वह पौन सदी पहले तक तो एक ही था और रोटी-बेटी के रिश्ते वहां आम थे। ऐसे में लोगों को अगर सुख और दुख के मौके को एक-दूसरे तक पहुंचने के लिए दस-बीस बरस का इंतजार वीजा के लिए करना पड़ता है तो इससे दोनों तरफ की हुकूमतों से लोगों की नाराजगी बढ़ती है।
डल झील पर हमें शिकारे में सैर कराते हुए आशिक भाई की जुबान और उनके हाथों के चप्पू एक सी रफ्तार से चलते थे। पूरे वक्त एक रनिंग कमेंटरी तीन घंटे तक डल झील के बारे में तो बताती ही रही, कश्मीर के बारे में और भी बहुत सी बातें वे कहते रहे। उन्होंने सियासत शब्द का एक नया ही मतलब सामने रखा। उन्होंने कहा कि कश्मीर में यह शियासत है, शिया का मतलब काला पहनने वाले और सत का मतलब सत्य। इस तरह सियासत से शियासत होते हुए उसका मतलब एक काले सच की तरह का हो गया है। अब उनकी यह बात जम्मू-कश्मीर की सियासत से नाराज लोगों के मन की बात भी हो सकती है और सियासत के सारे खेल को एक काला सच साबित करने वाली भी हो सकती है।
लेकिन जिन लोगों से हमारा वास्ता पड़ा उसमें पाकिस्तानपरस्त लोग नहीं थे। दर्जनों लोगों से मुलाकात और लंबी बात के बाद भी लोग बस इतने ही बुरे थे कि वे बुरी सरकारों के लिए हिकारत पाले बैठे थे। इससे अधिक नफरत या हिंसा उनके मन में नहीं थी। वे पाकिस्तान के साथ जाने का सोचने वाले तो बिल्कुल ही नहीं थे और उनका मानना था कि सरकारी बंदूकों की हिंसा अगर कश्मीर में खत्म हो जाएगी, अगर केंद्र सरकार से राज्य सरकार तक और बैंकों से लेकर बीमा दफ्तरों तक रिश्वत का चलन खत्म हो जाएगा, अगर लोगों को रोजगार मिलने लगेगा तो पत्थर चलने भी बंद हो जाएंगे। वहां के कामगार और कारीगर सैलानियों से फायदे जानते हैं और यह भी जानते हैं कि मिलिटेंसी बढऩे से लोगों का आना खत्म हो जाता है। जब तक सैलानी हैं तब तक तो वहां के लोग बर्फ पर स्लेज गाड़ी पर उन्हें बिठाकर खुद खींचकर भी रोजी कमा लेते हैं। (हालांकि हमें ऐसे घूमने की नौबत नहीं आई लेकिन मैं इस नजारे को कोलकाता के उन रिक्शों से भी भयानक पा रहा था जिनमें एक इंसान दूसरे इंसान को बर्फ पर इस तरह खींचकर ले जाए। और फिर मेरे भारी-भरकम वजन को लेकर तो मुझे ढोने वाले घोड़े पर तरस आ रहा था और ऐसे में स्लेज गाड़ी पर बिठाकर कोई दूसरा इंसान बर्फ पर पैदल चलता हुआ खींचे, यह सोचना भी भयानक लग रहा था।) इसलिए मेहनतकश लोग आतंक के साथ तो बिल्कुल नहीं हैं और कश्मीर के जिन लोगों की मुलाकात पाकिस्तान से आए हुए लोगों से होती है वे लोग भी पाकिस्तान की तरफ रूख करने की सोच नहीं सकते।
इन दिनों जितना बुरा हाल पाकिस्तान का हो रखा है और वहां से आने वाले लोग वहां की बदहाली जिस तरह बयां करते हैं उसके चलते कश्मीर के उन लोगों का नशा भी हिरन हो गया है जो लोग सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से पाकिस्तान से लगाव महसूस करते थे या हैं। लेकिन कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि अगर कश्मीर को स्वयत्तता देने जैसे जटिल मामले पर जनमतसंग्रह जैसा कोई नासमझी का काम किया जाएगा तो हो सकता है कि एक बड़ी आबादी आजादी की वकालत करने लगे। वहां के एक पत्रकार ने कहा कि जनमतसंग्रह में हर इंसान का एक वोट होगा और उनमें बहुत कम ऐसे हैं जो ऐसी आजादी के साथ जुड़ी हुई दिक्कतों के बारे में जानते हों या समझते हों। जो उसने कहा उससे मुझे कुछ महीने पहले फिलीस्तीन की राह पर पूरे रास्ते जोर-शोर से नारे लगाने वाले एक पाकिस्तानी दोस्त की याद आ रही थी जो कि ईरान की संसद के भीतर भी जोरों से नारे लगा रहा था-हम क्या चाहते, आजादी।
यही नारा कश्मीर के कुछ लोगों ने नारे की शक्ल में नहीं, बातचीत की शक्ल में रखा और इस एक अखबारनवीस साथी ने कहा कि यह आजादी कितनी महंगी पड़ेगी यह भारत से अलग होने के बाद ही इस कश्मीर को समझ आएगी। एक मुल्क कितनी दिक्कतों से चलता है इसका अहसास जनमतसंग्रह में हिस्सा लेने वाले लोगों को नहीं होता।
कश्मीर से लौट आने के बाद यहां पर जब अन्ना हजारे और उनकी टोली लोकपाल विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने या न लाने के बारे में एक जनमतसंग्रह की वकालत कर रही है, मांग कर रही है तो मुझे कश्मीर के इस पत्रकार साथी की बात याद पड़ रही है कि किसी जटिल मुद्दे पर जनमतसंग्रह के क्या खतरे हो सकते हैं? और सैद्धांतिक रूप से मैं देश के हर व्यक्ति को एक ही कानून के दायरे में रखने का हिमायती होने के बाद भी ऐसे मुद्दों पर किसी जनमतसंग्रह के खिलाफ हूं। मत उन्हीं मामलों पर लिया जाना चाहिए जिन पर लोगों की समझ हो। कल के दिन दूसरे किस्म की संवैधानिक जटिलताओं को लेकर भी लोकतंत्र के नाम पर एक जनमतसंग्रह की बात कोई और कर सकता है और कोई पारदर्शिता के नाम पर पारदर्शी तौलियों की भी वकालत कर सकता है। जब आज दिल्ली में बैठे बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग जाने किस नीयत के चलते ऐसे मुद्दे पर जनमतसंग्रह जैसी नासमझी की बात सोच-समझकर करते हैं तो फिर कश्मीर में खतरों के तले जीते लोग अगर ऐसी भावनात्मक बात सोचते हैं तो उसमें कोई हैरानी नहीं।
और अगर इतिहास को कोई पूरी तरह अनदेखा करना नहीं चाहता है तो उसे यह भी याद रखना होगा कि 1947 में जब जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने भारत के अंगे्रज गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन के साथ कश्मीर के भारत में विलय की बात की थी तो उसी समय यह तय हुआ था कि कश्मीर की जनता कहां जाना चाहेगी यह तय करने के लिए एक जनमतसंग्रह कराया जाएगा। यह दस्तावेज काफी लंबा-चौड़ा है जिसके बारे में यहां अधिक लिखना मुनासिब नहीं है लेकिन यह ऐतिहासिक हकीकत है कि 1950 के बाद से भारत की सरकार ने अपने-आपको इस वायदे से पूरी तरह से अलग कर दिया और पाकिस्तान इस तरफ के दो तिहाई कश्मीर को भारत के कब्जे का कश्मीर कहता है और भारत कश्मीर के उस तरफ के एक तिहाई हिस्से को पीओके कहता है, पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर।
ऐसे ऐतिहासिक जटिल मामले की छाया कश्मीर की आज की जिंदगी और सोच पर कम नहीं है।
श्रीनगर के लोग याद करते हैं कि किस तरह कोई 600 बरस पहले का हिंदू और बौद्ध राजाओं का राज इस इलाके में था। बाद में मुगलों के आने पर यहां मुसलमान राजा हुए। इस तरह न सिर्फ यह शहर बल्कि पूरा का पूरा जम्मू-कश्मीर इन तीनों धर्मों के लोगों की मिली-जुली और अलग-अलग बसाहटों वाला है और इन तीनों के लोगों ने आपस में रहना सीखा हुआ है। जिस वक्त हम हजरत बल दरगाह पहुंचे तो वहां जाहिर तौर पर मुसलमान अधिक थे लेकिन वहां इत्मीनान से फैले-पसरे सिख परिवार भी दिख रहे थे। उस दरगाह के भीतर पहुंचकर जो आराम से बैठे थे, वे वहां सिर्फ हड़बडिय़ा सैलानी की तरह नहीं आए थे और दरगाह के दरख्तों के साए में वे परिवार सहित देर तक थे। कुछ ऐसा ही हाल सोनमर्ग के रास्ते पर पड़ी एक मजार या दरगाह के बाहर देखने मिला जहां पर किसी हिंदू आस्थावान ने एक हरे कपड़े पर पीर बाबा की जय का नारा लिखकर अपने नाम सहित वहां टांग रखा था। हमने इस सफरनामे के शुरू में ही एक तस्वीर छापी थी जिसमें भारतीय फौज के एक हिंदू लांसनायक की याद में बनाई गई समाधि एकदम मुस्लिम समाधि की तरह की थी।
डल झील पर बसी हुई बस्ती को देखने के लिए जब हम वहां सड़क पर गाड़ी छोड़ पैदल बस्ती में घुसे तो मुहाने पर ही ईरान के धर्म गुरुओं की तस्वीरों वाला बोर्ड लगा था। ईरान के अपने ताजा अनुभव का सुबूत देते हुए मैंने अपने वहां के दोस्तों को कहा कि यह शिया बस्ती दिखती है। वहां पर आबादी का बड़ा हिस्सा तो सुन्नियों का है लेकिन शिया भी वहां कम संख्या हैं तो सही। लेकिन मैंने जानना चाहा कि क्या इन दोनों बिरादरियों के बीच लखनऊ की तरह के शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता, कभी नहीं हुआ।
कबीर शाह से मिलने के लिए मैं जब वहां एक बहुत भीतर के गांव गया तो वहां भी लोगों से यह पूछता रहा गांव में शिया भी हैं क्या और क्या उनकी मस्जिद, उनके कब्रिस्तान अलग हैं? तो पता लगा कि ये जगहें तो अलग-अलग हैं ही, और इस वजह से भी छोटे गांव में एक-दो शिया परिवार रहने से बचते हैं क्योंकि उन्हें सामाजिक रस्मों में दिक्कत आती है। इन दोनों बिरादरियों के बीच आमतौर पर वहां शादियां भी नहीं होतीं लेकिन बाहर के शहरों में जाने के बाद तो कश्मीरी हिंदू और मुस्लिम भी शादियां करते दिख जाते हैं। यह बातचीत वहां के शासक अब्दुल्ला परिवार के बारे में मैं इसी जगह दो-तीन दिन पहले लिख भी चुका हूं कि किस तरह फारुख अब्दुल्ला ने एक अंगे्रज ईसाई से शादी की, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला ने एक हिंदू लड़की से शादी की, और उमर अब्दुल्ला की बहन ने एक हिंदू गूजर सचिन पायलट से शादी की। लेकिन मुस्लिम समाज में ऐसी बातें आम नहीं हैं। (बाकी कल)

