छोटी सी बात

31 अगस्त
किसी भी त्यौहार के दिन उस धर्म और त्यौहार के बारे में किसी गैरधर्मान्ध, गैरसाम्प्रदायिक का लिखा हुआ ढूंढकर पढ़ें।

सेंवई के लड्डू बनाने का दिन

31 अगस्त
ईद और गणेश चतुर्थी के एक साथ आने से इनकी मिलीजुली खुशी चारों तरफ बिखर रही है। पाकिस्तान में जिन लोगों के हिन्दुस्तानी दोस्त इंटरनेट पर हैं वे तमाम लोग भी दोनों जलसों की खुशियों के पैगाम एक-दूसरे को भेज रहे हैं। इन दोनों धर्मों के नाम पर राजनीति करने वाले, नेतागिरी करने वाले और ठेकेदारी करने वाले लोगों का धंधा जैसे-जैसे पिछले दशकों में उजागर होते चले गया, वैसे-वैसे भारत में साम्प्रदायिक दंगे कम होते चले गए। अधेड़ लोगों को याद होगा कि किस तरह दो-तीन दशक पहले देश के कई शहरों में साल में कई-कई बार दंगे होते थे और कहीं पुलिस गोलियों में लोग मारे जाते थे और कहीं फौज बुलाई जाती थी।
भारत के लिए यह एक गर्व की बात है कि यहां धीरे-धीरे साम्प्रदायिकता का लावा ठंडा पड़ते चले गया क्योंकि एक तरफ तो दंगे करवाने वाली ताकतें उजागर होती चली गईं और दूसरी तरफ देश का एक बड़ा तबका पहले के मुकाबले अधिक संपन्नता पाकर रोजाना के सुख का मजा लेने लगा और वह इतना निठल्ला नहीं रह गया कि बैठे ठाले करने को और कुछ न हो तो कहीं पत्थर चलाने लगे या कहीं चाकू चलाने लगे। यह भी एक गौर करने की बात है कि ठीक दो दशक पहले इस देश में मंदिर और मजिस्द के नाम पर जो जूनून फैलाया गया था, उसकी धार भी पूरी तरह खत्म हो गई और अब कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि एक धार्मिक उन्माद को दुबारा फैलाकर पूरे देश में कोई एक साथ चुनाव जीत सकता है, या किसी गठबंधन की सरकार बना सकता है। सरकार तो दूर, आज तो यह बात भी देश में बहुत साफ हो चुकी है कि धर्मान्धता पर अड़ा हुआ कोई दल कोई गठबंधन भी नहीं बना सकता जो कि देश में सरकार बना सके। इस तरह आज चारों तरफ फैली हुई निराशा के बीच अगर देखें तो यह बात साफ है कि इस देश में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के वैसे आक्रामक तेवर अब मुमकिन नहीं हैं जैसे कि एक वक्त हैदराबाद, भिवंडी, नासिक या कानपुर में लाशें ही लाशें बिछा देते थे।
भारत का इतिहास इस बात को दर्ज कर चुका है कि किस तरह गणेश चतुर्थी का त्यौहार लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र से अंगे्रजी राज के दौरान शुरू किया था ताकि इसके मार्फत देश में राजनीतिक चेतना पैदा की जा सके, बढ़ाई जा सके। वक्त के साथ-साथ गणेश चतुर्थी में अपना वह मकसद पूरी तरह खो दिया था लेकिन पिछले एक-दो दशक में एक बार फिर समकालीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे गणेश की सजावट पर हावी हो चुके हैं और अब फिर इस बहुत बड़े धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम का उपयोग देश में सुलगते हुए मुद्दों को सामने रखने के लिए खुलकर होने लगा है। हम किसी भी धर्म के साथ आस्था से जुड़े हुए लोगों के बीच जागरूकता के लिए यह एक अच्छा रास्ता पाते हैं जब आज के मुद्दों को धार्मिक मौकों पर उठाया जाए। लेकिन यह बात सिर्फ किसी एक धर्म तक सीमित रहे, यह भी ठीक नहीं है। बाकी धर्मों को भी यह सोचना चाहिए कि अपने भीड़ के मौकों का इस्तेमाल वे किस तरह अपने समुदाय के लोगों की राजनीतिक-सामाजिक जागरूकता के लिए कर सकते हैं।
इस देश ने धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता के हाथों बहुत कुछ खोया है। यह एक बेहतर वक्त आया हुआ है जब जिंदगी के कुछ अधिक जरूरी मुद्दे चर्चा में आते हैं और अलग-अलग समाज एक-दूसरे के साथ जीना अधिक हद तक सीख चुके हैं। गिनाने को तो कुछ राज्यों में साम्प्रदायिक की घटनाएं गिनाई जा सकती हैं लेकिन वे अभी चौथाई सदी पहले की हर बरस की सैकड़ों हत्याओं के मुकाबले कुछ भी नहीं रह गई हैं। धर्म का महत्व सार्वजनिक जीवन में आस्था तक सीमित रहे और जागरूकता बढ़ाने में हो, वही ठीक है। इससे अधिक जब राजनीतिक ताकतें इसे अपना बाहुबल बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती हैं तो बहुत तबाही होती है। यह बात आज यहां करना इसलिए भी जरूरी है कि अभी भी बेअसर हो चुका एक तबका नफरत की बातें करना बंद नहीं कर रहा है। हम आज के इस मौके पर यह भी चाहते हैं कि हर धर्म और समाज के ऐसे लोग जो कि जाने-माने हैं, जिनकी कही बातें लोग पढ़ते-सुनते हैं, उन्हें भी अधिक दखल देकर, अधिक कड़ाई से अमन की बातें कहकर, अधिक हिस्सेदारी करके धर्मान्ध लोगों के खिलाफ लोगों को सावधान करना चाहिए। यह देश साम्प्रदायिक सद्भाव और सर्वधर्म समभाव की अनगिनत मिसालों से भरा हुआ है और उन्हीं पर फख्र करते हुए हमें आज से भी बेहतर कल बनाने की जरूरत है। इसलिए ईद और गणेश चतुर्थी के इस मौके पर क्यों न सेंवई के लड्डू बनाए जाएं?

छोटी सी बात


30 अगस्त
बदन, कपड़ों और मुंह को बदबू से आजाद रखने में जेब पर कोई बोझ नहीं पड़ता, सिर्फ जागरूक रहना काफी होता है।

जिंदगी और मौत

30 अगस्त 11
तमिलनाडु उबल रहा है, श्रीलंका के तमिलों की तकलीफों के साथ इस भारतीय राज्य के तमिलों की हमदर्दी पहले भी कई बार इसे दिल्ली सरकार के आमने-सामने खड़ा कर चुकी है, और अब तो राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी देने का बहुत ही नाजुक मामला सामने खड़ा है। चेन्नई में सरकार चाहे किसी की रही हो, किसी की हो, वह श्रीलंका के मुद्दे को अनदेखा नहीं कर सकती। इस एक मामले को लेकर राजीव गांधी के लिट्टे के आतंकी तमिल हत्यारों के साथ मिलकर इस राज्य के एक तबके की हमदर्दी है ही। अब वहां अदालत से लेकर सड़कों तक यह मांग एक तबका तो उठा ही रहा है कि इन तीन हत्यारों को फांसी न दी जाए। और जैसा कि देश के बहुत से प्रदेशों में बहुत से हत्यारों को फांसी से बचाने के लिए जिस तरह भाजपा के सांसद और देश के सबसे चर्चित क्रिमिनल वकील राम जेठमलानी कूद पड़ते हैं, वे इस मामले में भी राजीव के हत्यारों को बचाने के लिए पहुंच गए हैं और भाजपा ने कुछ दुविधा के साथ इसे उनका निजी मामला बताते हुए पार्टी को इससे अलग कर लिया है। गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ तक राम जेठमलानी बहुत से मामलों में जुटे हुए हैं और उनकी पार्टी कई बार जनता की नाराजगी भी इस बात को लेकर झेलती है। दरअसल राम जेठमलानी भाजपा के मनोनीत सांसद हैं और यहां पर जनता का एक तबका यह भी सोचता है कि पार्टी के सदस्य के रूप में तो कोई अपने पेशे का काम करते चल सकता है और हो सकता है कि पार्टी उसमें दखल न दे, लेकिन जब ऐसे सदस्य को पार्टी राज्यसभा में मनोनीत भी करती है तो वह एक किस्म से उसके पेशेवर फैसलों को या तो मंजूरी देती है या उन पर चुप तो रहती ही है। लेकिन यह आज का बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। आज तो बात यह है कि किसी फांसी के खिलाफ तमिलनाडु में विरोध हो रहा है तो अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ कश्मीर में लोग हिंसक हो सकते हैं, ऐसा डर देश में है।
लेकिन इन दोनों मामलों को देखें तो यह साफ है कि जाति, क्षेत्रीयता और धर्म के आधार पर  ही लोग किसी मौत की सजा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। ऐसा पहले भी देखने में आया है जब किसी मौत को रोकने के लिए ऐसे ही लोग जुटे हैं और किसी राजनीतिक आधार पर या किसी विचारधारा के आधार पर लोग इस तरह एक नहीं होते। हम इस बात को पसंद करें या न करें, हकीकत तो यही है कि जाति, धर्म और क्षेत्रीयता इस देश के लोगों की भीड़ को एकजुट करने के लिए एक मजबूत गोंद की तरह काम आते हैं, और बस वही काम आते हैं। इस देश की चुनाव-केंद्रित राजनीति में किसी पार्टी या नेता के लिए यह बहुत आसान फैसला नहीं होता कि इस तरह से चिपकी हुई भीड़ को समझदारी सिखाने के लिए कोई न्यायसंगत और तर्कसंगत बात कर सके। और तो और हमने पिछले कुछ महीनों में इस देश के पेशेवर मीडिया का भी यही हाल देखा है, जिसके तौर-तरीकों को लेकर हमें उसे कीर्तन मंडली कहकर पुकारना पड़ा। यह सब एक तरफ तो भारत में राजनीतिक चेतना की कमी का सुबूत है और दूसरी तरफ भारत में जो लीडरशिप आज है, उसकी अपनी बातों में जनता पर असर डालने लायक किसी वजन की कमी भी इससे दिखती है। जब चबूतरों पर चढ़ी प्रतिमाएं खोखली होने लगें, तब इसी तरह का हाल होता है। आज अगर दिल्ली को संभालने वाले नेता जनता के बीच वजन रखते तो शायद जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर अलग-अलग इलाके इस तरह नहीं उबलते।
हम राजीव गांधी के हत्यारों या फिर संसद पर हमला करने पर फांसी पाने वाले अफजल गुरू की अलग-अलग बात नहीं करते, हम फांसी की सजा के ही खिलाफ हैं इसलिए हम अदालत में ऐसी सजा के खिलाफ अपील के हिमायती हैं। इसके साथ-साथ इसी सिलसिल में हम यह भी कहना चाहेंगे कि देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले के बाद फिर राज्य या केंद्र सरकार तक रहम के लिए दौड़-भाग का सिलसिला कानून से हटा देना चाहिए। बरसों तक लोग राष्ट्रपति के पास रहम की अर्जी लिए खड़े रहें, यह ठीक नहीं है। दुनिया के सभ्य समाजों में मौत की सजा खत्म होती जा रही है और भारत में भी ऐसा होना चाहिए। इससे सरकार पर बहुत अधिक सार्वजनिक दबाव पड़ता है और अलग-अलग लोगों के साथ भेदभाव के आरोप भी लग सकते हैं। जब देश की सबसे बड़ी अदालत कानून के आधार पर कोई फैसला कर दे तो उसके बाद इस तरह के राजनीतिक विशेषाधिकार नहीं रह जाने चाहिए।
देश का बहुत सा समय इन दिनों विवेक के अधिकार की वजह से हुए भेदभाव या उसकी वजह से हुए भ्रष्टाचार में बर्बाद हो रहा है। और रूपए-पैसे से बढ़कर जब बात इंसानी जिंदगी की आती है तो किसी अफसर या नेता को यह हक क्यों मिलना चाहिए कि वे जिसे चाहें उसे बचा लें और जिसे चाहें उसे अदालती आदेश के तहत मर जाने दें। किसी भी इंसान को इतना बड़ा हक नहीं मिलना चाहिए कि वह दूसरों की जिंदगी तय कर सके, अदालतों को भी नहीं। मौत की सजा तुरंत खत्म हो और उसके भी पहले अभी फांसी की कतार में लगे हुए तमाम लोगों को एकमुश्त, एक साथ मौत से अलग कर दिया जाए।

छोटी सी बात

29 अगस्त
इन दिनों लोग चाहें तो अपने फोन या लैपटॉप पर पूरा ऑफिस लेकर चल सकते हैं। लेकिन याद रखें कि कहीं इन्टरनेट खराब मिल सकता है, तो कहीं बिजली बंद मिल सकती है। इसलिए कागजों को पूरी तरह छोड़ न दें। कुछ जरूरी नंबर और पते कागज पर भी नोट करके रखें।

नेहरु की पार्टी का यह क्या हाल?


29 अगस्त
अन्ना हजारे का मामला फि़लहाल निपट जाने के बाद आज इस देश में किसी को सबसे पहले अपना घर सुधारना है, तो वह कांग्रेस पार्टी है। पिछले कुछ दिनों में चल रहे इस लतीफे को हमने यहाँ छापा भी था कि घर में चार दिन औरत न हो तो घर का क्या हाल होता है यह देखना हो तो कांग्रेस को देख लो। न सिर्फ पार्टी बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन के मुखिया की हैसियत से भी कांग्रेस पार्टी ने पिछले कुछ महीनों में वह सब कुछ कर दिखाया है जो कि किसी भी समझदार को नहीं करना चाहिए। अब इलाज के बाद लौटने पर सोनिया गाँधी को अपना घर सुधारने के लिए पल्लू को कमर में खोंसकर जुट जाना होगा। लेकिन हम सोनिया को इन मामलों को सुधारने में कोई जादूगर भी नहीं मानते, ऐसा ही होता तो वे इलाज के लिए अभी 2-3 हफ्ते पहले ही तो बाहर गयी हैं, उसके पहले उनके यहाँ रहते हुए ही तो उनके लोगों ने बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक के मामलों में सभी किस्म के गलत काम कर दिखाए थे। यूपीए सरकार का ऐसा एक भी भ्रष्टाचार उनके इलाज के दौरान नया सामने नहीं आया है जिसे कि उनकी गैरमौजूदगी के दौरान का हादसा माना जाए। इसलिए यूपीए की मुखिया और कांगे्रस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया का काबू किसी कुशल गृहिणी की तरह का नहीं रहा जिससे कि घर तबाह होने से बच जाता है। हालांकि गठबंधन के पांच-पांच बाहुबली साथियों के बीच घर चलाना कैसा होता है यह भारत की पुरानी कहानियों में दर्ज है। उनकी अगुवाई वाली सरकार के मंत्रियों ने क्या-क्या नहीं कर दिखाया? कुल मिलाकर उनकी पार्टी और सरकार ने वह सब कुछ कर दिखाया है जो कि अगला चुनाव हारने के लिए जरूरी लग सकता है। लेकिन वे पहले तो ऐसी नहीं थीं! जब देश और उनकी पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए सब कुछ कर दिया था, तब उन्होंने कुर्सी परे सरका दी थी और अपने मुकाबले अधिक काबिल मनमोहन सिंह को चुनकर एक समझदारी दिखाई थी। लेकिन तबसे लेकर अब तक के इन सात बरसों में उन्होंने काबू को लगातार खोने का काम किया है। और हिंदुस्तान की राजनीति में जिस तरह सोनिया और राहुल को मिली-जुली लीडरशिप माना जाता है और कांग्रेस का भविष्य माना जाता है, तो इस अधेड़ नौजवान ने भी इस पूरे दौर में लगता है कि अख़बार पढऩे तक का काम नहीं किया, वर्ना राजा-कलमाड़ी की सुर्खियाँ तो बरसों से पहले पन्ने पर बनी हुई थीं। एक अधेड़ अगर इनको पढ़ भी नहीं पाया, तो इस उम्र में तो कुछ लोग मुख्यमंत्री बन जाते हैं, और कुछ लोग किसी देख के मुखिया भी बन जाते हैं। अगर कांग्रेस पार्टी इस देश का आने वाला कल है, और अगर सोनिया-राहुल कांग्रेस का आज और कल दोनों हैं, तो फिर हमें इस देश की फिक्र होती है।
कांग्रेस पार्टी को अपनी अगुवाई वाली केंद्र सरकार और महाराष्ट्र जैसी राज्य सरकार के कामों को लेकर जो शर्मिन्दगी होनी चाहिए थी, वह कहीं नहीं दिखती। ना ही कलमाड़ी जैसे कालिख पुते मुंह वालों को लेकर उसे कोई शर्म है। सोनिया, मनमोहन और राहुल की जाहिर तौर पर दिखती ईमानदारी और सादगी भी किसी काम की नहीं लगती जब कांग्रेस के नेता-प्रवक्ता और मंत्री खुलकर भले लोगों पर हमले करते हैं, तो एक पार्टी के रूप में इसकी सादगी कहीं भी नहीं रह जाती। इसलिए हमारा मानना है की सोनिया को काम सम्हालने के तुरंत बाद अपने लोगों के अहंकार को तो काबू में करना ही होगा। ऐसा नहीं हो सकता की पार्टी के तीन मुखिया तो भले बने रहें और बाकी तमाम लोग बकवास में जुटे रहें। लेकिन यह तो हुई बर्ताव की बात। इससे परे भी देखें तो अधिक मायने रखती है ईमानदारी। अगर गाँधी और नेहरु की पार्टी बेईमानी करने के लिए रात-दिन काम करें और काम के वक्त पर गंदी जुबान में दूसरों को कोसें, तो फिर गाँधी की कही एक चर्चित बात याद आती है जिसमें उन्होंने आज़ादी के बाद कांग्रेस पार्टी को भंग कर देने की बात कही थी। अगर कांग्रेस को एक गिरोह ही बनकर रहना है तो फिर किसी इमानदार को इस पार्टी का मुखिया क्यों रहना चाहिए, किसी ईमानदार को इस पार्टी की सरकार का मुखिया क्यों रहना चाहिए?
सोनिया गाँधी लौटते ही, काम सम्हालते ही देखें कि उनकी अगुवाई में नेहरु की पार्टी का यह क्या हाल हो गया है।

