कहीं मुर्दों से,कहीं जिंदों से,फर्क क्या?


30 अप्रैल 2012
अरब दुनिया से आई हुई कुछ खबरों में कहा गया है कि इजिप्ट में एक ऐसी तैयारी चल रही है जिसके बाद वहां के मर्दों को अपनी बीवी के मर जाने के छह घंटों बाद तक सेक्स कर सकता है। वहां की संसद तक ऐसे प्रस्ताव के जाने की चर्चा हुई तो वहां के महिला संगठन और मीडिया के लोग उबल पड़े। हालांकि सरकार ऐसी किसी तैयारी से इंकार भी कर रही है लेकिन इस्लाम से जुड़े हुए कुछ धर्म गुरूओं ने खुलकर ऐसी बात की वकालत की है।
यह बात मेरे ध्यान में एकदम से नहीं आई होती अगर तस्लीमा नसरीन ने इस खबर पर उबलते हुए नाराजगी जाहिर न की होती। उनके भेजे एक संदेश से इसके बारे में पता लगा, लेकिन उनका नजरिया इस मामले में कुछ अलग था। उन्होंने यह कहा कि देखो जिन मर्दों को जिंदा औरतों से बलात्कार पर कोई फिक्र नहीं होती वे लोग मुर्दा औरत से बलात्कार पर फिक्र जाहिर कर रहे हैं। धर्मांधता के खिलाफ और औरतों के हक की तरफदारी में गाली-गलौच की जुबान लिखने वाली तस्लीमा का यह नजरिया अपनी जगह ठीक है कि जिन्हें जिंदा की फिक्र नहीं वे मुर्दा की बात कर रहे हैं, लेकिन ये दोनों ही बातें एक ही ऐसी सोच से उपजी हुई हैं जिसके लिए औरत पांव की जूती की तरह रखी जाती हैं और जिसे एक मुसलमान तीन एसएमएस भेजकर तलाक दे सकता है, जिसे तुलसीदास ढोल की तरह पीट सकता है। जिसे हिंदू सती बना सकता है और जिसे ईसाई दुनिया अपने अजन्मे बच्चे के गर्भपात का हक देना नहीं चाहती। 
यह कैसी अजीब बात है कि दुनिया में संगठित शहरी धर्मों में ऐसी ज्यादतियां होती हैं जो कि आधुनिक सभ्यता के साथ बढऩे वाले धर्म हैं। दूसरी तरफ जो प्राचीन असंगठित आदिवासी समाज है उसके धर्म की धारणा, उसके सामाजिक रीति-रिवाज अधिक न्यायपूर्ण है और अधिक समानता वाले हैं। आदिवासी महिला को किसी भी शहरी महिला के मुकाबले एक बेहतर दर्जा मिलता है और तकरीबन बराबरी के हक मिलते हैं। बहुत से ऐसे आदिवासी समाज हैं जो कि मातृसत्तात्मक हैं और जहां पर आदमी को अपनी बीवी के घर रहकर काम करना पड़ता है। इसका क्या मतलब निकलता है? यही कि सारी आधुनिक और सारी शिक्षा में एक ऐसे धर्म को बनाया, बढ़ाया, और अपने ऊपर लाद लिया जिसमें उसने औरत के हक छीनने का पुख्ता इंतजाम कर लिया। सामाजिक स्तर पर अगर देखें तो आज पंजाब में, जहां पर कि सिखों की अधिक आबादी है, वहां पर अजन्मी कन्याओं के गर्भपात के चलते लड़के-लड़कियों का अनुपात इस कदर बिगड़ गया है कि वहां लड़कों को दुल्हनें नसीब नहीं हो रहीं। 
इसलिए जब इजिप्ट की यह खबर आई तो यह बात तकलीफदेह तो लगी, मन नफरत से भर गया, लेकिन कोई सदमा नहीं लगा। हम एक इस्लामिक और मुस्लिम देश को ही क्यों कोसें, हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के लिए सरकार का रूख यह है कि पुलिस का मुखिया कहता है कि आठ बजे के पहले कामकाजी अकेली महिलाएं घर चली जाएं क्योंकि वहां बलात्कार की बहुत घटनाएं हो रही हैं। दिल्ली की पुलिस से लेकर कर्नाटक के मंत्री तक बहुत से लोग बलात्कार के जुर्म के लिए महिलाओं को जिम्मेदार ठहराते हैं क्योंकि उनका मानना है कि महिलाएं उत्तेजक और भड़काऊ कपड़े पहनती हैं तो ऐसे हादसे होते हैं। दिल्ली के आसपास का एक इलाका ऐसा हो गया है जो कि बलात्कार के लिए समंदर के उस बरमूड़ा त्रिकोण जैसा हो गया है जहां बहुत से जहाज डूब जाते हैं। 
इसलिए न तो मुसलमानों के भीतर महिलाओं की बदहाली को उनके मजहब का मामला मानकर छोडऩे की जरूरत है और न ही अकेले मुस्लिम समाज को महिला-विरोधी करार देकर कोसने की जरूरत है। भारत में लड़के-लड़कियों के अनुपात के आंकड़े साबित करते हैं कि मुसलमानों के भीतर कन्या भू्रण हत्या के मामले हिंदुओं के मुकाबले बहुत कम हैं। इसलिए हिंदुओं में शाहबानो को तलाक के पहले, शादी के पहले, जन्म के भी पहले निपटा दिया जाता है।
लौटकर फिर एक मुर्दे से बलात्कार की बात करें तो यह लगता है कि लोग जीते-जी जिस जिंदा को मुर्दा मानकर चलते हैं, सेक्स के मजे के लिए उस मुर्दे को भी छह घंटे जिंदा मानने का कानून चर्चा में है! ऐसा लगता है कि मर्द के ऐसे हक की वकालत करने वाले मुस्लिम धर्मगुरू ने चिकित्सा विज्ञान के जानकार लोगों से राय लेकर ही यह मांग उठाई है क्योंकि छह घंटे के बाद तो मुर्दा अकडऩे भी लगता है। इसलिए एक औरत की लाश के साथ भी मजा करने की मर्द की चाह को बस उतना ही समय मिल सकता है। 
कोई भी देश हो, जाति हो या धर्म हो, अब ऐसा वक्त आ चुका है कि महिलाओं के हक के लिए एक बहुत आक्रामक तरीके से सड़क से संसद तक लडऩा होगा। एक औरत को राष्ट्रपति बनाने के बाद सोनिया गांधी सरकार और सुषमा स्वराज वाला विपक्ष, हर कोई महिला आरक्षण विधेयक पर सो गए दिखते हैं। लोकपाल विधेयक इस तरह अंधड़ जैसे खबरों में आ गया, संसद में छा गया कि मानो इससे औरत-मर्द की समानता भी तय हो जाएगी। दूसरी तरफ हम बहुत बार यह बात लिख चुके हैं कि किस तरह लोकपाल की मसौदा कमेटी में दोनों पक्षों की तरफ से रखे गए दस लोगों में से एक भी औरत को जगह नहीं दी गई। 
अभी संसद में रेखा के आने के बाद जो नया लतीफा चारों तरफ फैला है वह यह है-रेखा, हेमा, जया और सुषमा, सबकी पसंद निरमा।
अब जरा याद कर लें कि इन चारों के अलावा सोनिया, मायावती, ममता, जयललिता में से और भी कौन ऐसा है जिसने पिछले कई महीनों में या बरसों में महिला आरक्षण का नाम भी लिया हो? आज अगर कोई गूगल पर भारत के महिला आरक्षण को ढूंढे तो भी शायद शुरू के कई हजार नतीजों में से कोई भी इन महिलाओं के नाम के साथ नहीं मिलेगा। और इनमें से किसी भी महिला का सिर्फ नाम अगर ढूंढा जाए तो पिछले एक हफ्ते में ही इनके लाखों नतीजे हर एक के निकल आएंगे।
इस राजनीतिक बेईमानी को क्या महिला, एक आम महिला, आम महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं माना जाए? 

नक्सल-वार्ता के कुछ पहलू


30 अप्रैल 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के अगवा कलेक्टर की रिहाई के लिए नक्सलियों और राज्य सरकार के बीच चल रही बातचीत पर छत्तीसगढ़ की मीडिया और लोगों के बीच कुछ बेचैनी है। आज सुबह से अचानक यह चर्चा शुरू हुई कि बातचीत असफल हो गई है। जब तक इस अफसर के नक्सल-कब्जे में ठीक-ठाक रहने की खबर आती है तब तक बातचीत को असफल नहीं कहा जा सकता। और हमने अभी-अभी इसी बस्तर जिले से लगे हुए उड़ीसा में देखा है कि किस तरह एक विधायक की रिहाई बातचीत के एक महीने से अधिक हो जाने के बाद हुई है। इसलिए मीडिया और जनता दोनों को यह समझना होगा कि उग्रवादियों और आतंकियों से रिहाई की कोशिशें हर घंटे या हर दिन सफल और असफल के पैमाने पर नापना ठीक नहीं होता क्योंकि ऐसी बातचीत की कामयाबी या नाकामयाबी रिहाई से अलग भी कई तरह से होती है। दो पक्षों के बीच बातचीत ऐसी जमीन बनना भी कोई छोटी बात नहीं है और ऐसे अप्रिय अनुभव से भी सरकार को रिहाई की बातचीत की रणनीति तो सीखने-समझने मिल रही है, उसे शायद पहली बार नक्सलियों के पक्ष को औपचारिक रूप से अपने टेबिल पर देखने का मौका भी मिल रहा है। अभी तक नक्सलियों की जो मांगें सामने आ रही हैं उनको अगर देखें तो सरकार को यह मौका भी मिल रहा है कि वह अपनी पिछले बरसों की कार्रवाई का विश्लेषण कर सके और यह देख सके कि क्या किसी स्तर पर सुरक्षा एजेंसियों से कोई ज्यादतियां भी हुई हैं।
यह बातचीत न तो बहुत आसान है और न ही इसके आसान होने की उम्मीद कोई समझदार कर सकता था। एक कलेक्टर की जिंदगी जब दांव पर लगी हुई है, तब नक्सलियों से ऐसी बातचीत छत्तीसगढ़ का पहला ही अनुभव है। इस राज्य में वैसे तो शहरी लोगों की भावनाएं नक्सल इलाकों में मारे जाने वाले बेकसूर लोगों के बारे में साल-छह महीने में एक बार की मोमबत्ती-रैली तक सीमित है और उसके बाद बाकी वक्त शहरी-संपन्न जनता नक्सल खबरों को भीतर के पन्नों के लायक ही मानती है। और ये खबरें मौत के आंकड़ों तक सीमित रहने की उम्मीद वे लोग करते हैं जो नक्सल इलाकों से दूर अपने घरों में महफूज बैठे हैं। ऐसे में राज्य सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी  के सामने राज्य का प्रमुख विपक्षी दल कई तरह के सवाल भी खड़े कर रहा है। जैसा कि अपहरण से रिहाई के बीच किसी भी देश-प्रदेश में सरकार एक सिर्फ शिकस्त की नौबत में रहती है, छत्तीसगढ़ में भी कमोबेश वही हाल है। अगर अपने अफसर को  बचाने के लिए और जल्दी छुड़ाने के लिए राज्य सरकार तेजी से नक्सल मांगों को मान लेती है और दर्जनों या सैकड़ों नक्सलियों को रिहा कर देती है तो राज्य के सुरक्षा अधिकारियों और कर्मचारियों का हौसला पस्त होगा। दूसरी तरफ अगर कलेक्टर के साथ किसी तरह की अनहोनी होती है तो सरकार पर यह आंच आएगी कि औने-पौने संदिग्ध नक्सलियों को जेल में रखने की जिद में उसने एक अफसर की जान चली जाने दी। ऐसी नौबत में बातचीत एक बहुत ही हुनर का काम होती है और हमारी शुभकामनाएं हैं कि राज्य सरकार के चुने हुए वार्ताकार ऐसे हुनरमंद हों।
हम कुछ दिन पहले ही इस मुद्दे पर कुछ बातें लिख चुके हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में इस पर सनसनी इतनी है, और आगे छत्तीसगढ़ में इस तरह के खतरे की गुंजाइश इतनी अधिक है कि इस मुद्दे पर दुबारा लिखना भी जगह की बर्बादी नहीं है। राज्य सरकार को अपहरण के ऐसे मामलों में रिहाई के लिए आतंकी और उग्रवादी मांगों को लेकर अपनी एक नीति बनानी चाहिए। अगर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग  फैसले हर बार लिए जाएंगे तो एक नौबत ऐसी आएगी जब एक छोटे कर्मचारी की जान शायद चली जाए और सरकार पर यह तोहमत आए कि बड़े अफसर को बचाने के लिए उसने सबकुछ किया और किसी छोटे कर्मचारी को मर जाने दिया। झारखंड में कुछ महीने पहले ही ऐसी एक घटना नक्सल मोर्चे पर हुई थी। इसलिए राज्य सरकार को एक पारदर्शी और पूर्व घोषित नीति बनानी चाहिए ताकि उस पर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, अपने-पराए जैसे भेदभाव का आरोप न लगे।
हम अभी चल रही बातचीत को एक बहुत ही अच्छी नौबत मानते हैं और न सिर्फ सरकार को, बल्कि नक्सलियों को भी इस मौके पर जनहित में एक समझदारी दिखानी चाहिए और गरीब आदिवासियों की भलाई के मुद्दों पर सहमति के किनारे तक पहुंचना चाहिए। आज इस बातचीत से बाहर बैठी हुई कांगे्रस पार्टी को भी चाहिए कि वह छोटी-छोटी बातों पर राजनीति न करे और अमनचैन के लिए एक सैद्धांतिक तरीका अपनाए। दुनिया के तमाम समझदार देशों में आतंक से निपटने के लिए, किसी हमले के मौके पर दलीय राजनीति को अलग रखकर एक व्यापक जनहित से काम करना चाहिए।

29 april


गुफा की तरफ वापिसी?


