बाकी जानवरों को कहाँ भेजें?


संपादकीय 
30 जून 2012
पंजाब में कांग्रेस पार्टी के एक विधायक ने विधानसभा के भीतर एक प्रस्ताव रखा कि वहां के तमाम आवारा कुत्तों को पकड़कर चीन, नगालैंड और मिजोरम भेज दिया जाए। बाद में विधानसभा के बाहर कांग्रेस पार्टी ने इस बयान से किनारा कर लिया और कहा कि वह इससे सहमत नहीं हैं। लेकिन इसके पहले उत्तरपूर्वी राज्यों से कांग्रेस विधायक के इस बयान के खिलाफ आवाजें उठने लगी थीं। इस मामले से यह समझ आने लगता है कि इस बहुत बड़े और किस्म-किस्म के राज्यों वाले देश में कैसी दिक्कतें सतह के नीचे बनी हुई हैं। 
यह बात जाहिर है के नगालैंड में चीन की तरह कुत्ते खाए जाते हैं, और वहां यह काम कोई छुपकर नहीं नहीं होता। हर किस्म के जानवर, पशु-पक्षी, मछलियाँ अलग-अलग लोग खाते हैं, और यह सोचना या कहना गलत है कि कोई एक जानवर दूसरे से अधिक गंदा या अच्छा है। कुछ धर्म, कुछ जातियां किसी एक जानवर को खाना अच्छा मानते हैं, या दूसरे जानवर को खाने पर उनमें कड़ी मनाही है। मुस्लिम दुनिया में सूअर को बुरा मन जाता है, और कुत्तों को पालने पर रोक है। हिन्दुओं में बहुत से ऐसे है जिन्होंने गाय को काटने के खिलाफ कानून की बनवा दिया है, फिर जानवरों को मारने के तरीकों पर भी बहुत किस्म के धार्मिक रीति-रिवाज हैं। बहुत से धर्मों में जानवरों की बलि या कुर्बानी देने के रिवाज हैं, और तरीके हैं। इनमें से बहुत सी बातें उसी तरह का सच हो सकती हैं, जिस तरह का सच पंजाब के कांग्रेस विधायक ने दो दिन पहले कहा है, लेकिन क्या हर सच इस किस्म से कहने के लायक होता है?
इन दिनों टीवी पर एक इश्तहार आ रहा है जिसमें कोई सैलानी किसी चीनी रेस्तरां में अपनी समझ में मुर्गा मंगाकर खाते दिखता है, और बाद में उसे पता लगता है कि वह मुर्गा नहीं कुत्ता है। हो सकता है कि पंजाब के इस कांग्रेस विधायक की सलाह इस इश्तहार को देखने के बाद उपजी हो, लेकिन ना सिर्फ हिंदुस्तान के भीतर, बल्कि पूरी दुनिया में लोगों को एक दूसरे की इज्जत करना सीखने की जरूरत है। जिस पंजाब से यह सलाह निकली है, वहां के लोगों को लेकर अनगिनत लतीफे जमाने से चले आ रहे हैं, और पंजाब के लोग दरियादिली से उन्हें बर्दाश्त भी करते आ रहे हैं, लेकिन पंजाब की कुछ और बातें हो सकती हैं जिनको लेकर की गयी कोई मजाक वहां के लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे, फिर चाहे वे बातें सच ही क्यों ना हों। यह हाल देश के हर प्रदेश का है। हिंदुस्तान की गैजिम्मेदार फिल्मों के चलते पूरे दक्षिण भारत के लोगों को काले, मद्रासी बोलने वाले दिखाया जाता रहा है और उनकी टूटी-फूटी हिंदी मजाक का सामान मान ली गई। यह नहीं सोचा गया कि हिंदी इलाके के लोग क्या उतनी तमिल भी बोल पाते हैं, जितनी हिंदी दक्षिण के लोग बोल लेते हैं? जुबान, रिवाज, खान-पान को लेकर हर कोई एक दूसरे का मजाक उड़ाने लगें, तो भारत जितना बड़ा, इतनी विविधताओं वाला देश सिर्फ टकरावों से भर जाएगा। जातियों को लेकर, नेताओं को लेकर किस किस किस्म की अपमान की बातें नहीं छेड़ी जा सकती? 
