31 मई 2012


पेट्रोलियम सबसिडी और बंद, दोनों गरीब-विरोधी


31 मई 2012
संपादकीय
पेट्रोल की महंगाई के खिलाफ बहुत से गैरकांगे्रसी दलों ने आज भारत बंद करवाया। उसकी कामयाबी कितनी रही, यह खबर धीरे-धीरे आएगी लेकिन इस पर कुछ चर्चा दोपहर के इस वक्त भी हो सकती है। पेट्रोल की महंगाई को रोकने के लिए केंद्र सरकार कोई सबसिडी को, उसके खिलाफ दो दिन पहले ही हमने इसी जगह अपनी बात लिखी। आज उसी को यहां दुहराने का कोई मतलब नहीं है और आज के इस बंद से फिर वही बात सामने आती है कि इस बंद की सबसे बड़ी मार रोज कमाने-खाने वाले उन छोटे मजदूरों या फुटपाथी व्यापारियों पर पड़ी है जिनका पेट्रोल से कोई लेना-देना ही नहीं है। ऐसे लोग अपनी एक दिन की कमाई खो बैठे हैं। 
हम नीतिगत रूप से बंद के पीछे की वजहों को अलग-अलग करके नहीं देखते कि किस मांग को लेकर बंद जायज है और किस मांग को लेकर नहीं। हम दरअसल पूरे के पूरे बंद के खिलाफ हैं जो कि हमारे हिसाब से एक राजनीतिक स्वतंत्रता न होकर एक धाक और दबदबे से लोगों पर लादा गया प्रदर्शन होता है जिसकी मार सबसे गरीब पर सबसे अधिक पड़ती है। देश की कई अदालतों ने समय-समय पर इस बारे में कहा भी है, और अदालतों के कहे हुए से परे भी हमारा अपना यह मानना है कि कोई भी बात किसी दूसरे पर हिंसक तरीके से नहीं थोपनी चाहिए। आज कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र तक कई जगहों पर हिंसा के साथ बसों को जलाया जा रहा है। जलती हुई बसों की तस्वीरें तो दिखती हैं, लेकिन ऐसी हर बस से परे हजारों लोग अपने आज के जरूरी काम को नहीं कर पाते, कोई अस्पताल नहीं जा पाते, तो कोई अपने छोटे से कारोबार में नुकसान झेलते हैं। और मजे की बात यह है कि आज के इस बंद के पीछे भारतीय जनता पार्टी सहित बहुत सी ऐसी पार्टियां हैं जिनकी सरकारें अलग-अलग प्रदेशों में काबिज हैं, और बढ़े हुए पेट्रोल-रेट पर इन सरकारों ने अधिक टैक्स भी पाना शुरू कर दिया है। हमारा सवाल यह है कि जो पार्टियां पेट्रोल की महंगाई के खिलाफ हैं, जो मुख्यमंत्री इस महंगाई के खिलाफ बयान देते हैं, वे इस बढ़े हुए रेट पर अधिक टैक्स किस हिसाब से ले रहे हैं? इसलिए पेट्रोल को लेकर इस तरह का आंदोलन किसी नैतिक अधिकार वाला नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी राज्य की भाजपा सरकार केंद्र के बढ़ाए हुए दाम पर टैक्स वसूल रही है। भाजपा के लोग आज सड़कों पर बंद करवाते हुए घूम रहे हैं। जनता को उनसे पूछना चाहिए कि अगर केंद्र सरकार की पेट्रोलियम कंपनियों का रेट बढ़ाना गलत है, तो उस बढ़े हुए रेट पर छत्तीसगढ़ सरकार का टैक्स वसूलना कैसे सही है?
आज के इस बंद को करवाते हुए जो लोग घूम रहे हैं, उनको इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि पेट्रोल की सबसिडी जनता के जिस खजाने से अब तक जा रही थी, उस खजाने पर देश की जिस ऐसी गरीब आधी आबादी का भी तो हक है जो पेट्रोल का इस्तेमाल नहीं करती, ऐसी आबादी गाड़ी चलाने वालों को राहत क्यों दे? जब यह देश आधी से अधिक आबादी को सस्ता अनाज देता है, तो ही हर दिन दो वक्त उनका पेट भर पाता है। ऐसी आबादी के हक के पैसे को गाडिय़ां चलाने वाले लोगों को क्यों दिया जाए? इसलिए यह बंद पूरी तरह से नाजायज है, और हम पेट्रोल पर सरकारी अनुदान को भी ऐसा ही नाजायज मानते हैं। चूंकि देश का मीडिया शहरी मध्यम वर्ग के हितों का ध्यान रखने वाला हो गया है, राजनीतिक दल भी संसद के भीतर उच्च वर्ग वाले हो गए हैं, इसलिए इस मुद्दे को उठाने वाले लोग कम रह गए हैं कि पेट्रोल की सबसिडी सबसे गरीब पर बोझ है। 
और बात सिर्फ पेट्रोल की नहीं है। डीजल पीते हुए आज शहरी संपन्न तबके की इतनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ां एक-दो सवारियों को लेकर चलती हैं, जितनी बड़ी गाडिय़ों के लिए अमरीका जैसा देश बदनाम है। ऐसी गाडिय़ों वाले लोगों को डीजल पर भी कोई रियायत क्यों दी जाए? कल केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी यह बात उठाई है कि आज हर आटोमोबाईल कंपनी डीजल कारें और गाडिय़ां इसलिए बना रही हैं क्योंकि पेट्रोल और डीजल के दामों में खासा फर्क है। जब बीस लाख से पचास लाख रूपये की गाडिय़ां लोग अकेले के चलने के लिए लेने का दम रखते हैं, लेते हैं, सड़कों को रौंदते हैं, तो फिर उन्हें रियायती डीजल क्यों मिले?
हमें हैरानी इस बात की है कि सबसे गरीब के हक वाले सरकारी खजाने पर पडऩे वाले पेट्रोल-डीजल की रियायत के नाजायज इस्तेमाल को वामपंथी दल भी अनदेखा कर रहे हैं और अपने शहरी वोटों की खातिर वे भी इस बंद में शामिल हैं और पेट्रोल महंगाई के खिलाफ हैं। हम पेट्रोलियम सबसिडी और आज के बंद दोनों को गरीब-विरोधी मानते हैं और इन दोनों के खिलाफ हैं।

30 मई 2012


30 मई 2012


29 मई 2012


29 मई 2012


29 मई 2012


इस कैंसर के विरोध की जरूरत


30 मई 2012
संपादकीय
आंध्र के हजार आबादी वाले एक छोटे से गांव को कल तंबाकू मुक्त घोषित किया गया। दो ही दिन पहले केरल की खबर थी कि वहां पर तंबाकू और गुटखा के पाऊच पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिए गए हैं। इसके पहले भी कुछ राज्यों ने ऐसी रोक लगाई थी लेकिन किसी कानूनी कमजोरी की वजह से वह रोक देश की बड़ी अदालतों में बहुत मोटी फीस पाने वाले वकीलों ने तेजी से हटवा भी दी थी। लेकिन अगले दो दिन तंबाकू विरोधी दिवस की खबरों से भरे रहेंगे इसलिए इसके बारे में कुछ बात होनी चाहिए।
हमारे नियमित पाठक जानते हैं कि हम अपने अखबार में लगातार तंबाकू से होने वाले नुकसान के बारे में अपनी तरफ से एक अभियान चलाते हैं और इस बारे में जागरूकता का कोई सा भी मौका नहीं चूकते। लेकिन यह कोशिश अकेले बिल्कुल भी किसी काम की नहीं होगी अगर सरकार का कानून और लोगों के बीच एक अभियान इसी किस्म का नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ में भी एक बार राज्य सरकार ने ऐसी कोशिश की थी लेकिन उसने कानूनी सीमाओं का ध्यान रखे बिना ऐसा आदेश निकाला गया था जो आसानी से अदालत में खारिज हो गया। लेकिन सरकारें तो अपना काम करें या न करें, समाज को यह सोचना चाहिए कि वह किस तरह से तंबाकू के जहर को पीढिय़ां खत्म करने से रोक सकते हैं। आज गांव-गांव तक छोटे-छोटे बच्चे गुटखा के पाऊच खरीदते और चबाते दिखते हैं। शहरों में स्कूल-कॉलेज के बच्चे चौराहों और फुटपाथों पर सिगरेट पीते दिखते हैं। सरकार तो रात-दिन चौकसी करके भी इसकी बिक्री को कमउम्र लोगों से दूर नहीं रख सकती लेकिन समाज के लोग चाहें तो जरूर ऐसा कर सकते हैं। हममें से हर कोई अपने और पराए बच्चों का फर्क किए बिना अगर तंबाकू खाते या उड़ाते लोगों को रोकना शुरू करें, तो हो सकता है कि शुरू में ऐसे लोग एक नाराजगी दिखाएं। लेकिन अगर उन्हें समझाने के लिए बहुत सस्ते से पर्चे छपवाकर लोग लेकर चलें, और उन्हें बांटें तो यह काम किसी ईश्वर के नाम पर बांटे जाने वाले पर्चों के मुकाबले बेहतर होगा और असरदार भी होगा। 
केंद्र सरकार के स्तर पर तंबाकू पर रोक के लिए जिस तरह की चेतावनी को बढ़ावा मिलना था, उस पहल को तंबाकू कारोबारियों की खरबपति लॉबी ने कुचलकर रख दिया। और इसमें इतनी मोटी कमाई है, और दिल्ली में फैसले लेने और नीतियां बनाने वाले लोगों में से इतने लोग इस कदर बिकाऊ हैं कि जहर के इन व्यापारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कभी हो ही नहीं पाएगी। इसलिए जनता को खुद होकर अपने बच्चों को, आने वाली पीढिय़ों को इस शर्तिया कैंसर से बचाना होगा। आज यह काफी नहीं है कि हमारे खुद के बच्चे तंबाकू नहीं खाएं और सिगरेट-बीड़ी न पीएं। अगर ऐसी अच्छी बात कुछ लोगों के परिवारों में है तो वह इस पीढ़ी को भी पूरे का पूरा नहीं बचा पाएगी, क्योंकि यार-दोस्तों के बीड़ी-सिगरेट के धुएं से भी आसपास के फेंफड़े छलनी होना तय होता है और यह कैंसर तक का पक्का सफर होता है। दूसरी तरफ तंबाकू का सिलसिला अगर कायम रहता है तो आपकी आने वाली कई पीढिय़ों को वह अपनी जकड़ में लेने की ताकत रखता है, और आज आपके बचाए बच्चों के बच्चे जब बड़े होंगे तो हो सकता है कि उस वक्त वे इस जहर से न बच पाएं। इसलिए सिर्फ अपने बच्चों को बचाना बिल्कुल ही नाकाफी है।
लोगों को सरकार पर यह दबाव डालना चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर कड़ाई से रोक लगाई जाए और समाज के भीतर के जिम्मेदार सरोकारी लोगों को पहल करनी चाहिए कि वे अपने इलाकों में, या जहां भी वे जाते हैं वहां, किसी को आसपास सिगरेट-बीड़ी नहीं पीने देंगे। इसके लिए जरा सा हौसला करके लोगों को नियम-कानून तोडऩे वालों को समझाना होगा और इस पर भी वे न मानें तो अफसरों को खबर करके वहां यह जिद करनी होगी कि वे कार्रवाई करें। आज तो चारों तरफ हमको यह देखने मिलता है कि स्टेशनों और बस अड्डों पर, फुटपाथों और मैदानों पर, बगीचों में और सरकारी दफ्तरों में हर तरफ लोग सिगरेट पीते रहते हैं। यह सिलसिला अपने-आप कम नहीं होगा, लोगों को इसके खिलाफ अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। 

संस्कृतियों और पीढिय़ों के टकराव से हत्या-आत्महत्या


29 मई 2012
संपादकीय
इटली में बसे हुए एक भारतीय ने अपनी पत्नी को इसलिए मार डाला क्योंकि वह पश्चिमी फैशन के कपड़े पहनती थी और यह पति उसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ पाता था। ऐसे कुछ और हादसे दुनिया के अलग-अलग शहरों में कुछ मुस्लिम परिवारों में भी हुए हैं और कभी फैशन को लेकर तो कभी पे्रम-प्रसंग को लेकर हत्याएं हुई हैं। भारत में हत्या से कम कई किस्म के तनाव रहन-सहन और जीवनशैली को लेकर होते आए हैं। फिल्मों और टीवी के रास्ते पश्चिम का जो उदार फैशन अपने खुलेपन के साथ भारत पहुंचा है और इसे लेकर अलग-अलग पीढिय़ों के बीच एक तनातनी का माहौल खड़ा होते ही रहता है। संस्कृतियों का टकराव और संस्कृतियों के बीच अंतरसंबंध सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं दुनिया के बहुत से ऐसे समाजों में तनाव पैदा करते रहते हैं जहां पर परंपराओं से लेकर पाखंड तक बहुत सी बातों को लेकर पीढिय़ों की सोच में फर्क रहता है। एक दूसरी खबर आज ही सुबह हरियाणा के कुरूक्षेत्र इलाके की है जहां पर कि एक लड़की को उसके भाई ने इसलिए मार डाला क्योंकि उसके फोन पर बहुत सी कॉल आती थीं और भाई को लगता था कि बहन किसी गलत चक्कर में पड़ गई है। हरियाणा और आसपास के इसी इलाके में हर बरस दर्जनों ऐसे मामले होते हैं जिनमें पे्रम-प्रसंग की वजह से परिवार अपनी लड़कियों की हत्या करवा देते हैं। दूसरी तरफ पे्रम और विवाह की इजाजत न मिलने पर हर बरस हिंदुस्तान में हजारों आत्महत्याएं होती हैं।
भारत में जिन मुद्दों को लेकर हम नौजवान पीढ़ी में तनाव देखते हैं उनमें से फैशन एक है और पे्रम-संबंध एक दूसरा मुद्दा है। आधुनिक रहन-सहन की छूट भी जो परिवार अपने बच्चों को देते हैं, उन परिवारों में भी जब इस तरह से, इस माहौल में बड़े हुए बच्चे अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनना चाहते हैं तो उन्हें सलीम और अनारकली की तरह करार देते हुए मां-बाप पल भर में शहंशाह अकबर बन जाते हैं। फिर देश का एक बड़ा छोटा हिस्सा ही ऐसा है जहां पर आज बड़े हो रहे बच्चों को अपनी मर्जी के फैशन की छूट मिलती है। कुछ तो फैशन ऐसे होते हैं जिनकी वजह से परिवार से परे भी समाज में एक तनाव खड़ा हो सकता है और भारत में बहुत से शहर इससे भी जूझ रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ बच्चों से परे बहुत से संयुक्त परिवार ऐसे हैं जहां पर एक साधारण सी फैशन के लिए भी परिवारों के बुजुर्ग मनाही कर देते हैं और घर की बहू या बच्चे लगातार तनाव या कुंठा में जीते हैं। और अब तो योरप के सबसे फैशनेबल देश इटली में बसे हुए हिंदुस्तानी ने जब अपनी बीवी को मार डाला है तो भारत में बहुत लोगों को इससे एक मिसाल भी मिलेगी।
हम हत्या जितनी बड़ी किसी घटना के पहले तक की जिस कुंठा को आज जिस तरह से अनदेखा किया जाता है उसकी बात करना चाहते हैं। आज महिलाओं और बच्चों का उठना-बैठना भी बहुत तरह के लोगों के साथ होता है। उनमें से बहुत से लोगों की हसरतें आज के जमाने के तौर-तरीकों का सुख पाने की रहती हैं। इनमें फैशन से लेकर पे्रम-संबंधों और पे्रम-विवाह तक लोग अपनी मर्जी के कई काम करना चाहते हैं और उसकी पारिवारिक या सामाजिक इजाजत न मिलने पर वे जिस तरह के तनाव में रहते हैं, उनसे उनकी सामाजिक उत्पादकता भी कम होती है। दुनिया में जो देश जितनी कम रोक-टोक के समाज वाले रहते हैं, उनमें अपनी संभावनाओं तक पहुंचने की संभावना उतनी ही अधिक रहती है। दुनिया के कट्टर देश, देशों के कट्टर समाज पिछड़ जाते हैं। ऐसे में किस तरह के देश में, कैसे माहौल में रहा जाए और वहां के उदार वातावरण के साथ कैसे तालमेल बिठाया जाए, इसे लेकर हमारी कोई सीधी सलाह नहीं हो सकती, लेकिन गैरजरूरी रोक-टोक और गैरजरूरी दकियानूसी रीति-रिवाज समाज का कोई भला नहीं करते हैं। इसलिए परिवारों को अपनी पारिवारिक सीमाओं को गैरजरूरी तरीके से तंग रखना छोडऩा चाहिए।