29 अप्रैल 2012
संपादकीय
एक तरफ जब यूपीए सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि किस तरह आपसी सहमति से यौन संबंध बनाने की न्यूनतम उम्र सोलह बरस से बढ़ाकर अठारह बरस कर दी जाए तब दिल्ली की एक अदालत ने सांसदों से यह कहा है कि सामाजिक बदलाव को देखते हुए यौन संबंधों की उम्र के कानून पर विचार करना चाहिए क्योंकि आपसी सहमति वाले पे्रमी-पे्रमिकाओं से असहमत परिवार भी कानून की उम्रसीमा का इस्तेमाल करके पे्रम और सहमति को अपहरण और जबरदस्ती साबित करने लगते हैं।
दिल्ली की इस अदालत की महिला जज की यह राय तो आज देखने मिली लेकिन पिछले दो-तीन दिनों से जब से सहमति की न्यूनतम उम्र बढ़ाने की खबर आ रही थी, हम उससे असहमत थे। आज भारत जैसे देश में भी लड़के-लड़कियों की, सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक परिवक्वता कम उम्र में आ रही है। बच्चों के मां-बाप बनने की क्षमता अब तेरह बरस की उम्र में हो जा रही है और इस दकियानूसी समाज में ऐसे बच्चे किसी सेक्स-शिक्षा के बिना सिर्फ पोर्नोग्राफी के सहारे वयस्क बातों को समझते हैं। ऐसे में न तो शरीर की जरूरतों को और न ही भावनाओं को बहुत जिम्मेदारी के साथ समझना हो पाता है। लेकिन एक दूसरी बात यह है कि ऐसा लड़के और लड़कियों, दोनों के साथ होता है। वे परिपक्व हो जाते हैं, लेकिन उतनी जिम्मेदारी उनकी रोज की जिंदगी में कई बार नहीं रहती जितनी कि एक पीढ़ी पहले के मां-बाप उसने उम्मीद करते हैं। ऐसे में पे्रम-प्रसंग में आमतौर पर कानून का लड़के के खिलाफ इस्तेमाल होता है और सहमति से भी घर से दूर चले जाने पर अपहरण और आमतौर पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए लड़के को बंद कर दिया जाता है और लड़की को मां-बाप के हवाले कर दिया जाता है जिनसे कि वे अपने पे्रम को लेकर असहमत भी रहती है। भारत में आमतौर पर पे्रम के खिलाफ इतना बागी माहौल रहता है कि कोई लड़की खुलकर अपनी पसंद अपने मां-बाप से कह सके ऐसा बहुत ही छोटे फीसदी परिवारों में हो पाता है।
ऐसे में जब आपसी सहमति से देहसंबंध बनाने की उम्र सोलह से बढ़ाकर अठारह करने की बात हो रही है तो बलात्कार और अपहरण के आरोपों के लिए दो बरस और बढ़ जाएंगे। जब तक किसी ताकत के इस्तेमाल से जबरदस्ती न हो तब तक आपसी सहमति से सोलह बरस की उम्र में हुए संबंधों में किसी एक साथी को कुसूरवार ठहराना ठीक नहीं लगता। आज तो जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय एकता के लिए अंतरजातीय और अंतरधर्मीय शादियों को बढ़ावा देना चाहिए और इसके लिए पे्रम-संबंधों को एक कानूनी सुरक्षा भी देनी होगी। समाज तो अपनी जाति और धर्म व्यवस्था को कायम रखने के लिए हर किसी किस्म की मोहब्बत पर उसी किस्म की ज्यादती करते रहेगा जिस किस्म की ज्यादती सलीम और अनारकली पर हुई थी, लेकिन कानून को लोगों को हिफाजत देनी होगी। आज अठारह बरस की उम्र में भारत के लोग अपनी सरकार चुनते हैं, लेकिन वे अपना पे्रम-साथी या जीवन-साथी नहीं चुन सकते। यह सिलसिला पूरी नौजवान पीढ़ी को कई किस्म के मानसिक तनाव और कुंठाओं का शिकार बनाकर रख देता है और आज के माहौल में जो सांस्कृतिक उदाहरण दूसरे उदार और विकसित देशों से भारत तक पहुंचते हैं वे भारत के नौजवानों को अपनी मर्जी और पे्रम का रास्ता भी दिखाते हैं। अब अठारहवीं सदी की बातों से चिपककर जीने वाला भारतीय पाखंड इस देश को एक उत्साह से भरी नौजवान पीढ़ी नहीं दे पाएगा। हमारा बहुत साफ मानना है कि हर पीढ़ी को उसके वक्त के मुताबिक काफी कुछ आजादी देने की जरूरत है।
जब भारत का सुप्रीम कोर्ट यह तय कर चुका है कि वयस्क लड़के-लड़कियां अगर साथ रहते हैं तो उसमें कोई बात अनैतिक नहीं है और शादी करना कहीं जरूरी नहीं है, तब भी इस देश की पुलिस हर राज्य में किसी होटल में ठहरे हुए लड़के-लड़कियों को परेशान करने या उनसे उगाही करने में लगी रहती है और इसके लिए वेश्यावृत्ति को रोकने के लिए बने एक कानून का बेजा इस्तेमाल करती है। तो एक तरफ मां-बाप अपहरण और बलात्कार के कानून का बेजा इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ पुलिस इस तरह के कानून का। भारत के आज के समाज में हमउम्र लड़के-लड़कियों के बीच सोलह बरस की उम्र के बाद आपसी सहमति से, बिना जबरदस्ती बने देह-संबंधों को गलत करार देने वाला कानून बहुत ही गलत है। और अब जो चर्चा है वह इसे बढ़ाकर अठारह बरस तक ले जाने की है जिससे कि लड़कियों के मां-बाप तरे एकबारगी खुश हो सकते हैं लेकिन यह फैसला दकियानूसी होगा और नौजवान पीढ़ी की मानसिक सेहत के खिलाफ होगा। इस पर समाज के खुले दिमाग के लोगों को आज चर्चा करनी होगी वरना गुफा की तरफ वापिसी वाला यह कानून समाज का नुकसान करेगा।

28 april


28 april


स्टिंग ऑपरेशन के बहुत से पहलुओं पर एक छोटी चर्चा


28 अप्रैल 2012
संपादकीय 
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए बंगारू लक्ष्मण ने जिस तरह रिश्वत ली थी, उसके बारह बरस बाद अब सीबीआई कोर्ट ने उन्हें कुसूरवार ठहराते हुए 4 साल की कैद की सजा सुनाई। भाजपा के लिए यही एक बात राहत की थी, और है कि उसने इस स्टिंग ऑपरेशन के मीडिया में आने के तुरंत बाद अपने इस अध्यक्ष को पद से हटा दिया था। और उसके पास गिनाने को यह मिसाल हो सकती है कि कांगे्रस के लोग सारे स्टिंग ऑपरेशनों के बाद भी अदालती फैसलों तक पद पर जमे रहने पर अड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि बारह बरस पहले जब तहलका ने बंगारू लक्ष्मण सहित अटल सरकार के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज और उनकी घरेलू संगिनी, महिला मित्र जया जेटली के रक्षा मंत्री के सरकारी बंगले पर ही दलालों से सौदेबाजी के मामलों में हुए स्टिंग ऑपरेशन के बाद जॉर्ज का सरकार से और जया का पार्टी पद से इस्तीफा हुआ था। 
पिछले एक दशक में भारत में बहुत से नेताओं को स्टिंग ऑपरेशनों के रास्ते सत्ता से बाहर जाते देखा है और अब तक यह बहस जारी ही है कि पत्रकारिता में स्टिंग ऑपरेशन कितने नैतिक हैं, और कितने अनैतिक। इनका कितना इस्तेमाल किया जाना चाहिए और कितना नहीं। आज इस मुद्दे पर लिखने की एक और वजह है कि पिछले कुछ हफ्तों से थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह के दफ्तर में  उनसे बात करने वाले फौज के एक और रिटायर्ड आला अफसर पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने थलसेनाध्यक्ष को उनके दफ्तर में ही रिश्वत का प्रस्ताव रखा था। और अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि उस बातचीत की रिकॉर्डिंग सीबीआई को दी जा रही है। आरोपों के घेरे में जो रिटायर्ड अफसर है उसने यह सवाल उठाया है कि कोई सरकारी अफसर अपने दफ्तर में हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग कैसे कर सकता है? 
ये दो मामले एक-दूसरे से कुछ अलग भी हैं, और इनका एक पहलू इनको एक जैसा भी बनाता है। अंगे्रजों के समय से चले आ रहे टेलीफोन के उस कानून का अब कोई मतलब नहीं रह गया है जिसके तहत फोन पर बातचीत को बिना बताए रिकॉर्ड करना लोगों के लिए जुर्म है, और सरकारी की कुछ एजेंसियों को इसके लिए अलग से इजाजत मिलने का इंतजाम है। टेक्नालॉजी ने अब जिन कानून को बेमायने बना दिया है उनमें टेलीफोन की रिकॉर्डिंग का कानून भी है, तब जबकि लोग अपने खुद के फोन पर की जा रही बातचीत को रिकॉर्ड करते हैं। अब यह मानकर चलना चाहिए कि अपने फोन से अपनी की हुई या पाई हुई किसी कॉल को रिकॉर्ड करना हर किसी का हक है और ऐसे फोन कॉल पर दूसरे सिरे पर जो हैं, उनको अपनी फिक्र खुद करनी चाहिए। दूसरी बात यह कि अपने दफ्तर में कोई किसी से कोई बात करते हुए उसकी रिकॉर्डिंग करते हैं, तो यह शायद शिष्टाचार के तौर-तरीकों के खिलाफ हो, इसमें हम न कुछ गैरकानूनी देखते और न ही अनैतिक। ऐसा करने से गलत कामों के बारे में बहुत किस्म की बातें होना ही खत्म हो जाएंगी। एक वक्त शायद ऐसा भी आ सकता है जब केरल के मुख्यमंत्री की तरह बहुत से नेता और अफसर अपने दफ्तर को लगातार इंटरनेट पर दिखाते रहेंगे, और उसमें भी हमें कुछ अटपटा नहीं लगेगा। लेकिन ये सारी बातें सरकारी और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के अपने खुद के बारे में हैं कि वे क्या-क्या कर सकते हैं जिससे कि सार्वजनिक जीवन में एक पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे।
लेकिन दूसरा सवाल यह है कि पत्रकारिता के काम में स्टिंग ऑपरेशनों की कैसी और कितनी मान्यता होनी चाहिए। यह मुद्दा अभी वक्त और टेक्नालॉजी पर तैर रहा है, लेकिन आज तक की अपनी समझ और सोच के आधार पर हम यह कहना चाहेंगे कि स्टिंग ऑपरेशन अगर किसी कानून को तोडऩे के लिए किए जा रहे किसी काम का भांडाफोड़ करते हैं, तो उसे सही मानना चाहिए, चाहे वे कुछ गलत तरीकों को इस्तेमाल करके ही क्यों न किए गए हों। दूसरी तरफ बहुत से स्टिंग ऑपरेशन ऐसे भी होते हैं जिनमें किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी के ऐसे मौकों को कैद कर लिया जाता है जो कि उनके लिए शर्मिंदगी पैदा करते हैं। ऐसे मामलों में हमारा सोचना है कि अगर ऐसे निजी पल किसी कानून को तोडऩे, सत्ता की ताकत का बेजा इस्तेमाल करने जैसी बातों वाले भी हैं, तो उस रिकॉर्डिंग के सार्वजनिक इस्तेमाल का एक तर्क बनता है। अभिषेक मनु सिंघवी के ताजा मामले में हमने यही लिखा कि अगर उनकी इस रिकॉर्डिंग में कोई ऐसी बात भी है कि वे देहसुख के एवज में किसी से ऐसा फायदा दिलवाने का वायदा कर रहे हैं जो कि उनके सरकारी या संसदीय ओहदे के इस्तेमाल से मुमकिन है, तो वे ऐसे निजी पलों के स्टिंग ऑपरेशन के लिए भी देश और कानून के प्रति जवाबदेह हैं। लेकिन अगर किसी की निजी जिंदगी का किसी कानून को तोडऩे या पद के बेजा इस्तेमाल से कुछ लेना-देना नहीं है तो उसे हम स्टिंग ऑपरेशन के लायक नहीं मानते, और अगर ऐसा स्टिंग ऑपरेशन हुआ भी है तो भी हम उसे मीडिया के इस्तेमाल का नहीं मानते। 
कुछ बातें इन दोनों के बीच की हैं। जैसे नारायण दत्त तिवारी ने आंध्र का राज्यपाल रहते हुए वहां के बिस्तर का जिस तरह का असामाजिक और अनैतिक इस्तेमाल नियमित रूप से किया और जिस तरह से वे स्टिंग ऑपरेशन में कैद हुए, उसे हम सार्वजनिक महत्व का इसलिए मानते हैं कि वह एक मनोनीत पद के साथ जुड़ी हुई इस तरह की सहूलियत का राजभवन था जिसमें रहने वाले से कुछ सार्वजनिक मूल्यों को भी मानने की उम्मीद की जाती है। अपने निजी बंगले में रहने वाला कोई इंसान शराब पीकर वहां के आंगन में दौड़-भाग कर सकता है, लेकिन ऐसा हंगामा किसी बड़े पद पर बैठा हुआ व्यक्ति किसी सरकारी बंगले में करे तो उसे ठीक नहीं माना जाएगा। इसलिए कुछ बातें गैरकानूनी न होते हुए भी नाजायज होती हैं और सार्वजनिक जीवन में उनका ख्याल रखना चाहिए। निजी और सार्वजनिक, सरकारी और गैरसरकारी, नैतिक और कानूनी, जैसे अलग-अलग पहलू स्टिंग ऑपरेशनों के साथ जुड़े हुए हैं और स्टिंग ऑपरेशनों से सामने आने वाले हर मामले को बारीकी से परखने की जरूरत है। दूसरी बात यह भी है कि स्टिंग ऑपरेशन करना एक बात है, और उसका सार्वजनिक इस्तेमाल करना एक दूसरी बात। किसी गैरकानूनी बात को कैद करने की उम्मीद में भी एक स्टिंग ऑपरेशन हो सकता है जो कि अंत में जाकर यह साबित करे कि इसमें किसी कानून को तोडऩा कैद नहीं हुआ है। वहां पर आकर मीडिया का यह तय करना शुरू होता है कि ऐसे स्टिंग ऑपरेशन का इस्तेमाल किया जाए या नहीं।
आखिर में हम यह भी कहना चाहेंगे कि कुछ स्टिंग ऑपरेशन ऐसे भी सामने आते हैं जिनमें किसी व्यक्ति को बहुत बुरी तरह लालच में घेरकर उससे गलत काम करवाने की बात मंजूर करवाई जाती है। हम बिना किसी आधार के एक साजिश के तहत लालच देकर किसी को कमजोर करने और फिर उसे कैद करके कुसूरवार ठहराने के भी खिलाफ हैं। स्टिंग ऑपरेशन किसी को भ्रष्ट करके फिर उसे भ्रष्ट साबित करने वाले नहीं होने चाहिए।

27 april


26 april


लतीफों से परे सचिन और रेखा


27 अप्रैल 2012
संपादकीय
राज्यसभा में सचिन तेंदुलकर को मनोनीत करने का यूपीए सरकार का फैसला रेखा और जया के लतीफों में डूबकर रह गया। लेकिन कुछ लोगों ने यह सवाल जरूर उठाया कि सचिन तेंदुलकर का सम्मान किया जाना तो ठीक है, उन्हें राज्यसभा में क्यों भेजा जा रहा है। इस मामले को देखने के दो नजरिए हो सकते हैं। एक तरफ जब झारखंड में राज्यसभा चुनाव को अरबपति करोड़ों खर्च करके इस तरह खरीद रहे हैं कि देश में पहली बार चुनाव आयोग ने राज्यसभा चुनावों को वहां पर रद्द कर दिया। तब दूसरी तरफ देश के सबसे लोकप्रिय खिलाड़ी, और अब तक विवादहीन भी रहे हुए सचिन तेंदुलकर का राज्यसभा जाने का हक एक खिलाड़ी की हैसियत से तो बनता है और इसके पहले भी देश की इस उच्च संसद में खिलाड़ी मनोनीत हुए हैं। अब सवाल यह है कि कोई चित्रकार, कोई संगीतकार, कोई गीतकार और कोई गायक या खिलाड़ी जब राज्यसभा में जाते हैं, और ये राज्यसभा में प्रतिभावान लोगों के लिए रखी गई अलग सीटों पर जाते हैं तो क्या उसका देश की संसद को कोई फायदा होता है या फिर वे एक सम्मान देने के लिए इस सदन में भेज दिए जाते हैं? हम बहस के लिए यह भी मान लेते हैं कि सचिन तेंदुलकर राज्यसभा की चर्चा में हो सकता है कि कुछ अधिक जोड़ नहीं पाएं और हो सकता है कि वे मकबूल फिदा हुसैन की तरह वहां पर चित्र बनाने जैसे किसी काम को करते बैठे रहें, लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्यसभा में सारे ऐसे ही लोग भेजे जाते हैं जो कि वहां कि बहस में कुछ जोड़ते हों? हमने इसी सदन में समाजवादी मुलायम सिंह यादव के भेजे हुए देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक अनिल अंबानी को देखा, समय-समय पर समाजवादी पार्टी या झारखंड मुक्तिमोर्चा की तरफ से वहां रहस्यमय तरीके से पहुंचने वाले अरबपतियों को देखा, विजय माल्या जैसे विवादास्पद खरबपति को देखा, और भी किस्म-किस्म के लोगों को वहां देखा जिन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में शायद ही किसी बहस में शायद ही कुछ जोड़ा। इसलिए संसद का यह उच्च सदन सिर्फ काम करने वाले लोगों को देखने के लिए नहीं जाना जाता है। और राष्ट्रपति के कोटे की कही जाने वाली, लेकिन हकीकत में केंद्र सरकार द्वारा तय की जानी वाली इन सीटों पर मोटे तौर पर एक सम्मान के लिए लोगों को पहले भी लाया जाता रहा है, और उसी दौरान कभी-कभी ऐसे लेखक-पत्रकार भी इस कोटे से राज्यसभा में पहुंचे हैं जिन्होंने वहां बहुत कुछ कहा भी है।
यह समझने की जरूरत है कि ब्रिटेन से ली हुई इस संसदीय प्रणाली में उच्च सदन की कल्पना ऐसे लोगों के लिए की गई थी जो कि खुरदुरे चुनावों को लड़कर और जीतकर कभी संसद नहीं पहुंच सकते। ऐसे रचनात्मक और कल्पनाशील, प्रतिभावान और हुनरमंद विशेषज्ञों को यहां लाने का एक यह मकसद भी रहते आया है कि उनकी खूबियों का थोड़ा बहुत जितना भी फायदा सदन को मिल सके वह मिलना चाहिए। ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था जिस तरह राजशाही और सामंती है उसके चलते वहां पर कुछ खानदानी लोगों को सीधे संसद में पहुंचाने का भी यह एक चक्कर था जो कि भारत में खानदानी तो नहीं रह पाया लेकिन यह किसी भी तरह की प्रतिभा न रखने वाले नेताओं के लिए भी बिना चुनाव यहां पहुंचने का एक जरिया बना दिया गया। चुनाव हारे हुए लोग, चुनाव न लड़ पाने लायक लोग बिना मेहनत अपनी पार्टी की मेहरबानी से राज्यसभा में पहुंचते आए हैं और बहुत से मनोनयन यहां पर अलग-अलग पार्टियों ने ऐसे किए हैं जिनसे कि इस सदन की इज्जत कम हुई है। आज सचिन तेंदुलकर या फिल्म अभिनेत्री रेखा के मनोनयन से कम से कम ऐसी नौबत तो नहीं आई है। रेखा के बारे में यह मजाक चारों तरफ जरूर चल रहा है कि अमिताभ और जया से हिसाब चुकता करने के लिए कांगे्रस ने 'उसेÓ भी यहां भेज दिया है ताकि पूरे कार्यकाल जया बच्चन का मुंह कड़वा रहे। लेकिन इस निजी चर्चा से परे हकीकत तो यह है कि रेखा को अपने अभिनय के लिए देश के सारे बड़े पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। इसी तरह सचिन तेंदुलकर कोई बेजुबान पुतले जैसे नहीं हैं और अपने लंबे-लंबे इंटरव्यू के अलावा भी वे हर मैच के बाद में अपनी बात को तर्कसंगत और प्रभावशाली तरीके से रखते आए हैं। इसलिए हम इस बात को लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं हैं कि सचिन को राज्यसभा में लाकर कांगे्रस पार्टी उनकी लोकप्रियता को अपने पक्ष में भुना रही है। यह मौका तो भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के पास महाराष्ट्र में हमेशा से रहा है कि वे जब चाहते तब सचिन को अपनी तरफ से मनोनीत करके राज्यसभा भेज सकते थे। इसलिए सचिन पर बहस और रेखा पर लतीफे, इन दोनों को हम एक बहुत हल्की मजाक के लायक मानते हैं और इन दोनों को हम इस सदन में इस कोटे के तहत मनोनयन के लायक समझते हैं।

