सोच पर शौच, और श्रद्धांजलि


30 जनवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार

गांधी की हत्या को आज एक और बरस पूरा हुआ। देश की आजादी के आधे बरस के भीतर ही जिस तरह से गांधी को मारा गया था, उस हत्या के दिन को गांधी की पुण्यतिथि का नाम देकर उस हत्यारी सोच को हल्का करने का काम भारत का समाज करता है। गांधी को मारने के जिम्मेदार कुछ लोगों को सजा हो गई, कुछ लोग उसमें से बच भी गए होंगे जैसा कि भारत के किसी भी दूसरे अदालती मामले में होता है, लेकिन गोलियों से छलनी उस शरीर को जन्मतिथि और पुण्यतिथि के चबूतरों पर चढ़ाकर रख देना दरअसल उस सोच पर शौच कर देने सरीखा है। भारत ऐसा काम इसलिए करता है क्योंकि चबूतरों पर सालाना माला आसान होती है, सोच पर अमल नामुमकिन सा काम होता है। एक हत्या को हत्या शब्द के साथ जोड़कर जब तक नहीं देखा जाएगा तब तक आज भी जिंदा गांधी की सोच एक जिंदा सोच न रहकर इतिहास के एक दस्तावेज सरीखी रह जाएगी। इसलिए पुण्यतिथि जैसे शब्द फिजूल हैं और गांधी को उनकी हाथ की बनी खादी, उनकी हाथ की बनी चप्पल और उनके फटे पैरों की तरह खुरदुरे तरीके से ही याद करना चाहिए। 
भारत, यहां का लोकतंत्र और यहां की संस्थाएं, इस कदर बेईमानी से भरे हुए हैं कि गांधी की सोच के ठीक खिलाफ काम करते हुए भी वे गांधी के नाम का नगदीकरण रात-दिन करते हैं। हत्यारे और उनके पीछे के संगठन, उनके पीछे की विचारधारा तो ठीक है, वह तो खुलकर हत्यारी है ही, उसने बस बेईमानी इतनी की है कि गांधी का नाम अपनी वल्दियत में लिखना शुरू कर दिया है, लेकिन अधिक बेईमानी तो गांधी के उन वारिसों की है जो कि गांधी का नाम लेकर पलते आए हैं, देश को आज लूट रहे हैं, और आजादी की लड़ाई, गांधी को अपनी खानदानी विरासत बताते हैं। 
आज अगर कोई अखबारनवीस गांधी से बातचीत कर पाता तो शायद वे यही कहते कि वे ऐसे राष्ट्र के पिता बनने को तैयार नहीं हैं जहां पर आधी से अधिक आबादी को पेट भर खाना नसीब नहीं है, जो गरीबी की रेखा के नीचे है, जहां सत्ता पर अवैध कब्जा करने वाले लोग हर किस्म के जुर्म में भागीदार हैं, और बात-बात में ये तमाम अपराधी गांधी की कसमें भी खाते हैं। ऐसे राष्ट्र का पिता बनना कौन चाहेगा? 
गांधी ने अपनी आलऔलाद के लिए अपनी कोई विरासत नहीं छोड़ी। उन्होंने जो छोड़ा, अपने देश के लिए छोड़ा, और जिसे वे सबसे गरीब पाते थे, उस सबसे कमजोर दरिद्रनारायण के लिए छोड़ा। लेकिन आज उन बड़े नोटों पर गांधी की तस्वीर छापकर सत्ता पर काबिज लोग दो नंबरी कारोबार में उनका इस्तेमाल करते हैं, संसद में कोठों की तरह बिकने वाले और खरीदने वाले सांसद, संसद के अहाते में गांधी को बिठाकर अपनी इज्जत बढ़वाते हैं। क्यों गांधी चाहेंगे ऐसे राष्ट्र का पिता बनना? नेहरू जैसे जो लोग उनकी औलाद बनने के हकदार थे, वैसे नेहरूओं की अपनी औलादें आज नेहरू की औलादें बनने के लायक नहीं हैं, हकदार नहीं हैं, ऐसे में गांधी क्यों अपना नाम इन लोगों को देना चाहेंगे? 
और इससे परे भी सच तो यह है कि इस देश के नाम से अलग-अलग तबकों के जिन भी नामी-गिरामी लोगों का नाम जुड़ा हुआ है, वे तमाम लोग उस पूरी सोच पर रोज सुबह सोच-समझकर शौच करते हैं जो कि गांधी ने इस देश के लिए खुद अमल करके सामने रखी थी। देश के तमाम ताकतवर तबके, तबकों के रूप में कमजोर तबकों के हक लूटने में लगे हैं, और कोई गांधी की तस्वीरें टांगकर रखते हैं तो कोई उनकी प्रतिमाओं को लगवाकर अपने नाम की वाहवाही करवाते हैं। जब भारतीय लोकतंत्र के ताकतवर लोग गांधी का नाम जपते हुए उनकी तारीफ करते हैं, तब इटली के सिसिली इलाके के वे माफिया डॉन याद पड़ते हैं जो कि जुर्म की बादशाहत के साथ-साथ ईसा मसीह का नाम लेते हुए चर्च भी जाते हैं। या जिस तरह मुंबई का मस्तान नाम का डॉन हज भी जाता है। 
जिस तरह एक नामौजूद ईश्वर का कोई भला ऐसे भक्तों से नहीं होता, उसी तरह गांधी का कोई भला आज के उनके नामलेवा लोगों से नहीं हो रहा। जिस तरह ऊनी कपड़ों को बिना पानी के धुलाई करने वाली लॉन्ड्री में साल में एक-दो बार धुलवा लिया जाता है, उसी तरह साल में दो बार गांधी, दो बार लोकतंत्र और संविधान, दो-चार बार देश के लिए शहादत और बलिदान की बात कर ली जाती है और हर कोई  टमाटर सॉस माथे पर लगाकर शहीदों में नाम लिखा आता है।
यह सिलसिला पूरी तरह फर्जी, फरेबी और गांधी-विरोधी है। गांधी की सोच, सोच पर अमल करके दुनिया के सामने एक मिसाल रखने की थी। दुनिया के सामने ठीक उल्टी मिसाल रखने वाले, गांधी के तन और उनके मन को मारने वाले अलग-अलग गिरोह अगर उनकी तस्वीरों को लेकर, माला चढ़ाकर अपनी वाहवाही पाते हैं, तो गांधी की हत्या वाला यह सालाना दिन किसी धर्म की जुबान की तरह पुण्यतिथि कहकर खत्म कर दिया जाता है। 
यह सिलसिला बंद होना चाहिए। भारत के भीतर एक आवाज ऐसी खड़ी होनी चाहिए कि जो लोग सोच-समझकर, साजिश के तहत, अपनी किन्हीं जरूरतों से परे जाकर, सबसे कमजोर के हक लूटते हुए जब गांधी की सोच का कत्ल करते हैं, तो कम से कम उस सोच के लहू को अपने माथे पर लगाते हुए उन्हें शहीद बनने का हक न मिले। देश के भीतर एक ऐसे आंदोलन की जरूरत है जो लोगों को गांधी के बुतों वाले चबूतरों से दूर रखे, और किसी कानून के तहत ऐसा नहीं हो सकता इसलिए एक प्रतीकात्मक विरोध की तरह इन चबूतरों पर पहुंचने वाले लोगों के सामने कम से कम कोई बैनर-पोस्टर लेकर खड़े तो हों। 
यह कैसे त्रासदी है, और कैसा विरोधाभास-भरा दिन है कि जब गांधी के सम्मान के नाम पर सुबह से शाम तक उनका अपमान किया जाएगा!

जाति और धर्म से रंगे ये चुनाव कहां ले जाएंगे?


30 जनवरी 2012
संपादकीय
उत्तरप्रदेश से लेकर पंजाब तक जिस तरह से मुसलमान वोटों और सिख वोटों को लेकर धार्मिक संगठन चुनाव में दखल दे रहे हैं, और सारी जगहों पर जाति के आधार पर जिस तरह से वोटों का गणित बैठाया जा रहा है, वह बहुत भयानक हालत है। कल ही हमने इसी जगह पर चुनावों को लेकर पैसों और अपराध की दखल की चर्चा की थी जो कि भारत के लोकतंत्र को लेकर एक बहुत निराशा पैदा करने वाली नौबत बताती है। आज हम धर्म और जाति की बात करने को मजबूर हैं क्योंकि वोटों को जब ऐसे खेमों में बांटकर वोटरों को जानवरों की तरह हांककर किसी को जिताने और किसी को हराने की बात होती है तो वह भारत के लोकतंत्र की धारणा के खिलाफ बात जाती है। आज दिक्कत यह है कि अकाली दल सिख पंथ के नाम पर चुनाव लड़ रहा है, जामा मस्जिद के इमाम समाजवादी पार्टी को वोट देने का फतवा जारी कर रहे हैं, और भाजपा अपने चुनाव अभियान को हिंदू वोटों के धु्रवीकरण के लिए मंदिर के नाम पर चला रही है।
क्या सोचकर और क्या मानकर हम इस लोकतांत्रिक कहे जाने वाले चुनाव को लोकतंत्र मानें? कल की हमारी बातों को अगर हम दो लाईनों में यहां दुहराएं तो करोड़पतियों और अरबपतियों का सैलाब एक सुनामी लहर की तरह लोकतंत्र की भावना को बहाकर गहरे समंदर में ले जाकर फेंक चुका है। फिर मानो वह अपने-आपमें काफी न हो, तो अब धर्म और जाति के फतवे बचे-खुचे लोकतंत्र को नाली में बहाने पर आमादा हैं। यह सिलसिला इस लोकतंत्र को महान तो क्या बनाएगा, यह इसे महानता से दूर ही दूर, और अधिक दूर बहाकर ले जा रहा है। फिर अगर कोई यह सोचता है कि साक्षरता और शिक्षा से लोकतंत्र का कुछ भला हो रहा है, तो वह बात भी बिल्कुल नहीं है। देश के सबसे बड़े महानगर मुंबई में जिस तरह से पूरी तरह धर्मान्ध और साम्प्रदायिक शिवसेना की जमीन बनी हुई है, उसे क्या कहेंगे? हमारा यह देखा हुआ है कि पढ़े-लिखे लोग किसी भी तरह से कम धर्मान्ध हों, कम जातिवादी हों या कम साम्प्रदायिक हों ऐसा कोई सुबूत कहीं नहीं है। इसलिए भारत का औद्योगिक और आर्थिक विकास देश से इन बुराईयों को कम कर रहा हो ऐसा बिल्कुल नहीं हो रहा है। जैसे-जैसे राजनीतिक दलों में नई पीढ़ी आ रही है, पढ़े-लिखे लोग बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे उनमें खामियां बढ़ते दिख रही हैं, या कम से कम पहले की तरह कायम तो हैं ही।
देश किस तरह से धर्म और जाति के दखल से चुनावों को अलग कर सकेगा यह सोचना भी नामुमकिन सा लगता है। बहुत से लोगों को यह भी लगता होगा कि यह चर्चा ही फिजूल की है और ऐसी बातचीत से कोई भी फर्क नहीं आने वाला है। लेकिन हमारा मानना है कि लोकतंत्र में कोई भी फर्क बातचीत से ही शुरू होता है और उसी से वह किसी किनारे तक पहुंचता है। भारत के चुनावों की और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहुत सी खामियों का एक आसान सा जवाब नक्सल हिंसा जैसे तरीकों में कुछ लोग देखते हैं। लेकिन हमारा मानना है कि लोकतंत्र चाहे कितना ही बुरा क्यों न हो, नक्सली हिंसा जैसी अराजक सोच कभी इसका विकल्प नहीं बन सकती। लेकिन जब लोकतंत्र नाकामयाब होते दिखता है तो फिर लोगों को यह लगने लगता है कि अंगे्रजों का जमाना इससे बेहतर था, फौज इससे बेहतर होगी, और फिर कुछ लोगों को यह जरूर लगता है कि नक्सली इस लोकतंत्र से बेहतर हैं। ऐसी नौबत आगे न बढ़े इसके लिए जरूरी है कि अच्छे लोग चुनाव लडऩे के लिए सामने आएं, चुनाव की बुराईयों को खत्म करने के लिए सामने आएं, और अन्ना-बाबा-श्रीश्री की तरह एक पक्षपाती अभियान चलाने के बजाए सिर्फ अच्छाई और बुराई को लेकर जनता के बीच जागरूकता खड़ी करें।

छोटे राज्य के छोटे-छोटे जिले


28 जनवरी 2012
संपादकीय
नौ जिलों के उद्घाटन के साथ ही प्रदेश में 27 जिले अस्तित्व में आ गए हैं और सभी नए जिलों में कामकाज शुरू हो गया है। छोटे राज्यों और छोटे जिलों के हम हमेशा हिमायती रहे हैं। हमारा यह अनुभव रहा है कि प्रशासनिक ढांचे के विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ सरकार चौकन्ना होकर काम करती है, क्योंकि अधिकारियों और सत्ता के दूसरे जिम्मेदार लोगों की जिम्मेदारियां छोटी जगह पर केंद्रित रहती हैं और उनका किया अच्छा या बुरा काम खुलकर सामने दिखता है। इस जिम्मेदारी का बहुत बड़ा फायदा राज्य की जनता को मिलता है। सन् 2000 में जो तीन राज्य बने उसमें छत्तीसगढ़ ने यह साबित किया कि वह विकास के मामले में बाकी राज्यों से कहीं आगे है। बाकी के दो राज्यों में न तो ऐसी राजनीतिक स्थिरता है और न ही ऐसा विकास हो रहा है। राज्य के अस्तित्व में आने के साथ ही छत्तीसगढ़ के लोगों को ऐसा फायदा मिला जो भोपाल में सरकार के रहते कभी नहीं मिल सकता था। चाहे बिजली के मामले में हो, सिंचाई या सड़क के मामले में राज्य  के साथ हमेशा भेदभाव होता था। इन क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ काफी पिछड़ा हुआ था। बड़े राज्य होने और छत्तीसगढ़ के, राजधानी भोपाल से दूर होने का नुकसान आधी सदी तक इस क्षेत्र को उठाना पड़ा। इसी तरह बड़े जिलों के बारे में भी हमारा यही मानना है। चाहे रायपुर से पौने 2 सौ किलोमीटर दूर सरायपाली हो या सवा 2 सौ किलोमीटर दूर देवभोग वहां के लोगों को हर छोटे-मोटे काम के लिए रायपुर आना तकलीफदेह रहता था। प्रशासनिक नियंत्रण भी नहीं रहता था। कलेक्टर इन क्षेत्रों के दौरे पर जाते थे तो उन्हेें वापस लौटने में दो दिन लग जाते थे। केंद्र और राज्य सरकारों की इतनी योजनाएं और विकास कार्यक्रम चल रहे हैं जिन पर निगरानी और काबू दूर के जिला मुख्यालयों से ठीक से नहीं हो सकता है। अलग जिले बनने के बाद छोटी-छोटी जिला ईकाईयों की उत्पादकता बढ़ती है तो इन जिलों पर होने वाले प्रशासनिक व्यय के मुकाबले यह कुछ भी नहीं है। जब एक-एक जिले में सैकड़ों करोड़ के काम महीनों तक लेट होते हैं, या उनमें भ्रष्टाचार इस वजह से भी होता है कि जिला स्तर के अधिकारियों के पास निगरानी का समय नहीं है,  तो गड़बड़ी का कम से कम यह हिस्सा तो छोटे जिलों के बनने से कम हो सकता है।
छोटे राज्यों और छोटे जिलों की तरह हम छोटे-छोटे विभागों के भी हिमायती हैं। राज्यों में मंत्रियों की संख्या सीमित करना भी ठीक नहीं है। एक-एक मंत्री के पास कई-कई विभाग होंं और उनकी निगरानी भी वे ठीक से न कर पाएं तो ऐसी संख्या सीमित करने का कोई मतलब नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में तो एक-एक मंत्री के पास तीन-तीन, चार-चार विभाग हैं। मंत्रियों के लिए इतने सारे दायित्वों को संभालना और विभागीय योजनाओं की ठीक से निगरानी करना कठिन होता है। यह तर्क दिया जाता है कि मंत्रियों की संख्या सीमित रहने से प्रशासनिक खर्च बचेगा। लेकिन देखा जाए तो हर विभाग के दो हजार, तीन हजार करोड़ के बजट में मंत्रियों पर होने वाला कुल खर्च सालाना 5-7 लाख से ज्यादा नहीं होता। सरकार जिनको लालबत्ती बांटना चाहती है वह उसके लिए आज भी रास्ता निकाल लेती है। इसीलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि छोटी इकाइयां अधिक उत्पादक और जन कल्याणकारी रहती हैं।  और देश भर में मंत्रियों की संख्या के बारे में लागू किया गया यह नियम जनता को इस झांसे में तो रखता है कि इससे सरकारी खर्च में बचत हो रही है, लेकिन इससे उत्पादकता में कितना नुकसान हो रहा है, जनता के काम कितने लेट हो रहे हैं, उसके महंगे पडऩे का अंदाज आंकड़ों में नहीं लग सकता है, इसलिए नहीं लगाया जाता है।
हर जगह अस्पताल न रहे और सबको इलाज कराने दिल्ली के एम्स जाने पड़े तो जिस तरह दिक्कत होगी उसी तरह की दिक्कत प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण न होने से होती है। इसीलिए केंद्र सरकार को दिल्ली के एम्स जैसे अस्पताल 6 और राज्यों में खोलने पड़ रहे हैं ताकि अच्छे इलाज के लिए देश के दूर-दराज के राज्यों से लोगों को दिल्ली न आना पड़े और वहीं पर उनका इलाज हो सके। जहां तक भ्रष्टाचार और नालायकी की बात है तो वह बड़े राज्य में भी है और छोटे राज्य में भी। बड़े जिलोंं में भी इस तरह की शिकायत सामने आती थी और छोटे जिलोंं में भी इस तरह की शिकायत आ सकती है। लेकिन जहां तक प्रशासनिक व्यवस्था का विकल्प है, छत्तीसगढ़ ने इस दिशा में यह एक अच्छा काम किया है। जिलों की संख्या बढऩे से लोगों को सरकारी काम अपने घर के कुछ करीब मिलेगा। छोटे-छोटे कामों के लिए एक-एक, दो-दो दिन का समय बर्बाद नहीं होगा। वे एक ही दिन में अपना काम कराकर अपने घर वापस लौट सकेंगे। 
नए जिलों के उद्घाटन के दौरान नक्सल प्रभावित सुकमा, कोंटा से लेकर बलरामपुर, सूरजपुर और बालोद, बेमेतरा से लेकर मुंगेली और बलौदाबाजार में लोगों की जिस तरह भीड़ उमड़ी वह भी इस बात की ओर इशारा करती है कि सस्ता सुलभ सरकारी काम पाने की उम्मीद से उनमें खुशी है, लेकिन यह खुशी बहुत सी उम्मीदों के साथ भी है और इनको पूरा करना मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार के लिए नए जिले बनाने के मुकाबले कई गुना अधिक कड़ा काम होगा। लोग दूर-दूराज के जिला मुख्यालयों में जाकर परेशान थे। जिस तरह बिना किसी बड़े आंदोलन के छत्तीसगढ़ राज्य बना, उसी तरह बिना आंदोलन के 9 जिले बन गए। घोषणा पत्र में किए वादे को पूरा करते हुए डॉ. रमन सिंह ने पहले दो और अब 9 नए जिले बना दिए। उनका कहना है कि हर स्तर पर शासन-प्रशासन को जनजीवन तक पहुंचाने के लिए उनकी सरकार ने यह अभियान छेड़ा है। पूर्व में कुछ जिलों के लिए जरूर आंदोलन हुए थे, लेकिन अचानक इतने नए जिले बनने की उम्मीद उन जिलों के निवासियों को भी नहीं थी। हम यह उम्मीद भी करते हैं कि विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ प्रशासन में पूरी तरह कसावट भी होगी और लोगों का काम आसानी से होगा। आने वाला वक्त बताएगा कि  इन नए जिलों पर होने वाला खर्च उससे हजारों गुना अधिक बचत करके, और लोगों की उम्मीद और जरूरत को पूरा करके कामयाब होता है या नहीं। अगले विधानसभा चुनाव में इन नए जिलों की कामयाबी या नाकामयाबी असर डालेगी यह तय है।

