मौके की नजाकत


मौके की नजाकत


29 फरवरी 2012
छोटी सी बात
अस्पताल, श्मशान और शोक का कोई भी मौका हंसी मजाक का नहीं होता। कल रात ही एक बिल्कुल शांत अस्पताल में खड़े-खड़े बातें करते हुए मेरे ही मुंह से एक किस्सा निकला। यह अंदाज नहीं था कि उसे सुनने वालों में से एक की हंसी इतनी तेज रहेगी कि अस्पताल की कई मंजिलें गूंज जाएं। तुरंत ही वहां से बाहर निकलना पड़ा, लेकिन यह सूझते-सूझते फिर भी कुछ समय बर्बाद हो गया कि मरीज का हाल ठीक रहने पर भी हंसी-मजाक कुछ ठीक नहीं। 
इसके बारे में सोचते हुए कुछ समय पहले की एक बात याद आई कि एक परिचित परिवार में मुखिया के गुजर जाने के अगले दिन जब मैं वहां पहुंचा तो गर्मी की दोपहर तमाम लोग घर के भीतर थे और बाहर तक खूब हंसने-खिलखिलाने की आवाजें आ रही थीं। फाटक पर खड़े रहकर यह भी अटपटा लगा कि घंटी भी बजाएं या नहीं, क्योंकि इतनी हंसी के बीच बाहर कोई पहुंच गया है यह सोचकर भी शायद घरवाले कुछ झेंप जाएं। 
मौके-बेमौके की बात यही होती है। कोई बात किसी जगह बहुत अच्छी होती है और दावत में चार लतीफों के साथ आप हिट हो सकते हैं। दूसरी तरफ किसी परेशानी या गमी के मौके पर आप लतीफों के बीच खड़े रहकर भी लोगों की हैरानी और हिकारत का सामान बन सकते हैं। इसलिए ऐसे मौकों का ख्याल जरूर रखना चाहिए जब लोगों की भावनाएं पिघली हुई रहती हैं।  
किसी के बच्चे के इम्तिहान के समय अगर आप परीक्षा की परेशानी से कहीं किसी और की की हुई आत्महत्या की चर्चा छेड़ बैठेंगे तो आप उस परिवार को जरूरत से अधिक विचलित भी कर सकते हैं। इसी तरह किसी शादी के मौके पर तलाक की चर्चा, खाने की मेज पर किसी गंदगी की चर्चा, लोगों के मन में आपके लिए एक गहरी नापसंदगी पैदा कर देती है। इसलिए अपनी सही बात को भी किसी अटपटे मौके पर न करें।
-सुनील कुमार


महिला-शोषण का कोई अंत नहीं



संपादकीय
29 फरवरी 2012
अभी-अभी खबर आई है कि ऋषिकेश में 'दोस्तोंÓ ने स्कूल में पढऩे वाली एक लड़की के साथ बलात्कार किया। आज भारत में भी शहरी जिंदगी में स्कूल के लड़के-लड़कियों को साथ में घूमने-फिरने या काम करने की बहुत सी नौबत आती हैं या वे अपनी पसंद से ऐसा करते हैं। सोलह बरस की लड़की से उसी के स्कूल के उसी के उम्र के लड़कों का एक गिरोह बलात्कार करे तो ऐसी खबर से बाकी बच्चों के भी सावधान हो जाने की जरूरत आ जाती है। 
पश्चिमी देशों की घटनाओं को कुछ लोगों ने पढ़ा होगा और कुछ लोगों ने नहीं भी पढ़ा होगा। किसी शराब या दूसरे डिं्रक में धोखे से घोलकर दी जाने वाली एक गोली से पीने वाले का अपने पर से आपा खत्म हो जाता है। पश्चिम में लड़के-लड़कियों के मिलने के डेट रहते हैं और ऐसी डेट पर इस तरह की गोली घोलकर पिलाकर बहुत से लोगों ने बलात्कार किए। बाद में उस गोली को ही रेप-पिल कहा जाने लगा और उस पर रोक लगाने की मांग उठने लगी। आज महिलाओं के बहुत से संगठन इन गोलियों के बारे में जानकारी बढ़ाते चल रहे हैं। भारत के महानगरों और उनके बाद के दूसरे दर्जे के शहरों को छोड़ दें, तो लड़के-लड़कियों का इस तरह मिलना-जुलना देश के एक बड़े हिस्से में कुछ कम होता है। लेकिन शराबखानों से परे भी तो लड़के-लड़कियों का किसी और जगह साथ बैठकर पीना कोई अनहोनी अब भारत में नहीं रह गई है। इसलिए इस तरह की नौबत से बचने और अपने आसपास के लोगों को बचाने की जरूरत सब लोगों को है। जिनके बच्चे अभी-अभी खतरे की ऐसी उम्र में दाखिल हो रहे हैं उनको शुरू में सचेत करने की जरूरत मां-बाप या आसपास के बड़े लोगों की है, और जो बच्चे बड़े हो चुके हैं उनको खुद ही खतरों से बचना सीखना होगा। बात सिर्फ बलात्कार की नहीं है, उसके साथ-साथ इन दिनों छोटे-बड़े हर किस्म के शहर से जिस तरह हर जेब में रहने वाले मोबाईल फोन से खींची जाने वाली तस्वीरों या उस पर होने वाली रिकॉर्डिंग बाजार में बिक रही है, उससे ऐसे हमले की शिकार, आमतौर पर लड़कियों, की बाकी पूरी जिंदगी तबाह सी हो जाती है और पूरे परिवार को शहर छोडऩे जैसी नौबत आ जाती है। 
भारत में कुछ दकियानूसी संगठनों की धमकियों के चलते जवान हो चले बच्चों को भी उनके शरीर और उनकी वयस्क जरूरतों की साधारण जानकारी से दूर रखा जाता है। इसे एक भारतीय संस्कृति मान लिया गया है कि जवान हो जाने पर भी लोग जवानी की जरूरतों से अनजान रहें। स्कूल की बड़ी कक्षाओं या कॉलेजों में भी वैज्ञानिक तरीके से जो सेक्स-शिक्षा दी जा सकती है उसके बजाय हिंदुस्तान में जमाने से सिर्फ पोर्नोग्राफी बाजार में मौजूद है। यह सिलसिला बदलना चाहिए और हमने सामाजिक उदारता के मामले में देखा है कि वोट बिगडऩे से डरी-सहमी सरकारें समलैंगिकता से लेकर बिना शादी साथ रहने जैसे कई मुद्दों पर अदालत से सामाजिक बुराई पाकर फैसला देने की उम्मीद करती हैं। नतीजा यह है कि तरह-तरह की बीमारियों, सामाजिक अपमान, ब्लैकमेलिंग और मानसिक यातना का खतरा लड़कियों पर छाया ही रहता है। हमारा ख्याल यह है कि अलग-अलग सामाजिक संगठनों को अपने स्तर पर अपने बच्चों को वैज्ञानिक जानकारी देने के लिए खुद ही ऐसी पहल करनी चाहिए जिसमें वोटरों से भयभीत सरकारों की जरूरत न पड़े। आखिर बच्चे तो लोगों के अपने हैं, सरकार के तो हैं नहीं। 
पश्चिम बंगाल में सरकारी अस्पतालों में पिछले दिनों बलात्कार की कुछ घटनाएं हुई हैं। इनको देखते हुए भी हम इस मुद्दे पर संस्थानों और कामकाज की जगहों पर महिलाओं पर होने वाली ऐसे हमलों के खिलाफ सावधानी की तैयारी सुझाना चाहेंगे। जहां-जहां बच्चे, लड़कियां या महिलाएं शिकार हो सकते हैं वहां-वहां ऐसी जगहों के जो मुखिया हैं उनको ऐसी नौबत से बचाव के लिए तैयारी करनी चाहिए। भारत में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा साफ आदेश कामकाजी महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए है जिसे विशाखा गाईडलाइंस नाम से लागू किया गया है। लेकिन हमारा देखा हुआ यह है कि राज्य सरकार तक इस दिशा-निर्देश के मुताबिक बचाव का इंतजाम लागू नहीं करती, या कि कामकाजी महिला के शोषण की कोई वारदात हो जाने पर उसकी जांच तक सही तरीके से नहीं करती। यह सिलसिला बदलना चाहिए।


बाहर गए छत्तिसगढिय़ा मजदूर का ख्याल रखने की जरूरत



संपादकीय
28 फरवरी 2012
हरियाणा में बंधुवा बनाकर काम पर लगाए गए छत्तीसगढ़ी मजदूरों की रिहाई को लेकर कल ही रायपुर से सरकार ने हरियाणा से बात की है। इसे एक दिन भी पूरा नहीं हुआ है कि उत्तरप्रदेश से खबर आई है कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा सीमा तरफ की उप्र की एक अवैध खदान के ऊपर का पूरा पहाड़ धसक जाने से उसमें करीब पचास लोगों के मरने की आशंका है और दर्जन भर लाशें मिल चुकी हैं, इस पूरे काम में इस इलाके में छत्तीसगढ़ के हजारों मजदूरों के लगे होने की खबर है। कोई महीना ऐसा नहीं गुजरता जब देश के किसी न किसी इलाके से मजदूरों के बंधुवा होने, या किसी काम के दौरान मारे जाने की ऐसी खबर न आती हो जिसमें कि छत्तीसगढ़ के मजदूरों का जिक्र हो। 
देश के बहुत से हिस्सों से अधिक या बेहतर संभावनाओं वाले दूसरे हिस्सों की तरफ मजदूरों की आवाजाही लगी ही रहती है। और यह बात सिर्फ हिंदुस्तान की नहीं है, अमरीका में पड़ोस के देश मैक्सिको से रोजाना दसियों हजार मजदूर सरहद पार करके आते हैं और अमरीका को सस्ती मजदूरी देकर, अपने लिए मैक्सिको से अधिक रोजी जुटाकर लौटते हैं। हम इसे किसी किस्म का पलायन नहीं कहते। छत्तीसगढ़ में सरकारी और राजनीतिक जुबान जिसे छत्तीसगढ़ी मजदूरों का पलायन कहती है वह तो दरअसल जिंदगी की लड़ाई का एक ऐसा सफर है जिसमें लोग दिक्कतें और खतरे झेलते हुए दूर-दूर तक जाते हैं और तरह-तरह के शोषण को झेलते हुए भी अपने परिवार और बच्चों के साथ वहां रात-दिन खून-पसीना एक करते हैं। वे इसे पलायन कहने वाले लोग जो कि सत्ता पर काबिज रहते हैं, उनको अपनी भाषा सुधारने की जरूरत है। जिन लोगों पर गरीबों को काम देने, उनके लिए बेहतर संभावनाएं बढ़ाते चलने की जिम्मेदारी है, यह उनका पलायन है, अपनी जिम्मेदारियों से। लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार से लेकर विधानसभा तक इसे मजदूरों का पलायन कहा जाता है।
हर बरस लाखों मजदूर इस राज्य से दूसरे राज्यों में जाते ही हैं। हो सकता है कि उनके गांवों के आसपास जो काम खेत-कारखानों या सरकार की योजनाओं में मिलते हैं, उनसे काफी अधिक मजदूरी उनको दूसरे प्रदेशों में ठेके की मजदूरी की शक्ल में मिलती हो। वहां जाकर पूरा परिवार रात-दिन काम करता है और कुछ पैसे बचाकर अपने घर लौटता है। लेकिन यहां हर बरस हम ऐसे बयान छापते हैं कि जाते हुए मजदूरों को रोककर स्टेशनों पर पुलिस किस तरह की वसूली करती है। होना तो यह चाहिए कि राज्य सरकार किसी अच्छे संस्थान के लोगों को बाहर से लाकर यह शोध करने का जिम्मा दे कि राज्य के किस-किस इलाकों से किन वजहों से लोग हर बरस मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। इन इलाकों में उनके लिए अगले बरस तक बेहतर इंतजाम करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन आधी सदी से 'पलायनÓ जैसी गाली देते हुए रिपोर्ट छपती चली जाती है, और न भोपाल के वक्त हालत सुधरी, न रायपुर के वक्त। 
छत्तीसगढ़ सरकार को बिना देर किए हुए राज्य के ऐसे इलाकों का अध्ययन करवाना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि देश के नक्शे में ऐसे इलाकों को लगातार दर्ज करके रखा जाए जहां पर कि छत्तीसगढ़ से गए हुए मजदूर काम पर रहते हैं। इनकी शिनाख्त बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि इनके गांव में यह पता होता है और ऐसे लोगों के फोन नंबर जुटाकर सरकार लगातार इनसे संपर्क भी कर सकती है ताकि उनकी किसी परेशानी के वक्त यहां की सरकार उस राज्य से तुरंत बात कर सके। हमारा अनुभव यह भी कहता है कि सरकार के अपने ढांचे के लोग अपने काम के मिजाज के चलते संवेदनशीलता खो बैठते हैं। ऐसे में राज्य के ऐसे जिलों में काम करने वाले कुछ भरोसेमंद जनसंगठनों को ऐसी रिपोर्ट और संपर्क का काम दिया जा सकता है ताकि बाहर गए हुए छत्तीसगढ़ी मजदूरों के हाल की खबर यहां होती रहे। इस राज्य ने अपने अस्तित्व में आने के बाद से अपने ढांचे में बहुत क्रांकीट ढलते देखा है, लेकिन राज्य के मजदूरों के हुनर में खूबियां जोड़कर उनको सबसे सस्ती मजदूरी से बेहतर किसी काम के लायक बनाने का मानवीय ढांचा बेहतर नहीं बन पाया है। इस बारे में कोशिश की जानी चाहिए और यहां के मानव संसाधन में महत्व जोडऩे की जरूरत है। फिलहाल उत्तरप्रदेश के जिस हादसे को लेकर हमने लिखना शुरू किया है, उसमें अगर छत्तीसगढ़ी मजदूर शिकार हुए हैं तो उनकी पूरी मदद राज्य सरकार को करनी चाहिए।


