छोटी सी बात

छोटी सी बात
30 नवंबर
आप जब किसी से कहें कि आपको दस मिनट के लिए मिलना है, तो अपनी मुलाकात उसके भीतर ही खत्म करें। अगर आप ऐसी सावधानी नहीं बरतेंगे, तो हो सकता है कि अगली बार व्यस्त लोगों से आपको समय ही न मिल पाए।

कमजोर-गरीब को बिन मांगे जमानत मिल जानी चाहिए

30 नवंबर 2011
संपादकीय
कमजोर-गरीब को बिन मांगे जमानत मिल जानी चाहिए
देश के बड़े-बड़े मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, बड़े-बड़े अफसर और निजी कारोबारों के बड़े-बड़े लोग पिछले दो-चार दिनों में जेल के भीतर महीनों गुजारकर जमानत पर बाहर निकले हैं। इसके पहले कई किस्म के सामाजिक आंदोलनकारी बरसों तक जमानत न मिलने को लेकर खबरों में बने रहे हैं। इनके अलावा ऐसे सभी तबकों के बड़े-बड़े सैकड़ों और लोग तरह-तरह की तिकड़में लगाकर गिरफ्तारी से बचे हुए हैं, और गिरफ्तारी हो जाने पर जमानत में महीनों लग जाने की बात उनकी नींद जरूर उड़ा रही होगी। यह मौका इस चर्चा को छेडऩे के लिए सही है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को उस पर लगे आरोपों की सुनवाई चलने तक जमानत पाने का कितना हक कानून में लिखा हुआ है और कितना मौका उसे इसे पाने का मिलता है। देश में दसियों लाख विचाराधीन कैदी बरसों से जेल काट रहे हैं और जब कभी कोई अदालत जेल की सलाखों के पीछे झांकने का समय निकालती है, बहुत से ऐसे लोग, ऐसे बेजुबान-कमजोर लोग, सलाखों के पीछे बरसों से बंद मिलते हैं जो कि उन पर चल रहे मामले में संभव अधिकतम सजा से अधिक दिन सुनवाई के दौरान ही कैद में काट चुके हैं। इन दसियों लाख लोगों की बरसों की तकलीफ के आधार पर तो हम सरकार-संसद के रूख में किसी फर्क की उम्मीद नहीं करते थे, न ही करते हैं, लेकिन अब चूंकि सरकार और संसद के लोग, बहुत बड़े-बड़े लोग, कई-कई महीनों तक बिना जमानत जेल रहने लगे हैं, सरकार और संसद में इन्हें पहुंचाने या कुछ खास कुर्सियों पर बिठाने (राडिया टेप याद रखें) वाले बड़े-बड़े कारोबारी-अफसर भी जेलों में ईद-दीवाली मनाने को बेबस हुए हैं, इसलिए अब शायद जमानत के माहौल में फर्क लाने की बात कुछ लोग सोचने लगें। वैसे भी अदालत का कागजी नजरिया तो यही है कि बेल एक हक है और जेल मजबूरी। मतलब यह कि किसी पर चल रहे मामले का फैसला होने तक जमानत पाना उसका हक है, और सजा के पहले तक उसे जेल में जांच एजेंसी किसी मजबूरी में ही रखे। बड़े-बड़े लोगों के पिसने से हो सकता है कि छोटे लोगों का भी कुछ भला हो जाए और कांगे्रस के सबसे आक्रामक बयान दे रहे पदाधिकारी दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों लगातार दुनिया के कई देशों की मिसालें दे-देकर ट्विटर पर लिखा कि भारत में भी इसी तरह जमानत मिल जानी चाहिए।
अब हम थोड़ी जमीनी हकीकत की बात करें तो कोई जांच एजेंसी भी किसी अभियुक्त को या संदिग्ध को लंबे समय तक अपनी हिरासत में या न्यायिक हिरासत में जेल में इसीलिए रख पाती है कि वह अदालत से बार-बार समय लेती है कि उसकी जांच जारी है और फलां लोगों के जमानत पर बाहर आ जाने से जांच, सुबूत या गवाह पर असर पड़ सकता है। अदालतें कई बार इस तर्क को न मानते हुए जमानत दे देती हैं और कई बार उससे साफ मना कर देती हैं। न्यायपालिका में यह बात छुपी हुई नहीं है कि बहुत से जज दरियादिली से अधिकतर लोगों को जमानत दे देने के लिए जाने जाते हैं और बहुत से जज तकरीबन तमाम अर्जियों को खारिज करते हुए जमानत न देने के लिए जाने जाते हैं। दरअसल कानून जमानत के मामलों में समझ का पूरा इस्तेमाल करके लगभग मर्जी से ही फैसला लेने का हक अदालत को देता है। इसके चलते होता यह है कि जिले से राज्य के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक होते हुए जमानत का रास्ता महीनों लंबा हो सकता है। हमने आज इस मुद्दे की शुरूआत जिन दिग्गज लोगों से की है, वे तमाम लखपति, करोड़पति और अरबपति लोग हैं। उनको अपने परिवार के लिए कुछ कमाने की कोई जरूरत नहीं होती और वे पूरी जिंदगी जेल में रह लें तो भी घर भूखा नहीं मरेगा। दूसरी तरफ देश भर में दसियों लाख गरीब लोग ऐसे हैं जो कि अपने घर के लगभग अकेले कमाऊ होते हैं जिनके जेल में फैसले के पहले के गुजारे हुए दिन, महीने या बरस, उनके परिवार को भूखा मार डालते हैं, बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है और रोज कमाने वाले ऐसे लोगों की इस विचाराधीन कैद की भरपाई कानून कभी नहीं कर पाता।
ऐसे लोगों के भले के लिए कानून या कानून के नजरिए में ऐसे फेरबदल की जरूरत है जिससे कि इन्हें अधिक समय तक जेल के भीतर न रखा जा सके। वैसे भी जो गरीब है, कमजोर है, छोटे तबके का है, वह गिरफ्तारी के बाहर आकर, क्या खाकर सुबूतों और गवाहों को प्रभावित कर सकता है? इसलिए जमानत के कानून-नजरिए में हम तुरंत इस फेरबदल की सिफारिश करते हैं कि तमाम गरीब लोग तुरंत ही जमानत के हकदार माने जाएं। इनमें जो लोग हिंसक या संगठित अपराधों वाले पुराने और पेशेवर लोग हों, उन्हें चाहे तो अदालत कुछ और अरसा जेल मेें रख ले लेकिन जो आदतन अपराधी नहीं हैं, गरीब हैं, छोटे हैं और जिनके अपराध बड़े नहीं हैं, उनकी जमानत सिर्फ उनकी अर्जी पर आनन-फानन हो जानी चाहिए और एक दिन भी उन्हें जेल के भीतर नहीं रखना चाहिए। हमारा ख्याल है कि मौजूदा कानून के भीतर ही ऐसी व्याख्या करने का पूरा हक न्यायपालिका को है, और सुप्रीम कोर्ट को तुरंत ही इसे एक अनिवार्य व्यवस्था बनाना चाहिए। आज बड़े-बड़े ताकतवर अभियुक्तों के लिए बड़े-बड़े वकील गवाह, सुबूत, बयान और जांच से लेकर अदालती कार्रवाई तक को ताकत से प्रभावित करने की पूरी कोशिश करते हुए अपने मुवक्किल को जेल से बाहर लाने में जुटे रहते हैं। ऐसे स्टिंग ऑपरेशन भी सामने आ चुके हैं, और यह भी जाहिर बात है कि चाहे कम संख्या में सही, अदालती व्यवस्था अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्ट है। ऐसे में गरीब को बराबरी की सुनवाई पाने, जमानत की शर्तों का इंतजाम करने, बड़े-बड़े वकील रखने की कोई सहूलियत तो होती नहीं। कानून जब दूसरे कई पहलुओं से देखने पर अपने को पूरी तरह अंधा साबित करने में लगा हुआ दिखता है, तो फिर उसे गरीब और अमीर के फर्क, उनकी ताकत के फर्क को अनदेखा करते हुए दोनों को बराबरी के मौके देना चाहिए, और यह कहने से हमारा यह मतलब है कि दोनों के लिए बराबरी की संभावनाएं अदालत को खड़ी करनी चाहिए, जिसका रास्ता सिर्फ यही हो सकता है कि आदतन, पेशेवर अपराधियों को छोड़ तमाम गरीबों को गिरफ्तारी के साथ ही जमानत का हक रहना चाहिए। हम इस मुद्दे पर चर्चा सिर्फ मानवाधिकार संगठनों के बैनर तले नहीं चाहते, भारत में इस तबके ने सरकार विरोधी होने की एक साख कमा ली है, जिससे कि उनकी बातें बहुत सा असर खो बैठी हैं। इस मुद्दे पर हम उन तमाम संगठनों की पहल की अपील भी करते हैं जो कि गरीबों से किसी भी तरह की हमदर्दी रखते हैं, फिर चाहे वे मानवाधिकार आंदोलनकारी हों या न हों।

संसद के भीतर खुलकर चर्चा ही लोकतंत्र है, बहिष्कार नहीं

29 नवंबर 2011
संपादकीय
संसद के भीतर खुलकर चर्चा  ही लोकतंत्र है, बहिष्कार नहीं
भारत की संसद थमी हुई है। भाजपा से लेकर वामपंथी दलों तक बहुत से लोग, और शायद लोकसभा में आधे से अधिक सदस्य, सरकार के एक निहायत बेमौसमी और गैरजरूरी फैसले के चलते काम को रोककर बैठ गए हैं। हो सकता है ये सारे के सारे किसी अविश्वास प्रस्ताव की नौबत आने पर सरकार या एफडीआई के खिलाफ वोट न डालें, लेकिन आज उनकी एकजुटता इतनी तो है ही कि उन्होंने संसद को चलने से रोक दिया। इस बार संसद भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी और कंपनियों को इजाजत देने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ है। खब्रिस्तान की कुछ ताजा कब्रों के नीचे यह भी दिख रहा है कि 2004 में भाजपा खुदरा व्यापार में विदेशी आगमन के पक्ष में थी, 2009 में वह खिलाफ हुई।
केंद्र सरकार ने जब यह विवादभरा फैसला लिया तो उसे भी इस विरोध का अंदाज रहा होगा। हम नहीं जानते कि लोकपाल, भ्रष्टाचार, कालेधन, विदेशी खाते और पेट्रोल महंगाई जैसे कितने मुद्दे सरकार को संसद के इस सत्र में घेर सकते थे और सत्र न चलना विपक्ष का नुकसान अधिक है या सरकार का अधिक। लेकिन यह अंदाज लगे बिना भी हम एक बात कह सकते हैं कि ये भारतीय लोकतंत्र और भारतीय लोगों का नुकसान तो है ही। देश में आज सौ ऐसे मुद्दों की फसल खड़ी हुई है जिस पर संसद में लंबी चर्चा होनी चाहिए थी। लेकिन आज संसद का इस्तेमाल संसदीय चर्चा के बजाय केंद्र सरकार के किसी फैसले को लेकर, महंगाई को लेकर कार्रवाई का बहिष्कार करने में किया जा रहा है। किसी शादी की दावत का इस्तेमाल लोग खुशियां मनाने के बजाय गोलियां चलाकर अपने पुराने झगड़े निपटाने में करें, किसी अंतिम संस्कार के मौके का इस्तेमाल लोग वैराग्य भाव के बजाय जमीनों के सौदे करने में कर लें तो वह अटपटा लगेगा। इसी तरह केंद्र सरकार का कोई सरकारी फैसला इस देश से संसदीय चर्चा को रोक ही दे, तो फिर वह फैसला संसद से भी अधिक ताकतवर हो गया। कभी एक मुद्दे को लेकर तो कभी दूसरे मुद्दे को लेकर अगर संसद में विपक्ष यह तय कर ले कि वह फला मांग पूरी होने के पहले संसद चलने ही नहीं देगा तो विपक्ष संसद के अपने विशेषाधिकारों को पुतला बनाकर जलाकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। हम संसद की चर्चा का भारत जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी विकल्प नहीं देखते। फिर एक दूसरी बात हमारी समझ से परे यह भी है कि अगर कार्यपालिका के रूप में कोई फैसला लेना सरकार का अधिकार है और विपक्ष ऐसे किसी फैसले से असहमत है, तो उसके सामने संसद में इस पर चर्चा ही अकेला रास्ता है। भारतीय लोकतंत्र की संसदीय व्यवस्था ने सरकार, संसद और अदालत, इन तीनों के अलग-अलग अधिकार तय किए हुए हैं। एक सरकार ने अगर एफडीआई का फैसला लिया है तो संसद के भीतर इस फैसले के मुद्दे पर विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार को उखाड़ फेंके, वह तो लोकतांत्रिक और संसदीय रहेगा। लेकिन संसद को न चलने देना हमें किसी भी हालत में नामंजूर ही रहेगा।
ये बात हम देश की लोकसभा और राज्यसभा को लेकर अधिक फिक्र के साथ इसलिए कर रहे हैं कि भारत के राज्यों की विधानसभाएं मिसालों के लिए संसद की तरफ ही देखती हैं। आज संसद में जो हो रहा है कल राज्यों की विधानसभाओं में उसी अंदाज से हो सकता है या फिर संसद का हिसाब चुकता करने के लिए केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के लोग केंद्र की विपक्षी पार्टियों की सत्ता वाले राज्यों में ऐसा ही कर सकते हैं। दिल्ली के इस तौर-तरीके को अगर हम सही मानते हैं, और इसी की देखा-देखी छत्तीसगढ़ सरकार के किसी फैसले के खिलाफ यहां की विपक्षी कांगे्रस पार्टी इसी तरह विधानसभा नहीं चलने देगी, तो छत्तीसगढ़ की जनता के मुद्दे आखिर कहां चर्चा में आएंगे? देश हो या प्रदेश, बहिष्कार को बहस का विकल्प हम कभी नहीं मान सकते और नारे लगाते सांसदों की भीड़ चाहे संसद के भीतर हो, चाहे राष्ट्रपति भवन की राह पर हो, वह चर्चा और बहस करते सांसदों के मुकाबले कमजोर ही रहेगी। दिल्ली में आज जो चल रहा है उसे देखकर कुछ बातें लगती हैं। वामपंथी सभी जगह सत्ता खोकर अब लंबे विपक्षी भविष्य के लिए तैयार बैठे हैं। दूसरी तरफ भाजपा के भीतर अगले प्रधानमंत्री-प्रत्याशी बनने की हसरत लिए हुए लोगों को अलग-अलग मोर्चों पर अपना अस्तित्व साबित करने की हड़बड़ी है। बुजुर्ग अडवानी रथयात्रा कर दिल्ली मेराथन में आज की तारीख में भाजपा के भीतर सबसे फिट एथलीट बने खड़े हैं। इस रथयात्रा रणनीति में भाजपा के भीतर चूंकि उनका एकाधिकार है और पेटेंट उन्हीं के नाम है, इसलिए सुषमा स्वराज के सामने अब सिर्फ लोकसभा के भीतर शक्तिप्रदर्शन बचता है, और वे अपने इस सीमित मौके का पूरा इस्तेमाल कर रही हैं।  फिर यह बात भी है कि भाजपा का परंपरागत समर्थक-तबका जो व्यापारी रहे हैं, उनमें खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को लेकर बहुत दहशत है। दूसरी तरफ कांगे्रस पार्टी को रोजाना एक बार कोई आत्मघाती खुराक लेने का पर्चा उसके किसी फैमिली डॉक्टर ने लिखकर दिया हुआ है, सो उसने आज की झंझट के बीच एफडीआई को और खड़ा कर दिया।
इस चर्चा का आज यहां पर हम कोई अंत नहीं कर रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि कल हमने इसी जगह खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के मुद्दे पर उसके नफे और नुकसान के अपने तर्क खत्म न करके उस पर चर्चा शुरू ही की है। जब भारत में उग्रवादियों और आतंकवादियों से बातचीत होती है, जब पड़ोस के हमलावर देश से बातचीत होती है, तो संसद में पक्ष और विपक्ष बातचीत के समय पर बातचीत क्यों नहीं करते? देश की जनता ने न तो इन बहिष्कारी सांसदों को इस बहिष्कार के लिए चुना था और न ही इन पर होने वाले अंधाधुंध महंगे खर्च का कोई न्यायसंगत आधार बनता अगर इन लोगों को काम ही नहीं करना था। संसद को हम न आज, न कभी और, बहिष्कार की जगह मान सकते। हम विरोध के लिए अधिक काम करने के हिमायती हैं, और भारतीय संसद के विपक्ष को तो आज चाहिए कि वह देर-देर रात तक बहस को खींचे और सरकार के गलत कामों को वहीं उजागर करे। नारों और बैनरों पर लिखी बातें पर जनता अधिक भरोसा नहीं करती है और संसद के भीतर खुलकर चर्चा ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र लोगों को हड़ताल, धरने और जुलूस का हक तो देता है, लेकिन हमारा यह भी मानना है कि संसद के लोगों को देश के हड़ताल, धरने और जुलूस पर चर्चा करने की जिम्मेदारी लोकतंत्र ने दी है, न कि खुद हड़ताल करने की।