कड़वाहट की कुछ और खबरें


27 जनवरी 2012
संपादकीय
कल जब देश संविधान लागू होने की सालगिरह मना रहा था तब दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में दो बरस की एक ऐसी बच्ची जिंदगी की लड़ाई लड़ रही थी जिसे बुरी तरह पीटा गया था और जिसके बदन पर किसी इंसान द्वारा काटने के निशान भी थे। इस मामले की अभी जांच चल रही है इसलिए हम इसके ज्यादा खुलासे में यहां नहीं जा रहे लेकिन इतना तो तय है ही देश में एक बच्ची की ऐसी हालत हुई है।  दूसरी तरफ बंगाल की खबर है कि वहां पर मालदा सब डिवीजन में सरकारी अस्पताल में बारह घंटों में सात और नवजात बच्चों की मौत हो गई है और पिछले एक हफ्ते में इस अस्पताल में अब तक 39 बच्चे मारे गए हैं, और पिछले बीस दिनों का आंकड़़ा 82 हो चुका है। एक महिला मुख्यमंत्री के राज में लगातार जिस रफ्तार से सरकारी अस्पतालों में नवजात शिशु मारे जा रहे हैं वह बहुत ही तकलीफदेह और नामुमकिन सी बात लगती है लेकिन चूंकि खुद मुख्यमंत्री ने इसके पीछे किसी साजिश की बात नहीं कही है इसलिए हम बैठे-बैठे किसी अपराधकथा जैसी कल्पना करना नहीं चाहते हैं। लेकिन यह बेकाबू हालत फिक्र खड़ी करती है। यह खबर उस दौर में भी आ रही है जब योरप के एक देश में वहां की सरकार ने एक हिन्दुस्तानी मां-बाप से उनके बच्चों को इसलिए अलग कर दिया है क्योंकि वे उस देश के पैमानों पर लालन-पालन ठीक से नहीं कर रहे थे। अब भारत की सरकार वहां की सरकार से बहस कर रही है और बच्चों के मां-बाप अदालत में लगे हुए हैं। इन खबरों के साथ-साथ एक और खबर हमारे सामने है जो बताती है कि 2010 के भारत के आंकड़े अभी दिल्ली में एक साथ जोड़कर देखे गए और उनसे पता लगा कि एक बरस में सवा 8 हजार से अधिक दुल्हनें दहेज हत्या की शिकार हो गई हैं। मतलब यह कि हर घंटे में एक!
तथाकथित मानवीय मूल्यों के पैमानों पर तो यह सिलसिला बहुत भयानक है ही, सरकारों के लिए भी यह बहुत शर्म की बात है कि बच्चे और महिलाएं इस रफ्तार से मारे जा रहे हैं। इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ में मितानिन नाम पाकर गांव-गांव में काम करने वाली स्वास्थ्य कार्यकर्ता को याद करना जरूरी है जिसकी वजह से इस राज्य में शिशु मृत्यु दर खासी गिर गई है और छत्तिसगढिय़ा बच्चे पैदा होते ही मरना कम हो गए हैं। बड़े-बड़े शहरी ढांचों की चकाचौंध को देश का विकास बताने वाले इस हिन्दुस्तान की हालत शर्मनाक है। सिर्फ मौतों के आंकड़े असली हकीकत नहीं बताते और खबरों और सरकारी रिकॉर्ड में आने वाली एक-एक मौत के पीछे शायद हजार-हजार ऐसी जिंदगियां और रहती हैं जो कि तकलीफ से भरी रहती हैं लेकिन चूंकि जिंदा लाश की तरह घिसटती रहती हैं इसलिए वे आंकड़ा नहीं बन पातीं। परिवारों के भीतर बहू की प्रताडऩा से लेकर समाज में बच्चों के कुपोषण तक तमाम हालात ऐसे हैं कि भारत दुनिया के विकसित देशों के मानवीय विकास के पैमानों पर शायद अगले कुछ दशकों में भी नहीं पहुंच पाएगा। 
हम यह सोचकर भी हैरान होते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट देश के रियायती अनाज की योजनाओं को एक स्कूली मास्टर की तरह हाथ में रूल लिए हुए निगरानी न करता होता, वह अगर अपने सहायकों की मदद से देशभर की स्कूलों में दोपहर के खाने पर नजर नहीं रखता, महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण आहार की योजनाओं पर सरकार को आए दिन फटकार नहीं लगाता होता और देश में सड़ रहे अनाज के भंडार को मुफ्त में बांटने के लिए सरकार को मजबूर न करता होता तो जाने इस देश के औरत-बच्चों का क्या हाल होता? चूंकि देश की तमाम औरतें मतदाताओं का एक तबका नहीं है, और वे जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर, क्षेत्र और प्रांत के आधार पर बंटी हुई हैं, इसलिए भारतीय महिला मतदाता नाम का कोई तबका किसी सरकार, किसी राजनीतिक दल, किसी उम्मीदवार के लिए खतरा नहीं लगता। और बच्चे, वे अगर जिंदा बच भी गए तो भी अगले दस-बीस बरस के बाद ही उनके वोटों की नौबत आएगी इसलिए उनकी भी फिक्र करना आज किसी की प्राथमिकता नहीं है। लेकिन 26 जनवरी के मौके पर यह सोच रहे हैं कि सम-विधान नाम का यह संविधान लोगों को किस तरह की समानता दे रहा है? एक तरफ चकाचौंध की जिंदगी पाने वाला बहुत छोटा सा संपन्न तबका देश के अधिकांश साधनों को उसी तरह भोग रहा है जिस तरह दुनिया के अधिकांश साधनों को कुछ गिने-चुने संपन्न देशों के सीमित संख्या वाले लोग भोग रहे हैं। ऐसे में इस संविधान की सालगिरह के मौके पर कुछ कड़वी बातें हमने इस जगह दो दिन पहले ही लिखी हैं, और आज सुबह से औरतों-बच्चों के बारे में आती हुई खबरें हमारे मुंह में और कड़वाहट घोल गई हैं।

कैसे सम-विधान की यह कैसी सालगिरह?


25 जनवरी 2012
संपादकीय
संविधान की सालगिरह, एक और बार आकर खड़ी हो गयी है। जब-जब कोई सालगिरह आती है, लोगों को लगता है कि कौन-कौन सी बातें पिछले बरसों में इस मौके को नाकामयाब करने वाली हो चुकी हैं। देश के एक तबके को आज़ादी की सालगिरह, संविधान की सालगिरह, बरसी की तरह लगती है। अपने को गांधीवादी कहने वाले लोगों से लेकर अपने को माओवादी कहने वाले अनगिनत लोगों तक का कहना है कि हिंदुस्तान का लोकतंत्र बोगस हो चुका है और यह अब महज ताकतवर बाहुबलियों के हाथ का औजार बनकर रह गया है, जो इसे हर पांच बरस में धार करने लोगों के पास ले जाते हैं। लोग हैं कि पांच बरस में धार करके खुश हो लेते हैं, इतने कि फिर अपना गला ही इस धार पर रख देते हंै। इसीलिए हिंदुस्तान के एक समाजवादी नेता ने एक वक्त कहा था कि जि़ंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। लेकिन संविधान है कि इन तमाम जि़ंदा कौमौं को पांच बरस कब्रिस्तान में रहने को कहता है। 
संविधान शब्द की बात करें, तो सम और विधान से मिलकर बना हुआ लगता है। अब सोचें कि क्या इस देश में कानून सबके लिए बराबरी का रह गया है? इस देश की आधी से अधिक, शायद तीन चौथाई,  गरीबी की रेखा के नीचे की आबादी को देखें, तो लगेगा कि वह सबसे ताकतवर एक चौथाई आबादी के मुकाबले शेर की गुफा के बाहर अपनी बारी का इंतज़ार करते खड़े खरगोश की तरह ही है। किस कोने में लोगों को दिखता है कि विधान सम है? समानता के हक़ कहाँ दीखते हैं? सिर्फ भाषणों में? यही वजह है कि जब देश के जंगलों में नक्सली इस सम-विधान को खारिज कर देते हैं, जब इस देश के शहरों में अन्ना-बाबा सरीखे अलोकतांत्रिक लोग सम-विधान को ख़ारिज कर देते हैं, तो बहुत से आम लोग उन्हें मसीहा मान बैठते हैं। लोगों को लगता है कि जब विधान सम नहीं रह गया है, तो विधान की जरूरत क्या है? और फिर चाहे कुछ वक्त के लिए सही, इन लोगों को लोगों की हमदर्दी मिल जाती है। 
दरअसल इस देश में कहीं-कहीं समानता बची हुई भी है। लोगों को समानता का हक वहीं मिला हुआ है जहां पर गरीब की रोटी ताकतवर तबके तो पसंद नहीं आती है। लोगों को उन तमाम जगहों पर समानता हासिल है जहां ताकतवर तबका वसूली और उगाही, लूट और डकैती को अपने फायदे का नहीं पा रहा, मानो लूटने की लागत अधिक आ रही हो और माल का दाम कम हो। ऐसे असम-विधान की सालगिरह फिर आ गयी है। एक बार वे तमाम लोग फिर इसे बनाने वाले डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर को याद करेंगे, जो अपनी प्रतिमाओं पर सैकड़ों करोड़ खर्च करने जैसा गैरदलित, असमान काम करते हैं, और वे लोग भी याद करेंगे जिनको लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में किसी दलित की जरूरत नहीं लगी थी। जिसके हाथ ताकत आ जाती है, फिर वह चाहे किसी भी पेशे में हो, समाज के किसी भी तबके में हो, वह कमजोरों के हक खाने में जुट जाता है, ऐसे लोकतंत्र में लोकतंत्र या संविधान से जुड़े हुए किसी भी सालाना जलसे के क्या मायने हैं?
सालाना जलसे लोगों को एक खुशफहमी में रखने के लिए अधिक होते हैं, कम  ही लोग, कम ही संस्थाएं ऐसी हैं हिंदुस्तान में, जो सालाना जलसे को फख्र के साथ मनाने की हकदार रह गयी हैं। इस मौके पर लोगों को दो बातों पर विचार करना चाहिए और चर्चा करनी चाहिए। पहली तो यह कि अपने नाम के ठीक उलटे, कैसे सम-विधान आज असम-विधान होकर रह गया है, और कौन सी बाड़ खेत को खा रही है। सिर्फ कुछ कलमाडिय़ों, राजाओं और येद्दियुरप्पाओं के जेल जाने से कुछ नहीं होगा, और भ्रष्टाचार के खत्म हो जाने से भी सब कुछ नहीं होगा। भारतीय लोकतंत्र में दूसरी जो सौ किस्म की बेइंसाफी जमकर बैठ गयी है, वह भ्रष्टाचार से बहुत अलग किस्मों की भी है, और उससे अधिक खतरनाक भी है। जब तक इन सब पर बात नहीं होती, कोई इलाज ढूंढा नहीं जाता, तब तक इसे सम-विधान की सालगिरह के बजाय असम-विधान की बरसी ही कहा जा सकता है। 

छोटी सी बात


24 जनवरी 2012
छोटी सी बात
कोई अनजान भी अपने बच्चों के साथ बिड़ी-सिगरेट पीता दिखे तो उसे रोकने की कोशिश करें। आपके किए अच्छे काम का अच्छा नतीजा आपको बाकी जिंदगी में कई तरह से मिलता है।