कुछ दरवाजों के पीछे, या इंटरनेट पर


27 फरवरी 2012
आजकल

सुनील कुमार

अपने अखबार के लिए रोज हिंदी ग्राफिती, 'दीवारों पर लिक्खा हैÓ लिखते या बनाते हुए उस दिन के आसपास कुछ देखा हुआ, कुछ भोगा हुआ या कुछ पढ़ा और सुना हुआ असर डालता है। तकरीबन हर बार अपने खुद के शब्दों में एक पैनी बात लिखना कभी-कभी कुछ मुश्किल भी होता है और ऐसी नौबत से बचने के लिए जब जहां जो बात सूझ जाती है, उसे लिखकर रख लेने की आदत सी पड़ गई है। 
कभी-कभी दिमाग में कुछ बातें इस कदर घर कर जाती हैं कि हफ्तों तक किसी एक ही किस्म की बातें लिखना होता है और मुझे जानने वाले कुछ करीबी लोग इस बात को लेकर परेशान होने लगते हैं कि मेरे निशाना कहीं उनकी तरफ तो नहीं है। ऐसे में कुछ लोगों के सामने यह भी खुलासा करना पड़ता है कि लंबे सफर पर अचानक चले जाने की बुरी आदत के चलते मैं अक्सर दीवार के लिए कुछ बातों को पहले से लिखते चलता हूं ताकि न रहने पर भी ऐसी नौबत न आए कि खाली दीवार पर कोई इश्तहार लिखने लग जाए।
लेकिन जैसा कि फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों के बारे में कहा जाता है कि लोग वहां कई बातें किसी और को पढ़वाने के लिए कहीं और लिखते हैं, और फिर उस पर कुछ दूसरों की प्रतिक्रिया देखते हैं, ऐसे ही कभी-कभी चाहे-अनचाहे मुझसे भी हो जाता है कि अपने मन की कोई बात दीवार पर लिखा जाती है ताकि उसे कोई कहीं पर पढ़ ले। लेकिन अखबार की जरूरत के मुताबिक ऐसी बातें उन्हीं मुद्दों पर होती हैं जो मुद्दे मेरे अकेले की दौलत नहीं होते और दुनिया में जगह-जगह लोग कदम-कदम पर वैसे मुद्दों का सामना आज या कल करते ही चलते हैं।
इस बात पर आज लिखना इसलिए ठीक लग रहा है क्योंकि पखानों के दरवाजों के भीतर से परे अब लोगों के पास अपने नाम सहित या बिना नाम के लिखने को बहुत सी जगहें हो गई हैं जिनमें इंटरनेट ने खासा हाथ बंटाया है। इसलिए लोगों की भड़ास अब निकल जाती है और यह हर किसी की दिमागी सेहत के लिए बेहतर भी होता है। यह एक अलग बात है कि लोगों के मन की नफरत जब गंदगी बनकर इंटरनेट पर पहुंचती है तो उसके शिकार लोगों को उतनी ही दिमागी तकलीफ होती है जितनी राहत कुछ दूसरे लोगों को ऐसा लिखकर मिलती है। 
लेकिन तकरीबन पूरी जिंदगी लिखने के धंधे में गुजार लेने के बाद मन की भड़ास जितनी कम हो जानी थी, उतनी हुई नहीं। वजह शायद यह है कि हालात में जिस किस्म के बदलाव की नीयत से लिखा जाता है, वह अक्सर स्याही खत्म हो जाने तक करवट भी नहीं बदलता। किसी गेंडे की कड़ी खाल पर तिनका फेंकने से उसके बदन में जितनी हलचल होगी, उससे कम ही हलचल अदालत से परे के भारतीय लोकतंत्र में होती है। जब अदालत के दखल का खतरा आ खड़ा होता है तब कहीं जाकर सरकार या कारखानेदार और कारोबार यह देखना शुरू करते हैं कि आखिर मुद्दा क्या है। इसलिए लगातार लिखने के बाद जब महान होने का दावा करने वाला यह लोकतंत्र बेफिक्री की नींद सोते रहता है, तो फिर फिक्र के साथ लिखने वाले तक उसकी बातें उस बूमरैंग की तरह लौटती हैं जिसे फेंककर इस्तेमाल करने वाला हथियार बनाया गया है। पत्थर की दीवार से टकराकर मानो कुछ लौटा और उसने दीवार पर वार करने वाले को ही जख्मी कर दिया। 
दिल से लिखना आसान नहीं होता वह दिल दुखा जाता है। दूसरे दिल पर उसके असर की कोई गारंटी तो नहीं होती, गुंजाइश भी कम ही होती है और अपने ही मन पर चोट लगने का खतरा अधिक होता है।
लिखने वाले की एक बड़ी दिक्कत यह भी होती है कि उनके बीच कुछ अधिक नाजुक और महीन सोच के लोग अधिक होते हैं, और पढऩे वालों में ऐसी सोच वालों का अनुपात कुछ कम होता है। इस बेमेल मामले को इस तरह से समझा जा सकता है कि मानो बाजार में डिमांड से सौ गुना अधिक सप्लाई हो रही है और दुकानों के बाद बाजार तक की सड़कें भी माल से पट गई हैं। संवेदनशीलता मांग से सौ गुना अधिक आपूर्ति का मामला हो गया है और दुनिया की कोई व्यवस्था इस अनुपात के साथ चल नहीं पाती। यही वजह है कि संवेदनशील लोग भारत जैसे लगभग आजादी वाले लोकतंत्र में भी अपने-आपको बेसहारा और बेअसर पाते हैं। सोचने वाले, फिक्र करने वाले, और उसूलों वाले लोग लगातार भड़ास से लबालब भरे रहते हैं। 
जिस लिखने की बात हो रही है, वह एक किस्म का नहीं होता, वह किस्म-किस्म का होता है। कुछ लोग साहित्य लिखते हैं, और लगभग सारा साहित्य खतरों से परे का होता है। अपवाद की तरह कोई इक्का-दुक्का लेखक विरोध का शिकार होते भी हैं तो भी उससे उनकी किताबों की बिक्री बढ़ जाती है। अखबारों में फिक्र के साथ लिखने का चलन घटते चल रहा है और संपादक या लिखने वाले की फिक्र का जिम्मा मार्केटिंग विभागों ने बड़ी उदारता से लेकर अपने सिर पर रख लिया है, इसलिए वहां पर फिक्र की मृत्युदर, संसद और विधानसभाओं में अरबपति लोगों की बढ़ती भीड़ की वजह से वहां फिक्र की बढ़ चुकी मृत्युदर से मुकाबला करती है। 
ऐसे में पूरी तरह असंगठित, गैरकारोबारी और बेकाबू-अराजक, या आजाद, इंटरनेट ने लोगों को लिखने की एक ऐसी आजादी दी है जिसके लिए साहित्य के उत्कृष्टता के आलोचक-पैमानों पर खरे उतरने की कोई बंदिश नहीं होती, मार्केटिंग विभाग की मंजूरी से लिखने की कोई अखबारी बेबसी नहीं होती, और शायद असर कहीं अधिक होता है। 
दरअसल दस-बीस बरस पहले तक के विचारों के व्यापार के एकाधिकार को आज इंटरनेट ने ग्रामोफोन रिकॉर्ड की तरह बनाकर रख छोड़ा है। पुराने सामान जमा करने के शौकीन लोग विचार-व्यापार-एकाधिकार को जमा करके रख सकते हैं। जिन लोगों को यह बात अटपटी लग रही हो वे ध्यान से देखें कि मीडिया के कारोबार में अब विचार की कितनी जगह रह गई है, और क्या जगह रह गई है। इसलिए आज मीडिया का जो बढ़ता हुआ एकाधिकार है, वह मीडिया के कारोबार का एकाधिकार है, उसमें विचारों का एकाधिकार नहीं है, मार्केटिंग की रणनीति का साम्राज्यवाद जरूर है। 
बाजार बागी तेवर बर्दाश्त नहीं करता। ऐसे में आने वाले दिन विचारों पर और अधिक हमलों के दिन रहेंगे और खासकर लिखने वालों के विचारों के। इन पर हमले मीडिया के विज्ञापनदाता ग्राहकों के भी होंगे, और मीडिया के दफ्तर के भीतर खाता-बही देखने वालों के भी होंगे। यही वजह है कि पिछले दस-बीस बरसों में हिंदुस्तान में पेडन्यूज नाम का एक नया शब्द अंगे्रजी डिक्नशरी के दो शब्दों से निकलकर हिन्दी तक पहुंचते हुए एक शब्द बन गया है। इस माहौल में कबीर की तरह की तेजाबी बातें आमतौर पर छोटा मीडिया ही लिख सकता है, या फिर मीडिया के स्थापित ढांचे से परे का नए मीडिया किस्म का इंटरनेट का मीडिया लिख सकता है। पे्रस कौंसिल ऑफ इंडिया के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने पिछले दिनों मीडिया को लेकर बहुत सी कड़वी बातें कही हैं, जिनके जवाब में जवाबी तर्क या आत्मविश्लेषण के बजाय एक भीड़ की तरह हल्ला भर सामने आया है। 
आने वाले दिन मीडिया के बड़े घरानों के हाथों छोटे मीडिया कारोबार के बिकने के दिन दिखते हैं। ऐसे में लोगों को खरी और कड़ी बातें लिखने के लिए या तो कुछ दरवाजों के पीछे जाना होगा या इंटरनेट पर।

पाक को ऑस्कर के मौके पर


संपादकीय
27 फरवरी 2012
पाकिस्तानी डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'सेविंग फेसÓ को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री (शॉर्ट सब्जेक्ट) का ऑस्कर पुरस्कार मिला है। इस फिल्म का निर्देशन पाकिस्तान की शरमीन ओबेद चिनॉय और डेनियन जज ने किया है। यह फिल्म पाकिस्तान में चेहरों पर तेजाब फेंककर घायल की गई महिलाओं की कहानी है जो कि हमलावरों के खिलाफ बहुत ही कड़ी कानूनी लड़ाई लड़ती है। इस पुरस्कार के बाद पाकिस्तानी सूचना मंत्री ने शरमीन पर गर्व करते हुए कहा कि उन्होंने इस फिल्म में दिखाया है कि हमारे लोग कितना मुकाबला कर सकते हैं। इस निर्देशिका ने इसके पहले अफगानिस्तान में महिलाओं के हालात पर भी फिल्म बनाई है। उन्होंने कहा है कि आज तक वे ऐसी ही कहानियां करती रही हैं जिनसे लोग अमूमन डरते हैं और उनका जिक्र तक करना नहीं चाहते। भारत के लिए यह एक खुशी की बात है कि पड़ोस के इस देश में एक महिला की बनाई इस फिल्म को यह सम्मान मिला है और दोनों देशों की राजधानियों, बीच की सरहद से परे दोनों तरफ कलाकारों, लेखकों और संगीतकारों के बीच बहुत दोस्ताना रिश्ते हैं। बहुत ही भयानक नौबत से गुजर रहे पाकिस्तान में ऐसे हमलावरों को नाखुश करने वाली इस फिल्म से हम हिन्दुस्तान में भी कई किस्म की नसीहतें मिलने की गुंजाइश देखते हैं।
डाक्यूमेंट्री फिल्में हकीकत से जुड़ी होती है, और दुनिया भर में बहुत से दर्दनाक और असल मुद्दों का समकालीन इतिहास लेखन ऐसी फिल्मों से ही होता है। आज ही गुजरात के दंगों की दसवीं सालगिरह है और इस मौके पर वहां दंगों के पीछे की ताकतों को उजागर करने वाली फिल्मों की भी याद आती है जिनके साथ-साथ इस मुद्दे पर बनी हुई एक फीचर फिल्म को भी गुजरात में रोक दिया गया था। भारत जैसे लोकतंत्र में जहां पर कि समाज बहुत से विरोधाभासों को झेलता है और लोग बहुत बड़े-बड़े पाखंड के साथ जीते हैं, वहां अखबारनवीसी और मीडिया के बाकी पहलुओं के साथ-साथ मजबूत डाक्यूमेंट्री फिल्मों के साथ-साथ एक मजबूत परंपरा के आगे बढ़ाने की जरूरत हमको लगती है। इस काम से जुड़े हुए लोग जानते हैं कि इस धंधे में रोटी जुटाना भी बहुत कम लोगों के लिए ही मुमकिन होता है। कभी सरकार से कुछ पैसे मिलने पर कोई फिल्म बनती है तो उसका सरकार की नीतियों के मुताबिक होना जरूरी होता है। बेइंसाफी के खिलाफ कोई फिल्म बनाने के लिए कभी-कभी किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन से कोई काम किसी डाक्यूमेंट्री निर्माता को चाहे मिल जाता हो, लेकिन उससे सामाजिक आंदोलन का यह पहलू जिंदा नहीं रह सकता। 
भारत में कदम-कदम पर सामाजिक अन्याय बिखरा हुआ है और इनके लिए लोगों के मन में संवेदनशीलता पैदा करना, उन्हें असरदार तरीके से जानकारी देना और ऐसी कोशिशों से आगे चलकर सामाजिक समानता के लिए एक जनमत तैयार करना, एक बहुत लंबा काम है, लेकिन लोकतंत्र ऐसी ही लंबी कोशिशों से मजबूत होता है। आज पाकिस्तान में एक महिला ने एक दूसरी महिला की लड़ाई पर फिल्म बनाकर ऑस्कर जीता है तो उससे वहां की महिलाओं की बहुत सी दिक्कतों के बारे में न सिर्फ वह देश बल्कि दुनिया के और भी देश चौकन्ना होकर ध्यान देंगे। 
भारत में सरकारी टेलीविजन के बहुत से अलग-अलग चैनल हैं जो कि समाज की भलाई के लिए बहुत से अच्छे कार्यक्रम बनाते हैं। आज का बाजार दूरदर्शन और राज्यसभा-लोकसभा चैनलों को नीरस साबित करने पर तुला होता है। लेकिन दुनिया के बनने से अब तक और दुनिया के खत्म हो जाने तक सच हमेशा सनसनी के मुकाबले नीरस ही रहेगा। लेकिन दुनिया का भला ऐसी नीरस बातों से ही होता है। किसी के संघर्ष की कहानी किसी कि छोटी सी चोली के मुकाबले हमेशा ही कम आकर्षक लगेगी। और यह बात जाहिर है कि भारत के चैनलों में किसकी पसंद क्या है। हम केंद्र और राज्य सरकारों से यह उम्मीद करेंगे कि वे उदारता से अपने-अपने दायरों की सामाजिक दिक्कतों को उठाने वाली ऐसी फिल्मों को बढ़ावा दें जिससे कि सरकारी टीवी के दर्शकों का एक सामाजिक और राजनीतिक शिक्षण हो सके। यह सिलसिला रातों-रात नहीं हो सकता, लेकिन ऐसी चेतना के बिना लोकतंत्र किस तरफ आगे बढ़ रहा है यह भी सब लोग देख रहे हैं। देश-प्रदेश में सड़क-बांध और बिजलीघरों से तो ढांचे बढ़ते चल रहे हैं, लेकिन जनचेतना और जागरूकता का ढांचा चूंकि आंकड़ों में नहीं दिखता, उनकी इमारत आसमान छूते नहीं दिखती इसलिए वोटों की राजनीति वाले भारतीय लोकतंत्र में उसकी अहमियत नहीं आंकी जाती। हमारा मानना है कि जनकल्याणकारी सरकार को ऐसे लंबे उम्र वाले पेड़ भी लगाने चाहिए जिनके फल दस-बीस बरस बाद मिलना शुरू होते हैं। 

कांगे्रस नेताओं में बेअक्ली की फूहड़ बातें करने का मुकाबला


संपादकीय
26 फरवरी 2012
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष, राजस्थान में विधायक और प्रदेश महिला कांगे्रस अध्यक्ष रह चुकीं ममता शर्मा का कहना है कि किसी लड़की या महिला को कोई लड़का या आदमी सेक्सी कहे तो उसका बुरा नहीं मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियां सेक्सी शब्द से न डरें, सेक्सी का मतलब होता है ब्यूटी फॉर चार्मिंग एक्साइटेड। उन्होंने कहा कि सेक्सी शब्द का गलत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए एवं इसे पॉजिटिव लेना चाहिए।
यह शब्द लड़कियों या महिलाओं के बारे में लोग अपने बहुत करीबी दोस्तों के साथ मजाक में भी इस्तेमाल नहीं करते हैं। और सती प्रथा, घूंघट वाले राजस्थान से आई हुई ममता शर्मा अगर कोई पुराने ख्याल की बात करतीं, तो भी यह रहता कि वे अपने इलाके की भावनाओं के मुताबिक कोई बात कर रही हैं। लेकिन आज अचानक जिस तरह से उन्होंने भारत की लड़कियों और महिलाओं को सेक्सी कहने और कहलाने को एक मान्यता दे दी है उसके बाद यह सवाल उठता है कि महिलाओं के हकों के लिए बनी देश की इस सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था का मुखिया बने रहने का उनको क्या हक है? उनके इस बयान के बाद छेडख़ानी करने वाले लोगों को राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना एक हिमायती मिल गया है और दूसरी तरफ अभद्र भाषा की शिकार होने वाली महिलाओं को अब किस हौसले के साथ महिला आयोग तक जाने सूझ सकेगी?
हम ममता शर्मा की भाषा की कम समझ को बहुत बड़ा नहीं मानते। राजनीति में आकर किसी संवैधानिक पद तक पहुंचने के लिए भाषाशास्त्री होना जरूरी नहीं है इसलिए जब वे सेक्सी शब्द के मायने गिनाती हैं तो हम उसका भी अधिक बुरा नहीं मानते क्योंकि समझ और ज्ञान दोनों की कमी से ऐसा हो सकता है कि वे सेक्सी का मतलब सुंदर और आकर्षक बताने लगें, और सेक्सी को उत्तेजित भी बताने लगें। हम भारत की आम संस्कृति और यहां की संवेदनशीलता की उनकी नासमझी को उनकी एक इतनी बड़ी कमी मानते हैं, कि इस एक बात को लेकर उन्हें वहां से हटा देना चाहिए। उनके पहले भारत में शायद ही किसी ने इस तरह की नसीहत महिलाओं को दी हो। एक सार्वजनिक महिला कार्यक्रम में उनकी यह बात महिलाओं का बहुत बड़ा अपमान भी है कि उन्हें सेक्स के सामान की तरह समझने पर इतनी बड़ी कुर्सी पर काबिज, नेहरू-इंदिरा-सोनिया की पार्टी की नेता मुहर लगाए। 
लोगों को याद होगा कि बहुत बरस पहले जब मीडिया के एक उत्साही तबके ने उमा भारती को सेक्सी संन्यासिन लिखना शुरू किया था तो उन्होंने इस पर आपत्ति जाहिर करते हुए यह सिलसिला बंद करवाया था। ममता शर्मा की बात के बाद अगर उनके बारे में लोग ऐसी जुबान में बात करने लगें, और उनके बयान का जवाब देने के लिए उनसे मिलने वाले लोग उन्हें रूबरू सेक्सी कहने लगें, तो वे इसे बर्दाश्त कर पाएंगी?
दरअसल बहुत से लोगों का यह मानना होता है कि मुंह मिला हुआ है तो कुछ न कुछ बोलना चाहिए। हम इस मौके पर कुछ लोगों की जमाने पहले की दी हुई कुछ नसीहतें यहां याद दिलाना चाहेंगे ताकि और किसी की ममता शर्मा की तरह फजीहत न हो। किसी ने लिखा था-समझदार इसलिए बोलते हैं कि उनकेपास बोलने के लिए कुछ है, और कमसमझ इसलिए बोलते हैं कि वे कुछ बोलना चाहते हैं। कुछ और लोगों ने कहा है-इंसान को कुदरत ने आंखें दो दी हैं, कान दो दिए हैं, लेकिन इन चारों से देख-सुनकर बोलने के लिए मुंह कुल एक ही दिया है, इसलिए इसी अनुपात में बोलना चाहिए। लोगों को याद होगा कि गांधी जैसे महान विचारक भी बीच-बीच में कुछ वक्त के लिए चुप रहते थे और ऐसे मौनव्रत के दौरान वे स्लेट-पट्टी पर लिखकर लोगों से दो-चार शब्दों में बात कर लेते थे। आज कांगे्रस के बहुत से लोग सार्वजनिक जीवन में जिस तरह की बातें कर रहे हैं, वह भयानक है। इस पार्टी के एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का यह बयान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की खुली बेइज्जती करने वाला आपातकालीन-चापलूसी अंदाज का है जिसमें वे कहते हैं कि राहुल गांधी चाहें तो आज आधी रात प्रधानमंत्री बन सकते हैं और किसी में उनको रोकने की ताकत नहीं है। हमारा ख्याल है कि मनमोहन सिंह की जगह कोई भी जरा सा आत्मसम्मानी होता तो इस बयान के आने के बाद आधी रात भी नहीं होने देता और अपना इस्तीफा भेज चुका होता। हम बहुत से मामलों में सोनिया गांधी के व्यवहार की तारीफ करते आए हैं। लेकिन अब लगातार जिस तरह उनकी पार्टी के लोग अपने ही प्रधानमंत्री का अपमान करने में लगे हैं, अपनी ही पार्टी के सारे नेताओं और पार्टी का अपमान करने में लगे हैं, जिस तरह सोनिया का दामाद यह इंटरव्यू देता है कि उसकी जिम्मेदारी सोनिया के परिवार से दलालों को दूर रखने की है, जिस तरह वह यह बयान देता है कि सही वक्त आने पर प्रियंका राजनीति में आएगी और वह खुद भी राजनीति में आएगा, यह सब कुछ इस पार्टी के भीतर लोकतंत्र के खत्म हो जाने, पहले के मुकाबले अधिक खत्म हो जाने के सुबूत हैं। इंदिरा गांधी ने जब संजय गांधी जैसे तानाशाह को पार्टी और देश के ऊपर थोपा था, तो वे कम से कम मोर्चे पर खुद डटी रहती थीं और तमाम आरोपों का रूबरू सामना करती थीं। दस जनपथ की फौलादी दीवारों के पीछे से पार्टी और देश को चला रहीं सोनिया गांधी तो ऐसे आरोपों का सामना करने के लिए सामने भी नहीं आतीं। यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात नहीं है कि उनके पास अपनी पार्टी के, और अपने परिवार के ऐसे बड़बोले लोगों की कही बातों पर कहने के लिए भी कुछ नहीं है। हमें कांगे्रस के भविष्य की कोई फिक्र नहीं है, और वह जैसा करेगी वैसा भरेगी, लेकिन देश की इस सबसे बड़ी पार्टी की शुरू की गई गलत और घटिया परंपराएं देश के बाकी राजनीतिक दलों उसी निचले स्तर की बातें करने का एक नैतिक अधिकार दे देती हैं।
महिलाओं के बारे में कही गई ऐसी फूहड़ बात पर भी सोनिया गांधी अगर कुछ नहीं कहेंगी और कुछ नहीं करेंगी तो वे एक बहुत गैरजिम्मेदार पार्टी अध्यक्ष और यूपीए मुखिया साबित होंगी। साथ-साथ उन्हें अपनी पार्टी के श्रीप्रकाशों और जायसवालों की बातों पर भी अपना रूख साफ करना चाहिए कि किस आधी रात को मनमोहन सिंह को नींद से जगाकर बर्खास्तगी थमाई जाएगी।