उत्कृष्टता की एक बेरहम कसौटी

आजकल
सुनील कुमार
उत्कृष्टता की एक बेरहम कसौटी
भारत के एक वक्त के सबसे मशहूर कार्टूनिस्ट रहे आर.के. लक्ष्मण के काम पर  अभी टीवी पर किसी सीरियल की मुनादी रात-दिन आ रही है इसलिए अभी उनके बारे में सोचने का एक मौका आया। उन्होंने अपनी लगभग तमाम कामकाजी जिंदगी टाईम्स ऑफ इंडिया में काम करते गुजारी और वहां पर इस बड़े अखबार के भीतर वे अपने-आपमें उसी तरह एक साम्राज्य थे जिस तरह इटली के बीच में बसा वेटिकन अपने-आपमें एक अलग देश और साम्राज्य है। इस अखबार समूह में अब वैसे तो पहले वाली कोई बात रही नहीं, लेकिन जब यह एक बहुत अच्छा, विचारों का अखबार हुआ करता था तब भी आर.के. लक्ष्मण के विचार उनके कार्टूनों से झांकते हुए अखबार के विचारों से टकराते भी चलते थे, तो भी उनकी अहमियत इस अखबार में कभी कम नहीं हुई।
हालांकि लक्ष्मण के बारे में आज इस तरह की बात लिखने का कोई मौका नहीं है, लेकिन घिसे-पिटे मुद्दों पर बार-बार लिखने के बजाय बेहतर यह है कि देश के इस दिग्गज कार्टूनिस्ट के काम और उनके बारे में इस हफ्ते मैं आज यहां लिखूं, क्योंकि मेरी उनसे एक मुलाकात रही है और पिछली चौथाई सदी से अधिक वक्त से मैं देश के हिंदी और अंगे्रजी मीडिया के प्रमुख कार्टूनिस्टों का काम देखते आ रहा हूं, बड़ी बारीकी से।
लक्ष्मण के आखिरी कई बरस फिल्मी जुबान में एंटीक्लाइमेक्स रहे। पहले का उनका काम जितना अच्छा था, आखिरी का उनका काम फीका और बेअसर होते चले गया। लेकिन काम से अधिक उनका नाम था जो उनके जीते-जी मानो एक चबूतरे पर खड़ा हुआ था इसलिए लोगों ने उनका मूल्यांकन करना छोड़ दिया था। आज जिस तरह सचिन तेंदुलकर पांच-दस रनों पर कभी आऊट हो जाए तो भी लोग इस खिलाड़ी के महान प्रदर्शन के साए में खड़े हुए ऐसे कमजोर प्रदर्शन के अस्तित्व को देखना ही नहीं चाहते। उसी तरह लक्ष्मण का काम रहा, वे अपने-आपको दोहराते रहे, शायद बुजुर्गियत और कमजोरी के चलते वे अपने उस कमरे में कैद होकर रह गए थे जो टाईम्स ऑफ इंडिया के दफ्तर के भीतर एक टापू की तरह था और जहां बैठकर लक्ष्मण अपनी मर्जी से अपना काम करते थे। शायद ऐसा ही कुछ असर बहुत से दायरों के बुजुर्ग, वरिष्ठ या ऊंची कुर्सी पर पहुंचे हुए लोगों के साथ होता है कि वे जमीन से कट से जाते हैं। लक्ष्मण अपने-आपको दोहराने के साथ-साथ भार भी खोते चल रहे थे और एक वक्त उनका अच्छा काम देखे हुए लोग धीरे-धीरे टाईम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने के आखिरी कॉलम को देखना कम कर चुके थे।
एक धार और पैनापन पूरी जिंदगी कहीं भी कायम रहना बहुत मुश्किल होता है। अच्छे खासे तेज लोग भी अगर जिंदगी के आखिरी में जाकर अपने पिछले काम को जारी रखने की जिद करते हैं तो बहुत से मामलों में वे अपनी पिछली साख को खोते ही हैं, नया कुछ नहीं पाते। यह ठीक वैसे ही है कि जैसे सचिन के आने के बाद तक गावस्कर अगर मैदान में जमे रहने की जिद जारी रखते, तो हो सकता है कि वे अपने ही पुराने आंकड़ों के महत्व को कम करते जाते, वे अपने ही औसत को गिराते जाते, और लोग उन्हें आज उस तरह याद नहीं करते, जिस तरह आज करते हैं।
यह सिलसिला मैंने अखबारनवीसी के पेशे में भी देखा, जहां लोग बुजुर्ग होने के साथ-साथ वरिष्ठ होते चलना भूल सा जाते हैं। और महज यादों को ताजा मामलों पर लिखने के लिए काफी काबिलीयत मान लेते हैं। यादों का अपना एक महत्व होता है, वे आत्मकथा, जीवनी या संस्मरण लिखने के लिए बहुत ही कीमती सामान होती हैं, लेकिन यादें आज के मुद्दों पर विश्लेषण के लिए जरूरी सामानों में से महज एक होती हैं। बहुत से चुक गए लोग अब तक उस अंदाज में, उन्हीं पुरानी बातों के दम पर लिखते चलते हैं जिस किस्म की पुरानी तकनीक के दम पर आज मानो गावस्कर बैटिंग करने लगे।
वक्त के साथ-साथ जवान और जानकार बने रहना खासा मुश्किल होता है। और फिर एक बात यह भी रहती है कि जिस कारोबार या जिस पेशे में लोगों का पिछला काम उनकी जवानी या कामकाजी जिंदगी की चुनौतियों की आग में तपकर निखरा हुआ रहता है, आज जब वे सांझ के करीब बोझिल कदमों से टहलते हुए काम करते हैं तो वह काम उस तपन से गुजरा हुआ तो रहता नहीं, उनके सामने वह चुनौती भी नहीं रहती, और बहुत से या अधिकतर मामलों में लोगों के मन में अपने इतिहास को लेकर एक बददिमागी आ जाने का खतरा भी रहता है। नतीजा यह होता है कि ताजा जानकारी और ताजा मुद्दों से अछूते रहते हुए कुछ पुराने दिग्गज जब लिखते हैं तो अपनी बेदिमागी को अनदेखा करते हुए वे अपने इतिहास को लेकर एक बददिमागी का शिकार भी हो जाते हैं। यहां पर उनका काम अपने पिछले काम से खराब होने लगता है और यह कमजोरी वक्त के साथ-साथ बढ़ती चली जाती है।
कुछ ऐसे भी बुजुर्ग होते हैं जो अपने सीनियर होने के अहसास से आजाद रहते हैं और अपने काम को ही अपनी वरिष्ठता मानने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे लोग नौजवान और जानकार, सुनार की लपटों से गुजरते हुए सोने की तरह खरे और शानदार लोगों को तगड़ी टक्कर भी देते हैं, जैसे आऊटलुक पत्रिका के संपादक विनोद मेहता। लेकिन दूसरी तरफ कुछ ऐसे संपादक होते हैं जो अपने कामकाज के दौर में ही काम से अलग हो जाते हैं, द हिन्दू के प्रधान संपादक एन. राम की तरह, जो कि एक दूसरा काबिल संपादक देखकर उसे काम देते हैं। पिछले दिनों कार्पोरेट विरासत का हिन्दुस्तान के इतिहास का एक सबसे बड़ा मामला सामने आया जब टाटा उद्योग समूह के मुखिया रतन टाटा के वारिस का फैसला इस उद्योग समूह के बाहर की एक चयन कमेटी ने तय किया। रतन टाटा गर चाहते तो कई और बरस तक वे अपनी इस कुर्सी पर कायम रह सकते थे, इसी तरह भारत की एक सबसे बड़ी कंपनी इंफोसिस के चेयरमेन एन.आर. नारायणमूर्ति ने इसी अगस्त में अपने-आपको कंपनी के कामकाज से पूरी तरह अलग कर लिया, और इसके पहले भी वे 2006 से अपने को गैरकामकाजी चेयरमेन की तरह रखे हुए थे।
आर.के. लक्ष्मण के बारे में यह चर्चा कुछ लोगों को गैरजरूरी और कुछ कड़वी लग सकती है। लेकिन जिस इंसान ने पूरी जिंदगी देश और दुनिया के अनगिनत ताकतवर लोगों पर कोड़े चलाने का काम किया है, उसके बारे में कुछ खुली-खुली, कुछ खरी-खरी, और कुछ निजी विचारों से भरी बातचीत करने में क्या दिक्कत है? यह बात मुझे इसलिए लगती है क्योंकि हिन्दी के कम से कम दो ऐसे कार्टूनिस्ट मुझे अच्छी तरह याद हैं, जिनका काम इतना पैना और इतना धारदार रहा कि उनके सामने अपने बेहतर दिनों में भी लक्ष्मण नहीं टिक पाते थे। ये एक अलग बात है कि जनसत्ता के कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर की पहुंच हिंदी अखबार की वजह से एक तो सीमित थी और एक यह भी कि वह कम ताकतवर तबके तक थी। दूसरी तरफ आर.के. लक्ष्मण की पहुंच देश के सबसे बड़े अखबार की वजह से, अंगे्रजी अखबार की वजह से बहुत अधिक थी क्योंकि अंगे्रजी की पहुंच देश के सबसे ताकतवर तबके तक होती है। ऐसे में आखिरी-आखिरी में लक्ष्मण का काम वैसा ही फीका होते चले गया था जैसा कि कम पड़ती हुई आखिरी की दाल में पानी पड़ते चले जाने से उसका स्वाद हो जाता है। आखिरी के कई बरस वे अपने लिए अखबार में तय जगह को भरने का काम करते रहे और सुबह की चाय के साथ उनके काम से अखबार शुरू करने के आदी लोग उन्हें पहले की तरह वफादारी से, पढ़ते भी रहे। लेकिन बेहतर तो यह होता कि वे कुछ बरस पहले अपना काम छोड़ चुके होते। यह बात उसी तरह की है कि कुछ नेता कुछ चुनाव पहले लडऩा छोड़ चुके होते, कुछ उपन्यासकार अपनी पकड़ खोने के पहले लिखना बंद कर चुके होते।
यह लिखने का मौका आज इसलिए मिला कि लक्ष्मण के काम पर जो टीवी कार्यक्रम बन रहा है वह कहता है कि लक्ष्मण के हास्य चित्रों पर वह बन रहा है। देश के ताजा मुद्दों पर आधी सदी काम करने वाले कार्टूनिस्ट के नाम के साथ उसके व्यंग्य चित्रों के बजाय, उसके हास्य चित्र जुड़े रहें, तो यह बात लक्ष्मण के मेरे सरीखे पुराने प्रशंसक को उदास करती है। यहां पर एक दूसरी बात जो लिखने की और है, वह है हिन्दी के कार्टूनों की ताकत की। अंगे्रजी की पहुंच अधिक है, मतलब यह कि अधिक ताकतवर तबके तक उसकी पहुंच अधिक है, लेकिन फिर भी इस देश में सबसे भयानक हालात में सबसे पैने और तीखे हिंदी-अंगे्रजी कार्टून बनाने वालों में अगर मैं आज के टीवी-परख के अंदाज में नंबर दूं, तो राजेंद्र धोड़पकर के काम को दस, और लक्ष्मण के काम को शायद पांच नंबर ही दे पाऊंगा। राजेंद्र का काम भट्टी में तपकर लाल, सबसे धारदार तलवार की तरह का रहा, और लक्ष्मण का काम लगभग पूरे समय औसत से बेहतर दर्जे का रहा।
इस किस्म की बेरहमी से किसी के काम को परखने और इतनी कड़वी बात को साफ-साफ लिख देने वाले कुछ और लोग भी किसी दिन हो सकते हैं, इसलिए जिंदगी के किसी भी दायरे के वरिष्ठ लोगों, बुजुर्ग लोगों को अपनी यादों के टोकरे के तले न दबते हुए अपने काम की बेहतरी में लगना चाहिए। बालों की सफेदी उम्र का सम्मान तो दिला सकती है, काम की कसौटी पर, उत्कृष्टता की कसौटी लेकर अगर बेरहम लोग बैठे हों, तो बालों की सफेदी अपने-आपमें कोई अतिरिक्त सम्मान नहीं दिला सकती।

खुदरा कारोबार और विदेशी पूंजी के मुद्दों पर चर्चा की जरूरत

28 नवंबर 2011
संपादकीय
भारत के खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी की इजाजत देने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ संसद ठप हो चुकी है। देश के 28 राज्यों में से एक दर्जन इसके खिलाफ खुलकर सामने आ चुके हैं जिनमें यूपीए सरकार का भागीदार राज्य पश्चिम बंगाल तो है ही, खुद कांगे्रस सरकार वाला केरल भी चिल्हर कारोबार में एफडीआई के खिलाफ बोल चुका है। वहां के कांगे्रस अध्यक्ष ने सार्वजनिक बयान में अपनी राज्य सरकार से कहा है कि वह केंद्र के इस फैसले को न माने। देश में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए विदेशी चिल्हर कारोबार की छूट वाला यह बेमौसम का फैसला 53 शहरों के लिए है लेकिन इसमें से 28 शहर रिटेल में एफडीआई के खिलाफ लामबंद 11 राज्यों के हैं। इनमें से सबसे ज्यादा सात शहर उप्र से हैं। मध्यप्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु के चार-चार शहर हैं। झारखण्ड के तीन, पश्चिम बंगाल के दो-दो और छत्तीसगढ़, कर्नाटक, बिहार के एक-एक शहर हैं जहां राज्य सरकार की घोषणा के मुताबिक विदेशी दुकानें नहीं खुल सकती। राजस्थान में विरोध में भाजपा और प्रदेश भर के खुदरा व्यापार संगठन सड़कों पर उतर आए हैं। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने फ्रांसीसी रिटेल स्टोर कॉरफुर में तोड़-फोड़ भी की। अभी जयपुर में फिलहाल कॉरफूर का ही रिटेल स्टोर खुला है और इसने आते ही बाजार से थोक में खरीददारी शुरू कर दी है। इसका नतीजा यह रहा है कि बाजार से अंडे और सीएफएल बल्ब नदारद हो चुके हैं।
देशी हो या विदेशी, जब देश के परंपरागत बाजार के छोटे-छोटे दुकानदारों के पेट पर लात मारकर सरकार बड़े कारोबारियों को यह मौका दे रही है कि वे आर्थिक एकाधिकार से दसियों लाख छोटी दुकानों का कत्ल करके बाजार पर कब्जा कर लें, तो यह बात भारत जैसे देश में विरोध के लायक है ही। यहां के लोगों को याद होगा कि किस तरह कुछ अरसा पहले जब निजी कंपनियों के पेट्रोल-डीजल पंप खुले थे तो रिलायंस ने अपने पंपों के बगल में अपना ढाबा भी खोल दिया था। हमारे जैसे लोग मजाक में यह कहने लगे थे कि अब अंबानी किनारे बैठकर पंक्चर भी बनाएगा और कई लोगों की रोजी खा जाएगा। नतीजा कुछ ऐसा हुआ कि ढाबों को खा जाने वाले रिलायंस पेट्रोलियम पंपों का ही दीवाला निकल गया और वे सब अपने डीलरों को डुबाते हुए बंद हो गए। लोगों को यह भी याद होगा कि बाजार में रिलायंस कंपनी ने ही रिलायंस फे्रश नाम से फल-सब्जी की दुकानदारी भी शुरू की जिसका कई राज्यों में जमकर विरोध हुआ। भारत में आज विदेशी पूंजी से वालमार्ट जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां आकर छोटे बाजार को तबाह करें, ऐसा इसलिए नहीं है कि देशी बड़ी कंपनियों ने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे शहर में खुदरा कारोबार के लिए बहुत बड़ी-बड़ी दुकानें यहां के मॉल्स में खोली हुई हैं। लेकिन इनसे एकाएक छोटा व्यापार खत्म हो गया हो, मोहल्ले की दुकानें बंद हो गई हों ऐसा भी नहीं है। और उन्हीं शहरों में अब अगर बिग बाजार जैसे सुपर मार्केट किसी विदेशी कंपनी के खुलेंगे तो उससे बाजार पर, छोटे व्यापारियों पर बड़ी मार और अधिक पड़ जाएगी ऐसा भी हमें नहीं लगता। एक गोरा आकर जितना कारोबारी जुल्म कर सकता है, उतना ही देसी कारोबारी आज कर ही रहा है।
हम अभी देश के रिटेल सेक्टर में विदेशी पूंजी के पक्ष या विपक्ष में बात करने के बजाय अभी कुछ बातों पर चर्चा भर छेडऩा चाहते हैं कि लोग, और हम खुद भी, किन पैमानों पर केंद्र सरकार के इस फैसले को नापें। वालमार्ट किस तरह अंबानी या टाटा के बाजारों के मुकाबले अधिक बुरा होगा यह सोचना हमारे लिए कुछ मुश्किल है। हालांकि वालमार्ट एक बदनाम नाम है और दुनिया के कई जागरूक शहरों में इस कुख्यात खुदरा कारोबारी को अपना साम्राज्य फैलाने की इजाजत नहीं मिली है लेकिन उससे भारत जैसे देश के लोगों पर क्या नया फर्क पड़ेगा यह सोचना होगा। आज भी भारत में छोटे-छोटे सामानों के लिए मोहल्ला-दुकानों के एक बड़े आलीशन और बड़े विकल्प के रूप में देश के शायद सौ-पचास शहरों में मॉल में सुपर बाजार खुल ही चुके हैं। अब इस कमाई को अंबानी अपनी जेब में ले जाए या वालमार्ट ले जाए, इसके बीच के फर्क को हम अभी सोच रहे हैं, और लोग भी सोचें।
हम चिल्हर कारोबार में विदेशी पूंजी की वकालत में दिए गए इस तर्क को भी अनदेखा करना नहीं चाहते कि इससे किसान और उत्पादक को अपने सामान को एक बेहतर दाम मिलने लगेगा जो कि आज बाजार के बिचौलिए कहे जाने वाले लोग खा रहे हैं। यह बात कुछ हद तक तर्कसंगत इसलिए है कि खेत से दो रूपए किलो में निकलने वाली सब्जी बाजार में तीस-चालीस रूपए किलो तक ग्राहक को मिलती है। इस चेन की कड़ी का सबसे मुनाफेदार हिस्सा दलाल और थोक व्यापारी रहते हैं। हम यह तो नहीं मानते कि भारतीय या विदेशी सुपर बाजार मालिक इनके मुकाबले कमाई में कम दिलचस्पी वाले होंगे, लेकिन अगर किसान को फल और उपज का अधिक दाम किसी तरह से मिल सकता है, तो वह आज की जरूरत भी है। दूसरी बात यह कि भारत के बाजार के बारे में हमारा अनुभव यह कहता है कि यहां धंधा बहुत मोटे मुनाफे के साथ करने की आदत लोगों को है। अखबार में इश्तहारों के रेट से लेकर  किसी भी सामान तक, बाजार बहुत मोटी कमाई पर जीने का आरामतलब हो चुका है और दुनिया के आज के कारोबारी तौर-तरीके इससे बहुत अलग हैं। जब कभी भारत को दुनिया में खुला मुकाबला करना होगा, उसे कम मार्जिन पर अधिक बिक्री की तरफ बढऩा ही होगा। अगर भारत में विदेशी कंपनी आकर दूसरी विदेशी कंपनियों या आज के कारोबार में लगी हुई देशी कंपनियों के साथ मुकाबला करके, उपज को अधिक दाम पर खरीदकर ग्राहक को आज के मुकाबले कम दाम पर देने का काम कर सकती हैं तो इससे भारतीय खुदरा कारोबार में एक नई चुस्ती भी आ सकती है जैसी कि बीमा और बैंक में निजी कपंनियों के आने से आई है।
खुदरा कारोबार से परे, मीडिया जैसे कुछ दूसरे कारोबार में पहले ही विदेशी कंपनियां करीब एक चौथाई पूंजीनिवेश के साथ आ ही चुकी हैं और उनकी वजह से राष्ट्रीय हितों पर कोई खतरा आया हो ऐसा अभी तक तो सामने नहीं आया है। हम विदेशी पूंजी या विदेशी कारोबारी का सीधा विरोध करने के बजाय यह देखना चाहते हैं कि जिन कारोबारों में पिछले बरसों में विदेशी पूंजी और कारोबारी आए हैं, वहां का अनुभव क्या रहा है, क्या ग्राहक का फायदा हुआ है? क्या किसान या दूसरे उत्पादक को बेहतर दाम मिला है? क्या सामानों की उपलब्धता बढ़ी है? दरअसल नए कारोबार से पुराने कारोबार पर पडऩे वाली चोट को देखें तो आटोरिक्शा के आने से पैडल रिक्शा और तांगों का धंधा कम हुआ था, मुंबई जैसे शहर में कई हिस्सों में आटोरिक्शा पर रोक लगाकर सिर्फ टैक्सी की इजाजत देने से आटो का धंधा कुछ कम हुआ था और दिल्ली में मेट्रो शुरू होने से बाकी सभी किस्म की गाडिय़ों का धंधा कुछ कम हुआ है। लेकिन थोड़े वक्त के भीतर ही इन सब जगहों पर लोग अपने काम-धंधे को संभाल चुके थे और आज तो रोजाना बीस लाख मुसाफिर ढोने वाली दिल्ली मेट्रो वाले शहर में कोर्ट ने एक लाख नए आटोरिक्शा शुरू करने की इजाजत सरकार को दी है।
विदेशी कारोबारी से दहशत में आ जाने के बजाय यह सोचने की जरूरत है कि आज भारत कितने दायरों में, कितने कारोबार और उद्योगों में दुनिया की कंपनियों से वैसे भी मुकाबला कर रहा है। आज भारत में देशी कार कंपनियां तो एम्बेसडर और फियेट ही थीं, लेकिन उनका कुल उत्पादन जितना था उससे अधिक गाडिय़ों का निर्यात तो आज भारत से यहां पर कार बनाने वाली विदेशी कंपनियां कर रही हैं। इसलिए हम वालमार्ट की दहशत पर भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया की तर्ज पर भागना नहीं चाहते, यह समझने की जरूरत है कि इससे क्या नफा होगा और क्या नुकसान होगा। केंद्र सरकार ने तो आज सौ किस्म की दूसरी परेशानियों के बीच मधुमक्खी के इस छत्ते में बिना किसी तात्कालिक जरूरत के अपना हाथ घुसा दिया है, उसकी इस आत्मघाती कार्रवाई पर हम अधिक कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि वह चारों तरफ से लातघूंसे खा ही रही है। लेकिन देश के लोगों को यह समझने की जरूरत है कि यह हर राज्य का अपना फैसला रहेगा कि वह विदेशी दूकान को इजाजत दे या न दे। इसलिए जनता या व्यापारियों के संगठन अपने-अपने राज्य में राज्य सरकारों या राजनीतिक दलों से ऐसी रोक लगवा सकते हैं। हो सकता है कि यह चुनाव के समय घोषणापत्र का एक मुद्दा बने, लेकिन फिलहाल हमें देश के लोगों के डरने की कोई जरूरत नहीं दिख रही है, भारत में बड़े बाजार चलाने वाली भारतीय कंपनियां यहां की कमाई से दुनिया के दूसरे देशों में भी व्यापार शुरू कर रही हैं और ऐसे में विदेशी कंपनियों की कमाई विदेश चले जाने से आम हिन्दुस्तानी पर क्या फर्क पड़ेगा?