आनंदवनों बिना आनंद नहीं


24 जनवरी 2012
संपादकीय
बाबा आमटे के शुरू किए गए आनंदवन को मदद की जरूरत है। कुछ लोगों ने इस बात को चारों तरफ पहुंचाना शुरू किया है ताकि कुछ लोग आगे आएं। कुष्ठ रोगियों के बीच पूरी जिंदगी काम करते हुए उन्होंने करीब चौथाई करोड़ कुष्ष्ठ रोगियों के इलाज और उनके पुनर्वास में मदद की थी। और भारत में जिस तरह आज गली-गली में सत्ता की भूखी और हिंसक दौड़ में कुनबापरस्ती दिखती है, उसके ठीक उल्टे किस्म की एक कुनबापरस्ती बाबा आमटे के परिवार में दिखती है जहां उनके डॉक्टर बेटे उनके छोड़े गए काम को आगे बढ़ाते हुए अपने सुख को भूलकर लोगों के दुख को दूर करने में लगे हुए हैं। ऐसी कोशिशों का जब देखें तो देश की बाकी हालत के मुकाबले इनका कद और अधिक ऊंचा दिखता है। जब चारों तरफ बाजार की ताकतें, सत्ता पर काबिज लोग, हर कोई महज अपने से घिरे हुए दिखते हैं, इसमें लगे रहते हैं कि दूसरों के हक को किस तरह नोंच-खा सकें। देश के बड़े-बड़े दौलतमंद लोग अपने फर्जी ट्रस्ट बनाकर, फर्जी समाजसेवा दिखाकर टैक्स की छूट पाते हैं और बाजार की सामाजिक जवाबदेही की जिम्मेदारी पूरा करने का दिखावा भी कर लेते हैं। लेकिन ऐसे दिखावे पर कोई कार्रवाई करने का नैतिक या वैधानिक हौसला सरकारों में इसलिए नहीं होता क्योंकि अधिकतर सरकारें कम या अधिक हद तक इन कारोबारियों से दबी होती हैं या उनके साथ भागीदार होती हंै। 
आनंदवन की आज की जरूरत अधूरी होने को पढ़कर याद पड़ता है कि किस तरह देश भर में आज कुष्ठ रोगी सड़कों पर एक-दूसरे को धकेलते हुए भीख मांगते घूमते हैं। उनमें से बहुत से लोग एक मामूली सा बैंड लिए हुए गाते-बजाते कुछ सिक्के मांगते हैं। यह पूरा सिलसिला 21वीं सदी के चमचमाते भारत के लिए एक ऐसे पैबंद की तरह है जिसके मखमल को ही लोग चुरा चुके हैं। इस देश का प्रधानमंत्री कुदरती हादसों के मौकों पर दुनिया के दूसरे देशों से आई हुई मदद को यह कहकर वापिस कर देता है कि भारत को आज मदद की जरूरत नहीं है। लेकिन बिना इलाज, जिंदा रहने की जरूरतों के बिना कुष्ठ रोगी अपने गले हुए हाथ-पैरों से सुबह से शाम तक शहर घूमने को बेबस रहते हैं और उनके बच्चे संक्रमण का खतरा झेलते हुए भी उनकी झोपडिय़ों में उनके साथ रहते हैं। इस मौके पर एक दूसरी बात को भी याद करना चाहेंगे कि किस तरह संपन्न लोगों के एक अंतरराष्ट्रीय क्लब में पूरी दुनिया में पोलियो को हटाने का बीड़ा उठाया था और उस मदद से ही आज भारत में पोलियो खत्म हो जाने का अहसास हो रहा है। रोटरी क्लब ने इस पूरे अभियान में एक बड़ी हिस्सेदारी की, और उसे देखते हुए यह लगता है कि उस जैसे लायन्स क्लब या कारखानेदारों और कारोबारियों के दूसरे संगठनों का क्या ऐसा जिम्मा नहीं बनता कि वे कुष्ठ रोग जैसे या टीबी जैसे किसी दूसरे मामले में एक अगुवाई लेने का हौसला दिखाएं?
बाबा आमटे हों या मदर टेरेसा, या ऐसे कुछ और भी लोग हों जिनके कम या अधिक योगदान की चर्चा यहां पर जरूरी नहीं है, ऐसे लोगों के काम में हाथ बंटाकर समाज के ताकतवर तबके अपनी जिम्मेदारी भी कुछ दूर पूरी कर सकते हैं और अगर समाज बहुत तकलीफों को झेलते रहेगा तो उसका एक छोटा संपन्न तबका खुशहाली के किसी टापू पर रह भी नहीं पाएगा। लोग करोड़ों के खर्च की शादियों में कुछ सौ भिखारियों को खाना खिलाकर अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही पूरी मान लेते हैं। ऐसे लोगों को बिल गेट्स जैसे खरबपतियों से सीखना चाहिए कि किस तरह अपनी आधी दौलत, या उससे भी अधिक, समाज के लिए ईमानदारी से दान देकर, दूसरे लोगों को पे्ररणा देकर दुनिया में थोड़ी सी समानता की कोशिश की जा सकती है।

छोटी सी बात


23 जनवरी
छोटी सी बात
आपकी रोज की जिंदगी में कितनी पीढिय़ों के लोगों से आपकी बात-मुलाकात होती है? कितने पेशे के लोगों से? कितने किस्म के शौक वालों से? विविधता से मेल जोल के बिना किसी का भी विकास बहुत सीमित ही रहता है।

बसें बढ़ाने की अच्छी सोच


23 जनवरी 2012
संपादकीय
केंद्र सरकार की खबर है कि वह अगले पांच बरस में देश में 85 हजार बसों को सार्वजनिक परिवहन के लिए बढ़ाने की योजना बना रही है। खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह पिछले बरसों में लगातार देश के कुल वाहनों में सार्वजनिक बसों का अनुपात घटते चले गया है और लोग इस कमी की वजह से निजी गाडिय़ों पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। एक बार जब कोई अपनी गाड़ी पर चलने लगता है तो फिर उसका सार्वजनिक परिवहन पर लौटना कुछ मुश्किल होता है। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सार्वजनिक परिवहन के महत्व को बताते हुए हम लगातार लिखते हैं। छत्तीसगढ़ इस बात की मिसाल है कि किस तरह बसों के चलने से वे एकदम से लबालब रहती हैं और लोगों को इससे बड़ी सहूलियत भी मिलती है। रायपुर में आधी सदी पहले चलने वाली सिटी बसें बीच के कुछ दशक पूरी तरह बंद रहीं, लेकिन अब जब इनको शुरू किया गया तो लोग इन पर टूट पड़े। आज इन बसों को कई गुना बढ़ाने की मांग हो रही है। राजधानी दिल्ली का अनुभव है कि जब भूमिगत ट्रेन, मैट्रो शुरू हुई तो सड़कों से भीड़ कम हुई और लोग राजधानी के लंबे-चौड़े इलाके, एनसीआर, में दूर तक जाने के लिए अपनी कार छोड़कर मैट्रो को पसंद करने लगे क्योंकि सस्ती होने के साथ-साथ उसमें समय भी बचने लगा। एक-एक करके देश के महानगरों में मैट्रो की मांग होने लगी है और पूरी दुनिया यह बताती है कि सार्वजनिक परिवहन ही सड़कों से गाडिय़ों को कम करने का अकेला इलाज है। 
भारत का शहरी और संपन्न जीवन अमरीकापरस्त चले आ रहा है। यहां पर लोगों की गाडिय़ांं निजी जरूरतों के मुकाबले अधिक बड़ी भी होती जा रही हैं और जहां पर गाड़ी के बिना काम चल सकता है, वहां भी लोग गाडिय़ों पर आश्रित हो चुके हैं। यह सिलसिला आटोमोबाईल कंपनियों, पेट्रोलियम कंपनियों और इनसे जुड़े दूसरे कारखानों-कारोबारों को ठीक लगता है। ऐसी ही नौबत को और अधिक बाजारू बनाने के लिए एक वक्त अमरीका ने फोर्ड जैसी निजी कार कंपनी ने सार्वजनिक यातायात की ट्राम गाडिय़ां खरीद ली थीं और उन्हें कबाड़ में फेंककर लोगों को निजी कार रखने के लिए मजबूर कर दिया था। यह सिलसिला खतरनाक है और इसे जो लोग अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ समझते हैं, वे एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहते हैं जिनमें लोग कर्ज ले-लेकर महंगी जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएं। पूंजीवाद में अफ्रीका के देशों तक यह हालत कर दी है कि फटेहाल लोगों को अगर अस्पताल तक भी जाना है तो भी उन्हें निजी गाडिय़ों पर निर्भर रहना होता है।
केंद्र सरकार की यह पहल जरूरत को कितना पूरा करेगी यह अंदाज लगाना हमारे लिए मुश्किल है। लेकिन अगर जरूरत हो तो कारों पर एक ऐसा टैक्स लगाना चाहिए जिसे सीधा-सीधा सार्वजनिक बसों पर खर्च किया जाए। इससे एक तरफ तो कार खरीदना कुछ भारी पड़ेगा, और दूसरी तरफ बसें बढ़ती चली जाएंगी। बसों में चलने वाले लोग सीधे-सीधे कार वाले तो नहीं होते, लेकिन बस और कार के बीच की इतनी बड़ी आबादी दुपहिए गाडिय़ों पर चलने वालों की है कि उनको सार्वजनिक बस-ट्रेन से फायदा भी होगा और वे अपनी मौजूदा गाडिय़ों का कम इस्तेमाल करेंगे, कारों की तरफ बढऩे का नहीं सोचेंगे। इसके साथ-साथ जो कारें आज सड़कों पर आ चुकी हैं, उनका भी इस्तेमाल कम होते जाएगा और सड़कों पर से भीड़ घटेगी। लोगों के घरों में आज कारें चाहे खड़ी रहें, ऐसे लोग भी अगर बस और ट्रेन से चलने में समय और पैसों का फायदा देखेंगे तो वह अच्छा है। सरकार को पहले लोकल ट्रेन और बस का ऐसा जाल फैलाना होगा कि वह निजी गाडिय़ों का एक कामयाब विकल्प बन सके।
आज देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के नाम पर जितने बड़े-बड़े सरकारी निर्माण होते दिख रहे हैं, या जनता पर टैक्स लगाने का ठेका देकर जो निजी सड़क-पुल बनवाए जा रहे हैं, वे सबके-सब अधिक गाडिय़ों को बढ़ावा देने के हिसाब से किए गए हैं। अगर शहरों और गांवों के बीच, बड़े शहरों के बीच, अलग-अलग आयवर्ग की जरूरत के हिसाब से सस्ती और महंगी सार्वजनिक परिवहन सेवा स्थापित होती है, तो उससे भी आयातित र्इंधन, पर्यावरण, देश की उत्पादकता और लोगों के निजी जीवन सबको फायदा पहुंचेगा।



दर्जनों हत्याओं से जुड़े रहे हत्यारे की किताब, विमोचन


22 जनवरी 2012
संपादकीय

जयपुर में चल रहे नामीगिरामी लोगों के साहित्य सम्मेलन से सलमान रूश्दी को लेकर जितनी बड़ी खबर नहीं उठ पाई, उससे कहीं अधिक बड़ी खबर दिल्ली से उठी है कि एक प्रमुख प्रकाशक ने बिहार के एक कुख्यात हत्यारे की एक किताब छापी है जिसका विमोचन देश के एक विख्यात आलोचक नामवर सिंह करने जा रहे हैं। यह खबर कई मायनों में भयानक है। आनंद मोहन सिंह नाम का यह हत्यारा एक कलेक्टर के कत्ल में उम्रकैद काट रहा है और इससे परे वह दो दर्जन से अधिक हत्याओं के मामले में सुबूत न मिलने पर छूट चुका है। उत्तर भारत की राजनीति में ऐसे अपराधियों का दखल आज वैसे भी पूरे देश में फिक्र की वजह बना हुआ है, लेकिन उससे बड़ी फिक्र यह है कि एक प्रतिष्ठित प्रकाशक बिना पहले की किसी साहित्यिक साख के ऐसे हत्यारे की किताब को छाप रहा है और देश में हिन्दी के सबसे बड़े आलोचकों में से एक, अपने वामपंथी रूझान के बाद भी इसका विमोचन करने जा रहा है। नामवर सिंह प्रगतिशील लेखक संघ नाम के संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं, और शायद अभी भी हैं। यह संगठन भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की विचारधारा से जुड़ा हुआ माना जाता है और आपातकाल का स्तुतिगान करने के लिए हमेशा से यह आलोचना का शिकार भी रहा है।
इस बारे में जब हमारे अखबार ने राजकमल प्रकाशन के प्रमुख से बात की तो उन्होंने एक अपराधी को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हकदार बताया। यह एक सनसनीखेज बाजारू और कारोबारी फैसला हो सकता है कि हिंदी में किताबों के गिरते ग्राहकों को फिर से दुकानों तक ले जाने के लिए कोई ऐसी किताब छापे और अपनी बाकी किताबों के लिए भी कुछ चर्चा पा ले। लेकिन जिस अपराधी का पुराना रिकॉर्ड ऐसे किसी साहित्य का न रहा हो, और जिसके नाम पर इतने बड़े-बड़े अपराधों की एक मील लंबी लिस्ट पुलिस से अदालत तक चली हुई हो, उसके लिखे हुए को छापना और उसका विमोचन करके उसे एक सम्मान देना, एक मान्यता देना, हमें कुछ हैरान करता है। क्या अपराधों से दूर रहना, उनका हौसला पस्त करना सिर्फ  राजनीति और नेताओं का काम होना चाहिए या फिर समाज के बाकी तबकों को भी अपने हक का इस्तेमाल करते हुए ऐसे कुछ फैसले लेने चाहिए जिनसे कि अच्छे और बुरे का फर्क लोगों के सामने साफ हो सके। राजकमल प्रकाशन इसके बाद अगर चाहे तो निठारी कांड के दर्जनों बच्चों के बलात्कारी, हत्यारे और इंसानखोर लोगों के अनुभव भी छाप सकता है, उनकी कहानियां छाप सकता है और देश के महापुरूषों के बारे में उसकी लिखी बातें भी पाठकों तक पहुंचा सकता है। लोकतांत्रिक हक सबको लिखने का, और सबको छापने का है, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी और सामान्य समझबूझ का इस्तेमाल किसी प्रकाशक और विमोचक को अच्छे और बुरे का फर्क बता सकता है। राजकमल प्रकाशन और नामवर सिंह, और अगर नामवर सिंह का संगठन इससे सहमत हो तो वह भी, देश की जेलों में बंद और भी बड़े-बड़े ऐसे अपराधियों का महिमामंडन कर सकते हैं जो किसी विचारधारा के न होकर सिर्फ भयानक अपराधी रहे हुए हैं। 

