मौके की नजाकत


मौके की नजाकत


29 फरवरी 2012
छोटी सी बात
अस्पताल, श्मशान और शोक का कोई भी मौका हंसी मजाक का नहीं होता। कल रात ही एक बिल्कुल शांत अस्पताल में खड़े-खड़े बातें करते हुए मेरे ही मुंह से एक किस्सा निकला। यह अंदाज नहीं था कि उसे सुनने वालों में से एक की हंसी इतनी तेज रहेगी कि अस्पताल की कई मंजिलें गूंज जाएं। तुरंत ही वहां से बाहर निकलना पड़ा, लेकिन यह सूझते-सूझते फिर भी कुछ समय बर्बाद हो गया कि मरीज का हाल ठीक रहने पर भी हंसी-मजाक कुछ ठीक नहीं। 
इसके बारे में सोचते हुए कुछ समय पहले की एक बात याद आई कि एक परिचित परिवार में मुखिया के गुजर जाने के अगले दिन जब मैं वहां पहुंचा तो गर्मी की दोपहर तमाम लोग घर के भीतर थे और बाहर तक खूब हंसने-खिलखिलाने की आवाजें आ रही थीं। फाटक पर खड़े रहकर यह भी अटपटा लगा कि घंटी भी बजाएं या नहीं, क्योंकि इतनी हंसी के बीच बाहर कोई पहुंच गया है यह सोचकर भी शायद घरवाले कुछ झेंप जाएं। 
मौके-बेमौके की बात यही होती है। कोई बात किसी जगह बहुत अच्छी होती है और दावत में चार लतीफों के साथ आप हिट हो सकते हैं। दूसरी तरफ किसी परेशानी या गमी के मौके पर आप लतीफों के बीच खड़े रहकर भी लोगों की हैरानी और हिकारत का सामान बन सकते हैं। इसलिए ऐसे मौकों का ख्याल जरूर रखना चाहिए जब लोगों की भावनाएं पिघली हुई रहती हैं।  
किसी के बच्चे के इम्तिहान के समय अगर आप परीक्षा की परेशानी से कहीं किसी और की की हुई आत्महत्या की चर्चा छेड़ बैठेंगे तो आप उस परिवार को जरूरत से अधिक विचलित भी कर सकते हैं। इसी तरह किसी शादी के मौके पर तलाक की चर्चा, खाने की मेज पर किसी गंदगी की चर्चा, लोगों के मन में आपके लिए एक गहरी नापसंदगी पैदा कर देती है। इसलिए अपनी सही बात को भी किसी अटपटे मौके पर न करें।
-सुनील कुमार


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