छोटी सी बात

28 अगस्त
आपके पसीने, मुंह या मोजों की बदबू लोगों को आपसे दूर धकेल देती है। इसलिए अपनी निजी साफ-सफाई का ध्यान रखें। इसमें सावधान रहने की जरूरत पड़ती है, खर्च की नहीं।

जीत के जश्न के बीच हार की वजहें

28 अगस्त 11
सुनील कुमार
कल और आज के दिन भारत के संसदीय, लोकतांत्रिक और सार्वजनिक जीवन के लिए ऐतिहासिक दिन हैं। एक गैरराजनीतिक या गैरदलीय मंच से अनशन करते हुए अन्ना हजारे ने सत्ता और संसद इन दोनों को इस तरह हिलाकर रख दिया कि दोनों को अपनी परंपराएं छोड़कर उनकी मर्जी के मुताबिक, उनकी शर्तों से सहमत होते हुए, उनके कहे हुए समय के भीतर आम सहमति का एक प्रस्ताव संसद से उस कमेटी को भेजा गया जो कि लोकपाल विधेयक पर पूरे देश से आई हुई राय की सुनवाई करने वाली है। अन्ना हजारे की इस जिद को और उस पर संसद में बहुमत वाले सत्तापक्ष और विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की सकारात्मक दिखती पहल से कुछ पार्टियां और बहुत से नेता सहमत नहीं थे, लेकिन अन्ना की जान पर खतरे को देखते हुए संसद ने उनकी मांगों को पूरा करते हुए एक ऐसे बड़प्पन को दिखाने की कोशिश की जो बड़प्पन आज सत्ता की राजनीति में बच नहीं गया है। लेकिन बुरे से बुरे हालात में अच्छी से अच्छी तस्वीर पेश करने में नेताओं को महारत हासिल रहती है इसलिए कल कमोबेश इस हुनर को दिखाते हुए संसद ने कुछ ऐसा दिखाया कि वह देश की जनता की भावनाओं के मुताबिक यह काम पूरा कर रही है। जबकि हकीकत यह दिखती है कि देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां ने कल संसद के बाहर और संसद के भीतर एक-दूसरे से पीछे न रह जाने के डर से, एक-दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ दिखाते हुए अन्ना हजारे का साथ दिया।
कर्नाटक से लेकर मुम्बई और दिल्ली तक भ्रष्टाचार से घिरी हुई भाजपा और कांग्रेस की सरकारें अपने कुकर्मों से इतनी दबी हुई हैं कि उनका यह हौसला बचा नहीं था कि वे अन्ना हजारे की तानाशाही को तानाशाही कह सकें और यह कह सकें कि वे अपनी जिंदगी की नोंक पर सरकार और संसद को बंधक बनाकर एक ऐसी फिरौती मांग रहे हैं जो चाहे जाहिर तौर पर आज जनहित की दिखती हों लेकिन जो खतरनाक सिलसिले को शुरू करने वाली है। संसद के भीतर इन पार्टियों के सांसद अपनी आवाज बेचते हुए पकड़ाए जा चुके हैं, हवाला से लेकर निवाला तक इन पार्टियों के लोग समय-समय पर फंस चुके हैं और इनकी नैतिक आवाज बहुत कम बची हुई है। इसलिए हमारा यह मानना है कि राजनीतिक दलों और भारतीय लोकतांत्रिक-संसदीय संस्थाओं की बुरी तरह असफलता से विश्वसनीयता का एक बहुत बड़ा शून्य पैदा हुआ था जिसमें अन्ना नाम की आंधी टहलते हुए आकर काबिज हो गई।
अब सवाल ये खड़े होते हैं कि जब लोकतंत्र की औपचारिक संस्थाएं नाकामयाब होने लगती हैं तो फिर ऐसी आंधी को क्या अलोकतांत्रिक माना जाए? और जिस तरह आंधी और तूफान ढांचों को गिराकर अपना रास्ता बना लेते हैं, उन्हें कितना लोकतांत्रिक माना जाए और कितना अराजक माना जाए? उनके मुद्दों के सही रहने पर तूफानी तौर-तरीकों को अराजक माना जाए या न माना जाए? कल संसद में बातचीत के दौरान कुछ सांसदों और पार्टियों ने संसद के कल के तरीके को संविधान के खिलाफ या उससे परे माना और इसे एक बहुत अलग किस्म की नौबत मानते हुए इसका विरोध नहीं किया। ऐसी बात हमने इस आंदोलन के पिछले एक पखवाड़े में बार-बार लिखी है और आज के इस जश्न के बीच भी हम लोगों से उस पर सोचने के लिए कहेंगे। लोगों की बात या लोगों की तकलीफ संसद तक पहुंचाने के लिए, और संसद को उसे पूरा करने के लिए मजबूर करके अन्ना हजारे ने एक इतिहास तो गढ़ा है, लेकिन यह संसदीय लोकतंत्र का भविष्य गढऩा भी है, ऐसा हम अभी नहीं मानेंगे। यह तो आने वाले बरस बताएंगे कि इस मिसाल का कितना सही इस्तेमाल होगा और कितना गलत इस्तेमाल होगा। लेकिन आज इस पूरे मुद्दे के एक दूसरे पहलू पर चर्चा जरूर होनी चाहिए कि कानून बनाने का एकाधिकार करने वाली संसद अगर जनता की नब्ज पर अपना हाथ नहीं रख पाती है, और जनता से चुनकर आने वाले सांसदों को अपनी समझ और भावना से वोट डालने के बजाए अगर अपनी पार्टी के व्हिप के मुताबिक एक रेवड़ में चलना पड़ता है तो फिर संसद के पथरीले स्तंभों को ऐसी कोई और आंधी किसी और दिन भीड़ की ताकत के साथ आकर हिलाकर रख देगी। इसलिए हमें अधिक जरूरी आज यह सोचना लग रहा है कि ऐसी नौबत से भारत का संसदीय लोकतंत्र कैसे बचे? ऐसी ब्लैकमेलिंग और ऐसे भावनात्मक दबाव की नौबत को हम अलोकतांत्रिक तानाशाही आज भी मानते हैं और भारत की राजनीति को दुबारा ऐसी नौबत से बचने के लिए अपने आपको सजग करना होगा और जनता के प्रति संवेदनशील बनना होगा। लोकतंत्र को एक इससे भी अधिक बड़ा खतरा यह हो सकता है कि कल किसी अधिक बेचैनी की नौबत आने पर अगर पुलिस, सेना या जनता के बीच के कुछ और तबकों ने सरकार के लिए हिकारत पैदा हो जाएगी तो क्या होगा? दल-बदल कानून के चलते अब संसद के भीतर मतदान की नौबत आने पर किसी सांसद का कोई सोच-विचार नहीं बच जाता। अब पार्टियां थोक में सौदे और समझौते कर लेती हैं और कमी पडऩे पर खरीद-फरोख्त कर लेती हैं और चुने हुए जनप्रतिनिधि संसद के भीतर वोट डालने की नौबत आने पर अपनी जनता के प्रतिनिधि न होकर अपनी पार्टी के हुक्म को मानने वाले, सील लगाने वाले, बटन दबाने वाले भर रह जाते हैं। जब संसद संवेदनाशून्य हो जाती है, और जब जनता की तकलीफों पर चर्चा भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की कबड्डी की तरह की हो जाती है तब सांसदों की बोलती भी अगर अपनी पार्टी के हुक्म से बंद रहेगी तो वह संसद ऐसे ही बर्ताव की हकदार रह जाएगी जैसा बर्ताव कल बाहर खड़े रहकर अन्ना हजारे ने उसके साथ किया है। इसलिए आज एक तरफ तो अन्ना हजारे को यह सोचना है कि उनके साथ जुट गई एक ताकत का वे कहां पर इस्तेमाल कर सकेंगे, और दूसरी तरफ सरकार को यह सोचना है, संसद को यह सोचना है कि वे अपनी खोई हुई नैतिक ताकत को कैसे वापिस पा सकें ताकि उन्हें कल कोई दूसरी टीम, कोई दूसरी टोली बंधक न बना सके।  एक बार का नुकसान तो चाहे देश की सेहत का हो चाहे सरकार या पार्टी की सेहत का, और चाहे वह इंसान की सेहत का हो, उससे उबरना मुमकिन हो सकता है, लेकिन दिल के छोटे दौरे पडऩे के बाद अगर इंसान में अपनी सेहत के लिए चौकन्नापन न आए तो वह एक अधिक बड़े खतरे की गारंटी जैसा होता है। इसलिए हम आज भारत के राजनीतिक दलों, यहां की केन्द्र और राज्य सरकारों, चुने हुए और मनोनीत सांसदों, इन सबसे यह उम्मीद करेंगे कि जनता को लूट खाने वाले इस प्यासे और इंसानखोर हो चुके लोकतंत्र का इलाज वे करें, वरना आज तो अन्ना हजारे ने अपनी जान की नोंक पर उनसे मांगें पूरी करवाई हैं, कल कोई उनकी जान पर नक्सल बंदूक टिकाकर, या किसी और किस्म की हिंसा की नोंक पर अपनी मांगें पूरी करवाएगा। अन्ना हजारे के इस पूरे सिलसिले को सत्ता की राजनीति के, लोकतंत्र के तमाम भागीदारों को दिल की उस जांच की तरह लेना चाहिए जो बता देती है कि कौन-कौन सी धमनी कितनी-कितनी बंद हो चुकी है और खून की आवाजाही कितनी कम हो चुकी है। अन्ना हजारे ने जाहिर तौर पर बिना किसी औपचारिक संगठन और ढांचे के इतना दबाव खड़ा कर दिया या जितना भी दबाव उन्होंने खड़ा किया उसके आगे पक्ष-विपक्ष को झुक जाने में अपनी बेहतरी लगी, यह नौबत अन्ना हजारे के लिए जितने फख्र की है, उससे कहीं अधिक शर्म की नेताओं और उनकी पार्टियों के लिए है। अन्ना हजारे ने यह लड़ाई तो जीत ली है लेकिन उनके सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने साथ जुट गई इस बिजली का इस्तेमाल किस तरफ और कैसे करेंगे? यह इसलिए जरूरी है क्योंकि जिस तरह कारखानों में बनने वाले बिजली को जमा करके नहीं रखा जा सकता, उसका इस्तेमाल साथ-साथ करते रहना पड़ता है। आज के उनके जनसमर्थन को सही मुद्दों के साथ, सही दिशा में ले जाना और आज की कामयाबी को किसी बददिमागी में न बदलने देना एक बड़ा काम होगा। जैसे कोई भी ऊर्जा सही इस्तेमाल से बहुत कुछ कर पाती है, वैसा ही योगदान अन्ना हजारे के नाम के साथ जुटे हुए जनसमर्थन से पाया जा सकता है। कम से कम यह बददिमाग हो गई भारतीय राजनीति, संवेदनाशून्य हो गई संसद और मुर्दा हो गई भारतीय जनता को हिलाकर जाने वाला आंदोलन तो साबित हो ही गया है। हमारा यह मानना है कि चाहे आज पार्टियों में अपने कुकर्मों के बोझ से लदे होने की वजह से अन्ना के सामने घुटने टेके हों, कल भी कुकर्मों की शिनाख्त करके ऐसे किसी सामाजिक मुखिया को सामने खड़े रहना होगा जिसे दी गई गालियां राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं को वापिस लेनी पड़े और जो अपनी बेदाग छवि की वजह से जनता के सम्मान का ऐसा केन्द्र बन सके। आज हो सकता है कि संसद अपनी शर्म को छुपाने के लिए इसे अपनी हार न माने, लेकिन यह उसकी एक बहुत बड़ी हार तो हुई ही है और अपने खुद के कारणों से यह नौबत उसे बर्दाश्त करनी पड़ रही है।

छोटी सी बात

27 अगस्त
जब घर पर किसी गमी या परेशानी की वजह से लोग आए हों, तो उनके खाने-पीने की अधिक फिक्र न करें। बहुत सादा खाना खिलाएं, वे किसी जश्न में नहीं आए, परेशानी में हाथ बंटाने या गम जताने आए हैं।
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मकसद और राह को अलग-अलग करके देखना भी आज जरूरी है