ऑनर से पहते मरती उदारता, ईमानदारी, सच्चाई


संपादकीय
25 फरवरी 2012
खडगपुर में पुलिस ने एक लड़की और उसके प्रेमी की ऑनर किलिंग के आरोप में उसके माता-पिता, भाई और चाचा को गिरफ्तार किया। 18 बरस की यह लड़की अपने प्रेमी के साथ खेतों में मरी मिली, तब माना गया कि शायद प्रेमी जोड़े ने घरवालों से मंजूरी न मिलने के डर से आत्महत्या कर ली। लेकिन जांच से पता चला कि लड़के और लड़की की मौत के बीच 4-5 दिनों का अंतर था, और उन्हें मारने के बाद आत्महत्या की शक्ल  देने के लिए उनकी लाशें खेतों में फेंक दी गई थी। दो दिन हुए गुजरात में शादी से एक दिन पहले एक लड़के ने अपनी प्रेमिका के साथ रेल के आगे कटकर जान दे दी। महाराष्ट्र में एक शहर सतारा में, एक महिला के अपनी जाति से बाहर के व्यक्ति से शादी करने के बाद उसकी ऑनर किलिंग के बाद, वहां के दर्जन भर संगठनों ने मौन मार्च निकालकर घरेलू हिंसा सहती महिलाओं के लिए हेल्प लाईन शुरू करने की मांग की। लेकिन सतारा में या किसी और जगह हेल्पलाईन शुरू हो ही जाने से क्या फर्क पड़ जाएगा? जो समाज दिन ब दिन इतना कट्टर होते जा रहा है कि झूठी शान की खातिर अपने घर आंगन में पली बड़ी हुई बेटी का बेरहमी से कत्ल करते हुए उसके  हाथ भी नहीं कांपते, उसे किसी भी कानून से क्या फर्क पड़ेगा। ऑनर किलिंग अब केवल हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु या झारखंड की बपौती नहीं बचा है, यह रोग पूरी दुनिया में फैल चुका है। खासकर उन देशों में, जहां एशियाई आबादी रहती है।
ब्रिटेन जैसे देशों की पुलिस अपनी ही औलादों को इस तरह मारने  की ऐसी घटनाओं से हक्का बक्का है, क्योंकि उनके कानून की किसी धारा में ऑनर किलिंग जैसा जुर्म ही शामिल नहीं है। अपनी औलादों को अपनी मिल्कियत समझते दंभी माता-पिता और रिश्तेदारों का हौसला, लचर कानून व्यवस्था, वोटों की सौदेबाजी में बिक चुकी राजनीतिक इच्छाशक्ति, और एक दंभी समाज में दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। यह एक सामाजिक सोच की समस्या है, जिसका कानूनी हल निकाला नहीं जा सकता, क्योंकि हम देख रहे हंै कि सामाजिक सोच तो खादी के कुर्तों और खाकी वर्दी पर भी चढ़ी बैठी है। यह अपने से अलग  राय रखने वाले को धमकी, और फिर मार कर चुप कर देने की एक वहशियत है।  सोच, और रवैये में से उदारता की गुंजाईश पूरी तरह खत्म कर देने के लिए किया जा रहा मार्च है, जिसे कानून की कोई परवाह नहीं है। दुख की बात यह है, कि कब्र में पांव लटकाए बैठे बुज़ुर्गों ने अपनी विरासत सम्हालने के लिए नई पीढ़ी को भी राजी कर लिया है। इसलिए आए दिन भाई, बहनों, और उनके प्रेमियों की हत्या शान से करते दिखते हैं। देश की सबसे ऊंची अदालत उदारता की दुहाई दे देकर थक गई है, लेकिन कानून बनाने, और उसे अमल करने का फर्क दो दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालाय में तब दिखा, जब अदालत ने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को सही ठहराया, कहा- अपराध के लिए किसी का शिकायत करना जरूरी है, जब शिकायत ही नहीं, तो अपराध कहां हुआ, तो केन्द्र सरकार ने सामाजिक परम्पराओं और सोच की दुहाई दी। इसके पहले भी दक्षिण भारतीय अभिनेत्री खुश्बू ने सालों तक समाज के ठेकेदारों का सामना कर के सर्वोच्च न्यायालय में जीत दर्ज की है, और सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि दो व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से हुए संबंध में कोई बुराई नहीं, उसने दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से हुए लिव इन संबंधों में भी कोई बुराई नहीं देखी। इतना ही नहीं, अदालत संबंधित पक्षों से समलैंगिकता संबंधी कानून पर व्यापक और उदार नजरिये से बहस करने को कह रही है।
लेकिन इसके उल्टे हम देखते यह हंै कि कानून पर अमल करने वाली एजेंसियां, देश की  अदालतों के आदेशों की कोई परवाह नहीं करती, पार्कों में, होटलों में लड़के-लड़कियों को साथ देखकर उनके भीतर बैठा दम्भी समाज जाग उठता है, और वह ऐसे जोड़ों को कभी दौड़ा दौड़ाकर मारती है, कभी उनके मुंह पर कालिख पोतती है, तो कभी राखी बंधवा कर भाई-बहन का रिश्ता कायम करने पर मजबूर करती है। होटलों में लड़के-लड़कियां एक साथ अगर रुकंे, या एक कमरे में पाए जाएं ,तो उन्हे वेश्यावृत्ति के जुर्म में पकड़ लिया जाता है। जैसे नजरिये में उदारता और व्यापकता का जिम्मा केवल अदालतों का है, कानून लागू करने वाली एजेंसियां तो लकीर पीटने के लिए ही बनी है। ऐसा इसलिए है कि देश में आज कोई दमदार नेतृत्व नहीं है जो अपने स्वार्थ से परे उठकर समाज के लिए जो सही है, उसकी बात कर सके। आज यहां कोई राजाराम मोहन राय नहीं है जिन्होंने कभी विधवा विवाह की बात करने की हिम्मत की थी, आज तो यहां नवीन जिंदल, और ओम प्रकाश चौटाला हंै, जो संकीर्ण पुरातनपंथी नजरिये की हामी खाप पंचायतों के कदमों पर नतमस्तक है, क्योंकि उनके हाथ में इनके वोट बैंकों की चाभी है, जबकि जरूरत वोट के लिए मतदाता के तलवे चाटने की नहीं, उसके सामने कड़वा सच कहने की है। यह राजनीतिज्ञ ऐसे डॉक्टर हैं, जो अपने फायदे के लिए मलेरिया के मरीज को कुनैन खिलाकर चंगा करने की बजाए अपनी दूकानदारी चलाने के लिए उसे चाकलेट खिलाकर बीमार ही बनाए रखने में लगे हैं। सूचना क्रांति के इस जमाने में जब लड़के-लड़कियां पुराने दम्भ छोड़कर अपनी भावनाओं के लिए ईमानदार होना चाहते हंै, कभी कोई उनके पहनावे में बुराई ढूंढता है, तो कभी टी वी में,तो कभी मोबाईल को दोष दिया जाता है।
अपने गिरेबान में झांकना न तो यह कथित बुजुर्ग जरूरी समझते हंै, न ही उनकी चापलूसी में जुटे नेता, और न ही नेताओं को खुश करने में लगे  पुलिस और प्रशासन। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की उदार नजरिये के लिए बार-बार दुहाई देने से भी क्या फर्क पडऩा है? यह  पीढिय़ों की सोच के बीच अंतर की नहीं, अपने अपने स्वार्थ की बातें हंै, जिनके चक्कर में देश के आजादी, उदारता और सच्चाई दम घोंट रही है। चूंकि माता-पिता के हाथ में पुश्तैनी जमीन जायदाद है, समाज का समर्थन है  इसलिए वह बच्चों पर अपनी मनमानी  थोपना चाहते हंै, अपनी जिंदगी जी लेने के बाद अपने बच्चों की जि़ंदगियां भी वह जी लेना चाहते हैं। ऐसे परजीवी माता-पिता के हाथ मजबूत करती है। वह पुलिस और प्रशासन जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की चिंदिया फाड़कर उन्हें हवा में उड़ा देता है, और बेहद संकीर्णता दिखाते हुए वयस्क लड़के-लड़कियों से निपटता है। इन्हें शह मिलती है उन नेताओं से जो जाति विशेष के वोट पाने के लिए उसके ठेकेदारों की जी हुजूरी में लगे रहते हंै।
नजरिये का यह दोष, सोच की यह खामी, सिर्फ जीवन के इस एक पहलू तक ही सीमित नहीं रहेगी , इससे दूसरे पहलू भी प्रभावित होंगे, और हो रहे हैं नाइंसाफी, बेइमानी। झूठी शान फैल रही है जिसमें हर एक का नुकसान है। क्या इज्जत की खातिर अपने बच्चों की जान ले लेना माता-पिता के लिए जीवन की सबसे बड़ी हार नहीं है? उनके गलत काम की वाहवाही करने वाले, क्या कभी उनके जीवन में बच्चों की मौत के बाद पनपे खालीपन को भर सकते हैं? क्या ईमानदारी से सबके सामने बगीचे या होटल में मिलने वाले लड़के-लड़कियों को मारने पीटने से वह छिपकर मिलने और गंभीर खतरों में नहीं पड़ सकते हंै समाज के डर से किसी निर्जन स्थान मे मिलने वाले लड़के लड़कियों के साथ कितने ही हादसे होते हंै, तब पुलिस एक  कथित सामाजिक बुराई को रोक कर दूसरे कई जुर्मों की गुंजाईश पैदा नहीं करती है? गलत सोच का अंजाम हर मामले में गलत निकलेगा। एक चाकू की धार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि उससे तरकारी कट रही है, या गला। देश की अदालतें इस गंदगी को रोकने में अपनी भूमिका पूरी तरह निभा रही है अब राजनीतिक नेतृत्व का जिम्मा है कि वह पहल करे, हिम्मत दिखाए और इस सच का सामना करे,  कि देश को उसकी अवसरवादिता के नहीं समाज के झूठे दम्भ की नहीं, ईमानदारी और हिम्मत की जरूरत है।