संत के अतीत के कंकाल नहीं, ये सब तो ताजा-ताजा हैं...

27 नवंबर 2011
संपादकीय

दिल्ली की एक अदालत के आदेश पर आज देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और आज की चर्चित टीम-अन्ना की एक खास मेंबर किरण बेदी के खिलाफ अपने गैरसरकारी सामाजिक संगठन के कामकाज में जालसाजी और धोखाधड़ी जैसे आरोपों पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। कुछ लोग इसे अन्ना हजारे के आंदोलन के खिलाफ केंद्र सरकार की एक और साजिश कह सकते हैं, लेकिन अदालत में किसी ने एक पिटीशन लगाई थी और उस पर अदालत ने यह आदेश किया है इसलिए हम इसे लेकर केंद्र सरकार पर किसी भागीदारी या साजिश का आरोप लगाने के बजाय किरण बेदी से उम्मीद करेंगे कि वे अपने-आपको बेकसूर साबित करें। आज ही ऐसी ही मांग उनसे उन्हीं के एक भूतपूर्व साथी स्वामी अग्निवेश ने भी की है। उन्होंने इसे एक गंभीर मामला बताते हुए कहा है कि यह मामला ऐसा नहीं है कि कोई एक शिकायत लेकर थाने चले गया हो और पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर ली हो। इस मामले में कोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए उसमें लगाए गए आरोपों को देखते हुए पुलिस को यह आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि टीम-अन्ना की इस सदस्य के अपने नाम को साफ करने के लिए अपने आचरण को साबित करना चाहिए।
हम एक शिकायत, उस पर अदालती आदेश और उस आदेश के आधार पर पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को किरण बेदी को कुसूरवार ठहराने के लिए काफी नहीं मानते। भारत में अदालतों से सजा मिलने के आंकड़े बहुत कम रहते हैं क्योंकि कानून का रूख हर किसी को संदेह का पूरा लाभ देते हुए तभी सजा देने का रहता है जब मामला पुख्ता हो। इसके चलते बहुत से अपराधी सजा से बच जाते हैं और बेकसूरों के फंसने के मामले बहुत कम रहते हैं। फिर यह भी है कि किरण बेदी के साथ इस देश के दो सबसे बड़े वकील शांति भूषण-प्रशांत भूषण भी खड़े हैं इसलिए उन्हें कानूनी मदद की कोई कमी तो है नहीं। यहां पर यह चर्चा करना भी जरूरी है कि कुछ हफ्ते पहले ही किरण बेदी का एक दूसरा हेराफेरी का मामला सामने आया था जब जगह-जगह यह साबित हुआ कि उन्होंने कम भाड़े के हवाई सफर करके अपने मेजबानों से महंगे भाड़े के टिकट जितनी रकम वसूल की। उनके छत्तीसगढ़ आने के ऐसे एक कार्यक्रम की उनकी भेजी टिकटों के सुबूत सहित हमने अपने इस अखबार में रिपोर्ट भी छापी थी। उस मामले के बाद उनके संगठन ने उनके आयोजकों को अधिक वसूली गई इस रकम को लौटाने की घोषणा भी की थी और उनके ट्रैवल एजेंट ने उनके संगठन से इस्तीफा भी दे दिया था। हमारा तब भी यह मानना था और अब भी यह मानना है कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और पारदर्शिता के लिए आंदोलन चलाते हुए जो लोग देश के बड़े-बड़े तबकों पर बहुत गंभीर आरोप लगाते हैं, उन्हें अपने निजी जीवन में कम से कम सार्वजनिक पैसों या दान के मामले में संदेह से परे साफ-सुथरा रहना चाहिए। किरण बेदी अब तक इस देश को इस बात के लिए ही सफाई नहीं दे पाई हैं कि टिकटों की वह अधिक वसूली कैसे जायज थी और वह रकम उनके संगठन में किस तरह जमा होती थी, और एक ट्रस्ट में जा चुकी रकम अब किस तरह से निकलकर आयोजकों को वापिस मिलेगी, और उस पूरे सिलसिले में देश के कानून जो तोड़े गए, उनकी भरपाई कैसे होगी? हमने तो पहले ही दिन से ये सारे सवाल उठाए थे, बाद में टीम-अन्ना के किरण बेदी के करीबी सहयोगी अरविन्द केजरीवाल ने भी हवाई टिकटों की इस हेराफेरी को गलत बताया था।
हम अपने इस अखबार और इस संपादकीय कॉलम में टीम अन्ना के खिलाफ कोई अभियान चलाना नहीं चाहते। लेकिन हर कुछ दिनों में इनकी तरफ से कोई न कोई ऐसी बात या ऐसी घटना हो रही है जो कि हमें आदर्शवादिता, गांधीवाद, ईमानदारी की इसी टीम की खड़ी की गई कसौटियों पर इस टीम के लोगों को कसने के लिए हमें मजबूर करती है। बार-बार इन लोगों के बारे में लिखना इसलिए भी जरूरी हो जा रहा है कि आदर्श की इतनी अधिक बातें करते हुए देश में इतनी बड़ी हलचल हाल के बरसों में किसी और ने खड़ी नहीं की थी और जो लोग चबूतरों पर खड़े होना चाहते हैं, उनका अपना चाल-चलन जनता के प्रति जवाबदेह तो होना ही चाहिए। आज अगर किरण बेदी के ऊपर चारसौबीसी, धोखाधड़ी या जालसाजी जैसे आरोपों पर अदालत पुलिस से रिपोर्ट दर्ज करवा रही है, तो हम ऐसा मानकर चलते हैं कि मामले में कुछ तो होगा ही। लोकतंत्र में समाज के सामने से एक-एक करके जब आदर्श टूटने लगते हैं, ढहकर बिखरने लगते हैं तो वह बहुत तकलीफ की बात होती है। हमें टीम-अन्ना के लोगों से एक समय बड़ी उम्मीद थी कि वे लोगों के सामने एक आदर्श पेश कर रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे वक्त गुजरा ये लोग अहंकारी, तानाशाह, बदतमीज, गैरगांधीवादी, हिंसक, मनमानी करने वाले, हेराफेरी और जालसाजी करने वाले, सरकार की वसूली से मुंह चुराने वाले, लगातार झूठ फैलाने वाले साबित होने लगे। मोहभंग होना बहुत तकलीफदेह होता है। हम अपने इस कॉलम में इसी तरह की तकलीफ से गुजरे हैं, और आने वाले दिनों में अगर टीम-अन्ना के लोगों के बारे में और भी बुरी बातें सामने आती हैं तो वह भारत का एक बड़ा नुकसान इसलिए होगा कि बरसों बाद जनता ने किसी पर भरोसा किया था और वह इस कदर तोड़ दिया गया। किसी संत के अतीत के कंकाल अगर सामने आते हैं, तो भी हम उसे पुरानी बातें और संतई के पहले के कुकर्म मानकर भूल सकते थे। लेकिन अन्ना हजारे, केजरीवाल और किरण बेदी ने तो संतों के दर्जे का माहौल बनाने के बाद, बाद के काम में भी कई तरह से निराश किया है। यह भारत की जनता के भरोसे के साथ एक धोखाधड़ी है और इसकी भरपाई आसानी से नहीं हो सकती।

मुंबई में पत्रकार की हत्या में पत्रकार-गिरफ्तारी के सबक

26 नवंबर 2011
संपादकीय
मुंबई की कल दोपहर की खबर सदमा पहुंचाने वाली थी और उसने हक्का-बक्का भी कर दिया। जून के महीने में एक सीनियर पत्रकार की वहां गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और उसके पीछे वहां के कुख्यात अंडरवल्र्ड पर शक किया जा रहा था जिसके सरगना इस देश के बाहर बैठे हुए यहां जुर्म का कारोबार चलाते हैं और आतंक का भी। मुंबई के मीडिया को जानने वाले यह भी जानते हैं कि वहां क्राइम-बीट को राजनीतिक बीट से भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है और अखबारों के क्राइम रिपोर्टर बड़े ताकतवर माने जाते हैं और पुलिस से लेकर माफिया तक उनकी तगड़ी पहुंच रहती है। ऐसी ही पहुंच हत्या के शिकार इस पत्रकार जे डे की भी मानी जाती थी और देश के बाहर जाकर भी माफिया से उसके मिलने की भी जांच हत्या के बाद हो रही थी। ऐसा समझा जा रहा था कि दाऊद इब्राहीम और उसके विरोधी माफिया खेमे में से किसी एक को इस पत्रकार की खबरों से नुकसान हो रहा था और उसी के चलते यह हत्या हुई होगी। एक बड़े पत्रकार के इस तरह मारे जाने से मुंबई का मीडिया, राजनीतिक दल और वहां के नेता तो पुलिस पर आनन-फानन कातिल पकडऩे के लिए दबाव डाल ही रहे थे, मुंबई हाईकोर्ट में भी कुछ दिनों के भीतर ही पुलिस से जांच रिपोर्ट मांगी थी, और इस बात को हमने जून के महीने में इसी जगह लिखे संपादकीय में कुछ अभूतपूर्व और कुछ अटपटी बात माना था। हमने उस समय यह भी लिखा था कि जांच एजेंसियों पर इस तरह के सार्वजनिक दबाव डालकर अपराधियों को पकडऩे के लिए अल्टीमेटम देना ठीक नहीं होता क्योंकि बहुत से अपराध ऐसे रहते हैं जिनकी गुत्थी बरसों बाद भी नहीं सुलझ पाती। इसी देश में सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई आज तक दिल्ली के आयुषी हत्याकांड में किसी किनारा नहीं पहुंच पाई है जबकि वह मामला बहुत से सुरागों के साथ ही जांच एजेंसी को मिला था।
अब जब मुंबई के इस हत्याकांड में साजिश में भागीदार वहीं की एक महिला पत्रकार को गिरफ्तार किया गया है, जिसके बारे में कहा गया है कि उसने एक माफिया सरगना को इस पत्रकार के बारे में जानकारी देकर उसकी हत्या में मदद की। यह बात भी तकलीफदेह है कि एक वक्त ये दोनों पत्रकार एक साथ एक ही अखबार में काम कर चुके थे। अब सवाल यह उठता है कि ऐसे करीबी, जानकार और हमपेशा लोग जब कत्ल जैसे जुर्म में मदद करें, या उसमें साझीदार हों, और इस जुर्म को करवाने वाले लोग देश के बाहर कहीं और डेरा डाले हुए हों, तो इसकी जांच क्या कुछ दिनों के भीतर हो पाना मुमकिन था? बहुत से टेलीफोन, एसएमएस या ईमेल की जांच से पुलिस इस जगह तक पहुंची है कि उसने एक नामी-गिरामी अखबार की एक नामी-गिरामी पत्रकार महिला को गिरफ्तार किया है, तो क्या यह पूरी जांच कत्ल के कुछ दिनों के भीतर हो सकती थी? जहां पर पुलिस की लापरवाही से या उसकी साजिश, उसकी हिंसा से कोई मौत न हुई हो, वहां पर भी पुलिस को पहले दिन से गालियां और आलोचना मिलने लगें, उस पर दबाव पडऩे लगे, उससे अदालत भी जवाब-तलब करने लगे तो इससे किसी बेकसूर के फंस जाने का खतरा भी खड़ा हो जाता है। जून के अपने संपादकीय में हमने यह भी लिखा था कि दुनिया की सबसे अच्छी जांच एजेंसियों में से एक, ब्रिटेन की स्कॉटलैंड यार्ड का रिकॉर्ड भी बताता है कि हर अपराध को तो वह भी नहीं सुलझा पाता। और इसी ब्रिटेन में ऐसा भी इतिहास दर्ज है कि अदालत के हुक्म से किसी को मौत दे देने के आधी सदी बाद डीएनए जांच से यह भी साबित हुआ है कि मौत की सजा पाकर मार डाला गया व्यक्ति बेकसूर था।
आज हम इस बात को लोगों के सामने इसलिए रख रहे हैं कि हमारे आसपास भी कुछ-कुछ महीनों मेें ऐसी नौबत दिखती है जब किसी जुर्म के बाद जांच एजेंसियों पर ऐसा दबाव पड़ता है। उस वक्त समझदारी पर टिके रहने की ऐसी सलाह को सुनने का और समझने का वक्त शायद दुख-तकलीफ से गुजर रहे तबके के पास नहीं होता। इसलिए समाज को तनाव की नौबत आने के पहले ही सोच-विचार करके यह समझ लेना चाहिए कि बहुत से मामलों में अपराधी को कुछ दिनों के भीतर पकड़ लेने की उम्मीद और उसके लिए दबाव, जांच एजेंसियों के हौसले को पस्त कर देने वाला काम होता है और वैसे दबाव के बीच हो सकता है कि पुलिस किसी बेकसूर बकरे को पकड़कर सार्वजनिक बलि के लिए पेश कर दे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ने एक बहुचर्चित श्वेता हत्याकांड में इसी तरह के कुछ बेकसूर लड़कों को हत्यारा बताकर जनता का गुस्सा ठंडा कर दिया था और बाद में अदालत से शायद पहली ही पेशी में ये लड़के छूट गए थे। इस बात को कई दशक हो चुके हैं लेकिन उस बच्ची श्वेता का हत्यारा कभी पकड़ नहीं आया। इस तरह के दबाव से की गई जांच का क्या फायदा?
मुंबई के इस मामले को लेकर हम यहां एक चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि ऐसी नौबत जगह-जगह आती है और लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि अगर वे पुलिस या सीबीआई से जादू की किसी छड़ी की उम्मीद करेंगे तो जांच अफसर किसी टोपी से खरगोश निकालकर दिखा देने की तरह गढ़ा हुआ हत्यारा पेश कर देंगे और असली अपराधी कभी भी सामने नहीं आएगा। इसलिए ऐसे तमाम मौकों पर समाज को सब्र और समझदारी से काम लेना चाहिए।