27 अगस्त 11
आज दोपहर जब इस कॉलम के लिए अखबार की सोच लिखने का समय होता है उस वक्त संसद में लोकपाल पर एक सात घंटों की बहस चल रही है। इसलिए उसके एक-दो घंटे पूरे होने के बाद उसके बारे में कुछ लिखना ठीक नहीं है और शायद कल हम उस पर कुछ लिखने के लिए एक बेहतर स्थिति में होंगे। लेकिन आज का यह मौका ऐसा भी नहीं कि देश की संसद में चल रही देश की इस एक सबसे बड़ी बहस से बहुत परे का भी कुछ लिखा जाए। इसलिए हम घूम-फिरकर पिछले कुछ दिनों से चले आ रहे इस धारावाहिक मुद्दे, अन्ना हजारे, लोकपाल, जनलोकपाल, भ्रष्ट यूपीए सरकार और लोकतंत्र के बहुत से पहलुओं से जुड़े हुए एक और पहलू पर बात करना चाहते हैं। अन्ना हजारे के तौर-तरीकों को लेकर हमारी एक नापसंदगी की सोच बहुत से लोगों को पसंद नहीं आई है जिनका यह मानना है कि अन्ना ने अगर इस मुद्दे को पिछले कुछ महीनों में इस आक्रामक तरीके से नहीं उठाया होता तो यह तो चालीस से अधिक बरसों से संसद के बाहर खड़ा हुआ लोकपाल है।
यह बात लगभग पूरी तरह सही है कि अगर अन्ना हजारे ने अपनी जान को दांव पर लगाकर या जान दे देने की धमकी देकर यह आंदोलन न छेड़ा होता तो शायद भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल का मुद्दा आज भी किसी किनारे नहीं पहुंचा होता। यह बात सही है कि किसी लोकतांत्रिक बात को भी उठाने के लिए कभी-कभी लोकतांत्रिक तरीके काफी नहीं होते और भारत में तो सरकारें, दूसरी संवैधानिक संस्थाएं इस कदर भ्रष्ट और बेशर्म हो गई हैं कि भगत सिंह के फेंके गए हथगोले की तरह का कोई धमाका जब तक न हो तब तक ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों के कान नहीं खुलते।
अब इस पहलू की सोचते हुए महसूस करते हैं कि जिस तरह एक वक्त डॉक्टरी इलाज की दवाईयों में पेनिसिलिन बेअसर हो गया था और अगली पीढ़ी की दवाईयों को लाना पड़ा था, उसी तरह आज सरकार का ध्यान खींचने के लिए लोगों को नए तौर-तरीके, अधिक ऊंचे दर्जे के दबाव का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। अन्ना का तरीका उसी में से एक तरीका है। ऐसा दूसरा एक तरीका देश के दर्जन भर राज्यों में नक्सली इस्तेमाल कर रहे हैं। सबसे दबे-कुचले आदिवासी इलाकों में सरकारों के भ्रष्टाचार के शिकार लोगों के हकों के लिए नक्सलियों ने एक वक्त जो हथियारबंद लड़ाई शुरू की वह चौथाई सदी से कुछ अधिक में इस कदर बढ़ी है कि अब प्रधानमंत्री सहित पूरा देश उसे देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा मानता है। आज नक्सल हिंसा को अनगिनत लाशों के साथ-साथ इस बात के लिए भी जिम्मेदार माना जा सकता है कि उसने आदिवासियों के मुद्दों को देश के बीच बहस के लायक साबित कर दिया है, जंगल, जल और वहां बसे जन के बीच हक का एक रिश्ता नक्सलियों ने देश की बहस के बीच लाकर खड़ा कर दिया है। खदानों से लेकर कारखानों तक  को लेकर देश भर में जो भ्रष्टाचार हो रहा है और जनता के हक जिस तरह से लुट रहे हैं उनको लेकर नक्सल-हिंसा के बिना क्या दिल्ली में कानूनों में इतने किस्म के सुधार की कोई चर्चा हो सकती थी? इसी तरह देश भर में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी पाकर लोग अदालतों तक जा रहे हैं, और अदालतों से लीक से हटकर इंसाफ भी पा रहे हैं। अब कोई यह भी कह सकता है कि सूचना का यह हक सरकारों के ढांचों को पूरी तरह हिला दे रहा है, लेकिन इस हिलने से बेईमानी की चर्बी ही छंट रही है, कहीं भी सही सरकारी कामकाज में रोक नहीं पड़ रही।
कुल मिलाकर बात यह है कि समय-समय पर लीक से हटकर कुछ तौर-तरीकों का इस्तेमाल तब जरूरी हो जाता है जब सरकारें या लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाएं जनविरोधी हो जाती हैं, भ्रष्ट हो जाती हैं और लोकतंत्र से ताकत पाते हुए उस ताकत से लोकतंत्र को ही कुचलने में लग जाती हैं। ऐसे मौकों पर आक्रामक और अस्थाई रूप से अलोकतांत्रिक लगते हुए कुछ तौर-तरीकों का अपना एक इस्तेमाल हो सकता है और हम कुछ हद तक ऐसे तरीकों से सहमत रहते हैं जब तक कि लोकतंत्र की बुनियाद को नुकसान न पहुंचाने लगें। हमारे पुराने पाठकों को याद होगा कि हमने नक्सलियों के आंदोलन को लेकर भी हमेशा सरकार को यह सलाह दी कि उनके ठप्पे से परे भी उनके उठाए गए मुद्दों पर सरकार को सोचना चाहिए और नक्सलियों से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए। लेकिन जैसे-जैसे नक्सलियों की हिंसा बढ़ती चली गई, वैसे-वैसे उनके लिए हमारी आलोचना भी बढ़ती चली गई और एक वक्त ऐसा आया जब हमें लगा कि नक्सली अपने मुद्दों को जरूरत जितना उठाने के बाद अब महज बेदिमाग हिंसा में लग गए हैं तो फिर उनकी हिंसा को उनके मुद्दों से जोडऩा भी हमने खत्म कर दिया। पिछले आधे बरस में तकरीबन यही नौबत अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर आई। जब उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लड़ाई छेड़ी तो हमने अपने पाठकों को सुझाया कि इस लड़ाई में हर किसी को शामिल होना चाहिए। लेकिन जब जनलोकपाल मसौदा कमेटी बनी और सरकार के न्यौते पर उसमें समाज के पांच प्रतिनिधियों की कुर्सियों पर अन्ना के ही पांच साथी सवार हो गए तो हमने उनके फैसले को गांधीवाद विरोधी इसलिए माना कि पहले से एक ही विचारधारा के चले आ रहे पांच लोगों की टोली पूरे भारतीय समाज का प्रतिनिधि कैसे हो सकती है? इसी तरह अब जब अन्ना हजारे की जान को दांव पर लगाकर या उनकी जान की नोंक पर सरकार को और संसद को इस तरह ब्लैकमेल किया जा रहा है कि इतने घंटों में अगर उनकी तमाम शर्तों को और उनके मसौदे को ही कानून न बना दिया गया तो एक जान चली जाएगी, तो हम इससे पूरी तरह असहमत हैं और इसे एक खुली तानाशाही मान रहे हैं।
इस देश की सरकार और संसद में विपक्ष की अपनी चुनावी मजबूरियां हो सकती हैं कि वे इस धमकी के आगे झुककर अन्ना हजारे के इशारों पर नाचते हुए लोकतांत्रिक और संसदीय एकाधिकार अन्ना हो देते हुए बाकी देश को अपनी बात कहने का भी मौका न दें, लेकिन हमारे सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है इसलिए हम यह मानते हैं कि किसी प्रस्तावित कानून पर किसी भी टोली को ऐसा एकाधिकार देना अलोकतांत्रिक है। देश के राजनीतिक दल अन्ना हजारे के साथ खड़े हुए जिन लोगों की भीड़ को देखकर दहशत में हैं, वह भीड़ भी हमारी दहशत की वजह नहीं बन सकती। टीवी के कैमरों के सामने आकर पूरे देश में अपने चेहरे को दिखाने की चाह तो बड़े-बड़े नेताओं की कम नहीं होती, यह तो आम लोग हैं इसलिए ऐसा मौका उन्हें काट नहीं सकता। इसके साथ-साथ हम यह भी देख रहे हैं कि देश के तमाम किस्म के भ्रष्ट लोग भी अन्ना हजारे के आंदोलन में गांधी टोपी पहनकर, बैनर पोस्टर लेकर सड़कों पर हैं। हम किसी डकैत के हृदय परिवर्तन के अधिकार को मना नहीं करते, लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन को मिल रहे जनसमर्थन का विश्लेषण जब लुभावनी मजबूरियों के बिना किया जाएगा तो हमारा अंदाज यह है कि यह साबित होगा कि बहुत से लोग एक शोहरती-शहादत के फेर में अन्ना बने हुए सड़कों पर या धरनों में पहुंचे हुए हैं। जिस तरह किसी धर्मस्थल पर जुटे हुए लोगों की धार्मिक मूल्यों में आस्था के बारे में हमारा यह गहरा शक हमेशा बने रहता है कि उनका बहुत बड़ा हिस्सा अपने-आपको धोखा देने के लिए और अपने अपराधबोध से, अपनी आत्मग्लानि से मुक्त होने के लिए ईश्वर के सामने पहुंचा होता है ताकि वहां से अपनी आत्मा को ड्राईक्लीन करवाकर वापिस अपनी जिंदगी में दाग लगवाने वाले कुकर्म करने के लिए बैटरी चार्ज करवाकर आ जाएं। कमोबेश वैसी ही सोच लेकर घोषित रूप से भ्रष्ट लोग अन्ना की टोपी लगाए घूम रहे हैं क्योंकि उन्हें यही एक मौका अपने-आपको ईमानदार दिखाने का या बेईमानी का विरोधी बताने का मिल रहा है। कैमरों और कुकर्मांे के बीच की इस भीड़ को लेकर हम बहुत अधिक प्रभावित नहीं हैं और जैसा कि अन्ना के सबसे बड़बोले साथी अरविंद केजरीवाला ने कहा है कि दो करोड़ लोग अब तक उनका समर्थन कर चुके हैं, तो इससे यह भी साबित हुआ है कि बचे सवा सौ करोड़ से अधिक लोग अब तक उनका समर्थन करने से दूर हैं।
लेकिन आंकड़ों का अंदाज आज का मुद्दा नहीं है। हम आज जनकल्याण के मुद्दों को लेकर नक्सल आंदोलन से लेकर अन्ना आंदोलन तक की बात कर रहे हैं और हमारा यह मानना है कि तौर-तरीका माओवादी हो या गांधीवादी, एक सीमा के बाद जाकर अगर वह हिंसक हो जाता है तो मुद्दे धरे रह जाते हैं और माध्यम की तरफ देखना भी जरूरी हो जाता है। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोध जरूरी और जायज है। उस बात के लिए देश में एक बड़े तबके में उनका सम्मान हो रहा है। लेकिन उनकी बाकी की जिद और उनके हिंसक हो चुके तौर-तरीके, देश पर एकाधिकार का उनका आक्रामक अंदाज, किसी बददिमाग तानाशाह की तरह का हो गया है। इसलिए मकसद और वहां तक पहुंचने की राह को अलग-अलग करके देखना भी जरूरी है वरना नक्सली भी अपना मकसद तो आदिवासियों का भला ही बताते हैं।

छोटी सी बात


26 अगस्त
अपने ईमेल बॉक्स को कभी भी तीन-चौथाई से अधिक न भरने दें। आपको अचानक कई दिन इंटरनेट से दूर रहना पड़ा तो मेल बॉक्स भरने पर बाद में आने वाली ईमेल लौटने लगेंगी।

तानाशाही के खिलाफ कुछ आवाजें

26 अगस्त 11
अन्ना हजारे के उठाए हुए मुद्दे को जरूरी और सही मानते हुए भी हम उनके पूरे तौर-तरीके को घोर अलोकतांत्रिक और तानाशाह पा रहे हैं और पिछले कुछ हफ्तों में जनता के एक मुखर तबके के अन्ना समर्थन की लहर के खिलाफ जाकर भी हमने लगातार इस बारे में लिखा है। देश की राजनीतिक ताकतें लगातार अपनी चुप्पी बनाए हुए हैं लेकिन आज हमें कुछ खबरों को देखकर यह राहत मिली है कि सर्वदलीय बैठक में भी अल्पसंख्यकों और पिछड़े, कमजोर तबके के लोगों की फिक्र करते हुए कई नेताओं ने अन्ना के तानाशाह अंदाज के सामने सरकार के इस तरह से झुक जाने या इसके बाद और अधिक झुकने के खिलाफ देश को एक चेतावनी दी। हमारा पिछले कई हफ्तों का यही अनुभव रहा है कि अन्ना का तौर-तरीका देश के दीर्घकालीन व्यापक हितों के पूरी तरह खिलाफ जा रहा है और वे भ्रष्टाचार से थकी हुई, लुटी हुई जनता को लुभाते हुए, एक निहायत भ्रष्ट और अनैतिक सरकार को दबाते हुए एक ऐसा मुद्दा उठाकर बैठे हैं जिसमें वे लोकतंत्र के सबसे बड़े मसीहा लग रहे हैं। जबकि उनका सारा आंदोलन लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है और एक जनकल्याणकारी तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं। अगर भीड़तंत्र से ही कोई फैसला सही हो जाता है तो फिर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराना भी सही था और उसके बाद उसी भीड़ की कारसेवा से राम मंदिर बन भी जाना था। फिर इस देश में अल्पसंख्यकों के कोई हक नहीं रहने चाहिए क्योंकि बहुसंख्यक समुदाय की भीड़ अधिक बड़ी हो सकती है। यह खतरा कल की सर्वदलीय बैठक में भी सामने आया। इसके अलावा अन्ना से प्रभावित लोगों को देश के कुछ दलित लोगों के इस एतराज पर भी गौर करना चाहिए कि किस तरह अन्ना का आंदोलन दलित विरोधी है। हम खुद अन्ना के इस सार्वजनिक आंदोलन को उनके खुद के और देश के बहुसंख्यक समुदाय के हिंदू धर्म के रूझान वाला पा रहे हैं और इसे छुपाने की या अपने तौर-तरीकों को सर्वधर्म बनाने की भी अन्ना हजारे की कोई कोशिश नहीं है। हम एक बार फिर यहां दुहराना चाहते हैं कि हम भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आज की यूपीए सरकार के सबसे बुरे आलोचक हैं, हम चाहते हैं कि इस प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा किया जाए, हमारा मानना है कि उनकी जानकारी में उनके मंत्रियों ने जितने जुर्म किए हैं उन सबमें वे एक मुखिया के तौर पर हिस्सेदार हैं और इन सबकी सजा उनको मिलनी चाहिए। लेकिन देश के विपक्ष और अन्ना हजारे या बाबा रामदेव जैसे लोगों की अब तक की गई सबसे कड़ी मांग से भी अधिक कड़ी यह मांग करते हुए हम यह भी साफ कर देना चाहते हैं कि हम एक बुजुर्ग जिंदगी की नोंक पर चलाए जा रहे इस आंदोलन के सख्त खिलाफ हैं क्योंकि यह एक बंधक की जिंदगी की कीमत पर ब्लैकमेलिंग करते हुए फिरौती मांगने की तरह का आंदोलन है और ऐसा कोई आंदोलन कभी लोकतंत्र का कोई भला नहीं कर सकता, फिर चाहे वह पहली नजर में चाहे कितना ही भला और लोकतांत्रिक क्यों न लगता हो।
यह अखबार लगातार वैचारिक विविधता को बढ़ावा देने में भरोसा रखता है और आज भी हम अपने पहले पन्ने पर ऐसी खबरें दे रहे हैं जो कि देश की जनता के एक आंदोलनकारी तबके को नापसंद हो सकती हैं, होंगी, लेकिन हमारे हिसाब से ऐसा मत-मतांतर ही लोकतंत्र को जिंदा और सेहतमंद रख सकता है। देश की एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने भी लोकपाल के लिए अपना एक मसौदा बनाकर सामने रखा है, आंध्र के एक भूतपूर्व नौकरशाह जयप्रकाश नारायण ने भी एक मसौदा सामने रखा है और इन सब पर, संसद की कमेटी द्वारा देश भर के नागरिकों से चार सितंबर तक बुलाए गए सुझावों पर विचार किए बिना किस तरह अन्ना हजारे की जिद पर संसद या सरकार कोई फैसला ले ले? यह पूरा सिलसिला घोर अलोकतांत्रिक, घोर गांधी-विरोधी, घोर हिंसक और घोर तानाशाही से भरा हुआ है। एक सज्जन, ईमानदार, बुजुर्ग, त्यागी और संघर्ष करने वाले इंसान की जिंदगी को उसी तरह दांव पर लगाकर यह आंदोलन चल रहा है जिस तरह भावनाओं का सैलाब बिखेर देने वाला कोई टीवी रियलिटी शो चलता है। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और देश में इससे एक ऐसी परंपरा कायम हो सकती है, एक ऐसा सिलसिला शुरू हो सकता है जिसमें आगे जाकर कोई दूसरी जान दांव पर लगाकर किसी अधिक सीमा तक ब्लैकमेल किया जाए। आज इस देश की संसद और यहां की सरकार को एक रॉकेट छूटने की तरह उल्टी गिनती पर काम करना पड़ रहा है जो कि बहुत ही बेइंसाफी की बात है और यह देश के हित के खिलाफ है। पिछले कुछ दिनों की तरह आज भी हम यहां पर इस अखबार के संपादक के लिखे हुए कुछ ट्वीट दे रहे हैं जिनसे इस अखबार की नीति और साफ होती है। आज जरूरत देश के लोगों के यह समझने की है कि जिस तरह हर चमकदार चीज सोना नहीं होती उसी तरह हर जनकल्याणकारी दिखता हुआ आंदोलन जनता के दीर्घकालीन और व्यापक कल्याण होना जरूरी नहीं होता।

editor sunil on twitter

sunil kumar
* team anna doesn’t need a democracy or a govt, they need a radio station playing tunes of their choice, on demand.
* bastee mein itnaa huaa-huaa huaa, ki shaamil na hone wala gaalee khaaye muaa...
* an anshan reminds of sati pratha, where a woman was forced & made 2 believe that she should bcome sati. anna-supporters should face charges.
* allegations are presented as facts. indian media going back to stone age.
* there is an endless show going on at ramleela maidan, it is called emotional atyaachaar.
* lokpal standing committee has invited suggestions till 5th sept. how any bargaining could take place b4 that? other people’s rights?
* kejriwal says received support of 2 crore people. how and why a govt should not listen 2 other more than 100 crores in standing committee?
* i wonder, in just any other ordinary case, who would have been held responsible for motivating for suicide?!
* those who fight over just letters, can never enjoy the spirit.
* indian aasthaa channels shutting down. news channels performing better.
* i appreciation tolerance of one side in an endless series of meetings where after every meeting it is abused by the other side.
* i think only so called team anna would be responsible for nailing him on this cross...
* it is shameful to put the oldest member of the team to such a fast, and all other younger members using his life as knife. shameful

छोटी सी बात

25 अगस्त
किसी एक पत्र की बात पर भरोसा करने के पहले अपनी खुद की अक्ल, खुद के तर्कों का भी इस्तेमाल करें। सिर्फ मूर्ख ही आंख मूंदकर ऐसा कर सकते हैं।

अब यह अनशन अहिंसक नहीं

25 अगस्त 11
संपादकीय
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कई दिनों से देश में चले आ रहे अन्ना हजारे से जुड़े हर किस्म के असमंजस पर आज संसद में शायद अपनी तरफ से आखिरी प्रस्ताव रखते हुए उनसे अनशन खत्म करने की अपील की और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की सहमति के बाद पूरे लोकसभा की ओर से यह अपील उनके नाम जारी की गई। इससे अलग एक दूसरी बात यह हुई कि कांगे्रस के जिस बड़बोले और ओछी जुबान वाले प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे को कुछ दिन पहले सोचे-समझे अपमान के तहत ए-कंपनी कहा था, उन्होंने अपने बयान के लिए माफी मांगी है। इस बयान के बाद से मनीष तिवारी को कांगे्रस ने परदे के पीछे धकेल दिया था और यह बात जाहिर थी कि माफी न मांगने पर भी कांगे्रस को अपनी इस गलती या अपने इस गलत काम  का नुकसान समझ आ गया था।
हम यहां पर आज इस घिसे-पिटे मुद्दे पर लिखना नहीं चाहत थे लेकिन आज देश एक बड़े नाजुक मोड़ पर आ गया है और कल से अब तक घटनाएं जितनी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, उनको देखते हुए हमारे पास इस पर लिखने के अलावा कोई और चारा बचा भी नहीं है। सरकार से पिछले तीन दिनों में जितने किस्म की बातें, जितने दौर की बातें अन्ना-टोली ने की हैं, उसके बाद कल उनके ऐसे धुंआधार बयान सरकार के खिलाफ आए जो कि पहली नजर में  भरोसेमंद नहीं लग रहे थे। जो केंद्रीय मंत्री अन्ना-टोली से बात कर रहे हैं, वे ऐसे आक्रामक तेवर में बात करने वाले नहीं लगते जैसी बातें उनके नाम से अन्ना के लोग मंच और माईक से बोलते रहे। और देश का मीडिया चूंकि अपने नाम के बैनर के बजाय इन दिनों अन्ना के नाम का बैनर लेकर चल रहा है इसलिए वह अन्ना के लोगों के आरोपों को एक तथ्य की तरह टीवी और पहले पन्ने की सुर्खियां बना रहा है। इस आगजनी के बीच लोकसभा ने एक समझदारी के सर्वसम्मत प्रस्ताव के तहत यह तय किया कि अन्ना हजारे, अरूणा रॉय सहित तमाम किस्म के लोकपाल-प्रस्तावों पर सदन विचार करेगा। इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री ने अन्ना हजारे की तारीफ में जितनी बातें कहीं, उनको लेकर अब आक्रामक अन्ना-टोली और उनसे अधिक आक्रामक मीडिया के पास आग को और फैलाने की गुंजाइश कम दिखती है।
सरकार का जो भ्रष्टाचार देश की जनता को पिछले एक-दो बरस में निराशा में डुबा गया है उससे अधिक निराशा पिछले दिनों की इस तथाकथित सिविल सोसाइटी के बर्ताव से हुई है। लोकतंत्र, गांधीवाद और भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर लोकतंत्र के लिए लोगों के मन में एक निहायत नाजायज दर्जे की अनास्था पैदा करना और पूरी दुनिया में मान्य संसदीय लोकतंत्र के तरीकों को कुचलकर एक अराजकता पैदा करना और उसे बढ़ाना, यह काम अन्ना के लोगों ने किया और उनके पहले बाबा रामदेव के लोगों ने भी किया। हम किसी सरकार के भ्रष्टाचार का इलाज परले दर्जे की अराजकता में कभी नहीं देखते। तमाम भ्रष्ट सरकारों और बिके हुए कुछ सांसदों के बीच भी हमारी पूरी आस्था भारत की संसदीय व्यवस्था में है और हमारी यह भी सोच है कि इसमें जितनी खामियां हैं, उन सबसे उबरने की क्षमता भी उसमें है।
अब अगर अन्ना हजारे का अनशन आगे जारी रहता है तो हम उसे देश के माहौल को देखते हुए बिल्कुल भी अहिंसक नहीं मानेंगे। और उनकी सेहत को जो भी नुकसान पहुंचता है उसके लिए अन्ना की टोली पूरी तरह जिम्मेदार होगी। एक देश की सरकार और एक देश की संसद इससे अधिक किसी के लिए कुछ नहीं कर सकती और इसके बाद भी अगर अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों का अहंकार हिंसा पर उतारू रहता है तो देश के कानून को अपना काम करना चाहिए। इसके बाद भी अगर जनता को बरगलाना और भड़काना जारी रहता है, संसद से उसकी जिम्मेदारी और उसके अधिक छीन लेना जारी रहता है तो इसमें हम भ्रष्टाचार विरोध से कहीं अधिक एक साजिश भी ढूंढने की कोशिश करेंगे। इस अखबार के संपादक के लिखे हुए कुछ और तर्क इस बारे में यहां नीचे हम दे रहे हैं।