26 april


26 april


नीयत की हिंसा और हिंसा की नीयत


26 अप्रैल  2012
संपादकीय
गुजरात दंगों की सुनवाई, महाराष्ट्र में आदर्श जैसे दर्जनों घोटाले, दिल्ली में चौरासी दंगों पर सीबीआई की रिपोर्ट, उत्तरप्रदेश में करीब तीन हजार करोड़ का शौचालय घोटाला उजागर, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में अपहरण के बाद नक्सलियों से समझौते की बातचीत, देश भर में बोफोर्स का भूत एक बार फिर हवा में छाया, और देश की अदालतों ने सत्ता के बेजा इस्तेमाल के अनगिनत मामले। छत्तीसगढ़ में जिस तरह जिंदल जैसे ताकतवर कारखानेदारों की करतूत राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कोयला खदान की मंजूरी खारिज करते हुए जिंदल के खिलाफ लिखी है, वैसा हाल देश में कुछ और जगहों पर दूसरे कारखानेदारों का भी है।
इतिहास में बोलचाल की जुबान में जो भारत सोने की चिडिय़ा कहलाता था, आज ऐसा लगता है कि जिस-जिस के हाथों में औसत से कुछ अधिक ताकत है, उनके नाखून इंसानी जरूरतों से कहीं अधिक तेज हैं, जिनके दांत पका हुआ खाने के इंसानी रिवाज के मुकाबले चीरकर खाने लायक बड़े और कड़े हैं, वे सब इस चिडिय़ा को झिंझोड़कर कच्चा खा रहे हैं। भारत एक वक्त ऐसी राजशाही से उबरा था जो कि एक बीवी की याद में ताजमहल बनवाता था, गरीबों का हक खाकर। फिर अंगे्रजों के उस राज से उबरकर यह लोकतंत्र खड़ा हुआ जो कि लंदन के भले के लिए इस देश को लूटता था। कुछ राजा इस देश के ही अपने लुटेरे थे, कुछ मुगल बाहर से आए हुए थे और अंगे्रज एक सदी से अधिक के लिए यहां फौजी हुकूमत चलाते रहे। लेकिन आज तो लोकतंत्र के आने के बाद, जनता के चुने हुए लोग देश और जनता के साथ वह सुलूक कर रहे हैं जिसके लिए आज दिल्ली में अधिक कड़ी सजा की बात केंद्रीय मंत्रिमंडल करने जा रहा है। एक तरफ सोने की चिडिय़ा को लोग नोंचकर कच्चा खा रहे हैं, दूसरी तरफ जिसे भारतमाता कहते हैं उसके साथ बलात्कार कर रहे हैं। और ऐसे लोगों में से हजार में से एक दो कानून के शिकंजे में अगर फंसते भी हैं, तो भी उसके पहले तक वे आधी या चौथाई सदी तक पुलिस की सलामी पाते रहते हैं। अभी उत्तरप्रदेश के एक ताजा मंत्री को देखें तो जेल में कैद काटने के लंबे तजुर्बे के चलते उन्हें जेल मंत्री बनाया गया। 
यह लोकतंत्र आज ओडिशा और छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की रहम पर चलने वाले कई इलाकों में स्थगित और निलंबित सा है। आज से रायपुर में सरकार और नक्सलियों के बीच एक बातचीत शुरू होनी है जिसमें छत्तीसगढ़ के एक अगवा अफसर की रिहाई की कोशिश सरकार की तरफ से होगी। दूसरी तरफ कल और आज में नक्सलियों के पसंद के वार्ताकार, मध्यप्रदेश के एक भूतपूर्व आईएएस अफसर और बस्तर में कलेक्टर रहे हुए डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा के बयान अगर देखें तो ऐसा लगता है कि गांधी की खादी में एक नक्सली बिना बंदूक थामे ऐसे अपहरण को सही ठहरा रहा है। हम अभी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा की लोकतंत्र पर से इस अनास्था को पूरी तरह खारिज करने में इस कॉलम की आज की जगह खराब करना नहीं चाहते। लेकिन आज की समझौता-वार्ता ऐसी अनास्था के माहौल के बीच ही होने जा रही है जो कि नक्सलियों के हमदर्द कहे जाने वाले डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा तक सीमित नहीं है। और छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र निर्वाचन से बनी हुई सरकार से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक, सभी लोकतांत्रिक ताकतों को आज यह सोचने की जरूरत है कि देश-प्रदेश में किन बातों के चलते नक्सल हिंसा की जगह बनी और उनकी ताकत इस हद तक पनप चुकी है कि वे इस देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दिए जा चुके हैं।
आज की यह बातचीत तो एक अफसर की रिहाई तक शायद रह जाए, लेकिन इसके बाद क्या होगा? इसके बाद कल भी नक्सलियों के हथियारबंद-राज के इलाके में कोई न कोई दूसरा अफसर तैनात होगा, वहां फिर ऐसी नौबत आएगी कि फिर किसी को उठाकर नक्सली सरकार से सौदेबाजी की नौबत लाएंगे और जेलों से अपने साथियों को छुड़वाएंगे। यह सिलसिला सरकार कब तक बर्दाश्त कर पाएगी? और आज तो एक बड़ा अफसर है, कल छोटे-छोटे कई सरकारी कर्मचारी अगवा हो सकते हैं, परसों ओडिशा की तरह कोई विधायक या सांसद भी अगवा हो सकता है और सरकार क्या पूरी जिंदगी नक्सलियों के वार्ताकारों से बातचीत में इतना वक्त बर्बाद करती रहेगी? इसलिए आज की इस बातचीत के बाद की बात को हम यहां छेडऩा चाह रहे हैं। जब तक इस देश में सोने की चिडिय़ा को ढाबे की मुर्गी की तरह नोंचना जारी रहेगा, तब तक नक्सली बने रहेंगे, जमे रहेंगे। जब तक देश की तमाम राजधानियों में तेज नाखूनों और बड़े दांतों वाले हर तबके के ताकतवर लोग अपनी हिंसक नीयत के साथ देश पर जुल्म और ज्यादती करते रहेंगे, तब तक ऐसे अपहरण की जमीन बनी ही रहेगी। इस सिलसिले को बस्तर और ओडिशा की सरहद पर नहीं रोका जा सकेगा, न ही इसे झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र, मध्यप्रदेश और बिहार में रोका जा सकेगा। आज तो गुरिल्ला युद्ध की जरूरतों के मुताबिक नक्सल दस्ते जंगलों के आदिवासी इलाकों में ही हैं। लेकिन उनके लिए पढ़े-लिखे, शहरी, सवर्ण और संपन्न तबके में समर्थन देखना हो तो देश के एक सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू की मिसाल देखी जा सकती है जहां पर कि बस्तर में पौन सौ सिपाहियों के एक मुश्त मारे जाने पर खुशियां मनाई गई थीं। जिस दिन देश ने ताकतवर तबकों के जुल्म के खिलाफ, उनकी लूट के खिलाफ शहरों में लोग कानून अपने हाथ में ले लेंगे, उस दिन जंगलों के गुरिल्ला युद्ध की जगह कोई दूसरा तरीका इस्तेमाल होने लगेगा, और उस दिन शायद आज की तरह की बातचीत की जगह भी नहीं बचेगी। इसलिए इस बातचीत के प्रसंग से परे हम आज यहां यह फिक्र जाहिर करना चाहते हैं कि मौजूदा रिहाई में कामयाबी मिलने के साथ-साथ लोकतंत्र को अपने घर के भीतर बैठकर यह सोचना पड़ेगा कि वह अपनी नीयत की हिंसा को किस तरह काबू करे और तब कहीं जाकर वह नक्सलियों की हिंसा की नीयत पर सवाल खड़े कर सकेगा। आज का मौका इस टेबिल से परे के आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन का भी है। लोकतंत्र में अदालतें एक कुसूरवार को सजा देने की हालत में उस वक्त पहुंच पाती हैं जब हजारों कुसूरवार पकड़ और सजा से बच चुके होते हैं। ऐसे हजारों को सजा देने के लिए कानून में अपने हाथ में लेने की नौबत नहीं आने देनी चाहिए।

इंसानों में हीनभावना बेचने वाला सितारों पर टिका आक्रामक बाजार


25 अप्रैल 2012
संपादकीय
महिलाओं के कुछ भीतरी अंगों के लिए बनाई गई एक क्रीम की बहुत आक्रामक और अश्लील किस्म की मार्केटिंग और इश्तहारबाजी कल संसद में भी गूंजी। कुछ दिन पहले हमने इस बारे में खबर छापी भी थी और इस हमले के कुछ दूसरे पहलुओं को लेकर हम इस अखबार से शुरू करके इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों तक लगातार लिखते हैं। लेकिन बाजार की ताकत किसी भी सरोकार की ताकत से बहुत होती है और खासकर ऐसे मौकों पर जब सरोकारवादियों की अपनी विश्वसनीयता गड्ढे में रहती है तो फिर उनकी कही बात से जनमत पर क्या फर्क पड़ सकता है? 
पश्चिम के बाजार में पूरी दुनिया पर बार्बी नाम की एक गुडिय़ा को थोपकर बचपन से ही लड़कियों के मन में उनके बदन का एक असंभव सा आकार बिठा दिया है और ये लड़कियां बड़ी होने के बाद मरने तक उस असंभव को पाने के लिए संघर्ष करती रहती हैं। इस फेर में फैशन, खानपान, शरीर की कॉस्मेटिक सर्जरी, और तरह-तरह की दवाईयों, रसायनों और कॉस्मेटिक का इतना बड़ा बाजार खड़ा कर लिया गया है कि उसके इस्तेमाल के बिना दुनिया की अनगिनत महिलाओं को हीनभावना से उबरना मुमकिन ही नहीं लगता। भारत में जिस तरह से रंग को गोरा बनाने की क्रीम की मार्केटिंग हो रही है, उसके चलते अब शाहरूख खान जैसे फिल्म कलाकार पहलवानों तक को गोरा बनाने का बाजार खड़ा कर रहे हैं। अखबारों और पत्रिकाओं को देखें तो महिलाओं के शरीर के आकार को बदलने के लिए वे जालसाज और धोखेबाज कंपनियों के तेल और दवाओं के इश्तहार अपनी अक्ल को अलग रखकर छापते हैं, जिनके बारे में बच्चा भी यह समझ सकता है कि अखबार अपनी समझ और जिम्मेदारी को पन्ने पर की उतनी जगह के साथ-साथ बेचता है।
खासकर महिलाओं में हीन भावना खड़ी करके, उनका आत्मविश्वास तोड़कर अपने सामान बेचे जाते हैं और उनके खिलाफ जागरूकता का कोई अभियान भी नहीं चल पाता क्योंकि समाज में जिन सितारों की बात का असर हो सकता है वे भाड़े के भाटों की तरह सामान बेचने में लगे हैं। अभी पिछले कुछ दिनों से तो एक ऐसा क्रिकेट सितारा भी कोई फेयरनेस क्रीम बेचते दिख रहा है जिसके चेहरे पर धूप की कोई फिक्र दिखनी नहीं चाहिए थी। लेकिन जब कोई कामयाब हो गया है तो बाजार उसे भी हफ्ते भर में गोरा बनाकर दिखाने का झांसा देता है, और हमारा ख्याल है कि इसके खिलाफ धोखाधड़ी का एक ऐसा मामला भी बन सकता है कि ऐसे फिल्मी सितारे या ऐसे क्रिकेट सितारे कब हफ्ते भर में ऐसे गोरे हुए, कंपनी और वे इसे साबित करें।
महिलाओं के गुप्तांगों को अधिक आकर्षक रंग का बनाने वाली क्रीम का यह विज्ञापन भयानक है। हम भारत की संकीर्णता वाली परंपरागत सोच पर गए बिना भी अपनी खुद की बहुत उदार सोच, आधुनिक सोच के साथ में इस बात को भयानक पाते हैं कि बाजार इस तरह हमले कर सकता है, कर रहा है। यह ठीक है कि बाजार को बेचने की और ग्राहकों को उसे खरीदने की एक छूट लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत हमेशा बनी रहेगी, लेकिन इस अधिकार से परे हम इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समाज के लिए बहुत खतरनाक मानते हैं जो लोगों को अपने ही शरीर के बारे में नीची नजरों से देखने को मजबूर करता है। भारत में जिस तरह से कॉस्मेटिक सर्जरी को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह भी चिकित्सा विज्ञान की सुविधा न होकर बाजार की बहुत ही गैरजरूरी और हिंसक मार्केटिंग है। शरीर को लेकर एक खास रंग-रूप और आकार की तरफ बढ़ाते जाने का कोई अंत नहीं है। दुनिया ने माइकल जैक्सन को देखा है जो कि एक अश्वेत अफ्रीकन परिवार में अमरीका में पैदा हुआ और जो अपने बचपन की तस्वीरों में बहुत ही सुंदर और आकर्षक दिखता था। बाद में अपने ही चेहरे और शरीर से वह इस हद तक नाखुश रहा कि पूरी जिंदगी वह रंग बदलवाने, नाक का आकार बदलवाने में ऐसा लगे रहा कि आखिरी वक्त तक वह जीता-जागता भूतपे्रत सा लगने लगा था। उसी के दूसरे भाई-बहन जो कि प्राकृतिक रूप-रंग के साथ रहे, वे अभी तक बेहतर लगते हैं, हालांकि कि उनसे अमरीका के प्लास्टिक सर्जनों को करोड़ों नहीं मिल पाए।
भारत की संसद में यह फिक्र इसलिए मायने रखती है कि भारत का कानून किसी ऐसे सामान की मार्केटिंग को रोक नहीं सकता। लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग की अधिकांश आबादी वाले ऐसे देश में जनता के इतने बड़े तबके को एक हीनभावना में डालने की बाजारू साजिश पर काबू पाने का कोई तरीका निकालना चाहिए, चाहे वह तरीका कानूनी न होकर सामाजिक जागरूकता का ही क्यों न हो। जिस तरह दुनिया में हथियार के सौदागर देशों के बीच नफरत पैदा करके जंग के सामान बेचते हैं, जिस तरह आतंकियों के हमले बढ़ावाकर उससे पनपी दहशत के साए में सुरक्षा और निगरानी उपकरणों के व्यापारी अपनी दूकान सजाते हैं, उसी तरह फिल्मी सितारों को, क्रिकेट सितारों को भाड़े पर लेकर बाजार हीनभावना फैलाता है, और उससे उबरने के बाजारू झांसे बेचता है। 
हमारे हिसाब से इससे निपटने का एक जरिया यह हो सकता है कि ऐसे रंगभेदी सामान बेचने वाले लोगों का सामाजिक बहिष्कार करने के बैनर देश के बाकी जिम्मेदार और समझदार लोग उठाएं।

