आज बात कुछ हिंदू समाज की

30 जुलाई 2011
भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने अपने पिता, एक भूतपूर्व सैनिक अफसर का अंतिम संस्कार खुद करके हिंदू धर्म में महिलाओं के कमजोर हाल को चुनौती दी है। आमतौर पर हिंदुओं में यह काम आदमियों का माना जाता है और महिलाएं श्मशान तक भी नहीं जाती हैं। ऐसा पहले भी कहीं-कहीं पर सुनने में आता है और आज इस पर बात हम इसलिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं कि किसी भी समाज में रीति-रिवाजों की जकडऩ को चुनौती देने की जरूरत है और रेणुका चौधरी ने ऐसा एक छोटा सा कदम उठाया है। आज जब देश में एक तरफ खाप पंचायतों के नाम पर हत्यारे फैसले लिए जा रहे हैं और हिंदू समाज के बहुत से तबके कहीं अपने बच्चों की हत्या कर रहे हैं तो कहीं उनकी हसरतों की। और चूंकि हम यहां पर बात हिंदू समाज से शुरू कर रहे हैं इसलिए यहां पर जवाब में या मिसाल के तौर पर हम दूसरी समाजों की कुरीतियों और खामियों के जिक्र को जरूरी नहीं समझते।
एक तरफ हिंदू समाज जातियों और उपजातियों में बंटकर कहीं गोत्र के नाम पर हत्याएं कर रहा है तो कहीं पर ऊंची और नीची जाति के नाम पर। दूसरी तरफ हजारों बरस से चली आ रही मनुवादी व्यवस्था के चलते अब भी हिंदू समाज उस गैरकानूनी छुआछूत और भेदभाव को जारी रखे हुए है जिसके चलते हिंदुओं के बीच से दलित कटते चले गए हैं और वे कहीं पर अंबेडकरवादी बौद्ध हो गए हैं तो कहीं पर मुस्लिम बन गए हैं। हिंदू समाज में आदिवासियों को जिस तरह से जंगली गिना जाता है और जिस तरह से यह माना जाता है कि वे भगवान राम की सेवा करने के लायक बंदरों की तरह ही हैं, उससे भी आदिवासी हिंदुओं से दूर होते चले गए हैं। ऐसे में जब ईसाई धर्म प्रचारकों ने पढ़ाई-लिखाई, इलाज और दूसरी मदद ऐसे आदिवासियों को दी, तो वे अपनी आदिवासी संस्कृति से ईसाई धर्म में शामिल हो गए। इसे भी हिंदू धर्म के एक आक्रामक तबके ने धर्मातरण कहा, लेकिन ऐसे हमलावरों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि मनुवादी व्यवस्था के तहत हिंदू धर्म दलितों और आदिवासियों के सबसे नीचे कैसे मानता है? और अलग-अलग जातियों के बीच का यह हिंसक फर्क आज भी खत्म क्यों नहीं हो पा रहा है?
जो लोग खबरों को ध्यान से देखते हैं उन्हें आज की बाजार व्यवस्था के हाथों हांके जा रहे मीडिया में कहीं-कहीं किसी कोने पर छोटी सी खबर आदिवासी और दलित लोगों पर हमले के बारे में कभी-कभी देखने मिल सकती है। जब मीडिया के सारे बड़े ग्राहक, उसके इश्तहारों से प्रभावित होकर खरीददारी करने वाले लोग, संपन्न और सवर्ण समाज के अधिक हैं, तो नीचे गिने जाने वाले तबकों पर हमलों की खबरें वैसे भी दब जाती है। इसलिए हिंदू समाज के भीतर सामाजिक सुधार को लेकर जैसे आंदोलन पिछली एक सदी में जगह-जगह चले थे वैसे कोई आंदोलन अब नहीं सुनाई पड़ते। इसकी एक वजह यह है कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर चुनावी राजनीति में लगी पार्टियां किसी भी जाति या धर्म को एक तबके के रूप में नाराज करना नहीं चाहती। यही वजह है कि हिंसक और कट्टर, अपराधी खाप पंचायतों को काबू में करने के लिए जब सरकार में कोई बात उठती है तो हरियाणा जैसे राज्य के बड़े-बड़े राजनीतिक दल मुंह बंद कर लेते हैं और उसके पढ़े-लिखे नेता भी गुफा में रहने वाले लोगों की तरह बातें करने लगते हैं।
हिंदू धर्म की रीति-रिवाजों के लोकतंत्र के पैमाने पर नापने की जरूरत है। जितने भी रिवाज औरत और मर्द के बीच भेदभाव करने वाले हैं, उन सबको खारिज करने की जरूरत है। जितने भी रीति-रिवाज जातियों के बीच फर्क करने वाले हैं उन सबको भी खत्म करने की जरूरत है। जितनी परंपराएं समाज में अपने-आपको दूसरे धर्मों से बेहतर साबित करने के लिए एक हमलावर तेवर इस्तेमाल करने लगती हैं, उन तमाम परंपराओं को बदलने की जरूरत है। जिस तरह इस धर्म के गुरु और इसके तहत आने वाले आध्यात्मिक या दूसरे किस्म के सम्प्रदायों में अपराध फैले हुए हैं उनको भी हटाने की जरूरत है। जिस तरह हिंदुओं के बीच बड़े पैमाने पर कन्या भू्रण हत्या होती है, उसे भी खत्म करने की जरूरत है। कानून में अंतरजातीय विवाह को बढ़ाने के लिए तरह-तरह के इंतजाम किए गए हैं लेकिन हिंदू धर्म के तहत बहुत सी ऐसी कट्टरता है जो ऐसा होने नहीं देती और हत्या करने पर उतारू हो जाती है। इसे भी खत्म करने की जरूरत है। हमारा यह भी मानना है कि जिन मंदिरों में दलितों को घुसने नहीं मिलता है वहां पर उन तमाम गैरदलितों को भी पांव धरना बंद कर देना चाहिए जो कि दलित-गैरदलित समानता के हिमायती हैं।
यह लिस्ट बहुत लंबी हो सकती है लेकिन हम आज इस कम चर्चित रह गए मुद्दे पर बात इसलिए कर रहे हैं कि अब हिंदू समाज के भीतर सुधार की कोई चर्चा भी सुनाई नहीं देती है। ऐसा लगता है कि उदारवादी लोग समाज को पर्याप्त उदार मानकर बैठ गए हैं और उन्हें यह भी दिखाई नहीं पड़ रहा कि कट्टर लोग अपने दकियानूसीपन को फिर से लादने में पत्थर के औजार लेकर लगे हुए हैं। ऐसे में एक बहुत छोटा सा कदम रेणुका चौधरी ने उठाया है और हम इसकी तारीफ करते हैं। अगर यह समाज अपने पिछड़ेपन से नहीं उबरेगा तो यह सिर्फ रीति-रिवाजों में पिछड़ा नहीं रह जाएगा यह विकास के दूसरे पैमानों पर भी पिछड़ा रहेगा। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा लगातार कुंठाओं के बीच जीते रहेगा तो फिर वह समाज अपनी पूरी संभावनाओं जितना आगे कभी नहीं बढ़ पाएगा।

 

छोटी सी बात

29 जुलाई
दिन में आधा घंटा भी खराब करने के पहले सोच लें कि यह आपके दिन का दो फीसदी से अधिक हिस्सा होगा। और कामकाजी वक्त की तुलना में देखेंगे, तो पांच फीसदी से अधिक।

कतार में लगे देश में रफ्तार!

29 जुलाई
रेल मंत्रालय की खबर है कि वह ढाई-तीन सौ किलोमीटर की रफ्तार से ट्रेन चलाना शुरू करने जा रही है। इसके लिए कुछ रास्ते छांटे गए हैं। दुनिया के कई विकसित देशों में बहुत अधिक रफ्तार की रेलगाडिय़ों को गैरजरूरी माना जा चुका है और यह माना गया है कि उन पर जितनी अधिक लागत आती है, उनके लिए जितने सुरक्षा इंतजाम करने पड़ते हैं वे बहुत महंगे पड़ते हैं। हिन्दुस्तान में ऐसी रफ्तार के लिए चाह देखते हुए हमें एक दूसरी बात यह खटकती है कि जिस देश में लोगों को रात-दिन कहीं न कहीं कतार में लगने पर बेबस रहना पड़ता है वहां पर ऐसी रफ्तार का क्या इस्तेमाल है? रफ्तार जिंदगी के एक दायरे में आए, आबादी के एक छोटे हिस्से के लिए आए और उस पर होने वाले बहुत बड़े खर्च का बोझ गरीब जनता के हिस्से पर भी पड़े जिसे कि किसी रफ्तार के लायक नहीं माना जाता है तो इसे में लोकतंत्र में एक विरोधाभास मानते हैं। जिस देश में राशन के लिए, गैस सिलेंडर के लिए, अस्पताल में जांच और इलाज के लिए, कहीं अर्जी देने के लिए तो कहीं भुगतान जमा करने के लिए कतार ही कतार दिखती हैं, वहां पर रफ्तार की जरूरत को जिंदगी के ऐसे दायरों में है जहां पूरी आबादी को बेरोजगार मानकर उसे बिना किसी जरूरत, सिर्फ सरकारी नालायकी के चलते लाईन में लगा दिया जाता है। हम इसे देश की जनता के मौलिक अधिकारों का हनन मानते हैं कि सरकार इन कतारों को खत्म करने के बारे में कुछ सोचती भी नहीं है। आज देश में एक रफ्तार की बात सुनकर हमें यह बात और अधिक खटक रही है और इसलिए हम आज की इस चर्चा से लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर करवाना चाहते हैं कि जनता किसी गैरजरूरी कतार को अपनी नियति क्यों मानकर चलती है?
जिस देश में बड़े-बड़े आईआईएम इतने नामीगिरामी हैं कि वहां से निकलकर काबिल मैनेजर पूरी दुनिया को मैनेज करने के लिए जाते हैं। लेकिन इस देश के भीतर जनता का जो उत्पादक समय हो सकता है उसे अलग-अलग लाईनों में लगवाकर तबाह करना कैसे बंद हो इसे कोई मैनेज क्यों नहीं कर पाता? दरअसल सरकार के भीतर रिश्वत का सिलसिला उसी वक्त आसानी से बढ़ सकता है जब हर जगह हर बात के लिए कतार लगी हुई हो। चाहे वह बड़ी-बड़ी अर्जियों की हो, चाहे वह रेलवे रिजर्वेशन से लेकर वृद्धावस्था पेंशन की हो। जब तक लाईन में लगे हुए लोग थक न जाएं, निराश और हताश न हो जाएं, जब तक उनका सब्र जवाब न दे दे तब तक वे रिश्वत देने के लिए आसानी से तैयार नहीं हो सकते क्योंकि उनकी जेब में बहुत मेहनत की कमाई होती है। दूसरी तरफ इस देश में सत्ता और महत्ता की ताकत से लैस तबका ऐसा है जिसे कि हर किस्म की कतार से छूट मिलने का इंतजाम सरकारी नियमों में किया गया है। इसलिए उसे रिश्वत देने की बेबसी या तो नहीं रहती या फिर उसकी जेब में अधिक कमाई के लिए एक नजराना देने की हालत रहती है, जैसा कि कर्नाटक के लोकायुक्त की रिपोर्ट में जिंदल के मामले में सामने आया है। लेकिन हम एक बार फिर इस बात पर लौटना चाहते हैं कि सरकारें अपने-अपने नीचे लगने वाली कतारों के बारे में यह क्यों नहीं सोचतीं कि उन्हें खत्म कैसे किया जाए?
आजकल छोटे-छोटे शहरों की छोटी-छोटी दुकानों में, रेस्त्रां में ग्राहकों की कतार के लिए उन्हें कूपन मिल जाते हैं और उनका नंबर स्क्रीन पर दिखने पर वे वहां जा सकते हैं। ऐसी छोटी सी बात सरकारी काउंटरों पर क्यों लागू नहीं किया जा सकता? क्यों लोगों को धूप और बारिश में सड़क किनारे धूल और धुआं झेलते हुए एक-एक सिलेंडर के लिए, राशन के लिए घंटों खड़ा रहना पड़ता है? सरकार में बैठे हुए बड़े-बड़े और काबिल माने जाने वाले अफसर अपनी जनता के वक्त का कुछ बेहतर इस्तेमाल क्यों नहीं सोच पाते? हम समाज के भीतर के लोगों से भी यह उम्मीद करते हैं कि वे अपने आसपास जहां भी कोई कतार देखें वे वहां पर उस दफ्तर या उस संस्था के कामकाज में सुधार के तरीके देखें और ज्यादती को बर्दाश्त करने की आदी हो गई हिन्दुस्तानी जनता को कुछ राहत पहुंचाने की कोशिश करें। हम मैनेजमेंट के छात्रों से भी यह उम्मीद करेंगे कि वे एक प्रोजेक्ट की तरह अपने शहर में लगने वाली लाईनों का कोई ऐसा रास्ता निकाले जिससे कि आमजनता का रोजाना होने वाला अपमान भी बंद हो और लोगों को यह लग सके कि इस देश में उनकी छोटी-छोटी जरूरतें बिना तकलीफ पाए भी पूरी हो सकती हैं। हम अधिक रफ्तार की रेलगाडिय़ों के खिलाफ नहीं हैं लेकिन हम भारत की जनता की जिंदगी में ऐसे विरोधाभास को खत्म करना अधिक जरूरी समझते हैं और खुद रेलवे का यह हाल कि उसके काउंटरों पर साधारण लोग पूरे-पूरे दिन खड़े रहते हैं और उसका भ्रष्ट इंतजाम दलालों को अलग से टिकट देने के लिए बदनाम है। रेलवे पहले अपनी छोटी-छोटी बातों को सुधारे तो ही लोगों की नजरों में उसका सम्मान होगा, रफ्तार बढ़ाने से कुछ नहीं होगा।

छोटी सी बात

28 जुलाई
दुनिया को एक बेहतर जगह रातों-रात नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए हर छोटे-बड़े मौकों को बेहतरी के लिए इस्तेमाल करना होगा। अपने आस-पास को सुधारने की जरूरत जब दिखे, मेहनत करें। तभी आप अपनी अगली पीढिय़ों को एक बेहतर दुनिया देकर जाएंगे?

कर्नाटक से सबक गर नहीं लिया तो जनता का दिल तो बगावत...