प्रतिभाओं का जवाब है, गरीबी का नहीं


संपादकीय
24 फरवरी 2012
प्रदेश के होनहार खिलाडिय़ों की खोज करके उन्हें तालीम देने वाले एक संस्थान ने पिछले दिनों छत्तीसगढ़ को बताया कि बहुत से प्रतिभावान खिलाड़ी गरीबी के कारण संस्थान में तालीम लेने के लिए चुने जाने के बाद भी, अपनी प्रतिभा को निखार नहीं पाते। संस्थान खेल प्रतिभाओं की तलाश करने दूर दराज के गांवों में जाकर उन्हें ढूंढ भी लाता है, लेकिन जब छात्रावास में रहकर तालीम लेने की बात आती है तो यह या तो यह आते ही नहीं या अपने घर लौट जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने घर के कामकाज में कमाई में मदद करनी होती है। राज्य स्तर के खेल मुकाबलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बावजूद वह अपने खेत-खलिहानों में अपने माता-पिता का हाथ बंटाने लौट जाने मजबूर हैं। उनके सपने, उनकी प्रतिभा, और खेल जगत में राज्य की संभावनाएं इस तरह दम तोड़ती रहती हैं। यह सिलसिला हम बहुत बरसों से देखते आ रहे हैं। इसे देखकर हमें लगता है कि गरीबी के हाथों हार जाने वाले खिलाडिय़ों का हश्र देखकर भी खेल के प्रति छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं का उत्साह फीका नहीं पड़ता है। वह अपनी तरफ से तो आखिरी दम तक कोशिश करती है, मानो अपने राज्य से कहती हो- देखो हमारे बस में जो था हमने कर दिखाया, बात इसके आगे ले जाना अगर तुम्हारे बस में है, तो कर दिखाओ। बहुत बार जलसों में परेड करते वक्त नंगे पैरों चलते युवाओं, स्कूली बच्चों की तस्वीरें भी हमने छापी हैं, जिनमें अपनी गरीबी के बावजूद दुनिया के सामने, एक चमचमते मैदान पर कदम रखने का तो हौसला है, लेकिन अपनी गरीबी का जिनके पास कोई जवाब नहीं जो इनके हौसले तोड़ देती है। विकास के बहुत से पैमानों पर बहुत तेज रफ्तार से दौड़ रहे अपने राज्य का यह एक अफसोसनाक और दुखद पहलू है,  लेकिन इससे भी अफसोसनाक बात यह है कि तेजी से सम्पन्न होते चल रहे इस राज्य में अपने इन हीरों को तराशने का माद्दा नहीं है।
जिस दिन विश्व कप क्रिकेट में पाकिस्तान को सेमी फाईनल में हरा देने के बाद देश भर में जनता आधी रात को सड़कों पर उतर आई, और हाथ में तिरंगा लिए रात पर देश प्रेम के नारे लगा रही तो हमें लगा कि शायद पाकिस्तान के खिलाफ देश भर में कहीं सोए, कहीं जागे जुनून का असर है, लेकिन दो दिन बाद विश्वकप जीतने पर फिर वही नजारा देखा, तो लगा कि नहीं, लोगों को खेल और देश दोनों के लिए लगाव है। लेकिन यह लगाव इतना क्षणिक और इतना सतही क्यों है? यह सोचने की बात है। विश्व कप यंू ही नहीं जीता जाता ,उसके लिए प्रतिभाशाली खिलाडिय़ों के चुनाव, उनकी तालीम,और कड़े अभ्यास और सही मौके की जरूरत होती है। यह सब उन्हें कौन देगा कि वह हमें तिरंगा हाथ में लेकर सड़कों पर नारे लगाने, घूमने, खुश होने का मौका दें? इस राज्य में देश के बड़े-बड़े उद्योग यहां के प्राकृतिक संसाधनों,और यहां की श्रम शक्ति के बूते अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। वह इसके लिए रॉयल्टी देते होंगे, लेकिन क्या उनका फर्ज बस वहीं तक आ कर खत्म हो जाता है ? यहां  जितने भी उद्योग चल रहे हैं, उनमें से ज्यादातर पूरी तरह छतीसगढ़ के संसाधनों और मानव बल के बूते चल रहे हैं। उनकी जिम्मेदारी स्थानीय लोगों को छोटी-बड़ी नौकरियां देकर ही खत्म नहीं हो जाती। कार्पोरेट क्षेत्र की सामाजिक जवाबदेही के बारे में उनकी सोच भी गौर करने की बात है। अभी कुछ ही अर्सा पहले देश के औद्योगिक घरानों में ऊंचा नाम रखने वाले जिंदल समूह के मुखिया ने अमरीका की अपनी यूनिवर्सिटी को बड़ा दान दिया, ताकि वह जिस स्कूल में पढ़े वह उनके नाम से जान जाए। हम इसमें कोई बुराई भी नहीं देखते, यह एक सहज मानवीय हसरत है, जो किसी भी आम इंसान में जाग सकती है, और जब जेब में ऐसा करने के लिए जरूरी दौलत हो, तो यह सपना पूरा भी किया जा सकता है। ऐसे समय स्कूल में पढ़ते हुए परीक्षा में कितने नंबर आते थे, यह देखने की जरूरत नहीं रह जाती। लेकिन ऐसे उद्योगपतियों की तिजोरी अपनी कोख से भरने वाली इस धरती के बच्चों के सपनों का क्या, जो पूरी तरह इस लायक है कि आगे बढऩे की सुविधा उनके नाम हो। इस उद्योग समूह समेत राज्य भर में चल रहे बड़े-बड़े उद्योगों में से ज्यादातर छत्तीसगढ़ के लिए अपनी सामाजिक भागीदारी फ्लावर शो, डॉग शो या ऐसी ही किन्ही बातों में खर्च करते दिखते हैं। कई तो वह भी नहीं करते। अपने कारखानों में काम करने वालों के बच्चों के लिए स्कूल बनवाकर और उनमें आसपास के कुछ बच्चों को शिक्षा देकर जैसे छतीसगढ़ के लिए उनके फर्ज पूरे हो जाते हैं।
निजी क्षेत्र के उद्योगों के लिए तो सरकार ने सामाजिक भागीदारी को जरूरी बनाया ही नहीं है, लेकिन इसकी अपनी औद्योगिक इकाइयां, जहां सीएसआर अनिवार्य है, उनके इस मद के खर्च कैसे हैं, यह भी जांच का विषय है। जो सरकार राज्य के संसाधनों का औद्योगिक घरानों से सौदा करती है, उसे यह तय करना चाहिए कि वह यहां के मानव बल के विकास में अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा जरूर खर्च करे। यही नहीं सरकार को इन उद्योगों को अपने सीएसआर की सालाना रिपोर्ट में यह जाहिर करने की शर्त भी रखनी चाहिए। सामाजिक भागीदारी के अपने कामों में उन्होंने कहां, किस तरह के काम किए, और उनसे कितने लोगों को फायदा हुआ।
विकास में सामाजिक भागीदारी कई तरीके से हो सकती है इसके लिए कई तरह से सोचा जा सकता है जैसे नरेन्द्र मोदी को जब कोई किसी समारोह में मुख्य अतिथि की तरह बुलाता है, तो उसे उन्हें पैसे देने पड़ते हंै, जिन्हें वह अपने राज्य में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई पर खर्च करते हैं। साल भर में इस तरह अच्छी खासी रकम जमा हो जाती है। हम समझते हैं कि सरकार राज्य प्रतिभाओं के बारे में भी कुछ नया सोचने के लिए माहौल बनाए, और यहां से पैसा कमा रहे उद्योगों के लिए सामाजिक भागीदारी के तहत कोई ठोस काम करने की शर्त लगाए। यह केवल सरकार और औद्योगिक घरानों के सोचने की बात ही नहीं है। यह अच्छी स्थिति में जी रहे हर व्यक्ति के सोचने की बात होनी चाहिए कि वह ऐसी प्रतिभाओं का दम घुटने से कैसे रोक सकता है। गरीबी हटाना, या समाज में निचली पायदान पर खड़े इंसान की मदद करना, केवल एक अच्छा सामाजिक काम ही नहीं है। हालांकि हम यह मानते हंै कि ऐसा अच्छा  काम करने के अच्छे  नतीजे किसी न किसी रूप में मिलकर ही रहते हैं। वर्ना गुलाब का पौधा उगाने पर कैक्टस ऊग जाता, लेकिन हम इसके शुद्ध आर्थिक पहलू की बात करना चाहते हंै, जो गरीबी से बाहर आती जनता के उपभोक्ता वर्ग में तब्दील होने की बात करता है, जिससे व्यापार उद्योग को बढ़ावा मिलता है, नई नौकरियां  बनती हंै, समृद्धि आती है, यह अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाने की बात है। यह सच है कि यह एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन इतनी लंबी भी नहीं कि सालों साल तक प्रकृतिक संसाधनों का दोहन करके भी ना थकने वाले इसकी शुरुआत ना कर सके। ऐसे दौर में, जब जंगलों में जनता के असंतोष की चिंगारी को भड़काकर दावानल की शक्ल देने की कोशिशें जारी हों,   अपना धंधा चैन से चलाने के लिए व्यापारियों, उद्योगपतियों द्वारा नक्सलों को कर देने की बातें अक्सर सुनाई देती हों, क्या इन गरीब खिलाडिय़ों को मदद इसलिए न मिले कि इनके हाथ में हथियार नहीं है? 
समाज के प्रति जिम्मेदारी और जवाबदेही के माहौल के फायदे घर से लेकर बाहर तक सब को है। वर्ना यहां के युवाओं को कार्पोरेट लालच के खिलाफ आवाज उठाने में कितनी देर लगेगी ? राजधानी और राज्य के बड़े शहरों में चलते बड़े स्कूल, मंडियां, बैंक, अगर मन बना लें तो, ऐसे कितने की खिलाडिय़ों को दत्तक लेकर आगे बढऩे के लिए थोड़ी सी मदद कर सकते हैं। स्कूल ऐसे खिलाडिय़ों के लिए अपने विद्यार्थियों की फीस में मामूली बढ़ोत्तरी करके भी यह काम कर सकते हंै, इसके लिए अपने विद्यार्थियों के पालकों को राजी कर सकते हैं। इससे दूसरे अच्छे कामों के लिए भी जागरुकता का स्तर बढ़ेगा। जरूरत अपने आसपास रह रहे,अपने से कमजोर लोगों के बारे में बड़े दिल से सोचने की है, रास्ते निकल आएंगे। ऐसे खिलाडिय़ों का सामने आना नहीं रुकेगा, क्योंकि हौसलों का तो जवाब है, लेकिन गरीबी का नहीं, इसलिए मुकाबले जीत कर भी, इनका मन में दुख और असंतोष की चिंगारी लिए घर वापस लौटने का सिलसिला भी जारी रहेगा- जब तक सरकार और छत्तीसगढ़ के लोग यह तय नहीं कर लेते कि वह ऐसा नहीं होने देंगे।

किसके विकास में रोड़ा है चुनाव आचार संहिता?


संपादकीय
23 फरवरी 2012
केंद्र सरकार अब चुनाव आयोग के पर कतरने की ताक में है। भ्रष्टाचार पर गठित मंत्री समूह की बैठक में यह मसला उठा, हालांकि सरकार ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता का नाम लेकर विकास को रोकने के मसले पर उड़ती उड़ती बातचीत हुई, लेकिन अब सामने आ गया है कि यह बातचीत उड़ती उड़ती नहीं हुई, जैसा कि प्रणब मुखर्जी बता रहे हैं। इस बैठक  की कार्यसूची में ही अचार संहिता के मुद्दे को चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकालने पर चर्चा शामिल थी।  खबरें हैं कि सरकार में इस पर बाकायदा प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विपक्षी दलों को इसका जो विरोध करना था, वह कर रहे हंै। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में देश ने यह भी देखा कि किस तरह वोट जुटाने के लिए देश का कानून मंत्री ही चुनाव आयोग को ललकारने लगा, और कैसे जब तक चुनाव आयुक्त ने इस बात की शिकायत राष्ट्रपति से नहीं की, देश के प्रधानमंत्री हरकत में नहीं आए। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक बैठक की कार्यसूची में यह मुद्दा चुनाव आयोग से हाल ही में आचार संहिता भंग करने के लिए डांट खा चुके कानून मंत्री के अनुरोध पर रखा गया था। कंेद्र सरकार के दो मंत्रियों के डांट खाने तक, अपने नेताओं को चुनाव आयोग का सम्मान करने की सीख ऊपरी मन से ही सही, कांग्रेस देती रही, लेकिन जब बात राहुल गांधी के आचार संहिता भंग करने की बात आ गई, तो कांग्रेस को विकास की राह में आचार संहिता का मुद्दा सबसे बड़ा रोड़ा लगने लगा। इसके पहले उनके जीजा रॉबर्ट वाढेरा की रैली पर कार्रवाई करने वाले अफसर के तबादले के भी चर्चे हो चुके थे। इतने बरसों से देश में चुनाव करवाते आ रहा चुनाव आयोग,  चुनावी आचार संहिता लागू करने के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते आ रहा था, तब तक कांग्रेसियों को इसमें कुछ गलत नजर नहीं आया। अब उसकी अगुवाई वाली सरकार के सबसे बड़े मंत्री यह कहते हंै कि आचार संहिता विकास कार्यों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। एक सरकार के पांच साल का कार्यकाल खत्म होने पर चुनावों के पहले बमुश्किल दो महीनों के लिए लागू होती आचार संहिता के समय में ही क्या सरकार विकास का सारा काम कर लेती है? प्रणब मुखर्जी की बन्द दरवाजे में की गई यह टिप्पणी आज जब सामने आ गई है, तो इससे यह सबित होता है कि यह सरकार विकास के नाम पर ऐन चुनावों के  समय मतदाता को ठगने की छूट चाहती है। 
यह सच है कि चुनाव आयोग के अफसर अतिउत्साही होकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हंै, और कुछेक बार प्रशासनिक दिक्कतें पेश आती हैं। चुनाव आयोग पर सीबीआई की तरह सत्ता पक्ष की शाखा के रूप मे काम करने का आरोप भी कभी-कभार राजनीतिक दल लगा लेते हैं। जैसे गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने पूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह पर इस तरह के आरोप लगाए थे। लिंगदोह के ईसाई होने के नाते सोनिया से सहानुभूति रखने की बातें भी  की गई थीं, लेकिन आज हालात उल्टे हंै। आज यूपीए की सरकार के रहते एक मुसलमान कानून मंत्री के खिलाफ, एक मुसलमान मुख्यचुनाव आयुक्त ने शिकायत की है। इस स्थिति से साफ है कि एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग पर कभी-कभार भी लगाए गए इस तरह के आरोप बेबुनियाद रहे हैं। सच तो यह है कि चुनाव आयोग आज देश में एक  निष्पक्ष  और प्रभावशाली संस्था के रूप में स्थापित हो चुका है। समय-समय पर इसके बड़े पदों पर अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं, धर्मों के लोग आए, लेकिन कभी इस संस्था के खिलाफ किसी भी मुद्दे पर कोई गंभीर, या सतही आरोप सबित नहीं हो सका। आरोप, अगर लगाए भी गए, जैसा कि गुजरात में हुआ, तो जनता ने उन पर यकीन नहीं किया। न तो कभी चुनाव आयोग के खिलाफ कोई बड़ा स्टिंग ऑपरेशन हुआ, न ही इसके किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगा। इस संस्था के बारे में देश में आम राय यही है, कि यह भ्रष्ट और अवसरवादी नेताओं की आंख में खटकने वाली, ताकतवर, निष्पक्ष संस्था है, जिस पर इस देश की आम जनता अपनी उम्मीदें टिका सकती है। हम भी इस राय से सहमत हैं। हमें भी चुनाव आयोग और उसके कामकाज से कोई शिकायत नहीं, सिवाय इसके कि यह चुनावों में कालेधन और फिजूलखर्ची रोकने में नाकाम रहा है। हम इससे इस मामले में भी प्रभावी होने की उम्मीद करते हंै, वर्ना चुनाव आयोग की आमतौर पर स्वच्छ, निष्पक्ष छवि से हम भी सहमत हैं। दूसरी तरफ इसके पर कतरने की कोशिश में दिखती यूपीए सरकार, और उसका नेतृत्व कर रहे दल कांग्रेस को देखें, तो उसकी विश्वसनीयता आज तार तार है। इसके नेताओं को आयोग की लताड़ खानी पड़ी है। जब तक देश में हो-हल्ला नहीं मचता, इसके बड़े नेता गलत बर्ताव कर रहे  अपने नेताओं को आंख दिखाने का नाटक भी नहीं करते। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब यूपीए में शामिल दलों के नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई बात नहीं होती। प्रफुल्ल पटेल के सरकारी विमानसेवा के घरेलू कार जैसे इस्तेमाल की खबर अभी ताजा ही थी कि, मुंबई में कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष की सम्पत्ति जब्त करने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया। राहुल गांधी जनसभा में वाहवाही लूटने और अपने तेज तेवर दिखाने के नाम पर सपा का चुनावी घोषणापत्र कहकर जिस कागज़ को फाड़ते है, वह कांग्रेस उम्मीदवारों के नाम की फेहरिस्त निकलती है। कहने की बात यह है कि छोटी से ले कर बड़ी बातों तक, यूपीए की हालत आज ऐसी है कि उसकी कोई विश्वसनीयता जनता के बीच बची नहीं है, इसलिए अगर वह कोई ठीक बात भी करती है तो उस पर कोई यकीन नहीं करता। चुनावी आचार संहिता के मामले में भी उसके नेताओं का झूठ उसकी पहले से ही तार-तार  हो चुकी विश्वसनीयता को और भी जर्जर कर रहा है।
चुनावी आचार संहिता मतदाता के हित में है कि उसे चुनाव के समय अपने प्रतिनिधि की काबीलियत तय करते समय लालचों से बचाया जा सके, न तो कोई उसे खरीदने की कोशिश करे, न ही झूठी खबरें फैलाकर, ऐन चुनाव के समय लुभावनी योजनाओं की घोषणाएं करके उसके फैसले को प्रभावित करने की कोशिश करे। यह व्यावस्था यह तय करती है कि सत्ताधारी दल सरकरी तंत्र का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए न कर सके। चुनावी आचार संहिता को चुनाव आयोग के अधिकार के दायरे से निकालकर उसे कानूनी रूप देने की यूपीए सरकार की कोशिश देखने में जितनी मासूम लगती है, उतनी है नहीं, इससे चुनाव आयोग की ताकत बहुत कम हो जाएगी। फिर इसकी जरूरत भी क्या है, जब आयोग आचार संहिता लागू तो प्रशासन और पुलिस के जरिये ही करता है?
कांग्रेस पर देश में संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करते चलने का आरोप अक्सर लगाया जाता है। मंत्री समूह की बैठक में चुनावी आचार संहिता पर ताजा चर्चा भी ऐसा ही एक कदम है। कैग को आंखें दिखा चुकी सरकार अब चुनाव आयोग को आंखें दिखाने की कोशिश करती दिखती है। मौजूदा आम चुनावों में मतदाताओं का बड़ी तादाद में मतदान करना चुनाव आयोग की बड़ी सफलता मानी जाएगी। आज जब देश भर में प्रशासनिक तंत्र का निक्म्मापन बात बात पर जाहिर होता है, बड़े-बड़े घोटाले, और सरकारी कर्मियों की करोड़ों रुपयों की काली कमाई सामने आ रही है, देश में संवैधानिक संस्थाओं का कामकाज सराहनीय है। कैग हो या चुनाव आयोग, या ओडिशा का मानवाधिकार आयोग, जिसने सरकार को एक दलित लड़की के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूर कर दिया, या कर्नाटक का लोकायुक्त, जिसने दबंग खान माफिया को जेल जाने का रास्त खोला, और  उसे बचाने वाले मुख्यमंत्री को घर जाने पर मजबूर कर दिया। हम देखते हैं कि कार्यपालिका बनकर देश चलाने का दम भरने वालों को संवैधानिक संस्थाओं का डंडा ही सही रास्ते पर रख पा रहा है। जाहिर है यह संस्थाएं कार्यपालिका पक्ष के लोगों को अपने " विकास" में "सबसे बड़ी रुकावटें" लगती हो, लेकिन हम मानते हंै यह संस्थाएं देश के लोकतंत्र और संघीय ढांचे की मजबूती के लिए बहुत काम की हैं। यूपीए सरकार, और खासकर कांग्रेस की, व्यक्ति पूजा और  चुनाव जीतने के लिए इन संस्थाओं से छेड़छाड़ और  यूपीए सरकार की चुनाव आचार संहिता के बारे में ताजा कोशिश निहायत ही गैर जरूरी है।   