अपने से कमजोर पर जुल्म न करें


24 अप्रैल 2012
सड़क पर बहुत से लोग अपने से छोटी गाड़ी वालों पर ज्यादती करने पर उतर आते हैं, और अपने को ताकतवर समझते हैं। आप उतने ही ताकतवर होते हैं, जितनी ताकत अपने से अधिक ताकतवर पर दिखा सकते हैं। कार वाले के लिए, एक ठेले और रिक्शेवाले को थप्पड़ लगा देने में बहादुरी नहीं कायरता है। बहादुरी तो तब हो जब सड़क पर ज्यादती करने वाले किसी लालबत्तीधरी को रोककर विरोध करने की आपकी हिम्मत हो। अपने से छोटे, गरीब, कमजोर पर जुल्म करके आप अपने-आपको बहुत कमजोर साबित करते हैं। ऐसे लोगों से किनारा करें जो कि आदतन कमजोर लोगों पर ज्यादती करते हैं। ऐसी बात को अनदेखा करके, या उस पर चुप रहकर आप उसमें हिस्सेदार भी बन जाते हैं। 
विनम्रता आपको सड़क पर तो पीछे रख सकती है, लेकिन लोगों की नजरों में आपको आगे रखती है। 
आपकी बदतमीजी आपके बच्चों में भी उतरती है। अधिक हॉर्न बजाने वालों के बारे में मनोविज्ञान यह कहता है कि जिन बच्चों को बचपन में खिलौने नहीं मिले होते, वे ही अधिक हॉर्न बजाते हैं। मेरा तो यह भी मानना होता है कि कमजोर लोगों पर वे ही लोग अधिक चीखते हैं जिन्होंने अपने घर पर बचपन में अपनी माँ पर अपने बाप को चीखते देखा हो। इसलिए अपने माँ-बाप की छवि ठीक रखनी हो तो अपने बर्ताव को ठीक रखें। और ऐसी ही बातों की मिसाल अपने बच्चों के सामने पेश करें जिनसे कि उनके बड़े होने पर आपकी छवि खराब ना हो। 

सरकार-नक्सल बातचीत में दोनों तरफ भूतपूर्व अफसर!


24 अप्रैल 2012
संपादकीय
बस्तर के अगवा कलेक्टर पर बातचीत के लिए नक्सलियों ने अपनी तरफ से जिन तीन मध्यस्थतों के नाम लिए हैं उनमें से दो ने अलग-अलग मनाही कर दी है। सीपीआई के बस्तर के एक पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने अपनी पार्टी की नीति का हवाला देते हुए वार्ताकार बनने से मना कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील प्रशांत भूषण ने यह कहा है कि वे किसी के सिर पर बंदूक की नोंक टिकी हो तो उस हालत में कोई बातचीत करना नहीं चाहते। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि कलेक्टर की रिहाई हो जाने के बाद वे किसी भी बातचीत में मध्यस्थ बनने के लिए राजी हैं। एक तीसरा नाम नक्सलियों ने बस्तर में रह चुके एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा का दिया है, जो कि पिछले एक दशक से अधिक समय से सामाजिक आंदोलनकारी हैं, और वे मध्यस्थ बनने के लिए तैयार भी हो गए हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ सरकार ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मुख्य सचिव रहे हुए दो लोगों से सहमति लेने के बाद अपनी तरफ से उनका नाम मध्यस्थ के रूप में रखा है। 
यह बात अच्छी है कि सरकार और नक्सलियों के बीच बातचीत पर एक सहमति तैयार हो गई है और दोनों तरफ से किसी तात्कालिक हथियारबंद या हिंसक कार्रवाई के बजाय बातचीत की बात हो रही है। हमने दो ही दिन पहले इस मुद्दे पर इसी जगह यह लिखा था-'....छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास आज यह एक मौका है जब वे अपनी सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों की जान बचाने के लिए, और राज्य के आधे से अधिक नक्सलग्रस्त इलाकों में लोकतंत्र की वापिसी के लिए नक्सलियों से बातचीत का एक रास्ता शुरू करें। एक तरफ पुलिस अपना काम जारी रख सकती है, लेकिन दूसरी तरफ बीच के कुछ भरोसेमंद लोगों को लगाकर बातचीत करनी ही होगी। सरकार अगर चाहे तो एक बड़ी फौजी कार्रवाई करके नक्सलियों का कुछ समय के लिए नुकसान तो कर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र, महाराष्ट्र, झारखंड और मध्यप्रदेश का जुड़ा हुआ सारा इलाका किसी भी फौजी कार्रवाई से जब नक्सलमुक्त कराने की बात होगी तो हजारों जान जाना तय सा होगा। इसलिए वह कोई विकल्प भारतीय लोकतंत्र के भीतर कभी भी नहीं हो पाएगा। रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, और एक-एक घटना के बाद, एक-एक व्यक्ति को छुड़ाने के लिए की गई बातचीत हमेशा ही सरकार को महंगी पड़ेगी। इसलिए आज छत्तीसगढ़ सरकार को एक नए रास्ते की तलाश शुरू करनी चाहिए, और जब देश का यह सबसे बड़ा आतंरिक खतरा केंद्र सरकार तक को असफल साबित कर चुका है, तब इसके समाधान के लिए पहल करने वाले का नाम इतिहास में दर्ज भी होगा।Ó
ऊपर की यह बात हम परसों के ही अपने संपादकीय से यहां ज्यों की त्यों दोहरा रहे हैं क्योंकि इन दो दिनों में हमारे इस विचार में कोई फर्क नहीं पड़ा है बल्कि वह और मजबूत ही हुआ है क्योंकि दोनों पक्षों ने बातचीत का रास्ता पकड़ा है। बरसों से हमारी यही राय रही है और हम इसे आज के मौजूदा खतरे से परे भी देखना चाहते हैं। लेकिन आज एक छोटी सी हैरानी हमें इस बात पर है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के दो रिटायर्ड मुख्य सचिवों को ही अपना मध्यस्थ बनाकर एक सरकारी रूख ही सामने रखा है, जबकि सरकार इनसे परे के कोई ऐसे नाम छांट सकती थी जो कि सरकार और नक्सलियों, दोनों को कुछ अधिक समझते हों, जिनका राजनीतिक और सामाजिक अनुभव काफी रहा हो, और जो नक्सलियों को भरोसेमंद भी लगें। इन दोनों नामों से हमारी कोई असहमति नहीं है, लेकिन एक ही पेशे से आए हुए दो लोगों को एक साथ अपने प्रतिनिधि-मध्यस्थ बनाने के बजाय सरकार अपने ढांचे के बाहर के किसी व्यक्ति के बारे में क्यों नहीं सोच पाई? जबकि कल-परसों ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा था कि मीडिया की मध्यस्थता भी सरकार को मंजूर होगी। इस मामले में दो भूतपूर्व अफसरों को रखना कुछ उसी तरह का लग रहा है जिस तरह जनलोकपाल की मसौदा कमेटी में अन्ना हजारे की तरफ से एक ही पेशे के पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण का रख दिया गया था। नक्सलियों से बातचीत जनलोकपाल के मुकाबले भी एक बहुत अधिक जटिल बात होगी, और इसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से दो अलग-अलग किस्म के तजुर्बे वाले लोगों को अगर रखा जाता तो वह बेहतर होता। अभी दोपहर एक बजे जब हम यह लिख रहे हैं तब तक इन दो नामों पर नक्सल-प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अगर इनको ये दो नाम मंजूर भी हो जाते हैं तो भी हमारे हिसाब से अनुभव की विविधता, और सामाजिक-राजनीतिक सोच की पृष्ठभूमि की विविधता एक लंबी बातचीत में बेहतर होती। एक अजीब सी बात यह है कि डॉ. ब्रम्हदेव शर्मा जो कि अविभाजित बस्तर में कलेक्टर और कमिश्नर रहे हैं, वे और उनके बाद के अरसे में जो दो लोग मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव रहे हैं, वे इस बातचीत में आमने-सामने दिख रहे हैं! मतलब यह कि जिन अफसरों को अपने कार्यकाल में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या, और उसके भी पहले इस समस्या के कारणों से निपटने का मौका मिला था, वे अब इस समस्या से पैदा खतरों को सुलझाने के लिए बातचीत की मेज पर आमने-सामने बैठेंगे। है न हैरानी की एक अजीब बात?

21वीं सदी की रामलीला का मुखौटा


23  अप्रैल 2012
बहुत पहले से कुछ लोगों को बयां करते हुए एक बात लिखी जाती रही है-आर्मचेयर इंटेलेक्चुअल। यह बात उनके लिए कही जाती है जो किसी जमीनी हकीकत से जुड़े बिना महज बहस करते हैं और जिनकी असलियत की समझ कमजोर मानी जाती है। ऐसा ही एक दूसरा वाक्य इन दिनों इस्तेमाल होता है, इलीटिस्ट एक्टीविस्ट। इसका मतलब है कि भद्रलोक के सामाजिक कार्यकर्ता, या कि कुलीन तबकों के लोग जो कि बैनर थामें सड़कों पर दिखें। 
आज के माहौल में इन दोनों बातों को कदम-कदम पर देखा जाता है। सामाजिक कार्यकर्ता होना एक समय सामाजिक सरोकार के साथ समर्पण, समाजसेवा या त्याग की बात रहती थी, अब सामाजिक कार्यकर्ता होना एक पेशा हो गया है और इसके लिए देश के बड़े-बड़े शिक्षा संस्थानों में सामाजिक कार्यकर्ता बनने के बड़े-बड़े कोर्स चलते हैं और उनमें दाखिले के लिए खूब मारामारी रहती है। पचीस-पचास बरस पहले किसने सोचा होगा कि सामाजिक कार्यकर्ता बनने पांच बरस की पढ़ाई लगती है वह भी बहुत मुश्किल से मिले दाखिले के बाद।
लेकिन आज की बात इससे थोड़ी सी हटकर है। 
इन दिनों हॉलीवुड के एक्टरों से लेकर भारत के अरबपतियों तक, बहुत से लोगों की तस्वीरें फटे हुए कपड़ों में छपती हैं। जब अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान तक कोशिश करके फाड़ी हुई जींस पहनते हैं, जिनका कहीं तेजाब डालकर रंग उड़ाया जाता है तो कहीं पत्थर से घिसकर उसके धागों को चिथड़ा किया जाता है, तो सवाल यह उठता है कि इसके पीछे सोच क्या है? जब लोग बहुत अधिक संपन्न हो जाते हैं, और उनकी संपन्नता उनकी सामाजिक और नैतिक हिंसा की तरह दिखने लगती हैं, तो बहुत से लोगों को एक गरीबी ओढ़कर चलना जरूरी लगता है। लोग संपन्न और ताकतवर तो हो जाते हैं, लेकिन वे इस दर्जे के साथ जनता की, कमजोर तबके की, जुड़ी हुई हिकारत को जानते हुए अपने-आपको इस तबके से किसी न किसी तरह जुड़ा हुआ बताने वाली सोच को मुखौटे की तरह लगाकर भी चलते हैं। जब बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति गरीबों जैसे कपड़े पहन लेते हैं, गरीबों के मुद्दों पर काम करने लगते हैं, तो अपनी हिंसक संपन्नता से उपजी आत्मग्लानि से मुक्त होने का काम भी वे करते हैं। इसलिए जब आभिजात्य वर्ग या कुलीन तबके या भद्रलोक के लोग सामाजिक कार्यकर्ता बनते हैं तो फिर इसके पीछे, कम से कम कुछ मामलों में, अपनी शर्मिंदगी से उबरने की उनकी जरूरत भी रहती है।
इलीटिस्ट एक्टीविस्ट शब्द ऐसे ही लोगों के लिए इस्तेमाल होता है और मेरा ख्याल है कि ऐसे लोग जरूरतमंद तबकों के साथ एक और बेइंसाफी होते हैं। इसलिए कि इसके बाद गरीबी पर भी गरीब का एकाधिकार नहीं रह जाता, उसकी गरीबी की परिभाषा भी अमीर तय करने लगते हैं, उसकी जरूरतों को भी अमीर तय करते हैं, उसकी समस्याओं और उनके समाधान भी अमीर तय करते हैं, जो आमतौर पर यह सोचने की काबिलीयत रखते हैं कि डबलरोटी नहीं है तो लोग केक क्यों नहीं खा लेते। 
इस्तेमाल हो-होकर घिस जाने वाली या फट जाने वाली जींस या टी-शर्ट का उतना इस्तेमाल तो फैशनेबुल तबका तो कभी कर नहीं पाता है, उसे तो रोज-रोज नए कपड़े लेने रहते हैं, इसलिए कारखानों में ही फाड़े गए कपड़े उनको सुहाते हैं। बाजार में बरसों से ऐसी जींस भी हैं जो कि सचमुच इस्तेमाल की हुई हैं और ऐसी घिसी हुई इस्तेमाल की गई जींस नई जींस से कई गुना महंगी भी हैं। एक तो ब्रांड ही 'यूज्डÓ (इस्तेमाल हो चुकी) नाम का है। अब जब गरीब का अपनी गरीबी पर भी एकाधिकार नहीं रह गया तो फिर उसकी हालत उस दलित जैसी हो गई है जिस पर सवर्ण तबके की लिखी गई किताबें बाजारों में हैं और अब जिसके खिलाफ दलितों ने यह कहना शुरू किया है कि गैरदलित लेखक दलितों के मुद्दों पर न लिखें। मैं इस तर्क से तो सहमत नहीं हूं, लेकिन मैं इस नौबत की हकीकत को सच मानता हूं कि गैरदलितों ने दलितों को ऐसा सोचने की काफी वजहें दी हैं। 
अब यह वक्त आ गया है जब ऐसी सामाजिक मांग उठे कि संपन्न तबका गरीब बनने जैसे फैशन को छोड़े, कुलीन तबका सामाजिक कार्यकर्ता बनने का नाटक छोड़े। यह कुछ उसी तरह की नौबत होगी जिस तरह इस देश के दलितों ने पौन सदी पहले ही गांधी से यह कह दिया था कि वे उन्हें हरिजन कहना बंद करें। दलित तबके को हरिजन शब्द से कड़ी आपत्ति है और वे गांधी की इस भाषा को पूरी तरह खारिज भी करता है। जिस हरि ने अपने सवर्ण पुजारियों के राज में दलितों को दरवाजे के बाहर ही रखा उस हरि का जन भला क्यों होना चाहे?
आज फटे कपड़े पहनने वाले अमीरों से इतना तो जरूर पूछना चाहिए कि क्या वे गरीब के पास उसका हुलिया भी बाकी नहीं रहने देंगे? क्या वे गरीब से उसका हुलिया तक छीन लेना चाहते हैं? और यह कि जिस तरह के कपड़े वे पहन रहे हैं क्या उन्होंने उस तबके के लिए इतना कुछ किया है कि उनके खुद के पास अब सिर्फ ये फटे कपड़े ही रह गए हैं? ऐसे इलीटिस्ट एक्टीविस्ट से यह पूछा जाना चाहिए कि जिन सरोकारों को लेकर वे काम करते हैं और बातें करते हैं उनको निपटाने के लिए उन्होंने अपनी कमाई का कितना हिस्सा खर्च किया है? या फिर वे इससे सिर्फ प्रचार पाने का एक मकसद पूरा कर रहे हैं?
आज संपन्न हो चुके ताकतवर तबके को अपने सामाजिक सरोकार का मुखौटा बनाने के लिए गरीबों की तकलीफों की लुग्दी उसी तरह लगती है जिस तरह अखबारों की लुग्दी से रामलीला के मुखौटे बनाए जाते हैं। आज सामाजिक सरोकार के कुछ शब्द ऐसे हैं जिन्हें सामाजिक समानता से दूर बैठा तबका माला के मनकों की तरह फेरते रहता है और यह साबित करने को अपना हक मान लेता है कि वह गरीबों का, कुचले हुए लोगों का हमदर्द है, हमकदम है, हमसफर है। जबकि हकीकत यह होती है कि आभिजात्य तबके के हम में गरीब का ग भी नहीं होता, सरोकार का स भी नहीं होता। 
अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए, अपने लिए उस मंच, उस माईक, उस माला, उस महत्व और उस महिमा को जुटाने के लिए लोग गरीबों के मसीहा बन जाते हैं जिनको कि वे अपनी अमीरी से नहीं खरीद पाते। ऐसे पाखंड को खड़ा करने और फिर उसे प्रतिष्ठित करने की ताकत भी इनकी संपन्नता में होती है। इसलिए आज बहुत से करोड़पति और अरबपति लोगों को तथाकथित समाजसेवा में लगे देखा जा सकता है और जब तक कोई उनसे यह न पूछे कि अपनी कमाई का कितना हिस्सा वे इस समाजसेवा में लगा रहे हैं, तब तक वे एक प्याऊ खोलकर वाहवाही की तस्वीरें छपवा सकते हैं। 
मेरी एक दोस्त एक अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस की एयरहोस्टेस का काम छोड़कर अब इमेज काउंसलिंग का काम शुरू कर रही है। इसका मकसद है कि लोग कैसे अपनी छवि सुधारें। और छवि सुधारने का एक आसान तरीका यह होता है कि अपने-आपको  जमीन, जल, जंगल, जानवर और जनता की तकलीफों से जुड़ा हुआ साबित करना। आज अमरीका की कारोबारी दुनिया में जब कभी किसी कंपनी के लिए मुखिया की तलाश होती है, तो ऐसे तमाम नामों को सबसे पहले रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है जिनका कि समाजसेवा का कोई इतिहास नहीं होता। कारोबारी अमरीका भी यह मानकर चलता है कि समाज में सम्मान पाने के लिए एक कारोबारी को भी अपने-आपको गरीबों का हमदर्द साबित करना है। इसलिए वहां के बड़े सफल कारपोरेट लीडर भी अपनी ऐसी छवि बनाने में लगे रहते हैं, और भारत में मेरी जो दोस्त छवि सलाहकार का काम शुरू करने जा रही है, वह भी ऐसे ही लोगों के लिए है।
मतलब यह कि फटी हुई जींस, गरीबों की तरह उठना-बैठना, सरोकार की बातें करना, पेपर की लुग्दी से बना हुआ एक और मुखौटा है जो कि इक्कीसवीं सदी की रामलीला में जरूरी सा हो गया है। 