रूश्दी की आजादी से जुड़े मुद्दे


21 जनवरी 2012
संपादकीय
जयपुर के सालाना साहित्यिक जलसे में अंगे्रजी के चर्चित और विवादास्पद लेखक सलमान रूश्दी का आना टल गया क्योंकि भारत के मुसलमान उनसे चले आ रहा पुराना विरोध लेकर उनके खिलाफ फिर खड़े हो गए थे। मुसलमानों की काफी आबादी वाले उत्तरप्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं, और ऐसे में रूश्दी का यहां आना न सिर्फ केंद्र सरकार के लिए बल्कि राजस्थान और उत्तरप्रदेश सरकार के लिए भी एक बड़ी परेशानी का सबब हो सकता था। लोकतांत्रिक उदारता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नजरिए से देखें तो रूश्दी के भारत आने पर हिफाजत का पूरा इंतजाम करना सरकार या सरकारों की सीधी-सीधी जिम्मेदारी बनती है, लेकिन सरकारों की यह भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने राज में कोई बेकाबू तनाव न होने दें। रूश्दी पर दुनिया के कई मुस्लिम देशों से जारी किए गए फतवे तो चल ही रहे हैं, भारत में भी उन पर कोई हमला हैरानी की बात नहीं होती, इसलिए अगर सरकारों में उनके आने को लेकर अधिक उत्साह नहीं था, तो यह सरकारों की व्यापक जिम्मेदारियों और व्यापक जनहित को देखते हुए एक व्यवहारिक बात लगती है। 
हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती हैं, लेकिन भारत का संविधान सिर्फ ऐसी स्वतंत्रता वाला एक पन्ना नहीं है। यह एक बहुत ही जटिल संस्कृतियों वाले देश में सभी तबकों को इस अधिकार के साथ-साथ एक धार्मिक स्वतंत्रता देने वाला संविधान भी है और इसमें कुछ मामलों को लेकर अल्पसंख्यकों की भावनाओं का अलग से जिक्र भी है। यह बात सही है कि रूश्दी का विरोध करने वाले दुनिया भर के मुस्लिम संगठनों में से अधिकतर बहुत ही कट्टरपंथी हैं और उनके तौर-तरीके उग्रवादी या आतंकी हैं। लेकिन इससे इस बात पर फर्क नहीं पड़ता कि किसी तबके की धार्मिक भावनाओं को अगर रूश्दी के लिखे हुए से इस कदर चोट पहुंचती है कि वे इसके लिए बनाए गए कानून की मदद लेते हैं, तो भारत में ऐसे कानून या ऐसे हक के लिए सार्वजनिक लोकतांत्रिक प्रदर्शन की गुंजाइश भी है। रूश्दी की किताब पर लगाई गई रोक को भी हम गलत मानते हैं, लेकिन सवाल साथ-साथ ही यह भी खड़ा होता है कि किसी के लिखने की आजादी दूसरों की धार्मिक भावनाओं के अधिकार के साथ-साथ ही पढ़ी जा सकती हैं।
धार्मिक कट्टरता, धर्मांधता और पाखंड के खिलाफ हम भी आए दिन लिखते हैं। सलमान रूश्दी हो या कोई और, सबको अपनी बात लिखने का हक है और दुनिया के कुछ ऐसे देश हो सकते हैं जहां पर किसी धार्मिक तबके का विरोध हो इतना बड़ा खतरा उस समाज के लिए न हो कि वैसी किताब पर रोक लगाने की जरूरत पड़े। हमने योरप के देशों में रूश्दी को जगह पाते, और सरकारों का साथ पाते देखा है, लेकिन इन देशों ने ऐसे कार्टून बनाने की छूट भी सरकारों ने दी है जिनमें मोहम्मद पैगंबर का मजाक बनाया गया था। उन देशों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माहौल कुछ अलग है और वहां की सामाजिक स्थिति भी कुछ अलग है। वहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अलग पैमाने न सिर्फ धर्म के मामले में हैं बल्कि दूसरे मामलों में भी हैं। इसलिए हम दो अलग-अलग देशों की ऐसे मामले में पूरी-पूरी तुलना नहीं कर सकते। भारत की सरकार पर पहली जिम्मेदारी इस देश में अमन-चैन को जारी रखने की है, अगर किसी भी बात से ऐसे हालात बिगड़ सकते हैं तो सरकार पर उस खतरे को देखते हुए पहले से बचाव की कुछ कार्रवाई करने की जिम्मेदारी भी बनती है। इसलिए अगर रूश्दी के न आने से देश की परेशानी कुछ कम होती है, खतरा टलता है, तो इसे यह सोचकर भी देखना चाहिए कि आगे जब कभी इस देश में लोगों की सहनशीलता बढ़ेगी तब ऐसे मामलों को फिर से तौला जा सकता है। यह बात सिर्फ एक मुसलमान लेखक और मुस्लिम समाज की नहीं है। बहुत से दूसरे मामले ऐसे हुए हैं जिनमें कोई लेखक या कलाकार, कोई चित्रकार या फिल्मकार किसी तबके की नाराजगी का शिकार हुए हैं। सैद्धांतिक रूप से तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इन सबको पूरी हिफाजत दे, लेकिन सरकार की अपनी सीमाओं को भी देखना चाहिए। इस देश ने जब एक धार्मिक आतंक और कट्टरपंथी धर्मांधता के हाथों अपने एक प्रधानमंत्री को खोया है, जब एक क्षेत्र और जाति के आतंक के हाथों एक दूसरे प्रधानमंत्री को खोया है तो यह समझ लेना चाहिए कि सरकार की जिम्मेदारियां हवा में नहीं लिखी जा सकतीं और उनकी एक सीमा होती है। ऐसे सीमा को सोचे बिना सिर्फ आजादी की बात करना ठीक नहीं है। और आज के जमाने में किसी व्यक्ति का किसी देश में खुद होकर जाना जरूरी नहीं होता, ऐसी चर्चा के बाद उसका काम भी वहां पहुंचकर उसकी बात को रख सकता है। हमें अधिक अच्छा लगता अगर विरोध के बावजूद रूश्दी यहां आ पाते, लेकिन यह बात न उनके फायदे की होती और न भारत के फायदे की, अगर यहां उनका विरोध करते हुए बेकाबू लोगों में से कुछ लोग मारे जाते। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोगों को भी अपना लोकतांत्रिक विरोध करते हुए कुछ सब्र रखना होगा और ऐसे माहौल के लिए कोशिश करनी होगी जब चुनावी राजनीति से सहमे हुए नेता, और उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें धर्मांध लोगों के विरोध के मुकाबले रीढ़ की हड्डी के साथ खड़े हो सकें।

राहुल का आत्मघाती बयान

संपादकीय
20 जनवरी
राहुल गांधी की नासमझी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही। कल उनकी जगह  उनकी उम्र का कोई दूसरा ऐसा नेता होता जो कि रात-दिन सिर्फ राजनीति ही कर रहा है तो वे उत्तरप्रदेश के लिए उमा भारती को आयातित साबित करने की कोशिश नहीं करते। मध्यप्रदेश की सरहद से लगे हुए उत्तरप्रदेश के लिए उमा भारती अगर बाहरी कही जाएंगी, तो भारत की राजनीति के लिए सोनिया गांधी क्या कही जाएंगी? और तर्क के लिए हम कुछ और पीछे जाना चाहेंगे, एक कश्मीरी पंडित मोतीलाल नेहरू का उत्तरप्रदेश में क्या काम था? और फिर आज राहुल गांधी के गुरू बने हुए दिग्विजय सिंह का उत्तरप्रदेश की राजनीति में इतने दखल का क्या काम है? और छत्तीसगढ़ में ग्यारह लोकसभा सीटों में से सिर्फ एक पर कांगे्रस का सांसद होने पर भी यहां की गिनीचुनी राज्यसभा सीटों में से एक पर बार-बार एक खालिस बाहरी मोहसिना किदवई को थोपने का क्या तर्क है? ऐसी मिसालें कांगे्रस पार्टी के लिए अनगिनत गिनाई जा सकती हैं, मनमोहन सिंह का असम से क्या रिश्ता? अर्जुन सिंह का दक्षिण दिल्ली से क्या रिश्ता था? और अगर हम कुतर्क की हद तक जाएं, तो आज सोनिया और राहुल जैसे सितारों के रहते हुए कांगे्रस को उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी की जरूरत क्यों पड़ रही है जो कि शायद न तो कांगे्रस में है, और यह तो जाहिर है कि वे राजनीति में नहीं हैं। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्यों के बीच के रिश्ते, राज्यों के बीच के आपस के रिश्ते लचीले होने चाहिए। आज अगर भाजपा किसी दूसरे राज्य से अपने किसी नेता को विधानसभा का एक टिकट दे रही है तो उसे लेकर हड़बड़ाने की ऐसी जरूरत कांगे्रस को नहीं होनी चाहिए थी जिससे कि उसकी साख भी कम होती है और कांगे्रस अध्यक्ष के जन्म के देश को लेकर एक अप्रिय चर्चा का मौका भी बहुत लोगों को मिलता है जिनके मन में यह बात फांस की तरह लगी रहती है कि इतने बड़े देश में कांगे्रस को अध्यक्ष बनाने के लिए और प्रधानमंत्री बनाने के लिए कोई दूसरा हिन्दुस्तानी नहीं मिला था क्या? 
सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी के लिए राहुल गांधी को या किसी और को गैरजरूरी बातें, नाजायज बातें नहीं करनी चाहिए। उमा भारती से हमें इतने संतुलित जवाबी बयान की उम्मीद नहीं थी जिसमें उन्होंने राहुल को मां और बुआ की भाषा में नसीहत दी है। उमा भारती की साख एक अधिक आग उगलने वाली रही है और यह मौका तो उसके लायक भी था, फिर भी उन्होंने समझदारी की बात कही है। और यह एक दिलचस्प बात है कि मध्यप्रदेश के चुनावी मैदान में दस बरस के दिग्विजय-राज के बाद जब कांगे्रस को भाजपा ने परास्त किया था, तब भी उमा भारती भाजपा की तरफ से अगुवा थीं, और अब उत्तरप्रदेश में भी ये दोनों नेता चुनावी मोर्चों पर जगह-जगह टकराते रहेंगे। 
राहुल गांधी ने उमा भारती से यह सवाल भी किया कि जब बुंदेलखंड रो रहा था तब वे कहां थीं? यह सवाल राजनीतिक रूप से जायज है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब सोनिया गांधी और राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्रों में केंद्र सरकार की योजनाओं में भयानक भ्रष्टाचार चल रहा था, तब एक सांसद के रूप में वे लोग कहां थे? मायावती की सरकार तो बहुत बुरी तरह भ्रष्ट साबित हो ही चुकी है और दो दर्जन मंत्रियों की बर्खास्तगी, बहुतों की गिरफ्तारी, बहुत से कटघरों में, इस बात को पूरी तरह साबित करते ही हैं, लेकिन अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए अगर सांसद के इतने ताकतवर और सक्षम होते हुए भी अगर वहां भयानक भ्रष्टाचार चल रहा है तो फिर हमें यह समझ नहीं आता कि गांधी परिवार के बहुत भरोसमंद कैप्टन सतीश शर्मा जैसे लोग सोनिया-राहुल के सीटों पर काम किस तरह देख रहे थे? हमें पिछले बरसों में सोनिया और राहुल के अपनी सीटों को लेकर की गई ऐसी किसी शिकायत की जानकारी नहीं है जिसमें उन्होंने वहां पर लगातार चल रहे भारी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया हो। 
यह बात ठीक है कि मायावती हों या कि कोई और, लंबा राज करने वालों का एक ताकतवर और भरोसेमंद विकल्प अगर सामने नहीं रहता तो ऐसे लोग बददिमाग हो जाने का खतरा भी रखते हैं। लेकिन उत्तरप्रदेश जैसे चौतरफा चुनाव में कांगे्रस पार्टी सिर्फ राहुल के भाषणों से चुनाव नहीं जीत सकती। अगर कांगे्रस पार्टी के उत्तरप्रदेश के नेता इतने पिछले बरसों में माया राज का भ्रष्टाचार बयानों से परे भी उजागर करते होते, तो एक-एक गांव-कस्बे तक कांगे्रस की साख बनती और उसकी चुनावी संभावनाएं भी। लेकिन इस चर्चा के बीच आज हमें एक फिक्र यह होती है कि कांगे्रस का भविष्य, और यूपीए के तिबारा आने पर इस देश का भविष्य जो बनने जा रहा है वह आज चालीस की उम्र में एक नौसिखिए की तरह राजनीतिक बयान देता है और शायद उसकी परिपक्वता की कद-काठी भी वैसी ही है। उमा भारती पर बयान के लिए राहुल गांधी ने जो तर्क ढूंढा है, वह आत्मघाती अधिक है।



महिला के हक में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला


19 जनवरी 2012
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला देश की महिलाओं के हक में आया है। एक आदिवासी महिला और गैरआदिवासी पति की संतान को मां की वजह से अदालत ने आदिवासी माना है। इस ऐतिहासिक फैसले में भारत की सबसे बड़ी अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले को खारिज कर दिया जिसमें ऐसे बच्चे को आदिवासी का दर्जा देने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस बच्चे की तरफ से खड़े हुए वकील के इस तर्क को माना है कि अगर ऐसे बच्चे को आदिवासी समुदाय में ही बड़ा किया गया है और उस बच्चे ने वे तमाम तकलीफें झेली हैं जो कि एक आदिवासी बच्चा झेलता है, तो उसे ऐसा दर्जा देना ही चाहिए।
हम इस मामले की बहुत बारीकियों पर नहीं जाते, और अपनी बात को यहीं तक सीमित रखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने देश में बढ़ते हुए अंतरजातीय विवाहों का जिक्र करते हुए यह राय दी है कि महिला के आदिवासी होने पर उसके गैरआदिवासी किसी दूसरी जाति के हिंदू से शादी होने पर यह सोचने की जरूरत है कि हिंदू कानून को लागू करना कितना ठीक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा-ऐसी महिला को शादी के बाद हिंदू मान लेना कहां से ठीक होगा जबकि ऐसी शादी अपने-आपमें हिंदू रिवाजों वाले कानून के ठीक खिलाफ रहती है। हालांकि इसके साथ-साथ अदालत ने यह भी कहा है कि उसका यह निष्कर्ष हर मामले के लिए नहीं है और बच्चे को यह साबित करना होगा कि उसका पालन दलित / आदिवासी मां द्वारा हुआ है और ऐसे मामले में पिता के उच्च वर्ण के होने पर भी उसे पिता के तबके के हक नहीं मिलते हैं।
हम इस फैसले में दो बातों को देख रहे हैं, पहली तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ने आदिवासी समुदाय से जुड़े इस मामले में हिंदू धर्म का जिक्र करते हुए यह बहुत साफ किया है कि हिंदू और आदिवासी समुदाय अलग-अलग हैं। बल्कि अदालत ने आदिवासी और हिंदू की शादी को हिंदू रिवाजों के ठीक खिलाफ करार देकर बहुत साफ-साफ तरीके से हिंदू समाज के मुकाबले आदिवासी समाज को एक वंचित और दबा-कुचला समाज माना है। भारत में हिंदू समाज के एक आक्रामक तबके द्वारा तरह-तरह से आदिवासियों को हिंदू साबित करने की जो कोशिश चलती रहती है, सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश इस कोशिश के तर्क को पूरी तरह खारिज भी कर देता है, जबकि यह मामला इस तर्क पर केंद्रित नहीं है। दूसरी तरफ एक महिला के हकों को यह आदेश बड़े दम-खम के साथ स्थापित करता है और जिस तरह समाज किसी बच्चे के सिलसिले में बाप को ही सब कुछ मान लेता है, और मां की कोई हस्ती ही नहीं गिनी जाती, उस सिलसिले को सुप्रीम कोर्ट ने बदलकर रख दिया है और हम इसे भारत में महिला, और मां के दर्जे की हिमायत में एक बहुत अहमियत का फैसला मानते हैं।
कायदे की बात तो यह है कि इस देश की संसद को, संसद के बाहर राजनीतिक दलों को खुद होकर ऐसा फैसला लेना चाहिए था और जरूरत होती तो उसके लिए संविधान में एक संशोधन करना चाहिए था। हमारे नियमित पाठकों ने यह देखा होगा कि हम महिला के बराबरी के दर्जे के लिए, उसके हकों की हिफाजत के लिए लगातार लिखते हैं और हम यह भी उम्मीद करते हैं कि अदालत तक जाने में जो लोग ताकत रखते हैं, उन्हें भारत सरकार और भारत के प्रधानमंत्री की भाषा के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए, कि लालकिले से दिए गए भाषण में अगर प्रधानमंत्री दर्जन भर बार 'आम आदमीÓ कहते हैं तो यह आम औरत के हकों को कुचलना है, उसकी मौजूदगी को ही अनदेखा करना है। इस तरह के भाषा के कदम-कदम के अन्याय के खिलाफ हम बार-बार लिखते हैं, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि महिलाओं की अगुवाई वाली देश की पार्टियां, महिला नेता, वामपंथियों जैसे सिद्धांतवादी लोग, इनमें से किसी को भी आम आदमी को ही इंसान गिन लेने वाली भाषा में बुराई नहीं दिखती। लेकिन कानून की हमारी समझ यह कहती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई इस भाषा के खिलाफ जाएगा तो वहां भी महिला के पक्ष में ऐसा ही फैसला आएगा जैसा कि अभी एक आदिवासी मां की संतान के पक्ष में आया है।
देश में जो राजनीतिक चेतना संपन्न तबके हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि बेइंसाफी को देखते हुए भी चुप रहकर वे अपने-आपको इतिहास में जागरूक दर्ज नहीं करवा पाएंगे। देश के न सिर्फ महिला संगठनों को, बल्कि बाकी जिम्मेदार लोगों को भी सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद महिलाओं के हक के बाकी पहलुओं पर भी कोशिश करनी चाहिए।