स्वघोषित मसीहा उजागर

25 नवंबर 2011
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
केंद्र सरकार के एक सबसे प्रमुख मंत्री, महाराष्ट्र के सबसे बड़े नेता शरद पवार पर कल एक हमलावर ने पहले हथेली से हमला किया और फिर हथियार लहराते हुए नेताओं या सरकार को गालियां दीं। इस हमलवार नौजवान के बारे में बताया गया है कि चार-छह दिन पहले इसी ने इसी दिल्ली शहर में सजायाफ्ता भूतपूर्व संचार मंत्री सुखराम पर भी हमला किया था और इन दोनों के पीछे उसकी नीयत कितनी गंभीर है और कितनी महज शोहरत पाने की, यह अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। मीडिया ने इसे तुरत-फुरत महंगाई से जोड़ दिया और शरद पवार चूंकि खाद्य मंत्री भी हैं इसलिए यह माना गया कि यह पवार के मुंह पर महंगाई का चांटा पड़ा है। मीडिया की जुबान, खासकर सबसे पहले यह खबर पहुंचाने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जुबान में हमले का जिक्र नहीं था, थप्पड़, झापड़ और चांटे का इस्तेमाल समाचारों में इस तरह किया गया कि मानो वह हमला न होकर, दी गई कोई सजा हो। कांगे्रस ने इसे आनन-फानन दो ही दिन पहले भाजपा के भूतपूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा के दिए हुए इस बयान से जोड़ दिया कि बढ़ती महंगाई से परेशान लोगों के बीच हिंसा भड़कने का एक खतरा खड़ा हो सकता है। सचेत करने वाली इस साधारण सी बात को कांगे्रस अगर देश की जनता को भड़काने वाली मानती है, तो देश में सिर्फ कांगे्रस के प्रति समर्पित या परले दर्जे के मूर्ख लोग ही इस आरोप पर भरोसा करेंगे। हम तो अपने संपादकीय कॉलम में आए दिन न सिर्फ ऐसे खतरे से देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को चौकन्ना करते हैं, बल्कि हैरानी भी जाहिर करते हैं कि इस देश के लोग किस तरह ऐसे तमाम हालात में भी अमनपसंद बने रहते हैं। लेकिन पवार पर हमले को लेकर हम यहां अधिक कुछ लिखना नहीं चाहते। हम इस हमले के देश की जनता की भड़ास का प्रतिनिधि भी नहीं मानते। सवा अरब की आबादी में ऐसे इक्का-दुक्का लोग लाखों किस्म की ऐसी भड़ास का प्रतिनिधित्व करने वाले मिल सकते हैं जो कि उनकी अकेले की भड़ास हो, या जिसके पीछे उनकी अपनी कोई बदनीयत छुपी हो। हम इससे अधिक महत्व इस हमले के पीछे की नीयत को नहीं देते।
लेकिन महत्व न देते हुए भी अगर इस मुद्दे से आज का लिखना हम शुरू कर रहे हैं तो उसकी एक दूसरी वजह है। कल इस खबर के आते ही यह खबर आई कि अन्ना हजारे ने इस खबर को सुनते ही कहा-थप्पड़ मारा? एक ही मारा क्या?
जिन लोगों ने टीवी की खबरों पर दोपहर से देर रात तक बार-बार, बार-बार अन्ना के इस पांच-दस सेकंड के वीडियो क्लिप को देखा, और उनमें से जिनकी आंखें ठीक हैं, जिनके कान ठीक हैं, उन्होंने बहुत साफ-साफ देखा-सुना कि पहली खबर मिलते ही अन्ना हजारे की तात्कालिक प्रतिक्रिया बिना एक सेकंड गंवाए सामने आई और उन्होंने अपने मुंह के सामने तैनात समाचार चैनलों के ब्रांड वाले बड़े-बड़े माइक्रोफोन पर ही तुरंत यह बात कही। लेकिन बाद में जब समाचार चैनलों के स्टूडियो से फोन पर अन्ना हजारे से उनकी इस तात्कालिक प्रतिक्रिया को लेकर पूछा गया तो वे दो बातों से साफ-साफ मुकर गए। स्टार न्यूज से एक तो उन्होंने यह कहा कि उन्होंने सिर्फ अपने सामने मौजूद अपने कार्यकर्ताओं से यह पूछा था कि हमले में पवार को एक थप्पड़ के अलावा और तो कुछ नहीं लगा। दूसरा उन्होंने यह कहा कि उस वक्त वहां कोई मीडिया मौजूद नहीं था और बाद में उन्होंने मीडिया को इस हमले पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह लोकतंत्र पर हमला था। हमने और देश भर के टीवी चैनलों ने साफ-साफ यह देखा कि इस जानकारी के मिलने के समय अन्ना हजारे के सामने कई टीवी चैनलों के माइक्रोफोन मौजूद थे, उन्होंने जानकारी मिलने पर पूछा कुछ भी नहीं, सिर्फ एक टिप्पणी की, जिसके शब्द बहुत गिने-चुने थे-थप्पड़ मारा? एक ही मारा क्या?... और यह कहते हुए उनके चेहरे पर तगड़े व्यंग्य के भाव थे। अगर हम कुछ अटकलबाजी लगाना चाहें तो शायद ये भाव व्यंग्य के साथ-साथ कुछ मजा लेने वाले, परपीड़क के भी थे। लेकिन व्यंग्य से आगे की यह बात हमारा अंदाज है, उसका कोई सुबूत तो हो नहीं सकता।
लेकिन हम इस बात को चर्चा और विचार-विमर्श के लायक मानते हैं कि अन्ना हजारे जैसे वरिष्ठ, बुजुर्ग, अनुभवी और सार्वजनिक जीवन में अतिसक्रिय, स्वघोषित गांधीवादी और अहिंसक, और समय पडऩे पर शिवाजी की नीतियों पर चलने का भी दावा करने वाले आदमी की यह कैसी हिंसक, अलोकतांत्रिक, गांधी-विरोधी और शिवाजी-विरोधी प्रतिक्रिया रही! जब देश में सड़क से संसद तक भ्रष्टाचार और महंगाई पर चर्चा चल रही हो तब किसी एक व्यक्ति पर इस तरह से हमला अगर अन्ना को ऐसा मजा दे गया, तो यह इस महत्वहीन हमले से कहीं अधिक, अन्ना के बारे में सोचने की बात है। वैसे तो वे इस बात को खुद ही अभी चार दिन पहले भी दुहरा चुके हैं कि अगर कोई शराब न छोड़ता हो तो उसे खंभे से बांधकर कोड़े लगाने चाहिए। लेकिन शरद पवार की तो शराब पीने जैसी भी कोई गलती नहीं थी, उन पर हमले की बात सुनते ही अन्ना हजारे ने भारी आनंद और व्यंग्य के साथ, एक कुटिल मुस्कुराहट बिखेरते हुए एक बात कही, और वहां से कहते-कहते ही उठकर चले गए। अगर इस बात की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं होती तो इतनी बारीकी से उनके बारे में सोचने और यह लिखने का मामला नहीं बनता। लेकिन पूरे देश ने देखा कि किस तरह वे एक मजा लेते हुए बोलते हुए गए, न कि कुछ पूछते हुए। हमने अभी उनके कोड़े लगाने की बात का विरोध करते हुए दो-तीन दिन पहले ही इसी जगह लिखा था-''लोग याद रखें कि लोकतंत्र के लिए जिसके मन में हेठी है, वह इंसान कभी भी हिंसक हो सकता है, और अन्ना तो खुलकर कैमरे के सामने अपनी हिंसा की वकालत कर रहे हैं।ÓÓ
हिंसा का यही रूख सामने आया है। हम दिल्ली में एक सिरफिरे या शातिर और शोहरत को मरते हुए हमलावर की हिंसा को कम बड़ी हिंसा मानते हैं, इसकी खबर पर अन्ना हजारे की त्वरित स्वाभाविक प्रतिक्रिया को अधिक बड़ी हिंसा मानते हैं। इसके बाद इस वीडियो क्लिप को जब देश भर ने देख लिया तब भी अन्ना हजारे टीवी चैनलों से यह सफेद झूठ बोलते रहे कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा, जब कहा तब मीडिया वहां था नहीं, और उन्होंने तो पवार के बारे में जानकारी पाने को ऐसा पूछा था कि थप्पड़ से अधिक और तो उन पर कोई हमला नहीं हुआ। वीडियो रिकॉर्डिंग इस बात की गवाह है कि अन्ना हजारे की प्रतिक्रिया हिंसक थी और बाद में उसे रफा-दफा करने के लिए वे सफेद झूठ बोलते रहे। अहिंसक गांधी से लेकर, हथियारबंद शिवाजी तक, कोई भी महान व्यक्ति ऐसा खुला झूठ कहते हुए महान नहीं बनते। इससे अन्ना हजारे का मिजाज, उनका व्यक्तित्व उजागर होता है। पल भर के लिए हम पाठकों के सामने एक ऐसी काल्पनिक स्थिति रखना चाहते हैं कि अगर ऐसा कोई हमला अन्ना हजारे पर होता, और इस पर दिग्विजय सिंह की प्रतिक्रिया वैसी होती जैसी कि पवार पर हमले की खबर पर अन्ना की थी, तो क्या दिग्विजय सिंह पर इस हमले के पीछे होने का आरोप लगाते हुए अन्ना की टोली टूट न पड़ी होती? क्या इस देश में सार्वजनिक जीवन की तमाम रियायतों का हक, उन पर एकाधिकार अकेले अन्ना की टोली का है कि उन्हें इस प्रतिक्रिया से बरी कर दिया जाए? किरण बेदी को टिकटों की बेईमानी-धोखाधड़ी से बरी कर दिया जाए? अरविंद केजरीवाल को उनके सरकारी विभाग (अब तक के उनके एम्प्लायर), आयकर विभाग की नौ लाख की वसूली से छूट दे दी जाए? और यह सब तब जब इस देश की सरकार, संसद, राजनीतिक दलों और अफसरों में से किसी को भी संदेह का लाभ देने को भी टीम अन्ना तैयार नहीं है।
अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू होने के कुछ दिनों के भीतर ही हमने यह लिखना शुरू किया था कि यह न ईमानदार है, न तटस्थ है और न लोकतांत्रिक है। कल इस देश ने यह देख लिया कि गांधी और शिवाजी के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाला यह खादीधारी किस कदर परपीड़क और हिंसक है, कितना अलोकतांत्रिक है और कितना झूठा है। हममें से लगभग हर कोई अपनी-अपनी खाल बचाने के लिए समय-समय पर कई किस्म के झूठ कहते हैं और बहुत अधिक आदर्शों का दावा करने का हक बहुत कम लोगों में ही होगा। लेकिन जब हममें से कुछ लोग सलीब लेकर घूमते हैं और उस पर ठोंकने के लिए लोगों को ढूंढते हैं, सूली पर चढ़ाने की सजा जिसे चाहे उसे सुनाते रहते हैं, तो फिर उनकी दस सेकंड की हिंसक प्रतिक्रिया भी हजार शब्द के इस विश्लेषण को मजबूर करती है। पवार पर हमला पूरी तरह महत्वहीन बात है जो कि भारत की किसी भावना का कोई सुबूत नहीं है। लेकिन कल पवार की तकलीफ के बीच भी जिस तरह एक स्वघोषित मसीहा उजागर हुआ है, उसे हम कल के दिन की भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धि मानते हैं।

आम काम करते हुए खास साख

24 नवंबर 2011
संपादकीय
अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी को अभी दो दिन पहले इस जिम्मेदारी से हटाया गया, या ऐसी नौबत आने के पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पाकिस्तान की राजनीति में इस इस्तीफे की बुनियाद वहां की निर्वाचित सरकार पर फौजी दबाव का एक मामला बताया जाता है, लेकिन उस मामले की पूरी बातें अभी सामने आना बाकी हैं। यहां हम इस मामले के एक दूसरे पहलू पर बात करना चाहते हैं।
हुसैन हक्कानी को इंटरनेट पर लोग ट्विटर पर रोजाना पूरे वक्त देखते आ रहे हैं। जिस तरह भारत में भाजपा की सुषमा स्वराज या कांगे्रस के दिग्विजय सिंह, शशि थरूर अलग-अलग किस्म की बातें ट्विटर पर डालते हैं, वैसे ही दुनिया के कई देशों के नेता अपनी बातें इन दिनों बहुत असरदार हो चुके इंटरनेट-मीडिया पर लिखने लगे हैं। इस्तीफे के बाद भी हुसैन हक्कानी पूरी दरियादिली से, और बिना किसी मलाल के ट्विटर पर बने हुए हैं। पाकिस्तान के जिन सैकड़ों लोगों को हम रोजाना ट्विटर पर देखते हैं, उन सबकी इस डिप्लोमेट से हमदर्दी रखने की कोई निजी वजह नहीं हो सकती, लेकिन इंटरनेट हक्कानी का साथ देने में जुटा हुआ है। लोगों के मन में इनके लिए बहुत इज्जत दिखती है और लोग इसे फौजी गुंडागर्दी, खुफिया एजेंसियों की मनमानी के खिलाफ एक लोकतांत्रिक अफसर की लड़ाई मान रहे हैं। ऐसा भी नहीं है कि पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसियां ट्विटर तक सीधी या घूम-फिरकर बनाई गई पहुंच न रखती हों, लेकिन हक्कानी का कोई विरोध, उनके खिलाफ कोई बातें वहां बिल्कुल नहीं दिख रहीं।
वे अमरीका में रहते हुए भी पूरे वक्त पाकिस्तान के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं से इंटरनेट पर संपर्क रखते हुए हमें भी दिखते रहे, लेकिन ऐसा करने वाला कोई भारतीय डिप्लोमेट, या भारतीय नेता भी हमें याद नहीं पड़ता। राजनीति से परे शेर-ओ-शायरी का लगातार मजा वे इंटरनेट की इस सार्वजनिक वेबसाईट पर लेते थे और देते थे। उनकी लोकप्रियता या उन्हें आज मिल रहे एक समर्थन के पीछे उनके ऐसे सामाजिक संबंध भी जरूर हाथ बंटा रहे होंगे। अमरीका में पाकिस्तान के  बहुत ही नाजुक और अहम रिश्तों को ढोते हुए एक डिप्लोमेट किस तरह अपने देश के एक तबके से खुले हुए जुड़ा रह सकता है और किसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट का इस्तेमाल करके अपनी बातें भी लोगों से बांट सकता है, इसकी एक अच्छी मिसाल हमें पाकिस्तान के इस भूतपूर्व राजदूत में दिखी। लेकिन हुसैन हक्कानी को पिछले कुछ महीनों से लगातार देखते हुए, लोगों के साथ उनकी इस सार्वजनिक मंच पर बातचीत, सवाल-जवाब पढ़ते हुए हमें यह लगा कि वे पाकिस्तान की विदेश नीति को किसी सेल्समेन की तरह नहीं बेच रहे थे। वे अपनी एक अच्छी साख बनाने के साथ-साथ अपनी कही बातों की साख भी बना रहे थे, जो कि उनके देश की सोच को फैलाने में मददगार हो रही थी।
जनसंपर्क या लोगों तक अपने देश, अपनी सरकार की बातें पहुंचाने के लिए एक इंसान अपनी खुद की अच्छी तस्वीर का कैसा अच्छा इस्तेमाल कर सकता है, जब हम इस बारे में सोचते हैं तो हमें हिन्दुस्तान के अलग-अलग दायरों के बहुत से ऐसे लोग याद पड़ते हैं जो अपनी खराब तस्वीर, और खराब बर्ताव के चलते अपने संगठन, अपनी सरकार या अपने आंदोलन को एक बुरा नाम दिला देते हैं। छत्तीसगढ़ से इस चर्चा का कुछ रिश्ता जोड़ें तो इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने अपनी सरकार के ईमानदार इमेज वाले शायद अकेले ही मंत्री, रामचंद्र सिंहदेव को सबसे कुख्यात आबकारी विभाग दिया था जो कि शराब का कारोबार देखता था। सिंहदेव की ईमानदार तस्वीर के पीछे उस वक्त भी शराब कारोबार में सरकारी बेईमानी और उगाही चलती रही, लेकिन एक ईमानदार मंत्री के नाम और उसकी साख तले वे बातें उठ नहीं पाईं। हमें लगता है कि सचमुच के, या कम से कम दिखने वाले, एक लोकतांत्रिक और उदार डिप्लोमेट के चलते पाकिस्तान के बहुत ही सक्रिय इंटरनेट तबके के बीच उस सरकार की साख जरूरत से ज्यादा अच्छी बन गई। अच्छे लोग किस तरह किसी बुरी नौबत को भी कुछ या अधिक हद तक सुधार सकते हैं, यह हमें हुसैन हक्कानी के मामले को देखकर लग रहा है। एक अच्छा नेता, अफसर, राजनयिक किस तरह अपने लिए बिन मांगे तारीफ पाने के साथ-साथ अपने मुद्दों पर लोगों को सहमत करा सकता है, यह दुनिया में सभी संगठनों और सरकारों के लिए सोचने की बात है। इस बात को हमने अभी लिखते-लिखते ही जब ट्विटर पर डाला तो पाकिस्तान के साथ-साथ हिन्दुस्तान से भी दर्जनों लोगों ने हुसैन हक्कानी की तरीफ शुरू की और साथ-साथ कुछ ऐसी मिसालें भी गिनाईं कि भारत में कब-कब किस अच्छे अफसर ने अपने अच्छे काम और बर्ताव से लोगों का भरोसा जीता था। पाकिस्तान के एक भूतपूर्व डिप्लोमेट पर इस जगह इतना लंबा लिखने की कोई वजह नहीं है लेकिन हम इस बहाने हमारे पढऩे वालों के बीच यह सोच खड़ी करना चाहते हैं कि किस तरह किसी संस्था या सरकार, देश या पार्टी के प्रतिनिधि अपने खुद के तौर-तरीकों से एक आम काम को करते हुए भी एक खास साख बना लेते हैं जो उनके निजी इस्तेमाल की चाहे न हो, उनके पीछे के संगठन के काम की वह जरूर होती है।

गांधी ने ऐसे तानाशाहों के लिए खादी को बढ़ावा नहीं दिया था

23 नवंबर 2011
संपादकीय
एक टीवी इंटरव्यू में दुहराई गई अपनी एक बात के लिए अन्ना हजारे कल-परसों से मीडिया की आलोचना झेल रहे हैं और भाजपा भी अपने इस चहेते आंदोलनकारी की इस बात पर उसके खिलाफ बयान देने को मजबूर भी है। अन्ना हजारे का कहना है कि शराब पीने वाले को तीन बार चेतावनी देनी चाहिए, उसके बाद मंदिर ले जाकर कसम दिलवानी चाहिए कि वह शराब नहीं पीएगा, और उसके बाद भी अगर वह शराब पिए तो उसे मंदिर के सामने खंभे से बांधकर कोड़ों से पीटना चाहिए। उन्होंने यह माना भी कि वे पहले से अपने गांव रालेगानसिद्धि में ऐसा करते भी आए हैं। इसी तरह का काम भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मिजोरम में वहां ईसाई नौजवानों का संगठन वाईएमए करते आया है। चर्च से जुड़े इस संगठन की ऐसी बहुत सी गैरकानूनी कार्रवाई को समाज के हित में मानते हुए वहां की सरकार ने उसे इसकी खुली छूट दी हुई है और मुख्यमंत्री खुलकर ऐसी कार्रवाई की हिमायत करते हैं। मिजोरम लगभग सौ फीसदी ईसाई राज्य है और वहां पर धर्म आधारित संगठन और सरकार के बीच अधिक फर्क नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में ऐसे किसी धार्मिक एकाधिकार और सरकार इजाजत के बिना अन्ना हजारे लंबे समय से वहां एक धर्म के आधार पर, अपनी कार्रवाई करते आ रहे हैं जिसमें गांव के टीवी पर सिर्फ धार्मिक फिल्म देखने की छूट शामिल है। अन्ना अपने साम्राज्य के तानाशाह की तरह वहां अपने अंदाज का समाज सुधार लागू करते हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका कद इतना बड़ा हो गया है कि वे अपनी मनमानी लोगों पर थोप सकते हैं, थोपते आए हैं।
लेकिन लोकतंत्र किसी को सामाजिक भलाई को बाहुबल से थोपने की इजाजत नहीं देता। ऐसा काम तो तरह-तरह के आतंकी संगठन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में करते हैं जहां वे अच्छी बातों को लागू करवाने के नाम पर हिंसा और मनमानी लादते हैं। इसे कुछ बड़े पैमाने पर अगर देखेें तो एक तानाशाह को हटाने के नाम पर और एक देश में लोकतंत्र लागू करवाने के नाम पर अमरीका का गुंडा राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश लाखों मौतों को दुनिया पर लादकर इराक और दूसरे देशों पर हमले करते आया है। दूसरों की आजादी को कुचलने वाले चाहे अन्ना हों, चाहे नक्सली हों, चाहे तालिबान हों और चाहे अमरीका हो, इसे कभी भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। लोगों की जिंदगी में कई किस्म की कमजोरियां, खामियां हो सकती हैं, लेकिन कोई आदमी अगर अपनी बीवी को पीटता है, तो उस महिला को बचाने के लिए दुनिया का कोई अन्ना अगर उस आदमी की हत्या करवा दे तो उसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?
दरअसल अन्ना हजारे के सारे तौर-तरीके गांधीवादी खादी की खाल ओढ़े हुए, पूरी तानाशाही के हैं। भारत की राजनीतिक ताकतों में से जिन लोगों को पिछले एक बरस में अन्ना हजारे का आंदोलन अपनी चुनावी मतलबपरस्ती के माकूल बैठा, उन्होंने अन्ना को गांधी सा बना दिया। लेकिन एक तानाशाह की तोप जिस दिन ऐसी ताकतों की ओर अपना निशाना मोड़ लेगी, क्या उस दिन भी ये लोग इस तानाशाही की स्तुति करते रहेंगे? आज अगर अन्ना हजारे में जरा भी ईमानदारी होती, और बेंगलुरू में अपने ही साथी जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट को मानने की हिम्मत उनकी होती और वे कर्नाटक के भाजपा सरकार के विकराल भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुंह खोलते, और वहां के रेड्डियों और येद्दियुरप्पाओं को हटाने की बात साल-छह महीने पहले से करते तो क्या उस पर भी वे भाजपा के वैसे ही चहेते बने रहते? यह तो भाजपा और कुछ और विपक्षी दलों के लिए सहूलियत की बात है कि अन्ना हजारे अपनी राजनीति में पूरी तरह से बेईमान और पक्षपाती इंसान साबित हुए हैं, इसलिए कांगे्रस और यूपीए के खिलाफ जो राजनीतिक दल हैं, उन सबको इस तानाशाह ने एक क्रांतिकारी दिख रहा है। दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि कोई भी ईमानदार क्रांतिकारी इस तरह का राजनीतिक पक्षपाती और बेईमान नहीं होता। क्रांति के सिद्धांत होते हैं और क्रांतिकारी चाहे हिंसक हो या अहिंसक, वे चेहरे देखकर, पार्टियों के निशान देखकर उन सिद्धांतों को थोपने और उनसे रियायत देने का काम नहीं करते।
बात निकली थी अन्ना हजारे की तानाशाही की। इस देश के जिन लोगों ने कुछ घंटों से लेकर कुछ महीनों तक के लिए अन्ना हजारे को हीरो माना, वे यह सोच लें कि कल के दिन जब यह तानाशाह खादी न पहनने वालों को कोड़े लगवाएगा, सिगरेट पीने या पान खाने वालों को हंटर लगवाएगा, टीवी पर गैरधार्मिक कार्यक्रम के अलावा कुछ भी देखने वालों को पिटवाएगा, जब किसी भी धर्म के व्यक्ति को ले जाकर मंदिर में कसम खिलवाएगा, तब इन समर्थकों या प्रशंसकों को कैसा लगेगा? यह तो सही है कि अन्ना हजारे ने लोकपाल मसौदा कमेटी में उन्हें एक मूर्ख यूपीए सरकार द्वारा दे दी गई सभी पांचों कुर्सियों पर गैरमहिला, गैरदलित, गैरआदिवासी, गैरअल्पसंख्यक, और सिर्फ अपनी ही टोली के लोगों को भारतीय समाज के प्रतिनिधियों के रूप में बिठा दिया था और अपने भ्रष्टाचार के बोझ से दबी हुई, अपराधबोध में डूबी हुई, दहशतजदा सरकार ने उसे मान भी लिया था, लेकिन हम पहले दिन से अन्ना के ऐसे तानाशाह रूख के खिलाफ लिखते आ रहे हैं। लोग याद रखें कि लोकतंत्र के लिए जिसके मन में हेठी है, वह इंसान कभी भी हिंसक हो सकता है, और अन्ना तो खुलकर कैमरे के सामने अपनी हिंसा की वकालत कर रहे हैं। गांधी ने ऐसे लोगों के लिए खादी को बढ़ावा नहीं दिया था।

