31 march 2012


बीमार होते देश को बचाने की जरूरत


31 मार्च 2012
संपादकीय
देश के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण संस्थानों में से एक सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरमेंट  की ताजा रिपोर्ट बताती है कि किस तरह देश के एक तबके की संपन्नता के बाद यहां के बाजार में घुस चुकीं अंतरराष्ट्रीय खानपान कंपनियों ने अपनी पैकिंग पर आधी-अधूरी, झूठी या धूर्तता से लिखी गई जानकारी देकर ग्राहकों से यह बात छुपाई है कि उनका खाना सेहत के लिए कितना नुकसानदेह है। इस बात को लेकर दुनिया भर में ऐसी कंपनियां पहले तो उस देश के कानूनों को खरीदकर अपनी इस जालसाजी के लिए कानूनी रास्ते बना लेती हैं और फिर उसके बाद ग्राहकों को धोखा देने या अंधेरे में रखने का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाता है। ऐसे में आज जब यह रिपोर्ट सामने आई है तो सत्ता में बैठे हुए लोगों पर जनता का ऐसा दबाव पडऩा चाहिए कि उदार अर्थव्यवस्था के नाम पर बाजार में कारोबारियों को दी गई ऐसी छूट खत्म की जाए और इन पर एक टैक्स लगाकर सरकार उससे जागरूकता का एक अभियान भी चलाए।
भारत का संपन्न तबका बहुत ही रफ्तार से अधिक मोटापे की तरफ बढ़ रहा है और उसके साथ-साथ अधिक मोटापे से जुड़ी हुई बीमारियों की तरफ भी। भारत में जहां पर कि हजारों बरस से प्राकृतिक जीवन की नसीहत रहते आई है वहां पर आज कुछ तो लापरवाह शहरी जीवन से और कुछ बाजारू खानपान से संपन्न आबादी तरह-तरह की बीमारियों पा रही हैं, और ऐसे खानपान को बढ़ावा देने वाली दुकानें, दूसरी तरफ ऐसे ही खानपान से बढऩे वाली बीमारियों के महंगे इलाज की दुकानों के ग्राहक भी तैयार कर रही है। यह पूरा सिलसिला बाजार को बहुत अच्छा लगता है। पहले बड़े फ्रिज को कारखानों में बने खाने के सामानों से भरकर, खिला-पिलाकर, मोटा बनाकर, नए कपड़े बेचकर, महंगे जिम का कारोबार बढ़ाकर आखिर में महंगे अस्पतालों तक पहुंचाने का पूरा सिलसिला बाजार के काम का है। और जिस तरह किसी बड़े मॉल में एक शोरूम में जाने वाले ग्राहक दूसरे शोरूम के भी संभावित ग्राहक बन जाते हैं, वैसा ही उदार अर्थव्यवस्था में बहुत से कारोबार योजना के साथ या बिना योजना के एक-दूसरे के लिए करते चलते हैं। 
भारत के समाज में अपने-आपमें, खुद से होकर इतनी जागरूकता नहीं आ पा रही है कि लोग एक बेहतर जीवनशैली अपनाएं, और बाजार के झांसों में आने से बचें। नतीजा यह हो रहा है कि कमजोर कानून और भ्रष्ट सरकारी मशीनरी के चलते ग्राहकों के हकों का कोई ठिकाना नहीं रह गया और सिगरेट-शराब से लेकर दूसरे सामानों तक को फिल्मी सितारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों से इश्तहार करवाकर उनकी बिक्री बढ़वाई जा रही है। जिस ब्रांड की सिगरेट और शराब है उस ब्रांड से कोई फर्जी सा दूसरा सामान बाजार में जाकर, उसकी बिक्री के बिना भी उस ब्रांड के प्रचार पर अंधाधुंध खर्च किया जाता है और बिकी हुई सरकार उसे देखते रहती है। मानो सरकार के अलावा हर किसी को यह दिख जाता है कि यह ब्रांड के बढ़ाने की एक बाजारू बेईमानी है और सिर्फ कानून को यह नहीं दिखता। 
हम समाज और सरकार दोनों के स्तर पर एक सेहतमंद जीवनशैली के लिए जागरूकता के एक बड़े अभियान को तुरंत शुरू करने की मांग करते हैं। इसके तहत हर शहर और कस्बे में लोगों के लिए साफ हवा में घूमने-फिरने, कसरत करने, बीमारियों से बचाव की जानकारी पाने, योग और प्राणायाम के विवादहीन तरीकों को बढ़ावा देने का इंतजाम करना चाहिए। एक योजना के तहत सरकार ही जिला स्तर से शुरू करके बाद में और नीचे के स्तर तक ऐसे प्राकृतिक केंद्र विकसित कर सकती है जिनमें पेड़ों के बीच साफ और खुली हवा में ऐसे तमाम काम चल सकते हों। यह बात हम पहले भी सरकार को सुझा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जहां पर कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर रमन सिंह मुख्यमंत्री हैं, और मंत्रिमंडल में बहुत से लोग गंभीर बीमारियों के शिकार हैं, वहां पर फिर ऐसी जरूरत के लिए जागरूकता आसानी से आनी चाहिए। हम सीएसई की जंकफूड पर रिपोर्ट को इस चर्चा को शुरू करने के मुद्दे के रूप में ही ले रहे हैं, और यहां से बात को आगे बढ़ा रहे हैं। समाज अपने-आपमें इतने बड़े प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र खुद तो नहीं बना सकता, लेकिन वह सरकार को इसके लिए  तैयार जरूर कर सकता है।

यूपीए को अब सत्ता पर रहने का हक नहीं...


30 मार्च 2012
संपादकीय
संसद के भीतर और बाहर सड़क पर कांगे्रस पार्टी बहुत बुरी तरह घिर गई है। सेनाध्यक्ष के इंटरव्यू और उनकी चि_ी से शुरू हुआ विवाद अब बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुंच गया है कि थल सेना खरीदी में भ्रष्टाचार की पेशकश की जानकारी रक्षा मंत्री से लेकर यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी तक को 2009 से थी। इसलिए यूपीए सरकार और कांगे्रस के एक ईमानदार चेहरा बने हुए रक्षा मंत्री एंटनी से आज भाजपा ने इस्तीफा मांग ही लिया। हमारा मानना है कि पिछले एक बरस में कई ऐसे मौके आए जब इस पूरी सरकार को घर बैठने की नौबत रही लेकिन इसने सत्ता पर जमे रहना अपना हक समझा। आज इस बात को साफ-साफ समझने की जरूरत है कि सरकार चला रहे लोगों पर कैसी जिम्मेदारियां होती हैं और उनकी अनदेखी करना, भ्रष्टाचार को देखते हुए भी सोची-समझी अनदेखी करना, किस तरह का भ्रष्टाचार होता है। दिल्ली की आज की नौबत इस पूरी सरकार के जाने की है। अगर इतने बड़े और नाजुक मामलों में भ्रष्टाचार पता लगने के बरसों बाद तक यह सरकार उसकी जांच भी नहीं करवाती है तो वह संविधान पर हाथ धरकर ली गई शपथ के खिलाफ काम कर रही है और इससे पूरा देश घोटाले से लेकर फौजी तैयारियों तक, कई किस्म के खतरे में पड़ गया है। हर कुछ महीनों में यूपीए सरकार के बारे में ऐसा लगता है कि यह उसके ताबूत में ठुक रही आखिरी कील है, लेकिन यह पूरी बेशर्मी से अपनी जगह डटी हुई है, और कुछ महीनों बाद फिर एक घोटाला सामने आ जाता है।
इसके पहले 2जी घोटाले में तो यूपीए सरकार और उसकी मुखिया कांगे्रस के बारे में यह लगता था कि गठबंधन के साथियों को लूटने की जागीर देकर उसने देश की सत्ता पर काबिज रहने का हक खरीदा था, लेकिन सेना के मामले में ऐसा भ्रष्टाचार तो किसी गठबंधन-साथी तक भी नहीं जाता, यह तो कांगे्रस के ही सबसे अहमियत वाले एक नेता ए.के. एंटनी और प्रधानमंत्री के बीच की बात रही, और अब कांगे्रस के ही एक नेता ने यह कहा है कि उन्होंने 2009 में ही सोनिया गांधी को इसकी शिकायत कर दी थी। इसके बाद अगर भाजपा संसद में एंटनी से इस्तीफा नहीं मांगती है, तो फिर वह अपनी जिम्मेदारी से दूर बैठी रह जाएगी।
यहां पर एक बात साफ करना बहुत जरूरी है। किसी सरकार के प्रधानमंत्री या उसके किसी मंत्री की निजी ईमानदारी, सादगी या किफायतपरस्ती, उनका शरीफ होना देश के लिए तब कोई मायने नहीं रखता जब ऐसे लोग अपने इर्दगिर्द, अपने नीचे, अपने ऊपर होते हुए भ्रष्टाचार की लगातार अनदेखी करते हुए अपने खुद के न कमाने को एक काबिलीयत मान लेते हैं। हमारे हिसाब से ऐसे ईमानदारों के मुकाबले अगर मामूली बेईमान कोई दूसरे मंत्री-प्रधानमंत्री होते जो कि बड़ी बेईमानी को न होने देते तो वह एक बेहतर नौबत होती। आज हमें हैरानी यह होती है कि यूपीए के माई-बाप किस मुंह से सुबह आईने में अपना चेहरा देखते होंगे? पहले अखबार देखते होंगे या पहले चेहरा देखते होंगे? रात में किस तरह का बोझ सीने पर लेकर सोते होंगे? और अपना किस तरह का हक मानकर वे सत्ता पर बने हुए हैं?
हम चुनाव के खतरों पर नहीं जाते, और देश में सरकार की स्थिरता पर भी नहीं जाते। स्थिरता के अपने फायदे होते हैं, और अपने नुकसान भी होते हैं। जिस तरह जरूरत से अधिक समय तक बिना हलचल के अगर पानी कहीं जमा रहता है तो वह सडऩे लगता है। अपने दूसरे कार्यकाल में यूपीए के साथ यही हो रहा है। अगर यूपीए के पहले कार्यकाल के बाद कोई दूसरी सरकार उसकी जगह आई होती तो पहले कार्यकाल की चोरी-डकैती भी उजागर होती और नई सरकार कुछ संभलकर काम करती। सत्ता की निरंतरता पिछले जुर्म छुपाकर रखने में मदद करती है और वैसे ही जुर्मों को जारी रखने का एक मौका सरकार को देती है। आज जिस तरह उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार की मनमानी दूसरे कार्यकाल में नहीं चल पा रही है और आज वहां आई सरकार मायावती के किए हुए गलत कामों को उजागर करने की हालत में है, करने जा रही है, उसी तरह दिल्ली में यूपीए के साथ अगर हुआ होता तो भ्रष्टाचार का दूसरा कार्यकाल नहीं आया होता।
सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने देश में इस कदर निराशा और नाराजगी खड़ी कर दी है कि आपातकाल के बाद से ऐसी नौबत इसके पहले कभी नहीं आई थी। आज केंद्र सरकार की विश्वसनीयता गटर के गड्ढे में जा चुकी है और भाजपा इस बात की मांग करे या न करे, यूपीए सरकार को अब सत्ता पर और काबिज रहने का कोई हक नहीं है।

29 march


29 march


चुप रहे तो उनके देशों के भूखे भूखे ही रहेंगे


29 मार्च 2012
संपादकीय
भारत में फौज की जंग की तैयारी पर जाते हुए सेनाध्यक्ष की चि_ी से खलबली मची हुई है। इस पर मीडिया बहस कर रहा है और आधी बहस भारत की फौजी कमजोरियों पर है और आधी इस चि_ी पर। इस बीच भारत सरकार देश को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि उसने पिछले बरस सेना के बजट को सौ फीसदी खर्च कर लिया था और अब भी सेना की खरीदी में कोई कमी नहीं होगी। इस बीच एक हंसी-मजाक की बात यह चल रही है कि भारत की फौजी तैयारी में जितनी कमी है उससे देश को घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि जिस पड़ोसी देश पाकिस्तान को लेकर भारत की फौजी तैयारियां तय होती हैं, वहां की फौज इतनी भ्रष्ट है कि वहां भी फौज की तैयारी ऐसी ही, या इससे भी बुरी औनी-पौनी ही होगी। 
लेकिन पाकिस्तान अपनी दिक्कतों से जब अलग जूझ रहा है, और भारत दसियों हजार करोड़ रुपए की और खरीदी के करीब है, साथ-साथ इन दोनों ही देशों में भूख और कुपोषण के शिकार लोग करोड़ों में हैं, गरीबी की रेखा के नीचे दोनों जगह कम से कम आधी-आधी आबादी तो है ही, तब फिर जंगखोर की तरह कल के एक घर के दो बच्चे इस तरह लडऩे की तैयारियां कर रहे हैं जिससे कि भूखे के मुंह का कौर निकलकर पश्चिम के देशों के हथियारों के कारखानों में जा रहा है। क्या इसके खिलाफ इन दोनों देशों में एक ऐसा तगड़ा जनमत बनने की जरूरत नहीं है जिससे कि दोनों तरफ सरकारों पर एक दबाव बन सके? यह बात हर कोई जानता है कि दुनिया के बड़े-बड़े फौजी सौदों में अफसरों और नेताओं से लेकर जंग का माहौल बनाने वाले मीडिया तक का पेट जुड़ा होता है। जंग होने से जब कद्दू कटता है, तो सबमें बंटता है। गरीब और बेकसूर मारे जाते हैं, सरहद के दोनों तरफ गरीबों के घर तबाह हो जाते हैं और राजधानियों में बैठे हुए सत्ता हांकते लोग करोड़पति और अरबपति हो जाते हैं। दुनिया में जंगखोरी जिनका धंधा है वे हर किसी देश में पड़ोस के देश को दुश्मन बताते हुए उससे खतरा गिनाने का काम करते हैं और ऐसा माहौल बनाने में इन देशों के साथ-साथ दुनिया के बड़े-बड़े पालतू थिंकटैंक भी दहशत के लायक आंकड़े पेश करके बताते हैं कि किस देश से पड़ोस को कितना परमाणु खतरा है और कितना आतंकी खतरा है, कौन सा देश कितना बेकाबू है और कहां आतंकी परमाणु जखीरे के करीब हैं। दुनिया में एक-दूसरे के लिए शक और दहशत पैदा करने का यह कारोबार जंगखोर कारोबारियों का सोचा-समझा काम होता है और उनके पेश किए हुए आंकड़ों, विश्लेषण से खरीदी में बेईमानी की राह देखते लोगों का काम आसान हो जाता है।
सरकारों से हम किसी ईमानदारी की उम्मीद न पाकिस्तान में करते न हिंदुस्तान में करते। इक्का-दुक्का ईमानदार और सफेदपोश दिखते एंटोनियों को सामने रखकर जो भ्रष्टाचार करना होता है वह सत्तारूढ़ पार्टी और उसके दलाल करते ही रहते हैं। पाकिस्तान में तो बेनजीर के बेईमान पति को मिस्टर टेन परसेंट नाम से ही जाना जाता था, जाना जाता है और वहां के एक कानून के तहत राष्ट्रपति को जांच से, अदालती कार्रवाई से परे रख दिया गया है इसलिए वे अभी जेल के बाहर हैं और राष्ट्रपति हैं। इन दोनों देशों में अंतरराष्ट्रीय हथियार कंपनियों की साजिश के खिलाफ, उनके हफ्ते पर चलते नेताओं और अफसरों के खिलाफ एक जागरूकता की जरूरत है क्योंकि एक तरफ विदेशी बैंकों में नोटों की गड्डियां छत चीरकर आसमान तक पहुंच रही हैं तो दूसरी तरफ इन दोनों देशों की आधी-आधी आबादी दो वक्त की रोटी के लिए आसमान की राह तकती है।
इन दोनों देशों ने जो अमनपसंद लोग हैं उनको खुलकर सार्वजनिक चर्चा करनी होगी और जगह-जगह जंग के इरादों को गालियां देनी होगी। इससे कम में ये दोनों देश कभी अपने गरीबों का पेट नहीं भर पाएंगे क्योंकि धर्मांध तालिबानी हों, या भारत के नक्सली, कश्मीर के अलगाववादी हों या उत्तर-पूर्व के दूसरे उग्रवादी-आतंकी, इन तमाम मोर्चों पर पुलिस से लेकर फौज तक जितने किस्म के हथियार और बचाव के औजार सरकारों को खरीदने पड़ रहे हैं उनसे दुनिया के हथियारों के कारखानों का मालामाल होना जारी है। दुनिया में जहां-जहां लड़ाई की नौबत आती है, हमारे पास यह सोचने और मानने के ठोस कारण रहते हैं कि इनके पीछे ऐसे कारखानेदार हैं और वे ही लोग आतंक को, उग्रवाद को और हथियारबंद लड़ाईयों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए अगर अमनपसंद जनता चुप रहेगी, तो उनके देशों के भूखे भूखे ही रहेंगे।

सुरंग के आखिर में भी कोई रौशनी नहीं..

