छोटी सी बात


21 अक्टूबर
डॉक्टर के पास जाने के पहले उनकी या बाकी डॉक्टरों की पुरानी पर्चियां, पुरानी जांच रिपोर्ट ले जाना न भूलें। इसके साथ-साथ तकलीफों और सवालों को कागज पर लिखकर तैयारी से जाएं। दवा, खान-पान, सावधानी, सबके बारे में पूछने की तैयारी रखें। व्यस्त डॉक्टरों से आप उसी वक्त सोच-सोचकर नहीं पूछ सकते।

कांगे्रस-यूपीए आत्मघाती राह पर, राष्ट्रहित के खिलाफ ताजा बयान

21 अक्टूबर 20111
संपादकीय
यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी को उटपटांग बातें कहने और खुद के लिए परेशानी खड़ी करने की एक लत पड़ गई है। सुबह से शाम हो जाए और अगर यह पार्टी या सरकार अगर इस किस्म का कोई आत्मघाती काम न करे तो यह मानना चाहिए कि इसके नेता, मंत्री और अफसर छुट्टी मना रहे होंगे। और लोगों को तो छोड़ दें, अब तो लगभग मौनव्रत पर चलने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अपने ही गोल पोस्ट में गोल दागने की कोशिश करते हुए दिख रहे हैं। पिछले एक हफ्ते में उन्होंने दो ऐसे काम किए। सूचना के अधिकार पर एक सरकारी संबोधन में उन्होंने कहा कि इस अधिकार से ईमानदार और अच्छी नीयत वाले जनसेवकों का हौसला पस्त होने का एक खतरा है और इस कानून पर एक आलोचनात्मक नजर डालने की जरूरत है। उनकी इस बात पर सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक प्रमुख सदस्य अरूणा राय ने मनमोहन सिंह की धज्जियां उड़ाते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री का यह बयान पूरी तरह से गलत है। अरूणा राय इस कानून का मसौदा बनाने वाली प्रमुख व्यक्ति रही हैं और उन्होंने कहा कि सरकारी व्यवस्था को सूचना के अधिकार में नहीं उसके भीतर के भ्रष्टाचार ने प्रभावित करके रखा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को फिक्र तो उन मौतों की करनी चाहिए जो कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं को जगह-जगह मिल रही है, न कि नौकरशाहों की असुविधा की।
मनमोहन सिंह का यह बयान एक ऐसे वक्त आया है जब ईमानदारी और बेईमानी की बहस में उनकी सरकार की विश्वसनीयता आजादी के बाद से अब तक किसी भी सरकार की सबसे कम विश्वसनीयता है, और जब उनकी खुद की अगुवाई वाली केंद्र सरकार चोर, बेईमान और डकैत की तरह जनता की नजरों में गिर चुकी है, तब उस सूचना के अधिकार को कोसना हैरान करने वाला लगता है जिसने कि सारे बड़े भांडाफोड़ के पीछे अपना योगदान दिया है। फिर मानो गुपचुप रहने वाले मनमोहन सिंह के लिए अरूणा राय का कहना काफी नहीं था तो उन्होंने भाजपा के लाल कृष्ण आडवानी को यह नसीहत दे डाली कि वे अपनी रथयात्रा के दौरान कड़े या कड़वे शब्द कहने से बचें। अब राजनीति में कोई एक-दूसरे को कड़े या कड़वे शब्द से बचने को कहे, तो यह बात राजनीति से अनजान कोई इंसान ही कर सकता है। इसके जवाब में आडवानी ने जो कहा वह बहुत जायज बात थी कि उन्होंने तो महज इतना कहा था कि नेहरू से लेकर आज तक तमाम प्रधानमंत्री उन्होंने देखे हैं और मनमोहन सिंह उनमें से सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं। आडवानी ने पूछा कि इसमें कड़ी या कड़वी बात क्या है?
इस बात पर भी आज हम शायद यह संपादकीय नहीं लिखते लेकिन कल की एक दूसरी खबर और चौंकाने वाली है। अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते आज सबसे भयानक हालत में हैं। अमरीका ने आतंकियों की सरकारी मदद के लिए पाकिस्तान को बुरी तरह से घेर लिया है और अमरीकी सरकार के भीतर उस पाकिस्तानी आतंक पर भारी तमतमाए हुए तेवर हैं, जिस आतंक ने भारत पर हमले करके सैकड़ों जानें ले ली हैं। ऐसे मौके पर जब अमरीकी विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंच रही हैं और भारत की जनता सहित बाकी दुनिया भी यह देख रही है कि एक नाकामयाब लोकतंत्र पाकिस्तान को उसके अन्नदाता अमरीका की लताड़ कैसे पड़ती है तब भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा ने बेमौके का यह बयान दिया है कि भारत अमरीका और पाकिस्तान जैसे दोस्त देशों के बीच कोई मतभेद देखना नहीं चाहता और इन दोनों को बातचीत की मेज पर अपने मतभेद निपटा लेना चाहिए जिससे कि दूसरे देशों, खासकर भारत के लिए दिक्कतें खड़ी न हों। भारतीय विदेश मंत्री का यह बयान हाल के महीनों में उनकी पाकिस्तान की एक खूबसूरत, नौजवान और नई विदेश मंत्री से कुछ बार की मुलाकातों के उत्साह से पैदा हुआ अधिक दिख रहा है, भारत की विदेश नीति की समझदारी से उपजा हुआ कम। सच तो यह है कि यह बयान भारत के राष्ट्रीय और विदेशी हितों के ठीक खिलाफ है और यह पाकिस्तानी आतंक के खिलाफ भारत के लगातार खड़े किए जा रहे एक ठोस मामले को किनारे करते हुए एक ऐसी नौबत ला रहा है जिसके चलते अमरीका पाकिस्तान के खिलाफ अधिक खफा होने से बच भी सकता है। अमरीका और पाकिस्तान के बीच मतभेद अगर अमरीकियों पर पाकिस्तानी मदद से होने वाले आतंकी हमलों की वजह से खड़े हुए हैं, तो उन पर नरमी बरतकर भारत का विदेश मंत्री क्या साबित कर रहा है? आज तो पाकिस्तान जब सरकार, सेना और खुफिया एजेंसियों की आतंक में भागीदारी के सुबूतों से घिरते चले गया है तब भारत को अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत इस बात में लगा देनी थी कि पाकिस्तान का सबसे बड़ा फौजी मददगार अमरीका उसके सिर पर से अपना हाथ हटाए। एक तरफ पाकिस्तानी फौज और कुख्यात पाकिस्तानी फौजी खुफिया एजेंसी, आईएसआई, अमरीका के साथ एक टकराव का दंभ भरते हुए खड़े हैं, खुद अमरीकी विदेश मंत्री अभी कुछ घंटे पहले पाकिस्तान में वहां की सरकार को यह कह चुकी है कि आप अपने घर के पिछवाड़े में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह सिर्फ आपके पड़ोसी को डसेगा, ऐसे में भारत की पाकिस्तान के साथ हमदर्दी और नरमी हक्का-बक्का कर देने वाली है। अब तक पता नहीं क्यों भाजपा के भी किसी भूतपूर्व विदेश मंत्री का ध्यान इस पर नहीं गया है, लेकिन हम इसे मनमोहन सरकार का एक और आत्मघाती बयान मानते हैं जो पूरी तरह से भारत के लिए आत्मघाती है। एस.एम. कृष्णा इसके पहले भी कई किस्म की कूटनीतिक चूकें कर चुके हैं और अब तो जब प्रधानमंत्री कई किस्म के अवांछित बयान देना शुरू कर चुके हैं तो फिर बाकी मंत्रियों को तो मानो गलतियां और गलत काम करने का एक हक ही मिल जा रहा है।

छोटी सी बात


20 अक्टूबर
इन दिनों टेलीविजन की खबरों में नफरत के साथ बोलने वाले लोग बढ़ गए हैं। हिंदी के अधिकतर टीवी सीरियलों में पहले से यह बात रही है। इन सबसे अपने बच्चों को बचाएं। उनके स्वभाव में अगर ऐसी नफरत घर कर गई तो किसी दिन आसपास के लोग भी उसका शिकार हो सकते हैं।

वे करें तो लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला है...



20 अक्टूबर
संपादकीय
अन्ना हजारे के साथ इन दिनों जमकर खड़ी हुईं किरण बेदी को लेकर एक नया मामला अभी उजागर हुआ है कि वे जिन कार्यक्रमों में जाती हैं, उनके आयोजकों से विमान का सबसे महंगा भाड़ा लेती हैं लेकिन वे सस्ती टिकट पर सफर करती हैं। इस रिपोर्ट के छपने पर उन्होंने यह सफाई दी है कि ऐसी बचत को वे अपने एनजीओ में लगा देती हैं और बहुत से आयोजकों को यह बात मालूम भी रहती है। यह मामला 'छत्तीसगढ़Ó के पास कई महीने पहले आया था जब वे रायपुर के दो-तीन कार्यक्रमों में आकर लौटी थीं। लेकिन उस समय देश में अन्ना हजारे का आंदोलन जोरों पर था और इस अखबार ने सोच-समझकर उस समय इस रिपोर्ट को रोका था क्योंकि उसे छापने का एक असर अन्ना हजारे के आंदोलन को नुकसान पहुंचाना भी हो सकता था और उस समय जिन बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के मामले हवा में थे, उनके मुकाबले किरण बेदी का यह मामला उस वक्त अधिक चर्चा का हकदार नहीं था। लेकिन आज जब दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में पूरी रिपोर्ट छापी है तो उस समय से हमारे पास रखी हुई जानकारी की खबर भी हम बनाकर एक्सप्रेस की रिपोर्ट के साथ-साथ आज छाप रहे हैं। इस पूरे मामले को देश के अन्ना-समर्थक उनकी टोली पर एक और हमला मान रहे हैं लेकिन हमारा यह मानना है कि ईमानदारी और पारदर्शिता का झंडा उठाकर जो लोग पूरे देश को जगाने में लगे हैं, जो लोकतंत्र के सभी संगठनों को आरोपों के घेरे में खड़ा करके उनसे जवाब-तलब कर रहे हैं, उन लोगों को अपने सार्वजनिक कामकाज के बारे में जवाबदेह तो रहना ही चाहिए। इसलिए किरण बेदी से उनके सार्वजनिक हिसाब-किताब को लेकर अगर मीडिया कुछ पूछ रहा है, उनके अपने तरीके के हिसाब-किताब और किफायत को गलत मान रहा है तो इस पर उन्हें तो सफाई देनी ही चाहिए, किसी और को इसमें साजिश नहीं देखनी चाहिए। आखिर ये पूरे हिसाब-किताब तो किरण बेदी और उनके उस संगठन के हैं जो कि अपने सार्वजनिक कामकाज, कमाई और खर्च के लिए देश के कानून के तहत सरकार और जनता दोनों के प्रति जवाबदेह हैं। यह किरण बेदी का कोई निजी कारोबार तो है नहीं जिसके लिए कि वे सिर्फ टैक्स विभागों के प्रति जवाबदेह हों, इसलिए हम अभी उनकी सामने आई सफाई को काफी नहीं मानते और पूरे हिसाब-किताब के खुलासे की उम्मीद करते हैं।
उनका यह तर्क सही और सच शायद हो सकता है कि ऐसी बचत को वे अपने एनजीओ को दे देती हैं, और यह तर्क भी शायद सही और सच हो सकता है कि उनका एनजीओ समाजसेवा में इसे खर्च करता हो, लेकिन देश के कानून के मुताबिक दान या खर्च लेने और उसे खर्च करने के कुछ नियम बने हुए हैं। और देश के कानून और नियमों की जिन कसौटियों पर राजा, कलमाड़ी या अमर सिंह को कसा जा रहा है, वही कसौटियां तो नेहरू, गांधी या अन्ना-बाबा की टोलियों के लिए रहेंगी। दो अलग किस्म के कानून तो इस देश में नहीं हो सकते, जिनमें से एक उन लोगों पर लागू हो जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, और दूसरा उन लोगों पर लागू हो जो भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं। केन्द्र सरकार अगर अन्ना हजारे और उनके साथियों से नाखुश है तो वह उनके मामलों की जांच करा सकती है, किरण बेदी ने अपने सफर के लिए अगर पिछले बरसों में संस्थाओं से जरूरत से कई गुना पैसे लिए तो यह तो केन्द्र सरकार की किसी साजिश के तहत नहीं हो सकता, यह किरण बेदी का अपना फैसला था। अब अपने इस फैसले को नैतिक और वैधानिक साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी इसलिए है क्योंकि वे पूरे देश को नैतिकता और वैधानिकता की पटरियों पर चलाने के लिए रात-दिन एक कर रही हैं।
हमारे पास अपने समाचार की जो जानकारी है और जो इंडियन एक्सप्रेस ने छापा है उन दोनों को देखते हुए हमें किरण बेदी का यह फैसला नैतिक और सही तो नहीं लगता कि वे एक सफर का पैसा दो-दो संस्थाओं से मांगें, सस्ता सफर करके महंगा भाड़ा वसूलें। वे अपने एनजीओ में कोई नेक काम करती हो सकती हैं, लेकिन उन्हें बुलाने वाली संस्थाएं भी जब नेक काम करने वाली हों तो उनसे अधिक वसूली करके उसके अपनी मर्जी के इस्तेमाल का कोई नैतिक हक उन्हें हो सकता है? अन्ना हजारे नैतिकता की बात करते हुए एक बहुत ही बुजुर्ग और समझदार इंसान हैं। इसी टीम में कर्नाटक में हाईकोर्ट के जज रहे हुए और लोकायुक्त रहे हुए संतोष हेगड़े भी हैं। अब देखना यह है कि गांधीवादी नैतिकता और पारदर्शिता की कसौटी पर पूरे देश को रगड़ते हुए बैठे अन्ना हजारे किरण बेदी के इस काम को किस रंग का और कितना खरा सोना पाते हैं। दूसरी तरफ जस्टिस हेगड़े इस मामले को कानून और लोकायुक्त के पैमानों पर नाप सकते हैं कि यही काम अगर किसी नेता या अधिकारी ने किया होता तो एक जज या लोकायुक्त इस मामले को कैसा पाता।
जब सार्वजनिक जीवन में बहुत ऊंचे नैतिक मूल्यों को लेकर लोग आंदोलन करते हैं, बेईमानों के खिलाफ पूरे देश के सामने मसखरी के अंदाज में उनका मखौल उड़ाते हैं तो वे अपने आपको भी कांच के एक मर्तबान में जनता के सामने रखने को मजबूर रहते हैं। किरण बेदी के साथ भी आज यही दिक्कत है। उनका किया हुआ काम किसी साधारण इंसान के लिए तो बच निकलने का तर्क हो सकता था, लेकिन उन्होंने रामलीला मैदान से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की खिल्ली उड़ाते हुए घूंघट काढ़ कर जिस तरह जनता का मनोरंजन किया था, उससे वे सार्वजनिक जीवन के प्रति कुछ अधिक जवाबदेह हैं। और हम उम्मीद करते हैं कि उनके जवाब देश के कानून, नियम और नैतिक मूल्यों, सबको चुप करा पाएं।
इस बारे में इंटरनेट पर कुछ लोगों का लिखा हुआ यह ट्वीट हमें दिलचस्प लगा- वे करें तो लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला है...

छोटी सी बात

19 अक्टूबर 11
जब कमाई और खर्च का हिसाब करना हो तो बारीकी से सही-सही आंकड़े लिखें। इसके बाद कमाई को आधा कर लें और खर्च को दुगुना। इतने बुरे दिन भी तैयारी कर लें, तो फिर धोखा नहीं होगा।

संपन्न लोगों को हज-अनुदान क्यों?

18 अक्टूबर 20111
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह नोटिस जारी किया है कि वह वीआईपी कहे जाने वाले प्रभावशाली लोगों की हज यात्रा पर सबसिडी क्यों दे रही है? अल्पसंख्यक धर्मों के धार्मिक रीति-रिवाजों में सरकारी खर्च से अनुदान देने के भारत के संवैधानिक प्रावधान के चलते भारत के संपन्न मुसलमान भी हज जाने के लिए सरकारी अनुदान पा रहे हैं। हम सुप्रीम कोर्ट की इस आपत्ति से पूरी तरह सहमत हैं। पहले भी हम कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए सरकारी पैसों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। कानून के कुछ जानकार लोगों का यह कहना है कि बहुसंख्यक धर्मों के लिए संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है लेकिन अल्पसंख्यक धर्मों के लोगों के लिए ऐसा इसलिए जरूरी है कि वे भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए भी हैं और बहुसंख्यक समाज की तरह वे अपने धार्मिक कार्यक्रम नहीं कर पाते।
जब कभी जनता के पैसों से किसी धर्म को बढ़ावा देने की बात आती है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले या धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वाले देश में राज करने वाली सरकारें अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधाराओं के मुताबिक या अपनी-अपनी चुनावी प्राथमिकताओं के मुताबिक खर्च करने में जुट जाती हैं। छत्तीसगढ़ में हम राजिम कुंभ के नाम पर सरकार का बहुत बड़ा खर्च होते देखते हैं और हिंदू धर्म के कार्यक्रम सरकारी खर्च पर इस राज्य में इतने अधिक होते हैं कि बाकी धर्मों के लोगों को एक शिकायत बनी ही रहती है। भारत की संवैधानिक व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के धर्म के लिए सरकारी खर्च की जो बात रखी गई है उसमें यह फेरबदल करने की जरूरत है कि ऐसी कोई भी मदद सिर्फ उसी काम के लिए की जाए जो कि उस धर्म के बहुत गरीब लोगों के लिए जरूरी हो। गरीबी की रेखा के नीचे के किसी इंसान के लिए अगर सरकार हज जाने के लिए कुछ अनुदान देती है तो उसे एक बार समझा जा सकता है। लेकिन बाकी लोगों को, जिनके पास अपने खर्च से हज करने की ताकत है, उनको क्यों सरकार हज कराए? नतीजा यह होता है कि भाजपा के राज वाले छत्तीसगढ़ सहित शायद एक-दो और राज्यों में भी अब मानसरोवर की यात्रा के लिए हिंदुओं को (या शायद सभी को) अनुदान देना शुरू किया गया है। और यह अनुदान सभी आय वर्ग के लोगों को मिल रहा है। सरकार को धर्म से अपने-आपको अलग करना चाहिए। जो संपन्न लोग हैं उनको अपनी निजी आस्था के लिए, अपने निजी इलाज के लिए सरकारी मदद क्यों लेनी चाहिए?
दूसरी तरफ देश भर में सुप्रीम कोर्ट इस बात की निगरानी कर रहा है कि सार्वजनिक जगहों पर धार्मिक अवैध कब्जे और अवैध निर्माण सरकारें हटा रही हैं या नहीं? इसके बावजूद हम लगातार यह देख रहे हैं कि सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने के लिए जहां मजबूरी में किसी धार्मिक स्थल को हटाना पड़े तो भी शासन-प्रशासन इससे बचकर रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। जनता की जिंदगी को जहां धर्म के नाम पर गैरकानूनी काम मुश्किल कर रहे हैं, वहां भी नेता-अफसर डरे-सहमे दिखते हैं। सरकार के इस तरह दहशत में रहने से धार्मिक कट्टरता, आक्रामकता, हिंसा और बाकी किस्म के धार्मिक अपराध बढ़ते चलते हैं। ऐसी बातों से यह भी स्थापित होता है कि धर्म कानून से ऊपर है। और यह सोच आगे बढ़कर धार्मिक हमलों और दंगों तक पहुंचती है। सरकार की धर्मनिरपेक्षता का यह मतलब नहीं होना चाहिए कि वह सभी धर्मों की धर्मान्धता को एक बराबरी से बर्दाश्त करे।
दूसरी गड़बड़ी हम यह देख रहे हैं कि भारत में सरकारी कुर्सियों पर मजा करने वाले लोगों से लेकर सभी धर्मों के मठाधीशों तक, किसी की भी दिलचस्पी सुधारवाद और उदारवाद में नहीं दिखती। पे्रम के बजाय नफरत का जोड़ अधिक मजबूत मानकर ऐसे तमाम धार्मिक लोग अपने लोगों को किसी दूसरे अज्ञात, काल्पनिक या झूठे दुश्मन के खिलाफ डराते हुए जोड़कर रखते हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और जाति आधारित संगठन सुधार की बातें करते शायद ही दिखते हैं। यह सिलसिला इस देश को पत्थर युग की तरफ ले जाने की कोशिश करता है। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा नोटिस से एक बहस शुरू होनी चाहिए और अल्पसंख्यक समुदायों के ताकतवर और संपन्न लोगों से सरकारी खर्च पर दी जाने वाली सारी रियायतें छीन लेनी चाहिए। यह बात हमारी उसी सोच से उपजी हुई है कि आरक्षण का फायदा भी मलाईदार तबके को नहीं मिलना चाहिए।

छोटी सी बात


18 अक्टूबर
बाजार हर कुछ दिनों में आपको थोड़ी सी नई खूबियों वाले सामान पेश करते रहता है। लेकिन उनकी तरफ लपकने के पहले सोच लें कि उस सामान के पुराने मॉडल का आपने कितना इस्तेमाल किया है? और नई खूबियों से क्या आपको कोई फर्क पडऩे वाला है? अलमारी में बंद 10 मेगापिक्सल कैमरे की जगह 14 मेगापिक्सल का कैमरा लेकर बंद रखे रहने का क्या फायदा?