28 जुलाई 2011
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
कर्नाटक के मामले में अभी लिखने का पूरा मौका नहीं आया है लेकिन जो बातें अब तक सामने आ चुकी हैं वे आज सबसे जरूरी मुद्दा हैं इसलिए वहां की हलचल के बीच भी हम उस पर लिखना जरूरी समझ रहे हैं। पिछले दो दिनों में वहां के भयानक भ्रष्ट पाए गए मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के जो तेवर भाजपा ने दिल्ली में भुगते हैं, वे देखने लायक हैं। कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में लोहा खदानों से अवैध खुदाई से सरकार को होने वाले नुकसान का अंदाज सोलह हजार करोड़ रुपयों से अधिक का बताया है। यह आंकड़ा एक राज्य के एक विभाग के भ्रष्टाचार को देखते हुए पूरे देश में दूरसंचार घोटाले में लाख-दो लाख करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के आरोप के मुकाबले बहुत अधिक लगता है। कर्नाटक में यह आंकड़ा एक ऐसे लोकायुक्त की जांच के बाद सामने आया है जिसकी मौजूदगी वाली लोकपाल कमेटी का भाजपा तरह-तरह से साथ देते आई है। और ये लोकायुक्त कांगे्रस या यूपीए सरकार से लगातार टकराव के साथ भी चल रहे हैं इसलिए उनकी रिपोर्ट के पीछे कोई राजनीति नहीं देखी जा सकती। ऐसे में पिछले बरसों में जब लगातार इस मुख्यमंत्री के खिलाफ, उसके मंत्रियों के खिलाफ अंधाधुंध भ्रष्टाचार का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और अब अदालत इसकी निगरानी भी कर रही है, तो फिर हैरानी की बात यह है कि दिल्ली में बैठे हुए भाजपा के नेताओं ने अपने इस मुख्यमंत्री पर कार्रवाई क्यों नहीं की? हमारे पाठकों को अच्छी तरह याद होगा कि हमने दर्जनों बार यह लिखा है कि यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुप्पी साधे रहे तो वे भ्रष्टाचार में बराबरी के भागीदार रहे। और इसी बात को लेकर हमने बार-बार मनमोहन सिंह से इस्तीफे की भी मांग की और मंत्रिमंडल का मुखिया होने के नाते उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग भी हमने की। इतनी कड़ी मांग भाजपा ने भी नहीं की थी लेकिन हम नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी के ऊंचे पैमानों की उम्मीद सार्वजनिक जीवन में, खासकर सरकार चला रहे लोगों से करते हैं इसलिए हमने देश के विपक्ष के मुकाबले भी अधिक कड़ी मांग रखी। लेकिन आज जो नौबत कर्नाटक में सामने आई है और जिसमें वहां भाजपा का एक जाहिर तौर पर भ्रष्ट पाया गया मुख्यमंत्री एक दुस्साहस के साथ भाजपा पार्टी को ही चुनौती दे रहा है और ऐसी नौबत के बाद भी यह शर्त रख रहा है कि वह इस्तीफा तभी देगा जब पार्टी उसकी पसंद के एक नेता को मुख्यमंत्री बनाएगी, तो भाजपा के अपने कर्नाटक को लेकर भी अपनी खुद की ताकत को एक बार तौल लेने की नौबत आती है।
हम इसे भाजपा जैसी एक बड़ी पार्टी के लिए एक बड़ी असफलता इसलिए मानते हैं कि यह पार्टी आधी सदी से शुचिता नाम के एक शब्द का इस्तेमाल करते आई है जिसे लालकृष्ण अडवानी खासकर सार्वजनिक जीवन में साफ-सुथरे चाल-चलन के लिए कहते थे। फिर इस पार्टी को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मार्गदर्शन मिलने की बात भी संघ और भाजपा के नेता जनसंघ के जमाने से करते आए हैं और मौजूदा भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तो संघ के स्वयं सेवक के रूप में अपने गर्व को बार-बार बताते भी हैं। आज हमारे सामने बीबीसी की वेबसाईट पर येदियुरप्पा की एक ऐसी तस्वीर है जिसमें वे संघ के कार्यक्रम में संघ की पोशाक में बैठे हैं। हमें मनमोहन सिंह की यूपीए-भ्रष्टाचार पर चुप्पी को लेकर जितनी शिकायत है, उससे कहीं अधिक शिकायत हमें संघ की ऐसे मुख्यमंत्री को लेकर चुप्पी पर है, क्योंकि कांगे्रस पार्टी तो बहुत अधिक शुचिता की कोई बात नहीं करती है लेकिन भाजपा के मार्गदर्शक संघ के लोग सादगी और ईमानदारी की बातें लगातार करते हैं। ऐसे में संघ की विचारधारा से असहमति रखने वाले भी उससे यह उम्मीद करते थे कि भाजपा के एक इतने भयानक भ्रष्टाचार वाले मुख्यमंत्री, जो कि जाहिर तौर पर संघ से भी जुड़े हुए हैं, उन पर अदालती सजा की नौबत आने के पहले भी भाजपा और संघ मिलकर घर के भीतर एक कार्रवाई करने की पहल करेंगे। ऐसी कोई कार्रवाई कानूनी रूप से जरूरी नहीं थी लेकिन सार्वजनिक जीवन के मूल्यों और नैतिकता का यह साफ-साफ तकाजा था कि कर्नाटक की भयानक भ्रष्ट भाजपा सरकार पर समय रहते कार्रवाई करके भाजपा की बाकी सरकारों, बाकी पार्टी के लिए भी एक नसीहत चली जाती और कर्नाटक राज्य की जनता को इतने बेशर्म और भ्रष्ट नेताओं से राहत भी मिलती। लेकिन कर्नाटक की कितनी भी खबरें भाजपा को ऐसा फैसला लेने के लिए बेबस नहीं कर सकीं या फिर भाजपा इतना हौसला नहीं जुटा पाई।
पाठकों को यह भी याद होगा कि एक-दो बरस पहले जब लोहे की खदानों का भ्रष्टाचार ही सिर चढ़कर सामने आया था तब खदानों के सबसे बड़े अफरा-तफरी के मामले से जुड़े वहां के रेड्डी बंधुओं ने मंत्री रहते हुए इसी मुख्यमंत्री के खिलाफ एक ऐसा अभियान चलाया था जिसमें वहां के सारे भाजपा विधायक बाढ़ में डूबे अपने राज्य को छोड़कर दूसरे राज्य में रेड्डियों की सात सितारा मेहमाननवाजी पाते हुए दिल्ली की खिल्ली उड़ाते रहे। वह भी एक समय था जब भाजपा अपने संगठन के राजपाट के भीतर के इस बागी राज्य पर कोई कार्रवाई करती, लेकिन भाजपा ने उस वक्त भी वह मौका खो दिया, और आज तो नौबत और भी बिगड़ गई है जब एक चोर थानेदार की तैनाती पर अपनी मर्जी चला रहा है।
हमने पहले भी इस बात को कई बार लिखा था कि राजनीति में पैसों की ताकत की दखल अगर एक सीमा से अधिक बढ़ जाती है तो वह राजनीति लोकतंत्र की खाल खींचकर अपने जूते बनाने का काम करती है और कर्नाटक में भाजपा के मंत्री और मुख्यमंत्री ने एक-दूसरे से अपने टकराव को खत्म करके, गिरोहबंदी करके यही किया था। इतना बड़ा पैसा, जिसमें से कुल सोलह हजार करोड़ रुपए के हिसाब-किताब तक लोकायुक्त पहुंच पाए हैं, यह पैसा भारतीय लोकतंत्र को खरीदने और बेचने के लिए काफी है। राजनीतिक दलों को, और भाजपा से अलग भी बाकी राजनीतिक दलों को, यह समझने की जरूरत है कि अगर वे खरबपति धंधेबाजों को पार्टी का सरगना बनाकर बिठा लेंगे तो कल के दिन लोकतांत्रिक राजनीति करने वाले लोग इन सरगनाओं के लिए सिर्फ दरी बिछाने और पानी पिलाने का काम करेंगे। संसद और देश की विधानसभाओं का विश्लेषण यह बताता है कि धीरे-धीरे करके इन सदनों में करोड़पतियों और अरबपतियों की मौजूदगी बढ़ते चली गई है। इससे एक तरफ तो देश के गरीबों के बारे में संसद और विधानसभाओं की समझ खोखली हो गई है और दूसरी तरफ ऐसे लोग लोकतंत्र के हर पहलू को खरीद लेने की ताकत वाले भी हो गए हैं। कल तक यह माना जाता था कि देश के अतिसंपन्न धंधेबाज नेताओं और अफसरों को खरीदने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज तो ऐसे धंधेबाज खुद नेता हो गए हैं, खुद सांसद हो गए हैं और खुद विधायक हो गए हैं। छोटे-छोटे म्युनिसिपल चुनावों को देखें तो उनमें करोड़पति उम्मीदवार एक-एक वार्ड पर दसियों लाख का पूंजी निवेश करके चुनाव जीत रहे हैं और जाहिर है कि वे अपनी भरपाई कहां से किस तरह से करते होंगे?
कर्नाटक के इस सिलसिले में देश की जनता के भीतर लोकतंत्र पर पिछले कुछ बरसों से चली आ रही अनास्था को और अधिक बढ़ा दिया है। यह खतरनाक नौबत आमजनता की जुबान में कई शक्लों में सामने आती है। कुछ लोगों का यह कहना है कि इससे तो अंगे्रजों का राज बेहतर था, कुछ का कहना है कि इससे तो फौज को देश दे देना बेहतर होगा और कुछ लोगों का यह भी कहना है कि ऐसे देश में नक्सली नहीं आएंगे तो और कौन आएगा? हम केंद्र सरकार और कई राज्यों में चल रहे भयानक भ्र्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में आज जनता की निराशा को बताने में किसी नाटकीयता का इस्तेमाल नहीं कर रहे। एक तरफ खदानों की लूट है तो दूसरी तरफ धंधेबाजों के लिए सरकार किस तरह से गरीब किसानों की जमीनें लूटकर लोकतंत्र को दफन कर दे रही है यह उत्तरप्रदेश में सबसे अधिक सामने आ रहा है जहां पर कि एक तानाशाह और जाहिर तौर पर भ्रष्ट मुख्यमंत्री सोते-जागते अपने-आपको एक दलित की बेटी कहते हुए लोकतांत्रिक रियायत की उम्मीद करते दिखती है। जिस तरह देश के गरीबों के साथ सत्ता की चली आ रही बेइंसाफी अदालतों में उजागर हो रही है वह बहुत भयानक है। हम न सिर्फ संघ और भाजपा से, बल्कि कांगे्रस और बसपा से भी, और बाकी पार्टियों से भी यह कहना चाहते हैं कि अपने-अपने चोर-बेईमानों को वे तुरंत सत्ता से बाहर करें, संगठन में हाशिए पर करें वरना यह लोकतंत्र एक बहुत नाजुक और खतरनाक दौर से गुजर रहा है। यह देश इतना बड़ा है कि इसमें कोई बगावत मुमकिन नहीं है, लेकिन जनता का दिल आज बगावत पर आ खड़ा हुआ है ऐसा अंदाज हमें लोगों से बात करके लगता है। कर्नाटक हमारे हिसाब से भाजपा के लिए आज तक की सबसे बड़ी नसीहत हो सकती है और अगर इसके सबक पार्टी ने नहीं लिए तो उसे इसका एक चुनावी नुकसान भी उठाना ही पड़ेगा। बहुत देर से और बहुत कम कार्रवाई करके भाजपा ने भारतीय लोकतंत्र के भीतर आज एक बैनर को उठाने का हक लगभग खो दिया है। कम से कम वह आगे सावधान रहे।

छोटी सी बात

27 जुलाई
अगर कोई आपकी तारीफ में बढ़-चढ़कर कोई ऐसी अच्छी बात भी कहे जो कि सच न हो, तो उसे तुरंत सुधार लें। अपनी गलत तारीफ सुनकर चुप रहना अपने बारे में झूठ कहने से कम नहीं होता।

भारत के सबसे बड़े फौजी अफसर की गैरजरूरी और बेमौके की बात

27 जुलाई 2011
भारतीय सेनाओं के संयुक्त मुखिया और भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल वी.पी. नाईक ने एक प्रेस कांफे्रंस में कहा कि भारत पाकिस्तान के परमाणु जखीरे से अनजान नहीं है, लेकिन अगर भारत पर कोई परमाणु हमला करने की गलती करता है तो ऐसे पहले हमले का भारत की तरफ से जवाब बहुत बड़ा होगा और वह बहुत बड़ा नुकसान करेगा। आने वाले इतवार को नाईक रिटायर हो रहे हैं और उसके पहले उनकी यह मीडिया से आखिरी बातचीत थी। इसमें उन्होंने कहा कि हमारी परमाणु नीति हथियारों के पहले इस्तेमाल न करने की है लेकिन यह नीति किसी परमाणु हमले के नौबत आने पर जवाब में बहुत ही भारी कठोर और कड़े जवाबी नुकसान पहुंचाने की भी है।
यह बयान कल मीडिया में उस वक्त छाया जब पाकिस्तान की नई विदेश मंत्री अपने पहले भारत दौरे पर पहुंची ही थी और दोनों देशों के बीच जिन तनावों के साए में आज बातचीत चल रही है उसके बारे में कल हमने इसी जगह बहुत लंबी बात लिखी भी थी। आज दुबारा उसी बात पर लिखने की नौबत इसलिए आ रही है कि पिछले कुछ बरसों में हम लगातार इस बात को देख रहे हैं कि जब कभी भारत और पाकिस्तान के बीच प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री के स्तर पर कोई अहमियत की बात होने को रहती है तो उसके ठीक पहले कभी भारत की सेना की तरफ से या फिर भारत के गृह मंत्रालय की तरफ से कोई न कोई अफसर इस तरह का मुंह मारता है कि उससे पूरी बातचीत पटरी से उतरने को लगती है। भारत पर परमाणु हमले की नौबत में भारत किस तरह का जवाब देगा यह बयान देने की हड़बड़ी उस फौजी अफसर की हो सकती है जिसे अपनी नौकरी के आखिर में आखिरी बार मीडिया के कैमरे और अखबारों के पन्ने नसीब हो रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान की विदेश मंत्री के यहां पांव देते ही इस तरह का बयान भारत और पाकिस्तान की बातचीत में कोई मदद करेगा? और अगर कुछ कट्टर स्वघोषित राष्ट्रवादी ताकतें इस बात की हिमायती हैं कि अभी पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होनी चाहिए, तो इनके लिए तो भारत के फौजी अफसर का किस दिन का ऐसा बयान माकूल हो सकता है लेकिन तनाव के रिश्तों से गुजर रहे दो देशों के बीच बातचीत इससे से गड़बड़ाना तय है। फौजी वर्दियों के साथ एक दिक्कत यह रहती है कि आला अफसरों को अपने पूरे कामकाज के दौरान अगर किसी लड़ाई में अगुवाई करने का मौका नहीं मिलता तो वे हीरो बने बिना रिटायर होने का खतरा झेलते हैं। इसलिए बहुत से वर्दीधारी लोग एक ऐसी लड़ाई का सपना देखते रहते हैं जिसमें वे एक इतिहास गढ़ सकें, उन पर किताबें लिखी जाएं, वे किताबें लिख सकें और अगर 1971 की किस्म का मोर्चा हो तो फिर वे मानेक शॉ की तरह फील्ड मार्शल का तमगा भी पा सकें  जो कि दो अलग-अलग मोर्चों पर सेना की अगुवाई एक साथ करके ही पाया जा सकता है। हम इसे बहुत सीधे-सीधे एक युद्धोन्माद तो अभी नहीं कहते लेकिन इसे बहुत गैरजिम्मेदारी का एक बयान मानते हैं जिसकी कि आज कोई जरूरत नहीं थी और न ही पहले से तय पाकिस्तानी विदेश मंत्री के आने के दिन ऐसी खबरें आना भारत के लोकतांत्रिक मिजाज और इसकी शांति की विदेश नीति के अनुकूल ही ऐसा बयान था।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि पिछले साल दो साल में हमको कई मौकों पर भारत सरकार की कुर्सियां संभाले हुए लोगों के बेदिमागी और बददिमागी बयानों के खिलाफ लिखना पड़ा और वैसी ही नौबत तब आई जब कांगे्रस पार्टी के लोगों ने इसी दर्जे के, ऐसी ही खामियों वाले निहायत गैरजरूरी बयान दिए। एक मौका तो हमें ऐसा भी याद पड़ता है जब एक-दो दिनों के भीतर ही सरकार और कांगे्रस पार्टी, और शायद यूपीए के सहयोगी नेता भी, बददिमागी और बेदिमागी की होड़ में लग गए थे। अभी भी अगर हम देखें तो एक तरफ मणिशंकर अय्यर पार्टी के मोर्चे से उटपटांग बातें कर रहे हैं तो दूसरी तरफ सेनाओं का संयुक्त मुखिया एक अखबारी बात को बिना यह दिमाग के इस्तेमाल के एक मिसाइल की तरह भारत-पाक वार्ता पर दाग रहा है। कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि पतंग उड़ाने की तरह कभी ढील देना और कभी तान देना विदेश नीति की तरकीब और बाजीगरी रहती है और अभी इस बातचीत के मौके पर भारत के भीतर के आक्रामक पाक विरोधियों को भी खुश रखने के लिए शायद सरकार की तरफ से ऐसी बात की गई हो। अगर सरकार में किसी कि विदेश नीति की समझ ऐसी कमजोर है तो भी हम उसे खारिज करते हुए भारत सरकार को सलाह देना चाहेंगे कि वह अपनी बड़बोली जुबानों को काबू में रखे। एक वक्त जब विदेश मंत्री कृष्णा पाकिस्तान जाकर बात कर रहे थे तब भारत के गृह सचिव भी बिना किसी वजह के ढेरों नाजायज बातें उगलीं और इसे लेकर विदेश और गृह मंत्रालय के बीच तनातनी भी हुई। आज विदेश मंत्रालय के ऐसे नाजुक मोड़ पर प्रतिरक्षा मंत्रालय की तरफ से भारत का सबसे बड़ा फौजी अफसर अपने रिटायरमेंट की हड़बड़ी में ऐसी गैरजरूरी और बेमौके की बात कर रहा है। सरकार में ऐसी छूट सिर्फ प्रधानमंत्री के स्तर पर लापरवाही या कमजोरी से हो सकती है और देश को इसका बड़ा नुकसान हो रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्तों, दोनों तरफ अमन-चैन के हिमायती जो लोग हैं उनको ऐसे बयानों के मौकों पर खुलकर इनके खिलाफ बोलना चाहिए क्योंकि राजनीतिक दल और नेता तो वोटों की नीयत से ऐसे मौकों पर चुप रहना बेहतर समझते हैं। हमें यह भी हैरानी है कि पश्चिम बंगाल और केरल में चुनाव हार जाने के बाद वामपंथी दल आखिर कब तक लकवे का शिकार होकर इस तरह चुप पड़े रहेंगे?

छोटी सी बात


26 जुलाई 2011
जिस जानकारी पर भरोसा न हो उसे बोलने से बचें। आप तक वह जानकारी कहां से आई है, यह बात आगे काम नहीं आती। आगे तो आपका नाम ही जुड़कर जाता है। इसलिए किसी भी बात को जिम्मेदारी से ही आगे बढ़ाएं, अगर आप जिम्मेदार कहलाना चाहते हैं।

