बिकिनी में बेटी


2 अपै्रल 2012
मेरे कुछ दोस्त पिछले कुछ दिनों से कुछ बेचैन से हैं। हमारे बीच से किसी एक ने अपनी बेटी को मॉडलिंग की इजाजत दे दी और एक मॉडल के रूप में उसकी तस्वीरें साडिय़ों से लेकर बिकिनी तक सामने आ रही हैं। इस पर दूर के पहचान के भी कुछ लोग भड़क गए हैं, और पास के लोग भी रियायत देते हुए बेचैन हैं। सबको लग रहा है कि यह सिलसिला आगे बढ़ा तो उनके बच्चे भी ऐसी कोई राह पकड़ सकते हैं जिसमें कल मां-बाप आसपास के लोगों को मुंह दिखाने के लायक न रहें।
जब ऐसे एक मामले को लेकर कुछ दोस्तों ने मुझसे पूछा कि क्या मां-बाप का अपने बच्चों के लिए ऐसा फैसला सही है? तो मेरे लिए जवाब देना मामूली सा मुश्किल था। लेकिन अगला सवाल यह था कि बिकिनी में तस्वीरें खिंचवाती ऐसी लड़की अगर मेरी बेटी होती तो भी क्या मेरा यही जवाब होता? इस पर मुझे कुछ मिनटों का वक्त लेना पड़ा क्योंकि पहले तो एक बेटी होने की कल्पना करनी थी, और फिर ऐसी किसी नौबत की। इसके बाद ही कोई जवाब बन सकता था, और मैं अपनी किसी सोच के बारे में अंधड़ सी रफ्तार से कोई जवाब देना भी नहीं चाहता था।
लोगों के उठाए सवालों पर मेरा सोचना और जवाब देना एक ही था। अगर कोई लड़की, या किसी दूसरे मामले में कोई लड़का, अठारह बरस का हो जाने के बाद अपनी मर्जी से मॉडलिंग करे, और खासकर ऐसे समाज में करे जहां पर कि बच्चे इस उम्र में घर से बाहर अकेले रहना भी शुरू कर देते हैं, तो उसमें मां-बाप की क्या दखल रह जाती है? लेकिन बात दखल से कुछ अधिक थी। अगर मां-बाप बेटी के इस पेशे को तारीफ की नजरों से देखते हैं तो वे बेबस मां-बाप से अधिक हैं और उनकी मर्जी बेटी के इस फैसले में शामिल दिखती है। और जब मां-बाप बच्चों के किसी फैसले को, किसी काम को तारीफ के लायक मानें, तो यह मानना जायज ही होगा कि वे उस फैसले को बढ़ावा भी दे रहे हैं।
अपने-आपके भीतर इस नतीजे पर पहुंचने के बाद जब मैंने मॉडलिंग के पेशे और बिकिनी जैसे कपड़ों में काम करने के बारे में सोचा, तो पहला ख्याल आया अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों का जब बॉबी नाम की फिल्म में नई अभिनेत्री डिंपल कपाडिय़ा एक बिकिनी में सनसनीखेज अंदाज में सामने आई थी और उस फिल्म ने देश की सभी पीढिय़ों को लपेटे में ले लिया था। इस फिल्म के बाद से बहुत सी ऐसी फिल्में आई हैं जिनमें फिल्म उद्योग के अरबपति परिवारों की बेटियां सभी किस्म के किरदार करते हुए सभी किस्म के कपड़ों में दिखती रही हैं, और उनके मां-बाप के आंसू कहीं देखने में नहीं आए। हिंदी फिल्मों के सबसे उत्तेजक एक नाच-गाने में तो जिस अभिनेत्री ने परदे पर आग सी लगा दी, उसने अपने जेठ (पति के बड़े भाई) के साथ परदे पर यह डांस किया था और इसके पीछे किसी तरह की न तो कोई बेबसी थी और न ही पारिवारिक नाराजगी इसके बाद दिखी।
इसके बाद दूसरी मिसाल सूझी भारत और दुनिया भर में होने वाली सौंदर्य स्पर्धाओं की। खूबसूरती तय करने के लिए जो पैमाने इन मुकाबलों में होते हैं, उनमें से एक में सभी सुंदरियों को स्विमसूट में भी मुकाबले में उतरना होता है, और हमारे सरीखे अखबार वाले हर बरस वैसी खूबसूरत युवतियों की तस्वीरें छापने की राह देखते हैं।  इनमें से जो भी लड़की ताज की हकदार बनती है, उसके मां-बाप का फख्र से जगमगाता चेहरा ही बाद में आने वाले इंटरव्यू में दिखता है, किसी ब्यूटी क्वीन के रोते हुए मां-बाप अब तक नहीं दिखे।
फिर एक मिसाल सूझी, टीवी पर चौबीसों घंटे आने वाले फैशन चैनलों की, जिन पर दुनिया भर में होते रहने वाले फैशन शो की स्टेज पर की, और स्टेज से परे की रिकॉर्डिंग आती ही रहती हैं। उनमें एक-एक शो में जो दर्जनों मॉडल्स दिखती हैं, उनमें से भी हर किसी के मां-बाप तो होते ही हैं।
कुल मिलाकर मतलब यह कि जब देह को दिखाने से कामयाबी मिलती है, और जब उसका इस्तेमाल समाज में मंजूर हो चुके तौर-तरीकों से होता है, तो उसे लेकर आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उसे कोई अपनी बदनामी की वजह नहीं मानते।  आज के जमाने में तैराकी से लेकर कई किस्म के खेलकूद ऐसे हैं जिनमें लड़कियों को भी कुछ खास किस्म के कपड़े पहनने होते हैं, और हम बाजार की हमलावर साजिशों को एक अलग चर्चा के लिए बचाकर रखें, तो विलियम्स बहनों के कपड़ों को लेकर क्या उनके मां-बाप को कभी कोई शर्मिंदगी हुई होगी?