कुछ दिन पहले ही हमने लिखा था कि कांग्रेस पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं को देश के संविधान से लेकर सिद्धांतों तक की पढ़ाई करवाने के लिए, लीडरशिप सिखाने के लिए कॉलेज खोलने चाहिए, ताकि बाद में दूसरी बड़ी पार्टियां भी देखकर ऐसा ही करें। हो सकता है कि भाजपा ऐसी शुरुआत करे और कांग्रेस बाद में ऐसा करे। या फिर कोई राज्य अपने विश्विद्यालयों में ऐसे कोर्स शुरू कर सकते हैं ताकि इस लोकतंत्र को हांकने वाली अगली खेप कुछ बेहतर आए। कांग्रेस के पंजाब के विधायक की सलाह चाहे कितनी ही तर्कसंगत हो, वह संवेदनाशून्य है, समझ की कमी से उपजी है। इस देश के बहुत से जानवरों के बारे में कहा जा सकता है कि उनको किस नेता के जन्मस्थान पर भेज दिया जाना चाहिए, जहां पर उनको खाया जाता है, लेकिन ऐसा कहना गंदगी के अलावा और क्या होगा? हर सच का बेदिमाग इस्तेमाल किस काम का होता है? कौन से ऐसे प्रदेश हैं, धर्म हैं, जातियां हैं, जिनमें मजाक के लायक, आलोचना के लायक कुछ नहीं मिलेगा?  कांग्रेस को अपने लोगों को यह बताना चाहिए कि उसके लोगों का सार्वजनिक बर्ताव कैसा होना चाहिए।

जमा हुआ पानी अच्छा नहीं...


29 जून 2012
संपादकीय
सोनिया गाँधी ने दो दिन पहले जन अपनी अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के चार लोगों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उनको अगले कार्यकाल के लिए फिर से मनोनीत नहीं किया तो कुछ लोगों का मानना था कि उनको परिषद् से निकाल दिया गया है। कल उसी परिषद में दो नए सामाजिक कार्यकर्ताओं को मनोनीत किया गया। इस मामले के पीछे चाहे जो भी हो, लेकिन हम लोगों को इस तरह रखने और बदलने की बात करना चाहते हैं।
दुनिया भर में जहां भी थिंक टेंक होते हैं, वहां लोगों का आना-जाना लगे ही रहता है। किसी सरकारी कुर्सी पर हो, या फिर किसी और मनोनीत जगह पर, किसी ट्रस्ट में हो या किसी दूसरी संस्था में लोगों का चुनाव हो, नए लोगों का आना जाना लगे ही रहना चाहिए। वे ही चेहरे, दिल और दिमाग, जमे हुए पानी की तरह काई से भर जाते हैं। उनमें अपने लोगों के लिए पसंद, और नापसंदों के लिए चिढ़ काम में आड़े आने लगती है। फिर जहाँ सिर्फ सोचने-विचारने का काम हो, वहां भी किसी भी इंसान की सोच का सबसे काम का हिस्सा तो कुछ बरसों में सामने आ ही जाता है, उसके बाद के उनके ख्याल तो कम ही बचते हैं, दूसरी तरफ दुनिया में बहुत से ऐसे लोग बचे ही रहते हैं, तो अपनी अलग और नयी सोच को इन जगहों पर रखकर बात तो आगे बढ़ा सकते हैं या किसी नयी तरफ भी ले जा सकते हैं। सरकार की नौकरी वाली कुर्सियों पर भी जब किसी को बहुत लम्बे बरसों तक बिठाया जाता है, तो उनसे सरकार को मिलना कम होने लगता है। दूसरी तरफ कुछ दूसरे ऐसे दिमाग इस बीच अपनी बातों को भीतर ही भीतर रखे हुए चले जाते हैं। इसलिए हमारा मानना है कि किसी भी सरकारी या गैर सरकारी कुर्सी पर लोगों के रहने की एक सीमा होनी चाहिए। इससे इन लोगों को भी मालूम  होगा कि उन्हें अपना  सबसे अच्छा, सबसे अधिक योगदान एक सीमा के भीतर दे ही देना है। इससे दूसरे लोगों को मौका मिलने की गुंजाइश से उनके भीतर भी उत्साह बने रहेगा।