कमउम्र और खूबसूरत विदेशमंत्री

26 जुलाई 2011
पाकिस्तान में एक खूबसूरत नौजवान युवती के विदेश मंत्री बनने से भारत में एक अलग से उत्साह देखने मिला। बहुत से लोगों ने मजाक में लिखा कि वे अब पाकिस्तान से बहुत करीबी संबंध रखना चाहेंगे। लोगों को यह भी लगा कि एक बिल्कुल नई पीढ़ी की यह विदेश मंत्री पुराने जख्मों या हादसों के बोझ से आजाद रहते हुए एक नई शुरुआत कर सकेगी। लेकिन जल्दबाजी में ऐसे नतीजे पर पहुंचने वाले लोगों को यह भी समझने की जरूरत है कि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों की विदेशी नीति मोटे तौर पर प्रधानमंत्री के स्तर पर तय होती है और पाकिस्तान के बारे में यह बात भी जाहिर है कि वहां की फौज और वहां की कुख्यात फौजी खुफिया एजेंसी का दखल भी पाकिस्तान की विदेश नीति के मामले में रहता है। इसलिए किसी एक व्यक्ति के वहां आने से कोई बहुत बड़ा बदलाव हम नहीं देखते लेकिन इस बहाने पाकिस्तान की विदेश नीति और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर बात जरूर हो सकती है।
जो लोग पाकिस्तान की विदेश नीति को भारत के खिलाफ पाते हैं उनको पाकिस्तान के अंदरूनी हालात की बेबसी पर भी गौर करना चाहिए। यह मुल्क डेमोके्रसी के किनारे-किनारे चलने की कोशिश करते रहा लेकिन वहां की फौजी वर्दियों ने बंदूक टिकाकर उसे फुटपाथ से भी परे करने का काम कई बार किया। इसके अलावा आजादी के बाद से लेकर अब तक पाकिस्तान की सरकारों में भ्रष्टाचार भारत की सरकारों के मुकाबले अधिक रहा, वहां मजहब के बोलबाले से लोगों की वैज्ञानिक सोच ऐसी पिछड़ी कि पाकिस्तान एक कमजोर देश बने रह गया। जहां पर लोकतंत्र के पैर इसलिए भी नहीं जम पाए कि मजहब की बुनियाद पर, उसके मुताबिक जब कहीं का कानून बनता है तो न उसमें इंसानों का दर्जा बराबरी का रहता और न ही आज की आधुनिक जरूरतों की गुंजाइश उसमें रहती। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान के फौजी हुक्मरानों ने वहां के मजहबी दकियानूसी लोगों के साथ मिलकर सरकार पर काबिज रहने के रास्ते निकालने पिछली आधी सदी में लगातार जारी रखा और बीच-बीच में अगर कोई चुनी हुई सरकार आई भी तो उसका हाल इसलिए भी खराब रहा कि वह बहुत बुरी तरह बेईमान सरकार रही। पाकिस्तान के हाल को देखें तो मजहब के बोलबाले से बाकी दुनिया के साथ उसका तालमेल कम रहा और उसकी माली हालत ऐसी चौपट रही कि वह अमरीका की जेब पर पलने वाले एक गुलाम की तरह ही चलते रहा और आने वाले अनगिनत बरसों तक उसकी वैसी ही हालत दिखती है।
पाकिस्तान की हालत में और बुरी बात तब जुड़ गई जब उसकी अपनी जमीन पर और पड़ोस के अफगानिस्तान की जमीन पर मजहबी आतंक, अमरीकी फौजी साजिशों के तहत बढ़ाया गया और अफगानिस्तान से कम्युनिज्म खत्म करने के लिए उसे बागियों की एक फौज की तरह खड़ा किया गया। नतीजा यह हुआ कि कम्युनिज्म तो चले गया लेकिन दहशतगर्दी इस कदर काबिज हो गई कि उसने अमरीका की नाक ही काटकर रख दी। अब आज अमरीकी फौजी मनसूबों को मुस्लिम आतंक को खत्म करने के नाम पर पूरी दुनिया में जगह-जगह हमले करने का लायसेंस अमरीकी राष्ट्रपति के हाथों ही मिल गया है और न्यूयॉर्क की अपनी कुछ इमारतों में कुछ हजार बेकसूर लोगों की मौत के एवज में वह दुनिया में अपने फैलाव का ऐसा बड़ा काम कर पा रहा है जैसा कि वह तीसरे विश्वयुद्ध से भी नहीं कर पाता। आज वह आतंक को खत्म करने के नाम पर एक-एक करके तमाम देशों में दखल बढ़ाते जा रहा है और लाखों लोगों की हत्या करते हुए वह एशिया के इस हिस्से पर बाज के खूनी पंजों को मजबूती से जमा चुका है। पाकिस्तान की तमाम विदेश नीति अमरीकी फौजी इरादों के काबू में भी है और अपने देश के भीतर के धर्मांध और कट्टर अलोकतांत्रिक ताकतों के हमले भी वह रात-दिन झेल रही है। इससे परे पाकिस्तान के अपने दीवालिया खस्ता हाल का दबाव भी उस पर है कि गरीबी की तरफ से पाकिस्तान की जनता का ध्यान हटाने के लिए वह समय-समय पर कैसे भारत के खिलाफ नारे लगाता रहे। हम आज दुनिया में कम ही ऐसे देश देखते हैं जिन पर, जिनकी घरेलू और बाहरी नीतियों पर इतने किस्म के अलग-अलग दबाव रहें और इसके बीच वह भारत-पाक जैसे जटिल रिश्तों पर काम करे। ऐसे में अगर एक कमउम्र और खूबसूरत विदेश मंत्री के आने से भारत के लोगों में एक नया जोश आता है तो उसमें हम कोई बुराई नहीं देखते। भारत में विदेश विभाग में महिलाएं लगातार ऊंची कुर्सियां संभालते आई हैं और आज भी उनके चेहरे ऐसी तमाम बातचीत में दिखते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच कई दूसरे किस्म के फर्क हो सकते हैं लेकिन इन दोनों ही देशों में अपने दो और पड़ोसी देशों की तरह महिला प्रधानमंत्री होने की एक परंपरा रही है। पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो, भारत में इंदिरा गांधी के अलावा श्रीलंका और बांग्लादेश में भी महिलाएं इन कुॢसयों पर रहते आई हैं। इसलिए चाहे इस्लामी कायदे हों या कोई और तौर-तरीके, एक महिला की लीडरशिप पाकिस्तान भी पहले देख चुका है। इसलिए पाकिस्तान के भीतर भी यह कोई अनहोनी नहीं हुई है। इन दोनों देशों के बीच हमने यह भी देखा है कि ऊपर लिखी हुई तमाम मुश्किलों से परे ऐसे लोगों की अपनी शख्सियत का फर्क भी बातचीत और रिश्तों पर पड़ा है जो कि इन दोनों मुल्कों में किसी वक्त कुर्सियां संभाले रहे हैं। इसलिए अगर एक ताजा चेहरा लोगों में खुशी लाता है तो यह उसकी किस्म की खुशी है जैसी कि क्रिकेट में होती है या फिल्मों और टेलीविजन के प्रोग्रामों में होती है। भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतरी के लिए अगर एक नई पीढ़ी को बात करने का मौका मिलता है तो इससे जाहिर तौर पर फायदा ही होगा। लेकिन इस एक मामूली फर्क से पाकिस्तान की अनगिनत दिक्कतें बहुत कम हो जाएंगी ऐसा भी हम नहीं समझते।

छोटी बात

25 जुलाई 2011
किसी की बात को बिना सुबूत, बिना तर्क खारिज करके आप महज यह साबित करते हैं कि आप न्यायापूर्ण नहीं हैं और तर्क वाली वैज्ञानिक सोच भी आपके पास नहीं है।

छोटे से एसएमएस से एक बड़ी बात तक



आजकल
25 जुलाई 2011
सुनील कुमार
अभी कुछ हफ्ते पहले मुझे कश्मीर जाने का मौका मिला तो वहां एक बात को लेकर खासी तकलीफ रही कि एयरटेल के मेरे दो मोबाईल फोन, दोनों पोस्टपेड होने के बाद भी वहां पर ईमेल और एसएमएस से परे रहे। कश्मीर में सुरक्षा के कारणों से प्रीपेड मोबाईल फोन, शायद बाहर से गए हुए, काम नहीं करते। वहां के लोगों से यह भी पता लगा कि उनकी बहुत सी रिश्तेदारी पाकिस्तान में होने के बावजूद वहां से पाकिस्तान फोन नहीं लग सकता। एयरटेल के साथ घंटों माथा फोडऩे पर बार-बार इस कंपनी ने यही कहा कि कश्मीर में एसएमएस पर कानूनी रोक लगी हुई है। लेकिन हमारे साथ में ही रिलायंस और वोडा फोन के जो मोबाईल फोन यहां से गए हुए थे वे वहां एसएमएस से लेकर इंटरनेट तक सभी काम कर रहे थे। जाहिर है कि या तो एयरटेल का कानून का आड़ लेना गलत था या फिर बाकी टेलीफोन कंपनियों कानून तोड़कर यह सहूलियत अपने ग्राहकों को दे रही थीं।
लेकिन आज यहां पर चर्चा टेलीफोन पर नहीं है बल्कि लोगों के बात करने के हक पर है। कश्मीर को लेकर एक रिपोर्ट पाकिस्तान के एक अखबार डॉन में छपी है जिसमें एक ऐसी प्रदर्शनी का जिक्र है जो कि दिल्ली, ऑस्ट्रेलिया के सिडनी, जर्मनी के बर्लिन के अलावा हॉलैंड के एक शहर में भी लगी और इसमें ऐसे एसएमएस थे जिन्हें कश्मीर के लोग भेज नहीं पाए थे और जो एक प्रोजेक्ट के तहत लोगों से लिखवाए गए थे। कश्मीर के लोगों से कहा गया कि अगर वे एसएमएस लिख पाते तो क्या लिखते? इसमें लोगों ने अपनी छोटी-छोटी घरेलू बातें भी लिखीं, कुछ शेयर लिखे और कुछ राजनीतिक बातें भी लिखीं। कश्मीर के जो लोकल कनेक्शन पोस्टपेड हैं उनमें शायद एसएमएस की सुविधा रहती है लेकिन उस राज्य के बाहर के फोन, खासकर प्रीपेड फोन और राज्य के भीतर के भी प्रीपेड फोन एसएमएस पाना और भेजना नहीं कर पाते।
इन दिनों मैं पूरी दुनिया की खोज-खबर कुछ अधिक हद तक रखने के लिए इंटरनेट पर ट्विटर पर रोजाना कई घंटे लगाकर अपने कंधे और हाथ को तबाह करने की हद तक पहुंच चुका हूं। इसमें पाकिस्तान के लोगों के लिखे हुए छोटे-छोटे से संदेश सबसे अधिक राजनीतिक बेचैनी के होते हैं और गिनती में बहुत अधिक भी होते हैं। दुनिया के जिन इलाकों में टकराव अधिक है वहां अगर बोलने की आजादी कुछ कम है तो वहां के लोग जहां राह दिखती है वहां जाकर दीवारों पर लिखने लगते हैं। मुझे याद है कि पिछले बरस दिसंबर के महीने में कई दिन हम लोग ईरान में थे जहां पर इंटरनेट पर फेसबुक जैसी वेबसाईटों पर रोक लगी हुई थी लेकिन हमारे संपर्क का ऐसा कोई नहीं था जिसने उसका तोड़ निकालकर न रखा हो और अपने देश के कानून के खिलाफ वह फेसबुक का इस्तेमाल न कर रहा हो।
हिन्दुस्तान में बोलने और लिखने की आजादी पर रोक का सबसे बुरा और सबसे लंबा दौर एक ही था, इमरजेंसी का। इस दौर में अखबारों से झुकने कहा गया था और इतिहास गवाह है कि उनमें से अधिकतर अखबार लेट गए थे। लोगों को आपातकाल एक अनुशासन पर्व दिखने लगा था और संजय गांधी ने लोगों को इस देश का ऐसा भविष्य दिखने लगा था जैसा चमचमाता हुआ इतिहास भी सोने की इस चिडिय़ा का कभी न रहा हो। लेकिन उस दौर में भी कुछ लोग ऐसे थे जो कि बोलने की आजादी के रास्ते निकाल लेते थे और अखबारों में न सही, पर्चों में लिखकर कसर पूरी करते थे। कुछ अखबारों में उस वक्त लोगों ने प्रूफ की गलतियां जानबूझकर छोड़कर इंदिरा गांधी के नाम को इंदिरा गधी जैसा भी किया था और कुछ पर कार्रवाई हुई थी, कुछ कार्रवाई से बच गए थे।
इसलिए जब किसी देश या प्रदेश में बोलने की आजादी कम होती है तो लोग पर्चों में लिखने लगते हैं, शौचालयों के दरवाजों के भीतर की तरफ लिखने लगते हैं और कहीं-कहीं दीवारों पर भी। कुल मिलाकर होता यह है कि जब समाज में लोगों की भड़ास अधिक हो और उसके निकलने की राह बिल्कुल न हो, तो वह तरह-तरह के धमाकों के साथ निकलती है। ये धमाके बंधी उंगलियों वाली बिरादरी के अपने भी हो सकते हैं और किसी कमजोर बिरादरी के लिए नक्सलियों की तरह बाहर से आकर किए गए धमाके भी हो सकते हैं।
इंटरनेट पर लोगों को अपनी भड़ास निकालने का बहुत बड़ा चौपाल मिल गया है जहां वे अपनी बातों को लिखकर टांग सकते हैं और उस पर दुनिया के लोगों का असर देख भी सकते हैं। इंटरनेट की टेक्नालॉजी में अराजकता की जितनी संभावनाएं हैं उनके चलते लोग यहां पर आजादी का बेजा इस्तेमाल भी कर लेते हैं लेकिन कम से कम इसके बाद लोगों के मन में भड़ास कुछ कम बचती है।
कश्मीर में अगर लोगों के एसएमएस पर रोक लगती है, उनके फेसबुक पर कुछ लिखने के बाद अगर वहां की सरकार उन्हें गिरफ्तार करती है तो ऐसी तमाम चीजें कुछ पत्थर बनकर उन पथरावों में जुड़ जाती हैं जो कि वहां की सड़कों पर कुछ अलगाववादी भी करवाते रहते हैं। जब जुबान से कुछ लफ्ज निकलने पर रोक, जब हाथ की कलम कुछ लिख न सके, जब उंगलियां कोई एसएमएस बनाकर भेज न सकें तो फिर ऐसे खाली हाथ अगर पत्थर उठा लेते हैं तो उसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।
मैं यहां पर लोगों के ऐसे निजी हक से परे की कुछ ऐसी नौबत भी सोचता हूं जिनमें किसी समाज को इसलिए बोलने का मौका नहीं मिलता क्योंकि शहरी और संपन्न तबके की दिलचस्पी वाला मीडिया इन बातों को बाजार की दिलचस्पी का नहीं पाता। ऐसा तबका एक ऐसा आदिवासी तबका भी हो सकता है जो कि ऐसे शहरी समाज के हाथों हांके जाते लोकतंत्र को अपनी जरूरतों का नहीं पाते और चूंकि उसकी खुद की बोली, उसकी जुबान, उसकी बातों की हिन्दुस्तान के शहरी लोकतंत्र में जगह नहीं दिखती इसलिए वह नक्सली बमों को शायद कभी-कभी अपनी बात जोरों से बोलने की इजाजत दे देता है। शायद धर्म, संपन्नता, जाति के आधार पर कमजोर तबकों को अपनी बात रखने का बराबर का मौका नहीं मिलता और इसलिए शायद उनकी बेचैनी तरह-तरह की हरकतों की शक्ल में बाहर निकलती है।
मैं अभी कश्मीर जैसे किसी राज्य की सुरक्षा की जरूरतों को नकार नहीं रहा लेकिन मेरा यह भी मानना है कि लोगों को जब तक बोलने की आजादी नहीं रहेगी, जब तक उनकी बातों को सामने आने का हक नहीं मिलेगा तब तक उनकी बेचैनी कुछ खतरनाक बनी रहेगी। वैसे भी आज के जमाने में जब लोगों की बातों की आवाजाही पल-पल होती है तब अगर ऐसे हक या मौके से किसी तबके को दूर रखा जाएगा तो वह दिखने के लिए कुछ अलग किस्म की दीवारें भी ढूंढ़ेगा और उसकी बातें फिर हो सकता है कि उतनी मासूम न रहें।
हिन्दुस्तान के आज के हालात में मैं यह मानता हूं कि जब सरकारों और नेताओं की बददिमागी इतनी अधिक हो गई है कि जब वे लोगों की लिखी और कही बातों के असर से अपने को ऊपर मानते हैं तो फिर लोग असर का कोई और रास्ता तलाशने पर बेबस हैं। ऐसा एक रास्ता आज देश भर में नेताओं और सरकारों पर से भरोसा उठ जाने की शक्ल में सामने आया है। इसलिए महज बोलने का मौका काफी नहीं हो सकता, उस बोलने का असर होना जरूरी है तभी जाकर लोगों को अपना कहा हुआ, कहा हुआ लगेगा। वरना किसी दीवार के सामने खड़े होकर कुछ कहकर किसी को तसल्ली नहीं हो सकती।
कश्मीर में जिस तरह लोगों से लिखे हुए एसएमएस लेकर इसकी एक प्रदर्शनी लगाई गई, क्या उसी तरह की प्रदर्शनी देश के दूसरे इलाकों के ऐसे लोगों की बातों की नहीं लग सकती जहां कि लोग फोन से दूर हैं, शायद लिखने की ताकत से दूर हैं। क्या सामाजिक कार्यकर्ताओं में से कुछ ऐसी पहल कर सकते हैं कि वे बेजुबान तबकों तक जाकर उनकी बातों को सुनें, उन्हें एसएमएस या ट्विटर की अक्षर सीमा के भीतर बांधें और उन्हें किसी वेबसाईट पर डालकर वहां उसकी प्रदर्शनी लगाएं? आज भारत जैसे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी का मोटा मतलब मीडिया के मालिकों या उसके ताकतवर लोगों, या उसे खरीदने की ताकत रखने वाले लोगों की बोलने की आजादी रह गया है। सबसे कमजोर तबके के बोलने के लिए हवा और आसमान भी नहीं है, इसलिए कई बार उसकी तरफ से उसकी बात धमाकों के साथ सामने आती है। यह बात लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है और इस लोकतंत्र को ऐसा रास्ता निकालना होगा कि बेइंसाफी को सबसे अधिक झेलने को बेबस, सबसे गरीब, सबसे पिछड़ा, सबसे दबा-कुचला तबका अपनी बात को कहीं सामने रख सके, उसकी बात को कोई सुने और यह लोकतंत्र उसकी बातों पर गौर करे।

