छोटी सी बात


29 सितंबर
अच्छे और बुरे काम बूमरैंग की तरह के होते हैं जो फेंकने वाले के पास लौटकर आते ही हैं। इसलिए कांटे बिखेरते हुए याद रखें कि उस राह पर आपको भी लौटना पड़ सकता है।

हृदय दिवस के बहाने कुछ सोचें

29 सितंबर 2011
आज दुनिया भर में विश्व हृदय दिवस मनाया जा रहा है। ऐसे दिनों का एक फायदा यह होता है कि इस दिन इससे जुड़ी हुई कुछ खबरें छप जाती हैं और कुछ ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनसे लोगों को याद पड़ता है कि उनके बदन के भीतर ऐसा एक हिस्सा है और उन्हें उसका ख्याल रखना चाहिए। बीमारी से बचाव के बारे में हम लंबे समय से यह लिखते आए हैं कि तमाम आधुनिक इलाज अधिक मौजूद होते जाने के बावजूद न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि अमरीका जैसे देश में भी लोगों को बीमारी का इलाज करवाना खासा मुश्किल पड़ रहा है। इलाज के खर्च के लिए सेहत का जो बीमा लोग खुद करवाते हैं या सबसे गरीब तबके लिए भारत जैसे देश में सरकारों ने यह काम अभी शुरू किया है, उससे भी कुछ हद तक तो इलाज मुफ्त में होता है लेकिन बहुत से मामलों में बीमा कंपनियां और अस्पताल इतनी बेईमानी करते हैं कि सरकार से वसूली हो जाती है और लोगों का इलाज नहीं हो पाता।
लेकिन इससे सबसे परे हर किसी की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने-आपको सेहतमंद रखें, बीमारी से बचाकर रखें और अपने आसपास भी ऐसा ही माहौल बनाकर रखें। भारत में अभी ताजा आंकड़े बतलाते हैं कि गैरसंक्रामक रोग बड़ी रफ्तार से बढ़ रहे हैं और भारत सरकार इससे बचाव के लिए दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। लेकिन सरकार की योजनाएं कितना फायदा पहुंचा पाती हैं यह सबका देखा हुआ है। और फिर यह भी है कि कुदरत के बनाए हुए इस बदन को तमाम चिकित्सा विज्ञान मिलकर भी बीमारी के पहले की हालत तक नहीं पहुंचा सकता। इसलिए लोगों को खुद ही अपने शरीर का ध्यान रखना है और साल में ऐसी दिन तो बहुत बार आएंगे जब अलग-अलग बीमारियों या शरीर के अलग-अलग हिस्सों के नाम पर उस दिन को मनाया जाएगा, लेकिन एक बड़ी बात यह है कि अगर कोई सेहत पर ध्यान देना शुरू करेगा तो वह तो फिर सभी जगह काम आने लगेगा।
भारत जैसे देशों जहां पर आज भी गरीब और मध्यमवर्गीय तबके की जीवनशैली ऐसी है कि वह उन्हें फिट रहने में मदद करती है। ऐसे में लोगों को चाहिए कि रोज मामूली कसरत करके, अपने खाने-पीने को सेहतमंद रखकर, तंबाकू और शराब, भारी-भरकम खाने से बचकर, कम खाकर, तनावमुक्त रहकर, योग और प्राणायाम जैसी मुफ्त की मिली बातों का इस्तेमाल करके वे बीमारी से बचे रहें। और बीमार पडऩे के पहले भी तन और मन को चंगा रखने के कई अलग-अलग दर्जे होते हैं। इनसे लोगों की उत्पादकता पर फर्क पड़ता है। कुछ लोग आसानी से रोज दस घंटे काम कर लेते हैं और कुछ लोग आठ घंटे पूरे होने के पहले ही थककर चूर हो जाते हैं, दम तोड़ देते हैं। इसलिए जो लोग अपने शरीर को ठीक-ठाक रखते हैं वे अपने कामकाज में भी बेहतर रहते हैं और उनके आगे बढऩे की संभावनाएं भी अधिक होती हैं।
लेकिन इसमें सरकार की भी एक भूमिका हम देखते हैं। हर शहर और कस्बे में सरकार को ऐसे प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने चाहिए जहां पर लोग रोज मुफ्त में योग-प्राणायाम, कसरत जैसी सुविधा पा सकें और जहां पर खान-पान से जुड़ी हुई बातों को लेकर जागरूकता पैदा की जा सके। आज बेकाबू शहरीकरण के चलते ऐसी जगहें कम होती जा रही हैं और अगर कसरत के लिए शहरी सुविधाएं हैं तो वे इतनी महंगी हैं कि हर कोई उनका खर्च नहीं उठा सकता। हमने कुछ समय पहले ईरान की तस्वीरों के साथ छापा था कि किस तरह सड़क किनारे की सार्वजनिक जमीन पर किस तरह कसरत की मशीनें लगी रहती हैं ताकि आते-जाते लोग उनका इस्तेमाल कर सकें। चीन में सड़कों के किनारे फुटपाथ पर ऐसी साधारण मशीनें लगा दी जाती हैं जिन पर लोग बसों का या ट्रेन का इंतजार करते हुए कसरत कर सकें। बहुत ही कम दाम की ऐसी मशीनों को भारत में भी जगह-जगह लगाया जा सकता है ताकि आते-जाते उन्हें देखकर लोग उनके इस्तेमाल की सोच सकें। कुछ समय पहले अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में एक इलाके से दूसरे इलाके तक जाने वाली मोटरबोट में ऐसे फेरबदल किए गए थे ताकि लोग उन पर पैडल मारते हुए बैठे रहें और उसकी ताकत भी बोट को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल हो। राज्य सरकारें और स्थानीय संस्थाएं ऐसी पहल कर सकती हैं।
इसके अलावा तकनीकी वैज्ञानिक जगह-जगह रोज के इस्तेमाल में आने वाली मशीनों में ऐसा फेरबदल कर सकते हैं ताकि वे बिजली के साथ-साथ पैडल से भी चल सकें और उससे कसरत भी हो जाए। ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें हैं जिनका ख्याल करके लोग सेहतमंद बने रह सकते हैं, और वही बीमारी से अकेला बचाव है। कभी भी बीमार पडऩे के बाद तंदरूस्ती पूरी की पूरी नहीं लौटती।

छोटी सी बात

28 सितंबर
वजन कम करने की चाह रखने वालों के लिए एक तरकीब है। वे जिस हाथ से अधिकतर काम करते हैं, उसे खाने-पीने की चीजों की तरफ न बढ़ाएं। इसी तरह खाने के लिए चम्मच को उस हाथ में थामें जिसे आप कम इस्तेमाल करते हैं। एक अंदाज है कि इससे आपका खाना-पीना तीस फीसदी तक घट सकता है। दूसरी तरकीब है छोटे बर्तनों में खाने की, छोटे चम्मच से खाने की।

यूपीए को क्या अपने न लौटने की गारंटी हो चुकी है?

28 सितंबर
पांच दिन लंबे अमरीका प्रवास से लौटने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की आलोचना करते हुए जो बयान दिया है वह निहायत बेबुनियाद, और एक हताश नेता का बयान है जिसके कि काबू में कुछ भी नहीं रह गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष बेचैन है और देश पर समय से पहले चुनाव थोपना चाह रहा है। उनकी इस बात पर आज देश के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने कहा है कि सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं, विपक्ष को उन्हें अस्थिर करने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर गिरती है तो वह अपने कर्मों की वजह से गिरेगी। विपक्ष की यह प्रतिक्रिया बिल्कुल तर्कसंगत है और कल से प्रधानमंत्री के बयान को सुनकर एकदम यही बात हम खुद होकर भी लिखने वाले थे।
किसी लोकतंत्र में विपक्ष कैसे चुनाव थोप सकता है? संसद या विधानसभा में जिस पार्टी या गठबंधन का बहुमत होता है वही अगर चाहे तो समय के पहले सदन को भंग करके चुनाव की घोषणा कर सकता है। लेकिन भारतीय विपक्ष ने न तो सांसदों की खरीद-फरोख्त करके सरकार को गिराने की कोशिश की और न ही विपक्ष से लोकतंत्र में यह उम्मीद की जा सकती कि वह सत्ता के जुर्म, मनमोहनी अंदाज में, अनदेखे करके चुपचाप बैठे रहे। विपक्ष ने, मीडिया ने और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अगर यूपीए सरकार के कुकर्मों को उजागर किया है, इस गरीब देश की जनता के हक की लूटपाट को सामने रखा है तो इनमें से किसी ने भी सरकार पर चुनाव को नहीं थोपा है। सरकार पर चुनाव तो खुद उसके मंत्री, खुद उसके नेता थोप रहे हैं जो कि इस अंदाज में बेईमानी कर रहे हैं कि अगले आम चुनाव में अब आने की कोई गुंजाइश बची नहीं है इसलिए अभी जितनी लूटपाट हो सके वह कर ली जाए।
सरकार से परे कांगे्रस पार्टी का हाल अगर देखें तो उसकी दुर्गति भी देखने लायक है। एक तरफ इसके प्रवक्ता एक बड़े नाजुक मौके पर अन्ना हजारे जैसे जननायक बने हुए बुजुर्ग को लेकर गालियां बकते हैं, पूरी की पूरी पार्टी किसी धर्म से जुड़े मुद्दे पर ऐसे धर्म के नेता या प्रवक्ता का इस्तेमाल करती है जिससे नुकसान के अलावा और कुछ न हो। फिर दिग्विजय सिंह जैसे नेता हैं जो कि बाबा-अन्ना जैसे लोगों के लिए गालियों के इस्तेमाल के साथ-साथ ओसामा के लिए ओसामाजी कहकर पता नहीं इस देश के कौन से ऐसे मुस्लिम तबके को खुश करना चाहते हैं जो कि ऐसे आतंकी के साथ हमदर्दी रखता हो। कांगे्रस के नेताओं के ऐसे मुस्लिम पे्रम से इस देश के मुस्लिमों की तस्वीर भी बिगड़ती है और हिंदू साम्प्रदायिकता पर राजनीति करने वाले लोगों को हथियार भी जुट जाता है। मनमोहन सिंह ने यह बात भी कही है कि उनकी सरकार जनता के नजरिए को ठीक कर पाने में नाकामयाब रही। ऊपर हमने जिन बातों को गिनाया है वे तमाम बातें जनता की नजरों में यूपीए सरकार और इस गठबंधन की पार्टियों के बारे में तस्वीर बनाने का काम करती रहीं। और यह तस्वीर खासी भयानक बन गई है जिसके बारे में अब अधिक, और अधिक लोग यह मानने लगे हैं कि अगले आम चुनाव तक यूपीए का उबर पाना नामुमकिन होगा, हालांकि हम राजनीति में इतनी जल्दी ऐसी अटकल लगाने में अपने को कमजोर पाते हैं।
मनमोहन सिंह में अगर जरा भी समझदारी, जरा भी शर्म बची हो तो उन्हें अपनी सरकार के बाकी जुर्म बाहर कहीं-कहीं से भांडाफोड़ होने के पहले खुद जनता के सामने रखने चाहिए और अपने घर बिदा हो जाना चाहिए। उनकी सज्जनता की छवि अब एक इतिहास की बात है। किसी गिरोह के सरदार को ऐसी रियायत नहीं मिल सकती कि वह मासूम है। और यही बात यूपीए के डीएमके जैसे दलों पर भी लागू होती है, इसके भूतपूर्व मंत्रियों और वर्तमान मंत्रियों पर भी लागू होती है। पिछली आधी सदी में हमें ऐसी कोई भारत सरकार याद नहीं पड़ती जिसकी इस कदर बदहाली हुई हो और जिसे लेकर देश की जनता में कोई विश्वसनीयता न बची हो। भारतीय जनता पार्टी चूंकि देश की सरकार नहीं चला रही है इसलिए वह सिर्फ कर्नाटक या उत्तराखंड जैसे अपने राज के प्रदेशों में ही भ्रष्टाचार करके सब्र कर रही है। उसका रिकॉर्ड भ्रष्टाचार पर कोई अधिक बेहतर नहीं है और वह विपक्ष में रहने की वजह से आज इस मौके पर कुछ कम कालिख से पुती हुई है। ऐसे में सरकार की फजीहत के लिए भाजपा इसी तारीफ की हकदार नहीं है और मनमोहन सिंह की यह सरकार अपने ही कुकर्मांे के वजन से डूबने के करीब है। मनमोहन सिंह को कम से कम इतनी समझदारी दिखानी चाहिए थी कि वे चुनाव लादने का श्रेय विपक्ष को न देते क्योंकि ऐसा करने की ताकत खुद उनके घर में है और उनके घर के तमाम नेता-मंत्री ऐसा करने में जुटे हुए हैं। देश में आज सवाल यह है कि क्या यूपीए अगले चुनाव में अपनी संभावनाओं को शून्य देखते हुए उसी अंदाज में लूटपाट में जुटी हुई है जिस अंदाज में  लौटता हुआ कोई राजा सब कुछ लूटते हुए लौटता है?

छोटी सी बात


27 सितंबर
बीमारी या तकलीफ का इलाज शुरूआती दौर में ही आसान होता है। बहुत सी बीमारियों तो जंगल की आग सरीखी होती हैं, एक बार भड़क गईं, तो काबू में आना बहुत महंगा पड़ता है, लंबा होता है, नुकसान भी बहुत होता है। इसलिए कोई भी जांच तुरंत करवाएं, और उसमें गर कोई बीमारी न निकले, तो उसे फिजूलखर्ची न मानें।

भगत सिंह, तुम्हारी शहादत की यहां सिर्फ इतनी कीमत है

27 सितंबर 2011
कल जब देश भर में जगह-जगह शहरों में लोग भगत सिंह की जन्मतिथि पर उनकी प्रतिमाओं पर जाकर तस्वीरें खिंचवाएंगे तब इस बात को कम ही लोग देखेंगे कि कौन-कौन से राजनीतिक दल और कौन-कौन से नेता इन प्रतिमाओं तक पहुंचने के हकदार भी नहीं हैं और जिनकी तमाम करतूतें भगत सिंह की सोच और उनके काम, उनकी जिंदगी और उनकी शहादत, इनमें से हर एक बात के खिलाफ हैं। लेकिन अगर यह फर्क जनता के बीच सोचने और समझने में नहीं आएगा, तो फिर यह वैसी ही राजनीतिक बेईमानी होगी जैसी गांधी की तस्वीरों के साथ होती है।  शहादत के लहू से अपने माथे तिलक करके जो लोग खुद भी शहीदों में नाम लिखाना चाहते हैं, उनको उजागर करना समाज के जागरूक तबके की जिम्मेदारी रहती है। लेकिन हिंदुस्तान में आज सभी किस्म के तबकों के बीच की विभाजन रेखा धुंधली होते-होते खत्म हो चुकी है और अब कोई भी किसी तस्वीर को लेकर चल सकता है और जनता को एक धोखा और झांसा दे सकता है।
1907 से 1931 तक कोई 25 बरस की जिंदगी में भगत सिंह ने अंगे्रजों के खिलाफ एक क्रांतिकारी लड़ाई लड़ते हुए शहादत की जो ऊंची मिसाल पेश की, उसने उन्हें गांधी से बहुत अलग रहते हुए भी, एक अलग किस्म का कद दिया। आज हम यह चर्चा यहां इसलिए कर रहे हैं कि अंगे्रजी राज के खिलाफ बगावत के पूरे वक्त के लडऩे के साथ-साथ छोटी सी उम्र में भगत सिंह ने जिस तरह से दुनिया के क्रांतिकारी आंदोलनों को पढ़ा, माक्र्स को पढ़ा, क्रांतिकारी हलचलों में वे शामिल हुए और जिस तरह से जान पर खेलकर उन्होंने अंगे्रजों के खिलाफ एक ऐसी हथियारबंद लड़ाई लड़ी जिसके चलते उन्हें मिली फांसी से उन्हें बचाने से गांधी तक ने अपील से मना कर दिया था। हिंदुस्तान की जनता के अधिकांश हिस्से में जिस हथियारबंद संघर्ष के लिए नापसंदगी थी, वह कड़ा और जानलेवा रास्ता जिस उम्र में भगत सिंह ने ले लिया था, आज उस उम्र की पीढ़ी भगत सिंह के इतिहास को भी नहीं पढ़ पातीं और दुनिया के संघर्ष की कहानियां तो अब गिने-चुने लड़के-लड़कियां ही पढ़ते हैं। जो न पढ़ते हैं, न जानते हैं, वे फैशन के बतौर चे गुएरा की तस्वीरों के टी-शर्ट पहनते हैं।
हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग के भीतर यह एक भयानक किस्म का, भयानक दर्जे का पाखंड है जिसके चलते तमाम साम्प्रदायिक, भ्रष्ट, दुष्ट और शोषक ताकतें भगत सिंह का नाम लेकर अपनी तस्वीरें छपवाने की कोशिश करती हैं। लेकिन यह किस तरह का देश है जहां और कुछ नहीं तो कम से कम भगत सिंह के इतिहास को पढऩे और समझने के लिए नौजवान पीढ़ी कुछ घंटों का वक्त निकालकर कम से कम अपने-आपको कुछ अधिक जागरूक और जानकार बनाने की भी नहीं सोच पाती! आज का हिंदुस्तान यहां की लोकतांत्रिक संस्थाओं की बेईमानी का शिकार होकर राजनीतिक हिकारत का सामान मान चुका है और अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था के तहत आम हिंदुस्तानी अब एक ग्राहक सा रह गया है। भगत सिंह की लड़ाई की सारी जिंदगी बीस से पचीस बरस के उम्र की रही, और इस उम्र में एक मोबाईल और एक मोबाईल पर पूरा ध्यान लगाए हुए उनकी उम्र की हिंदुस्तानी पीढ़ी अपना वक्त गुजार देती है।
ऐसा देश इतिहास से कुछ सीखने, सबक लेने और नसीहत लेने की बात तो तभी सोच सकता था जब इतिहास को पढऩे में उसकी नौजवान पीढ़ी थोड़ा सा वक्त लगाती। और इतिहास पढऩे से हमारा यह मतलब नहीं है कि स्कूल और कॉलेज में इतिहास को एक विषय के रूप में कोई पढ़े। भगत सिंह जैसों की शहादत के खून से भीगी हुई, सींची हुई अपनी जड़ों को भी अगर कोई देखना नहीं चाहता तो फिर वे आज के बाजार में मौजूद सामान, और कल बाजार में आने वाले सामान के सपनों में डूबे लोग हैं जिनको भगत सिंह का नाम भी लेने का कोई हक नहीं है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार इस देश के वे तमाम राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी हैं, वे तमाम प्रमुख लोग भी हैं जिन्होंने भगत सिंह को साल में दो बार माला के लायक बनाकर रख छोड़ा है और साल में दो बार राष्ट्र के नाम संदेश में उनका जिक्र हो जाए तो बहुत है। आज की राजनीतिक ताकतों को नौजवान पीढ़ी के बीच अधिक राजनीतिक जागरूकता से बहुत अधिक तकलीफ होना तय है, इसलिए इस पूरी पीढ़ी को एक अफीम के नशे की तरह सिर्फ फर्जी मुद्दों में उलझाकर रख दिया गया है और एक बावले ग्राहक की तरह उसके सामने एक के बाद दूसरा सामान, एक के बाद दूसरी सर्विस सरकारें रखती चली जाती हैं। पचीस बरस की उम्र तक के जितने लोग इस देश में मोबाईल फोन पर जितना वक्त अब तक गुजार चुके हैं क्या उसका एक फीसदी वक्त भी वे देश के सबसे जलते हुए मुद्दों को जानने और समझने में लगाते हैं?
भगत सिंह, यह देश बहुत ही अहसानफरामोश देश है और तुम्हारी शहादत की यहां सिर्फ इतनी कीमत है कि लोग उसके साथ खड़े होकर अपनी तस्वीरें छपवाने की गारंटी कर लेते हैं।