28 मार्च 2012
संपादकीय
.संसद से लेकर सड़क तक देश बहुत ही विचलित है। कोई एक मामला ऐसा हो वह भी नहीं। सरकार से लेकर कारोबार तक, और आदिवासियों से लेकर सैनिकों की जिंदगियों तक, केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक इतने किस्म की निराशा जनता को हो रही है और इतने किस्म के सदमे उसे लगातार लग रहे हैं, कि सोते-जागते, उठते-बैठते लोग जो बातें करते हैं, वे लोकतंत्र को कोसने की होती हैं। लोकतंत्र की व्यवस्था और लोकतंत्र के मौजूदा हाल के बीच फर्क कम ही लोग कर पाते हैं और माहौल ऐसा हो गया है मानो लोकतंत्र कोई नाकामयाब और खराब व्यवस्था हो। यह सिलसिला देश में कानून के सम्मान, समानता, इंसानियत और इस किस्म की तमाम सकारात्मक बातों के लिए जनता के बीच एक बहुत नकारात्मक नजरिया पैदा कर चुका है और बढ़ाते चल रहा है। आज हम लगातार तीसरे दिन थल सेनाध्यक्ष और केंद्र सरकार के बारे में लिखना नहीं चाहते लेकिन खबरों में पाठकों को यह पढऩे मिलेगा कि थल सेनाध्यक्ष जाते-जाते किस तरह देश की फौजी तैयारियों के बारे में अपनी क्या बातें लिखकर जा रहे हैं और सरकार को शर्मिंदगी में डालने वाली ये बातें किस तरह से उजागर होकर सामने आ रही हैं। 
संसद में विपक्ष में भी इस बात पर संभलकर जिम्मेदारी का बर्ताव किया है कि फौज के बारे में गोपनीय बातें उसने वहां पर एक सीमा से अधिक नहीं उठाई हैं, लेकिन जितनी बातें सामने आ चुकी हैं उससे साधारण लोगों का निराश होना स्वाभाविक है। इससे परे अगर कुछ और बातों को देखें तो देश यह भी देख रहा है कि किस तरह एक हत्यारे को बचाने के लिए पंजाब की पूरी सरकार और देश में जगह-जगह सिख समाज सड़कों पर उतर आया है। अब सवाल यह उठता है कि जिस हत्यारे की फांसी को टालने के लिए कोई ताकतवर बिरादरी न हो, वह कैसे बचेगा? कल को अगर किसी ऐसी जाति या धर्म का हत्यारा हो जो कि एक बहुत छोटे अल्पसंख्यक तबके का हो, जिसके जात-बिरादरी के लोग बहुत गरीब हों, जिसके धर्म से जुड़ी किसी राज्य की सरकार न हो, तो क्या उसकी फांसी बिना किसी चर्चा के निपट जाएगी? हमको यह बात अच्छी लगी कि सुप्रीम कोर्ट ने एक सिख हत्यारे की फांसी को लेकर देश में उठ रहे विरोध पर कमोबेश यही सवाल उठाया है, और यही सवाल हम दो-तीन दिन पहले उठा चुके हैं। 
लोकतंत्र में समानता सिर्फ कानून की किताब में छपे हुए शब्दों तक नहीं होनी चाहिए। हमने अभी-अभी यह भी लिखा कि फांसी की सजा के बाद चुने हुए नेताओं की सरकार के हाथ में उसकी माफी का हक क्यों होना चाहिए? निर्वाचित नेताओं के फैसलों को हम कई तरह की मतलबपरस्ती वाला देखते आए हैं, ऐसे में देश की सबसे बड़ी अदालत से दी गई फांसी से माफी ऐसे नेताओं के हाथों में क्यों होना चाहिए जो कि बरसों तक रहम की अपील पर बैठे होते हैं? ऐसे ही हकों के खिलाफ आज देश में जगह-जगह अन्ना हजारे और उनके समर्थक सवाल खड़े कर रहे हैं। विवेक का अधिकार ऐसे तबके के हाथ भला कैसे दिया जा सकता है जो कि अपने विवेक को अलग रखकर कभी नोटों के लिए और कभी वोटों के लिए गलत काम करते रंगेहाथों पकड़ाते आया है। दिल्ली में कांगे्रस की अगुवाई में गिरोह काम करता है तो कर्नाटक में भाजपा की अगुवाई में। किस पार्टी को बेईमानी से परहेज है? और ऐसी तमाम बातें मिलकर साधारण जनता के मन से लोकतंत्र पर आस्था खत्म कर दे रही है। आम लोग कितनी तकलीफों में जिंदगी जीते हैं, आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, सुप्रीम कोर्ट अगर निगरानी न कर रहा होता तो गरीबों को अनाज भी न मिला होता और वह सरकारी गोदामों में सड़ जाने के नाम पर घपला करके बाजार में बेच दिया गया होता। लेकिन लोकतंत्र में अदालत एक क्लास के मॉनिटर की तरह कब तक लाठी लिए काम करवाते रहे? कुल मिलाकर यह तस्वीर इतनी घोर निराशा की है कि जनता का एक हिस्सा अंगे्रजों के राज की एक काल्पनिक स्थिति की तारीफ करते नहीं थकता, दूसरा हिस्सा फौज की हसरत रखता है और जंगलों में बसे हुए आदिवासियों के तीसरे हिस्से के कुछ लोग नक्सलियों को सरकार से बेहतर समझते हैं। शहरी लोग लतीफों के एसएमएस भेजकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। इस सुरंग के आखिर में भी कोई रौशनी नहीं दिख रही है, और बहुत से लोगों का यह मानना है कि वहां से अगर कभी कोई रौशनी आते दिखेगी तो वह लोगों को कुचल देने वाली रेलगाड़ी की रौशनी ही हो सकती है।

जवाब से उठ गए और सवाल


27 मार्च 2012
संपादकीय
कल ही इस मामले पर हमने यहां लिखा था और आज फिर कुछ ताजा बातें जो सामने आई हैं उनको देखते हुए यह साफ है कि आज उसी मुद्दे को आगे बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा जरूरी मुद्दा नहीं है। आज संसद में जब रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने यह कहा कि उनसे साल भर सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने उन्हें बताया कि जनरल, शायद तेजिंदर सिंह उनसे मिले और उन्हें रिश्वत की पेशकश की। इस पर रक्षा मंत्री का कहना है कि वे सुनकर हैरान थे, एक मिनट तक चुप बैठे रहे और जनरल सिंह से कहा कि कार्रवाई करो। जनरल ने कहा कि मैं ऐसा नहीं करना चाहता। पता नहीं क्यों? उन्हें मुझे या विभाग को लिखित शिकायत देनी चाहिए थी।
ए.के. एंटनी की निजी साख ठीक है लेकिन यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री हों या कोई और, उनकी निजी साख किसी काम आते दिख नहीं रही है। कल के उठाए गए कुछ सवालों को आज हम फिर यहां उठाना चाहेंगे कि जब साल भर पहले रक्षा मंत्री की जानकारी में यह मामला आ गया, और चाहे जुबानी ही आया, और चाहे सेनाध्यक्ष लिखित शिकायत से कतरा रहे थे, और चाहे वे खुद कोई कार्रवाई करने से कतरा रहे थे, क्या किसी ने रक्षा मंत्री को रोका था कि वे इस जुबानी शिकायत को रिकॉर्ड में लाकर सीबीआई को जांच के लिए देते? सेनाध्यक्ष रक्षा मंत्री के मातहत हैं और रक्षा मंत्री ऐसा करते तो सेनाध्यक्ष के सामने उस जांच में बयान देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। सरकारी कामकाज की जो बहुत साधारण समझ हमारी है, और प्राकृतिक न्याय जो सुझाता है, उसके मुताबिक सरकार में बैठे किसी भी व्यक्ति की जानकारी में ऐसे किसी भी भ्रष्टाचार की बात लाई जाती है, तो यह उसकी स्वाभाविक जिम्मेदारी बनती है कि वह उस पर कार्रवाई शुरू करे। इस मामले में रिश्वत की पेशकश अगर सच ही की गई थी, तो जनरल सिंह के लिए यह जरूरी था कि रक्षा मंत्री को बताने के पहले या बताने के बाद वे उस पर भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई के लिए पुलिस में शिकायत करते। कल तक जब हम इस मुद्दे पर लिख रहे थे तो हमें यह बात साफ नहीं थी कि सेना के कोई नियम ऐसी किसी कार्रवाई के पहल को रोकते तो नहीं हैं। लेकिन आज एंटनी के बयान से यह साफ है कि सेनाध्यक्ष को ऐसी कार्रवाई करने का हक था, और हमारा मानना है कि यह उनकी जिम्मेदारी थी। हमारा यह भी मानना है कि अगर सेनाध्यक्ष ने रक्षा मंत्री के कहने के बाद भी कार्रवाई नहीं की तो मामले की जांच के साथ-साथ रक्षा मंत्री की यह भी जिम्मेदारी बनती थी कि वे सेनाध्यक्ष से इस बात पर जवाब-तलब करते कि वे लिखित शिकायत क्यों नहीं कर रहे हैं और जांच का अदेश क्यों नहीं कर रहे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि रक्षा मंत्री खुद भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं चाहते थे और सेनाध्यक्ष तो बिल्कुल ही नहीं चाहते थे। हमारा मानना है कि शपथ लेकर काम करने वाले जनसेवकों का यह आचरण अपराध के दर्जे में आता है और अपनी जिम्मेदारी को जानबूझकर पूरा न करने का, भ्रष्टाचार को बचाने का, सेना के काम को खतरे में डालने का अपराध इन दोनों ने किया है।
जैसी कि दूसरी कुछ खबरें आई हैं, सीबीआई सेना के पिछले घोटालों में बहुत असरदार साबित नहीं हुई है, तो ऐसे में सीबीआई को यह मामला देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेना आज एक बरस बाद किसी जिम्मेदारी को पूरा करना नहीं है। हमारा यह मानना है कि जिस तरह धूर्त और बेईमान पार्टियां या नेता, एक-दो साफ-सुथरे दिखने वाले लोगों को सामने और ऊपर रखकर चोरी-डकैती का कारोबार जारी रखते हैं, वैसा ही कुछ यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह और ए.के. एंटनी जैसे ईमानदार और किफायती माने जाने वाले लोगों के साथ हो रहा है। इन लोगों को दूकानों के शो-केस में रखे गए खूबसूरत पुतलों की तरह सरकार में सामने खड़ा कर दिया गया है और देश को हर तरह से लूटना जारी है।
हम सीबीआई की जांच को इस मामले में काफी नहीं पाते और आज या आने वाले दिनों में संसद के भीतर विपक्ष को इन सारे सवालों को साफ-साफ दिखाना चाहिए जो हम यहां पर आज उठा रहे हैं। इनके जवाब जांच से परे भी मिलने चाहिए और मीडिया का जो हिस्सा जनरल सिंह से बात कर रहा है, उसे भी उनके लिए असुविधा खड़ी करने वाले ऐसे सवाल जरूर पूछने चाहिए। इसके बिना जनता, देश और लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी कोई भी पूरा नहीं कर पाएंगे। 

जुल्म कैसे खूबसूरती?