उत्तरप्रदेश का नया मुख्यमंत्री, और पुराने अपराध जारी


28 मई 2012
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के एक थाने में पुलिस की निगरानी में उसके एक दोस्त ने वहां लाई गई एक तीर्थयात्री लड़की के साथ बलात्कार किया। इस खबर की जो तस्वीरें टीवी समाचार में देखने मिली रही हैं उनमें पूछताछ करती हुई महिला अफसर अपने बगल में इस लड़की को खड़ा रखकर उसका बयान नोट कर रही है। पूरा उत्तरप्रदेश तरह-तरह की हिंसा, गुंडागर्दी और लूटपाट की घटनाओं से भर गया है। मायावती के पेश किए गए आंकड़ों पर न भी जाएं तो रोजाना ऐसी खबरें आती हैं कि वहां इतनी हत्याएं हो रही हैं और इतने बलात्कार हो रहे हैं। सत्ता से जुड़े लोग लगातार इन अपराधों से जुड़े मिल रहे हैं और कमोबेश इसी तरह का हाल मायावती के विधायकों और मंत्रियों का था जिनके खिलाफ ऐसे मामले दर्ज होते ही रहते थे और उनकी सत्ता से रवानगी भी होते रहती थी। समाजवादी पार्टी के मौजूदा मुखिया मुलायम सिंह एक तरफ अंबानी के करीब हैं तो दूसरी तरफ अमिताभ और तीसरी तरफ सहारा के सुब्रत राय के करीब। कारोबार की दुनिया के इतने बड़े-बड़े लोगों के साथ दोस्ती के बाद भी अगर समाजवादी पार्टी के नजरिए में आज की लोकतांत्रिक दुनिया के तकाजे के मुताबिक कोई सुधार नहीं हुआ है तो यह एक बड़ी शर्मिंदगी की बड़ी निराश करने वाली बात है। 
उत्तरप्रदेश में एक नई पीढ़ी ने काम संभाला है और मुलायम के बेटे अखिलेश यादव देश के सबसे कमउम्र मुख्यमंत्री हैं। उनसे लोगों को लगता था कि उत्तरप्रदेश की परंपरागत जुर्म भरी राजनीति से बाहर आकर कड़ाई से एक ऐसा माहौल बनाएंगे जिससे कि बाहर के लोग भी ताजमहल और बनारस से परे इस प्रदेश में आना चाहें। लेकिन उनका अब तक का रूख ऐसा दिखता नहीं है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि समाजवादी पार्टी और बसपा, इन दोनों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच देश-प्रदेश के कानून को लेकर जो गहरी हिकारत दशकों से वहां चली आ रही है उसे रातों-रात बदलना अभी सत्ता के हनीमून से गुजर रहे नए मुख्यमंत्री के लिए एकदम से मुमकिन न हो। लेकिन हम इन बड़ी उम्मीदों से परे भी इस बात को लेकर बहुत हताश और हक्का-बक्का हैं कि आईएएस और आईपीएस जैसे अफसर जो कि देश भर से चुनकर राज्यों में भेजे जाते हैं, वे भी उत्तरप्रदेश में इस कदर बेअसर कैसे हो जाते हैं और कैसे उनके अधिकार क्षेत्र में लगातार तरह-तरह के जुर्म होते हैं? बगल का बिहार जो कि लालू राज में हर किस्म की अराजकता देख चुका है, वहां पर अभी नितिश कुमार का एक कार्यकाल पूरा होते न होते माहौल बहुत बदल गया है। और पहले के मुकाबले वहां गुंडागर्दी और रंगदारी कुछ कम है। उत्तरप्रदेश में चाहे इस सत्ता के इन महीनों में अखिलेश यादव कुछ न कर पाएं हों, लेकिन अगर उन्हें इस देश में बाकी प्रदेशों के मुकाबले किसी भी तरह टिककर खड़े रहना है तो उन्हें राज्य का माहौल सुधारना होगा। एक बलात्कार किसी राज्य में वहां आकर काम करने की संभावना वाली हजारों महिलाओं का हौसला पस्त कर देता है और लोग किसी दूसरे राज्य में जाने की संभावना देखने लगते हैं। ऐसे में उत्तरप्रदेश में पूंजीनिवेश भी उतना नहीं जुट सकेगा जितना कि उसका हक बन सकता है। 
दरअसल किसी प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति और वहां पर कानून-व्यवस्था का हाल रातों-रात नहीं सुधर सकता। इसके लिए लंबी कोशिश लगती है, लगातार कोशिश लगती है। जिस तरह देश के कई राज्य साम्प्रदायिक हिंसा के आदी हो गए हैं और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य साम्प्रदायिक हिंसा से परे हैं, इसी तरह अलग-अलग राज्यों में मेहनत से एक ऐसा माहौल बनाना पड़ता है जिसमें कानून का सम्मान हो।  उत्तरप्रदेश में राजनीतिक ताकतों का अपराध से रिश्ता गहरा है और इसे तोडऩे की जरूरत है वरना वहां आने-जाने वाले लोग भी अपने-आपको सुरक्षित महसूस नहीं करते। आज देश में कोई एक राज्य अराकता के पैमाने पर इतना ऊपर हो यह बात शर्मनाक है।

गमलों के पौधे बरगद नहीं बनते

28 मई 2012
इन दिनों स्कूल के इम्तिहान के बाद कॉलेजों में दाखिले का मौसम चल रहा है। हर जगह यही सुनाई पड़ता है कि किस बच्चे ने कहां जाने की कोशिश की है। मां-बाप बहुत से मामलों में यह बताते मिलते हैं कि वे अपने किस बच्चे को क्या बनाना चाहते हैं। एक छोटा हिस्सा ऐसे लोगों का भी है जो कि अपने बच्चों की मर्जी से उन्हें कुछ बनने की इजाजत देना पसंद करते हैं। 
बहुत मामूली लगने वाली इस बात का आज यहां लिखना जरूरी इसलिए है कि स्कूल से कॉलेज के बीच के सफर में अधिकतर मामलों में मां-बाप मंजिल और डेरे तय करते हैं, जो कि हर बार बच्चों की पसंद के, उनके मिजाज के और उनके भले के नहीं होते। नतीजा यह होता है कि मां-बाप की हसरतों के मुताबिक, या पारिवारिक पेशे और कारोबार के मुताबिक बच्चे पढ़-लिख तो लेते हैं लेकिन पसंद की पढ़ाई न होने की वजह से वे अपनी संभावनाओं की उन ऊंचाईयों पर नहीं पहुंच पाते जो कि अपनी चाही हुई पढ़ाई करके पहुंच सकते थे। 
अपने आसपास के लोगों को देखें तो कुछ लोग ऐसे मिलेंगे जो घर के बच्चों में से एक को डॉक्टर, एक को इंजीनियर और एक को सीए बनाना चाहते हैं। इनमें भी अगर घर में बूढ़े बढ़ रहे हैं तो बड़े बच्चे की बारी डॉक्टर बनने की आती है। कारोबार में पिता अकेले पड़ रहे हों तो बड़े बेटे से कहा जाता है कि पढ़ाई के बजाय वह कारोबार शुरू कर दे, या कारोबार की जरूरत के लायक पढ़ाई करे। परिवार को अगर दिक्कतों से बचाने के लिए ऐसी कुर्बानी किसी को देनी होती है तो भी ठीक है, लेकिन बड़े-बड़े पैसे वालों में भी जब यह बात देखने मिलती है तो उसके पीछे कोई बेबसी नहीं होती। 
जिस तरह धरती का हर हिस्सा या अपने घर के अहाते का हर कोना हर किस्म के पेड़ों के लिए माकूल नहीं होता है और कोई पेड़ धूप नहीं झेल पाता, कोई छांव में मर जाता है, किसी को अधिक पानी बर्दाश्त नहीं होता, और कोई ऊंट की तरह प्यास वाला पेड़ होता है। कुछ पेड़ समंदर के किनारे भी नमकीन हवा में ही फल दे पाते हैं, कुछ को ओस जरूरी होती है, और कुछ बर्फ पड़े बिना अच्छे फल नहीं देते। ऐसा ही हाल इंसानों का भी होता है। कुछ बच्चे भाषा के मामले में तेज होते हैं, तो कुछ गणित में, कुछ खेलकूद में अच्छे होते हंै, और कुछ बच्चे फोटोग्राफी जैसे किसी हुनर में। उनकी हसरतें भी बहुत अलग-अलग होती हैं। जिस तरह कुदरत में अनगिनत रूप-रंगों वाले पेड़-पौधे होते हैं, जिस तरह समंदर की मछलियों में भी लाखों रंग-रूप होते हैं और इतने ही रंग-रूप पंछियों में भी होते हैं, इसी तरह इंसानों में भी दिल और दिमाग की पसंद के बहुत से रंग होते हैं। उन सबको मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून या मैनेजमेंट जैसे चार-पांच लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में बांट देना, उनकी क्षमता और संभावनाओं को किसी जंगले में जकड़ देने जैसा होता है।
आज जो मां-बाप बहुत अधिक जानकार भी हैं, उनका भी हाल यह है कि वे दुनिया में आज मौजूद बहुत सी पढ़ाई, बहुत किस्म के काम, रोजगार की कई किस्म की संभावनाओं के बारे में जानते ही नहीं हैं। इसलिए जो कुछ मामूली सी जानकारी उनको है वे उन्हीं कुछ बक्सों में अपने बच्चों को डाल देना चाहते हैं। यह एक बहुत खतरनाक नौबत रहती है जब मां-बाप का सम्मान करने वाले बच्चे उनकी हसरत को अपने लिए हुक्म मानकर चुप रह जाते हैं और उनकी कही हुई पढ़ाई करने लगते हैं। कुछ बच्चे ऐसे भी रहते हैं जो कि कुछ तनाव झेलकर भी मां-बाप से बहस करते हैं और अपनी मर्जी का पढऩे की कोशिश करते हैं। घर में भारी तनाव और तिरस्कार से जो हर्जा हो सकता है वह ऐसे बच्चों को झेलना पड़ता है, फिर भी वे औरों के मुकाबले बेहतर साबित होते हैं।
आज का यह कॉलम ऐसे मां-बाप और ऐसे बच्चों सभी के लिए लिखा जा रहा रहा है। हर किसी को यह समझने की जरूरत है कि आसपास मौजूदा और आसानी से दिखने वाली पढ़ाई या किसी प्रशिक्षण के बाद शुरू होने वाले पेशे से परे भी दुनिया बहुत बड़ी है। भारत में जो मां-बाप बहुत सोचते हैं, वे भी शायद आधा दर्जन कोर्स से परे नहीं सोचते होंगे। जबकि उनकी क्षमता और उनकी पहुंच के भीतर की ही पढ़ाई और प्रशिक्षण दर्जनों किस्म के होते हैं जिनके बारे में सोचा तक नहीं जाता।
एक बात पहले भी शायद मैंने अपने किसी कॉलम में लिखी थी। ब्रिटेन के मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में मेरी एक दोस्त पढ़ाती है। जब उसके स्कूल में पढ़ रहे बेटे ने कहा कि वह आगे पढ़ाई न करके, सामाजिक आंदोलनों की वीडियोग्राफी का काम करना चाहता है, तो उसने करीब पन्द्रह बरस उम्र के बेटे की इस सोच का साथ देते हुए उसे एक छोटा वीडियो कैमरा लेकर दिया और वह लड़का सामाजिक आंदोलनकारियों के साथ काम करने लगा, उनके आंदोलनों की रिकॉर्डिंग करने लगा। कुछ लोगों को ऐसे काम के बाद यह खतरा भी लग सकता है कि पढ़ाई से परे चले गए इस लड़के का भविष्य क्या होगा? लेकिन आज की दुनिया में अगर कोई हुनरमंद है तो उसकी पढ़ाई कोई महत्व नहीं रखती। हमारे ही अखबार के दफ्तर में किसी की पढ़ाई जानने की जरूरत भी नहीं पड़ती और लोग अपनी काबिलीयत के मुताबिक काम करते हैं न कि किसी डिग्री के मुताबिक।
इसलिए अगर अपने बच्चों को उनकी जिंदगी में कामयाब बनाना ही एक बड़ा मकसद है तो भी यह जरूरी है कि उन्हें दुनिया भर में उन्हें मिल सकने वाले मौकों के बारे में अधिक से अधिक बताया जाए, दुनिया के बारे में उनकी जानकारी बचपन से ही बढ़ाई जाए और उनकी पसंद के दायरे को बढ़ाया जाए। इसके बिना भी जिन लोगों की पसंद आज सीमित दायरे में किसी एक बात के लिए है, उन्हें भी अगर उस पसंद का इस्तेमाल करने नहीं मिलता है तो फिर यह एक तंग दायरे के भीतर भी मां-बाप की मर्जी के खूंटे से बच्चों को बांध देने जैसा है। एक कोल्हू का बैल भी काम तो करता ही है, लेकिन एक जगह बंधा हुआ घूमता हुआ वह कोई मंजिल तय नहीं करता, वह सिर्फ कोई रस निकालने या कोई तेल निकालने जैसा मजदूरी का ही काम करता है। अपनी मर्जी के, अपनी पसंद के खिलाफ पढऩे वाले बच्चे भी कोल्हू के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हुए जिंदगी तो काट ही लेते हैं, लेकिन वे अपनी संभावनाओं की मंजिल की तरफ बढ़ भी नहीं पाते। 
दुनिया उन लोगों से नहीं बनती है जो कि किसी अनचाही पढ़ाई से गुजरकर कोई अनचाहा काम करते हैं। इतिहास वे लोग लिखते हैं जो अपनी मर्जी का पढ़ते हैं, सीखते हैं, या नहीं भी पढ़ते हैं, और फिर अपनी मर्जी का काम करते हैं। गमलों में लगाए पौधे कभी बरगद नहीं बनते।