छोटी सी बात

26 सितंबर
अपना सारा घमंड, सारी बददिमागी, अपने से अधिक ताकतवर लोगों पर आजमाकर देखें। सबक आपको अपने से कमजोर लोगों के साथ सही बर्ताव सिखा देगा।

भारत, पाकिस्तान और अमरीका

26 सितंबर 2011
अमरीका और पाकिस्तान के बीच जिन आरोपों या सुबूतों के आधार पर रिश्ते तनाव से भरे हुए दिख रहे हैं उनसे भारत के कुछ लोग यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि मुंबई हमले जैसे कई छोटे-बड़े हमले के लिए जिम्मेदार पाकिस्तान अब अपने सबसे बड़े मददगार देश अमरीका की नजरों में ही गिर रहा है या गिर गया है। पाकिस्तान की नई, नौजवान और खूबसूरत विदेश मंत्री ने अमरीका में दौरे के दौरान जवाबी हमला करते हुए यह कहा कि अमरीका पर आतंकी हमलों के लिए पाकिस्तान का नाम अगर इसी तरह अमरीका जोड़ेगा तो वह एक दोस्त खो बैठेगा। दोनों तरफ के बयानों को अगर देखें तो यह तनाव पिछले बहुत बरसों में अभूतपूर्व दिख रहा है लेकिन यह आगे कहां तक पहुंचेगा इसे लेकर अटकलबाजी आसान इसलिए नहीं है कि अमरीका की विदेश नीति और सैनिक नीति के लिए पाकिस्तान हिंद महासागर क्षेत्र के इस इलाके में अब भी उसकी सबसे पसंदीदा हुकूमत है। एक ऐसा देश जो अमरीका के पैसों पर जिंदा है, जो अपनी जमीन के अमरीका-विरोधी लोगों की नाराजगी कम रखने के लिए बीच-बीच में अमरीका पर गुर्राकर कुछ दांत उसे दिखाता है, लेकिन इससे परे हकीकत यह है कि उसकी जमीन पर अमरीकी फौजें जो चाहे वो करती हैं। ऐसे में इस तनाव की गंभीरता और उसके लंबे असर के बारे में हमें गहरा शक है। आतंकियों, कट्टरपंथियों, फौजियों और जासूस एजेंसियों से चारों तरफ से घिरे हुए और उनके शिकार इस देश की हालत अमरीका को एकदम माकूल बैठती है और उसे ऐसा ही परेशानहाल, मुसीबतजदा फौजी अड्डा चाहिए।
पाकिस्तान की परेशानियां बढ़ते देखकर हिंदुस्तान की जमीन के जंगखोर लोग खुश हो सकते हैं और कुछ अमनपसंद ऐसे लोग भी खुश हो सकते हैं जो पाकिस्तानी जमीन से यहां होने वाले आतंकी हमलों से जख्मी हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की बेहतरी चाहने वाले लोगों में जो समझदार लोग हैं वे जानते और समझते हैं कि पड़ोस में लगी आग किसी के फायदे की नहीं होती। पाकिस्तान जैसे-जैसे एक अधिक नाकामयाब लोकतंत्र होते जा रहा है वैसे-वैसे वह अमरीका या चीन, या दोनों की फौजी डिजाइनों का एक अधिक बेबस पुर्जा होते चले जा रहा है। यह सिलसिला कभी भी भारत के फायदे का नहीं रहेगा और भारत के मामलों में दखल देने के लिए पाकिस्तान को अमरीका या चीन भाड़े के एक कंधे की तरह इस्तेमाल करते रह सकते हैं, रहेंगे। इसलिए पाकिस्तान में कट्टरपंथ और धर्मान्धता खत्म या कम होने, वहां फौज की दखल कम होने, वहां की गरीबी कम होने और वहां पर उनके खुद के या पड़ोसी देशों के आतंकियों का कब्जा कम होने में ही भारत का भला है। अमरीका जो कि अपने-आपको दस बरस पहले के आतंकी हमले के एक जख्मी की तरह पेश करते हुए पूरी दुनिया पर हमला करने का हकदार बताते रहता है, उसे अपने ऐसे पल भर के नुकसान के बाद जंग के फायदे अलग दिखते हैं। एक-एक देश की सरकारों को पलटना, वहां के अच्छे या बुरे, जैसे भी हों, शासकों को मारना और दुनिया के अकेले दादा की तरह अपने-आपको स्थापित करना उसकी धाक के लिए जरूरी और फायदेमंद है।
हमारे पाठकों को यह बात शायद याद होगी कि इराक में लोकतंत्र लाने के नाम पर जब अमरीका ने हमला किया तो उसके खिलाफ हमने लगातार लिखते हुए उस पर भारत सरकार की चुप्पी को भी इतिहास में दर्ज होने वाला एक शर्मनाक तथ्य लिखा था। लोगों ने इस हफ्ते की भारतीय प्रधानमंत्री की खबरों को अगर ध्यान से देखा है तो अब जाकर शायद पहली बार मनमोहन सिंह ने इस पर मुंह खोला है और पश्चिमी देशों द्वारा फौजी कार्रवाई से किसी देश में सत्ता बदलने की आलोचना उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अपने भाषण में की है। अब तो अमरीका और उसके गिरोह के बाकी हमलावर देश इस राह पर इतना आगे बढ़ गए हैं कि भारत की ऐसी पहली कड़ी प्रतिक्रिया उनकी साजिशों को कोई भी नुकसान पहुंचाने की हालत में रह नहीं गई है। इसलिए हम मनमोहन सिंह या भारत की ऐसी प्रतिक्रिया को बहुत खोखली प्रतिक्रिया मानते हैं। और आज अमरीका और पाकिस्तान के बीच तनाव अगर सचमुच आगे बढ़ता है तो एक नौबत ऐसी आ सकती है कि पाकिस्तान को आतंकी-अड्डा बताते हुए अमरीका वहां भी तख्तापलट के लिए सीधी या दबी-छुपी फौजी कार्रवाई कर सकता है। यह हालत भी भारत के जिन लोगों को अच्छी लगेगी उन्हें एक विख्यात कविता याद रखनी चाहिए जो कहती है-मैं चुप रहा क्योंकि आज वे मुझे लेने नहीं आए थे...
पाकिस्तान और भारत के तनाव, अमरीका और पाकिस्तान के तनाव से बिल्कुल अलग मामला है और रिश्तों के ये दो अलग-अलग मामले किसी तरह की तुलना के लायक भी नहीं हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत को एक ऐसी स्थाई विदेश नीति पर चलने की जरूरत है जिसमें किसी देश में सत्ता बदलने के लिए किसी भी दूसरे देश की फौजी कार्रवाई पर भारत की प्रतिक्रिया बरसों बाद न आए, और वह समय रहते, असर डालने के वक्त के भीतर ही आए। लेकिन मनमोहन सिंह जैसों से कोई उम्मीद इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि भारत का यह प्रधानमंत्री तो हमलावर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को औपचारिक रूप से जाकर यह कहता है कि भारत के लोग उसे बहुत चाहते हैं। इतिहास का इतना बड़ा झूठ जो प्रधानमंत्री अपने देश के नाम पर बाहर पेश करता है वैसा अमरीकापरस्त इंसान किसी मजबूत विदेश नीति को कभी नहीं बढ़ा सकता। दुनिया के इतिहास में खासी दखल रखने वाले जवाहर लाल नेहरू के देश और उनकी पार्टी की यह बदहाली करने वाले मनमोहन सिंह का नाम इतिहास में कैसी स्याही से दर्ज होगा क्या उस रंग को भी यहां बताने की जरूरत है?

अलग-अलग नस्ल, अलग-अलग रेट

26 सितंबर 2011
सुनील कुमार
अमरीका के कैलिफोर्निया में जिस जाने-माने और चर्चित बर्कले शहर और विश्वविद्यालय में मुझे पिछले तीन बरसों में दो बार जाने का मौका मिला वहां इन दिनों एक नया विवाद छिड़ा हुआ है। जिन लोगों ने मेरी अमरीका यात्रा के संस्मरण पढ़े होंगे उन्हें इस शहर के बारे में याद होगा कि किस तरह जुड़े हुए सानफ्रांसिस्को अब इस बर्कले में एक वक्त हिप्पी आंदोलन शुरू हुआ था, यहीं पर परमाणु विरोध का आंदोलन शुरू हुआ था, किस तरह विश्वविद्यालय में पेड़ों को कटने से बचाने के लिए वहां के लड़के-लड़कियां महीनों तक उन पेड़ों पर ही बस गए थे। अमरीका के भीतर कैलिफोर्निया का यह हिस्सा खासे वामपंथी रूझान का माना जाता है और यह अपने उग्र आंदोलनों के लिए इतिहास में अच्छी तरह दर्ज भी है। तीन बरस पहले इन्हीं दिनों जब बर्कले विश्वविद्यालय में भारत के लोकतंत्र पर हुए एक सेमिनार में छत्तीसगढ़ के उस वक्त के पुलिस प्रमुख विश्वरंजन एक वक्ता थे और एक दूसरे वक्ता के रूप में मैं यह देख रहा था कि बिनायक सेन की गिरफ्तारी के खिलाफ वहां किस तरह सैकड़ों नौजवान सेमिनार के भीतर ही प्रदर्शन कर रहे थे।
ऐसे बर्कले में इन दिनों जाहिर है कि वामपंथी रूझान के ठीक खिलाफ भी एक विचारधारा मौजूद होगी। अमरीका की जातिवादी व्यवस्था भारत की मनुवादी-ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था से कुछ अलग है और वह नस्लवादी है, जिसमें दुनिया के अलग-अलग इलाकों से आई हुई नस्लों के लोगों के बीच एक सामाजिक-आर्थिक तनाव, टकराव और अंतरसंबंध चलते रहते हैं। अभी वहां छात्रों के एक समूह ने बेकरी के कुछ सामानों को एक प्रतीक के रूप में एक अलग तरीके से बेचने का आंदोलन शुरू किया है। इसे वे 'विविधता बढ़ाओÓ आंदोलन कह रहे हैं और यहां पर डबलरोटी जैसे साधारण सामानों को बेचने के रेट खरीददारों की नस्लों के आधार पर कम या अधिक तय किए गए हैं। इनमें सभी नस्लों की महिलाओं को एक अलग दर्जा दिया गया है।
दरअसल बर्कले विश्वविद्यालय सहित कैलिफोर्निया के बाकी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए एक नए नियम को लागू करने की तैयारी चल रही है और यह अभी वहां के गवर्नर के पास विचार के लिए रखा हुआ है। इसके तहत विश्वविद्यालय नस्ल, सेक्स, जाति, राष्ट्रीय या भौगोलिक इलाके के आधार पर दाखिला देते समय भेदभाव कर पाएगा।
यह नया आंदोलन छेडऩे वाले लोग अमरीका की संकीर्णतावादी, विविधता-विरोधी समझी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक हैं और उनका मानना है कि प्रतिभा के आधार पर दाखिला देने के बजाय अगर नस्ल के आधार पर भेदभाव किया जाता है तो वह नस्लवादी होगा। ये लोग इसे एक व्यंग्य के रूप में समाज के सामने पेश कर रहे हैं जिसमें श्वेत लोगों के लिए बेकरी का कोई सामान अगर दो डॉलर का होगा, तो वही सामान एशियाई लोगों के लिए डेढ़ डॉलर का होगा, अफ्रीकन-अमेरिकन के लिए पौन डॉलर का, अमरीका के मूलनिवासियों (आदिवासियों) के लिए चौथाई डॉलर का होगा और सभी महिलाओं को इन रेट्स पर चौथाई डॉलर की अतिरिक्त छूट मिलेगी।
इन आंदोलनकारी छात्र-छात्राओं ने कहा है कि अगर उनके इस आंदोलन को नस्लवादी करार देते हुए लोग इसे कोस रहे हैं, तो इससे भेदभाव की तरफ ध्यान खींचने का उनका मकसद पूरा हो रहा है।
इंटरनेट पर फेसबुक पर इस आंदोलन के लिए बनाए गए पेज पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक अश्वेत छात्र ने लिखा कि यह पूरा सिलसिला उसके लिए बहुत ही चिड़चिड़ाहट  पैदा करने वाला है क्योंकि उसके आसपास के लोग चाहते हैं कि वह उनके लिए सस्ते में सामान खरीदकर दे।
जब इस आंदोलन को हम भारत के आज के हाल से जोड़कर देखते हैं तो ध्यान पड़ता है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के खिलाफ दलित उठकर खड़े हुए थे और उन्होंने अन्ना के आंदोलन को ब्राम्हणवादी, दलित-विरोधी करार दिया था। इसी अखबार में अन्ना के आंदोलन के और पहले से जब लोकपाल मसौदा कमेटी बनी, तब से हमारे लिखे हुए संपादकीय लोगों ने पढ़े होंगे जिनमें हमने इस बात का कड़ा विरोध किया था कि इस कमेटी में सामाजिक आंदोलनकारियों के नाम पर न सिर्फ एक ही टोली के पांच लोगों को ले लिया गया था बल्कि इनमें दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और महिलाओं को कोई जगह नहीं दी गई थी। इसके खिलाफ हमने बार-बार लिखा और अन्ना-टोली के तौर-तरीकों को गांधीवाद विरोधी भी कहा था।
समाज में समानता को देखने के अलग-अलग नजरिए होते हैं। कुछ लोगों को बराबरी का मौका समानता लग सकता है और कुछ लोगों को यह लग सकता है कि बराबरी के मौके के इस्तेमाल के लायक जब तक सब लोगों को बराबर से नहीं पहुंचाया जा सकेगा तब तक समानता नहीं आएगी। इसलिए भारत में आरक्षण की व्यवस्था की गई ताकि हजारों बरस से जिन तबकों के लोग एडिय़ों तले कुचलकर रखे गए हैं, उनके बच्चों को आज के भारतीय समाज के मुकाबले में शामिल होने लायक तो बनाया जा सके। इसके लिए अलग-अलग तबकों को अलग-अलग तरह के आरक्षण के फायदे दिए गए जो कि संविधान के पहले अंदाज के बरस पूरे हो जाने तक भी कमजोर तबकों को नहीं मिल पाए।
आरक्षण की तैयारी के खिलाफ अमरीका में संकीर्णतावादी लोगों में जो यह प्रतीकात्मक आंदोलन शुरू किया है, इससे वहां आरक्षण की जरूरत और नस्लवाद पर एक बहस छिड़ी है। इससे एक दूसरी बात जो मुझे याद पड़ती है वह कोई बीस बरस पहले की है जब विश्वनाथ प्रताप सिंह मेरे शहर आए थे। उस वक्त शायद वे प्रधानमंत्री नहीं रह गए थे। उनको इंटरव्यू करते समय जब यह पूछा गया कि मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर जब जातिवाद पर पूरे देश में एक बहस छिड़ी तो क्या उससे एक खत्म हो चुके बहस के मुद्दे को फिर से जिंदगी नहीं मिली? तो उनका कहना था कि जातिवाद किसी तरह से खत्म नहीं हुआ है और 'जाति-व्यवस्था के पीछे तो निहित हिंसा है, निहित अन्याय है वह हजारों वर्ष से है। लेकिन जूता पहने हुए कभी याद नहीं आता कि जूता भी है। जिसका अंगूठा दबता है उसे याद आता है कि अंगूठा भी है, उसे ही जूता दिखता है, अब जाति-व्यवस्था से जो लोग कभी दबे नहीं हैं उनका लगता है जाति-व्यवस्था है ही नहीं। तो जो जाति-व्यवस्था के तले दबे हैं उन्हें रोज याद आता है कि वे दबे हैं लेकिन वे मुखर नहीं हैं इसलिए लगता है कि जाति-व्यवस्था लोप हो गई है।Ó
वीपी सिंह से वह एक लंबी बातचीत थी जिसकी बातें आज भी पढऩे और सोचने लायक हैं क्योंकि जब सत्ता की किसी अहमियत वाली, मायने रखने वाली बस पर सवार होने की बात आती है तो अन्ना की टोली को पांचों गैरदलित, गैरआदिवासी, गैरअल्पसंख्यक और गैरमहिला सदस्य कूदकर बस पर सवार हो जाते हैं और एक जोड़ी बाप-बेटे भी एक ही पेशे से आए हुए दो सीटों पर काबिज हो जाते हैं, बिना यह फिक्र किए कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस विशाल विविधता वाले देश में हर कमजोर तबके से उनके जैसे काबिल पाए और लाए जा सकते हैं।
अमरीका में पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा के आने से वहां की अश्वेत जनता की जिंदगी पर उतना ही फर्क पड़ा है जितना कि उत्तरप्रदेश में एक दलित की बेटी के मुख्यमंत्री बनने से या वहीं की एक दलित महिला के लोकसभा अध्यक्ष बनने से वहां की दलित महिलाओं की जिंदगी पर पड़ा है, वे पहले के मुकाबले अधिक बड़ी संख्या में बलात्कार झेल रही हैं और बलात्कार के बाद उन्हें जला भी दिया जा रहा है। इसलिए अलग-अलग नस्लों को अलग-अलग रेट पर डबलरोटी बेचने का प्रतीकात्मक व्यंग्य भारत में बिना दूकान लगाए भी मजबूत तबकों के लोगों की जुबान से लगातार झड़ते-बरसते रहता है। यहां पर उसके लिए किसी दूकान लगाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

छोटी सी बात

25 सितंबर
किसी के बारे में झूठी या गंदी बात कहते हुए याद रखें कि इसका हिसाब आपकी जिंदगी में ही चुकता होता है। किसी नर्क या जहन्नुम की नौबत नहीं आती।

शोएब ने क्या गलत लिखा?