26 मार्च 2012
इंटरनेट पर अभी मैं कुछ दोस्तों से एक बहस में उलझ गया। उन्होंने अंधों और कानों के बारे में किसी कहावत को लिखते हुए कोई बात कही और मैंने लोगों की शारीरिक दिक्कतों के बारे में बनाई गई कहावतों, कहे जाने वाले मुहावरों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज की कि जो दिक्कत या कमजोरी लोगों के अपने हाथ में न हो, उसे लेकर बनाई गई बातों को दुहराना बेइंसाफी है। ये बातें बनाई तो गई थीं सैकड़ों बरस पहले जब समाज में कहने का अधिक हक ताकतवर तबकों को ही था। कोई गरीब हो, कमजोर हो या नीच ठहराई गई जाति का हो, महिला हो या जानवर हो, ढोल हो या जूता हो, उन सबके लिए तरह-तरह की हिकारत भरी बातों से भरी हुई जुबान ही उस ऊंचे तबके में इस्तेमाल होती थी जिसका पढऩे और लिखने पर भी एक किस्म का एकाधिकार था। 
इंटरनेट पर हुई इस बहस का एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि कुछ लोगों का यह कहना था कि कहावत और मुहावरे, फिर चाहे वे अंधों और कानों का जिक्र करने वाले ही क्यों न हों, वे भाषा को असरदार और खूबसूरत बनाते हैं, और इसलिए वे इनका इस्तेमाल करते ही रहेंगे। मेरे लिए यह कुछ अजीब सी बात थी, क्योंकि अनजाने में बचपन से चली आ रही आदतों के मुताबिक कुछ लोग चोर के साथ चमार जोड़कर बोलने की गलती कर बैठते हैं, दूसरे किस्म की नाजायज कहावतें इस्तेमाल कर बैठते हैं, लेकिन कोई इस पर चर्चा के बाद भी यह कहे कि वे इसे जारी रखेंगे, तो यह बात एक ताजा सोच की भी है। अगर कोई न इसे गलती माने, और न गलत माने, बल्कि इसका इस्तेमाल जारी रखने की बात करे, तो फिर यह उनका सोचा-समझा फैसला है कि ऐसी तुलना में कोई बुराई नहीं है जो कि लोगों की उनकी पहुंच से परे की बेबसी के बारे में अपमानजनक हो, क्योंकि ऐसी भाषा उन्हें अधिक खूबसूरत लगती है।
दुनिया के इतिहास में ऐसे बहुत से मामले हैं जिनमें लोग दूसरों की बेबसी को एक  रोमांचक मनोरंजन बना लेते हैं। कहीं पर एक वक्त लोगों को शेर के सामने झोंक दिया जाता था, तो आज भी दुनिया में कई जगह सांडों को तलवारबाजों के सामने झोंक दिया जाता है। समाज के भीतर कमजोर तबकों की लड़कियों को चकलाघर ले जाकर उनके मुकाबले ताकतवर तबके के लोग एक अलग किस्म का वयस्क मनोरंजन पाते हैं। ऐसा ही मनोरंजन भाषा से भी कुछ लोगों को मिल सकता है, जिनके लिए गरीब की लुगाई, गांव भर की भौजाई सरीखी की होती है, यानी उससे जो चाहे वह मजाक कर सकता है।
भाषा की राजनीति और भाषा का अन्याय लोगों को आसानी से समझ नहीं आता, इसलिए कि जो बेइंसाफी करने की, बेइंसाफ जुबान इस्तेमाल करने की ताकत रखते हैं, उनके सामने गालियों के हकदार मान लिए तबके की कोई जुबान नहीं होती। जिसे चमार कहकर चोर के बराबर खड़ा कर दिया जाता है, उसका मुंह आमतौर पर गैरचमारों के सामने खुल भी नहीं पाता। सैकड़ों बरस पहले जब गोस्वामी तुलसीदास ने ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी को एक कतार में खड़ा करते हुए सबको पिटाई (ताडऩ) का अधिकारी बताया था, तब तो समाज में बराबरी के हक की कोई चर्चा नहीं थी। लेकिन इन सैकड़ों बरसों में भी अगर सोच नहीं सुधर पाई और सिर्फ सीमेंट बन गया, कम्प्यूटर बन गया, इंसान चांद पर चले गए, तो यह तुलसीदास की बेइंसाफी से भी बुरी बात है। मुझे इस बात पर भी कुछ हैरानी होती है कि अपने से सौ बरस पहले दुनिया के इतिहास की सबसे महान और पाखंड-विरोधी बातें कह और लिख गए कबीर से भी तुलसीदास ने इतना नहीं सीखा कि औरत को ढोल की तरह पीटना, और ऐसा पीटने की नसीहत देना पूरी तरह बेइंसाफी की बात थी और तुलसीदास की इज्जत इन दो लाईनों ने घटाकर पता नहीं कहां पहुंचा दी।
इसी सिलसिले में कल और आज की एक खबर याद पड़ रही है जिसमें भारत में छपी एक मुस्लिम लेखक की किताब को लेकर कनाडा और योरप में उठ रहे सवाल सामने आए हैं। इस किताब में यह लिखा गया है कि एक मुस्लिम शौहर को अपनी बीवी को किस-किस तरह प्रताडि़त करने और पीटने का हक है। मजहब का बड़ा फर्क रहते हुए भी यह मुस्लिम लेखक तुलसीदास से प्रभावित दिखता है।
मैं यहां पर कुछ बेचेहरा और बेनाम दोस्तों के खिलाफ लिखने का इरादा नहीं रखता और इस बात को सिर्फ चर्चा के एक मुद्दे के रूप में लिख रहा हूं कि किसी की बेबसी पर वार करने को कैसे कोई खूबसूरती मान सकते हैं? क्या यह कुछ-कुछ उसी किस्म का नहीं होगा कि किसी जंग के दौरान किसी एक फौज के साथ चलते हुए मीडिया के लोगों को अच्छी तस्वीरें दिलवाने के लिए वह फौज बहुत से निहत्थे कैदियों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून डाले और तस्वीरें लेने का एक मौका अपने साथ जड़े हुए फोटोग्राफरों को दे...? 
कला, साहित्य, संगीत या फोटोग्राफी का ऐसा कोई भी पहलू मेरी समझ से परे है जो कि सामाजिक अन्याय और शोषण, हैवानियत और कू्ररता को खूबसूरती मानते हुए उसका इस्तेमाल करे। ऐसी तमाम विसंगतियों का इस्तेमाल अगर कोई इन विसंगतियों को दूर करने के लिए मिसाल के रूप में, ध्यान खींचने के लिए चर्चा के दौरान करे तो वह बात तो समझ आती है, जब कोई इन्हें अपनी बात को असरदार बनाने के लिए कहे तो वह 21वीं सदी में पूरी तरह खारिज कर देने लायक सोच है।
कहावतों और मुहावरों को उनके गढ़े जाने के दौर की सामाजिक हकीकत से अलग करके देखना खतरनाक हो जाता है क्योंकि इनको कुछ लोग सूक्तियों की तरह भी मान बैठते हैं। लोग ऐसा समझ लेते हैं कि लोकोक्तियां बहुत लंबे अनुभव से उपजी होती हैं और वे बहुत अक्ल की होती हैं। जबकि इनको गढऩे वाले लोग आमतौर पर समाज के शोषक, या कम से कम गैरशोषित तबके के रहते थे और उनकी सोच अपने वर्गहित की होती थी।
किसी औरत को कभी बांझ कहना तो कभी रांड कहना, तरह-तरह से उसे त्रियाचरित्र कहना अपने किस्म की दसियों हजार लोकोक्तियों में से कुछ हैं। जो कमजोर है उसके खिलाफ लिख देना, हर कमजोर को धिक्कार देना, ऐसी सोच को भाषा की खूबसूरती जब माना गया तब माना गया, आज इसे सजा के लायक जुर्म के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। 
बहस में मैं कई बार यह बात कहता हूं, और इस ताजा बहस के पहले भी इस अखबार के संपादकीय में या अपने कॉलम में इस बात को बहुत बार लिखते आया हूं कि कहावत या मुहावरे के तर्क के रूप में कभी पेश नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस वक्त, जिन तर्कों पर इनको बनाया गया था, उस वक्त के वे तर्क लोकतांत्रिक नहीं थे, समानता की कोई सोच उस वक्त नहीं थी और कमजोर तबको के कोई अधिकार उस समय नहीं थे।
यही वजह है कि आज भारत में दलित समुदाय और दलित लेखक, पश्चिम में अश्वेत लेखक, यहां की मनुसंतानों और वहां के गोरों के लिए हुए को पूरी तरह खारिज करते हुए अपना अलग साहित्य और अपना अलग इतिहास लिखने लगे।

जाते-जाते जनरल ने फैला दी सनसनी


26 मार्च 2012
संपादकीय
थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह ने द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में यह कहकर संसद में उबाल ला दिया है कि फौज के लिए गाडिय़ां खरीदने के एक मामले में उनसे रूबरू चौदह करोड़ रूपए रिश्वत की पेशकश की गई थी, और उन्होंने तुरंत ही रक्षा मंत्री से मिलकर इसकी शिकायत कर दी थी। आज संसद में इस मामले पर तब हंगामा शुरू हुआ जब अखबार में छपे इंटरव्यू को लेकर सुबह से देश भर के मीडिया में सनसनी फैल गई। अभी कुछ बातें सामने नहीं आई हैं कि यह मामला कितना पुराना है और यह कि इस मामले जानकारी रक्षा मंत्री को कब मिली, और यह कि सीबीआई जांच के आदेश इसके छप जाने के बाद आज क्यों दिए गए? इसके पहले ही जांच क्यों नहीं शुरू करवाई गई?
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते हैं। हमें सेना के ऐसे मामलों में कुछ अलग नियम-कायदों की जानकारी नहीं है, लेकिन क्या जनरल सिंह के सामने यह विकल्प नहीं था कि रिश्वत की ऐसी पेशकश सामने आते ही वे तुरंत पुलिस को बुलाकर दलाल को उसके हवाले करते और जांच की एक स्वाभाविक प्रक्रिया शुरू हो जाती। हो सकता है कि सेना के मामलों में नियम और तौर-तरीके कुछ अलग रहते हों ताकि गोपनीयता बनी रहे। दूसरा सवाल यह उठता है कि अगर जनरल सिंह सच कह रहे हैं और उन्होंने रक्षा मंत्री से ऐसा बता दिया था, तो ऐसी शिकायत मिलने के बाद रक्षा मंत्री ने तुरंत ही जांच के आदेश क्यों नहीं दिए? आज भांडाफोड़ होने के बाद जांच करवाना सरकार की नीयत पर शक खड़े करता है। एक और बात जो जनरल सिंह ने अपने इंटरव्यू के दौरान कही है, वह यह है कि चूंकि वे भ्रष्टाचार पर टूट पड़े थे, इसलिए उन्हें उनकी जन्मतिथि के मामले में निशाना बनाया गया। उन्होंने यह कहा कि बातें अब रफ्तार से खुल रही हैं और अब जल्द ही यह सामने आएगा कि उस नाटक के पीछे किसका हाथा था, और उसका सूत्रधार कौन था। एक हैरानी यह भी है कि जनरल सिंह ने अपने रिटायर होने के करीब ही यह बात क्यों कही, और इसके होते ही उन्होंने पारदर्शिता के साथ यह क्यों नहीं सामने रख दिया?
हम इन बातों को बहुत गंभीर और घातक इसलिए मानते हैं क्योंकि ये फौज से जुड़ी हुई बातें हैं और वहां पर किसी भी तरह का भ्रष्टाचार देश के सैनिकों की जान को सीधे खतरे में डालने वाला भी हो सकता है और देश को खतरे में डालने वाला भी हो सकता है। इसलिए इस पूरे मामले में जनरल सिंह से लेकर रक्षा मंत्री तक, तमाम लोगों को यह साफ करने की जरूरत है कि चूक कहां पर हुई है, और गुनहगार कौन है। देश को याद है कि किस तरह कुल चौंसठ करोड़ रूपए के भ्रष्टाचार के आरोप में गली-गली में यह शोर हो गया था कि राजीव गांधी चोर है, और उनकी सरकार उठाकर फेंक दी गई थी। आज अगर एक सौदे में एक अफसर को अगर इतनी रिश्वत की पेशकश की गई है तो ऐसा लगता है कि बोफोर्स का मामला उतना बड़ा नहीं था।
जो सामान्य जनधारणा भारत में चली आ रही है वह तो यही है कि पेट्रोलियम की खरीदी में, हथियारों की खरीदी में इतना संगठित और व्यवस्थित भ्रष्टाचार होता है कि विदेशों में मिलने वाला कमीशन विदेशी खातों में जमा हो जाता है और उसे फिर नेता या पार्टियां अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं। एक दूसरी चर्चा जानकार तबकों में यह भी रहती है कि ऐसे विदेशी खातों का इस्तेमाल भारत की सरकार भी दुनिया भर में जासूसी करने और अपने कुछ अघोषित कामों के लिए करती है। इसलिए बड़ी सरकारी खरीदी में भ्रष्टाचार कोई अनहोनी या नई बात नहीं है, और शायद ही कोई सरकार देश में ऐसी रही हो जिसके बारे में ऐसा शक जनता के बीच न रहा हो। लेकिन शक और हकीकत के बीच का फासला हवा में बने रहता है, और पहली बार एक सेनाध्यक्ष ने सीधे-सीधे अपने को ही ऐसी पेशकश का आरोप लगाया है। इससे अधिक गंभीर हिस्सा उनके आरोप का यह है कि उन्होंने रक्षा मंत्री को इसकी जानकारी दे दी थी, और उनके आरोप के बाद की आज की खबर जांच का आदेश आज देने की है।
यूपीए सरकार के ताबूत में हर एक-दो दिनों में कोई न कोई नई कील ठुकती चली जा रही है। यह तो गनीमत है कि देश का विपक्ष सत्ता के भ्रष्टाचार को कड़ी टक्कर देते हुए अपनी सीमित सत्ता में कर्नाटक से लेकर राज्यसभा उम्मीदवार बनाने तक जमकर मैदान में है और इसलिए देश की राजनीतिक हवा में ये दोनों चिमनियां कम या अधिक प्रदूषण फैलाते हुए खड़ी हैं इसलिए किसी को चुल्लू भर पानी का हक दिखाई देता है, तो किसी को लोटा भर पानी। इस बीच देश का पानी उतरते चले जा रहा है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

ये मेरे, लेकिन इनका खान-पान गैरकानूनी..., यह कैसी सोच है?