बात की बात

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बात की बात

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छोटी सी बात

अगर आपके खींचे तस्वीरों में से कुछ खराब भी हों, तो भी उन्हें तब तक अपने कम्प्यूटर पर से न मिटाएं, जब तक वैसी अच्छी तस्वीरें आपके पास न हों। कम अच्छी तस्वीरें भी यादों के लिए अच्छी होती हैं और आप लोगों को उन्हें दिखाकर जानकारी भी दे सकते हैं। जब किसी जगह, सामान या लोगों की अच्छी तस्वीरें हों, तो फिर खराब आई तस्वीरों को मिटाने में देर भी न करें।

छोटी सी बात


जिन लोगों के दफ्तरों में बहुत से लोग काम करते हैं, और ई-मेल का इस्तेमाल भी करते हैं, उनके लिए ऑफिस के पदनाम या डिसिगनेशन वाले ई-मेल एड्रेस बना लेना चाहिए, ताकि वे काम छोड़कर जाएं, तो न तो अपने साथ ई-मेल बॉक्स ले जाएं और न ही उनके पीछे इस दफ्तर की ई-मेल जाती रहे। ये कर्मचारी और संस्थान, दोनों के लिए जरूरी है। निजी ई-मेल एड्रेस निजी फोन नंबर का इस्तेमाल दफ्तर के काम के लिए ठीक नहीं होता।

मिलिटेंसी, मिलिटरी और मीडिया वाला कश्मीर

23 जून 2011
सुनील कुमार

रायपुर से दिल्ली होते हुए श्रीनगर पहुंचना और वापिस आना, सब कुछ सरकार के हवाई अड्डों से और हर जगह टीवी पर दूरदर्शन या तो गायब या धुंधला। रायपुर के हवाई अड्डे पर तो केंद्र सरकार का ठिकाना होने के बावजूद हिन्दी के सबसे गैरजिम्मेदार और सनसनीखेज, झूठे समाचार चैनल ही लगे रहते हैं, दिल्ली में निजीकरण के बाद के टीवी स्क्रीन भी दूरदर्शन दिखाना बंद कर चुके हैं और श्रीनगर में सब कुछ सरकारी होने के बाद भी बड़े से टीवी स्क्रीन पर दूरदर्शन के समाचार इतने धुंधले दिख रहे थे कि वे मानो केंद्र सरकार की धुंधली कश्मीर-नीति का एक प्रतीक थे।
जिस कश्मीर में केंद्र सरकार को अपनी बात अधिक खुलासे से करने की जरूरत है और वहां के अलगाववादी तबके को साथ जोडऩे की जरूरत है, वहां भी अगर हवाई अड्डे पर घंटे-घंटे बैठने वाले लोगों को दूरदर्शन के समाचार साफ-सुथरे दिखाने की फिक्र किसी अफसर को नहीं है, वहां से रोज आने-जाने वाले सांसदों को यह नहीं सूझता है तो यह अफसोस की बात है। केंद्र सरकार का प्रचारतंत्र तो ऐसी बातों को देखने पूरे देश घूम नहीं सकता लेकिन वहां के नेता-अफसर तो इन बातों का ध्यान रख सकते हैं।
एक तरफ तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में ऐसी लापरवाही, दूसरी तरफ कश्मीर की जमीन से जो लोग अपनी बात लिखते हैं उनके बारे में सरकार का नजरिया भयानक है। जिस दिन हम वहां थे उसी दिन बीबीसी उर्दू सर्विस की संवाददाता  के खिलाफ सरकार ने झूठी जानकारी फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए एक मामला कायम किया था। कश्मीर की इस एक जानी-मानी अखबारनवीस, लंदन में बसी हुई नईमा अहमद महजूर को आईटी एक्ट के तहत राज्य में असंतोष फैलाने के लिए आईटी के उपयोग का आरोपी बनाया गया है।
नईमा ने यह लिखा था-'पुलिस ने लालचौक पर इस आदमी को क्यों मारा? कोई वजह?Ó
जिस दिन हम श्रीनगर पहुंचे थे, उसी दिन कुछ घंटे के भीतर होटल के पास ही शहर की जानी-मानी जगह पर एक नागरिक की ऐसी मौत हुई थी। पुलिस का कहना था कि इसे कुछ बेचेहरा बंदूकबाजों ने मारा था, न कि पुलिस ने।
नईमा ने फेसबुक पर लोगों के पोस्ट किए गए कमेंट्स पर लिखा था-क्या पुलिस आराम से नहीं बैठने देगी लोगों को?
कश्मीर के अखबारों में इस बारे में छपी खबरों में यह था कि पुलिस ने नईमा के लंदन और श्रीनगर के पतों पर नोटिस भेज दिया है। एक दूसरी जानकारी यह थी कि पिछले दिनों श्रीनगर में पुलिस ने ऐसे दर्जन भर नौजवानों को पकड़ा है जिन्होंने 2010 में राज्य में चल रही अशांति को लेकर फेसबुक पर बातें लिखी थीं। कश्मीर के एक मुस्लिम धार्मिक गुरु के खिलाफ भी फेसबुक पर अपनी बातें लिखने पर ऐसा ही जुर्म कायम किया गया है।
वहां से लौटने के बाद मैं यहां जिन लोगों के नाम सहित उनकी कही बातें लिखने की सोच रहा था, वह सारी सोच आखिरी के दो दिनों में मिले अखबारों में पुलिस के रुख के बाद धरी रह गई। जिन्होंने मुझसे कुछ कहा उन्हीं लोगों को मेरे लिखे से परेशानी खड़ी न हो जाए। और कुछ जानकार लोगों का कश्मीर से परे भी यह कहना है कि हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून इस कदर कड़ा बन गया है कि उसके तहत इंटरनेट पर साधारण बातें लिखने वालों को भी धर लिया जा सकता है। फिर कश्मीर तो आज ऐसा इलाका है जहां पर बंदूकों का राज है और बंदूकों की सोच बहुत लोकतांत्रिक तो होती नहीं। फिर कश्मीर लगातार ऐसी मौतें देख रहा है जिसके लिए जिम्मेदार सैनिकों और सिपाहियों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वहां एक अलग कानून लागू है जिसके तहत केंद्रीय सुरक्षा दस्तों को किसी कार्रवाई से कई तरह की रियायत मिली हुई है।