25 सितंबर 2011
पाकिस्तान के तेजरफ्तार गेंदबाज शोएब अख्तर की एक किताब ने भारत के टेलीविजन समाचार चैनलों को कुछ दिनों के लिए दाना-पानी दे दिया है। सचिन के बारे में शोएब ने एक खास गेंद के बारे में लिखा कि उस पर सचिन डर गए थे और उसे खेल नहीं पाए थे। इस पर हिंदुस्तानी क्रिकेटपे्रमी, देशप्रेमी, सचिन प्रशंसक और पाकिस्तान-विरोधी तमाम लोग बुरी तरह उबल पड़े। शोएब ने पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडिय़ों और वहां के क्रिकेट मैनेजमेंट के बारे में भी बहुत सी कड़वी बातें लिखी हैं जिन्हें लेकर उन्हें जवाबी हमले का सामना भी वहीं पर झेलना पड़ रहा है। हम उन तमाम बातों के सच और झूठ के बारे में नहीं जानते लेकिन सचिन के बारे में उनकी लिखी गई एक बात और उस पर भारतीय समाचार चैनलों द्वारा खड़ा किया गया बवाल जरूर सोचने और लिखने के लायक है।
अगर किसी गेंदबाज को यह लगता है कि उसकी किसी तेजरफ्तार गेंद पर कोई बल्लेबाज सहम गया है, तो यह उसका अपना सोचना हो सकता है और यह भी हो सकता है कि शोहरत पाने की चाह से परे भी शोएब अख्तर ने ऐसा लिखा हो। कल दिन भर जब टीवी चैनलों पर यह मामला उठाया गया और लगातार शोएब के बारे में भारतीय टेलीविजन ने यह कहा कि यह शोहरत पाने की चाह है ताकि किताब अधिक बिके, तो किताब को पढ़े बिना इस तरह की बातों को रात-दिन टीवी पर दिखाने से शोएब के बारे में कुछ साबित हुआ हो या न हुआ हो, भारतीय टीवी के बारे में यह जरूर साबित हुआ कि अपने चैनल की शोहरत बढ़ाने के लिए, अपने अधिक दर्शक जुटाने के लिए उन्होंने जरूर इस विवाद को खड़ा किया है। क्रिकेट जैसे तेजरफ्तार खेल में किसी एक खिलाड़ी के सहम जाने या न सहम जाने के मुद्दे को इतना तूल देने का एक मतलब यह भी है कि लोग सचिन तेंदुलकर को इंसान से ऊपर मानते हैं। कहावतों और मुहावरों के रूप में तो ऐसा मानना ठीक है लेकिन कोई भी खिलाड़ी क्या यह कह सकता है कि वह किसी गेंद से कभी सहमा ही नहीं है? और क्रिकेट तो ऐसा खेल है जिसमें आऊट होने या न होने जैसे मामलों को दो-दो, तीन-तीन एंपायर कैमरों और कम्प्यूटरों के साथ मिलकर तय करते हैं, तो ऐसे खेल में अगर किसी खिलाड़ी को ऐसा लगा कि उसकी गेंद पर कोई सहम गया है तो क्या ऐसा लिखने के पहले कोई किसी कम्प्यूटर से सर्टिफिकेट लेकर आए?
हम आत्मकथाओं को किस्से कहानियों के मुकाबले अधिक दिलचस्प और अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। इनमें साहित्य जैसा चाहे कुछ न रहता हो लेकिन अपने वक्त के इतिहास पर अपना नजरिया जरूर रहता है। इसे उसी तरह देखना भी चाहिए और हमने इसके पहले भी कई किताबों के बारे में ऐसा लिखा है कि उन पर प्रतिबंध की मांग या उनके खिलाफ किसी प्रदर्शन या अदालती मामले मुकदमे के बजाय उनके जवाब में लिखना चाहिए। तर्कों और एक नजरिए के तथ्यों का जवाब तर्कों और जवाबी नजरिए के तथ्यों से ही होना चाहिए। कुछ लोग एक पक्ष को भक्तिभाव से देखते हुए दूसरे पक्ष को कोसना और गालियां देना शुरू कर देते हैं, जैसा कि कल से सचिन के प्रशंसक कर रहे हैं, इससे सिर्फ यही साबित होता है कि लोगों के पास तर्क की कमी है, लोगों के पास बर्दाश्त की कमी है और अपने नजरिए से परे की बात को वे किसी को कहने या लिखने देना भी नहीं चाहते। यह सिलसिला इसलिए खत्म होना चाहिए कि मानवीय सभ्यता में जैसे-जैसे लोकतंत्र दाखिल होता है वैसे-वैसे लोगों के बीच वैचारिक विविधता को लेकर सहनशीलता बढऩी चाहिए। ऐसा न होने का एक ही मतलब है कि लोगों के पास अपने मंदिरों में सदियों पहले गढ़ी गईं नग्न प्रतिमाओं को अनदेखा करने और मकबूल फिदा हुसैन के पीछे लाठी लेकर दौडऩे की बददिमागी है। ऐसी ही कमजोर समझ लोगों की आत्मकथाओं को लेकर होती है। कोई भी आत्मकथा कोई निर्विवाद इतिहास नहीं होती। आत्मकथा किसी एक व्यक्ति की नजर से उसकी अपनी जिंदगी की बात होती है जिससे दूसरे लोग सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। अब तो इंटरनेट का जमाना है जब किसी किताब का जवाब देने के लिए दूसरी किताब लिखना भी जरूरी नहीं होता और उस पर कुछ घंटों के भीतर पूरी दुनिया में उस मामले से जुड़े हुए लोगों के बीच एक ऐसी अंतहीन बहस छिड़ी जा सकती है जो कि किताब को कुछ दिनों में ही मात दे दे। किसी किताब को लेकर एक अंधा विरोध उस किताब को अधिक शोहरत दिला देता है जिससे कि सचमुच अगर कोई असहमत है तो उसका मकसद तो पिछड़ ही जाता है। इसलिए अंधे विरोध के बजाय तर्क और तथ्य से किसी बात का जवाब देना ही लोकतंत्र है, ऐसा न करके लोग किताब की बिक्री बढ़ाने में मदद करते हैं, और ऐसा करते हुए वे दरअसल अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने का काम भी करते हैं।

छोटी सी बात


24 सितंबर
घमंड और पाखंड, इन दोनों में से अधिक बुरा कौन सा होता है, अपने आसपास के लोगों से चर्चा करके देखें। उनके तर्क भी पूछें। आपको जिंदगी की एक नई सोच मिलेगी।

सत्ता और लंगोट

24 सितंबर 2011
राजस्थान में गहलोत मंत्रिमंडल के एक बुजुर्ग मंत्री के खिलाफ हत्या और बलात्कार का मामला दर्ज हो जाने से वहां कांगे्रस की राज्य सरकार की एक ताजा किरकिरी हुई है। एक नर्स के गायब हो जाने के बाद से वहां के एक मंत्री का नाम शक के घेरे में चले आ रहा था और अब मामला दर्ज होने से यह जाहिर है कि शक में कुछ दम तो है ही। दूसरी तरफ दिल्ली में कांगे्रस के एक सबसे बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी को एक मामले में डीएनए नमूना देने से राहत देते हुए एक अदालत ने यह कहा कि उनका बेटा होने का दावा करने वाला नौजवान जिस मामले को लेकर अदालत में लड़ रहा है उसमें नमूना न देने की तिवारी की अपील को ऐसे भी देखा जा सकता है कि मानो एक नौजवान के आरोप सही हों। लोगों को याद होगा कि आंध्र के राजभवन में इन्हीं बुजुर्गवार के बिस्तर पर खेलकूद के जैसे वीडियो सामने आए थे और जिनके चलते उन्हें बहुत ही शर्मनाक हालत में इस्तीफा देकर निकलना पड़ा था, उसे देखते हुए उनकी एक पुरानी महिला मित्र के बेटे का यह दावा कुछ दमदार भी लगता है कि वह एनडी तिवारी का बेटा है।
भारतीय बोलचाल की जुबान में ऐसे लोगों को लंगोट का कच्चा कहते हैं और यह बात उत्तरप्रदेश के राजभवन से लेकर अमरीका के राष्ट्रपति भवन तक सभी जगहों पर भरपूर लागू होती है, जहां-जहां सत्ता की ताकत कुछ लोगों को आसपास के दायरे में अधिक आकर्षक, अधिक असरदार बना देती है। ऐसे लोग सेक्स के मामले में चाहे जैसे हों, उन पर फिदा लोगों की नजरों में उनके करीब पहुंचना ही पर्याप्त मादक रहता है। शोहरत और ताकत के साथ सोने वालों की कमी नहीं रहती और दूसरी तरफ शोहरत और ताकत की ऊंचाई पर पहुंचे हुए लोग अपने आसपास के दायरे पर हाथ धर देने को अपना हक सा समझ बैठते हैं। इसलिए जॉन एफ कैनेडी का नाम मर्लिन मनरो के साथ जुड़े रहता था, बिल क्लिंटन का नाम मोनिका लेविंस्की के साथ और नेहरू का नाम एडविना माउंटबेटन के साथ। इससे परे भी अगर देखें तो सत्ता की ताकत में मदमस्त मर्दों के बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं की एक अंतहीन कतार तो उत्तरप्रदेश में एक महिला मुख्यमंत्री के रहते हुए बनती दिखती है, और एक बड़ी त्रासदी यह है कि बलात्कारी अमूमन मायावती की पार्टी के मंत्री-विधायक दिखते हैं तो बलात्कार और हत्या की शिकार लड़कियां और महिलाएं अमूमन मायावती के दलित समाज की। इससे अधिक शर्मनाक और क्या बात हो सकती है? लेकिन जब लोगों के राजनीतिक मूल्य गटर में चले जाते हैं तो सत्ता का नशा और घमंड सिर चढ़कर बोलने लगता है। जिन वामपंथी दलों पर पश्चिम बंगाल में कानून हाथ लेने के आरोप लगते ही रहते थे, उस राज में भी उत्तरप्रदेश जैसे बलात्कार-हत्या के मामले कभी नजर नहीं आए। वामपंथी विचारधारा में महिलाओं और समाज के बाकी दूसरे कमजोर तबकों के लिए बराबरी के हक की सोच ऐसे बलात्कार नहीं होने देती। लेकिन बाकी किसी पार्टी के राज में ऐसी जिम्मेदारी देखने नहीं मिलती, और देश के बाकी सारे राजनीतिक दल, उनके नेता समय-समय पर ऐसे जुर्म करते पकड़ाते रहे हैं, और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे हजारों जुर्म के बाद कोई एक-दो शिकायतकर्ता ही पुलिस तक पहुंचने का हौसला जुटा पाते होंगे।
हम आए दिन सत्ता के बेजा इस्तेमाल के अलग-अलग पहलुओं के बारे में लिखते हैं, लेकिन आज हम सिर्फ इसी एक पहलू को लेकर लिख रहे हैं जिसका शिकार भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन में सिर्फ महिलाएं हैं। यह नौबत अभी पूरी भयानक इसलिए नहीं लग रही है क्योंकि ऐसी कोई शिकायत लेकर जब कोई महिला सरकार या अदालत के पास जाती है तो वहां काबिज मर्दों की बहुतायत उसे खारिज करने की पूरी कोशिश करती है और उस महिला के साथ अगले कई बरसों तक सार्वजनिक जीवन में चर्चा और प्रताडऩा की शक्ल में बलात्कार जारी रहता है। हम पहले कई दूसरे किस्म के अपराधों को लेकर यह सुझाव देते आए हैं कि सत्ता की ताकत के अलग-अलग दर्जों पर काबिज नेताओं, अफसरों या जजों, ऐसे तमाम लोगों के अपराधों के लिए अलग तेज रफ्तार अदालतें होनी चाहिए जिन्हें लालबत्ती-वीआईपी अदालत जैसा कोई बहुत इज्जत का नाम दिया जा सकता है ताकि ऐसे दर्जे का सिर इन अदालतों में ऊंचा रह सके। इसके साथ ही जब ऐसे लोगों के अपराध उनके मुकाबले कमजोर या बहुत कमजोर लोगों पर रहें तो उसके लिए अलग से कड़ी सजा का इंतजाम रहना चाहिए।
ऐसे जुर्म का हौसला लोगों को शायद इसलिए भी होता है कि राजनीतिक दलों में निजी चाल-चलन को लेकर कोई आचार संहिता बनी हुई नहीं है और तमाम किस्म की ज्यादतियों के बाद भी अय्याश और बलात्कारी लोग तब तक अपनी पार्टियों और सरकारों के नेता बने रहते हैं जब तक कि पुलिस या अदालत में फंसने लायक वजनदार कोई मामला उनके खिलाफ सीना तानकर खड़ा न हो जाए। क्या एक महिला की अध्यक्षता वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी, कांगे्रस अपनी पार्टी के लोगों के लिए कोई नियम-कायदे सामने रखेगी?

छोटी सी बात

23 सितंबर
अस्पताल हो या कोई और सार्वजनिक जगह, औरों को परेशान करने लायक जोर-जोर से बात करने आप अपने को बदतमीज साबित करते हैं। ऐसे लोगों के साथ खड़े लोग भी उतने ही जिम्मेदार होते हैं। कोई भी अपनी दौलत से बड़ा नहीं बनता बल्कि इंसानियत से बड़ा बनता है।

फटी कमीज और टूटा बटन


23 सितंबर
केरल के मुख्यमंत्री ओमेन चांडी अभी हैदराबाद पहुंचे तो वहां का मीडिया यह देखकर हक्का-बक्का रह गया कि उनकी कमीज फटी हुई थी और एक बटन भी गायब थी जिसकी जगह पिन लगी हुई थी। हैदराबाद के मीडिया को नेताओं की ऐसी सादगी देखने की आदत रह नहीं गई है क्योंकि वहां एक तरफ तो जगन मोहन रेड्डी का साम्राज्य मुगल बादशाहों को टक्कर देते दिखता है और दूसरी तरफ लगे हुए कर्नाटक के दूसरे रेड्डी बादशाह अपने राज्य से लेकर आंध्र तक अवैध खुदाई और रंगदारी में दसियों हजार करोड़ का साम्राज्य बना चुके हैं। ऐसे में अपने साधारण कपड़ों से भी बेफिक्र एक राज्य का मुख्यमंत्री हैदराबाद को कुछ अटपटा लग रहा था। लेकिन जैसा कि राजनीति में हर तस्वीर के दो पहलू हो सकते हैं, कुछ का कहना है कि ओमेन चांडी की जिंदगी ऐसी ही सादगी और लापरवाही की है, कुछ का कहना है कि वे घर से खुद के कपड़े फाड़कर, बटन तोड़कर निकलते हैं ताकि जनता के बीच उनकी तस्वीर एक गरीब, ईमानदार की बन सके।
अभी हम चांडी के सच पर जाने के बजाय यह सोच रहे हैं कि सार्वजनिक जीवन में जनता के पैसों पर सरकारी कुर्सियों पर रहने वाले लोग अपने बर्ताव और अपने तौर-तरीकों को कैसा रखें? लोकतंत्र में जिस गांधी का नाम लेकर यह देश अपने को एक महान विरासत का वारिस बताता है, उस गांधी की सादगी किसी कोने में धर दी गई है और उस कमरे को ताला डालकर उस पर सरकारी सील लगा दी गई है कि कहीं वह सादगी सामने आकर मुंह न चिढ़ाने लगे। पूरे देश में हम नेताओं को, अफसरों को और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को इस गरीब जनता के पैसों पर इस कदर ऐश करते देखते हैं कि लगता है कि गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले लोगों के मन में किस कदर नफरत नहीं पनपी हुई होगी? सत्ता के सीधे बेजा इस्तेमाल और सत्ता की ताकत से अपने दो नंबरी से लेकर दस नंबरी तक के कारोबार बढ़ाने वाले राजनीतिक-कारोबारी बहुत ही अश्लील और हिंसक तरीके से अपनी दौलत की नुमाइश करते हैं।
कुछ लोग जो एक मिसाल की तरह दिखते हैं, और हम आज तक की ही बात कर रहे हैं, हो सकता है कि आने वाले दिनों में वे भी भ्रष्ट साबित हो जाएं, उनमें चांडी के ही केरल के एक दूसरे कांगे्रसी केंद्रीय मंत्री ए.के. एंटोनी का नाम है, जो सादगी से जीते हैं और ईमानदार माने जाते हैं। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के बेटे के बारे में हमारी निजी जानकारी है कि वह दिल्ली में विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए बस और मेट्रो से आना-जाना करता है और गरीबी के अंदाज में जीता है। कुछ ऐसे अफसर हमारी जानकारी में हैं जो अपने घर-दफ्तर पर सरकार का कोई खर्च नहीं करते और सादगी से जीते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जनता के पैसों पर ढेरों फिजूलखर्ची करने वाले अफसर भी हर किसी के सामने रहते हैं।
सूचना के अधिकार के तहत जानकारी पाने में लगे हुए लोगों को जनता के पैसों की बर्बादी के बारे में लगातार खोजबीन करनी चाहिए और ऐसी जानकारी को लेकर आगे लड़ाई लडऩी भी चाहिए। लेकिन जो बात हमें अधिक परेशान करती है वह है चुनाव के रास्ते नेतागिरी और कारोबार में ऊपर पहुंचने वाले नेताओं के दौलत के हिंसक प्रदर्शन की। चुनाव लडऩे वाले नेता दस-दस, बीस-बीस लाख रूपयों की घडिय़ां पहनते हैं, पचास लाख की गाड़ी में घूमते हैं और पचीस-पचास करोड़ की कोठियां बनवाकर उनमें रहते हैं। वे किस तरह इस पूरे सिलसिले के अपराध से अपने दिल-दिमाग को परे रख पाते हैं यह सोचना बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन यह सोचना ही मुश्किल होता है, उनके लिए ऐसा करना शायद जरा भी मुश्किल नहीं होता और एक चोर की मिसाल दूसरे चोर के लिए काम आती है, सरकारी बेजा इस्तेमाल का एक मामला दूसरों के लिए परंपराएं खड़ी कर देता है। इस देश में वामपंथियों के अलावा कोई ऐसी पार्टी नहीं दिखती जो कि पार्टी के स्तर पर सादगी, किफायत और ईमानदारी पर पूरा अमल करती हो। देश की राजधानी दिल्ली में वामपंथी दलों के सांसदों को जो मकान मिलते हैं उनमें अनिवार्य रूप से उनकी पार्टी के संगठन के दफ्तर भी चलते हैं और सांसदों को मकान का एक हिस्सा ही इस्तेमाल करने दिया जाता है। यह बात भी शायद बहुत से पाठकों को न मालूम हो कि वामपंथी सांसदों को संसद से मिलने वाली तनख्वाह पूरी की पूरी पार्टी के फंड में जमा हो जाती है और वहां से उन्हें उतना ही महीना मिलता है जितना कि उस पार्टी के किसी फुलटाईम कार्यकर्ता को मिलता है। जिस गांधी से वैचारिक रूप से वामपंथी बहुत करीब नहीं थे, आज वे ही वामपंथी गांधी की सादगी, किफायत और ईमानदारी का झंडा उठाकर चलते हैं, वैसी जिंदगी जीते हैं। दूसरी तरफ अपने आपको गांधी की औलाद साबित करने के लिए डीएनए रिपोर्ट लेकर घूमने वाले कांगे्रसियों को देखें, या आरएसएस की तखत पर सोने वाली सादगी को देखें, न भाजपा के नेता न कांगे्रस के नेता किसी सादगी में भरोसा रखते और न ही जनता के पैसों की फिजूलखर्ची से परहेज करते। नतीजा यह है कि उनके मातहत काम करने वाले सरकारी अफसर भी नौकरशाह की तरह शाही फिजूलखर्ची करते हैं। और यह देश बत्तीस रूपए रोज पर जीने वालों को गरीब न मानने वाला देश है।