अमरीका के राष्ट्रपति की कुर्सी दुनिया के गब्बर की तरह की सबसे अधिक ताकत वाली मानी जाती है। उस पर आने वाले लोग भी 4-4 बरस के दो कार्यकाल के बाद दोबारा उस कुर्सी पर न रह सकते और न दुबारा आ सकते। कोई सोच सकता है कि बुश अगर हिंदुस्तान के प्रधान मंत्रियों की तरह 18-18 बरस एक कुर्सी पर बने रहता, तो दुनिया का कोई कोना उसके बमों से बच पाता? बीच बीच में अमरीका में अलग अलग सोच के लोग आते हंै, तो उस देश में कुछ इंसानियत लौटती है।
हिंदुस्तान में कांग्रेस, लालू की पार्टी, मुलायम की पार्टी, जयललिता की पार्टी, ममता और माया की पार्टी, फारूख अब्दुल्ला और बादल की पार्टी को देखें, तो एक ही कुनबे के चलते इन पार्टियों में कुनबे और कुनबे की पसंद से परे किसी का आगे बढऩा मुमकिन नहीं होता है। नतीजा यह होता है कि पार्टी के और लोगों के मन में कुछ करने की हसरत ख़त्म हो जाती है। इससे बेहतर हालत भाजपा के भीतर है जहाँ हर कुछ बरस बाद पार्टी के अध्यक्ष बदलते रहते हैं। कुछ लोगों के मन में तो महत्वाकांक्षा बनी और बची रहती है। अगर नेहरु के बाद इंदिरा का आजीवन राज पार्टी और सरकार पर बने रहने का भरोसा और सोच बने नहीं रहते तो क्या इंदिरा इमरजेंसी लगा पातीं? इंदिरा इज इंडिया का नारा महज उस एक मामले में नहीं था, कदम-कदम पर, मोहल्ले के चुनावों से कलर अनाथाश्रम और गौशाला के चुनावों तक, साहित्य की समितियों से लेकर किसी एन जी ओ तक, हर कहीं इंदिरा इज इंडिया की सोच कायम है। ऐसे में सोनिया गाँधी के परिषद् में नए लोगों को मनोनीत करना पुराने लोगों को अपनी बेइज्जती नहीं माननी चाहिए, इसे नए लोगों के देश के लिए इस्तेमाल की तरह सोचना चाहिए. और ऐसा बाकी जगहों पर भी होना चाहिए।

आतंकियों से सबक की जरूरत


28 जून 2012
संपादकीय
मुंबई हमलों का एक बड़ा आतंकी अभी सउदी अरब को सुबूत दिखाकर हिंदुस्तान लाया गया। अभी पुलिस और जाँच एजेंसियों ने उसके जिन बयानों का जिक्र किया है, उनकी अहमियत अदालत में चाहे कुछ भी ना हो, लेकिन वे बातें बहुत खौफनाक हैं। महाराष्ट्र में पैदा हुए इस मुस्लिम आतंकी ने प्लान किया था कि अजमल कसाब समेत सभी आतंकी कलाइयों पर मौली बांधें, जैसा कि आस्थावान हिन्दू बांधते हैं, और उनके पास के पहचान-पत्र भी हिन्दू नामों वाले थे, ताकि उनके मारे जाने से यह साबित हो कि वे हिंदू थे। इसके पीछे उनकी चाल यह थी कि महाराष्ट्र पुलिस ने चूँकि कई हिन्दू आतंकियों को भी गिरफ्तार किया था, इसलिए इस हमले को उसका हिसाब चुकता करना माना जाएगा। जांच अफसरों की तरफ से आई इस खबर के साथ-साथ कर्नाटक की एक खबर याद करें जो कुछ महीने पहले आई थी। बीजेपी सरकार की पुलिस ने बहुत से हिन्दुओं को गिरफ्तार किया था जो कि एक आतंकी वारदात करने उसके साथ पाकिस्तानी झंडों को जोड़कर यह साबित करना चाहते थे कि यह मुस्लिमों का काम है, और वे पाकिस्तान समर्थक भी हैं।
मजहबी नफरत, सांप्रदायिक तनाव की बात तो इतनी सी चर्चा से साफ़ हो जाती है कि हिंदुस्तान को किस-किस किस्म की साजिशों से चौकन्ना रहने की जरूरत है, लेकिन दजऱ्नों नामों वाले इस आतंकी को पकडऩे और उसके खिलाफ सुबूत जुटाने का काम किस तरह हुआ, वह याद रखने और सबक लेने की बात है। अबू जिंदाल या जुदाल नाम का यह आतंकी-अभियुक्त इंटरनेट पर फेसबुक जैसे सोशल नेट्वर्किंग वेबसाइटों पर काम कर रहा था और उससे भी उस तक पहुँचने में जांच अफसरों को मदद मिली। आज जो लोग यह सोचते हैं कि इन्टरनेट