editor sunil on twitter

sunil kumar
* last night i saw in dream, subramanyam swami accusing sonia 4 this systematic degradation of UPA & congress 2 prove, she is indispensable..
* an sms- ghar mein 4 din ourat na ho to ghar ka kya haal ho jata hai, dekhnaa ho to congress ko dekh lo...
* look at new nokia advertisement, new handsets in india with the software called- Symbian Anna !!!!! (times of india, delhi front page y’day)
* anyone praising her/his own honesty and sacrifice over relevant issues looks fake to me, as if Made In China :-)
* a government overloaded with its crimes, easy to be brought to its knees.
* b4 a slogan could move u, remember, slogans r seldom based on facts r logic. facts, truth & rational can never b so dramatic & appealing
* indian media, whatever you do, you cant beat Gita Press Gorakhpur in circulation.
* i like to coin new words in my writings, a new hindustani term occurred to me this morning- shohratee-shahaadat.... how is that !!

छोटी सी बात

24 अगस्त
अगर आप डाक टिकट, सिक्के या ऐसे कोई दूसरे सामान जमा करते हैं तो महज गिनती बढ़ाना काफी नहीं, उनके बारे में जानकारी भी जुटाते चलें। उनके देशों के बारे में उन पर छपी तस्वीरों वाले लोगों, उन जगहों के बारे में पता लगाने पर ही आपके संग्रह का कोई महत्व होगा।

घुटनों से, लेटने की ओर

24 अगस्त 11
बदहाल और बेहाल दिल्ली को अगर देखें तो यूपीए सरकार पर तरस आता है। किसी सिर कटे जानवर की तरह वह चारों तरफ दौड़-भाग रही है और मोबाईल फोन पर आया हुआ एक एसएमएस सही लगता है जिसमें कहा गया है-चार दिन कोई औरत घर से बाहर रहे तो उसके घर का क्या होता है यह देखना हो तो कांगे्रस को देख लो।
हम यह भी नहीं कहते कि सोनिया गांधी के रहते हुए कांगे्रस की ऐसी बदहाली न हुई होती, क्योंकि जिन मुद्दों को लेकर अन्ना हजारे अपनी तानाशाह मांगों के साथ भी सबसे बड़े लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी नेता के रूप में जनता की नजरों में गिने जा रहे हैं, वे तमाम मुद्दे तो सोनिया गांधी के यहां रहते हुए भी सामने आ चुके थे। यूपीए सरकार का ऐसा एक भी भ्रष्टाचार उनके इलाज के दौरान नया सामने नहीं आया है जिसे कि उनकी गैरमौजूदगी के दौरान का हादसा माना जाए। इसलिए यूपीए की मुखिया और कांगे्रस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया का काबू किसी कुशल गृहिणी की तरह का नहीं रहा जिससे कि घर तबाह होने से बच जाता है। हालांकि गठबंधन के पांच-पांच बाहुबली साथियों के बीच घर चलाना कैसा होता है यह भारत की पुरानी कहानियों में दर्ज है। लेकिन आज यह जुबानी मजाक का वक्त नहीं रह गया है और पूरा देश इस बात को देख रहा है कि राजधानी के रामलीला मैदान पर अन्ना की गिरती हुई सेहत अधिक रफ्तार से गिर रही है या घुटनों पर खड़ी सरकार अधिक रफ्तार से लेट रही है। यह लोकतंत्र के लिए एक बहुत ही निराशा का वक्त है जब कोई सरकार अपने अस्तित्व के सातवें बरस में, ईमानदार और सज्जन समझे जाने वाले एक प्रधानमंत्री की सरकार की विश्वसनीयता का यह हाल है कि उसकी पहल पर भी इस देश में किसी का कोई भरोसा नहीं है, और हर कोई इस सरकार का नाम सामने आते ही उसे एक गिरोह की तरह का मान रहा है।
हम अन्ना हजारे की कुछ मांगों और उनके आंदोलन के कुछ तरीकों को घोर अलोकतांत्रिक मानते हुए पूरी तरह उन बातों के खिलाफ हैं। लेकिन अन्ना हजारे के उठाए हुए कई मुद्दे बहुत सही हैं जिनके चलते हुए यह सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हाथ-पैर हिलाने को तैयार हुई है और अन्ना की जान खतरे में दिखने पर यह सरकार अब तेजी से दौड़-भाग रही है। हम अन्ना की इस सफलता के बावजूद यह मानते हैं कि यह पूरा सिलसिला बिल्कुल भी लोकतांत्रिक नहीं है और इससे देश में एक बहुत खतरनाक मिसाल कायम होने जा रही है कि लोग जान देने की धमकी के साथ क्या कुछ करवा सकते हैं। एक वक्त था कि लोग नाईफ (चाकू) की नोंक पर कुछ करवा लेते थे और आज अन्ना का आंदोलन यह साबित कर रहा है कि लोग लाईफ (जिंदगी) की नोंक पर इस सरकार को घुटनों पर ला चुकी है। यूपीए सरकार अपने कुकर्मों के बोझ से इस कदर लदी हुई है कि उसे घुटनों पर लाना एक आसान काम साबित हुआ। आज देश की जनता संसद, न्यायपालिका, सरकार और प्रस्तावित लोकपाल, इन सबमें कोई फर्क किए बिना एक रामबाण दवा की तरह जनलोकपाल की बात सीधे-सीधे मान ले रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल को एक तानाशाह की तरह की ताकत दे देने में भी जनता को कोई हर्ज नहीं लग रहा है। आज देश में संवैधानिक संस्थाओं के बीच के मौजूदा संतुलन के नफे और नुकसान को भी जनता समझना नहीं चाह रही है। आज भारत के तमाम अन्ना समर्थक मौजूदा लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाओं के प्रति घोर अनास्था और अन्ना हजारे के प्रति घोर आस्था के बीच पूरी तरह तर्कहीन तरीके से जुटे हुए हैं। न इस आंदोलन को लेकर न्यायसंगत तर्क हैं और न ही भारत की एक विस्तृत लोकतांत्रिक-संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने के कोई न्यायसंगत तर्क हैं। आज पूरी तरह से कालिख पुती हुई व्यवस्था की प्रतिमा को चबूतरे से उखाड़कर फेंक देने पर आमादा है। दरअसल जब लोकतंत्र पूरी तरह नाकामयाब और भ्रष्ट दिखने लगता है तो फिर किसे रोका जा सकता है कि वह गांधीवादी कही जा रही तानाशाही पर भरोसा न करें। नतीजा यह है कि आज सरकार तमाम किस्म की समझ को परे रखकर एक ऐसे संकटनिवारण में लग गई है जिसमें कि आमतौर पर कोई दमकल लगती है या फिर किसी अस्पताल में आईसीयू जैसी जगह लगे दिखती है। यह नौबत किसी भी इज्जतदार सरकार के लिए बहुत शर्मनाक हो सकती है कि महीनों से उसके जो मंत्री अन्ना हजारे से बात कर रहे थे आज उनमें से कोई भी इस बातचीत में मुंह भी दिखाने के लायक नहीं समझा जा रहा है। कांगे्रस का जो बड़बोड़ा प्रवक्ता तकरीबन पूरे वक्त पार्टी की तरफ से हिन्दी और अंगे्रजी दोनों में टीवी पर छाया रहता था, वह भी अन्ना हजारे का नाम लेकर गाली-गलौच करने के बाद अब पार्टी की तरफ से शायद फिलहाल गुमनामी पर भेज दिया गया है। ऐसे में सरकार नए चेहरे अब अन्ना के पुराने चेहरों से जूझ रहे हैं, प्रधानमंत्री बेबस और गुमसुम से बैठे हुए हैं और यूपीए-कांगे्रस का घर चलाने वाली अस्पताल के बिस्तर पर अमरीका में है।
आज का पूरा सिलसिला लोकतंत्र के लिए एक गहरे सबक का मौका है कि जब लोकतंत्र के पाए जनता का भरोसा खो बैठते हैं तो फिर वह लोकतंत्र के नाम पर किसी भी किस्म के तंत्र को सिर-आंखों पर बिठा लेती है। हम आज दिल्ली में चल रही सौदेबाजी या समझौते की बारीकियों पर नहीं जा रहे लेकिन इस बात को लेकर हम फिक्रमंद हैं कि लाईफ-पाइंट पर मांगें पूरी करवाने का अगला सिलसिला कौन लेकर आएगा और किस मुद्दे को लेकर आएगा? और उस दिन यह सरकार या उस दिन की कोई दूसरी सरकार कैसे यह तय करेगी कि वह अगली जिंदगी जो उस दिन दांव पर लगी रहेगी वह अन्ना की जिंदगी से कम कीमती रहेगी या अधिक कीमती रहेगी?
फिलहाल दिल्ली और बाकी देश गली-गली जिस किस्म की शोहरती-शहादत को देख रहे हैं, वह बड़ा दिलचस्प सिलसिला है।

editor sunil on twitter

sunil kumar
* i dont remember when a country, not just a govt, was blackmailed at, not a knife-point, but a life-point ! horrible form of ‘democracy’
* jan lokpal is just one suggestion. suggestions r invited from every citizen. why not listen to more people? why this elitism?
* kumudani doesn’t insist that every flower should grow in night.
* owls don’t insist that everyone should see only in dark.
* i m against corruption, fighting 4 cause, but totally against whims of anna
some people diffuse the difference between anshan and antshant...

* there is an- ‘Anshan travel guide - Wikitravel,’ .... but it is not about ramlila grounds, it is about travel to a place Anshan in china :-)

* check in your own city, if certified corrupt people haven’t already joined anna’s movement?!? it is a pix opportunity for many(if not most)

छोटी सी बात

23 अगस्त
किताबों को पढऩे के बाद औरों को भी पढऩे के लिए देने की आदत डालें। अगर आपकी कोई ऐसी टोली बन सके जो कि एक अनौपचारिक सी लाइब्रेरी चला सके, तो और भी अच्छा।

ऐसे में कैसे साथ जिएंगे-साथ मरेंगे?

23 अगस्त 2011
संपादकीय
भारत और दुनिया के बहुत से दूसरे समाजों में शादीशुदा लोगों के लिए साथ जिएंगे, साथ मरेंगे जैसी बात कही जाती है। भारत में तो एक वक्त हैवानियत की हद तक जाकर हिंदू समाज में पति की चिता पर पत्नी को झोंक दिया जाता था। इसके लिए कहीं-कहीं तो औरत को दिमागी रूप से ऐसा तैयार किया जाता था कि सती होकर वह सीधे स्वर्ग जाएगी, और कहीं-कहीं पर भीड़ उसे ले जाकर सती बना देती थी। कड़े कानून के चलते और कुछ सामाजिक सुधार के चलते यह सिलसिला बंद हुआ है। लेकिन जब हम साथ जिएंगे, साथ मरेंगे की बात को सोचें तो भारत में एक बड़ी दिक्कत लगती है। यहां आमतौर पर लड़का अपने से चार-पांच बरस छोटी लड़की से शादी करता है, जिसके पीछे कई किस्म की सामाजिक और शारीरिक सोच रहती है। सामाजिक सोच यह कि लड़की उम्र में छोटी रहेगी तो दबी रहेगी और पति से जुबान नहीं लड़ाएगी। दूसरी शारीरिक सोच यह है कि पति जब बूढ़ा हो जाएगा तो भी उसके मरने तक पत्नी का शरीर चलता रहे और पूरी जिंदगी आदमी को सेवा और सुख हासिल रहे। एक सोच शायद यह भी रहती होगी कि आदमी के बूढ़े हो जाने तक औरत जवान बनी रहे और उससे अधिक देह सुख हासिल होता रहे। लेकिन इसका नतीजा यह है कि यह देश मर चुके पतियों के बाद बच गईं अकेली महिलाओं वाला हो गया है जिन्हें एक गाली की तरह विधवा कहकर बुलाया जाता है।
अभी दुनिया के औद्योगिक देशों के आंकड़े आए हैं जिनमें यह पाया गया है कि वहां औरत की औसत उम्र आदमी से पांच से दस बरस तक अधिक है। भारत के बारे में ये आंकड़े पहले से चले आ रहे हैं और इस पर हमने कुछ महीने पहले इसी जगह लिखा भी था, लेकिन जब हम भ्रष्टाचार पर हफ्ते में तीन बार लिख लेते हैं तो इस सामाजिक समस्या पर भी कुछ महीनों बाद दूसरी बार लिखने में क्या बुराई है? भारत में औरत की औसत उम्र आदमी की औसत उम्र से तीन बरस दो महीने अधिक है, इसका मतलब यह कि अगर भारतीय लड़का अपने बराबरी की उम्र की लड़की से शादी करे तो भी आंकड़ों के हिसाब से वह उसे आखिरी के तीन बरस से अधिक के लिए अकेला ही छोड़ जाएगा। इंसाफ तो यह कहता है कि भारत में दुल्हन तीन बरस दो महीने अधिक उम्र की होनी चाहिए। लेकिन अगर ऐसा सुझाव किसी लड़के के मां-बाप को दिया जाए तो वे भड़क उठेंगे कि उनके लड़के में कोई खोट है क्या? लेकिन कहने के लिए साथ जिएंगे, साथ मरेंगे वाली बात बड़ी आसानी से जगह-जगह कह दी जाती है।
उम्र का ऐसा फासला भारत की कुछ जातियों में और भी अधिक है। बंगाली समाज में तो आदमी अपने से आठ-दस बरस तक छोटी लड़की से शादी कर लेता है और कोई हैरानी की बात नहीं रह जाती कि वृंदावन के विधवा आश्रमों में बंगाल से आई हुई अकेली रह गई महिलाओं की भीड़, सफेद साडिय़ों में, सिर मुंडाए हुए एक भयानक तस्वीर पेश करती हैं। भारतीय समाज का एक बहुत ही कूू्रर चेहरा भारत में अकेली रह गई महिलाओं को लेकर सामने आता है। हम सैद्धांतिक रूप से अपने लिखने में किसी भी महिला के लिए विधवा शब्द का जिक्र नहीं करते क्योंकि पति के चले जाने के बाद भी पत्नी के पास अपनी एक जिंदगी बची रहती है और किसी मर्द के बारे में चर्चा होते समय हिंदी और हिंदुस्तान में विधुर जैसे शब्द का आमतौर पर इस्तेमाल नहीं होता, कम से कम वैसे अनिवार्य रूप से तो नहीं होता जैसा कि किसी महिला के लिए उसके विधवा-दर्जे का होता है। भारत के पुरुष प्रधान समाज में हजारों बरस से ऐसी कहावतें और मुहावरे चले जा रहे हैं जिनमें किसी अकेली रह गई, पति को खो चुकी महिला के बदचलन होने, या बदचलन हो जाने के खतरे में रहने की बात कही जाती है। दुनिया के ज्ञान कोश देखें तो भारत में पति को खोने वाली महिला के जिक्र में बताया गया है कि उसके चूडिय़ां तोड़ दी जाती हैं, उसके बिंदी हटा दी जाती है, उसके रंगीन कपड़े बदलकर उसे सफेद कपड़े दे दिए जाते हैं। सारा देश कुछ ऐसी जातियों को जानता है जो कि अपनी ऐसी महिलाओं से मांसाहार छीन लेता है, अंडे और प्याज-लहसुन पर रोक लगा देता है, मसालों पर रोक लगा देता है ताकि उनके शरीर में कोई उत्तेजना पैदा न हो। यह तो हिंदू समाज के अधिकांश जगहों पर देखने मिलेगा कि खुशी के किसी मौके पर परिवार की ऐसी, पति खो चुकी महिलाओं को समारोह में सामने नहीं आने दिया जाता। लेकिन पत्नी खो चुके किसी आदमी पर ऐसी किसी रोक की बात भी किसी ने कभी नहीं की है।
इस फर्क को हमारे तमाम पाठक इतना अधिक जानते हैं कि उन्हें अधिक जानकारी देने की जरूरत नहीं है। लेकिन हम इस मुद्दे को चर्चा के लिए यहां रख छोडऩा चाहते हैं कि भारतीय समाज में लड़कों की शादी उनसे अधिक उम्र की लड़की से करना क्यों शुरू न हो? समाज सुधार की बात जो लोग करते हैं वे इस सवाल का जवाब तो दें।

editor sunil on twitter

editor sunil  on twitter
* annaism, annaites, annacracy, annatantra, annafobia, annaholic, annacratic, annarchist, pls RT, add more words
* opposing ways of anna is treated supporting UPA, this is bush doctrine. u r either wth us r wth enemy. ths is not gandhism, ths is bushism.
* PM: ‘’There is no magic wand to solve corruption”..... , there is one, it is called spine...
* when obama said that people unhappy with congress, in india some people started texting it...
* i have developed pathological dislike for some people. so keeping away from news bulletins to remain sane.
* i cant stand tv news any more. it is nauseating. so spent some time on pure entertainment channels.
* anna’s planners, whoever they r, have perfect understanding of people who have no understanding of democracy. like ganesh drinking milk...
* civil society is no threat, but its arrogance 4 monopoly over democracy in a very undemocratic, dictatorial way certainly is.
* some of most corrupt were loudest in protest against corruption in my city, and it left everyone wondering.., such faces on hoardings 2
* i do not really know if it is history of protest or history of media is being written in india... ?