कश्मीर के मीडिया में एक किस्म का सन्नाटा है। वहां मिले एक-दो अखबारनवीसों का कहना है कि जब दोनों तरफ से बंदूकें चलती हों, और दोनों तरफ कत्ल करने से परहेज न हो तो यहां बसे हुए अखबारनवीस पीढ़ी-दर-पीढ़ी कितना हौसला दिखा सकते हैं? वहां के लोगों के पास पुलिस की ज्यादती की और भी मिसालें हैं लेकिन कुछ का यह कहना है कि गोलियों और गिरफ्तारी से परे भी अखबार वालों को दबाने के और तरीके सरकार के पास रहते हैं और आतंक से लड़ाई का तर्क देते हुए उन सबका इस्तेमाल सरकार खुले या छुपे तरीके से करते रहती है। वहां जनसुरक्षा कानून  के तहत पिछली गर्मियों में एक पत्रकार साहिल मकबूल को गिरफ्तार किया गया, जम्मू-कश्मीर सरकार की आलोचना करने वाले एक अखबार को सेंसर किया गया, एक पे्रस फोटोग्राफर की हत्या कर दी गई, दर्जनों रिपोर्टरों को हमले में घायल किया गया और स्थानीय टीवी चैनलों को समय-समय पर रोका गया।
वहां की एक पत्रकार ने लौटने के बाद हुई बातचीत में बताया कि सरकार की मामूली आलोचना पर भी किसी पत्रकार को मिलिटेंट-सपोर्ट करार दे दिया जाता है। इसके अलावा कोई कड़ा आलोचक हो तो उसे आईएसआई का एजेंट कह दिया जाता है।
जम्मू-कश्मीर की बड़ी अजीब हालत है जहां सरहद करीब हो, आतंक से लंबी लड़ाई हो, अलगाववाद का बड़ा खतरा हो वहां पर मीडिया के खिलाफ घोषित और अघोषित कार्रवाई करने का मानो सरकार को एक हक सा मिल जाता है।
तहलका में इसी बरस फरवरी में छपी एक रिपोर्ट में यहां के मीडिया पर सरकार की ज्यादतियों की एक लंबी कहानी है जिसे इस (द्धह्लह्लश्च://222.ह्लद्गद्धद्गद्यद्मड्ड.ष्शद्व/ह्यह्लशह्म्4_द्वड्डद्बठ्ठ४८.ड्डह्यश्च?द्घद्बद्यद्गठ्ठड्डद्वद्ग=हृद्ग०५०२११ञ्जद्धद्गङ्कड्डद्यद्यद्ग4.ड्डह्यश्च) वेबसाईट पर देखा जा सकता है। अपने वहां के गिने-चुने दिनों में साथ के सैलानी-मूड के लोगों के साथ मेरे लिए अधिक अखबारनवीसी मुमकिन नहीं थी।
मीडिया और मिलिट्री, मिलिटेंसी और मजहब, इस किस्म की बातें वहां एक-दूसरे के साथ बहुत दूर तक जुड़ी हुई हैं। वहां एक वक्त तैनात रह चुके एक बड़े अफसर से बात होने पर उन्होंने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा दस्ते एक गैरबराबरी की लड़ाई लड़ते हैं। जिस जनता को वे बाहरी आतंकियों के हमलों से बचाने के लिए तैनात हैं वह जनता ही अपने देश के सैनिकों से नफरत करती है। आसपास से गुजरने वाले तमाम लोग जब आपको नफरत से देखते जाएं और सिर पर आतंकियों के हमलों का खतरा मंडराता रहता हो तो सिपाही और सैनिक एक अलग किस्म के तनाव में जीते हैं। ऐसे में राज्य की सरकार को मदद करने के लिए उनकी तैनाती भी अगर बहुत से तबकों की आलोचना पाती है और खुद राज्य सरकार जनता की तसल्ली के लिए बार-बार यह कहती है कि कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बल कम किए जाएंगे, तो जवानों का हौसला भी पस्त होता है। उसने आगे कहा कि लगातार ऐसी परिस्थितियों में काम करना आसान नहीं रहता जहां जनता नफरत के साथ-साथ पत्थरों से भी काम लेती है।
लेकिन कश्मीरी जब अपने सूबे से बाहर निकलकर बाकी हिन्दुस्तान में जाते हैं तो बाकी हिन्दुस्तान के लोग उन्हें कश्मीर से हिन्दुस्तान में आया हुआ मानते हैं। गे्रटर कश्मीर नाम के एक अंगे्रजी अखबार के एक कार्टूनिस्ट मलिक साजिद का दिल्ली का साबका कुछ इसी किस्म का था। उन्होंने अपने अखबार में इस बारे में लिखा है-दिल्ली के इंडिया हेबिटाट सेंटर में मेरे कार्टूनों की प्रदर्शनी हफ्ते भर के लिए लगी थी। इसमें मेरा काम 'अमन का आतंकÓ नाम से प्रदर्शित किया गया था। कश्मीर में जगह-जगह लगने वाले रेजरवायर से कार्टून टांगे गए थे। इसके साथ ही कुछ कीचड़-पत्थर और शराब की बोतलें भी मैंने रखी थीं जैसी कि कश्मीर में सुरक्षा दस्तों की बंकरों के आसपास सड़कों पर दिखती हैं। दिल्ली में रहते हुए मैंने अपने अखबार के लिए कार्टून बनाया, डिजिटल कैमरे से उसकी तस्वीर खींची और उसे ईमेल करने के लिए एक साइबर कैफे तक गया। वहां से मैं ईमेल कर ही रहा था कि उसी वक्त कनॉट प्लेस और गे्रटर कैलाश में बम फूटने की खबर वहां किसी को फोन पर लगी। इस पर साइबर कैफे का मालिक दूसरे लोगों से फुसफुसाकर बात करने लगा कि यह आदमी कश्मीरी है और इसकी शिनाख्त देखें। ये मेरे पास आकर मेरा पासपोर्ट पूछने, जब मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है और पहचानपत्र है तो उसे देखने के बाद वे यह देखने लगे कि मैं किस वेबसाईट को देख रहा था। जब उन्होंने पाया कि मैं कश्मीर की वेबसाईट देख रहा था तो उन्होंने तुरंत पुलिस को बुला लिया कि यहां एक कश्मीरी है। इस पर आनन-फानन वहां पुलिस पहुंची और पहुंचते ही चीखने लगी कि कहां है आदमी? इसके बाद वे मुझे गालियां देते हुए, घसीटते हुए बाहर ले गए और वहां करीब 200 लोग इस तरह इक_े हो गए कि कोई टेररिस्ट पकड़ाया है। मैं चीखते रह गया कि कोई जाकर हेबिटाट सेंटर में बताए कि जिसकी प्रदर्शनी लगी है उस आर्टिस्ट को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद थाने में हरामजादे कश्मीरी जैसी गालियां, देश के खिलाफ रहने की गालियां, चलती रहीं...
एक कश्मीरी कार्टूनिस्ट की प्रताडऩा की यह लंबी कहानी और यह बताती है कि कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान में कश्मीरियों को लेकर बर्दाश्त कितना कम है और बेसमझी कितनी अधिक। जब समझ का ऐसा फासला हो और देश के किसी तबके में इस फासले को दूर करने की चाह न हो तो कश्मीरी किस तरह बाकी भारत से जुड़े रहेंगे? (बाकी कल)