नैतिकता के ठेकेदारों से तकाजा


23 अप्रैल 2012
संपादकीय
कल से देश का समय एक बहुत ही गैरजरूरी मुद्दे पर मीडिया ने खराब करना शुरू कर दिया है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के बीच, अन्ना हजारे और उनकी टोली के बीच, उनकी टोली के लोगों के बीच आपस में किस तरह से शब्दों और बातों की कुश्ती चल रही है यह देखने लायक है। लोग एक-दूसरे के खिलाफ आग और जहर उगल रहे हैं, एक-दूसरे की बातों को गलत, झूठ बता रहे हैं, साजिशों के आरोप लगा रहे हैं। जिस तरह से अन्ना की कही हुई बातों को नकारा जा रहा है और जिस तरह से टीवी चैनल यह दिखा रहे हैं कि खंडित किए जा रहे बयान के दौरान अन्ना का वह साथी खड़ा दिख रहा है जब वह बयान दिया जा रहा है। कुल मिलाकर एक बहुत ही गैरजरूरी मुद्दे पर देश का समय खराब हो रहा है, और देश के सामाजिक आंदोलन की बची-खुची साख और खराब हुई जा रही है। हमारी नीयत इन लोगों पर लिखने की नहीं है लेकिन इस पर लिखने की जरूर है कि सामाजिक आंदोलनों को अपनी साख का ख्याल सबसे पहले, सबसे अधिक इसलिए रखना चाहिए क्योंकि इसके बिना उनकी कही हुई भली बातें, दी हुई नसीहतें सब खोखली साबित होती हैं और  उनकी नैतिक कमजोरी से उन मुद्दों की भी शिकस्त होने लगती है जिनके पोस्टर-बैनर वे अपने हाथों में उठाए रखते हैं। 
आज अन्ना हजारे के सामने एक बड़ी दिक्कत यह है कि वे पवार पर थप्पड़ से हुए हमले का मजा लेते हुए कैमरे पर कैद हो चुके हैं, अपने गांव में एक तानाशाह की तरह सांस्कृतिक नैतिकता के तालिबानी हुक्म जारी करने की बात फख्र के साथ बार-बार कहते रहते हैं। देश के उदार तबके में, मानवाधिकार की बात करने वालों में और प्रगतिशील लोगों में अन्ना हजारे के लिए सम्मान शून्य है। उनकी शोहरत उन लोगों पर टिकी है जिन्हें कि सामाजिक न्याय की समझ कम है, जिनमें व्यक्तिगत आजादी के महत्व को समझने की समझ नहीं है। इसी तरह जो बाबा रामदेव बार-बार आकर अन्ना से जुडऩे की कोशिश करते हैं, वे खुद तरह-तरह की टैक्स चोरी के ऐसे आरोपों से घिरे हुए हैं, अपना एक भयानक बड़ा औद्योगिक और कारोबारी साम्राज्य बनाकर उसके मालिक बने हुए हैं, कि वे कालेधन के खिलाफ अब कोई भरोसेमंद बात करने के लायक नहीं बचे हैं। साथ-साथ यह बात भी है कि उनका सारा अभियान भारत की दलीय राजनीति के एक हिस्से की तरह चल रहा है और अपने संन्यासी चोले के अनुशासन के बाहर-बाहर ही रहते हुए वे सोनिया परिवार पर हमले को एक ओवरटाईम की तरह चला रहे हैं। अन्ना हजारे के बाकी साथियों को देखें तो अरविंद केजरीवाल बरसों तक केंद्र सरकार को बकाया देने से बचते रहे, आखिरी में उन्होंने यह सार्वजनिक दावा किया कि वे यह भुगतान नहीं करेंगे, और फिर उन्हें यह करना पड़ा। इस नैतिक कमजोरी के अलावा उनकी तेजाबी जुबान, बददिमागी, सिर चढ़कर बोलती महत्वाकांक्षा जैसी बहुत सी ऐसी कमजोरियां उनके साथ हैं कि वे लोगों के मन में अब पहली नजर में ही एक हिकारत खड़ी करने में महारत पा चुके हैं। तीसरा चेहरा किरण बेदी का है जो कि हवाई जहाज की टिकटों में हेराफेरी करने और जायज से कई गुना पैसों की उगाही करने में फंसी हुई हैं और अपने भक्त समुदाय के बाहर उनकी विश्वसनीयता हाशिए पर चली गई है। शांति भूषण और प्रशांत भूषण, इन पिता-पुत्रों के खिलाफ इस तरह की बातें तो नहीं हैं, लेकिन फिर भी अरबपति होते हुए भी उन्होंने जमीन की खरीदी में टैक्स बचाने के लिए गलत काम किए, ऐसे मामले उनके खिलाफ एक गैर कांगे्रसी सरकार ने उत्तरप्रदेश में खड़े किए हुए हैं।
हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि आज सार्वजनिक जीवन में कोई भी प्रमुख व्यक्ति ऐसे आरोपों से बिल्कुल बचा रह सकता है। और हम यह भी नहीं मानते कि हर आरोप सही होते हैं, या अदालत में सही साबित होने के लायक रहते हैं, लेकिन हमारा इतना जरूर मानना है कि सार्वजनिक जीवन के नेताओं को उन मूल्यों पर खरा उतरना चाहिए जिनको वे दूसरों पर लागू करने पर आमादा हैं। लोगों को अरविंद केजरीवाल की कही वे बातें भी नागवार गुजरी हैं जो कि उन्होंने संसद के लोगों के खिलाफ एकमुश्त कह डालीं। संसद के जिन लोगों को वे बार-बार अपराधी कहते हैं, वे लोग अपराध के आरोप या मामले झेल रहे हैं। उनका अपराध साबित होना अभी बहुत बचा है और हो सकता है कि वे बेकसूर भी साबित हो जाएं। लेकिन दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल तो सरकार के पैसे को बरसों तक दबाए रखने के अपराधी साबित हो ही चुके हैं। उन्होंने अपने विभाग का बकाया चुकाने में बरसों लगा दिए, न देने पर अड़े रहे और जब यह एक बड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन गया तब उन्होंने यह भुगतान किया। ऐसे में आज जब अन्ना और बाबा के इर्दगिर्द एक-दूसरे से परहेज करते हुए लोग पूरे देश को फिर नैतिकता सिखाने पर आमादा हैं, तो उनके दामन तरह-तरह के दागों से भरे पड़े हैं। भारत में सार्वजनिक नैतिकता का एक पैमाना रामकथा से निकलकर आता है जब किसी के कहे हुए एक नाजायज और झूठे आरोप पर भी राजा अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल देता है कि राजा और उसके परिवार को शक से ऊपर रहना चाहिए। इसी तरह की बात दुनिया के दूसरे देशों से भी निकलकर आती है कि सीजर की बीवी को शक से ऊपर रहना चाहिए।
क्या पूरे देश में नैतिकता के ठेकेदार बने हुए अन्ना-बाबा और उनकी टोली को अपने-आपको शक से ऊपर नहीं रखना चाहिए? और आज तो छोटे-छोटे बयानों को लेकर उनका चाल-चलन कई तरह के नए शक रोज खड़े चल रहा है।

नक्सल मोर्चे पर छत्तीसगढ़ एक नई पहल करे


22 अप्रैल  2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नए बने जिले सुकमा के एक नौजवान आईएएस अफसर को जिले का पहला कलेक्टर बनने मिला तो यह बड़ा हादसा हो गया। कल जब देश में सिविल सर्विसेस दिवस मनाया जा रहा था उसी दिन छत्तीसगढ़ में इस तबके के एक अफसर का अपहरण हुआ। राज्य भर में शासन का सालाना ग्रामीण जनसंपर्क कार्यक्रम ग्राम सुराज चल रहा है और नक्सल इलाकों में भी सत्तारूढ़ जनप्रतिनिधि और अधिकारियों की आवाजाही पहले से घोषित कार्यक्रम के मुताबिक चलना तय था। ऐसे में नक्सलियों की दो दिनों में दो वारदातें बस्तर में ही हो गई हैं। पहले दिन एक विस्फोट से एक विधायक के काफिले पर हमला हुआ जिसमें तीन लोग मारे गए। और कल कलेक्टर का अपहरण हो गया जिसके साथ-साथ उनके दो सुरक्षा कर्मियों को नक्सलियों ने मार डाला। चूंकि नक्सली आए दिन लोगों को मार रहे हैं इसलिए आज उनके बारे में उस पहलू को लेकर लिखने का कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन एक आईएएस अधिकारी के अपहरण को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार के सामने जो एक परेशानी खड़ी हुई है उस पर चर्चा करने की जरूरत है।
पाठकों को यह याद होगा कि बस्तर से लगे हुए उड़ीसा के कोरापुट जिले में एक विधायक के अपहरण को कई हफ्ते गुजर गए हैं। और राज्यों की एक गैरमौजूद सरहद के आरपार नक्सली सारे इलाके में आते-जाते रहते हैं और वारदात भी करते रहते हैं। इसलिए अगल-बगल के सुकमा और कोरापुट के इन दो अपहरणों के पीछे नक्सलियों का कोई एक दलम चाहे न भी हो, राज्य सरकार को घुटनों पर लाकर उनसे नक्सलियों और नक्सल-हमदर्दों को जेलों से छुड़वा लेने का उनका इसी महीने का उड़ीसा का अनुभव शायद छत्तीसगढ़ में भी हौसला बढ़ाने वाला रहा और यहां वे एक अफसर को उठा ले गए। अब केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच इस बात को लेकर पिछले एक पखवाड़े से यह मतभेद चल ही रहा है कि ऐसी नौबत आने पर नक्सलियों के सामने किस रफ्तार से घुटने टेके जाएं, उनकी कितनी मांगें मानी जाएं, कितने कैदियों को छोड़ा जाए। यह एक बहुत ही मुश्किल नौबत रहती है जब किसी बेकसूर की जिंदगी को बचाने के लिए कई संभावित कुसूरवारों को जेल से छोडऩा पड़ता है, या छोड़ा जाता है। हमने ऐसी ही नौबत से बचने के लिए इसके पहले भी इसी जगह अपनी बात लिखी थी कि राज्य सरकारों को ऐसी किसी नौबत को लेकर अपनी एक नीति पहले से बनानी चाहिए और पहले से उसकी घोषणा करनी चाहिए ताकि किसी बड़े व्यक्ति या किसी छोटे व्यक्ति के अपहरण के मामले में सरकार पर यह आरोप न लगे कि उसने छोटे को तो मर जाने दिया, और बड़े को बचाने के लिए कैदी छोड़े। हमारे कुछ जानकार दोस्तों का यह कहना है कि ऐसी कोई नीति दुनिया में कहीं भी नहीं बनाई जाती और वक्त आने पर ही अलग-अलग मामले में उसके महत्व के हिसाब से सब तय किया जाता है। लेकिन एक बार जब नक्सलियों या किसी भी दूसरे किस्म के अपराधियों के हाथ यह लग जाएगा कि वे किसी बड़े व्यक्ति का अपहरण करके बहुत से लोगों को छुड़ा सकते हैं, तो फिर यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा, और लगातार अपराधियों को छोड़ते चले जाने से सुरक्षा बलों का हौसला भी पस्त होगा और उनकी मेहनत पर भी पानी फिरते रहेगा।
यहां पर हम छत्तीसगढ़ में खड़ी मौजूदा दिक्कत से थोड़ा सा परे की भी बात करना चाहते हैं क्योंकि इस घटना को सिर्फ एक घटना जैसा मानना ठीक नहीं होगा। छत्तीसगढ़ को इस मौके पर नक्सलियों से निपटने की पुलिस-नीति के साथ-साथ एक ऐसी राजनीतिक-नीति के बारे में भी सोचना होगा जिससे कि इसका कोई स्थायी हल निकल सके। लोगों को याद है कि पंजाब के आतंक के दिनों में जब अर्जुन सिंह वहां राज्यपाल बनाकर भेजा गया था तो उन्होंने प्रदेश को एक राजनीतिक समाधान तक पहुंचाया था। और पंजाब के आतंक के खात्मे के इतिहास में उनका नाम दर्ज भी होगा। वहां पर उस दौरान भी पुलिस और शायद फौज की भी कार्रवाई चलती रही, लेकिन इलाज तो राजनीतिक ही हो पाया। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के पास आज यह एक मौका है जब वे अपनी सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों की जान बचाने के लिए, और राज्य के आधे से अधिक नक्सलग्रस्त इलाकों में लोकतंत्र की वापिसी के लिए नक्सलियों से बातचीत का एक रास्ता शुरू करें। एक तरफ पुलिस अपना काम जारी रख सकती है, लेकिन दूसरी तरफ बीच के कुछ भरोसेमंद लोगों को लगाकर बातचीत करनी ही होगी। सरकार अगर चाहे तो एक बड़ी फौजी कार्रवाई करके नक्सलियों का कुछ समय के लिए नुकसान तो कर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र, महाराष्ट्र, झारखंड और मध्यप्रदेश का जुड़ा हुआ सारा इलाका किसी भी फौजी कार्रवाई से जब नक्सलमुक्त कराने की बात होगी तो हजारों जान जाना तय सा होगा। इसलिए वह कोई विकल्प भारतीय लोकतंत्र के भीतर कभी भी नहीं हो पाएगा। रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, और एक-एक घटना के बाद, एक-एक व्यक्ति को छुड़ाने के लिए की गई बातचीत हमेशा ही सरकार को महंगी पड़ेगी। इसलिए आज छत्तीसगढ़ सरकार को एक नए रास्ते की तलाश शुरू करनी चाहिए, और जब देश का यह सबसे बड़ा आतंरिक खतरा केंद्र सरकार तक को असफल साबित कर चुका है, तब इसके समाधान के लिए पहल करने वाले का नाम इतिहास में दर्ज भी होगा।

मनमोहन सिंह बहुत ही हौसले वाले हैं...