27 मई 2012


कानून कुचलता जिंदल


27 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में उद्योगों का फायदा और उनका नुकसान दोनों जो जिले झेल रहे हैं,  उनमें से एक रायगढ़ में वहां के दानवाकार उद्योग जिंदल पर कल कलेक्टर की बनाई सरकारी टीम ने जब छापा मारा तो इतने किस्म के नियम कुचले पड़े मिले कि जिनकी वजह से किसी दूसरे गरीब को बरसों की कैद हो गई रहती। लेकिन देश के सबसे ताकतवर और पैसे वाले उद्योगपतियों में से एक नवीन जिंदल कांगे्रस पार्टी के सांसद भी हैं और वे जब कानून को अपने कड़े बूट से कुचलते हैं, तो उनके हाथों में वह हिंदुस्तानी झंडा होता है जिसे फहराने के हक के नाम पर जीते मुकदमे की शोहरत से वे अपने-आपको बड़ा देशभक्त साबित करते हैं। छत्तीसगढ़ में हकीकत यह है कि इस राज्य के इतिहास में किसी कारखानेदार ने अगर सबसे अधिक कानून तोड़े हैं तो वे नवीन जिंदल हैं। यहां से हजारों करोड़ हर बरस कमाने के साथ-साथ वे यहां अपने कारखाने का जहर हवा से लेकर पानी तक घोल रहे हैं, मजदूरों का हक मार रहे हैं, प्रदूषण रोकने की मशीनें न चला कर बिजली बचा रहे हैं, और यह सब हमारा कहना नहीं है, यह सब एक नौजवान और कड़क कलेक्टर की कार्रवाई में कल सामने आया है। 
छत्तीसगढ़ में कम से कम हमारे अखबार के पाठक तो यह जानते ही हैं कि किस तरह देश के पर्यावरण के कानूनों को जिंदल बरसों से तोड़ते आया है। बिना इजाजत बिजलीघर बनाना शुरू कर देने पर नवीन जिंदल की ही कांगे्रस पार्टी के राष्ट्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने राज्य सरकार को निर्देश भेजकर रायगढ़ की जिला अदालत में जिंदल के खिलाफ अपराधिक मामला चलाने को कहा था और वह मामला अभी चल ही रहा है। इसके बाद राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यह पाया कि जिंदल की कोयला खदान को स्थानीय मंजूरी मिलने के लिए पर्यावरण सुनवाई पूरी तरह फिक्स की गई थी और किसी को मुंह खोलने का हक नहीं मिला, पूरी धौंस और पूरे बाहुबल के साथ यह जनसुनवाई पुलिस के साए में खत्म कर दी गई और उसे जनता की सहमति मान लिया गया। बरसों बाद जाकर अब देश की इस सबसे बड़ी पर्यावरण संवैधानिक संस्था ने जिंदल को मिली इजाजत खारिज करते हुए दोबारा जनसुनवाई में जाने का फैसला दिया है। 
आज पूरे प्रदेश में देश के कुछ और हिस्सों की तरह, जिस तरह से कारखानों के खिलाफ, खदानों के खिलाफ आम जनता के मन में नफरत खड़ी हो चुकी है, उसी का नतीजा है कि जगह-जगह नक्सली पैर जमा पा रहे हैं और उन्हें जनता के कम से कम एक हिस्से का तो साथ मिल ही रहा है। एक तरफ जब अरबपति और खरबपति कारखानेदार जनता की जिंदगी में जहर घोलते हुए, मजदूरों का हक छीनते हुए, मनमानी कर रहे हैं, तब इसी राज्य में फिलहाल तो दूसरे हिस्सों में हमारे जवान नक्सलियों से निपटते हुए रोजाना जान दे रहे हैं। आखिर कितना और वक्त लगेगा जब कारखानों के इलाकों में भी जमीन खोने वाले, सांस खोने वाले, आस खोने वाले लोग ऐसे कारखानेदारों से निपटने के लिए नक्सलियों को समर्थन देना शुरू कर देंगे? यह एक भयानक नौबत है कि जो कारखानेदार राजधानी रायपुर के चौराहों पर लाख-दो लाख खर्च करके अपने नाम की करोड़ों रुपए के बराबर की शोहरत के बोर्ड लगा लेता है, वह कारखानों और खदानों पर लागू होने वाले हर कानून को तोड़ते हुए मिलता है। जिंदल के सामने खड़े होने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का क्या हाल होता है यह भी लोगों ने देखा हुआ है। और जिंदल की मनमानी के खिलाफ, उसके कानून तोडऩे के खिलाफ इस राज्य में बहुत से तबकों में जिस तरह की चुप्पी के साथ सन्नाटा रहता है, उसकी वजह भी हर कोई जानता है। 
हम रायगढ़ के इस नौजवान कलेक्टर की पहल, और उसके पीछे राज्य सरकार की सहमति की तारीफ करते हैं कि सिर्फ ताकतवर होने से जिंदल को जनता का जीना हराम करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। और जब इतने सारे कानून कुचलने की बात सामने आ गई है, लगातार दिल्ली से लेकर बिलासपुर और रायपुर तक अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं में जिंदल के खिलाफ फैसले हो रहे हंै, तो ऐसी कंपनी को चौराहों पर कुछ लाख खर्च करके महानता का दर्जा पाने का मौका क्यों देना चाहिए? क्या अपराधों में फंसे हुए बाकी लोगों को भी सरकार ऐसा मौका देगी?

26 मई 2012


दिल्ली भागीदार नहीं?


26 मई 2012
संपादकीय
बगावत करके कांगे्रस से निकले हुए जगनमोहन रेड्डी आंध्र में आज खबरों में हैं। अरबों की अनुपातहीन संपत्ति के मामले में अदालत के दिए हुए जांच-आदेश पर सीबीआई ने अब केस तैयार करने की राह पकड़ी है। जगनमोहन के पिता वाईएसआर रेड्डी कांगे्रस के चहेते मुख्यमंत्री थे और हवाई हादसे में मौत तक वे कांगे्रस हाईकमान की पसंद बने रहे। इस दौरान सरकारी फैसलों की मेहरबानी से उनका बेटा करोड़पति, अरबपति और शायद खरबपति भी बनते चले गया। शायद सैकड़ों करोड़ की लागत से बना महल सा मकान हो गया, बड़े-बड़े कारोबार हो गए। जब पिता की मौत के बाद पार्टी ने पुत्र को मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो बगावत करके जगनमोहन ने नई पार्टी खड़ी कर ली। बगावत तो एक लोकतांत्रिक काम है इसलिए उसे लेकर हमें कुछ नहीं कहना है, लेकिन सवाल यह है कि जिस कांगे्रस पार्टी की राजनीति में हर नेता के पीछे केंकड़ों की तरह टांग खींचते दर्जनों नेता लगे रहते हैं, उस पार्टी में वाईएसआर के खिलाफ क्या उस वक्त पार्टी की आंख नहीं खुली जब सरकारी मेहरबानी से उनका बेटा अरबपति बन चुका था? ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कांगे्रस के नेताओं के खिलाफ कोई हाईकमान तक शिकायत न पहुंचाए।
दरअसल कांगे्रस में जगनमोहन रेड्डी हों, या कर्नाटक के बेल्लारी में भाजपा के रेड्डी भाई मंत्रिमंडल में हों और लोहे की अवैध खुदाई से हजारों करोड़ कमा रहे हों, येदियुरप्पा का कुनबा सरकारी फैसलों से करोड़ कमा रहा हो, इनती बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां अपने बेईमानों पर काबू क्यों नहीं पातीं? हम एक प्रदेश पर काबिज एक पार्टी पर काबिज एक कुनबे की बात नहीं कहते, करूणानिधि, जयललिता, लालू-मुलायम, बादल, माया जैसे बहुत से नेता पूरी तरह बेकाबू रहते हैं और अपने राज्य को वे अपनी खानदानी लाठी से हांकते हुए कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन कांगे्रस और  भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टियां हैं, उनको तो अपनी-अपनी पार्टी भ्रष्ट लोगों पर काबू रखने की तरकीबें आनी चाहिए। कांगे्रस पार्टी के भीतर सोनिया का कुनबा अगर भ्रष्टाचार पर उतारू हो जाए, तब तो यह कहा जा सकता है कि उसे कौन रोकेगा? लेकिन जब इस पार्टी के मुख्यमंत्री और मंत्री लूटपाट में लग जाते हैं, तब उन पर काबू न पाने के क्या मायने होते हैं? जब संघ परिवार और भाजपा के ऊंचे आदर्शों की बात कहने वाले, शुचिता का दावा करने वाले लोग दिल्ली में बैठकर भी अपनी पार्टी के प्रादेशिक भ्रष्टों पर कोई काबू नहीं पा सकते तो इसका क्या मतलब निकाला जाए? 
हमारा तो ऐसा सोचना है कि राजनीतिक दलों से जुड़े हुए किसी भी तरह के कारोबारी अपनी राजनीतिक संबंधों की वजह से कारोबार में कई किस्म के फायदे पाते ही हैं। और वैसे भी अगर किसी पार्टी के कोई नेता बहुत संपन्न हैं, तो उनसे उनकी पार्टी को मदद लेनी ही चाहिए। इसलिए बड़ी पार्टियों को अपने नेताओं को कोई पद देने या चुनाव की टिकट देने के लिए ऐसी शर्त रखनी चाहिए कि वे अपनी सालाना कमाई का कुछ फीसदी हिस्सा पार्टी को दें। वैसे भी जब दौलतमंद लोग किसी पार्टी में रहते हैं तो उन लोगों की पार्टी चंदे के लिए कारोबार-माफिया से सौदे क्यों करे? इन पार्टियों को अपने संविधान में फेरबदल करके पार्टी का खजाना भरने का जरिया तो निकाल ही लेना चाहिए। ऐसे हिसाब-किताब से यह भी पता लगेगा कि घोषित रूप से कौन से नेता कितने दौलतमंद हुए जा रहे हैं? आज जिस कांगे्रस पार्टी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार की जांच एजेंसी सीबीआई, कांगे्रस के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के बेटे को अरबपति-खरबपति साबित करने में लगी हुई है, उस कांगे्रस पार्टी को आज सार्वजनिक रूप से यह जवाब भी देना चाहिए कि उसके मातहत, उसकी सरकार चलाते हुए उसका एक मुख्यमंत्री अपने परिवार को कैसे इतनी दौलत दिला सकता है? और आज अगर कांगे्रस शासन के दौरान का भ्रष्टाचार आंध्र में साबित हो रहा है, भाजपा शासन के दौरान का भ्रष्टाचार कर्नाटक में साबित हो रहा है, तो इन पार्टियों को सार्वजनिक रूप से यह जवाब भी देना चाहिए कि उनकी सरकारें इस कदर लूटपाट कैसे करती रहीं, दिल्ली में बैठे इस पार्टी के बड़े नेता कैसे सब अनदेखा करते रहे? क्या सार्वजनिक जीवन में मुफ्त में कोई इतनी अनदेखी करता है? 
आज जिस जगनमोहन की वजह से हम इस पर चर्चा कर रहे हैं उस जगनमोहन के पिता वाईएसआर रेड्डी के इतिहास को देखें तो वे कड़प्पा जिले के एक ऐसे पिता के घर पैदा हुए थे जो कि सामंतों के खिलाफ दबे-कुचले लोगों का नेता था, और जिसनेे इस संघर्ष को विरासत में पाया था। आज उसी कुनबे का जगनमोहन एक राजनीतिक वारिस भी बना है और अरबपति-खरबपति भी बन चुका है। इस तरक्की पर कांगे्रस पार्टी का क्या कहना है? क्या यह आसानी से मान लिया जाए कि कर्नाटक और आंध्र की लूटपाट में दिल्ली की भागीदारी नहीं रही?

25 मई 2012


आज मोदी ही मुद्दा


25 मई 2012
संपादकीय
मुंबई में चल रहे भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रम में केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ जितनी खबरें निकलनी चाहिए थीं, वे तमाम मोदी लूटकर ले गए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय लीडरशिप को उसकी औकात समझा दी, और संघ-भाजपा के एक महत्वपूर्ण नेता, और अपने पुराने विरोधी, संजय जोशी को बेदर्दी से बेइज्जत करके बाहर जाने पर मजबूर कर दिया। जिस तरह की कल की सुबह भाजपा के लिए शुरू हुई, उसने ही बाकी तमाम राष्ट्रीय मुद्दों को भीतर के पन्नों पर धकेल दिया और मोदी का बाहुबल इस कदर पहले पन्नों पर छाया, कि शाम होने तक देश का मीडिया मोदी की राष्ट्रीय संभावनाओं और उनके राष्ट्रीय बोझ होने पर चर्चा में जुट गया था। एक बार फिर देश के लोगों को गुजरात के दंगों के वक्त के लहू सने हाथों वाला नेतृत्व याद आ गया।
यूपीए सरकार पर जितनी कालिख लगी है, उसी में ब्रश डुबा-डुबाकर विपक्षी दल देश की दीवारों को नारों से रंग सकते थे। लेकिन भाजपा आज अपने ही भीतरी कलह से जूझ रही है। और यह कोई नई बात नहीं है। न तो मोदी के हाथों और चेहरों पर हजारों मुसलमानों की मौतों का लहू कभी धुल पाएगा, और न ही गुजरात के भीतर भाजपा-संघ परिवार में मोदी का एक तानाशाह सा रूख लोगों की चर्चा से दूर हो पाएगा। नरेन्द्र मोदी ने अपने राज्य में आर्थिक सफलता हासिल करने के बाद धर्मनिरपेक्ष ताकतों, अल्पसंख्यकों, ईमानदार और निष्पक्ष अफसरों और हिंदू ताकतों के भीतर भी अपने विरोधियों, सबको एक बराबरी से ठिकाने लगाया। आर्थिक सफलता के आंकड़ों के पीछे सोलह हजार से अधिक दंगाग्रस्त मुसलमानों के अब तक राहत शिविरों में ही जीने के आंकड़े छुप जाते हैं। बाजार को देखने वाला मीडिया मुश्किल से ही कमाई के आंकड़ों के पीछे झांक पाता है। गुजरात के जिलों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अनगिनत अदालतों में मोदी और उनके लोग अनगिनत किस्म से जांच और कटघरों में घिरे हुए हैं, इसके बाद भी भाजपा के भीतर उनका दबदबा कल सुबह आसमान पर चढ़ा हुआ दिखा जब पार्टी के राष्ट्रीय कार्यक्रम में आने के पहले भी उन्होंने मानो बंदूक की नोंक पर अपने को नापसंद संजय जोशी को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निकलवाकर दम लिया और उसके बाद ही वे वहां पर आए। 
इन्हीं दिनों भाजपा के एक दूसरे नेता, कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा लगातार पार्टी को आंखें दिखा रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में बुरी तरह घिरे हुए इस दक्षिणी नेता को भाजपा का पश्चिमी सरदार सुहा रहा है। येदियुरप्पा ने खुलकर मोदी की तारीफ की है और भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को बिना रीढ़ की हड्डी का कहा है। ऐसे माहौल में आज जब पार्टी के संविधान को बदलकर नितिन गडकरी को अध्यक्ष के पद पर काबिज रखा जा रहा है तो दिल्ली में भी भाजपा के बहुत से नेताओं के बीच बेतहाशा बेचैनी है। दरअसल आज का यह वक्त न सिर्फ अगले आम चुनाव के वक्त पार्टी की लीडरशिप तय करने का है, बल्कि प्रधानमंत्री पद के अगले प्रत्याशी को तय करने का भी है और उस मामले में भाजपा के भीतर जहां मोदी सबसे वजनदार साबित हो सकते हैं वहीं पर भाजपा के बाहर उसके गठबंधन दलों के बीच मोदी सबसे कमजोर भी साबित हो सकते हैं और शायद हैं भी। उन पर साम्प्रदायिकता के जैसे दाग-धब्बे लगे हैं उनसे कोई तेंदुआ भी शरमा सकता है। इसलिए कल की मोदी की जीत पार्टी के भीतर, पार्टी को परास्त करते हुए कितनी आगे बढ़ पाएगी, इसमें हमें शक है। सहयोगी दलों के बीच सबसे नापसंद भाजपा नेता की बगावत की कीमत पर भी शायद पार्टी के बाकी राष्ट्रीय नेता मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने से परहेज करेंगे। जो भी हो अगले दो बरस दिलचस्पी के रहेंगे और आज तो लिखने के लिए बस मोदी ही एक मुद्दा हैं।

24 may 2012


24 may 2012


पेट्रोल में लगी आग बुझे तो कैसे बुझे?