विविधता और उदारता के खिलाफ कट्टरता

25 जुलाई 2011
नार्वे में दो दिन पहले एक कट्टर संकीर्णतावादी, माक्र्सवाद विरोधी, इस्लाम विरोधी, गोरे-यूरोपियन-ईसाई नौजवान ने जिस तरह एक लंबा घोषणापत्र लिखने के बाद नब्बे से अधिक लोगों को मार डाला उससे पश्चिम में कट्टरपंथ के एक नए सैलाब की तरफ लोगों का ध्यान गया है। यह कोई नई बात नहीं है और ऐसी घटनाएं बीच-बीच में उन तमाम देशों में सामने आती हैं जहां पर लोकतंत्र की विचारधारा उदारता के नए पैमाने गढऩे में लगी रहती हैं। यह उदारता हालांकि एक पश्चिमी सोच के अनुकूल उदारता ही रहती है लेकिन वह है तो उदारता ही। और मानो इस उदारता के अनुपात में ही उसके साथ-साथ कट्टरता भी जवाब देने के अंदाज में बढ़ते जा रही है। दो-चार दिन पहले ही जर्मनी में हिटलर के एक सहयोगी की कब्र को खोदा गया और उसकी हड्डियां निकालकर, उन्हें जलाकर उसकी राख को फेंक दिया गया और उस कब्र को मिटा दिया गया। इसके पीछे तर्क यह था कि जर्मनी में पनप और बढ़ रहे नवनाजीवाद के हिंसक समर्थक इस कब्र को तीर्थ की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और उससे जर्मनी में राजनीतिक उदारता की हवा खराब हो रही थी। अमरीका की तमाम गुंडागर्दी को अनदेखा न करते हुए भी हम यहां पर इस बात की चर्चा करना चाहेंगे कि उसने ओसामा बिन लादेन की कब्र कहीं बनने नहीं दी ताकि उसके प्रशंसक वहां पर कोई तीर्थ न बना डालें।
योरप और अमरीका में लगातार लोकतंत्र के तहत सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा दिया गया। पूरी दुनिया से आए हुए लोगों के धर्मों को जगह दी गई और कहीं-कहीं पर सरकारों के कुछ ऐसे फैसले भी रहे जो किसी धर्म के लोगों को हमले की तरह लगे लेकिन वे हमले थे नहीं। जैसे फ्रांस ने हाल ही में बुर्के पर रोक लगाने का फैसला लिया और इसे मुसलमानों ने अपने धार्मिक अधिकारों और अपनी संस्कृति पर हमला माना। लेकिन फ्रांस का तर्क मुस्लिम महिला के बुनियादी मानवाधिकारों का था जो कि बुर्के में कैद दिखते थे। इस पर बहस अभी चल ही रही है कि नार्वे में इस ताजा हमलावर ने पन्द्रह सौ पेज के अपने नफरत के घोषणापत्र में सांस्कृतिक विविधता, इस्लाम और माक्र्सवाद पर हमले को सही ठहराया है। यह नफरत कुछ जगहों पर हिंसा की हद तक दिखती है और बहुत सी जगहों पर संकीर्णतावादी, सांस्कृतिक शुद्धतावादी, और दक्षिणपंथी कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की चुनावी जीत की शक्ल में अहिंसक सी दिखती है। एक के बाद एक बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर कट्टरवादी लोग या उनके करीब समझे जाने वाले लोग चुनाव जीत रहे हैं।
हम दुनिया के भविष्य के लिए आतंक और हिंसा को उतना खतरनाक नहीं मानते जितना कि कट्टरवादी अहिंसक लोगों को मानते हैं। ऐसा इसलिए कि किसी भी देश में हिंसक अपराधियों को पकड़कर पूरी जिंदगी के लिए जेल में डालने का इंतजाम हो सकता है लेकिन जब ऐसी विचारधारा के करीब के राजनीतिक दल जनता के वोट पाकर सत्ता में आते हैं तो फिर वे हिटलर की तरह जीतकर संसद में पहुंचे हुए लोग भी होते हैं और उनकी जीत का एक मतलब यह भी निकाल लिया जाता है कि जनता ने उनकी हिंसा पर मंजूरी की मोहर लगा दी है। लेकिन अपनी इस सोच के साथ भी हम यह चर्चा करना चाहेंगे कि क्या दुनिया की अलग-अलग लोकतांत्रिक और उदारवादी शासन-व्यवस्था और समाज में रहते हुए लोग क्या अनिवार्य रूप से लोकतांत्रिक और उदारवादी हो सकते हैं? क्या इंसान का मिजाज ऐसा हो सकता है कि वे धर्म, जाति, रंग, संस्कृति और इलाके के भेदभाव को नीचे रखकर लोकतंत्र की समानतावादी, बहुलतावादी उदारता को ऊपर मान सकें? यह बात कुछ मुश्किल दिखती है। एक तरफ तो जब यह लगता है कि दुनिया उदारता की तरफ बढ़ रही है तब दूसरी तरफ यह भी दिखता है कि भौतिक विकास के साथ भी, उसके बाद भी, संपन्नता और शिक्षा के बाद भी कट्टरता, धर्मांधता और नफरत में कमी नहीं आ रही है। इसका एक मतलब यह भी है कि तमाम किस्म की पढ़ाई-लिखाई और तमाम किस्म के कामकाज मिलकर भी लोगों को लोकतंत्र की बुनियादी सोच न समझा पा रहे हैं और न उससे सहमत करा पा रहे हैं। आज भी हिन्दुस्तान में ऐसा सोचने वाले और बोलने वाले लोग मिल जाते हैं जो खुलकर कहते हैं कि जब पाकिस्तान बन गया तो यहां के मुसलमान वहां चले क्यों नहीं गए? इसी किस्म की सांप्रदायिक और नस्लवादी नफरत दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में कई लोगों के बारे में हमेशा ही कायम रहती है।
अब सवाल यह है कि इस नौबत का इलाज क्या है? कोई आसान रास्ता यहां पर नहीं दिखता, सिवाय इसके कि एक तरफ तो लोगों में विविधता के लिए सहनशीलता बढ़ती चले, और दूसरी तरफ इस विविधता के भीतर रहते हुए अलग-अलग तबकों के लोग अपनी पहचान को एक गैरजरूरी आक्रामकता के साथ, जिद के साथ सड़कों पर फैलाने से परहेज करें। विविधता की सारी सोच उस वक्त नाकामयाब हो जाती है जब लोग विविधता के बीच अपनी-अपनी पहचान सबसे ऊपर रखने पर अड़े रहते हैं और अपने अधिकारों को दूसरों के अधिकारों के ऊपर लादने को अपनी लोकतांत्रिक आजादी मान लेते हैं। यह सिलसिला बदलना आसान इसलिए नहीं है कि नफरत में लोगों को जोड़कर रखने का मजबूत गोंद रहता है। जब किसी तर्क की बात की जाती है, इंसाफ की बात की जाती है तो उसमें धर्मांधता, कट्टरता और नफरत की तरह की उत्तेजना नहीं होती। बिना सनसनी वाले अमनचैन के तर्क पिछड़ जाते हैं। दुनिया के देशों की राजनीतिक व्यवस्था, शासन व्यवस्था और समाज की उदारता में मदद की जिम्मेदारी पूरी किए बिना अगर कोई तबका सिर्फ अपने अधिकारों का दावा करते हुए उन्माद के नारे लगाते रहेगा तो उसके खिलाफ जगह-जगह एक ऐसी हिंसा खड़ी हो सकेगी जिसे कि संविधान में रखी गई उदारता भी नहीं बचा पाएगी। धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रदर्शन एक तरफ तो हर तबके का अधिकार है लेकिन दूसरी तरफ इंसानों की बिरादरी ऐसे प्रदर्शन को बर्दाश्त करने के लिए तैयार भी नहीं है। इसलिए किस तरह इस प्रदर्शन को कम रखा जा सकता है और किस तरह बर्दाश्त को बढ़ाया जा सकता है इस धीमे सिलसिले को जारी रखने के बारे में सोचना चाहिए।

बात की बात

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छोटी सी बात

24 जुलाई 2011
आप कहां बैठकर क्या बात करते हैं, इसका हमेशा ख्याल रखें। आसपास के लोग जो सुनते हैं, उसे गोपनीय रखना उनकी जिम्मेदारी नहीं होती। राज की बात को अकेले में ही कहने की आदत डालें।

भ्रष्टाचार के लिए मर्दों से बच्चे पैदा करवाने वाली सरकारें...

24 जुलाई 11
राजस्थान की एक खबर है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में कर्मचारियों और डॉक्टरों ने मिलकर केंद्र सरकार की योजना में घपला करते हुए प्रसूति के झूठे मामले बनाए जिनमें मर्दों को भी मां बना दिया, बूढ़ी महिलाओं के बच्चे पैदा करवा दिए और एक महिला को साल भर में चौबीस बार मां बनना दिखा दिया। यह वह देश है जहां पर गरीबों को इलाज नसीब होने में दिक्कत जा रही है। दूसरी तरफ देश भर में जगह-जगह स्वास्थ्य विभाग का काम हर किस्म के भ्रष्टाचार का शिकार है। उत्तरप्रदेश में तो एक के बाद एक कई स्वास्थ्य अधिकारियों की हत्याएं हुईं ताकि शायद वहां हुए हजारों करोड़ के घोटाले दबे रहें। मायावती सरकार के खिलाफ एक बहुत बड़ा माहौल स्वास्थ्य घोटाले से बना है। छत्तीसगढ़ में भी पिछले बरसों में लगातार इस विभाग में भ्रष्टाचार ने रिकॉर्ड तोड़ दिए और बड़े-बड़े भ्रष्ट अफसर आयकर छापों का शिकार हुए, सीबीआई की जांच चली, फरार रहे और उनके पास सैकड़ों करोड़ का कालाधन मिलने की बात जांच एजेंसियों ने सामने रखी।
इस देश में धर्म और ईश्वर का इतना बोलबाला है और लगभग पूरा देश आस्तिक और आस्थावान है इसलिए कभी-कभी यह हैरानी होती है कि गरीबों से पटे हुए इस देश में ऐसे आस्तिक लोग इतने बेबस-बीमारों का हक कैसे खाते हैं? लेकिन फिर हमारी स्थाई समझ काम आती है कि धर्म और ईश्वर पर आस्था किसी को भी अपराध करने से नहीं रोकते बल्कि उन्हें कुछ दान करके, कुछ पूजा-पाठ करके अपराधबोध से मुक्त हो जाने की छूट जुटा देते हैं। लेकिन इस बात से परे अगर हम यह देखें कि केंद्र सरकार से आए हुए हजारों करोड़ रुपए अगर गरीबों के इलाज के बजाय सत्ता हांक रहे लोगों की जेबों में चले जाएं तो इस देश के गरीब तबके को वक्त के कितने पहले मर जाना होता है? और इतनी काली कमाई करने वाला तबका फिर सत्ता को अपनी जेब में रखने की ताकत उसी तरह हासिल कर लेता है जिस तरह कर्नाटक में कुछ मंत्रियों ने अपनी पार्टी के भीतर हासिल की हुई है। भ्रष्टाचार के एक सीमा से बढ़ जाने के बाद उसमें अपने-आपको बचाने के लिए ढाल खड़ी कर लेने की आर्थिक ताकत और आ जाती है।
केंद्र सरकार को उसकी सौ फीसदी रकम से राज्यों में चलने वाली योजनाओं पर सीधी निगरानी रखनी चाहिए और इसमें हम केंद्र-राज्य संबंधों में कोई टकराव नहीं देखते। राज्यों के पास केंद्र की योजनाओं पर अपने अमले के हाथों अमल की सहूलियत तो रहती ही है, इन पर अगर कोई केंद्रीय जांच एजेंसी भी नजर रखे तो उसमें हम कोई बुराई नहीं देखते। छत्तीसगढ़ में केंद्र सरकार की राशन-रियायत जितनी कामयाबी से गरीब तक पहुंच रही है, वैसा देश के बहुत कम राज्यों में हो रहा है और लाखों करोड़ रुपए साल की सबसिडी कई राज्यों में उन लोगों के हाथों जा रही है जो बाद में चुनाव में उसका इस्तेमाल करके किसी भी ईमानदार विरोधी के खिलाफ जीत खरीद लेने की हालत में आ जाते हैं या फिर अगर वे अफसर हैं तो वे अपने लिए किसी कमाऊ कुर्सी को खरीदने की ताकत बची पूरी नौकरी के लिए पा लेते हैं। इसलिए हम सरकारी भ्रष्टाचार से करोड़पति या अरबपति बनने वाले नेताओं और अफसरों को सिर्फ देश के इतनी रकम के नुकसान का जिम्मेदार नहीं मानते बल्कि सरकारी कार्रवाई, अदालती मुकदमे और जांच एजेंसियों के काम को खरीद लेने की उनकी ताकत को भी हम आज के भ्रष्टाचार से उपजने वाला पेड़ देखते हैं।
इसलिए केंद्र सरकार को अपनी योजनाओं पर अधिक नजर रखने, उनकी अधिक जांच करने, उन पर सीधे कार्रवाई करने का अधिकार रखना चाहिए। दूसरी बात यह भी है कि जो जनप्रतिनिधि संसद या विधानसभा के लिए चुने जाते हैं वे भी अगर अपने इलाकों में चौकन्ना रहेंगे तो ऐसा भ्रष्टाचार नहीं हो सकता। सरकार में भ्रष्टाचार दबे-छुपे कम होता है, खुलेआम अधिक होता है। इसलिए जब कभी कोई संगठित भ्रष्टाचार सामने आता है तो उससे उस इलाके के जनप्रतिनिधियों पर दो में से एक बात तो लागू होते दिखती ही है। वे या तो लापरवाह रहते हैं या भ्रष्टाचार में हिस्सेदार रहते हैं। राजस्थान में इतने बड़े पैमाने पर मर्दों के बच्चे पैदा होने दिखाया जाए या एक औरत को साल भर में चौबीस बच्चे होते दिखाया जाए और यह बात किसी चौकन्ने जनप्रतिनिधि तक न पहुंचे ऐसा हम नहीं मान सकते। हमारा अनुभव बताता है कि अगर नेता और अफसर अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं तो ऐसा भ्रष्टाचार हो ही नहीं सकता। अगर कुछ लोग भ्रष्ट हैं तो कुछ दूसरे लोग ईमानदार जरूर निकल आते हैं जिनसे कि भांडाफोड़ हो सके। लेकिन देश में जगह-जगह इन बरसों में यह भी हुआ है कि भ्रष्टाचार की आवाज उठाने वाले लोगों की हत्याएं की गईं और अनगिनत ऐसे मामले हुए जिनमें सरकार ने ऐसे लोगों को प्रताडि़त करने के कई रास्ते निकाल लिए। भारतीय लोकतंत्र में अदालती रास्ता इतना कमअसर है कि वह लोगों की मदद नहीं कर पाता और जब सरकार कहर बनकर किसी पर टूट पडऩा चाहती है तो वह अपने-आपको कड़कती बिजली वाले काले अंधेरे आसमान के नीचे पाता है। ऐसे में केंद्र सरकार को अपनी योजनाएं की जांच अधिक दूर तक करना चाहिए और इसके पहले कि उसकी दी गई बहुत बड़ी रियायतें पूरी तरह लुट जाएं, उसे कार्रवाई करना चाहिए। राजस्थान की जिस खबर को लेकर हम यहां लिख रहे हैं, वह केंद्र सरकार के लिए भी शर्मनाक है क्योंकि दोनों जगहों पर एक ही पार्टी का राज है।

बात की बात

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छोटी सी बात

23 जुलाई 2011
अपने ऐसे दोस्तों से मिलें जिनके बच्चों से आप पहले चुके हैं तो उनके बारे में जरूर पूछें। हर इंसान अपने बच्चों की चर्चा पसंद करता है।

नार्वे ही नहीं, पूरी दुनिया दहली

23 जुलाई 2011
योरप के लिए कल का दिन दिल दहलाने वाला रहा। नोबेल शांति पुरस्कार देने वाला नार्वे कल अपनी ही घरेलू आतंकी हिंसा का शिकार हुआ और वहीं के एक नौजवान ने गोलियों से सौ के करीब बच्चों या नौजवानों को भूनकर रख दिया। इसके अलावा वहां की राजधानी ओस्लो में प्रधानमंत्री के दफ्तर के करीब एक बुरा और बड़ा बम धमाका हुआ जिसमें सात लोग मारे गए और सारी इमारतें हिल गईं। पहली नजर में यह लगा था कि यह किसी मुस्लिम संगठन का काम हो सकता है क्योंकि नार्वे उन देशों में से था जिन्होंने मोहम्मद पैगंबर के बारे में बनाए गए कार्टून छापे थे। लेकिन कुछ घंटों के भीतर ही यह साफ हो गया कि यह हमलावर तो वहां का ही था, घोर मुस्लिम विरोधी था और यह काम पूरी तरह उस देश के भीतर का था। हालांकि एक खबर यह भी है कि एक किसी मुस्लिम संगठन ने इसकी जिम्मेदारी ली है, अभी तक यह घोषणा सच या झूठ होने का पता नहीं चला है।
यह याद रखने की जरूरत है कि नार्वे एक छोटा देश होने के बाद भी दुनिया की राजनीति में बहुत से आतंकी, उग्रवादी, अलगाववादी और बागी संगठनों की उनके देशों के साथ शांतिवार्ता के लिए अपनी जमीन को पेश करते आया है। उसका दुनिया की शांति में एक योगदान रहा है, लेकिन इन दिनों अफगानिस्तान में काम कर रही नाटो की सेनाओं में नार्वे के सैनिक भी शायद शामिल हैं और उसे लेकर उसे कुछ धमकियां भी झेलनी पड़ रही है। इस देश को पहले गिने-चुने बहुत छोटे आतंकी हमले झेलने पड़े हैं।  एक संगठन के दस्तावेज बताते हैं कि 1970 से 2010 के बीच नार्वे पर पन्द्रह आतंकी हमले हुए हैं जिसमें एक मौत हुई थी और कुल तेरह घायल हुए थे। इसकी तुलना इन्हीं बरसों में अमरीका से अगर करें तो वहां पर 2347 आतंकी घटनाएं हुई थीं। लेकिन कल का यह हादसा इस देश के इतिहास में, इस पूरे इलाके के इतिहास में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बुरा हादसा माना जा रहा है।
अब एक सवाल यह उठता है कि अगर एक इंसान अपनी किसी नाराजगी की वजह से इतने लोगों को मार सकता है तो इससे कैसे बचा जाए? इसके बारे में अभी तक ऐसी खबर भी नहीं है कि उसके पीछे कोई आतंकी संगठन था। और इस घटना से परे हम पश्चिम के बारे में जब देखते हैं तो अमरीका में हर कुछ महीनों में होने वाली ऐसी हिंसा याद आती है जिसमें कोई एक बंदूकबाज दर्जन-दर्जन भर लोगों को मार डालता है। बंदूक की यह संस्कृति, हथियारों की घर-घर मौजूदगी और दुनिया भर के लड़ाई के मोर्चों पर पश्चिम की फौजों के जाने और वहां से विचलित होकर वापिस आने जैसी कई बातें यह सोचने को मजबूर करती हैं कि अमनचैन किस्तों में कहीं नहीं आ सकता। ऐसा नहीं हो सकता कि नाटो की फौजें खाड़ी के देशों पर, मुस्लिम देशों पर लगातार हमले करें और नाटो देशों के भीतर कोई तनाव खड़ा न हो। जिन देशों पर नाटो हमला कर रहा है वहां के बेकसूर लोग भी आगे चलकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने घर की मौतों का हिसाब चुकता करने की सोच सकते हैं और दूसरी तरफ विदेशों में खोले गए मोर्चे के असर से इन देशों में ऐसा घरेलू तनाव भी हो सकता है जैसा कि कल नार्वे में सामने आया है। इस शांत देश में इस एक घटना के जख्म आने वाले कई दशक तक नहीं भर पाएंगे और दुनिया के तमाम देशों को ऐसे मौके पर यह सोचना चाहिए कि दुनिया से बेइंसाफी कैसे कम हो और कैसे फौजी मोर्चे घटें, कैसे दुनिया में बदले की आग को सुलगने से रोका जाए, कैसे बंदूक की संस्कृति घटे, और कैसे दुनिया का कारोबार हथियारों के सौदागरों के हाथों से हटाया जाए। यह भी सोचना होगा कि अमरीका की तरह के हमलावर देश के साथ उसके पि_ू बने हुए योरप के देश, योरप के बाहर के देश उन्हें नापसंद मुल्कों को इतना जख्मी करके न छोड़ें कि वहां से बदले की चिन्गारियां हमेशा ही उठती रहें।
नार्वे का कल का हादसा बहुत तकलीफदेह है और दुनिया में बंदूकों की मौजूदगी नागरिकों के पास से चाहे कम भी हो जाए सुरक्षा दस्तों के हाथों में तो हथियार रहेंगे ही। इसलिए इंसान और दुनिया का बचाव हथियारों से कभी नहीं हो सकेगा, इसके लिए अमन और इंसाफ पर टिकी हुई एक ऐसी सोच ही काम आ सकती है जिसमें इंसान और इंसान के बीच का फासला कम होगा और सबसे गरीब, सबसे कुचले हुए लोगों को राहत दी जाएगी। हम इस घटना से परे भी पूरी दुनिया में जगह-जगह, अलग-अलग मुद्दों को लेकर चल रही बगावत और हिंसा को देखते हैं और उनके बारे में हमारा यही मानना है कि उनमें से लगभग हर हिंसा किसी न किसी बेइंसाफी से शुरू होती है और फिर बेइंसाफी के खिलाफ लड़ते-लड़ते वैसी बगावत फिर चाहे खुद ही बेइंसाफ हो जाती है। नार्वे की इस घटना को लेकर लोगों को दुनिया भर में तनाव के कारणों पर सोचना चाहिए, और सोच से ही हर जगह रास्ता निकलेगा, चाहे वह खाड़ी के देश हों या फिर बस्तर, कश्मीर जैसी जगहें हों।