फिजूलखर्ची से बचने की जरूरत


छोटी सी बात
फरवरी 2012
रोज की जिंदगी में हम कारखानों में बने हुए ऐसे सामान इस्तेमाल करते हैं जो तरह-तरह के रसायनों से बने होते हैं। इनसे शरीर को भी नुकसान हो सकता है और धरती को तो नुकसान होता ही है। इसलिए टूथपेस्ट, साबुन, शैंपू से लेकर मच्छर भगाने और मारने तक के सामानों का इस्तेमाल कैसे कम से कम हो सकता है यह सोचना चाहिए। मच्छरों और कीड़े-मकोड़ों के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले जहर इंसानों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। हर किसी की जिंदगी में और उनके घर-दफ्तर में ऐसी बातों का इलाज अलग-अलग किस्म का हो सकता है, लेकिन इस बारे में कुछ ध्यान देने से खर्च और सेहत दोनों की बचत हो सकती है।
कुछ तरह के साबुन और शैंपू कुछ इलाकों के पानी से आसानी से नहीं धुलते और इनसे नहाते हुए कई गुना अधिक पानी खर्च हो जाता है। ऐसे ब्रांड कभी दुबारा नहीं लेने चाहिए। इसी तरह यह ध्यान भी रखना चाहिए कि ठंड के मौसम में ऐसे साबुन का ही इस्तेमाल करें जिनमें तेल या उस तरह कोई दूसरी चीज अधिक अनुपात में हो। ध्यान से देखेंगे तो पैकिंग पर यह दिख जाएगा और आप पहले बदन की प्राकृतिक चिकनाई को कम करके फिर किसी क्रीम, तेल को लगाकर उसकी भरपाई करने से बच जाएंगे। ये छोटी-छोटी बातें न सिर्फ आपकी सेहत और जेब की बचत के लिए है बल्कि धरती को बचाने के लिए भी है।  यह ध्यान भी रखा जा सकता है कि किन कपड़ों को हर बार साबुन से धोने की जरूरत नहीं पड़ती और किस तरह सिर्फ पानी से धोकर काम चल सकता है। इससे साबुन, पानी, और कपड़ों जिंदगी, सबकी बचत होती है।  कपड़ों पर पे्रस करने के बारे में हम यहां पहले भी लिख चुके हैं कि जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़ों को पे्रस की जरूरत जरा भी नहीं होती। अंगे्रजों का खाली किया हुआ यह देश अभी तक एक ऐसी मानसिक गुलामी में जीता है जिसमें बिना जरूरत की तामझाम को इतनी अहमियत दी जाती है। जब भी आप बिना जरूरत कपड़े पे्रस करते हैं तो बिजली खर्च करते हैं और उस बिजली के लिए धरती पर बहुत सा प्रदूषण पैदा होता है। ताकतवर तबका ऐसी बहुत सी फिजूलखर्ची इसलिए करता है क्योंकि वह इसका खर्च उठा सकता है। लेकिन अपनी आने वाली पीढिय़ों पर आने वाले इस बोझ को भी कोई उठा सकेगा?
-सुनील कुमार


गुफा की तरफ जाने के खतरे


संपादकीय
22 फरवरी 2012
इंटरनेट की मेहरबानी से अश्लील, फूहड़, हिंसक और दूसरे कई किस्म की आपत्तिजनक बातों को लिखने का मौका लोगों को मिल रहा है। इसका फायदा भारत में भी कुछ ऐसे लोग लगातार उठाते हैं जिनके अस्तित्व का ऐसी बातों के बिना किसी को पता नहीं चलता। फिर इंटरनेट से परे का मीडिया तैयार खड़ा हुआ है कि जो सबसे बेहूदी बात है, उसे सबसे पहले लपककर अपने पाठकों और दर्शकों के सामने परोस दिया जाए। नतीजा यह है कि जो सबसे फूहड़ बात हो, उसके आनन-फानन, जंगल की आग की तरह फैल जाने की संभावनाएं अब मीडिया के मल्टीमीडिया हो जाने से बढ़ गई हैं। मुंबई की एक चर्चित मॉडल लड़की ने पहले तो भारतीय टीम की जीत-हार को लेकर अपने कपड़े उतारने के बयान देकर खबरों में जगह पाई थी, और उसके बाद से एक पाकिस्तानी अभिनेत्री ने उसे बेदखल करके फुटपाथ के उस कोने पर अपनी दूकान सजा ली थी। कल से फिर खबरों में यह मॉडल आई है क्योंकि एक दूसरी विवादास्पद महिला, प्रमुख और चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपनी आम जुबान में इस मॉडल को लेकर सही बातें बहुत वयस्क जुबान में इंटरनेट पर लिखी हैं। 
भारत के साथ एक दिक्कत यह हो गई है कि अंगे्रजी और इंटरनेट की वजह से यहां के लोग पूरी दुनिया की संस्कृतियों से जुड़ गए हैं। बहुत रफ्तार से आए इस सैलाब ने पांव संभालने का मौका भी भारत के तौर-तरीकों को नहीं मिल पाया और बहुत सी आंखों में खारा पानी चले गया है, बहुत सी आंखों में रेत चली गई है। नतीजा यह हुआ है कि कुछ लोगों के लिए आम हो चली जुबान बाकी लोगों के लिए, या एक बड़े तबके के लिए बबूल के कांटे सरीखी हो गई है। लोगों को अपने ही बच्चों के फेसबुक या ट्विटर पेज से दूर रहना पड़ता है क्योंकि कई बार उस पेज को देखने के बाद पुराने ख्याल के लोगों को पूजाघर से गंगाजल लेकर आंखें धोनी पड़ती हैं। लेकिन बदलाव के हर दौर में इस तरह का टकराव और खिंचाव संस्कृतियों में और संवेदनाओं में होता ही है। 
लेकिन आज हम यहां यह चर्चा करना चाहते हैं कि इंटरनेट से लेकर पत्र-पत्रिकाओं तक भारत में वयस्क सामग्री के लिए जगह बिल्कुल ही नहीं है। अंगे्रजी की कुछ बहुत चमक-दमक वाली बहुत महंगी पत्रिकाओं को छोड़ दें, कुछ महंगी अंगे्रजी किताबों को छोड़ दें तो भारत के गैरअंगे्रजीभाषी लोगों के लिए उनकी जरूरत, उनके मजे और मनोरंजन के लिए शायद ही कुछ वयस्क मिलता हो। नतीजा यह है कि लोग लिखने की बेकाबू आजादी देने वाले इंटरनेट पर पहुंचते ही कई किस्म की बेहूदी बातें लिखने लगते हैं। फिर प्रचार पर जिंदा रहने वाले बाजार ऐसी गंदगी को चारों तरफ और बढ़ावा देते चलते हैं। न तो यहां देर रात के वयस्क टीवी चैनल की गुंजाइश निकल रही है और न ही भारत में अश्लीलता के मौजूदा कानूनों के चलते हुए थानेदारों के स्तर पर पहली नजर में अश्लीलता तय होने के इंतजाम में कोई गंभीर पत्र-पत्रिका वयस्क लोगों की मानसिक और शारीरिक जरूरतों पर चर्चा के लिए निकल सकती है। यह देश आज की अपनी पाखंडी संस्कृति के बीच बड़े होने का खतरा ही नहीं उठा रहा। जिस देश में सेक्स-शिक्षा के लिए मंदिरों की दीवारों से लेकर, वात्सायन जैसे बड़े विशेषज्ञ जानकार की लिखी महान किताब मौजूद थी, जहां मुगलों और अंगे्रजों के रहते हुए भी नगरवधुओं और तवायफों के कोठों पर तहजीब सीखने की बात होती थी, आज चुनावी नीयत और कट्टरपंथी साम्प्रदायिकता के चलते सिर्फ झंडों-डंडों की बात होती है। 
ऐसे में जिन लोगों को फूहड़ बात कहने का मौका मिलता है, जिनको कपड़े उतारने का मौका मिलता है, वे सभी बाजार को देखते हुए ऐसा करने लगते हैं। इस देश के महान चित्रकारों के सामने मॉडल की तरह बैठकर तस्वीरें बनवाने के लिए महिलाएं जाने कब से कपड़े उतारते आई हैं। लेकिन अब कपड़े उतारने से कला का कोई रिश्ता नहीं रहा, अब अखबारी सुर्खियों और टीवी चैनलों का ख्याल रखकर यह काम होता है। जब एक स्वस्थ वयस्क मनोरंजन या जानकारी नहीं मिलती है तो वहां पर पोर्नोग्राफी कही जाने वाली ब्लू फिल्में अधिक चलती हैं और सेक्स का अधकचरा ज्ञान हर पीढ़ी को गलतफहमी में रखते चलता है। इस देश की संस्कृति को गुफा की तरफ ले जाने की बजाय अगर उसे एक समाज-विज्ञान के नजरिए से उदार नहीं बनाया जाएगा, तो फूहड़ और अश्लील हिंसा ही खबरों में बनी रहेगी। 

छोटी सी बात


छोटी सी बात
21 फरवरी 2011
बातचीत की आम जुबान में लोग किसी भी किस्म की कमजोरी को गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। गरीब को फटेहाल या दो कौड़ी का कहते हैं, किसी को लंगड़ा किसी को लूला, किसी को पागल, किसी को अंधड़ा, किसी को कनवा और किसी को चितकबरा या कबरा कह देते हैं। ये सारी जुबान तब तक तो ठीक है जब तक आपके परिवार में किसी को कुदरत से मिली ऐसी कोई तकलीफ न हो। लेकिन जब घर पर कोई ऐसा हो तो क्या उस वक्त भी आप इसी तरह के शब्द इस्तेमाल करते हैं? वैसे तो यह कहा गया है कि जिसके खुद के पैरों में बिवाई न पड़ी हो वह दूसरों का दर्द क्या जाने, लेकिन बेरहम और रहमदिल, अक्लमंद और नासमझ या कमसमझ के बीच फर्क तो यही है कि दूसरों की भावनाओं को देखते हुए किसी ऐसी बात को गाली की तरह इस्तेमाल न करें जिस पर कि उनका कोई बस नहीं है।
अगर कोई बदतमीज है, घमंडी है, हिंसक है, भ्रष्ट या बेईमान है, दगाबाज या झूठा है, तो ऐसी तमाम बातें कुदरत की दी हुई न होकर, लोगों की खुद की पाई हुई होती हैं। किसी के बारे में न्यायसंगत तरीके से अगर ये बातें कही जाएं, तो ये गालियां नहीं हैं। बिना मेहनत जो दूसरों के हिस्से का खाता है, उसे हरामखोर कहने में भी कोई बुराई नहीं है, अगर यह बात अच्छी तरह से साबित हो चुकी है। हालांकि भारत की संसदीय व्यवस्था में इनमें से अधिकांश शब्दों को असंसदीय करार देकर निकाल दिया जाता है, लेकिन जिम्मेदारी के साथ बोलचाल में इनके इस्तेमाल में कोई बुराई नहीं होती। लेकिन जिन बातों पर किसी का बस नहीं चलता, जन्म से मिली हुई तकलीफों, या साधारण रूप-रंग को लेकर जब कोई जली-कटी जुबान का इस्तेमाल करते हैं तो वे नाइंसाफी करते हैं। इसलिए किसी दूसरे के बच्चे को काला-कलूटा कहने के पहले यह सोचें कि आपकी अगली पीढ़ी के रंग की आपको कोई गारंटी है? मानसिक रूप से कमजोर या अविकसित किसी बच्चे को पागल कहने के पहले यह सोचें कि आपके परिवार में कोई ऐसा पैदा हो और उसे लोग इसी जुबान में बुलाएं तो आपको कैसा लगेगा?
--सुनील कुमार

कुनबापरस्ती के दो और खतरे


21 फरवरी 12
संपादकीय
कल की दो खबरें कांगे्रस पार्टी और यूपीए सरकार के लिए देश के कसैले हो चुके मुंह में कुछ और कुनैन घोलने वाली हैं। हम लगातार कुनबापरस्ती के खिलाफ लिखते हैं और एक ही घर के एक से अधिक लोगों को चुनाव में खारिज कर देने के लिए इंटरनेट पर जगह-जगह चर्चा भी छेड़ते हैं। लेकिन सत्ता है कि उसकी बददिमागी लोगों को अपने कुनबे के लिए देश को पांवपोंछने की तरह इस्तेमाल करती है। यह ठीक है कि आज केंद्र में यूपीए सरकार के चलते सात बरस हो रहे हैं इसलिए अधिक मामले वहीं के सामने आ रहे हैं, लेकिन इक्का-दुक्का सरकारों को छोड़कर बाकी सभी का हाल अपने कुनबों के लिए ऐसा ही है। तमिलनाडु, पंजाब, कश्मीर, बिहार, आंध्र, उत्तरप्रदेश जैसे बहुत से राज्य हैं जहां पिछले दशकों में हम राजवंशों की तरह गिने-चुने कुनबों को न सिर्फ कांगे्रस पार्टी में बल्कि दूसरी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों में भी वंशवाद को पनपाते देख रहे हैं। 
यूपीए सरकार में कुछ महीने पहले तक प्रफुल्ल पटेल एनसीपी की तरफ से ताकतवर विमान मंत्री थे, और इन दिनों वे कनाडा के किसी से रिश्वत लेने के आरोप झेल भी रहे हैं। लेकिन इन आरोपों की असलियत तो सामने आने में बहुत वक्त लग सकता है, अभी जो हकीकत सामने है वह है-'सन् 2010 में तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के रिश्तेदारों को बिजनेस क्लास में जगह नहीं मिलने पर उनकी सेवा में बड़ा विमान लगा दिया था। 25 अप्रैल को बेंगलुरु से मालदीव जाने और 28 अप्रैल को वहां से लौटने के लिए की गई इस विशेष व्यवस्था की जानकारी सूचना के अधिकार (आरटीआई) याचिका के जरिए मिली है।Ó अब अगर घाटे में डूब रही और अब बिक जाने या बंद हो जाने की कगार पर खड़ी हुई राष्ट्रीय एयरलाइंस अपने इसी मंत्री के बरसों वहां काबिज रहने के बाद भी आज इस नौबत को अगर झेल रही है तो जाहिर है कि उसके पीछे मंत्री की ऐसी मनमानी भी रही है। अपने कुनबे के लिए कोई देश के मुसाफिर हवाई जहाज का ऐसा शर्मनाक बेजा इस्तेमाल करे, तो उसे सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह खारिज कर देना चाहिए। एक तरफ देश गरीबी की रेखा के नीचे घिसट रहा है, और करोड़ों बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मरने की कगार पर खड़े हैं और पहले कौन मरेगा इसके लिए एयर इंडिया से उनका मुकाबला चल रहा है और मंत्री का कुनबा इस मौत में अपना भी हाथ लगा रहा है। मनमोहन सिंह की थाली में दो रोटी एक सब्जी दाल और दही की बहुत चर्चा होती है। लेकिन उनकी सरकार का अगर देश को लूटने में यही हाल हर सुबह सामने आ रहा है तो उनकी यह ईमानदारी सरकारी नल पर कहीं-कहीं आते गंदे पानी से भी कम इस्तेमाल की है। 
दूसरी खबर है कि यूपीए और कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को देश के विमानतलों पर सुरक्षा जांच से मिलने वाली छूट की। हमने अभी पिछले हफ्ते ही यह लिखा है कि राष्ट्रपति के बेटे से एक करोड़ रूपए की चुनावी नगदी के बारे में पूछताछ को देखते हुए ऐसे किसी भी व्यक्ति को किसी सुरक्षा जांच से कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। सुरक्षा एजेंसियों की अगर कोई मजबूरी है तो विशेष छूट मिले हुए राहुल-प्रियंका जैसे लोग अलग से जाएं और उनके परिवार के बाकी लोग सुरक्षा जांच से होकर जाएं। सुरक्षा जांच का रिश्ता सिर्फ इन लोगों से नहीं है, हमारे जैसे बाकी साधारणा मुसाफिरों की जिंदगी से भी है, जिसे खतरे में डालने का कोई हक छूट देने वाले लोगों को नहीं है। किसी ईश्वर ने क्या ऐसा कोई सर्टिफिकेट दिया हुआ है कि भारत के ये ढाई-तीन दर्जन लोग कोई अपराध नहीं कर सकते, या आत्महत्या की नीयत से अपने साथ-साथ और लोगों को भी नहीं उड़ा सकते? ऐसी कोई भी रियायत पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है और हमारा पक्का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट तक ऐसा मामला जाने पर अगर वहां के जज अपनी खुद की सुविधाओं को खोने के लिए तैयार होंगे, तो ऐसे विशेषाधिकार तुरंत खारिज करेंगे। 
अभी दो-तीन दिन पहले ही सोनिया गांधी के इसी दामाद की बातचीत हमने दिल्ली के अखबार इंडियन एक्सपे्रस से लेकर छापी थी जिसमें रॉबर्ट ने कहा था कि उनका काम सोनिया के परिवार को दलालों से दूर रखने का है। उन्होंने कहा था कि उनकी भूमिका ऐसे व्यक्ति की है, जो परिवार से दलाल टाइप के लोगों को दूर रखता है और गांधी परिवार तक उन बातों को सीधे पहुंचाता है, जो लोग चाह रहे हैं। अब सवाल यह है कि देश की सबसे कड़ी और बड़ी सुरक्षा व्यवस्था से घिरी हुई सोनिया गांधी तक किस तरह के दलालों की पहुंच है जिन्हें रोकने का जिम्मा रॉबर्ट का है? उनके इर्दगिर्द तो सुरक्षा अधिकारियों का तगड़ा घेरा हर पल रहता है, सरकार के कई और बड़े अफसर उनके इर्दगिर्द रहते हैं, कांगे्रस पार्टी के बड़े दिग्गज पदाधिकारी और नेता सोनिया के इर्दगिर्द रहते हैं, ऐसे में कौन से दलाल वहां तक पहुंचते हैं जिनको रोकने का इतना बड़ा काम उनका दामाद कर रहा है? सच तो यह है कि रॉबर्ट वाड्रा की पूरी बातचीत पूरी तरह से सोनिया और कांगे्रस के खिलाफ जा रही है। और जिन लोगों की सरकार में कोई जवाबदेही नहीं बनती, कांगे्रस पार्टी में कोई जवाबदेही नहीं बनती, वे लोग अगर इस तरह निहायत गैरजरूरी और नाजायज बड़े बोल बोलते हैं तो लोगों को देश का यह सबसे पुराना वंशवाद एक बार फिर खटकने लगता है। हम नहीं जानते कि कांगे्रस पार्टी में ऐसे नुकसान के बारे में सोचने की कोई जगह बच गई है या फिर मुसाहिबों की भीड़ को हम जैसों की ऐसी बातें खटकेंगी, जो भी हो इस देश को वंशवाद के खिलाफ एक आंदोलन की बहुत जरूरत है।