इजराइल-फिलस्तीन की सरहद से सबक लेने की जरूरत

18 अक्टूबर 20111
मध्य-पूर्व एशिया में इस वक्त एक ऐतिहासिक घटना घट रही है। एक इजराइली सैनिक बरसों के बाद फिलस्तीन के गाजा वाले हिस्से से रिहा किया जा रहा है और इसके बदले इजराइल की जेलों से सरकार और वहां की अदालत दोनों की मंजूरी से करीब हजार फिलस्तीनी कैदी रिहा किए जा रहे हैं। सात बरस से यह इजराइली सैनिक फिलस्तीन के इस हिस्से पर काबिज और राज कर रहे वहां के हथियारबंद संगठन हमास का कैदी था। हमास इजराइल के साथ फिलस्तीन के ऐतिहासिक झगड़े को निपटाने में सैनिक कार्रवाई पर भरोसा रखने वाला संगठन है और उसे कुछ लोग एक आतंकी संगठन भी गिनते हैं। हमास के रिश्ते फिलस्तीन के दूसरे हिस्से, पश्चिम तट, के प्रधानमंत्री महमूद अब्बास से बहुत खराब हैं और अब्बास की बातचीत से समझौते की सोच को हमास खारिज करता है। पिछले दिनों अब्बास ने संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलस्तीन को एक देश का दर्जा देने का जो प्रस्ताव रखा था, उस पर हमास असहमत था, और यह माना जा रहा है कि कैदियों की अदला-बदली का यह ताजा काम हमास ने अब्बास की संयुक्त राष्ट्र पहल का मुकाबला करने के लिए और अपने अस्तित्व को दिखाते चलने के लिए किया है। जो भी हो, फिलस्तीन और इसराइल के बीच सरहद के दोनों तरफ हथियारबंद हमलों और जवाबी हमलों में पिछले दशकों में अनगिनत मौतें हुई हैं और इजराइल की फौजी ताकत के मुकाबले गाजा के नौसिखिए लड़के बहुत अधिक जानें खो चुके हैं।
लेकिन हम उस मुद्दे की अधिक बारीकियों में जाने के बजाय कैदियों की अदला-बदली की इस पहल पर बात करना चाहते हैं। दो देश हों या एक देश के भीतर किसी सरकार या किसी संगठन के बीच का तनाव हो, उसे कम करने के जो-जो रास्ते हो सकते हैं, उनका इस्तेमाल होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कैदियों को लेकर आधी सदी से कई किस्म के तनाव चल रहे हैं। दोनों तरफ से दिल छू लेने वाली तकलीफदेह असली कहानियां आती ही रहती हैं। पाकिस्तान का एक मरणासन्न, बहुत बूढ़ा प्रोफेसर भारत में एक मामले में फंसकर यहां की जेल में मर जाने के करीब है, और ऐसी ही बहुत सी जिंदगियां पाकिस्तान की जेलों में कैद है। सआदत हसन मंटो अब नहीं रहे नहीं तो वे 'टोबा टेकसिंहÓ जैसी और बहुत सी कहानियां लिख पाते। दुनिया में आज सरहद के आरपार जो सबसे बुरे किस्म की दुश्मनी की मिसाल है वह इजराइल और फिलस्तीन की है। और अगर आज उनके बीच इंसानी जिंदगियों के लेन-देन का कोई रास्ता निकल सकता है, तो भारत और पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी तो उनके मुकाबले कुछ भी नहीं है।
अब दूसरा सवाल यह उठता है कि सरहदों से परे भी, एक ही देश और एक ही जमीन पर, दो राजनीतिक दलों के बीच, अन्ना और यूपीए सरकार के बीच, कांगे्रस और भाजपा के बीच, कुकुरहाव किस्म की नोंक-झोंक के बिना क्या सभ्य, समझदार और जिम्मेदार इंसानों की तरह बातचीत नहीं हो सकती? आज मुलाकात की जहां जरूरत है वहां मुक्कालात के अलावा कुछ नहीं दिखता, और बहुत आम लोग भी जहां यह देखकर महसूस करते हैं कि अपने-आपको दिल-दिमाग वाला होने का दावा करने वाले इंसान, पूरी बेदिली से सांडों की तरह सिर टकराते हुए यह साबित करते हैं कि खोपड़ी की कड़ी खोल अधिक महत्वपूर्ण है बजाय भीतर के नरम दिमाग के। पहले भी हमने एक-दो बार यह लिखने की कोशिश की कि जो लोग अपने-आपको राजनीति, सरकार या समाज के नेता कहते हैं वे अपने अहंकार को छोड़कर व्यापक जनहित में समझदारी की बात करने को तैयार क्यों नहीं होते? हमारा ऐसा भरोसा है कि आने वाले बरसों में भारत की शब्दावली में जिद, बददिमागी और घमंड के समानार्थी शब्दों में केजरीवालिज्म जैसा एक शब्द और जुडऩे जा रहा है। कुछ अरसा पहले अन्ना को लेकर हमने कुछ शब्द सुझाए थे लेकिन अब पिछले महीने इस बात के गवाह हैं कि केजरीवाल अन्ना की चीनी मिट्टी के बरतनों की दूकान में उनके अपने पालतू सांड हैं। कैसे भारत की जहरीली हवा साफ हो और कैसे इस किस्म के पचीस-पचास बकवासी लोग देश के वक्त को बर्बाद करने के ओवरटाईम काम से बेदखल किए जाएं, और कैसे गांधी के नामलेवा इस लोकतंत्र में गांधीवाद और लोकतांत्रिक तरीके से आपस में बातचीत हो सके, इसके बारे में इन गिरोहबंदियों से आजाद होकर इस देश को व्यापक जनकल्याण के रास्ते निकालने चाहिए। उदार और खुली समझ और सोच रखने वाले लोगों को मनीष तिवारी, केजरीवाल जैसे लोगों को हाशिए पर धकेलने के लिए सार्वजनिक बहस छेड़कर कोशिश करनी चाहिए।

छोटी सी बात

17 अगस्त 2011
घडिय़ों का समय आगे रखना ठीक नहीं होता। ऐसे में कभी सही समय से चलती घड़ी के मुताबिक चलकर आप धोखा भी खा सकते हैं।

खारिज कर दी गई कांग्रेस के आत्ममंथन का वक्त

17 अक्टूबर
संपादकीय
हरियाणा के हिसार उपचुनाव की खबर चर्चा में कुछ अधिक रही वरना देशभर में अलग-अलग राज्यों में होने वाले इक्का-दुक्का उपचुनाव इतनी बड़ी खबर नहीं बनते। लेकिन सभी राज्यों के करीब आधा दर्जन उपचुनावों के नतीजे पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ गए हैं। मतदाताओं ने एक किस्म से पंजे को मरोड़कर रख दिया है। इससे देशभर में कांग्रेस के खिलाफ चल रही एक लहर, एक जनमत दोनों का एक संकेत मिलता है। हम अकेले हिसार के नतीजों को महत्वपूर्ण इसलिए नहीं मानते क्योंकि वहां पर चुनाव शुरू होने के पहले ही कांग्रेस हारी हुई थी और कोई अगर यह सोचता है कि अन्ना हजारे की टोली के प्रचार से वहां जीती हुई कांग्रेस बाजी हार गई, तो ऐसा सोचना एक नासमझी होगी। लेकिन दो हिसाब से उपचुनावों के इन नतीजों को देखने की जरूरत है। एक तो यह कि कांग्रेस कैसे अपना घर सुधारे जो कि घरवाली के बाहर रहने से महीने दो महीने में ही उजाड़-बर्बाद हो गया है, दूसरी बात यह कि राजनीतिक चुनावों में जब गैर राजनीतिक ताकतें, संगठन और लोग किसी को जिताने और हराने पर अमादा हो जाते हैं तो उसे लोकतंत्र पर किस तरह का खतरा खड़ा हो सकता है। इन उपचुनावों से किसी भी प्रदेश या देश में कोई संतुलन नहीं बिगड़ रहा, लेकिन चुनावों को अपनी जिद्द से प्रभावित करने का सिलसिला आगे भी चल सकता है और वह अपनी बदनीयत तो पूरी कर सकता है, लोकतंत्र का कोई भला नहीं कर सकता।
यह दूसरी बात हम इसलिए कर रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा लेकर उत्पात कर रही अन्ना टोली ने हरियाणा के चुनाव में कांग्रेस को हरवाने का काम नहीं किया है बल्कि वहां पर कांग्रेस के सबसे बुरे नाम वाले नेताओं में से एक, आयाराम गयाराम शब्दावली को जन्म देने वाले दलबदल के जन्मदाता भजनलाल के बेटे को जिताने का काम किया है। बिना किसी कारोबार के भजनलाल का बेटा आधे अरब का तो घोषित रूप से मालिक हैं और अघोषित की बात का अंदाज जनता खुद लगा सकती है। ऐसे में बेईमान और भ्रष्ट पार्टी को हराने का सारा नारा बोगस रहा और जैसा कि एक टीवी पत्रकार ने अभी-अभी इंटरनेट पर लिखा कि अरविंद केजरीवाल अपने खुद के शहर हिसार से लड़कर जीतकर बताते तो वह अन्ना टोली की जीत होती। हम पिछले दिनों में लगातार अन्ना हजारे के अभियान को उजागर करते आए हैं, भाजपा के भ्रष्टों के खिलाफ अन्ना हजारे की चुप्पी को कोई भी समझदार एक मौन व्रत नहीं मानेगा इसलिए उनकी चुनावी कोशिशों को हम कोशिश के बजाए साजिश मानने को बेबस हैं।
लेकिन दूसरी बात यह भी है कि कांग्रेस पार्टी को यह देखना है कि आज पूरे देश के तेवर उसके खिलाफ क्यों हैं? उसके अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन की चोरी और डकैती को देखकर देश हक्का-बक्का है और ऐसी भ्रष्ट पार्टी के लोगों का बड़बोलापन देख-देखकर लोग और हक्का-बक्का हैं। उस वक्त तो सोनिया गांधी देश में नहीं थीं जब उनकी पार्टी के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी की तर्ज पर अन्ना हजारे की टोली को ए कंपनी कहा था और इतनी भद्दी जुबान का इस्तेमाल किया था कि बाद में उन्हें अदालती मुकदमे से बचने के लिए और प्रवक्ता का पद बचाने के लिए लिखकर अन्ना हजारे से माफी मांगनी पड़ी थी। लेकिन आज तो सोनिया गांधी बैठकर टीवी देखती होंगी जब उनके निजी सिपाही दिग्विजय सिंह अन्ना हजारे को आरएसएस का एहसानफरामोश करार दे रहे हैं, बयान के अलावा ऐसी चिट्ठी भी लिख रहे हैं। दिग्विजय सिंह के तर्क और उनके तीर वैचारिक आधार पर कोई जायज चाहे ठहरा ले, भारतीय संस्कृति और भारतीय उदारता के हिसाब से दिग्विजय के हमले बहुत ओछे और घटिया माने जा रहे हैं। अब सोनिया गांधी अगर इस पर चुप हंै तो हम इस चुप्पी को कर्नाटक के भाजपाई भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे की चुप्पी से अलग किस्म की चुप्पी कैसे मान लें?
कांग्रेस को यह भी सोचना चाहिए कि एक अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री रहते हुए आज पूरे देश में महंगाई को लेकर यह बुरा हाल क्यों हैं? गांधी और नेहरू के वारिस होने का दावा करने वाली इस पार्टी के इतने लोग और इतने साथी जेलों में क्यों हैं? इस पार्टी के इतने नेता बिना कारोबार भजनलाल और वाईएसआर कैसे बन जाते हैं? और क्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में कोई पार्टी अपने मुखिया और अपने प्रधानमंत्री दोनों की चुप्पी के साथ जनता का विश्वास जीत सकती है, उसे भरोसा दिला सकती है? इन उपचुनावों से कांग्रेस को आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का एक मौका मिल रहा है और उसे अपना घर, अपनी भाषा और अपनी नीयत इन सबको सुधारना चाहिए वरना अगले आमचुनाव के नतीजे तो अभी से देश की दीवारों पर लिखे हुए दिख रहे हैं।

वॉल स्ट्रीट से पगडंडी इधर भी आएगी?