उन्हें एक गुमनामी के साथ बेचेहरा बने रहकर काम करने की सहूलियत देता है, वे गलत सोचते हैं। इस नई तकनीक के पदचिन्ह वक्त की रेत पर ऐसे बनते हैं, कि मिटते ही नहीं। किसी बात को आप अपने कंप्यूटर पर से मिटा भी दें, तो भी उसे निकाल लेने की तरकीबें हैं। आप इंटरनेट पर जाते हैं, तो अपने कंप्यूटर के सीरियल नंबर को उजागर करके ही जा सकते हैं, अपने फोन या इंटरनेट नंबर को उजागर करके ही जा सकते हैं। फिर वहां आप चाहे जितनी बार अपनी बातों को, अपनी खोज को मिटाते जाएँ, वे वहां सुबूत के लायक बनी ही रहती हैं। टाइप किए हुए हर अक्षर वहां हमेशा मौजूद रहते हैं, और जिन पेजों पर आप जाते हैं, उनको भी इंटरनेट दर्ज करते चलता है। अगर आप बहुत जानकार  और सावधान नहीं हैं, तो आपके कंप्यूटर पर बैठा कोई भी यह देख सकता है कि आप कब और किस पेज पर गए थे। अगर आप कोई जुर्म नहीं भी कर रहे हैं, तो भी अपनी निजी जिंदगी की गोपनीयता आप इंटरनेट पर कदम-कदम पर गिराते चलते हैं। 
कंप्यूटर और इंटरनेट की तकनीक जितनी आसान है, उसे इस्तेमाल करते हुए आप उतनी ही आसानी से अपने तौलिये गिराते चलते हैं। आज बीमा कम्पनियाँ दावों के भुगतान के पहले फेसबुक पर जाकर दावों के खिलाफ सुबूत जुटा लेती हैं। किसी रिश्ते को तय करने के पहले लोग होने वाली बहू या होने वाले दामाद की हरकतें फेसबुक पर देख लेते हैं, और फिर ही फैसला लेते हैं। नौकरी पर रखने के पहले लोग अर्जी देने वालों की पूरी जन्म-कुण्डली इंटरनेट पर देख लेते हैं।
इसलिए लोगों को जुर्म करना हो या न करना हो, ओसामा बिन लादेन से यह सबक लेने की जरूरत है कि बिना इंटरनेट किस तरह अमरीका की पूरी ताकत के भी मुकाबले बरसों तक बचा जा सकता है। 

शोहरत का नगदीकरण


27 जून 2012
संपादकीय
हरियाणा की जिन खाप पंचायतों ने आमिर खान के इन दिनों ख़बरों में बने हुए टीवी प्रोग्राम सत्यमेव जयते का कुछ दिनों पहले विरोध किया था, वे पंचायतें अब एक मुद्दे पर उनके साथ खड़ी हैं। आमिर ने जब हरियाणा में प्रेमी जोड़ों को मार डालने को लेकर एक प्रोग्राम बनाया तो खाप पंचायतें उसके खिलाफ खड़ी हो गई थीं। अब खेती में जब बहुत अधिक कीटनाशक इस्तेमाल करने का ख़तरा आमिर ने दिखाया, तो पंचायतों ने तय किया कि वे गाँव-गाँव तक जाकर किसानों को अधिक कृषि-दवाओं या खेती के कीड़ों को मारने वाले जहर के खतरों से आगाह करवाएंगी। पंचायतों की तो यह एक अच्छी पहल है ही, और आमिर का प्रोग्राम अपने-आप में एक अच्छी पहल है, जिससे कि वे तमाम मुद्दे फिर चर्चा में आ रहे हैं जिनको हमने जिंदगी का एक हिस्सा ही मान लिया था, कभी न टलने वाला।
इन दोनों बातों से कुछ समझने की जरूरत है। आमिर खान के बारे में सोचें तो उन्होंने पिछले कई बरसों में कुछ मुद्दों पर बनी काल्पनिक मुम्बइया फिल्मों में काम करके, फिल्म समारोहों के सम्मानों से दूर रहकर, गॉसिप से दूर रहकर, जुर्मों से दूर रहकर अपनी एक छवि बनाई है, या अपने आप बन गई है। वे आज के वक्त में उसी तरह के भारत-कुमार बने हुए हैं जैसे के एक वक्त मनोज कुमार बने हुए थे, या एक वक्त सुनील दत्त फौजियों के बीच जाकर बने हुए थे। बीच के अरसे में और भी कुछ लोग ऐसी शोहरत पा चुके हैं। जब जनता के बीच किसी एक सितारे की ऐसी शोहरत होती है, तो उस शोहरत का ऐसा ही इस्तेमाल होना चाहिए। और आज तो कोई एक कंपनी इस प्रोग्राम को बना रही है, सरकार और समाज को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि किस तरह जरूरी बातों को कुछ मशहूर और अच्छी शोहरत वाले लोगों की मदद से उठाया जाए। टीवी एक ताकतवर औजार तो है ही, असल जिन्दगी में जनसंचार के और भी बहुत से तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। 