इस सरकार के चले जाने की नौबत कबकी जा चुकी है

22 सितंबर 11
पी. चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते हुए अफवाहों के बाजार में ऐसी चर्चा रहती थी कि उनका बेटा एक ऐसी कंपनी चलाता है जो कि शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान मोटी कमाई करती है। और वित्त मंत्री के रूप में शेयर बाजार में ऐसे उतार-चढ़ाव पैदा करना किसी के लिए भी एक मामूली बात हो सकती है। लेकिन यह बात सिर्फ अफवाहों तक रही और चिदंबरम किसी बड़े दाग से बचे रहे। लेकिन कल उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी ने जो दस्तावेज पेश किए उसमें वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन में किस-किस मंत्री की क्या भूमिका रही इसके बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे गए एक पत्र की कॉपी भी है जिसमें पिछले वित्त मंत्री चिदंबरम की भूमिका गहरे शक से घिर जाती है। जब यूपीए के गठबंधन में डीएमके के मंत्री राजा लंबा भ्रष्टाचार करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आबंटन  में देश को लाख-दो लाख करोड़ का चूना लगा रहे थे तब वित्त मंत्री से जितनी दखल की उम्मीद की जाती थी उतनी उम्मीद उन्होंने नहीं की और चुप रहकर इस भ्रष्टाचार को देखते रहे। प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से गए तथ्य-पत्र में यह बात खुलकर उजागर हुई है और सूचना के अधिकार के तहत प्रधानमंत्री कार्यालय से निकाले गए इस पत्र का चिदंबरम के खिलाफ एक धमाकेदार इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के भीतर और बाहर दोनों जगह कल हुआ है।
पी. चिदंबरम सरकार और राजनीति से परे सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील हैं और उनकी बीवी अभी भी वकालत करती हैं। इसलिए नाजुक और जटिल मामलों पर उनकी कानूनी समझ को कम नहीं आंका जा सकता। वे सीधे जनता की अदालत से आए हुए सांसद से मंत्री बने हुए नेता नहीं हैं और वे देश के सौ-पचास सबसे बड़े वकीलों में से एक होंगे। इसलिए उनकी समझ को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता। जब देश में तरह-तरह के भ्रष्टाचार को लेकर रोज ही मामले उस समय भी उठ रहे थे तब चिदंबरम ने सरकार की संभावित कमाई को नाली में बहा देने जैसे दिख रहे 2जी फैसले को क्यों चुप रहकर हो जाने दिया यह हैरानी की बात है। एक वित्त मंत्री के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी थी कि वे गठबंधन के तमिल साथी के बजाय देश की जनता के खजाने का अधिक ख्याल रखते।
लेकिन यहां पर एक दूसरी बात भी सामने आती है। जब यह पूरा मामला प्रधानमंत्री के दफ्तर तक पहुंच गया था तो उसके बाद प्रधानमंत्री ने उस पर क्या किया? यह पूरा सिलसिला एक निहायत भ्रष्ट मंत्री की साजिश के जानकारी में आ जाने के बाद वित्त मंत्री द्वारा अनदेखा करने, प्रधानमंत्री द्वारा अनदेखा करने का मामला है और हम इसे किसी भी तरह प्रधानमंत्री की लापरवाही, भागीदारी, हिस्सेदारी को जिम्मेदार ठहराने से कम का मामला नहीं मान सकते। पाठकों को ध्यान होगा कि हम पिछले महीनों में बहुत बार यह बात लिख चुके हैं कि मंत्रिमंडल के मुखिया को मंत्रिमंडल के अपराधों की जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता और मनमोहन सिंह पर इस साजिश में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल होने या रहने को लेकर मुकदमा चलाना चाहिए। अब प्रणब मुखर्जी की जैसी भूमिका सामने आई है, उस पर उनके पास अगर कोई ठोस जवाब न हो, इस सुबूत को काटने के सुबूत न हों तो उन्हें भी इस साजिश में भागीदार मानकर अदालत में उन्हें पेश करना चाहिए। प्राकृतिक न्याय की मांग यह रहती है कि ऊपर बैठे लोग अपने-आपको संदेह से परे रखें। जब राज चलते थे तो यह बात राजाओं पर लागू होती थी कि सीजर की बीवी को शक से ऊपर रहना चाहिए, और अब जब लोकतंत्र है तो ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों को मामूली अपराधी की तरह अदालती कटघरे में संदेह का लाभ तलाशने के बजाय अपने-आपको एक पारदर्शी जांच के लिए पेश करना चाहिए। ऐसा न करके यूपीए और कांगे्रस के मंत्री इस पूरे गठबंधन को अगले चुनाव की संभावनाओं से दूर तो कर ही रहे हैं, देश के साथ बहुत बड़ी गद्दारी भी कर रहे हैं। हम राजनीति की, इस लोकतंत्र में चुनाव के अलग-अलग पहलुओं की बारीकियों पर जाने के बजाय जब एक नजर में आज देश की सरकार को देखते हैं तो यह साफ लगता है कि पिछले आम चुनाव में उसे पांच बरस राज करने का जो हक मिला था आज वह उस हक को पूरी तरह खो चुकी है। खुद प्रधानमंत्री बनने के बजाय उस वक्त काबिल और ईमानदार समझे जाने वाले मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर सोनिया गांधी ने अपने उस 'त्यागÓ के लिए जो वाहवाही पाई थी, वह वाहवाही भी अब सोनिया गांधी के नाम के साथ किसी को याद भी नहीं पड़ती। जो मनमोहन सिंह एक वक्त ईमानदार समझे जाते थे वे आज एक अपराधी मंत्रिमंडल के सरदार की तरह दिख रहे हैं, जिनके घर दौलत का कोई हिस्सा पहुंचा हो या न पहुंचा हो इससे इस लुटे हुए देश की लुटी हुई जनता का कोई वास्ता न है न रहने की कोई जरूरत है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इन दोनों की अगुवाई में पिछले बरसों में इस सरकार ने जितने किस्म की लूटपाट की है, उससे उसके चले जाने की नौबत कबकी जा चुकी है। आज कानून किसी सरकार को कितने भी अपराधों के बाद हटाने का नहीं है इसलिए ये सब देश को और लूट लेने की गुंजाइश वाली जगहों पर जमे हुए हैं, लेकिन कब तक?

छोटी सी बात

21 सितंबर
किसी टीवी चैनल पर अगर एक-दिन में दो-तीन बार आप वही खबरें सुनते हैं, तो उसका मतलब है कि आप वक्त बहुत बर्बाद कर रहे हैं।

मुर्गीखाने के दाने गिनने की तरह का गरीबी का पैमाना

21 सितंबर 11
योजना आयोग ने भारत में गरीबी का पैमाना तय करते हुए जब यह कहा कि गांव के गरीब वे हैं जिनका हर दिन का खर्च पचीस रूपए से कम है और शहर के गरीब वे हैं जिनका हर दिन का खर्च बत्तीस रूपए से कम है तो इससे बहुत से लोगों को एक झटका लगा। सरकार पिछली चौथाई सदी में धीरे-धीरे अपना हाथ बिजली और पानी की रियायतों से खींच रही है, डीजल पर से रियायत कम या खत्म सी हो गई है, सड़कों के निजीकरण से गरीबों की बस महंगी हो गई है, खाने के सामानों में चूल्हे पर चढऩे से पहले ही बाजार में आग लगी हुई है, और गरीब-बीमार के लिए इलाज नामुमकिन सा काम हो गया है, जब तक कि वे कुछ कर्ज न जुटा पाएं। ऐसे में सरकार का यह पैमाना एक सदमा पहुंचाता है। हम अभी दो-चार दिनों के भीतर ही यह बात लिख चुके हैं कि गरीबी को लेकर एक बड़ा सदमा इसलिए भी लगता है कि इन गरीबों के लिए सरकार चलाने वाले लोग लगातार डकैती करके अमीर हुए जा रहे हैं। और इसमें कांगे्रस और भाजपा के बीच किसी किस्म का कोई मतभेद नहीं है। एक तरफ कलमाड़ी और राजा जैसे कांगे्रस-यूपीए के लोग हैं तो दूसरी तरफ बेल्लारी के भाजपा मंत्री रहे रेड्डी हैं जिनके बारे में आज यह रिपोर्ट आई है कि वे कर्नाटक के भाजपा राज के मुख्यमंत्री से भी अधिक ताकतवर मंत्री रहते हुए दूसरे खदान मालिकों से एक हजार करोड़ रूपए रंगदारी टैक्स में वसूल कर चुके थे। सीबीआई इन आंकड़ों को अदालत में पता नहीं कितना साबित कर पाएगी लेकिन जनता को इस बात का पूरा भरोसा है कि ये आंकड़े असली डकैती का एक बहुत छोटा हिस्सा है।
ऐसे देश में जहां पर कि नेताओं और अफसरों की कमाई आसमान छू रही है वहां पर गरीब के पेट से झांकती पसलियों का गुजारा जब पचीस रूपए रोज पर तय किया जाता है तो आम जनता को नक्सली हिंसा किस्म के तमाम आतंक जायज लगने लगते हैं और शायद जरूरी लगने लगते हैं कि ये शहरों में अब तक क्यों शुरू नहीं हो रहे? गरीबी के पैमाने तय करने वाले योजना आयोग की सोच एक पश्चिमी उदारवादी अर्थव्यवस्था की सोच है और इसीलिए इसके कार्यकारी मुखिया मोंतेक सिंह अहलूवालिया का नाम अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुखिया की कुर्सी के लिए भी कुछ समय पहले छिड़ा था। गरीबों के लिए हमदर्दी के बिना जब एक उदार अर्थव्यवस्था लोगों को आर्थिक  एकाधिकार का साम्राज्य खड़ा करने का माहौल बनाते चलती है तो उसे गरीब की जिंदगी की लागत पचीस रूपए रोज दिखने में कोई हैरानी नहीं है। और यह लागत शायद उस वक्त काम आ भी जाए जब देश के हर गरीब को सांसदों को संसद के आलीशान रेस्त्रां में मिलने वाले रेट पर खाना मिलने लगे, उनके भाड़े के रेट पर मकान मिलने लगे, उनकी तरह मुफ्त का फोन और सफर मिलने लगे, तो जरूर पचीस रूपए रोज में काम चल सकता है। देश की संसद में जिस तरह खरबपति, अरबपति और करोड़पति भर गए हैं, कोई हैरानी नहीं कि उन्हें पचीस रूपए में गुजर सकने वाले दिन का कोई अंदाज न हो। यही हाल अफसरों का है जिनमें से ईमानदार को भी अब लाख रूपए महीने तक की तनख्वाह मिलने लगी है, तो अब पचीस रूपए का अंदाज आखिर लग किसे सकता है?
यह एक बहुत शर्मनाक हाल है और यह इस देश के माथे से गरीबी और गरीबों के आंकड़ों को पोंछ देने की एक साजिश है। इंदिरा गांधी के वक्त भी जब गरीबी हटाओ का नारा चलता था तो लोगों का अनुभव यह था कि वह गरीबों को हटाने का नारा है और उसका सबसे काला चेहरा आपातकाल में सामने आया था जब राह चलते गरीबों को उठाकर उनकी नसबंदी की गई थी और तुर्कमान गेट जैसे इलाकों से गरीबों को बुलडोजरों और गोलियों से हटाया गया था। आजादी के बाद करीब आधी सदी से अधिक का राज इसी कांगे्रस सरकार का या उसकी अगुवाई का रहा है। आज भी अगर वह पचीस रूपए रोज पर एक जिंदगी के गुजर जाने को एक पैमाना मान रही है तो इसके कम से कम कुछ नेता तो एक दिन इस रकम में गुजारकर देखें। राजनीति और सरकार को हांकने वाले लोग इस कदर भ्रष्ट और संपन्न हो चुके हैं कि उन्हें हिंदुस्तानी गरीबी की हकीकत का कोई अहसास नहीं रह गया है। वे गरीब के खाने और जीने को उसी तरह तौल रहे हैं जिस तरह तौलकर किसी मुर्गीखाने में कतार में खड़ी मुर्गियों को दाना दिया जाता है। हिंदुस्तानी गरीब से उसी तरह मर जाने की भी उम्मीद की जाती है जिस तरह मुर्गीखाने की मुर्गियों का मरना तय रहता है। आजादी के बाद पचास बरस में अपने नेताओं की दौलत को हजारों गुना बढ़ा लेने वाली कांगे्रस पार्टी में अगर सौ-दो सौ बरस बाद कोई संवेदनशील नेता आएगा तो वह उस वक्त के इतिहास में दर्ज आज के इस वक्त के अपने इन आंकड़ों को लेकर देश से माफी मांगेगा। लेकिन फिलहाल हिंदुस्तानी गरीब कटने के पहले दाने के सामने खड़े हुए मुर्गे की तरह जीता रहे।

छोटी सी बात

20 सितंबर
किसी से फोन पर लंबी बात छेडऩे के पहले पूछ लें कि अभी बात करने की उनको सुविधा है या नहीं। किसी के व्यस्त समय में, परेशानी के बीच अगर आप कोई कम जरूरी या लंबी चर्चा छोड़ देंगे, तो कड़वाहट ही होगी।

मोदी के मुकाबले की कुछ शर्तें

20 सितंबर 11
गुजरात में भाजपा से बड़े भाजपा के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन दिनों का उपवास भाजपा और एनडीए के लिए चाहे जैसी परेशानी खड़ी करे, इससे देश के मीडिया को चार दिनों का एक तमाशा मिल गया और अगर भूकंप की खबरों को लेना मजबूरी नहीं होता तो मोदी-पुराण कुछ और दिनों तक चलती। दरअसल नरेंद्र मोदी का कद किसी को रावण के पुतले की तरह ऊंचा लग सकता है और किसी को अयोध्या में आस्था की बुनियाद पर बनाने की जिद की तरह ऊंचा, लेकिन उनका कद खबरों के लिहाज से और भाजपा के भीतर की राजनीतिक के लिहाज से किसी भी दूसरे भाजपाई से ऊंचा है। हम यहां पर दूसरी पार्टियों के नेताओं से उनकी तुलना इसलिए करना नहीं चाहते क्योंकि अभी मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में पांव रखने के पहले अपनी पार्टी की एक मंजूरी तो लगेगी ही, और उनकी पार्टी को एनडीए के भीतर तब तक एक सहमति लगेगी जब तक वह राममंदिर के मुद्दे को लेकर अकेले आगे बढऩा तय नहीं कर लेगी। सिर्फ उसी हालत में वह एनडीए के भागीदारों की हेठी करके मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर सकती है, हालांकि उससे भाजपा के बहुत से दूसरे नेताओं के सपने चूर-चूर हो जाएंगे जो कि दिल्ली की राजनीति करते हुए दशकों से यह सपना पाले हुए हैं। एक दिन प्रधानमंत्री के पद पर दावेदारी का उनका भी आएगा।
लेकिन आज की बातचीत भाजपा को लेकर नहीं है और शायद अकेले मोदी को लेकर भी नहीं है। यह समझने की जरूरत है कि संघ परिवार के कई बड़े संगठनों के साथ हिकारत का रिश्ता पाले हुए भी नरेंद्र मोदी किस तरह गुजरात में हिंदुओं के सबसे बड़े नेता तो बने हुए हैं ही, वे एक कामयाब कारोबारी राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में दुबारा चुनाव जीतकर आने वाले नेता भी साबित हो चुके हैं। ऐसे में जब कांगे्रस पार्टी के एक बहुत ही कमजोर साख वाले नेता शंकर सिंह वाघेला मोदी के सद्भावना-मिशन नाम के इस उपवास के जवाब में एक उपवास को लेकर एक अलग शामियाने में बैठ गए, तो वे मजाक का सामान बन गए। दरअसल मुख्यमंत्री की कुर्सी बरसों तक संभालने के बाद किसी बड़े घोटाले में नाम फंसे बिना, राज्य में आमतौर पर भ्रष्टाचार की शिकायतों के बिना, खासे कामयाब आर्थिक विकास वाले तो नरेंद्र मोदी भाजपा के इतने बड़े मुख्यमंत्री हैं कि उनके मुकाबले ऐसी खूबियों के साथ कांगे्रस किसी को जवाबी मोर्चे पर पेश कर नहीं सकती थी। हजारों मुसलमानों के कत्ल के साम्प्रदायिक इतिहास वाले मोदी-राज के बावजूद अगर उस राज्य में देश-विदेश से लोग पूंजी-निवेश के लिए पहुंच रहे हैं और मशालों और त्रिशूलों की नोंक पर अगर 2002 से अब तक राज्य में साम्प्रदायिक अमन-चैन कायम रखने में मोदी कामयाब रहे हैं तो बहुत से लोग 2002 को भूलकर आगे बढऩे के हिमायती हैं। ऐसे में मोदी का राष्ट्रीय स्तर पर सामना करने की बात तो आगे की है, आज गुजरात में मोदी का मुकाबला करने के लिए न संघ परिवार के भीतर कोई है, न भाजपा के भीतर कोई है, और न ही गुजरात में विपक्षी कांगे्रस के पास कोई है। महाराष्ट्र में शिवसेना के मुखिया बाल ठाकरे ने चाहे मोदी के खिलाफ गोल-मोल शब्दों में इतना ही लिखा हो कि मोदी आगे-आगे हैं और भाजपा उनके पीछे-पीछे, यह बात फिलहाल तो ठीक ही लगती है।
हम यहां पर देश की जनता के एक बड़े हिस्से, ऐसे बड़े हिस्से जिसने कि 2002 के दंगों में कुछ खोया नहीं है, उस हिस्से की सोच का अंदाज लगाना चाहते हैं जिसे लगता है कि मोदी को देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए। उनकी सोच के तर्क अगर देखें तो यह साफ है कि मोदी की निजी आर्थिक-ईमानदारी की छवि उनके काम आ रही है और उनके राज्य के आर्थिक विकास, बहुत कम भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड भी उनके काम आ रहा है। इन दो बातों का साम्प्रदायिकता से परे भी मुमकिन होना नामुमकिन नहीं है। क्यों कोई धर्मनिरपेक्ष या साम्प्रदायिकता-विरोधी मुख्यमंत्री या मंत्री ईमानदार नहीं हो सकते? क्यों वे कोई एक कामयाब सरकार नहीं चला सकते, क्यों अपने मंत्रालय, विभाग या प्रदेश को भ्रष्टाचार से परे नहीं रख सकते? एनडीए के भीतर ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी की साम्प्रदायिकता के भयानक खिलाफ रहते हुए भी अपने राज्य को ईमानदारी के साथ विकास की तरफ ले जा रहे हैं। और यह भी याद रखने की जरूरत है कि उन्हें लालू-राज के पन्द्रह बरसों में खंडहर हो चुका राज मिला था। लेकिन हम फिर मोदी को छोड़ नीतीश कुमार में उलझना नहीं चाहते। आज हमारा सवाल कांगे्रस पार्टी से यह है कि वह क्यों अपनी और अपने नेताओं की लकीरों को लंबा नहीं कर पाती? वह कब तक धर्मनिरपेक्षता को भुनाने के लिए साम्प्रदायिकता-विरोध को काफी बड़ा हथियार माना जाएगा? चूंकि मोदी के आगे बढऩे की एक चर्चा है इसलिए कांगे्रस को यह याद दिलाने की आज जरूरत है कि उसकी मौजूदा लकीरें मोदी की लकीरों से बड़ी नहीं हो पाएंगी और ठोस काम का जवाब ठोस काम से ही हो सकता है, ईमानदारी का मुकाबला ईमानदारी से ही हो सकता है।