यह संसद का नहीं, अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार

22 नवंबर 2011
संपादकीय
यह संसद का नहीं, अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार
भारतीय संसद का सत्र शुरू होने पर विपक्ष ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम के बहिष्कार की घोषणा की है। खासकर भाजपा पिछले कुछ महीनों से 2जी घोटाले में चिदंबरम के नाम को जोड़ते हुए उनके इस्तीफे के लिए लगातार अभियान चला रही है। संसद में यूपीए को घेरने के लिए भाजपा ने कल ही यह कहा है कि सदन के भीतर वामपंथियों के साथ उसका एक तालमेल तय हो चुका है। इसके खिलाफ हमने वामपंथियों का कोई बयान अभी तक देखने नहीं मिला, इसलिए ऐसा लगता है कि पिछले कुछ और मौकों की तरह हो सकता है कि इस बार भी भाजपा और वामपंथी किसी तालमेल से सत्ता का विरोध करने के लिए एक साथ हों। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां चर्चा का मकसद भाजपा और वामपंथियों के बीच के एक अटपटा तालमेल नहीं है बल्कि संसद के बहिष्कार की बात है।
संसद की कार्रवाई को दिन भर के लिए रोक देना या किसी एक मंत्री का बहिष्कार करना, इसको हम पूरी तरह नाजायज मानते हैं। अभी हम इस वाक्य तक पहुंचे ही थे कि संसद की खबर कि लोकसभा हंगामे के बाद कल तक के लिए स्थगित हो गई है। यह सिलसिला खतरनाक है और देश की जनता के साथ बेइंसाफी है। कल ही हमने इसी जगह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में लिखा है कि वे कैसे-कैसे अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर रही हैं। आज संसद के बारे में यह दुबारा इसलिए लिखना पड़ रहा है कि आरोपों के घेरे में आए हुए किसी मंत्री के बहिष्कार के पहले संसद के विपक्ष को यह बात भी सोचनी चाहिए कि उन आरोपों पर अभी क्या हो रहा है? विपक्ष के ही एक बहुत आक्रामक नेता, और नेहरू-गांधी परिवार और कांगे्रस से दुश्मनी सी रखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा दायर करके पी. चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं और अदालत के हुक्म पर सीबीआई ने उन्हें 2जी घोटाले की फाईलों में से चिदंबरम और राजा के बीच के कागजों को दे भी दिया है। अदालत किसी जांच एजेंसी से इस तरह फाईलों की कॉपियां किसी पिटीशनर को दिलवाए, ऐसा भी हमें पहले का याद नहीं पड़ता है। अब कानून पढ़ाने वाले, और सोनिया-चिदंबरम से खुली दुश्मनी रखने वाले सुब्रमण्यम स्वामी जिन आरोपों के साथ 2जी घोटाले में चिदंबरम को जेल भेजने की अपनी घोषणा पूरी करने में लगे हैं, उस मामले में अदालत की किसी पहली कार्रवाई के भी पहले अगर संसद का विपक्ष चिदंबरम का बहिष्कार करता है तो यह अदालत के फैसले के पहले ही, अदालत में पहली नजर में किसी अपराध की बात भी सामने आने के पहले ही फैसला दे देने जैसा है। प्रीजज करना ठीक नहीं होता। खासकर ऐसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर की कार्रवाई को प्रभावित करते हुए जहां पर कि लोगों की कुछ लोकतांत्रिक जिम्मेदारियां होती हैं। विपक्ष का यह हमलावर तेवर उसी तरह का है जिस तरह अन्ना हजारे पिछले कुछ हफ्तों में लगातार सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं और इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर रहे हैं कि सरकार ने एक तरफ तो इसी सत्र में लोकपाल विधेयक को रखने की बार-बार घोषणा की है, और दूसरी तरफ संसद की स्थाई समिति इस विधेयक के मसौदे से या इसकी बातों से वैसे भी जूझ रही है। जब यह संसदीय सिलसिला जारी है, तब घर बैठे बेवजह पूरी तरह नाजायज बयानबाजी करके अन्ना हजारे ने इस पूरे मुद्दे की, अपने आंदोलन की और अपनी खुद की साख चौपट की है। उनके विरोध की गंभीरता उन लोगों के बीच खत्म हो चुकी है जो यह देख रहे हैं कि लोकपाल विधेयक एक पटरी पर संसदीय प्रक्रिया से गुजरते हुए इस सत्र में सांसदों के सामने पहुंचने जा रहा है। लोकतंत्र के भीतर एक प्रक्रिया के चलते हुए उसमें बिना किसी जरूरत बाहर बैठे कोंचना सिर्फ कुछ लोगों के अहंकार को मजा दे सकता है।
हम संसद के बाहर भाजपा या किसी दूसरी विपक्षी पार्टी की चिदंबरम को हटाने की मांग के खिलाफ नहीं हैं, और अगर वे चाहें तो इसके लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से आंदोलन करते रहें, डॉ. स्वामी की तरह अदालत में जाएं, प्रधानमंत्री से मिलकर यह मांग करें, राष्ट्रपति से मिलें, और मीडिया को सहमत कराने की कोशिश करें कि किसी भ्रष्ट को सत्ता पर बने रहने का हक क्यों नहीं होना चाहिए? लेकिन हम अदालत में चल रहे एक मामले को लेकर संसद को प्रभावित करने के खिलाफ हैं। कल के दिन संसद में चल रही किसी बहस को लेकर अदालत की कार्रवाई प्रभावित होने लगे, अदालत की कार्रवाई को लेकर किसी फैसले के पहले ही सरकारी कामकाज प्रभावित होने लगे, आरोपों को लेकर बिना किसी जांच, नतीजे के चुनाव प्रभावित होने लगें, तो यह सिलसिला ठीक नहीं है। भारतीय लोकतंत्र में तीन बड़ी स्पष्ट संस्थाओं को बनाकर उनकी जिम्मेदारियां और उनके अधिकार तय किए गए हैं और जहां तक 2जी घोटाले का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में जब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है, जब अदालती दखल से याचिकाकर्ता को फाईलें मिल रही हैं तो संसद के विपक्ष को डॉ. स्वामी की क्षमता और उनकी मेहनत पर भरोसा करना चाहिए। एक कानूनी कार्रवाई के बीच संसद को प्रभावित करने का कोई भी तर्क आज चिदंबरम के मामले में जायज नहीं दिख रहा, और हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आज के इस बयान से सहमत हैं कि चिदंबरम के बहिष्कार का कोई आधार नहीं है। जब पूरी की पूरी यूपीए सरकार कई अदालतों के कई कटघरों में किस्तों में खड़ी है, तो अदालतों से परे ही अगर इस सरकार को कुसूरवार ठहराना है तो फिर बचे सारे बरस इस संसद का बहिष्कार ही कर देना चाहिए। लेकिन संसदीय लोकतंत्र न इस तरह से बनाया गया है और न ही इस तरह से हांका जाना चाहिए। विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए जिसके लिए देश की जनता ने उसे चुना है। देश की जनता ने यूपीए की पार्टियों को सरकार चलाने के लिए चुना है, यूपीए ने मंत्रालय चलाने के लिए अपने मंत्री चुने हैं, देश में किसी भी तरह के अपराधों पर कार्रवाई के लिए अदालतें बनी हैं और जज नियुक्त किए गए हैं, इन सबके बीच में सस्ता मुर्गा खाते हुए ऐश की जिंदगी जीने वाले सांसद अगर अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे तो देश की जनता की नजरों में आज भी सांसदों की बहुत अधिक इज्जत नहीं रह गई है। आज लोगों को इक्का-दुक्का भ्रष्ट जजों के रहने पर भी देश की अदालतों पर भरोसा है। और वे किसी राजनीतिक दल के साथ हमदर्दी रखे बिना मोटे तौर पर ईमानदारी और असरदार तरीके से अपना काम कर रही हैं। ऐसे में अदालत की सीधी निगरानी में खड़े चिदंबरम के बहिष्कार का क्या औचित्य है? आज देश में इतने सारे मुद्दे हैं, और संसद के इस सत्र के सामने इतने सारे विधेयक हैं कि सांसदों को ओवरटाईम करके इन सब पर मेहनत करनी चाहिए। यह बहिष्कार वे चिदंबरम का या संसद का नहीं कर रहे हैं, वे अपनी जिम्मेदारियों का बहिष्कार कर रहे हैं।

पूरी हमदर्दी उस जनता के साथ,जिसने इस संसद को चुना है

21 नवंबर 2011
संपादकीय
पूरी हमदर्दी उस जनता के साथ,जिसने इस संसद को चुना है
कल से भारतीय संसद का वह सत्र शुरू हो रहा है जिसमें पिछले कई महीनों से खबरों में चले आ रहे विधेयक पेश होंगे और देश की जनता के भेजे हुए लोग उन पर चर्चा करके उन्हें कानून बनाने का काम करेंगे। संसदीय व्यवस्था की इस साधारण जिम्मेदारी को लेकर आज यह साफ है कि जनता के चुने हुए सांसद लोकसभा में, और सांसदों-विधायकों के अनुपात में राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई राज्यसभा में विधेयकों पर चर्चा राजनीतिक पसंद और परहेज के मुताबिक शुरू होगी और खत्म हो जाएगी। भारतीय लोकतंत्र के भीतर की संसदीय व्यवस्था में कानून बनाने का यह सिलसिला लगभग पूरा ही नाकामयाब हो जाएगा क्योंकि राजनीतिक खेमेबंदी विधेयकों के पहलुओं पर किसी भी सार्थक बहसों को होने नहीं देगी और दलबदल कानून के चलते सांसद अपनी मर्जी से, अपनी अक्ल से कोई काम कर नहीं सकते।
जिस दलबदल कानून को बनाया इसलिए गया था कि सांसद या विधायक जिस निशान पर चुनाव जीतकर आते हैं उसे उस कार्यकाल के खत्म होने तक छोड़ न सकें। नतीजा यह हुआ कि इसके बाद से संसद और विधानसभाओं में दलबदल का काम थोक में होने लगा क्योंकि किसी पार्टी को अगर एक तिहाई से अधिक सांसद या विधायक छोड़ते हैं तो उस पर दलबदल कानून लागू नहीं होता। इसके चलते अब पार्टियां संसद और विधानसभाओं के किसी भी मतदान के समय आमतौर पर व्हिप जारी करती हैं, जिसके खिलाफ जाकर वोट डालने वाले लोगों पर सदन की सदस्यता खो देने का खतरा रहता है। नतीजा यह होता है कि पार्टी की बंधी-बंधाई नीति और रणनीति से परे जाकर कोई सांसद या विधायक सदन में खुले दिमाग से स्वस्थ तर्क-वितर्क नहीं कर सकते। देश के ऐसे संसदीय माहौल में ऐसे ऐतिहासिक विधेयक पेश होने जा रहे हैं जिनके लिए पिछले महीनों में इस देश ने ऐतिहासिक आंदोलन देखे हैं,  ऐतिहासिक अहंकार देखा है और संसदीय व्यवस्था की ऐतिहासिक हेठी देखी है। इस पूरे दौर में देश के राजनीतिक दलों ने सत्तारूढ़ यूपीए और उसकी मुखिया कांगे्रस की फजीहत देखने के लिए अराजकता को इतना बढ़ावा दिया कि वह संसद के भीतर भी खुलकर झलकने वाला है। इस विशाल देश में हर बरस कुछ राज्यों के चुनाव होते हैं और उनमें अपने बाहुबल को साबित करने के लिए, वोटरों को लुभाने के लिए राजनीतिक दलों की अपनी तात्कालिक बेबसी या प्राथमिकताएं होती हैं, जिनके चलते संसद के भीतर की संसदीय जिम्मेदारी एकदम पीछे की सीट पर जाकर बैठ जाती हैं और तकरीबन हर पार्टी मीडिया के मार्फत जनता तक पहुंचने की तरकीबों को अपनी सामने की बेंचों पर बिठा देती है।
ऐसे में देश के अगले जाने कितने बरसों के प्रभावित करने वाले कानून का क्या हाल होगा? संसद का मतलब और महत्व हर मुद्दे पर दलीय राजनीति और चुनाव प्रचार न होकर, देश के संविधान, कानून और नियमों को ढालना है, लेकिन यह मतलब चुनावी मतलबपरस्ती से तुरंत ही शिकस्त पाकर ढेर हो जाता है। एक नए कानून के हर पहलू और उनकी बारीकियों पर खुले दिमाग से बातचीत के बजाय वहां जब बंद दिल से चर्चा होती है और दिमागों को पार्टी हित में एक टोकरी में एक साथ बंद करके रख दिया जाता है तो उस देश का लोकतंत्र अपनी सबसे अच्छी संभावनाओं के करीब पहुंच नहीं पाता। राजनीति, और खासकर सस्ती और फूहड़, हमलावर और लोकप्रियता को प्यासी चुनावी राजनीति, संसद की पूरी हवा में घुली रहती है और यह ऐतिहासिक भारतीय संसद अमूमन बहुत शानदार लोकतांत्रिक बहस नहीं देख पाती।
हम संसद की प्राथमिक जिम्मेदारी को एक बार फिर पटरी पर लाने की सलाह सभी पार्टियों को देंगे। आज जिस तरह देश के म्युनिसिपल सफाई, पानी, रौशनी की बुनियादी जिम्मेदारी को छोड़कर मोटे तौर पर बिल्डर-प्रमोटर के बाजारू अंदाज में काम करते दिखते हैं, वैसे ही संसद और विधानसभाओं में लोग चुनाव प्रचार करते दिखते हैं। यह एक बहुत त्रासदी की नौबत है जब भारतीय लोकतंत्र में सरकार चोरी-डकैती में लगी है, अदालतें कदम-कदम पर सरकार के हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करने के नापसंद (या अच्छे लगने लगे) फैसले लेने लगी हैं, जब सीएजी (महालेखा नियंत्रक) ऐसी जांच करने, ऐसी रिपोर्ट बनाने की प्रिय या अप्रिय स्थिति में हैं जिनसे कि सरकार नंगी हुई जा रही है, जब अन्ना-बाबा जैसे घोर अलोकतांत्रिक लोग सड़कों और मैदानों से भारतीय संसद को विविध भारतीय बनाकर मनचाहे गाने गवा रहे हैं, तब अगर संसद चुनाव प्रचार के मंच की तरह रह जाती है तो यह लोकतंत्र जर्जर हो चला साबित होता है। एक तरफ भारत के लोकतंत्र को बाजार के बाहुबली जेब में रखकर चल रहे हैं, दूसरी तरफ देश के बहुत से राज्यों में नक्सली निर्वाचित सरकारों को कई इलाकों से खदेड़ ही चुके हैं, ऐसे में संसदीय लोकतंत्र अपनी इज्जत बहुत दूर तक तो खो ही चुका है। आने वाले दिन भारतीय संसद में संसदीय जिम्मेदारी के दिखेंगे या फिर चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी के, इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। हमारी कोई हमदर्दी यूपीए सरकार के साथ नहीं है, बल्कि पूरी की पूरी हमदर्दी उस जनता के साथ है जिसने इस संसद को चुना है, और अब वह महज चुनावी राजनीति झेल रही है।