जन्नत को जहन्नुम बनाने पर आमादा सैलानी

22 जून 2011
सुनील कुमार

इतनी खूबसूरती के बीच भी कश्मीर में घूमना, उसे देखना, उस वक्त तकलीफदेह हो जाता है जब वहां गए हुए सैलानी और वहां के भी कुछ लोग, एक-दूसरे से या आपस में बदतमीजी पर उतर आते हैं। उत्तर भारत से गए हुए अधिकतर सैलानियों के मन में किसी कतार के लिए सम्मान बहुत कम दिखता है। जिस जगह दूसरे लोग घंटों से लाईन में लगे हैं वहां पर किस तरह रिश्वत देकर पीछे के रास्ते से आगे पहुंचा जाए इसका रास्ता कुछ लोगों को बहुत खुशी दे जाता है। हिन्दुस्तानियों का एक तबका इसी बात में खुश रहता है कि किसी साफ-सुथरी जगह पर कैसे थूका जाए या कैसे मूता जाए, जहां सिगरेट पीने की मनाही हो वहां कैसे सिगरेट पी जाए और मंदिर से लेकर केबल कार तक किस तरह अपने हद से अधिक आगे बढ़कर अपने को कामयाब माना जाए।
अलग-अलग इलाके के लोगों के मिजाज को देखें तो कुछ बातें खुलकर सामने दिखती हैं। कुछ लोगों को अलग-अलग इलाके के लोगों के बारे में ऐसी बात हो सकता है कि अपमानजनक भी लगे लेकिन अपने ही देश के लोगों की खामियों का अहसास किए बिना उन्हें खूबियों में कभी तब्दील नहीं किया जा सकता। गुजरात से आए हुए लोग सबसे शांत मिजाज के, धीरे बात करने वाले, कतार में लगने वाले लोग थे। बंगाल से आए हुए लोग किसी भी सार्वजनिक जगह पर बहुत जोरों से बोलने वाले दिखते हैं और आपस में भी वे जो कहते हैं उन्हें दूर-दूर तक के लोग सुन सकते हैं। दिल्ली और पंजाब से आए हुए लोगों की जुबान में बहुत मौकों पर गालियां भरी होती हैं और अपने अलावा किसी और के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं दिखता।
ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें किसी खूबसूरत और अच्छी जगह के मजे को किरकिरा करके रख देती हैं। कुछ ऐसी जवान, फैशनेबल, और चुलबुली लड़कियां केबल कार की घंटों लंबी कतार को तोडऩे की ऐसी कसम खाई बैठी थीं कि कई बार फटकार खाने के बाद भी वे किसी न किसी तरह सबसे आगे पहुंचकर घुसने में कामयाब हो गईं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जिन शहरी मां-बाप ने ऐसे लोगों को हजारों रुपए के चश्मे और दसियों हजार के मोबाईल फोन लेकर दिए, उन्होंने आसपास के किसी तमीजदार से कुछ तमीज लेकर अपने बच्चों को क्यों नहीं दी? जब हट्टे-कट्टे और जवान लोग, बच्चों वाले अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने को अपनी आदत बना लें तो वैसा समाज सभ्य लोगों के बीच कभी इज्जत नहीं पा सकता।
घूमने-फिरने की जगहों पर तरह-तरह से गंदगी फैलाना देखना हो तो उसके लिए हिन्दुस्तानियों से बेहतर मिसाल शायद कम ही लोगों की मिले। इन दिनों बाजार में तमाम चीजें जिस तरह की चमकदार प्लास्टिक पैकिंग की मिलती हैं, और वैसी पैकिंग के बिना कोई खुली चीज किसी बड़ी या महंगी जगह पर मिल ही नहीं सकती, वैसी चीजों को खाकर उसका कचरा खूबसूरत पहाडिय़ों पर फैला देने वाले, डल झील के पानी में बिखरा देने वाले सैलानियों के बीच नागरिक जिम्मेदारियों को कैसे पैदा किया जा सकता है, या फिर उन पर कुछ कड़े देशों की तरह का जुर्माना कैसे लगाया जा सकता है, इस बारे में सोचना चाहिए।
कश्मीर में जब बड़ी-बड़ी बातों के लिए भी सरकार और प्रशासन नामौजूद दिखते हैं तो ऐसी छोटी-छोटी बातें में बेहतरी की सोचने वाला कौन मिलेगा? कश्मीर के समाज में अपनी बड़ी-बड़ी दिक्कतों के चलते हुए, उनके मन में बड़े-बड़े रंज रहते हुए ऐसी कम अहमियत वाली बातों की तरफ उनका ध्यान न जाना तो ठीक है लेकिन मस्ती के मूड में जो सैलानी अपने अलग-अलग अच्छे भले इलाकों को छोड़कर वहां जाते हैं वे भी इस बारे में न सोचें तो यह दिल्ली-मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के अपने अविकसित रह जाने और असभ्य रहने का सुबूत रहता है। वहां रहते हुए ही मैंने कुछ छोटी-छोटी बातें अखबार के लिए लिखकर भेजीं कि किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों का बर्ताव उनकी जाति, उनके धर्म, उनकी बोली, उनके इलाके जैसी बहुत सी बातों के लिए दूसरों के मन में सम्मान या अपमान तय करता है।
गुलमर्ग में केबल कार के गोंडोला कहा जाता है। उससे ऊंचाई पर बर्फ तक जाने के लिए 800 रुपए खर्च भी करने पड़ते हैं। इसके बाद भी वहां कतार इतनी लंबी लगी थी कि कई जगहों पर जाते और आते हुए घंटों तक खड़े रहना पड़ रहा था। अलग-अलग इलाकों के बदतमीज लोग तो वहां कतारें तोड़ ही रहे थे, हाथ में वायरलेस सेट पकड़े हुए एक अफसर आधा-पौन दर्जन लोगों को लाकर कतार से परे सीधा गोंडोला में बिठाने लगा। मैंने इसे लेकर जब बहस की और अंगे्रजी में फटकार लगाते हुए उसका नाम और पद पूछा तो बहुत बहस के बाद उसने नाम बताया और कहा कि ये लोग राजकीय अतिथि हैं और इन्हें वह सीएम हाउस से लेकर आया है। ऐसी नौबत हर जगह आती है। किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री ही नहीं, छोटे-छोटे अफसरों के भेजे हुए लोग ऐसे ही कभी नवरात्रि में किसी मंदिर तक तो कभी किसी दरगाह पर पहुंचते हैं। लेकिन कई घंटे लाईन में लगने के बाद, और लोगों को बदतमीजी-मक्कारी करते देखने के बाद मेरा सब्र जवाब दे चुका था। काफी डाटकर मैंने इस राजकीय जत्थे को अपने से आगे बढऩे से तो रोक दिया लेकिन ऊपर पहुंचकर जब हम उतरे तो एक-दो मिनट के बाद ही चमक-दमक वाला यह ताकतवर जत्था भी पहुंचा। मैंने इस अफसर के साथ इस परिवार की तस्वीरें भी खींचकर रख लीं, लेकिन उस वक्त एक फिक्र यह भी थी कि वर्दियों और बंदूकों के साथ में चलने वाले इन लोगों से उलझना कश्मीर में कितनी समझदारी की बात है?
इसके कुछ दिन पहले जब हम पहलगाम से श्रीनगर लौट रहे थे तो इस राजधानी के शुरू होने पर ही फौज का एक ठिकाना इस हाईवे के दोनों तरफ पड़ा। वहां अचानक दोनों तरफ सेना के फौजियों ने ही तमाम गाडिय़ों को रोक दिया। इसके बाद सड़क के एक तरफ के इस आर्मी कैंप से निकलकर सड़क के दूसरे तरफ कुल एक महिला जा रही थी जो कि अपने हुलिए और कपड़ों से किसी अफसर की बीबी थी। आमने-सामने के गेट तक आने-जाने के लिए जिस अंदाज में बंदूकबाजों ने पूरा ट्रैफिक रोक दिया था और फिर मैडम जिस तरह टहलते हुए पार गईं, उनके पीछे एक वर्दीधारी एक ट्रे में चाय का सामान लेकर गया, उससे कश्मीर में सत्ता और जनता के बीच का फासला समझ में आता है। एक महिला सड़क किनारे रूककर, आती-जाती गाडिय़ों को देखकर भी सड़क पा कर सकती थी, लेकिन कश्मीर में दिल्ली की भेजी हुई फौजें अपने-आपमें एक कानून हैं।
ऐसे में 13 हजार फीट की एक जमी हुई पहाड़ी पर मैं अगर वहां के कुछ ताकतवर बंदूक और वायरलैस वालों से उलझ रहा था तो इसके पीछे समझदारी तो कम थी, अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने की एक नासमझी अधिक थी। बाद में कुछ जानकार लोगों ने कहा कि कश्मीर ऐसी बहस की जगह नहीं है।
मुझे लगा कि अगर किसी राज्य को कुदरत से मिली खूबसूरती से खिंचे आ रहे सैलानियों की गिनती में इजाफा करना है, या उनसे अधिक कमाई करनी है तो उस राज्य को अपने-आपको एक बेहतर मेजबान बनकर भी दिखाना होगा। जिस परले दर्जे की बदइंतजामी वहां पर सरकार के तमाम कामों में एक सैलानी के सामने आती है वह भयानक है। जो अच्छी बातें सामने आती हैं वे कुदरत की दी हुई हैं और वहां के गरीब लोगों के भले मिजाज की हैं। कश्मीर में एक नौजवान मुख्यमंत्री के रहते हुए भी अगर रोजमर्रा की जिंदगी के हालात नहीं सुधरते हैं तो यह राज्य अपनी संभावनाओं को नहीं पा सकेगा। और हो सकता है कि एक नौजवान से ही ऐसी उम्मीदें बेबुनियाद हों और कहीं कोई बुजुर्ग मुख्यमंत्री भी बेहतर काम करने वाला आ जाए।
श्रीनगर की एक ठीक-ठाक दर्जे की होटल में हम अपने एक कश्मीरी दोस्त के ठहराए रूके थे। होटल मालिक के परिवार के मेहमान होने की वजह से जाहिर था कि बाकी लोगों के मुकाबले हमें कुछ अधिक अच्छा बर्ताव मिलता, और मिला भी। लेकिन उसके बाद भी ऐसा लगा कि वहां काम करने वाले लोगों को कुछ और अधिक टे्रनिंग की जरूरत है जिससे कि सैलानी कुछ बेहतर अनुभव लेकर जा सकें। वहां लोगों में पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग की शायद कुछ कमी है इसलिए सभी तरह के काम करने वाले लोग अपने मुहल्ले में काम करने के लायक तो हैं लेकिन बाहरी लोगों से वास्ता पडऩे पर उनमें कुछ-कुछ कमियां दिखती हैं। इस मामूली बात को मैं कश्मीर के नौजवानों में पनपते अलगाववाद और आतंक से जोड़कर देख रहा हूं कि अगर उन्हें बेहतर काम-धंधे से लगाना है तो उन्हें मामूली काम को भी खूबी के साथ करने की ट्रेनिंग देने का काम सरकार को करना चाहिए। जब तक ऐसा विकास काम करने वालों के बीच नहीं होगा तब तक बेरोजगारों के दिन नहीं सुधरेंगे और वे शायद रोज के मेहनतानों पर पत्थर फेंकने का काम अच्छा मानते रहेंगे।
जिस देश में देश भर के अफसरों को देश भर के राज्यों में भेजने का पुराना इंतजाम है वहां पर भी जम्मू-कश्मीर राज्य के आईएएस अफसर या उस राज्य के स्थानीय अफसर चीजों में इतने मामूली सुधार क्यों नहीं कर पाते यह मेरे लिए हैरानी की बात है। हो सकता है कि कुछ और राज्य इससे भी बुरी हालत में हों लेकिन ऐसी मामूली गलतियों को सही ठहराने के लिए कम से कम मैं तो किसी अधिक बुरे से तुलना करना ठीक नहीं समझता। (बाकी कल)