छत्तीसगढ़ को लेकर हमारी फिक्र रहती है कि लोग सड़कों पर एक्सीडेंट के बाद मारे जाते हंै और इनमें से बहुत से मामले एक हेलमेट होने से टल सकते थे, लेकिन हेलमेट के नियम को बेवकूफ अपने सर पर बोझ समझते हैं और इसे रोकने के लिए राजनीतिक दलों के झंडे-डंडे लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। राज्य के भीतर के, राज्य के बाहर के किसी असरदार इंसान को लेकर सरकार या समाज किसी असरदार तरकीब को लेकर एक अभियान चला सकता है, और जनजागरण पैदा कर सकती है। ऐसी तरकीब संयुक्त राष्ट्र संघ भी करते ही रहता है जब वह हॉलीवुड  के फिल्मी सितारों को कुछ मुद्दों पर अपना ब्रांड राजदूत बनाता है। भारत में भी कुछ राज्य अमिताभ या शाहरुख़ को अपना ब्रांड राजदूत बना चुके हैं, लेकिन मोटे तौर पर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए. ऐसा नहीं हुआ कि हरियाणा में प्रेमियों की हत्या करने के खिलाफ जागरूकता के लिए किसी ने किसी मशहूर और पसंदीदा इंसान को इस्तेमाल किया होता। हरियाणा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री से लेकर वहां के नई पीढ़ी के परदेश पढ़े हुए कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल तक हत्यारी खाप पंचायतों के साथ खड़े नजर आए थे। वहां किसी ने जनजागरण की कोई तरकीब क्यों नहीं सोची? 
जनता के बीच, आम लोगों के बीच किसी बात का असर पैदा करने के लिए ऐसे लोगों की तलाश होती ही रहनी चाहिए जो कि मशहूर भी हों, और जिनकी इज्ज़त भी हो। जो हिरण को न मारते हों, जो मैचों के बीच सिगरेट पीते न पकड़ते हों, जो अपनी गाडिय़ों से फूटपाथ पर जीते लोगों को न कुचलते हों, जो नशे में डूबे हुए न हों। आमिर खान आज उनमें से एक हैं। अमिताभ बच्चन का कुनबा ऐसा हो सकता था, लेकिन उनकी दिलचस्पी मुफ्त में किसी के भलाई में कभी रही नहीं। जिस भोपाल के अमिताभ दामाद हैं, वहां के गैस के शिकारों के लिए उनके मुंह से हमदर्दी के दो लफ्ज भी पूरी जिंदगी में नहीं निकले। खैर, आज हम ऐसे लोगों की ही बात करना चाहते हैं, जो कि देश और दुनिया के मुद्दों पर कुछ बोलने की हिम्मत रखते हैं। जैसे आमिर ने ही खुलकर अन्ना हजारे के मुद्दों का साथ दिया। 
सरकार और समाज को ऐसे असरदार लोगों की तलाश, शिनाख्त और फिर उनके जनहित में इस्तेमाल की कोशिश करनी चाहिए। अगर सचिन तेंदुलकर हर तीसरे महीन खुद का खून किसी मरीज़ को देने लगें और इसकी अपील करें, तो इस देश में खून की कमी एक दिन में ख़त्म हो जाएगी। अगर विद्या बालन लोगों को पानी बचाने के लिए कहे, अगर सानिया मिजऱ्ा सिगरेट तम्बाखू के खिलाफ कहे, तो लोगों पर इन बातों का दूर तक असर हो सकता है। कोई फि़ल्मी सितारा पेड़ों के लिए, कोई खेल सितारा फुटपाथी बच्चों के लिए, कोई सितारा घरेलू नौकरों-नौकरानियों के भले के मुद्दे उठाए, तो समाज की बहुत सी दिक्कतें दूर हो सकती हैं।

आग के बाद दरगाह का और भी बड़ा नुकसान.