24 मई 2012
संपादकीय
किसी ने कल इसे पेट्रोल-बम कहा तो किसी ने शनि की साढ़ेसती। एकमुश्त साढ़े सात रुपये लीटर का दाम बढऩे से पेट्रोल इस्तेमाल करने वाले लोग सदमे में हैं। देश के इतिहास में पहली बार एक साथ भाव इतना बढ़ाया गया है। सरकार का तर्क यह है कि कई महीने पहले पेट्रोल को सरकारी नियंत्रण से बाहर कर देने के बाद अब यह पेट्रोलियम कंपनियों के तय करने की बात हो चुकी थी कि वे पेट्रोल का दाम कितना रखें। लेकिन जिस तरह से संसद का सत्र खत्म होने के एक दिन बाद ही, सरकार की राजनीतिक सहूलियत का ध्यान रखते हुए यह बढ़ोतरी की गई है, उससे जाहिर है कि सरकार की इन सार्वजनिक क्षेत्र कंपनियों पर सरकार अपने असर का इस्तेमाल तो करती ही है। 
लेकिन इन मामूली बातों पर जाने के बजाय आज यह समझने की जरूरत है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम और भारतीय रुपये के दाम में जब भी घट-बढ़ होगी तब उसका बोझ किस पर जाए? यह एक बड़ा लोकप्रिय और लुभावना राजनीतिक नारा हो सकता है कि केंद्र सरकार इस बोझ को उठाए और पेट्रोल, डीजल, रसोईगैस और मिट्टी तेल पर सबसिडी जारी रखे। लेकिन सरकार की कोई भी सबसिडी उसकी कमाई से ही निकलती है और किसी दूसरे खर्च में कटौती से ही ऐसा रास्ता बन पाता है। अब यह देखें कि पेट्रोल के दाम में सरकारी रियायत का फायदा किन लोगों को होगा। देश में बड़ी-बड़ी कारें दौड़ाने वाले लोग, महंगी दुपहिया चलाने वाले लोग भी वही रियायती पेट्रोल पाते हैं जो कि सस्ते दुपहिया चलाने वाले लोग पाते हैं। और शायद देश की आधी आबादी ऐसी होगी जिसका पेट्रोल से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह आबादी या तो साइकिल चलाती है या डीजल से चलने वाली निजी और सरकारी सार्वजनिक गाडिय़ों में मुसाफिर की तरह चलती है। जिस देश में आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे हो, वहां पर सरकारी खजाने से निकलने वाली किसी भी रियायत का एक छोटा या बड़ा जैसा भी हिस्सा बड़ी गाडिय़ों और महंगी मोटरसाइकिलों पर भी जाता है, तो उस रियायत को सही कैसे ठहराया जा सकता है? किसी भी समझदार देश में लोगों को अपने इस्तेमाल का भुगतान करने की आदत होनी चाहिए। रियायत का हक सबसे गरीब तबके के लिए ही होना चाहिए। अभी रसोईगैस में रियायत को संपन्न तबके के लिए खत्म करने की तैयारी हो चुकी है। आयकर देने वाले लोग किस तर्क के आधार पर रसोईगैस या पेट्रोल में रियायत पाएं? 
आज लोगों पर इसका जो भी बोझ पड़ रहा है उसकी जिम्मेदारी सरकार पर हम एक दूसरी वजह से मानते हैं न कि महंगे पेट्रोल की वजह से। सरकार को इस देश में सार्वजनिक परिवहन का ऐसा ढांचा खड़ा करना चाहिए था जिससे कि हर आयवर्ग के लोगों की शहरी आवाजाही के लिए उन्हें अपनी जरूरत और पसंद के लायक बसें मिलतीं। बसों के अलावा कहीं पर रेलगाडिय़ों और कहीं पर भूमिगत मेट्रो। इनका ऐसा जाल अभी तक बिछ जाना था कि लोग अपनी गाडिय़ों पर चलने के बजाय इन पर चलते। आज अगर महंगी कार वालों के लिए एयरकंडीशंड बसें रहतीं तो बहुत से लोग कार के बजाय उनमें चलते हुए, या तो ड्राइविंग से बचते या ड्राइवर के खर्चे से बचते और उसमें कुछ पढ़ते हुए या कम्प्यूटर पर काम करते हुए चलते। आज दिल्ली में अगर कोई मेट्रो को देखे, और यह कल्पना करे कि उसके तमाम मुसाफिर अपनी निजी गाडिय़ों पर चलें, तो उस तस्वीर में दिल्ली की सड़क का एक इंच का हिस्सा भी खाली नहीं बचेगा। इसलिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की अहमियत केंद्र और राज्य सरकारों को समझनी थी, लेकिन आटोमोबाईल लॉबी के चलते जिस तरह अमरीका में चलते-फिरते रेल यातायात को खत्म किया गया था, उसी तरह भारत में शहरी परिवहन ढांचा खड़ा नहीं होने दिया गया। जिस राजधानी दिल्ली में देश के नेता बसते हैं, और जहां पर सुप्रीम कोर्ट के जज खुद प्रदूषण झेलते हैं, वहीं पर ऐसी योजनाएं बन सकीं। लेकिन बाकी देश में सैकड़ों शहरों में ऐसा कोई काम नहीं किया गया। 
दूसरी बात शहरी योजना की यह भी रहती है कि लोगों की गैरजरूरी आवाजाही को कैसे घटाया जाए? भारत के शहरों में लोगों के लिए इस तरह का ढांचा नहीं बनाया गया कि कम से कम दूरी पर उन्हें अधिक सुविधाएं मिल सकें। इसका नतीजा है कि शहर के व्यस्त इलाकों में लोगों को जरा-जरा से सामान या काम के लिए जाना पड़ता है। एक तरफ बसों की कमी, दूसरी तरफ शहरी योजना की कमजोरी, नतीजा यह हुआ कि लोग अपनी गाडिय़ों के बेबसी में मोहताज होते चले गए। आज जो राजनीतिक दल इस बढ़ोतरी को लेकर सड़कों पर हैं उन सबने कहीं-कहीं सरकारें चलाई हैं, और नारों से परे एक ठोस काम करने की जिम्मेदारी उन्होंने पूरी नहीं दिखाई।
एक आखिरी बात यह कि महंगे पेट्रोल के आयात को लेकर दाम में बढ़ोतरी का जो तर्क दिया जा रहा है, उसके साथ-साथ केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा टैक्स भी उस महंगे दाम पर अपने-आप बढ़ जा रहा है। पेट्रोलियम कंपनियां तो अपने घाटे को दूर करने के लिए दाम बढ़ा सकती हैं, लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें तो उस पर अपने टैक्स घटा सकती हैं। हमारे हिसाब से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि टैक्स प्रतिशत के आधार पर न लगकर एक तय रकम का लगे जिससे कि आयात का बोझ और अधिक बढ़कर जनता पर न पड़े। सरकारें बैठे-ठाले किस बात की अधिक कमाई करें? केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत अपने टैक्स घटाकर पांच बरस पहले के टैक्स की रकम जितने करने चाहिए ताकि लोगों को एक राहत मिल सके। केंद्र और राज्य के बजट में इस अतिरिक्त कमाई को तो रखा ही नहीं जाता है इसलिए उनको कोई घाटा नहीं होने वाला है, जनता की तकलीफ से सरकारों को अधिक कमाई का मौका मिलना क्यों जरूरी हो?

23 may


23 may


बुढ़ापे की जरूरत


23 मई 2012
संपादकीय
एक ब्रिटिश अखबार की खबर है कि मौत के करीब पहुंच चुके लोगों के बीच सामाजिक संबंधों के लिए एक सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट शुरू की गई है। ऐसा इसलिए किया गया है कि वे अपनी ही तरह के उन लोगों से बातचीत कर सकें जो मौत का इंतजार कर रहे हैं, बहुत बुरी तरह बीमार हैं या बहुत बूढ़े हो चुके हैं। माई लास्ट  विश नाम की यह वेबसाईट दुनिया भर के ऐसे एक-दूसरे से अनजान लोगों को जोडऩे का काम करेगी जो कि अलग-अलग किस्म के दायरों से आए हुए हैं। 
इस खबर से हमें दुनिया के दूसरे विकसित देशों में आज की एक दूसरी समस्या याद पड़ती है कि किस तरह बुजुर्गों की बढ़ती आबादी, छोटे होते परिवार, बढ़ते शहरीकरण और आर्थिक तंगी के चलते निम्न और मध्यम आयवर्ग के भीतर बुजुर्गों की देखभाल कैसे एक बड़ी दिक्कत बन रही है। आगे-पीछे भारत के बड़े शहरों में यही हाल होना है और एक कड़वी हकीकत तो यह है कि एक नामौजूद भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों के सम्मान के नारे से परे, बुजुर्गों की हालत बहुत जगह बहुत खराब है। आज इस चर्चा का यह मकसद बिल्कुल नहीं है कि ऐसी कोई वेबसाईट भारत के बुजुर्गों के काम आएगी, लेकिन यह जरूर है कि इस बहाने यहां की बुढ़ापे की दिक्कतों पर बात करने की जरूरत है। भारत में भी बहुत से परिवारों में बुजुर्गों को ठीक से रखने में दिक्कत होती है, या नई पीढ़ी इस जिम्मेदारी से बचना चाहती है। नतीजा यह होता है कि पाखंड का हमारा राष्ट्रीय चरित्र मां-बाप की सेवा के गुणगान करते हुए उनकी जरूरतों को बहुत से मामलों में अनदेखा करते चलता है। जिस तरह गाय को मां कहते हुए उसे घूरे पर छोड़ दिया जाता है उसी तरह परिवार के बुजुर्गों को किसी बहुत अच्छी हालत में रखना कई लोग नहीं कर पाते, या नहीं करते। ऐसे में समाज और सरकार को एक पहल करके बुजुर्गों के लिए ऐसी जगह बनाने की जरूरत है जो कि भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों को मुंह में कंकड़ की तरह खटकेगी, लेकिन हकीकत यह है कि उनसे इन बुजुर्गों में से बहुतों की हालत सुधर जाएगी। ऐसी जगह समाजसेवा के हिसाब से समाज या सरकार भी चला सकते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं, उनके लिए भी ऐसी जगह बननी चाहिए जहां पर कि वे अपनी पीढ़ी के लोगों के साथ रह सकें, सुरक्षित रह सकें और उनकी सेहत की देखभाल एक अधिक संगठित और व्यवस्थित तरीके से हो सके। अब मिसाल के तौर पर जिन लोगों के बच्चे दूसरे देशों में बस गए हैं और मां-बाप किसी वजह से वहां जाकर नहीं रह पाते, यहीं रह जाते हैं, और उनकी रोज की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं। ऐसे लोगों के लिए उनकी आर्थिक क्षमता के मुताबिक भुगतान करके रहने की ऐसी जगह रहनी चाहिए जहां पर वे वक्त बेवक्त इलाज भी पा सकें, और उनका वक्त अच्छे से कट भी सके। 
वृद्धाश्रम शब्द से बहुत से लोगों को परहेज है, ठीक उसी तरह जैसे कि लोगों को कसाईखाने से परहेज है। लेकिन जब गाय को बचाने के नाम पर उसे घूरे पर छोड़ दिया जाता है और मां-बाप को सिर्फ कुछ रकम भेजकर लोग उससे अधिक कुछ नहीं कर पाते, तो समाज में एक संगठित इंतजाम का विकल्प तो होना ही चाहिए। इसके बाद भी जो लोग अपने घर में रहना चाहें या जिन्हें उनकी औलादें अपने घर में रखना चाहें, वह तो रहे ही, लेकिन जिनकी दुर्गति हो रही है, कम से कम वे तो दूसरी जगहों पर एक नजर डालकर अपनी बची हुई जिंदगी की बेहतरी सोच सकें। सरकार को सामाजिक संस्थाओं को जोड़कर मुफ्त के और भुगतान वाले ऐसे अलग-अलग बसेरे बनाने चाहिए, क्योंकि अच्छा लगे या बुरा लगे, यह आज की जरूरत तो है ही।