21 अप्रैल 2012
संपादकीय
सिविल सर्विस दिवस पर प्रधानमंत्री ने देश के आला अफसरों से कहा है कि वे फैसले लेने में न हिचकें। अगर बिना किसी दुर्भावना के उनके फैसलों में कोई गलती हो जाती है लेकिन उनकी नीयत ठीक रहती है तो सरकार उन्हें बचाने का ध्यान रखेगी। उन्होंने यह भी कहा कि नौकरशाहों के किसी तरह के राजनीतिक दबाव में नहीं आना चाहिए। और साथ ही भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर किसी सरकारी अफसर को नहीं फंसाना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह बयान देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु के बयान के बाद आया है। दरअसल, बसु ने शुक्रवार को बयान दिया था कि देश में बढ़ रहे घोटालों की वजह से नौकरशाह फैसला लेने से हिचकते हैं। 
मनमोहन सिंह आज पता नहीं किस नैतिक साहस के साथ ऐसी बात कह पाए होंगे। यह भी हो सकता है कि उन्हें ऐसा लिखकर दे दिया गया हो और उन्हें सामने खड़ा करके उनके जैसी आवाज में किसी और न ऐसी बातें कही हों। क्योंकि कोई भी शरीफ और ईमानदार इंसान मनमोहन सिंह की जगह रहते हुए आज इतनी बड़ी-बड़ी बातें तो कह नहीं सकते। और यह पूरा सिलसिला ऐसी शर्मनाक नौबत में आकर खड़ा हो गया है कि दिल्ली अब यह चर्चा है कि केंद्र सरकार को कुछ ताकतवर मंत्री पार्टी हाईकमान से कह चुके हैं कि उन्हें संगठन में कोई महत्वपूर्ण जगह दे दी जाए और वे सरकार में नहीं रहना चाहते। हम आज फिर यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी के बारे में लिखना नहीं चाहते जो कि आज भी कतार में सबसे आगे हैं, आलोचना पाने के लिए। लेकिन आज का मौका देश में नौकरशाह कहे जाने वाले अफसरों पर बात करने का है, जो कि सचमुच एक तनाव से गुजर रहे हैं। 
दरअसल भारतीय नौकरशाही की सारी ट्रेनिंग और सोच जिस तरह से ढली है, वह देश के आज के मौजूदा, कुछ अधिक, पारदर्शी और जवाबदेह माहौल के साथ फिट नहीं बैठ रही है। सूचना के अधिकार के आने के बाद, अदालतों के सक्रिय हो जाने के बाद, और भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं या जांच एजेंसियों के अधिक ताकतवर हो जाने के बाद अब सरकारी अफसरों पर एक यह तलवार तो टंग ही गई है कि उनके फैसले के पीछे कोई बेईमानी या बदनीयत तो नहीं है। मनमोहन सिंह इस सरकार के मुखिया रहते हुए इस देश के आखिरी के सौ-दो सौ लोगों में आने चाहिए जिन्हें कि अफसरों को कोई नसीहत देने का हक हो। येदियुरप्पा और मायावती, राजा और कलमाड़ी जैसे चुनिंदा सौ लोगों को जितनी मसीहाई नसीहत देने का हक होना चाहिए, गले-गले तक भ्रष्ट यूपीए के मुखिया होने के नाते मनमोहन सिंह को भी करीब-करीब उतना ही हक मिलना चाहिए। इसलिए आज जब वे इस बात को कह रहे हैं तो हमारा अंदाज यह है कि इस देश के ईमानदार और काबिल नौकरशाह एक बहुत बड़ी हिकारत और नफरत के साथ इस बात को पढ़ रहे होंगे। यूपीए के भीतर कांगे्रस और उसके कुछ भागीदार दलों ने मिलकर जिस तरह से देश को लूटा है, वह अभूतपूर्व तो है ही, ऐतिहासिक भी है। जिस तरह आपातकाल में कांगे्रस को लोकतंत्र की हत्या का एक दाग बची पूरी जिंदगी के लिए दिया था, उसी तरह सरकार की बेईमानी का इस बार का मिला हुआ दाग मानो मतदान की स्याही से यूपीए, और खासकर कांगे्रस के माथे पर लगा है, जो कि मिटने वाला नहीं है, और ऐसे में अफसरों को नसीहत देना परले दर्जे की बेशर्मी ही है। 
जहां तक भारत में अफसरों का सवाल है, तो बड़े अफसरों के बारे में देश की जनता का दो तरह का अनुभव है। एक तरफ तो मनमोहन सिंह जैसे लोग अफसरों को हौसले के साथ फैसले लेने को कह रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के बहुत से नेताओं का यह मानना है कि नौकरशाह दर्ज में आने वाले बड़े अफसरों का हौसला इतना अधिक होता है कि वे निर्वाचित लोकतंत्र पर हावी हो जाते हैं, और बहुत से राज्यों में कुछ सरकारों के बारे में समय-समय पर ऐसी बातें कही जाती हैं कि सरकार पर नौकरशाही हावी है। खासकर जो राजनीतिक दल विपक्ष में रहता है वह इस बात को एक मुद्दा भी बनाकर चलता है। इस बात में कई जगहों पर बहुत सच्चाई होती है और कई जगहों पर निर्वाचित नेता अपने जिम्मे के नीतियों के काम को छोड़कर जब ठेका और तबादलता उद्योग की प्राइवेट पै्रक्टिस शुरू कर देते हैं, तो उनके अफसर लोकतंत्र को चलाने का बोझ उठाते हुए उन पर हावी भी हो जाते हैं। कहीं-कहीं इन दोनों तबकों के काबिल और बेईमान होने से यह पै्रक्टिस एक भागीदारी फर्म की तरह चलने लगती है, और हमारे लिए यह सोच पाना खासा मुश्किल है कि इसका हौसला और बढ़ जाएगा तो जनता का क्या होगा? आला अफसरों में एक तबका ऐसा भी है जो बहुत काबिल है, बहुत ईमानदार है और उसका अक्सर कुछ बिगड़ नहीं पाता। भारतीय शासन और प्रशासन व्यवस्था में पूरी तरह से ईमानदार का कुछ बिगाड़ पाना थोड़ा मुश्किल ही होता है। वे ही लोग तलवार के नीचे खड़े होते हैं जो कि कुछ कमजोर होते हैं, और जिनमें कुछ या अधिक कमजोरियां होती हैं।
हम आज के इस सिविल सर्विस डे पर अफसरों के भीतर अधिक हिम्मत की जरूरत को किसी अहमियत का नहीं मानते। भारतीय संसदीय लोकतंत्र में अफसरों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की सरकार के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों का संतुलन बहुत अच्छे से बना हुआ है। जब तक इनमें से किसी एक तबके, या दोनों ही तबकों के भीतर कोई बदनीयत न हो, जब तक किसी का अहंकार उसे तानाशाह सा न बना दे, जब तक सत्ता की नीतियां सरकार का बेजा इस्तेमाल करने पर उतारू न हो जाएं, तब तक किसी अतिरिक्त साहस की जरूरत अफसरों को नहीं है। और जिस तरह से सरकार के दूसरे तबके काम करते हैं, उसी तरह से बड़े अफसरों को भी काम करते रहना चाहिए, और उनके लिए किसी अलग साहस की जरूरत क्यों होना चाहिए।
वैसे आज का दिन और आज का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण, देश के लोगों में साहस पैदा करने के लिए एक बड़ी मिसाल है, कि किस तरह यूपीए सरकार का मुखिया भी आज नसीहत का साहस दिखा सकता है।

20 april 2012


20 april 2012


20 april


मंडी की टोकरी में सजा लोकतंत्र कपिल सिब्बल की जुबानी...


20 अप्रैल  2012
केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि शिक्षा में सुधार और भ्रष्टाचार मिटाने उन्होंने 14 से भी अधिक  विधेयकों के मसौदे तैयार किए है, लेकिन संसद को प्रभावित कर रहे निहित स्वार्थ उन्हें पारित नहीं होने देते। कपिल सिब्बल ने  व्यवसाय के इरादे से शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को संस्थानों के लिए मंजूरी देने के लिए जहां राज्य सरकारों की आलोचना की वहीं यह भी कहा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो शिक्षा में सुधार किया जा सकता है। उन्होंने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक कार्यक्रम में ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि भारत को मजबूत बनाने की कोशिशों पर राजनीतिक दलों के सत्ता में बने रहने के स्वार्थ हावी हो रहे हैं। सिब्बल ने आरोप लगाया कि निजी शिक्षा संस्थान चलाने वाले ताकतवर लोग शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने वाले इन विधेयकों को अटका रहे हैं। इन्हें शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है, वे केवल पैसा कमाने इस क्षेत्र में आए है।
कपिल सिब्बल की इन बातों को देखें तो ऐसा लगेगा कि भारतीय लोकतंत्र की इस संसदीय हालत के बारे में नक्सली देश को बताते हुए बगावत की जमीन तैयार कर रहे हैं। आज जब देश में स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों का काम देखने वाले केंद्रीय मंत्री ही ताकतवर बाजार को इतना खतरनाक बता रहे हैं कि ये ताकतें संसद को प्रभावित करके विधेयक पास नहीं होने दे रही हैं, तो फिर नक्सली ही अगर इस देश के संसदीय लोकतंत्र को खारिज करते हैं, तो क्या गलत करते हैं? कपिल सिब्बल ने जो कहा है वह हमारे जैसे लोगों को लंबे समय से महसूस होते आया है और हम बार-बार यह लिखते भी हैं कि देश की संसद और विधानसभाएं जिस तरह से करोड़पतियों और अरबपतियों से भरती चली जा रही हैं, उनमें गरीब की फिक्र करने वाले लोग अब बच कितने गए हैं? बाजार की ताकतें न सिर्फ झारखंड से राज्यसभा की सीटें खरीदती हैं बल्कि और जगहों पर भी पार्टियों की टिकटें अपनी मर्जी के लोगों के लिए खरीदती हैं और चुनाव में उनके लिए जीत और हार भी खरीदती हैं। इसके बाद जैसा कि राडिया टेप से सामने आया, बाजार अपने खरीदे हुए सांसदों के लिए मंत्रालय भी खरीदता है और फिर उसके बाद पूरे देश को खरीद लेता है, आसमान की दूरसंचार तरंगों से लेकर, जमीन के नीचे की कोयला खदानों तक। जब पार्टी, सांसद-विधायक, संसद के सवाल-जवाब, संसद का मतदान, वहां विधेयकों की रफ्तार और फिर बने हुए किसी कानून का लागू होना और न होना, यह सब कुछ मंडी में टोकरों में सजे हुए हों, तो फिर इससे ज्यादा पंसदीदा नौबत बाजार के लिए और क्या हो सकती है? 
जिन लोगों को सरकार, अदालत या लोकतंत्र के किसी भी और दायरे से कोई काम करना या करवाना होता है, उनकी बातों को सुनें तो ऐसे लोग सबसे अधिक खुश होते हैं कुर्सियों के बेईमान होने से। उन्हें यह भरोसा रहता है कि अगर कोई पैसा खा रहा है तो फिर काम तो हो ही जाएगा। एक केंद्रीय मंत्री जब सार्वजनिक मंच पर, उद्योग और व्यापार के एक संगठन में मंच और माईक से जब संसद की खरीदी-बिक्री के बारे में इस तरह साफ-साफ कह रहा है तो लगातार बेईमानी झेल रही जनता के मन की निराशा को एक सुबूत भी मिल जाता है। तमाम लोग यह देखते हैं कि किस तरह आज स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय, इन तमाम जगहों पर सत्ता की ताकत और पैसों का बोलबाला रहता है। महाराष्ट्र के मामले तो रोज सामने आ रहे हैं कि किस तरह वहां मुख्यमंत्रियों और दूसरे ताकतवर मंत्रियों ने अपने-अपने स्कूल-कॉलेजों के लिए सरकारी जमीनों को जुटाया। कुछ समय पहले यह बात भी खुलकर सामने आई थी कि किस तरह महाराष्ट्र के ही मंत्रियों के स्कूल-कॉलेज और उनके विश्वविद्यालय लाखों रूपयों में सीटें बेचते हैं। आज भी वे सारे लोग मंत्री बने हुए हैं और महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक राज कर रहे हैं। 
जब लोकतंत्र को हांकने वाले लोग अपने चक्कों तले कमजोर और गरीब लोगों के हकों को कुचलते हुए चलते हैं, और पैसे वालों को सब कुछ बेचते हुए चलते हैं तो लुटी हुई जनता का भरोसा लोकतंत्र से खत्म हो जाता है। भारत में आज नेता, राजनीति और अफसर, मीडिया जैसी तमाम ताकतों के लिए जनता के मन में नफरत इसीलिए बैठी हुई है कि उसे इस बात का पक्का भरोसा है कि भारतीय लोकतंत्र में हर ताकत अपने से कमजोर को लूटने के लिए ओवरटाईम कर रही हैं।
कपिल सिब्बल की पार्टी सात बरस से अधिक समय से देश को हांक रही है। उन्हीं की पार्टी के अर्जुन सिंह अपनी जिंदगी के आखिरी तमाम बरस देश की शिक्षा के मंत्री रहे, और उनके बाद से कपिल सिब्बल यह देख रहे हैं। इसके बाद भी अगर उनको देश के ताकतवर कारोबारियों की साजिश के सामने इतनी बेबसी लगती है, तो यह लोकतंत्र की नाकामयाबी का एक नमूना है। हमारा ख्याल है कि देश की राजनीतिक पार्टियों को, और दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कपिल सिब्बल की कही बातों पर आगे चर्चा करनी चाहिए, उस चर्चा के बिना बचा-खुचा लोकतंत्र खत्म हो जाना तय है।