छोटी सी बात



19 सितंबर
बिना समय लिए किसी भी व्यस्त व्यक्ति के घर-दफ्तर न जाएं। उनके काम के वक्त आपकी गप्पें मारने की नीयत संबंध खराब कर सकती है। फोन अब आसान हैं, बात करके जाएं, यह साफ कर दें कि कितने देर के लिए आप आना चाहते हैं। किसी जगह जरूरत से अधिक रूककर आप अपनी बेइज्जती ही करवाते हैं।

दान से लेकर मदद तक की तैयारी करने की जरूरत

19 सितंबर 11
देश के कई हिस्सों से बाढ़ का पानी उतरा नहीं था कि कई राज्यों में भूकंप से तबाही हुई। हालांकि पिछले कुछ महीनों में जापान से लेकर अमरीका तक कुदरत की जैसी मार इंसानों पर पड़ी है उसके मुकाबले भारत का अभी का नुकसान कुछ कम है लेकिन इस मौके पर इस देश में दो बातों पर सोचना जरूरी है। एक तो यह कि  ऐसे मौके पर बचाव के लिए लोगों और सार्वजनिक सुविधाओं, निजी क्षमता का कैसे इस्तेमाल हो सकता है और पल भर में इसकी जानकारी के लिए किस तरह की तैयारी सरकार के स्तर पर करनी चाहिए। दूसरी बात यह कि इस देश में धर्म और आध्यात्म के नाम पर जिस तरह से लोगों की जेब से पैसा निकलता है, वह मुसीबत के वक्त गरीबों और घायलों के लिए भी निकलना चाहिए। ईसाई धर्म प्रचारकों और चर्च से नफरत करने वाले लोग भी यह मानते हैं कि भारत के सबसे पिछड़े हुए आदिवासी इलाकों में अगर इलाज और पढ़ाई का ढांचा खड़ा हो पाया तो वह सिर्फ अंगे्रजों के राज में चर्च के मार्फत हो पाया। और चर्च को यह पैसा भारत के ईसाईयों से नहीं मिला, बल्कि दुनिया के उन देशों से यह पैसा आया जहां लोगों को दान देने की एक आदत है। भारत में देखें तो हिंदू या जैन मठ-मंदिरों का पैसा बहुत ही कम समाज के काम आता है। धर्म के अपने ही लोगों के धार्मिक कामकाज पर अगर खर्च होता है तो उससे समाज का क्या फायदा? एक प्रतिमा के ऊपर अगर सौ किलो सोना चढ़ाया जाता है और वह सलाखों में कैद पड़े रहता है तो उससे किसका भला होता है? अभी सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला चल ही रहा है कि किस तरह केरल के एक मंदिर के ट्रस्टी उस मंदिर के खजाने के कमरों को खोलने तक देने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारे हिसाब से किसी ईश्वर को दौलत पर बिठाकर रखना आमतौर पर ईश्वर के नाम से जुड़ी हुई नसीहतों का बहुत बुरा अपमान है। जब तक इस दुनिया के दुख-तकलीफ को दूर करने के लिए ऐसी दौलत का इस्तेमाल न हो, तब तक, अगर कहीं कोई ईश्वर है तो, और अगर वह सुख-दुख को समझता है, तो वह ऐसी किसी दौलत पर चैन से सो नहीं सकता जो कि लाखों जिंदगियों को बचाने के काम आ सकती है।
हिंदुस्तान जैसे बड़े देश में हर बरस बहुत सी प्राकृतिक विपदाएं आती ही रहती हैं और कई दूसरे किस्म के हादसे भी होते हैं जिनमें सरकार की मदद मुसीबत के मारे लोगों के लिए काफी नहीं होती। ऐसे में यहां के लोगों की यह सभी किस्म की जिम्मेदारी है कि वे भरोसेमंद समाजसेवी ट्रस्ट पहचानकर उनके मार्फत लोगों की मदद का काम करें। हम कुछ बरस पहले तक प्रधानमंत्री राहत कोष की सिफारिश करते थे लेकिन पिछले दो-तीन बरसों में प्रधानमंत्री की नजरों के नीचे इस देश को जिस तरह से लूटा गया है उसके बाद अब हम यह नहीं चाहते कि लोगों का दिया गया दान भी कलमाडिय़ों के पेट में जाए। इसलिए लोग सीधे-सीधे मदद करें, अपने खुद के भरोसेमंद संगठन खड़े करें या मदद का कोई और रास्ता देखें। लेकिन अपनी न्यूनतम जरूरत से अधिक कमाने वाले लोग अगर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेने के बाद बची कमाई का एक हिस्सा तय करके सबसे गरीबों को नहीं देते तो वे इंसान के रूप में इस धरती पर भी रहने के हकदार नहीं हैं, और यह उनका ईश्वर तय करे कि वे उसके मंदिर-मस्जिद में जाने लायक हैं या नहीं।
दूसरी बात यह कि समाज के लोगों की मदद करने की क्षमता का इस्तेमाल सरकार अगर ऐसे मौकों पर नहीं कर पाती तो हम इसे एक बहुत बड़ी नाकामयाबी मानेंगे। राहत के लिए, बचाव और मदद के लिए अगर स्वयंसेवकों को पहले से लिस्ट बनाकर तैयार करके रखा जाए, उनके हुनर, उनकी क्षमता, उनके साधन की लिस्ट बनाकर उसे तुरंत इस्तेमाल में लगाने की योजना बनाई जाए तो बहुत सी जिंदगियां बच सकती हैं। आज भारत में जहां आबादी है वहां पर औसतन हर चार-छह लोगों के बीच एक टेलीफोन है। ऐसे में पल भर में लोगों तक पहुंचा जा सकता है और ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो उत्साह के साथ थोड़ी बहुत मेहनत करें, खून देने को तैयार हो जाएं, अपनी गाड़ी में कुछ लोगों को अस्पताल तक ढो लें, कुछ लोगों को खाना खिला दें, कुछ के लिए दवाईयां खरीद दें।
आपदा प्रबंधन के लिए हम पहले भी कुछ बार यह सुझा चुके हैं कि हर प्रदेश, जिले और शहर के स्तर पर एम्बुलेंस, अस्पताल, बुलडोजर, क्रेन से लेकर बाकी तमाम साधन और सुविधाओं को नक्शे पर दर्ज करके रखना चाहिए और उनसे जुड़े तमाम लोगों के नंबर-पते रखना चाहिए ताकि तुरंत उन्हें बुलाया जा सके बजाय इसके कि जब आग लगी हो तब कुआं खोदने के लिए कुदाली की दूकान का पता ढूंढा जाए। अब तक ऐसी किसी योजना के बारे में हमें पता नहीं लगा है और अगर जनता की भागीदारी, सार्वजनिक और निजी ढांचे की भागीदारी ऐसी किसी योजना में हुई होती तो वह हमें सुनाई तो पड़ी ही होती। विचार का यह कॉलम बहुत अधिक तकनीकी बातों को लिखने का नहीं होता, लेकिन ऐसी तैयारी के बारे में चर्चा होनी चाहिए।

कफन चीरकर आने वाले इंटरव्यू

19 सितंबर 2011
सुनील कुमार
भारत के अमरीका में सबसे करीबी दोस्त समझे जाने वाले, नेहरू के वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की पत्नी जैकलीन ने अपने एक लंबे इंटरव्यू में  देश और दुनिया की बहुत सी बातों पर अपनी राय रखी थी और अपने गुजर जाने के बाद इसे उजागर करने की शर्त रखी थी। कैनेडी की हत्या के बाद जैकी ने दुनिया के एक सबसे रईस जहाज मालिक ओनासिस से शादी की थी और अपने वक्त की एक सबसे खूबसूरत और आकर्षक मानी जाने वाली इस महिला की तस्वीरें पश्चिम दुनिया को हमेशा ही खींचती रहीं।
भारत में सबसे बड़ी खबर इस इंटरव्यू को लेकर तब बनी जब उसके ऐसे हिस्से सामने आए जिनमें जैकी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ बहुत सी कड़वी बातें कहीं। जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री निवास में मेजबान की तरह इंदिरा सभी देशी-विदेशी मेहमानों से मिलती थीं, और नेहरू के पसंदीदा दोस्त कैनेडी के परिवार से उनका अच्छा मिलना-जुलना हुआ था।
जैकलीन कैनेडी: लाइफ विद जॉन एफ कैनेडी शीर्षक से इस बातचीत में जैकलीन कैनेडी उस समय भारत की प्रधानमंत्री बनने वाली इंदिरा गांधी के बारे में कहती हैं, 'भारत की होने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक सूखी, कड़वी, बहुत महत्वाकांक्षी और भयंकर महिला थीं।Ó
जहां तक याद पड़ता है, जैकलीन राष्ट्रपति की पत्नी भर थीं और उनका अपना कोई काम नहीं था। इसलिए उनकी समझ और उनकी बातों का वजन इन दोनों की एक सीमा रही होगी। लेकिन अभी जब यह बात निकली है तो कई दूसरी बातें भी इस किस्म की याद पड़ती हैं। बहुत बरस हुए जब आजादी के पहले के एक बड़े भारतीय नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद का लिखा हुआ खबरों में आया। उन पर लिखी गई एक किताब को अपनी सहमति देते हुए भी उसके करीब तीस पेजों को रोकने की शर्त लगाई थी जो कि कुछ घटनाओं के बारे में थे और कुछ निजी बातों और विचारों के थे। उन्होंने यह कहा था कि ये पन्ने भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में सीलबंद रख दिए जाएं और उनकी मौत के तीस बरस बाद उन्हें खोला जाए। यह किताब प्रोफेसर हुमायूं कबीर ने लिखी थी जो कि अपने वक्त के जाने-माने शिक्षाविद् थे। इसके बाद की कहानी बहुत लंबी है जिसे यहां पर लिखने से बात एक दूसरी तरफ मुड़ जाएगी, लेकिन इस चर्चा का मकसद यह है कि अपने वक्त के इतिहास को अपनी नजर से लिखना एक बहुत गंभीर काम होना चाहिए न कि लापरवाही से कही गई बातों का पुलिंदा।
मैं इस बात का हिमायती रहा हूं कि महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तमाम लोगों को देश और दुनिया के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए अपने काम और अपने दायरे में होने वाले घटनाओं को दर्ज करके जाना चाहिए। इस बात को पहले कई बार मैंने अपने कॉलम में लिखा है, लेकिन जैकलीन कैनेडी या ओनासिस, ने इंदिरा गांधी के बारे में जो कड़वी बातें कही हैं उनके पीछे के तर्क इस इंटरव्यू में नहीं हैं। मतलब यह कि किसी की तारीफ या आलोचना के विशेषण बिना किसी संदर्भ के, बिना किसी आधार के इस्तेमाल कर लिए गए। इनसे अखबारों की सुर्खियां तो बनती हैं, लेकिन इनसे इतिहास नहीं बन पाता।
और इतिहास से परे एक दूसरी बात भी। एक-दूसरे के बारे में जो अच्छी या बुरी बातें लोग अपने मन में पालकर रखते हैं, उनमें से कितनी बातों को जानने, और जानते हुए उनके साथ जीने की ताकत लोगों में रहती है? आज जब विकीलीक्स से रिस-रिसकर लाखों दस्तावेज हर कुछ महीनों में सामने आ रहे हैं, जिनमें अमरीकी सरकार के लोगों की दुनिया भर के देशों और लोगों के बारे में, घटनाओं के बारे में राय सामने आ रही है तो बहुत से देश और लोग बेचैन हो रहे हैं। अमरीकी अफसरों की लिखी बातों को चरित्र प्रमाणपत्र की तरह लोग और सरकारें अपने प्रचार के लिए और विरोधियों पर हमला करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
जिस तरह से भूकंप में जमीन के नीचे धरती की प्लेट्स खिसकती हैं, उसी तरह ऐसी पुरानी बातों के, गोपनीय या खुफिया बातों के सामने आने से लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा डांवाडोल होता है, और मेरे जैसे एक साधारण अखबारनवीस को यह लगता है कि अगली बार जब अमरीकी दूतावास से लोग मिलने के लिए आएंगे तो उनसे किस भरोसे से भरोसे की कोई बात की जा सकेगी?
यह समझने की जरूरत है कि इंसान और दुनिया का सारा मिजाज, और उसके काम के तौर-तरीके कुछ बातों को जानकर करने और कुछ बातों को न जानते हुए करने के हिसाब से बने हुए हैं। और यह इंतजाम कुदरत ने किया हुआ है, मिजाज से परे, तौर-तरीकों से परे इंसान के बदन का हिसाब-किताब भी कुदरत ने ऐसा ही बनाया है।
बदन के बारे में जरा ध्यान से सोचें तो इसके जिस-जिस हिस्से की हमें जरूरत होती है, दिमाग उसी हिस्से का, जरूरत की हद तक उस पल इस्तेमाल करता है। पूरा शरीर एक साथ हजारों चीजों को देख, सुन, सूंघ, छू सकता है और अगर यह पूरी की पूरी जानकारी दिमाग तक बेरोक-टोक जाती रहे तो दुनिया का यह सबसे तेज कम्प्यूटर भी जवाब दे जाएगा। इसलिए इंतजाम यह है कि जिस वक्त तन और मन को जिस बात की जरूरत रहती है सिर्फ उसी से जुड़ी बातें शरीर के बाकी हिस्से से दिमाग तक जाती हैं। बाकी तमाम संवेदनाएं दिमाग के नीचे ही कहीं थम जाती हैं।
इसलिए किसके बारे में कौन क्या कह रहा है यह पूरे समय अगर लोग जानते रहेंगे तो जीना मुश्किल हो जाएगा। जिन लोगों के आपस में बहुत अच्छे रिश्ते रहते हैं उन्हें भी अगर एक-दूसरे की कही बातें मालूम होती रहें, तो वे रिश्ते पल भर में हवा हो जाएंगे। इसकी ताजा मिसाल सब कुछ बहुत आसानी से बता देती है क्योंकि अच्छे पारिवारिक रिश्तों के बाद भी अगर कोई इतनी कड़वी बात कहती है तो आलोचना के शिकार इंसान के परिवार को आज भी वह बात खटक सकती है। क्या कोई यह सोच सकता है कि राहुल गांधी के खिलाफ बातें लिखने वाले अमरीकी अफसरों की राय उजागर हो जाने के बाद भी कांगे्रस की सरकार अमरीका की सरकार से बिना किसी कड़वाहट के बात कर पाएगी?
इसलिए अखबारी या साधारण इंटरव्यू में कई बार लापरवाही और गैरजिम्मेदारी से कही गई बातों को हम इतिहास लेखन का दर्जा नहीं दे सकते और न ही बेबुनियाद बातों को अधिक महत्व दिया जा सकता है। अपनी जिंदगी, अपने काम और अपने दायरे के बारे में लोगों की लिखी गई बातें, उनके इंटरव्यू के मुकाबले आमतौर पर अधिक गंभीर रहने की उम्मीद की जाती है और वैसी बातें समकालीन इतिहास लेखन की तरह होती हैं जिनमें लिखने वाले के अपने अनुभव इतिहास के एक पहलू के एक व्यक्ति के अनुभवों की तरह ही दर्ज होते हैं।
मैं भविष्यवाणियों के भी खिलाफ हूं क्योंकि उनसे लोगों के मन में उनके आने वाले दिनों के बारे में एक ऐसा पूर्वाग्रह बैठ जाता है जो कि उनके आज के फैसलों को कम या अधिक हद तक प्रभावित करता है। इसी तरह लोगों की गैरजरूरी राय भी दूसरे लोगों के दिल-दिमाग को नुकसान पहुंचा सकती है। और यह बात सिर्फ बड़े-बड़े चर्चित लोगों के बारे में नहीं रहती, बहुत साधारण लोगों पर भी उसी हद तक लागू होती है और पूरे का पूरा सच न तो बर्दाश्त के लायक होता और न ही पूरे के पूरे सच की जिंदगी में जरूरत होती। फौज में एक नियम सब जगह लागू होता है, नीड टू नो, नीड टू टेल। जितनी जरूरत हो उतना ही जानों और जितनी जरूरत हो उतना ही बताओ। विकीलीक्स से दुनिया का कितना भला हो रहा है या कितना बुरा इसके बारे में मैं इतने महीनों में भी अपनी राय नहीं बना पाया हूं, और फिर ऐसे पुराने-पुराने इंटरव्यू कफन चीरकर सामने आ रहे हैं।

छोटी सी बात


18 सितंबर
गर्मियों में ठंडे और सर्दियों में गर्म पानी से नहाते ही चले जाने का जी चाहता है। ऐसे में पानी की फिजूलखर्ची से बचें। गर्म पानी में तो दोहरी बर्बादी होती है, पानी की भी, गर्म करने की भी।