26 जून 2012
संपादकीय
कश्मीर में कल दो सौ बरस पुरानी एक सूफी संत की दरगाह आग से तबाह हो गई। इस संत और दरगाह पर मुसलमानों और हिंदुओं की बराबरी की आस्था थी। इस हादसे के बाद श्रीनगर में भारी तनाव हो गया है क्योंकि आसपास के लोगों का कहना है कि सरकारी दमकल ने पहुंचकर आग बुझाने में देर की। दूसरी तरफ फायर बिगे्रड कर्मचारियों का कहना है कि लकड़ी के ढांचे वाली इस दरगाह पर पानी डालने से लोगों ने रोका क्योंकि उनका मानना था कि इससे दरगाह अपवित्र हो जाएगी। इस तनाव के बाद वहां भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं और शहर में अफरा-तफरी का माहौल है। एक खबर यह भी है कि इसे लेकर श्रीनगर में एक तबके ने भारत-विरोधी नारे लगाए और प्रदर्शन किए। 
आज देश में जगह-जगह लोग धर्म और जाति को, क्षेत्रीयता को लोकतंत्र के ऊपर मानते हैं। बहुत से लोग एक आक्रामक राष्ट्रीयता को बढ़ावा देते हुए अपने देश के हितों को दुनिया के व्यापक हितों से ऊपर भी मानते हैं। जब देश में इस तरह का बेइंसाफी वाला, और वैज्ञानिक समझ से परे का माहौल बनता है तो उसका असर दूर तक जाता है। इसी का नतीजा है कि देश में जब कोई हादसा होता है तो उसके पीछे की वजहों को देखे बिना बहुत से लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़क जाती हैं। कश्मीर में कुछ जायज या कुछ बेबुनियाद बातों के चलते आबादी का एक हिस्सा केंद्र सरकार के खिलाफ भड़का हुआ रहता है और वहां बात-बात में यह तबका भारत-विरोधी नारे लगाते हुए पत्थर उठा लेता है, आग लगाने लगता है। कल एक ऐसी संत की दरगाह में आग लगी जिसने दरियादिली और बड़प्पन की ऐसी नसीहतें दी थीं कि हिंदू और मुस्लिम बराबरी से उनको मानने वाले रहे, आज भी हैं। लेकिन इस हादसे को कुछ लोगों ने सरकारी लापरवाही मानी, कुछ लोगों ने इसी मौके पर भारत-विरोधी नारों के साथ एक प्रदर्शन कर दिया। 
अभी हम कश्मीर की जटिल स्थिति का विश्लेषण करने के बजाय इसके एक पहलू पर ही लिख रहे हैं। किसी संत के अनुयायी अगर उसकी नसीहतों के खिलाफ ही सब कुछ करने लगें, तो फिर ऐसे अनुयायी न होना ही बेहतर है। आज बुद्ध और महावीर से लेकर गांधी और कबीर, गुरूनानक से लेकर गुरू घासीदास तक बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी कही हुई बातें दुनिया के सामने सीख की तरह मौजूद हैं। लेकिन इनके अनुयायियों में एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो उनके नाम का झंडा-डंडा लेकर तो चलता है लेकिन काम उन नसीहतों के ठीक उलटा करता है। कबीर ने अपने पूरे जीवन में जिस आडंबर के खिलाफ, पाखंड के खिलाफ कहा, आज उनके नाम पर चलने वाले लोग उनकी बातों पर नहीं चलते। महान सोच का मूर्तिकरण ही सब कुछ मान लिया जाता है। शिरडी को देखें तो कल तक जो फकीर दुनिया को यह भी नहीं बता गया कि वह हिंदू था या मुस्लिम, उसकी फटेहाल जिंदगी को आज ऐसा महिमामंडित कर दिया गया है कि वह पूरा तीर्थ अब आडंबरों से लादकर सिर्फ हिंदू तीर्थ बना दिया गया है और उसका धर्मनिरपेक्ष माहौल खत्म हो गया है। इसके अलावा तीर्थ के बाजारूकरण ने एक फकीर या एक संत के नाम और काम का आडंबरीकरण कर दिया है। नतीजा यह है कि जिस सादगी के साथ जनकल्याण में सांई बाबा की सोच कही जाती है, उस सादगी को मिटा ही दिया गया है। गांधी के सेवाभाव को आज उनके डीएनए वाला होने का दावा करने वालों ने मेवाभाव में बदल दिया है। महावीर