छोटी सी बात

22 जुलाई
बारिश से घिरे हुए लोगों को यह सबक लेना चाहिए कि बुरे मौसम में कई लोगों से मदद लेने की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए अच्छे मौसम में बुरे वक्त की भी सोचकर रखेें।

हमलावर उदारता

22 जुलाई 2011
आठ महीने की कड़ी मेहनत के बाद ईरान की महिला फुटबॉल टीम आज रो रही है क्योंकि फुटबॉल को नियंत्रित करने वाले संगठन फीफा ने उन्हें बदन को ढांके रहने वाली पोशाक में खेलने की इजाजत नहीं दी है। इस बात को कुछ हफ्ते हो गए हैं लेकिन मुस्लिम परंपराओं और खेल की अंतरराष्ट्रीय पोशाक का यह टकराव इससे परे दूसरे कई खेलों तक जारी है। लंदन में 2012 में होने वाले ओलंपिक में कई खेलों में यह दिक्कत आने जा रही है। दुनिया के कुछ देश जहां महिलाओं के खुले बदन के आदी हैं और जहां के समाज में नग्नता को लेकर एक अलग किस्म की उदारता है उनके पैमानों को जब मुस्लिम देशों पर भी थोपने की कोशिश होती है तो देशों से परे यह बेइंसाफी मुस्लिम महिलाओं के साथ भी होती है जो कि अपने-अपने दायरे में आगे बढऩे की कोशिश कर रही हैं। हम खेल के ऐसे नियमों को पूरी तरह गैरजरूरी और बोगस मानते हैं जिनसे किसी एक टीम को दूसरी टीम पर एक नाजायज कायदा न मिलने पर भी उस पर रोक लगाई जाती है। अधिक कपड़ों के साथ अगर किसी देश की टीम खेलती है तो उसका तो मतलब यही है कि वह कम कपड़ों में खेल रही टीम के मुकाबले नुकसान में रहेगी। इसके बाद भी किसी देश के रीति-रिवाजों को अनदेखा करके इस तरह की ज्यादती करना हम सिर्फ खेल नहीं मानते। हम इसे पश्चिमी देशों की सोच को, उनके तौर-तरीकों को बाकी देशों पर थोपने की जिद भी मानते हैं। और इससे भी अधिक हमारा यह मानना है कि बाजार में तरह-तरह के फैशन के सामान बनाने वाली कंपनियों की यह साजिश है कि खेल में महिलाओं के बदन अधिक से अधिक उघड़े रहें और उनकी फैशन के नाम पर सामान अधिक बिक सकें। हर बरस विंबलडन में महिलाओं खिलाडिय़ों के छोटे-छोटे कपड़े बड़ी-बड़ी खबरों का सामान बनते हैं। खेल-फैशन के कारोबारी बहुत कोशिश करके ऐसे कपड़ों को छोटा करवाते हैं और ऐसी खबरों को बड़ा करवाते हैं। ऐसे में जाहिर है कि बाजार की यह ताकत अंतरराष्ट्रीय खेल संगठनों के फैसलों को उसी तरह प्रभावित करती है जिस तरह भारत में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान करोड़ों के भ्रष्टाचार के लिए कलमाड़ी ने फैसले लिए या बदले।
खेलों की प्रायोजक कंपनियां खेल संगठनों पर बहुत सा दबाव रखती हैं। भारत में भी महिला बैडमिंटन खिलाडिय़ों के कपड़ों को लेकर कुछ महीने पहले एक विवाद छिड़ा था जिसमें उनके लिए छोटी स्कर्ट पहनना जरूरी किया गया था और जाहिर है कि ऐसी पोशाक कुछ लड़कियों को या उनके परिवार और उनकी बिरादरी को खटकती हैं। इसलिए हमारा यह मानना है कि खेल संगठनों को न्यूनतम कपड़ों की सीमा तो तय करनी चाहिए कि उससे कम कोई न पहन सके, लेकिन अधिकतम कपड़ों की कोई सीमा तय करने की जरूरत इसलिए नहीं है कि अधिक कपड़ों के साथ खिलाड़ी अगर अपने समाज के कायदों को मानते हैं और खेल में नुकसान झेलते हैं तो यह उनकी अपनी मर्जी की बात होनी चाहिए। दरअसल पश्चिम के ताकतवर देशों के काबू में जितने भी किस्म के संगठन रहते हैं वे पूरी दुनिया को पश्चिम के सांचे में ढालकर ऐसी नौबत बनाए रखना चाहते हैं जिससे कि पश्चिम के कारोबारी फायदे में रहे और पश्चिम की संस्कृति ही धीरे-धीरे पूरे दुनिया की संस्कृति बनती चली जाए। यह सिलसिला दुनिया की विविधता के खिलाफ है और अमरीका की विस्तारवादी नीति का ही एक नमूना है। फुटबॉल के मामले में जो खबरें हैं उनमें यह है कि पिछले कुछ महीनों से फीफा के मुखिया के चुनाव में और 2022 के विश्वकप के कतार में होने के चयन के मामले में लंबी-चौड़ी रिश्वत का खेल चला है। जाहिर है कि ऐसी रिश्वत की रकम देने की ताकत खेल और फैशन की कंपनियां रखती हैं, और उनका खेल संगठनों पर उसी तरह का कब्जा रहता है जिस तरह का कब्जा दवा कंपनियों का डॉक्टरों पर रहता है। हमारा यह मानना है कि फीफा पर नस्लवादी और महिला के खिलाफ आक्रामक होने के जो आरोप लग रहे हैं वे बिल्कुल ठीक हैं और इस संगठन ने ऐसा ही बर्ताव किया है जिससे कि मुस्लिम देशों की लड़कियां इस खेल में आगे न आ सकें। हम इस बात को बिल्कुल फिजूल मानते हैं कि किसी खेल को खेलने के लिए एक ही किस्म की पोशाक होनी चाहिए। अपने देशों में मुस्लिम लड़कियां वहां के कट्टरवादी लोगों की लगाई तरह-तरह की रोक से बरसों से जूझती आ रही हैं। उससे उबरकर वे किसी तरह खेल के मैदान में पहुंचती हैं तो वहां एक नए किस्म की रोक दुनिया का वह हिस्सा उन पर थोप रहा है जो अपने-आपके उदारवादी और लोकतांत्रिक होने का दावा करता है। यह संस्कृतियों का टकराव नहीं है, दुनिया में असर रखने वाली एक संस्कृति की यह दूसरी संस्कृति पर गुंडागर्दी है। इस सिलसिले के खिलाफ दुनिया में आवाज उठनी चाहिए।

कमल और कीचड़ में से एक

21 जुलाई 2011
कर्नाटक की भ्रष्ट भाजपा सरकार की करतूतों पर वहां के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने मुहर लगाते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री और उनके कई मंत्री खुदाई के भ्रष्टाचार में शामिल हैं। यह रिपोर्ट अभी औपचारिक रूप से जारी नहीं हुई है लेकिन इसके छप जाने पर लोकायुक्त ने इसका खंडन भी नहीं किया है। उनकी तमाम बातें लोगों के अंदाज के मुताबिक ही हैं कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा और उनका परिवार, उनके मंत्री, जनतादल (एस) के पिछले मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी और कई दूसरे लोग खुलकर इस राज्य के खनिज की लूटपाट में लगे हुए थे। लेकिन यहां पर जो नई बात सामने आई है वह इस रिपोर्ट से परे की है। और ये नई बातें एक अलग से कार्रवाई की मांग भी करती हैं। लोकायुक्त ने मीडिया से बात करते हुए कल साफ-साफ शब्दों में कहा कि उनके टेलीफोन राज्य सरकार टैप करवा रही है। दूसरी बात उन्होंने कही कि कर्नाटक के एक मंत्री ने उनसे मिलकर यह अपील की कि वे अपनी रिपोर्ट से मुख्यमंत्री को बाहर रखें। ये दोनों बातें हमारे हिसाब से भारत की एक संवैधानिक सत्ता के खिलाफ आपराधिक और अनैतिक हरकत हैं और इन दोनों पर सजा की बात बनती है।
कर्नाटक के बारे में इस रिपोर्ट के छपने के पहले भी किसी का यह मानना नहीं था कि वहां की भाजपा सरकार अवैध खुदाई के मामले में सजा से कम किसी भी बात की हकदार है। अब एक दिक्कत भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने यह आ खड़ी हुई है कि वह देश में ईमानदारी को लेकर जो बयान दे रहा है, जिस तरह अन्ना हजारे और जस्टिस हेगड़े वाली लोकपाल कमेटी पर अन्ना हजारे का साथ दे रहा है, वह कर्नाटक में अब क्या करेगा? हमने यह बात उस वक्त भी लिखी थी जब अन्ना हजारे की टोली एक पूरी तरह अलोकतांत्रिक तरीका अपनाकर जिसके खिलाफ चाहे उसके खिलाफ बयान दे रही थी और चूंकि भाजपा उनके निशाने से बाहर थी इसलिए वह उसका मजा ले रही थी। लेकिन अब अन्ना टोली के हेगड़े का निशाना सीधा-सीधा भाजपा के मुख्यमंत्री पर है, मंत्रियों पर है और पूरी भाजपा सरकार पर है कि किस तरह उसने कर्नाटक को लूटा है, इसलिए अब दिल्ली में भाजपा को इस रिपोर्ट पर अपना रूख जनता के सामने रखना होगा। हमारा मोटे तौर पर यह मानना है कि भाजपा कर्नाटक में कार्रवाई करने में वैसे भी बहुत देर कर चुकी है और भ्रष्टाचार का धब्बा उस पर काफी बड़ा लग चुका है। वह चाहे तो अब भी लोकायुक्त की रिपोर्ट को खारिज करके  अपने भ्रष्ट मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जारी रख सकती है लेकिन इसके बाद यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार पर उसकी कही किसी भी बात की विश्वसनीयता शून्य रहेगी।
ऐसा भी नहीं है कि भारत की राजनीति में लोकायुक्त की रिपोर्ट को खारिज न किया गया हो। कई बरस पुरानी बात है जब मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री के अपने पहले कार्यकाल में अपने मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ आई लोकायुक्त की रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और उस पर कोई भी कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था। अभी-अभी हमने दिल्ली की रिपोर्ट छापी है कि किस तरह वहां की शीला दीक्षित की कांगे्रस सरकार लोकायुक्त की रिपोर्ट को कूड़ेदान में डालकर अपने भ्रष्ट मंत्री को जारी रखे चल रही है। इसलिए कर्नाटक में भाजपा अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को जारी रखने का एक जवाबी हक तो भारतीय राजनीति के तहत पा चुकी है लेकिन इससे यूपीए सरकार और उसकी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार पर वह आगे कुछ नहीं बोल पाएगी।
यहां पर एक बार फिर देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ आज चारों तरफ बने हुए माहौल पर नजर डालने की जरूरत है और यह सोचने की जरूरत है कि जनता राजनीतिक दलों से आज क्या उम्मीद करती है। अगर हर पार्टी अपने-अपने भ्रष्ट लोगों को इसी तरह बचाते चलेगी तो पूरा देश इन लोगों के हाथों लुटते चलेगा। इसलिए आज न सिर्फ जनता के एक दबाव की जरूरत है बल्कि उस अदालत के दखल की भी जरूरत है जिसे हम सैद्धांतिक आधार पर सरकारी अधिकार क्षेत्र से बाहर रखना पसंद करेंगे। जब देश की सरकारें आखिरी सांस तक अपने भ्रष्टाचार को जारी रखने पर उतारू हैं तब अगर अदालती दखल भी नहीं होगी तो किसी दिन इस देश में जंगलों से परे भी नक्सली खड़े होंगे या फिर पुलिस और फौज भ्रष्ट सरकारों की बात सुनने से मना कर देंगी।
भाजपा को बिना देर किए अपने इस मुख्यमंत्री को बर्खास्त करना चाहिए और उन मंत्रियों को भी बर्खास्त करना चाहिए जो कि अवैध खुदाई की काली कमाई से इतने ताकतवर हो गए हैं वे जाहिर तौर पर पार्टी को जेब में लेकर चल रहे हैं। यह सिलसिला भाजपा को काफी बदनामी दिला चुका है और इससे चुनाव में उसके खिलाफ एक बहुत बड़ा नारा उसके विरोधी दलों के हाथ रहेगा। कमल और कीचड़ में से भाजपा को एक छांटने की नौबत आ चुकी है।
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छोटी सी बात


20 जुलाई 2011
किसी भी सलाह या मदद से आपको कोई बड़ा फायदा होता हो, तो शुक्रिया और तोहफे से अधिक, फायदे के एक हिस्से के बारे में भी सोचें। ऐसा करके ही आप किसी का सही शुक्रिया कर सकते हैं। ऐसा करके आप आगे के लिए लोगों को जीत भी लेते हैं, और उनकी दिलचस्पी आपके फायदे में भी रहती है।

जांच कितने मामलों की होगी?