17 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार
अमरीका के शेयर बाजार और वित्तीय संस्थानों के प्रतीक वॉल स्ट्रीट में दुनिया की जिंदगी पर गहरी जकड़ बना चुके कारोबारी खूनी शिकंजे के खिलाफ ऐतिहासिक प्रदर्शन चल रहे हैं। इनसे बाजार की सेहत पर कोई फर्क पड़ रहा हो या न पड़ रहा हो, दुनिया पर बाजार के एक हत्यारे कब्जे के खिलाफ एक सोच खड़ी हुई है जो कि धीरे-धीरे अमरीका से परे भी बाकी देशों में फैलती जा रही है। अमरीका के बहुत से बड़े शहरों में यह आंदोलन जोर पकड़ चुका है और आज सुबह की एक खबर बताती है कि यह चार महाद्वीपों में चल रहा है। ऑस्ट्रेलिया, इटली, ब्रिटेन, जापान, हांगकांग, कोरिया, ताईवान जैसे देश इस फेहरिस्त में जुड़ते जा रहे हैं। (नीचे की रिपोर्ट भी देखें)।
ओडब्ल्यूएस (ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट) वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो नाम का यह आंदोलन दुनिया में आर्थिक शोषण और असमानता के खिलाफ आज एक प्रतीकात्मक आंदोलन है, लेकिन एक वक्त हिंदुस्तान की नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ आंदोलन भी माओवादी विचारधारा का एक प्रतीकात्मक आंदोलन था जो आज दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दिया गया है।
न्यूयॉर्क शहर में अमरीका की कारोबार की सड़क से जो जख्मी चली आ रही और आज हमलावर हो गई सोच की आग आगे पता नहीं कितने दूर तक फैलेगी लेकिन  इसने इंसानों पर बाजार के लगातार हमलों के खिलाफ एक जागरूकता शुरू की है।  इस मुद्दे पर वैसे तो बहुत कुछ छप रहा है लेकिन इस पर आज लिखने के पीछे मेरी नीयत भारत से इसे किसी तरह जोडऩे की है। इस देश में किसानों और आदिवासियों की जमीनों, नदियों, खदानों को लेकर आजादी के पहले से जिस किस्म की लूट और डकैती चल रही थी वह हाल के बरसों में एक संगठित अपराध वाले माफिया के अंदाज में पहुंच गई थी। नेता-अफसर और कारखानेदार मिलकर जिस बेरहमी से जनता के हक की कुदरती दौलत को जेब कर रहे थे, उसके खिलाफ नक्सल आंदोलन ने एक जागरूकता खड़ी की और फिर गैरनक्सल संगठनों ने देश भर की अदालतों तक जाकर इस लूटमार को धीमा किया है।
कमोबेश इसी तरह का हाल भारत के उन शहरी इलाकों में भी चल रहा है जहां पर नक्सलियों की तरह की गुरिल्ला लड़ाई मुमकिन नहीं है और न ही सुविधाभोगी हो गए शहरी लोगों के बीच लडऩे का वैसा माद्दा रहता है जैसा कि जंगल में बसे हुए उन लोगों में रहता है जिनके पास खोने को कुछ नहीं रहता। लेकिन सूचना के अधिकार  का एक असर यह हुआ कि शहरी भ्रष्टाचार नाम की लूटमार के खिलाफ भी मामले अदालतों तक पहुंचे और नेता-अफसर जेल गए।
अब सवाल यह उठता है कि न्यूयॉर्क की वॉल स्ट्रीट हो या भारत के छोटे-बड़े शहरों की भीड़, ये किस तरह संगठित रूप से इंसान की हिमायत कर सकते हैं? शहरों में नक्सली तो जंगलों की तरह कामयाब हो नहीं सकते और उनके हिंसा के तरीके से दुनिया के आंदोलनकारियों में से अधिकतर असहमत भी होंगे। लेकिन सवाल यह है कि नक्सलियों के बिना अगर जंगलों में बसे आदिवासियों और गरीबों के शोषण और उन पर सरकारी, राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जुल्म का मुद्दा ही शहरी लोकतंत्र की नजरों में नहीं आता, तो फिर शहरों में चल रहे ऐसे तमाम जुल्म किस किस्म के नक्सलवाद या किस अहिंसक आंदोलन से लोगों की नजरों में आ सकेंगे?
पिछले कुछ दिनों की खबरों को देखें तो भारत में एक भयानक हालत यह है कि अमर सिंह से लेकर येदियुरप्पा तक बड़े-बड़े सरकारी अस्पतालों में आलीशान इलाज पा रहे हैं, और गरीब गर्भवती औरतें सरकारी अस्पतालों में जगह न पाकर आधी रात को अस्पताल के सामने फुटपाथ पर रहमदिल कारों की आड़ में बच्चा पैदा करने और फिर उसकी मौत देखने को बेबस हैं। इन दो बातों को एक साथ मिलाकर देखें तो लगता है कि सिवाय नक्सल हिंसा के कैसे शहरों में इस बेइंसाफी का मुद्दा कोई उठा सकता है? यह बात बहुत साफ है कि जंगल और खदानों वाले राज्यों में अगर नक्सली इस कदर कब्जा न कर चुके होते तो भारत की सरकारें और यहां की राजनीतिक पार्टियां भूमि अधिग्रहण के, खदानों के कानूनों पर खुद होकर इस तरह की चर्चा कभी न करतीं।
इस देश और इसके प्रदेशों में जितने बड़े-बड़े घोटाले हो रहे हैं, मायावती जैसे निर्वाचित लोग जिस कदर तानाशाही, बेशर्मी और हिंसा से जनता के पैसों से आत्मस्तुति कर रहे हैं, उसके खिलाफ एक शहरी सोच खड़ी करने के लिए कौन सा रास्ता हो सकता है?
भारत में हिंदी के रोमांचक और जासूसी उपन्यास लिखने वाले एक जाने-माने लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने बहुत पहले एक किताब लिखी थी-खबरदार शहरी। इसकी कहानी मुझे कुछ धुंधली सी याद है और इसमें भारत के कानून और सरकार की नाकामयाबी से थके हुए शहरी जागरूक लोगों की एक टीम खुद ही अपराधियों को निपटाने में लग जाती है। यह तो एक कहानी की बात है, हकीकत में तो किसी भले इंसान को मारना और किसी अपराधी को मारना, एक सरीखा जुर्म है और लोकतंत्र में ऐसे किसी जुर्म की जगह नहीं हो सकती, लेकिन भारत में बहुत बार बनने वाली ऐसी फिल्में भी लोगों को याद होंगी जिनमें कोई थका हुआ पुलिस अफसर नेताओं को ही मारने पर उतारू हो जाता है।
भारत में भी शहरी और गैरगरीब तबकों के ऐसे लोग हैं जो अपनी खुद की जिंदगी में बहुत अधिक कमी न रहने के बावजूद यह मानते हैं कि हिंसा के बिना सबसे कमजोर तबके को इस देश में कभी कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। हम हिंसा के खिलाफ रहते हुए भी यह समझना चाह रहे हैं कि जेल पहुंचते ही आलीशान अस्पताल तक पहुंच जाने वाले नेताओं को निकालकर फुटपाथ पर किस तरह फेंका जाए और किस तरह फुटपाथ पर बच्चा जनती गरीब औरत को अस्पताल के भीतर जगह दिलवाई जाए? किस तरह रोज कमाने-खाने वाले लोगों की बेदखली को रोका जाए और ईश्वर के नाम पर उन्हीं जगहों के इर्दगिर्द बड़े-बड़े अवैध कब्जे, अवैध निर्माण, सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ आदेश के बाद भी बेदखल न होने के मुद्दे को उठाया जाए?
मीडिया तो अपने कारोबार और अपने टीआरपी, अपनी छपी हुई कॉपियों की गिनती, विज्ञापन के अपने कारोबार, इन सबकी असुविधा न होने पर ही सबसे कमजोर तबके की किसी बात को उठाने के बारे में सोच सकता है, और अन्ना हजारे जैसे आंदोलन अन्याय पर हमले के बजाय कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर खुलकर केंद्रित हो चुके हैं, भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा कर्नाटक के चलते अपने पहिये की हवा खो चुकी है, ऐसे में वॉल स्ट्रीट का आंदोलन भारत के शहरों में कौन शुरू करेगा?
भारत के लोकतंत्र पर भारत के धनपशु किस कदर बैठ गए हैं यह नीरा राडिया और अमर सिंह के टेलीफोन की कानूनी या गैरकानूनी, जैसी भी, रिकॉर्डिंग से साबित हो चुका है और 2जी घोटाले से लेकर बेल्लारी तक यह भी साबित हो चुका है कि लोकतंत्र के तहत चुनावी जीत को देश लूट लेने का ठेका कैसे मान लिया गया है। ऐसी नौबत में फंसे हुए लोकतंत्र के पश्चिम के देशों से निकलकर बाकी जगहों तक फैलता हुआ आंदोलन यहां कैसे शुरू हो सकता है यह सोचने की जरूरत है, इसलिए ये आंदोलन अभी तक बिना हथियारों के है, और जहां पर जुल्म और ज्यादती के खिलाफ बिना हथियार के आंदोलन शुरू नहीं हो पाते, वहां पर हथियारबंद, हिंसक और जानलेवा हथियारों के लिए जगह बन जाती है। शोषण और असमानता के खिलाफ अगर लोग अपने औजार लेकर खड़े नहीं होने दिए गए तो फिर उन्हें हथियार लेकर खड़े होने से कौन रोक लेगा? पश्चिम से उठे जनचेतना के इस झोंके को हम अभी आंधी तो नहीं मानेंगे लेकिन इसकी तरफ आंखें खुली रखना भी जरूरी है और लोकतंत्र-अहिंसा के दायरे में इसे यहां शुरू करना भी जरूरी है।


वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन दुनियाभर में फैला
कारपोरेट लूट, भ्रष्टाचार और सरकारी कटौतियों के खिलाफ पिछले महीने कुछ लोगों द्वारा न्यूयार्क से शुरू हुआ वॉल स्ट्रीट घेरो आंदोलन ने यूरोप से लेकर एशिया तक को अपनी चपेट में लिया है। न्यूयार्क और मैड्रिड की तर्ज पर दुनिया भर में ऐसे प्रदर्शन करने वालों आयोजकों ने 82 देशों में शनिवार, 15 अक्टूबर को लोगों से आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया था। इस आह्वान का असर यह हुआ कि एशिया के भी कई देशों दक्षिण कोरिया, जापान, फिलीपींस, हांगकांग, ताइवान में लोग सड़कों पर उतर आए।
इटली की राजधानी रोम में पर्यटन स्थल कालोसियम के पास भारी भीड़ जमा हुई और उसमें से कुछ छात्रों ने एक बैंक पर हमला कर दिया और गाडिय़ों में आग लगा दी। छात्रों ने वहां की दीवारों को लाल रंग में लिखे नारों से रंग दिया। इसमें प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी के खिलाफ रोष प्रकट करते हुए लिखा गया था-हमारा पैसा हमें वापस करो। अमेरिका में न्यूयार्क और ह्यूस्टन शहरों में प्रदर्शन हुए।
इसी तरह न्यूजीलैंड में ऑकलैंड, वेलिंगटन, काइस्टचर्च, यूरोप में मैड्रिड, लंदन, मिलान, रोम एथेंस, सिसली एवं आस्ट्रेलिया में सिडनी, मेलबोर्न आदि शहरों में लोगों ने प्रदर्शन किया।
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में सैकड़ों की संख्या में लोग सरकार के खिलाफ लामबंद हुए। उन्होंने शहर के सिटी स्कवायर में इक_ा होकर अपना रोष व्यक्त किया। इस दौरान देश की राजधानी वेटिलंगटन से भी प्रदर्शनों की खबर है।
सिडनी में प्रदर्शन के एक आयोजक ने विरोध के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि हम सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे हैं, हम व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। उसने कहा कि जिस तरह पैसा राजनीति पर हावी है वह बदलना चाहिए। बड़े-बड़े व्यापारिक घराने, खनन कंपनियां राजनीतिक दलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। उसने कहा कि प्रदर्शनकारी 99 फीसदी लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और वह कारपोरेट और वित्तीय जगत के एक फीसदी लोगों के लोभ और भ्रष्टाचार को खत्म करके ही दम लेंगे।
लंदन में विरोध करने वालों का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य वित्तीय व्यवस्था को निशाना बनाना है इसलिए वह वाल स्ट्रीट घेरो की तर्ज पर लंदन शेयर बाजार पर प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं।
ताइवान में विरोध कर रही एक महिला प्रदर्शनकारी ने कहा कि 2008 में मंदी के समय छंटनी के शिकार हुए लोगों को अब तक रोजगार नहीं मिला है। लोग इस आर्थिक व्यवस्था से तंग आ चुके हैं।
जापान के टोक्यो में भी सैकड़ों लोगों ने सरकार के खिलाफ रैलियां निकालीं। उनकी प्रमुख मांग जापान से परमाणु ऊर्जा की विदाई की रही।
फिलीपींस की राजधानी मनीला स्थित अमेरिकी दूतावास के सामने भी बड़ी संख्या में लोग इक_े हुए और उन्होंने साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और फिलीपींस बिकाऊ नहीं है- जैसे नारे लगाए।

छोटी सी बात


16 अक्टूबर
अगर इंटरनेट तक आपकी पहुंच है, और फिर भी आप वहां किसी जानकारी को तलाशने के बजाय किसी व्यस्त व्यक्ति से उसे पूछते हैं, तो यह ज्यादती है। पहले तलाश कर लें, जब कहीं न मिले, तो फिर लोगों को परेशान करें।

कमल के भीतर के कांटे

16 अक्टूबर 2011
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के हमलावर तेवर अब एकदम से बचाव की नौबत में आ गए हैं। और इसकी वजह कर्नाटक में कल पिछले भाजपाई मुख्यमंत्री का भ्रष्टाचार गिरफ्तार होना भर नहीं है, वह तो लंबे समय से तय माना जा रहा था, उसकी बहुत सी वजहें हैं। पिछले कुछ हफ्तों में भाजपा पर न तो अपनी खुद की लीडरशिप की लगाम दिख रही और न ही इस पार्टी पर लगाम रखने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेमौसम, बेजरूरत के जलसे की तरह अपने साम्राज्य में एक शाही उपवास रखा और देश भर से भाजपा की नेताओं को वहां या तो पहुंचना पड़ा या उन्हें उनको बुलवा लिया। इस आयोजन को लेकर और इसके साथ-साथ एक राष्ट्रीय नेता के रूप में, भावी संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में मोदी की आमद संघ से लेकर भाजपा तक हर कहीं खलबली खड़ी कर गई। यह बात भी ध्यान देने की रही कि गुजरात के संघ परिवार के कुछ संगठन और बहुत से नेता मोदी से अपने लंबे समय से चले आ रहे परहेज को जारी रखते हुए मोदी के शाही उपवास से दूर रहे और इससे हिंदू ताकतों के बीच एक दरार और खुलकर सामने आई। लेकिन भाजपा का धर्मसंकट महज इतने से नहीं निपट गया। चुनाव अभी दूर हैं, एनडीए के साथियों का मिजाज उस आने वाले बरसों बाद के चुनाव के वक्त कैसा होगा इसकी अटकल लगाना आज आसान नहीं है लेकिन मोदी की, एकला चालो रे,   इस कार्रवाई से देश भर में यह बात उभरकर खड़ी हो गई कि मोदी भाजपा के भीतर रहते हुए भी भाजपा से बड़े या तो सचमुच हैं, या फिर वे अपने-आपको ऐसा साबित कर रहे हैं। दूसरी बात यह साबित हुई कि मोदी और लालकृष्ण आडवानी के बीच का तालमेल पार्टी के व्यापक हितों से परे का और गड़बड़ है। लेकिन मोदी कांड निपट पाता उसके पहले ही आडवानी ने रथयात्रा का ऐलान अपने स्तर पर ही कर दिया, जिसे कि बाद में जाकर पार्टी को अपना ठप्पा देना पड़ा। ये सारी खबरें भाजपा के भीतर के सत्तासंघर्ष की खबरें सामने लाती रहीं, और एक निहायत ही गैरजरूरी बहस छिड़ गई कि भाजपा का अगला प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी कौन होगा?
मानो इतना काफी नहीं था, और आडवानी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा के मध्यप्रदेश पहुंचने के पहले ही, मध्यप्रदेश की एक आग उगलती भाजपाई नेता उमा भारती ने वाराणसी में यह शिगूफा छोड़ दिया कि आडवानी अगले प्रधानमंत्री होंगे। इस बात को उन्होंने कई तरह से घुमा-फिराकर मजबूती से सामने रखा और भाजपा के आडवानी से एक पीढ़ी नीचे के साठे पे पाठे लोग बेचैन हो गए कि क्या 2014 में भी उनके नाम पर भाजपा का यह चुस्त-दुरूस्त, सेहतमंद बरगद छाया रहेगा? इसलिए जब सतना में भाजपा के एक नेता आडवानी की यात्रा की बेहतर रिपोर्टिंग के लिए मीडिया को नगद रिश्वत देते कैमरों पर कैद हुए, और पार्टी से निलंबित किए गए तो साजिशों की कल्पना करने वाले लोगों को यह भी लगा कि क्या भाजपा के भीतर के आडवानी विरोधियों ने ही मिलकर उनकी यह ताजा फजीहत खड़ी नहीं की है? लेकिन मानो इतना कुछ काफी नहीं था इसलिए ऐसे ही वक्त कर्नाटक से भाजपा के लिए रूका हुआ एक सदमा बैंड बजाते पहुंचा कि वहां पर भाजपा की सरकार के संस्थापक और पार्टी के सबसे बड़े नेता, भूतपूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को अदालत ने गिरफ्तार करवाकर जेल भेज दिया। देश के जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आडवानी एक जनचेतना यात्रा निकालकर प्रधानमंत्री पद की अटकलें बढ़ाते चल रहे हैं, वही भ्रष्टाचार सतना से लेकर बेंगलुरू तक बांस की ऊंची गेड़ी पर चढ़कर-चलकर उनकी यात्रा की राह पर खबरें गढ़ रहा है। दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री लगातार इंटरनेट पर अपने-आपको और अपने राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त, भारी कामयाब साबित करते हुए अपना बुत पार्टी से बहुत ऊंचा खड़ा करते चल रहे हैं।
यह सोचना मुश्किल है कि भाजपा के भीतर के इन दो बड़े नेताओं के ऐसे दो बड़े जलसे करने की क्या जरूरत थी जिनको पार्टी ने घोषित नहीं किया था और जिन्हें इन दोनों ने अपने-अपने बूते खुद ही तय किया, खुद ही मुनादी की और बाद में पार्टी जाकर एक बेबस और मजबूर की तरह इनसे जुड़ी। ये दोनों ही कार्यक्रम ऐसे वक्त पर हुए या घोषित हुए जब पार्टी के एक, इन दोनों से बहुत छोटे, नेता भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी एक ऑपरेशन के बाद आराम पर थे। हम भाजपा की इस नौबत का विश्लेषण करते हुए किसी भी बात का अतिसरलीकरण करना नहीं चाहते और न ही कूदकर किसी नतीजे पर पहुंचना नहीं चाहते, लेकिन यह बात साफ है कि आडवानी और मोदी इन दोनों के इन जलसों में भाजपा को ताकतवर बनाने के बजाय उसके भीतर की दरारों को और गहरा कर दिया और उस पर रौशनी का घेरा भी डालकर देश भर के सामने इस पार्टी की ऐसी तस्वीर रखी कि इसके नेता प्रधानमंत्री बनने के लिए उतावले हो रखे हैं। देश में, और भाजपा में, आज यह नौबत सूत न कपास, जुलाहों में ल_मल_ा जैसी तस्वीर पेश कर रही है और इससे भाजपा का भला कुछ भी नहीं हो रहा।
यह नौबत भाजपा के भीतर अध्यक्ष नितिन गडकरी की उदारता है, या कमजोर पकड़ है, यह तो बाद की बात है, पहली बात तो यह है कि प्रधानमंत्री के पद को लेकर अगर इस पार्टी मेें बावलेपन का संक्रमण इसी तरह बढ़ेगा तो एनडीए के भीतर भी इसकी फजीहत बढ़ेगी और इस पार्टी, इस गठबंधन की संभावनाएं घटेंगी।

छोटी सी बात

15 अक्टूबर
जो लोग अखबारों को पन्नों से गिनकर उनकी अहमियत आंकते हैं, वे पढऩे वाले नहीं, तौलने वाले होते हैं। अच्छा पढऩे, और आसपास के लोगों के पढ़ाने में दिलचस्पी लें। इसी से दुनिया बेहतर हो जाएगी। अच्छे अखबार, अच्छी पत्रिकाएं और अच्छी किताबें खत्म हो जाएं, तो दुनिया बुरी ही बच जाएगी? अच्छे और बुरे में फर्क करना सीखें।

माया-प्रतिमा के इर्दगिर्द सलाखों का खर्चा कहां से आएगा?