22 मई 2012


22 मई 2012


आत्महत्या से कम दर्जे के तनाव की न खबरें बनतीं, न कोई इलाज


22 मई 2012
संपादकीय
बारहवीं के नतीजे निकले तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक गरीब मुस्लिम परिवार की लड़की ने लगातार दूसरे बरस फेल होने पर आग लगाकर आत्महत्या कर ली। यह तो बात इम्तिहान की थी लेकिन इससे परे भी साल भर आत्महत्या की खबरें आती हैं कि कहीं पे्रमी जोड़े ने आत्महत्या कर ली तो कहीं किसी एक अकेले निराश इंसान ने। समाज में तनाव लगातार बढ़ते चल रहा है, मुकाबला बढ़ते चल रहा है और नाकामयाबी की नौबत आने पर लोग खुदकुशी की सोचने लगते हैं। यह असफलता परीक्षा की भी हो सकती है और किसी पे्रम-प्रसंग की भी। लेकिन जब कोई जान चली जाती है तभी वह खबर बनती है। निराशा में जीते हुए लोग, तनाव में डूबे हुए लोग किसी तरह की खबर नहीं बनते और इस सामाजिक तकलीफ की तरफ ध्यान भी नहीं जाता। 
हम छत्तीसगढ़ राज्य को ही चर्चा के लिए लें, तो सरकारी मेडिकल कॉलेज और निजी पै्रक्टिस करने वाले मनोचिकित्सकों सबको गिन लें तो दो करोड़ की आबादी पर दो सौ मनोचिकित्सक भी छत्तीसगढ़ी लोगों को नसीब नहीं हैं। चिकित्सकों के नीचे मनोवैज्ञानिक परामर्श के लिए शायद पूरे राज्य में इतने लोग भी नहीं हैं। नतीजा यह होता है कि कहीं पढ़ाई की दिक्कत, कहीं परिवार के लोगों के साथ कोई तकलीफ और कहीं पे्रम-प्रसंग या शादी-शुदा जिंदगी के तनाव, लोगों का एक बड़ा हिस्सा मानसिक तकलीफ में जीता है और उसके पास किसी तरह का कोई इलाज नहीं होता, उसे कोई सलाह नसीब नहीं होती, और ऐसी दिमागी हालत में समाज में उसका वह योगदान कभी नहीं हो सकता जो कि अधिक जिम्मेदार देशों में एक नागरिक का होता है। फिर भारत तो ऐसे पाखंडी देशों में से है जहां पर पे्रम के खिलाफ नफरत है और जहां पर बच्चों के शोषण को लोग पश्चिमी बुराई मानते हैं जो कि भारत में मौजूद ही नहीं हो सकती। पति-पत्नी के बीच के रिश्ते गैरबराबरी के हैं जहां पर पत्नी का एक भड़ास के साथ जीना तय रहता है। लड़के-लड़कियों को उनकी उम्र के मुताबिक मिलना-जुलना कम नसीब होता है और जितने पे्रम-विवाह होते हैं, उनसे सौ गुना अधिक पे्रम-संबंध मां-बाप कुचलकर फेंक देते हैं। 
ऐसे में न सिर्फ हताश-निराश लोगों को मनोचिकित्सा और परामर्श की जरूरत होती है बल्कि उनके पूरे परिवार को इसकी जरूरत रहती है। लेकिन यह है कहां पर? इस राज्य को बने एक दशक से अधिक हो गया है लेकिन सरकार ने एक भी चिकित्सा महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में इस किस्म के कोई कोर्स शुरू नहीं किए। नतीजा यह है कि आबादी बढ़ रही है, तनाव तो बढ़ ही रहा है, उसके इलाज की कोई संभावना नहीं बढ़ रही। और तनाव से कुछ कम दर्जे की बात करें, तो स्कूल-कॉलेज के बच्चों को आगे की पढ़ाई और कामकाज के बारे में मार्गदर्शन देने के लिए सलाहकारों और मानसिक परामर्शदाताओं की जो जरूरत है वह तो अच्छी खासी महंगी स्कूलों में भी पूरी नहीं हो पाती है। दरअसल इस समाज में मानसिक जरूरतों के लिए समझ ही कम है। लोगों को लगता है कि डांटने-फटकारने से सारा काम निकल जाता है और बच्चे पटरी पर आ जाते हैं। यह सिलसिला बदलने की जरूरत है। इस विषय के जो जानकार हैं उनको समाज से लेकर सरकार तक एक बहस छेडऩे की जरूरत है जिसमें हमारे हिसाब से अखबारों में लिखकर, कुछ सार्वजनिक चर्चा करवाकर, सरकार को समझाकर इलाज करना चाहिए। 
राज्य सरकार को अपने विश्वविद्यालय में मनोचिकित्सा की पढ़ाई का विस्तार करके, परामर्श के कोर्स भी शुरू करने चाहिए, बढ़ाने चाहिए और सरकारी अस्पतालों में इनके लिए काम की जगह निकालने के साथ-साथ बड़े कॉलेज और स्कूलों में भी उनके लिए काम निकालना चाहिए। आज नौकरी की गुंजाइश नहीं होती इसलिए भी किसी पढ़ाई की तरफ लोग नहीं जाते। हालांकि हमारा यह मानना है कि मनोचिकित्सकों से लेकर परामर्शदाताओं तक के लिए राज्य में निजी पै्रक्टिस की भी भरपूर संभावना है। इस राज्य में एक बाल कल्याण परिषद नाम संवैधानिक संस्था है, महिला आयोग है, मानवाधिकार आयोग है, हमारे हिसाब से इस बारे में पहल करने की संवैधानिक जिम्मेदार इन सभी संस्थाओं की है। अपनी लालबत्तियों से बाहर आकर इनको समाज के तनाव को देखना चाहिए और सरकार को सुविधाएं बढ़ाने के लिए कहना भी चाहिए।

हत्या और मां-बाप


21 मई 2012
संपादकीय
आज से अदालत में फिर आरूषि हत्याकांड की सुनवाई तेजी से आगे बढऩे वाली है। यह मामला दिल्ली का होने की वजह से खबरों में जरूरत से हजार गुना अधिक रहा और पूरे देश में इस पर चर्चा भी जरूरत से हजार गुना रही। नतीजा यह हुआ कि अखबारों में और टेलीविजन पर इस हत्याकांड में मां-बाप की गिरफ्तारी और उन पर सीबीआई का चलाया जा रहा मुकदमा खबरों में इस कदर रहा कि देश भर में बच्चों से लेकर बड़ों तक को मानसिक तनाव झेलना पड़ा। अभी भी बहुत से बच्चे इस तनाव में जीते हैं कि उनके मां-बाप भी उन्हें मार सकते हैं। भारत में चूंकि बच्चों के मानसिक तनाव को लेकर किसी किस्म की चर्चा या सलाह-मशविरे का रिवाज नहीं है इसलिए कोई यह अंदाज लगाने वाले नहीं हैं कि दो कत्लों की यह खबर देश में कितना सामाजिक तनाव खड़ा कर गई है और बच्चों के दिल-दिमाग पर इन खबरों का कितना बुरा असर पड़ा है। इस बात पर आज यहां लिखना इसलिए भी ठीक और जरूरी लग रहा है क्योंकि सीबीआई ने इस पूरे मामले में अब तक जो कुछ हासिल बताया है उसमें इस बच्ची के कत्ल के लिए मां-बाप के खिलाफ और कोई सुबूत नहीं दिखे हैं, केवल यही सुबूत दिखा है कि किसी और के खिलाफ कोई सुबूत नहीं हैं। पहली नजर में अभी तक कि सीबीआई की कही बातें ये हैं कि चूंकि और कोई कत्ल करने की हालत में नहीं था, किसी और की लाशों तक पहुंच नहीं थी, इसलिए मां-बाप ने ही यह किया होगा। हम अभी इस केस पर अधिक जाना नहीं चाहते क्योंकि वह तो अदालत में तय होगा, लेकिन एक बात पर बहुत तकलीफ के साथ लगती है कि हत्या के चार बरस बाद भी आज हर कुछ दिनों में मां-बाप अदालत में घसीटे जाते हैं, मीडिया के कैमरे उनको हर बार बाकी देश के सामने पेश कर देते हैं, और चार बरसों के लंबे अरसे के बाद भी अभी यह तय नहीं है कि केस मां-बाप के खिलाफ कितना वजनदार है। 
अब हम सिर्फ बहस के लिए एक ऐसी नौबत सोचते हैं जिसमें कि इस बच्ची के मां-बाप अदालत से बरी हो जाते हैं। आगे चलकर अगर ऐसा होता है, तो इन बीते चार बरसों में, या इनकी गिरफ्तारी के बाद के ढाई-तीन बरस में इनकी जो प्रताडऩा हुई है, उसकी भरपाई कैसे होगी? जब भारतीय न्याय-व्यवस्था की भावना यह है कि चाहे सौ कुसूरवार छूट जाएं, एक भी बेकसूर को सजा नहीं होनी चाहिए, तो ऐसे में कत्ल की शिकार लड़की के मां-बाप की बरसों तक चली जांच और बरसों तक चली प्रताडऩा हमें एक बड़ी बेइंसाफी लगती है। मां-बाप पर शक करने की अगर कोई वजह है तो भी या तो यह जांच कुछ जल्दी होनी चाहिए थी, या फिर मां-बाप को इतने लंबे समय तक मुकदमे की सुनवाई के पहले जांच और अदालत की प्रताडऩा से दूर रखना चाहिए था। हो सकता है कि ऐसी नौबत देश में बहुत से दूसरे लोगों के सामने भी आती हो, लेकिन उन सबके बारे में भी हमारा यही मानना है कि जुर्म साबित होने के पहले की प्रताडऩा, सामाजिक सजा की लंबाई कम होनी चाहिए। क्योंकि आज जिस रफ्तार से यह प्रताडऩा और सजा इस बच्ची के मां-बाप पा रहे हैं, वह न्याय की भावना के हिसाब से बहुत ही नाजायज है। किसी भी मां-बाप को इतनी लंबी प्रताडऩा से नहीं गुजारना चाहिए। यह कहते हुए हम यह भी जानते हैं कि इसी देश में तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं मां-बाप अपने बच्चों का कत्ल करवाते पकड़ा रहे हैं, और बहुत से मामले सही भी साबित हो रहे हैं। लेकिन ऐसे तमाम मामलों में जांच के दौरान की बरसों की जेल ठीक नहीं है। जांच एजेंसियों के सुबूत और गवाह तेजी से जुटाकर उनकी हिफाजत का इंतजाम कर लेना चाहिए और फिर संदिग्ध रिश्तेदारों को जमानत मिलने देना चाहिए जो कि उनका हक भी है।
यह मौका मीडिया के लिए यह सोचने का भी है कि दिल्ली में टीवी चैनलों के कैमरों की अंधाधुंध मौजूदगी की वजह से क्या इतना बड़ा कवरेज ठीक है जिससे कि बाकी देश पर एक बुरा असर पड़े? एक वक्त भारत में अपराध की कहानियों वाली कुछ पत्र-पत्रिकाएं देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिकाओं से भी अधिक बिकती थीं। आज टीवी के समाचार चैनल या तो पुलिस के हुलिए में, या किसी अपराधी के हुलिए में अपने स्टूडियो से अपराध की घटनाओं को उसी तरह पेश करने लगे हैं। ऐसे बुलेटिनों से परे भी जब मुख्य समाचार बुलेटिन हत्या के शक में गिरफ्तार मां-बाप को जरा-जरा सी अदालती घट-जोड़ के लिए दिखाते चलते हैं तो यह भी एक भयानक नौबत है। इस पर सभी तबकों को सोचना चाहिए।

एक जिंदगी, और मौत की कहानी


21 मई 2012
रायपुर से बाहर सफर पर रहते हुए जब फोन पर पता लगा कि यहां की बुजुर्ग दासगुप्ता बहनों ने आत्महत्या कर ली, तो सीने पर एक तरह का घूंसा सा लगा। उनसे मेरी मुलाकात दशकों पुरानी थी। इनके घर भी जाना हुआ था और शुरूआत इनकी दरियादिली को देखकर हुई थी जो कि बाद में इनके हौसले की तारीफ में बदल गई थी। बिना शादी साथ रहतीं इन बुजुर्ग बहनों के तेवर आखिरी तक हक के लिए लडऩे के बने रहे और इस आत्महत्या को कोई चाहे पलायन कहे, मुझे लगता है कि यह अपनी जिंदगी को खत्म करने का उनका हक अधिक रहा। 
सरकारी नौकरी से रिटायर होने वाली इन दो बुजुर्ग बंगाली बहनों ने कुछ दशक पहले एक ट्रस्ट में बच्चों की स्कॉलरशिप के लिए अपनी बचत में से एक पर्याप्त रकम देने की पहल की थी। उसी सिलसिले में पहली बार उनसे मेरी मुलाकात हुई और उनकी इस चाह को पूरा करने के लिए मैं इस ट्रस्ट की तरफ से उनके घर गया और उन्हें सारी बातें समझाकर, शायद स्कॉलरशिप के लिए चेक लेकर लौटा था। 
उनके सामने एक लंबा बुढ़ापा था, और आसपास कोई रिश्तेदार भी नहीं था जो कि देखभाल करे, उनकी दौलत भी सिर्फ नौकरी से बचाए गए पैसे थे, न कि किसी और तरह की पारिवारिक दौलत। इसलिए उनकी एक सोच यह भी हो सकती थी कि अपने इलाज के लिए पैसों को बचाकर रखना, लेकिन इससे परे भी वे समाजसेवा के लिए खर्च करती थीं। 
अभी पांच-छह बरस पहले हमारे इस अखबार के दफ्तर में वे आईं क्योंकि उन्हें कहीं से इस अखबार को शुरू करने की खबर लगी थी। इस बार उनके पास अपनी एक दिक्कत थी। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सरकारी इलाके से लगकर अपने जिस निजी मकान में वे दशकों से रहते आई थीं, वहां पर अब एक मंत्री ठीक सामने के घर में रहने आ गए थे और उनकी, उनके घर आने वालों की, गाडिय़ां रात-दिन उनके दरवाजे पर रास्ता रोके खड़ी रहती थीं। इन दो बहनों में से एक लगातार बीमार भी रहती थीं और इन गाडिय़ों के धुएं से इनके शोर-गुल से उसकी तबियत और बिगड़ रही थी। दूसरी बहन ने लगातार मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक दौड़ लगाई ताकि उनके दरवाजे गाडिय़ों का डेरा लगना बंद हो। यह संघर्ष बरसों तक चला और फिर मुख्यमंत्री के एक आदेश के बाद उस पर अफसरों से अमल करवाने में एक पूरी जिंदगी ही मानो और लग गई। इसी दौरान वे इस बात को लेकर कुछ बार मेरे पास आईं और अपने हक के लिए उनके मन में इतना चौकन्नापन था कि वे कोई ज्यादती बर्दाश्त करने के खिलाफ थीं।
उनका दर्द बहुत लंबा-चौड़ा था, उनकी कई-कई पन्नों की शिकायतें तकलीफ और भड़ास से लबालब रहती थीं, और वे इस जिद पर भी अड़ी रहती थीं कि अगर हम उनकी शिकायत को छापें तो पूरी की पूरी छापें, वरना न छापें। इस किस्म की भावना अखबार में मानी नहीं जा सकती और उनके अलावा भी बहुत से लोगों से वक्त-वक्त पर मेरा मतभेद ऐसी बात को लेकर होते रहा है कि किसी बात को बिना संपादन के ही छापा जाए। उन्हें यह समझाने में मुझे खासी तकलीफ हुई कि अखबार की अपनी सीमा है और अखबार के पाठक के पढऩे की अपनी एक क्षमता है। लेकिन यह कहते हुए मुझे कुछ तकलीफ भी होती थी क्योंकि वे मुझसे मिलने के लिए कभी-कभी घंटों इंतजार करती थीं, क्योंकि अखबार पूरा बन जाने के पहले किसी से न मिलने की बंदिश अपने पर मैं लगाकर चलता हूं। उनकी शिकायत पर रिपोर्ट बनाकर हमने छापी भी थी लेकिन वे उससे नाखुश रहीं, और दुबारा वे किसी और रिपोर्टर से बात करने के बजाय मुझसे ही बात करने की जिद पर अड़ी रहती थीं। 
निपट बुढ़ापे में अपने घर के सामने के बंगले में बसे एक मंत्री के खिलाफ, तो कभी अपने घर के ठीक पीछे बसे किसी बहुत बड़े पुलिस अफसर के घर के पेड़ से होने वाली किसी दिक्कत के खिलाफ, वे लगातार अपने हक के लिए लड़ती थीं और अपनी सीमित बचत को गरीबों के लिए लगाने में भी उनकी दिलचस्पी बनी हुई थी। उन्होंने हमारे इस अखबार में भी किसी समाजसेवी ट्रस्ट के बारे में जानकारी ली थी, और ऐसी कोई संस्था यहां न होने की बात बताने पर वे कुछ निराश भी हुई थीं। 
आज यहां लिखने का मकसद न उनकी समाजसेवा है और न ही उनकी आत्महत्या। ये दोनों ही काम बहुत से लोग करते हैं। उन्होंने अपनी जिंदगी जीते हुए अपने हक के लिए जितना संघर्ष किया, जितनी दौड़-भाग की, जिस तरह मुख्यमंत्री के जनदर्शन तक पहुंचकर वहां से अपनी शिकायत पर जांच का आदेश करवाया, बड़े-बड़े अफसरों के पीछे लगकर जांच करवाई, और उस जांच पर अमल करवाने के लिए फिर मुख्यमंत्री और गर्वनर तक दौड़-भाग की, वह सब किसी फिल्मी सीरियल सा रहा। 
इसी बीच में मेरी बारी भी आती थी, और वे बिना फोन किए मेरे दफ्तर पहुंचकर घंटों इंतजार कर लेती थीं, और मेरी इस बेबसी का अंदाज भी उन्हें नहीं था कि काम पूरा होने के बाद कई बार मुझे दफ्तर के बाहर तकरीबन दौड़ते हुए ही अगले काम पर निकलना होता था। जब कोई आकर उनके बैठे होने की खबर देता था, तो कभी-कभी दौड़-भाग के बीच मैं एक किस्म की दहशत में घिर जाता था कि किसी और काम की जगह पहुंचने में आज लेट हो जाना तय है या फिर एक बुजुर्ग महिला को निराश करके, लगभग बदतमीजी से मुझे बाहर निकल जाना होगा, उन्हें किसी रिपोर्टर के हवाले करते हुए। 
कई बार मैंने उन्हें यह भी सुझाया था कि वे तकलीफ न किया करें, वे मुझे फोन कर दें तो मैं उनके घर आकर उनके कागज ले लूंगा, या किसी रिपोर्टर को उनके पास भेज दूंगा। लेकिन लोगों से लगातार मिलते हुए शायद वे इस बात को अच्छी तरह समझ गई थीं कि अपना कोई काम करवाना हो तो खुद ही जाना ठीक होता है। इसलिए वे बिना फोन किए, या फोन पर बात न होने पर भी सीधे चली आती थीं। 
सिर्फ हड्डियों सी लगती छोटी सी कद-काठी के साथ वे आती थीं, और अपने हक के लिए उनके मन में एक पहाड़ सी ताकत थी। जिन मामूली बातों को लेकर भारतीय लोकतंत्र में कमजोर लोग ताकतवर लोगों की ज्यादती को बर्दाश्त करने को ही बेहतर मान लेते हैं, उसकी आदत डाल लेते हैं, उन मामूली बातों के लिए वे इस तरह संघर्ष करती थीं कि मानो हक की लड़ाई उनकी जिंदगी का मकसद ही हो। अपनी बहन की सेहत के लिए अपने दरवाजे के सामने से धुएं और हॉर्न का प्रदूषण फैलाने वाली गाडिय़ों को दूर रखने के लिए उन्होंने अपने घर के ठीक सामने नो-पार्किंग का सरकारी बोर्ड लगवाकर ही दम लिया था।
वे सईद मिर्जा की फिल्मों के किसी किरदार की तरह एक भारी सनक के साथ हक की लड़ाई लडऩे वाली थीं, और नेक कामों में उनकी दिलचस्पी के चलते यह भी तय था कि इस लड़ाई के पीछे उनकी नीयत किसी को परेशान करने की नहीं थी, अपने को परेशानी से बचाने के हक के इस्तेमाल की थी। 
दोनों बहनों की इस तरह की खुदकुशी की खबर बहुत तकलीफदेह इसलिए भी है कि एक घनी बस्ती में उन्हीं पड़ोसियों के बीच पूरी जिंदगी गुजार देने के बाद भी ऐसी नौबत आई और न तो आसपास किसी को ऐसा अहसास हुआ, और न ही शायद व्यस्त शहरी जिंदगी में किसी के पास उनकी तकलीफ को जानने का वक्त ही रहा। मरने के बाद भी उन्होंने अपनी सहेजी हुई बचत को समाजसेवा के लिए लगाने की कोई वसीयत छोड़ी है, और यह बचत सादगी की एक जिंदगी गुजारते हुए उन्होंने की थी। 
मैं यह भी नहीं कहूंगा कि उनकी कोई कमी मुझे खलेगी, क्योंकि उनसे मुलाकात कुछ परेशानी की ही रहती थी। बहुत अधिक दौड़-भाग वाली जिंदगी में बिना समय तय किए किसी के आने से कभी भी खुशी नहीं होती। फिर उम्र के साथ उनके इरादों की मजबूती भी बढ़ती चली गई थी, लेकिन एक अखबार में उनकी हर चाहत और हर जरूरत की गुंजाइश नहीं थी। आज उनके बारे में यह लिखते हुए उनके संघर्ष को जब याद कर रहा हूं, तो लग रहा है कि ऐसा तो किसी भी और को मैंने इतने बरसों तक देखा नहीं था। जो सत्ता से लडऩे का पहाड़ चढ़ती रही, वह आखिर में आकर जिंदगी की सांसों से इस तरह लुढ़क गई!