राहुल गांधी देश को जवाब दें

23 जून 11
उत्तरप्रदेश में किसानों और पुलिस के टकराव के बाद पुलिस ज्यादती के आरोपों के बीच कांगे्रस के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी मोटर साइकिल पर बैठकर दिल्ली के करीब के भट्टा परसौल पहुंचे थे और वहां से निकलकर उन्होंने ये गंभीर आरोप लगाए थे कि वहां महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और बड़ी संख्या में किसानों की हत्याएं हुईं। अब ऐसी खबर है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच में पाया है कि वहां पर न कोई बलात्कार हुआ और न ही किसानों की हत्या हुई।
कांगे्रस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक दिग्विजय सिंह के मार्गदर्शन में राहुल गांधी के राजनीतिक प्रशिक्षण का अंदाज लोगों को है। इस मौके पर दिग्विजय राहुल के साथ मौजूद भी थे। और ऐसे तमाम आरोप दिग्विजय ने भी लगाए थे। इसलिए यह बात साफ है कि कांगे्रस की अमूल-बेबी की कही बातें दिग्विजय के मुताबिक ही रही होंगी। इसलिए हम राहुल गांधी की अपरिपक्वता को कोई रियायत इस मामले में नहीं दे सकते। वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर आकर, अपनी पारिवारिक विरासत से सिखने का पूरा मौका पाते हुए, कांगे्रस की राजनीति की धुरी पर रहते हुए, और किसी भी दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को संभालने की अटकलों वाले नेहरू-गांधी परिवार के इस चिराग को नासमझी की रियायत नहीं दी जा सकती। जब एक दलित महिला मुख्यमंत्री के राज पर आरोप लगाने हों, तो हम कुछ सावधानी बरतने को ही समझदारी भी मानेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि उत्तरप्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांगे्रस किसी तिनकेनुमा मुद्दे को भी छोडऩा नहीं चाहती और वह इसके लिए परले दर्जे के ऐसे झूठे आरोप लगाने से भी नहीं चूकी जिसका कि गलत साबित होना तय सा था।
हम मायावती के राज को बहुत अच्छा नहीं मान रहे और आज दरअसल माया राज की बदअमनी के खिलाफ ही लिखना तय था, लेकिन फिर केंद्र सरकार के अधीन सी काम करने वाले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह रिपोर्ट ने हमारा रूख मोड़ दिया। उत्तरप्रदेश में रोजाना होते कई-कई बलात्कार, सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्रियों और विधायकों के बड़े-बड़े अपराध और जेल में कल हुई एक बहुत संदिग्ध हत्या जैसे अनगिनत मामले माया के खिलाफ हैं। लेकिन इन सबके बीच भी यह बात अधिक मायने रखती है कि राहुल गांधी के लगाए हुए इतने गंभीर आरोप झूठे साबित होते दिख रहे हैं। राजनीति यह तो कहती है कि राहुल गांधी उत्तरप्रदेश गए होते और किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का या माया सरकार के खिलाफ उन जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करते। उन्होंने अलग-अलग नजरियों से इन दोनों ही कामों को किया लेकिन उसके बाद जब वे बलात्कार और हत्या जैसे ठोस अपराधों के आरोप लगाते हैं और किसानों की लाशों को बड़ी संख्या में ठिकाने लगा देने जैसी बात कहते हैं तो फिर उन्हें आज देश को इस बात पर जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ऐसी गैरजिम्मेदारी क्यों की?
दरअसल पिछले कुछ महीनों में दिग्विजय सिंह ने कांगे्रस पार्टी के औपचारिक प्रवक्ताओं से परे जाकर एक अलग आक्रामक मोर्चा खोलने का जो काम किया है उसे लेकर लोगों के बीच यह धुंध छाई हुई है कि वह सोनिया गांधी के कहे हुए, उनकी सहमति से या फिर अपनी मर्जी से एक आक्रामक नेता बने हुए हैं? लेकिन आक्रामकता का सिलसिला लोगों को कई तरह की गलतफहमी या खुशफहमी का शिकार भी बना देता है। दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और संघ परिवार के खिलाफ अपने अभियान की धार को लगातार बढ़ाते हुए इतना तेज कर दिया है कि अब उस पर चलना शायद उनके खुद के लिए मुश्किल साबित होगा। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि संघ परिवार के खिलाफ कांगे्रस के भीतर अर्जुन सिंह के जाने के बाद एक जगह खाली हो गई थी और दिग्विजय उसे भरने का काम भी कर रहे हैं। यह काम पार्टी अधिक चाहती है या वे खुद अधिक चाहते हैं इसे समझने का लोगों के पास कोई जरिया नहीं है क्योंकि कांगे्रस की मुखिया अधिकतर मामलों में मुंह नहीं खोलती हैं और पार्टी के भीतर के मुद्दों पर भी उनका रूख सामने नहीं आता है।
खैर, हमें इस पार्टी के भीतर के मुद्दों से अधिक लेना-देना नहीं है लेकिन दिग्विजय-राहुल की मायावती के खिलाफ यह पूरी तरह से नाजायज और गैरजरूरी बयानबाजी आज उनकी पार्टी को ही भारी पड़ रही है। हमारा लिखने का मकसद यह है कि जिस पुलिस पर बलात्कार और हत्या, हत्या के बाद लाशों को तबाह कर देने के आरोप लगाकर राजनीति चाहे जितनी की जाए, इससे पुलिस पर क्या असर पड़ता है? यह पुलिस कल तक किसी दूसरी पार्टी की सरकार के मातहत काम करती थी, आज मायावती के नीचे काम कर रही है, कल किसी और पार्टी की सरकार रहेगी। ऐसे में अगर विपक्ष पुलिस पर ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाते रहेगा तो क्या किसी ने यह भी सोचा है कि इन पुलिस कर्मचारियों को घर जाकर अपनी बीबी, अपने बच्चों को भी मुंह दिखाना रहता है और समाज में जीना भी पड़ता है। बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर आरोप इस लापरवाही से, इस बदनीयती से किसी पर लगाना हम बहुत खराब मानते हैं और कल को अगर मायावती की सरकार दिग्विजय-राहुल पर झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने का जुर्म कायम करती है तो अदालत में कांगे्रस किस तरह अपने-आपको बचाएगी?
भारत जैसी राजनीति में हम वैसे भी बहुत ही फिजूल की गालीगलौज देख रहे हैं। जब भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी मुलायम-लालू से लेकर कांगे्रस तक गालियों की बौछार करते हैं तो उससे चटपटी हैडिंग अखबारों को मिल जाती हैं। टेलीविजन समाचार चैनलों को बार-बार दिखाने के लिए उनका एक बयान मिल जाता है। लेकिन इस चक्कर में देश के जो जरूरी मुद्दे हैं वे गायब हो जाते हैं। हमें यह भी लगता है कि क्या मीडिया को भी गैरजिम्मेदारी और बदनीयती से की गई गालीगलौज को बढ़ाने से बचना नहीं चाहिए? क्या ऐसे बयान देने वालों को उनके शब्दों और उनके मतलब को लेकर घेरना नहीं चाहिए? लेकिन दर्शक संख्या और पाठक संख्या के गलाकाट मुकाबले में मीडिया उसी तरह गंदगी को परोसने में ओवरटाईम कर रहा है जिस तरह वोटों की लड़ाई में आगे निकलने के लिए पार्टियां और नेता गंदगी परोस रहे हैं। देश को इससे उबरने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री लोकपाल के बाहर क्यों?


22 जून 11
अपने कुनबे और पार्टी के लोगों से मिलने चेन्नई से चलकर तिहाड़ जेल पहुंचने की बेबसी वाले डीएमके ने अपनी भागीदारी के यूपीए-मुखिया कांगे्रस के लिए एक परेशानी खड़ी की है। जब कांगे्रस के यूपीए-मंत्री लगातार देश को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना क्यों ठीक होगा, तब डीएमके ने मांग की है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए।  जाहिर है कि डीएमके अपनी नाराजगी को जाहिर करना चाह रहा है। लेकिन डीएमके की बात से परे भी इस बारे में सोचने की जरूरत है।
हम बरसों से यह लिखते आ रहे हैं कि देश के किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई खास दर्जा नहीं मिलना चाहिए जिससे कि वह दूसरे लोगों के अधिकार और सम्मान के ऊपर गिना जाए। हमने इस देश की सरकारी जुबान से वीआईपी शब्द भी हटाने पर जोर डाला था क्योंकि किसी एक व्यक्ति को दूसरों से कम महत्वपूर्ण कैसे गिना जा सकता है। जब इस देश की तमाम कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अलग-अलग समय पर भ्रष्ट साबित हो चुके हैं या उनके भ्रष्टाचार की खुली चर्चा हो चुकी है तब प्रधानमंत्री को या सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जजों को लोकपाल के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए? अभी कुछ ही समय पहले रिटायर हुए सुपीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन पर अपने कुनबे सहित भ्रष्टाचार में शामिल होने के कई आरोप सामने आए हैं। उन्हें वहां से रिटायर होने के बाद केंद्र सरकार ने एक दूसरे राष्ट्रीय संवैधानिक पद पर नियुक्त भी कर दिया है। इसी वक्त के आसपास केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर एक ऐसे अफसर को मनमोहन सरकार ने नियुक्त किया था जिस पर भ्रष्टाचार का मामला चल ही रहा था। नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की दखल पर सतर्कता आयुक्त को हटना पड़ा। ये तमाम कुर्सियां लोकपाल के दायरे से बाहर रखी जा रही हैं या इन्हें विमानतलों पर सुरक्षा जांच से छूट जैसे विशेष अधिकार मिले हुए हैं।
लोकतंत्र के भीतर जो व्यक्ति अपने-आपको वीआईपी का दर्जा दिलाना चाहते हंै, या मंजूर करते हैं, वे एक अलोकतांत्रिक काम करते हैं। किसी को भी लोकपाल के दायरे से बचने की क्या जरूरत है? यह तो ठीक है कि आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निजी छवि को लेकर कुछ लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना ठीक होगा। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके बंगले के बगल में बसाए गए उनके दत्तक-दामाद के उस वक्त अपने जैसे कामों के लिए चर्चा में थे, क्या उसके बाद भी कोई प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सोच सकता है? आज यूपीए के भीतर कांगे्रस के मंत्री जिस तरह के तर्क प्रधानमंत्री को लेकर दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वे अपनी बात देश की जनता के गले से उतारने में लगे हैं। लेकिन मनमोहन सिंह को एक शो-केस के खूबसूरत पुतले की तरह इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। और फिर किसी इंसान के ईमानदार होने के हम इतनी बड़ी खूबी भी नहीं मानते कि उसकी मिसाल को प्रस्तावित कानून को प्रभावित करने के लिए काम में लाया जाए। यह तो हर व्यक्ति के लिए एक साधारण बात होनी चाहिए कि वह ईमानदार रहे।
कांगे्रस के भीतर भी दिग्विजय सिंह ने अपनी राय दी है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए। डीएमके के बाद हो सकता है कि कुछ और भागीदार पार्टियां भी इस राय से इत्तफाक रखें। अभी लोकपाल मसौदा कमेटी में तमाम मंत्रियों के कांगे्रसी होने की वजह से उनकी राय एक किस्म से कांगे्रस की राय जैसी भी दिखने लगी है। लेकिन जब केंद्रीय मंत्रिमंडल लोकपाल मसौदा लेकर बैठेगा तो हमारा ख्याल है कि ऐसी कुछ और पार्टियां भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखना चाह सकती हैं जिनके अपने प्रधानमंत्री कभी नहीं बन सकते। यूपीए को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बाकी लोगों की बात का भी ख्याल रखना पड़ेगा और वहां पर उन्हें सिर्फ कांगे्रस की मर्जी पर चलने की बददिमागी छोडऩी पड़ेगी।
इस देश में बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग जेल जा चुके हैं या जाने से बचे हुए हैं। ऐसे में उनमें से किसी को कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए। लोकपाल के दायरे में हर किसी को लाना चाहिए, लेकिन अपनी इस सैद्धांतिक सोच को हम सरकार पर एक-एक शब्द नहीं थोपना चाहेंगे क्योंकि भारत के संविधान की कुछ दूसरी जटिलताएं भी हो सकती हैं। लेकिन हम यहां पर जोर देकर यह कहना चाहेेंगे कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को जांच के दायरे में रखना जरूरी है, और किसी को भी इससे रियायत नहीं मिलनी चाहिए।

बात की बात

बात की बात

पीढ़ी-दर-पीढ़ी का राज ऐसा...