छोटी सी बात

22 अगस्त
हर दिन किसी दूसरी उपयोगी भाषा का एक शब्द जानने की कोशिश करें।  जिस भाषा का आपको काम पड़ता हो, उसकी जानकारी बढ़ाते चलना चाहिए। जानकारों के बीच आपका कमजोर शब्द ज्ञान आपको नीचा दिखाता है।
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सार्वजनिक परिवहन की जरूरत

संपादकीय 22 अगस्त 2011
देश के बड़े शहरों के बाद अब उनसे छोटे शहरों की बारी है जहां बढ़ती हुई निजी गाडिय़ों की पार्किंग एक बुरे सपने की तरह शहरों पर लद गई हैं। दिल्ली में लोग आधे-आधे घंटे तक बाजारों की पार्किंग में जूझते रहते हैं और रईसी की आदत के चलते उनकी गाडिय़ों के एयरकंडीशनर भी चलते हैं और रेंगती हुई गाडिय़ों के इंजन भी रफ्तार के मुकाबले कहीं अधिक ईंधन पीते रहती हैं। यह हाल महानगरों के बाद उन तमाम शहरों का हो चला है जहां पर किसी भी वजह से काले या सफेद पैसे का बोलबाला है। लोग आटोमोबाइल उद्योग के आक्रामक कारोबार के उसी तरह शिकार हो रहे हैं जिस तरह आधी सदी या उससे अधिक पहले अमरीका में सार्वजनिक परिवहन को खत्म करके मोटर कंपनियों ने एक ऐसी नौबत शुरू की थी जो आज तक चल रही है और जिसके तहत हर अमरीकी के लिए अपनी निजी और बड़ी मोटर गाड़ी पर निर्भर रहना एक बेबसी है। भारत अपने अतिसंपन्न एक छोटे तबके के लिए जहाज सरीखी बड़ी गाडिय़ों के बाद अब संपन्न तबके के लिए कई किस्म की गाडिय़ों और मध्यम वर्ग के लिए दो लाख से कम की चौपहिया वाला बड़ा बाजार बन गया है और केंद्र सरकार की तमाम नीतियां इस बाजार को बढ़ावा देने वाली हो गई हैं।
जहां राज्यों को अपने शहरों के हित में भी कारों पर चलने वाले तबके लिए एक ऐसी आरामदेह सार्वजनिक यातायात व्यवस्था करनी चाहिए थी जो कि पैसे वाले लोगों को आरामदेह आवाजाही दे पाती। लेकिन शायद ही कोई ऐसा शहर हो जो निजी गाडिय़ों का धंधा मंदा करने के खतरे के साथ शहरों में बसों या वैसे ही किसी और सार्वजनिक परिवहन का ढांचा खड़ा कर रहा हो। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चौथाई सदी के पहले सफलता से जो सिटी बसें चलती थीं, जिनमें दस-बारह पैसे की टिकट लेकर उस वक्त लोग चलते थे, उनको मामूली नुकसान गिनाकर जो बंद किया गया तो अभी पिछले पांच बरस में ही वे बसें दुबारा शुरू हुईं। शुरू होते ही इन बसों को मुसाफिर पाट चुके हैं और लोग निजी दुपहियों के बजाय इनमें चलने लगे हैं। लेकिन ये बसें ऐसी आलीशान या ऐसी आरामदेह नहीं हैं कि उनमें कारों में चलने वाले लोग भी चलना पसंद करें। लेकिन जब हम दिल्ली जैसे शहर को देखते हैं तो वहां पर कारों वाला एक तबका अपना कुछ-कुछ लोकल सफर मेट्रो से करने लगा है क्योंकि वह साफ-सुथरी, सुविधाजनक और तेज रफ्तार है, किफायती भी है।
शहरों में पार्किंग की दिक्कत, आटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण और टै्रफिक जाम में बर्बाद होने वाला इंसानी वक्त मिलाकर अगर देखें तो लगता है कि पूंजीवादी अमरीका के भीतर भी न्यूयॉर्क जैसा एक महानगर जिस तरह सार्वजनिक परिवहन पर एक सदी से अधिक से निर्भर है, वैसा किसी न किसी जरिए से हिंदुस्तान के शहरों में क्यों नहीं हो सकता? यहां पर हम आटोमोबाइल उद्योग पर सीधे-सीधे किसी साजिश का शक इसलिए नहीं करते कि सरकार में बैठे लोगों की कल्पनाशून्यता पर हमें बाजार की साजिश से अधिक भरोसा है और बसों को होने वाले बहुत मामूली घाटे को गिनाकर सरकारें और शहर उन्हें बंद करने को बेहतर मानते हैं। जहां तक हमें याद पड़ रहा है की शहरीकरण योजना के तहत सार्वजनिक यातायात के लिए बड़ी गुंजाइश रखी गई थी और उसका इस्तेमाल कौन सा प्रदेश या कौन सा शहर करता है इस पर वहां के लोगों को भी नजर रखनी चाहिए। हमारा मानना है कि निजी गाडिय़ों के चलते यह देश उसी तरह धुएं में डूब जाएगा जिस तरह अमरीका गाडिय़ों में डूब गया है। इस देश में तो किसी प्रदूषण पर भी कोई रोक नहीं है और न ही शहरी ढांचा अधिक गाडिय़ों के लायक किसी शहर में बना है। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर गाडिय़ां इतनी बढ़ती चली गई हैं कि उनसे शहर पट गए हैं। यह सिलसिला तुरंत खत्म होना चाहिए लेकिन टैक्स बढ़ाकर या पार्किंग फीस बढ़ाकर या ईंधन के दाम बढ़ाकर ऐसा नहीं हो सकता। भारत जैसे काले धनी देश में लोग हमेशा ही फिजूलखर्ची के लिए पैसा पाते रहेंगे और जब तक एक सुविधाजनक, आरामदेह, तेजरफ्तार और पर्याप्त बड़े नेटवर्क वाले सार्वजनिक परिवहन का इंतजाम शहरों में नहीं होगा, यह देश आटोमोबाइल उद्योग को बढ़ावा देने वाला बने रहेगा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को शहरों को चलाने वाली संस्थाओं का हौसला बढ़ाकर, उन्हें पर्याप्त ग्रांट देकर इस लायक बनाना चाहिए कि वे सार्वजनिक परिवहन के ढांचे को खड़ा कर सकें और उसके घाटे को उठा भी सकें। इसमें जितनी भी देर हो रही है उतना ही इस देश का और धरती का नुकसान हो रहा है।

मंजीरे बजाता मीडिया

22 अगस्त 2011
आजकल
सुनील कुमार
ब्रिटेन में कुछ ही हफ्ते हुए जो दुनिया के सबसे बाजारू मीडिया-मालिक रूपर्ट मर्डोक को अपने मालिकाना हक का ब्रिटेन का सबसे पुराना और दुनिया का सबसे बड़ा इतवारी अखबार बंद कर देना पड़ा क्योंकि उसके पत्रकारों ने कई किस्म के घोर अनैतिक अपराध करके खबरें गढऩे का काम किया था। एक सभ्य समाज ब्रिटेन में अखबारों को अखबारी चर्चा से परे का नहीं माना जाता और वहां एक-दूसरे के बारे में खासा कुछ लिखा जाता है, कोई संपादक या बड़ा पत्रकार जब कोई जगह बदलता है तो वह पूरे मीडिया में एक खबर बनती है। हिन्दुस्तान में ऐसा रिवाज बहुत कम है इसलिए मीडिया द्वारा पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों को बेच खाने के बारे में एक-दूसरे पर कुछ नहीं लिखा जाता।
लेकिन दो दिन पहले ही मैंने ट्विटर पर यह लिखा कि भारत इन दिनों विरोध का इतिहास दर्ज कर रहा है या मीडिया का, समझ नहीं पड़ रहा। कई दशकों के बाद आज यह पहला मौका है जब खबरों के चैनलों पर जाने को ही दिल नहीं कर रहा क्योंकि वहां खबरों से परे का ही लगभग सब कुछ लबालब है। अन्ना हजारे के विरोध प्रदर्शन को लेकर अच्छे खासे समाचार चैनल भी अपनी अक्ल को ताक पर रखकर, पत्रकारिता के बहुत ही बुनियादी सिद्धांतों को दराज में बंद करके मुन्नी और शीला के अंदाज में एक-दूसरे को पीटने में लग गए हैं। यह एक भयानक हालत है और जिस तरह इस पूरे देश को शायद एक साजिश के तहत गणेश प्रतिमाओं पर दूध के लोटों सहित भेज दिया गया था, आज उसी तरह इस देश के टीवी समाचार चैनल लोगों को लोकतंत्र की बुनियादी समझ से परे एक बेदिमाग और बददिमाग, अलोकतांत्रिक जिद की तरफ धकेल रहे हैं। यह फर्क यहां साफ कर देने की बहुत बड़ी जरूरत है कि भारत का लोकतंत्र आज भ्रष्टाचार के एड्स जैसे खतरनाक हाल से गुजर रहा है, और अगर समाचार चैनल लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ झोंकते तो भी वह एक बात होती। भारत के नामी-गिरामी समाचार चैनल लोगों को एक कीर्तन के अंदाज में अन्ना के जगराता की ओर धकेल रहे हैं जहां पर किसी तर्क की, किसी असहमति की, किसी लोकतांत्रिक-संसदीय व्यवस्था की, किसी न्यायपालिका की, किसी वैकल्पिक विचार की कोई जगह नहीं रह गई है। जिस तरह किसी कीर्तन में सिर बहुत से होते हैं लेकिन आस्था के सुर-ताल पर हिलते हुए इन सिरों के भीतर दिमाग कुंद कर दिया जाता है क्योंकि आस्था के दरबार में किसी तर्क का मतलब दुश्मन सरीखा होता है। इसलिए एक वैकल्पिक विचार सामने रखने वाली अरूणा रॉय सरीखी गंभीर सामाजिक कार्यकर्ता को गद्दार बताने वाले बैनर रामलीला मैदान में लग गए हैं क्योंकि उन्होंने अन्नावादी लोकपाल से परे अपना एक विचार सामने रखा है। गाली-गलौज की ऐसी ही जुबान इस लोकतंत्र के बहुत से दूसरे लोकतांत्रिक संस्थाओं में बैठे लोगों के लिए इस्तेमाल हो रही है और पूरी की पूरी संसद को भ्रष्ट कहकर खारिज कर देने की जिद को एक गांधीवाद कहा जा रहा है।
लेकिन मैं यहां पर अन्ना के आंदोलन के बारे में अधिक बात करना नहीं चाहता क्योंकि इस बारे में पिछले दिनों मैंने काफी कुछ लिखा है और अपने-आपको भ्रष्ट लोगों का हिमायती कहने का मौका बहुत से दोस्तों को दिया है। आज की बात मीडिया को लेकर है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और हिन्दी के बड़े अखबारों वाला मीडिया जो कि इन दिनों, या पिछले कुछ बरसों से आपस में आगे बढऩे के एक गलाकाट मुकाबले के तहत पाठक को गुदगुदाने के लिए मुन्नी, शीला और शालू की तरह के ठुमके लगा रहा है। ऐसे मीडिया को टीआरपी के तहत एक-दूसरे से अधिक दर्शक और एबीसी के तहत एक-दूसरे से अधिक पाठक पाने की हड़बड़ी है और दुनिया में यह साबित हो चुका है कि धर्म, आध्यात्म या किसी दूसरे किस्म की आस्था से अधिक भीड़ किसी दूसरे तरीके से नहीं जुट सकती। यह आस्था किसी तानाशाही के लिए भी हो सकती है या किसी जाति, प्रांतीयता, राष्ट्रीयता के लिए भी हो सकती है। इनमें अगर एक फर्जी आत्मगौरव और एक राष्ट्रीयता, किसी दूसरे से एक नफरत का तड़का और लग जाए तो यह आस्था आसमान तक पहुंच जाती है।
1992 में आस्था का ऐसा ही सैलाब और ऐसा ही ज्वारभाटा अयोध्या में राममंदिर को बनाने के लिए और बाबरी मजिस्द को गिराने के लिए देखा गया था और उस वक्त के मीडिया का धर्मान्ध कीर्तन मुझे अब तक याद है। देश के सबसे बड़े अखबार होने का दावा करने वाले अखबार की पहले पन्ने की सुर्खी थी-अयोध्या में हजारों कारसेवक मारे गए, सरयू नदी रक्त से लाल हुई।
आज उसी किस्म की धर्मान्धता, कट्टरता और नफरत इस देश में लोकतंत्र के मौजूदा ढांचे के खिलाफ फैलाई जा रही है। इसमें खासकर टीवी चैनलों ने अपने संवाददाताओं और स्टूडियो को संभालने वाले लोगों के हाथों से माइक्रोफोन लेकर उन्हें मंजीरे थमा दिए हैं। किसी समाचार की बुनियादी जरूरत को खत्म कर दिया गया है। तथ्यों को तर्कों के पैमानों पर नाप लेने के बजाय हर किस्म के विशेषणों का इस्तेमाल करके एक तस्वीर पेश की जा रही है। इसका मकसद किसी दूसरे देश के साथ युद्ध के दौरान अपने देश के लोगों को मोर्चे के लिए मदद करने को तैयार करना होता तो भी समझ आता। आज अन्नावादी लोगों के प्रोपेगंडा को हवा देने के लिए टीवी चैनलों और कुछ बड़े अखबारों ने बड़े-बड़े पंखे लगा रखे हैं और लंबे संसदीय-लोकतंत्र के इतिहास वाले इस देश में यह स्थापित करने की कोशिश हो रही है कि लोकतंत्र एक पूरी तरह अवांछित, और एक घटिया जुबान में कहें तो, नाजायज बच्चा हो गया है जिसे उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है और अन्नाटोली के लोग एक नया सबेरा लेकर आए हैं, सिर्फ वे ही लोग जनता के हक के मसीहा हैं और सिर्फ उन्हें जनता के हक की लड़ाई लडऩे की अधिकृत डीलरशिप मिली हुई है। इस बात को स्थापित करने में जिस तरह से गलाकाट मुकाबले में लगा हुआ मीडिया का हिस्सा जुटा हुआ है उससे यह लगता है कि वोटों के गलाकाट मुकाबले में लगे नेता चुनाव के दौरान जितने किस्म की अनैतिक हरकतें करते हैं कि एक बार किसी तरह चुनाव जीत जाएं, उसी तरह की हरकत आज मीडिया कर रहा है कि किसी तरह मुकाबले में दूसरे को पछाड़ दिया जाए।
जिस लोकतंत्र में संविधान के तहत एक साधारण नागरिक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साधारण अधिकार का ही हक भारत के मीडिया को हासिल है, पहले तो वह अपने-आपको इस लोकतंत्र का चौथा पाया कहने लगा, और अब एकाएक अन्ना लहर में अपने लिए मोती ढूंढते हुए वह लोकतंत्र के बाकी तीनों पायों को हिलाने में जुट गया है। टीवी चैनलों के संवाददाता सड़क किनारे खड़े हुए लोकतंत्र की नई परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, अपने मिनट दो मिनट के खबर-खुलासे के नाम पर वे वहां संपादकीय लिख रहे हैं, और अपने दर्शक को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि किस तरह आज इस देश के लोकतंत्र को पूरी तरह उखाड़कर फेंक देने की जरूरत है और संसदीय तंत्र की जगह सड़क तंत्र आज किस तरह बेहतर होगा।
पूरी जिंदगी अखबारों में गुजारने की वजह से मेरे मन में अखबारों के एक बेहतर मीडिया होने का जो पूर्वाग्रह बना हुआ है वह भी बड़े-बड़े अखबारों के कीर्तन देखकर अब टूट चुका है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पत्रकारिता पर कभी अधिक आस्था रही नहीं और उसकी तस्वीरों और आवाज वाली पहली सूचना से अधिक कोई कीमत आमतौर पर लगी नहीं। लेकिन लोकतंत्र पर से आस्था को खत्म करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह कुदाली लेकर, सब्बल और घन लेकर जुट गया है, उसे देखकर अब उन लोगों को भी शर्म आ रही होगी जो 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मजिस्द के ढांचे पर चढ़कर उसे गिरा रहे थे।
अगर यह लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ होती तो उस लड़ाई की गुंजाइश लोकतंत्र के भीतर है। अन्ना की सुनामी को घर-घर पहुंचाते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और मेरी नजर में आने वाले कुछ बड़े अखबारों ने इस बात को पूरी तरह भुलाने के लिए जनता की आंखों और कानों में आज के अनशन को थोप दिया है कि पिछले साल भर में भ्रष्टाचार के जितने भी मामले सामने आए और जिन पर कार्रवाई हुई, वे तमाम मामले अदालत के रास्ते आए हैं और यूपीए सरकार द्वारा अपने पिछले कार्यकाल में बनाए गए सूचना के अधिकार के तहत पाई गई जानकारी के तहत आए हैं। ये तमाम मामले इसी भारतीय लोकतंत्र की न्यायपालिका की पहल या दखल से उजागर हुए हैं और इनके पीछे सुब्रमण्यम स्वामी जैसे कुछ ऐसे सोनिया-नफरती लोग रहे हैं जो कि आज अन्ना हजारे के इस आंदोलन से पूरी तरह असहमति रख रहे हैं। हम यहां याद दिलाना चाहेंगे कि देश का सबसे बड़ा दिख रहा 2जी घोटाला जिस सुब्रमण्यम स्वामी के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद उजागर हुआ। उन्होंने चार दिन पहले ट्विटर पर लिखा-अन्ना एक अच्छे इंसान हैं और उनकी सोच भी साफ है लेकिन वे नक्सलियों और पश्चिमी सोच वालों पर निर्भर हैं। उन्हें सही वक्त पर इन लोगों से आजाद करना होगा। उन्होंने यह भी लिखा कि भ्रष्टाचार से छुटकारा पाने के लिए तीन पहलुओं से इलाज करना होगा। पहला, पर्याप्त असरदार कानून, दूसरा, उन पर अमल और तीसरा, लंबे समय तक ऐसा चलने के लिए नीति-सिद्धांत की व्यवस्था। उन्होंने आगे लिखा कि अन्ना पूरी तरह से केवल पहले पहलू पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जबकि मैं दूसरे दो पहलुओं पर काम कर रहा हूं। हम दोनों के रास्तों में यह एक फर्क है।
सुब्रमण्यम स्वामी के निजी विचारों को मैं बहुत गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि वे भारत के मुसलमानों के खिलाफ, नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ बहुत ही जहर भरे हुए हैं। लेकिन ऐसे जहर के साथ भी अगर कोई हिंदुस्तानी देश की अदालत तक पहुंचकर किसी भ्रष्टाचार को उजागर करता है तो उस कोशिश को मैं देश के भले की मानता हूं और देश की संसदीय व्यवस्था का इस्तेमाल करके अपराधियों को सजा दिलाने का एक जिम्मेदारी का काम मानता हूं। मैं सुब्रमण्यम स्वामी को अदालत, संसद, इन सबको किनारे छोड़कर अपनी मनमानी से आगे बढऩे वाला नहीं पाता। यहां पर उनका खतरा देश को उन ताकतों के मुकाबले कम दिखता है जो कि पूरी संसदीय व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में लगे हैं और जिन्हें सिर्फ अपने ही तर्क समूचा लोकतंत्र लगते हैं। मैं सुब्रमण्यम स्वामी की इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूं कि अन्ना के साथ के लोग नक्सलियों के हिमायती हैं। लेकिन फिर भी इतनी बात जरूर लगती है कि ये दो तबके देश के लोकतंत्र के लिए हिकारत पैदा करने, उसे गैरजरूरी साबित करने और उसे कम या अधिक दूर तक उखाड़ फेंकने के लिए पूरी ताकत के साथ काम कर रहे हैं। मैं अपने मन के भीतर सोचता हूं तो यह भी लगता है कि भारत से लोकतंत्र को मटियामेट करने के लिए एक तबका बंदूकों के साथ खुलकर उसका विरोध कर रहा है और दूसरा तबका लोकतंत्र से अपने जूतों के तल्ले बनाकर उससे लोकतंत्र को कुचल रहा है। एक ऐसी तस्वीर दिमाग में बनती है कि यह एक ऐसी रिले रेस है जिसमें एक धावक जाकर अपना रूल दूसरे को थमाता है, दूसरा जाकर तीसरे को, तीसरा जाकर चौथे को जो कि उसे आखिरी तक ले जाता है। अब पहला धावक कहने को तो यह कह सकता है कि उसने तो आखिरी तक कोई चीज पहुंचाई ही नहीं, लेकिन हकीकत यह है कि लोकतंत्र पर से, भारत की मौजूदा संसदीय व्यवस्था पर से लोगों की आस्था को पूरी तरह खत्म करने का काम अलग-अलग तबके अलग-अलग दूरी तक करते दिख रहे हैं, और मैं संदेह का लाभ देते हुए इन्हें एक टीम नहीं मान रहा, सुब्रमण्यम स्वामी मान रहे हैं।
लेकिन मैं फिर पटरी से उतर रहा हूं और मीडिया की बात करते-करते मैं फिर अन्ना पर चले आ रहा हूं। मुझे बात आज अपने तबके पर करनी चाहिए। हिंदुस्तान में जब तक अखबारनवीसों की तनख्वाह कम रही और श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के बैनर तले पत्रकार लड़ते रहे, उस वक्त तक भी अखबारों के, पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों पर थोड़ी बहुत बातचीत होती थी, वह सिलसिला पत्रकारों की बेहतर तनख्वाह के साथ-साथ खत्म हो गया। आज बाजार और मीडिया मालिक मिलकर मीडिया के रूख को तय करते हैं। आज बाजार का रूख फुटपाथ पर रामबाण दवा बेचने वाले एक ऐसे फेरीवाले के साथ है जो कि एक दवा को हर मर्ज को दुरूस्त करने वाला कह रहा है और इसी एक दवा को हिंदुस्तान की अकेली दवा भी कह रहा है। इसलिए अपने बाजारू फायदों में डूबा हुआ हिंदुस्तान का अधिकांश बड़ा मीडिया अन्ना हजारे का साथ देने के नाम पर पत्रकारिता की बुनियादी बातों को पूरी तरह खत्म कर चुका है और भारत के लोकतंत्र को, यहां की विविधता को, यहां की असहमति को, संवैधानिक संस्थाओं को सबको खारिज करने के कीर्तन में मंजीरे बजा रहा है।