एक लंबी सी, छोटी सी बात

20 नवंबर 2011
संपादकीय
एक लंबी सी, छोटी सी बात
पाकिस्तान में मोबाईल फोन पर आने-जाने वाले एसएमएस के लिए डेढ़ हजार शब्दों को प्रतिबंधित कर दिया है। फोन कंपनियों को आदेश जारी हो गए हैं कि जो मैसेज इन शब्दों वाले हों, उन्हें कंपनियां ही रोक लें और आगे न जाने दें। पाकिस्तान की तहजीब जिस किस्म की जुबान और तौर-तरीकों को बुरा मानती है, उसे रोकने की नीयत से वहां की सरकार ने यह कदम उठाया है, लेकिन जैसा कि पूरी दुनिया में रोक का तजुर्बा रहते आया है, इस मामले में भी वहां की सरकार में बैठे लोगों ने ऐसे-ऐसे शब्दों को इस लंबी लिस्ट में जोड़ दिया है जिसका कि सेक्स या अश्लीलता से परे भी साधारण बातचीत में इस्तेमाल होता है। अब वहां डिपाजिट, टैक्सी, जीभ, पिछला दरवाजा, मूर्ख, छेद, शैतान, गुलाम, थूक, बंधक, कंडोम, समलैंगिक, के अलावा, एथलीट्स फुट जैसे मुहावरे भी रोक दिए गए हैं। ऐसे बड़े शब्द जिनका कोई हिस्सा किसी छोटे प्रतिबंधित शब्द वाला हो, उसे भी टेलीफोन आने-जाने नहीं देंगे।
यह रोक कुछ अधिक दूरी तक चली गई है और जिन जगहों पर किसी मजहब के आधार पर रोक लगती है तो वहां अतिउत्साही अफसर या नेता रोक को आसमान तक ले जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन धर्म के अलावा भी कई किस्म की विचारधाराएं प्रतिबंधों का क्या हाल करती हैं यह भारत में भी आपातकाल के दौरान देखा जा चुका है जब आजादी और लोकतंत्र को लेकर गांधी और नेहरू की कही बातों को भी अगर अखबार अपने संपादकीय कॉलम में छापते थे तो उन्हें सरकार के खिलाफ बगावत मानकर उनके खिलाफ सेंसरशिप का कानून इस्तेमाल किया जाता था। आज भी हम भारत में हुसैन की पेंटिंग्स, महाराष्ट्र के पांडुलिपि-संग्रहालय, शोध संस्थान, दिल्ली में पाठ्यपुस्तक के लेख, जैसी बहुत सी बातों को प्रतिबंध का शिकार होते देखते हैं। लेकिन आज हम सेंसरशिप या गैरजरूरी रोक से परे की कुछ बात यहां करना चाहते हैं और पाकिस्तान की इस ताजा एसएमएस-रोक को हम इस चर्चा के शुरू करने का एक बहाना ही मान रहे हैं।
आज भारत में भी हम देखते हैं कि उम्र, ओहदे और रिश्ते से परे लोगों के बीच तरह-तरह के अश्लील या सेक्स-आधारित संदेश, लतीफे खुलकर आते-जाते हैं। जिन लोगों के बीच कभी रूबरू ऐसी मजाक का रिश्ता न रहा हो, वे लोग भी कहीं से आए हुए सेक्सी लतीफे को ज्यों का त्यों आगे बढ़ाते हुए दिमाग का इस्तेमाल नहीं करते। यही हाल ई-मेल पर तस्वीरों को आगे बढ़ाते हुए होता है और तरह-तरह की सेक्स-आधारित वीडियो क्लिप सारे वक्त एक फोन से दूसरे फोन तैरते रहती है। टेक्नालॉजी ने लोगों के बीच रिश्तों के तौर-तरीकों को उलट-पुलटकर रख दिया है। हमारे अखबार को जो लोग लगातार पढ़ते हैं उन्होंने देखा होगा कि रोज छपने वाली एक छोटी सी नसीहत या सलाह में हम हर कुछ हफ्तों में इस बारे में लिखते हैं कि किस तरह लोगों को अपने मोबाईल फोन से सभी खराब या गलत बातों को, तस्वीरों को मिटाते चलना चाहिए क्योंकि कब उनका फोन अपने बच्चों या अपने बड़ों के हाथों में चला जाए, उसका कोई ठिकाना तो रहता नहीं। नतीजा यह होता है कि दो पीढिय़ों के बीच, या लिहाज वाले रिश्तों के बीच एक-दूसरे की नजरों में गिर जाने का एक खतरा हो जाता है या फिर उनके बीच लिहाज के रिश्ते खत्म होकर बेतकल्लुफी के रिश्ते बन जाते हैं जो कि पारिवारिक ढांचे के तहत ठीक नहीं होते। हम दो वयस्क दोस्तों के बीच मजाक या मजे के एसएमएस में किसी रोक-टोक को ठीक नहीं मानते इसलिए पाकिस्तान में इस रोक से बराबरी के दोस्ताना रिश्ते के मजाक का एक तरीका खत्म होने जा रहा है, इसलिए हम वैसी किसी रोक के बजाय लोगों के अपने-आप पर ऐसे काबू की चर्चा कर रहे हैं जो बेतकल्लुफ दोस्तों से परे के बाकी रिश्तों के मामले में इस्तेमाल होना चाहिए।
जब समाज ने रिश्तों को ऐसी शक्ल में नहीं ढाला है कि लोग एक-दूसरे से हर किस्म का मजाक कर सकें, तब सिर्फ तकनीकी सहूलियत के चलते रिश्तों की परिभाषा और उनका अंदाज इस तरह बदल जाए यह ठीक नहीं है। आज भी अगर भारत के लोग एक-दूसरे के मोबाईल फोन घर के भीतर अचानक किसी जरूरत से इस्तेमाल करने लगें और पिछले आए-गए संदेशों को देखें, फोन में जमा वीडिया क्लिप देखें तो एक-दूसरे की नजरों में गिरने की नौबत आ सकती है। भारत में एक अधिक उदार लोकतंत्र के चलते ऐसी भाषा पर रोक तो किसी कानून के तहत नहीं आएगी, लेकिन हम सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर लोगों से सावधानी बरतने की बात जरूर कहेंगे। हर कुछ हफ्तों में छोटी सी बात कहकर हम जो सलाह देते आए हैं उसे आज यहां इस बड़े कॉलम में दे रहे हैं क्योंकि हमारा मानना है कि यह राष्ट्रीय महत्व के किसी मुद्दे से कम अहमियत की बात नहीं है।

यह नर्मजोशी का माहौल नहीं

19 नवंबर 2011
संपादकीय
यह नर्मजोशी का माहौल नहीं
इंटरनेट पर ट्विटर पर आज दोपहर जावेद अख्तर ने लिखा कि इस माध्यम का उपयोग लोग दोस्ती, गर्मजोशी और खूबसूरत भावनाओं और विचारों के पुल की तरह करें। इसके बाद अमिताभ बच्चन सहित कुछ और लोगों ने इस बात से सहमत होते हुए इसे आगे बढ़ाया। लेकिन हमारी तरह के कुछ लोग इससे असहमत थे और उनका मानना था कि किसी भी सार्वजनिक संचार माध्यम या मीडिया का इस्तेमाल आज के जमाने में सिर्फ दोस्ती, सिर्फ गर्मजोशी और सिर्फ खूबसूरत भावनाओं के लिए नहीं हो सकता। जब चारों तरफ बेइंसाफी बिखरी हुई है तो कैसे कोई सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें कर सकता है।
कल से सुखराम की खबरें आने लगीं तो लोगों को याद आया कि एक वक्त वह भाजपा के साथ भी था। उसके घर से करोड़ों के नगद नोट मिलने के भ्रष्टाचार का मामला, आज खबरों में बने हुए दूरसंचार मंत्रालय में बड़े भ्रष्टाचार का मामला को सुखराम को आज जेल भेज ही रहा है लेकिन सीबीआई ने सुखराम के बारे में आज अदालत ने कड़ी से कड़ी सजा की मांग करते हुए कहा कि वह आदतन अपराधी है। ऐसी हालत में सुखराम के बारे में वे, उन, जैसे शब्द इस्तेमाल करना हमको ठीक नहीं लग रहा है। जब तक कोई महज कटघरे में होते हैं तब तक तो संदेह का लाभ देते हुए वैसे लोगों को थोड़े-बहुत सम्मान के साथ लिखा जा सकता है। लेकिन जिसे कांग्रेस सरकार की मातहत सीबीआई ही कांग्रेस कार्यकाल के अपराधों के लिए आदतन अपराधी करार दे रही है उसे हम किसी भी सम्मान का या शिष्टाचार का हकदार कैसे मानें?
आज की ही एक दूसरी खबर है कि अटल सरकार में सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक रहे, और भाजपा के बहुत बड़े नेता माने जाते रहे प्रमोद महाजन के दूरसंचार कार्यकाल के समय के स्पेक्ट्रम आबंटन को लेकर सीबीआई ने एक मामला दर्ज किया है और टेलीफोन कंपनियों और महाजन के अफसरों पर छापे मारे हैं। हम इसमें सीधे-सीधे सीबीआई पर कोई राजनीतिक दबाव इसलिए नहीं देखते कि दूरसंचार घोटाले को लेकर सीबीआई सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही है और उसका अपना हाल शीशे के मछली घर में तैरने वाली मछली जैसा है। इसलिए इस बात की अधिक उम्मीद नहीं लगाई जा सकती कि सीबीआई यूपीए सरकार के साथ-साथ एनडीए सरकार को भी लपेटने के लिए एक फर्जी मामला दर्ज कर रही है। यहां पर उस बयान को भी याद करने की जरूरत है जो प्रमोद महाजन की हत्या के बाद उनके भाई ने दिया था और जिसमें महाजन के बारे में कहा गया था कि वे हजारों करोड़ के मालिक थे। राजनीतिक चर्चाओं को मानें तो ऐसी चर्चा महाजन के बारे में उस समय थी भी। एक तरफ भाजपा के कर्नाटक के भ्रष्टाचार की खबरें हैं तो दूसरी तरफ गोवा में कांग्रेस की सरकार अवैध खुदाई के मामले में कम या अधिक हद तक फंसी हुई दिख रही है। भारत की बाकी हवा भी ऐसी ही गंदगी और बदबू से भरी हुई है।
जिस बात से हमने शुरू किया था उसे आगे बढ़ाएं तो आज जावेद अख्तर या गुलजार जैसे भावनाओं वाले कवियों और लेखकों के बजाए कबीर जैसे कड़क और साफ-साफ कहने वाले, बेइंसाफी और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाने वाले और कोड़े जैसी मार करने वाले लोगों की जरूरत है। बहुत से लोगों को बिना कड़वाहट की बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन यह याद रखने की जरूरत है कि जिस रीढ़ की हड्डी से, जिसके भीतर की नसों से पूरा बदन चलता है, उस रीढ़ की हड्डी को कड़क होना पड़ता है। सिर्फ नर्मजोशी से और दोस्ती की गर्मजोशी से दुनिया नहीं चल सकती। यह एक बहुत ही रोमांटिक सोच है जो कोई कवि तो कर सकता है, या ऐसे लोग कर सकते हैं जो बेइंसाफी के शिकार नहीं हैं, जो ऐसी जगहों पर हैं या ऐसे ताकतवर हो गए हैं कि उनका अब आसानी से कुछ नहीं बिगड़ सकता, वे खूबसूरत भावनाओं तक अपने आपको सीमित रख सकते हैं। लेकिन कबीर आज होते और ट्विटर तक उनकी पहुंच होती तो वे या तो जावेद अख्तर की बात को न मानते, और अगर उनकी बात को मानते तो फिर ट्विटर छोड़कर जाकर अपने हाथकरघे पर बैठ गए होते। जब पूरी दुनिया बेइंसाफी से भरी हुई हो, तो सच कैसे नर्म हो सकता है और कैसे गर्मजोशी से भरा हो सकता है? कैसे बातें बहुत दोस्ताना हो सकती हैं?

छोटी सी बात

छोटी सी बात
18 नवंबर
जब किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन की बैठक हो रही हो, जिस देश में हो रही हो, उसके बारे में अखबारों, किताबों में पढ़कर या इंटरनेट पर ढूंढकर अपने आस-पास के लोगों को जरूर बताएं।

कम लागत से दिल-दिमाग में अधिक गहराई तक

18 नवंबर 2011
संपादकीय
इटली की एक फैशन कंपनी यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटन ने अपने विज्ञापनों के ताजा अभियान से एक बार फिर खबरें खड़ी कर दी हैं। यह कंपनी अपने मालिक की एक पीढ़ी पहले से दुनिया को चौंकाने वाले विज्ञापनों की वजह से इतनी खबरों में आती रही है जितना प्रचार अपने विज्ञापनों से भी वह नहीं पा सकती थी। उसके अभी के ताजा अभियान में उसने दुनिया के कुछ देशों के बड़े-बड़े सरकारी नेताओं और ईसाई धर्म के एक प्रमुख गुरू, पोप को एक मौलवी को चूमते हुए गढ़ी गई तस्वीरों की वजह से हड़कंप मचा हुआ है। कहने को तो बेनेटन नाम की इस कंपनी ने अपने इस अभियान को नफरत नहीं का नाम दिया है, लेकिन कुल मिलाकर यह बाजारू चर्चा पाने का एक जरिया ही है।
इस अभियान के बारे में यूनाइटेड कलर्स ऑफ बेनेटन का कहना है कि यह सुलह की प्रतीकात्मक तस्वीरें है। उसका कहना है कि ये विज्ञापन 'सकारात्मक उकसावाÓ है जिसका उद्देश्य सहनशीलता की आदर्श स्थिति लोगों के सामने लाना है। अपने विज्ञापनों के जरिए लोगों को चकित करने का बेनेटन का ये प्रयास नया नहीं है। इससे पहले वह मृत्युदंड पाए कैदियों, एक पादरी का चुंबन लेती नन और एड्स से मरते एक व्यक्ति की तस्वीरों का उपयोग विज्ञापनों में कर चुका है। इस कंपनी की ऐसी हरकतों के चलते कई बार दुनिया के अलग-अलग तबकों में इसका विरोध हुआ और जैसा कि बाजार का रिवाज है, बेनेटन बदनाम हुआ, तो क्या उसका नाम नहीं हुआ? इसलिए बुरे प्रचार के चक्कर में बहुत से फिल्म वाले अपने ही फिल्मों के खिलाफ किसी-किसी से अदालतों में केस करवाते हैं, कहीं उसके पोस्टर जलवाते हैं, और कहीं उस पर रोक की मांग करवाते हैं। यही हाल किताबों का होता है, उनमें कुछ ऐसी चर्चित और विवादास्पद बातें लिखी जाती हैं कि किताब के आने के पहले ही उसके बारे में अनगिनत खबरें आने लगती हैं और उसे पढऩे के पहले ही डरी-सहमीं, बिना आत्मविश्वास वाली सरकारें उस पर रोक लगाने लगती हैं। कहीं किसी नाटक को ऐसे विरोध या ऐसी रोक के बाद सौ गुना अधिक दर्शन नसीब हो जाते हैं तो किसी किताब के एक की जगह चार-चार संस्करण छप जाते हैं।
नकारात्मक या बुरा प्रचार आम तौर पर एक सोची-समझी रणनीति के सदियों से सफल हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। लेकिन दुनिया को चौंकाते हुए कभी-कभी कुछ गैरबाजारू जनचेतना अभियान भी चलते हैं जिनका मकसद चर्चा पाना होता है। यह पूरा सिलसिला लोगों के दिल-दिमाग के बाजारू शोषण से परे का भी है और जब यह बाजार को फायदा दिलाने के लिए नहीं होता तो फिर यह लोगों को झकझोरने के लिए भी होता है। आज दिक्कत यह है कि किसी तस्वीर, नारे, विज्ञापन या सार्वजनिक जगह पर किसी प्रदर्शन या नुमाइश की इस ताकत का इस्तेमाल करने के बजाय सरकारों से लेकर बाजारों तक ऐसा खर्च अधिक होता है जिससे असर पैदा नहीं होता। प्रचार के मनोविज्ञान, उसकी तकनीक और कल्पनाशीलता के बिना जब कभी जिस तरह के अभियान चलते हैं, वे अपनी लागत को वसूल करके, खर्च करने वाले लोग कोई फायदा नहीं दे पाते। ऐसे में बेनेटन की लोगों को चौंकाने की अपार क्षमता पश्चिम के देशों में तो प्रचार से जुड़े जानकारों के बीच गंभीर अध्ययन और विचार-विमर्श की एक मॉडल बन ही चुकी है, इस पर हमारे जैसे दूर बैठे हुए लोग भी सोचते हैं, बात करते हैं, उसकी तारीफ करते हैं या उसे कोसते हैं, उसके ब्रांड के कपड़े खरीदें या न खरीदें, उस ब्रांड को जानने तो लगते ही हैं।
जैसा कि इस कंपनी के बारे में कहा जाता है कि यह बिना लागत बहुत अधिक प्रचार पा लेनेेे का हुनर जानती है और यह किसी विवाद की सरहद के भीतर तक घुसकर काम करने की आदी है, वैसा बिना किसी अधिक विवाद के भी भारत में किया जा सकता है लेकिन एक दिलचस्प और बुरी बात यह है कि बाजार के वे लोग जो प्रचार पर खासा खर्च करते हैं, वे भी अपने अभियान को असरदार बनाने के लिए मेहनत नहीं करते। लोगों को किसी कल्पनाशील कलाकार, डिजाइनर, लेखक पर खर्च करना बर्बादी लगता है, जबकि वे विज्ञापनों पर करोड़ों रूपए खर्च कर देते हैं। बहुत से अभियान देखकर हमें यह अफसोस होता है कि जरा सी और मेहनत से, कल्पनाशीलता से इस लंबे-चौड़े खर्च को कितना अधिक असरदार बनाया जा सकता था, लेकिन क्वालिटी या उत्कृष्टता के पैमाने पर सस्ता सामान कितना फीका और बेस्वाद हो जा रहा है, इसकी समझ कम लोगों को दिखाई पड़ती है। हम सिर्फ नकारात्मक या विवादास्पद अभियानों की बात नहीं कर रहे हैं, यह बात लोगों का ध्यान खींचने की तरकीबों की है, और यह काम तो बाजार से लेकर सदाचार तक के कई किस्मों के अभियानों के लिए जरूरी होता है। बिना मर्दों के बीच चुंबन की तस्वीरों के भी लोगों का ध्यान खींचने के तरीके हो सकते हैं जिससे कि कम लागत से लोगों के दिल-दिमाग में अधिक गहराई तक पहुंचा जा सकता है।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
17 नवंबर
किसी दूसरे शहर में घूमते हुए अगर आपके पास कैमरा है, तो आप वहां की यादें लेकर लौट सकते हैं। और इसके लिए कुतुब मीनार ही जरूरी नहीं है, आप तो सड़क चलते कोई दिलचस्प बोर्ड भी पा सकते हैं, और कोई मदारी भी आपको अच्छी फोटो दे सकता है।

लोकतंत्र से परे आखिर ना सोचें, तो कैसे?