यह ठीक है कि कश्मीर पर कई अलग किस्म के दबाव हैं जो कि भारत के किसी दूसरे प्रदेश पर नहीं है, लेकिन उनसे वहां की सरकार की बदहाली को सही ठहराना मुमकिन नहीं। सैलानियों के मेजबान इस सूबे का हाल जैसा धूल, धुएं और लीद से लबालब है वह देखते ही बनता है (या कहें कि देखते नहीं बनता है?)
वहां के पिछली पीढ़ी के मुख्यमंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला के बारे में इज्जत से बोलने वाला कोई नहीं टकराया। उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को जरूर कुछ लोग बाप से बेहतर मानते हैं कि वह लोगों से मिल-जुल लेता है और लोगों को कुछ समझता है। फिर चाहे करता कुछ नहीं।
मुम्बई और दूसरे देशों में सैलानी की तरह सितारों के साथ घुमने-फिरने, नाचने-गाने की डॉ. फारूख अब्दुल्ला की तस्वीरें सबको याद हैं। एक आदमी ने कहा- जो चीफ मिनिस्टर पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने स्टेट से बाहर घूमता हो वह काम क्या करेगा?
यह एक लोकप्रिय तर्क हो सकता है और तुरंत एक से दूसरे तक पहुंच सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से नेता, अफसर, ऐसे होते हैं जो हर दिन काम करने के बाद भी अपने सूबे का नुकसान करते हैं उसे खा-पी जाते हैं। अब अगर राजा साल के तीन सौ पैंसठ दिन दूरसंचार मंत्रालय में काम करता होता, कलमाड़ी पूरे वक्त राष्ट्रमंडल खेलों के दफ्तर में काम करता होता, तो क्या देश का कुछ भला होता?
तीसरी पीढ़ी का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कई बरस से सत्ता में है, पहले दिल्ली की, अब कश्मीर की। लेकिन एक कलेक्टर के स्तर पर भी जो मामूली मरम्मत या सुधार के काम होने चाहिए, उनका भी कुछ पता नहीं है। सैलानियों से लबालब इस राज्य में कोई आतंकी तो आकर रोकता नहीं कि गांवों के नामों की तख्तियां न लगाओ, सड़क किनारे मील के पत्थर न लगाओ, मोड़ पर सावधान करने वाले बोर्ड न लगाओ, फुटपाथों की ऊंचाई कम न करो।
दरअसल आतंक और अलगाववाद से जूझने के बहाने सरकार को नालायक और निकम्मा बने रहने की छूट दे रखी है। एक हफ्ते में वहां के जितने जिले देखने मिले, सब आगे-पीछे के ही बदहाल थे। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कलेक्टर भी अपने-अपने जिलों में कोई न कोई काम करते दिखते हैं, कश्मीर में इन तमाम जिलों में कदम-कदम पर लगा कि फलां काम को करने की फुरसत अफसरों को क्यों नहीं है? केन्द्र सरकार से पैसे तो कश्मीर की दूसरे राज्यों के मुकाबिले बहुत अधिक मिलते हैं।
बिजली बंद रहने का हाल यह था कि कोई शाम ऐसी नहीं थी कि सड़क से गुजरते दर्जनों अंधेरे गांव-कस्बे पार न करना पड़े। श्रीनगर में एक अस्पताल की जरूरत पडऩे पर मैं हमारे ड्राइवर मकबूल भाई के साथ वहां के बहुत बड़े सरकारी चेस्ट हॉस्पिटल पहुंचा तो बंद बिजली के बीच अस्पताल के बोर्ड-गेट तक नहीं सूझ रहे थे, टीले पर बसी इमारत तो किसी भी तरह से दिख ही नहीं रही थी। बाजार में भी दूकानें अपने-अपने इंतजाम से रौशन थीं।
सरकार की बदहाली की यह तीसरी पीढ़ी नेशनल कांफ्रेंस की है और दूसरी पीढ़ी की पीडीपी की महबूबा मुफ्ती सईद भी बाप के साए में राजनीति में हैं। लेकिन विरासत किसी को काबिल बना देती तो फिर कनिमोझि महीनों से जेल में क्या होती? (या फिर करूणानिधि से यही उसे विरासत में मिली है?)
श्रीनगर की डल लेक के किनारे हजरत बल दरगाह है। उसी के जरा से पहले सोच समझकर शेख अब्दुल्ला की मजार बनाई गई है। उस वक्त अदालतें चौकस नहीं थीं, इसलिए झील पर ही यह काम किया गया। लेकिन हजरत बल दरगाह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों में से एक परिंदा भी शेख अब्दुल्ला की मजार पर ठहरा नहीं दिखा। एक तख्ती तक वहां लगी नहीं दिखी और छह बार वहां से गुजरने पर भी सन्नाटा ही दिखा। अपने बाप और दादा की मजार पर एक तख्ती तक कश्मीर के मुख्यमंत्री क्यों नहीं लगवा पाए?
जब आतंक का साया हो, अलगाववादियों के पत्थर चल रहे हों, तो सरकार को सरहद का बहाना देकर कई किस्म का काम नकारने का रास्ता मिल जाता है। कश्मीर में राज्य सरकारों की नाकामयाबी को वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्होंने बेहतर सरकारें देखी हैं, बेहतर राज्य देखें हैं। बाकी सैलानी तो जन्नत के नजारे देखते-देखते ही लौट जाते हैं। हो सकता है कि देश के कई राज्य इससे भी बुरे चल रहे हों, और वहां के लोगों को कश्मीर में कुछ न खटकता हो।
उमर अब्दुल के दादा शेख अब्दुल्ला इस राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री रहे। और उन्हीं की पार्टी ने उतने बरस लगातार राज किया जितने बरस नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे, 1947 से 1964 तक। नेहरू के जाने के जरा से पहले ही उनके इस राज्य ने पहला कांग्रेसी मुख्यमंत्री देखा 1964 में। फिर 1965 से यहां के प्राईमिनिस्टर की कुर्सी का नाम बदलकर चीफ मिनिस्टर कर दिया गया। कुल मिलाकर तीन बरस के पीडीपी के राज को छोड़ें तो अब्दुल्ला और नेहरू के कुनबों की पार्टी ही इस पर राज करती रहीं, लेकिन यहां का बुरा हाल कायम रहा। राजधानी से बेहतर तो और कहीं कुछ हो नहीं सकता।
राज्य का धर्मनिरपेक्ष मिजाज आतंकी घटनाओं, अलगाववाद और कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर देने से परे, रोजमर्रा में बना हुआ है। साम्प्रदायिक दंगे सुनाई नहीं पड़ते, शायद इसलिए भी कि यहां पंडितों ने उसी तरह रहना सीख लिया है जिस तरह गुजरात में मुसलमानों ने। लेकिन शायद एक वजह और भी है। यहां से गए नेहरू की बेटी ने एक पारसी से शादी की थी, और उसकी अगली पीढ़ी तो इटली से बहू ले आई। कश्मीर के आज के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की शादी एक फौजी अफसर रामनाथ की बेटी पायल से हुई और उमर अब्दुल्ला की बहन सारा की शादी सचिन पायलट से हुई। अब कश्मीर के आम लोगों का यह अंदाज है कि उमर अब्दुल्ला की बहन की शादी राहुल गांधी से हो सकती है। उमर के पिता फारूख अब्दुल्ला ने एक अंग्रेज-ईसाई नर्स मौली से शादी की थी। इसलिए सत्ता पर काबिज कुनबे का निजी मिजाज दिल्ली के गांधी-नेहरू कुनबे सरीखा ही है।
कश्मीर के कई इलाकों से गुजरते एक गौर करने वाली बात यह भी थी कि यहां के किसी भी सर्वजनिक जगहों पर अखबार बिकते देखने को नहीं मिला जिस तरह हमारे यहां सड़क किनारे, चायठेलों, पानठेलों, बस स्टैंड, होटलों के आसपास अखबारों को बिकते देखा जा सकता है पर यहां ऐसा कोई चलन नहीं दिखा। शायद केवल घरों तक पहुंचता हो। वैसे यहां कई प्रेस काम्प्लेक्स हैं, कई अखबार छपते हैं। हो सकता है इसका कारण यह भी हो कि आतंकी गतिविधियों, हिंसा की खबरों से यहां आने वाले पर्यटकों का हौसला कम होता हो।
 (बाकी कल)

छोटी सी बात


जब बुराई से लडऩे की आपकी ताकत न रहे, तो भी उससे दूर रहने का हौसला तो दिखाएं। लड़ाई और भागीदारी के बीचभी एक रास्ता रहता है। दुनिया का इतिहास, समाज की यादें, सब दर्ज करते हैं।

कर्नाटक में अब नया धोखा,भक्त, भगवान दोनों को!