इंसान और धनवान





छोटी सी बात
20 फरवरी 2011
शहर की एक व्यस्त सड़क से निकलते हुए एक बारात इस तरह पूरी चौड़ाई को घेरे हुए थी कि मानो किसी बड़ी गौशाला के जानवर एक साथ तालाब जा रहे हों। बहुत रौशनी, बहुत बाजा, मतलब यह कि खासी पैसे वाली बारात थी। यह सड़क शहर के एक बड़े हिस्से को रेलवे स्टेशन से जोड़ती है, इस सड़क पर बहुत से नर्सिंग होम हैं, जिनमें सैकड़ों मरीज हर वक्त रहते ही हैं। यहां दर्जन भर दवा दूकानें हैं जहां तक लोगों को आना-जाना पड़ता है। इन सबके साथ-साथ इस सड़क के दोनों ओर हजारों मकान भी हैं जिनमें रहने वाले लोगों को इसी सड़क से गुजरना होता है। लेकिन एक बारात ने इन सबका जीना घंटों के लिए मुश्किल कर दिया। 
दसियों हजार लोगों की बददुआ के साथ जो जिंदगी शुरू हो रही हो वह कितना सुख पाएगी इसका अंदाज लगाना हो तो भारतीय संस्कृति में अच्छा काम करने से अच्छा होने की जो नसीहत दी जाती है उसे सोचना चाहिए।
दरअसल इंसान एक सीमा तक इंसान रहता है। जैसे-जैसे वह धनवान बनते जाता है उसके भीतर का इंसान छोटा होते जाता है। अधिक पैसों के साथ अहिंसक बने रहने खासा मुश्किल होता है। लोग अपनी खुशी को दूसरों का जीना मुश्किल करते हुए सड़कों पर इस तरह बिखेर देते हैं कि मानो पूरी दुनिया की यह मजबूरी हो कि वे इनकी खुशी के लिए अपनी सहूलियत का हक छोड़ दें। सड़क पर, रेलवे स्टेशन या किसी और सार्वजनिक जगह पर दूसरों के हक पर अपने एक गैरकानूनी हक को लादकर लोग जितनी बेशर्मी और हिंसा से अपने सुख और दुख से जगहों को पाट देते हैं, वह भयानक है। एक तो पैसा अपने-आपमें हिंसक होता है और फिर भीड़ तो पूरी तरह से बेदिमाग होती है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह लिखा था कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं दिमाग एक भी नहीं होता। इन दोनों का मेल पेट्रोल और आग की तरह का होता है और लोगों की बदतमीजी विस्फोट की चिंगारियों की तरह चारों तरफ फैलने लगती है।
एक दिक्कत यह भी रहती है कि जिन अफसरों पर ऐसी अराजकता को काबू करने की जिम्मेदारी रहती है वे पैसों और बेदिमाग सिरों की भीड़ से उलझने के बजाय घर बैठे रहना बेहतर समझते हैं। 
यह संपन्नता लगातार हिंसक होकर, बदतमीज होकर यही बताती है कि परिवार या व्यापार ने इन्हें पैसों की संपन्नता तो दी है लेकिन इंसानियत से इन्हें विपन्न कर दिया है।---                सुनील कुमार

दूध की धार भूखे पेटों की तरफ क्यों नहीं मोड़ता ईश्वर?


संपादकीय
20 फरवरी 2012
देश भर में आज हिंदू समुदाय शिवरात्रि मना रहा है। सरकारी दफ्तरों की छुट्टी है और शिवमंदिरों में लोगों की भीड़ लगी है। शिवलिंग पर से दूध की धार थम ही नहीं रही है। जितनी तस्वीरें हमारे फोटोग्राफर लेकर आए हैं या जो टीवी के परदे पर दिख रही हैं वे दूध से अभिषेक की तस्वीरें हैं। यही त्यौहार नहीं, बाकी त्यौहार भी और दूसरे धर्मों के भी त्यौहार भी, इसी किस्म के बहुत से रीति-रिवाज लेकर आते हैं जब ईश्वर के सामने लड्डुओं से लेकर तरह-तरह की कुर्बानी चढ़ाई जाती है। ऊपर वाले का दरबार चढ़ावों से लबालब होता है। सड़क किनारे से जब लोगों को हटाया जाता है तो रोज कमाकर रोज खाने वाले फुटपाथी लोग सबसे पहले हटाए जाते हैं, और ईश्वर की दूकान आखिर तक चलती रहती है।
इस बात की चर्चा आज जरूरी इसलिए है कि इस देश में भूख और कुपोषण से हर बरस आधा-एक करोड़ बच्चे मारे जाते हैं। एक तरफ इतनी बड़ी गरीब आबादी की जिंदगियों को जारी रखने का इंतजाम नहीं है, और दूसरी तरफ आज ही दक्षिण भारत के एक मंदिर की दौलत को गिनने का काम अदालती आदेश से शुरू हुआ है। आज ही एक दूसरी खबर है कि अमिताभ बच्चन की अच्छी सेहत के लिए उनका परिवार एक मंदिर पहुंच रहा है। इस परिवार में सुख और दुख के हर मौके पर मंदिर के भगवानों को उनके दर्शन होते हैं, लेकिन इस परिवार की किसी रहमदिली के दर्शन किसी गरीब को हुए हों ऐसी कोई खबर कभी पढऩे में नहीं आती। खैर, हर बरस ये आंकड़े भी आते हैं कि तिरूपति के मंदिर की इस बरस की कमाई कितनी रही और दूसरे किसी धर्म स्थान की कितनी। ईश्वर को जो लोग मानते हैं, वे कहते हैं कि दुनिया में एक पत्ता भी उसकी मर्जी के बिना नहीं हिलता। ऐसे में हमारे मन में यह सवाल उठता है कि कुपोषण से, भूख से दसियों लाख बच्चों को इस देश में ही मरते हुए देखने वाला ईश्वर अपनी पत्थर की मूर्ति पर बहाए जाने वाले दूध की धार को गरीबों की तरफ, भूखों मरते बच्चों की तरफ क्यों नहीं मोड़ पाता? और अगर यह मोडऩे में उसकी दिलचस्पी नहीं है, या यह उसकी ताकत से परे है तो फिर वह किस तरह सर्वशक्तिमान ईश्वर माना जा सकता है?
दुनिया में त्यौहारों के हर मौके पर आस्था का सैलाब देखने मिलता है। यह तो हिंदुस्तान का लोकतंत्र है जो हमें ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने की इजाजत देता है। दुनिया के कई ऐसे अधिक धार्मिक कट्टर देश हैं जिनमें ऐसे एक सवाल से लोग जेल चले जाते हैं और लंबी सजा या मौत की सजा तक पहुंच जाते हैं। लेकिन ऐसे लोकतंत्र में जहां पर कि गरीबी और भुखमरी की तस्वीरें आए दिन अखबारों में दिखती हैं वहां भी आस्थावान लोग ईश्वर के बजाय भूखों को दूध चढ़ाना, लड्डू खिलाना क्यों नहीं सोच पाते? हम पल भर के लिए बहस के लिए यह मान भी लें कि धर्म का लोगों पर कुछ अच्छा असर होता है और ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाले लोग नास्तिकों से बेहतर होते हैं। लेकिन ऐसा एक भी सुबूत तो देखने नहीं मिलता कि उनके ईश्वर के बनाए हुए लोगों की भूख मिटाने को लोग पूजा समझते हों, और धर्म स्थलों की जगह लोग त्यौहारों पर गरीबों की बस्तियों में जाते हों। सच तो यह है कि धर्म और ईश्वर की सोच ही लोगों को कई किस्म के अपराधबोध और ग्लानि से उबरने में मदद करती है। अगर इस जन्म, पिछले जन्म और अगले जन्म की धारणा न हो, पाप और पुण्य जैसी सोच प्रचलित न हो, तो लोग गलत काम करने से हिचकेंगे और इसी जन्म में अच्छा काम करने लगेंगे। हर धर्म लोगों को हजार किस्म के खराब काम करने के बाद प्रायश्चित की छूट देता है और एक वाशिंग मशीन की तरह धर्म लोगों को अपनी आत्मा पर लगे दाग-धब्बों को धोने की बड़ी सस्ती सहूलियत देता है। दुनिया में लगभग तमाम लोग आस्तिक और आस्थावान हैं, नास्तिक तो उंगलियों पर गिने जाने वाले ही किसी को भी याद आएंगे। ऐसे में दुनिया में इतनी बेइंसाफी कैसे है? अगर ईश्वर की धारणा लोगों को गलत काम से रोकती होती तो फिर दुनिया में गलत काम खत्म ही हो जाने थे।
आज हम इस चर्चा को दूध की धार देखते हुए छेड़ रहे हैं, और बहस के लिए एक और पल के लिए मान लेते हैं कि ऊपर बैठा ईश्वर सब कुछ देख रहा है। तो फिर उसके बारे में लिखी गई इस बात को तो वो शर्तिया ही देख लेगा, और अगर वह सर्वशक्तिमान है तो फिर वह दूध की धार को भूखे पेटों की तरफ मोड़ भी देगा।
हम इसका इंतजार करेंगे।


अवैध और नैतिक के बीच की दुविधा


20 फरवरी 2012
आजकल
सुनील कुमार
इन दिनों नकल के खिलाफ दुनिया भर में संगीत कंपनियों, फिल्म इंडस्ट्री और किताबों के प्रकाशकों ने अभियान चला रखा है। जो इंटरनेट वेबसाइटें बिना किसी हक के संगीत को अपलोड करके लोगों के लिए मुफ्त में डाऊनलोड करने की सुविधा देती हैं उनमें से कुछ आज कटघरे में हैं। चीन जैसे देश में कॉपीराइट और पेटेंट अधिकारों के खुले बेजा इस्तेमाल के खिलाफ पश्चिमी देश लंबे समय से लगे हुए हैं। इसके बाद भी दुनिया भर के फुटपाथ लोगों को फिल्म, संगीत, किताब के साथ-साथ हर किस्म के फैशन-सामान की नकल देते हैं। और उन लोगों के सपने पूरे करते हैं जो कि उन्हें खरीद नहीं सकते। 
दुनिया के देशों का अपना कानून और उनके बीच के कानून ऐसी किसी भी चोरी या नकल के खिलाफ हैं। लेकिन जब बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी लागत से दर्जनों गुना अधिक दाम कमाने के लिए बाजार में बड़े-बड़े एकाधिकार कायम कर लेती हैं और दवाओं से लेकर जिंदगी बचाने के दूसरे कई किस्म के सामानों तक के दाम भारी मुनाफाखोरी के साथ तय करती हैं तो उसके खिलाफ दुनिया के कोई कानून नहीं है। और जैसा कि हम भारत की विधानसभाओं और भारत की संसद में देखते हैं, दुनिया के अधिकांश देशों में संसद से सरकार तक कारोबार का ऐसा बोलबाला रहता है कि कानून उन्हीं के हक के बनते हैं। 
भारत में सिगरेट और तंबाकू के पैकेटों पर खतरे की तस्वीर छापने का संघर्ष बरसों से चलते आ रहा था, और आज भी उसे कम भयानक दिखाने की मुहिम कंपनियां चला ही रही हैं। भारत में कहने को तो तंबाकू और शराब के इश्तहारों पर रोक है, लेकिन उसी ब्रांड से संगीत की सीडी या सोडा या पानी या कपड़े बनाकर कंपनियां अपने तंबाकू और शराब का प्रचार भी कर ही लेती हैं। यानी बाजार का कारोबार कानून की आंखों में मिर्च झोंक कर अपना काम निकाल लेता है और बाजार के हाथों बिकी सरकारें इसे सरोगेट पब्लिसिटी कहकर चुप बैठी रहती हैं। रोक के खिलाफ ऐसी राह निकालना और लोगों को नुकसान की तरफ बढ़ाना कुछ वैसा ही है जैसा अमरीका दुनिया भर में हवाई हमले करते हुए बेकसूर मौतों को कोलेटरल डैमेज कहकर इंसाफ ठहरा देता है। 
ऐसी बाजार व्यवस्था के खिलाफ, उसके एकाधिकार के खिलाफ लड़ाई का एक मोर्चा पायरेसी या नकल है। जब दुनिया के कानून और बाजार की रणनीति एक गिरोहबंदी करके लोगों के खिलाफ साजिशों को आए दिन पेश करती हैं, तो इसके खिलाफ आत्मरक्षा की लड़ाई में आम जनता को ही क्या पीछे बंधे हुए अपने हाथों के साथ लडऩे की मजबूरी होनी चाहिए? यह सिलसिला बेइंसाफी का है। 
इसलिए जो कंपनी बहुत बड़ी हो चुकी है, जो लेखक बहुत अधिक सफल हो चुका है, जिस फिल्म की खासी कमाई हो चुकी है, फैशन के जो सामान लागत से दर्जनों गुना दाम लेने की हालत में हैं ऐसे सबकी नकल फुटपाथों से लेने में क्या हर्ज है यह बात मेरे मन में ऐसे तमाम मौकों पर आती ही है। किसी भी चीज की नकल की नौबत तभी आती है जब वह एक सीमा से अधिक कामयाब हो चुकी रहती है। किसी मामूली सामान की नकल बनाने की जहमत कौन मोल लेगा क्योंकि मामूली होने से उसके खरीददार भी तो बहुत कम ही होंगे। इसलिए पाइरेटेड किताब उसी लेखक की बाजार में आती है जो बहुत अधिक बिक चुकी है। ऐसे में दुनिया के कानून से परे लोग अगर खुद होकर यह तय करते हैं कि उसकी नकल खरीदने से लेखक और प्रकाशक भूखे नहीं मरेंगे, तो मामूली कमाई वाले लोगों को बाजार के बहुत कामयाब लोगों के बारे में ऐसा सोचने का हक तो है। 
नकल से बने सामान को खरीदना वैसे तो कानून को तोडऩे जैसा है, लेकिन जब बाजार लोकतंत्र से लेकर इंसानियत तक तक सारे कानून को तोडऩे पर आमादा हो, रात-दिन का अपना धंधा ही उसने यह बना रखा हो, तो फिर कानून के टोकरे को अपने सिर पर लादकर चलने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ गरीबों की है? भारत जैसे महान कहे जाने वाले लोकतंत्र में भी हर कानून कमजोर पर तो पूरी ताकत के साथ लादा जाता है और वही कानून ताकतवर के कदमों तक पहुंचते हुए दम तोड़कर बिछ जाता है। 
जिस तरह अंगे्रज-राज में गांधी ने बहुत से कानून तोड़े क्योंकि वे कानून भारत के हक के खिलाफ बने हुए थे। गांधी से लेकर भगत सिंह तक के आजादी के आंदोलन को देखने के दो नजरिए थे, एक से इन्हें बगावत कहा जाता था और दूसरे से इन्हें क्रांति। ठीक इसी तरह आज के बाजार की एकाधिकार की गुंडागर्दी, मनमानी, मुनाफाखोरी और सरकारी नीतियों की बाजारू खरीद-फरोख्त के खिलाफ नकल को कोई अपराध मान सकता है और कोई उसे एक ऐसा विरोध मान सकता है जो कि बाजार की साजिशों का विरोध करने के लिए शायद अकेला बच गया कारगर तरीका है। 
मैं कानून के दायरे में चलने को हमेशा ही सही और बेहतर मानता हूं। लेकिन जब कानून को बनाने और लागू करने वाली पूरी व्यवस्था गरीब के हकों के खिलाफ हो जाए तो ऐसे गरीब या छोटे ग्राहक इस कानून की आंखों में मिर्च झोंककर बाजार की मुनाफाखोरी के खिलाफ नकल खरीदने का एक नैतिक हक तो रखते ही हैं। अब मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि जो नैतिक रूप से सही लग रहा है, वह वैधानिक रूप से सही क्यों नहीं है? जान बचाने वाली किसी दवा के दाम अंतरराष्ट्रीय मुनाफाखोरी के चलते अगर इतने बढ़ा दिए जाते हैं कि गरीब उसे न खरीद पाने की वजह से बेमौत मर जाए तो ऐसी मुनाफाखोरी को वैधानिक बनाने वाला विधान अनैतिक है। और ऐसे विधान को न मानने में कोई बुराई भी नहीं है।
अब एक सवाल यह भी इस बात के साथ-साथ उठता है कि बाजार के किस हिस्से को अनैतिक माना जाए, और किसके खिलाफ लड़ाई में नकल को सही माना जाए यह कौन तय करेगा, और कैसे यह तय होगा? इसके पैमाने क्या होंगे? और क्या इससे एक अराजकता की नौबत नहीं आ जाएगी? यह तमाम बात मोटे तौर पर शहरों के बारे में हो रही है। और यह सोचने-समझने की जरूरत है कि इन सतही शहरी जरूरतों से कहीं अधिक बड़ी जरूरत राजधानियों से दूर के नक्सल इलाकों के आम गरीब लोगों की है। वहां पर नक्सलियों ने या उनके साथ की कुछ जनता ने अगर सरकार के कानून के कुछ हिस्से को जनहित के खिलाफ और अनैतिक मानकर बंदूक का कानून लागू करने का काम किया हुआ है, तो उसमें से कौन सी बात को जायज माना जाए? शहरों में बाजार और कानून की व्यवस्था के खिलाफ जो बगावत मुझे खटक नहीं रही है वह जंगलों में धमाकों के बीच भी क्या नहीं खटकेगी? इन दोनों मिसालों में फर्क सिर्फ एक है, या शायद बड़ा फर्क सिर्फ एक है कि एक में हिंसा शामिल है और दूसरे में खून-खराबे का कोई काम नहीं है।
एक जगह अराजकता को न्यायसंगत मानते हुए दूसरी जगह की अराजकता के खिलाफ मैं कैसे लिख सकता हूं, यह दुविधा किसी एक तर्क पर पहुंचने के लिए रास्ता ढूंढती है। जब तक ऐसी किसी राह का कोई नक्शा मेरे दिमाग में साफ न हो सके, तब तक भी यह बात साफ है कि मैं अपने पैमाने से जो ब्रांड मुनाफाखोर पाता हूं, उनकी जरूरत होने पर नकल को खरीद भी लेता हूं। दो लाख रूपए की किसी घड़ी की दो हजार रूपए वाली चीन की बनी हुई नकल से अगर कुछ लोगों के सपने पूरे होते हैं तो यह नकल उसी तरह अच्छी है जिस तरह भारत में एक किसी साबुन के इश्तहार में, दाग अच्छे हैं, जैसी बात कही गई है। जो नकल किसी सामान के असली ग्राहकों को कम न करे, और मामूली ग्राहकों के सपने भी पूरे कर सके, तो वह नकल शायद अच्छी ही है।
बाजार की हिंसा और साजिशों के खिलाफ जब सरकार, संसद और अदालत, किसी भी जगह लड़ाई कारगर न हो तो शहरों के भीतर बिना खून-खराबे वाली ऐसी अवैधानिक लेकिन नैतिक हक वाली लड़ाई ठीक है। दुनिया में जहां-जहां देश मिलकर बाजार के नए कानून बनाने को जुटते हैं, उन तमाम सम्मेलनों के सामने सड़कों पर सामाजिक संगठन आर्थिक साजिशों के खिलाफ आंदोलन करते खड़े रहते हैं। नकल को बनाना चाहे कोई सामाजिक आंदोलन न हो, लेकिन बाजार के दानवों को कुछ कमजोर करने में गरीब-विरोधी कानून को तोडऩे में क्या बुराई है? दुनिया में जब आर्थिक समानता की सोच पूरी तरह खत्म कर दी गई हो, तो लोगों को यह हक तो मिलता ही है कि वे अपने हिसाब से पूंजी का एक नया बंटवारा करने का नया रास्ता तलाशें। 
अवैध और नैतिक के बीच की यह दुविधा मेरे मन में जारी ही है।