छोटी सी बात

21 अगस्त
इन दिनों चार्जर और बिजली के दूसरे उपकरण के प्लग दो पिनों के भी होते हैं,  और तीन के भी। उनका एक साधारण सा कन्वर्टर 5-10 रूपयों में आता है। इसे सफर में लेकर ही चलना चाहिए। इसी तरह बहुत से तीन पिन प्लग सॉकेट ऐसे होते हैं कि उनमें दो-तीन प्लग तब तक नहीं लगते जब तक सॉकेट में ऊपर कोई पिन न जाए। इसके लिए लकड़ी की एक पेंसिल भी सफर के सामान में रखे। अगर विदेश जाना हो तो वहां के लिए अलग एडॉप्टडर आते हैं। लेकिन अगर आप बड़े समूह के साथ जाकर किसी हॉल या कमरे में एक साथ ठहरने वाले हैं तो एक्सटर्नल कार्ड भी लेकर चलें, क्योंकि सबके फोन कैमरों के लिए प्लग पाइंट नहीं मिलते।

रेड्डी और येद्दी अपने हाईकमानों को वक्त रहते दिखते क्यों नहीं?

21 अगस्त 11
आंध्र में कांगे्रस से बगावत करके अलग राजनीति करने वाले जगन मोहन रेड्डी के साम्राज्य का अदालत के आदेश के बाद सीबीआई के छापे पड़े जबकि बगावत के बाद भी कांगे्रस अगुवाई के तहत काम करने वाली सीबीआई ऐसा कर सकती थी। लेकिन राजनीतिक दबाव में काम करने के तमाम आरोपों के बीच भी सीबीआई ने ऐसा किया नहीं। बाद में अदालत ने नाराजगी के साथ सीबीआई को जांच के लिए कहा और उसके तहत ही अभी के ये छापे पड़े। लेकिन इन छापों में जो बात सामने आई उनमें एक यह भी है कि अपने कांगे्रसी मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी के वक्त का जो महलनुमा मकान जगन रेड्डी को विरासत में मिला है वह साढ़े तीन सौ करोड़ कीमत का पाया गया है।
वाईएसआर रेड्डी एक हेलीकॉप्टर हादसे में मारे जाने के ठीक पहले तक कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के वफादार, करीबी और भरोसेमंद लोगों में से एक थे। उनकी मौत के बाद अब यह दिखाई पड़ रहा है कि किस तरह वे हजारों करोड़ की दौलत छोड़कर गए हैं। आज कांगे्रस के लिए यह एक फिक्र की बात हो सकती है कि इतनी बड़ी संपत्ति वाला कोई भूतपूर्व कांगे्रसी और वर्तमान प्रतिद्वंद्वी अगले चुनावों में कांगे्रस को टक्कर देने के लिए न सिर्फ आंध्र में बल्कि कुछ दूसरे प्रदेशों में भी तैयारी शुरू कर चुका है। आखिर इतनी दौलत कोई बिना किसी सार्वजनिक चर्चा के तो जुटा नहीं सकता। क्या कांगे्रस हाईकमान को अपने अलग-अलग मुख्यमंत्रियों और जैसा कि हाल में साबित हुआ है यूपीए के मंत्रियों और कांगे्रस के कलमाडिय़ों की काली कमाई  उस वक्त नहीं दिखती जिस वक्त वे लूटपाट में लगे रहते हैं? यह आरोप रेड्डी पर तब से लगते रहते हैं जब उनके मुख्यमंत्री रहते हुए उनका बेटा अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर रहा था। कमोबेेश इसी किस्म की अनदेखी कर्नाटक में भाजपा हाईकमान अपने मुख्यमंत्री येद्दी की कर रही थी। इस तरह कांगे्रस के रेड्डी और भाजपा के येद्दी, ये इतनी ताकत जुटा चुके थे कि आंध्र में कांगे्रसी मुख्यमंत्री का बेटा सीधे सोनिया को ललकार रहा है और आंध्र में भाजपा का मुख्यमंत्री अपने भ्रष्टाचार के पकड़ाए जाने के बाद भी अगला मुख्यमंत्री तय कर रहा है। यह कुछ उसी किस्म का हुआ कि चोर तय करे कि अगला थानेदार कौन होगा?
हमारा यह भी मानना है कि राजनीति और सत्ता की काली कमाई का एक बहुत थोड़ा हिस्सा ही कोई भी जांच एजेंसी पकड़ पाती है और अधिकतर दौलत बेनामी और गुमनामी ही बनी रह जाती है। ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाओं की जो लहर आज देश में चल रही है उसके तहत क्या सिर्फ एक लोकपाल के मुद्दे को लेकर या सिर्फ यूपीए सरकार को लेकर ही लड़ाई लड़ी जाए या फिर जगह-जगह लोग अपने स्तर पर भी यह मुद्दा उठाएं कि सत्ता के वटवृक्ष के नीचे बैठकर सत्ता के कारोबारी इतना धन कैसे कमा रहे हैं? लोगों को अपने-अपने शहर में यह काम करना होगा और तभी जाकर एक सार्वजनिक दबाव सरकारों पर या राजनीतिक दलों पर पड़ेगा। आज जरा देर के लिए जिस तरह से लोग अन्ना हजारे के अभियान का साथ देते हुए सड़कों पर निकले हैं, उसे देखते हुए भी कुछ लोग हंस रहे हैं कि हर किस्म के टैक्स चोर, रिश्वत देने वाले और भ्रष्ट लोग झंडे-बैनर लेकर चल रहे हैं। अगर यही लोग तय कर लें कि वे रिश्वत नहीं देंगे तो भी भ्रष्टाचार कुछ कम हो जाएगा। ऐसे तमाम जुलूस दूर दिल्ली के भ्रष्टाचार पर हमले को आसान पाते हैं। जब अपने आसपास के भ्रष्टाचार पर हमले की बात आती है तो सारे झंडे-डंडे और बैनर दुबक जाते हैं। अगर समय रहते हैदराबाद और बेंगलुरू में इन मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार का विरोध होता, इनकी पार्टियों के दिल्ली में बैठे नेता इनके भ्रष्टाचार पर लगाम लगाते तो आज अपनी-अपनी पार्टी के भीतर ये एक-एक राक्षस का सामना नहीं करते होते और ये दोनों राज्य लुटने से बच गए होते।
हम अभी लोकपाल या ऐसे किसी विधेयक की बात नहीं कर रहे, हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि देश को एक ऐसी खुफिया एजेंसी की जरूरत है जो कि आर्थिक अपराध और सरकारी भ्रष्टाचार पर नजर रख सके और समय रहते लूट, डकैती को रोका जा सके। जब पूरा खेत ऐसे नेता चर जाते हैं तो फिर उस खेत में लगे हुए दानों को गिनने से क्या हासिल होता है? भ्रष्टाचार के पहले ही उसे रोकने का इंतजाम होना चाहिए और पिछले दो-चार दिनों में देश के कुछ समझदार लोगों ने रामलीला मैदान के नारों से परे यह कहा है कि देश का सरकारी ढांचा ऐसा बदलना होगा कि उसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश न निकले। पूरा का पूरा लोकपाल भ्रष्टाचार के बाद के हिसाब से है जो कि जांच और कार्रवाई का काम करेगा। इस देश को एक निगरानी एजेंसी की जरूरत है जो कि साढ़े तीन सौ करोड़ के महल बनने के पहले, जमीन और नींव के स्तर पर ही देख ले कि यह पैसा आ कहां से रहा है। भ्रष्टाचार और काली कमाई के इस्तेमाल के मामले में यह देश बहुत ही बेशर्म हो चुका है और इस हाल को बदलने की जरूरत है।

आरक्षण की नहीं, रोक की राजनीति


सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म आरक्षण पर उत्तर प्रदेश सरकार की रोक को ख़त्म करके अपने आदेश में जो कहा है, उससे देश के बहुत से तबकों को देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख इस मुद्दे पर समझ आ जाना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी था कि आये दिन इस देश में कहीं न कहीं किसी फिल्म, किसी नाटक, किसी किताब पर रोक की बात उठती ही रहती है। बात उठती इसलिए है, कि जैसे ही किसी को लगता है कि एक मुद्दे को उठाकर, जाति, धर्म, प्रान्त या पेशे के आधार पर एक तबके को भड़काया जा सकता है, तो लोग तुरत काम-धंधे से लग जाते हैं। मोटे तौर पर यह झगड़ा वोटरों को यह बताने के लिए शुरू किया जाता है कि झंडा-डंडा उठाने वाले लोग उनके कितने बड़े हिमायती हैं। लेकिन फिर दूसरे नेताओं को यह लगने लगता है कि  वे पिछड़ जा रहे हैं, सो मतदाताओं के तलुए सहलाने को बाकी लोग भी जुट जाते हैं। छोटी-छोटी अदालतों में जाकर रोक की मांग करने वाले लोगों के कहे जब अदालतें नामी-गिरामी सितारों को नोटिसें जारी करने लगती हैं, और खुद भी ख़बरों में आने लगती हैं, तो इससे उन लोगों का हौसला बहुत बढ़ता है जो ख़बरों की अखबारी बोट पर सवार होकर ही अपना अस्तित्व कायम रख पाते हैं। हिंदुस्तान को रोक लगाने में मज़ा बहुत आता है। रुश्दी की किताबों पर जब दुनिया का कोई इस्लामी देश भी रोक नहीं लगाता तब देश में किताब पहुंचे बिना भी उस पर भारत सरकार रोक लगा देती है। छत्तीसगढ़ में तो जोगी सरकार ने अपने ही एक मंत्री के पिता की लिखी एक किताब पर रोक लगते हुए उसे जेल में ही डाल दिया था। इसके पहले भी बहुत से प्रदेश रोक लगाने के शौकीन रहते आये हैं। कभी धार्मिक भावनाएं तो कभी सामाजिक भावनाएं आहत हो जाने का तर्क देते हुए सरकारें रोक लगाते आयी हैं। यह सिलसिला बंद होना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट का यह ताज़ा फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कायम रखने में काम आएगा।
बहुत से लोग शोहरत पाने के लिए रोक खुद भी लगवाते हैं क्योंकि उन्हें मालूम रहता है  कि इससे ख़बरों में आना आसान हो जाता है और बाज़ार बढ़ जाता है, दर्शक और पाठक बढ़ जाते हैं। लेकिन जब फिल्मों के लिए देश में एक सेंसर बोर्ड बना हुआ है, तो फिर हर छोटी बड़ी अदालत, हर सरकार, हर आयोग अगर फिल्मों को रोकते चलेगा, तो फिर हर राज्य को अपना सेंसर बोर्ड दे देना चाहिए। एक थानेदार भी किसी किताब के खिलाफ मामला दर्ज करके किसी लेखक को गिरफ्तार कर सकता है। मकबूल फि़दा हुसैन को देश की सौ अदालतें इतने नोटिस भेज सकती हैं  कि उन्हें देश ही छोड़कर जाना पड़े। आज अदालत को यह फैसला देते हुए शायद हुसैन का जिक्र करने की बात न सूझी हो, क्योंकि वह फिल्म पर रोक से कुछ अलग किस्म का मामला था, लेकिन हमें वह बाद यहाँ जरूरी लगती है। आज कहीं महारास्ट्र के ठाकरों के गुंडे जाकर किसी शोध संसथान को तहस-नहस कर सकते हैं कि वहां से शोध करके किसी ने शिवाजी के बारे में कोई कड़वी बात अपनी किताब में लिखी है। यह तमाम गुंडागर्दी बंद होनी चाहिए चाहे उसे सरकार करे, चाहे कोई और करे।
रोक की संस्कृति ख़त्म होनी चाहिए। जिन लोगों का बर्दाश्त कम है, उनको अदालत जाकर अपने दिल-दिमाग के जख्म दिखने चाहिए। और ऐसे मामलों में भी छोटी अदालतों को रोक लगाने का हक नहीं होना चाहिए। इस कानून के तहत अपील और आदेश का कम हाई कोर्ट का ही होना चाहिए। आज इस देश में तो निचली अदालतों का इस्तेमान करके लोग असली या नकली रोक लगवाने के कानून का बेजा इस्तेमाल कर ही रहे हैं, और इससे इतिहास को लेकर अब कड़वे सच कोई लिखने का हौसला मुश्किल से कर पाता है। इतिहास की तो बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें कि कोई न कोई तबका ख़ारिज कर देना चाहता है। कल तक जो लोग भगत सिंह की सोच के हत्यारे थे, वे भी आज उनकी तस्वीर अपने मंच पर सजाकर कल के लहू के हाथों पर दस्ताने पहने रहना चाहते हैं। ऐसे देश में सिर्फ कोर्ट कोई कड़वी बात कर सकता है क्योंकि उसे चुनाव नहीं लडऩा है। सता और सत्ता की राजनीति में लगे बहुत से लोग तो खुलकर यह साजिश करते दीखते हैं, कि हम रोक लगायेंगे, और तुम अदालत जाकर ख़ारिज करवा लेना। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद रोकों का सिलसिला कुछ धीमा पडऩा चाहिए।