सरकार और फौजी मुखिया में टकराव


संपादकीय
18 जनवरी 2012

दक्षिण एशिया के दो अहम देशों में फौज और सरकार अलग अलग वजहों से टकराव  की स्थिति में है, लेकिन दोनों देशों के हालात एक-दूसरे से एकदम अलग हंै, और दोनों देशों की फौजों और सरकारों की विवादों में भूमिकाएं भी अलग-अलग हंै। पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली सरकार को इस बात पर ऐतराज है कि फौज ने एक हो सकने वाले सत्ता पलट के बारे में उसे परे रखकर सीधे सर्वोच्च न्यायालय से बात की। जबकि अब तक जनता की चुनी हुई सरकार को लाचार और कमजोर समझने, और उससे वैसे ही बरतने वाली फौज और आईएसआई, सरकार के ऐतरज़ जताने की हिम्मत पर भौंचक्की है। दूसरी ओर भारत में पेंशन, आधुनिकीकरण जैसे बहुत से मुद्दों पर सरकार की उपेक्षा की शिकार थल सेना आज तक अनुशासित बनी रही है। देश के इतिहास में पहली बार सेना प्रमुख ने सरकार को अदालत में घसीटा है, यह एक अभूतपूर्व और अवांछनीय घटना है, इसमें दो मत नहीं हो सकते। इस मुद्दे पर सेना अध्यक्ष के पास जहां कहने को अपने तर्क है, वहीं सरकार के पास भी कहने को अपनी बात है। किसका पक्ष ज्यादा भारी है, यह बात अदालत तय करेगी। विपक्षी दल इस मुद्दे पर अपनी आदत और मजबूरी के मुताबिक सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हंै इस मामले में गलती चाहे जिसकी भी साबित हो, खामियाजा इस देश में सरकार और फौज के आपसी संबंधों को भुगतना होगा, इसमें शक नहीं। क्या  देश को इस स्थिति में डालना जरूरी था?
जनरल वी के सिंह ने रक्षा मंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि सेना पूर्व सैनिकों के संगठनों ने अदालत में जो जनहित याचिका दायर की है, उसकी सुनवाई के पहले वह अदालत जाने पर मजबूर थे। इस याचिका के कारण उनकी पैदाईश के साल के बारे में उन पर सरकार, और फौज को गलत जानकारी देने का इल्जाम लग सकता था। अखबार और जानकार  सूत्र बताते हंै कि इस जनहित याचिका  के मद्देनजर सरकार, और जनरल सिंह में एक समझौते की बात चल रही थी कि सरकार उनके द्वारा बताई जा रही जन्म तारीख को सही करार दे दे, और जनरल सिन्ह इस्तीफा देकर अपने बाद आने वाले सेना प्रमुख के लिए जगह खाली कर दें।  लेकिन जनरल सिंह ने यह खत लिखकर रक्षा मंत्री को यह जता दिया है कि सरकार के समय पर फैसला ना लेने के कारण वह अदालत जाने पर मजबूर हो गए। उन्होंने दो दिन पहले ही पत्रवार्ता में भी कहा कि जन्म की तिथि गलत बातने का मसला उनकी निष्ठा और सम्मान से जुड़ा है, जो किसी भी फौजी के लिए बहुत अहम है, शायद सबसे ज्यादा अहम है। फौज के संगठन में, उसके फर्ज की जरूरतों को देखते हुए सामान्य लचीले नागरिक मूल्यों से अलग  मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है। शायद 11 लाख की फौज के मुखिया को अपनी निष्ठा और सम्मान अपनी फौज से जुड़ा लगता हो, उसके नैतिक बल का सवाल लगता हो, लेकिन आखिर फौज होती किसलिए है? देश के सम्मान की हिफाज़त के लिए ही ना। सवाल यह उठता है कि अपनी बात साबित करने के लिए क्या जनरल सिंह के पास यही एक रास्ता बचा था? क्या उन्होंने उन गम्भीर नतीजों और खतरों पर गौर किया, जो फौज के मुखिया के सरकार को अदालत में घसीटने  के कारण सामने आ सकते हैं? देश में इस पर बहुत बहस हो रही है। ज्यादातर रिटायर और फर्ज बजा रहे फौजी जनरल सिंह के  साथ हंै, तो देश का एक तबका उनके खिलाफ भी है, लेकिन सरकार के साथ कोई भी नहीं। क्योंकि रक्षा मंत्रालय में जब पहली बार जनरल सिंह के पैदाईश के साल के बारे में गड़बड़ की बात सामने आई, तब से आज तक उन्होंने कई बार इसे ठीक करवाने की गुजारिश की, लेकिन जाहिर था कि सरकार ने इस मसले पर तब फैसला लेने की बजाए इसे लटकाए रखा। बताया जाता है कि जनरल सिंह के पहले के दो सेनाध्यक्ष, उनके बाद जिन जनरल बिक्रम बीर का नाम सेनाअध्यक्ष के रूप में लिया जा रहा है उनकी खातिर जनरल सिंह की पैदाईश का साल 1950 ही रखना चाहते थे, इसलिए जनरल सिंह की कोशिशें नाकाम कर दी गर्इं। जनरल सिंह द्वारा पेश किए गए तमाम सुबूतों के बावजूद सरकार ने इस मसले को जानबूझकर लटकाया, या अपनी लापरवाही में, दूसरे तमाम मामलों में इस सरकार का रवैया देखकर यह कहना बहुत मुश्किल नहीं है। हम पहले भी देख चुके हंै कि यह सरकार अहम मुद्दों पर टकराव टालने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं करती, चाहे 2 जी पर जेपीसी  बनाने का मुद्दा हो, या अन्ना हजारे का मुद्दा, इसने  टकराव  के हालात पैदा किए, और देश का माहौल और संसाधन बर्बाद किए। आज जितनी जिम्मेदारी जनरल सिंह की यह देखने की है कि देश में गलत परम्परा न बने, उससे ज्यादा जिम्मेदारी सरकार की है। अगर थल सेनाअध्यक्ष के इस कदम से आगे चलकर फौज के अनुशासन पर इसका असर पडऩे का डर है, तो इतना ही डर सरकार और नौकरशाहों की फौज में दखलंदाजी, और फौज को अपने जूते तले दबाए रखने की कोशिश करने का भी है। यह कांग्रेस की ही सरकार थी, जिसने इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते देश के इतिहास में पहली बार फौज में ले. जन. एस के सिंहा की वरिष्ठता के बावजूद  उनके मातहत ले. जन. ए एस वैद्य को थल सेनाध्यक्ष बनाया था।
इतने बड़े और अहम संग्ठन के मुखिया के साथ संवाद  ठीक नहीं रख पाने की सरकार की नाकामी के कारण ही आज यह हालात पैदा हुए कि जनरल सिंह या तो अपने ऊपर अपनी पैदाईश के साल के बारे में फौज को गलत जानकारी का दाग लिए रिटायर हो जाते, या अदालत जाते, और इस विवादास्पद मामले का फैसला अदालत करती। ऐसा होने पर  सरकार यह कहने की हालत में आ जाती कि ऐसा हम नहीं, अदालत ने कहा है। सियासी तौर पर देखने में यह चालाकी बहुत सूझ भरी लग सकती है कि सरकार ने एक विवाद से खुद को सफाई से उबार लिया, लेकिन फौज के मनोबल, और परंपराओं के खयाल से यह कितना सही है, यह गौर करने लायक है। जनरल सिंह का देश के हित में  रिटायर होना सही होता, या फौज के मनोबल और अपनी निष्ठा, सम्मान को बचाने के लिए लडऩा, इस बारे में बहस की गुंजाईश हो सकती है, लेकिन आज  सरकार में इस कारण जो दौड़भाग मची हुई है (या जिसका दिखावा किया जा रहा है), देश में जो बदमजगी फैल गई है, उसके लिए यकीनन सरकार दोषी है। अब सरकार चाहे जनरल सिंह से अदालत में निपटे, या अदालत के बाहर, अपने एक अफसर के हाथों मुंह की खाने की शर्मिंदगी से वह बच नहीं सकती। हम बहुत से लोगों की तरह इसे देश की इज्जत मटियामेट होना नहीं मानते बल्कि अंबिका सोनी की तरह यही कहना चाहते है कि देश में न्याय मांगने का हक सब को है। अगर हुआ, तो यह यूपीए सरकार की इज्जत का मटियामेट होगा, जिसमें समय रहते सही फैसले लेने की हिम्मत और नीयत, दोनों नहीं है। थल सेना जैसे बड़े संगठन के मुखिया रह चुकने के बाद भी, जनरल सिंह का अपने जन्म वर्ष का मुद्दा सुलझा नहीं पाना, फौज के प्रति सरकार और नौकरशाही के रवैये के बारे में बहुत कुछ कहता है, और इस  स्थिति के लिए जो किसी भी सूरत में  सही नहीं है, दस साल से देश पर राज कर रही यूपीए सरकार ही दोषी है।

अपराध का सामाजिक अंजाम


संपादकीय
17 जनवरी 2012
बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने पिछले दिनों राज्य के सज़ायाफ्ता अपराधियों और उनके अपराध का ब्यौरा इंटरनेट पर रखने की शुरुआत कर दी है। बिहार के गृह विभाग की वेबसाईट पर इससे संबंधित एक पेज में राज्य में सज़ा पाने वाले अपराधियों के नाम पते, उनके पिता का नाम, उनके अपराध और अदालत से मिली सजा के खिलाफ उनकी अपीलों के खारिज होने का ब्यौरा रखा जाएगा। यही नहीं, सजायाफ्ता लोग सरकारी ठेके और हथियारों के लाईसेंस नहीं पा सकेंगे। मुख्यमंत्री का कहना है कि अपराध करने का एक सामाजिक परिणाम होता है जो अपराधियों को भुगतना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि सज़ायाफ्ता लोगों के ब्यौरे  इंटरनेट पर रखने से दूसरों में कानून तोडऩे और जुर्म करने का  हौसला कम होगा। वह इसे बिहार को अपराध मुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम  बता रहे हैं। पिछले साल बिहार की जनता को सेवा का अधिकार देने के बाद, इस साल नितीश कुमार ने अपराध कम करने के लिए यह कदम उठाकर एक बार फिर सुशासन के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जाहिर की है और इस मामले में देश के सामने एक मिसाल पेश की है। सज़ा मिलने तक  तो कानूनन किसी को गुनहगार माना भी नहीं जा सकता, और इस छूट का आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक  फायदा उठाए जाते हम अपने चारों तरफ देखते ही हैं,लेकिन मौजूदा सियासी चलन के मद्देनजर , एक राज्य के मुख्यमंत्री का अपने राज्य में, जुर्म करने वालों के हौसले पस्त करने के लिए ऐसा कड़ा कदम उठाना हिम्मत का काम है। नितीश कुमार की इस नई पहल से बिहार को रहने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम आगे बढ़ा  है।
भारत में आपराधिक मामलों में सजा न मिल पाना अपराध बढऩे के बड़े कारणों में से एक बताया जाता है। आंकड़े बताते हंै कि आईपीसी की अलग-अलग धाराओं में सजा मिलने की दर लगातार घटी हैं, और ऐसे अपराधों में बढ़ोत्तरी हुई है। अभी ताजा मिसाल ओडिशा में पीपली बलात्कार मामले की है, जहां सामूहिक बलात्कार की घटना के एक आरोपी पर, ज़मानत पर बाहर आने के बाद घटना की गवाह के साथ बलात्कार करने का आरोप है। गंभीर अपराध के लिए पकड़े जाते लोगों के साथ बहुत से कारणों से सख्ती नहीं की जा सकती, अपराधियों के मानव अधिकार और कानूनी पेचीदिगियों की सीमाएं बहुत से मामलों में कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों के हाथ  बांध देती हंै, और जुर्म को अनचाहे बढ़ावा  मिलता है। कमजोर तबकों जैसे दलित, महिलाओं और बच्चे, जो समाज में सबसे कमज़ोर स्थिति में हंै वह इसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। हाल ही में खबरों में गर्म भंवरी देवी का मामला इसकी मिसाल है, जिसमें रसूखदार नेताओं पर सहायक नर्स जैसी छोटी सरकारी कर्मी के अपहरण और हत्या के अरोप हैं। भारत में जुर्मों का लेखा जोखा रखने वाले क्राईम रिकार्ड ब्यूरो ने गौर करने पर पाया कि 1953 से 2006 के बीच देश में हत्या जैसे अपराधों ने 231 फीसदी, अपहरण के मामलों में 356 फीसदी और डकैती  के मामलों में 120 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इन अपराधों में सजा  मिलने की दर दयनीय है। इसके लिए बहुत सी बातें जिम्मेदार हैं- स्थानीय जांच एजेंसियों में क्षमता, उन्हें अपराध की जांच के लिए मिलने वाली सुविधाओं, सहयोग का अभाव, उनके काम के मुश्किल हालात, जनता की लापरवाही, और अपराधियों का बचाव, लेकिन इन सबका खमियाजा भुगतने वाली जनता ही है। बिहार में एनडीए की सरकार बनने के पहले चुनव के दौरान हिंसा, बूथों पर कब्जे जैसी घटनाएं आम हुआ करती थीं, वहां अपराधियों द्वारा तरह-तरह के जुर्म करने के लिए अपनी अपनी सेनाएं रखने के किस्से आम थे, जाहिर है ऐसा माहौल अपराधी को बेखौफ करने वाला, और जनता को सहमाने वाला था।
नितीश कुमार की इस पहल से हालात रातोंरात बदल जाएंगे, ऐसी उम्मीद हम नहीं करते ,लेकिन इतना तो तय है कि सरकार ने अपराधियों को यह इशारा कर दिया है कि आज तक जो राजनीतिज्ञ उन्हें अपनी आंख का तारा बनाए हुए थे, अब उनके ख्यालात बदल चुके हैं। यह कदम शोभा भर के लिए न बना रहे ,और जिस इरादे से उठाया गया है, उसको पूरा करने के लिए सरकार कमर कसे रहे, तो बात यहां से आगे बढ़ेगी। हम जानते हंै कि बिहार में इंटरनेट पर सजायाफ्ता लोगों के नाम पढऩे वाले बहुत कम होंगे, लेकिन सरकार ने उसे  उपलब्ध एक माध्यम से समाज के गुनाहगारों को उनकी जगह जताने की हिम्म्त बताई है। आज जब भ्रष्टाचार, महंगाई से लोगों ने असंतोष फैला हुआ है। सरकार के ऐसे कदम से जनता में इस बात के लिए धीरज बंधेगा कि अपराधी की हौसला आफज़ाई तो कम से कम नहीं की जा रही है।
नितीश कुमार ने यह भी कहा है कि इंटरनेट पर इस तरह का रिकार्ड रखने से सजायाफ्ता लोगों को सरकारी ठेके हासिल करने से रोका जा सकेगा। सरकारी ठेके हथियाने के लिए माफिया खड़े करने के मामले में आज तक बदनाम बिहार में यह  सोच और कदम तारीफ के काबिल है। जब रजनीति अपराध को सहारा देना बंद कर देगी तो  उसका  आधा  हौसला अपने आप पस्त हो जाएगा। ऐसा फैसला वही नेतृत्व कर सकता है, जिसे अपने जनाधार पर भरोसा हो, और जिसकी नीयात में किसी भी तरह से सत्ता पर काबिज बने रहने की खोट ना हो। आज जब गंभीर अपराधों के लिए कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे  मुजरिमों की सजा पर, देश की बड़ी राजनीतिक  पार्टियां एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रही हंै, नितीश कुमार ने बिना किसी शोरशराबे यह कदम उठाकर अपराध करने वालों को एक सख्त संदेश  दे दिया है। यह फैसला अपराध के  सामाजिक पहलू से जुड़ी कार्रवाई है, जो अपनी मंजिल तभी पा  सकेगी जब न्यायिक ,  प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आने वाली रुकावटें दूर की जा सके।