पेशाब की धार का मुकाबला


19 अप्रैल 2012
संपादकीय
भारत ने आज अपनी एक ऐसी मिसाइल को आजमाया है जो पांच हजार किलोमीटर तक जा सकेगी। इससे चीन और पाकिस्तान सहित आसपास के तमाम देशों तक उसकी पहुंच बढ़ गई है और शायद अधिक वक्त नहीं लगेगा कि पड़ोस के ये दोनों देश इसके मुकाबले की ताकत पाने में जुट जाएंगे, या कि पा चुके होंगे, या पाने के करीब होंगे। हम अभी इस मुद्दे का कोई फौजी विश्लेषण नहीं करना चाहते कि भारत की फौजी जरूरतें क्या हैं और किसी लड़ाई की नौबत आने पर उसे किस-किस तरह से तैयार रहना चाहिए। दीवार पर लिखी हुई इस बात पढऩे और समझने के लिए किसी अधिक समझ-बूझ की जरूरत नहीं है लेकिन दीवार के आरपार देखने के लिए एक समझ जरूर लगेगी लेकिन उस समझ को रोकने में दुनिया के जंगखोर लोग और जंग के सौदागर, सभी लग जाएंगे। इसलिए आज की बात फौजी तैयारियों और जंग की जरूरतों से परे यह सोचने की है कि किस तरह हिंदुस्तान इस उपमहाद्वीप के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में हथियारों की कमी की तरफ बढ़ सकता है, और ऐसा माहौल बना सकता है कि बाकी लोग भी एक-दूसरे की देखा-देखी हथियारों की दौड़ में शामिल न हों। गांधी ने एक वक्त कहा था कि आंख के जवाब में आंख ले लेने की सोच एक दिन पूरी दुनिया को अंधा बनाकर छोड़ेगी। हथियारों की लड़ाई आज वही नौबत ला चुकी है कि भारत और पाकिस्तान की सरहद के दोनों तरफ करोड़ों की आबादी कुपोषण की शिकार है, भूख से मारी जा रही है, नर्क और जहन्नुम सी जिंदगी जी रही है और हथियारों के मुकाबले में लगी हुई है। आज अगर कोई यह सोचे कि मिसाइलों का यह मुकाबला महज मिसाइलों तक जाकर रूक जाएगा, तो वैसा भी नहीं है। आज इन मिसाइलों के मुकाबले में दूसरे देश मिसाइलें बनाने में लग जाएंगे, फिर इन मिसाइलों से बचने की तकनीक, और इन मिसाइलों को खत्म करने की तकनीक बनाने में दुनिया की हथियार कंपनियां कमाई करने लगेंगी और यह सिलसिला तब तक चलते रहेगा जब तक तमाम आंखें नहीं फूट जाएंगी। फिर एक दिन अमरीका जैसा दुनिया का दादा स्टारवार जैसी एक ऐसी तकनीक लेकर आ जाएगा जिससे कि आज ढाई हजार करोड़ रूपए में बनी भारत की बनी यह मिसाइल अंतरिक्ष से ही वार करके पल भर में खत्म कर दी जाएगी।
इस मुकाबले का कभी कोई अंत नहीं होगा क्योंकि सरकारों और कारोबारियों की एक मोटी कमाई जंग के मुकाबले से जुड़ी होती है और भाड़े के चारण और भाट वीररस गाकर, या किसी दूसरे मुखौटे के पीछे से एक दहशत फैलाकर जंग का खतरा बताते चलेंगे और दुनिया की भूख की कीमत पर मिसाइलें बनती चलेंगी। हम यह सोचते हैं कि यह ढाई हजार करोड़ रूपया अगर भारत और पड़ोसी देशों के बीच रिश्ते बेहतर करने पर खर्च होता तो जंग का मुकाबला आगे बढऩे की नौबत भी नहीं आती। आज तो यह सिलसिला बच्चों के मुंह से दूध और रोटी छीनकर बढ़ते चल रहा है। फौज और सरकार की सोच तांगे के घोड़े की ढंकी हुई आंखों की तरह बिल्कुल तंग नजरिए की होती है। और बाजार की जेब में जीता मीडिया भी जंग के बिगुल बजाने में लगा रहता है। ऐसे में अमनपसंद लोगों की आवाज कुचल दी जाती है, जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्तों की चाह रखने वाले लोग रात-दिन मेहनत भी करते हैं, और अपने-अपने देशों के युद्धोन्मादी लोगों की गालियां भी खाते हैं। पड़ोसी देश को दुश्मन मानकर चलने वाले लोग अपने देश के अमनपसंद लोगों  को गद्दार भी मानते हैं क्योंकि साधारण समझ रखने वाले लोगों को फौजी तैयारी देशप्रेम लगती है। 
गरीबी के शिकार दो देश अगर सरहद पर तनाव घटाकर अपने लोगों को बेहतर जिंदगी दे सकते हैं, तो यह उतना आसान चुनावी नारा नहीं बन सकता जितना कि जंग के माहौल में कोई बात बन सकती है। दूसरी बात यह कि गरीबों के दानों में बेईमानी करना थोड़ा मुश्किल होता है, और फौजी सामानों की खरीदी किस तरह आसानी से महंगी और बेईमान की जा सकती है यह भी सबका देखा हुआ है। भारत और पाकिस्तान जंग के सौदागरों के कारोबार के खरीददार बने हुए एक अंधे मुकाबले में लगे हैं और मिसाइलों की मार का यह मुकाबला ठीक वैसा ही है जैसा कि दो बच्चों के बीच पेशाब की धार दूर तक ले जाने का मुकाबला होता है। 

18 april


सिंघवी, सीडी, और सबक


18  अप्रैल 2012
संपादकीय
एक सेक्स सीडी को लेकर दिल्ली उबल रही है। एक नामी-गिरामी कुनबे के दूसरी पीढ़ी के देश के सबसे महंगे वकीलों में से एक, कांग्रेस सांसद और प्रवक्ता, अभिषेक मनु सिंघवी को किसी महिला वकील के साथ दिखाने वाली सीडी की सनसनी, कोल्ड ड्रिंक की ताजा खुली बोतल की तरह राजधानी में बिखरी हुई है। सिंघवी की अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगा दी है क्योंकि यह तर्क पेश किया गया था कि सिंघवी के भूतपूर्व ड्राइवर ने उन्हें धमकाने, ब्लैकमेल करने और बदनाम करने की नीयत से इस कथित खुफिया रिकॉर्डिंग में सिंघवी का कथित सेक्स दिखाने की बात कही है।
इस मामले पर सिंघवी के चालचलन और उनकी नैतिकता पर हमें कुछ नहीं लिखना है। इस चर्चित सीडी में उनके साथ दिखती महिला भी अधेड़ है और ये संबंध बिना जोर-जबरदस्ती, आपसी सहमति के लगते हैं। इनको लेकर सिर्फ इनके परिवारों को शिकायत हो सकती है, लेकिन इसमें पहली नजर में गैरकानूनी नहीं है। एक सांसद और पार्टी प्रवक्ता के लिए यह हरकत शर्मनाक है और पार्टी के लिए भी, लेकिन इससे परे की एक बात पर चर्चा अधिक जरूरी है।
ऐसा बताया जा रहा है कि इस रिकॉर्डिंग में जो महिला वकील पहचान में आ रही है, वह किसी अदालती दर्जे के पद पर अपनी नियुक्ति की बात कर रही है और उसे सिंघवी की तरफ से यह आश्वासन दिया जा रहा है कि उन्होंने इसकी सिफारिश कर दी है, और उसकी नियुक्ति हो जाएगी। यह बात गौरतलब है कि सिंघवी संसद की एक कमेटी के अध्यक्ष भी हैं जो कि न्यायिक जवाबदेही तय करने वाले विधेयक को तय कर रही है। ऐसे में कानून मंत्रालय  से लेकर दूसरी अदालती संस्थाओं तक उनकी कुछ अधिक पहुंच भी होगी। ऐसे में सिंघवी का किसी को नियुक्ति का भरोसा दिलाकर उससे देहसुख का फायदा पाना अगर सच है, तो यहां पर उनकी संसदीय जिम्मेदारियों और उनके निजी चाल-चलन के बीच एक टकराव खड़ा हो जाता है। हम ऐसी ही संभावना या आशंका को ध्यान में रखकर इस मुद्दे पर आज यहां एक सैद्धांतिक चर्चा कर रहे हैं, जो कि हो सकता है कल सिंंघवी के मामले पर लागू न भी हो। लेकिन इससे इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि अपने किसी सरकारी, संवैधानिक, संसदीय या सार्वजनिक पद पर बैठे हुए लोगों का कैसा आचरण भारत जैसे लोकतंत्र में मंजूर या बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
लोगों को याद होगा कि वाइट हाउस में एक बहुत जूनियर प्रशिक्षणार्थी मोनिका लेविंस्की के साथ संबंधों को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को अमरीका के इतिहास के सबसे शर्मनाक सेक्स-हादसे का सामना करना पड़ा था और वहां की संसद में महाभियोग भी झेलना पड़ा था क्योंकि उन्होंने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया था। कांगे्रस पार्टी, भारत सरकार और संसद, इन सबको सिंघवी के नाम के साथ जुड़े हुए इस मामले की हकीकत सामने आ जाने के साथ-साथ यह देखना होगा कि कहां-कहां पर अपने पद की ताकत के बेजा इस्तेमाल का मामला बनता है। यह बहुत तकलीफदेह बात है कि भारतीय लोकतंत्र में कभी किसी विधानसभा के भीतर विधायक और मंत्री अश्लील फिल्में देखते पकड़ाते हैं तो कहीं और किसी दूसरे तरह का सेक्स कांड होता है। लोग हंसी-मजाक में यह बात कहते हैं कि अगर व्यस्त जीवन और काम के बोझ के चलते ताकतवर लोगों को देह-सुख की जरूरत होती है तो उन्हें मामूली से खर्च पर ऐसे देशों में चले जाना चाहिए जहां पर कानूनी रूप से यह बाजार में मौजूद है। जब संबंध बनाना किसी तरह की निजी बेबसी हो तो भी सार्वजनिक जीवन के लोगों को सावधान रहना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि सिंघवी के नाम से जुड़ा यह कांड बाकी लोगों को भी सावधान करेगा क्योंकि आजकल कुछ हजार रूपयों में ही ऐसे खुफिया कैमरे और माईक्रोफोन बाजार में गली-गली मिलते हैं जिनसे किसी के भी निजी जीवन को दुनिया के सामने रखा जा सकता है।
कांगे्रस पार्टी के लिए यह एक भारी तकलीफ और शर्मिंदगी का मौका है, हम इस मौके पर सिर्फ इतना चाहेंगे कि निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन में बंटे हुए इस मामले के पहलुओं को अलग-अलग करके तौल लेना चाहिए और जितना मामला निजी है उसे छूना नहीं चाहिए और जितना मामला पद के प्रभाव के बेजा इस्तेमाल का है, उसे छोडऩा नहीं चाहिए।

दिल्ली में कांगे्रस के ताबूत में ठुकी तीन और कीलें


17 अप्रैल 2012
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली में तीन नगर निगमों के चुनाव में कांगे्रस का सूपड़ा ही साफ हो गया है। तीनों पर भाजपा का कब्जा हो चुका है और कांगे्रस की बहुत शर्मनाक शिकस्त है। वहां पर शीला दीक्षित मुख्यमंत्री हैं, जिनके इलाके में यह चुनावी नतीजे सामने आए हैं। उनके बेटे संदीप दीक्षित भी दिल्ली से ही निर्वाचित सांसद हैं, और ये नतीजे इन दोनों को नुकसान पहुंचाने वाले तो हैं ही, देश भर में कांगे्रस की जो फजीहत लगातार चल रही है यह उसी सिलसिले की एक और कड़ी है।
दिल्ली के स्थानीय चुनावों का कोई बारीक विश्लेषण करना आज का यहां मकसद नहीं है, लेकिन देश की राजधानी का माहौल बाकी देश तक जरूरत से कुछ अधिक जाता है और यह कांगे्रस को खासा सदमा देने वाला दिन है। हम पिछले एक-दो बरस लगातार कांगे्रस की लीडरशिप, कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार, उसके प्रधानमंत्री और इन सबके कामकाज को लेकर लिखते आ रहे हैं कि कांगे्रस हाईकमान के हाथ से रस्सी फिसलती चली जा रही है। इसकी सरकार के मंत्रियों से लेकर इसके नेताओं तक, और सुरेश कलमाड़ी जैसे इसके खेल राजनीति के नेताओं तक, यह पूरा खेमा अलीबाबा की कहानी के चालीस चोरों जैसा दिख रहा है। कदम-कदम पर देश को जिस तरह निराशा हो रही है उसी का नतीजा है कि दिल्ली में कांगे्रस को लोगों ने बुरी तरह से खारिज कर दिया है। यह शहर देश की राजनीति से कुछ अधिक जुड़ा होता है क्योंकि यहां की सुबह सत्ता के कारनामों से रंगे अखबारों से शुरू होती है। और कांगे्रस ने बुरी तरह बढ़ी हुई महंगाई के साथ तरह-तरह की कालिख से काला हुआ अपना चेहरा लोगों को दिया, और लोगों ने उसे धकेल दिया। 
उत्तरप्रदेश और पंजाब, गोवा और डांवाडोल उत्तराखंड के नतीजों के बाद अब दिल्ली के म्युनिसिपल के नतीजे देश की जनता का रूख बता रहे हैं। जो शीला दीक्षित सत्ता में तीसरी बार लौटकर आई थी वे भी अपनी पार्टी के लोगों को जिताने की ताकत कम से कम म्युनिसिपल चुनाव में नहीं दिखा पाईं। कांगे्रस के पार्षद भाजपा से आधे से भी कम दिख रहे हैं, और यह एक ऐसा तगड़ा झटका है जिससे अगर अभी भी कांगे्रस की नींद नहीं खुली तो देश भर के अगले चुनावों में वह इसी तरह खारिज कर दी जाएगी। पूरी तरह से और बुरी तरह से भ्रष्ट सरकार देने वाली यूपीए की मुखिया कांगे्रस का भविष्य, उसके खानदानी चिराग राहुल गांधी को उत्तरप्रदेश ने जिस तरह वापिस घर भेज दिया है, उससे अब गांधी परिवार का वह चर्चित करिश्मा भी ढीला हो गया दिखता है। जहां राहुल, प्रियंका, और उनके बच्चे, सब कोई चुनावी मंच पर पेश कर दिए थे वहां भी अमेठी और रायबरेली में कांगे्रस को लोगों ने खारिज कर दिया था। यह तो इस पार्टी की अपनी बेशर्मी है कि उस बुरी तरह हार का ठीकरा भी लोग राहुल के सिर पर न फोडऩे देने के लिए अपने सिर सामने कर रहे हैं, लेकिन महीनों से उत्तरप्रदेश में राहुल की बयानबाजी लोग देख ही रहे थे। इसलिए लोगों को ऐसा कोई शक नहीं है कि वहां की हार किसकी हार थी।
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन में कुनबापरस्ती को पूरी तरह खारिज करना चाहिए वह चाहे गांधी परिवार की हो, दीक्षित परिवार की हो या फिर मुलायम सिंह के कुनबे की हो। दिल्ली में सत्ता पर काबिज कुनबे के लिए भी यह एक झटका है और चाहे यह शिकस्त कुनबापरस्ती की वजह से न हुई हो, हम कुनबापरस्ती को इन नतीजों से लगने वाले झटके को महत्वपूर्ण मानते हैं और इसे लोकतंत्र की तरफ एक कदम भी मानते हैं। हमारा ख्याल है कि इन चुनावी नतीजों से कांगे्रस के अगले चुनाव के आसार का ताबूत अब तीन और कीलें ठुकवा चुका है।