15 अक्टूबर
उत्तरप्रदेश में मायावती ने दलित अधिकारों और उनके बढ़ावे के नाम पर एक ऐसा घोर अश्लील और हिंसक काम किया है जिसकी मिसाल चापलूसी पर जिंदा रहने वाली कांगे्रस जैसी पार्टी में भी नहीं मिलती और भारत की किसी दूसरी पार्टी में भी नहीं मिलती। करीब सात सौ करोड़ की लागत से उन्होंने उत्तरप्रदेश और दिल्ली की सरहद पर एक ऐसा स्मारक खड़ा किया है जिसे वे दलित प्रेरणा स्थल कह रही हैं। लेकिन इसमें देश के सबसे प्रमुख दलित नेता डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर, मायावती की सत्तारूढ़ पार्टी के संस्थापक और मायावती को यहां तक पहुंचाने वाले कांशीराम के साथ-साथ मायावती ने अपनी खुद की भी वैसी ही आसमान की ओर खड़ी, बड़ी सी प्रतिमा बनवाई है जिसके लिए सरकारी खजाने से रकम निकली। कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत में सदियों से कुचले जाते रहे दलित समाज के लोगों के हाथ जब सत्ता आती है तो वे अपने पुरखों के जख्मों पर इसी किस्म का महंगा मरहम लगाने का काम कर बैठते हैं। हो सकता है कि मायावती के मन में भारत की, हिंदू समाज की मनुवादी जाति व्यवस्था के खिलाफ इसी किस्म का एक आक्रोश हो और वे प्रतिमाएं, वहां पर आसपास कोई छत्तीस एकड़ जमीन पर बनने वाला पार्क इसी किस्म की एक सोच का नतीजा हो लेकिन क्या लोकतंत्र में एक गरीब प्रदेश की जनता के हक को सत्तारूढ़ पार्टी अपने चुनाव चिन्ह हाथियों की प्रतिमाओं से इस तरह भर सकती है?
यह बात अधिक चुभने वाली तब हो जाती है जब इसी उत्तरप्रदेश में इसी दिन अदालत राज्य सरकार को यह नोटिस जारी करती है कि वहां बीमारी से मारे गए सैकड़ों बच्चों की मौतों के बारे में सरकार जवाब दे। यह उत्तरप्रदेश देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है। और जब इसी राज्य में समाजवादी पार्टी मायावती से अपनी राजनीतिक कड़वाहट के चलते यह कहती है कि माया के सत्ता से हटने के बाद जनता इन प्रतिमाओं को उखाड़ फेंकेगी, तो यह बात हमें तर्कसंगत और न्यायसंगत लगती है। पिछली चौथाई सदी का दुनिया का इतिहास है कि किस तरह लेनिन और स्तालिन की प्रतिमाएं उखाड़कर फेंकी गईं, और किस तरह सद्दाम हुसैन की प्रतिमा को गिराकर लोग उस पर नाचे। हम इन तमाम मामलों की सीधे-सीधे कोई तुलना नहीं कर रहे लेकिन अपने जीते जी, अपने हाथों, जनता के पैसों से, भूख-बीमारी-कुपोषण से मरते हुए बच्चों की जिंदगी की कीमत पर अगर कोई नेता अपनी कांसे की प्रतिमाएं बनवाकर सजावट में सात सौ करोड़ रूपए खर्च करती है तो हम उसे आत्ममुग्ध, महत्वोन्मादी, तानाशाह और अलोकतांत्रिक ही कहेंगे। दलित समाज का हजारों बरस का शोषण और उस पर हुए जुल्म आज के आजाद भारत में ऐसे अश्लील, भौंडे और हिंसक फिजूलखर्च को सही नहीं ठहरा सकते। हमें थोड़ी सी हैरानी इस बात की होती है कि यह मामला पर्यावरण के कुछ दूसरे पहलुओं के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गया और देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस बर्बादी को रोकने का कोई रास्ता नहीं निकाला। मायावती का यह कहना बहुत ही गैरजिम्मेदारी का है कि इस स्मारक पर राज्य के बजट का एक फीसदी भी खर्च नहीं हुआ है। देश की सबसे अधिक, बीस करोड़ से अधिक, आबादी वाले इस राज्य की जनता के हक में से एक फीसदी भी अपनी मनमानी पर खर्च करने का हक किसी एक इंसान को कौन सा लोकतंत्र दे सकता है? यह प्रदेश पूरी दुनिया का सबसे बड़ा प्रदेश है और मायावती चौथी बार इस प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी है और अपनी निजी अनुपातहीन संपत्ति को लेकर वे देश की सबसे अधिक दौलतमंद मुख्यमंत्री भी बन चुकी हैं। अदालत में वे इस दौलत को लेकर कटघरे में हैं और अपनी अथाह रहस्यमयी दौलत को लेकर वे कुछ बरस पहले छब्बीस करोड़ रूपए इनकमटैक्स दे चुकी हैं। वे देश की अकेली ऐसी मुख्यमंत्री हैं जो कि देश के बीस सबसे बड़े आयकरदाताओं में आती हैं। ये सारी बातें उन्हें दलित परिवार में पैदा होने के बाद भी एक बादशाह की तरह का बना देती हैं और वे किसी भी दलित-रियायत के नैतिक हक से ऊपर उठ चुकी हैं। उनका पूरा तौर-तरीका एक खूंखार तानाशाह जैसा है और वे सरकार को जिस मनमाने तरीके से चलाती हैं वह लोकतंत्र से बहुत परे का है। भारत के चुनावों के जातिगत गणित के चलते यह तानाशाह हो सकता है कि फिर जीतकर आ जाए लेकिन यह इस देश में राजनीतिक चेतना की कंगाली का सुबूत है और रहेगा। हम जनता के पैसों से ऐसी किसी भी बर्बादी के सख्त खिलाफ हैं और कल के दिन अगर अनुपातहीन दौलत और भ्रष्टाचार की वजह से मायावती को जेल होती है तो फिर उनकी प्रतिमा के इर्दगिर्द सलाखों को खड़ा करने का खर्चा उनकी निजी दौलत से आएगा, उनकी पार्टी यह लागत उठाएगी या फिर उत्तरप्रदेश के कई हजार और बच्चों की जिंदगी बेचकर वे सलाखें खरीदी जाएंगी? यह मामला संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों के सोचने का है और इसमें देर इसलिए नहीं करनी चाहिए कि आगे चलकर कोई दूसरा तानाशाह इसी तरह का काम कर सकता है। एक मिसाल के तौर पर अगर उत्तरप्रदेश की अगली सरकार मायावती की प्रतिमा को गिराकर उसे मटियामेट करती है तो उस फैसले को गलत कैसे कहा जाएगा, हम अभी यही सोच रहे हैं।

छोटी सी बात

14 अक्टूबर
अधिक खाने से पहले सोचें कि धरती पर बहुत से लोग भूख से मरते भी हैं। बिना किसी बीमारी अगर आपको खा-खाकर मोटापा है, तो यह दुनिया के भूखों के खिलाफ हिंसा है।

ये हमले अदालतों का भी अपमान


14 अक्टूबर 2011

दो दिनों से टीवी की खबरों में भारत की राजधानी दिल्ली में एक ऐसी हिंसा दिख रही है जिस पर दिल्ली की अदालतों को खुद होकर कोई कार्रवाई करनी चाहिए थी। उग्र हिन्दू विचारधारा वाले कुछ नौजवानों ने सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत सक्रिय और प्रमुख वकील प्रशांत भूषण के उस दफ्तर में घुसकर उन पर हमला किया जो सुप्रीम कोर्ट के अहाते में है। फिर कल जब अदालत में इन हमलावरों को पेश किया जाना था तो फिर अदालत के बाहर प्रशांत भूषण-अन्ना हजारे के समर्थकों पर इन्हीं लोगों ने सड़क पर फिर हमला किया। हमें हैरानी यह है कि ये दोनों बातें अदालतों से जुड़ी होने के बाद भी अदालतों ने हमलावरों की हिंसा को अदालत का अपमान नहीं माना।
यह तो एक बात हुई। लेकिन दूसरी बात यह है कि जब कोई ऐसी हिंसा कैमरों पर दर्ज हो रही है तो उन पर बरसों तक सजा न मिलने से देश में हिंसक तेवर रखने वाले बाकी लोगों की हौसलाअफजाई होती है। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि देश की शायद अधिकतर आबादी अमन-चैन से रहना चाहती है और उसके इस हक को छीनने वाले गिने-चुने अपराधियों की वजह से लोग अपने इस हक के इस्तेमाल से डरने लगते हैं। उत्तरप्रदेश में जब आए दिन राजनीति और सत्ता से जुड़े हुए दबंग अपराधी बलात्कार करते हैं और विरोध करने वाले शिकार महिला को मार भी डालते हैं तो उससे बलात्कार की और शिकार महिलाओं का मुंह खुलना भी बंद हो जाता है। छत्तीसगढ़ में भी हम देख रहे हैं कि किस तरह लड़कियों को टेलीफोन करके परेशान करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं और ऐसे लोगों को अब तक कोई सजा मिली हो, तो कम से कम उसकी चर्चा तो सुनाई नहीं पड़ी है। इसलिए यह तो सोचा ही नहीं जा सकता कि बढ़ते हुए टेलीफोन और बढ़ते हुए दुस्साहस से लड़कियां बच पाएंगी।
इसी सिलसिले में हम ऐसे आंदोलनों की बात करना चाहेंगे जो जनता पर हमला करते हों, सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को तबाह करते हैं, और फिर उनके आंदोलनों को ठंडा करने के लिए सरकारें उनके खिलाफ कार्रवाई न करने का फैसला लेती हैं। यह सिलसिला भी इसी तरह का खतरनाक है कि एक अपराधी के बच जाने के बाद और लोगों को भी वैसे, या किसी और किस्म के अपराध करने में कोई हिचक नहीं होती। इसलिए सरकारों के पास यह पसंद या नापसंद नहीं होनी चाहिए कि ऐसे अपराधियों, या किसी भी किस्म के अपराधियों पर वे मुकदमा चलाएं, या न चलाएं। अदालतों के बाहर अगर अपराधी गिरोहबंद होकर एक बार फिर इसी विचारधारा पर हमला करते हैं तो यह उनके दबदबे का एक सुबूत है और सरकार, अदालत दोनों के बेअसर होने का भी। जब अदालतों के जज छोटी-छोटी बातों को अपना अपमान मानकर लोगों को अदालत की अवमानना के नोटिस देते हैं, तो फिर अदालत परिसर में जजों से परे लोगों पर होने वाले हमले, अदालत में पेश किए जाने वाले आरोपियों के पक्ष मेें फिर अदालत के बाहर हमले, इन सब पर अदालत की अवमानना क्यों नहीं मानी जाती? किसी जज को एक व्यक्ति के रूप में ही अपनी बेईज्जती नहीं मानना चाहिए बल्कि उसे अदालत के अपमान की परिभाषा में सारी अदालती कार्रवाई, उससे जुड़े हुए लोगों के मान-अपमान को शामिल करना चाहिए।
पाठकों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में श्रीराम सेना नाम के हिंसक और हमलावर संगठन ने नौजवान लड़के-लड़कियों पर खुले हमले टीवी के कैमरों के सामने किए थे। वैसे ही हमले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी उसी किस्म की हिंसक विचारधारा वाले संगठन करते आए हैं। लेकिन ऐसे लोगों को चूंकि अदालत से सजा नहीं मिल पाती, उनके साथ हमदर्दी रखने वाली विचारधारा की सरकारें कोई कार्रवाई नहीं करतीं, इसलिए ऐसे हमले बढ़ते चलते हैं। एक लोकतंत्र में किसी विचार का जवाब जो लोग लाठी मानते हैं, उन लोगों की जगह सिर्फ जेल होनी चाहिए और ऐसे लोगों के संगठनों की जगह भी घूरे पर होनी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि दिल्ली में जिन अदालतों के बाहर और जिनके अहाते में ये ताजा हमले हुए हैं, उन अदालतों में कोई वकील जाकर यह पिटीशन लगाएगा कि ऐसे हमलावरों पर अदालत के अपमान का जुर्म भी दर्ज किया जाए और अदालतें उन पर तुरंत कार्रवाई भी शुरू करें।

छोटी सी बात


13 अक्टूबर
कभी किसी डॉक्टर से पूछ कर समझें कि एक्सपायर हो चुकी (मियाद खत्म होने के बाद की) दवाईयां, दवा न रहने से बेहतर हैं या नहीं? जब तक ताजा दवा न आ जाएं, तब तक पुरानी पड़ गई दवा को इमरजेंसी में काम ले आएं या फिर बिना दवा के रहें? एक्सपायर दवा का असर कम हो जाता है? या फिर वह नुकसानदेह भी हो जाती है?

प्रशांत भूषण पर हमला

13 अक्टूबर 2011
सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और लोकतंत्र की अनगिनत खामियों के खिलाफ अदालत से लेकर सड़कों तक लगातार लड़ाई लडऩे वाले प्रशांत भूषण पर कल एक शर्मनाक हमला हुआ जब उनके दफ्तर पहुंचकर लोगों ने उन्हें मारा क्योंकि उन्होंने कश्मीर की जनता के जनमत संग्रह के अधिकार की बात कही थी। देश के उस उग्रवादी तबके ने यह हमला किया है जो कश्मीर को समझे बिना कश्मीर को भारत का एक हिस्सा बनाए रखने का हिमायती है और वह कश्मीर के किसी दर्जे, वहां की स्थिति, वहां की भावनाओं पर कोई चर्चा भी देशद्रोह मानता है। अभी जो तथ्य सामने आए हैं वे इसके पीछे हिंदू भावनाओं वाले एक उग्रवादी संगठन श्रीराम सेना का नाम इससे जुड़ा हुआ बताते हैं, और पाठकों को यह याद होगा कि यह श्रीराम सेना किस तरह कर्नाटक में पे्रमी नौजवान जोड़ों पर, स्कर्ट पहनने वाली लड़कियों पर खुला हिंसक हमला करके उन्हें घायल कर चुकी है। घोर साम्प्रदायिक यह संगठन, बहुत ही कट्टर हिंदूवादी, कथित भारतीय संस्कृतिवादी और आक्रामक राष्ट्रवादी विचारधारा का है जिस पर कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कार्रवाई करने से मुंह चुराया था। ऐसे लोग अगर अब दिल्ली में शोहरत पाने के लिए ऐसे चर्चित वकील पर हमला करते हैं जो कि अन्ना हजारे का एक प्रमुख साथी होने के नाते भी इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में है तो ऐसी आक्रामकता पूरे देश में रोकने की जरूरत है।
भारत में एक तरफ बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने जूते की नोंक पर रखकर जनता की मानसिकता को बुरी तरह से अराजक बनाने के काम में लगे हैं, और इस काम में प्रशांत भूषण भी अन्ना के साथ हैं। जब कभी लोकतंत्र को नीचे रखकर एक व्यक्तिवादी सोच और आंदोलन को आगे बढ़ाया जाता है, जब ऐसी मूर्खता की बातें की जाती हैं कि अन्ना हजारे इस देश की संसद से ऊपर हैं तो फिर हर किसी को अपनी-अपनी सोच को लोकतंत्र से ऊपर रखने का बढ़ावा मिलता है। ऐसी ही सोच इस देश में एक समय इस बात को बढ़ावा देते आई है कि धार्मिक आस्था संविधान से ऊपर है और अदालत का फैसला चाहे जो हो, मंदिर वहीं बनाएंगे। यही सोच बिना साम्प्रदायिकता के लेकिन उसी किस्म की अराजकता के साथ लोकपाल के बैनर तले यूपीए सरकार, और खासकर कांगे्रस पार्टी पर हमला बोलने के लिए पिछले छह महीनों से ओवरटाईम कर रही है। प्रशांत भूषण को कानून का जानकार होने की वजह से इस बात को समझना था कि चाहे एक नया कानून बनाने के लिए हो, चाहे एक मंदिर बनाने के लिए, लोकतंत्र के रास्ते को छोड़कर मनमर्जी की पगडंडी पर देश को धकेल देने से यह अराजकता लुढ़ककर सुप्रीम कोर्ट के वकील के चैंबर तक पहुंच सकती है, और कल पहुंच गई है।
भारत में लोकतंत्र को खारिज करके, तरह-तरह के शॉर्टकट भारी पड़ रहे हैं। यह सिलसिला तुरंत रोकने की जरूरत है और हमारा मानना है कि किसी एक सरकार के कुकर्मों से न तो लोकतंत्र में सरकार नाम की संस्था बुरी हो जाती, और न ही कुछ सांसदों के रिश्वत लेने से संसद खराब हो जाती और न ही कुछ जजों के भ्रष्ट होने से न्यायपालिका गैरजरूरी हो जाती। किसी भी एनजीओ के भ्रष्ट हो जाने से क्या अन्ना हजारे को भी कोई उसी कतार में खड़ा कर सकता है? अनास्था का यह सैलाब खतरनाक है और इसे इस हद तक बढ़ाना नहीं चाहिए।
प्रशांत भूषण ने कश्मीर के बारे में जो कहा है वह पूरी तरह देश के संविधान और देश के हित के बहुत से विकल्पों में से एक है और इसे देशद्रोह मानने वाले लोग ऐसे फर्जी राष्ट्रवादी लोग हैं जो भगत सिंह जैसे महान शहीद के नाम पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसी ताकतों पर अगर तुरंत कार्रवाई नहीं होगी तो बरसों तक चलने वाले ऐसे मामलों के दौरान ये लोग साम्प्रदायिक की नफरत को और अधिक फैलाते रहेंगे। देश में ऐसे नए कानून की चर्चा चल रही है जो साम्प्रदायिक पर कड़ी कार्रवाई करे। हम इसके प्रावधानों पर जो बहस चल रही है उस बारीकी में अभी नहीं जा रहे, लेकिन ऐसा कानून जरूरी है जो साम्प्रदायिकता को जड़ से कुचल सके, और तुरंत कुचल सके। साथ ही प्रशांत भूषण को भी अपने तौर-तरीकों पर यह सोचना चाहिए कि वे जिस विचारों की आजादी के आज हकदार हैं, वैसी ही विचारों की आजादी की हकदार कांगे्रस पार्टी है, दूसरी राजनीतिक पार्टियां हैं, लोकपाल विधेयक के बारे में।

छोटी सी बात


12 अक्टूबर
जिंदगी में रोज ही कई अच्छी और कई बुरी बातें सामने आती हैं। अपने बच्चों को इनकी मिसाल देकर समझाना चाहिए ताकि वे सबक ले सकें। किताबी नसीहतों के मुकाबले मिसालें अधिक असरदार होती हैं और उन्हें समझाते हुए आप खुद भी सबक और नसीहत पाते ही हैं।