20 जुलाई 2011
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद दिल्ली पुलिस ने नोट के बदले वोट के संसद के भ्रष्टाचार पर आनन-फानन कार्रवाई शुरू की और देश के एक सबसे बड़े सत्ता के दलाल अमर सिंह के एक सहयोगी को गिरफ्तार किया गया और ऐसे आसार हैं कि आजकल में अमर सिंह सहित कुछ दूसरे बड़े लोगों की बारी आ सकती है। एक दूसरी घटना में मुंबई हाईकोर्ट ने वहां के एक पत्रकार की हत्या की जांच को सीबीआई को देने की अपील को खारिज कर दिया, इस मामले में मुंबई पुलिस वहां के माफिया के कई लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है और हथियार भी बरामद कर चुकी है। पूरे देश में जगह-जगह मामलों को सीबीआई को देने के लिए कोई सड़कों पर है तो कोई अदालत में। हो सकता है कि राज्य की पुलिस स्थानीय सरकार के दबाव में सत्तारूढ़ पार्टी या सरकार के लोगों के खिलाफ कोई जांच न कर पाए, लेकिन सीबीआई के मत्थे आखिर टोकरी कितनी भरी जा सकती है?
इस मुद्दे पर लिखने की बात हमें अभी इसलिए सूझी कि लंदन से बीबीसी की एक खबर है कि वहां संसद की एक कमेटी के मुखिया ने कहा है कि अगर पुलिस को नए साधन-सुविधा और क्षमता नहीं दिए गए तो फोन हैकिंग के चल रहे मामले की जांच पूरी होने में बरसों लग जाएंगे। हमने पिछले महीने भर में एक से अधिक बार यह लिखा है कि पुलिस या जांच एजेंसियों पर जब कोई अतिरिक्त दबाव इस बात को लेकर रहता है कि वह तेजी से अपराधियों को पकड़े तो उसकी जांच कई बार सही नहीं हो पाती और कई बार बेकसूर लोग पकड़कर पेश कर दिए जाते हैं ताकि धरना और जुलूस बंद हो जाएं। जब ब्रिटेन जैसे विकसित और तकनीकी क्षमता वाले देश में वहां की संसद और सरकार यह मान रही है कि हैकिंग की जांच में बरसों लग जाएंगे तो जाहिर है कि भारत में बहुत से मामलों की जांच में लंबा समय लग सकता है।
हम आज यहां पर कुछ बातों की सिर्फ चर्चा करके छोडऩा चाहते हैं ताकि लोग उन्हें आगे बढ़ा सकें। इन पर हमारी अपनी कोई आखिरी राय नहीं है लेकिन इस पर लोगों को राय जरूर बनाना चाहिए। एक तो देश और प्रदेश में सत्ता अपनी पसंद या नापसंद से बहुत से मामलों की जांच तेज या धीमी करने की तरकीब जानती हैं। और जब जांच तय भी होती है तो जांच एजेंसी की क्षमता शुरू से ही चुकी हुई रहती है। ऐसे में जब अदालत का डंडा पड़ता है तो तमाम कामों को रोककर पहले उन चुनिंदा मामलों की जांच की जाती है जिनकी निगरानी अदालतें खुद कर रही हैं। ऐसे में कम चर्चित मामले धरे रह जाते हैं और उनके शिकार लोगों को कोई इंसाफ नहीं मिल पाता। इसलिए देश में हो रहे अपराधों के अनुपात में जांच एजेंसियां की क्षमता बनाने की जरूरत है और मुकदमे के लिए अदालतों की क्षमता भी उसी हिसाब से बढ़ानी चाहिए। अभी मुंबई के धमाकों के बाद एक सवाल यह भी उठा कि देश को सबसे अधिक टैक्स देने वाले इस महानगर में फोरेंसिक जांच के लिए टीमों को हवाई जहाज से दिल्ली और हैदराबाद से भेजने की घोषणा केंद्रीय गृहमंत्री जब कर रहे थे तो वह गर्व की बात थी या शर्म की?
लेकिन यहां पर हम जांच और मुकदमे की नौबत से पहले की बात छेडऩा चाहते हैं जिस पर हम कई बार लिख चुके हैं। मुंबई विस्फोट की बात ही लें तो जैसा हमने बार-बार लिखा है, ढाई बरस तक अगर इस नाजुक और निशाने पर बैठे महानगर को आतंकी हमले से बचाकर रखा गया तो इसके पीछे खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों की कामयाबी रही। यह बचाना अधिक सस्ता पड़ा क्योंकि इतने बरसों में अगर कुछ और बार ऐसे हमले हुए होते तो उनसे जिंदगी और दौलत दोनों का बड़ा नुकसान हुआ होता। ऐसा ही हमारा मानना गैरआतंकी किस्म के बहुत से दूसरे अपराधों को लेकर है जिनसे देश को बचाने के लिए ऐसी खुफिया एजेंसियों की जरूरत है जो आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार, रिश्वत, मिलावट, नकली सामान जैसे बहुत से मामलों के शुरू होते ही तुरंत उसे पकडऩे की ताकत रखे। लंबे समय तक चोरी-डकैती चाहे सरकार में चले, चाहे सांसदों में चले और चाहे सरकारी ढांचे में चले, उससे जो नुकसान हो चुका रहता है वह बाद में न तो किसी भरपाई से लौटता और न ही ऐसे सभी मामलों में किसी को सजा हो पाती है। इसलिए इंसानी सेहत के मामले में जिस तरह बचाव ही सबसे अच्छा इलाज होता है, उसी तरह देश में अपराधों को पौधे की उम्र में ही खत्म कर देना अकेला रास्ता है। हम बार-बार देखते हैं कि तमाम अपराधों की जांच भी पुलिस या दूसरी एजेंसियां नहीं कर पातीं। जो सबसे कमजोर तबका होता है वह अपनी बेजुबानी के चलते कहीं यह चीख भी नहीं पाता कि बरसों से उसके मामले की जांच नहीं हुई है और हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट अपनी मर्जी के मामलों की जांच के लिए थानों में जाकर बैठे हैं। भारतीय न्याय-व्यवस्था तक पहुंचना भी देश की आबादी के शायद आधे हिस्से को नसीब भी नहीं हो सकता। इसलिए भारतीय शासन व्यवस्था में एक नई सोच के साथ अपराधों पर निगरानी और उनके शुरू के वक्त में ही उन पर कार्रवाई के लिए एजेंसी बनानी चाहिए। आज तो जब देश पूरा लुट चुका रहता है तब जाकर बरसों की अखबारबाजी और अदालत में लोगों की अर्जी के बाद उसकी जांच शुरू होती है। किसी के साथ पच्चीसवीं बार बलात्कार हो जाने के बाद, कुछ बरस बाद जाकर किसी को उसके लिए कटघरे में पहुंचाना किसी तरह का इंसाफ नहीं हो सकता। आज देश के साथ यही हो रहा है और चुनिंदा मामलों की जांच में एजेंसियों का अनुपातहीन समय लगने से बाकी तमाम जांच रूकी पड़ी हैं। इस तस्वीर को बदलने की जरूरत है और अपराधों के रोकथाम के काम में सुरक्षा एजेंसियों से अधिक खुफिया एजेंसियों को लगाने की जरूरत है और इसके लिए एक नया इंतजाम ही करना पड़ेगा।

छोटी सी बात

19 जुलाई 2011
जो सामान समय पर ना मिले, समझो वह सामान भी गया और उसे ढूंढऩे का समय भी गया। इसीलिए चीजों को ऐसा रखें कि वक्त पर मिल जाए। ऐसा ना होने पर सामान कबाड़ है।

यह भज्जी-माल्या की नूराकुश्ती तो नहीं?

19 जुलाई 2011
कल से टीवी के परदों पर एक दिलचस्प खबर चल रही है कि शराब बनाने वाली एक कंपनी के एक एक इश्तहार को लेकर क्रिकेट खिलाड़ी हरभजन सिंह की मां ने कंपनी को नोटिस दिया है कि इस विज्ञापन में भज्जी का मजाक उड़ाया गया है। इस विज्ञापन में महेंद्र सिंह धोनी भी हैं और इन दोनों के बीच धोनी, भज्जी का मजाक उड़ा रहे हैं ऐसा भज्जी की मां का मानना है। इस खबर से भारतीय क्रिकेट खिलाडिय़ों के इश्तहारों से कमाई के कारोबार की तरफ ध्यान खिंचता है और साथ ही यह भी लगता है कि दारू कंपनी के एक लुके-छुपे इश्तहार को करने के पहले क्या इस क्रिकेट खिलाड़ी को यह समझ नहीं आया कि उससे उसकी इज्जत बढऩे वाली है या घटने वाली है? अब यह झगड़ा कुछ और आगे तक इसलिए चलते दिख रहा है कि खेलकूद के धंधे के एक बड़े मालिक और इस शराब कंपनी के मालिक, सांसद और खबरों में बने रहने के शौकीन विजय माल्या ने इस विज्ञापन को हटाने से मना कर दिया है। कल के दिन हमें जरा भी हैरानी नहीं होगी अगर यह पता लगेगा कि यह पूरा टंटा हरभजन और माल्या ने मिलकर और सोच-समझकर किया था ताकि इश्तहार की चर्चा से सामान और अधिक बिके। जो बात आज यहां प्रासंगिक नहीं है लेकिन फिर भी उसे हम यहां एक लाईन में लिख देना चाहते हैं वह यह कि सिगरेट और शराब के इश्तहारों पर लगी रोक के बावजूद उसी ब्रांड से कुछ ऐसे सामानों की बिक्री का नाटक करते हुए इश्तहार दिए जाते हैं जिनका कोई बाजार नहीं है। अगर है भी तो भी इन सामानों पर उतना ही टैक्स लगना चाहिए जितना कि उसी कंपनी की बनाई हुई शराब पर लगता है। लेकिन जो कारोबार ताकतवर होता है वह सरकार की टैक्स नीति को बनवाता है, बिगड़वाता है और जेब में लेकर चलता है। इसलिए अब हम इस विज्ञापन की बात पर लौटें।
जब इस देश के क्रिकेट खिलाडिय़ों ने अपने बाजार के लिए अपने एजेंट तैनात कर रखे हैं और वे यह तय करते हैं कि खिलाड़ी कहीं आटोग्राफ भी देंगे या नहीं, तो फिर किसी विज्ञापन से उनका अपमान हो रहा है या नहीं यह तो पहले से तय हो जाने वाली बात है। कल ही की बात है कि युवराज सिंह ने ट्विटर पर यह लिखा कि वे लंदन में आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर एचएमवी की दूकान पर शाम एक घंटा रहेंगे और वे सिर्फ वल्र्ड कप की अधिकृत डीवीडी पर ही आटोग्राफ देंगे, इसलिए लोग किसी और चीज पर उनसे आटोग्राफ न लें। इस तरह जब कंपनियां अपने सामान को बेचने के लिए क्रिकेट खिलाडिय़ों को ढेर-ढेर पैसा देती हैं तो एग्रीमेंट के समय ही यह तय हो जाता होगा कि उन्हें कैसे नाचना है या क्या गाना है। यह लेकिन एक बहुत ही अजीब बात है कि एक वयस्क खिलाड़ी हरभजन सिंह खुद मामला-मुकदमा लडऩे के बजाय अपनी मां से विजय माल्य की कंपनी को नोटिस दिलवा रहे हैं, या वे खुद दे रही हैं।
आज टीवी के बहुत से रियलिटी शो देखें तो उसमें ये तमाम क्रिकेट खिलाड़ी नाचते-गाते दिखते हैं और इनमें से हर बात के लिए वे ढेरों पैसा भी लेते हैं। देश के बाकी तमाम खेलों और खिलाडिय़ों को कुचलते हुए क्रिकेट ने जो सुलूक दूसरे खेलों और दूसरे खिलाडिय़ों के साथ किया है उसकी वजह से अब क्रिकेट के शौकीन लोग मशहूर खिलाडिय़ों की वाहवाही चाहे करें उनके बाजारू धंधों को लेकर शायद ही किसी की हमदर्दी होगी। और एक इश्तहार को लेकर मान और अपमान का नोटिस जब रवाना हो चुका है तो लग रहा है कि यह क्रिकेट खिलाड़ी झगड़ालू होने की अपनी पुरानी इमेज के मुताबिक ही अभी भी चल रहा है। लोगों को याद होगा किस तरह साइमंड्स से मैदान पर बहस होने पर भज्जी ने उसे एक बंदर करार देते हुए उस तरह चिढ़ाया था। एक आदिवासी मूल के खिलाड़ी का वैसा मजाक करना एक नस्लवादी हरकत भी थी लेकिन वह बात भी एक मामूली कार्रवाई और शायद जुर्माने के बाद आई-गई हो गई थी। अब जब एक विज्ञापन को लेकर भज्जी को यह लग रहा है कि उसमें धोनी से उनका मजाक उड़वाया गया है तो यह बात हंसी-मजाक की समझ की कमी भी बताती है। हास्यबोध अगर हो तो कई तरह की बातें टल सकती हैं और खुशवंत सिंह से लेकर नवजोत सिंह सिद्धू तक बहुत से लोग मजाक करते और मजाक झेलते आए हैं। इस फिजूल के विवाद से सिर्फ दारू कंपनी का भला होगा और अगर ऐसा नकली झगड़ा खड़ा करने का कोई सौदा भज्जी ने माल्या से नहीं किया है तो इससे इस खिलाड़ी की इज्जत कोई बढऩे नहीं जा रही है। यह बात तो हर किसी को पहले से मालूम थी कि वे दारू कंपनी के सामान का विज्ञापन करने जा रहे हैं, दारू की बिक्री को बढ़ाने के लिए विज्ञापन करने जा रहे हैं, तो इसे लेकर बहुत रोना-धोना भज्जी को कोई हमदर्दी नहीं दिलाएगा।

अपना धर्म, अपना ईश्वर खुद गढ़ें!

आजकल
18 जुलाई 2011
सुनील कुमार
जब आसपास की जिंदगी कम दिलचस्प हो तो आज के जमाने में कस्बा बन चुकी दुनिया के बाकी हिस्सों में इंटरनेट से जाकर बहुत सी नई बातें देखी जा सकती हैं। जब आपके आसपास के लोग सिर्फ उन्हीं पुरानी बातों को करते रहें, जिनके बारे में कई-कई बार लिखा जा चुका हो तो फिर रौशनदान से बाकी दुनिया में झांकना ताजी हवा के एक झोंके जैसा होता है।
एक वेबसाईट पर लोगों से कहा गया कि वे अपना धर्म गढ़ें। हर मजहब कभी न कभी, किसी न किसी ने तो शुरू किया ही है। महावीर हों या बुद्ध, ईसा हों या गुरुनानक, हर धर्म की शुरुआत किसी एक इंसान की की हुई ही है। इसलिए इस वेबसाईट ने लोगों की हौसलाअफजाई की की वे भी एक नए धर्म की कल्पना करके उसके बारे में लिखें और हो सकता है कि लोगों को वह पसंद आ जाए और वे एक नए धर्म के संस्थापक बन जाएं!
इस पर करीब हजार लोगों ने लिखकर भेजा और फिर इस वेबसाईट को चलाने वाले ने इसे रोक दिया ताकि अब तक आई हुई कल्पनाओं को सामने रखा जा सके और उसके बाद फिर और लोगों की इंट्री को जगह मिले। इसमें धर्म के नाम, किस बात में इस धर्म की आस्था है, रीति-रिवाज और इसके त्यौहारों की जानकारी भेजना है। इसमें से कुछ कल्पनाओं को देखें।
धर्म का नाम आधुनिकता, आस्था यह कि आप खुद अपने ईश्वर हैं, आप अपने मूल्य, नैतिक-सिद्धांत, और दूसरे विश्वास खुद तय करते हैं। रीति-रिवाज-आपके जन्मदिन पर छुट्टी रहे और आप अपने-आपके लिए एक तोहफा खरीदें। प्रमुख छुट्टियां-पहला बड़ा त्यौहार आपका जन्मदिन रहेगा, दूसरी बड़ी छुट्टी शुक्रवार की रहेगी, हर कोई शुक्रवार को प्यार करता है (क्योंकि अगले दो दिन छुट्टी रहती है)। इस धर्म के मानने वाले अपनी छोटी-मोटी छुट्टियां खुद तय करेंगे।
मेरे हिसाब से यह एक बड़ी दिलचस्प दिमागी मशक्कत है कि लोग अपनी सोच से एक धर्म डिजाइन करें। जो लोग धर्म को गंभीरता से लेते हैं उनको भी अपने-अपने धर्मों में कोई खामी दिखती होगी या किसी खूबी की कमी लगती होगी। कोई रीति-रिवाज खटकता होगा और हो सकता है कि उस धर्म के त्यौहार की तारीखें अंगे्रजी कैलेंडर से तय होने वाली छुट्टियों के साथ मेल न खाती हों। हम हिंदुस्तान के ही अलग-अलग धर्मों को देखें तो ही इनके बहुत से बुरे रीति-रिवाज लोगों को खटक सकते हैं, खटकते हैं। जिन लोगों का धर्म पर भरोसा है और जिन्हें अभी तक अपने धर्म की मरम्मत करने की जरूरत नहीं लगी है, वे भी जब एक नया धर्म गढऩे की मशक्कत करेंगे तो उन्हें अपने मौजूदा धर्म के खराब हिस्सों और पुर्जों की समझ आने लगेगी।
मैं अपनी निजी सोच में एक खालिस नास्तिक हूं और इस नाते न तो मुझे कभी धर्म की जरूरत लगती और न ही ईश्वर की। इतनी सी बात को खुले-खुले कहकर मैं पिछले महीनों में ताजा-ताजा दोस्त बने बहुत से मुस्लिम फिलीस्तीनियों को खो भी चुका हूं। जब मैं ईश्वर के बारे में खुलकर कुछ कड़वी बातें लिख देता हूं तो उसके बाद फेसबुक पर या इंटरनेट की ऐसी दूसरी दोस्ती वाली साईटों पर कुछ दोस्तों की तरफ से सिर्फ चुप्पी मिलने लगती हैं। नास्तिक की जगह शायद बहुत किस्म की आस्थाओं में है ही नहीं। क्योंकि मैं किसी अलग किस्म के ईश्वर पर आस्था रखने को भी मुझे किसी खास किस्म के ईश्वर की तरफ खींचने की कोशिश कुछ धार्मिक प्रचारवादी लोग कर सकते हैं। लेकिन जो ईश्वर के अस्तित्व को ही न मानता हो उस पर तो ऐसे प्रचारवादी लोगों को पहली कमरतोड़ मेहनत तो आस्था पैदा करने के लिए करनी पड़ेगी। चट्टान पर फसल लगाना मुश्किल होता है। इसलिए मेरी आस्था से बेहतर एक कोई दूसरी आस्था मुझे टिकाने की गुंजाइश भी जब नहीं होती तो कुछ लोग मुझे बिल्कुल ही फि जूल का मान लेते हैं।
अब ऐसे में अगर मेरे जैसे कड़क नास्तिक को भी अगर एक धर्म डिजाइन करने को कहा जाए और शर्त यह हो कि यह करना ही है तो अभी यहां तक पहुंचकर मैं सोचना शुरू कर रहा हूं कि मेरा धर्म किस किस्म का होगा?
मुझे लगता है कि दुनिया की जो सबसे पुरानी बिरादरियां हैं, ऐसे मूल निवासी या आदिवासी लोगों की आस्था शायद मेरी सोच के अधिक करीब होगी जो कि प्रकृति से जुड़ी हुई है। ईश्वर की धारणा से परे, कुदरत पर मेरा अपार भरोसा है। कुदरत पूरी तरह वैज्ञानिक है और उसके तमाम फैसलों के पीछे न्यायसंगत और तर्कसंगत कारण नजर आते हैं। कुछ लोगों को लग सकता है कि बादल फटने, बाढ़ आने, भूकंप आने या कहीं सूखा पड़ जाने के पीछे कौन सी न्यायसंगत और तर्कसंगत, वैज्ञानिक वजह हो सकती है। कुदरत का अपना एक सिलसिला है और उसने कभी इंसानों को कोई गारंटी कार्ड नहीं दिया था कि उसके ज्वालामुखी कभी फटेंगे ही नहीं, या भूकंप कभी आएगा ही नहीं। उसकी धरती का ढांचा इसी किस्म का है कि वह ऐसी तमाम उथल-पुथल से गुजरता ही रहेगा और इंसान को इस बहुत ही कुदरती हलचल के बीच रहना सीखना होगा।
यह कुदरत की तरफ से एक ऐसी चुनौती भी इंसानों को है जिसका सामना करते हुए, जिससे बचने की तरकीबें निकालते हुए वह एक ऐसी तैयारी कर ले रहा है जिससे कि आगे जाकर किसी दूसरे ग्रह पर जाने या वहां के लोगों के यहां आने पर वह तमाम बड़ी हलचलों के लिए तैयार रहे। मतलब यह कि जिसे हम प्राकृतिक विपदा कहते हैं वह एक चुनौती अधिक है और सीखने का मौका अधिक है। अगर ज्वालामुखी की मार से बचना लोग नहीं सीख पाएंगे तो कल किसी दूसरे ग्रह से आए हुए लोगों के किसी किस्म के लावे से बचना वे कैसे सीखेंगे? और बाद सिर्फ किसी एक किस्म की नौबत से जूझने की न होकर, उस नौबत के चलते एक तकनीक बना लेने की भी है और उसे परख लेने की भी है।
तो बात हो रही थी कुदरत को लेकर मेरी समझ की, जिसके तहत आम बोने से आम हासिल होता है और बबूल लगाने से बबूल। यहां इन दोनों मिसालों का मतलब आम का बेहतर होना या बबूल का बेकार होना नहीं है, सिर्फ दो अलग-अलग किस्मों की चर्चा है। धर्म को लेकर या ईश्वर को लेकर अगर मुझे अनिवार्य रूप से कोई सोच बहस के लिए बनानी ही है तो मेरा ईश्वर अच्छे कामों का एक ऐसा प्रतीक होगा जो कि इसके अलावा किसी और तरह की आकाशवाणी करने वाला नहीं होगा। वह न तो आदमी होगा और न ही औरत। जिस तरह कुछ आदिवासी समाजों में पेड़, नदी, सूरज, चांद, जानवर और एक-दो और प्राकृतिक प्रतीक उपासना के केंद्र माने जाते हैं उसी तरह कुदरत का यह सिलसिला मेरे लिए एक प्रतीक रहेगा कि जैसा बोओ वैसा काटो।
अब जैसा कि इस वेबसाईट ने पूछा है कि ऐसे नए धर्म के रीति-रिवाज क्या होंगे? तो मुझे लगता है कि मेरे इस धर्म को मानने वाले लोगों के लिए उपासना के तरीके और रीति-रिवाज शायद ऐसे हों कि रोज के अपने काम करने की ताकत का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से जो सबसे जरूरतमंद तबके या सार्वजनिक हित के लिए लगाए उसी को माना जाएगा कि उसने पूजा की है। हर किसी के चारों तरफ इतने कमजोर तबके रहते हैं कि उनके लिए बहुत कुछ करने की गुंजाइश उनसे अधिक ताकतवर हर किसी के पास होती है। इसलिए जो ऐसा करे उसी ने उपासना की है यह माना जाए।
जहां तक किसी खास दिन छुट्टी की बात है, तो आज के दुनिया के शहरी ढांचे में जिस जगह जो सबसे सहूलियत का दिन है उसी दिन छुट्टी रहनी चाहिए। आज भी भारत के सरकारी इंतजाम में साल के कुछ दिन किसी कमिश्नरी या किसी जिले में स्थानीय स्तर पर छुट्टियां तय होती हैं। यह सिलसिला तमाम छुट्टियों के लिए होना चाहिए और जिस जगह जो त्यौहार मनाए जाते हैं या जिस जगह जिन छुट्टियों का इस्तेमाल मजे के लिए हो सकता है, वैसी छुट्टियां उन दिनों पर रखना चाहिए। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि धार्मिक रिवाजों की कट्टरता की तरह यह भी तय होना चाहिए कि छुट्टियों के हकदार वे ही लोग रहें जो कि उसके पहले के काम के तमाम दिनों में ईमानदारी से अपना काम कर चुके हों। जिस तरह हज पर जाने वाले लोगों के लिए शर्तों की एक लंबी फेहरिस्त रहती है कि ऐसे इंसान अपनी तमाम पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां पूरी कर ली हैं या नहीं? उसके बाद ही किसी को हज पर जाने का हकदार माना जाता है। वैसा ही इंतजाम मेरी सोच के धर्म में हफ्तावार छुट्टी के लिए भी होना चाहिए कि उस बीच में लोगों ने ईमानदारी से काम के दिनों में अपना काम किया है या नहीं? और जिस तरह ताकत के एक हिस्से का, वक्त के एक हिस्से का इस्तेमाल कमजोर तबकों की भलाई के लिए किया है या नहीं? तो ऐसे काम और ऐसी उपासना कर लेने के बाद ही लोग छुट्टी मनाएं ऐसा मेरा मानना है।
लेकिन आज यहां की यह चर्चा मैंने अपनी सोच के लिए नहीं छेड़ी है। यह तो मैंने अलग-अलग आस्थावान और आस्थाहीन लोगों के सोचने के लिए शुरू की है कि वे अपनी मौजूदा आस्था और उससे जुड़े ईश्वर, रीति-रिवाज, उपासना और छुट्टियों के बारे में क्या सोचते हैं और उसमें क्या फेेरबदल उन्हें बेहतर लगेगा? इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कि एक बिल्कुल नए धर्म की कल्पना करें। लोगों के दिल-दिमाग को ऐसी कसरत में डालने के लिए यह बात यहां शुरू की गई और शायद कुछ लोग इसे आपसी बातचीत में या अपने मन में आगे भी बढ़ाएं।