ने संचय के खिलाफ कहा था, उनके अनुयायी आज सबसे अधिक संचय करने वाले तबकों में से एक हैं। गुरूनानक ने जितनी उदारता से अलग-अलग धर्मों के, सबसे दलित माने जाने वाले तबकों के, संतों की लिखी बातों को गं्रथ साहब में शामिल किया था, वह उदारता आज तनाव के सारे मौकों पर गायब दिखती है और धर्म के प्रतीकों को लेकर लोग सड़कों पर उतर आते हैं। गुरूनानक की बाकी बातें अनसुनी रह जाती हैं, उनकी व्यापक जनकल्याण की नसीहतें धरी रह जाती हैं, और लोग धर्मचिन्हों को ही सब कुछ मान बैठे हैं। ऐसी मिसालें अनगिनत हैं। लेकिन यहां पर उनकी फेहरिस्त बनाने से कोई फायदा नहीं है। इस चर्चा का मतलब यह है कि भक्त अपनी आस्था के केंद्र ईश्वर या किसी संत का कोई भला नहीं करते, अगर वे उनकी नसीहतों को मन, वचन और कर्म से नहीं मानते। जिस तरह कहा जाता है कि कोई इंसान उतने ही अच्छे होते हैं जितने अच्छे लोगों को वे इर्दगिर्द रखते हैं, उसी तरह किसी संत की बातों का वजन भी अनुयायी अपनी हरकतों से साबित करते हैं। इसलिए जिन लोगों को अपने आदर्श, अपने ईश्वर, अपने गुरू की नसीहतों पर चलना जरूरी न लगता हो, उन लोगों का दूर रहना ही बेहतर है। आज कोई मजहब इसलिए हिंसक मान लिया जाता है क्योंकि उसको मानने वाले लोग हिंसा पर उतारू हो जाते हैं, तो इससे उस मजहब की साख खराब होती है। इसलिए आस्थावान लोगों को अपनी आस्था के साथ-साथ यह भी याद रखना चाहिए कि उनके जैसी आस्था रखने वाले दूसरे लोग क्या कर रहे हैं। जिस तरह गुरू-भाई या गुरू-बहन की एक-दूसरे के लिए जिम्मेदारी होती है, उसी तरह किसी पंथ, किसी सम्प्रदाय, किसी आस्था, किसी धर्म या किसी जाति से बंधे हुए लोग एक-दूसरे की हरकतों पर अगर चुप रहते हैं तो वे अपनी पूरी बिरादरी का नुकसान करते हैं और आस्था के केंद्र का भी। 
कश्मीर में एक दरगाह के हादसे को लेकर जो लोग हिंसा कर रहे हैं, अपने देश के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, वे लोग उस दरगाह का और अधिक नुकसान कर रहे हैं, जितना कि आग के इस हादसे ने भी नहीं किया है।

अन्ना-बाबा से परे एक भरोसेमंद जनमत की पहल की जरूरत


संपादकीय
25 जून 12
केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी को हिमाचल की एक अदालत ने भ्रष्टाचार के मामले में मुकदमा चलाने के लायक पाया है, और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने के आदेश दे दिए हैं। ये मामला 2009 का है जब कांग्रेस के ही एक पूर्व मंत्री ने एक सीडी जारी की थी जिसमें उस वक्त हिमाचल के कांगे्रसी मुख्यमंत्री वीरभद्र उनकी पत्नी और पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह को एक आईएएस अफसर के साथ रिश्वत के लेन-देन की  बातचीत टेप की गई थी। जांच में वीरभद्र समेत सभी आरोपियों की आवाजें मैच हो गई थीं।
यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका है कि उसके एक बड़े मंत्री और हिमाचल में आने वाले चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार समझे जा रहे नेता पर पत्नी सहित भ्रष्टाचार का मुकदमा शुरू हो रहा है। दो ही दिन पहले शिमला में वीरभद्र सिंह ने अपने 77 वें जन्मदिन पर हुए एक बड़े आम जलसे में कांगे्रस पार्टी से मांग की थी कि वह हिमाचल में मुख्यमंत्री पद का अपना अगला दावेदार घोषित करे। वीरभद्र सिंह पर अभी भ्रष्टाचार के जिस मामले को लेकर मुकदमा शुरू हो रहा है, उसी मुद्दे को लेकर हिमाचल में अन्ना हजारे की टीम आंदोलन चला रही थी।