अरब क्रांति की सालगिरह और प्रजातंत्र की कीमत


संपादकीय
16 जनवरी 2012
ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति को एक बरस पूरा हो गया है। ट्यूनिशिया से शुरू हुई अरब क्रांति मिस्त्र में मोहभंग  के दौर से गुजरती दिख रही है, और एक तानशाह से निजात पाकर प्रजातंत्र अपनाने की मिस्त्र के लोगों की इच्छाओं पर सेना और इस्लामी कट्टरपंथियों के काबिज होने की खबरें आ रही हैं। दूसरी तरफ लोकतंत्र का त्यौहार जिसे कहा जाता है, वह चुनाव भारत में पांच राज्यों में होने जा रहे है। तब राजनीतिक पार्टियों का प्रजातंत्र के लिए रवैया और चुनावी कवायद देखना अपने आपमें इस हिसाब से दिलचस्प है  कि इतने बरसों बाद भी राजनीतिक दल मतदाताओं को प्रजातंत्र के लिए कितना तैयार, कितना सयाना समझते हंै। उत्तराखंड से लेकर गोवा तक जहां भी देख लें राजनीतिक दलों का बर्ताव देखकर लगता है कि उन्हें मतदाता के सयाने ना होने का पूरा इत्मीनान है।  चुनावी कार्यक्रम जारी होते ही  करोड़ों रुपयों का काल धन पकड़ाया जाना आम खबर हो गई है। चुनाव आयोग की सख्ती जितनी बढ़ती जा रही है कालेधन के इस्तेमाल के लिए नेताओं का दिमाग भी उतनी ही तेज़ी से काम करने लगा है। निजी वाहनों से कालाधन जब्त करने की घटनाओं ने उन्हें इसकी हेरफेर के लिए अब बैंकों की एटीएम गाडिय़ों का इस्तेमाल करने की अक्ल दे दी है।
जाति धर्म के समीकरणों के साथ-साथ  अपनी कमज़ोरियों को शहादत में बदलने की नेताओं की चालाकी देखते ही बनती है। मायावती अपने राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी को जन आंदोलन कह रही है। यह ऐसा जन आंदोलन है  जिसके नेता की वसीयत  पर अमल करने के लिए उन्होंने जनता के हक के  करोड़ों रुपये पत्थर की मूर्तियां बनवाने में खर्च कर दिए, जबकि उनके राज  में बच्चे देश में सबसे ज्यादा कुपोषित रह गए हंै। अब चुनावों के पहले जब चुनाव आयोग ने इन बुतों को कपड़े से ढंकने का देश दिया तो मायावती के तेज दिमाग का चर्चा हो रहा है कि किस तरह उन्होंने 2012 के चुनावों का खयाल कर के 2007 से ही अपनी पार्टी  के प्रतीक और अपने बुत बनवाने शुरू कर दिए। चुनाव आयोग के इस फैसले को मायावती दलित विरोधी बताती हैं। एक मामूली क्लर्क की बेटी से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी माया जाहिर तौर पर कोई 88 करोड़ की मालकिन बताई जाती हैं। एक ऐसे राज्य में जहां दलितों पर हिंसा के मामले 2009 और 2010 में सबसे ज्यादा हुए,  चुनाव आयोग  पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाने वाली मुख्यमंत्री  इस बारे में कोई जवाब देना ठीक नहीं समझती कि अभी दस साल पहले उसमें से ही निकालकर बनाया गया उत्तराखंड विकास के मामले में उससे बहुत आगे कैसे है? क्यों उनके राज्य में कुपोषित बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है? क्यों एक सख्त महिला मुख्यमंत्री होने का दम भरने वाली इस नेता के राज्य में महिलाओं के साथ देश में सबसे ज्यादा हिंसा होती है? वह खुद के भ्रष्टाचार के खिलाफ होने का सुबूत इस बात से देती है कि उन्होंने  सैकड़ों अफसरों का बात की बात में तबदला कर दिया। 21 मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया, और आधे से ज्यादा मौजूदा विधायकों का टिकिट काट दिया। चुनावी पंडित इसे माया की चित भी मेरी पट भी मेरी बताते हुए कह रहे हैं कि किस तरह, माया दस हजार करोड़ के एन एच आर एम घोटाले से भी  फायदा उठाने की सूझबूझ रखती है, किस  तरह उन्होंने केवल उतने ही विधायकों की टिकिट काटी जो बहुत कम मतों से जीते थे, और किस तरह मौका मिलते ही वह अपने बहुजन दल को सर्वजन में बदलने की ताकत रखती है। चुनावी माहौल में "टीना"( देयर इज़ नो ऑल्टर नेटिव)  और मीता ( माया इस द ऑल्टर्नेटिव) जैसे लफ्ज उछाले जा रहे हैं। मायावती  की जवाबदेही तय करने की बात कहीं नहीं होती। उन पर वार करने वाली कांग्रेस और उसके नेता मौका पड़ते ही उसके साथ सरकार रचने को तैयार बैठे बताए जाते हंै। आय के मुकाबले ज्यादा दौलत इक_ी करने के लिए उनके खिलाफ मामले को संसद में मुश्किल घड़ी में सरकार की नैया पार करने की पतवार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
यह सब इसलिए किया जाता है क्योंकि राजनीतिक दल और उनके नेताओं को जनता के लाचार होने का पूरा इत्मीनान है।  संविधान में किए गए प्रावधानों को किस तरह तोड़ मरोड़कर अपनी तरफ वोट बैंक राजनीति की जाए, इसकी जुगत में राजनीतिक दल लगे  हुए हैं। यह सोच कि  संविधान को चुनावी फायदे के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, कभी खतरनाक भी हो सकती है। कानून मंत्री जैसे उदारवादी,कानून के जानकार माने जाने वाले नेता के बयानों को देखकर इसका अन्दाज लगाया जा सकता है, लेकिन 60 बरस के जनतंत्र में क्या मतदाता इस खतरे को भांपने को तैयार हो सका है? बिकाऊ खबरों को कोसने वाले देश से कोई यह जवाब भी तो मांगे  कि उसे बिकाऊ खबरें पढ़कर वोट दे देने वाला क्यों समझता जाता है? हमने बार-बार लिखा है कि लोकतंत्र अनमोल है, इसका पता इसका बेजा इस्तेमाल करने वालों को उस दिन लगेगा, जब इस अंधेरगर्दी से त्रस्त जनता अपना नसीब जंगलों में फैले किसी आंदोलन को थमा देगी, और वह कंगारू अदालतों में इतने बरसों की आजादी का मर्सिया पढ़ डालेगा। उत्तर प्रदेश हो या मणिपुर, उत्तराखंड हो या गोवा अलग-अलग राज्यों की समस्या अलग-अलग हो सकती है, लेकिन मतदाताओं का सामना नेताओं के एक जैसे बर्ताव से है। बिहार के विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने धर्म और जाति के आधार पर खुद को मूर्ख बनाए जाने की कांग्रेस और राजद की कोशिशें नाकाम की थीं। यह सच है कि बहुमत  की आवाज सुनने वाली व्यवस्था में अपनी जति और सम्प्रदाय के साथ खड़ा होने में  मतदाता को ज्यादा सलामती लगती होगी, लेकिन अरब देशों, उत्तरी कोरिया, म्यांमनार , चीन की जनता की हालत देखकर यह समझ में आता है कि अपनी सलामती से बड़े मुद्दे जो हमारे सामने हंै  उन पर भी उसे गौर करना चाहिए। चुनाव में हिसाब तो स्थानीय मुद्दों पर मांगना चाहिए, लेकिन नजर व्यापक मुद्दों पर हो, तो प्रजातंत्र को मजबूत करने में मतदाता अपना योगदान कर सकेंगे।

भारत चीन हो सकता है?


संपादकीय
15 जनवरी 2012

कल अपनी सालगिरह पर पत्रकारिता और बाजार में अपनी मौजूदगी की जब हम बात कर रहे थे, तो अपने नए  साल की शुरुआत करते वक्त भी  हमारे सामने ऐसी दो खबरें थीं  जो इस दिशा में अपना कूच, अपनी कोशिशें जारी रखने की ज़रूरत साबित करती हंै- एक,भारत की अदालतों की, फेसबुक और गूगल पर चीन की तर्ज पर कार्रवाई की धमकी, तो दूसरी राजकोट में एक अखबार में नये साल की दावत मनाते पुलिस की आला अफसर की तस्वीर छापने पर, एक बड़े अखबार समूह के रिपोर्टरों और वरिष्ठ संपादकों की गिरफ्तारी। दिल्ली की अदालतों ने गूगल समेत 21 कंपनियों को बुलाकर कहा है कि वह ऐतराज के काबिल सामग्री अपनी साईट्स से हटाए, वर्ना चीन की तर्ज पर उन पर यहां भी रोक लगाई जाएगी। यह चेतावनी उन तमाम सायबर कानूनों के अलावा दी जा रही है, जिनके तहत सजा देने का प्रवधान देश का कानून में पहले ही किया जा चुका है। दिल्ली की अदालत की इस बात पर कपिल सिब्बल खुश हो सकते हंै, लेकिन एक प्रजातांत्रिक देश में चीन की मिसाल देकर उसकी राह पर चलना हमारे लिए कितना ठीक होगा, यह गौर करने लायक बात है।
गूगल, फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग  साईट्स लोगों को एक-दूसरे से बातें करने का मौका देती हैं। सामने कोई मौका हो, तो उसका फायदा अलग-अलग तरीके से उठाने वाले लोग भी मिल जाते हैं, लेकिन क्या इसमे उस मौके में खामी ढूंढना सही होगा? इन सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर लोग क्या बोल रहे हंै,क्या पोस्ट कर रहे हैं, उसे नियंत्रित करना तकनीकी रूप से आज भारत में धमकाई जा रही कंपनियों के लिए कितना मुमकिन है, इसका जवाब वह देश की अदालतों को देंगी, लेकिन यह बोलने की आज़ादी ही तो है, कि दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी और सरकार  के रुख के खिलाफ बटला हाऊस एनकाऊंटर  को फर्जी करार दे रहे हंै, और कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हंै कि यह उनके दल के भीतर का आंतरिक प्रजातंत्र है। अगर ऐसा है, तो यह कांग्रेस के तय करने की बात है कि उसे किस नेता को बोलने की कैसी, और कितनी आज़ादी देनी है, और यह जनता के तय करने की बात है कि वह इस मामले में किसको, कितना सही मानती है। इसी तरह सोशल नेट्वर्किंग साईट्स पर, देश के सायबर कानूनों की हद में आ रही सामग्री पर किस तरह प्रतिक्रिया देनी है, यह तय करने का हक क्या इसके उपभोक्ताओं का नहीं है ?  प्रजातंत्र के 6 दशक के बाद ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में, क्या हमारे  पास चीन की तरफ ताकने के अलावा कोई  रास्ता नहीं बचा है?  हम यह मानते हंै कि एक-दूसरे से बोलने, बात करने की आजादी पर कोई कटौती लादने के अपने खतरे हो सकते हंै, देश में पहले ही इंटरनेट और सायबर पर रखी जाने वाली सामग्री के लिए कानून बने हुए हंै। इन्हें तोडऩे वालों के खिलाफ सख्ती करने के रास्ते कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों के पास पहले से हंै, लेकिन किसी  भी बहाने विचारों का गला घोंटने से पहले इमरजेंसी के दिनों की याद कर लेनी चाहिए- यह हरकत जिनकी आवाज दबाई गई उनके साथ, और जिन्होंने आवाज़ दबाई, उनके लिए भी बुरी साबित हुई थी।
राजकोट की घटना में पुलिस अधिकारी की तस्वीर एक प्रेमी युगल के साथ छापने के एवज में अखबार के कर्मियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि अखबार ने जानबूझकर एक प्रेमी युगल के साथ पुलिस की आला अफसर, और उनके पति की तस्वीर छापकर अशिष्ट संकेत देने की कोशिश की। क्या शिष्ट है, क्या अशिष्ट , किसी ने क्या संकेत देने की कोशिश की, इन मसलों पर बहुत बारीकी से सोचने, और फैसले लेने की जरूरत पड़ती है। लेकिन गुजरात के एक कस्बाई शहर में एक अखबार, और दिल्ली की अदालत में सोशल नेट्वर्किंग के जरिये अभिव्यक्ति की आज़ादी देने वाले दिग्गजों का, सत्ता के जिस मिजाज़  से  सामना हो रहा है,  उससे अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कैसा संकेत मिल रहा है, इस पर गौर करने की जरूरत है। अच्छे बुरे को  तौलने के लिए हम एक व्यापक और उदार नजरिये के हामी हैं, और हमारा मानना है कि ऐसा एक दूसरे के साथ बात करके ज्यादा आसानी से, बेहतर तरीके से किया जा सकता है। हमारी नजर में संवाद, सख्ती से बेहतर विकल्प है। विकास को बढ़ावा देने के लिए, जनता की नब्ज पर हाथ रखने में कामयाब होने के लिए, देश के जिन राजनीतिज्ञों की तारीफ की जाती है, अगर ध्यान दें तो वह तमाम, फेसबुक, ट्विटर, यहां तक कि एसएमएस का भी खुलकर इस्तेमाल करते हैं। विचारों की अभिव्यक्ति पर कोई बंदिश लगाने की बजाए, उसे विचारों के लेनदेन में बदलना क्या बेहतर नहीं है? सवाल नजरिये का है। एक तरफ इजराईल है, जिसके बारे में खबर है कि वह फिलीस्तीनी आज़ादी के लिए संघर्ष करने वालों के मुकाबिल अपना प्रचार करने के लिए सोशल नेट्वर्किंग साईट्स और इंटरनेट पर सक्रिय युवाओं की भर्ती कर रहा है, क्योंकि फिलीस्तीनी आज़ादी के लिए लड़ रहे लोग दुनिया को गाज़ा की दुश्वारियों के बारे में बताने के लिए सोशल नेट्वर्किंग  साईट्स का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हंै, और इजराईल को डर है कि इनसे यहूदी विरोधी माहौल बन रहा है, जिसका सामना किया जाना जरूरी है। दूसरी तरफ एक जमे जमाए प्रजातंत्र में यह साईट्स आज अदालतों के कटघरे में खड़ी है, हालांकि यह बात सच है कि भारत में इन्हें अदालत तक सरकार नहीं खींच ले गई हैं, लेकिन ऐसे ही कानूनों की पैरवी वह पहले कर चुकी हैं। जहां तक आपत्तिजनक सामग्री का सवाल है उसके लिए जब देश में पहले ही  कानून बना हुआ है तब पहले सरकार का सोशल नेट्वर्किंग साईट्स और इंटरनेट पर सेंसरशिप लगाने की कोशिश करना ,और फिर अदालतों का यह रुख, क्या इतने सालों से प्रजातंत्र को सहेजने के बाद हमें यही पहुंचना था? क्या अपने बारे में किसी की राय सुनने से इंकार कर देना किसी समस्या का हल है?
फिर यह भी बात है कि  रोक लगाने की कोई सीमा नहीं होती। इस ताकत का इस्तेमाल करने के लिए जिस समझ-बूझ की जरूरत होती है, कानून पर अमल करवाने वालो की  लंबी जंजार में वह समझ कब कहा छूट जाए कोई नहीं कह सकता। इसके खतरे बहुत हैं- जनता के लिए भी और सरकार के लिए भी, लेकिन इमरजेंसी के अनुभवों से हमने देखा है कि अभिव्यक्ति को रोकने का बुरा अंजाम कुर्सी पर बैठे लोगों ने ही ज्यादा भुगता है। अवाम तो जीवन की जद्दोजहद की आदी है और अपने लिए वह एक नहीं तो दूसरा रास्ता निकाल ही लेती है। दिल्ली और राजकोट के मामलों पर अदालतें अपने फैसले सुनाएंगी। उनके फैसलों से सहमत न होने वालो के लिए देश की न्यायपालिका में आगे भी सुनवाई की व्यवस्था है। प्रजातंत्र की यही खासियत है कि यह जनता की व्यवस्था है, और उसे कानून के दायरे में अपनी बात आखिर तक करने का अधिकार संविधान ने दिया है। इस दायरे में उसकी, और कानून की हद पर विवाद हो सकता है, लेकिन अपनी बात कहने का हक तो फिर भी है ही!