छोटी सी बात


20 अगस्त
किसी होटल या दूसरी जगह के वाई-फाई इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए याद रखें कि कोई आपके कम्प्यूटर तक घुसपैठ भी कर सकता है या आपके पासवर्ड जान सकता है। इसलिए मुफ्त की सहूलियत के साथ सावधानी जरूरी है, ठीक वैसी ही जैसी कि सार्वजनिक शौचालय में किसी बीमारी से बचने की जरूरत होती है। ऐसी ही अतिरिक्त सावधानी किसी साइबर कैफे में भी बरतें।

छोटी सी बात


19 अगस्त
बहाव के साथ कचरा सबसे जल्दी बह जाता है। मजबूत स्तंभ, मजबूत पेड़, सबसे आखिर में। सच की ताकत होती है कि वह बहाव के सामने खड़े रह पाता है।

अन्ना के कई पहलुओं पर चर्चा

19 अगस्त
आज देश का सबसे बड़ा तबका अगर किसी एक बात पर चर्चा कर रहा है तो वह अन्ना हजारे हैं। इसलिए पिछले दिनों अपनी लिखी बातें में से कुछ बातों को यहां पर दुबारा आ जाने का खतरा उठाते हुए भी हम अन्ना से जुड़े पहलुओं पर आज फिर लिख रहे हैं। अभी टीवी पर वे जेल से निकलकर रामलीला मैदान के रास्ते पर हैं जहां पर वे एक पखवाड़े के अनशन की घोषणा कर चुके हैं। पिछले कुछ दिनों से लेकर अगले इस पखवाड़े तक को देखने के लिए लोगों को एक नजरिया विकसित करना होगा तभी जाकर भारत में ऐतिहासिक दिख रहे इस जनसमर्थन को समझा जा सकेगा।
अन्ना ने दो मुद्दे उठाए हैं। सरकार के बनाए हुए लोकपाल विधेयक के बहुत पहले से वे एक जनलोकपाल विधेयक की सोच सामने रखकर उसे लेकर सरकार पर दबाव बनाए हुए थे और देश का लोकपाल कैसा हो इस पर वे अपनी सोच को लेकर बहुत आक्रामक गांधीवाद के साथ आंदोलन कर ही रहे थे। उनका दूसरा मुद्दा भ्रष्टाचार के खिलाफ है जो लोकपाल के पहले से जारी है और बाद में भी जारी रहेगा। वे महाराष्ट्र में लंबे समय से अलग-अलग कुछ मंत्रियों के खिलाफ आंदोलन चलाकर, अपनी ही जुबान में, उनके विकेट ले चुके थे और उनका अपना चाल-चलन सामान्य संदेह से परे का साफ-सुथरा चले आ रहा है। काफी हद तक वे गांधीवादी बने रहते हैं लेकिन अभी-अभी उन्होंने खुद ही यह भी कहा है कि उनकी बात न सुने जाने पर वे शिवाजी की जुबान भी बोल सकते हैं। अन्ना का आज का दूसरा पहलू यह है कि केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार चला रही कांगे्रस पार्टी ने पार्टी के स्तर पर अन्ना पर बड़ी हल्की जुबान से हमले किए, और दोनों सरकारों ने मिलकर उन्हें अनशन करने से रोकने के लिए इतनी जी-जान लगा दी कि सरकारें और कांगे्रस दोनों ही अपनी विश्वसनीयता खो बैठीं और लोगों को आपातकाल की याद आने लगी। अन्ना का तीसरा पहलू यह है कि उनके मुद्दों से परे, उनके साथियों से परे, वामपंथियों ने भी संसद के भीतर और बाहर खुलकर इस सरकारी ज्यादती का विरोध किया जिससे अन्ना के अनशन को रोककर उन्हें गिरफ्तार किया गया। यूं तो किसी आंदोलन के पहले लोगों को इसी किस्म के कानून के तहत गिरफ्तार करने का भारत में हमेशा का इतिहास रहा है, लेकिन आज देश की जनता जिस हद तक भ्रष्टाचार के खिलाफ उबली हुई है, उसके चलते अन्ना पर लगी रोक और उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए।
आज के हालात का एक पहलू यह भी है कि देश के मीडिया के पास चूंकि पिछले हफ्ते-दस दिन से भ्रष्टाचार का कोई नया मामला नहीं था इसलिए खबरों के घंटे भरने के लिए टीवी के पास यह एक मददगार मुद्दा आ गया और इसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने लपक लिया। चूंकि इस मामले में एक निरंतरता है इसलिए यह टीवी समाचार चैनलों की जरूरत को पूरा भी करता है। नतीजा यह हुआ कि केंद्र सरकार की गटर की गहराई तक पहुंच गई विश्वसनीयता के दौर में अन्ना हजारे का कद कुतुब मीनार सा दिखने लगा और मीडिया अपनी तर्कशक्ति छोड़कर कीर्तन के मंजीरे उठा चुका है।  टीवी के चैनल सड़कों पर बज रहे देशभक्ति के गानों से परे भी इस तरह देशभक्ति का संगीत बजा रहे हैं मानो वे देश से अंगे्रजों को भगाने जा रहे हैं। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि इस देश के किसी भी आंदोलन में बजाने के लिए ऐसा संगीत अब तैयार खड़ा मिलता है। इसे कुछ लोग एक ऐतिहासिक जनक्रांति मान रहे हैं और कुछ लोग इसे लेकर आपातकाल के वक्त सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा दिए गए तर्कों को भी गिना रहे हैं कि कैसे आज फिर कांगे्रस और उसकी सरकारें वैसे ही तर्क दे रही हैं।
हम इस चर्चा को इसलिए कर रहे हैं कि लोगों को यहां दो-तीन मुद्दों को अलग-अलग करके देखने की जरूरत है। एक तो देश के भीतर का एक व्यापक भ्रष्टाचार जिसमें सरगना केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार है और इस प्रधानमंत्री से हम दर्जन भर बार इस्तीफा मांग चुके हैं और इस पर मुकदमा चलाने की मांग कर चुके हैं। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ यह आंदोलन कैसा चले, यह बाबा रामदेव के झंडे तले चले, या अन्ना हजारे के बैनर तले चले, या इन दोनों से परे किसी ऐसी शक्ल में चले जिसमें कि वामपंथी दल भी शामिल हो सकें जो कि इस देश में सबसे ईमानदार सरकारें चलाने का इतिहास गढ़ चुके हैं। आज जहां तक भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का सवाल है तो उसके कई तरीके हो सकते हैं और कुछ बहुत ईमानदार तबके अन्ना-बाबा के तौर-तरीकों से असहमति रखने वाले भी हो सकते हैं। हम इसे हिंसक और तानाशाही का नजरिया मानते हैं कि जो लोग भी अन्ना-बाबा से असहमति रखते हैं, उन लोगों को अनिवार्य रूप से भ्रष्टाचार के साथ मान लिया जाए। इस अखबार के संपादक ने इस मुद्दे पर इंटरनेट पर कुछ मिसालें दी हैं जिन्हें नीचे यहीं पर सरल अंगे्रजी में हम दे रहे हैं।
अन्ना के साथ आज जो जनसमर्थन है, उसका लोकपाल बिल से कोई लेना-देना नहीं है। वह एक बहुत ही कानूनी दस्तावेज है और वह अपने किस्म के कई दस्तावेजों में से एक है। हमारा पूरी तरह से यह मानना है कि सार्वजनिक रूप से अपने तर्कों को उठाने के बाद किसी भी आंदोलनकारी को कानून बनाने का काम संसद पर ही छोडऩा होगा क्योंकि लोकतंत्र कितना भी भ्रष्ट हो जाए वह भीड़तंत्र के मुकाबले तब तक अकेला असरदार तंत्र बने रहेगा जब तक कि भीड़ किसी क्रांति के रास्ते लोकतंत्र को ही उखाड़कर न फेंक दे और कोई बेहतर तंत्र लाकर लागू न कर दे। दुनिया के इतिहास को देखते हुए हमें भारत के आज के हालात में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं दिखती और न ही जरूरत ही दिखती। आज का जनसमर्थन हमें केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों के आसमान छूते भ्रष्टाचार और उसे बचाए रखने, उसे जारी रखने की सत्ता की हसरतों के खिलाफ जनता की नफरत से उपजा दिखता है जिसे कि अन्ना हजारे में एक उम्मीद दिखी है। इस उम्मीद का लोकपाल बिल की तकनीकी बारीकियों से कुछ भी लेना-देना नहीं है जिसे कि बहुत ही कम लोग जानते हैं। आज के जनसमर्थन के पीछे दूसरी वजह भ्रष्ट कांगे्रस पार्टी की दुष्ट नीतियां हैं और सत्ता का बेजा इस्तेमाल करके एक आंदोलन को कुचलने की उसकी तानाशाही है। इस दुष्टता और तानाशाही का विरोध करने वाले लोगों को अन्ना हजारे का मामला सामने मिला और वे झंडा-डंडा लेकर खड़े हो गए। इन दो बातों को लेकर आज का यह सैलाब दिख रहा है और यह विश्लेषण इसलिए जरूरी है कि चाहे इस आंदोलन के किसी सार्थक अंत तक पहुंचने की हम बात करें या आगे किसी और आंदोलन की संभावनाओं को सोचें, उन दोनों के लिए यह समझना जरूरी है कि जनसमर्थन किन बातों को लेकर मिल रहा है। आज यह लिखने के बाद भी यह पूरा पखवाड़ा इस मुद्दे पर चर्चा के लिए मौजूद रहेगा इसलिए हम आज के लिखने को किसी औपचारिक नतीजे तक नहीं ले जा रहे, लोगों के सोचने के लिए इसे एक सिरे की तरह छोड़ रहे हैं। बाकी बातें कुछ नीचे अंगे्रजी ट्विटर से और अगले किसी दिन।
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छोटी सी बात

18 अगस्त
यूं तो कई तरह की कसरतें जिंदगी में काम आती हैं, लेकिन एक छोटी सी कसरत है आईने में देखकर मुस्कराने की। इससे भी आपका हौसला बढ़ता है और आप कामयाब होते हैं। रोज सुबह काम शुरू करने के पहले आईने में देखकर मुस्कराएं और अपे आपको यकीन दिलाएं कि आज आप पिछले दिन से बेहतर काम करेंगे, कर सकते हैं।

एक और बातचीत की जरूरत अभी बाकी, और गुंजाइश भी

18 अगस्त 11
दुनिया का रिवाज है कि जब लोग एक-दूसरे का सबसे बुरा बर्ताव देख चुके होते हैं तो उनके बीच संबंध सबसे अच्छे होने की भी एक संभावना रहती है। राजनीति में तो इस संभावना का इस्तेमाल कुछ लोग कर पाते हैं और कुछ लोग नहीं कर पाते हैं। लेकिन चुनावी कटुता से अलग जो संगठन या लोग रहते हैं उनको अपनी कड़वाहट और निजी मतभेद छोड़कर व्यापक जनहित में कुछ करने की कोशिश करनी चाहिए। यह बात हम आज अन्ना हजारे के खेमे और कांगे्रस पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बारे में कह रहे हैं। दोनों ने एक-दूसरे के साथ मतभेद की ऊंचाईयां देख ली हैं और कम से कम जाहिर तौर पर दोनों ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे की बात कर रहे हैं। यूपीए सरकार या कांगे्रस के पास भी अपने मौजूदा भ्रष्टाचार को जारी रखने का विकल्प अब नहीं बचा है क्योंकि जनता एक चतुर घाघ की तरह नजर गड़ाए बैठी है और कोई ताजा भ्रष्टाचार सामने आने पर अदालतें भी मानो खाल खींच लेने के अंदाज में हैं। पिछले दिनों में जगह-जगह जनता का जो रूख सामने आया है, वह भी भ्रष्ट सरकारों के लिए एक चेतावनी की तरह है। बहुत वक्त बाद शहरी और मध्यम वर्गीय लोग किसी मुद्दे पर इस तरह सड़कों पर आए हैं। यह तबका आमतौर पर किसी संघर्ष से परे रहने वाला है और हम आज भी इसके प्रदर्शन को कोई संघर्ष नहीं गिन रहे, लेकिन यह देश आज शहरों से दूर जंगलों में नक्सलियों की अगुवाई में आदिवासियों का एक अलग किस्म का हिस्सेदारी वाला हिंसक संघर्ष देख रहा है, और सरकार से लोगों की भड़ास शहरों में भी किसी दिन हिंसक होने की आशंका हम बार-बार जाहिर करते आए हैं।
अब मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हीं का जेल जाना बचा है और हमें नहीं लगता कि वे ऐसी कोई नौबत आने तक अपनी आंखें और बंद रखेंगे। इसलिए चाहे कांगे्रस पार्टी ने अन्ना हजारे पर बहुत ओछी जुबान में हमले क्यों न किए हों, भले ही सरकार और अन्ना हजारे के बीच सैद्धांतिक मतभेद लोकपाल से परे के भी क्यों न हों इसके बावजूद हमें बातचीत की जगह खत्म नहीं दिखती है। अन्ना हजारे के मिजाज में जितनी भी गांधीगिरी हो वह बातचीत को दुबारा शुरू करने के लिए काफी होनी चाहिए क्योंकि गांधी भी तो पूरे सैद्धांतिक मतभेदों के बावजूद बार-बार अंगे्रजों के साथ बातचीत की मेज पर जाते ही थे। भारत और पाकिस्तान आज दुश्मनी जैसी कड़वाहट के बाद मेज पर बात करते ही हैं। उमा भारती जहाज के पंछी की तरह उड़कर, जहाज को गालियां देकर, लौटकर जहाज पर आती ही हैं। ऐसी बहुत सी मिसालें इस देश में मिलेंगी जब चूर-चूर हो चुका आईना फिर जुड़कर एक हो जाता है और इसीलिए राजनीति के बारे में यह कहा जाता है कि उसमें बड़े अजीब-अजीब हमबिस्तर हो जाते हैं। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव का आंदोलन राजनीति से बहुत परे का भी नहीं है और वह राजनीति पर केंद्रित तो पूरी तरह है। हमारे अपने बहुत गहरे मतभेद बाबा और अन्ना से हैं। मुद्दों को लेकर भी हैं और तौर-तरीकों को लेकर भी हैं। उससे सौ गुना अधिक गहरे मतभेद हमारे यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से हैं और कांगे्रस पार्टी के तौर-तरीकों से भी हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र एक इतनी उदार और लचीली व्यवस्था है कि उसमें अलग-अलग तमाम इरादों के, और ख्यालों के लोगों के एक होने की गुंजाइश हमेशा बची ही रहती हैं। पिछले कुछ महीनों से देश के दोनों बड़ी वामपंथी पार्टियों के एक होने की एक चर्चा तो छिड़ी ही है। दूसरी तरफ सोनिया को विदेशी कहते हुए जिन लोगों ने कांगे्रस पार्टी छोड़ी थी उन राष्ट्रवादी कांगे्रसियों के साथ मिलकर आज कांगे्रस देश और महाराष्ट्र प्रदेश दोनों की सरकारें चला ही रही हैं। इसलिए हम अन्ना-बाबा और सरकार के बीच बातचीत की एक गुंजाइश अभी भी देखते हैं फिर चाहे यह बात देश के कुछ राजनीतिक दलों को चाहे ठीक न लगे, अन्ना-बाबा के कुछ साथियों को चाहे यह खराब लगे। एक ऐसी सुगबुगाहट है कि अन्ना के साथियों में से एक जस्टिस संतोष हेगड़े ऐसी कोई पहल कर सकते हैं, और ऐसी पहल हमारे हिसाब से होनी ही चाहिए। इस देश की कोई सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अड़ी रहकर अब जिंदा नहीं रह सकती और इसलिए हम भ्रष्टाचार के खिलाफ सबके एक साथ बैठकर बात करने को जरूरी समझते हैं।
पाठकों ने देखा होगा कि किस तरह पिछले साल भर से कश्मीर में केंद्र सरकार के नियुक्त किए हुए वार्ताकार कश्मीरी अलगाववादियों सहित तमाम लोगों से बात कर रहे हैं। हम यह भी देखते हैं कि किस तरह नक्सलियों से बात करने के लिए आंध्र सरकार ने एक वक्त वहां के एक रिटायर्ड आईएस अफसर की सेवाओं का उपयोग किया था। हम यह भी देख रहे हैं कि किस तरह पिछले बरस कई बार स्वामी अग्निवेश का नाम नक्सलियों से बातचीत के लिए सामने आया, यह अलग बात है कि कुछ मुठभेड़ हत्याओं के बाद वह सिलसिला थम सा गया। लेकिन हम न नक्सलियों से बातचीत की संभावना खत्म होते देखते और न ही स्वामी अग्निवेश के बीच एक-दूसरे से जिंदगी भर का कोई परहेज देखते। कोई निजी मामला रहता तो बात अलग होती। बात जब सार्वजनिक हित की है तो फिर सरकार को या कोई आंदोलनकारी, इन सबको अपने-अपने व्यक्तित्व के टकराव, मुद्दों पर असहमति, काम के तौर-तरीकों का फर्क छोड़कर एक न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर बातचीत करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। कारखानों में मजदूरों और कारखानेदारों के बीच टकराव जगह-जगह होते चलता है, लेकिन बातचीत के बाद समझौते होते हैं और काम आगे बढ़ता है। आज ऐसी ही बातचीत की जरूरत और जगह दिल्ली में दिखाई देती है। हम अन्ना हजारे और सरकार दोनों से अलग-अलग बातों पर असहमति के बाद भी यह चाहते हैं कि कोई विश्वसनीय मध्यस्थ जो कि दोनों पक्षों को मंजूर हो उसके साथ इनको फिर बैठना चाहिए और जिन-जिन बातों पर सहमति हो सकती है उन पर सहमत होने के बाद बाकी पर असहमत बने रहने को नाकामयाबी नहीं मानना चाहिए। आज भी हम जीत इन दोनों पक्षों में से किसी एक को देने के बजाय देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता में उठे हुए आक्रोश को देना चाहेंगे क्योंकि अन्ना हजारे को ताकत भी उन्हें मिले हुए जनसमर्थन की ही है और सरकार अगर हड़बड़ाई है तो वह भी अन्ना को मिले जनसमर्थन से ही डरी हुई है।
राजनीतिक दलों में से कुछ लोग यह बात हाथ आए हुए एक बड़े मुद्दे के निकल जाने की तरह की लग सकती है लेकिन देश के हित में यह है कि लोग बातचीत के रास्ते बंद न करें, पूरा का पूरा लोकतंत्र विविधताओं के बीच सहमति और असहमति के साथ चलने वाली एक व्यवस्था है और इसकी भावना का सभी पक्षों को सम्मान करना चाहिए।