जगजीत कोई शून्य नहीं छोड़ गए

12 अक्टूबर 2011
भारत के आज के सबसे लोकप्रिय गजल गायक जगजीत सिंह के गुजर जाने से किसी तरह का कोई शून्य खड़ा नहीं हो गया है। उनका गाया हुआ इतना कुछ, इतने किस्मों का आज भारत के दसियों करोड़ घरों में होगा कि वह आने वाली कई पीढिय़ों को सुख और खुशी देने के लिए काफी है। एक इंसान का बदन इसके मुकाबले इतना छोटा होता है कि उसके जाने से जगजीत सिंह को चाहने वालों को तकलीफ के बावजूद किसी तरह का खालीपन खड़ा नहीं हो गया। जब किसी का काम उसकी जिंदगी से बढ़कर हो जाए, तो वही जिंदगी काम की होती है। जिसका जिंदा रहना जरूरी हो, उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में अब तक दुनिया के लिए इतना कुछ जोड़ा नहीं है कि वह उनकी जिंदगी से बढ़कर हो जाए।
जगजीत सिंह पर लिखने को दिल इसलिए चाहता है कि इस गायक ने अपनी बनाई धुनों पर अपनी आवाज से उन सैकड़ों शायरों को करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जो शायद किसी किताब के मार्फत उनकी गजलों को न पढ़े होते। और आज के जमाने में जब संगीत का मतलब शोर सा हो गया है, जब शब्दों की जरूरत और अहमियत किसी भी किस्म के गाने में बहुत कम मान ली गई है, तब जगजीत सिंह ने अपनी आवाज और अपनी संगीत से लोगों को उन शब्दों पर सोचने के लिए भी मौका दिया, मजबूर किया, जो शब्द उनके खुद के लिखे हुए नहीं थे।  दरअसल गाई हुई एक गजल उसे लिखने वाले शायर की ही नहीं रह जाती, उस संगीत और आवाज की भी हो जाती है। गाई हुई गजल के मायने, लिखे हुए शब्दों के मायने से कुछ बढ़ जाते हैं और उनकी अहमियत भी बढ़ जाती है। जगजीत सिंह ने अपनी गाई गजलों में कवियों और शायरों के शब्दों में एक बहुत बड़ा वैल्यू एडीशन किया और श्रोताओं के रूप में उन्हें पाठक नसीब कराए। इसलिए भारत के शायद सबसे मशहूर और चहेते, शायद सबसे सुरीले और खासा अधिक गाने वाले जगजीत सिंह उर्दू और हिंदी कविता का, कई क्षेत्रीय भाषाओं के गीतों का इतना भला कर गए हैं जितना शायद किसी और गायक-संगीतकार ने न किया हो।
कानों के रास्ते दिल और दिमाग तक इतनी मिठास घोलने, गानों में रची-बसी कल्पनाओं में लोगों को डुबा देने का महत्व बहुत अधिक है। इसलिए कि आज की जिंदगी में तेज रफ्तार तकलीफें मानसून की बारिश की तरह लोगों पर बरसती हैं और हर कुछ घंटों में कोई न कोई ऐसी खबर आती है जिससे कि लोगों के दिल-दिमाग और उनकी जुबान पर कड़वाहट बिखर जाए। हताशा और नफरत में फिसलते चली जा रही हिन्दुस्तानी जिंदगी और सोच को अगर कोई एक आवाज और उसके पीछे के दिल से रचा गया संगीत मिठास से भर देता है तो यह सुनने वालों को दिमागी रूप से सेहतमंद बनाए रखने के लिए एक बड़ा काम है। और यह काम जगजीत सिंह के जाने से जरा भी कम नहीं होने जा रहा, उनका गाया हुआ इतना कुछ है कि हर किसी को उसमें अपनी पसंद की धुन, अपनी पसंद का संगीत, अपनी पसंद के लफ्ज मिल ही जाते हैं, आवाज तो हर किसी गाने में बेमिसाल है ही। जगजीत सिंह में परदे के पीछे से, और स्टेज पर बैठकर भी लोगों को बांध लेने की एक बेमिसाल खूबी थी। जिन लोगों ने उन्हें सामने बैठकर सुनने का सुख पाया है वे हमारी इस बात को कुछ और अधिक दूर तक समझ और महसूस कर पाएंगे। लेकिन पिछली चौथाई सदी से अधिक से एक से अधिक पीढिय़ों ने जगजीत सिंह के रिकॉर्ड सुने, फिर कैसेट, सीडी और फिर डीवीडी से होते हुए इंटरनेट तक जगजीत सिंह का संगीत लोगों को लुभाते रहा, मोहते रहा और अब आने वाली पीढिय़ां भी उन्हें देखे बिना, टेक्नालॉजी की मेहरबानी से, यह सुख पाते रहेंगी।
किसी एक इंसान के बारे में इसी जगह पर हमने दो-चार दिन पहले ही लिखा था जब एप्पल कंपनी के स्टीव जॉब्स गुजर गए। उस चर्चा को आज हम दो वजहों से कर रहे हैं, एक तो इसलिए कि स्टीव के आईपॉड ने संगीत को लोगों के कानों तक एक अलग ही तरह से पहुंचा दिया था और हमारे जैसे करोड़ों लोग जेब में जगजीत सिंह के लगभग तमाम संगीत को लेकर चलने के लायक हुए। लेकिन एक दूसरी खराब वजह यह भी थी कि स्टीव जॉब्स ने खरबपति होने के बावजूद समाज के लिए कुछ नहीं किया। जगजीत सिंह के बारे में ऐसा कहने की नौबत नहीं आ रही क्योंकि उन्होंने बच्चों के संगठनों, स्कूलों और अस्पतालों के लिए मदद के बहुत सारे काम भी किए। लेकिन एक तकलीफदेह बात उनके साथ यह भी लगी कि उनका बेटा एक सड़क हादसे का शिकार हुआ, उनकी पत्नी की पहली शादी की बेटी ने खुदकुशी कर ली और अब वे एक ऐसे बे्रन हैमरेज का शिकार हुए जो कि बहुत अधिक लोगों की मौत की वजह नहीं बनता है, खासकर बिना किसी एक्सीडेंट के।
लोगों को इतना सुख और इतनी खुशी देने वाले जगजीत सिंह को अपनी जिंदगी में कुछ अधिक ही तकलीफें मिलीं, क्यों? इसका कोई जवाब हमें नहीं सूझता।


 

छोटी सी बात



11 अक्टूबर
मुसीबतों से नुकसान तो होता है, लेकिन उनसे सबक लेकर आप आगे के लिए चौकन्ने हो जाएं, तो वह मुसीबत आगे की किसी बड़ी मुसीबत से आपको बचा भी लेती है।

यह सिर्फ सरकारी नहीं, सामाजिक हैवानियत भी


11 अक्टूबर
देश के सबसे बड़े और दौलतमंद महानगर मुंबई का हाल यह है कि वहां की महानगरपालिका के एक अस्पताल में एक गरीब औरत को बच्चे को जन्म देने के लिए भर्ती नहीं किया गया और आधी रात के बाद अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर उसका बेटा पैदा हुआ जो कि कुछ घंटों में मर गया। हम इसे एक गैरइरादतन हत्या मानते हैं और जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाले ऐसे अस्पताल में जिन डॉक्टरों ने एक गरीब की जिंदगी के खिलाफ ऐसा फैसला किया उनके खिलाफ आपराधिक मामला चलाना भी हम जरूरी समझते हैं। मीडिया की पहुंच वाले शहरों से ऐसे मामले तो हर हफ्ते देश में कहीं न कहीं सामने आ रहे हैं लेकिन हमारा यह मानना है कि एक फीसदी मामलों तक भी न तो मीडिया के कैमरे पहुंच पाते और न ही हमारे लिखने की ऐसी नौबत आती। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार ने कई मामलों में ऐसे आदेश दिए हैं कि किसी भी मरीज को सरकारी या निजी अस्पताल न लौटाएं, सरकारों ने गरीबों के लिए इलाज बीमा की योजना भी लागू करने की शुरुआत की है। लेकिन ऐसे में जब सरकारी या स्थानीय संस्थाओं वाले अस्पताल ऐसे हरकत करते हैं तो कुछ लोगों पर जुर्म कायम होना जरूरी है। इस अस्पताल ने यह भी माना है कि आधी रात एक गरीब गर्भवती को दूसरे अस्पताल जांच के लिए भेजते हुए भी यहां के डॉक्टरों ने एम्बुलेंस नहीं दी और जांच रिपोर्ट के बाद भर्ती करने से मना करके फिर दूसरे अस्पताल जाने को कहा। यह एक भयानक सरकारी इंतजाम है और पूरी तरह से हैवानियत का भी।
लेकिन गरीबों और कमजोर तबकों के लिए यह एक अनोखी बात नहीं है। सरकार और समाज से कमजोर लोगों को इसी तरह कुचला जाना पड़ता है। कदम-कदम पर लोकतंत्र के तहत गरीबों को जो हक मिलने चाहिए, उनको छीना जाता है, सरकार उनके लिए अपनी योजनाओं में जो जगह रखती है, उन्हें दूसरे लूट ले जाते हैं,  अदालतें अपने दरवाजे सिर्फ खर्च करने में काबिल लोगों के लिए खुले रखती हैं और देश की संसद और विधानसभाओं में लगातार खरबपति, अरबपति और करोड़पति बढ़ते चल रहे हैं। ऐसे में यह जाहिर है कि सड़क के किनारे से ठेलों को जब चाहे तब उठाकर हटा दिया जाता है और इस पल जब हम मुंबई के एक अस्पताल में एक गरीब मरीज के बारे में यह लिख रहे हैं, उसी पल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बाहर से ठेले और खोमचे वालों को ट्रक में लादकर ले जाने की तस्वीरें हमारे सामने हैं।
दरअसल समाज में आज लोगों की राजनीतिक-सामाजिक चेतना गटर में जा चुकी है। न तो परिवार के भीतर नई पीढ़ी को तथाकथित इंसानियत की बातें सिखाना अब आम रह गया और न ही स्कूल या कॉलेज में ऐसी नसीहतों की कोई जगह है। समाज के भीतर भी लोगों से ऐसी प्रेरणा पाने का मौका नई पीढ़ी को नहीं मिलता। इसलिए आज के जो नौजवान डॉक्टर, या इससे पिछली पीढ़ी के भी जो डॉक्टर मरीजों को इस तरह से लौटाते हैं, उनकी राजनीतिक चेतना शून्य रहती है और कमजोर तबकों के लिए उनमें कोई हमदर्दी भी नहीं रहती। हम इसे सिर्फ सरकारी इंतजाम की खामी मानकर सिर्फ कानूनी कार्रवाई तक अपनी बात को सीमित रखना नहीं चाहते, हम इस मौके पर यह भी पूछना चाहते हैं कि समाज के भीतर इस परले दर्जे की हैवानियत को लेकर भी क्या कोई बातचीत होगी या फिर बीत चुके महान लोगों की महानता का साल में दो-दो बार, जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर, गुणगान करके ही भारत का समाज अपने आपको महान परंपराओं का वारिस मानता रहेगा?
भारत में हैवानियत दिखाने वाले लोगों को, धर्म, आध्यात्म और महत्वहीन अनुपात वाले दान से आत्मग्लानि से मुक्त होने का एक आसान जरिया मिला हुआ है। ऐसा अपराध करने वाले डॉक्टरों में से कोई ईश्वर की किसी दुकान पर जाकर अपने लिए पुण्य खरीदने को काफी समझता होगा और फिर वह किसी गरीब के साथ ऐसा जुल्म करके भी किसी पाप की सोच से मुक्त रहता होगा। तर्क से परे की जितने किस्म की आस्था होती है वह लोगों को लोकतंत्र, तथाकथित इंसानियत और नियम-कायदों को तोडऩे का हौसला जुटा देती है। मुंबई की इस घटना को लेकर समाज के भीतर एक व्यापक चर्चा की जरूरत है कि ऐसी नौबत जब आती है तब जिम्मेदार लोगों के भीतर का इंसान मरकर कहां जाकर दफन हुआ रहता है? ऐसी घटनाएं इस देश के लिए शर्म से डूबकर मर जाने की है कि जिन राजधानियों में ताकतवर कुर्सियों पर बैठे हुए लोग गरीबों के हक के सरकारी खजाने को रात-दिन लूटने की साजिश बनाने में लगे रहते हैं वहीं पर भारत का एक नागरिक फुटपाथ पर पैदा होने को, और कुछ घंटों में मर जाने को बेबस रहता है। इसे महज एक और खबर मानकर जो लोग भुला देंगे, उन्हें किसी ईश्वर के दरबार में जाकर खड़े रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रहेगा।

छोटी सी बात


10 अक्टूबर
जो लोग बिना बुलाए किसी के घर-दफ्तर बार-बार चले जाते हैं, देर तक बैठते हैं, वे अपनी बेइज्जती का पुख्ता इंतजाम करते चलते हैं। ऐसी छूट आज के जमाने में किसी से भी नहीं लेनी चाहिए। लोग जब आपसे कतराना शुरू करते हैं, तो फिर हो सकता है कि आपकी किसी बड़ी जरूरत के वक्त भी वे आपसे कतराएं। ऐसी नौबत न आने दें।

मीडिया, और मीडिया कारोबार पर रोक का सरकारी फैसला

10 अक्टूबर 2011
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत के टेलीविजन चैनलों के बारे में बनाए गए नियम-कायदों को और कड़ा करते हुए यह तय किया है कि अगर कोई चैनल दस बरस के लिए मिले हुए लाइसेंस के दौरान सरकार की इस बारे में बनाई गई नीतियों  और नियमों को पांच से अधिक बार तोड़ता है तो सरकार उसका लाइसेंस आगे बढ़ाने से मना कर सकती है। और सरकार के नियमों में अब जो बातें हैं उनमें अश्लीलता, भौंडापन, महिलाओं और बच्चों का अपमान, किसी समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक होना, देश के हितों के खिलाफ होना या दूसरे देशों के साथ दोस्ताना रिश्तों के खिलाफ होना, जैसी बातें शामिल हैं। सरकार ने प्रसारण के कारोबार से छोटे लोगों को बाहर करने के हिसाब से यह तय किया है कि गैरखबरी-ताजा मामलों, वाले चैनलों की पूंजी अब डेढ़ करोड़ रुपए की मौजूदा शर्त से बढ़ाकर पांच करोड़ कर दी गई है। समाचार-ताजा मामलों के चैनलों के लिए लाइसेंस पाने को अब तीन करोड़ रुपए पूंजी की मौजूदा शर्त को बढ़ाकर बीस करोड़ रुपए कर दिया गया है। इसके अलावा बहुत किस्म की और शर्तें जोड़ी गई हैं।
यह पूरी सोच एक पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और तानाशाह सोच है जो कि मीडिया के इस हिस्से पर लगाम लगाने के लिए और छोटे लोगों को धंधे से बाहर करने के लिए की गई है। इसे कुछ अधिक दूर तक समझने के लिए भारत के अखबारों की मिसाल ली जा सकती है। कल को अगर केंद्र सरकार अखबारों के लिए यह नियम बना दे कि अखबार निकालने वाले प्रकाशक के पास दस करोड़ की पूंजी होनी चाहिए, अखबार की मशीन एक बार में बीस पेज छापने वाली होनी चाहिए और अखबार कम से कम चौबीस पेज का होना चाहिए, तो ऐसे कारोबार में सिर्फ ऐसे बड़े लोग बच जाएंगे जिनके दूसरे कारोबार भी होंगे और जिन पर सरकार का लगाम लगाना आसान भी होगा। ऐसे छोटे लोग जो केवल अखबार की अर्थव्यवस्था के तहत अखबार निकालने की सोचते हों, वे तमाम लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े इस कारोबार में घुस भी नहीं सकेंगे। यह दो हिसाब से अलोकतांत्रिक होगा, एक तो लोकतंत्र के भीतर कारोबार करने की आजादी। और दूसरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उपयोग को सीमित करना। यह सिलसिला बहुत भयानक है। आज पहली नजर में यह सिर्फ टेलीविजन चैनलों के बारे में लगता फैसला है लेकिन यह सरकार की एक ऐसी सोच है जो आगे चलकर मीडिया के दूसरे हिस्सों को भी गिरफ्त में लेगी।  मजे की बात यह है कि देश के कुछ बड़े कारोबारी अखबारों ने इस फैसले पर टेलीविजन प्रसारण के बड़े कारोबारियों से प्रतिक्रिया ली तो वे कम पंूजी वालों को इस धंधे से बाहर करने के सरकारी फैसले के हिमायती रहे। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी बड़े इस्पात कारखाने वाले से पूछा जाए कि छोटे-छोटे कारखाने बंद कर देना ठीक होगा या नहीं।
इस बारे में लिखते हुए कुछ दिन पहले ही ब्रिटेन में वहां की लेबर पार्टी का एक विचार पढऩे मिला जिसके तहत सरकार वहां इस पार्टी का संस्कृति (छाया) सचिव ऐसा प्रस्ताव रखने जा रहा है जिसमें वहां के पत्रकारों को एक पेशेवर संगठन के माध्यम से काम करने का लाइसेंस मिलेगा और वे अगर आचार संहिता को तोड़ेंगे तो  उन्हें भविष्य में पत्रकारिता करने नहीं मिलेगा। भारत सरकार के ताजा फैसले को अगर देखें तो यह बात बहुत साफ है कि किसी भी चैनल को जिन बातों पर दस बरस पूरे होने पर आगे काम करने से रोका जा सकता है, वे तमाम बातें बहुत आसानी से सरकारी मर्जी से साबित की जा सकती हैं। किसी देश की आलोचना करने पर उसे भारत के साथ दोस्ताना रिश्तों में दरार पैदा करने वाला करार दिया जा सकता है। किसी भी बात को देश के हित के खिलाफ माना जा सकता है और जिस देश में कल इमरजेंसी के दौरान इंदिरा इज इंडिया कहा गया था और आज अन्ना को संसद से ऊपर कहा जा रहा है वहां पर किसी भी बात को उस वक्त की मौजूदा सरकार अपनी नीतियों के हिसाब से, देशहित के खिलाफ मान सकती है।
हम आए दिन टेलीविजन समाचार चैनलों के खराब काम और कारोबारी रूख के खिलाफ, उनकी गैरजिम्मेदारी और सनसनी के खिलाफ लिखते हैं। लेकिन हम ऐसी किसी भी रोक के खिलाफ हैं जिसमें कोई सरकार किसी गलती के आधार पर चैनल की जिंदगी खत्म कर दे। कल को क्या पांच समाचार गलत साबित होने पर अखबार बंद करवा दिया जाएगा? चुनाव में पांच नियम तोडऩे पर आगे चुनाव लडऩे पर रोक लग जाएगी? दफ्तर पांच बार लेट पहुंचने पर सरकारी नौकरी से निकाल दिया जाएगा? रोक लगाने की यह सोच पिछले एक-दो बरस में यूपीए सरकार को मीडिया, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हाथों पहुंचे नुकसान की वजह से उपजी दिख रही है। इस दौरान हमने मीडिया को कई बार बहुत ही गैरजिम्मेदार पाकर उसके खिलाफ लिखा है लेकिन यह बात साफ है कि ऐसी गैरजिम्मेदारी, पे्रस काउंसिल जैसी किसी संस्था में कार्रवाई के लायक तो है, किसी चैनल को बंद करने लायक वह फिर भी नहीं है। दस बरस के बाद किसी चैनल को बंद करने का खतरा लोगों को काम की आजादी से पूरी तरह रोक देगा। आज भारत में मीडिया की आजादी पर चर्चा सिर्फ उसी समय होती है जब मीडिया के प्रकाशन-प्रसारण के कारोबार पर कोई वार होता है। उसके पहले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित कोई वार विरोध खड़ा नहीं कर पाता। यह एक भयानक स्थिति है जब सिर्फ कारोबार की स्वतंत्रता ही पत्रकारिता की स्वतंत्रता रह गई है। इस बारे में सरकार से परे भी बात होनी चाहिए और इस ताजा सरकारी फैसले से परे भी बात होनी चाहिए।

छोटी सी बात

9 अक्टूबर
सरकार को किसी भी तरह का चूना लगाने वालों को याद रखना चाहिए कि टैक्स चोरी से लेकर बाकी किस्म को बेईमानियों तक से वह दवा-खाना आ सकता था जिससे गरीबों की जान बची होती।