गाय को खाना और बचाना


16 अप्रैल 2012
संपादकीय
हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में वामपंथी गुटों के समर्थन से दलित छात्र संगठनों द्वारा गोमांस उत्सव के आयोजन के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा विरोध के बाद रविवार शाम से फैले तनाव में पांच विद्यार्थियों को चोटें पहुंची हैं, जबकि दो वाहनों को आग लगा दी गई है। वरिष्ठ अध्यापकों और शहर के अकादमीशियनों के समर्थन से उस्मानिया वि वि के दलित छात्र गुटों ने दलित भोज संस्कृति को मनाने के लिए उत्सव का आयोजन किया था, गोमांस खाना इस संस्कृति का हिस्सा है।  कुछ हफ्ते पहले दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी उत्तर-पूर्वी राज्यों के छात्रों, अल्पसंख्यक छात्रों, दलित छात्रों और इन तबकों के खान-पान के अधिकार की वकालत करने वाले वामपंथी-उदारवादी छात्रों ने वहां भी इसी तरह के आयोजन की घोषणा की थी। उसके बाद वहां के बारे में कोई खबर हमें नहीं मिली लेकिन हैदराबाद का कल का यह तनाव उसी सोच की एक कड़ी है। 
दरअसल देश में गोमांस को लेकर लंबे समय से एक तनाव चले आ रहा है। हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों का एक हिस्सा ऐसा है जो कि गाय को दूसरे जानवरों से अलग गिनता है और आजादी के वक्त से ही गाय को बचाने के लिए, कसाईघर जाने से रोकने के लिए तरह-तरह के आंदोलन चलते आए हैं। देश के कई राज्यों में गाय को काटने और खाने के खिलाफ कानून बने हुए हैं। लेकिन यह पूरा मुद्दा हिंदू धर्म के एक ऐसे तबके का उठाया हुआ और चलाया हुआ है जो कि खुद भी हिंदू धर्म के इतिहास के एक बड़े हिस्से को मिटा देना चाहता है जिसमें कि वैदिक सभ्यता के समय से गोमांस को खाना प्रचलित था और आज हिंदू लोग जिन देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, जिन्हें भगवान मानते हैं, उनके गोमांस खाने की बात भी इतिहास के उस दौर में दर्ज है, इतिहास के पहले के दौर के रीति-रिवाजों के दस्तावेजों में दर्ज है। लेकिन आज भारत में यह एक बड़ा भावनात्मक मुद्दा है कि गोमांस को अपराध बनाया जाए या नहीं बनाया जाए।
जब देश का बहुसंख्यक हिंदू तबका, अपने एक हिस्से की इस आक्रामक और भावनात्मक पहल के पीछे चुप है, तब देश के ऐसे दूसरे तबके भी हैं जिनके संवैधानिक और नागरिक अधिकार बराबरी के हैं, जिनकी खान-पान की अलग संस्कृति है, और जिन तबकों को हिंदू धर्म के मुखिया तबकों की ज्यादती का शिकार हजारों बरस से होना पड़ा है, आज उनमें गोमांस के कानून के खिलाफ एक बगावत खड़ी हो रही है। अगर भारत को विविधताओं वाला एक देश मानते हुए सभी लोगों को अपने-अपने तौर-तरीकों के लिए आजादी दी जाती है, तो पूरा का पूरा उत्तर-पूर्व गोमांस खाता है, कश्मीर जैसे राज्य में गोमांस को लेकर बाकी मांस से अलग कोई भावना नहीं है, बंगाल और केरल में गोमांस पूरी तरह प्रचलित है, और देश भर के अलग-अलग आदिवासी हिस्सों में हमेशा से ही गोमांस खाया जाता रहा है। दरअसल बड़े जानवर का यह गोश्त सस्ता पड़ता है और तमाम गरीब तबकों के लिए उसी को खा पाना मुमकिन भी होता है। इसलिए जब एक भावनात्मक या धार्मिक आधार पर गोमांस पर रोक की बात आती है तो देश के दसियों करोड़ गरीब लोगों के खान-पान पर सीधा हमला भी होता है। किसी एक जानवर को लेकर एक धर्म की भावना अलग हो सकती है, लेकिन किसी दूसरे धर्म की भावना उस जानवर के बारे में वैसी होना जरूरी नहीं है। इसलिए हिंदू धर्म के एक हिस्से की जिद पर विविधताओं वाले इस देश में हर जगह गोमांस पर रोक लगाना नागरिकों के समान अधिकारों के खिलाफ जाता है। और जब बहुसंख्यक तबका अपने बाकी बहुत से तौर-तरीकों को लेकर अपने ही धर्म के दलितों के खिलाफ रहता है, अल्पसंख्यकों के खिलाफ रहता है, जब उत्तर-पूर्व को इस देश के बहुत बड़े हिस्से के लोग भारत में ही गिनना भूल जाते हैं, जब कश्मीर को देश के कुछ लोग पाकिस्तान का हिस्सा समझने की गलती करते हैं, तब कुछ हिंदुओं की गो-हत्या पर रोक की मांग सिर्फ एक किस्म के जानवर को बचाने की मांग नहीं रह जाती। उसका एक साम्प्रदायिक और राजनीतिक पहलू भी सामने आता है और उस आधार पर ही उसके खिलाफ बहुत से तबके उठकर खड़े होते हैं।
इन राजनीतिक, साम्प्रदायिक और शुद्धतावादी मुद्दों पर तो बहुत लंबी चर्चा की जरूरत है, लेकिन यह बात अपनी जगह सही है कि देश के बहुत बड़े तबके में प्रचलित गोमांस पर रोक लगाना संवैधानिक-बराबरी के पूरी तरह खिलाफ है। 
और जहां तक गाय को बचाने का सवाल है तो इसे लेकर आंदोलन करने वाले सवर्ण और संपन्न हिंदू तबके की आंखों तले कमजोर और बूढ़ी गाय सिर्फ घूरों पर जिंदा रहती है। उसे जिंदा बचाने में इन तबकों की कोई दिलचस्पी नहीं है और उसे कोई खा न ले यह एक बहुत बड़ा मुद्दा बनाया जाता है। मतलब यह कि ऐसे गौपे्रमी गाय को न जिंदा रहने में मदद करेंगे, और न उसे कटने देंगे। यह पूरा सिलसिला एक बड़ा पाखंडी सिलसिला है जिसके बारे में गौरक्षकों को खुद सोचना चाहिए। किसी की गाय को तब तक कोई ले जाकर कसाई को नहीं दे सकता जब तक कि उस गाय को फायदेमंद न पाकर खुद गौप्रेमी तबका छोड़ न दे। इसलिए आज जब देश में एक के बाद दूसरी जगह दबे-कुचले लोग गाय को खाना अपना अधिकार बता रहे हैं तो गाय को बचाना कहने वाले लोग इन सवालों का जवाब दें।

ममता को सुप्रीम कोर्ट से लताड़ की जरूरत


16 अप्रैल 2012
ममता बैनर्जी पर बनाए गए एक साधारण से कार्टून को लेकर उनकी तृणमूल कांगे्रस पार्टी के लोगों ने विश्वविद्यालय के इस कार्टूनिस्ट-प्राध्यापक को पीटा और वहां की पुलिस उन्हें इंटरनेट पर इस कार्टून को डालने को लेकर गिरफ्तार किया। पिछले बहुत से महीने ऐसे हुए हैं जब ममता बैनर्जी का नाम सिर्फ बुरी खबरों के लिए खबरों में रहा है। कभी वे अपनी ही भागीदारी वाली यूपीए सरकार से एक दिन में दो-दो बार झगड़ते दिखती हैं तो कभी वे अपनी ही पार्टी के रेल मंत्री को बर्खास्त करती हैं। एक बददिमाग और बेदिमाग तानाशाह की तरह वे अपनी तबाही करती चली जा रही हैं। 
किसी कार्टूनिस्ट या मीडिया के किसी हिस्से के खिलाफ नाराजगी को बदनीयत और जुल्म की हद तक ले जाने वाली सत्ता का भला इतिहास ने कभी नहीं देखा है। भारत में इसकी सबसे बड़ी मिसाल इमरजेंसी रही है जिसमें संजय गांधी की तानाशाही का झंडा लेकर चलते हुए छत्तीसगढ़ के ही विद्याचरण शुक्ल पूरे देश में एक खलनायक की तरह देखे गए और वह दौर है और आज का दिन है, इस देश के मीडिया ने उन्हें अच्छी नजर से कभी देखा ही नहीं। 
1984 की बात है, छत्तीसगढ़ के दौरे पर आए हुए देश के एक सबसे बड़े कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण ने एक इंटरव्यू में मुझे विद्याचरण शुक्ल के बारे में कुछ बातें कही थीं। (देखें बॉक्स)
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विद्याचरण में मुझे जेल की धमकी दी थी-आर.के. लक्ष्मण
प्रश्न- विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर ने अपनी पत्रिका शंकर्स वीकली बंद करने की घोषणा करते हुए आखिरी संपादकीय में लिखा था कि अब लोगों की सहनशक्ति कम होती जा रही है, लोग अपने पर बनाए कार्टून बर्दाश्त नहीं कर पाते ऐसे में कार्टून बनाना ही छोड़ देना बेहतर होगा, क्या आपको भी कभी ऐसी छटपटाहट होती है?
लक्ष्मण - आपातकाल में मेरे बहुत से कार्टून रोक दिए गए जो बाद में इलस्ट्रेटेड वीकली के एक अंक में जनता सरकार के आने पर छपे, सेंसरशिप के उस वक्त कोई पैमाना नहीं रह गया था सब कुछ सनक पर चलता था, ऐसे में हताश होकर मैं दिलली गया, वहां अपने दोस्त अफसरों से मिलकर कुछ जोड़-तोड़ बैठायी तब जाकर बंबई आकर 'फ्रीÓ होकर काम करना शुरू किया।
लेकिन इसके बाद आपके यहां के इन वी.सी. शुक्ल ने जो उन दिनों पूरे फार्म में थे, मुझे खुद धमकी दी कि मुझे जेल में डालवा देंगे। फिर तो हिम्मत टूट गई। समझ ही नहीं आता था कि कब तक चलेगी इमरजेंसी, खत्म होने के आसार नहीं थे मैंने रिटायर हो जाने का फैसला कर लिया।
कार्टून बनाना बंद करके छुट्टियां बिताने मॉरीशस चला गया। लेकिन वहां मैंने देखा कि उन देशों में व प. एशिया में भारतीय अफसर विदेशी दूतावासों में जाकर मेरे बनाए कार्टूनों की कटिंग्स दिखाकर जाहिर करते थे कि हिन्दुस्तान में अभी भी कितनी आजादी है। यह देखकर मैंने फिर लौटने का फैसला किया। फिर आम चुनाव आ गए जनता सरकार बनी और (हंसते हुए) इतनी आजादी मिली कि जिसका पूरा उपयोग कर पाना मेरे लिए संभव भी नहीं रह गया था।
प्रश्न- आज के राजनेता या अन्य प्रमुख लोग, आपके अपने कैरियर के शुरू के दिनों के समकालीन प्रमुख व्यक्तियों के मुकाबले कैसे लगते हैं? कौन सा वक्त था जब आपको कार्टून बनाने में सबसे ज्यादा मजा आया?
लक्ष्मण-आजादी के बाद से आज तक कभी भी स्थिति किसी कार्टूनिस्ट के लिए बुरी नहीं रही। हमेशा उसके लिए पर्याप्त सामग्री, स्थिति, लोग उपब्ध रहे लेकिन फिर भी एक केंद्रीय खाद्यमंत्री हुआ रकते थे कन्हैयालाल मानिक लाल मुंशी, खाद्य समस्या के हल के लिए वे एक से एक योजनाएं बनाते थे। एक थी अन्न उगाने के लिए पेड़ लगाओ, उनका ख्याल था कि ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के लगने से बादल रूक जाएंगे, पानी बरसेगा, जमीन उपजाऊ होगी तथा अनाज अधिक होगा, दूसरा नारा उन्होंने दिया था जिसके पोस्टर भी छपे थे। कम खाओ ज्यादा उगाओ यानि आदमी अपनी जरूरत से ज्यादा खाता है तथा अन्न बचाने के लिए खाना कम कर दे। वे एक कैरेक्टर थे फिर जब रफी अहमद किदवई आए तो उन्होंने राशनिंग वगैरह से सब सुधारा। फिर पाकिस्तान विभाजन का वक्त भी बहुत दिलचस्प विषयों से भरा पड़ा था उस पर कार्टून बनाते हुए बहुत मजा आया।
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ममता बैनर्जी ने तीन दशक से अधिक से बंगाल में जमी हुई कम्युनिस्ट पार्टियों को उखाड़कर फेंक दिया, और केंद्र में अल्पमत की यूपीए सरकार को वे बंदूक की नोंक पर रखती हैं, इसलिए उनकी बददिमागी बढ़ती चल रही है। एक कार्टून को लेकर किसी का इतना उबल पडऩा अगर जायज है तो सोनिया गांधी के कुनबे के बारे में उनसे नफरत करने वाले लोग जिस तरह की झूठी बातें इंटरनेट पर रोजाना डालते हैं, उस पर तो उनकी सरकार देश में आपातकाल ही लगा दे। 
ममता बैनर्जी ने अपनी पिछली पार्टी कांगे्रस की ऐतिहासिक गलतियों, और गलत कामों से भी कोई सबक लिया हुआ नहीं दिखता है। आपातकाल के समय वे पश्चिम बंगाल में महिला कांगे्रस की अध्यक्ष थीं और उन्होंने बेकसूरों पर संजय-इंदिरा की केंद्र और राज्य सरकार के जुल्म देखे हुए हैं। उन्होंने यह भी देखा है कि आपातकाल के साथ ही पश्चिम बंगाल से कांगे्रस की जो बिदाई हुई थी, और जिस तरह से वामपंथी वहां पर सत्ता में आए थे तो उसके बाद से अब तक कांगे्रस वहां हाशिए पर ही बनी हुई है। एक वक्त जो पार्टी बंगाल पर राज करती थी उस पार्टी का हाल यह है कि आज वहां बंगाल में ममता बैनर्जी के लिए दरी बिछाने का काम कर रही है। यह तो ठीक है कि वामपंथी सरकार कोई साढ़े तीन दशक तक वहां राज करने के बाद अब ममता के हाथों शिकस्त पाकर बाहर हुई है, लेकिन क्या हिंदुस्तान के इतिहास में सत्ता के इतने लंबे चलने की और कोई मिसाल है? और जिन वामपंथियों को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर माना गया, उन वामपंथियों को भी जनता ने बार-बार अगर चुना, तो उनमें कोई तो बात रही ही होगी। 
ऐसे बंगाल में एक बार सत्ता में आकर ममता ऐसी मदमस्त हो गई हैं कि लोकतंत्र के सारे तौर-तरीके खो बैठी हैं। यह सिलसिला कभी भी बहुत लंबा नहीं चलता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की आजादी पर हमला करने वाले देर-सबेर उसका लंबा भुगतान करते हैं क्योंकि जनता यह देखती है कि मुंह खोलने का अगर यह नतीजा है, तो ऐसी ज्यादती करने वाले लोग पहला मौका मिलते ही सत्ता से बाहर कर दिए जाएं।
ममता बैनर्जी नासमझ भी हैं। एक कार्टून जो कि हमारे इस अखबार में रोजाना बनाए जाने वाले बहुत तीखे और तेजाबी कार्टूनों के मुकाबले कहीं भी नहीं टिकता है, वैसे मामूली कार्टून को एक प्राध्यापक की गिरफ्तारी तक ले जाना, ममता बैनर्जी के एक अंत की शुरूआत हो सकती है।
भारतीय लोकतंत्र में ऐसे नाटकीय व्यक्तित्व पहले भी कभी-कभी, कहीं-कहीं आए हैं, लेकिन तानाशाही किसी की चली नहीं। आज अपनी खुद की पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के लिए ममता बैनर्जी का बर्ताव वैसा है जैसा कोई अपने पांव की धूल के साथ करता है। पैर झड़ाने के अंदाज में उन्होंने अपनी पार्टी के केंद्रीय रेल मंत्री को जितने घटिया तरीके से हटाया उससे पूरे हिंदुस्तान में उनके नाम पर धिक्कार ही धिक्कार सुनाई पड़ी है। और अब पिछले तीन-चार दिनों से पूरे देश में, और भारत में दिलचस्पी रखने वाली बाहर बसे लोगों में ममता के नाम पर एक नफरत सुनाई पड़ रही है। एक संभावना खत्म होते दिख रही है, इसका हमें अधिक अफसोस इसलिए है क्योंकि ममता के नाम के साथ अब तक कोई आर्थिक भ्रष्टाचार सुनाई नहीं पड़ा था और उनका निजी जीवन एक सादगी की मिसाल भी बना हुआ है। बंगाल में उन्होंने वामपंथी सरकार के जाने को मानो अपनी तानाशाही के पक्ष में जनमत मान लिया है। उन्हें यह मामूली समझ तो होना ही चाहिए कि साढ़े तीन दशक की सरकार के बाद सत्तारूढ़ पार्टी को जनता की कई तरह की नाराजगी का सामना करना ही पड़ता है और चुनावी नतीजे ममता को ही जनता की तारीफ शायद न हों, वे एक लंबी सत्ता से जनता का असंतोष शायद अधिक हो। ऐसे में अपनी हर हरकत से ममता जनता से दूर जा रही हैं। 
लेकिन ममता से परे हम अगर देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करें, तो शायद ही कोई सरकार, पार्टी और नेता ऐसे हों जो कि किसी कार्टून को लेकर बनाने वाले पर टूट पड़ें। इसे लेकर ममता के जुल्म के शिकार प्रोफेसर को ही नहीं, कुछ दूसरे मानवाधिकार संगठनों को अदालत तक जाने की जरूरत है ताकि सुप्रीम कोर्ट तक इस मामले को ले जाकर ममता को ऐसी लताड़ लगवाई जा सके कि वह देश के बाकी बददिमागों के लिए भी एक सबक बन जाए।