बाहुबल से उपजी बददिमागी

18 सितंबर 2011
गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सद्भावना मिशन के नाम से तीन दिन का सरकारी उपवास शुरू करके और बातों के साथ-साथ इतना तो साबित कर ही रहे हैं कि सत्ता पर काबिज इंसान कुछ भी कर सकते हैं। जिसे गुजरात में सत्ता के इशारे पर हजारों बेकसूर मुसलमानों को मार डाले जाने पर अफसोस भी गैरजरूरी लगता हो वह अब उपवास पर बैठा है। लेकिन सत्ता और भी कई किस्मों की बददिमागी करवाती है। हम इसकी मिसालें देखते हैं तो लगता है कि क्या कुर्सी पर बैठे हुए लोगों को यह अहसास ही नहीं रह जाता कि इस पर वे पूरी जिंदगी के लिए नहीं बैठे हैं? और यह बात हम दुनिया के तानाशाहों को लेकर नहीं कर रहे, लोकतांत्रिक संविधान के तहत  कुल पांच बरस के लिए चुनाव जीतकर आने वाले लोगों के बारे में कह रहे हैं।
कुछ ही वक्त पहले ऐसी खबर आई थी कि उत्तरप्रदेश की दलित-महिला मुख्यमंत्री मायावती के सैंडिल लाने के लिए विशेष विमान लखनऊ से मुंबई भेजा गया था। यह बात अमरीकी कूटनीतिज्ञों ने दिल्ली से अमरीका भेजे गए अपने गोपनीय संदेश में लिखी थी। इस बात में कितना सच है इसको परखे बिना लोग इस पर भरोसा करने को मजबूर इसलिए हैं क्योंकि एक दलित की इस बेटी ने अपने बुत खड़े करने के लिए सरकार के सैकड़ों करोड़ रूपए झोंक दिए। ऐसी ही बददिमागी इसी उत्तरप्रदेश में समाजवादी-लोहियावादी, अपने-आपको पिछड़े वर्ग का गांव का किसान कहने वाले मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री रहते हुए दिखाई थी जब उन्होंने अपने गांव में ऐसी हवाई पट्टी बनवाई थी जिस पर कि कोई बड़ा विमान भी उतर सके। ऐसी ही बददिमागी कुनबापरस्ती के मामले में, भ्रष्टाचार के मामले में लालू यादव ने बिहार में पन्द्रह बरस तक दिखाई और लालू या बिहार, इनमें से किसने अधिक खोया यह अंदाज लगाना आज भी मुश्किल है। ऐसी ही बददिमागी कर्नाटक में भाजपा के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने दिखाई जिन्होंने खुला भ्रष्टाचार किया और लोकायुक्त रिपोर्ट के मुताबिक सोलह हजार करोड़ रूपए की चोरी भी उनके कार्यकाल के साथ, उनके मंत्रियों के नाम जुड़ी। ऐसी ही बददिमागी महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख या अशोक चव्हाण ने दिखाई, जिनके नाम आदर्श सोसायटी घोटाला जैसे मामलों से जुड़े और कांगे्रस की यह मजबूरी हो गई थी कि इन्हें बदला जाए। झारखंड में तो रिश्वत, भ्रष्टाचार, दलबदल, सत्तापलट, ऐसे तमाम कामों के लिए बहुत से नेताओं और पार्टियों ने ऐसी बददिमागी दिखाई कि जनता के सामने उन्हें कभी दुबारा जाना ही न हो।
लेकिन राजनीति से जरा हटकर बात करें तो पिछले महीनों में अन्ना हजारे और उनके साथियों ने जो बददिमागी दिखाई उसने सत्ता की बददिमागी को भी मात कर दिया और यह साबित किया कि ताकत कहीं भी हो उसका मिजाज सिर चढ़ जाने का होता है। हम मुंबई में मुकेश अंबानी के निजी मकान की आसमान छूती इमारत को याद करते हैं जिससे लेकर रतन टाटा ने भी एक इंटरव्यू में कुछ महीने पहले यह कहा था कि उन्हें समझ नहीं पड़ता कि किसी को इतने बड़े घर की क्या जरूरत पड़ती है। लेकिन लोकतंत्र और उदार अर्थव्यवस्था में यह तो हर किसी का हक है कि वह अपने पर कितना खर्च करे। इस सिलसिले में इस मुद्दे से हटी हुई एक दूसरी बात हमें यहां याद पड़ती है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कल ही एक ऐसे नए टैक्स ढांचे की वकालत की है जिसमें हर बरस दस लाख डॉलर से अधिक कमाने वाले लोगों पर एक न्यूनतम टैक्स ऐसा लगाया जाए जिसे ओबामा बफेट-टैक्स का नाम दे रहे हैं। अमरीका के अरबपति व्यवसायी वारेन बफेट के सुझाए हुए इस प्रस्ताव का कहना है कि करों के ढांचे में विसंगतियों के चलते धनाड्य वर्ग के लोग अपेक्षाकृत कम टैक्स भरते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि निवेश से होने वाली आमदनी पर नौकरी से मिलने वाले वेतन की तुलना में कम टैक्स लगता है। दौलत की ताकत को कम करने के लिए वारेन बफेट और बिल गेट्स जैसे लोग लगातार कई तरह की कोशिशें कर रहे हैं, लेकिन भारत में हम देखते हैं कि लोग धर्म के अलावा बहुत कम ही जगहों पर अपनी कमाई का कोई निर्धारित हिस्सा देते हों।
एक दूसरी छोटी सी खबर यह है कि दुनिया में बिकने वाले बोर्ड पर खेले जाने वाले खेलों में सबसे अधिक बिक्री व्यापार में एकाधिकार सिखाने वाले खेल मोनोपोली की है जिसे कि हिंदी-भारत में व्यापार नाम से जाना जाता है। यह व्यापार में एकाधिकार से मिलने वाले फायदों को बच्चों के दिमाग में शुरू से भरते चलता है। इसके साथ एक दूसरी खबर यह है कि दुनिया के सबसे रईस चार सौ लोगों के पास जितनी दौलत है उतनी दौलत दुनिया के सबसे गरीब चार सौ करोड़ लोगों के पास मिलाकर भी नहीं है। यह गैरबराबरी किसी किस्म की बददिमागी खड़ी करती है जैसी बददिमागी अपने राज्य में हजारों हत्याओं के लिए आरोपों से घिरे मुख्यमंत्री की दिखती है, या अपनी प्रतिमाएं खड़ी करवाने वाली एक दलित की बेटी की दिखती है। जिस जनतंत्र में तंत्र पर काबिज नेता का जनता से हकों का फासला इतना अधिक हो जाता है वहां पर बददिमागी बढ़ती चलती है और वह लोकतंत्र को भावना से लेकर शब्दों तक हर किस्म से मिटाते जाती है। एकाधिकार सत्ता का हो या व्यापार का, सामाजिक आंदोलन द्वारा या अखबार का, बहुत अधिक ताकत एक हाथ में आ जाने से लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। यह बात ठीक है कि व्यापार पर काबू के लिए बने लायसेंस-परमिट राज के अपने खतरे और नुकसान भारत ने भुगते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उदारवादी अर्थव्यवस्था के नाम पर आज दुनिया के बहुत से देशों में जैसी आर्थिक तानाशाही बिना किसी सामाजिक जवाबदेही के खड़ी हो चुकी हैं, उनके खतरे कम नहीं हैं।
इस पूरी चर्चा का एक मकसद यह है कि जिस तरह एक बीज पौधा बनकर आसमान की तरफ खड़ा होता है, उसी तरह एक सीमा से अधिक बढ़ी हुई ताकत इंसान के सिर की तरफ बढऩे लगती है, वहां पहुंच ही जाती है। इसलिए लोगों को यह सोचना चाहिए कि इस नौबत को कैसे रोका जाए? लोकतंत्र तो हर किसी के ताकत के ऐसे बड़े गोदाम बनाने की छूट देता है, लेकिन ऐसा विकराल आकार लोकतंत्र को भी खत्म करने लगता है। चलते-चलते आखिरी में यह बात अधूरी रह जाएगी अगर हम प्रधानमंत्री की हैसियत से राजीव गांधी के बूटों तले शाहबानो नाम की एक बूढ़ी मुस्लिम महिला को कुचलना याद न करें। संसद के भीतर जब कांगे्रस का बाहुबल किसी पहलवान को मात कर रहा था तो उस ताकत का सबसे बेशर्म और बददिमाग इस्तेमाल कांगे्रस ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ कानून बनाने में किया था जो शाहबानो को हक देता था। अब कुछ चुनिंदा बाहों पर मांसपेशियां इतनी अधिक जुट जाने के खिलाफ लोकतंत्र के भीतर क्या किया जा सकता है, यह राह तलाशने की भी जरूरत है।

छोटी सी बात


17 सितंबर
फोन की बात हो या एसएमएस हो, बातचीत को बहुत स्पष्ट रखें। गोलमोल बातों का मतलब निकालने में वक्त बहुत बर्बाद होता है और फिर लोग आपकी बात सुनना नहीं चाहते।

महंगाई गर डायन है, तो फिर लूट खाने वाले लोग क्या हैं?

17 सितंबर 2011
महंगाई को लेकर पूरे देश की जनता का अधिकतर हिस्सा बहुत तकलीफ में है। निम्न और मध्यम आयवर्ग के लोग रोज की जिंदगी जीना बहुत मुश्किल पा रहे हैं। एक छोटी सी राहत की बात यह है कि सबसे कमजोर तबका सरकार की अलग-अलग रोजगार योजनाओं और रियायती राशन जैसी छूट के चलते महंगाई की मार को मध्यम वर्ग के मुकाबले कुछ कम कड़क पा रहा है क्योंकि उसकी अपनी जरूरतें बहुत सीमित हैं। लेकिन कुल मिलाकर महंगाई से लोग इस कदर तकलीफ में हैं।
महंगाई की मार उस वक्त लोगों को और तकलीफ दे जाती है जब जनता रात-दिन यह पढ़ती है कि उसकी सेवा करने के नाम पर जो लोग सत्ता चला रहे हैं, वे नेता-अफसर, ठेकेदारों और कारोबारियों के साथ मिलकर जनता के हक को निचोड़ ले रहे हैं और उनकी दौलत जंगल के हिरन की तरह छलांगें लगाकर आगे बढ़ रही हैं। यह सिलसिला लगातार एक खतरनाक खाई की तरफ बढ़ रहा है जब लोगों का सब्र उसमें छलांग लगाकर मरने को तैयार हो जाए या उस खाई में किसी को धकेलकर मारने के लिए तैयार हो जाए। इस देश की तमाम भ्रष्ट और दुष्ट ताकतों के लिए आज यह एक राहत की बात है कि महंगाई की मार से सबसे अधिक तकलीफ पाने वाला तबका समाज का सबसे कमजोर तबका नहीं है। सफेद कॉलर वाले लोग बगावत से खासे दूर रहते हैं क्योंकि शहरी या संपन्न सहूलियतें उन्हें खतरा उठाकर बागी तेवर अपनाने से रोक देती हैं। लोगों की आदतें सहूलियतों से ऐसी हो जाती हैं कि वे कोई हथियार उठाने का दमखम नहीं रख पाते।
हम किसी हिंसा की तारीफ नहीं कर रहे और उसकी वकालत नहीं कर रहे, लेकिन देश की हकीकत यह है कि लोगों के मन में सत्ता भोग रहे लोगों के लिए नफरत के अलावा और कुछ नहीं है, और हाथों के खाली रहने पर भी अपने मन में वे तरह-तरह के हथियार उठाने की सोचते रहते हैं। जब लोग देखते हैं कि एक-एक नेता सैकड़ों और हजारों करोड़ कमा रहा है, जब एक-एक घोटाला दसियों हजार करोड़ से लाख-लाख करोड़ का हो रहा है तो उन्हें लगता है कि अगर जनता के हक की ऐसी लूटमार न हुई होती तो क्या देश में इतनी महंगाई हुई होती? जब लोग महंगा अनाज खरीदते हैं, दाल और तेल खरीद नहीं पाते, घर के बीमार के लिए दवाई नहीं खरीद पाते, तो नेताओं की असल दौलत के दो-चार फीसदी जैसे मामूली घोषित फर्जी आंकड़े उनकी आंखों में पिसी मिर्च की तरह जलने लगते हैं। ऐसी नफरत के बीच जीने को बेबस जनता न तो अपनी जिंदगी जी पाती और न ही इस देश के लिए उतना कुछ कर पाती जितना करने की उसकी ताकत हो सकती थी।
हम नारों पर जाना नहीं चाहते लेकिन अगर किसी वक्त यह देश सोने की चिडिय़ा रहा होगा तो तब से लेकर अब तक देशी राजाओं ने, मुगलों ने, अंगे्रजों ने, और अब आजाद हिंदुस्तानी तानाशाह-लुटेरे शासकों ने इस चिडिय़ा के सारे पंख नोंच दिए हैं और सोने के अंडों की चाह में इसके पेट को चीर दिया है। लेकिन इस देश की संभावनाएं इतनी अधिक थीं, कि इसके बावजूद यह चिडिय़ा अब तक जिंदा है। कोई अगर इस देश के पिछले कुछ दशकों के आर्थिक विकास को एक बड़ी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपाता है, तो यह समझने की जरूरत है कि ऐसी पीठ वाला की वजह से इतना विकास नहीं हुआ है, उनके बावजूद इतना विकास हुआ है, उनके रहते हुए इतना विकास फिर भी हो ही गया है। ऐसा देश अपने लोगों के ठीक से जीने का सामान नहीं दे पा रहा है और देश भर में सत्ता पर काबिज लोग सबसे गरीब लोगों के हक की सार्वजनिक संपत्ति को लूट रहे हैं, सरकार की योजनाओं में डाका डाल रहे हैं और लोकतंत्र पर जनता की आस्था के साथ बलात्कार कर रहे हैं।
कोई अगर यह समझता है कि देश की महंगाई डायन है तो देश के असली राक्षस तो झंडे और बत्तियों वाली गाडिय़ों ने सलामी लेते घूम रहे हैं, और जनता महंगाई से अपनी रोज की जिंदगी बचाने के लिए दौड़-भाग कर रही है। यह सिलसिला इंसानियत के लिए (यह भी एक बार तय हो जाए कि इंसानियत आखिर किस और कैसे इंसान को लेकर बना हुआ शब्द है?) खतरनाक है और लोकतंत्र के लिए भी। इससे जिस दिन शहरी लोगों के मन में नफरत हथियार उठा लेगी उस दिन पूरे देश के शहर नक्सली इलाके बन जाएंगे।

छोटी सी बात


१६ सितंबर
हंसना सेहत के लिए बहुत अच्छा और जरूरी होता है। मेडिकल रिसर्च बताती है कि अधिक हंसने वाले, कम बीमार पड़ते हैं। अगर आप बहुत कम हंसते हैं, तो अपने आस-पास के दायरे में कुछ फेरबदल करें, कुछ खुशनुमा लोग जोड़ें, और झींकने वाले लोग कुछ कम करें। एक नए इश्तहार को देखें- हर एक दोस्त जरूरी होता है...

क्या देश में ऐसे रास्ते निकालने लायक मैनेजमेंट-गुरू नहीं हैं?

16 सितंबर 2011
अपनी खुद की उम्मीदों के खिलाफ और अपनी आशंकाओं के बावजूद आज हम यह सलाह देने जरूरी और जायज समझते हैं कि देश में पेट्रोल-डीजल, रसोईगैस और मिट्टीतेल की रियायत के लिए जरूरतमंद तबके को पहचान लिया जाए और समाज के आर्थिक रूप से मलाईदार तबके को इससे बाहर कर दिया जाए। यह तरीका आसान नहीं होगा, लेकिन पेट्रोलियम खरीदी के बढ़ते हुए घाटे को देखते हुए अब यह जरूरी है कि इसकी रियायतों को संपन्न लोगों तक पहुंचने से रोकने के रास्ते निकाले जाएं। जिस तरह आज देश में गरीबों को मिलने वाले रियायती मिट्टीतेल में नीला रंग मिलाकर उसे खुले बाजार के गैररियायती मिट्टीतेल से अलग करने की कोशिश की गई वैसी ही तरकीबें, लेकिन कामयाब होने लायक, पेट्रोल-डीजल और रसोईगैस के लिए निकालनी चाहिए।
अब कम्प्यूटरों और संचार उपकरणों के सहारे पेट्रोलियम की बिक्री पर कुछ नजर रखना पहले के मुकाबले अधिक आसान है। इस देश में मैनेजमेंट और सूचना तकनीक के बड़े-बड़े जानकार हैं। लाखों करोड़ की सरकारी रियायत को कम करने के लिए ऐसे विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक तरकीब बनाई जा सकती है जिससे कि चार पहिया गाडिय़ों को पेट्रोलियम रियायत न मिले और दुपहिया वाहनों को मिलती रहे। ऐसे दुपहिया वाहनों के लिए यह भी जरूरी हो सकता है कि वे उन गाडिय़ों के नंबर के कार्ड बनवाएं और उन पर ही हर महीने एक निर्धारित कोटा उन्हें रियायत पर मिले और बाकी के लिए वे खुले बाजार के रेट से पैसा दें। एक तरीका यह हो सकता है कि दुपहियों के लिए पेट्रोल पंप ही अलग बन जाएं। एक आसान तरीका यह हो सकता है कि आयकरदाता तबके को किसी भी रियायत से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए और उससे नीचे के तबके को रियायती पेट्रोलियम मिले। आयकर देने वाले लोगों को रियायती रसोई गैस सिलेंडर क्यों मिलना चाहिए? अगर ऐसा करने के लिए कोई रास्ता असरदार नहीं निकल सकता तो फिर अलग-अलग गाडिय़ों की इंजन क्षमता के मुताबिक उन पर ऐसा टैक्स लगाना चाहिए जो कि हर बरस ईंधन की एक अनुमानित खपत के आधार पर वसूला जाए। जिन लोगों को बड़ी गाडिय़ां चलानी है, वे हर बरस एक अधिक टैक्स देने को तैयार रहे क्योंकि वे रियायती ईंधन खुले बाजार से पाते रहेंगे।
लेकिन एक बड़ी बात जो होनी चाहिए वह सार्वजनिक परिवहन की है। हम हर कुछ महीनों में उसके बारे में लिखते हैं। दिल्ली जैसे शहर में जहां लोगों को बसों में पैर धरने की जगह नहीं मिलती थी, वहां आज स्थानीय मेट्रो ट्रेन के चलते दसियों लाख लोग रोजाना सड़कों से परे अब इन तेज रफ्तार डिब्बों में पटरियों पर चलते हैं और दिल्ली अब उतनी मुश्किल नहीं रह गई है। लेकिन पैसे वाले लोगों की भरमार से वहां अब लाखों कारें दिन भर में किसी भी वक्त सड़कों पर रहती हैं और यह एक ऐसा तबका है जो कि मेट्रो के सफर के पहले और बाद के सफर के लिए कोई आरामदेह जरिया नहीं पाता और अपनी गाड़ी में ही चलता है। दिल्ली में अपनी कारों में चलने वाले लोगों से सौ गुना अधिक कमाने वाले लोग न्यूयॉर्क जैसे शहर में भूमिगत रेलगाड़ी से चलते हैं क्योंकि उसके पहले और उसके बाद पैदल चलने के लिए वहां साफ-सुथरी सड़कें हैं और अच्छे फुटपाथ हैं। दिल्ली में आज कोई संपन्न व्यक्ति फुटपाथों पर लंबा चलने की सोच नहीं सकते क्योंकि वहां इतनी गंदगी है और इतने लोग बसे हुए हैं। तो जब तक आरामदेह और सहूलियतों वाला इंतजाम नहीं होगा लोग अपनी गाडिय़ों पर चलने के लिए मजबूर होंगे और यह बात सिर्फ पेट्रोलियम की खपत को लेकर हम नहीं कह रहे, धरती को प्रदूषण से बचाने के लिए भी कह रहे हैं।
दुनिया के बाजार में पेट्रोलियम के दाम हिंदुस्तान की सरकार के काबू के नहीं हैं। इसलिए उसे लेकर अगर देश के विपक्षी दल केंद्र सरकार के खिलाफ कोई मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर चाहे वह दर्द भरी जनता की हमदर्दी का हकदार क्यों न हो, वह जायज नहीं होगा। इसलिए पेट्रोलियम की कटौती कहां-कहां हो सकती है और साधारण जनता से लेकर मामूली पैसे वालों तक के लिए अगर कोई भरोसेमंद और अच्छी सार्वजनिक यातायात प्रणाली बनाई जा सकती है तो उस तरफ जाना चाहिए। आज शहरों में बसों या ट्रेन के लिए जहां सरकार खुद नहीं बना पा रही वहां निजी क्षेत्र को बढ़ावा देकर जनता को सुविधा क्यों मुहैया नहीं कराई जा सकती? लोगों को अब याद भी नहीं होगा कि किस तरह इस देश में एक टेलीफोन कनेक्शन के लिए दस-दस बरस लोगों को इंतजार करना पड़ता था। आज शहरों में छोटे-छोटे बच्चे दो-दो, तीन-तीन सिम कार्ड जेब में लिए चलते हैं। इसलिए शहरी यातायात को बड़े पैमाने पर निजी भागीदारी से ही खड़ा कर लिया जाए अगर सरकार खुद नहीं खड़ा कर पा रही है।
नेता और अफसर अपने स्तर पर जो काम नहीं कर पा रहे हैं उसके लिए इस देश के ऐसे मैनेजमेंट विशेषज्ञों को क्यों शामिल नहीं किया जा रहा जो कि दुनिया के बड़े-बड़े देशों में जाकर बड़ी-बड़ी कंपनियां चलाने में अपनी कामयाबी दिखा चुके हैं और उनमें जालसाजी तक में कामयाब रहे हैं। यह जरूर है कि बाहरी लोगों को ऐसे काम में लाने पर पेट्रोलियम खरीदी के वैसे कमीशन के भांडाफोड़ होने का खतरा बने रहेगा जो कि किसी भी सरकार के राज में स्विस बैंकों में जमा होने की चर्चा दिल्ली के गलियारों में हमेशा रहती है। लेकिन हम तो पेट्रोलियम के देश में आ जाने के बाद उसे रियायत के हकदार तबके तक ही सीमित रखने की तरकीब की सलाह दे रहे हैं, और ऐसी सलाह तो खरीदी के भ्रष्टाचार से परे भी ली जा सकती है। आज चिकित्सा विज्ञान शरीर के बहुत छोटे-छोटे हिस्से के सीधे इलाज, वहां सीधे दवा पहुंचाने की तरकीबें ढूंढ चुका है, जिनके चलते बाकी शरीर ऐसे इलाज को झेलने से बच जाता है। हम ऐसे ही सब्सिडी को सीधे गरीब-हकदार तक पहुंचाने की बात कर रहे हैं जिससे मलाईदार तबके को बाहर रखा जा सके। क्या इस देश में ऐसे रास्ते निकालने लायक मैनेजमेंट-गुरू नहीं हैं?