तुरंत तेलंगाना बनाने की जरूरत

9 अक्टूबर 2011
तेलंगाना को लेकर आंधप्रदेश में एक बड़ा तनाव बना हुआ है और आज के आंध्र से अलग होकर नया राज्य बनने के लिए बेमुद्दत हड़ताल पर चल रहा तेलंगाना इलाका तो सब कुछ बोल रहा है लेकिन आंध्र का बाकी हिस्सा अभी चुप है। कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार और आंध्र की कांगे्रस सरकार के सामने यह एक शिकस्त ही शिकस्त वाली नौबत है कि वह राज्य न बनाए तो तेलंगाना तो हाथ से निकला हुआ है ही, राज्य बनाए तो बाकी आंध्र को यह लगेगा कि उसके साथ बेइंसाफी हुई है, आज के अविभाजित आंध्र की राजधानी हैदराबाद की मौजूदगी उसके भौगोलिक इलाके तेलंगाना में होगी या उसे दोनों राज्यों के बीच एक केंद्र प्रशास्ति शहर, चंडीगढ़ की तरह बनाकर रखा जाएगा? ऐसे बहुत से विकल्प, संभावनाएं और अटकलें हवा में हैं और यह नौबत उस कांगे्रस पार्टी की ही खड़ी की हुई है जिसके मंत्री चिदंबरम ने एक दिन अचानक ही तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा कर दी थी। उसके तुरंत बाद कांगे्रस और यूपीए सरकार को यह समझ आ गया था कि वह बयानबाजी की चूक हो गई और कांगे्रस ने न तो यूपीए के बाकी भागीदारों से बात की थी और न ही आंध्र में खुद अपनी पार्टी के लोगों से बात की थी। सोनिया के इस ताकतवर मंत्री की मुनादी धरी रह गई और तेलंगाना के बनने का आज तक रास्ता नहीं निकल पाया। इतने नाजुक मामले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने नौ दिसंबर 2009 को जो बयान दिया था उसकी मरम्मत करके एक पखवाड़े बाद में दूसरा बयान देना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनके पहले बयान को उनके दूसरे बयान के साथ जोड़कर ही पढ़ा जाए। यहां पर इस चर्चा का कोई प्रसंग तो नहीं है लेकिन यह बात यहां गिनाना ठीक होगा कि इसके पहले और इसके बाद कांगे्रस के केंद्रीय मंत्रियों और केंद्रीय नेताओं ने जितने किस्म की भयानकबयानी की है वह एक रिकॉर्ड है।
लेकिन आज हम अपनी बात को तेलंगाना और बाकी देश में नए राज्य बनने की चाह, और दावा रखने वाले इलाकों तक सीमित रखना चाहते हैं। आज ही एक खबर है कि महाराष्ट्र का विदर्भ का इलाका बड़ी दिलचस्पी और बेचैनी से तेलंगाना की राह देख रहा है। इसी तरह पश्चिमी उत्तरप्रदेश और कुछ दूसरे इलाके भी राज्य बनना चाहते हैं। आज के इस हो-हल्ले के बीच कुछ लोगों से यह बात अनदेखी रह गई है कि पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने किस खूबी के साथ बिना शोर-शराबे गोरखालैंड के आंदोलन पर वहां के संगठनों के साथ एक ऐसा समझौता कर लिया जिससे उस इलाके की 'आजादीÓ या स्वायत्तता की हसरत हिंसक नहीं हो पाई और अमनचैन से राज्य सरकार ने उस इलाके के जरूरत के लायक हक दे दिए। हम यहां पर यह भी याद करना चाहेंगे कि अविभाजित मध्यप्रदेश में कांगे्रस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पहल करके विधानसभा से ऐसा प्रस्ताव करवाया था कि छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिया जाए, यह राजनीतिक नजरिए से अपने थाली की कुछ मिठाई को उठाकर किसी को देने जैसी बात भी थी। लेकिन ऐसी उदारता उन्होंने दिखाई थी और मध्यप्रदेश के साथ-साथ बिहार और उत्तरप्रदेश ने भी झारखंड और उत्तराखंड बनाने के प्रस्ताव विधानसभा में पास किए थे जिसके आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार राज्य बनाने का वह ऐतिहासिक फैसला लिया था। आज न तो कोई राज्य अपने किसी हिस्से को अलग करने को तैयार है और न ही दिल्ली में किसी में अटलजी जैसा साफ-साफ फैसला करने का आज साहस है।
फिर यह कि तेलंगाना का आज का आंदोलन केंद्र सरकार बहुत अधिक समय देते भी नहीं दिख रहा। ऐसा भी नहीं कि तेलंगाना का आज का तनाव ऐतिहासिक है। इसके बहुत पहले भी वहां के आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और पूरे देश में राज्य का दर्जा पाने के लिए इतनी बड़ी शहादत का इतिहास नहीं मिलता, पुलिस की गोलियों से कोई पौने चार सौ लोग मारे गए थे। और आज यह इलाका बेमुद्दत हड़ताल पर है जिसे लेकर वहां के लोगों का यह कहना है कि यह राज्य बनने तक जारी रहेगा। वहां के आंदोलनकारियों की शहादत का ऐसा मजबूत इतिहास कि यह आंदोलन लंबे समय तक जारी रहने का आसार तो है, और यह भी हो सकता है कि लोग वहां आत्मदाह पर भी उतर आएं। यह मामला केंद्र सरकार के लिए एक ऐसी राजनीतिक चुनौती है जिससे जूझने की ताकत आज कांगे्रस में नहीं दिख रही है। और अब यह समय भी नहीं दिख रहा है कि कांगे्रस की लीडरशिप वाला यूपीए किसी राज्य पुनर्गठन आयोग की चर्चा छेड़े।
हमारा यह मानना है कि छोटे राज्य बनाए बिना और कोई चारा इस देश में नहीं है। और यह बात हम किसी मजबूरी या बेबसी की नौबत को देखकर नहीं कह रहे हैं, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के अनुभव को देखकर कह रहे हैं। ऐसी मिसाल भी गिनाई जा सकती है कि झारखंड या गोवा जैसे छोटे राज्य लगातार राजनीतिक अस्थिरता और भयानक भ्रष्टाचार, संवैधानिक संकट सभी कुछ तो भुगतते रहे हैं, भुगत रहे हैं। लेकिन ऐसा तो बड़े राज्यों के साथ भी होते आया है और सिर्फ ऐसे ही तर्कों के आधार पर छोटे राज्यों को रोका नहीं जा सकता। आंध्र देश के उन राज्यों में से है जहां एक बड़ी नक्सल मौजूदगी रही है। अगर किसी इलाके को उसका हक न मिले तो हिंसक आंदोलन दूसरे बैनरों तले भी शुरू हो सकते हैं। तेलंगाना को तुरंत बनाने और बाकी देश में भी छोटे राज्यों की मांग को तौलने की जरूरत है। आज ही।





 

छोटी सी बात

8 अक्टूबर
बिना काम किए, बिना मेहनत किए आप किसी को धोखा नहीं दे सकते। पसीना चमकता हुआ दिखता है और कामचोर की शक्ल पर मकड़ी के जाले से दिखते हैं। कामचोर सबसे बड़ा धोखा अपने आपको देते हैं।

अन्ना का मुखौटा उतरा

8 अक्टूबर
अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने का आव्हान उनके आंदोलन की शक्ल पर छाई हुई धुंध को साफ कर देता है। आज जब देश की कोई भी पार्टी अन्ना हजारे की लोकपाल विधेयक को लेकर चली आ रही अंतहीन जिद के साथ पूरी तरह नहीं है और यूपीए और कांगे्रस ने अपनी सीमाओं को पार करके भी अन्ना हजारे के साथ कई कड़वे समझौते किए, तब हरियाणा के एक उपचुनाव में अन्ना हजारे का कांगे्रस के खिलाफ वोट देने को कहना और वहां पर खुलकर सीडी चलाकर प्रचार करना भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं है, यह सीधे-सीधे कांगे्रस के खिलाफ मुखौटे में चल रहा एक राजनीतिक आंदोलन है। ऐसा करके अन्ना हजारे ने देश के समझदार तबके के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो दी है और बहुत से लोग उन्हें एक जिद्दी, अडिय़ल और ब्लैकमेलर मान रहे थे, अब वे कांगे्रस विरोधी एक राजनीतिक ताकत के रूप में भी खुलकर सामने आ गए हैं।
आज जब एक उपचुनाव में प्रचार करते हुए उनका सीधा हमला कांगे्रस की चुनावी संभावनाओं पर है, तब एक और मुखौटा पहनकर अन्ना हजारे का आंदोलन और उनकी टोली आरएसएस के साथ अपने रिश्तों को दबाने-छुपाने की कोशिश और कर रहे हैं। यह सिलसिला लोगों को तब भी दिख रहा था जब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन कहने को तो भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे थे लेकिन असल में उनका पूरा निशाना यूपीए सरकार, कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी का परिवार था। ऐसी हालत में गांधीवाद के नाम पर, भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर इन दोनों गुटों द्वारा अलग-अलग या तालमेल से अलग-अलग समय पर किए गए आंदोलनों को समझने की जरूरत है। जिस तरह कोई चाकू या बंदूक की नोंक पर किसी मांग को पूरा करवाता है उस तरह अन्ना हजारे ने अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना दिखाते हुए केंद्र सरकार, राजनीतिक दलों और संसद, सबको एक साथ ब्लैकमेल करते हुए देश का एक सबसे जटिल भावी कानून फुटपाथ पर बनाने की जिद सामने रखी। देश के लोगों को अपनी जान के मुद्दे पर उकसाते और भड़काते हुए अन्ना हजारे ने दो बातों को सामने नहीं आने दिया। एक तो यह कि उत्तर-पूर्व के मणिपुर राज्य में शर्मिला नाम की एक महिला दस बरस से अधिक समय से अनशन कर रही है और उसकी मांग है कि वहां पर ज्यादती करने वाली भारतीय सेना के बचाव के लिए बनाए गए विशेष कानून को खत्म किया जाए। दूसरी बात यह कि इस देश में जैन समाज के लोग आए दिन पचीस-पचास दिनों का पूरी तरह का उपवास करते ही रहते हैं। इन दोनों मुद्दों को सामने न आने देकर सारा हल्ला कुछ इस तरह का किया गया कि अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कानून नहीं बना तो अन्ना हजारे जान दे देंगे। वहां से लेकर संसद और पार्टियों ने सिर झुका लिया और अन्ना की अधिकतर मांगों को पूरा करने का वायदा किया, पूरा लोकतंत्र इस धमकी के आगे झुके रहा, और वहां से लेकर आज कुछ हफ्तों के भीतर अन्ना हजारे फिर कांगे्रस के खिलाफ चुनाव प्रचार करते हुए मैदान में हैंं।
लोकतंत्र में जब कभी कोई नेक-नीयत इंसान भी तानाशाह की तरह खड़ा हो जाता है और उसकी बातों की वजह से कुछ वक्त के लिए उसकी पूजा होने लगती है तो वह इंसान आगे-पीछे लोकतंत्र के लिए घातक ही साबित होता है। लोकतंत्र के कुछ संस्थानों के नाकामयाब होने से, उनसे कुछ या कई गलतियां होने से उन सबको नकारते हुए एक तानाशाह अंदाज में नया कानून बनाने की जिद उठाई जाए और उसे पूरा किया जाए, यह लोकतंत्र नहीं है। हम किसी भी और कितने भी जनकल्याणकारी तानाशाह के मुकाबले निर्वाचित लोगों को बेहतर समझते हैं और लोगों से उनके निर्वाचन का अधिकार छीनकर अगर कोई जान देने की धमकी देकर कोई भला सा दिखता काम भी करवाना चाहता है तो हम उसे बहुत ही खतरनाक मानते हैं। पूरी दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि तानाशाहों के कई नारे संतों की तरह के होते हैं। भारत में ही आपातकाल के दौरान संजय गांधी के नारे छोटे परिवार, दहेज के विरोध और पेड़ लगाने के थे। लेकिन उस वक्त की तानाशाही की हकीकत इन नारों के पीछे एक हत्यारी हकीकत थी। आज अन्ना हजारे के आंदोलन के नारों के पीछे उनकी नीयत चुनाव में किसी राजनीतिक ताकत का विरोध करते हुए किसी दूसरी राजनीतिक ताकत को बढ़ावा देने की तो साबित हो ही चुकी है, आने वाले दिनों में अगर उनके आंदोलन को लेकर कुछ दूसरे किस्म की साजिशें भी साबित होंगी तो हमें कोई हैरानी नहीं होगी।

छोटी सी बात


7 अक्टूबर
आपका कद जैसे-जैसे बढ़ते जाता है, आप आसान निशाना बनते जाते हैं। इसलिए कामयाबी के साथ-साथ चौकन्नापन भी बढ़ाते जाएं। यह भी याद रखें कि शिखर पर जाते हुए लोग अकेले भी होते जाते हैं।

मौलिक खूबियों से लेकर एक खामी तक की कहानी, स्टीव जॉब्स

7 अक्टूबर 2011
किसी कामयाब कारोबारी पर इस जगह लिखने का मौका कम ही आता है और एप्पल कम्प्यूटर के मार्फत दुनिया में अरबों घरों तक पहुंचने वाले स्टीव जॉब्स के बारे में लिखने की वजह न कामयाबी है और न ही कारोबार। उनकी जिंदगी इतनी दिलचस्प है और सामानों के बाजार में उनका योगदान इतना मौलिक है कि ये दो बातें उनके बारे में लिखने के लिए काफी है। और जिन्होंने एप्पल के बनाए सामान इस्तेमाल किए हैं उनमें से अधिकतर का यह मानना है और अनुभव है कि वे अपने किस्म के सामानों में सबसे अच्छे रहते हैं। यह क्वालिटी या उत्कृष्टता एक और बात है जो आज यहां उनके बारे में लिखने को मजबूर करती है।
एक बहुत मामूली और शायद दिक्कतों भरी हुई शुरूआत की जिंदगी कहां तक पहुंची यह देखना हो तो वैसे तो अमरीका में कुछ दूसरी कहानियां भी इस किस्म की मिल जाएंगी लेकिन स्टीव जॉब्स का मामला भी देखने और सीखने लायक है कि किस तरह कोई अभावों से ऊपर उठकर आसमान तक पहुंच सकता है और अपने काम की वजह से सितारे की तरह आसमान पर हमेशा टंगे भी रह सकता है। स्टीव जॉब्स का जन्म अमरीका में आकर बसे एक सीरियाई मुस्लिम आप्रवासी परिवार में हुआ और किन्हीं वजहों से उन्हें एक दूसरे परिवार को गोद दे दिया गया। अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ बच्चा स्कूल और कॉलेज के वक्त दोस्तों के कमरों में फर्श पर सोता था और खाना जुटाने के लिए इधर-उधर पड़ी खाली बोतलों को इक_ा करके बेचता था। हफ्ते के हफ्ते वह हरे कृष्ण मंदिर में मुफ्त का प्रसाद पाने भी चले जाता था और बाद के बरसों में वह भारत भी आया और बौद्ध बना।
हाल के बरसों तक अगर स्टीव जॉब्स को देखें तो अमरीका की कारोबारी दुनिया के मुखिया लोगों वाला कोई भी तौर-तरीका उनका नहीं था। पूरे वक्त खेल के जूते, साधारण नीली जींस और काली टी-शर्ट को उन्होंने मानों अपनी वर्दी बना रखी थी और यह पोशाक अमरीका में छुट्टी के वक्त तो बड़े लोग पहन लेते हैं लेकिन बड़े से बड़े समारोह में भी स्टीव जॉब्स सिर्फ इन्हीं कपड़ों में दिखते रहे। अपने रहन-सहन की उनकी इस मौलिक सोच की ही एक झलक उनके बनाए हुए सामानों में भी दिखती रही। एप्पल के कम्प्यूटर, लैपटॉप, आईपॉड और आईफोन से लेकर आईपैड तक उन्होंने जो-जो बनाया उनमें से हर किसी में एक बहुत ही अनोखापन था। और यही अनोखापन दुनिया के आज के कड़े मुकाबले वाले बाजार में उन्हें एकाधिकार सा दिला गया। उनके बारे में आज यहां लिखने का एक मकसद यह है कि एक मौलिकता, अनोखापन और उत्कृष्टता मिलकर क्या कर सकते हैं यह लोगों को देखने, समझने और सीखने की जरूरत है। दो बातें सोचने की हैं। एक तो यह कि दुनिया के तौर-तरीकों के खिलाफ एक बागी के अंदाज में भी कोई अपनी मर्जी के कपड़ों में सबसे बड़ी पूंजीवादी दुनिया में रह सकता है। दूसरी बात यह कि कल्पनाशीलता और उत्कृष्टता एक शानदार बाजार-व्यवस्था के साथ कहां तक पहुंच सकती है। उनके बारे में यह माना गया कि उन्होंने ये तमाम सामान उस किस्म के और उस वक्त बनाए जब लोगों को इस बात का अहसास भी नहीं था कि उन्हें वैसे किसी सामान की जरूरत है। बहुत ही गरीबी या साधारण हालत से उठकर कोई अगर मौलिक सामानों वाली, वक्त से दस कदम आगे चलने वाली दुनिया की सबसे बड़ी, कामयाब और मशहूर कंपनी बना सकता है और ऐतिहासिक कमाई करके भी दिखा सकता है, तो ऐसी अकेली कहानी शायद स्टीव जॉब्स की ही है।
स्टीव जॉब्स को दुनिया भर में एप्पल के ग्राहक जिस तकलीफ के साथ याद कर रहे हैं और फूल चढ़ा रहे हैं, वह देखने लायक है। क्या इसके पहले किसी कारोबारी को ऐसा कुछ नसीब हुआ था? एप्पल कंपनी के सबसे बड़े मुकाबले वाली माइक्रोसॉफ्ट  कंपनी के मुखिया बिल गेट्स के रिश्ते स्टीव जॉब्स से दोस्ती के भी रहे और गलाकाट मुकाबले के भी। लेकिन बिल गेट्स ने जिस अंदाज में दुनिया भर में समाज सेवा कर बीड़ा उठाया है और दुनिया भर के उद्योगपतियों को अपनी आधी दौलत समाज के लिए देने के लिए प्रेरित किया है, वैसा कुछ भी स्टीव जॉब्स के साथ जुड़ा हुआ नहीं है। मिट्टी से उठकर उन्होंने एप्पल जैसी कंपनी बनाई, उसे छोड़कर निकल गए, फिर दूसरी कंपनी बनाकर उसकी कमाई से एप्पल को खरीद लिया और उसे तारों से ऊपर तक ले गए, लेकिन उन्होंने समाज के लिए कोई दान किया हो ऐसा किसी को नहीं मालूम है। बल्कि एप्पल पर दुबारा कब्जा करने के बाद उन्होंने उस कंपनी के समाजसेवा के सारे कार्यक्रम बंद भी करवा दिए। इस तरह एक अच्छे कारोबारी की जो जिम्मेदारी समाज के लिए होती है उसमें स्टीव जॉब्स ने शायद अपना आधा खाया जूठा सेब भी किसी भूखे को नहीं दिया। उनकी बहुत सी खूबियों को गिनाते हुए अगर इस बात की चर्चा न की जाए तो यह अधूरी बात ही होगी। उनकी कंपनी को शेयर बाजार में दुनिया की सबसे सफल कंपनी कहा लेकिन यह कंपनी अमरीका की सबसे कम समाज सेवा करने वाली कंपनी भी कहलाई। स्टीव जॉब्स की सामानों और तकनीक, मार्केटिंग और डिजाइन की सारी मौलिकता, बिल गेट्स की समाजसेवा की मौलिकता और आधी दौलत दान देने के अभियान के सामने धरी रह गई।