छोटी सी बात

18 जुलाई 2011
अगर लिखना आपको अच्छा लगता है तो जान लें कि पढऩा और लोगों से गंभीर मुद्दों पर सुनना, बात करना बहुत जरूरी है। पढऩे-सुनने में सौ घंटे लगें, तो शायद आप एक घंटे अच्छा लिख सकते हैं।

गैरजरूरी बयानबाजी क्यों?

18 जुलाई 11
मध्यप्रदेश में कल भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांगे्रस के मौजूदा राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह की बयानबाजी का विरोध करने पहुंचे भाजपा के नौजवानों ने कहीं तोडफ़ोड़ की तो कहीं शायद उन्हें कांगे्रस के विरोध का सामना भी करना पड़ा। एक खबर यह भी है कि दिग्विजय सिंह ने ऐसे किसी प्रदर्शनकारी को थप्पड़ लगा दिया। अभी हम इस घटना को लेकर कोई राय कायम करना नहीं चाहते क्योंकि सड़कों पर होने वाले राजनीतिक टकराव में यह नापना-तौलना कुछ मुश्किल होता है कि शुरुआत किधर से हुई और किसने ज्यादती की। लेकिन हम एक दूसरी बात करना चाहते हैं कि क्या इस देश में आज ऐसे किसी निहायत गैरजरूरी टकराव को टालकर जनता की जिंदगी की कुछ असल जरूरतों और दिक्कतों पर देश की इन बड़ी राजनीतिक पार्टियों को बात करने की जरूरत नहीं है? हमने कुछ दिन पहले भी इसी जगह पर देश की राजनीति में चल रही कड़वाहट को लेकर लिखा था कि इससे लोकतंत्र का नुकसान हो रहा है और जनता का नुकसान हो रहा है क्योंकि संसदीय लोकतंत्र एक निरंतर टकराव का अखाड़ा नहीं है। यहां पक्ष और विपक्ष के बीच ऐसे रिश्ते तो रहना ही चाहिए कि वे जरूरी बातों पर बात करने के लिए साथ बैठ सकें।
जब दिग्विजय सिंह से यह पूछा गया कि क्या वे मुंबई के इन ताजा धमाकों के पीछे संघ का हाथ देखते हैं, तो उनका जवाब था कि वे ऐसी किसी आशंका से इंकार नहीं कर सकते, हालांकि उनके पास इस घटना को लेकर ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं। कोई और ऐसा बयान देता तो यह बयान आया-गया हो जाता। लेकिन दिग्विजय सिंह पिछले महीनों या एक-दो बरसों में लगातार जो अभियान चलाए हुए हैं उसकी साख के चलते उनकी यह बात संघ-समर्थकों ने गंभीरता से ली और इसे सड़क पर विरोध के लायक माना। दिग्विजय सिंह ने पिछले शायद साल-दो साल में लगातार आरएसएस पर हमला करने का वह जिम्मा उठा लिया है जिसे एक वक्त अर्जुन सिंह सिर पर लिए चल रहे थे। अब अर्जुन सिंह तो नहीं रहे इसलिए कांगे्रस पार्टी के भीतर अकेले दिग्विजय सिंह इस मुद्दे के लिए ओवरटाईम करते हुए संघ-विरोध की विश्वसनीयता को खत्म सा कर चुके हैं और संघ के खिलाफ लगने वाले आरोपों को हल्का भी कर चुके हैं। दरअसल किसी भी मौके-बेमौके अगर वे संघ का हाथ आतंक की घटनाओं में देखने लगेंगे तो पुलिस की जांच में अगर हकीकत इससे ठीक उल्टी आएगी तो इससे संघ विरोधी अभियान पर से लोगों का भरोसा खत्म हो जाएगा। ऐसे ही मौके के लिए कुछ लोग कहते हैं-जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसका दुश्मन की क्या दरकार।
लोगों को याद होगा कि आपातकाल के पहले के दिनों में इंदिरा गांधी और उनके बिगड़ैल बेटे संजय गांधी की अगुवाई में कांगेे्रस और केंद्र सरकार ने देश में ऐसा माहौल बनाया था कि हर हादसे के पीछे विदेशी हाथ ढूंढा जाता था। फिर एक वक्त कुछ बरस पहले ऐसा आया कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मामले को भाजपा और कुछ दूसरी पार्टियों ने इतना बड़ा बना दिया कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर की इस अभूतपूर्व स्थिति की जटिलता से परे जनता को यह लगा कि यह सोनिया के खिलाफ एक अन्यायपूर्ण अभियान है और उसे खारिज करते हुए लोगों ने सोनिया की लीडरशिप को वोट दिया। हुआ यहां तक कि सोनिया के विदेशी मूल के होने के मुद्दे पर कांगे्रस अलग होकर नई पार्टी बनाने वाले पवार और संगमा अपनी पार्टी को लेकर आज कांगे्रस के जूनियर भागीदार बनकर सोनिया की लीडरशिप में ही काम कर रहे हैं। दरअसल तर्कहीन, अन्यायपूर्ण और एक अंधा विरोध किसी का नुकसान नहीं करता और उसे फायदा ही दिला देता है। जब देश भर की अधिकांश आतंकी घटनाओं के पीछे गैरआरएसएस ताकतें कांगे्रस सरकारों की एजेंसियों की जांच में ही पकड़ा रही हैं तो सोते-जागते संघ का नाम लेकर उसे कोसकर दिग्विजय सिंह संघ का ही भला कर रहे हैं।
हम मध्यप्रदेश की सड़कों पर हुए टकराव को लेकर खासकर इसलिए लिख रहे हैं कि अगले दो-चार दिन में दिग्विजय सिंह का छत्तीसगढ़ भी आना है। यहां पर भी भाजपा न सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी है बल्कि वह सड़कों पर एक मजबूत मौजूदगी भी रखती है। कल के दिन यहां पर भी एक-दूसरे के खिलाफ अगर ऐसा टकराव होता है तो उससे एक निहायत गैरजरूरी तनाव बाद में भी बचे रह जाएगा। लेकिन यह भी है कि ऐसे बयानों का विरोध करना भी लोकतांत्रिक ही कहलाएगा जब तक कि वह तोड़-फोड़ और हिंसा तक न पहुंच जाए। इसलिए हम न सिर्फ छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में, बल्कि पूरे देश में ऐसे फिजूल के शक्तिप्रदर्शन के खिलाफ हैं चाहे वह भाजपा के झंडे-डंडे का हो या फिर कांगे्रस की निहायत गैरजरूरी और तर्कहीन बयानबाजी का।  हमारा मानना है कि इस तरह के किसी भी बयान से जांच एजेंसियों पर एक गैरजरूरी दबाव भी पड़ता है और ऐसा कहने वाले लोग चाहे किसी भी पार्टी के लोगों पर निशाना बनाते हों, उससे एक गैरजरूरी कड़वाहट भी पैदा होती है। जिन लोगों के पास किसी अपराध के सुबूत हैं उन्हें जांच एजेंसी या अदालत तक जाना चाहिए और सार्वजनिक जीवन में पूरी तरह से गैरजरूरी ऐसे विवाद छेडऩा बंद करना चाहिए। यह काम बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेता कर रहे हैं लेकिन आज यहां हम दिग्विजय सिंह पर अधिक चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि बीते कल जो मध्यप्रदेश में हुआ वह आने वाले कल छत्तीसगढ़ में न हो।

छोटी सी बात

17 जुलाई 2011
किसी बातचीत में आपको अगर आपकी कम जानकारी के कारण चुप बैठना पड़ता है, तो बाद के खाली वक्त में उसे याद रखें, और खाली वक्त का इस्तेमाल पढऩे-लिखने, ज्ञान पाने में करें।

ऐेसे सामूहिक बलात्कार पर सोचने की कुछ और बातें

17 जुलाई 2011
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नई राजधानी के लिए जो इलाका तय हुआ है वहां के एक सुनसान पड़े हिस्से में गांव की एक लड़की अपने दोस्त के साथ घूम रही थी कि कुछ गुंडों ने उन्हें घेरा और उस लड़की से वहीं सामूहिक बलात्कार किया। यह घटना चूंकि राजधानी की है इसलिए यह एक बहुत बड़ा अपराध लग रही है, और चूंकि उत्तरप्रदेश और दिल्ली में आए दिन सामूहिक बलात्कार की खबरें खड़ी हो रही हैं इसलिए भी रायपुर की यह खबर अधिक सनसनीखेज लग रही है। लेकिन इस घटना के पुलिस-पहलू से परे भी इसे देखना होगा तभी जाकर आगे ऐसे हादसे रूक सकेंगे।
शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में अगर कोई जवान लड़का-लड़की घूम रहे हैं तो उससे उन्हें वहां एक अकेला वक्त तो मिल रहा है लेकिन वह बिना खतरे के नहीं आता। भारत में अधिकांश जगहों पर ऐसे जोड़ों को खतरा झेलना पड़ सकता है क्योंकि वहां से अगर बदमाश लोगों की टोली निकल रही है तो उनके इरादे खतरनाक हो सकते हैं। ऐसी नौबत के पीछे ऐसे जवान बदमाशों की इस जरूरत को भी समझना होगा कि अपने सुख के लिए उन्हें कानूनी रूप से कोई देह खरीदना मुमकिन नहीं है क्योंकि वेश्यावृत्ति भारत में एक अपराध है। लड़के-लड़कियों का साथ में उठना-बैठना या किसी बंद कमरे में मिलना कस्बाई छत्तीसगढ़ में तब तक मुमकिन नहीं है जब तक कि ऐसे लोगों को अपने खुद के घर कभी हासिल हों। लेकिन अपने सूने घर से परे अगर जवान लड़के-लड़कियां कहीं मिलना चाहते हैं तो न तो उनके लिए होटलों कमरे आसानी से मिल सकते, वहां पुलिस छापामार कर उन्हें वेश्यावृत्ति के मामले में गिरफ्तार कर सकती है, न ही वे शहर के बाग-बगीचों में ठीक से मिल सकते, जहां पर कि बाकी लोगों को उनका करीब बैठना अश्लील लग सकता है। मतलब यह कि जब समाज प्रेम के साधारण प्रदर्शन को भी बर्दाश्त नहीं करता, करना नहीं चाहता तो जवान लोगों को सुनसान जगहों पर जाने की जरूरत भी लगेगी और उन्हें वैसी सुनसान जगहों पर देखकर कुछ लोगों का एक जुर्म करने का हौसला भी पैदा होगा।
इस ताजा घटना को लेकर हम यही कह सकते हैं कि पुलिस का कितना भी दबाव, अदालत का कितना भी डर ऐसे अपराधों को नहीं रोक सकता जो इंसानी जरूरतों के  इंसानी दुस्साहस के साथ जुड़ जाने के बाद पैदा होते हैं। न ही सुनसान इलाकों की ऐसी पुलिस चौकसी हो सकती कि हर जोड़े की हिफाजत की जा सके। इसलिए समझदारी की बात यही है कि समाज अपने नजरिए को हकीकत को मानने वाला बनाए। आज जब इस देश की संस्कृति में जवान लड़के-लड़कियों का मिलना रोका नहीं जा सकता, वे जब साथ-साथ पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं, मोबाइल और मोबाइक के जमाने में उनका घूमना-फिरना एक आम बात हो गई है, तो उनकी आज के जमाने की जरूरतों को एक कानूनी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की जरूरत है। इसके बिना समाज में बलात्कार, आसपास के लोगों का दूसरे किस्म का देहशोषण, बच्चों के साथ बुरा सुलूक, वेश्याओं के साथ असुरक्षित संबंध जैसे बहुत से खतरे बढ़ते चल रहे हैं। भारत का आज का गैरमहानगरीय इलाका बहुत ही पाखंडी मानसिकता के साथ जी रहा है जहां पर कि कुछ लोग यह मानकर, और साबित करते हुए चल रहे हैं कि भारत की संस्कृति में प्रेम कभी था ही नहीं। जबकि यहां का इतिहास और पुराण कृष्ण की तरह-तरह की रासलीलाओं से लेकर वात्सायन के विस्तृत सेक्स-ग्रंथ तक से भरा है और श्रृंगार रस का साहित्य भारत के एक युग में पहाड़ सा पैदा हुआ है। ऐसे देश में एक राजनीतिक सोच भारतीय संस्कृति के एक फर्जी इतिहास का दावा करते हुए प्रेम के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाती है। हिन्दू धर्म के ठेकेदार बनते हुए लाठियां लेकर ये लोग वेलेंटाइन डे पर, नए साल पर जिस तरह से प्रेमी-प्रेमिकाओं पर, दोस्त लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं उनको रोकने में सरकारों की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। यह माहौल आज की नौजवान पीढ़ी को ऐसे लठैतों की नजरों से बचने पर मजबूर करता है। और चूंकि परिवारों के लोग भी अपने जवान बच्चों की जरूरतों को नहीं समझते इसलिए यह पीढ़ी कहीं कोने ढूंढती है तो कहीं कोई दूसरी खाली जगहें। हम यहां पर यह भी लिखना चाहते हैं कि एक नौजवान पीढ़ी की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को कुचलते हुए अगर कोई समाज अपने आपको बहुत शुद्धता पर टिका समाज मानता है तो वह ऐसी पीढ़ी के सामाजिक योगदान भी संभावनाओं को पहले कुचलता है। अपनी अपूरित जरूरतों के साथ भड़ास और कुंठा से जीने वाले नौजवान अपने समाज और देश-प्रदेश में अपनी पूरी क्षमता से कुछ नहीं जोड़ पाते। इंसानी ताकत से दुनिया के जो देश आगे बढ़े हैं उन सब में इंसान को बहुत बड़ी निजी आजादी मिलने का इतिहास है। जो देश वर्तमान की जरूरत को नहीं समझता, उस देश का भविष्य कभी उसकी संभावनाओं जितना अच्छा नहीं हो सकता। भारत का छत्तीसगढ़ जैसा इलाका इसी तरह अपनी संभावनाओं को खो रहा है। अपनी जवान पीढ़ी में अगर भड़ास बोई जा रही है, तो उससे कभी बहुत मीठे फल मिल भी नहीं सकते।

दीवारों पर लिक्खा है...