25 मार्च 2012
संपादकीय
देश में वामपंथी विचारधारा पर चलने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की नीतियां और वहां होने वाली हलचल दिल्ली के बाहर भी दुनिया भर में खबर बनती हैं। वहां से बहुत से ऐसे मुद्दे उठते हैं जिनसे देश के बहुत से तबकों के दिल-दिमाग पर छा चुकी चर्बी पर जोर पड़ता है और उन्हें कुछ बातों को सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। किसी भी तरह के आर्थिक और सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक तबकों से जुड़ी हुई सत्ता को जेएनयू से उठती लहरों में अक्सर गंदगी दिखती है। लेकिन लोकतंत्र में विचारधाराओं का सैलाब अगर आता-जाता न रहे, तो समंदर के किनारे जमी हुई गंदगी तो वहीं इक_ा हो-होकर सड़ांध पैदा करने लगेगी। और सत्ता पर काबिज तबके अपनी आम आदत के मुताबिक यथास्थिति जारी रखना चाहेंगे। 
आज इस पर चर्चा का मौका मिला है क्योंकि जेएनयू में छात्रों के एक तबके ने यह सवाल उठाया है कि वहां के हॉस्टल की मेस में मिलने वाला खाना देश के सभी तबकों की संस्कृति और पसंद के हिसाब से क्यों न हो? इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय में भारत के हर राज्य से लड़के-लड़कियां पढऩे आते हैं और यहां की राजनीतिक चेतना और संपन्न विचारधारा के चलते दुनिया भर से छात्र-छात्राएं पढऩे आते हैं और बहुत से प्राध्यापक पढ़ाने भी आते हैं। अभी यहां की ताजा मांग यह है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते यहां गाय और सुअर का मांस भी पकाया जाए क्योंकि भारत के कई राज्यों में इनको खाना न सिर्फ कानूनी दायरे में है बल्कि वहां के लोगों के परंपरागत खान-पान में इसकी एक नियमित जगह है। वहां से पढऩे के लिए यहां आने वाले लोगों को जब बरसों यहां रहना पड़ता है तो उन पर भारत के एक तबके की सोच में गलत या खराब माने जाने वाले गाय-सुअर के मांस पर रोक क्यों लगानी चाहिए? वहां के लोगों का तर्क यह है कि खान-पान लोगों की अपनी मर्जी की बात है और उस पर बहुसंख्यक लोगों की मर्जी थोपी नहीं जानी चाहिए। 
जेएनयू को दलित और आदिवासी अधिकारों के लिए, अल्पसंख्यकों के मुद्दों के लिए और मानवाधिकारों के लिए लडऩे वाली जगह के रूप में माना जाता है। वहां पर छात्रों का एक तबका ऐसा भी है जो मानता है कि सामाजिक न्याय के लिए नक्सली हिंसा जायज है क्योंकि सबसे गरीब को इंसाफ दिलाने के बाकी कोई भी तरीके भारतीय लोकतंत्र में कारगर नहीं हो रहे हैं। प्रगतिशीलता और उदारता की एक मजबूत सोच जेएनयू की हवा में हमेशा से रहती है और इसके शुरू से ही इस पर वामपंथी विचारधारा हावी रही जिसके चलते यहां प्राकृतिक न्याय से लेकर सामाजिक समानता तक बहुत से मुद्दों पर लोकतंत्र की एक ऐसी व्याख्या होती है जो कि भारत की मध्यमार्गीय लोकतांत्रिक सोच को भी खटकती है, कट्टरवादियों और साम्प्रदायिक लोगों को तो जेएनयू एक देशविरोधी, देशद्रोही जगह लगती है। 
पूरी दुनिया का रिवाज यही है कि जब कभी सबसे अधिक कमजोर तबकों के हक की बात कोई भी छेड़ता है, तो सबसे ताकतवर तबका उस चर्चा को देशद्रोह ठहराने की तरफ धकेलना शुरू कर देता है। भारत में सुविधाभोगी मध्यम वर्ग इतना बड़ा है कि वह मीडिया से लेकर सामाजिक-राजनीतिक चर्चा तक किसी भी क्रांतिकारी सोच को हिंसक या देशद्रोही मान लेने को एक आसान विकल्प मानता है। लेकिन हम आज वहां के छात्रों द्वारा उठाए गए मुद्दों को देश में गो-हत्या को हिन्दू भावनाओं के खिलाफ या सुअर के मांस को मुसलमानों की भावनाओं के खिलाफ मानते हुए उन पर किसी एक हॉस्टल में रोक लगाने पर चर्चा चाहते हैं। जो आदिवासी हिन्दू समाज के एक आक्रामक तबके को हमेशा से हिन्दू दिखते हैं, उन्हीं आदिवासियों में गो-मांस खाना हजारों बरसों से चली आ रही परंपरा है। और अगर हिन्दू धर्मग्रंथों को आज की कट्टरता के काले चश्मे से परे पढ़ा जाए तो उनमें वैदिक काल से अब तक गो-मांस को खाने की लंबी परंपरा रही है।दलितों का खानपान भी सवर्ण हिंदुओं से अलग है। हिन्दू देवी-देवताओं में से कितने ही गो-मांस खाने वाले समाज के रहे हैं। इसलिए आदिवासी तो हमारा है, वह तो हिन्दू है, लेकिन उसका खानपान हिन्दू विरोधी है, इस तरह की सोच न्यायसंगत और तर्कसंगत नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ही हम बहुत बार देख चुके हैं कि किस तरह आदिवासी समाज के लोग यहां परंपरागत रूप से गाय और भैंस का मांस खाते हैं। यहां के सरगुजा इलाके में कुछ बरस पहले तो दफनाए जा चुके भैंसों को निकालकर-खाकर कई आदिवासी मर गए थे। छत्तीसगढ़ की कई जनजातियों में गाय-भैंस खाने का पुराना चलन है। आज की हिन्दूवादी सोच उनको तो हिन्दू मानने और बनाने में लगी है, लेकिन उनके रसोई घर पर सजा का बुलडोजर चला रही है। 
ऐसे में जेएनयू से उठा सवाल बड़ी असुविधा पैदा करने वाला है। समाज और सरकार में सत्ता चला रहे लोगों के दिल-दिमाग में सामाजिक रीति-नीति का जो ढांचा जमा हुआ है, वह ऐसे सवालों से चरमराता है। लेकिन ऐसी बहस के बिना हम लोकतंत्र को पनपते हुए और परिपक्व होते हुए नहीं देखते। भारत सिर्फ हिन्दी भाषी मध्य भारत नहीं है, सिर्फ हिन्दू भारत नहीं है या सिर्फ मुसलमान-अल्पसंख्यक वाला भारत नहीं है। इसमें केरल, बंगाल, उत्तर-पूर्वी राज्य, कश्मीर और बीच के हिस्से के सारे आदिवासी इलाके भी हैं जिनका खान-पान किसी एक धार्मिक सोच को ठीक नहीं लग सकता है, लेकिन उनके अपने पुराने, हजारों-लाखों बरस के तरीकों को किस आधार पर नाजायज ठहराया जा सकता है? आज अगर कुछ लोगों की धार्मिक भावनाएं किसी एक जानवर के साथ जुड़ी हुई हैं, तो दूसरे लोगों की सामाजिक और सांस्कृतिक भावनाएं और उनका खान-पान भी बहुत से जानवरों के साथ जुड़ा हो सकता है। बहुसंख्यक, हिन्दू, सनातनी या किसी और सोच की भावनाओं को दूसरों की भावनाओं पर थोपना किस तरह का लोकतंत्र है? गो-हत्या देश में एक पुराना चले आ रहा मामला है, और दिल्ली में उठी इस नई बहस से इस पर एक नई सहमति या असहमति सामने आएगी। 

धर्म, राजनीति और जुर्म


24 मार्च 2012
संपादकीय
पंजाब के मुख्यमंत्री की हत्या करने वाले को होने जा रहे फांसी रूकवाने के लिए अकाल तख्त ने वहां के मुख्यमंत्री को यह निर्देश दिया है कि वे राष्ट्रपति और केंद्र सरकार से पहल करके इस फांसी को रूकवाएं। वहां के कांगे्रसी मुख्यमंत्री के इस हत्यारे को हफ्ते भर के भीतर फांसी होनी है। पंजाब के इस धार्मिक संगठन के इस निर्देश से भारत की राजनीति का एक ऐसा पहलू सामने आता है जिसमें धर्म राजनीति पर हावी हो रहा है। कल के दिन हिन्दुओं की हिमायती किसी पार्टी की सरकार को कोई शंकराचार्य यह निर्देश देगा कि वह किसी हिंदू हत्यारे को बचाने के लिए पहल  करे, किसी मुसलमान मुख्यमंत्री को जामा मस्जिद से यह फतवा जारी हो कि वह जाकर किसी मुसलमान हत्यारे को बचाए, तो यह सिलसिला कहां तक जाएगा?
लेकिन भारत का लोकतंत्र राजनीति को धर्म से, साम्प्रदायिकता से अलग नहीं कर पाया है। चुनाव आयोग के कड़े लगते हुए नियम भी इस खतरनाक गठजोड़ के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा से लेकर शिवसेना तक, और अकाली दल से लेकर कुछ और पार्टियों तक जाति, धर्म और साम्प्रदायिकता का बोलबाला चलता है, और भारत का लोकतंत्र इसे झेल रहा है। लेकिन पंजाब की राजनीति में सिख पंथ के संगठनों की अलोकतांत्रिक दखल लंबे समय से देश देख रहा है। लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि इंदिरा गांधी के वक्त किस तरह की आतंकी हिंसा पंजाब के सिख संगठनों की छत्र-छाया में चल रही थी, और उस वक्त भी वहां पर वामपंथी-माक्र्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता ही उसके विरोध में रह गए थे। कांगे्रस ने पंजाब के आतंक के फल-फूल जाने के पहले तक इन्हीं आतंकियों को उसी तरह बढ़ावा देकर रखा था, जिस तरह मध्य-पूर्व के देशों में अमरीका ने तालिबानों को और बाकी आतंकी संगठनों को बढ़ाया था। पंजाब का खूनी इतिहास धर्म, राजनीति और आतंकी हिंसा की बहुत सी मिली-जुली घटनाओं से लिखा हुआ है और इससे देश को जो सबक लेना चाहिए था, वह नहीं लिया जा सका है। इसलिए आज पंजाब में एक हत्यारे को बचाने के लिए वहां की सत्ता के साथ खड़े हुए धार्मिक संगठन का यह फतवा जारी हुआ है। अकाल तख्त सिखों का एक सबसे ताकतवर संगठन है और उसे ऐसे अलोकतांत्रिक काम में उलझने से रोकने के लिए इस राज्य में उदारता का एक वातावरण रहना चाहिए था, जो कि वहां पर नहीं बन पाया है। 
केंद्र सरकार के लिए एक तरफ कश्मीर के किसी हत्यारे को सुनाई गई फांसी पर फैसला लेना बाकी है, कहीं पर कुछ तमिल हत्यारों की दया याचिका खड़ी हुई है। ऐसे में हमें एक आसान रास्ता यह दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले के बाद की दया याचिका वाला इंतजाम अब खत्म करना चाहिए। अदालत के जजों को चुनाव नहीं लडऩा पड़ता इसलिए वे अधिक ईमानदारी से कोई बात कह पाते हैं। वोटरों के सामने बेबस खड़े नेता ऐसा नहीं कर पाते। किसी की जान को बख्श देने का हक अदालत से परे किसी के हाथ में वैसे भी नहीं होना चाहिए क्योंकि नाम चाहे राष्ट्रपति को हो, उनके नाम पर फैसले तो केंद्रीय मंत्रिमंडल ही लेता है और जब देश में गठबंधन की सरकार चल रही हो, जगह-जगह हर साल-दो साल में चुनाव होते हों, तब किसी फांसी को खारिज कर देने जैसे फैसले हमेशा इंसाफ के पैमानों पर खरे नहीं होते, और वे राजनीतिक फैसले रह जाते हैं, पक्षपाती हो सकते हैं। लोकतंत्र में ऐसी मनमानी की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। 
इसके पहले की ऐसे और मामले सामने आएं, और देश में बदअमनी फैलने का कोई अधिक बड़ा खतरा सामने आए, उसके पहले ही कुछ लोगों को अदालत जाकर सरकारों के रहम के हक को खारिज करवाने के लिए एक याचिका लगानी चाहिए। फांसी के खिलाफ रहम की अपील पर अगर लोग दस-दस बरस तक हवा में टांगे रखे जाते हैं, तो ऐसी पक्षपाती व्यवस्था खत्म होनी चाहिए। एक समय यह राजाओं के हाथों में रहता था कि वे लोगों की जान बख्श दें। लोकतंत्र में यह सिलसिला खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन इसके साथ-साथ हम आखिर में एक लाईन यह भी कहना चाहेंगे कि मौत की सजा पूरी तरह खत्म हो जानी चाहिए।

भगत सिंह पर माला चढ़ाने का हक इतना आसान नहीं हो.


23 मार्च 12
संपादकीय
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के दिन आज हिंदुस्तान, और पाकिस्तान में भी, जगह-जगह इनको याद किया जा रहा है। नाम भगत सिंह का अधिक लिया जाता है, लेकिन सम्मान तो पूरी शहादत का होता है, इन सभी का होता है। भगत सिंह के नाम के साथ दिक्कत यह है कि उनकी शहादत भर का जिक्र होकर रह जाता है, उनकी बाकी बातें चर्चा में नहीं आ पातीं। अंग्रेजों के फांसी के फंदों पर पहुँचने के पहले भगत सिंह ने 23 बरस की उम्र में माक्र्सवाद और अंतरराष्ट्रीय मामलों की जो समझ हासिल की थी, जितना पढ़ा था, समझा था, उन पर लिखा था, और उस पर अमल किया था, वह बात भी कम मायने की नहीं थी। इस उम्र में आज हिंदुस्तान की जवान पीढ़ी माक्र्सवाद के नाम पर इम्तिहान में हर किस्म के नाजायज या जायज तरीकों से माक्र्स पाने की बात सोचने से अधिक और कितना सोच पाती है? आज देश में गरीबी और अमीरी के बीच की जो बढ़ती हुई खाई है, जो जातियों और मजहबों के बीच नफरत चल रही है, देश की जो लूटपाट चल रही है, उन सबके बारे में अंगे्रजों के खिलाफ एक हथियारबंद लड़ाई लड़ते हुए भी भगत सिंह जितना सोचा था और जितना पाने की कामना की थी, आज उनके उम्र की पीढ़ी उन बातों को समझ भी नहीं सकती। 
आज शहादत की सालगिरह के इस मौके पर हमें जो लिखना सूझ रहा है वह इस देश की हालत को देखकर पैदा हुई भारी हताशा से जुड़ी बातें हैं। कबीर से लेकर गांधी और भगत सिंह तक, जाने कितने ही महान लोग इस देश में हुए जिनको हर बरस एक-दो बार याद किया जाता है, जिनकी प्रतिमाएं जगह-जगह लगाई जाती हैं, जिनके नाम पर इमारतों के नाम होते हैं, या सरकार की योजनाओं के नाम होते हैं। और इसके साथ ही उनकी जिंदगी की सोच, उनकी लिखी हुई बातें, उनकी अपनी जिंदगी की मिसाल भुला दी जाती हैं। प्रतिमा चौराहों पर चढ़ा दी जाती हैं और उनकी जिंदगी के आदर्श, उनकी सोच को धूल में मिला दिया जाता है। गांधी के नाम पर एक रोजगार की योजना बनाई जाती है जिसमें देश के सबसे कमजोर तबके के लिए सबसे बड़े काम का इंतजाम किया जाता है, और उसमें इतना बड़ा भ्रष्टाचार किया जाता है कि काम बेईमानों का होता है योजना की बदनामी से नाम गांधी का बदनाम होता है। लेकिन हम सिर्फ सरकार की बात आज यहां करना नहीं चाहते क्योंकि समाज में सरकार से परे भी कुछ सोच होनी चाहिए, जिम्मेदारी होनी चाहिए और उसकी अपनी कुछ हैसियत भी होनी चाहिए। भगत सिंह की बात होते हुए क्या प्रतिमाओं से परे एक ऐसी लायबे्ररी की बात नहीं होनी चाहिए जिसमें सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संघर्ष से जुड़ी हुई किताबें रखी जाएं? क्या साल में दो बार उनको मालाएं चढ़ाने के बजाय उनके लिखे हुए पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? 
भारत में आज मोबाईल और मोबाईक से लैस नौजवान पीढ़ी पूरी तरह अनपढ़ और गैरजिम्मेदार बनती चली जा रही है। यह बात हमारे अंदाज में तीन चौथाई से अधिक लोगों पर लागू होती है और इसलिए हम इसे ही इस पीढ़ी की पहचान के रूप में देख रहे हैं, और बात कर रहे हैं। इस पीढ़ी को भगत सिंह की तस्वीरों वाले टी-शर्ट पहनना या उनकी प्रतिमाओं पर माला चढ़ाने जाना भी अगर किसी तरह सूझ जाए, तो भी उसे यह नहीं सूझ सकता कि भगत सिंह की सोच की तरफ भी झांक लिया जाए। दरअसल पढऩा मुश्किल और तकलीफदेह होता है, फूल चढ़ाना आसान होता है जिससे दिमाग पर कोई जोर भी नहीं पड़ता। आज अगर कोई गांधी की अहिंसा, सादगी और गरीब के लिए उनके मन की तकलीफ जैसी बातों पर अमल की सोचे तो वैसी जिंदगी खासी मुश्किल हो जाएगी। दूसरी तरफ प्रतिमा-माला, मंच-माईक, का सिलसिला अधिक आसान होता है और उससे छाती पर कोई बोझ भी नहीं बढ़ता। गांधी ने तो एक बहुत लंबी जिंदगी तय की थी और उनका लिखा हुआ, उनका पढ़ा हुआ बहुत अधिक था। लेकिन भगत सिंह ने तो कुल तेईस बरस की उम्र में जो समझ पाई थी, वह भारत के बहुत से बड़े-बड़े और महान लोगों की उस उम्र की समझ से कोसों आगे थी। और उसकी वजह बहुत साफ थी, माक्र्सवाद की पढ़ाई और उस पर चिंतन-मनन। वह दिन है और आज का दिन है, दुनिया में अगर इंसाफ और बेइंसाफ के बीच फर्क समझना हो, गरीब और अमीर के बीच के फासले पर फिक्र करनी हो, तो माक्र्स को पढ़े और समझे बिना और कोई रास्ता नहीं है। और यह बात भगत सिंह ने उस वक्त समझकर अमल में लाई थी जब संचार के आज की तरह के कोई रास्ते भी नहीं थे।
मूर्तियों और मालाओं का सिलसिला खत्म होना चाहिए। इस पाखंड के चलते किसी का ध्यान इस बात की तरफ नहीं जाता कि भगत सिंह से लेकर गांधी तक के मुश्किल सबक ताक पर धर दिए जाते हैं और उस ताक से साल में दो-चार बार प्रतिमाएं निकालकर उनकी धूल झड़ा ली जाती है। हम कबीर को देखते हैं कि जिन पाखंडों के खिलाफ उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एक अभूतपूर्व हौसले के साथ कहा, वैसे ही पाखंड आज उनको पूजनीय बनाने के लिए खुलकर इस्तेमाल हो रहे हैं। भगत सिंह पर माला चढ़ाने का हक इतना आसान नहीं होना चाहिए।

22 march


22 march


दांतों का ख्याल न रखा तो...