छोटी सी बात

5 अक्टूबर
कोई आपसे बदतमीजी करे तो कभी चुप रहकर बर्दाश्त न करें। रूबरू बता दें कि आप उसे समझते हैं और यह आपको मंजूर नहीं। बदतमीज की दूकान से कभी कोई सामान न लें। इन दिनों बाजार में किसी सामान का एकाधिकार नहीं है। इसलिए बेहतर सामान, कंपनी या डीलर छांटें। अपने साथ हुई बेईमानी या बदतमीजी को लेकर आस-पास के लोगों से चर्चा जरूर करें।

अपने को धोखा देने की सालगिरह


5 अक्टूबर 2011
हर बरस की तरह इस बार भी दशहरे का त्यौहार रावण को जलाकर पूरा हो जाएगा। रावण बहुत सहूलियत लेकर आता है। वो ना रहे तो लोग जलाएंगे किसे? एक होली का मौका आता है कि लोग अपनी हसरतें पूरी कर पाते हैं, और एक दशहरा आता है, लेकिन रावण तो कबका चला गया। अब बात आ गयी है बुराई की, तो उसके लिए होली पर लकडिय़ाँ और दशहरे पर पुतले लोगों ने गढ़ लिए। रावण था या नहीं, राम थे या नहीं, इसको लेकर मतभेद हो सकता है, लेकिन कम से कम राम की कहानी तो थी ही। उस कहानी से बिना भक्ति-भाव के भी अगर कुछ सीखने का है, तो वह अच्छाई और बुराई के बीच फर्क है। आज एक फर्क करने के लिए हिन्दुस्तान की बड़ी-बड़ी बुराइयों की चर्चा ना भी करें, और महज छोटी-छोटी बुराइयाँ गिनें, तो हिंदुस्तान में हर किसी के भीतर ऐसे रावण दिखते हैं कि उनमें से दस-दस सर छांटकर उनको लोग हर बरस जलाते जाएँ, तो उनके अपने मरने तक ऐसे कुछ सर कम हो पाएंगे। ऐसा भी तब हो पायेगा जब लोग इस दशहरे को अपने भीतर के मारे गए सिरों को फिर सर ना उठाने दें, और हर बरस अपनी बाकी बुराइयों के पुतले बनाते जाएँ. दरअसल जब एक कोई ऐसा आसान निशाना मिल जाता है, कि जिसे मारकर लोगों को लगता है कि उन्होंने बुराई मार दी, तो फिर उसी बात से अपने किये गलत कामों की आत्मग्लानि ख़त्म हो जाती है, और दशहरे की शाम लोग सोनपत्ती बांटते हुए इस फख्र के साथ घूमते हैं, कि बुराई का ऐसा ही अंजाम वे करते रहेंगे। लेकिन इसके बाद वे अगले बरस दशहरे तक के लिए बेफिक्र हो जाते हैं, कम से कम होली तक के लिए तो हो ही जाते हैं।

लेकिन सबको यह सोचने की जरूरत है कि अपने आप को धोखा देने का यह सिलसिला कब तक चलाया जाएगा, और राम-रावण के किस्सों से क्या सचमुच हिंदुस्तान के लोग अपना भला कर पा रहे हैं? अयोध्या वाले उत्तर प्रदेश में आये दिन लोग कमजोर तबकों की लड़कियों से बलात्कार करके उन्हें मार डाल रहे हैं, जि़ंदा जला दे रहे हैं। क्या रामजन्मभूमि के करीब रहने से इंसानों के भीतर का रावण मारा गया? अगर दशहरे के त्यौहार के प्रतीकों से ही किसी का भला हुआ होता, तो फिर रामजन्मभूमि के आस-पास आज लाल-बत्तियों में रावण ही रावण क्यों दिखते होते? लेकिन जिस तरह तमाम किस्म के बुरे लोग रोज़ मंदिर-मस्जिद जाकर ना सिर्फ इश्वर को (अगर वह कहीं है तो) बल्कि अपने आपको, पूरे समाज को झांसा देते रहते हैं। बहुत बरस हुए रायपुर में एक जाली नोट चलाने वाला भक्त पकड़ाया था जो रोज कई मंदिरों में जाकर सौ-सौ के नोट चढ़ाता था, और 95 रूपये वापिस लेता था। इस तरह वह जाली नोट खपा देता था। पकड़े जाने के ठीक पहले तक लोग उसे बहुत बड़ा भक्त मानते रहे। दुनिया भर में लोग रात-दिन ऐसे धोके देते रहते हैं। रावण या होली को बुराई के प्रतीक के रूप में जलाना उसी दर्जे का काम है।
बहुत ही सीधी-सादी बुराइयों को छांटकर अगर उनको ईमानदारी से ना जलाया जाये, तो दशहरा सौ रूपये का जाली नोट है, और होली पचास रूपये का। अपने निजी बर्ताव में, सार्वजनिक जिन्दगी में, लोगों को इतनी बुराइयां छोडऩे की जरूरत है, कि जो लोग ऐसा कर पते हैं, वे आस-पास रावणों की भीड़ देखकर लगातार भड़ास से भरे रहते हैं। दूसरों के साथ बदतमीजी करने वाले किसी भड़ास में नहीं रहते, लेकिन हमेशा अच्छा सुलूक करने वाले लोग लगातार दूसरों की बदतमीज़ी झेल-झेलकर तकलीफ पाते रहते हैं। दशहरे पर रावन जलाना बंद करना चाहिए और लोगों को अपने निजी- सार्वजनिक रावण निपटाने के बारे में सोचना चाहिए। अपने मन की बहादुरी के लिए ऐसे प्रतीकों का इस्तेमाल समाज के लिए घातक है।

छोटी सी बात

4 अक्टूबर
आपके  दोस्त पीने वाले हों, तो उनके अधिक पी लेने के बाद आप उनसे अलग-अलग लोगों की चर्चा करके उनकी असली भावनाएं जान सकते हैं। इससे आपको यह भी समझ आज जाएगा कि वे कितनी दोस्ती के लायक हैं।
और पीने वाले लोग इस खतरे को ठीक से समझ लें। नशे में कह दिया था, कहकर सॉरी कहने से फटे हुए दिल नहीं जुड़ जाते।

सेक्स को लेकर पाखंडी समाज से

4 अक्टूबर
एक भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा किए गए एक सर्वे में यह पाया गया है कि भारत में सेक्स की उम्र वाले नौजवान उम्र के लोगों में से 72 फीसदी ऐसे हैं जिन्होंने किसी नए साथी के साथ बिना किसी सुरक्षा के सेक्स संबंध बनाए। इस सर्वे के मुताबिक 40 फीसदी नौजवान लोगों ने यह कहा है कि उन्हें जरूरत के वक्त गर्भनिरोधकों का पाना मुश्किल हो जाता है। इसी सर्वे में 36 फीसदी लोगों ने यह कहा है कि वे परिवार या दोस्तों में कोई ऐसा मामला जानते हैं जिसमें गर्भनिरोधक न होने से लड़की गर्भवती हो गई। विश्व गर्भनिरोधक दिवस 26 सितंबर को मनाया जाता है और इसी के आसपास इससे जुड़े हुए सर्वे की यह रिपोर्ट जारी हुई है। यह भी पाया गया कि सर्वे में जवाब देने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं या डॉक्टरों से गर्भनिरोधकों के बारे में पूछने में हिचकते हैं और इनमें से बहुतों को स्कूल में यौनशिक्षा नहीं मिलती। यह सर्वे 29 देशों में ऑनलाईन किया गया था, जिसका एक मतलब यह भी है कि इसके जवाब देने वाले नौजवान समाज के संपन्न या शिक्षित या शहरी इंटरनेट उपभोक्ता थे। भारत में सभी राज्यों में यह सर्वे किया गया था और इसमें 20 से 25 बरस की उम्र के लड़के-लड़कियों को शामिल किया गया था। दुनिया भर के आंकड़ों में यह मिला कि हर बरस 20 करोड़ से अधिक युवतियां गर्भवती होती है जिनमें से 41 फीसदी गैरइरादतन मां बनने की राह पर चल पड़ती हैं।
इस सर्वे के आंकड़े तो अंतहीन हैं लेकिन हम इसे भारत के एक खास संदर्भ में देखना चाहते हैं। यहां पर समाज का जो तबका अधिक बोलता है वह अधिक कट्टर और दकियानूसी भी है। भारत की एक काल्पनिक संस्कृति को जिंदा रखने और उसके झंडे तले साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता या एक पाखंडी नैतिकता की अपनी दूकान चलाने के लिए यह तबका पे्रम संबंधों के सिर तोड़ता है मानो कृष्ण कभी इस देश में हुए ही नहीं, सेक्स की चर्चा से भी कतराता है मानो वात्सायन किसी और देश में हुए थे, यौनशिक्षा से कतराता है मानो तवायफों के कोठों पर संपन्न तबके के रईस नौजवानों की शिक्षा किसी और देश में होती रही हो। पूरी तरह एक पाखंड में जीकर, हकीकत पर हमलावर भारत का समाज अपनी नौजवान पीढ़ी को एक अंतहीन निराशा में पटक देता है जहां पर उसे अपने बराबरी के लड़के-लड़कियों से दोस्ती रखने के पहले आसपास के समाज को देखना होता है। लेकिन शहरीकरण, पढ़ाई, कामकाज के चलते अब पूरे देश में ऐसी नौबत बढ़ती चल रही है कि लड़के-लड़कियों के बीच उठना-बैठना, घूमना-फिरना, साथ काम करना अधिक होता है। लेकिन ऐसी नौबत के लिए न तो उन्हें एक वैज्ञानिक आधार पर बनी यौनशिक्षा मिली होती है और न ही समाज का वातावरण ऐसा होता है कि कोई लड़की जाकर किसी दूकान से गर्भनिरोधक खरीद सके। हम अपने आसपास के दायरे को देखें तो क्या ऐसा वातावरण दिखेगा कि किसी दवा दूकान पर जाकर कोई लड़की कंडोम खरीद सके? और ऐसा न होने पर वह बीमारियों और गर्भ से बचने के लिए अपने साथी लड़के पर पूरी तरह आश्रित हो जाती है।
हमें इस बात का पूरा अंदाज है कि इस मुद्दे पर हमारे साफ-साफ लिखने को लेकर हमारे बहुत से पाठक कुछ असुविधा महसूस करेंगे और हो सकता है कि इस अखबार को अपने जवान बच्चों की नजरों से परे रखने की कोशिश भी करेंगे। लेकिन हम ऐसे मां-बाप से भी यह जानना चाहते हैं कि दिन में कई घंटे बाहर रहकर पढऩे, खेलने और काम करने वाले अपने जवान बच्चों की वे कितनी निगरानी कर सकते हैं? उनके अपने बराबरी के लोगों से संबंधों को लेकर वे कितने आश्वस्त रह सकते हैं? और अगर वे अपने मन के भीतर इस तरह की खुशफहमी पाल कर भी रखते हैं तो वे जान लें कि कोई भी पीढ़ी रोक के बांध को तोड़कर या उसमें दरार पैदा करके अपना रास्ता निकालते आई है। ऐसे जवान बच्चे तो अपने किसी जोड़ीदार के लिए उस तरह तो वफादार रहने को बेबस नहीं रहते जैसे कि शादीशुदा जोड़े आपस में होते हैं, इसलिए उनकी जिंदगी में नए या अनजान लोगों से, अचानक किसी मौके पर सेक्स के खतरे आ सकते हैं और वैसे भी गर्भनिरोधकों की सावधानी उन्हें बचा सकती है। कोई भी मां-बाप अपने गैरशादीशुदा जवान बच्चों के बैग में कंडोम देखकर दहशत में तो आ सकते हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि कुंवारी बेटी को गर्भवती पाकर या जवान बेटे-बेटियों को एड्स जैसी बीमारी का शिकार पाकर उन्हें जो दहशत होगी वह कंडोम की दहशत से लाख गुना अधिक होगी। जो लोग यह मानते हैं कि उनकी नसीहतें और उनकी निगरानी उनके बच्चों को सेक्स से दूर रख लेती है, वे एक झांसे में जी रहे हैं और उन्हें आज की पीढ़ी की हकीकत का अहसास नहीं है। और फिर हम सिर्फ इसी पीढ़ी की बात क्यों करें, पहले की पीढिय़ां भी शायद ऐसी ही रही हों तभी तो जगह-जगह नवजात बच्चे घूरों में फेंके जाते थे। अगर हम जरा सा याद करें तो पहले हमारे भी शहर में हर हफ्ते-दस दिन में ऐसी कोई हत्या किसी गटर में तैर जाती थी, लेकिन आजकल ऐसी खबरें कम आती हैं, शायद गर्भनिरोधकों की वजह से या फिर गर्भपात करवाने की सरकारी और निजी सुविधा बढऩे की वजह से। दूसरी तरफ    भारत में एड्स के खतरों की हालत अब तक साफ नहीं है कि हकीकत में ये आंकड़े कितने हैं। सरकारी अस्पतालों तक पहुंचने वाले मामले हमें भरोसेमंद नहीं लगते हैं और हमारा मानना है कि सामाजिक बदनामी के डर से ऐसे अधिकांश मामले उजागर ही नहीं हो पाते होंगे और नाम-पता लिखने वाले सरकारी अस्पतालों से दूर बहुत से लोग निजी अस्पतालों में या दूसरे शहरों में चले जाते होंगे।
कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि हिंदुस्तान के नौजवानों को उनकी उम्र की शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों के मुताबिक एक सेहतमंद जिंदगी जीने देने के लिए माहौल देने की जरूरत है और सरकार को समाज के साथ मिलकर इसकी पहल करनी होगी। इसकी शुरूआत बैंक के एटीएम की तरह कंडोम की मशीनें लगाकर की जा सकती है, और कोई हर्ज नहीं कि रात-दिन खुली रहने वाली सरकारी जगहों, सार्वजनिक सुविधाओं पर ऐसी मशीनें लगाई जाएं जहां से कोई लड़की या महिला भी अपने लिए ऐसा बचाव खरीद सके। जो लोग यह मानते हैं कि ऐसी सुविधाएं बढऩे से लोगों के बीच सेक्स की संस्कृति बढ़ेगी, उन्हें आज की हकीकत का अंदाज ही नहीं है।

हिंदुस्तान की जनता यह सब कब तक बर्दाश्त करेगी?

03 अक्टूबर 2011
भारतीय लोकतंत्र की हालत और इंसान से लेकर भगवान तक की हालत बहुत नफरत पैदा करने वाली है। हम बार-बार कोशिश करते हैं कि कुछ मुद्दों पर कम से कम कुछ हफ्तों तक दुबारा न लिखें लेकिन ऐसा न करना एक अलग किस्म की हैवानियत होगी इसलिए लिखे बिना कोई गुजारा नहीं है। आज ही पहले पन्ने पर हम खबर छाप रहे हैं कि किस तरह कर्नाटक में कल तक भाजपा के मंत्री रहे वहां के सबसे बड़े खदान माफिया रेड्डी बंधुओं और उनके आसपास के लोगों पर सीबीआई के छापे पड़ रहे हैं और वहां के खदान मालिकों और देश के सबसे बड़े स्टील उद्योगपतियों पर सीबीआई ने छापे डाले हैं। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट अपने निगरानी में करवा रहा है तब हो रही है वरना कर्नाटक की भाजपा सरकार से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक सबके हाथ इन खदान चोरों के सिर पर उसी तरह थे जिस तरह इन रेड्डी बंधुओं के सिर पर सुषमा स्वराज के हाथ की तस्वीरें मीडिया में तैर रही हैं। इसी के साथ दूसरी दिल दहलाने वाली खबर यह है कि इसी लूटे जा रहे कर्नाटक में कुपोषण से हजारों बच्चे मारे जा रहे हैं और ये आंकड़े खुद वहां की सरकार के हैं। लोहा खदानों की इन चोरियों से परे जिस रायचूर जिले में सोने की खदान चलती है वहां पिछले दो बरस में ढाई हजार से अधिक बच्चे कुपोषण से मारे गए हैं और यहां के खदान चोर मंत्रियों के चढ़ाए हुए पैंतालीस करोड़ के मुकुट से तिरूपति के भगवान को कोई परहेज नहीं रहा और न ही वहां के ट्रस्टियों को ऐसे चोरों से चढ़ावा लेने में कोई दिक्कत हुई।
लोकतंत्र से लेकर ईश्वर तक का कारोबार गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है और ऐसी मौतों वाले राज्य की लूट से जब देश का सबसे दौलतमंद ईश्वर अपनी सजावट करता है तो ईश्वर और धर्म की सोच पर भी सवाल खड़े होते हैं। हम बहुत से भक्तों को नाराज करने की कीमत पर भी यह सवाल उठाना चाहते हैं कि लुटेरों की बस्ती में गरीब और मासूम बच्चों की भूख और कुपोषण से ऐसी मौतों की रिपोर्ट मौत का हिंदू भगवान, यमराज अपने से बड़े किसी भगवान को जमा करता है या नहीं? और इसके बाद भी इन हजारों लाशों के हक के निवालों को निगलकर राक्षसों से ताकतवर हो चुके वहां के इन नेताओं के चढ़ावे को यह भगवान वापिस क्यों नहीं कर सकता? अगर उसका कोई अस्तित्व है तो वह ऐसे वक्त सामने क्यों नहीं आता? और बिना हथियार उठाए जो लोग हजारों लाखों लोगों को इस तरह बेमौत मारने में रात-दिन लगे हैं उनको अगर यह ईश्वर रोक नहीं सकता तो उसके अस्तित्व की धारणा और उसकी सत्ता का और क्या सुबूत हो सकता है? और देश में लोकतंत्र की सत्ता का और क्या सुबूत हो सकता है? और इस देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर पूरे देश में वाहवाही पाने वाले अन्ना-बाबा जैसे लोगों की कर्नाटक की लूटमार पर चुप्पी से बड़ा और क्या सुबूत हो सकता है उनकी नीयत के बारे में? जब चारों तरफ की इंसानी और भगवानी ताकतें ऐसी लूटमार पर चुप हैं और लोकतंत्र ऐसी लूटमार के कई बरस निकल जाने के बाद एक अदालती दखल से ही इसमें झांक पा रहा है तो फिर ऐसे लोकतंत्र की जरूरत आखिर किसको है?
खदानों वाले इस कर्नाटक में जब भाजपा का मुख्यमंत्री अपने बेटे-दामाद को करोड़ों का दस्तावेजी फायदा पहुंचाने में फंसा हुआ है और उसी कर्नाटक की राजधानी में बसे हुए ऑर्ट ऑफ लिविंग के भगवान श्रीश्री रविशंकर को उस कर्नाटक में कोई बुराई नहीं दिखती और दिल्ली के रामलीला मैदान में वे देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा उठाते हैं तो यह भी लगता है कि धर्म से परे आध्यात्म का अपनी आंखों के सामने हो रहे ऐसे लूटमार और हो रही ऐसी मौतों पर क्या सोचना है? यह एक बहुत बड़ा ऑर्ट ऑफ लिविंग है जिसमें कुपोषण से होने वाली हजारों मौतों और उसके लिए जिम्मेदार सरकार के लोगों की रात-दिन की दसियों हजारों करोड़ की लूटमार को साथ-साथ देखते हुए उस पर मौन व्रत रखना और रामलीला मैदान के अन्ना-बाबा के व्रत को तुड़वाने के लिए वहां पहुंचना।
यह पूरा सिलसिला भारत के लोकतंत्र से लेकर इंसानियत तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। यह सिलसिला धर्म से लेकर आध्यात्म तक और भगवान से लेकर उसके एजेंटों तक पर से आस्था खत्म कर देने वाला है। यह सिलसिला योगियों से लेकर गांधीवादियों तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। और आज छापे में घिरे कांगे्रस विधायक की पार्टी से लेकर भाजपा विधायक की पार्टी तक और देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों तक पर से विश्वास को खत्म कर देने वाला है। ऐसे में देश की जनता की भावनाओं में जो विकल्प बचते हैं वे भयानक हैं। कुछ को लगता है कि इससे तो अंगे्रजों का राज अच्छा था, कुछ को लगता है कि अब इस देश को फौज के हवाले कर देना चाहिए, और कुछ को लगता है कि नक्सली बाकी देश में क्यों नहीं फैल रहे। हमें यही लगता है कि हिंदुस्तान की जनता यह सब कब तक बर्दाश्त करेगी?