छोटी सी बात


15 सितंबर
झूठ बोलने से बचें। मोबाइल फोन के जमाने में झूठ जल्दी पकड़ में आ जाते हैं। आप रहें किसी जगह, और कहें कहीं और का, तो हो सकता है फोन करने वाला आपकी पीठ के पीछे खड़ा हो।

कोर्ट को लेकर मोदी के जश्न में उड़ाए जा रहे गुबार का सच

15 सितंबर 2011
अमरीकी सरकार के एक अंदरूनी ईमेल में मोदी सरकार की तारीफ को लेकर मीडिया खबरों से पट गया है और भाजपा का हौसला बढ़ गया है। पिछले काफी समय से भाजपा के पास यूपीए सरकार के कुकर्मों के अलावा खुद का हासिल कुछ नहीं था। गुजरात दंगों को लेकर मोदी को वीजा देने से मना कर देने वाली अमरीकी सरकार के भारत के एक अफसर की लिखी बातों को अपनी सरकार की तारीफ से परे, गुजरात की साढ़े छह करोड़ जनता की तारीफ बताते हुए खुद मोदी ने इसे अपने ब्लॉग पर डाला है। मोदी-गौरव का यह ताजा सिलसिला सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश से शुरू हुआ जिसके अदालत से बाहर कागज पर आने से पहले ही जुबानी जमा-खर्च आसमान तक पहुंच गया था और इसे मोदी की फतह बताते हुए भाजपा के दिग्गज मोदी को मुबारकबाद देने में जुट गए थे। इस हल्ले के बीच भाजपा के आज के सक्रिय सबसे बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवानी की गुजरात से रथयात्रा शुरू करने की मुनादी भी हाशिए पर चली गई, और लोग पल भर को यह भी भूल गए कि भाजपा के पास अभी भी अपना एक अध्यक्ष है, एक मजबूत संगठन है और वह एनडीए नाम के एक ऐसे गठबंधन का हिस्सा भी है जिसके तमाम भागीदार अनिवार्य रूप से साम्प्रदायिक नहीं है। ऐसे माहौल में भी यह हल्ला आखिर एक गुबार की तरह उठा कि अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को मोदी को सामने लाना चाहिए या वह ला सकती है, और क्या अगला चुनाव इस देश में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्वों के टकराव के रूप में होगा?
एक तो अमरीकी कूटनीतिक-विश्लेषण और फिर अन्ना के बाद अनाथ बैठे मीडिया की भूख और प्यास। इन दोनों ने मिलाकर देश के टीवी खबर-चैनलों के बड़े-बड़े सितारों को इस अटकलबाजी में झोंक दिया कि मोदी अपने-आपको बहुत बड़ा नेता साबित करने के लिए गुजरात विधानसभा भंग करके राज्य में चुनाव करवाकर एक बार फिर अपने को जनता की अदालत में सही और सबसे मजबूत साबित कर सकते हैं। कुछ और का कहना था कि अब मोदी का वक्त राष्ट्रीय राजनीति में आने का हो गया है। और मीडिया के भूख-प्यास से बेचैन पंडितों (यह शब्द जाति के लिए नहीं, प्रचलित भाषा में जानकारों के लिए इस्तेमाल होने वाले एक मनुवादी शब्द के रूप में) का कम से कम एक अंदाज सही है कि भाजपा के भीतर मोदी की तरह नाटकीय लोकप्रियता वाला दूसरा कोई नेता नहीं है और अगर अदालतों से मोदी को ऐसी राहत मिल गई है तो फिर अब उनके लिए गुजरात से ऊपर उभरने का वक्त आ गया है।
लेकिन यहां पर इस बात को समझने की जरूरत है कि मोदी के समर्थन के सारे हल्ले के बीच सुप्रीम कोर्ट का आदेश आखिर है क्या? गुजरात के 2002 के साम्प्रदायिक मानवसंहार का एक चर्चित हिस्सा गुलबर्ग सोसायटी का था जहां पर बड़ी संख्या में जलाए गए लोगों में कांगे्रस के एक मुसलमान सांसद भी थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक इस सांसद की पत्नी सहित कुछ और लोग गए थे और अपील की थी कि मोदी और 62 दूसरे अफसरों ने इन दंगों को रोकने के लिए जानबूझ कर कोई कदम नहीं उठाया और हिंसा को बढ़ावा दिया। इस अपील का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद कोई आदेश देने से इंकार किया और कहा कि इस मामले पर गुजरात की निचली अदालत फैसला करे।
हम पिछले कुछ दिनों से सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर हवा में तैर रही बधाईयों और मिठाईयों को देखकर हैरान हैं, लेकिन चुप रहे क्योंकि इस आदेश की कॉपी हमें नहीं मिली थी। जो लोग देश की इस सबसे बड़ी अदालत के इस आदेश को मोदी को मिली हुई क्लीनचिट मानते हैं उन्हें न्याय की प्रक्रिया को कुछ समझना होगा। भारत के अदालती ढांचे में क्या यह मुमकिन है कि सुप्रीम कोर्ट किसी को क्लीनचिट दे दे और उसके बाद अहमदाबाद जिले की अदालत का एक मजिस्ट्रेट या जज उस मामले में फैसला दे? यह मामला पूरी तरह से अदालत के न्यायक्षेत्र का था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कोई टिप्पणी करने के बजाय उसे इसलिए एक जिले की अदालत को भेजा क्योंकि उसी अदालत में यह मामला चल रहा है और वहीं सुनवाई कर रहे जज-मजिस्ट्रेट को यह भी तय करने का अधिकार है कि मोदी पर लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच की जाए, या न की जाए। यह न सिर्फ अदालती ढांचे में, बल्कि सरकार के ढांचे में भी होता है कि जब किसी अधिकारी का कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र तय किया हुआ रहता है तो आदेश उसी स्तर से जारी होता है न कि राज्य के सबसे बड़े अधिकारी के स्तर से। मोदी के खिलाफ यह मामला चूंकि जिला अदालत या मामले की सुनवाई कर रहे अदालत के स्तर का था इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उसमें दखल नहीं की और इस मामले के गुण-दोष (मेरिट ऑफ द केस) पर कुछ कहने के बजाय उसे उपयुक्त अदालत को भेजा।
सुप्रीम कोर्ट अगर किसी मामले को अपनी दखल से नीचे की अदालत के दखल के लायक पाता है, तो बस इस तकनीकी बात को मोदी के गुनाह या मोदी की बेगुनाही पर अदालती फैसला बताते हुए भाजपा के बहुत से नेताओं ने इसे एक राष्ट्रीय जलसे में तब्दील कर दिया। क्या इस देश की सुप्रीम कोर्ट नीचे की तमाम अदालतों में चल रहे, चलने के लायक, उनके अधिकार क्षेत्र के मामलों पर सीधे आदेश करने लगे तो वह लोकतंत्र के भीतर की न्याय-व्यवस्था के लिए बेहतर होगा? ऐसे आदेश उसी समय होते हैं जब ऐसा साबित होने लगता है कि नीचे की अदालत या तो ठीक काम नहीं कर रही है, उसने कोई गलत आदेश दिए हैं, या वहां पर हो रही देर से कोई ऐसा नुकसान हो रहा है जिसकी भरपाई बाद में नहीं हो पाएगी। ऐसे कुछ और कारण भी हो सकते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इस मामले पर आदेश चाहे मोदी के पक्ष में होता या मोदी के खिलाफ, अगर वह निचली अदालत के न्यायक्षेत्र को कुचलते हुए आता तो वह एक खराब आदेश होता। उससे एक नाटकीय खबर तो बनी होती, जैसी कि अभी मोदी के समर्थन में बनाई गई है, लेकिन क्या देश भर की जिला अदालतों का, ट्रायल कोर्ट का काम उनसे छीनकर सुप्रीम कोर्ट करने लगे?
पिछले बहुत समय में किसी अदालत के आदेश को लेकर इतनी रफ्तार से इतनी बड़ी गलतफहमी कम ही फैलाई जाती या कम ही फैलती दिखी है। इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने न तो मोदी के पक्ष में और न मोदी के विरोध में कुछ भी कहा है। मोदी और उनके हिमायती सुप्रीम कोर्ट से बहुत ही कड़े चाबुक की दहशत में जी रहे थे और वहां से ऐसा कुछ न होने पर वे उन्हें मिली राहत को एक अदालती राहत की तरह पेश कर रहे हैं और जश्न मना रहे हैं। लेकिन देश के लोगों को यह बात बहुत साफ-साफ समझने की जरूरत है कि यह राहत ऐसी दहशत को मिली हो सकती है, यह राहत कोई अदालती राहत नहीं है, यह न कोई चाबुक है और न कोई क्लीनचिट। यह मुमकिन है कि अहमदाबाद के ट्रायल कोर्ट से इस अपील पर फैसला होने के बाद उसके खिलाफ मोदी या उनके विरोधी ऊपर की अदालत में जाएं और वहां के फैसले से नाखुश खेमा फिर सुप्रीम कोर्ट तक इसे लेकर पहुंचे और तब सुप्रीम कोर्ट इस केस के मेरिट (गुण-दोष) पर फैसला करे। नरेन्द्र मोदी ने इस आदेश को लेकर यह कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उनके और गुजरात की सरकार के खिलाफ 2002 के दंगों के बाद से बेबुनियाद और झूठे आरोपों से खड़ा किया गया एक अस्वस्थ वातावरण खत्म होने का वक्त आ गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश में ऐसी कोई बात नहीं है जिसकी कि कोई ऐसी व्याख्या कर सके। इस बारे में गुजरात में मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले एक आईपीएस अफसर संजीव भट्ट का मोदी को लिखा एक खुला खत भी देखा जाना चाहिए।
एक आम अखबार के संपादकीय कॉलम में अदालती प्रक्रिया का इतना बारीक विश्लेषण करने की नौबत आमतौर पर नहीं आती है लेकिन हवा में गुलाल उड़ाकर जो धुंध खड़ी की गई है उसे साफ करना भी जरूरी है। मोदी पर अदालती फैसला अभी बहुत दूर है।

बिना यातना बड़े होने का हक

14 सितंबर
विकीलीक्स के खुलासे में अभी यह सामने आया था कि किस तरह वैटिकन के अमरीकी राजदूत ने अपनी सरकार को यह लिखकर भेजा था कि पोप चाहते हैं कि अमरीका में बच्चों के यौन शोषण में पकड़ाए पादरियों पर मुकदमे न चलाए जाएं। इसका कैथोलिक ईसाईयों के मुख्यालय, वैटिकन, की तरफ से कोई खंडन भी नहीं किया गया। आज दूसरी खबर यह है कि यौन शोषण के दोषी किसी भी पादरी को सजा न होने से निराश उनके शिकार लोगों ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में पोप के खिलाफ एक मामला दायर किया है। ऐसा करने वाले लोगों की गिनती नौ हजार है।
धर्म के साम्राज्य में बच्चों के यौन शोषण की यह एक भयानक नौबत है। पूरी दुनिया का धर्म का इतिहास इस बात का गवाह है कि जहां कहीं ब्रम्हचर्य को किसी पर थोपा जाता है, वहां सेक्स अपराध का खतरा खड़ा हो जाता है या फिर ऐसे अघोषित संबंध विकसित होने लगते हैं जिन्हें धर्म और समाज की भाषा में अवैध कहा जाता है। हम तो दो वयस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से होने वाले किसी भी सेक्स संबंध को अवैध नहीं मानते और न ही उसे बुरा मानते। लेकिन अलग-अलग कई ऐसे धर्म हैं जो अपने गुरूओं और प्रचारकों को शादी से रोकते हैं और जैसा कि धर्मों का तौर-तरीका रहता है, बिना शादी के सेक्स संबंधों से तो वे रोकते ही हैं। नतीजा यह होता है कि ईसाई धर्म साम्राज्य पूरी दुनिया में बच्चों के देहशोषण के आरोपों, मामलों और अपराधों से घिरा हुआ है, भारत में हम हिंदू धर्म में कहीं मंदिरों में देवदासी प्रथा के नाम पर वेश्यावृत्ति देखते हैं तो कहीं मठों और आश्रमों में कोठारिन रहती है तो कहीं कोई स्वघोषित साधू-महात्मा अघोषित रूप से सार्वजनिक हो चुके सेक्स संबंधों के लिए कुख्यात रहता है।
आज बच्चों के देह शोषण के मामले में अगर सिर्फ ईसाई धर्म के भीतर भांडाफोड़ रोजाना हो रहे हैं तो इसकी वजह महज यह नहीं है कि ऐसा शोषण सिर्फ वहीं हो रहा है। ऐसे मामले मोटे तौर पर अमरीका और योरप में ही उजागर हो रहे हैं जहां पर लोगों के बीच कानूनी जागरूकता अधिक है और जहां का लोकतंत्र लोगों को बचपन में हुए शोषण के खिलाफ भी आज अदालत जाने जैसे हक देता है। भारत जैसे देश में कोई क्या खाकर अदालत जाएगा जहां पर कि कल हुए बलात्कार की आज हुई रिपोर्ट के बाद उस लड़की से थाने में फिर बलात्कार करके उसे रस्सी पर टांग दिया जाता है और अगर मामला अदालत तक पहुंच पाया तो वहां पर जिरह के दौरान अपराधी और उसका वकील उस लड़की से सबके सामने कई बार और जुबानी-बलात्कार करते हैं। बचपन के शोषण के खिलाफ लोग तभी अपने देश की अदालत या अंतरराष्ट्रीय अदालत तक जाने की सोच पाते हैं जब उन्हें वहां का कानून असरदार दिखता है। भारत में तो परिवार के बच्चे इस बात को लेकर शर्मिंदगी में जीते रहेंगे कि उनके दादा या नाना अपने बचपन में उनके हुए देह शोषण को लेकर आधी सदी से अदालत में खड़े हैं।
लेकिन अमरीका और योरप के इन मामलों से सीधा वास्ता न होते हुए भी इस पर हम इसलिए लिख रहे हैं, और पहले भी इसलिए लिख चुके हैं, कि बच्चों के देह शोषण का खतरा धर्म से परे भी समाज में, घर-बार में, पड़ोस और स्कूल में, मैदान और हॉस्टल में बने ही रहता है। भारत में जहां पर कि लोग सेक्स पर चर्चा से कतराते हैं, मां-बाप बनने के लायक उम्र तक पहुंच गए बच्चों को भी किसी तरह की सेक्स शिक्षा देने के नाम से राजनीतिक दल दहशत में आ जाते हैं, वहां पर अपने खुद के बच्चों की ऐसी शिकायत को कोई मां-बाप शायद ही सुनते हों। अगर कोई बच्चा ऐसे शोषण या ऐसी छेडख़ानी की शिकायत करता है तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है। इन फिरंगी वारदातों से भारत को यह सबक लेने की जरूरत है कि वह अपनी धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों को किस तरह निगरानी में रख सकता है ताकि यहां पर ऐसा जुल्म होने पर तुरंत वह बात उजागर हो और उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो सके। दूसरों को लगी ठोकर से जो समाज सबक ले लेता है वही समाज अपनी पूरी संभावनाओं तक पहुंचने का हकदार होता है। अगर भारतीय समाज में अनगिनत बच्चे बचपन में ऐसे शोषण का शिकार होकर एक घायल मानसिकता के साथ बड़े होते हैं तो उनका सामाजिक योगदान भी एक सेहतमंद मानसिकता के व्यक्ति से कम होगा। इसलिए देश के व्यापक हित में यह है कि उसका समाज चौकस रहे और उस समाज के हर इंसान को ऐसी यातना के बिना बड़े होने का हक मिले।

छोटी सी बात

13 सितंबर
गलतियां तो सबसे कभी न कभी होती हैं, लेकिन इंसान तो गलतियों का पुतला होता है, ऐसे तर्क का इस्तेमाल न करें।