एक वक्त था जब बड़े बुजुर्ग यह सिखाते थे कि समय पर खाना चाहिए, और खाने के बीच-बीच में अधिक कुछ नहीं खाना चाहिए। यह बात सेहत के लिए कई हिसाब से अच्छी थी लेकिन इसका एक खास पहलू और भी है। लोग जब पूरे समय कुछ न कुछ खाते हैं तो उनके दांतों में खाना लगे और फंसे रह जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि रात के आठ घंटों को छोड़कर बाकी पूरे समय लोगों के दांत साफ नहीं रहते और इससे सडऩ से लेकर बदबू तक की गारंटी रहती है।
समझदारी इसमें है कि सुबह के नाश्ते के बाद ब्रश करके निकलना चाहिए, दोपहर के खाने के बाद जितनी अच्छी तरह हो सके मुंह साफ कर लेना चाहिए, और रात के खाने के बाद जल्द ही ब्रश कर लेना चाहिए। जिन लोगों को फ्लॉस करने की सुविधा हो, वह बहुत कारगर होती है। बहुत मामूली दाम पर आजकल फ्लॉस मिलने लगे हैं और टूथपिक जैसी डंडी का बंधा हुआ धागे का एक टुकड़ा दंातों के बीच के जोड़ को साफ करने में कारगर होता है, और इसके बिना कोई भी टूथब्रश यह सफाई नहीं कर सकता। यह खर्च टूथब्रश बदलने या टूथपेस्ट के खर्च का एक फीसदी भी नहीं होगा, लेकिन इससे दांतों का बहुत बड़ा भला हो जाता है। हर बार खाने के बाद अगर सुविधा हो तो फ्लॉस कर लेना अच्छा है।
बहुत से बच्चे, और बड़े भी, बिना ब्रश किए सो जाते हैं। इनके दांत वक्त के साथ-साथ इतने महंगे इलाज के लायक हो जाते हैं कि बस। इसलिए दिन में तीन बार दो-दो मिनट का समय अगर ध्यान से दांतों के लिए रखा जाए तो उम्र अधिक होने के साथ-साथ इनका महंगा इलाज टल सकता है।
इसके साथ-साथ एक बात यह भी है कि दांत साफ न रखने वाले लोगों के मुंह से ऐसी बदबू आती है कि कोई उन्हें अपने करीब बिठाना भी पसंद नहीं करता। पसंद आपकी।

क्या भारतीय चुनाव 5 बरस लूटने का ठेका दे देता है?


22 मार्च 12
संपादकीय
दिल्ली आज कोयले की धूल से घिर गई है। सीएजी की एक ताजा रिपोर्ट के सामने आने से हंगामा मचा हुआ है कि यूपीए सरकार ने कोयला खदानों का नीलाम न करके उसे जिस तरह से लोगों को दिया उससे बड़ी-बड़ी कंपनियों को दसियों हजार करोड़ का नाजायजा मुनाफा हुआ और देश को दस लाख करोड़ रूपयों से अधिक का नुकसान हुआ। इस तरह की रकम के शून्य गिनना हमारी क्षमता से परे की बात है और सरकार सीएजी की रिपोर्ट को गलत या अनुपातहीन साबित करने के लिए चाहे जो कर ले, आज शायद जनता को यह लग रहा होगा कि इस देश को सरकार चला रही है या लुटेरे चला रहे हैं। अभी यह एकदम पहली जानकारी आई है इसलिए यह कहना थोड़ा सा मुश्किल है कि सीएजी का अंदाज हकीकत से कितना अधिक या कितना कम हो सकता है, लेकिन आज एक देश को यूपीए सरकार के मुकाबले सीएजी पर अधिक भरोसा है। और जिस तरह 2जी घोटाले का भांडाफोड़ सीएजी की रिपोर्ट से ही शुरू हुआ था और यूपीए सरकार जिस तरह उसमें मुजरिम साबित होते चल रही है, उससे लोगों को आज दस लाख करोड़ के इस नुकसान की रिपोर्ट को सही मानने की बहुत बड़ी बुनियाद है। लोगों को यह भी याद है कि किस तरह से यूपीए के संचार मंत्री ए. राजा के जेल जाने के बाद बने नए संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि 2जी में केंद्र सरकार, यानी देश को, किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ। शून्य नुकसान के उनके बयान में यूपीए सरकार की बहुत थू-थू करवाई। इसलिए आज जब विपक्ष इस कोयला खदान घोटाले को लेकर संसद को ठप कर रहा है, तो हम कैसे यह कहें कि विपक्ष को संसद चलने देनी चाहिए और इस मामले पर वहां चर्चा करनी चाहिए। हम आमतौर पर संसद और विधानसभा के काम को ठप करने के खिलाफ हैं। लेकिन आज सवाल इससे परे का है अगर केंद्र सरकार इतने बड़े-बड़े घोटालों में लगी है, तो फिर इस संसद का चलना और न चलना क्या मायने रखता है? 
हम लगातार यह देख रहे हैं कि देश की खदानों को, जमीन, जंगल और नदी को, समंदर के किनारों को, जिस तरह निजी कारोबारियों के हवाले किया जा रहा है, जिस तरह से बड़े-बड़े ठेके देकर अगले दस-बीस-पचीस बरस के लिए लोगों को सड़क बनाकर लागत से दर्जनों गुना, सैकड़ों गुना टोल टैक्स वसूल करने का एकाधिकार दिया जा रहा है, वह इस देश को लूटने की सत्ता की भागीदारी है। और इसमें केंद्र सरकार के साथ-साथ कई राज्य सरकारों का भी हाथ है। इसलिए किसी एक पार्टी या गठबंधन को कोसने के बजाय आज भारतीय लोकतंत्र में यह सोचने का मौका आ गया है कि जंगलों के आदिवासी इलाकों से परे बाकी देश में भी नक्सलियों का फैलना कब तक टल पाएगा? जिसके हाथ सत्ता है उसमें से इतने सारे लोग आज लूटपाट में लगे हुए दिख रहे हैं, कि जनता की अगली कई पीढिय़ां कारखानेदारों और कारोबारियों की गुलाम बनकर रह जाएंगी। एक-एक कारखाने के लिए जिस तरह से खदानें बांटी जा रही हैं, उससे अभी से यह तय हो जा रहा है कि अगली तमाम पीढिय़ां नए जमींदारों के हाथों लुटती रहेंगी।
आज देश एक ऐसी जगह आकर खड़ा हो गया है कि अगले चुनाव तक का इंतजार करना भारी है। अब तो यूपीए सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है और लोगों को यह भी लगता है कि सत्ता हाथ से अगली बार जाना तय जानकर क्या इस सरकार के लोग देश के साथ वैसा ही सुलूक करेंगे जैसा कि हिंदुस्तान छोड़कर जाने की नौबत आने पर लौटते हुए महमूद गजनवी की सेना ने लूटा था। इस सरकार से किसी ईमानदारी की उम्मीद तो हम पहले खो बैठे हैं, लेकिन अब यह लगता है कि इसे आगे कुर्सी पर बने रहने देने के खिलाफ क्या किया जा सकता है? क्या भारतीय चुनाव लोगों को पूरे पांच बरस लूटने का एकाधिकार का ठेका दे देता है? 

रविशंकर को मालूम है सरकारी स्कूलों की हकीकत लेकिन...



21 मार्च 12
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
आर्ट ऑफ लिविंग के नाम से आध्यात्म की एक शैली को बढ़ावा देने वाले श्री श्री रविशंकर के नाम से चर्चित गुरू का कहना है कि भारत में सारे सरकारी स्कूल बंद करके केवल निजी स्कूल होने चाहिए क्योंकि मोटे तौर पर सरकारी स्कूलों में पढ़े हुए बच्चे ही आगे जाकर नक्सली बनते हैं। उन्होंने इस बारे में यह भी कहा कि निजी स्कूलों के बच्चों को कभी ऐसा उग्रवाद नहीं सिखाया जाता। जयपुर में वे एक समारोह के मंच से यह बोल रहे थे और इसके तुरंत बाद वहां के सरकारी स्कूलों के एक संघ ने इस बयान की निंदा करते हुए रविशंकर की नीयत और उनकी मानसिक स्थिति पर सवाल उठाए। शिक्षकों ने कहा कि उनकी दिमागी हालत कुछ गड़बड़ लगती है तभी उन्होंने ऐसे बयान दिए हैं। अकेले राजस्थान में इस बरस सत्रह लाख बच्चे इम्तिहान दे रहे हैं और अगर उनके बयान में कोई सच्चाई होती तो फिर राज्य के हर गांव में नक्सली होते। शिक्षकों के संघ ने यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि रविशंकर गरीबों को बुनियादी तालीम से दूर रखना चाहते हैं, क्योंकि अधिकांश बच्चे जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं वे और किसी तरह का शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते।
श्री श्री रविशंकर (ये सारे श्री हमारे लगाए हुए नहीं हैं, उनके खुद के लगाए हुए हैं), से कुछ लोगों को हो सकता है कि उनके इस बयान से निराशा हुई हो, लेकिन हमें धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए लोगों से कभी भी कोई बड़ी आशा नहीं रही है और हाल के बरसों में तो जिस तरह से बाबा रामदेव से लेकर रविशंकर तक चुनावी लोकतंत्र में पार्टियों की संभावनाओं को प्रभावित करने में लगे हुए हैं, जिस तरह खुलकर राजनीति कर रहे हैं, वह देखने लायक है। रूस में एक समय जारशाही के दौरान जिस तरह से धर्म से जुड़े हुए लोग बदनाम रहे, जिस तरह से इंदिरा गांधी के समय धीरेन्द्र ब्रम्हचारी नाम का उनका एक करीबी बदनाम रहा, जिस तरह से चंद्रा स्वामी नाम का एक तांत्रिक इंदिरा से लेकर चंद्रशेखर तक बहुतों का करीब रहा और जिस तरह वह अपराधों के मामलों में फंसा रहा, यह सब भारत की पिछली चौथाई सदी का ही इतिहास है। इसके बाद भी कुछ लोगों को अगर धर्म और आध्यात्म के सामाजिक योगदान की खुशफहमी हो, तो उन्हें उस रजनीश को भी पढ़ लेना चाहिए जिनके तर्कों से बहुत से लोग प्रभावित होते हैं। उनका पूरे का पूरा फलसफा जिस तरह गरीबों से नफरत करने वाला रहा, और जिस तरह से पूंजीवाद को बढ़ाने वाला रहा, उसे समझने के लिए आस्था से परे की थोड़ी सी समझ भी चाहिए। उनके अलावा भी देख लें तो देश में कई धर्मों-आध्यात्मिक सम्प्रदायों के बहुत सारे गुरुओं का हाल यह है कि उनके इर्दगिर्द के अनुयायिओं की लिस्ट में हर किस्म के अपराधी मिल जाते हैं और दो नंबरियों से लेकर दस नंबरियों तक की भीड़ उनके आसपास दिखती है जिससे उन्हें कभी कोई परहेज नहीं होता।
लेकिन हम रविशंकर की कही हुई बातों पर लौटें, तो उन्होंने ठीक वही कहा है जो कि धर्म हजारों बरस से कहते आ रहा है। गरीब समाज के भीतर एक किस्म के शूद्र होते हैं और गरीबी एक अछूत सी नौबत होती है। ऐसे गरीबों को आज पढऩे के मौके से दूर कर देना और इस बड़ी आबादी को अनपढ़ रखकर महंगे निजी स्कूलों में ही पढ़ाई की बात करना, मनु की वर्ण व्यवस्था से लेकर, सामंती अर्थव्यवस्था तक की हिमायती सोच है। यह सोच निजी स्कूलों को चलाने वाले लोगों का धंधा बढ़ाने वाली सोच भी है, और इससे दरिद्र के दरिद्र बने रहने की वह पूंजीवादी जरूरत भी पूरी होती है जिसके तहत गिने-चुने लोगों के हाथों पूंजी रहना धार्मिक-आध्यात्मिक गुरुओं को अनंतकाल से ठीक लगते आया है। माक्र्स ने जिस तरह धर्म को अफीम कहा था ताकि उसके नशे में लोगों को उनके हकों से दूर रखा जा सके, वैसा ही काम अभी धर्म के छाते तले काम करने वाले आध्यात्म को भी बांटा गया है ताकि इस जन्म की गरीबों की तकलीफों को उनके पिछले जन्म के कुकर्मों का नतीजा बताकर उनकी नाराजगी को काबू में रखा जा सके और उन्हें अगले जन्म के सपने दिखाकर राजा-मालिक के प्रति वफादार बनाए रखा जा सके। अपने अंतहीन प्रवचनों से लोकतंत्र, न्याय और समानता के खिलाफ एक माहौल को धर्म और आध्यात्म के नेता बनाते हैं और बढ़ाते चलते हैं।
सरकारी स्कूलें गांव-जंगल तक सबसे गरीब तबके को न सिर्फ पढ़ाई का मौका देती है बल्कि दोपहर का खाना भी देती है। केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के चलते स्कूलों में ऐसा खाना पकाने के काम में नीची मानी जाने वाली जातियों की महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है, और सभी जातियों के बच्चे मिलकर एक साथ खाना खाते हैं। जाहिर है कि इससे ऊपर लेटा हुआ मनु बेचैनी से करवटें बदलता होगा और नीचे धरती पर मनुवाद को बढ़ाने वाली, कई रंगों के चोलों वाली, मनु की संतानें भी अपने को नाकामयाब मानती होंगी। आज भी एक खबर छपी है कि किस तरह हिमाचल के एक मंदिर में हरिजनों (दलितों) के भीतर घुसने के खिलाफ चेतावनी वहां टंगी हुई है। ऐसे देश में सरकारी स्कूलें अगर बंद हो जाएं तो मनु का मकसद पूरा हो सकता है। साथ-साथ एक बात यह भी है कि जब तक स्कूलों में मुफ्त का खाना मिलते रहेगा तब तक बाजार-व्यवस्था के तहत पूंजीवादी कारोबार का ध्ंाधा कुछ मंदा रहेगा। इसलिए बाजार के हित में यह है कि इन बच्चों को सरकारी खाना न मिले और इनके मां-बाप कम मजदूरी पर पैसे वालों के यहां काम करने को बेबस हों। भरे पेट वाले लोग कई तरह की आवाज उठा सकते हैं इसलिए पेट को खाली रखना भी धर्म, सत्ता, आध्यात्म और बाजार की मिलीजुली साजिश रहती है।
रविशंकर का यह कहना कि सरकारी स्कूलों से निकले हुए बच्चे ही नक्सली बनते हैं, सही है। नक्सली उन्हीं तबकों से आए हुए बन सकते हैं जिन तबकों ने शोषण, अत्याचार और बेइंसाफी को पैदा होने से लेकर बंदूक उठाने की उम्र तक लगातार देखा है। और ऐसे बच्चे महंगे निजी स्कूलों के तो हो नहीं सकते, वे महज मुफ्त की सरकारी स्कूलों के ही हो सकते हैं। उनकी यह बात राजनीतिक, सामाजिक असलियत की उनकी कमजोर समझ का सुबूत हम नहीं मानते। वे इतने समझदार हैं कि वे हकीकत को समझते हैं, और देश का समझदार तबका भी उनके कहे हुए के पीछे की हकीकत को समझता है। लेकिन उनकी यह सोच भारत के लोकतंत्र में अब पूरी नहीं हो सकती।
रविशंकर को मालूम है सरकारी स्कूलों की हकीकत लेकिन, मनु की खुशी के लिए ये ख्याल अच्छा है...