संपादकीय
17 नवंबर 2011
कल और आज की कुछ ख़बरें दिल को परेशान करने वाली हैं, दिमाग को भी। बहुत से मामलों में एक बार फिर यह बात आसमान पर लिखी दिख  रही है कि हिंदुस्तान में जनतंत्र किस तरह धनतंत्र में तब्दील हो गया है, और लोकतंत्र के तौर-तरीके किस तरह बेशर्म हो गए हैं। अभी कुछ दिन पहले ही जब कर्नाटक के गिरफ्तार हुए पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा जेल जाते ही अस्पताल चले गए थे, और एक विचाराधीन अभियुक्त या आरोपी से मिलने उनकी भाजपा  के मुख्यमंत्री अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ अस्पताल गए थे, बिना जेल या अदालत की इजाजत के। कल राजस्थान में सीबीआई की जांच झेल रहे, कटघरे के करीब, कांग्रेस के एक भूतपूर्व मंत्री के अस्पताल में भर्ती होते ही मुख्यमंत्री गहलोत उन्हें  देखने  अस्पताल चले गए। जबकि  इस भूतपूर्व मंत्री पर जो तोहमत लगी  है वह  एक नर्स  के अपहरण, और संभावित क़त्ल  के मामले में शामिल होने की है। जिस मंत्री को वह अपने मंत्रिमंडल में रखने लायक नहीं समझते थे, उसे मिजाज़पुर्सी के लायक समझते हुए उन्होंने यह भुला दिया कि वह एक राज्य के मुख्यमंत्री हंै, उनके इस  व्यवहार से एक आरोपी के अपराध को  सामाजिक मान्यता मिल सकती है। लेकिन राजस्थान में कांग्रेस की यह परेशानी मानो काफी नहीं थी, तो देश के एक सबसे चर्चित हत्याकांड में हत्यारे मनु शर्मा को पेरोल दिलाने में दिल्ली पुलिस ने अपने पिछले अदालती रुख से पलटकर एकदम से इस हत्यारे को पेरोल दिलाने में पूरी ताकत लगा दी। इसके पहले भी मनु शर्मा को जेसिका हत्याकांड में पुलिस और जांचकर्ताओं ने  किस तरह बचाया था, वह अभी पुरानी बात नहीं है। जेसिका की बहन के संघर्ष को अगर मीडिया की मदद से जन समर्थन नहीं मिलता, और न्यायपालिका जागरुक न होती, तो अपनी ताकत के बूते मनु शर्मा कभी जेल गया ही नहीं होता।
कल ही खबर थी कि सुप्रीम कोर्ट में एक मामले में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने एक जमीन घोटाले के मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत के नोटिस का जवाब सात बरस बाद दिया। क्या इनमें से कोई भी एक बात इन लोगों के ताकतवर हुए बिना हो सकती थी? सत्ता  की ताकत, दौलत  की ताकत, और मनु शर्मा जैसे हत्यारे के मामले  में तो दौलत  के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के एक बड़े नेता, अपने बाप की ताकत भी। किस तरह बात की बात में, ताकतवर लोग गिरफ्तार हो जाने पर जेल से घंटों में अस्पताल चले जाते हैं, यह देखते ही बनता है। दूसरी तरफ अमर सिंह जैसे स्वघोषित राष्ट्रीय  दलाल जेल से जमानत पर बाहर आते ही कहते हैं कि उन्हें पूरी साजिश की खबर है, और अदालत ऐसे जानकार को गवाही देने के बाद ही गंभीर इलाज के लिए विदेश जाने को नहीं कहती। बहुत बीमार होने की वजह से इलाज के लिए जमानत मिली, फिर इलाज के लिए विदेश जाने की इजाजत मिली, और सारी साजिश का जानकार यह आदमी सीने में राज लिए हुए बाहर चले जा रहा है। गंभीर इलाज से वह लौटे, या ना लौटे, अदालत इस आदमी को कोर्ट बुलाकर पूरी साजिश पर बयान क्यों नहीं लेती?
नितीश कटारा हत्याकांड में ऐसे ही एक दबंग हस्ती के फरजन्द विकास यादव को अदालत ने उम्रकैद की सजा तो सुनाई, लेकिन वह सजा सुनाने के 45 महीनों के भीतर जेल से किसी न किसी बहाने 85 बार बाहर आया। आखिरी बार वह मेडिकल जांच के बहाने 25 दिनों तक एम्स में  ठाठ से भर्ती रहा। जब मीडिया ने उसके बारे में दरयाफ्त करना शुरू किया तो उसे अचानक जांच किए बिना ही छुट्टी दे दी गई। ताकत के दम पर जेल से अस्पताल तक हर इंतज़ाम हो जाता है, और बड़े-बड़े ज़ुर्म करने वाले, उन्हें दी गई सजा और इंसाफ का माखौल  उड़ाते हुए आराम से घूमते हंै। जब जनतंत्र धनतंत्र में बदल जाता है, तो इससे असहमत लोग अलग -अलग दर्जे की अनास्था जनतंत्र के प्रति विकसित कर लेते हैं। उनमें से कुछ लोग हथियार उठाकर जंगलों में भी उतर जाते हैं।
अमिताभ बच्चन के परिवार में ऐश्वर्या राय ने एक कन्या को जन्म दिया है। इसके कई दिन पहले ही भारत के समाचार चैनलों के संगठन ने खुद होकर फैसला लिया था, और अमिताभ बच्चन को उसकी खबर भी कर दी थी कि इस जन्म को लेकर टीवी न्यूज़ चैनलों के कैमरे, उनकी गाडिय़ाँ, अमिताभ के घर या जन्म वाले अस्पताल के बाहर नहीं जाएंगीं। बहुत सी और बंदिशें न्यूज़ चैनलों ने खुद होकर अपने पर लाद ली थीं। यह सारे वे ही चैनल हैं जो कि एक मंत्री के साथ भंवरी की रेकॉर्डिंग समाचारों में दिखाते हैं। उस वक्त भंवरी की कोई निजी जिन्दगी नहीं होती, उसके पति और बच्चों का कोई दिल नहीं होता। आज कोई चैनल अमिताभ बच्चन और उनके कुनबे  को नाराज करना नहीं चाहता, इसलिए रातों रात आचार संहिता बनाकर अमिताभ को पेश भी कर दी। क्या कोई  छोटे, कमजोर कभी ऐसे सम्मान लायक हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों को दिखते हैं?
ताकत का सम्मान कैसा होता है, यह देखना हो तो भारत की संसद देख लें, विधानसभाएं देख लें। इनमें एक-एक करके करोड़पति और अरबपति बढ़ते चल रहे हैं। धनबल को टिकट, जीत, और फिर मंत्रीपद जैसे तोहफे कैसे मिलते हैं, यह देश की किसी भी राजधानी में देखा जा सकता है। हर दिन गैरबराबरी की ऐसी ख़बरें लोगों को लोकतंत्र से परे सोचने को मजबूर करती हैं।


 

छोटी सी बात

छोटी सी बात
16 नवंबर
जब किसी से हाथ मिलाएं, तो गर्मजोशी से, मजबूती से हाथ मिलाएं, या फिर न मिलाएं। कमजोर हैंड-शेक, उत्साह या आत्मविश्वास की कमी मानी जाती है।

पहले सौ करोड़ जमा करो फिर...

16 नवंबर 2011
संपादकीय

हिंदुस्तान में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के और इंटरनेट के विस्फोटक विस्तार के बाद प्रिंट मीडिया को भी अपने जिंदा रहने के लिए तरह-तरह की मशक्कत करने की नौबत आ खड़ी हुई है। पिछले दिनों नए आईटी कानून के तहत छत्तीसगढ़ सहित बाकी जगहों पर भी नए किस्म से मुकदमे दर्ज होने लगे हैं। लेकिन आज यहाँ पर चर्चा के लायक एक खबर है जो की मीडिया के बहुत से लोगों का दिल दहला सकती है, और मीडिया के मारे लोगों का हौसला बढ़ा सकती है।
अंग्रेजी के एक बड़े समाचार चैनल टाईम्स नाऊ में कुछ अरसा पहले करोड़ों के प्रोविडेंट फंड घोटाले की एक रिपोर्ट प्रसारित हुई थी। इसमें आरोपी की जगह उसी से मिलते-जुलते नाम वाले एक दूसरे आदमी की फोटो 15 सेकंड तक समाचार बुलेटिन के परदे पर आई। यह तस्वीर थी सुप्रीम कोर्ट में जज रहे पी.बी. सावंत की। नाराज सावंत ने इस चैनल पर मानहानि का मुकदमा कर दिया। पुणे की अदालत ने इस मामले में टाईम्स नाऊ के खिलाफ 100 करोड़ के हर्जाने का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ जब यह समाचार चैनल मुंबई हाईकोर्ट गया तो हाईकोर्ट ने सुनवाई करने के पहले ही इस चैनल को नगद और बैंक गारंटी की शक्ल में 100 करोड़ जमा करने का हुक्म दिया। इसके खिलाफ जब चैनल सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां भी हाईकोर्ट का आदेश कायम रहा कि चैनल अपील के पहले इतनी रकम और गारंटी जमा करे। यह ठीक है कि मामला सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके एक व्यक्ति का था और यह चैनल देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाईम्स ऑफ इंडिया का है, इसलिए जुर्माना या हर्जाना उसी पैमाने का रहा, लेकिन यह समझ लेने की जरूरत है कि बिना किसी इरादे के ऐसा अपमान हो जाने के बाद कानून का रूख कैसा हो सकता है। 15 सेकंड गलत तस्वीर दिखाने के बाद इस चैनल ने 5 दिन तक माफी प्रसारित की और अपनी गलती के लिए सावंत से भी माफी माँगी।
आज सुबह जब दिल्ली के टाईम्स ऑफ इंडिया में यह पूरी खबर छपी है, तो इसी अखबार के पहले पन्ने पर फिर एक गलत तस्वीर के लिए माफी छपी है, एक ही नाम वाले दो लोगों की तस्वीर में गलतफहमी से गलत की तस्वीर छप गई। उससे मीडिया के तकरीबन पूरे हिस्से को सबक लेने की जरूरत है। ऐसी गलती कौन नहीं कर बैठता? पल-पल के चैनल की बात बात छोड़ ही दें, दिन में एक बार छपने वाले अखबार भी ऐसी गलती कर बैठते हैं। लेकिन इस किस्म का जुर्माना भला कौन दे सकता है? और हम तो मीडिया के उस हिस्से की सोच रहे हैं जो रात दिन लोगों के खिलाफ दुर्भावना से सच और झूठ छापते रहता है, टीवी पर दिखाते रहता है। उसके खिलाफ अगर लोग हौसला करके और जहमत उठाकर अदालत जाने लगें तो क्या होगा? और जिसके खिलाफ पूरी दुर्भावना से अभियान छेड़ा जाता है, वह अदालत क्यों ना जाए?
हमारा ख्याल है कि जस्टिस सावंत के मामले में अदालत का फैसला बहुत ही कड़ा है और शायद आगे की अदालत में यह ना टिके और खारिज हो जाए बहुत मामूली मुआवजे के साथ। लेकिन आज अगर ऊपर सी अदालत में सुनवाई के भी पहले इस चैनल को 100 करोड़ का इंतजाम करना है, तो यह तो भयानक बात है ही। इस मामले का चाहे जो भी हो, हम बाकी मीडिया के बारे में सोच रहे हैं, कि उसे कितना सावधान रहने की जरूरत है, दूसरी तरफ मीडिया के शिकार लोगों को इससे एक रास्ता भी मिलता है कि वे भी जस्टिस सावंत की राह पर जा सकते हैं। अगर मीडिया के बाकी मारों को भी इसी पैमाने से राहत मिलने लगे तो मीडिया का दीवाला 2-4 मामलों में ही निकल जाएगा। और अगर ऐसे कुछ मामलों से बाकी मीडिया की साजिशें खत्म  हो जाती हैं, तो उसमें क्या बुराई है? याद रखें कि जस्टिस सावंत के साथ तो एक चूक के चलते उनकी फोटो किसी और के जुर्म के समाचार के साथ निहायत ही गलती से कुछ सेकंड के लिए परदे पर चली गई थी। अब जो लोग सोच समझकर किसी के खिलाफ झूठ छापते हैं, उनके बारे में भी अदालतें ऐसी ही कड़क हो जाएं, तो चार मामलों के बाद ही मीडिया की बदनीयत ख़त्म हो जाएगी। और हम इसे बहुत बुरा भी नहीं कहेंगे।

देश में कांग्रेस पार्टी को राजकुमार कॉलेज की जरूरत

संपादकीय
15 नवंबर
कांग्रेस के भविष्य राहुल गाँधी ने कल उत्तर प्रदेश की अपनी बड़ी चुनावी सभा में जिस जुबान में अपना भाषण दिया उससे इस देश में कांग्रेस की राजनीति को लेकर और देश के लोकतंत्र को लेकर एक गहरी फिक्र खड़ी होती है। ना तो देश के लोगों को कोई कांग्रेस को वोते देने से रोक सकता, और ना ही बाकी बहुत से दलों को कांग्रेस से गठबंधन करने से। ऐसे में अगर कांग्रेस की अगुवाई वाली अगली केंद्रीय सरकार भी बनता है, तो उसे कौन रोक सकता है? लेकिन ऐसी हालत में कांग्रेस के अगले नेता को देखकर फिक्र होती है। राहुल गाँधी चालीस की उम्र पार कर चुके हैं। पिछले कई बरसों से वे कांग्रेस, संसद और केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश की राजनीति कर रहे हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह की देख-रेख में चल रही राहुल की ट्रेनिंग का अगर यह हाल है, तो ऐसे प्रधानमंत्री के चलते देश का क्या हाल होगा? राहुल गाँधी की जिस सभा को लेकर उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान की शुरुआत कहा जा रहा था, उस सभा के राहुल गाँधी के लम्बे भाषण का अगर यह हाल है, तो फिर देश का उनकी लीडरशिप में क्या हाल होगा?
राहुल गांधी के चेहरे-मोहरे और उनके कुनबे, उनके लहू और उनके डीएनए पर जो लोग भी फि़दा हों, क्या कोई समझदार हिन्दुस्तानी राहुल की बातों पर फि़दा हो सकता है? उनकी तमाम बातें, मुंह से बहुत मुश्किल से निकलती लगती हैं, और वे ना उनके दिल से निकलती लगती और न दिमाग से निकलती। ऐसे में उनकी राजनीतिक समझ महज नारों तक सीमित लगती है, और हर बार वे कोई न कोई ऐसी बात कह जाते हैं कि जिसके बारे में लगता है कि वह उनके, और कांग्रेस पार्टी के लिए आत्मघाती बातें हैं। अभी बैठे-ठाले उन्होंने जिस तरह उतर प्रदेश से बाहर जाने वाले लोगों को लेकर भीख मांगने को लेकर जो कहा, उससे उद्धव ठाकरे जैसों को भी राहुल पर हमला करने का मौका मिल गया कि राहुल गांधी में समझ में कमी है। यूपी के हालात के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। नेहरू, इंदिरा, राजीव सोनिया और राहुल सभी उप्र से ही संासद रहे हैं। इसलिए यूपी की बदहाली के लिए गांधी परिवार ही जिम्मेदार है।
उत्तर प्रदेश को देखें तो लगता है कि राहुल गाँधी की याद करके कही गई नारों से भरी अर्थहीन बातों के मुकाबले खुलकर पढ़कर बोलने वाली मायावती की बातें अधिक अक्ल की हैं।
लेकिन हम आज पूरी जगह राहुल पर बर्बाद करना नहीं चाहते। हमें हैरानी होती है कि कांग्रेस या भाजपा जैसी बड़ी पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं-नेताओं के लिए ट्रेनिंग का इंतजाम क्यों नहीं करतीं? हमारा मानना है कि जिस तरह गुजरात के आनंद में ग्रामीण विकास के मैनेजमेंट की पढ़ाई होती है, उस तरह राजनीति, पार्टी, चुनाव, चुनाव-क्षेत्र के मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए कोई कॉलेज शुरू क्यों नहीं किए जाते? ना तो पार्टियां ऐसा करते दिखतीं, ना ही कोई सरकार या राज्य। और नतीजा यह है कि लीडरशिप में आने वाले लोग देश, प्रदेश या अपने वार्ड की सेवा करने के बजाय जेल जा रहे हैं, और बहुत से लोग उस राह पर हैं। एक नतीजा यह भी है देश की जनता की कमाई, उसके हक़ रात-दिन लुटे जा रहे हैं, और विपक्ष में बीते लोग भी उसको पकड़ नहीं पा रहे, रोक नहीं पा रहे। अगर इस देश में बहुत से गैरजरूरी, बेमायने पाठ्यक्रमों के बजाय इस किस्म की पढ़ाई करवाई जाती तो सत्ता से लेकर विपक्ष तक की राजनीति में बेहतर लोग मिलते।
आज इस देश में सिर्फ वामपंथी पार्टियों के लोग राजनीतिक परिपक्वता के साथ आते हैं और यही वजह है कि वे बेहतर नेता, कार्यकर्ता, और ईमानदार भी, साबित होते हैं। कांग्रेस के भीतर अब अक्ल, नीति, सिद्धांत, और जनसमझ वाले लोग कम होते जा रहे हैं, और महज चापलूस लोग हावी होते जा रहे हैं। क्या कांग्रेस अपने इस युवराज की ट्रेनिंग के नाम पर ही कोई कॉलेज शुरू कर सकती है? छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सौ से भी अधिक बरस पहले देश के उस वक्त के राजे-रजवाड़ों ने मिलकर एक स्कूल शुरू किया था, राजकुमार कॉलेज। यह था तो स्कूल, आज भी स्कूल है, लेकिन चूँकि इसमें राजकुमारों को पढऩा था इसलिए इसे कॉलेज नाम दे दिया गया था। इसमें उस वक्त के बिगड़ैल राजकुमार पढ़ा करते थे। एक दूसरी किस्म के कॉलेज अभी मुंबई में चलते हंै जिनमें कारखानेदार कुनबों के बच्चों को पढ़ाने के लिए ऐसे पाठ्यक्रम बनाए गए हैं, जो उनके चिरागों को उनके कारोबार के साइज़ की पढ़ाई दे सके। कांग्रेस को आज ऐसी बहुत जरूरत है। कम लिखे को अधिक समझें।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
14 नवम्बर
आप टीवी देखने में रोज कितना वक्त लगाते हैं? हिसाब कीजिए। और फिर सोने-नहाने-कमाने-खाने के समय को चौबीस घंटों में से घटा दें। और सोचें कि अपनी जिंदगी के खाली वक्त का आधा-चौथाई हिस्सा कितने अच्छे या कितने कूड़े पर खर्च कर रहे हैं।

बेची जाती बालदेह पर भी होगी चर्चा?