बहस में जब इस तरह की कुछ बातें हो चुकीं थीं, तब तक मैं अपना दिमाग बना पाया था कि अगर कोई बेटी होती, और वह मॉडलिंग या फिल्म के पेशे में ऐसे कपड़े पहनकर तस्वीरें खिंचवाना चाहती, तो मैं एक पाखंडी होने के बजाय, उसके फैसले में खुशी से शामिल पिता होता। लेकिन अखबार का यह कॉलम ऐसी निजी चर्चा के लिए नहीं है, और अपनी सोच को भी मैंने एक मुद्दे पर अपनी सोच की शक्ल में सामने रखा है, ईमानदारी से।
अब छिड़ चुकी इस चर्चा के एक दूसरे पहलू पर आएं। समाज और भाषा इन दोनों में नग्नता को अश्लीलता और फूहड़ता के समान मतलब वाला शब्द मान लिया जाता है। इस चूक से भी बचने की जरूरत है। दुनिया के तमाम चित्रकला कॉलेजों में  बिना कपड़ों बैठी किसी मॉडल को देखते हुए उसके शरीर को बयां करने वाले चित्र बनाना पढ़ाई का एक हिस्सा होता है। भारतीय संस्कृति के मंदिरों से लेकर योरप में माइकलएजेंलो जैसे विश्वविख्यात चित्रकारों और मूर्तिकारों तक नग्नता को कला का एक महत्वपूर्ण माध्यम पाया गया है। दुनिया भर की प्रतिमाओं और तस्वीरों में बहुत खुलासे से बनाए गए बदन के पूरी तरह उघाड़े रहने पर भी उसे किसी ने अश्लील नहीं माना है। हर जगह उसकी जगह मंदिरों में और कलादीर्घाओं में है और बहुत से मामलों में बहुत दकियानूसी ईसाई धर्म के सबसे बड़े तीर्थ, वेटिकन में तो दीवारों से लेकर छत तक बदन बिखरे पड़े हैं।
बहस में मैंने बदन को लेकर यह भी याद दिलाया कि हिंदू और जैन धर्मों के साथ-साथ, दुनिया के बहुत से यूरोपीय देशों में पूरी तरह सामाजिक मान्यता प्राप्त नग्न बस्तियों की पुरानी परंपरा है। वहां किसी भी न्यूडिस्ट कॉलोनी को आपत्तिजनक या अपमानजनक नहीं माना जाता, और न ही उसे अश्लील या फूहड़ माना जाता। वैसी बस्तियों में रहने वाले लोग अपने को कुदरत के अधिक करीब पाते हैं। भारत में नागा साधुओं से लेकर जैन धर्म के एक सम्प्रदाय में बिना कपड़ों के रहने वाले संन्यासियों तक, सार्वजनिक जगहों पर भी ऐसी नग्नता को अश्लील या फूहड़ कभी नहीं माना गया। भारत में तो हिंदू धर्म के भीतर कुछ ऐसे तांत्रिक और गैरतांत्रिक रीति-रिवाज हैं जिनको बिना कपड़ों ही पूरा किया जाता है।
मध्य-पूर्व के जो मुस्लिम देश खासे दकियानूसी माने जाते हैं उनमें भी खूबसूरत महिलाओं के बैली डांस की पुरानी परंपरा रही है और इसे अश्लीलता से बहुत परे माना जाता है, पूरे के पूरे परिवार अपने बच्चों सहित इसे देखते हुए देखे जा सकते हैं।
दरअसल शरीर जहां-जहां दिखता है, उसे देखकर शरीर का सम्मान बढ़ता है। किसी खिलाड़ी के बहुत चुस्त बदन को देखकर लोगों को अपने बदन पर चढ़ी हुई  खतरनाक चर्बी खटकती है। जो लोग स्वीमिंग पूल पर या समंदर के किनारे कम कपड़ों में दूसरों के सामने आते हैं, वे ही अपने बदन को अच्छा बनाए रखने के लिए चौकन्ने होते हैं। स्वस्थ और सुंदर शरीर दूसरे लोगों को भी स्वस्थ और सुंदर बने रहने की राह दिखाते हैं।
ऐसे में अगर कोई युवक या युवती मॉडलिंग के पेशे को अपनाते हैं, तो हम घर बैठे टीवी पर उसे देखें, फिल्मों में देखें, घर पर आने वाली पत्रिकाओं में देखें, और उसमें कुछ भी गलत न पाएं, फिर भी उसे एक गलत पेशा मानें, तो यह शायद ऐसे दर्शकों और पाठकों का पाखंड सरीखा लगेगा। इसलिए जिन लोगों को ऐसा काम शर्मिंदगी से भरा लगता हो, उन्हें पहले मनोरंजन और खेलकूद से लेकर, मंदिर और कलादीर्घाओं तक को शर्मनाक मानना होगा, तभी जाकर उनका परहेज ईमानदार लगेगा।
इसलिए मैं अपने ऐसे दोस्तों के साथ हूं जो कि अपने बच्चों को ऐसे कामकाज को लेकर सिर ऊंचा करके चलते हैं।


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