आज मेरी बारी है-भाजपा


20 मार्च 12
संपादकीय
कल हमने यूपीए और कांगे्रस की फजीहत के बारे में लिखा था और उसके भी पहले से इससे थोड़ी ही कम दिक्कत भाजपा की चली आ रही थी। कर्नाटक भाजपा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अपनी हरकतों से राज्य के नाम को 'कर नाटकÓ साबित करने में लगह हुए हैं और भाजपा इस मुश्किल से जूझने में लगी है। भाजपा की दिक्कतों की अगर बात करें तो बिहार, झारखंड में भी वह अपने एक बड़े नेता यशंवत सिन्हा की नाराजगी झेल रही है, लेकिन वैसा तो हर पार्टी के साथ होते ही रहता है इसलिए अभी उस पर लिखने का कोई मौका नहीं है। 
कर्नाटक की बात कुछ अलग है। दक्षिण भारत में पहली बार भाजपा की सरकार बनाने वाले मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने अपने-आपको पार्टी से बड़ा नेता बनाकर हमेशा से रखा। और उनकी सरकार में जिस तरह से दो खबरपति खदान मालिकों ने विधायक बनकर, मंत्री बनकर खदानों पर डाका डाला, उसकी वजह से उनको सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा और उसके पहले भी उन्होंने भाजपा को खुली चुनौती देते हुए सरकार को बंधक सा बनाकर रखा। कर्नाटक में जिस तरह सोलह हजार करोड़ रुपए से अधिक के खनिज घोटालों की रिपोर्ट वहां के लोकायुक्त की दी हुई ही है, और जिस तरह मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का परिवार इन गोरखधंधों में फायदे पाते पकड़ाया है वह सबके सामने है। अब इतने मामलों के रहते हुए येदियुरप्पा हाईकोर्ट के एक फैसले को लेकर फिर मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं जिसमें लोकायुक्त की कार्रवाई को गलत बताया गया है। लेकिन कुल मिलाकर येदियुरप्पा की साख अभी कटघरे में ही है और लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र या उनके विवेक के अधिकार से परे भी पहली नजर में येदियुरप्पा अपराधी लगते हैं, और किसी भी पार्टी से यह उम्मीद की जाती है कि ऐसे दागी नेताओं के अदालत से पूरी तरह बरी हो जाने तक पार्टी उन्हें सरकार से दूर रखे। और एक बड़ी पार्टी अगर ऐसी परंपराएं कायम नहीं करेगी तो फिर लालू-मुलायम और शिबू सोरेन जैसे एक घर से पार्टी चलाने वाले लोगों से क्या उम्मीद की जाएगी?
भाजपा के लिए कर्नाटक का सिलसिला अदालती या विधानसभा के भीतर की जोर आजमाइश का नहीं है। यह मामला पार्टी के भीतर मांसपेशियां फड़काने का है। जिस तरह खुलकर एक राज्य का नेता अपने राष्ट्रीय नेताओं को आंख दिखा रहा है, जिस तरह पार्टी विधायकों का बहुमत जमानत पर छूटे इस नेता के साथ है, जिस तरह कर्नाटक के भाजपा सांसद येदियुरप्पा का झंडा लेकर दिल्ली में खड़े हैं, और जिस तरह वे राष्ट्रीय नेतृत्व की हुक्मउदूली कर रहे हैं, उससे पार्टी उनसे कमजोर साबित हो चुकी है। हम इसे भाजपा की भीतरी परेशानी का मामला भी कम देखते हैं और लोकतंत्र में सार्वजनिक मूल्यों के सम्मान का मामला अधिक देखते हैं। जिस किसी राज्य में या केंद्र सरकार के जिस किसी मंत्रालय में निर्वाचित लोगों के कटघरे में होते हुए भी उनको बचाने का काम किया जाता है, उसके खिलाफ हम लगातार लिखते आए हैं। आज अपनी नीयत को साबित करने का मौका भाजपा का है और हो सकता है कि ईमानदारी बरतने पर उसकी कर्नाटक की सरकार की नियति खत्म हो जाए। लेकिन जिस किसी पार्टी को ऐसी नौबत झेलनी होती है, उसके लिए हमारी यही सलाह रहेगी कि सबसे पहले संदिग्ध नेता को लाभ के किसी भी पद से दूर किया जाए। कल से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी एक बात कहते सुनाई पड़ रहे हैं कि भाजपा किसी दबाव में कोई फैसला नहीं लेगी, ऐसे में कर्नाटक में उनकी बात का वजन अभी साबित हो जाएगा। 
हमने कर्नाटक भाजपा और उसकी राज्य सरकार को लेकर बार-बार यह लिखा कि जब पार्टी के कुछ नेताओं को इतना अधिक कमाने का मौका दिया जाता है कि वे राष्ट्रीय नेताओं से लेकर राज्य के विधायकों और मतदाताओं तक, सबको जेब में रखकर चल सकते हैं, तो यह बात किसी राष्ट्रीय पार्टी के अस्तित्व के लिए भी खतरा बन जाती है। किसी को भी अपने नेताओं को इतना अधिक संपन्न नहीं बनने देना चाहिए कि जब कर्नाटक बाढ़ से तबाह था, तब अपने विधानसभा क्षेत्रों में जाने के बजाए वहां के भाजपा विधायक इन्हीं खरबपति रेड्डी-मंत्रियों के मेहमान होकर, अपने ही मुख्यमंत्री को गिराने की कोशिश में दूसरे प्रदेश के सबसे महंगे होटल में बस ही गए थे। तब भी हमने यह लिखा था कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन में पैसों का इतना बड़ा खेल किसी भी पार्टी के लिए आत्मघाती ही रहता है। जिस मुख्यमंत्री के राज में इस तरह से दसियों हजार करोड़ के घपले पकड़ाए हैं, जो अपने परिवार के साथ भ्रष्ट दिख रहा है, उसी को अगर चाकू की नोंक पर दुबारा मुख्यमंत्री बनाना पड़ता है, तो यह भाजपा के लिए हाल-फिलहाल की सबसे बड़ी शर्मिंदगी होगी।

20 march


20 march


19 march


बीच बाजार शीशों वाला पखाना


19 मार्च 2012
एक दोस्त के साथ मैं हिंदुस्तान के पश्चिमी हिस्से के एक शहर में था जो कि दिल्ली से खासा दूर था और एक दूसरे राज्य में था। उसकेमोबाईल फोन की घंटी बजी और उसने चाहे किसी भी वजह से यह कहना शुरू किया कि वह कोलकाता पहुंच गया है और कल उनसे मिलेगा। सुनकर मुझे बहुत हैरानी हुई क्योंकि दुबारा उसी का फोन आता और इसका फोन व्यस्त होता या बंद होता तो इस प्रदेश की भाषा-बोली में कॉल करने वाले को संदेश मिलता, और वह कोलकाता की भाषा से खासा अलग होता। 
टेक्नालॉजी ने न सिर्फ जासूसों के लिए बल्कि बहुत आम लोगों के लिए बहुत सी बातों को समझना खासा आसान कर दिया है। कोई भी व्यक्ति आपके फोन से खिलवाड़ करते हुए एक सेटिंग को मंजूरी दे सकता है जिससे कि आपके फोन की मौजूदगी वाला इलाका वह अपने फोन पर कभी भी देख सके। आज भी इंटरनेट पर फेसबुक जैसी लोकप्रिय वेबसाईटों पर लोग एक लाईन भी लिखकर डालते हैं तो वह समय के साथ-साथ जगह भी दिखाते चलती है। इसलिए झूठ बोलने और गलत काम करने के दिन रफ्तार से लदते जा रहे हैं। 
आज से बारह बरस पहले की बात मुझे याद है कि जब लंदन में अपने मेजबान परिवार के घर ठहरे हुए कुछ अधिक उत्साह में जब मैंने कचरे को ले जाकर बाहर घूरे के ड्रमों में डाला, और अलग किस्म के कचरे को अलग ड्रम में डाल दिया तो घरवालों पर म्युनिसिपल के जुर्माने का एक खतरा खड़ा हो गया था। जमाने पहले से विकसित देशों में कचरे को गलत ड्रम में डालने पर म्युनिसिपल कचरे के बैग की बारीकी से जांच करके किसी न किसी लेबल, बिल, लिफाफे, किसी किस्म की दवाई से उस घर तक पहुंच जाती है जिसने रसोई कचरे के डिब्बे में बोतलें या बोतलों के ड्रम में अखबार डाले थे। और इसके बाद का जुर्माना खासा कड़क भी होता है।  इसलिए बहुत छोटे-छोटे सुराग आसानी से आपकी गोपनीयता को खत्म करते हैं। 
अमरीका और इजराइल की जासूस एजेंसियां लोगों पर निगरानी रखने के लिए एक-एक टेलीफोन, एसएमएस, ईमेल के मार्फत बहुत आसानी से जगह, कम्प्यूटर या फोन की कंपनी, टेलीफोन कंपनी, सॉफ्टवेयर जैसी अनगिनत बातों का लगातार पता लगाते चलती है और किसी दिन आपको मुफ्त में किसी अच्छे कम्प्यूटर एप्लीकेशन का प्रस्ताव आता है तो हो सकता है कि वह आपकी सारी जानकारी को आगे बढ़ाने वाला हो, और अगर आप किसी भी तरह की अहमियत रखते हैं तो यह भी मुमकिन है कि वह आपके हिसाब से बनाया गया हो और आपको निशाना बनाकर भेजा गया हो। आप अपने ईमेल पर किसी को अपनी बीमारी के बारे में चार शब्द लिखकर भेजें, और वहां से आपको किसी इलाज या दवाई के बारे में लिखकर कुछ आए, तो जीमेल जैसे सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले ईमेल के बॉक्स पर आपको उस बीमारी से जुड़े हुए इश्तहार दिखने लगेंगे। जीमेल यह दावा करती है कि वह आपकी मेल नहीं पढ़ती, महज उसके कुछ शब्दों को पकड़कर उनका कम्प्यूटर बाजार के विज्ञापनदाता को बताता है कि कौन-कौन सा ईमेल किस सामान के ग्राहक होने का सुबूत है। बस वहीं से बाजार का हमला शुरू हो जाता है।
करीब पन्द्रह महीने पहले जब मैं एशिया से गाजा कारवां के साथ दिल्ली से आधा दर्जन मुस्लिम और इस्लामी देशों से गुजरते हुए फिलीस्तीन तक गया, तो न सिर्फ मेरे पासपोर्ट पर इन तमाम देशों के वीजा लगे थे। ये ऐसे देश थे जो कि पश्चिम के कुछ देशों को अपने लिए बहुत खतरनाक लगते हैं, और इजराइल की सरकार ने अपनी वेबसाईट पर हम लोगों के नाम भी डाल रखे थे कि भारत से आतंकियों का एक दस्ता इस तरह इजराइल की समुद्री-घेराबंदी को तोडऩे पहुंच रहा है और इनसे निपटने के  लिए इजराइल की सेना तैयार है। ऐसी किसी शहादत का मौका वहां आया नहीं और तनाव के साए में मुहिम का वह सफर पूरा हो गया। लेकिन इसके कुछ महीनों के भीतर ही जब अमरीका जाने पर मेरे पासपोर्ट को देखकर लॉस एंजेल्स के एयरपोर्ट पर मेरे पासपोर्ट पर लगे इन तमाम 'इस्लामिकÓ वीजा के बारे में कुछ भी नहीं पूछा गया, तो पहले मुझे बहुत हैरानी हुई, और बाद में बात समझ आ गई। 
फिलीस्तीन तक जाने वाले हिमायती लोगों की इतनी जांच-पड़ताल अमरीका और इजराइल की एजेंसियां कर चुकी होती हैं कि उनमें से किससे इन देशों को खतरा हो सकता है यह ठोकने-बजाने के लिए वहां के एयरपोर्ट तक नौबत नहीं आती। जब पासपोर्ट और वीजा के साथ भारत से इन देशों की टिकटें बनती हैं, तभी आने वाले ऐसे लोगों की जांच हो चुकी होती है। इसलिए मेरे साथ अमरीका की उदारता का पल भर का भ्रम कुछ ही समय में अमरीका के चौकन्नेपन के एहसास में बदल गया और यह समझ आ गया कि कौन उनके लिए खतरनाक हो सकता है, और कौन नहीं इसकी साधारण समझ तो उनमें है ही। मुझे एक पुराने वीजा के आधार पर उस देश में दुबारा दाखिला इतनी आसानी से मिल गया क्योंकि उनको आसानी से यह अहसास हो गया होगा कि मेरे जैसे लोग फिलीस्तीन-समर्थक ही हैं, आतंकी नहीं।
भारत जैसे अभी-अभी विकसित होना शुरू हुए देश में भी बैंक के कार्ड से किए गए भुगतान, किसी सामान की खरीददारी, हवाई या ट्रेन टिकटों की बुकिंग, एसएमएस, ईमेल जैसी बातों से अब लोगों पर सरकार पल-पल नजर रख सकती है, और जिन लोगों पर शक होता होगा उन पर रखती भी होगी। आज जब भी कोई कम्प्यूटर, फोन या इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, अपनी निजी जिंदगी को एक पोस्टमार्टम के लिए खोलकर रख देते हैं। आज टेक्नालॉजी से मिलने वाली सहूलियतों के साथ-साथ ये खतरे आएंगे ही। इसलिए अधिक जरूरी यह है कि लोग कम से कम डिजिटल दुनिया में ऐसा कुछ न करें जो उनके खिलाफ जाए, जा सके।
कुछ लोग सावधान होते हैं और अपने परिवार के लोगों के बारे में इंटरनेट पर अजनबियों से कोई भी बात नहीं करते। लेकिन तकनीक की ऐसी खुफिया घुसपैठ की ताकत और जासूसी एजेंसियों, बाजार की सर्वे एजेंसियोंं की घुसपैठ से अनजान बहुत से लोग इंटरनेट पर पूरी जिंदगी को बिखेरते चलते हैं। इस बारे में आज इस बात की जरूरत इसलिए है क्योंकि लोगों की जिंदगी अधिक से अधिक डिजिटल होते चल रही है, और इंटरनेट पर सामाजिक अंतरसंबंधों वाली फेसबुक जैसी वेबसाईटों के चलते अब लोग चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने अपनी बहुत सी बातें ऐसी जगहों पर डालते चलते हैं जो कि उन्हें सुरक्षित लगती हैं। 
ओसामा बिन लादेन जैसे किसी अपराधी को पकडऩा या मारना हो तो जासूसी एजेंसियां शक के घेरे में आए हुए मकान से निकलने वाले कूड़े की जांच तो करते ही हैं, उनसे बचने के लिए ओसामा के घर पर ही कचरा जलाने का पूरा इंतजाम था, और यह इंतजाम भी शक की एक वजह बना था क्योंकि उस घर से कचरा निकलता नहीं था। इतने बरस ओसामा बचा भी इसलिए रह सका कि वह डिजिटल तकनीक से दूर रहा और कम्प्यूटर, फोन से परे भी रहा।
योरप के एक देश की एक तस्वीर कुछ बरस पहले हमने छापी थी जिसमें किसी सार्वजनिक जगह पर ऐसा सार्वजनिक शौचालय था जिसमें बाहर से तो भीतर कुछ नहीं दिखता था, लेकिन भीतर से बाहर, शीशों के आरपार सब कुछ दिखता था। चारों तरफ ऐसे कांच वाला शौचालय एक बड़ी अजीब सी डिजाइन थी। लेकिन इससे ठीक उल्टे आज डिजिटल जिंदगी में लोग मानो किसी सार्वजनिक जगह पर ऐसे पखाने में बैठे हैं जिसके भीतर वे अपने-आपको महफूज समझ रहे हैं क्योंकि बाहर का कुछ नहीं दिख रहा। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत यह है कि बाहर से भीतर सब कुछ दिख रहा है। ऐसे जमाने में इलाज सिर्फ एक है कि अपने चाल-चलन को ठीक रखना, कामकाज को बिना जरूरत टेलीफोन, कम्प्यूटर या इंटरनेट पर नहीं डालना। और यह मानकर चलना कि उनकी हर बात किसी भी दिन उनके पूरे दायरे के बीच चने-मुर्रे की तरह बंट सकती है।