छोटी सी बात

17 अगस्त
आप जिनकी आलोचना अधिक करते हैं, उनकी कुछ खूबियां भी ढूंढें और उनकी भी चर्चा करें। आलोचना करना जरूरी भी हो तो कभी-कभी दूसरों की मिसाल देकर, दूसरों से चर्चा करते हुए इशारों में करें। सिर्फ कड़वी बातें किसी को नहीं पचतीं।

भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जादू की एक छड़ी हो सकती है प्रधानमंत्रीजी

17 अगस्त 11
कल से लेकर आज तक राजनीतिक दल, इंटरनेट और दिल्ली सहित बहुत से शहरों के रास्ते अन्नामय हो गए हंै। इन सबसे ऊपर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक किस्म से बावला हो गया है क्योंकि एक घटते हुए, आगे बढ़ते हुए घटनाक्रम से अधिक दर्शक किसी और बात के लिए नहीं जुटते। आंध्रप्रदेश में एक बार एक सुअर ने अचानक एक मंदिर के चारों तरफ चक्कर लगाने शुरू कर दिए और वह रूक ही नहीं रहा था। वहां के तमाम समाचार टीवी चैनलों ने मंदिर के इर्दगिर्द अपने कैमरे लगा दिए थे और शायद एक पूरी रात और आधा या पूरा दिन उसी परिक्रमा को वे दिखाते रहे। ऐसा हाल बहुत सी दूसरी घटनाओं के साथ होता है जिनमें राखी सावंत से लेकर मीका के चुंबन तक की घटनाएं होती हैं। फिर यह तो देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे एक महत्वपूर्ण आंदोलन से जुड़ी हुई खबर थी जिसने इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को बांध रखा।
लेकिन कल अन्ना हजारे की अनशन के पहले ही कर ली गई गिरफ्तारी से लेकर रात तक उनकी जेल से रिहाई, बाहर निकलने से उनकी मनाही और संसद के दोनों सदनों में इसे लेकर चल रहा हंगामा दो मुद्दों को एक कर गया। इस पर हमने कल भी लिखा, लेकिन आज भी इस पर लिखना इसलिए जरूरी है क्योंकि इस पर बहुत से लोगों के बयान आए और घटनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। एक मुद्दा अन्ना हजारे की वह जिद है कि वे अपने सुझाए हुए लोकपाल के मसौदे से कम कुछ नहीं चाहते और इसके लिए वे संसद में जा चुके सरकार के मसौदे पर चर्चा का इंतजार भी नहीं करना चाहते और न ही इस आसान विकल्प का इस्तेमाल करना चाहते कि वे सांसदों से, संसद की कमेटी से मिलकर उसके सामने अपनी बात रखें और फिर उन्हें विचार करने दें। यह विकल्प कुछ कम नाटकीय होता, इसमें टीवी चैनलों की कम दिलचस्पी होती और इसमें देश के बहुत से शहरों में सैकड़ों से लेकर हजारों तक लोग सड़कों पर नहीं आए होते। इसलिए इस आसान और तर्कसंगत, न्यायसंगत राह के बजाय अन्ना हजारे ने बेमुद्दत या आमरण अनशन की ऐसी राह चुनी जिसका समाचार महत्व अधिक था फिर चाहे उसका संसदीय महत्व कुछ भी हो या न हो।
जैसा कि बहुत स्वाभाविक है कि संसद में विपक्ष ने अन्ना हजारे की गिरफ्तारी को ही मुद्दा माना और उसने कल से अब तक के किसी और पहलू को मुद्दा मानने से इंकार कर दिया। प्रधानमंत्री ने संसद के दोनों सदनों में जो बयान दिए उसके बाद राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली ने जैसा दमदार जवाब दिया उसका मौका लोकसभा के हल्ले-गुल्ले में विपक्ष की नेता और भाजपा के भीतर जेटली की प्रतिद्वंद्वी सुषमा स्वराज ने खो दिया। खैर यह मुद्दा आज महत्वपूर्ण नहीं है कि भाजपा के इन दो महत्वाकांक्षी नेताओं में से किसने स्कोर किया, मुद्दा यह है कि कल से अब तक की घटनाओं पर सरकार ने क्या कहा और क्या किया। यहां पर हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बिल्कुल ही कम संवेदनशीलता वाले, राजनीतिक समझ-बूझ और चतुराई से अनछुए मंत्रियों से घिरा हुआ पाते हैं जिन्होंने कल सुबह से लेकर अब तक अन्ना हजारे का कद बढ़ जाने दिया और एक ऐसी नौबत लाकर खड़ी कर दी जिसमें कि लंबे अरसे बाद वामपंथी दल और भाजपा कंधे से कंधा भिड़ाकर सरकार के खिलाफ मोर्चे पर टिक गए हैं। हम यह तो नहीं जानते कि सोनिया गांधी अगर दिल्ली में होतीं तो नौबत इससे कुछ अलग होती, लेकिन फिर भी हम यूपीए और कांगे्रस अध्यक्ष के फैसले इससे कम मूर्खता के या अधिक समझदारी के देखते आए हैं। अन्ना हजारे की बातों से हम एक लंबी-चौड़ी असहमति रखते हैं लेकिन हम इस बात से कभी सहमत नहीं हो सकते कि किसी को आंदोलन करने से रोका जाए। हमारा बड़ा साफ मानना है कि सरकार की ऐसी हरकत, चाहे वह दिल्ली पुलिस के कंधे पर बंदूक रखकर चलाई गई हो, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और यह तय है कि वह आपातकाल की याद दिलाती है। हम आज की नौबत को आपातकाल की नौबत जैसी नहीं देखते लेकिन कल से यूपीए सरकार ने दिल्ली पुलिस के मार्फत पूरे देश के मुंह में एक पूरी तरह से अवांछित कड़वाहट घोल दी है। एक प्रतीक के रूप में ही यह बात लोगों को बुरी तरह से खटक गई कि जिस तिहाड़ जेल में कलमाड़ी और राजा जैसे भ्रष्ट बंद हैं वहीं ले जाकर अन्ना हजारे और उनके साथियों को बंद कर दिया गया।
जिस धारा 144 का हवाला देकर केंद्र सरकार अन्ना हजारे के आंदोलन को कुचलने को कानूनी तौर पर ठीक साबित कर रही है, क्या उसी धारा 144 के खिलाफ कुछ ही महीने पहले राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह के साथ उत्तरप्रदेश के किसानों के आंसू पोंछने नहीं गए थे? देश की राजनीति और सार्वजनिक जीवन के मुद्दे किसी थाने के मुंशी कि कानूनों में बंधी हुई सीमित समझ से अधिक उदार समझ-बूझ से सुलझाने के  होते हैं। कल से अब तक यूपीए सरकार का सारा बर्ताव नियमों की एक बहुत ही संकीर्ण समझ का हवाला देने वाला है जो कि पूरी तरह अलोकतांत्रिक है।
जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं हो सकती, तो हमारा यह मानना है कि ऐसी एक छड़ी हो सकती है। और यह छड़ी इस विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के भीतर रीढ़ की हड्डी की शक्ल में हो सकती है।

छोटी सी बात

16 अगस्त
अगर आप अपनी कार की सीट पर लैपटॉप, कैमरा, महंगी दूकानों के शॉपिंग बैग रखकर जाते हैं, तो आप चोरों और उठाईगीरों को न्यौता देते हैं। लोगों की नीयत और ईमानदारी को बार-बार चुनौती न दें, खुद भी सावधान रहें।

कांगे्रस की बेवकूफी या बदनीयती की कार्रवाई

16 अगस्त
लोकपाल बिल में अपनी पसंद के फेरबदल करवाने के लिए आज सुबह से  अनशन पर बैठने वाले अन्ना हजारे और उनके साथियों को दिल्ली में इसके पहले ही हिरासत में ले लिया गया। इसके पहले अनशन के लिए तय जगह और राजघाट पर स्थानीय पुलिस ने धारा 144 लगाकर लोगों के इक_ा होने पर रोक लगा दी थी। पिछले  कुछ दिनों से कांगे्रस पार्टी और यूपीए सरकार का रूख इसी किस्म का दिख रहा था और दिल्ली में इसी पार्टी और इसी सरकार का मिलाजुला राज चलता है। कहने को यह है कि किसी शहर में कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती है और हालात बिगडऩे के पहले ही बचाव में कार्रवाई करने का अधिकार भी स्थानीय प्रशासन का होता है। लेकिन भारतीय शासन व्यवस्था में यह बात हर कोई जनता है कि प्रशासन किस तरह सीधे शासन के नियंत्रण में काम करता है और इस बात पर सुप्रीम कोर्ट को तो झांसा दिया जा सकता है कि यह फैसला पुलिस या प्रशासन का था, सुबूतों की दरकार न रखने वाली जनता को यह धोखा नहीं दिया जा सकता।
यूपीए और कांगे्रस के आलोचक, अन्ना हजारे के समर्थक, देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की परवाह करने वाले लोगों में से कुछ इसे आपातकाल की याद दिलाने वाली कार्रवाई मान रहे हैं। जब एक अब तक अहिंसक लगता, अब तक बेकाबू न लगता अन्ना हजारे का यह आंदोलन अपने तौर-तरीकों में लोकतांत्रिक था तो सरकार के सामने हमें ऐसी कोई मजबूरी नहीं दिखती कि अन्ना को आंदोलन से रोककर पुलिस हिरासत में लिया जाता और राजघाट जैसे राष्ट्रीय स्मारक पर लोगों को पहुंचने से रोका जाता। राजघाट पर, उसके इर्दगिर्द धारा 144 लगाकर लोगों का वहां आना भी रोक देना इस सरकार की बददिमागी और बेदिगामी का सुबूत है और अगर इससे कुछ लोगों को आपातकाल की याद आती है तो हम उसे पूर्वाग्रह नहीं मान सकते। जैसा कि हमारे पाठक पिछले कुछ महीनों से हमारी बात को पढ़ रहे हैं, हम अन्ना हजारे की जिद के हिमायती नहीं हैं और उनके आंदोलन को गैरजरूरी और जिद्दी मान रहे हैं, उनके मुद्दों को अलोकतांत्रिक भी मान रहे हैं क्योंकि वे संसद की हेठी करने वाले मुद्दे हैं। लेकिन साथ-साथ हमारा यह भी मानना है कि लोकतंत्र में ऐसी असहमति के लिए पूरी जगह है और किसी का यह हक नहीं है कि वे एक प्रतिबंध लगाकर ऐसी असहमति रोकें। हमारे हिसाब से आज की चर्चा अन्ना हजारे का अडिय़ल रूख और गैरजरूरी जिद नहीं है, आज की चर्चा सरकार की बददिमाग कार्रवाई पर होनी चाहिए।
केंद्र और दिल्ली के शासन-प्रशासन में कोई फर्क नहीं है इसलिए अन्ना हजारे और उनके साथी अनशनकारियों की गिरफ्तारी और अनशन को रोक देने के लिए यूपीए और उसकी मुखिया पार्टी कांगे्रस सीधे-सीधे जिम्मेदार है। लोकतंत्र के भीतर किसी को भी एक शांतिपूर्ण आंदोलन से रोकना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। इसके खिलाफ हमें उम्मीद है कि अगले कुछ घंटों में सुप्रीम कोर्ट कोई आदेश कर सकता है या कम से कम दिल्ली सरकार से जवाब-तलब तो करेगा ही। लेकिन कांगे्रस के बददिमाग नेता अगर यह सोचते हैं कि एक आंदोलन को इस तरह से रोककर वे भ्रष्टाचार के मुद्दे को हाशिए पर धकेल देंगे, तो यह उसी तरह की सोच है जिस तरह आपातकाल के पहले कांगे्रस लीडरशिप को ऐसे ही सलाहकार-नेताओं ने सुझा दिया था कि सबको जेल में बंद करके इंदिरा की सरकार को बचाया जा सकता था। उस सलाह का नतीजा देश के इतिहास में दर्ज है। हमारी अन्ना हजारे के मुद्दों और तौर-तरीकों से गहरी असहमति है। लेकिन हम उनके आंदोलन के हक के हिमायती हैं और किसी भी आंदोलन को शुरू होने के पहले इस तरह रोकने की कोशिश करना लोकतंत्र का गला घोंटना है। अन्ना हजारे अपने आंदोलन के अब तक नायक थे लेकिन कांगे्रस की जुबान और उसकी हरकतें अन्ना हजारे को जननायक बनाने पर उतारू दिखती हैं। आज पूरे देश में कांगे्रस और यूपीए सरकार ने अपने खिलाफ एक निहायत ही गैरजरूरी बगावत पैदा कर दी है और जो लोग अन्ना से असहमत हैं वे लोग भी अन्ना के आंदोलन के हक के साथ खड़े हो गए हैं। सरकार की इस एक कार्रवाई ने संसद के भीतर भी अब कोई गंभीर काम होना मुश्किल कर दिया है, लेकिन हम अभी-अभी सीपीआई के आए इस बयान से बिल्कुल सहमत नहीं है जिसमें उन्होंने संसद के तीन दिन के बहिष्कार का आव्हान किया है। संसद का बहिष्कार एक निहायत गलत बात होगी और हमारा मानना है कि अन्ना हजारे सहित तमाम मुद्दों पर बात करने के लिए विपक्ष को संसद को ओवरटाईम करने के लिए बेबस करना चाहिए न कि संसद से सरकार को बच जाने का एक और मौका देना चाहिए।
अभी जब हम यह लिख ही रहे हैं तब भोपाल की एक खबर है कि वहां एक सामाजिक आंदोलनकारी महिला जो कि अन्ना हजारे के समर्थन में अनशन के लिए अपने घर से रवाना हो ही रही थी, उसे किसी ने गोली मार दी है। यह महिला बहुत से मुद्दों को लेकर आंदोलनों में सामने रहते आई है और अगर यह हत्या है तो इसके पीछे हो सकता है कि कोई और मुद्दा भी हो, लेकिन हम अपनी इस आशंका से डर जाते हैं कि अगर अन्ना हजारे जैसे किसी बड़े सामाजिक आंदोलनकारी को आज सरकार की हिरासत में कुछ हो जाता है तो इस देश में कैसी आग लगेगी? इसलिए आज कांगे्रस की इस बेवकूफी या बदनीयती की कार्रवाई बहुत ही धक्का पहुंचाने वाली है।