भारत में नेताओं के भरोसे कुछ नहीं छोड़ा जा सकता


20 मई 2012
संपादकीय
अपनी सरकार का पहला बरस पूरा होते-होते किसी की शोहरत इस कदर गिर सकती है, यह कल्पना से परे की बात है, ममता बैनर्जी के बारे में। वाममोर्चे की तीन दशक से अधिक पुरानी सरकार को एक सैनिक वाली सेना की तरह चुनावी बहादुरी दिखाते हुए ममता ने उखाड़ फेंका था। लेकिन आज इस एक बरस में वे दर्जन भर ऐसे गलत काम कर बैठी हैं जिन्हें कोई बददिमाग और बेदिमाग तानाशाह ही कर सकते थे। ममता बैनर्जी ने अब तक एक सरकार के रूप में तो कोई असर छोड़ा नहीं है, सिवाय कुछ मामलों में अपनी सादगी के। दूसरी तरफ वे बंगाल को एक अलग देश साबित करने में लगी हैं, और अपने-आपको उसका मालिक। यह सिलसिला देश और दुनिया के उन तमाम पढऩे-लिखने वाले, सोचने-समझने वाले और उदार-लोकतांत्रिक लोगों को बुरी तरह हिला गया है। 
एक महिला मुख्यमंत्री के बारे में आज अगर यह कहा और लिखा जा रहा है कि वे अपने राज में एक महिला से बलात्कार को मजाक की तरह लेती हैं और एक कार्टून के मजाक को अपने कत्ल की साजिश कहती हैं, तो वे एक सभ्य लोकतंत्र में नहीं जी रहीं। कल एक टेलीविजन प्रोग्राम में वे बंगाल की एक छात्रा के एक बहुत ही मासूम सवाल पर भड़क गईं और उसे सीपीएम और नक्सलियों की कार्यकर्ता बताते हुए, प्रसारित होते कार्यक्रम के बीच से उसे छोड़कर चली गईं। उसके बाद पुलिस ने सवाल करने वालों के संबंध में जांच शुरू कर दी। ममता के तौर-तरीके यह बताते हैं कि सार्वजनिक जीवन में रहते हुए और एक सरकार को चलाने की संवैधानिक शपथ लेने के बाद भी उनके मन में न तो इंसाफ के लिए कोई इज्जत है और न ही अपने साथियों के लिए कोई सम्मान। अपनी पार्टी के सबसे बड़े केंद्रीय मंत्री को वे उसी तरह उठाकर कूड़ेदान में फेंक चुकी हैं जिस तरह कोई सर्दी पोंछकर कागज के रूमाल को फेंकते हैं। यह सिलसिला लगातार बढ़ते ही चल रहा है और एक तरफ वामपंथियों से नफरत, दूसरी तरफ महत्वोन्माद, इन दोनों पाटों के बीच में  ममता की शोहरत साल भर में ही पिसकर चूर-चूर हो गई।  आज ही सुबह अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर एक शेर डाला है-उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पे थी और आईना साफ करता रहा...। यह बात मानो ममता बैनर्जी पर लागू हो रही है।
दरअसल एक तरफ जब ममता बैनर्जी एक मासूम कार्टूनिस्ट को जेल भेज रही है और एक बहुत ही साधारण व्यंग्य को कत्ल की साजिश बता रही है तब इस देश की संसद में दलितों के उठाए एक मुद्दे पर राजनीतिक दल और सरकार मिलकर हड़बड़ी में साठ साल पुराने एक कार्टून को स्कूली पढ़ाई की किताब से निकालकर फेंक दे रहे हैं। जब पूरे देश का माहौल ऐसा है तो ममता बैनर्जी का कुसूर कुछ कम लगने लगता है और कार्टूनिस्ट मुजरिम लगने लगते हैं। भारत को इंदिरा के वक्त के आपातकाल की याद होगी जिसके पहले से कुनबापरस्ती के चापलूसों ने यह हल्ला करना शुरू कर दिया था कि इंदिरा के खिलाफ एक विदेशी हाथ साजिश कर रहा है। और अब जब आपातकाल को एक जिंदगी गुजर गई है, तब भी ऐसे किसी हाथ की शिनाख्त उनकी हाथ छाप पार्टी और उसकी सरकारें नहीं कर पाई हैं। उस वक्त ममता बैनर्जी कांगे्रस में थीं, और ऐसा लगता है कि कत्ल की साजिश की उनकी यह कल्पना या उनका यह बहाना, उन दिनों के अनुभव पर आधारित हैं। जब इंदिरा और संजय गांधी का लगाया हुआ आपातकाल था तब तो कार्टूनों पर लोगों को जेल होना चल गया था, लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में भी आपातकाल से मुंह जला चुका यह देश छांछ के घड़े को अगर लात मारकर गिरा रहा है, तो ऐसा देश आज पूरी दुनिया में सिर्फ हैरानी और हिकारत से देखा जा रहा है। दुनिया के सभ्य होने के साथ-साथ एक-दूसरे के लिए जो बर्दाश्त बढऩा चाहिए, वह हिंदुस्तान में खत्म होते दिख रहा है। और यह कैसी हैरानी की बात है कि पिछले कुछ समय में न तो भारत की साम्प्रदायिक ताकतों से ऐसे हमले हुए, और न ही परंपरागत रूप से प्रतिबंध की पक्षधर पार्टियोंं ने ऐसा किया। अब ममता बैनर्जी से लेकर दलित तक प्रतिबंध के हिमायती हो गए हैं। 
यह सिलसिला भयानक है। एक तरफ जिस आंबेडकर के कार्टून को लेकर दलितों और बाकी नेताओं के एक तबके ने विशेषज्ञों की तैयार की हुई कोर्स-किताबों को संसद की बहस के बीच ही सरकार से खारिज करवा दिया, उस आंबेडकर का परिवार इस पर हक्का-बक्का है और कार्टून बनाने वाले शंकर का परिवार तो हक्का-बक्का है ही।  आज वोटों का डर दिखाकर देश के किसी हिस्से में किसी जाति का जिक्र इतिहास से खत्म किया जा रहा है तो कहीं इतिहास के पन्नों पर पौराणिक काल से ही हिंदुओं में प्रचलित गोमांस खाने का जिक्र मिटाया जा रहा है। जो समाज अपने इतिहास को देखने का साहस नहीं कर सकता वह समाज इतिहास के आधे-अधूरे चबूतरे पर  डगमग ही खड़ा रह सकता है। इससे एक ही बात साबित होती है कि सच से लेकर लोकतंत्र की दूसरी बातों तक, कुछ भी राजनीति और नेताओं के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते। 

आईपीएल पर रोक लगाने से क्या होगा


19 मई 2012
संपादकीय
आईपीएल मुकाबलों पर बवाल बढ़ता ही जा रहा है। शाहरुख खान  का विवाद थमा भी नहीं था कि एक विदेशी महिला ने विजय माल्या की टीम के एक खिलाड़ी पर छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया, और माल्या पुत्र ने इस महिला पर उन्हेें चारा डालने का आरोप लगाया। इन विवादों में बहुत से नेता भी कूद पड़े हंै और आईपीएल बंद करने की मांग उठने लगी है। इस पूरे मामले में बीसीसीआई का बर्ताव अब तक के अपने चरित्र में मुताबिक ही रहा है। उसने एक दो सतही जवाब दे कर अपना पल्ला झाड़ लिया। सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद आईपीएल बन्द करने की मांग को ले कर भूख हड़ताल करने की घोषणा कर चुके है, लेकिन क्या आईपीएल बंद कर देने से, इस पर लगे तमाम आरोपों का जवाब मिल जाएगा? जो बुराईयां खेल के इस फार्मेट, और बीसीसीआई के तौर तरीकों में नजर आ रही हंै  वह दूर हो जाएंगी? क्या मुद्दा आईपीएल है, या खेलों में घुसा भ्रष्टाचार ,काला पैसा, और सियासत? आज आईपीएल को ले कर जैसे भी हालात है, इसके लिए क्या अकेली बीसीसीआई ही जिम्मेदार है? क्या देश के भीतर उसे , कायदे कानूनों, जवाबदेही से परे वेटिकन जैसी संस्था बन जाने देने के लिए राजनीतिज्ञ और कार्यपालिका जिम्मेदार नहीं है?
इन सवालों के जवाब ढूंढना इसलिए जरूरी है, कि आईपीएल नाम का यह  तमाशा जनता के बूते होता है। जनता टिकिट लेकर यह मुकाबले देखती है। खेल मंत्री अजय माकन ने भी यही कहा है कि  खेल प्रेमियों, और प्रशंसकों के पैसों से होने वाले इस मुकाबले में पैसों, और आयोजन के मामले में पारदर्शिता होनी जरूरी है। क्रिकेट, टेनिस गोल्फ, और फुटबाल जैसे उन खेलों में से है, जिनके इर्दगिर्द दुनिया भर में एक पूरा बाजार खड़ा कर दिया गया।  भारत में क्रिकेट के बाज़ार की चाभी जिन खेल संगठनों के हाथ में है, उनमें से ज्यादातर पर अलग-अलग दलों के नेता, या उनके समर्थक काबिज हैं। यह संगठन खुद को कायदे कानून से परे समझते हैं। अब तो नजऱ आ रहा है, उसके मुताबिक बाजार किसी भी कीमत पर इस खेल को ज्यादा से ज्यादा बिकाऊ बनाता है, नेता इसमें उसके मददगार बनते हंै,और  खिलाड़ी पेशे में खुद को टिकाए रखने के लिए कभी बाजार, तो कभी नेताओं के हाथों मोहरा बनते रहते हैं। यह गठबंधन इस खेल में घुस आई   बुराइयों की जड़ दिखता है। लेकिन फिर भी क्या आईपीएल को बंद कर देना इसका कोई इलाज है? आईपीएल को खुद खेल मंत्री खेल नहीं, मनोरंजन मानते हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने  आईपीएल पर मनोरंजन कर भी लगाया है। लेकिन एक प्रजातांत्रिक ढांचे में मनोरंजन के कार्यक्रम  करने का अधिकार कैसे छीना जा सकता है? यह मनोरंजन नियमों के दायरे में, उसके मुताबिक हो, यह देखना कानून पर अमल करने वाली एजेंसियों का काम है। कोई आयोजन अगर कायदों के मुताबिक नहीं हुआ, तो उसे बंद करना  इस समस्या का इलाज नहीं, कि देश में कायदे को अमल में लाने के जिम्मेदार लोग ऐसा कर नहीं पाते। अगर आईपीएल में मैच फिक्सिंग हो रही है, तो यह टिकिट ले कर मैच देखने वाले दर्शक और घर में, अपना काम धाम छोड़कर  टीवी के सामने  बैठकर चैनल पर मैच देखने वाले खेल के प्रशंसक के साथ भी नाइंसाफी है, कि खेल शुरू होने के पहले ही हार जीत का फैसला हो जाए। लेकिन मुकाबला बंद कर देना इस समस्या का हल नहीं। आईपीएल के  साथ जुड़े ग्लैमर, और मैचों के बाद होती दावतों को खिलाडिय़ों द्वारा किसी महिला से छेड़छाड़ की वजह कैसे बताया जा सकता है? क्या आईपीएल के पहले क्रिकेटर मैचों के बाद दावतें नहीं करते थे? क्या उनके महिला प्रशंसकों से संबंधों पर कभी चर्चाएं नहीं हुई? यह दोनों बातें कानून व्यवस्था से जुड़ी हैं, लेकिन कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों में इनके पालन का हौसला जागे, यह काम कौन करेगा? नेता अपने फायदे नुकसान के मुताबिक कभी आईपीएल के समर्थन में, तो कभी इसके खिलाफ हो जाते हैं। इसी आईपीएल में बंगलौर में एक मुकाबले के पासों के लिए स्थानीय नगरपालिका के पार्षदों ने खुले तौर पर सौदेबाजी की। आयोजक  बृहनबंगलौर नगर पालिका के 198 पार्षदों को 250 पास दे रहे थे, लेकिन बंगलौर के उप महापौर ने अखबारों में खुले आम कहा कि अगर संस्था के नाम 450 पास नहीं दिए गए तो वह आईपीएल के खिलाफ जरूरी कार्रवाई करेंगे। नगरपालिका में विपक्ष के नेता ने इस "जरूरी कार्रवाई" का खुलासा करते हुए कहा कि नगरपालिका आईपीएल को विज्ञापन शुल्क में दी गई रियायत वापस ले लेगी,और भारी शुल्क लगाएगी। जनता के पैसों से चलती एक संस्था के निर्वाचित सदस्य, जब एक मैच देखने के लिए ऐसी सौदेबाजी करे, तो क्या यह गंदगी, आईपीएल में नजऱ आ रही गंदगियों से किसी मायने में कम है? जब इन्हें बर्खास्त नहीं किया जाता, तो आईपीएल बंद क्यों हो? यह घटना बताती है कि बुराई कहां से शुरू हो रही है।
सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है। उसने 2006 से बीसीसी को आईपीएल आयोजन के लिए दी जा रही कर माफी वापस ले ली है। इस साल के बजट में आईपीएल में खेलने वाले तमाम घरेलू और विदेशी खिलाडिय़ों पर 25 फीसदी सेवा शुल्क लगाने का प्रस्ताव किया है। सभी राष्ट्रीय खेल संगठनों को सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में लाने का प्रस्ताव भी किया गया है, हलांकि बीसीसीआई खुद को सूचना अधिकार के दायरे से परे समझती है, लेकिन इस दिशा में कड़े कदम उठाना सरकार का काम है। खेल मंत्री अजय माकन ने आईपीएल में काले पैसे के इस्तेमाल की जांच करने का हुक्म जि़म्मेदार एजेंसियों को दिया है। प्रवर्तन निदेशालय, और आय कर विभाग ने पिछले दिनों  बीसीसीआई को जो तकरीबन 80 नोटिस भेजे हैं उनमें से ज्यादातर आईपीएल के बारे में है, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव सामने है और गठबंधन की मजबूरियों का रोना रोकर अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने की आदी यूपीए सरकार, खेल मंत्री के इस सख्त रवैये को कितना आगे ले जा पाएगी, यह देखने की बात है। सरकार के सबसे बड़े दल कांग्रेस के एक केन्द्रीय मंत्री विलासराव देशमुख टीवी पर शाहरुख खान पर शराब पीकर वानखेड़े स्टेडियम में आने, और बदतमीज़ी करने के लिए पांच बरस तक उनके वानखेड़े आने पर रोक लगाने का ऐलान करते हंै, तो कांग्रेस के ही एक और अहम सांसद राजीव शुक्ला उस पर ठंडा पानी डालते हैं। बीसीसीआई पर एनसीपी के शरद पवार की पकड़ जग जाहिर है। दूसरी तरफ टीवी पर शाहरुख की सारी गाली गलौच सुनने के बावजूद सरकार के एक घटक दल तृणमूल कांग्रेस की मुखिया, और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी उनके समर्थन में बयान देती है। आईपीएल आयोजन में बीसीसीआई जो कायदे तोड़ रही है, अपने खुद के हिसाब-किताब को लेकर वह जिन सवालों के घेरे में है उनका जवाब उससे लिया जाएगा, और यह मुद्दे गठबंधन की कथित मजबूरियों की भेंट नहीं चढ़े यह देखना आईपीएल पर रोक लगाने से ज्यादा जरूरी है।  