21 जून 11
सुनील कुमार
कर्नाटक की कुटिल राजनीति का कोई इलाज नहीं दिखता कभी सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर कमल को झुलसा देने वाली घर की आग लगती है तो कभी मुख्यमंत्री को निपटाने में ऐसे जुट जाता है कि दिल्ली में उसके आका शर्मा जाते हैं। पैसों के नंगे नाच में कर्नाटक की राजनीति इतनी अश्लील है कि उसे धनबल के पैमाने पर 'एÓ सर्टिफिकेट मिलना चाहिए। लेकिन अब एक बिल्कुल ही नया नाटक वहां शुरू हो गया है ईश्वर के दरबार में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और उनके कट्टर विरोधी जनतादल-एस के एच.डी कुमारस्वामी के बीच आरोपों की सच्चाई के लिए वहां के एक मंदिर में कसमें खाई जाएंगी। वहां भक्तों के बीच इस भगवान के लिए मान्यता है कि उसके सामने झूठी कसम खाने वाला पूरे कुनबे सहित तबाह हो जाता है।
यह बड़े मजे की कुश्ती है। इसी मंदिर में नहीं, दुनिया के किसी भी धर्मस्थल में, ईश्वर में इंसाफ कर देने की इतनी ताकत होती, तो रोम में ईसा मसीह के रहते जर्मनी में हिटलर दस लाख बेकसूर यहूदियों को कैसे मार पाता? पंजाब में भिंडरावाले के हत्यारे स्वर्ण मंदिर से निकल-निकलकर बेकसूरों को मारकर दुबारा वहीं कैसे छुप जाते? कश्मीर की हजरत बल दरगाह पर आतंकी कैसे कब्जा कर पाते? बिरला मंदिर वाली दिल्ली में निठारी के बलात्कारी-हत्यारे इतने बच्चों को मारकर उन्हें खा कैसे पाते? जगन्नाथ मंदिर वाले उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जिंदा कैसे जलाया जाता? प्रार्थना के लिए जाते गांधी को एक हिंदू उग्रवादी नाथूराम गोडसे कैसे गोली मार पाता? ओसामा बिन लादेन अल्लाह का नाम लेकर कैसे हजारों हत्याएं कर पाता? कैसे दक्षिण भारत के मंदिरों में देवदासी बनाने के नाम पर गरीब बेबस लड़कियों के बदन लूटे जाते? कैसे अल्लाह का नाम लेकर छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियों की शादी कब्र में पांव टांगे बूढ़ों से हो पाती? कैसे राम-सीता को घर से निकाल पाते? कैसे अहिंसा की बात करने वाले बड़े पैमाने पर कन्या भू्रण हत्या कर पाते?
ऐसी मिसालों की फेहरिस्त का अंत नहीं है। ईश्वर की शपथ अनिवार्य रूप से लेकर ही जो अमरीकी राष्ट्रपति बन पाता है वह किस तरह वियतनाम में दसियों लाख की हत्या करवाता है इसे देखने वाला ईश्वर कहां है? अगर कर्नाटक में ईश्वर होता तो वह हजारों करोड़ की अवैध खुदाई करके खरबपति बने मंत्रियों से सब कुछ छीनकर इस देश के भूखे-नंगे लोगों में न बांट देता? जब इसी कर्नाटक में वेलेंटाईन डे पर प्रेम करने वाले साथ रहते हैं, तो इसी ईश्वर का नाम लेने वाले उन पर हमले करते हैं, तब क्या करता है ईश्वर? देश भर की जेलों में सजायाफ्ता मुजरिम अपने-अपने ईश्वर की उपासना करते दिखते हैं, अगर ऐसा ईश्वर सचमुच होता, और उसका असर होता तो अपने ऐसे भक्तों को अपराध से क्यों नहीं रोकता? क्यों मस्तान को हज जाने से खुदा नहीं रोकता? क्यों किसी हिंदू देवता ने गोडसे का हाथ नहीं थामा? क्यों पशुपति नाथ मुम्बई में हर बरस चकलाघरों में उतारी जाती दसियों हजार नाबालिग  नेपाली लड़कियों को बचा पाते? क्यों अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में राम बलात्कारियों को नहीं रोक पाते? बलात्कार की शिकार लड़कियों को जलने से नहीं रोक पाते? उनकी आंखें फोड़ दी जाती हैं, और राम देखते रहते हैं?
कर्नाटक के नेताओं के नंगे नाच का यह आखिरी बेशर्मा आइटम है जब वो ईश्वर की एक धारणा का बेजा इस्तेमाल करके जनता को फिर बेवकूफ बना रही हैं। इस मंदिर के देवता के सामने झूठ बोलने पर वैसी ही तबाही की कहानियां प्रचलित हैं, जैसी कि चौथाई सदी पहले संतोषी मां के नाम से चलती थीं। संतोषी मां की पूजा न करने से साहूकार के बेटे का पूरा कुनबा किस तरह खत्म हो जाता है, यह डरावनी कहानी पर्चों के रास्ते देश भर में फैलाई गई थी। कर्नाटक के एक मंदिर को एक अदालत की तरह दो नेता बीच में ला रहे हैं। हम मजे से 27 जून का इंतजार कर रहे हैं कि इस दिन दोनों में से कम से कम एक तो झूठ बोलेगा ही, और फिर हम देखेंगे कि कौन तबाह होता है। सच की अग्निपरीक्षा का यह पूरा नाटक फर्जी है। अगर इन दोनों नेताओं में दम है तो दोनों नार्को टेस्ट के लिए जाएं और उन पर लगे तमाम आरोपों के बारे में उनसे बेहोशी की हालत में जवाब लिए जाएं। ऐसा ही नार्को टेस्ट बाबा रामदेव का होना चाहिए जो रामलीला मैदान में पुलिस पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं। किसी पर इतना गंभीर आरोप लगे तो उसके सच को तो परख ही लेना चाहिए। और बाबा तो अपना जीवन खुली किताब बताते हैं, नार्को टेस्ट में उनके पास छिपाने को तो कुछ रहेगा नहीं!
इस देश में तो ईश्वर के नाम को लेकर जालसाजी कर रहा है, कोई गांधी का नाम लेकर तानाशाही कर रहा है और कोई योग के नाम पर अराजकता कर रहा है। यह सब लोकतंत्र के ढांचे को कमजोर करने की तरकीबें हैं। एक तरफ जंगलों में नक्सली-लोकतंत्र को बारूदी सुरंग से उड़ा रहे हैं, दूसरी तरफ शहरों में आस्था के नाम पर लोग लोकतंत्र को हाशिए पर धकेल रहे हैं। सार्वजनिक जीवन के सत्ताभोगी लोग भी लोकतांत्रिक जांच और जवाबदेही से बचकर अगर आस्था के आंगन में नंगा नाच रहे हैं तो यह इस देश की आस्थावान आबादी के साथ एक और धोखाधड़ी है। जनता के पैसों पर ऐश करने वाले और उसे लूटने वाले लोग अब ईश्वर का नाम लेकर उसे और छलने जा रहे हैं।
दूरसंचार घोटाले में जेल में बंद शाहिद बलावा पर हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप है। वह इस देश का सबसे नौजवान खरबपति कहा जा रहा है। अब उसे बचाने के लिए उसका परिवार रोज दो बकरों को काटकर गरीबों में बांट रहा है। बताया गया है कि बलवा अपने 300 बकरों का इतना शौकीन था कि उन्हें फल, मेवे खिलाता था और कोल्ड ड्रिंक पिलाता था। देश में भूख और कुपोषण से हर बरस दसियों लाख बच्चे मारे जाते हैं, उनका हक खाने वाले ऐसे बलवे और उनके पावरफुल आका बकरों को मेवे खिला रहे हैं और अब गरीबों में बकरों का गोश्त बांट रहे हैं?
इसी दर्जे की जालसाजी मुम्बई में सबसे बड़ा एक गणेश बिठाने वाला कुख्यात तस्कर वरदराजन मुदलियार करता था। लेकिन वरदा के पंडाल से उठकर गणेश कभी नहीं गए। 27 जून को कर्नाटक में एक बार फिर जनता को धोखा दिया जाएगा, इस बार सत्ता और विपक्ष मिलाकर यह धोखा देंगे। अस्तित्वहीन ईश्वर पत्थर बने रहेगा, बस जतना धोखा खाएगी। इससे तो अच्छा रहता कि वह बकरा खाती।

बात की बात

बात की बात

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बात की बात

छोटी सी बात


कहीं आपसे गलती या गलत काम हो जाए तो तुरंत पूरी ईमानदारी से उसे मानकर, काफी से काफी अधिक माफी मांगें। इसके साथ कोई किंतु -परंतु न जोड़ें। और आगे की चर्चा में याद न दिलाएं कि आप माफी मांग चुके हैं। याद दिलाने से माफी की अहमियत खत्म। अगर सामने वाले आपकी माफी को याद न रख रहे हों, तो एक बार और माफी मांग लें।