पत्रकारिता और बाज़ार में सालगिरह


14 जनवरी 2012
विशेष संपादकीय

 सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के इस पुराने अख़बार की इस मौजूदा शक्ल के एक और बरस पूरे होने पर कुछ लिखना इसलिए मुश्किल है, कि अपने बारे में लिखना ठीक नहीं, और बाकी किसी मुद्दे के बारे में लिखने में हम कुछ घंटे की भी देर नहीं करते, मीडिया के बारे में हम आये दिन लिखते ही रहते हैं। लेकिन अख़बार की सालगिरह पर अखबारनवीसी के बारे में तो लिखने का मौका बनता है।
एक वक्त पत्रकारिता कहा जाता था, फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आ जाने से यह मीडिया हो गया, क्योंकि यह महज़ पत्र यानी अख़बार नहीं रह गया। फिर इंटरनेट के बढ़ते चले जाने से इसकी शक्ल, और अक्ल, दोनों बदल गए। आज सुबह एक अच्छे ब्रिटिश अख़बार में एक लेख पढ़ते हुए उस पर यह सूचना जगमगा रही थी कि कुछ घंटों के भीतर उसे 2800 लोग पढ़ चुके हैं। कल तक यह अख़बार महज कागज पर पढ़ा जाता था, और उसके रद्दी में चले जाने तक लोगों को यह पता भी नहीं चलता था कि उसमें पढऩे लायक क्या है, और कितने लोगों ने उसे पढ़ा है। लोग अपनी मर्जी से पढ़ते थे। अब  तकनीक और कारोबार ने मिलकर लोगों के दिमाग में यह भरना शुरू कर दिया है कि पढऩे लायक क्या है। किस मुद्दे पर, किस का लिखा हुआ, अधिक पढ़ा जाता है। इसे आज इंटरनेट के पन्नों पर एक काउंटर इस तरह गिनते चलता है जिस तरह किसी ऑटो का मीटर चलता हो। इसी हिसाब से उन पन्नों पर इश्तहार मिलते हैं। अख़बारों की बाजारू लड़ाई में अख़बार यह साबित करने में लगे रहते थे कि कौन सा पेपर अधिक छपता है, लेकिन अब तो किस खबर को, किस लेख को कितनों ने पढ़ा, यह भी हर किसी को साथ-साथ दिखते चलता है। इसने कल तक की अखबारनवीसी और आज के मीडिया की अक्ल भी बदल दी। अब कोई भी रिपोर्टर या स्तंभकार, लेखक, संपादक, टीवी प्रस्तुतकर्ता, अपने लिखे या किये को रात-दिन इंटरनेट पर बढ़ावा देते दिख जाते हैं। हिंदुस्तान के एक बड़े नामी-गिरामी इंग्लिश न्यूज़ चैनल के मुखिया का नाम लेकर अभी अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर लिखा, कि वे यह समझ नहीं पाए कि उसने अपने चैनल के कार्यक्रमों का प्रचार करने के लिए, उसके भेजे हुए ट्वीट को आगे फ़ैलाने की बात उनसे क्यों कही। दरअसल अमिताभ अगर उस चैनल के कार्यक्रमों की ट्वीट को अपने नाम से फिर ट्वीट कर देते, तो उनको पढऩे वाले 5-10 लाख लोग भी उस चैनल के कार्यक्रम के बारे में जान जाते, लेकिन एक निजी सन्देश को उजागर करके अमिताभ ने चैनल को शर्मिंदगी में डाल दिया। बहुत से दूसरे लोगों ने अमिताभ को कोसा कि वे ट्विटर की तहजीब नहीं जानते, लेकिन अमिताभ ने चाहे जो किया हो, चैनल ने जो किया वो? अभी कुछ दिन पहले ही अमिताभ अपनी फिल्म की रिलीज़ के ठीक पहले उसके प्रचार के लिए इस स्टूडियो गए थे। जब खुद का प्रचार चैनल से करवाया, तो अब चैनल की बारी है अपना प्रचार अमिताभ से करवाने की।
बाज़ार की ऐसी मारकाट के बीच सबसे अधिक नुकसान अगर किसी का हुआ है तो वह पत्रकारिता है। अख़बारों के छपने (बिकने की बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मुकाबले में कितना बिकता है, कितना बंटता है, इसका हिसाब कोई नहीं लगा सकता), के आंकड़े, और टीवी समाचार चैनलों के दर्शकों की गिनती से अब मीडिया या पत्रकारिता की कामयाबी तय होती है। जिस तरह लोग पैसे वालों को बड़े लोग या अच्छे लोग कहने लगते हैं, उसी तरह अब अधिक गिनती वाले लोग बड़ा मीडिया कहलाते हैं। यह बड़ा कारोबार तो हो सकता है, लेकिन बड़ा अख़बार तो कोई अपनी साख से ही बन सकता है। गुलशन नंदा अगर प्रेमचंद से अधिक बिकने लगे, तो उससे प्रेमचंद छोटे लेखक नहीं हो जाते। लेकिन अगर साहित्य की उत्कृष्टता तय करने का काम सरकार में किताबें सप्लाई करने वाले बताने लगें, तो फिर प्रेमचंद की बारी कहाँ आयेगी? आज मीडिया के बाज़ार में यही हो रहा है।
जो लोग चीजों को अधिक बारीकी से देखकर समझते हैं, वे इस बारे में चर्चा भी करते हैं, लेकिन अपनी जिंदगी की लड़ाई में लगे अधिकतर लोगों के पास दूसरों के कारोबार में झाँकने का वक्त कहाँ? नतीज़ा यह है कि जिस अंदाज़ में अमिताभ अपनी फि़ल्में बेच रहे हैं, उससे अधिक फूहड़ अंदाज़ में मीडिया अपने को बेच रहा है। कभी-कभी हमें लगता है कि बहुत से बड़े-बड़े अख़बारों का अंदाज़ ऐसा होता है कि कार्यक्रमों को कराने के साथ-साथ वे अख़बार भी निकालते हैं। कुछ बड़े अख़बार देश में बड़े-बड़े कार्यक्रम ऐसी कंपनियों को प्रायोजक बनाकर करवा रहे हंै, जो कटघरों में खड़ी हैं, और जिनके खिलाफ मीडिया में बहुत लिखा जा रहा है, और जिनके जेल जाने के दिन करीब हैं।
अब वक्त है कि मीडिया के कारोबार वाले हिससे को पत्रकारिता से अलग करके देखा जाए।

फौजी ताकत से इंसानियत फिर शर्मसार



संपादकीय 
13 जनवरी 2012
अफगानिस्तान में तालिबानियों की लाशों के साथ अमरीकी फौजियों के आपत्तिजनक बर्ताव की दुनिया भर में निंदा हो रही है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई, और अमरीकी रक्षा मंत्री लेओन पनेटा ने अमरीकी फौजियों की इस हरकत की कड़ी निंदा की है। पनेटा ने कहा है कि यह हरकत करने वाले अमरीकी फौजियों से इसका पूरा जवाब मांगा जाएगा। उन्होंने अमरीकी, और नाटो सेना के कमांडर की अगुवाई में इस घटना की जांच के आदेश भी दे दिए हैं। यह फूटेज बहुत ही संवेदनशील समय में आया है। यह ऐसे समय में आया है, जब नाटो की सेना 2014 में अफगानिस्तान से चले जाने का ऐलान कर चुकी है। अफगानिस्तान में उसके बाद हालात बिगड़े नहीं, इसके लिए नाटो और अफगान सरकार तालिबानियों के साथ बातचीत शुरू कर रही है। अब तक पिछले दरवाजों से हो रही यह कोशिशें, अब कतार में तालिबानियों को बातचीत के लिये एक दफ्तर जुट जाने के बाद से खुलकर सामने आ गई है। ऐसे में जब तालिबानियों को बस 2014 तक अपनी ताकत सम्हाल कर इंतज़ार ही करना, और उसके बाद कमजोर अफगान तंत्र पर टूट पडऩा भर बाकी रह जाता था। इस वीडियो का सामने आना अफगानिस्तान में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इस वीडियो में खून से लथपथ एक तालिबानी लाश के साथ होने वाला दुव्र्यवहार अफगानिस्तान में तालिबानियों को नए लड़ाके जुटाने के लिए काफी हो सकता है। वहीं दूसरी ओर नाटो के दूसरे सदस्य देशों की नाराजगी, जिनेवा घोषणा और युद्ध के अंतरराष्ट्रीय नियम तोडऩे का इल्जाम अमरीका पर लग सकता है, वह अलग।

इसलिए अमरीकी रक्षा प्रतिष्ठानों ने तुरत-फुरत इस फूटेज में दिखाई गई घटना की निंदा कर डाली है। अबु गरीब जैसी घटनाओं के समय अमरीकी फौज की ज्यादतियों पर खामोश रहने वाले अमरीकी मीडिया का एक हिस्सा अब यह भी कह रहा है कि अच्छे बुरे लोग सब जगह होते हंै, सो फौज में भी हैं। ऐसी बातें भी कही जा रही हंै कि यह हरकत उन युवाओं ने की है, जिनके माता-पिता ने उन्हें सही परवरिश नहीं दी।  लेकिन इन सबके बीच एक बात जो गौर करने जैसी लग रही है, वह है किसी फौज की, किसी जगह लंबे समय तक तैनाती के मानसिक स्थितियों की। जब एक फौज किसी इलाके में तैनात की जाती है तो जाहिर तौर पर उस इलाके के लोगों को यह जताया जाता है कि वह कानून के दायरे में नहीं रहते, और उन्हें सही रास्ते पर रखने के लिए, या किसी विदेशी, बाहरी खतरे से उन्हें बचाने के नाम पर वहां फौज की तैनाती की गई है। ऐसी फौजों को किसी न किसी कारण लगातर हिंसा करनी पड़ती है, और कही न कहीं इंसानियत के प्रति फौजियों की संवेदनशीलता कम होते जाने की बहुत सी मिसालें दुनिया में जगह-जगह देखने को मिलती हैं। मारे गए तालिबानियों के साथ अमरीकी युवा फौजियों की हरकत ऐसी ही मानसिकता की मिसाल है। इसका फायदा दुनिया में अमरीकियों को निशाना बनाने के लिए उठाया जा सकता है। एक तालिबानी प्रवक्ता ने अमरीकियों पर अपने हमलों को जायज ठहराते हुए कहा भी है कि ऐसी हरकत अमरीकियों ने पहली बार नहीं की है, और उनके खिलाफ तालिबानियों के हमले जारी रहेंगे। अमरीकी ड्रोन हमलों के निशाने से ध्वस्त होकर, और अपने बड़े नेताओं के गिरफ्तार हो जाने के बाद टूटी कमर लेकर अमरीका से बात करने को राजी हुए तालिबानी आज तो यह कह रहे हंै कि, इस घटना से उनकी अपने  कैदियों को नाटो की गिरफ्त से छुड़ाने के लिए होने वाली बातचीत पर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन क्या इस घटना के बाद तालिबानियों के साथ सौदेबाजी में नाटो का हाथ नीचे नहीं हो जाएगा?
इन सब बातों पर गौर करने पर यह अंदाज भी लगाया जा सकता है कि नाटो-तालिबान के बीच की बातचीत में, नाटो का पक्ष हलका करने के लिए इस समय जानबूझकर यह वीडियो जारी किया गया है। भारत में भी हम देखते हैं कि जब आतंकवादियों में से नर्मपंथियों के साथ सरकार बातचीत का कोई सिरा खोलती है, तो जन भावनाएं भड़काने वाली या सरकार को बचाव की मुद्रा में लाने वाली कोई घटना हो जाया करती है। हालांकि इस घटना में गलती अमरीकी फौज की दिखती है, और खुद अमरीकी विदेश मंत्री इस वीडियो की सच्चाई से  इंकार नहीं कर रहे हैं। अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी कह रही हंै कि अमरीका इस घटना के निंदा करता है लेकिन इसके कारण वह किसी दबाव में आकर अपनी नीति नहीं बदलेगा। आज के मुश्किल हालात में जब परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान राजनीतिक अस्थिरता की कगार पर खड़ा है, परमाणु शक्ति से सम्पन्न उत्तरी कोरिया की कमान एक कम उम्र, कम तजुर्बेकार तानाशाह के हाथ में आ गई है, इस वीडियो का सामने आकर ताकत संपन्न देशों को आतंकवादी गुटों के आगे कमज़ोर करना, दुनिया के लिए कोई अच्छे आसार पैदा नहीं करता। भारत के लिए खासकर यह चिंता की बात है कि उसके एक पड़ोसी देश में राजनीतिक अस्थिरता है तो दूसरे में यह वीडियो बम फूटा है।

दीवारों पर लिक्खा है,


छोटी सी बात


12 जनवरी 2012
छोटी सी बात
आम जगहों को आप जीतना साफ-सुथरा रखते हैं, उतनी ही अच्छी सीख आपको मां-बाप आपको दे पाए...

एनजीओ भूख का हौव्वा खड़ा करते हैं, और सरकार?


12 जनवरी 2012
संपादकीय
मशहूर अर्थशास्त्री अरविंद पनगढिय़ा ने कहा है कि भारत और अफ्रीका की भूख की बातें कर करके एनजीओ दौलतमंद बनते जा रहे हंै, लोगों की तकलीफों से उनका व्यापार बढ़ रहा है। बात सुनने में बहुत कड़वी लगती है,क्योंकि पिछले कुछ सालों से गैर सरकारी संगठन क्षेत्र के दखल, और सुझावों से ही गरीबों के लिए सरकारों ने बहुत मानवीय योजनाएं बनाई हंै, जैसे- नरेगा। छत्तीसगढ़ की खाद्य सुरक्षा योजना जिससे सीख लेकर केंद्र सरकार अब खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने जा रही है। यही नहीं, सामाजिक और  सियासी फलक पर भी एनजीओ के दखल, और उनके कामों के कारण कौमी भेदभाव, जात-पांत का भेदभाव, कोख में बेटियों की हत्या, और विवादास्पद होने पर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन ने जनता और सरकार दोनों को दिशा दी है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब अपने विषय का कोई बड़ा जानकार  ऐसी चुभती बात कहता है, तो उस पर गौर करना लाजिमी हो जाता है।
जनता की भलाई के लिए सरकारों की योजनाएं एनजीओ की मदद से सही तरीके से अंजाम तक पहुंच सकती हैं। वह समाज और सरकार के बीच कड़ी का काम करते हैं। सन 2000 में गुजरात में विनाशकारी भूकंप आने के बाद से देश में एनजीओ की तादाद बहुत बढ़ी, क्योंकि उस दौर में लोगों ने देखा कि मुसीबत में पड़ी जनता के लिए मदद जुटाने में एनजीओ कितने कारगर होते सकते हैं। प्रशिक्षित, विषयों के जानकार, और दिलों में जनता की सेवा करने का जज़्बा रखने वाले लोग समाज में बदलाव लाने के लिए क्या कुछ नहीं कर सकते। देश के कोने-कोने में ऐसे बहुत से एनजीओ हंै, जो बिना किसी शोर शराबे,  शोहरत की हसरत के, किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बिना, संजीदगी से अपना काम करते रहते हैं। ऐसे संगठनों के कारण एनजीओ क्षेत्र को नाम विश्वसनीयता और इज़्ज़त मिली है,  लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जहां तकलीफंे हंै और उन्हें दूर करने की जरूरत है वहां ऐसे लोगों के लिए मौके हैं। जिन्हें एनजीओ बनाने, उन्हें चलाने की जानकारी है, और वह यह काम करना चाहते हैं समाससेवा का बहुत बड़ा जज़्बा दिल में ना होने पर भी यह लोग पेशेवर अंदाज में, अपनी पढ़ाई-लिखाई को काम में लगाकर इस क्षेत्र में अपना कैरियर बनाते हैं, लेकिन जब लोगों की तकलीफंे किसी की रोजी रोटी का जरिया बन जाए, तो यह खयाल भी उभर सकता है कि तकलीफे नहीं रहेंगी, तो हमें पूछेगा कौन, या तकलीफों का खौफ खड़ा करके अपने पैरों तले जमीन मजबूत की जाए। बहुत से विवादास्पद एनजीओ के कारण आज लोग इन सगठनों पर हावी हो रही पांच सितारा संस्कृति के बारे में बात करने लगे हैं। भोपाल गैस त्रासदी हो या गुजरात भूकंप, या गुजरात  कौमी  दंगे, या फिर छत्तीसगढ़ समेत नक्सल प्रभावित राज्यों की समस्याएं। शक पैदा करने वाले  एनजीओ और उनकी भूमिका पर चर्चे गाहे-बगाहे होते ही रहे है। यही नहीं आतंकवादियों की मदद के लिए एनजीओ के इस्तेमाल पर भी सरकार की तेज नजर है।
हम अक्सर एनजीओ के खिलाफ कुछ लिखने में संयम बरतते हंै, क्योंकि मु_ीभर लोगों के कारण, वाकई गंभीरता से काम कर रहे बहुत से संगठनों के लिए जनता के दिल में शक पैदा हो, यह हम नहीं चाहते। लेकिन यह सच है कि पैसों का गलत इस्तेमाल करने वाले, समस्याओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर सरकारी दान लेने वाले एनजीओ आखिरकार चलते तो जनता के पैसों से ही हैं। यही नहीं कार्पोरेट क्षेत्रों से बड़े-बड़े दान लेकर चल रहे एनजीओ भी आखिरकार तो जनता के पैसों से चलते हंै, क्योंकि इन कार्पोरेटों की शेयरधारक जनता है। यह जिन संसाधनों का इस्तेमाल करके धन बटोरते हंै, उन पर जनता का हक है, इसलिए हमारी यही उम्मीद रहती है कि एनजीओ के कामकाज में जितनी हो सके, पारदर्शिता बरती जाए। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में एक व्यक्ति ने एनजीओ को दिए जाने वाले पैसों के खर्च की जांच के लिए याचिका दायर की, तो सरकार की एक विकास एजेंसी कापार्ट ने अदालत को बताया कि आज भ्रष्टाचार के खिलाफ जेहाद चलाए हुए अन्ना हजारे के अपने ट्रस्ट ने गांवों में सिंचाई के लिए मिले पैसों का 90 फीसदी आने-जाने, वेतन, और छपाई में ही खर्च कर दिया। एजेंसी को फिर भी इससे शिकायत नहीं, शायद इसलिए कि जनता का पैसा सबका पैसा होता है। एनजीओ की जवाबदेही और पारदर्शिता की जांच सरकार का काम है, क्योंकि वही इन्हें जनता के लिए बनाए गई अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों की जिम्मेदारी और उसे निभाने के लिए जनता के पैसे सौंपती है, लेकिन ऐसे संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वह अपनी पारदर्शिता बनाए रखे।
पनगढिय़ा ने जो बात कही है वह पारदर्शिता और जवाबदेही के इसी मुद्दे से जुड़ा दूसरा, और बहुत अहम मुद्दा है। अपने लिए बाज़ार तलाशने, आर्थिक फायदे के लिए किसी समस्या का हौव्वा खड़ा करने का आरोप अक्सर संगठनों पर लगाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य  संगठन पर पिछले बरसों में यह आरोप कई बार लगते रहा कि वह कुछ दवा कंपनियों के फायदे के लिए महामारियों का डर खड़ा कर रहा है। यही बात एड्स और भुखमरी के लिए काम कर रहे संगठनों पर अक्सर लगता रहता है। भारत में भुखमरी और गरीबी के आंकड़ों पर इस क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों, खाद्य सुरक्षा पर अभियान चला रहे संगठनों का,  योजना आयोग से टकराव इन दिनों ज़ोरों पर है। इन संगठनों ने योजना आयोग को गरीबी की बहुत अपमानजनक सीमा वापस लेने पर मजबूर किया है, लेकिन कार्पोरेटों को लाखों-करोड़ों की रियायत देने वाली सरकार गरीबों की खाद्य सुरक्षा में कुछ हजार करोड़ के खर्च को बूते के बाहर बताकर इन संगठनों की बात न मानने पर तुली है। पनगढिय़ा एशियाई विकास बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हंै। उन्होंने विश्व बैंक और आईएमएफ में भी काम किया है, इसलिए भूख पर काम कर रहे संगठनों के बारे में उनकी राय, ऐसे संगठनों के लगातार निशाने पर बने हुए मॉंटेक सिंह अहलुवालिया से किसी हमदर्दी के कारण है, या उससे परे, यह तय करने का बीड़ा हम नहीं उठाते। यह सच है कि भूख मिटाने के लिए देश के संसाधनों में से ज्यादा हिस्सा मांग रहे समाजिक संगठन, योजना आयोग और वित्त मंत्रालय के आंख की किरकिरी बने हुए हैं, और यह भी सच है कि दुनिया में ऐसे भी एनजीओ जिन्होंने लोगों की तकलीफों को पैसे कमाने का जरिया बनाया है, पनगढिय़ा  के बयान को इन दोनों बातों की बिना पर तौलकर देखना होगा। लेकिन यह सच है कि अगर भूख पर शोर मचाने वाले एन जी नो नहीं होते तो, मॉंटेक सिंह 20 रुपये रोज को गरीबों के गुजारे के लिए काफी ठहरा चुके होते। और यह भी कि अगर एनजीओ भूख का हौव्वा खड़ा करके पैसे बना रहे हंै, तो इसकी जिम्मेदारी से सरकारें और ऐसे  बैंक नहीं बच सकते, जो जनता का पैसा उन्हें देकर उस पर नजर रखने की अपनी जिम्मेदारी से चूक जाते हैं।