अस्पताल के मालिक-मैनेजर के हाथों चलता देश का इलाज


19 मार्च 12
संपादकीय
संसद के भीतर इस वक्त यूपीए सरकार की जो फजीहत हो रही है, वह कांगे्रस के बारे में दो ही बातें साबित करती है, पहली यह कि उसका गठबंधन चलाने का कोई मिजाज नहीं है और जैसा कि कल समाजवादी पार्टी के लोगों ने दिग्विजय सिंह के बयान के बाद कहा है, यह पार्टी घमंडी है। दूसरी बात यह कि किसी सत्तारूढ़ गठबंधन में अगर गठबंधन की राजनीतिक मुखिया गैरराजनीतिक हो और गठबंधन का प्रधानमंत्री भी गैरराजनीतिक हो तो यह भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र के लिए एक बहुत घातक नाकामयाबी की बात है। यह कुछ उसी तरह का लग रहा है कि एक अस्पताल का मालिक और वहां का गैरचिकित्सक मैनेजर मिलकर एक जटिल बीमारी का इलाज कर रहे हों।
पिछले कम से दो बरसों का तो हाल यह है कि कोई हफ्ता ऐसा नहीं गुजरता जब हमें बेबस होकर यूपीए और कांगे्रस के बारे में लिखना न पड़ा हो। न चाहते हुए भी एक ही मुद्दे पर जब बार-बार लिखने की नौबत आती है तो कभी-कभी यूपीए और कांगे्रस पर तरस भी आता है कि इनके बारे में आखिर और कितना लिखा जाए, और कितने बार इनकी बेदिमागी, बददिमागी और बेईमानी को कोसा जाए? लेकिन जब तक हम अपने-आप पर अगली बार लिखने के पहले काबू रखें, तब तक यूपीए और कांगे्रस, सरकार और पार्टी की तरफ से हमारे सरीखे लोगों को कोंचा जाता है कि क्या इस पर भी नहीं लिखोगे? 
कल टेलीविजन पर जिन लोगों ने दिग्विजय सिंह का बयान देखा होगा वे इस बात पर हैरान हुए होंगे कि उत्तरप्रदेश की राजनीति में इतने ताजा-ताजा कड़वे रिश्तों के तुरंत बाद वहां के इंजार्च महासचिव क्यों समाजवादी पार्टी के केंद्र सरकार में शामिल होने पर पूछे गए सवाल पर कुछ बोल रहे थे। नतीजा यह हुआ कि इस खबर के आते-आते समाजवादी पार्टी के ताजा-ताजा घायल हुए चुनावी नेताओं ने कांगे्रस और दिग्विजय सिंह के खिलाफ वे तमाम हमलावर और आग उगलती बातें कहना शुरू कर दिया जिसका उन्हें हाल ही के चुनाव अभियान की गंदगी के बाद हक मिला हुआ है। आज उत्तरप्रदेश को लेकर कांगे्रस के लिए समझदारी की बात यही होगी कि उसके जो नेता चुनावी मैदान में समाजवादी पार्टी के खिलाफ भारी गैरजरूरी और हमलावर बातें कहकर लखनऊ से दिल्ली मानो लौटे भी नहीं हैं, उन्हें समाजवादी पार्टी से किसी भी बातचीत से कुछ दूर ही रखें। इस बहुत मामूली सी समझ के बिना कल चारों तरफ से पिटती हुई कांगे्रस पार्टी को दस थप्पड़ें और लग गईं। हमारा ऐसा मानना है कि कांगे्रस के प्रधानमंत्री और कांगे्रस की अध्यक्ष की राजनीतिक समझ बेहतर होती, वे राजनीति की जटिल जरूरतों से रोजाना जुड़े रहते, तो ऐसी नौबत नहीं आई होती। 
एक तरफ पिछले चार दिनों से यूपीए गठबंधन की एक बड़ी नेता ममता बैनर्जी ने केंद्र सरकार का जीना हराम कर रखा है। गठबंधन सरकार चलाने के लिए अगर कांगे्रस को एक शेरनी को साथ रखना है, उस पर सवारी करनी है, तो उसके खाने-पीने और उसे खुश रखने की फिक्र भी कांगे्रस को करनी चाहिए। सवारी बने हुए हर प्राणी की अपनी-अपनी जरूरतें होती हैं, ईमानदार ममता बैनर्जी अहंकार का नाश्ता करती हैं, बददिमागी का लंच और मनमानी का डिनर। दूसरी तरफ डीएमके के मंत्री दीमकों की तरह कागज खाते हैं, रिजर्व बैंक के छापे हुए। भारत की जमीनी-संस्कृति की समझ अगर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को होती तो वे जानते कि शिवलिंग पर कोई फूल चढ़ता है और बाहर बैठे नंदी पर कोई और पत्ती। अगर ऐसी समझ इन नेताओं में होती तो वे ममता बैनर्जी को रोजाना पिन चुभाने वाले अपने नेताओं पर लगाम डालकर रखते, और डीएमके के मंत्रियों के लिए खाने-पीने का कुछ उसी तरह का इंतजाम अलग से कर देते जैसा कि इंदिरा गांधी के समय से चर्चा में रहते आया है। बिना जेल के कैसे तेल की खरीदी के कमीशन से साथियों का मुंह बंद किया जाता है यह सिखाने वाला अभी मनमोहन-सोनिया के आसपास शायद कोई नहीं रहा, और यही वजह रही कि यूपीए सरकार के पूरे हाथ जब रंगे नोटों वाले रंग से पूरी तरह लाल हो चुके थे, तब सरकार को समझ में आया कि इतना भ्रष्टाचार तो मंत्रियों को जेल ले जा सकता है और प्रधानमंत्री पर भी आंच ला सकता है। 
आज केंद्र के गठबंधन की नालायकी के चलते देश में एक पूरी तरह गैरजरूरी चुनाव की चर्चा होने लगी है। हम यह तो नहीं मानते कि चुनाव सामने खड़े ही हैं, लेकिन इतने बड़े देश में ऐसी चर्चा और ऐसे आसार भी कोई अच्छी बात नहीं है। देश को अब यह समझ आ गया है कि निजी सज्जनता का नाम लेकर मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी जैसे लोग देश को चलाने के हक का दावा नहीं कर सकते, उन्हें ऐसा हक नहीं दिया जा सकता।

18 march


नक्सल मोर्चे पर नया खतरा


18 मार्च 12
संपादकीय
उड़ीसा में दो विदेशी पर्यटकों को बंधक बनाने के बाद नक्सलियों ने सरकार के सामने बहुत सी मांगें रखी हैं और उनके लिए आज शाम तक का वक्त दिया है। यह मामला भारत सरकार के लिए कुछ परेशानी खड़ी करने वाला इसलिए होगा क्योंकि ये पर्यटक उसी इटली के रहने वाले हैं जहां के जहाज से भारत के कुछ मछुआरों को पिछले दिनों डकैत समझकर गोली मार दी गई थी, और जहाज कर्मचारियों पर मुकदमा चल ही रहा है। और इस बात को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा कि केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी की पैदाइश इटली की है, इसलिए अगर आज नक्सलियों से बातचीत में भारत सरकार किसी तरह की नरमी को जरूरी या जायज मानते हुए कोई भी रियायत करती है तो सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने का मुद्दा कुछ लोग फिर उठा लेंगे। हालांकि हमारे पास ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि ऐसे किसी मामले में सोनिया गांधी के मायके से कोई फर्क पड़ेगा, लेकिन जनभावनाएं हमेशा तर्कों पर नहीं चलतीं। एक तरफ अभी-अभी इटली के जहाज से भारतीय सीमा के भीतर भारतीयों की हत्याएं हुई हैं, और उनकी गिरफ्तारी के बाद दोनों देशों के बीच कुछ परेशानी की बात तो चल ही रही है, और अब यह मामला हो गया।
पहली नजर में जो जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक उड़ीसा के इस घोर आदिवासी इलाके में विदेशी सैलानियों के आने के खिलाफ वहां पर सक्रिय नक्सली पहले से यह मांग करते आ रहे थे कि वहां इन्हें न आने दिया जाए। लेकिन कंधमाल के उसी इलाके से ये विदेशी सैलानी मिले हैं जो वहां के लोगों की तस्वीरें भी ले रहे थे। हम इसमें मोटे तौर पर कोई बुराई नहीं देखते क्योंकि जो तस्वीरें इनमें से एक सैलानी ने इंटरनेट पर डाली हैं, उसमें किसी तरह की नग्नता नहीं है और कोई आपत्तिजनक बात भी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि नक्सलियों की सक्रियता वाले इलाके में विदेशी सैलानियों को लेकर अगर ऐसी नौबत आती है तो भारत के अधिकांश नक्सली इलाकों में यह खतरा खड़ा हुआ है क्योंकि विदेशी सैलानियों से लेकर विदेशी छात्रों और शोध करने वाले लोगों तक का एक तबका नियमित रूप से ऐसे इलाकों में आकर काम करता ही है। हर कोई सिर्फ उघड़े बदनों की तस्वीरें लेने के लिए ही नहीं आते, लोग आदिवासी समुदाय के अलग-अलग पहलुओं पर शोध कार्य के लिए भी आजादी के पहले से यहां आते रहे हैं। 
इस नए खतरे से हमको एक निराशा यह भी हो रही है कि भारत में सैलानियों का आना इससे एक नए खतरे में पड़ेगा और आदिवासी इलाकों से परे भी दूसरी जगहों पर सैलानी अगर कम जाएंगे तो एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था पर असर आएगा। जहां तक आदिवासी जीवन में सैलानियों की दखल की बात है तो वैसे मामले अलग से सामने आते हैं और उनके खिलाफ सरकार को कड़े कदम उठाने ही चाहिए। अंडमान में मानव-पर्यटन के नाम पर जिस तरह से सैलानियों को लेकर आदिवासियों के बदन दिखाने का काम वीडियो पर कैद हुआ है, उसमें कुसूरवार लोग कैद के लायक हैं। लेकिन ऐसे बाजारू पर्यटन से परे बहुत से विदेशी ऐसे भी होते हैं जो संवेदनशीलता के साथ न सिर्फ आदिवासी इलाकों में बल्कि बहुत से परंपरागत समुदायों में ऐसा महत्वपूर्ण शोध कार्य करते हैं जैसा कि भारत के लोग भी कम करते हैं। लेकिन ये एक अलग बहस का मुद्दा है। आज का असल खतरा नक्सली शिकंजे में किसी भी विदेशी नागरिक का आना है और ऐसे मामलों में भारत के देश-प्रदेश की सरकारें कुछ किस्म के अनचाहे फैसले लेेने पर भी मजबूर हो सकती हैं। नक्सल मोर्चे पर यह एक नए किस्म का तनाव खड़ा हुआ है और इससे एक यह बात भी फिर सामने आती है कि सरकारें कितना भी इंतजाम करके नक्सल-हिंसा का मुकाबला नहीं कर पा रही हैं, और इस मोर्चे पर बातचीत से एक रास्ता निकालने की जरूरत है। विदेशियों के अपहरण से तो आज इस मुद्दे पर चर्चा हम कर रहे हैं, लेकिन हिंदुस्तान के लोग जितनी बड़ी संख्या में नक्सलियों के हाथ मारे जा रहे हैं, वह तस्वीर भी बहुत भयानक है। रोज यह खबर आती है कि किस तरह से निहत्थी जनता नक्सलियों की शिकार होते चल रही है और किस तरह से भारत-विरोधी आतंकियों के साथ नक्सलियों का रिश्ता गहरा होते चल रहा है। यह पूरा हाल केंद्र सरकार और राज्यों को मिलकर सुलझाना होगा, और चाहे यह रास्ता मुश्किल लगे, रास्ता बातचीत से ही निकलेगा।