सर्द वादियों में खुले आसमां तले चेहरे

20 जून 2011
सुनील कुमार

कश्मीर से साथ लौटीं कुछ हजार तस्वीरों को देखने से जी नहीं भरता। न उन सबके पूरे आकार में छापने के लिए अखबार के पन्ने का आकार काफी है और न ही उनको शब्दों में बयां किया जा सकता है। ऐसे में दो चेहरे एकदम अलग याद पड़ते हैं जिनमें से एक से कुछ बात हो पाई और दूसरे से बोली के फर्क की वजह से बिल्कुल ही बात नहीं हो पाई।
इतनी तस्वीरों में जो दो चेहरे सबसे अलग थे उसमें से एक श्रीनगर से सोनमर्ग के रास्ते पर बंजारों के साथ चल रही भेड़-बकरियों के रेवड़ के आगे-आगे चल रही दो महिलाओं में से एक का था। यह बूढ़ी महिला अपने चेहरे पर गहरी लकीरों के साथ इत्मीनान से तस्वीरें खिंचवा रही थी और वह पहले ही कुछ बख्शीश की उम्मीद जाहिर कर चुकी थी। मैं उसकी तस्वीरें खींचते हुए लगातार यह सोच रहा था कि उसके साथ उससे दो या तीन पीढ़ी छोटी एक दूसरी महिला भी चल रही थी, और ऐसे ही एक दूसरे रेवड़ के पीछे चलता हुआ पांच-सात बरस का एक लड़का भी मुझे याद पड़ रहा था।
भेड़-बकरियों और घोड़ों को लेकर चलते यह पहाड़ी बंजारे पूरे कश्मीर में कहीं से कहीं जाते हुए दिखते हैं, घोड़ों पर उनका सामान दिखा या मर्द। औरतें सभी जगहों पर पैदल ही दिखीं। ऐसा नहीं कि आदमी बिल्कुल भी पैदल नहीं चलते, लेकिन ऐसे दर्जनों रेवड़ देखने के बाद भी जब एक भी औरत घोड़े पर नहीं दिखी तो फिर उसे शायद घुड़सवारी की इजाजत न रही हो। लेकिन ऐसे तमाम रेवड़ों के साथ-साथ उन्हें खाई में गिरने से बचाने के लिए बंजारा कुत्ते साथ चल रहे थे जो कि पहाड़ी ठंड के हिसाब से खासे घने और बड़े बालों वाले थे।
इन लोगों के सामानों के ग_र बहुत रंग-बिरंगे कपड़ों से बने हुए थे और उन पर राजस्थान-गुजरात की तरह के कसीदे का काम भी था और कपड़ों का जोड़ भी था। उनकी जुबान बहुत अलग थी इसलिए उनसे अधिक बातचीत हो नहीं पाई और दर्जनों तस्वीरों के एवज में जब मैंने इन दोनों महिलाओं को 10-10 रुपए दिए तो वे 50-50 रुपए मांगती रहीं। सड़क किनारे इनके रंगों, इनके हुलिए और इनके जानवरों की वजह से सैलानी रूककर तस्वीरें खींचते होंगे और इन्हें बख्शीश का हक ठीक से समझ आ चुका है। जिन शहरों में मॉडलों को तस्वीरों के लिए हजारों और लाखों रुपए दिए जाते हैं, वहां के फोटोग्राफरों को इन पहाड़ी या बंजारा लोगों की तस्वीरों के एवज में कुछ तो भुगतान करना सीखना चाहिए।
एक दूसरा चेहरा जिसे भूलना बहुत मुश्किल है, वह था सोनमर्ग की पहाडिय़ों पर प्लास्टिक की एक चादर से बने एक तंबू के बाहर एक मुस्कान का। बहुत दूर से एक बहुत बड़ी चट्टान के ऊपर फैलाई हुई घास पर दो बच्चे खेलते दिख रहे थे, नीचे बहुत से घोड़े घास चर रहे थे। जैसे-जैसे पास पहुंचना हुआ, कैमरे के टेलीलैंस से दिखना शुरू हुआ कि एक लड़का को कम उम्र का था लेकिन उसके साथ जो लड़की दिख रही थी वह शायद सलवार कुर्ते में एक युवती थी।
चूंकि यह तंबू खुले में था इसलिए वहां पहुंचने तक यह दिख गया कि तमाम लोग हम चार शहरी लोगों को वहां पहुंचते हुए देखकर उस अकेले तंबू के भीतर सिमट गए थे। हममें से एक लड़की और एक महिला को देखकर उनकी हड़बड़ाहट कुछ कम हुई लेकिन फिर भी वे बात करने को बहुत तैयार नहीं थे। उनमें से एक युवती का चेहरा देखकर कैमरा बेताब हो रहा था लेकिन जैसे ही मैं तस्वीर लेने की कोशिश कर रहा था वैसे ही उसका हाथ या कपड़ा अपने चेहरे को ढांक ले रहा था या वह सिर घुमा ले रही थी। लेकिन कुछ देर बाद जब वहां सभी लोगों की तस्वीरें मैं लेने लगा तो फिर यह युवती सीना तानकर खड़ी हो गई कि लो फोटो। उसकी अब तक की झिझक खत्म हो गई और जब वह यह देख रही थी कि कैमरे का लैंस सीधे उसके चेहरे पर टिक गया है तब भी वह कैमरे के पीछे की आंख से मानो सीधे आंख मिलाते हुए लैंस में झांकती रही, और एक-दो नहीं, दर्जनों तस्वीरों तक झांकती रही।
सैलानियों के लिए घोड़े चलाने वालों के इस परिवार में 7 छोटे-छोटे बच्चे थे जो सभी इस वक्त तक तंबू के भीतर खाना पूरा करके बाहर आ गए थे और कम से कम दो और महिलाएं, दो-तीन बड़े बच्चे भी थे। इतने लोगों के बीच जब किसी एक खास खूबसूरत चेहरे पर कैमरा टिके और अड़े हुए घोड़े की तरह हटने से ही इंकार कर दे तो वहां के बाकी लोग भी उसे समझ तो रहे होंगे और मानो उन सबका ख्याल रखते हुए मैं उनकी भी बहुत सी तस्वीरें लेते रहा, लेकिन कैमरा एक भौंरे की तरह उड़कर, घूमकर मानो फिर उसी फूल पर जाकर बैठ रहा था।
उसका नाम मुस्कान था और जाने कैसे उसके मां-बाप नाम रखते वक्त यह सूझा होगा कि बड़ी होकर उसकी मुस्कान ही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती होगी। लेकिन मैं मुस्लिम रिवाज वाले इस इलाके में मैं मन में आई इस बात को वहां बोल भी नहीं पा रहा था और बस कैमरे को ही बात करने दे रहा था। प्लास्टिक की चादर के जमीन छूते सौ वर्गफीट से कम के इस तंबू तले ही इस घर के मर्द भी सैलानियों का दिन खत्म हो जाने के बाद आकर रहते होंगे। ये तमाम लोग इसमें समाते भी कैसे होंगे यह भी समझ से परे है।
सोनमर्ग की सर्द पहाडिय़ों में बिल्कुल खुले आसमान तले उस पूरे टीले पर यह अकेला तंबू था और शाम होते-होते वहां ओले पड़ रहे थे और हवा सर्द हो चली थी। दिन भर तो सैलानियों को घोड़ों पर चढ़ाए इन तंबुओं के मर्द पैदल चलते ठंड से कुछ हद तक बच जाते होंगे, उनके बदन पर विदेशी सैलानियों के छोड़े हुए या विदेशों से आकर यहां बिके हुए पुराने गर्म कपड़े दिख जा रहे थे। लेकिन ठंड आने तक ऐसे छोटे से तंबू में इतने तमाम लोग किस तरह पूरी रात काटते होंगे यह समझना बहुत मुश्किल था। यह तंबू चारों तरफ से नीचे से, जमीन से ऊपर भी था और वहां हवा की रफ्तार बहुत तेज भी थी।
एक तंबू के इन तमाम लोगों के बीच यह मुस्कान भी है जिसका चेहरा अगर मुंबई जैसे किसी शहर में होता तो फैशन के किसी बड़े ईश्तहार में वह सड़क किनारे दीवारों पर छाया होता। लेकिन जंगल में नाचते मोर की खूबसूरती किसे दिखती है?
जब शहरों में तरह-तरह के सौंदर्य स्पर्धाएं होती हैं और उनकी खबरें आती हैं तो हर बार उन्हें पढ़कर मुझे यही लगता है कि यह भारत की सबसे सुंदर युवती न होकर उन युवतियों में सबसे सुंदर है जो इस मुकाबले तक पहुंच पाती हैं। भारत के कई हिस्सों में ऐसी मुस्कान बिखरी हुई होगी जिन तक कैमरे भी शायद नहीं पहुंच पाते होंगे।
इन तस्वीरों को लेने के बाद उनमें से एक दूसरी युवती ने जब पूछा कि क्या इस कैमरे से पर्ची नहीं निकलेगी, तो मैं समझ गया कि उन्होंने पहले किसी सैलानी के पास पोलराइड कैमरा देखा होगा जिसमें से तुरंत ही एक लगभग धुंधली सी तस्वीर छपकर निकल आती है। मैंने उन्हें अपने कैमरे के पीछे के स्क्रीन पर इन तस्वीरों को दिखाने की बात कही, तो वे सब फासला छोड़कर पास आ जुटे। और यहीं पर मेरी दिलचस्पी उजागर भी हो गई कि मैंने किन चेहरों की कितनी तस्वीरें ली थीं। लेकिन यह सब तो शायद उन्हें पहले भी समझ आ रहा होगा।
लेकिन चेहरों को याद करते हुए मुझे पहले ही दिन ली हुई एक तस्वीर याद पड़ती है जो कि पहलगाम से श्रीनगर लौटते हुए सड़क किनारे के एक खेत में धान का रोपा लगाती हुई एक छोटी सी परी की थी। उसके बारे में मैं पहले लिख भी चुका हूं लेकिन उस वक्त उसके चेहरे की चर्चा नहीं हो पाई थी। आज जब कम्प्यूटर पर उसका चेहरा बड़ा करके देख रहा हूं तो लग रहा है कि उस खेत में उपजे धान का दाम कुछ अधिक होना चाहिए जहां यह परी रोपा लगा रही थी। (बाकी कल)