18 may


सिर चढ़कर बोलती जेब की ताकत


18 मई 2012
संपादकीय
कल रात वानखेडे स्टेडियम में आईपीएल मैच में अपनी टीम की जीत के बाद शाहरुख खान के महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों और सुरक्षा गार्डों के साथ धक्कामुक्की ,गाली गलौच करने  की खबर है। मुंबई पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से अखबारों में छपी खबर के मुताबिक शाहरुख ने झगड़े के वक्त शराब भी पी रखी थी। वह अपनी टीम की जीत की खुशी मनाने बीच मैदान में जाने की जि़द कर रहे थे, और सुरक्षा गार्डों ने उन्हें वहां जाने से मना किया तो उन्होंने यह तमाशा किया। एक क्रिकेट टीम के मालिक शाहरुख के वानखेड़े स्टेडियम में प्रवेश पर रोक लगाने की कोशिशों की खबर है। जनता में लोकप्रियता पर जिसका पेशेवर जीवन टिका है, ऐसे फिल्म अभिनेता का सार्वजनिक रूप से, टीवी कैमरों के सामने ऐसा बर्ताव, उन तमाम आलोचनाओं के लायक है जो शाहरुख को अब मिल रही है। लेकिन यह घटना हमारे देश के मौजूदा हालात की तस्वीर भी पेश करती है, जिसमें पैसे, या किसी भी किस्म की ताकत रखने वाले का, इंसानियत और तमाम सामाजिक नैतिक मूल्यों को दर किनार रख कर बरतना एक आम बात हो गई है। अपनी दौलत, और बॉक्स ऑफिस पर अपनी ताकत के घमंड में शाहरुख की बदतमीजियां आम हंै- वह सरेआम कभी शिरीष कुन्दूर को पीट देते हैं, कभी सह अभिनेताओं पर बेहद निजी और बेजा टिप्पणियां करके विवाद खड़े करते हैं। शाहरुख ही क्यों, पिछले दिनों सैफ अली खान के एक रेस्त्रां में देर रात एक शख्स के साथ कथित रूप से मारपीट करने की बात हो, या सलमान खान की आक्रामक हरकतें, या अमीरजादों का सड़कों पर महंगी बड़ी गाडिय़ां दौड़ाकर बेकुसूरों की जान लेना या किसी विधायक का रेलवे प्लेटफार्म पर घोड़ा दौड़ाते पहुंच जाना, महंगी बाईकों पर आम जनता की सुरक्षा की परवाह किए बिना सड़कों पर रेस लगाना। ऐसी तमाम बातें आज आम हो चुकी हंै। सार्वजनिक जीवन में किसी भी  तरह की ताकत के बूते नियम कायदे तोड़कर, सभी तरह के मूल्यों को लतियाकर, घमंड में चूर होकर बर्ताव करना, और उसके लिए कोई अफसोस जाहिर न करना,आजकल जैसे चलन बनते जा रहा है।
किसी विकसित पश्चिमी देश में लोग जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, वैसा बर्ताव धनबल, बाहुबल, कुर्सी के बल पर भारत में आए दिन देखने को मिलता है। ऐसा इसलिए है कि ताकत वालों के लिए कुछ भी कर के छूट जाना इस देश में बेहद आसान है। अगर मीडिया सिर पर न चढ़ बैठे, तो क्षमा चोपड़ा की जान लेने वाले बीएमडब्लू के चालक और मालिक को पुलिस सस्ते में ही छटक जाने दे। जेसिकालाल हत्या कांड में तो न्यायपालिका ने भी एकबारगी जेसिका के हत्यारों को बखश दिया था। मीडिया के पहल करने पर न्यायपालिका ने इस पर गौर किया और दोषियों को सजा हुई। पीडि़तों के पीछे अगर मीडिया की ताकत न होती तो कुसूरवार छूट जाते। सवाल यह है कि क्या आज ताकत ही सब कुछ है ,मूल्य कुछ भी नहीं? शाहरुख को अगर सुरक्षा गार्ड बीच मैदान जाने से रोकते हंै तो एक टीम के मालिक के रूप में उन्हें इस नियम के पालन में उन्हें सहयोग करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नियम तोडऩे के लिए सारी सीमाएं पार कीं। कानून तोडऩे वालों के साथ व्यवस्था में बरती जाने वाली नर्मी से समाज में जो असंतोष और अन्याय पैदा होता है, उसके नतीजे के रूप में नक्सली हमें देश भर में दिखाई देते हैं। यह और बात है कि बहुत बड़ी संख्या में बेकुसूर तबका उनके जुर्म का भी शिकार है, जिसके अपनी सुनवाई के लिए किसी और तरीके के इस्तेमाल की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। भरी ज़ेबें, बड़े कुर्सी, बड़ी कार, हाथ में पकड़े हथियार सबकी ताकत जब दिमाग में चढ़कर बोलने लगे, तो उसे काबू में करने के लिए जो तंत्र जरूरी है, वह आज देश मेें गैर मौजूद है। हर क्षेत्र में कड़े नियम कायदे बनाने की बात की जाती है, लेकिन कायदों पर अमल ही न होना हो, तो उनकी धार का क्या मतलब? जिस तरह ट्रैफिक नियमों को देश में तोड़ा जाता है। पश्चिमी या विकसित देशों में वैसा होने पर लाईसेन्स रद्द करने और कई दिनों तक नया लाईसेंस जारी न करने की सजा दी जाती है। लेकिन हमारे देश में तो लोगों को लाईसेंस की ही परवाह नहीं है, न ही उन्हें यह परवाह करवाने करने को मजबूर किया जाता है।
बलात्कार और यौन शोषण पर, महिला सुरक्षा पर, बाल यौन शोषन पर, ट्रैफिक पर मौजूदा कानून और सख्त  किए जा रहे हंै, लेकिन जो कानून पहले से ही मौजूद है उनके पालन का ही माहौल न हो, जब उन पर अमल की ही नीयत और काबीलियत न हो, तो कितने भी सख्त कनून बनाने का मतलब ही क्या बचता है। देश में न्याय की धीमी रफ्तार का आलम है कि बच्चों के यौन शोषण जैसे गम्भीर मामलों तक के निपटारे पर दस दस साल लग जाते हैं। बलात्कार के लंबे खिंचते मामलों के दौरान गवाह के साथ भी बलात्कार का जैसा मामला ओडिशा में आया, वह होता है, या जैसा बिहार में कि मां के बलात्कार के गवाह बेटे को ही जिंदा जला दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार कर शिकार को जला देने का नया चलन शुरू हो गया है। यह सारा हौसला कानून के  लचर अमल से आता है  जिससे मूल्यों को पुराने कपड़ो की तरह उतार फेंकने की शह मिलती है। बुद्ध , गांधी और महावीर अब हमारे लिए पर्यटन को बढ़ाने का जरिया भर रह गए हैं। उनकी सिखाई गई बातों का दम हम रुपये कमाने को तो करते हंै। रोजमर्रा की जि़ंदगी में बरतने के लिए नहीं। कल ही अहमदाबाद पुलिस ने शहर मे पिछले कई महीनों से  लोगों की नींद हराम किए हुए बाईकर्स गैंग पकड़ी तो उसके आधे से ज्यादा सदस्य किशोर निकले, जिनमें से कुछ तो दसवीं या 12 वीं की परीक्षा दिए हुए बच्चे थे। देर रात , जब उनके घर के लोग समझते कि वह अपने दोस्त के यहा पढ़ाई कर रहे हैं, तब वह शहर भर में घरों के सामने खड़ी गाडिय़ों के शीशे तोड़कर अपनी विकृत प्रवृत्तियों को संतोषते। यह सडऩ कितनी गहरी है, इसका पता चलने पर लोग थोड़ा  सा चौंकते हंै, और फिर रोज के अपने काम मे लग जाते है, जैसे  कायदों पर अमल के लिए आवाज उठाने की जिम्मेदारी महज मीडिया या न्यायपालिका ही रह गई हो। अपने देश, शहर, लोगों को अपना समझने की भावना न आज के युवाओं में दिखती है न ही उन्हें इसके लिए प्रेरित किया जाता है। युवाओं को आज सिर्फ एक ही मूल्य की फिक्र है उनके मोबाईल रिचार्ज के मूल्य की। 
इसका इलाज कायदे कानून और मूल्यों के प्रति, अपने अधिकारों के प्रति जागरुक, साक्षर जनता है।  हम किसी क्षेत्र विशेष की तरफ उंगली न भी उठाना चाहे, तो भी यह सब देख सकते हंै कि केरल में या गुजरात में कोई विधायक रेल्वे प्लेटफार्म पर घोड़ा नहीं दौड़ाता, न ही यहां रोज बलात्कार कर के पीडि़तों को जला डालने, या  डकैती की वारदात सुनाई देती है। नैतिक और सामाजिक मूल्य केवल किताबों में सजाए रखने की चीज़ें नहीं है इनके खो जाने से जो कानूनी अराजकता आती है। वह राजनीति और प्रशासन पर भी असर डालती है और एक दिन इससे हमारे रोज़मर्रा के जीवन पर असर पडऩे लगता है। शाहरुख को जीत का जश्न मनाने बीच मैदान मे जाने से न रोकने के बाद सुरक्षा कर्मी दूसरे मैचों में प्रशंसकों को कैसे रोक पाते? एक स्पर्धा का आयोजन ठप्प होने से कैसे बच पाता? लेकिन खुद को सबसे अलग और नियम कायदों से  ऊपर समझने वाले शाहरुख देश के उन बहुत से दबंगों का चेहरा है, जिनके दिमागों में उनकी जेब की गर्मी, उनकी बड़ी गाडिय़ों के इंजिन का हार्सपावर, उनके कुर्सी की ताकत नशा बनकर काबिज हो चुकी है। ऐसे लोगों की तादाद वैसे ही बढ़ चुकी है। और ज्यादा बढ़े इसके पहले जनता का अमलीतंत्र को अपना काम करने पर मजबूर करने जितना तेज तर्रार, जानकार, और एकजुट होना जरूरी है। 

17 मई 2012


17 मई 2012


17 मई 2012


राहुल एक बड़ा काम यह कर सकते हैं...