17 march


17 march


छत्तीसगढ़ के बजट के आगे-पीछे कुछ बातें


17 मार्च 12
संपादकीय
छत्तीसगढ़ का बजट इस वक्त विधानसभा में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह वित्तमंत्री की हैसियत से पढ़ ही रहे हैं, और उसकी तमाम बारीकियों को अभी जानकर उसके बारे में कुछ लिखना हमारी समय-सीमा के भीतर मुमकिन नहीं है। इसलिए इस बजट में पहली नजर में जो टैक्स घटते दिख रहा है और सरकार के अलग-अलग विभागों के बजट जिस तरह बढ़ते दिख रहे हैं, राज्य की अर्थव्यवस्था के इस रूख को देखते हुए हम यहां कुछ बातों को आज लिख रहे हैं। 
अपने दस बरसों के अस्तित्व में यह राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश की सामंती गुलामी से आजाद होकर लगातार तरक्की कर रहा है। यहां का बजट आकार भी दस बरसों में छह गुना से अधिक बढ़ चुका है। इसके साथ-साथ नया राज्य बनने की वजह से बहुत से लोग भोपाल छोड़कर छत्तीसगढ़ आने को तैयार नहीं हुए इसलिए इस राज्य में सरकारी ढांचा शुरू से छोटा रहा और बजट में सरकारी अमले पर होने वाले खर्च का अनुपात भी देश के शायद किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले कम रहा। नतीजा यह हुआ कि सरकार के पास राज्य के ढांचे को विकसित करने के लिए, नई जनकल्याणकारी योजनाओं को शुरू करने के लिए और बाकी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए इतनी सुविधा रही जितनी की देश के बहुत कम राज्यों में है। खनिज से जुड़े उद्योगों के लगातार विस्तार की वजह से इस राज्य को टैक्स से अच्छी कमाई हुई और राशन जैसे इंतजाम में राज्य सरकार ने जब अपनी तरफ से हजार करोड़ की रियायत का हौसला दिखाया, और धान के एक-एक दाने को सरकारी अनुदान के साथ खरीदने में कामयाबी पाई तो सत्तारूढ़ भाजपा दुबारा जीतकर आई। लेकिन जब दुनिया और देश एक खराब अर्थव्यवस्था से गुजर रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ अगर संपन्नता का सुख भोग रहा है, तो इससे राज्य की आदत भी कुछ बिगड़ रही है। जिस तरह अतिसंपन्न परिवारों के बच्चे बिगड़ जाने का खतरा कुछ अधिक होता है, उसी तरह अतिसंपन्न राज्य के भी अपने खतरे होते हैं।
इस राज्य में हम किफायत और कटौती की आदत नहीं देख पा रहे। नई राजधानी को देश की सबसे अच्छी नई राजधानी बनाने की सोच ने वहां पर न सिर्फ बहुत बड़ा खर्च करवाया, बल्कि आगे भी वहां सरकारी कामकाज का ढांचा महंगे खर्च का बन गया है। इसके साथ-साथ राज्य में आज सरकार के अलग-अलग विभागों में और स्थानीय संस्थाओं में भी कम खर्च में, किफायत में काम चलाने की सोच खत्म हो चुकी है। अविभाजित मध्यप्रदेश के दिनों में जब म्युनिसिपलों में महीनों तक तनख्वाह नहीं बंट पाती थी, कर्मचारी हड़ताल पर जाते थे, तब से लेकर अब के छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपलों का हालत एकदम बदल गई है। लेकिन नतीजा यह है कि सफाई का खर्च किसी शहर में असल खर्च से पांच गुना दिखाया जा रहा है तो कहीं पर दस गुना। और ऐसे पैसे को बहुत से लोगों के बीच बंटने की बात म्युनिसिपलों के आसपास के चायठेलों वाले भी जानते हैं। इसी तरह का हाल पिछले बरसों में स्वास्थ्य विभाग का रहा जहां पर सैकड़ों करोड़ के घोटाले कई तरह से सामने आए, और उनमें से कोई भी जुर्म आज किसी कानूनी किनारे तक नहीं पहुंच पाया है। राज्य की राशन व्यवस्था में अभूतपूर्व और अद्वितीय सफलता को अगर छोड़ दें, तो केंद्र सरकार की बहुत सी योजनाओं में गड़बडिय़ों का सिलसिला भी छत्तीसगढ़ में नहीं थमता है। हम अपनी तसल्ली के लिए उत्तरप्रदेश जैसे दूसरे कुछ अधिक भ्रष्ट और बदनाम हो चुके राज्यों की बात नहीं करना चाहते क्योंकि बुरी मिसाल से कोई अच्छे नतीजे नहीं पाए जा सकते। लेकिन छत्तीसगढ़ को केंद्र से मिलने वाली योजनाओं की रकम को एक किफायत के साथ और चोरी-बेईमानी रोकते हुए खर्च करने की आदत डालनी होगी, और यह बात बजट के आंकड़ों में नहीं आ पाती, जनता इसे महसूस ही कर पाती है। सरकारी सेवाओं में छत्तीसगढ़ में आज भी बहुत कमी है, और यहां पर हम फिर कहना चाहेंगे कि हम देश के दूसरे बदहाल राज्यों के साथ इसकी तुलना करके संतुष्ट हो जाने के खिलाफ हैं। छत्तीसगढ़ को अपने ही बीते कल के मुकाबले बेहतर बनकर दिखाना चाहिए और इसके लिए आज के मौके को हम चर्चा के लायक इसलिए पाते हैं क्योंकि जिस काम के लिए बजट में जो रकम दी जा रही है उसका अधिक से अधिक अच्छा इस्तेमाल जब तक नहीं होता तब तक वह रकम सिर्फ एक आंकड़ा होकर रह जाती है। 
अगले चुनाव तक छत्तीसगढ़ को करीब दो बरस बचे हैं। इस बीच देश के सबसे कामयाब मुख्यमंत्रियों में से एक समझे जाने वाले डॉ. रमन सिंह और सबसे काबिल अफसरों में से एक समझे जाने वाले उनके मुख्य सचिव सुनील कुमार मिलकर अगर इस शानदार बजट-आकार का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पाते तो इसे हम सरकार की एक कमजोरी मानेंगे। इस राज्य को संपन्नता की आदत सी पड़ गई है और ऐसे में कमर कसकर काम करना छूट सा गया है। यह तो ठीक है कि कुदरत की मेहरबानी से मिली खदानें अभी सौ-पचास बरस तक और सोना उलगती रहेंगी, लेकिन इस बीच भी सरकार को चोरी रोककर, बेईमानी पकड़कर, पाई-पाई को जनता के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करनी चाहिए। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे अफसरों पर पडऩे वाले छापों में जब आसमान छूती दौलत मिलती है, तो यही साबित होता है कि जनता के हिस्से का पैसा कहां जाता है। यह सिलसिला रोकने की कोशिश करने पर यह राज्य इस विशाल बजट से और भी अच्छा बन सकता है। बजट की बारीकियों पर बात बाद में।


16 march


बजट और उसके आगे-पीछे को समझने के लिए जरूरी सोच


16 मार्च 12
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार 
बजट का बारीक विश्लेषण तो अर्थशास्त्र के अधिक जानकार लोग और समाज के अलग-अलग तबकों के हिमायती लोगों की तरफ से कुछ देर में आना शुरू हो जाएगा, लेकिन हम बजट से जुड़ी हुई कुछ दूसरी बातों पर चर्चा करना चाहते हैं जो कल से मीडिया में शुरू हुई बजट चर्चा में सामने आ रही है। जिन तबकों की मीडिया तक पहुंच है और जिनकी बात आज के बड़े कारोबारी मीडिया के अपने खुद के कारोबार के लिए अधिक मायने रखती है, उन्होंने इस बजट से अपने मलाईदार तबकों के लिए रियायतों की वकालत शुरू कर दी थी और साथ ही में गरीबों के लिए रखी गई रियायत के खिलाफ कहना शुरू कर दिया था। अब जो बजट विश्लेषण आएंगे, उनमें भी एक हिस्सा यह होगा कि गरीबों को दी जाने वाली सरकारी रियायतों को कैसे कम किया जाना चाहिए था। दरअसल गरीब के मुंह में जब रियायती मोटा दाना दिखता है तो मलाईदार तबके के लोगों को खुद के मुंह के बारीक खुशबूदार दाने कंकड़ की तरह लगने लगते हैं। 
टीवी पर जो लंबी-चौड़ी बहस चल रही थी उसमें एक पुराना तर्क बार-बार दुहराया जा रहा था कि इस देश में आयकर कुल तीन फीसदी के आसपास लोगों से आता है, और उन्हीं पर पूरा बोझ पड़ता है। तनख्वाह पर जीने वाले बहुत से लोगों को इस बात का मलाल होता है कि चेक से मिलने वाली तनख्वाह पर तो टैक्स कटकर ही मिलता है और उसमें कुछ छुपाने की, या बचाने की सहूलियत नहीं होती। गरीबों को मिलने वाले रियायती अनाज, या उनकी जिंदगी के लिए जरूरी रोजगार को लेकर अक्सर सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को कोसा जाता है कि ये रियायतें अधिकतर तो सरकारी अमले और जुड़े हुए कारोबारियों की जेब में चली जाती हैं, लेकिन इस बात की चर्चा नहीं होती कि गरीबी के रेखा के नीचे के लोगों को जिंदा रहने के लिए दी जाने वाली यह रियायत बीच में खा जाने वाले लोगों में से इस कमजोर तबके के तो कोई भी नहीं होते। इसलिए लार टपकाते चोर गैरगरीब तबके के जुर्म की सजा गरीबों को दिया जाना कैसे इंसाफ कहा जा सकेगा? और रियायतों को गरीबों तक पहुंचाने के लिए किसी परमाणु-फार्मूले की जरूरत नहीं होती, उसके लिए एक ईमानदार नीयत और मेहनत काफी होती है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मुख्यमंत्री के कमर कस लेने भर से अगर रियायत राशन में चोरी को लगभग पूरी तरह खत्म कर दिया है, तो ऐसी कौन सी वजह है कि इस राज्य में केंद्र और राज्य की दूसरी योजनाओं को इसी तरह चोरी-प्रूफ न बनाया जा सके, या देश के दूसरे राज्यों में राशन के इंतजाम को ऐसा कामयाब न बनाया जा सके?
अभी जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त बजट आते दिख रहा है और इसमें संपन्न तबके पर कुछ बोझ पड़ते भी दिख रहा है। ऐसे में फिर यह बहस शुरू हो जाएगी कि केंद्र सरकार जनकल्याण के नाम पर गरीबों के भलाई की ऐसी योजनाएं क्यों शुरू करती है और इनका बोझ गैरगरीबों पर क्यों डाला जा रहा है? इसी तर्क का जवाब हम यहां देना चाहते हैं। संपन्न तबका अपने घर से संपन्नता लेकर नहीं आया है। अभी कुछ हजार साल पहले की ही बात है जब गरीब और अमीर का इस तरह का फर्क नहीं था और लोग बराबरी से गुफाओं में या दूसरी जगहों पर रहते थे। वहां से लेकर आज के बड़े-बड़े कारखानों की बड़ी-बड़ी चिमनियों तक का जो सफर है, वह इस धरती के ही साधनों को इस्तेमाल करके तय हुआ है। और इस धरती पर हर किसी का बराबरी का हक था, और है। कुछ लोगों ने कुछ हजार साल पहले खेती की जमीन कुछ अधिक घेरी होगी, कुछ ने दूसरों को गुलाम बनाकर उनसे मुफ्त में काम करवाया होगा, कुछ ने एक जाति व्यवस्था कायम करके कुछ लोगों के आगे बढऩे के हक को छीना होगा और अपने कुनबों को आगे बढ़ाया होगा। यह तो हम हजारों बरस पहले की बात कर रहे हैं, हाल के पचीस-पचास बरसों को अगर देखें तो लोकतंत्र, अदालत, संसद, सरकार और एक सक्रिय समाज के रहते हुए भी अभी इस पल तक भारत जैसे देश में यह एक सबसे बड़ा मुद्दा है कि धरती के साधनों को किस तरह एक चुनिंदा तबका दुह रहा है। और जिस तरह आज की बड़ी मशीनी डेयरियों में गाय के थन से मशीन लगाकर दूध दुहा जाता है, उसी तरह धरती से लहू निकल जाने तक उसे एक ताकतवर तबका दुह रहा है। भारत के बजट में और बजट से परे के भी सरकारी कार्यक्रमों में जब गरीबों को रियायत दी जाती है तो वह इस धरती पर हर इंसान के एक हक का बंटवारा होता है, न कि किसी अमीर की जेब काटकर गरीब को दान दिया जाता है। जो लोग भी यह सोचते हैं कि उनकी मेहनत की कमाई बिना मेहनत वाले गरीबों तक बांटी जाती है, उन लोगों को यह अहसास नहीं है कि यह धरती उनकी खानदानी जागीर नहीं है।
बाजार-व्यवस्था को बढ़ावा देने वाला ताकतवर मीडिया इस पल अपने दर्जनों टीवी चैनलों से संपन्न तबके में महंगाई की दहशत फैलाने में जुट गया है। लेकिन कार, फ्रिज, टीवी जैसी चीजों को महंगे होने से फर्क भी तो उसी तीन फीसदी के आसपास के आयकरदाता तबके पर पड़ेगा जो कि गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों के मुकाबले बहुत-बहुत अधिक संपन्न है। हम अभी आज के बजट के असर से पडऩे वाले फर्क का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, सिर्फ एक सोच की बात कर रहे हैं। इस देश में अगर आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और आयकर देने लायक कमाई वाली आबादी सबसे ऊपर के तीन फीसदी में है, तो क्या आधी आबादी को भूख से उपजी हिंसा की बेबसी तक धकेलना एक समझदारी होगी? भूखे पेटों से मिलने वाली आखिरी ताकत पत्थर उठाने के काम आती है, ताकि किसी कांच को तोड़कर भीतर से बे्रड या केक, कुछ भी निकाला जा सके। जब ऐसे पत्थर चलेंगे तो वे सिर्फ कांच को ही निशाना बनाएंगे ऐसा तय नहीं है। इसलिए अमीरी और गरीबी के बीच के फासले को पथराव के पत्थरों से पटे हुए मैदान की तरह नहीं बनने देना चाहिए। यह फासला किसी रहम के साथ कम करने की जरूरत नहीं है, इस फासले का कम होना गरीबों का एक जायज हक है, और इसकी इज्जत न करके ताकतवर तबका अपने लिए दिक्कतें ही खड़ी करेगा। सबसे संपन्न तीन लोगों के इर्दगिर्द जब पचास भूखों का घेरा होगा तो वे कितनी चैन से सो सकेंगे? आज के बजट को और सरकारी जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को इस सोच के साथ देखने की जरूरत है।