दिमाग है कि मानता नहीं


संपादकीय
11 जनवरी 2012

एक लोकप्रिय गीत है- दिल है कि मानता नहीं, लेकिन लंदन में एक दिलचस्प शोध हुई है जिसके मुतबिक औरतों का दिमाग, उनके जिस्म  को आईने  में उसके  असल आकार के मुकाबले दो तिहाई ज्यादा फैसला हुआ दिखाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि शरीर की अपनी व्यवस्था तो हमें हमारे अंगों के बारे में सही जानकारी देती है, लेकिन यह हमारे  दिमाग  की शरारत है, कि आइने में हमें हमारा जिस्म मोटा दिखाता है। शोध करने वालों ने पाया कि यंू तो अपने शरीर को शीशे में असलियत से ज्यादा मोटा देखने की गलती सभी करते हंै, लेकिन औरतों में यह बात खासतौर पर पाई जाती है, लेकिन यूनिवर्सिटी कालेज ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों ने जो बात खोजबीन करके कही है, क्या उसके फायदे खूबसूरती का बाजार अर्से से भुना नहीं रहा है? या कि बरसों से इस बाजार ने औरतों के दिमाग की जो वायरिंग की है, उसे जिस दिशा में दसियों सालों से धकेला है, उसका ही यह नतीजा है कि आज हमारा दिमाग हमें आईने में अपने असल आकार से मोटा समझने, हम जितने अच्छे दिखते हंै, उससे कमतर देखने के लिए भटका रहा है, ताकि हम उसे अपने मन माफिक बनाने के लिए खूबसूरती के बजार के हाथों खेलें, क्रीम लोशन या कास्मेटिक सर्जन के चाकू की धार का सामना करें।
एक पुरानी कहावत है- आईना झूठ नहीं बोलता। लंदन के वैज्ञानिकों ने  अब बताया है कि दरअसल यह दिमाग है, जो झूठ बोलता है। इस शोध के सतही और गहरे दोनों लिहाज  से मायने निकाले जा सकते हंै। ट्विटर पर फैशन इंडस्ट्रीज़ नाम के पेज पर पोस्ट किया गया एक ट्वीट हमारे समाज में इस शोध की जडं़े बताता है-- मंै फैशन इंड्स्ट्री हंू, जो औरतों को आज़ादी की राह से भटकाकर उन्हें दिमागी और जिस्मानी तौर पर पूरी तरह गुलाम बना देती है। खूबसूरत दिखने की चाह, जैसे है उससे बेहतर दिखने की चाह में कुछ गलत नहीं, लेकिन उसके पीछे लगाई जाने वाली बेदिमाग  दौड़, जिसके लिए आज भारत के महानगरों से लेकर गांव-देहात के कस्बों तक लकीरे खींची जा चुकी हैं, खतरनाक है। एक के बाद एक देश ने कुछ सौंदर्य  साम्राज्ञियां  दुनिया को दीं ,और 42 फीसदी कुपोषित देश पूरी तरह खूबसूरती के व्यापारियों की झोली में आ गिरा। अब बाजार के जानकार कह रहे हंै कि 2014 तक भारत का पहले से ही तेज़ी से बढ़ रहा खूबसूरती का उद्योग 50 फीसदी और ज्यादा हो जाएगा। इनका कहना है कि ऐसा लोगों ने स्वच्छता और अपनी छवि के प्रति जागरुकता आने के कारण होगा। सुनने में यह बातें मासूम लगती हंै, जो किसी भी इंसान के लिए बुरी नहीं हो सकती, लेकिन यह जागरुकता किस कीमत पर, किन नैतिक धरातलों पर और कैसे, और किस हद तक आ रही है, यह सोचना भी जरूरी है। टी वी खोलते ही विज्ञापन दिखाते हंै कि किस  तरह एक सांवली आबादी को महज गोरा बना देने से उसकी  समस्याएं सुलझ जाती हंै। शैम्पू, टूथ पेस्ट, साबुन के विज्ञापनों में बताया जाता है कि इन्हें बनाने के दुनिया भर के कितने जहीन लोगों का ज्ञान उंडेला गया है, लेकिन इन उत्पादों के निर्माता उन्हें कितनी ईमानदारी से बनाते हैं, यह जांचने वाला कौन है ?
गोरी चमड़ी के लिए क्रीम, लोशन, आंखों के लिए कॉंटेक्ट लेंस, और शरीर को बार्बी डॉल जैसा बनाने के लिये देश के छोटे  छोटे कस्बाई शहरों में भी लोगों के जिस्मों पर चलते कास्मेटिक सर्जनों के नश्तर आम हैं। पिछले दिनों एक रिपोर्ट में बताया गया कि किस तरह रायपुर जैसे छोटे कस्बाई शहर में भी लोग लाखों  रुपये खर्च करके अपने रूप, रंग,जिस्म  का कायाकल्प करवा कर अपनी समस्याए सुलझाने की कोशिशें कर रहे हंै, लेकिन इन कास्मेटिक  सर्जरियों के लंबे समय के नुकसान के बारे में अपने उपभोक्ताओं को जागरुक करने की इन पर कोई बंदिश नहीं है। अमरीका में कम उम्र से ही लड़कियों में सौन्दर्य प्रसाधनों के इस्तेमाल का चलन बढ़ गया है। अपनी कदकाठी छोड़ वह साईज जीरो या बार्बी जैसी अस्वाभाविक काया हासिल करने के लिए भूखी मरती, गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती हंै, कोई कोई तो मर भी जाती हैं। दुनिया में पूंजीवाद के प्रतीक वालमार्ट के प्रवक्ता का कहना है कि उनका स्टोर मेकअप के सामान बेचता है, लेकिन उन्हें किस उम्र की बच्चियों के लिए खरीदना है, यह फैसला माता-पिता का है। इस बाजार की देन ऐसे  माता-पिता हंै जो अपनी  बच्चियों को परीकथाएं सुनाने की उम्र में लेडी  गागा की मिसालें देते हैं। अभी बहुत दिन नहीं हुए है जब अमरीका में खुद को मानव बार्बी कहने वाली, अब तक अपने ऊपर दस लाख पाऊंड की कास्मेटिक सर्जरी करवा चुकी 51 बरस की सारा बर्ज ने अपनी 7 साल की बेटी की फरमाईश पर उसे ब्रेस्ट इम्प्लांट वाऊचर जन्मदिन पर भेंट में दिया। इस  लालसा को कुरदने और हवा देने के लिए आए दिन होने वाली सौंदर्य स्पर्धाएं, फैशन शो, और फैशन पत्रकारिता जैसे हथियार इस बाजार के हाथियार हैं। और इस बाजार का निशाना कौन है? एक ऐसी दुनिया ,जो एड्स ,गरीबी, और भुखमरी जैसी समस्यओं से जूझ रही है, जहां एक बीमारी खत्म होती नहीं कि दूसरी सिर उठा लेती हंै, ऐसी दुनिया में खुद को और ज्यादा खूबसूरत देखने की जि़द लिए बैठा दिमाग नई-नई तरह की असमनाताएं पैदा कर रहा है। जब सेहत पर होने वाले खर्च का हिसाब लगा कर दुनिया के जहीन यह समझा रहे हंै कि स्वास्थ्य गया, तो बहुत कुछ गया, और सेहत, विकास की चिंताओं में अहम् बन चुकी है, खूबसूरती का बाज़ार  मानव बल की  सेहत, सौन्दर्य प्रसाधनों की कीमत पर बिक्री कर की तरह वसूल ले रहे हंै। अमरीकी सरकार ब्रेस्ट इम्पलांट कारण सेहत का खतरा उठा रही 30 हजार महिलाओं का दोबारा ऑपरेशन कर यह सिलिकॉन इम्प्लांट्स अपने खर्च पर उनके जिस्म से निकलवा रही हंै लेकिन भारत जैसे देश में, जहां भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों से सरकारों का बेदरकारी का इतिहास रहा है ऐसे किसी खतरे से जनता के हिफाज़त कौन करेगा? भारत ही नहीं, बहुत से विकासशील देशों की व्यवस्थाओं में ऐसी बहुत सी खामियां हंै जो इस बाज़ार को उसकी जवाबदेही से छूट जाने की आज़ादी दे देती हैं। और दुख की बात यह है कि इस बाज़ार का निशाना ऐसे ही देश ज्यादा है ऐसे में  दिमाग को सही रास्ते पर चलाना, उसे ऐसा बनाए रखनाकि इंसान को सचाई देखने दे, एक बड़ी चुनौती है।

छोटी सी बात



10 जनवरी 2012
छोटी सी बात
अपनी आत्मा को मारकर गलत काम करने के पहले सोचें कि जिंदा रहना क्या इतना जरूरी है?


इस मलाई को हटाओ


10 जनवरी 2012
संपादकीय
देश के सबसे बड़े राज्य के चुनाव के बीच अब लोगों को इंतजार है कि राजनीतिक दल किस-किस तरह की घोषणाएं कर सकते हैं। यह तमिलनाडु तो है नहीं कि टीवी और लैपटॉप, मंगलसूत्र और चावल बांटकर वोटरों को रिझाया जा सके, यह तो उत्तरभारत का दिल है जिसे जातिवाद और आरक्षण से लुभाने का काम अनंतकाल से चले आ रहा है और जाने कब तक यह फार्मूला यहां असरदार बने रहेगा। ऐसी चर्चा है कि कांग्रेस दलितों के बीच दलित और अतिदलित जैसे फर्क को खड़ा करके इस आरक्षित समुदाय के भीतर भी वोटों के जातिगत संतुलन को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर सकती है। कहा जा रहा है कि जिस तरह बिहार में नीतिश कुमार ने ओबीसी को दो हिस्सों में बांटा था उसी तरह कांगे्रस यहां दलितों के साथ करना चाह रही है। कांगे्रस ने मुस्लिमों को ओबीसी में शामिल करने की बात सामने रखकर आरक्षण को सीधे-सीधे चुनावी गणित से जोडऩे का काम कुछ महीने पहले से शुरू कर ही दिया है, अब चुनावी वायदे ऐसी कुछ और बातें देख सकते हैं। मजे की बात यह है कि पूरे देश में आधी आबादी को फायदा दिला सकने वाले महिला आरक्षण की बात भी बंद हो गई है क्योंकि देश की महिलाएं मतदाताओं के किसी एक तबके में, किसी एक घेरे के भीतर खड़ी हुई नहीं हैं।
महिला आरक्षण की हिमायत ने कुछ नया कहने को नहीं है सिवाय इसके कि राजनीतिक दल संसद के भीतर और संसद के बाहर लगातार पूरी तरह बेईमान बने हुए हैं क्योंकि इन पार्टियों के भीतर फैसला लेने वाले लोग पुरूषप्रधान सोच के प्रतीक हैं, और ऐसे लोगों के कब्जे से सोनिया गांधी जैसे लोग भी बाहर नहीं आ पाते। लेकिन आज हम यहां पर महिला आरक्षण पर चर्चा के बजाय, मौजूदा आरक्षित तबकों की बात करना चाहते हैं जो कि कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा देने के नाम पर उन तबकों के ताकतवर लोगों के हाथों में उस फायदे को देने का काम कर रहे हैं। दलित, आदिवासी या ओबीसी, जिस भी जाति के आधार पर आरक्षण तय किया गया उसका मकसद था कि ये समाज देश के भीतर बहुत कमजोर हैं और इसलिए उन्हें बाकी लोगों की बराबरी तक लाने के लिए आरक्षण की जरूरत है। लेकिन इन तबकों के भीतर आरक्षण का फायदा पाने की आर्थिक और शैक्षणिक क्षमता उस मलाईदार तबके में ही लगभग सीमित रह गई है जो कि जाति से इन तबकों का होने के बाद भी ताकतवर हो चुका है और आगे बढ़ चुका है। जब तक किसी भी आरक्षित तबके के भीतर मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदे से हटाया नहीं जाएगा तब तक उन जातियों के सबसे कमजोर लोगों को आरक्षित वर्ग के भीतर ही सीमित सीटों पर अपने ही ताकतवर लोगों के बराबर तक मुकाबले में पहुंच पाना नसीब ही नहीं हो सकता। आरक्षित तबके के एक सांसद, विधायक, अफसर या करोड़पति के बच्चे किसी दाखिले के लिए या नौकरी के लिए जितनी तैयारी कर सकते हैं, उतनी तैयारी उनकी जातियों के बाकी 99 फीसदी बच्चे नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि कमजोर समुदायों के भीतर, जाति और रक्त के आधार पर, एक ऐसे ताकतवर तबके का एकाधिकार सा आरक्षित सीटों पर हो चला है जो कि एक दूसरे नजरिए से देखें तो सामान्य तबके के अधिकांश लोगों से भी बहुत अधिक ताकतवर हो चुका है।
ऐसे में संसद से लेकर अदालत तक और सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक जागरूकता का एक ऐसा आंदोलन छेडऩे की जरूरत है जो मलाईदार तबके को देश के किसी भी आरक्षण से बाहर करने के लिए हो। ऐसा कानून लिखकर तैयार करने वाले और ऐसा कानून बनाने वाले लोग चूंकि ऐसे ही मलाईदार तबकों के लोग हैं इसलिए ऐसी राय भी इनके वर्गहित के खिलाफ की है। लेकिन भारत के वामपंथी दलों को इस सामाजिक हकीकत को उठाने की जरूरत है और इसे एक बहुत बड़ा चुनावी राजनीतिक मुद्दा बनाने की जरूरत है क्योंकि राजनीतिक मुद्दा बनाए बिना, वोटों पर असर का खतरा खड़े किए बिना इस देश में ऐसा कोई फैसला सत्ता पर बैठे लोग खुद होकर नहीं लेंगे। यहां पर हम अदालतों में आरक्षण पर बहस के दौरान इस बारे में कही गई बहुत सी बातों को लाना नहीं चाहते क्योंकि कानून की तकनीकी बारीकियों से परे व्यापक जनहित की और सबसे कमजोर तबके की मदद करने की एक सोच जरूरी है जो कि तकनीकी बातों की चर्चा में उलझकर रह जाएगी।