पेशेवर झूठों की कहानी

3 अक्टूबर 2011
आजकल
सुनील कुमार

इंटरनेट पर सुब्रमण्यम स्वामी को रोजाना दर्जनों ट्वीट पोस्ट करते देखना बड़ा दिलचस्प भी रहता है और हैरान करने वाला भी। उनकी कुछ बातों को गंभीरता से लेना इसलिए जरूर लगता है क्योंकि वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर अपने कई आरोपों को दस्तावेजों के साथ साबित करने का काम कर चुके हैं और दुनिया के बड़े जाने-माने विश्वविद्यालयों में उन्हें पढ़ाने के लिए बुलाया जाता है। इसलिए उन्हें महज साम्प्रदायिक, शिगूफेबाज कहकर खारिज कर देना जायज नहीं होगा। उनकी बातें साम्प्रदायिकता के जहर से भरी रहती हैं लेकिन वे अपने आरोपों को देश की सबसे बड़ी अदालत तक ले जाकर उन्हें सही साबित करने का हौसला दिखाने वाले कुछ गिने-चुने नेताओं में से हैं जिनकी अपनी पार्टी का न कोई बड़ा ढांचा है और न ही उन्हें इस लड़ाई में किसी और से बहुत बड़ा सहारा मिलता।
मैंने उनसे ट्विटर पर कुछ आरोपों को लेकर जब सुबूत मांगे तो उनका जवाबी हमला तो कम था लेकिन उनके समर्थन में चौकन्नी और मेहनत करने वाली टीम ने सीधी गाली-गलौज शुरू करने और बिना किसी जानकारी के मुझे कांगे्रस की तनख्वाह पर जीने वाला लिखना शुरू कर दिया। उन्हें यह जानकर थोड़ी सी निराशा हो सकती है कि कांगे्रस के कुछ लोग मुझे भाजपा की तनख्वाह पर जीने वाला मानते हैं, सरकार में बैठे कुछ लोग नक्सलियों का मददगार मानते हैं, नक्सलियों से हमदर्दी रखने वाले मुझे सरकार का हिमायती मानते हैं। कुल मिलाकर कोई भी मुझे अपना नहीं मानता क्योंकि किसी व्यक्ति या संगठन के बजाय जब मुद्दों पर लिखना होता है तो कभी किसी के खिलाफ कड़वी बातें लिखी जाती हैं तो कभी उनके किसी विरोधी के खिलाफ। और इंटरनेट के ट्विटर पर मेरे सरीखे छोटे शहर के अखबारनवीस के बारे में अधिक लोग जानते नहीं हैं इसलिए किसी से एक लाईन का सीधा सवाल भी लोगों को तुरंत उकसा देता है कि वे गाली-गलौज शुरू कर दें।
खुद सुब्रमण्यम स्वामी ने सुबूत की मांग के मेरे ट्वीट के जवाब में लिखा कि भारतीय मीडिया किसी सुबूत को परखने की ताकत नहीं रखता।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक अपनी लड़ाई को तर्कसंगत और न्यायसंगत साबित करने में लगे हुए, दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में पढऩे और पढ़ाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह की बातें लिखते हैं उससे यह हैरानी होती है कि ऐसे बेबुनियाद झूठ की उन्हें जरूरत क्यों पड़ती है? अभी उन्होंने लिखा-विष कन्या की बहन, अनुष्का उर्फ अलेजान्द्रा ने सोनिया के हमशक्ल का रोल निभाना शुरू कर दिया है। वह पी.चिदंबरम को आदेश जारी करती है। दो अक्टूबर को सुबह राजघाट पर ध्यान से देखें। उन्होंने आगे लिखा कि अनुष्का रोजाना उस पर (यह शायद चिदंबरम के बारे में ही है) चीखती है-स्वामी को गिरफ्तार करो, भारतीय संविधान टायलेट पेपर है उसे फेंक दो। वे आए दिन इटेलियन माफिया जैसे आरोप लगाते रहते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि सोनिया और जेटली प्रेस को कहते रहते हैं कि वे उनके (स्वामी के) बारे में कोई भी अच्छी खबर न छापे।
मुझे ऐसी किसी अनुष्का नाम के विष कन्या के बारे में अलग से जानकारी नहीं है कि स्वामी किसके बारे में लिख रहे हैं, लेकिन मुझे उनके इस आरोप पर जरा भी भरोसा नहीं है कि कोई सोनिया गांधी की हमशक्ल होकर राजघाट पर पहुंचेगी।
इस मुद्दे पर आज लिखने की इसलिए सूझ रही है कि कांगे्रस के चर्चित, विवादास्पद और ताकतवर महासचिव दिग्विजय सिंह की एक शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने बाईस लोगों या वेबसाईटों के खिलाफ जुर्म कायम किया है जहां पर उनके बारे में अपमानजनक बातें लिखी गई हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जिस तरह के आरोप रोज कई बार लगा रहे हैं, उनको साबित करना शायद उनके जैसे ताकतवर अदालतबाज के लिए भी मुश्किल होगा और उनसे अदालत में सोनिया से जुड़े मुद्दों पर बहस करना कांगे्रस तय करती है या नहीं इसका अंदाज लगाना मुश्किल होगा। लेकिन जो सोनिया गांधी मीडिया में किसी से किसी तरह की बात न करने के लिए जानी जाती है वह मीडिया के लोगों को स्वामी के पक्ष की कोई खबर न बनाने को कहे, यह बात भरोसमंद नहीं लगती।
दिग्विजय सिंह के दायर किए गए मामले से बहुत पहले ही फेसबुक पर कई लोगों से इस बात को लेकर मेरा गहरा मतभेद रहा कि कुछ साम्प्रदायिक सोच के लोगों का रोज का लिखा हुआ झूठ कई लोग एक सच की तरह फैलाना शुरू कर देते हैं और जब मैं उनसे जान-पहचान होने के नाते जांच-परख लेने की अपील करता हूं तो वे मुझे इस खेमे का या उस खेमे का एजेंट लिखने लगते हैं। इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को फैलाना जितना आसान है, उतना ही आसान झूठ को पकड़ लेना भी है। जब बहुत ही सनसनीखेज और बड़े-बड़े आरोप लगते हैं तो उनको जांच लेना मेरी आदत में शुमार हो गया है। नतीजा यह होता है कि सोनिया या राहुल के बारे में, सोनिया के मायके के बारे में, सोनिया के इटेलियन माफिया या पोप से रिश्तों के बारे में जितने तरह की बातें इंटरनेट पर तैरती हैं वे सारी की सारी बातें घोर साम्प्रदायिकता फैलाने वाली एक-दो दर्जन वेबसाईटों तक जाकर खत्म हो जाती हैं, और इससे आगे भी किसी भी भरोसेमंद समाचार स्रोत तक नहीं पहुंच पातीं। सोनिया गांधी के न्यूयॉर्क में इलाज के दौरान सुब्रमण्यम स्वामी ने बहुत किस्म के ऐसे आरोप लगाए कि अमरीकी अदालतों में सोनिया की कांगे्रस पार्टी के दायर किए गए मुकदमे कैसे वापिस लिए जा रहे हैं या इस किस्म की कुछ और बातें। उनके बारे में पूछने पर उनके पास कोई जवाब नहीं था और उनके हिमायतियों के पास गंदी गालियां थीं।
कोई सच का साथ इस हद तक छोड़कर झूठ की बुनियाद पर अपनी दुश्मनी की इमारत को कब तक खड़ा रख सकता है, उससे एक लंबे सार्वजनिक जीवन में उसका क्या फायदा हो सकता है, यह सोचना बड़ा मुश्किल है लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी इसकी एक बहुत बड़ी मिसाल हैं।
आज जिन लोगों को भारत की सूचना तकनीक कानून की जानकारी नहीं है उन्हें यह जान लेना बेहतर होगा कि अखबार में किसी को बेइज्जत करके दसियों बरस तक संपादक बचे रह सकता है, लेकिन आईटी एक्ट इतना कड़ा है और उसमें सजा की संभावना, या आशंका जो भी कहें, इतनी अधिक है कि लोगों का बचना खासा मुश्किल होगा। लोगों को इंटरनेट पर किसी के खिलाफ झूठ लिखते हुए एक धेले का भी खर्च नहीं होता, जबकि अखबार को छापना खासा मुश्किल होता है। ऐसे में लोगों को किसी के चाल-चलन से लेकर किसी के परिवार तक के बारे में सफेद झूठ लिखने में भी पल भर नहीं लगता और फिर उस झूठ में दिलचस्पी रखने वाले लोग उसे एक संक्रामक रोग की तरह फैलाने में जुट जाते हैं।
दिग्विजय सिंह ने पुलिस में जो मामला दर्ज करवाया है वह कुछ लोगों को जब तक सजा दिलवाने में कामयाब हो सके तब तक बहुत से और लोग लापरवाही से किसी के भी बारे में झूठ लिखना जारी रख सकते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने का एक मकसद यह भी है कि कम से कम इस कॉलम को पढऩे वाले लोग ऐसी गलती से भी बचें, और किसी सजा के खतरे से भी। सच और झूठ, जायज और नाजायज, तय करने का मामला तो अपने-अपने नजरिए से लोग करते हैं, लेकिन अदालत में जब कोई मामला जाता है तो वहां पर सच सिर्फ वही होता है जो अदालत में सच साबित किया जा सके। जो लोग नेहरू-गांधी परिवार की रगों में दौडऩे वाले खून को लेकर एक डीएनए टेस्ट के सुबूत की तरह साम्प्रदायिक नफरत को रात-दिन लिख रहे हैं और फैला रहे हैं वे लोग तभी तक कानून से बचे हैं जब तक कोई उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं करता और उन्हें अनदेखा करना बेहतर समझता है। अब तक बहुत से अखबार भी अपनी छापी झूठी बातों के साथ भी इसलिए चलते रहते हैं क्योंकि उनके खिलाफ कोई अदालत तक जाने को लोग वक्त, खर्च और इज्जत की और अधिक बर्बादी मानते हैं। लेकिन इंटरनेट के मामले में चूंकि कानून बहुत अधिक कड़ा है इसलिए लोग इसे छोटी बर्बादी मानते हुए झूठे को बर्बाद करना भी तय कर सकते हैं।

छोटी सी बात

2 अक्टूबर
किसी के परिवार में बैठें तो अपनी उम्र के लोगों से बात करने के बजाय उस परिवार के बच्चों और बूढ़ों से अधिक बात करें। अपनी बराबरी के लोगों से तो आप और भी कहीं बात कर सकते हैं।

गांधी से इन सबको दूर रखो


2 अक्टूबर

इस देश में गांधी को साल भर में सबसे अधिक अगर किसी दिन कोसा जाता है तो वह उनके जन्मदिन 2 अक्टूबर को। देश भर में शराब की दुकानें इस दिन बंद रहती हैं और इस सरकारी फैसले की वजह से इस दिन छुट्टी मनाने वाले लोगों का मजा किरकिरा होता है और रोज पीने वाले बेचैन रहते हैं। नतीजा यह होता है कि करोड़ों लोग शायद आज के दिन यह कहते हुए गांधी को याद करते हैं कि खुद तो चले गया, हमें प्यासा मार डाला। लेकिन इससे परे भी इस दिन लोगों के मुंह में बहुत कड़वाहट घुलती है। जितनी बात गांधी का चेहरा टीवी पर दिखता है, नेताओं के भाषण छपते हैं और राह चलते कहीं-कहीं गांधी की प्रतिमाओं पर जलसा दिखता है, उतनी ही बार लोगों को यह बात अधिक तल्खी के साथ याद पड़ती है कि गांधी का नाम लेकर चलने वाले देश के ताकतवर नेता इस तरह गांधी की सोच पर शौच करते हुए देश चला रहे हैं। गरीब के हक, समाज के प्रति जिम्मेदारी, और जिंदगी में किफायत, ईमानदारी और इंसाफ, बराबरी का बर्ताव, इनमें से तमाम बातों को कुचलते हुए जो तबका चलता है वही आज राजघाट से लेकर कस्बों तक गांधी प्रतिमाओं पर माला चढ़ाकर शोहरत का एक और मौका दुह लेता है।
जो तबका लाल-पीली बत्तियों में चलता है, सायरन और काफिले में चलता है, जो महलों की तरह के सरकारी बंगलों में रहता है, मुफ्तखोरी करता है, देश को लूटता है उसे गांधी के पास पहुंचने से कैसे रोका जा सकता है, यह तरकीब सोचने की जरूरत है। जिसका चाल-चलन, जिसकी नीयत गांधी के ठीक खिलाफ है, वह तबका गांधी जयंती पर अपने-आपको भला साबित करने का एक और मौका पा जाता है। इस देश के गरीब अपने पूरे चौबीस घंटों का खर्च छब्बीस रूपए रोज में चलाने के हकदार माने जा रहे हैं, और ऐसे हजार-हजार लोगों के हक को एक-एक दिन में खर्च करने वाले लोग सरकारी सहूलियतों को भोगते हुए इस लोकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील कर चुके हैं लेकिन गरीब की आह को लेकर कबीर का लिखा हुआ भी आज के इस जमाने में बेअसर हो चुका है और लोहा तो दूर खादी का कपड़ा भी आज उस आह से भस्म नहीं होता।
ऐसे तमाम मौके जो कि आजादी की चर्चा के रहते हैं, वे देश के लोगों को याद दिलाते हैं कि आजादी कहां-कहां लुट चुकी है। जब-जब एक किफायत और महानता वाले महात्मा की चर्चा होती है तो याद पड़ता है कि उसे चबूतरों पर किस तरह कैद करके रखा गया है और नेता अपनी वल्दियत में बापू का नाम लिखाकर किस तरह आधी सदी से ज्यादा के काले राजा बने हुए हैं। महानता और अच्छी बातों की चर्चा के तमाम मौके देश के लोगों के मन में निराशा को और अधिक भर देते हैं, हताशा को और अधिक बढ़ा देते हैं। हमारे हिसाब से गांधी को जो तबका आज याद करते हुए अपने शाही अंदाज और लूटमार एक दिन के कुछ घंटों के लिए रोकता है वह देश के साथ और गांधी के साथ बराबरी की ज्यादती करता है। इसके खिलाफ लोगों को किसी जनहित याचिका को लगाकर ऐसे नियमों की अपील करना चाहिए कि जो गांधीवादी तरीकों से जीकर और चलकर गांधी जयंती समारोहों तक पहुंचे, वैसे ही लोगों को वहां पहले माला का मौका मिलना चाहिए।
गांधी को जितना ही अधिक याद करें, उतना ही अधिक आम लोगों के मन में गांधीवादी अहिंसा से परे हटकर एक हिंसा अपनाने की बात उठती है। गांधी ने जब यह कहा था कि हिंसा को बर्दाश्त करना भी एक हिंसा है, तो क्या उन्हें आज के हिंदुस्तान की नक्सल हिंसा जैसी नौबत का अंदाज था? आज देश भर में जगह-जगह गांधी की जुबान के दरिद्रनारायण जैसी हालत में जी रहे हैं और जैसी हालत में मर रहे हैं उन्हें देखें तो लगता है कि गांधी के नामलेवा वारिसों ने उन्हें दरिद्र बनाए रखने की मानो कसम ही खा रखी है। जिस तरह किसी फटेहाल गरीब को कोई महंगा त्यौहार भारी पड़ता है, उसी तरह गांधी पर भरोसा रखने वालों को गांधी जयंती का यह दिन गांधीवाद पर से भरोसा खत्म करने वाला लगता है। गांधी के सम्मान के नाम पर अपना सम्मान बढ़वाने की ऐसी फर्जी कोशिशें खत्म करवानी चाहिए। हम राजघाट और देश भर में उस जैसे दूसरे जलसों से नेताओं को और सत्ता के दूसरे तबकों को दूर रखने के लिए देश में एक सामाजिक जागरूकता के आंदोलन की भी कल्पना करते हैं। तमाम किस्म के दागी तबकों और लोगों को गांधी की यादों की विरासत से दूर रखना चाहिए।