भ्रष्ट-रिश्वतखोर सांसदों को सजा न देने के लिए संसद जवाबदेह

13 सितंबर 2011
कानून बेदिमाग कैसे होता है इसकी एक शानदार मिसाल अभी सामने आई जब आयकर ट्रिब्यूनल ने यह फैसला दिया कि नरसिंह राव सरकार को बचाने के वक्त झारखंड मुक्तिमोर्चा के सांसदों को मिली रिश्वत इसलिए टैक्स फ्री है क्योंकि वह मोर्चा ने अपने को मिला राजनीतिक दान बताया है। ऐसे चार सांसदों को मिली रिश्वत उन्होंने अपने निजी बैंक खातों में जमाकर दिया था। बाद में उन्होंने उनके खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार निवारण मामले में यह मंजूर भी किया था कि विश्वास मत पर साथ देने के लिए कांगे्रस पार्टी ने उन्हें यह रिश्वत दी थी। बाद में वे अदालत से इस आधार पर बरी हो गए थे कि संविधान के तहत सांसदों को इस मामले में अदालत की पहुंच से बाहर रखा गया है। इस रिश्वत के इनकम टैक्स से भी आजाद रहने के बाद यह पूरा मामला कानून की मसखरी करता हुआ लगता है। और ऐसे ही एक दूसरे मामले में जिसमें सांसदों को संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों कैमरे पर पकड़ा गया था, उनको भी संसद द्वारा दी गई बर्खास्तगी की सजा के अलावा और कोई सजा नहीं दी गई। देश का कानून संसद के भीतर के भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता और यही वजह है कि आज जब अन्ना हजारे की टोली सांसदों को गालियां देती है, संसद का अपमान करती है, तो यह बात गलत होने पर भी देश में शायद किसी को नहीं खटकती।
बोलचाल की जुबान में कहा जाता है कि यह अंधा कानून है। लेकिन हम इस भाषा को भी बदलना चाहते हैं क्योंकि यह नेत्रहीन लोगों के लिए अपमानजनक है। कानून किस तरह तंग सीमाओं में कैद होता है यह दिखाने के लिए सांसदों के ये मामले बहुत मददगार हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन के तौर-तरीकों से पूरी तरह असहमत रहते हुए भी हम उनके उठाए हुए मुद्दों को महत्वपूर्ण मानते हैं और चुनाव सुधार को लेकर जो बातें वे कर रहे हैं उन पर भी देश में एक खुली बहस होनी चाहिए। चूंकि आज की बातचीत यह सिलसिला सांसदों के भ्रष्टाचार से शुरू हुआ है इसलिए हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि चुनाव कानून के ढीले होने से इस देश में चुनाव लगातार भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं और एक तरफ जहां लोगों को लगता है कि अब पहले की तरह बूथ पर कब्जा करके वोट छाप देने का सिलसिला खत्म हो गया है तो दूसरी तरफ यह भी बहुत साफ दिखता है कि पैसों का खेल किस कदर बढ़ गया है। अब बंदूकों की नोंक पर बूथ पर काबिज होने की जरूरत नहीं रहती, अब वोटरों के एक हिस्से को खरीदकर अहिंसक तरीके से लोकतंत्र का गला रेत दिया जाता है। चूंकि कानून को गला रेतने का यह लहू दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए देश को लगता है कि चुनावों में हिंसा अब खत्म हो गई है। लेकिन करोड़ों के अवैध खर्च की वजह से अब पार्टियां अरबपतियों को अधिक टिकटें दे रही हैं और वे संसद की सीटें अधिक खरीद रहे हैं। हमारी तो यह भी सोच है कि जिस तरह जातियों के आधार पर संसद या विधानसभा में लोगों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं, उसी तरह एक यह सीमा तय करनी चाहिए कि कोई भी पार्टी अपनी कितनी फीसदी सीटें करोड़पतियों और अरबपतियों को दे सकती है? यह इसलिए भी जरूरी है कि अब संसद में गरीबों के मुद्दों पर चर्चा करने वाले लोग घटते चले जा रहे हैं और बड़े-बड़े कारोबार से जिनके हित जुड़े हुए हैं वे संसद और विधानसभाओं में बढ़ चुके हैं, बढ़ते चले जा रहे हैं। जिस तरह महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए महिला आरक्षण जरूरी है, उसी तरह गरीबों को चुनाव की टिकटों के दौरान अच्छा खासा मौका मिलने का कानूनी इंतजाम होना चाहिए। यह आरक्षण एक अधिक असरदार आरक्षण होगा क्योंकि आज के आरक्षित तबकों में से जब तक अधिक आयवर्ग या संपन्नता वाले मलाईदार तबके को अलग नहीं किया जाएगा तब तक इन कमजोर तबकों को आरक्षण का फायदा देने के संवैधानिक प्रावधान का फायदा सचमुच कमजोर लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता।
यह चुनाव सुधार पर बातचीत का वक्त इसलिए भी है क्योंकि आज हर किस्म के अपराधी, चुनाव कानून में तरह-तरह के छेद तलाशकर उसके रास्ते संसद और विधानसभाओं तक पहुंच रहे हैं। कानून को ऐसा असरदार बनाने की जरूरत है कि भ्रष्ट और दुष्ट लोगों को संसद और विधानसभाओं से बाहर रखा जा सके। पिछले दिनों हमने संसद के समय के इस्तेमाल के बारे में लिखा ही है और देश की जनता अगर संसद और विधानसभा से, बाकी लोकतांत्रिक-संवैधानिक संस्थाओं से निराश है, तो यह तस्वीर भी बदलनी चाहिए वरना अन्ना हजारे जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोग भी देश की जनता को लोकतांत्रिक लगते रहेंगे।
फिलहाल हम इस बेदिमाग कानून को तो तुरंत सुधारने की मांग करते हैं जिसके तहत संसद के भीतर की रिश्वतखोरी के मामले भी कानून से परे हैं और जिन पर खुद सजा देने से संसद बची है। संसद की सदस्यता को खत्म करने को हम पर्याप्त सजा नहीं मानते और हमारा मानना है कि रिश्वत लेने वाले सांसदों को कैद देने का काम संसद को करना चाहिए था और वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई है। सांसदों के तबके को ही अगर भ्रष्ट सांसदों को सजा देने कहा जाएगा तो उसका यही हाल होगा। संसद का पूरा बर्ताव प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के ठीक खिलाफ है, और अपने भ्रष्ट-रिश्वतखोर सदस्यों को सजा न देने के लिए संसद देश के लिए जवाबदेह भी है, और ऐसा न करने पर वह अपने-आपको अन्ना-टोली की गालियों का हकदार ही साबित करके दिखाएगी।

छोटी सी बात


12 सितंबर
किसी के घर मेहमान बनकर टिके हों तो याद रखें, बंगाल में एक कहवात है- मेहमान और मछली तीसरे दिन बदबू मारने लगते हैं।

दिल्ली से शक पर जीता मणिपुर

12 सितंबर 2011
मणिपुर में दस-ग्यारह बरस से आमरण अनशन कर रही शर्मिला की मोहब्बत की कहानी आज पहले पन्ने पर छप रही है जिसे लेकर इसे छापने वाले अखबार को मणिपुर के बाहर भी रोक दिया गया है। वहां पर सेना के विशेष अधिकारों वाले कानून को खत्म करने के लिए जो आंदोलन चल रहा है उसके लोगों का मानना है कि एक ब्रिटिश पत्रकार के साथ शर्मिला के प्रेम-प्रसंग की खबरें इस आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से छपवाई जा रही हैं। हालांकि इस प्यार की बात को खुद शर्मिला ने अपने इंटरव्यू में सही बताया है और यह जानकारी दी है कि अपने पे्रमी से उसकी शादी राज्य में यह कानून खत्म हो जाने के बाद ही हो सकती है। अन्ना हजारे के जैसे अनशन के ग्यारह दिन में देश का मीडिया बावला हो गया था, वैसा अनशन अस्पताल के बिस्तर पर भी शर्मिला ग्यारह बरस से कर रही है और आने वाले नवंबर में बारहवां साल शुरू हो जाएगा।
हमें मणिपुर के आंदोलकारियों के इस ताजा प्रतिबंध के पीछे बहुत समझदारी इसलिए नहीं दिखती है कि आंदोलन के नेता के एक स्वाभाविक और पूरी तरह कानूनी प्यार से इस आंदोलन को क्यों कोई नुकसान पहुंचना चाहिए? भारत के कुछ हिस्सों में तो अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच प्यार और शादी को लेकर कत्ल तक की नौबत आती है लेकिन बारह बरस से आंदोलन पर बैठी हुई एक महिला नेता के प्यार से मणिपुर के लोगों को इतनी शर्मिंदगी क्यों होनी चाहिए? भारत के समाज में प्यार या औरत-मर्द के किसी भी किस्म के संबंधों को लेकर लोगों के बीच बहुत अधिक संवेदनशीलता साधारण लोगों के बीच तो दिखती है लेकिन जागरूक समाज आमतौर पर इससे ऊपर उठ जाता है और जो लोग एक राजनीतिक-सामाजिक चेतना को लेकर एक लंबा लोकतांत्रिक आंदोलन चलाते हैं उन्हें तो अधिक चीजों को बर्दाश्त करने की आदत होनी चाहिए।
लेकिन इस साधारण तर्क के पीछे मणिपुर के बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि भारत का यह उत्तर-पूर्वी राज्य एक ऐसे सौतेले बच्चे की तरह है जिस पर कि दिल्ली की नजर नहीं पड़ती और इस भारतमाता की बाकी राष्ट्रवादी संतानों को भी यह मणिपुर इस देश का हिस्सा नहीं लगता है। इसीलिए जो कैमरे रामलीला मैदान पर मानो वेल्डिंग से कस दिए गए थे, वे कैमरे अस्पताल के बिस्तर पर जारी आमरण अनशन के दसवें बरस पर भी फोकस नहीं कर पाते। यही वजह है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों हों या फिर कश्मीर हो, भारत के कई सरहदी सूबे अपने-आपको इस देश की मुख्यधारा से बाहर रखा हुआ पाते हैं। यह सिलसिला देश की फौजी हिफाजत के लिए भी खतरनाक है लेकिन उससे भी परे हम यह मानते हैं कि यह विशाल लोकतंत्र अगर दिल्ली के इर्दगिर्द के इलाके को ही विशाल लोकतंत्र मानकर चलता रहेगा तो किनारे के राज्य अपने को सौतेला ही पाते रहेंगे। अगर इस देश के कमजोर तबके अपने-आपको दिल्ली की सल्तनत की जूतियों तले पाते रहेंगे तो उनका भावनात्मक और उत्पादक योगदान इस देश को कभी पूरी तरह नहीं मिल पाएगा। इसका एक दूसरा बड़ा नुकसान यह है कि जिन मुद्दों पर एक राष्ट्रीय सहमति बननी चाहिए, उन तमाम मुद्दों पर ऐसे उपेक्षित राज्य एक निहायत क्षेत्रीय या प्रांतीय सोच तक सीमित रह जाते हैं। इसके लिए सिर्फ दिल्ली जिम्मेदार है।
आज अगर मणिपुर के आंदोलनकारी यह मान रहे कि शर्मिला की मोहब्बत की खबरें दिल्ली सरकार की साजिश के तहत छप रही हैं तो हमारा यह मानना है कि ऐसी गलतफहमी को पैदा होने से रोकने के लिए दिल्ली की सरकार ने बहुत कम किया है, और बहुत बुरी तरह नाकामयाब रही है। यह सिलसिला बदलना चाहिए और यह भी याद रखने की जरूरत है कि चीन की सरहद पर अरूणाचल के मुख्यमंत्री कुछ महीने पहले जब एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे तो भी वहां के लोगों को यह लगा था कि क्या अगर भारत के किसी बीच के बड़े राज्य का मुख्यमंत्री हादसे का ऐसा शिकार हुआ होता तो भी क्या भारत की सेना और भारत के उपग्रह उसे तलाश करने में ऐसे ही चार दिन लगाते? हम इस शक को बेबुनियाद मानते हैं लेकिन ऐसा शक होने के पीछे की वजहों को जायज मानते हैं। भारतीय लोकतंत्र की मूलधारा में अगर किनारे के राज्यों को जोड़ा नहीं गया तो लोगों की ऐसी सोच बनी ही रहेगी। आज मणिपुर से लेकर कश्मीर तक की भावनाओं को समझने की जरूरत है।

आजकल

12 सितंबर 2011
सुनील कुमार
लाशों के इस ढेर की खुशबू!
हिंदुस्तान में आज तरह-तरह की कंपनियों के ब्रांड देखने मिलते हैं। लेकिन जो लोग इतिहास के सबसे बड़े हत्यारों के साथ भागीदारी करने वाली कंपनियों से परहेज करना चाहते हैं, उनको ऐसे कुछ ब्रांडों की जानकारी होनी चाहिए। मिसाल के तौर पर ह्यूगो बॉस नाम का ब्रांड भारत के सभी बड़े शहरों में फैशन के सामान और परफ्यूम जैसी चीजें बेचता है।
यह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि यह कंपनी जर्मनी में हिटलर की नाजी पार्टी से जुड़ी हुई थी। इसका मालिक नाजी पार्टी का सदस्य था और हिटलर के नौजवान संगठन-हिटलर यूथ, और हिटलर की सेना- एसएस, की वर्दियां बनाता था। इसके साथ-साथ 1930 के दशक में इस कंपनी ने हिटलर के उन दसियों लाख कैदियों की पोशाक भी बनाई जो कि उसके यातना शिविर में मार डाले गए। आज भी यह जर्मन कंपनी मजे से दुनिया भर में धंधा कर रही है। 110 देशों में 6 हजार से अधिक जगहों पर इसकी दूकानें हैं। इसके अलावा इस कंपनी ने कुछ दूसरी कंपनियों को अपने ब्रांड से सामान बनाने का लायसेंस भी दिया है जिसमें सैमसंग भी है जो कि सेलफोन बना रहा है। प्रॉक्टर एंड गैम्बल प्रेस्टिज नाम की कंपनी इत्र और शरीर पर लगाने के कुछ दूसरे सौंदर्य प्रसाधन इसी नाम से बनाती है। यहां पर दी गई यह तस्वीर उसके आज के सामान की है और 1934-35 में दिए गए एक इश्तहार की है कि वह नाजी फौजों के लिए वर्दियां बनाता है। अब इस कंपनी के सामान खरीदने वाले यह जान लें कि हिटलर की नाजी फौज ने एक करोड़ से अधिक लोगों की मौत का सामान किया था।
लेकिन जब हम लोगों से यह उम्मीद करते हैं कि घोषित रूप से जो लोग इतिहास के बड़े-बड़े जुर्म से जुड़े रहे हैं, उनके कारोबार को फायदा पहुंचाने के बजाय वे ऐसे दूसरे सामानों के बारे में सोचें जिनके पीछे कोई मुजरिम जुड़ा नहीं रहा है। लेकिन यह बात पूरी तरह, और बुरी तरह अनसूनी रह जाती है। लोगों की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके कोका-कोला जैसे गैरजरूरी और नुकसानदेह सामान को पीने से अमरीका तक उसकी कमाई का जो हिस्सा पहुंचता है उससे वह दुनिया के बेकसूरों को मारने के लिए बम और गोलियां बना लेता है।
पिछले कुछ हफ्तों में हिन्दुस्तान के मीडिया के एक हिस्से ने ऐसी खुशफहमी खड़ी कर दी है कि इस देश की जनता एकदम से बेइंसाफी और बेईमानी के खिलाफ चौकन्नी हो गई है और आजादी की एक दूसरी लड़ाई के लिए कमर कसकर खड़ी है। आने वाले दिन इस बात को बताएंगे कि टेलीविजन चैनलों के रात-दिन डटे हुए कैमरों के सामने शोहरती-शहादत का मौका गर न रहे तो लेंस में झांकते ऐसे लोग कितनी लड़ाई लड़ेंगे? फिर भी हम कुछ वक्त की जागरूकता को आगे बढ़ाने के हिमायती हैं। क्या आज हिन्दुस्तान में जिस-जिस कंपनी के खिलाफ बेईमानी और रिश्वत देने, तरह-तरह के जुर्म करने के मामले सामने आते हैं, उनके सामानों के इस्तेमाल से बचने की कोशिश लोग कर सकते हैं?
पिछले दिनों जब अन्ना हजारे के अनशन का मामला चल रहा था तब टीवी चैनलों पर देश के एक बड़े कारोबारी और उससे भी अधिक इज्जतदार समझे जाने वाले नारायण मूर्ति ने कहा था कि कोई विधेयक तो ठीक है लेकिन डेविल इज इन डिटेल्स। मतलब यह कि असली झंझट तो किसी कानून की बारीकियों में रहती है, उसके अमल में रहती है। यही बात हम भारत की जनता में आई हुई समझी जा रही जागरूकता को लेकर कहेंगे कि टीवी कैमरों से परे जब रोज की असल जिंदगी में कसौटी पर हिंदुस्तानियों को कसा जाएगा तो समझ आएगा कि उनकी जागरूकता अमल भी हो रही है या नहीं।
यह कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन मेरी पसंद का है और मुझे लगता है कि सामाजिक जागरूकता के लिए बहुत बार कोशिशें करनी पड़ती हैं जिनके तहत बहुत बार ऐसे कॉलम में या अखबार के संपादकीय में, और अब इन दिनों इंटरनेट पर ट्विटर या फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों पर बार-बार चर्चा छेडऩी पड़ती है। अपने बहुत से ऐसे नामी-गिरामी दोस्तों और पहचान वालों के लिखे हुए में जब आम आदमी में ही आम औरत को भी शामिल कर लिया जाता है तो वहां उन्हें टोककर और रोककर मैं कई लोगों की नाराजगी भी झेलता हूं, लेकिन कई लोग अपनी आगे की बातों में आदमी औरत के बराबरी के हक की इज्जत करना शुरू कर देते हैं।
इतिहास में दर्ज कुछ और बातें जो अभी-अभी फिर से पढऩे मिलीं वे बताती हैं कि हिटलर के उस भयानक दौर की जितनी तस्वीरें आज देखने मिलती हैं वे तमाम कोडक कंपनी के कैमरों से ली गई थीं, जिन्हें कि इस कंपनी ने नाजी राज को मुफ्त में दिया था। लोग अगर इंटरनेट पर देखें तो लाशों के ढेर की तस्वीरें और मौत से भी बुरी जिंदगी जी रहे लाखों यहूदियों की तस्वीरें देखी नहीं जातीं। इतिहास बताता है कि कोडक कंपनी की जर्मन ब्रांच ऐसे यातना शिविरों के कैदियों को बंधुआ मजदूरों की तरह इस्तेमाल करके सामान बनाती थी। और इस कंपनी के नाजियों से बहुत गहरे रिश्ते रहे।
इसी तरह फोर्ड, आईबीएम, जेपीमोर्गन जैसी कंपनियां दुनिया के सबसे बड़े हत्यारों, नाजियों के बहुत बड़े मददगार रहे हैं। जेपीमोर्गन नाजी पार्टी को फायनांस करने वाली एक बड़ी बैंक थी।
मैंने पहले भी कई बार यह लिखा है कि हिंदुस्तानियों में जिम्मेदारी के अहसास का हाल यह है कि भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार हत्यारी अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के बनाए एवररेडी सेल के बहिष्कार की बात भी किसी ने नहीं की, जबकि बाजार में उसके दर्जन भर विकल्प मौजूद थे।
इतिहास को खंगालकर देखें तो ऐसी बहुत सी कंपनियां निकलेंगी जिन्होंने इतिहास के सबसे बड़े हत्यारों का साथ दिया है। ऐसा सिर्फ दुनिया के इतिहास में हो यह जरूरी नहीं, भारत में भी बहुत सी कंपनियां हत्यारों के साथ हैं। अब सवाल यह है कि चौकस हो चुकी समझी जा रही भारतीय जनता बुरे का बायकॉट करेगी या फिर अन्ना हजारे की तरह विलासराव (आदर्श घोटाला फेम) देशमुख के हाथों प्रधानमंत्री की चिट्ठियां पाकर और उन्हीं के हाथों जवाब भेजकर खुश रहेगी?