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बात की बात

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छोटी सी बात

16 जुलाई 2011
इंटरनेट पर कई किस्म के घूरे आपके पांवों को उलझाते हैं। समझदारी उनसे बचते हुए चलने में रहती है। कचरे में फंस कर रह जाएंगे तो यह नया औजार आपको डुबा देगा।

सरकार के पाले में अदालती घुसपैठ

16 जुलाई 2011
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को बदलने और वापस लेने की मांग की जिसमें काले धन से जुड़े सभी मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों वाला विशेष जांच दल बनाने का आदेश दिया गया था। सरकार की ओर से दलील दी गई है कि फैसला अपने दायरे के बाहर जाकर दिया गया और सत्ता के विभाजन के भलीभांति स्थापित सिद्धांत के खिलाफ है। अर्जी में कहा गया है कि दो जजों की इस बेंच ने कार्यपालिका को सौंपे गए कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप किया है और अदालत का फैसला 'इस विधिक सिद्धांत के विपरीत है कि अदालत का काम यह देखना है कि कार्यपालिका कानूनी जिम्मेदारी सही से निभाए ना कि कार्यपालिका को सौंपे गए काम को खुद हाथ में लेना।Ó सरकार के अनुसार, 'यह इस भलीभांति स्थापित सिद्धांत में हस्तक्षेप है कि अदालतें आर्थिक नीति में दखलंदाजी नहीं करतीं जो कि कार्यपालिका का कार्यक्षेत्र है और आर्थिक नीति के मामलों पर फैसले देना अदालत का काम नहीं है जिसे आवश्यक तौर पर विशेषज्ञ संस्थाओं पर छोड़ देना चाहिए।Ó सरकार की दलील है कि अदालतों को न तो आर्थिक नीति की न्यायिक समीक्षा से लेनादेना है और न ही उनके लिए उन विषयों पर विचार देना जरूरी है जो कि कार्यपालिका के दायरे में आते हैं। अदालत के एसआईटी बनाने के फैसले पर विरोध दर्ज कराते हुए दलील दी गई है कि यह निर्देश कार्यपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारियों को समाप्त करेगा। सरकार ने कहा कि कथित आदेश कार्यपालिका की संवैधानिक जिम्मेदारी और भूमिका को पूरी तरह समाप्त कर सकता है जो खुद संसद के प्रति जवाबदेह है। यह कहा गया है कि अदालत को 'न्यायिक आत्मसंयमÓ बरतना चाहिए क्योंकि वह टैक्स तथा आर्थिक नीतियों से जुड़े मामले को देख रही है।
भारत के लोकतंत्र में हम केंद्र सरकार के ऊपर लिखे गए तर्कों को एक बड़ी दिलचस्प संवैधानिक बहस पा रहे हैं। यह बहुत जरूरी भी है और यह भी जरूरी है कि अदालत को ऐसे फैसले की नौबत कैसे आई और उस फैसले पर केंद्र सरकार को अदालत को इतना सुनाने का मौका क्यों मिला? यहां पर हम अपने कुछ पाठकों की सुविधा के लिए भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी सोच और उस पर बनी व्यवस्था को बताना चाहेंगे। इस देश में विधायिका यानी संसद (और विधानसभाएं), कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका यानी अदालत (और दूसरी संवैधानिक-कानूनी संस्थाएं) इस तरह बनाई गई हैं कि वे एक-दूसरे के लिए एक सीमित जवाबदेही के साथ एक-दूसरे के कामकाज पर कुछ हद तक नजर रखने और जरूरत पडऩे पर कुछ हद तक दखल देने का हक और जिम्मेदारी दोनों रखती हैं। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका में कार्यपालिका ने न्यायपालिका को यह बताने की कोशिश की है कि वह अपने चादर से बाहर पैर फैलाकर सरकार को कोंच रही है जो कि ठीक नहीं है। यह बात पूरी तरह से गलत नहीं है लेकिन साथ ही यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या भारत के संवैधानिक ढांचे में इस तरह की दखल की कोई गुंजाइश बनती है क्या? हम कुछ दिन पहले की एक दूसरी घटना याद करना चाहेंगे जब अन्ना-बाबा के प्रसंग में केंद्र सरकार ने अपनी ही किसी कार्रवाई के लिए जनता के सामने यह सफाई दी थी कि अभूतपूर्व परिस्थितियां, अभूतपूर्व कार्रवाई की जरूरत भी खड़ी करती हैं। हमें लगता है कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ बरसों में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को ताक पर धरकर जिस तरह से अपने संवैधानिक अधिकारों से डकैती का एक पेशा शुरू कर दिया था, उससे उसके अधिकारों का दावा कमजोर भी पड़ा है। हम लोकतंत्र की इन तीन संस्थाओं के बीच के अंतरसंबंधों को लेकर यहां पर बहुत जटिल व्याख्या तो नहीं कर सकते लेकिन साधारण समझ से हमारे मन में यह सवाल उठता है कि जब थानेदार ही डकैत हो जाए तो फिर वह किसी वर्दी का या लालबत्ती का दावा कैसे कर सकता है? मनमोहन सिंह की आज की सरकार, भारतीय संविधान में कार्यपालिका के लिए बनाई गई जिम्मेदारियां पर कहां तक खरी उतर रही है? इसलिए उसका यह दावा हमें कुछ हद तक नाजायज और खासी हद तक बोगस लगता है कि अदालत कार्यपालिका के काम में दखल दे रही है। हम इसे इस तरह से देखते हैं कि अदालत मनमोहन सिंह सरकार के काम में कुछ दखल देने को बेबस है क्योंकि यह सरकार अब संवैधानिक जिम्मेदारियों के तहत एक कार्यपालिका नहीं रह गई है और एक अपराधी की तरह काम कर रही है। जिस देश में आधी आबादी बिना रियायती अनाज के हफ्ते भर में भूख की कगार पर पहुंच जाए वहां पर अगर यह सरकार लाखों करोड़ की लूटपाट के बाद अपने अधिकारों का दावा करे तो हमें उसके अधिकारों से अधिक अदालत की, अदालत पर जिम्मेदारी महत्वपूर्ण लगेगी।
हम भारत की आज की स्थिति को अभूतपूर्व मान रहे हैं। और ऐसे में कुछ अभूतपूर्व संवैधानिक दखल एक-दूसरे के काम में हो सकती है। हम भारतीय लोकतंत्र के भीतर ऐसे तीन टापुओं की कल्पना नहीं करते जो कि एक-दूसरे के काम में दखल न देते हुए एक-दूसरे की जमीन पर होते हुए खुले अपराधों को अनदेखा करके चुप बैठे। अगर संसद के भीतर वोट देने के लिए बाहर नोट लिए जा रहे हैं और सरकार की पुलिस उसकी जांच नहीं कर रही है तो अदालत की फटकार को हम न तो पुलिस के काम में दखल मानते और न ही संसद के काम में। इस देश में संसद की व्यवस्था इतनी बोगस है कि नोट लेकर वोट देने वाले, सवाल पूछने के लिए नोट लेने वाले अपने सांसदों को यह संसद सदस्यता खत्म करने से अधिक कोई सजा नहीं दे पाती, या नहीं देना चाहती क्योंकि बड़ी-बड़ी पार्टियों के सांसद इसमें शामिल थे। इस देश में दूध में पानी मिलाने वाले किसी छोटे से इंसान को कैद हो सकती है लेकिन संसद के अपने हक को मंडी में बेच देने वाले सांसदों को कैद नहीं हुई। इसलिए अदालत के दखल का दायरा कांक्रीट की बनी हुई किसी नहर के किनारों की तरह नहीं है, वह बांग्लादेश के इलाके में हर बाढ़ के बाद बदल जाने वाले किनारों के खेतों की तरह है और बुरा वक्त अदालत को दायरे से बाहर जाकर भी कुछ काम करने पर मजबूर कर सकता है।
हम ऐसी दखल को सैद्धांतिक रूप से बिल्कुल ही अवांछित मानते हैं। तीनों संस्थाओं के बीच ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए लेकिन अगर अदालतों के जज बड़ी संख्या में बेईमानी करते पकड़ाएं तो हो सकता है कि संसद उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के मौजूदा इंतजाम से परे जाकर कोई और कार्रवाई भी सोचे और वैसा कोई कानून बनाए। इसी तरह सरकार भी अदालत के मामले में जहां उसका अधिकार बनता है वहां पर कार्रवाई करके भी दखल देती है और काम न करके भी दखल देती है। जब अदालतों में हजारों कुर्सियां खाली पड़ी हैं और दसियों लाख मामले कतार में खड़े हैं तो लोगों को तैनात न करना भी अदालत के कामकाज में सरकार की एक दखल है। दखल हमेशा कार्रवाई करके नहीं होती है, जरूरी काम को न करके भी दखल होती है।
सरकार की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आगे होने वाली बहस को हम दिलचस्पी के साथ देखेंगे लेकिन इस बीच जो पाठक भारतीय लोकतंत्र को कुछ बेहतर समझना चाहते हैं वे इन तीनों संवैधानिक संस्थाओं को लेकर कुछ साधारण सी किताबें या साधारण से लेख जरूर पढ़ें क्योंकि जनता की जागरूकता के बिना इस देश में कभी भी बेहतर सरकारें नहीं आ पाएंगी। हम इस मामले से परे भी जनता के राजनीतिक शिक्षण के लिए लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था पर बहस की सिफारिश करते हैं।

दीवारों पर लिक्खा है...

पोस्‍ट यहॉं पेस्‍ट करें

दीवारों पर लिक्खा है...

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छोटी सी बात

15 जुलाई
कोई नई बात सीखने में कुछ हिचक होती है, कुछ डर लगता है, और पहले से सीख चुके लोगों को देखकर हीन भावना भी हो सकती है कि आपसे छोटे लोग भी आपसे अधिक जानते हैं। लेकिन इन सबको अनदेखा करके ही आप कोई नई बात सीख सकते हैं, और इसमें देर ना करें। किसी भी हुनर की बात की कब जरूरत पड़ जाए क्या पता? कई बार शौक में सीखा गया हुनर आड़े वक्त में लोगों को जिन्दगी चलाने में भी काम आ जाता है।

लाशों के लहू से पोस्टर बनाना

15 जुलाई 2011
कल जब राहुल गांधी ने यह कहा कि देश में आतंकी हमले 99 फीसदी रोके जा चुके हैं लेकिन एक फीसदी हमले हो भी सकते हैं, तो कांगे्रस विरोधी नेता और ओवरटाईम कर रहा लगभग तमाम मीडिया इस नौजवान पर टूट पड़ा मानो इसने कोई अपराध कर दिया। ये आंकड़े किसी रिपोर्ट पर आधारित नहीं हैं और यह बात करने का एक तरीका है जिसमें कोई हालात को बयां करता है। और अगर कोई यह कहता है कि एक फीसदी खतरा तो हमेशा ही बना रहेगा तो क्या यह गलत या झूठ बात है? हम तो इस बात को एक पाखंड मानेंगे कि देश की कोई भी सरकार, कोई भी प्रदेश यह दावा करे कि उसकी जमीन पर एक फीसदी भी खतरा नहीं रह गया है या नहीं रहने दिया जाएगा। ऐसा दावा तो रूस और जापान के परमाणु बिजलीघर नहीं कर पाए, ऐसा दावा तो ब्रिटेन की टेलीफोन कंपनियां नहीं कर पाईं जो कि आज हैकिंग की खबरों के चलते खबरों में है, ऐसा दावा तो अमरीका अपने तमाम इंतजाम के बाद न्यूयॉर्क के विश्व व्यापार केंद्र की इमारतों पर हमले के पहले या हमले के बाद नहीं कर पाया, ऐसा दावा तो आज भी भारत में किसी राज्य की सरकार, किसी भी पार्टी की सरकार नहीं कर सकती। फिर राहुल गांधी ने अगर एक फीसदी खतरे के बने रह जाने की बात कही है तो क्या आज की राजनीति एक इंसान से महज फर्जी और झूठे बयान की उम्मीद करती है? क्या राहुल गांधी किसी तिजोरी-कंपनी की तरह की कोई गारंटी और वारंटी की बात करते तो आज के नेताओं को भला लगता? या फिर सिर्फ विरोध करने के नाम पर किसी की कही हुई एक बहुत साधारण और सच्ची बात को लेकर उसके खिलाफ काटने को दौडऩा लोकतांत्रिक राजनीति है?
हमें तो मौकापरस्त नेताओं से अधिक शिकायत नहीं है जो कि लहू से भीगी लाश  में ब्रश डुबाकर अपने पोस्टर बनाने में जुट जाते हैं या फिर जलती लाशों पर रोटियां सेंकने लगते हैं। लेकिन हमें अधिक शिकायत उस मीडिया से है जो रात-दिन अपने काम में शायद पचास फीसदी की चूक करता है, और जिसकी नीयत शायद पचास फीसदी से भी अधिक गड़बड़ रहती है। क्या कोई अखबार कभी भी यह दावा कर सकता है कि उसकी भाषा, उसके तथ्य और उसकी सुर्खियों में एक फीसदी की गलती भी नहीं रहेगी? क्या रात-दिन अपने बुलेटिनों में गलत तस्वीरों, झूठी जानकारियों और मूर्खता की टिप्पणियों वाले टीवी समाचार चैनलों में से कोई भी निन्यानवे फीसदी सही सच का दावा कर सकता है? क्या आज राहुल पर लाठी लेकर पिल पडऩे वाले नेताओं में से कोई भी ऐसा है जो यह कह सके कि उसकी पार्टी में एक फीसदी भी  चोर-बेईमान नहीं हैं? और दुनिया में न सिर्फ सरकार को बल्कि किसी कारखाने के कामकाज में कब और कौन यह दावा कर सकता है कि उससे एक फीसदी भी गलती नहीं होगी?
हमने कल ही इस जगह लिखा है कि हम ढाई बरस तक मुंबई को किसी हमले से बचाने को छोटी कामयाबी नहीं मानते। हम छत्तीसगढ़ में रहते हुए यह देख रहे हैं कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तमाम वर्दियां और बंदूकें मिलकर अपनी अधिक से अधिक कोशिश के बावजूद हर महीने दर्जनों जानें खो रही हैं। क्या छत्तीसगढ़ को लेकर यहां की भाजपा सरकार या केंद्र की कांगे्रस अगुवाई की सरकार यह दावा कर सकती हैं कि नक्सल मोर्चे पर निन्यानवे फीसदी कामयाबी रहेगी? इसलिए यह बात हमें तकलीफदेह लगी कि राहुल गांधी के बयान पर नेताओं, पार्टियों और मीडिया ने ऐसे ओछेपन से काम किया है कि लाशों के लहू से राहुल मुर्दाबाद के बैनर बनाए गए हों। यह सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और जब देश पर, बेकसूर जनता पर देश के भीतर से या सरहद के पार से हमला होता है तो लोगों को ओछेपन को छोड़कर बड़प्पन की बात करनी चाहिए। और हम इस बड़प्पन से यह कहना नहीं चाहते कि सरकार को उसकी नाकामयाबी या उसकी खामी के लिए झिड़का न जाए, उसे कटघरे में खड़ा न किया जाए। लेकिन अगर ढाई बरसों तक किसी हमले से मुंबई को बचाने में कामयाबी के बाद अगर एक हमला ऐसा हुआ है और उसे लेकर एक फीसदी की रियायत भी कांगे्रस पार्टी के साथ नहीं की जा रही है तो फिर दर्जन भर सेंचुरी के बाद एक बार शून्य पर आऊट हो जाने पर सचिन तेंदुलकर को टीम से बाहर ही निकाल देना चाहिए।
हम सार्वजनिक जीवन में किसी भी तबके द्वारा ओछापन दिखाने के खिलाफ रहते हैं। और जब मुंबई में लाशें बिखरी हुई हैं तब बयानबाजी में कुतर्क करने वाले लोगों को हम किसी भी तरह से माफी का हकदार नहीं मानते। देश के दुख-दर्द के मौके पर ऐसी राजनीति को हम पूरी तरह से सिद्धांतहीन मानते हैं जिनमें कोई यह साबित करने की कोशिश करे कि उसकी सरकार रहने पर एक फीसदी खामी भी नहीं रह जाएगी। भाजपा के सारे बयान क्या आज देश को यह याद नहीं दिला रहे कि कंधार से हिंदुस्तानी हवाई-मुसाफिरों को छुड़ाकर लाने के लिए भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवानी के गृह मंत्री रहते हुए किस तरह आतंकियों को तश्तरी में सजाकर ले जाकर विमान अपहरणकर्ताओं को तोहफा दिया गया था? वह नाकामयाबी एक फीसदी थी या दस फीसदी थी या पचास फीसदी थी?
अगर किसी को मुंबई के इस मौके पर भी राजनीति करनी ही थी तो उन्हें पिछले दस-बीस बरसों के देश के और प्रदेशों के आंकड़े निकालकर यह साबित करना था कि उनकी पार्टी के राज में आतंक की घटनाएं एक फीसदी भी नहीं बच गई हैं। ऐसान करके अगर कोई यह सोचता है कि राहुल गांधी के बहाने कांगे्रस के भविष्य पर हमला करने का यह एक मौका मिला है तो हम उन्हें याद दिलाना चाहते हैं कि यह मरहम और कंधा देने का मौका है, घटिया राजनीति करने का नहीं।