आदिवासियों के खिलाफ कारखानों की साजिश


संपादकीय
19 फरवरी 12

छत्तीसगढ़ में जगह-जगह कारखानों के लिए आदिवासियों की जमीनें लेने के लिए एक बड़ी साजिश चल रही है। देख भर के बड़े-बड़े कारखानेदार इस खनिज-संपन्न राज्य में कानून तोडऩे में लगे हैं। अभी कुछ ही महीने हुए हैं कि बस्तर में एस्सार नाम की कंपनी को नक्सालियों को एक फर्जी जनसंगठन के रास्ते से नक्सलियों को करोड़ों रूपये देने का मामला पकड़ाया। लेकिन कल हमने जो रिपोर्ट छापी है, वह और भी भयानक है। उद्योगपति इस राज्य में कारखाने लगाने के लिए सैकड़ों और हजारों एकड़ जमीनें खरीद रहे हैं। राज्य का शायद ही ऐसा कोई इलाका हो जहां पर बिजली हो, सड़क और पटरी हो, जो खदानों के पास हो और जहां आदिवासियों की जमीनें न हों। नतीजा यह हो रहा है कि तकरीबन हर कारखानेदार जालसाजी और साजिश करके कुछ गरीब आदिवासियों के नाम पर दूसरे आदिवासियों की जमीनें खरीद रहा है और ऐसे कर्मचारियों या बिचौलियों के नाम की जमीन को कारखाने की जमीन बताकर राज्य और केंद्र से तरह-तरह की मंजूरी भी ले रहा है। यह उसकी अपनी एक कारोबारी मजबूरी हो सकती है लेकिन भारत के आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए उनकी जमीनों की खरीदी-बिक्री गैरआदिवासियों को रोकने के कड़े कानून लागू हैं। और इन दिनों छत्तीसगढ़ में चल रही खरीदी में इस कानून को सोच-समझकर, जमकर तोड़ा जा रहा है जो कि आदिवासियों की लूट से कम कुछ नहीं है। 
कानून की हमारी बहुत साधारण समझ यह कहती है कि आदिवासियों के ऐसे षडयंत्र भरे शोषण पर एक कड़ी कार्रवाई करने के लिए आदिवासी कानून मौजूद हैं। राज्य सरकार का न सिर्फ यह अधिकार बनता है कि आदिवासियों की जमीन को एक साजिश से हथियाने वाले ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाए, बल्कि सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है। और सरकार से परे भी राज्य और केंद्र में आदिवासियों के हितों को बचाने के लिए कुछ संवैधानिक संगठन बने हुए हैं जिनमें मनोनीत नेताओं को जनता के खर्च से ऐशो-आराम मिलते हैं, और अगर ऐसे मामलों में ये संवैधानिक संस्थाएं कार्रवाई नहीं करती हैं तो हमारे हिसाब से वे अपनी जवाबदेही पूरी नहीं करतीं और उनकी इस अनदेखी के खिलाफ भी अदालत जाया जा सकता है। यह मामला आदिवासी हितों को लेकर लडऩे वाले जनसंगठनों के अदालत जाने लायक भी है और अदालतें खुद होकर भी ऐसे मामलों पर कार्रवाई शुरू कर सकती हैं। भारत की न्यायपालिका अपने जज के ट्रैफिक जाम में फंस जाने पर भी अदालती कार्रवाई शुरू करने का इतिहास दर्ज कर चुकी है, लेकिन मासूम और बेजुबान आदिवासियों के खिलाफ ऐसी बाजारू साजिश पर शायद अदालतों को किसी के आने और दरवाजा खटखटाने का इंतजार होगा। सरकारी रोजी के काम में लगे हुए गरीबी की रेखा के नीचे के आदिवासियों के नाम बैंक खाते खुलवाकर, उसमें करोड़ों रूपए डालकर दूसरे आदिवासियों की जमीनें खरीदने की साजिश देखने लायक है। कल के अखबार में हमने इसके दस्तावेजी सुबूतों और तस्वीरों सहित रिपोर्ट छापी है और छत्तीसगढ़ में आदिवासी हितों की बात करने वाले लोगों की परख का यह मौका है।
अब लगे हाथों इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिए कि उद्योगों के लिए जमीन लेने में जो दिक्कतें आती हैं, उनका क्या इलाज निकाला जा सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार एक अलग कानून की बात कर रही है और वह आने को है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने निजी उद्योगों के लिए जमीनें लेकर देने का सिलसिला बंद कर दिया है और अब कारखानेदारों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे बाजार में अपने लिए जमीन का इंतजाम करें। केंद्र और राज्य की इन दो नीतियों के बीच उद्योगों का लगना खासा मुश्किल है और इसका कोई रास्ता देश में निकालना होगा। लेकिन किसी दिक्कत की वजह से लोगों को कानून तोडऩे का हक नहीं मिल सकता। ऐसा हो तो फिर देश के हर गरीब और भूखे को यह हक मिल जाएगा कि वे संपन्न तबके की कारों को तोड़कर उसमें से सामान निकाल लें और दुकानों को तोड़कर उसमें से खाना निकाल लें। कानून के राज में ऐसी छूट गरीबों को नहीं मिल सकती, इसलिए अमीरों को भी कानून तोडऩे की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में आदिवासी जमीन को लेकर जो साजिश हुई है, उसमें हमारे हिसाब से आयकर विभाग की कार्रवाई भी बनती है और ऐसे तमाम लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसा न हो जाए कि अंधा कानून बीच में डाले गए आदिवासियों को जेल भेजकर साजिश करने वाले कारखानेदारों को बचा ले।

राष्ट्रीय खतरे और राजनीतिक हिसाब


संपादकीय
18 फरवरी 12

देश के आधा दर्जन से अधिक गैरकांगे्रसी मुख्यमंत्रियों ने केंद्र सरकार की एक ऐसी नई निगरानी संस्था राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र (एनसीटीसी) का विरोध किया है।  उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, तमिलनाडू, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश  खुलकर इसके खिलाफ आ गए हैं। इसमें केंद्र की यूपीए सरकार के लिए अधिक बड़ी परेशानी पश्चिम बंगाल से है जहां यूपीए की भागीदार पिछले कई महीनों से लगातार केंद्र सरकार से खफा चल रही है और इन दोनों के बीच बिना तनातनी देखे सूरज डूब नहीं रहा है। यूपीए के हिस्सेदारों में से तमिलनाडु में करूणानिधि वैसे ही घायल चल रहे हैं, और बाहर से यूपीए का साथ देने वाले माया-मुलायम के खिलाफ कांगे्रस के नेता लगभग हर घंटे गालियां दे रहे हैं। यह पूरी नौबत एक भयानक कमसमझी का सुबूत है।
लेकिन आज की यह चर्चा हम यूपीए की नासमझी और कमअक्ली भरी बददिमागी पर खराब करना नहीं चाहते। उसके लिए कल तक कांगे्रस फिर सामान जुटा देगी। आज हम इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि भारत के संघीय ढांचे के भीतर केंद्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर आज एक ऐसे मुद्दे पर तनाव खड़ा हो रहा है जो पूरे देश को चूर-चूर करने की ताकत रखता है। आतंकवाद विरोधी केंद्र की यूपीए सरकार की सोच राज्यों को उनके अधिकार क्षेत्र में दखल लग सकती है, हो सकता है कि यह कानून व्यवस्था लागू करने के राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में पूरी दखल भी हो। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि जब देश के बहुत से राज्यों में घरेलू और विदेशी आतंक बढ़ते चले जा रहा है तब केंद्र सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है और उसके लिए उसे किस तरह के अभूतपूर्व अधिकारों की जरूरत है? अमरीका की मिसाल सामने है, जो दुनिया भर पर हमले करता है लेकिन खुद अमरीका की जमीन पर उसके खिलाफ किसी तरह के आतंकी हमले के खतरों को लगभग खत्म कर दिया गया है। इसके लिए वहां कुछ ऐसे केंद्रीय कानून हैं जो कि वहां की राष्ट्रीय सरकार को राज्यों के भीतर भी निगरानी रखने और कार्रवाई करने का हक देते हैं। भारत में अमरीका की एफबीआई जैसी कोई संस्था नहीं है। गैरकांगे्रसी पार्टियों की यह आशंका सही है कि ऐसे अभूतपूर्व अधिकारों से लैस कोई केंद्रीय संस्था कांगे्रस जैसे घाघ राजनीतिक दल के हाथों में राजनीतिक साजिशों का हथियार बन सकती है। लेकिन केंद्र पर राज करना न तो कांगे्रस का एकाधिकार है, और न ही दूसरी पार्टियों की सत्ता दिल्ली में आने पर ऐसे किसी बेजा इस्तेमाल से उनको भी रोका जा सकेगा। 
ऐसे में हमको यह बात लग रही है कि आशंकाओं के चलते किसी जरूरी संस्था का विरोध करना केंद्र सरकार के लिए राजनीतिक परेशानी खड़ी करने का काम तो हो सकता है लेकिन इससे देश एक ऐसे खतरे में भी पड़ सकता है जिससे उबरना फिर रातों-रात मुमकिन नहीं होगा। यह कुछ उसी तरह का मामला होगा कि आग लगने पर बाल्टी खरीदने का टेंडर निकालना। आतंक के खिलाफ लडऩे के लिए एक मजबूत केंद्रीय संस्था पहली नजर में ठीक और जरूरी लगती है। लेकिन देश की इस बहुत ही जरूरी जरूरत पर प्रदेशों को सहमत करने की क्षमता कांगे्रस खो चुकी है। वह गिनती के दम पर यूपीए में मुखिया तो बनी हुई है, लेकिन जिन पार्टियों ने उसे आड़े वक्त पर संसद में साथ दिया था उन पार्टियों को भी बिना किसी जरूरत गालियां बकने से वह अपने बड़बोले नेताओं को रोक नहीं पा रही है। आज पूरे देश की राजनीति में कांगे्रस ने एक ऐसा माहौल बना दिया है कि जिसको गाली खानी हो, वह आकर उसका साथ दे। 
भारत जैसे चुनाव आधारित लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं जनहित और अपनी चुनावी संभावनाओं के बीच डोलती रहती हैं। ऐसे में इस पेंडुलम को अपनी तरफ करने के लिए उस पार्टी को भी कोशिश करनी पड़ती है जो कि देश पर राज कर रही है या देश पर राज करने वाले गठबंधन की मुखिया हो। कांगे्रस के साथ परेशानी यह है कि उसकी मुखिया से कोई उसी वक्त बात कर सकता है जब मुखिया ऐसा चाहती हैं। और उसके गठबंधन के प्रधानमंत्री न कोई बात करते और न ही उनसे बात का कोई मतलब कांगे्रस की व्यवस्था में निकलता है। ऐसे में यह देश केंद्र के सत्तारूढ़ गठबंधन की नालायकी का दाम चुका रहा है और देश के लिए जरूरी सुरक्षा एजेंसी भी खड़ी नहीं हो पा रही है। लेकिन आखिर हम एक बार फिर सभी राजनीतिक दलों से यह कहना चाहेंगे कि राष्ट्रीय खतरों के मामलों को राजनीतिक हिसाब-किताब से परे रखना चाहिए। 

छोटी सी बात


17 फरवरी
छोटी सी बात
सुनील कुमार 
किसी बात को बिना दिमाग का इस्तेमाल किए ज्यों का त्यों मान लेने का मतलब आत्मविश्वास की कमी। अपने तर्कों को ना छोड़ें, दूसरों की बात को सच्चाई के कसौटी पर परखें तभी उस पर भरोसा करें। विज्ञान का तरीका तर्कसंगत होता है। आपने विज्ञान चाहे न पढ़ा हो, उसके तरीकों को आजमाना तो सीख ही सकते हैं। और विज्ञान किसी इंसान का बनाया हुआ नहीं है, पूरी कुदरत ही वैज्ञानिक है। कुदरत की मिसालें देखें, तो आपको समझ आएगा कि हर बात के पीछे ठोस वजहें होती हैं।
बहुत से लोग अंधविश्वास के चलते किसी की कही बात पर आँखें बंद करके भरोसा कर लेते हैं। ऐसा करना ना आपके लिए ठीक है, ना ही उसके लिए जिस पर आपका अंधविश्वास है। सच्चा गुरु आपको तर्कों के साथ समझाता है, ना कि भभूत देकर। आपका जो लोग सम्मान करते हैं, उनको भी अपने अंधविश्वास तले ना दबाएँ। अपने बच्चों को भी अपनी आस्थाएं तय करने की छूट दें। हो सकता है कि उनके फैसले आपके मुकाबले बेहतर हों। उनके लिए पसंद को ख़त्म ना कर दें। अगर आपके बच्चे आपकी कही बात को अपने दिमाग के इस्तेमाल के बिना मान लेते हैं, तो यह उनके अपने विकास के लिए, फैसले लेने की क्षमता के लिए ठीक नहीं होगा। पूरी जिन्दगी आप ही तो उनको राह दिखाने को नहीं रहेंगे, इसलिए उनको राह तय करना आना चाहिए। इसके लिए वैज्ञानिक सोच जरूरी होती है। तर्क करने वाले गलतियां कम करते हैं। बच्चों के साथ कभी इस भाषा का इस्तेमाल ना करें कि वे बहस बहुत करते हैं। चुप रहकर बात को मान लेने वाले जिन्दगी में अधिक गलतियाँ करते हैं, अधिक धोखे खाते हैं। 
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संपादकीय
17 फरवरी 12