14 सितंबर 2011
संपादकीय

नेहरू के जन्मदिन पर मनाए जाने वाले बालदिवस पर आज नेहरू की पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार की ओर से बड़े-बड़े इश्तहार जारी किए गए जिनमें नेहरू की कही बातें छपी हैं। ये बातें और बच्चों के साथ नेहरू की तस्वीरें देश को एक बार और बुरी तरह यह याद दिलाती हैं कि बच्चों की क्या दुर्गति है। हम आज यहां किसी और मुद्दे पर लिखने का सोचते कि उसके पहले हमारे छायाकार की आज सुबह की खींची एक तस्वीर सामने आई जिसमें छोटे-छोटे बच्चे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शराब की खाली बोतलों को इक_ा करके उनके बदले आईसक्रीम पा रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर याद आया कि पहले भी हम इसी शहर में ऐसी तस्वीरें छाप चुके हैं जिनमें सड़क के किनारे शराब पीते बैठे लोगों के आसपास ही बच्चे बैठकर बोतल की आखिरी बूंद खाली हो जाने की राह देख रहे हैं ताकि उन बोतलों को उठाकर ले जाकर वे बेच सकें और अपने लिए या अपने घर के लिए रोटी जुटा सकें। आज ही के अखबार में हम एक रिपोर्ट छाप रहे हैं कि किस तरह मजदूर बच्चों के लिए सरकार द्वारा चलाई जाने वाली श्रमिक स्कूलों में बच्चे पढ़ रहे हैं या कुछ काम सीख रहे हैं। आजादी की पौन सदी करीब है और इस देश में सरकारें मजदूर बच्चों के लिए स्कूलें चला रही हैं! इससे नेहरू के इस देश में बच्चों की हालत का पता लगता है।
बच्चों के साथ ज्यादती के बारे में कई बार हम अपने विचार लिखते हैं और कई बार देश भर से उनके बदहाल पर आई खबरें छापते हैं। लेकिन बच्चों की हालत को सुधारने के लिए सरकारों या संवैधानिक संस्थाओं में बैठे हुए लोग अपनी जिम्मेदारियों समारोहों से शुरू करते हैं और समारोहों पर खत्म कर देते हैं। असली खतरों से देश के जो करोड़ों बच्चे गुजर रहे हैं, वे ऐसे समारोहों के अहातों के भी बाहर हैं, और जैसा कि हमने यहां पर लिखना शुरू किया है, वे शराब ठेकों के अहातों के इर्दगिर्द हैं। वे सर्द रातों के फुटपाथों पर हैं, रेलवे स्टेशनों पर, रेल गाडिय़ों में, अपनी नौकरी की होटलों और चाय ठेलों की भट्ठियों के आसपास सोए हैं, कहीं झाडू लगा रहे हैं, कहीं कारखानों और बस-टैक्सियों में काम कर रहे हैं और अनगिनत बड़े-बड़े घरों में छोटे-छोटे बच्चों को थामने से लेकर बड़े-बड़े बर्तनों को मांजने तक का काम कर रहे हैं। जिन लोगों का दिल इतना पढ़कर ही हिल गया हो, उन्हें यह बताना थोड़ा सा राक्षसी होगा कि किस तरह हर बरस दसियों हजार बच्चे, नाबालिग-कमउम्र बच्चे, इस देश के चकलाघरों में अपनी देह बेचने के लिए बेच दिए जाते हैं। नेहरू का यह देश, धर्म और ईश्वरों से लदा हुआ यह देश, आध्यात्म और संस्कृति के पाखंडी घमंड से सिर तानकर चलता हुआ यह देश ऐसे बच्चों की बात भी करना नहीं चाहता। नतीजा यह है कि खून-पसीना या अपनी देह के कुछ अंगों को बेचकर जो बच्चे बड़े होते हैं, वे इस लोकतंत्र, इस समाज और इन दोनों की हैवानियत के बारे में अपनी सोच पुख्ता करके ही बड़े होते हैं।
बाल दिवस पर क्या आज इस पूरे देश में होने वाले किसी भी समारोह में बच्चों के ऐसे हालात पर खुलकर चर्चा होगी? या फिर नेहरू से शुरू होकर यह चर्चा राहुल पर आकर खत्म हो जाएगी? यह एक अजीब बात है कि आधी सदी से अधिक जिस कांगे्रस ने इस देश पर राज किया है, इस देश के हिंदू और भारतीय मूल्यों की बात करते हुए जिस भाजपा ने देश और प्रदेश पर राज किया है, इन दोनों ही पार्टियों के पास, उनकी सरकारों और उनके नेताओं के पास आज इतना हौसला नहीं है कि फुटपाथ, प्लेटफार्म और चकलाघरों में नोंचे जाते बच्चों के बारे में वे चर्चा भी कर सकें। कांगे्रस के एक बच्चे राहुल के जवाब में भाजपा के पास गांधी नाम और लहू वाला एक दूसरा बच्चा वरूण है। लेकिन इन दोनों से परे देश में दम तोड़ते बचपन पर असल चर्चा, ईमानदार चर्चा इन दोनों पार्टियों ने, या किसी और पार्टी ने भी, किसी बाबा ने, किसी अन्ना ने, किसी श्रीश्री ने की हो तो जरा याद करके देखें? कुछ सामाजिक संगठनों और मीडिया के एक गैरबाजारू हिस्से के समय-समय पर उठाए गए मुद्दों को अगर छोड़ दें तो नेहरू की गोद से उतरे हुए बच्चे बिल्कुल अकेले हैं और उनकी देह को खरीदने वाला यह वयस्क देश बेरोक-टोक नेहरू की पार्टी में है, उस पार्टी का विरोध करने वाली पार्टी में है, बाजार और सरकार पर राज करने में है, और बड़े-बड़े घरों के मकानमालिक की शक्ल में बिजली के बिलों पर उसका नाम दर्ज है। यह एक भयानक हालत है और अब यह चर्चा के भी बाहर है। यह नौबत इस देश को और बाकी दुनिया को एक ऐसी घायल पीढ़ी दे रही है जो कि इस देश के लिए, समाज के लिए किसी तरह से भी जवाबदेह नहीं होगी।

...लइका के संग पैसा पावऔ


14 नवंबर 2011
आजकलसुनील कुमार
हमारी एक साथी संवाददाता एक गांव में गई तो थी एक दूसरी रिपोर्ट बनाने, लेकिन वह अलग-अलग कई तस्वीरें लेकर लौटी और उनमें से एक दीवार पर लिखे एक नारे की थी-
अस्पताल मा जचकी करवाऔ।
लइका के संग पैसा पावऔ।।
सरकार की ओर से अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में जचकी करवाने को बढ़ावा देने के लिए यह नारा लिखा गया है। लेकिन छत्तीसगढ़ी बोली की अपनी साधारण जानकारी से पहली नजर में मुझे यह लगता है कि इस नारे में लइका शब्द का इस्तेमाल लड़के की तरफ इशारा करता है। लेकिन छत्तीसगढ़ी के व्याकरण की अधिक जानकारी न होने से इस बारे में रविशंकर विश्वविद्यालय में भाषा शास्त्र के प्राध्यापक रह चुके डॉ. चित्तरंजन कर से पूछा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी कि यह पुल्लिंग शब्द है। लेकिन बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ी में प्रचलित बोलचाल के आधार पर यह भी कहा कि लइका में लड़का-लड़की सभी शामिल हो जाते हैं। जब मैंने बाल की खाल निकालने के अंदाज में उन्हें कुछ और घेरा तो उन्होंने यह माना कि एक अकेली लड़की के लिए लइका शब्द का इस्तेमाल शायद खटके, और उन्होंने यह वायदा किया कि वे इस बारे में और सोचकर लिखकर देंगे। अभी इस कॉलम को लिखते हुए भी मेरी कोशिश है कि उनका लिखा हुआ हमें मिल जाए तो उसे भी साथ-साथ छापा जा सके।
इसके बाद मैंने छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख संस्कृतिकर्मी लाल राम कुमार सिंह से पूछा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सभी बच्चों के लिए एक साथ लइका शब्द का इस्तेमाल हो सकता है लेकिन उन्होंने भी मेरे खोद-खोदकर पूछने पर यह माना कि किसी एक लड़की का जिक्र करने के लिए लइका शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, जबकि एक लड़के का जिक्र करने के लिए लइका लिखा या बोला जाएगा।
आज जब देश कन्या भू्रण हत्या से जूझ रहा है और आबादी में लड़कियों का अनुपात गिरते चले जा रहा है तब सरकार के एक नारे की भाषा बहुत सोची-समझी होनी चाहिए और वह सिर्फ लड़के को बढ़ावा देने वाली नहीं होनी चाहिए। इस नारे के बारे में छत्तीसगढ़ी को कम समझने वाले कुछ और लोगों से जब मैंने बात की तो वे लइका को लड़का से ही जोड़कर देख पा रहे थे।
इस देश में हिन्दी और अंगे्रजी के अलावा जिस उर्दू जुबान को मैं बोलचाल के नाते कुछ हद तक जानता हूं उन सबमें भाषा इस कदर पुरूषप्रधान और मर्दाना है कि उसमें औरत को या तो आदमी में ही शामिल मान लिया गया है या फिर उसे बहुत ही नीचे दर्जे का महत्वहीन, बेमायने माना गया है। इस बारे में पहले भी कई बार अपने अखबार के संपादकीय में और इस कॉलम में लिखकर भाषा के पुरूषप्रधान अन्याय का विरोध किया गया है, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक-एक नेता के बयान कई-कई बार छापे जा सकते हैं तो समाज के भीतर समानता के साथ किए जा रहे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ भी एक से अधिक बार लिखने में हमें जगह की बर्बादी नहीं लगती।
हिन्दी भाषा की लोकोक्तियां देखें तो उसमें औरत का अपमान करने वाली बातें भरी पड़ी हैं। और हिन्दी का कोई भी शब्दकोश देखें तो उसमें लइका की बराबरी करते हुए ऐसे तमाम शब्द नर के साथ ही बनाए गए हैं जो कि नर और नारी दोनों के लिए होने चाहिए थे। इनमें नरभक्षी, नरकंकाल जैसे अनगिनत शब्द हैं जिनसे यह लगता है कि हिंसक जानवर भी नारी को खाने लायक नहीं मानता और नारी का तो कोई कंकाल भी इसलिए नहीं गिना जाता कि जीते-जी भी उसे मर्द बिना रीढ़ की हड्डी का ही देखना पसंद करते हैं। यह सिलसिला आदमखोर, आदमीयत, आदमकद से होते हुए अंगे्रजी में मैनईटर, मैनपॉवर, वर्कमैन जैसी तमाम बातों पर हावी है। जहां तक मर्दों का बस चला उन्होंने ताकत का पैमाना भी हॉर्सपॉवर बनाया, मानो घोड़ी की ताकत का कहीं इस्तेमाल ही नहीं होता है। और महिला को जगह मिली कुतिया, बिच, सन ऑफ बिच जैसी गालियों में। वहां पर मर्दानगी को गालियों से परे, ताकत और वीरता के लिए पुरूषार्थ जैसा शब्द दिया गया है और औरत को कमजोर बताने के लिए चूडिय़ां पहनने को गाली की तरह मान लिया गया है। एक चुड़ैल से लेकर रंडी और रांड तक की हजार किस्म की गालियां औरत पर ही टिकी हुई हैं और अंगे्रजी, उर्दू में भी मां और बहन पर केंद्रित गालियां लबालब हैं।
हजारों बरस से औरत को पांव तले की धूल मानने वाली भाषाओं और उन भाषाओं के कहावत-मुहावरे बहुत हिंसक हैं, समानता के खिलाफ हैं लेकिन हमारी रग-रग में वे इतने आसानी से भर चुके हैं कि अब राजनीतिक चेतना से परे की महिलाएं भी इस भाषा में कोई अन्याय नहीं देखतीं। छत्तीसगढ़ की विधानसभा की दीवार पर किसी वेद से लेकर पुरूषार्थ के बारे में कुछ लिखा गया है और उसमें किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता। इसी तरह इस देश का प्रधानमंत्री लालकिले से आजादी की सालगिरह के अपने भाषण में एक दर्जन बार जब आम आदमी कहता है, तो भी किसी को इसमें कुछ बुरा नहीं लगता। बार-बार लिखते हुए हम यह सोचते हैं कि इन तमाम बातों को लेकर कोई महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग या अदालत तक जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ होते नहीं दिखता क्योंकि अधिकतर लोग इस असमानता के आदी हो चुके हैं।
हमें भाषा के इस अन्याय में सुप्रीम कोर्ट तक एक जनहित याचिका लेकर जाने का पूरा सामान दिखता है। भाषा की ऐसी तरह-तरह की मिसालें लेकर किसी को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए कि अदालत, सरकार, संसद और मीडिया को ऐसी अन्यायपूर्ण भाषा के इस्तेमाल से रोकना चाहिए। भारत के संविधान में आदमी और औरत को न सिर्फ बराबरी दी गई है बल्कि औरत को हजारों बरस के शोषण और अत्याचार से आजादी दिलाने के लिए कई किस्म के खास अधिकार भी दिए गए हैं और संविधान भारत में महिलाओं के लिए एक अलग नरमी रखता है और जिस अन्याय का जिक्र हम कर रहे हैं उसकी कोई जगह इस संविधान में नहीं है।
लेकिन जिस व्यक्ति को भारत के हिंदू समाज की सोच में मर्यादा पुरूषोत्तम माना जाता है, उस राम ने भी एक सामाजिक मर्यादा को निभाने के लिए अपनी पत्नी सीता के साथ जैसा अन्याय किया था, वैसा ही अन्याय आज भी भारत की महिलाओं के साथ जारी है। दूसरी तरफ राम के बाद आए कृष्ण के युग में सोलह सौ सुंदरियों के साथ एक अकेले कृष्ण की रासलीला पर भी न तो किसी 'धोबीÓ (अयोध्या की तरह) ने कोई सवाल उठाया और न ही बाद के अभी पिछली सदी के दौर में समाज ने महिलाओं को सती बनाने में कोई दिक्कत महसूस की। अब इस सिलसिले का उसी तरह विरोध करने का वक्त आ गया है जिस तरह का विरोध दुनिया के कुछ देशों में वहां के शासकों के खिलाफ हो रहा है, भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर है।

छोटी सी बात

छोटी सी बात
13 नवम्बर
त्यौहारों के मौकों पर आने वाले शुभकामना-कार्ड से पते-फोन नंबर नोट किए बिना उन्हें न फेंके। वैसे भी ये कार्ड किताबों के भीतर रखने के लिए बुक-मार्क की तरह इस्तेमाल हो सकते हैं।

सुरक्षा जांच से किसी को भी छूट क्यों?

13 सितंबर 2011
संपादकीय
भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के अमरीका जाने पर वहां एक से अधिक बार उनकी तलाशी ली गई, प्लेन पर भी और एयरपोर्ट पर भी। इस बात का भारत में विरोध हुआ, भारत ने अमरीका से विरोध किया और आज अमरीका ने भारत को चि_ी भेजकर इस घटना के लिए माफी मांगी। लेकिन हमारा मानना है कि इस सिलसिले में कुछ अलग है। न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में भी उन तमाम जगहों पर बैठे हुए लोग तरह-तरह के जुर्म में शामिल पकड़ाए जा चुके हैं जिनकी वजह से उन्हें बिना तलाशी किसी नाजुक जगह पर क्यों आने-जाने दिया जाए, यह सवाल आम इंसानों के मन में उठता है। आज इस देश में जितनी बड़ी संख्या में मंत्री, मुख्यमंत्री, अफसर, कारोबारी, कारखानेदार जेलों में पड़े हैं, वे अगर बिना सुरक्षा जांच किसी विमान में चढऩे दिए जाते हैं तो रोक-टोक वाले किसी सामान को छुपाकर ले जाने का उनका जुर्म तो आज उन पर लगी तोहमतों से कम ही होता। इसलिए किसी के किसी कुर्सी पर चढ़े होने से या उतर जाने के बाद उसे सुरक्षा जांच से किसी तरह की रियायत दी जाए यह बात हमारी समझ से परे है। क्यों दुनिया के तमाम लोगों को ऐसी सुरक्षा जांच के मामले में एक बराबर नहीं रखा जाता जहां पर और लोगों की जिंदगियां भी जुड़ी हुई हैं। यह समझने की जरूरत है कि किसी सार्वजनिक विमान पर या किसी सार्वजनिक जगह पर किसी एक व्यक्ति को महत्वपूर्ण मानकर उसे जांच से छूट देने का मतलब वहां मौजूद बाकी तमाम लोगों के हिफाजत के हक को छीन लेने जैसा भी है। जिस विमान में दूसरे लोग भी सफर कर रहे हों, या जो जनता के पैसों से खरीदा गया विमान हो, उन पर किसी को भी जांच से रियायत क्यों मिलनी चाहिए? कई बार ऐसा भी हो सकता है कि ऐसे रियायती खास लोगों की जानकारी के बिना भी उनके कपड़ों में या सामान में कोई दूसरे लोग साजिश के तहत कोई खतरनाक सामान डाल दें।
और भारत का इतिहास तो कुछ और बातों का गवाह भी है। दो-दो साजिशों के तहत अपने दो-दो प्रधानमंत्रियों और पार्टी अध्यक्षों को खोने वाली कांगे्रस पार्टी ने एक विमान अपहरणकर्ता को अपनी पार्टी का टिकट देकर सांसद या विधायक बनवाया था क्योंकि उसने शायद इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के खिलाफ यह विमान अपहरण किया था। ऐसे में दूसरे लोग सुरक्षा जांच से बचने के बाद ऐसी महानता का दर्जा पाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते?
सुरक्षा जांच से छूट की मांग हमारे हिसाब से एक झूठा अहंकार है और एक महत्वोन्मादी तबके के लिए बनाई गई चापलूस व्यवस्था है। गैरबराबरी का यह इंतजाम पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति की सुरक्षा जांच होती है, उसके खुद के भले के लिए वह एक जरूरी इंतजाम होता है। आज किसी के कपड़ों या जूतों में कोई सामान भरकर कोई तस्करी करे और दूसरे देश जाकर फिल्मी अंदाज में उनके सामानों से वह प्रतिबंधित सामान निकाल ले, तो इसकी क्या रोक-टोक जांच में छूट के साथ-साथ मुमकिन है? फिर हमने भारत के विमानतलों पर और दूसरी जगहों पर महत्वपूर्ण समझे जाने वाले ऐसे तबके के लिए आम लोगों की नजरों में नफरत को बार-बार देखा है। किसी और को जांच से छूट देकर दूसरों की जान को खतरे में डालना, उन दूसरों को कैसे अच्छा लग सकता है? यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए और जो डॉ. कलाम अपनी सादगी के लिए अपने पूरे कार्यकाल में जाने जाते थे, उन्हें खुद होकर यह जिद करनी चाहिए कि वे भी आम इंसानों की तरह हर सुरक्षा जांच से होकर गुजरेंगे। अपनी जिंदगी में पाखंड से कोसों दूर रहने वाले डॉ. कलाम अगर यह काम नहीं करेंगे तो फिर ऊंची कुर्सियों पर बैठने वाले बहुत छोटे व्यक्तित्व के अहंकारी लोग कहां से सामाजिक प्रतिष्ठा के बाहुबल के ऐसे प्रदर्शन का लालच छोड़ पाएंगे? हमने राजनीति और भारत में खास दर्जा प्राप्त दूसरी जगहों पर इक्का-दुक्का ही लोग ऐसे देखे हैं जो साधारण इंसानों की तरह रहना पसंद करते हैं और बिना लाल-पीली बत्ती के, बिना सायरन और शक्ति प्रदर्शन के जीते हैं और चलते हैं। गांधी अगर चाहते तो अंगे्रज हुकूमत उन्हें लालबत्ती और सायरन लगी हुई गाडिय़ों का पूरा काफिला ही दे देती। लेकिन उसके बाद उनके महान या महात्मा बनने की गुंजाइश खत्म हो जाती। डॉ. कलाम ने इस बात को मुद्दा ही क्यों बनने दिया है यह हमारी समझ से परे है।