17 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले कुछ दिनों से दस-बीस कदम की दूरी में राहुल गांधी के चेहरे को देखे बिना तय नहीं हो सकती। कांगे्रस के लिए यह एक बड़ा मौका है जब उसका भविष्य दिन भर के कार्यक्रम में यहां पहुंच रहा है और पार्टी ने हर संभव जगह तस्वीरों और झंडे-बैनरों से पाट दी है। यह कांगे्रस पार्टी के उत्साह का सुबूत है और कोई भी पार्टी जिसके पास दम-खम हो वह ऐसा कर सकती है और समय-समय पर ऐसी दूसरी पार्टियां भी यह करते रहती हैं। कल से कांगे्रस के कुछ अलग-अलग नेता हमसे संपर्क कर रहे थे कि राहुल गांधी के सामने रखने के लिए कुछ सुझाव हम उन्हें दें, जिन्हें कि वे अपने या हमारे नाम से उन्हें बताएं। लेकिन अखबार का काम किसी निजी सलाह के मुकाबले अपने पाठकों के बीच सलाह रखने का होता है इसलिए रायबहादुर बनने के बजाय हम इस पन्ने पर इस जगह उन कुछ बातों को लिखना चाहते हैं जो कि कांगे्रस के अलग-अलग लोग, या दूसरी पार्टियों के लोग भी सोच सकते हैं और उन्हें ठीक लगे तो कुछ कर सकते हैं।
भारत की राजनीति में अगर राहुल गांधी एक नई पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में माने जा रहे हैं, तो उनसे तकरीबन एक पीढ़ी छोटे लोग भी राजनीति में आ चुके हैं। राहुल गांधी एक अधेड़ हैं, यह अलग बात है कि उनको नौजवानों का नेता कहा जाता है। भारत में नेताओं की औसत उम्र पश्चिम से बहुत अधिक होने के बारे में अभी एक टीवी चैनल पर चल रही बहस में एक जानकार ने कहा था कि दुनिया के कई देशों में स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही नौजवान गंभीरता से राजनीति में हिस्सा लेते हैं इसलिए अमरीकी राष्ट्रपति अठावन बरस के होने के पहले ही आठ बरस काम करके रिटायर हो चुके रहते हैं। ऐसा ही ब्रिटेन में है जहां पर कि प्रधानमंत्री निवास में बच्चे पैदा होते रहते हैं, प्रधानमंत्रियों के खुद के, न कि उनके बेटे-बेटियों के। इसलिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि भारत में वोट डालने की उम्र अठारह बरस से युवा पीढ़ी राजनीति की एक गंभीर समझ विकसित न कर सके। ये एक अलग बात है कि भारत में आज वामपंथी दलों से परे शायद ही कोई पार्टी ऐसी है जिसमें मालिकों की तरह काबिज कुनबों और नेताओं की चापलूसी से परे कोई गंभीर काम होता हो। 
ऐसे में राहुल गांधी, या दूसरी पार्टियां, अगर अपना भला चाहती हैं और साथ-साथ, लगे हाथों, भारत के लोकतंत्र का भला भी चाहती हैं तो उन्हें अपनी बेशुमार दौलत का कुछ हिस्सा लीडरशिप के कॉलेज बनाने पर खर्च करना चाहिए। आज वोट डालना शुरू करने के बीस-पचीस बरस बाद तक लोगों को न लोकतंत्र की समझ है, न देश के संविधान की जानकारी है, न ही उन्हें सामाजिक न्याय के मुद्दों की सीख मिलती है। नतीजा यह होता है कि धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, धनबल और पार्टी के नेताओं से घरोबे के आधार पर पार्टी के नेता मनोनीत होते रहते हैं और चूंकि सभी प्रमुख पार्टियों में, अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियों में काम का यही तरीका है इसलिए राजनीति में आने वाली युवा पीढ़ी के लिए अपने व्यक्तित्व विकास, अपने ज्ञान के विकास और अपनी लोकतांत्रिक समझ को विकसित करने की कोई अहमियत नहीं होती। ऐसे में इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत का लोकतंत्र झेलता है। 
इस देश में आज कॉलेज की पढ़ाई की तरह ही बहुत से विश्वविद्यालयों में नेतृत्व विकास में गे्रजुएट और पोस्टगे्रजुएट डिग्री शुरू करने की जरूरत है जिसमें सामाजिक छवि से लेकर व्यक्तित्व विकास तक, भारत के शासन-प्रशासन के ढांचे, यहां के संविधान, यहां की न्याय व्यवस्था, संसदीय प्रणाली, पंचायत व्यवस्था, चुनाव प्रणाली और चुनाव संचालन, जनसंपर्क और समाज व्यवस्था की व्यापक पढ़ाई करवानी चाहिए। आज जब पंचायतों से लेकर संसद तक करोड़ों जनप्रतिनिधि निर्वाचित संस्थाओं में, सहकारी संस्थाओं में, मजदूर और सामाजिक संगठनों में अलग-अलग पदों पर पहुंचते हैं, तो उनके नेतृत्व की क्षमता से देश की दशा और दिशा पर फर्क भी पड़ता है। हमारा मानना है कि कांगे्रस और भाजपा जैसी दो बड़ी पार्टियां अगर व्यापक स्तर पर ऐसे कॉलेज शुरू करके ऐसी पढ़ाई और प्रशिक्षण का इंतजाम करें, तो भारत के लोकतंत्र को बेहतर युवा पीढ़ी मिल सकती है। राहुल गांधी की उम्र अभी इस महत्व को समझने की है इसलिए उनके इर्दगिर्द के लोग उन्हें ऐसा सुझाव दे सकते हैं। जो भी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं और अपने पदाधिकारियों के विकास पर ध्यान देगी, उन्हें अधिक काबिल बनाएगी, वह पार्टी अधिक कामयाब भी होगी। करोड़ों लोग भारत में आज ऐसी पढ़ाई कर रहे हैं जिससे उनकी आगे की जिंदगी का कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। दूसरी तरफ राजनीति में ऐसे करोड़ों नौजवान पहुंच रहे हैं जिनको राजनीति से जुड़े हुए मुद्दों की कोई समझ, नारों से अधिक नहीं रहती है। इन दो किस्म की तस्वीरों को मिलाकर एक ऐसा कोर्स शुरू किया जाना चाहिए जिसे की पार्टियां अपने उत्साही कार्यकर्ताओं के लिए धीरे-धीरे करके जरूरी करती चलें।
इसी देश में आज आनंद से लेकर बहुत सी दूसरी जगहों पर ग्रामीण विकास और सामाजिक कार्यक्रमों के ऐसे पाठ्यक्रम चल रहे हैं जिनसे निकलने वाले बहुत काबिल माने जाते हैं और जिन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हाथों-हाथ लेती हैं। कुछ इसी तरह का माहौल राजनीति से जुड़े हुए पाठ्यक्रमों के बाद बन सकता है। कांगे्रस के भविष्य के सामने एक सलाह यही हम इतनी महत्वपूर्ण मानते हैं कि उससे इस पार्टी का बदहाल बदल सकता है। और फिर इसके देखा-देखी दूसरी पार्टियां भी ऐसा कर सकती हैं जिससे कि देश की राजनीति का हाल बदल सकता है।

16 मई


आने वाले दिन पता नहीं और कितने समझौतों के होंगे


संपादकीय
16 मई
संसद में एक पाठ्य पुस्तक के कार्टून को लेकर जिस तरह यूपीए सरकार दहशत में आकर अंबेडकरवादियों के सामने बिछ गई और पूरी की पूरी किताब को प्रतिबंधित करने की बात मान ली उसी का नतीजा था कि इन किताबों के लिए बनी चयन समिति के सदस्यों पर हमले हुए और देश भर में अब यह माहौल बना कि किसी धर्म या जाति का संगठन अगर धमकी देता है तो लोकतंत्र के भीतर की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सरकार कूड़ेदान में फेंक देगी। इस बारे में हमने कुछ विचारकों के लेख भी पिछले दिनों में इस अखबार के पहले पन्ने से छापे हैं ताकि लोगों को उस मुद्दे की बारीकियां समझ में आए। लेकिन आज की एक दूसरी खबर यह है कि देश के कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल ने रेल भाड़े की वापिसी को लेकर कहा है कि सरकार को ऐसा करने के बजाए रेल के घाटे को भाड़े से पूरा करना चाहिए। लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले रेल बजट से नाराज होकर यूपीए सरकार की एक बड़ी भागीदार ममता बैनर्जी ने अपनी तृणमूल कांग्रेस के रेलमंत्री को हटा दिया था और अपने एक दूसरे सांसद के रेलमंत्री बनवाकर ही उन्होंने दम नहीं लिया बल्कि बढ़े हुए रेल भाड़े को हटवा भी दिया। रेल सुविधा जनता के लिए तो है लेकिन वह एक कारोबार भी है और सस्ती लोकप्रियता के लिए एक कारोबार को तबाह करने का नतीजा देश के बहुत से राज्यों में घाटे में आ गए बिजली विभागों में भी देखने मिलता है और भारतीय रेल भी उसी तरफ जा रही है। 
गठबंधन की सरकार के जो नुकसान सामने आ रहे हैं उनमें से एक यह है कि अलग-अलग क्षेत्रीय दलों की अलग-अलग सनक या प्राथमिकता के मुताबिक केन्द्र सरकार को समर्पण करना पड़ रहा है और देश के व्यापक और दीर्घकालीन नुकसान की कीमत पर भी कहीं आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है कहीं भ्रष्टाचार की तरफ आंख बंद करनी पड़ रही है और कहीं एक संकीर्णता को बढ़ावा देना पड़ रहा है। दलितों की नाराजगी से डरकर यूपीए सरकार ने जिस तरह से आधी सदी पुराने और अंबेडकर की जिंदगी में ही उनके सामने आ चुके एक निहायत मासूम और अच्छे कार्टून को हटाया है वह कट्टरता के सामने बुरी तरह से घुटने टेक देना है। एक तरफ महाराष्ट्र में ठाकरे कुनबा जिस तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ लाठियां लेकर टूट पड़ता है, उसी तरह से कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूपीए ने सरकार की कलम से पाठ्य पुस्तकों पर हमला करने का भरोसा दिलाया और दलितों की नाराजगी से यह पार्टी और यह सरकार बची। सरकार में इतना नैतिक साहस होना चाहिए कि वह नाजायज मांगों को मानने से इंकार कर सके। लेकिन अपने कुकर्मों से लदी हुई यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी न तो आज ममता बैनर्जी को किसी बात के लिए मना कर सकती और न ही दलितों को नाराज कर सकती। 
देश एक किस्म से पीछे जा रहा है, धर्मान्ध और कट्टर पार्टियों से, सांप्रदायिक ताकतों से तो ऐसी उम्मीद की जाती है कि वे वैज्ञानिक सोच और प्रगतिशीलता के खिलाफ लोगों को गुदगुदाकर पिछली सदी में ले जाएं। लेकिन कांग्रेस पार्टी, एक वक्त की नेहरू की पार्टी, आज इस कदर दहशत में जी रही है, इस कदर समझौतापरस्त हो गई है कि उसके पास सही बातों के साथ खड़े रहने का हौसला भी नहीं है। एक कार्टून ने यह साबित कर दिया है कि इस सरकार और इस पार्टी की रीढ़ की हड्डी नीचे खिसक कर इसके घुटनों में आ गई है और आए दिन यह घुटनों पर दिखाई पड़ती है। पिछले दिनों इसी सरकार के आर्थिक सलाहकार ने कुछ बातें कहीं थीं जिनसे उपजी खबरों से यह तस्वीर बनी थी कि बचे कार्यकाल में यह सरकार कोई आर्थिक सुधार नहीं कर पाएगी। बाद में उन बातों की कुछ लीपापोती की गई। लेकिन यह बात साफ है कि यह कार्यकाल इसी तरह का गुजरने वाला है और देश के लिए यह बहुत ही महंगा भी पडऩे वाला है। पता नहीं आने वाले दिन केन्द्र सरकार और उसकी मुखिया पार्टी के और कितने किस्म के समझौतों के आएंगे। 

राजधानी में गोलीबारी


15 मई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बीती शाम जमीन के दो व्यापारियों पर बाजार के बीच गोलियों से हमला लोगों के बीच डर पैदा कर गया है। करीब दो बरस पहले एक हवाला व्यापारी का कत्ल करके अपराधी वहां से मोटी रकम लूटकर भागे थे। इस बीच जमीनों के व्यापार को लेकर रायपुर शहर में ही कई हत्याएं हुई हैं, शेयर बाजार में सैकड़ों करोड़ डुबवाने वाले फरार हैं, और जमीन-ईमारतों के कारोबार में सुपारी लेने-देने की चर्चा होते रहती है। दरअसल दो नंबर के धंधों में राज्य बनने के बाद से अब तक लगातार इतनी बढ़ोतरी हुई है कि मोटी कमाई के मुकाबले जान बहुत सस्ती साबित होने लगी है और भाड़े के हत्यारे तो ऐसी कमाई के एक-दो फीसदी दाम पर ही मिल जाते हैं। जहां पर जमीन के एक-एक सौदे से करोड़ों के नफे-नुकसान का रिश्ता हो, वहां पर कुछ लाख देकर अपहरण और हत्या उन लोगों को तो बिल्कुल भी महंगे नहीं लगते जो रात-दिन वैसे भी कई किस्म के कानून तोड़ते हैं।
कुल मिलाकर राजधानी की संपन्नता ने कालेधन के खेल को इतना बढ़ा दिया है कि रिश्वत, भ्रष्टाचार से लेकर जालसाजी तक हर किस्म के काम में बहुत से लोग लगे हुए हैं। कहीं कुछ अफसर, कहीं कुछ नेता और बहुत से गुंडे-मवाली जमीनों के काम में अपनी अलग-अलग किस्म की ताकत का खुलकर इस्तेमाल करते हैं और कल शहर के बीच घने इलाके में हुई गोलीबारी ऐसे ही किसी झगड़े की वजह से हुई हो सकती है, लेकिन मामले की असलियत जांच के बाद ही सामने आएगी इसलिए अभी इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल है सिर्फ आसार ही बताए जा सकते हैं। जमीन का कारोबार राजधानी में सबसे बड़ी कमाई का जरिया भी है और सबसे बड़ी काली कमाई का जरिया भी है। इसमें छोटे-छोटे बहुत से लोग नुकसान भी झेलते हैं लेकिन माफिया के अंदाज में काम करने वाले जमीन के सौदागर आसमान तक पहुंचते लोगों ने देखे हैं। इसलिए जिस शहर या बाजार में इतना अधिक कालाधन तैर रहा हो, वहां पर पेशेवर अपराधी न आएं, या पेशेवर अपराधियों को लोग भाड़े पर न लें ऐसा नहीं हो सकता। जिस तरह गुड़ के साथ मक्खियां आती ही हैं, उसी तरह दो नंबर के धंधों के साथ जुर्म भी चले आते हैं।
इसलिए हम ऐसी वारदातों के बाद आनन-फानन आंदोलन की चर्चा करने को गलत मानते हैं। जांच के बाद जब यह साबित होता है कि हमलों के शिकार लोग किसी गलत सौदे की वजह से, या किसी जाती दुश्मनी की वजह से मुसीबत में फंसे हैं, तो उस वक्त तक आंदोलनों की वजह से शहर के गरीबों का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका होता है। बाजार या राजनीतिक दल, जाति या धर्म के संगठन, इनकी ताकत के चलते हर जुर्म के बाद आंदोलन की बात होने लगती है। जिस हवाला कारोबार का जिक्र हमने किया है, उस कत्ल के बाद भी व्यापारियों ने आंदोलन छेड़ा था और शायद शहर बंद भी करवाया था। अब अगर दो नंबर के कारोबार में लगे लोग, बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के ऐसा खतरनाक काम करते हैं, तो उनको कौन सी पुलिस बचा सकती है? इसलिए कल के हमले के बाद से आसपास के बहुत से लोग जो चर्चा कर रहे हैं कि एक-दो दिनों में ही हमलावर न पकड़े जाएं तो आंदोलन किया जाएगा, उसका विरोध होना चाहिए। बहुत से मामले ऐसे रहते हैं जिनमें पुलिस लंबे समय तक किसी अपराधी तक नहीं पहुंच पाती। इसलिए किसी तरह का अल्टीमेटम देकर आंदोलन करना निहायत गलत होता है, और होगा। गलत कारोबार की वजह से या निजी रंजिश की वजह से इस तरह के सोचे-समझे निशाने पर अगर कोई हमला होता है तो उससे शहर या प्रदेश की कानून व्यवस्था का कोई पैमाना तय नहीं होता। ऐसे अपराधों से बचने के लिए लोगों को खुद भी गलत धंधों से बचना चाहिए और ऐसा काम करने या करवाने वाले लोग चाहे किसी भी तबके के हों, उन पर कड़ी कार्रवाई के लिए उनके तबके के लोगों को भी तैयार रहना चाहिए।
अपराध तो हर किस्म का खराब होता है, उस पर जल्द से जल्द कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसे लेकर किसी तरह का दबाव खड़ा करना ठीक नहीं होता।