राष्ट्रपति का बेटा और एक करोड़
महाराष्ट्र में म्युनिसिपल चुनावों के दौरान विदर्भ के अमरावती में कांगे्रस के विधायक राव साहब शेखावत को कलेक्टर ने नोटिस जारी किया है कि वे जब्त एक करोड़ रूपए का हिसाब दें। इस विधायक का कहना है कि यह पैसा पार्टी का घोषित पैसा है और कमजोर उम्मीदवारों को बांटने के लिए आया था। इस खबर में देखने की बात यह है कि इतनी बड़ी जब्त नगदी जिस विधायक से जुड़ी है वह राष्ट्रपति का बेटा भी है। 
हमारे नियमित पाठकों को यह मालूम है कि हम किसी भी तरह के विशेषाधिकार किसी नेता या अफसर, जज या किसी और संवैधानिक पद पर काबिज व्यक्ति को देने के खिलाफ रहते हैं। जब कांगे्रस की सरकार ही महाराष्ट्र में अपनी पार्टी के नेता से इस नगदी को जब्त करते हुए दो लोगों को गिरफ्तार करती है, तो कम से कम इतनी बात  तो जाहिर है कि उसमें पहली नजर में कोई गड़बड़ी है। इतनी बड़ी रकम इस तरह से आना-जाना, और राष्ट्रपति के बेटे का उससे जुड़ा होना यह सवाल खड़ा करता है कि अगर ऐसा बेटा राष्ट्रपति के साथ सफर करता होता तो उसका सामान भारत के मौजूदा इंतजाम के मुताबिक सुरक्षा जांच से भी परे होता और / या उसे लेकर कोई सवाल नहीं हो पाते। हम बार-बार यह लिखते हैं कि किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा जांच से छूट नहीं मिलनी चाहिए। यह बात हमने भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम की अमरीका में हुई सुरक्षा जांच के सिलसिले में लिखी थी कि जांच में क्या बुराई है? खासकर तब जब लोग दूसरे मुसाफिरों के साथ सफर करते हैं, दूसरों के साथ किसी स्टेशन या एयरपोर्ट पर रहते हैं, जनता के पैसों से लिए गए सरकारी विमानों में सफर करते हैं।  किसी भी तरह की रियायत राष्ट्रपति के बेटे के ऐसे एक करोड़ रूपए की आवाजाही पर सवाल नहीं उठाने देती। ऐसी घटना को लेकर लोगों को अदालत में जनहित याचिका लगानी चाहिए कि सुरक्षा जांच से देश के किसी भी व्यक्ति को कोई रियायत न मिले। भारत में एक भी कुर्सी ऐसी नहीं है जिस पर बैठे लोग किसी न किसी व्यक्ति को लेकर जनता को यह पक्का भरोसा हो कि वे पक्के भ्रष्ट थे। ऐसे लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक रियायतें देना गलत है और उसके खिलाफ एक जनमत तैयार होना चाहिए। 
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राहुल की नौटंकी
उत्तरप्रदेश का चुनाव तो आधा गुजर चुका है आधा और गुजर जाएगा, लेकिन कांगे्रस के लिए यह कुछ अधिक सोचने का सामान छोड़ जा रहा है। मुसलमानों को लेकर कल तक जो एक उदारवादी मुस्लिम नेता सलमान खुर्शीद थे वे आज एक अधिक कट्टरपंथी मुस्लिम, या धर्म की चुनावी-राजनीति करने वाले ऐसे आक्रामक कानून मंत्री बन गए हैं जिनको चुनाव के कानून को सोच-समझकर तोड़ते देखा जा रहा है। हो सकता है कि ऐसी हरकतें चुनाव में कुछ अधिक वोट पाने के लिए एक कामयाब हरकत हो, लेकिन हम इसके खिलाफ इसलिए हैं कि चुनाव के दौर में ऐसी सस्ती हरकतें उस पार्टी की तो कम से कम नहीं होनी चाहिए जो सवा सौ साल पुरानी पार्टी होने के अहंकार में डूबी रहती है। हमको यह बात भी अच्छी नहीं लग रही कि एक धर्मांधता विरोधी, गैरसाम्प्रदायिक समझी जाने वाली कांगे्रस पार्टी इस तरह से अपने-आपको चुनावी अंधड़ के बीच में धार्मिक चापलूसी करने वाली पार्टी बनाकर रख छोड़े। हम ऐसी बड़े मुद्दे पर चुनावी घोषणापत्र में या कि चुनावी मंच से एक सोच को सामने रखने को सही नहीं मानते। कांगे्रस को इस मुद्दे को पहले ही छेड़ देना था और उस पर लोगों की सोच सामने आती रहती। आज यह एक सस्ती हरकत लग रही है। 
लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने एक दूसरा कारण भी है। पिछले दो-तीन दिनों से राहुल गांधी जिस तरह की अप्रिय चर्चाओं से घिरे हुए हैं वे बहुत निराश करने वाली हैं। उन्होंने अपने भाषण के दौरान एक कागज को फाड़ा, यह जाहिर करते हुए कि मानो वह समाजवादी पार्टी का चुनावी घोषणापत्र हो, और बाद में वीडियो कैमरों ने दिखा दिया कि वह कागज उनकी अपनी पार्टी के नेताओं की एक फेहरिस्त थी। यह नौटंकी ठीक नहीं है। दूसरी कुछ पार्टियों के कुछ नेता, या कांगे्रस के कुछ दूसरे नेता ऐसा करें तो उसमें हैरानी की बात कम हो, लेकिन सोनिया और राहुल नौटंकी से कुछ परे रहते आए हुए खुशमिजाज नेता समझे जाते रहे हैं, लेकिन शायद उत्तरप्रदेश में कांगे्रस की इज्जत का पूरा घड़ा अपने सिर पर आ जाने के बाद राहुल गांधी आपा खो रहे हैं। कल शायद उनके बोझ को कुछ कम करने के लिए कांगे्रस के उत्तरप्रदेश प्रभारी और राहुल गांधी के प्रशिक्षक समझे जा रहे दिग्विजय सिंह ने यह बयान दिया है कि उत्तरप्रदेश में कांगे्रस अगर कामयाब नहीं होती है तो उसके लिए वे (दिग्विजय सिंह) जिम्मेदार होंगे। वैसे अपने-आपमें यह बयान चुनाव के बीच सेनापतियों में से एक की तरफ से आना कुछ हैरान ही करता है कि क्या कांगे्रस वहां पर ऐसी किसी नौबत की तोहमत राहुल गांधी पर से हटाने के लिए अभी से माहौल बनाना शुरू कर रही है?
भारत की चुनावी राजनीति में सस्ती, सतही, घटिया और गैरजिम्मेदार हरकतों की कोई कमी नहीं रहती। और मीडिया के लिए यह एक मजे की बात रहती है कि वह दस सेकंड के एक शॉट को एक ही बुलेटिन में दर्जनों बार दिखाकर अपने दर्शकों को बांधकर रख सके। लेकिन कल के दिन देश का प्रधानमंत्री बनने की चर्चा जिन लोगों के बारे में चलती है, उनसे भी हम यह उम्मीद करते हैं कि वे कुछ बड़प्पन दिखाएं।

छोटी सी बात


छोटी सी बात
16 फरवरी
किसी का नाम रखने के बारे में हम पहले भी यह सलाह देते आए हैं कि उसकी कोई गलत व्याख्या न हो सके। किसी ऐतिहासिक, सामाजिक संदर्भ में उसका खराब या नकारात्मक मतलब न निकले। इसी तरह जिन नामों को लेकर अंतरराष्ट्रीय या विदेशी संभावनाएं हों, उनके अंग्रेजी हिज्जों को लेकर सावधान रहें। कोलगेट ब्रांड ने सोचा नहीं होगा कि स्पेन में उस नाम का एक मतलब होता है- ''जा, जाकर फांसी लगा ले।ÓÓ जहां लोग स्पेनिश बोलते हैं वहां मामला गड़बड़ है।
इसी तरह एक फैशन ब्रांड- ''फ्रेंच कनेक्शन यू केÓÓ, को शायद एक गाली से मिलता-जुलता बनाया गया है, लेकिन भारत में मां-बाप बच्चों के कपड़ों पर एफसीयूके लिखा देखना पसंद नहीं करेंगे।
पूरी दुनिया का ख्याल तो नहीं रखा जा सकता, लेकिन जहां तक संभावनाएं दिखें, उनका ख्याल रखना चाहिए। अब पौन सदी पहले मेरी मां का नाम 'फूलÓ रखते हुए मेरे नानी-नाना को यह पता तो नहीं होगा कि अंग्रेजी में इस शब्द के क्या मायने होंगे। और शायद इस अंग्रेजी मतलब को जाने बिना ही मां गुजर गई। आज किसी लड़की का नाम 'फूलÓ रखें, तो अंग्रेजी के चलन के कारण उसे स्कूल कॉलेज में कुछ दिक्कत हो सकती है।
कुछ लोगों के नाम बहुत निराशा वाले होते हैं। एक-दो लड़कियां ऐसी भी देखने में आईं, जिनका नाम ही निराशा है। एकांत या विकल नाम भी कोई सकारात्मक तस्वीर नहीं बनाते। मेरा निजी मानना यह है कि इसका अच्छा असर नहीं पड़ता।
कुछ लोग दूकानों के नाम ऐसे रखते हैं जिनको उस इलाके के लोग ठीक से पढ़ नहीं पाते या बोल नहीं पाते। इन्द्रधनुष के रंगों के पहले अक्षरों से बना एक नाम मेरे जैसे साधारण पढ़े-लिखे से भी पढ़ते-बोलते नहीं बनता। अंग्रेजी कम बोलने वाले इलाके में अंग्रेजी के 'जीÓ से होने वाले दो उच्चारणों 'गÓ और 'जÓ की दिक्कत को भी समझना चाहिए।

उत्तरप्रदेश और मुंबई


संपादकीय
16 फरवरी 12
उत्तरप्रदेश के विधानसभा के चुनाव में अब तब 55-60 फीसदी वोट डले हैं। इसमें भी उन सीटों पर अधिक वोट डले हैं जहां से गुंडे-बदमाश चुनाव लड़ रहे हैं या फिर जो नक्सल इलाकों की सीटें हैं। मतलब यह कि आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन वाले उत्तरप्रदेश के मतदाता अधिक वोट डाल रहे हैं। दूसरी तरफ इस वक्त मुंबई में म्युनिसिपल चुनावों के वोट डल रहे हैं, और घनी शहरी आबादी की वजह से कुछ कदमों की दूरी पर जो पोलिंग बूथ हैं वहां तक भी पहुंचने में लोग ठंडे बैठे हुए हैं। इस पल ट्विटर पर बहुत से जाने-माने लोग लिख रहे हैं कि जो लोग आज वोट डालने नहीं निकलें, वे लोग पांच बरस तक सड़क, नाली, पानी की कोई शिकायत न करें।
न सिर्फ चुनावों में वोट डालने की जागरूकता बल्कि बहुत सी दूसरी तरह की जागरूकता को लेकर हिन्दुस्तान का एक शहरी, पढ़ा-लिखा या दौलतमंद तबका, गरीबों,  गांववालों और अनपढ़ों को तरह-तरह से कोसते रहता है और हर किस्म के पिछड़ेपन के लिए उनको जवाबदेह मानता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक चेतना, सामाजिक चेतना और सुधार का इन बातों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। शराब को बुरी चीज मानने वाले लोग अपनी इस नापसंद को पल भर के लिए अगर अलग रखने को तैयार हों, तो देश के बहुत से आदिवासी इलाकों में आदमियों के साथ-साथ औरतों को भी बराबरी से शराब पीने का हक मिला हुआ है। शराब की अच्छाई और बुराई पर चर्चा किसी दूसरी जगह हो सकती है, इस बात को कहने का हमारा मकसद यह बताना है कि शहर, संपन्नता और पढ़ाई से दूर का आदिवासी समाज किस तरह औरत-मर्द की समानता पर अधिक भरोसा रखता है। भारत के शहरी मध्यम और उच्च वर्ग में क्या महानगरों से परे इस बात की कल्पना की जा सकती है कि औरतें भी बराबरी से बैठकर पी सकें? शुद्धतावादियों को यह लग सकता है कि पीना खराब है और हम यहां पीने की वकालत कर रहे हैं। लेकिन हमारा यह मानना है कि औरत-मर्द के बीच का भेदभाव पीने के मुकाबले भी कहीं अधिक बुरी बात है। 
आदिवासियों के बारे में हम एक बात यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि बिना पढ़ाई-लिखाई और बिना टेलीविजन वाले दिनों में, भारत के आपातकाल के अंत में हुए आम चुनावों में आदिवासियों ने नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। जब भारत का शहरी तबका आपातकाल के सारे महीनों में वक्त पर चलने लगी रेलगाडिय़ों पर मुग्ध होकर 'अनुशासन पर्वÓ मना रहा था, तब जंगलों में बसे, शहरी जुबान में कहें तो, अनपढ़ आदिवासियों ने इंदिरा-संजय को एकमुश्त खारिज कर दिया था। ऐसे आदिवासियों को आज हिंदुस्तान में उनके अपने किस्म के धर्म और ईश्वर की धारणा के साथ जीने भी नहीं दिया जा रहा और उन्हें एक शहरी-संगठित धर्म का बताने का काम चल रहा है। लेकिन यह एक अलग मुद्दा है जिस पर बात कभी और।
इसी तरह इस देश में एक यह सोच बनी हुई है कि लोग गरीबी की वजह से भ्रष्ट हो जाते हैं। कोई गरीबी की बेबसी में हो सकता है कि कोई पहला भ्रष्टाचार कर लेता हो। लेकिन इस भ्रष्टाचार की संपन्नता के बाद तो वह उतना गरीब भी नहीं रहता, और आगे के तमाम भ्रष्टाचार तो ऐसे लोग संपन्नता आ जाने के बाद भी जारी रखते हैं। दूसरी तरफ जब दूसरी-तीसरी और चौथी पीढ़ी के दौलतमंद लोग हर किस्म की बेईमानी और जालसाजी करते हुए पैसा कमाते हैं, तो वे गरीबों के लिए संपन्न तबके द्वारा सहेजकर रखी गई गालियों गलत साबित करते हैं। हमारा लंबा अनुभव यह है कि संपन्न लोग अधिक बेईमान होते हैं, वे अधिक अपराध करते हैं, वे अधिक गलत काम करते हैं, क्योंकि उनके पास इन कामों की सजा से बच निकलने के लिए पैसों की ताकत होती है। गरीब क्या खाकर ऐसे काम करने का हौसला करेगा जिससे कि बच निकलने के लिए उसके पास न तो जमानत की रकम होती, न रिश्वत होती, और न ही महंगे वकील की फीस उसके पास होती। जो इंसाफ को खरीद नहीं सकता वह जुर्म करने के पहले कई बार ठिठकता होगा।
उत्तरप्रदेश के चुनाव में नक्सली इलाकों में गांवों के मतदाता और आदिवासी मतदाता जिस बड़ी संख्या में पहुंचे हैं, वे मुंबई जैसे महानगर के मतदाताओं के मुंह पर एक तमाचे की तरह हैं जिनको मुंबई सिर्फ दूधवाले भैया की तरह जानता है। इस वक्त आ रही खबरें बताती हैं कि मुंबई में जो दौलतमंद इलाके हैं वहां किसी को वोट डालने की परवाह कम ही है। 
भारत में सामाजिक बोलचाल की जुबान में, और बहुत से गैरजिम्मेदार मीडिया में भी एक संपन्न परिवार से जुड़ी खबरों में उसे अच्छे और प्रतिष्ठित परिवार जैसे शब्दों के साथ पेश किया जाता है। मानो दौलत अच्छाई का दूसरा नाम हो और दौलत प्रतिष्ठा का प्रतीक हो। इसी तरह गंवईयां शब्द को या देहाती शब्द को कम समझदार, अनजान और पिछड़े हुए के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मेहनतकश और ईमानदार गरीब को भी कंगले और दो कौड़ी के इंसान की तरह गिना जाता है, मानो चोरी की गिन्नियों से लदे इंसान बेहतर होते हों और पसीने की कौडिय़ां कोई दाग हों।
ऐसी गाली-गलौज की जुबान इस्तेमाल करने वाले लोग मतदान के दिन अपने-आपको बेहतर तो साबित करके दिखाएं।