देश में पिछले कुछ समय में एक बात अच्छी हो रही है कि सत्ता का भ्रष्टाचार पहले के मुकाबले अब अधिक रफ्तार से, अधिक हद तक उजागर हो रहा है। ऐसा नहीं कि पहले सत्ता में भ्रष्टाचार कम होता था। लेकिन अब सूचना के अधिकार के चलते, खुफिया कैमरों और माईक्रोफोन की मेहरबानी से, भ्रष्टाचार के मामले अदालत तक पहुंचने के लायक पुख्ता बनकर भांडाफोड़ हो रहे हैं। आदर्श सोसायटी से लेकर कर्नाटक की लोहा खदानों तक, 2जी घोटाले से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों तक हर कहीं का भांडाफोड़ कुछ बरस पहले इतनी आसानी से नहीं हुआ होता। लेकिन कांगे्रस और भाजपा की सरकारों को जो मामले हमने ऊपर गिनाए हैं उनसे परे द्रमुक और अन्नाद्रमुक के मामले, लालू और मुलायम के मामले, मायावती और जगन मोहन रेड्डी के मामले, ऐसे अनगिनत मामले हैं जो अलग-अलग दर्जे की कानूनी उलझनों तक पहुंचे हुए हैं और कई नेता भीतर हैं, कई जमानत पर हैं और कई फिक्र के साथ सो रहे हैं।
ऐसे में अन्ना हजारे की अविश्वसनीय हो चुकी, सिर्फ कांगे्रस पर केंद्रित मुहिम से परे एक ऐसी गैरराजनीतिक और तटस्थ, निष्पक्ष मुहिम देश में चाहिए जो कि सभी पार्टियों को इस बात के लिए बेबस करे कि भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के गंभीर अपराधों वाले लोगों के मामले सामने आते ही उन्हें सत्ता और चुनाव से, जांच पूरी होने तक, अलग किया जाए। ऐसा लगता है कि मीडिया के भीतर के कुछ भरोसेमंद लोग भी बिना किसी एक पार्टी पर तोप का निशाना लगाए, सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करते हुए एक ऐसी सार्वजनिक मांग कर सकते हैं कि देश को बचाने के लिए किस तरह के राजनीतिक चरित्र की जरूरत है और पार्टियों को इस बारे में क्या करना चाहिए। मीडिया का अपना काम वैसे तो किसी मुहिम या अभियान से परे का होना चाहिए लेकिन हम कुछ मुद्दों को लेकर देश की आज की जरूरत पर एक वैचारिक सहमति की बात कर रहे हैं। राजनीति से गंदगी को दूर करने के लिए अगर देश के प्रमुख सौ-दो सौ पत्रकार मिलकर एक न्यूनतम सफाई कार्यक्रम जनता के सामने विचार के लिए रखते हैं, और उसके पीछे अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के पत्रकारों की मिलीजुली सहमति होती है तो उससे एक सार्वजनिक और लोकतांत्रिक दबाव राजनीतिक दलों पर पड़ेगा। ऐसा अभियान दल-निरपेक्ष होना जरूरी होगा और वह देश के प्रति मीडिया की अलग-अलग जिम्मेदारियों से परे की एक सामूहिक जिम्मेदारी, सामूहिक पहल की जरूरत से उपजा हुआ होगा। मीडिया को किसी तरह का आंदोलन नहीं चलाना चाहिए और हम एक्टिविस्ट जर्नलिस्ट को एक गैरजर्नलिस्ट ही मानते हैं, लेकिन आज का हमारा यहां का सुझाव किसी सक्रिय आंदोलन का न होकर एक दलनिरपेक्ष वैचारिक पहल का है, जिसमें देश के व्यापक भले के लिए एक नई पहल की जरूरत है। और यह काम जरूरी नहीं कि सिर्फ पत्रकार ही करें, डॉक्टरों के संगठन, वकीलों के संगठन, प्राध्यापकों के संगठन और उद्योग-व्यापार के लोग भी देश में ऐसा एक माहौल बनाने का काम कर सकते हैं। जनतंत्र, जनमत से बहुत अधिक समय तक बहुत अधिक दूर तक अछूता नहीं रह सकता। और आज ऐसी एक पहल की जरूरत हमको इसलिए भी लगती है क्योंकि अन्ना और बाबा जैसे आंदोलन घोर बदनीयत साबित हो चुके हैं, और उनके पीछे एक राजनीतिक भेदभाव पूरी तरह, और बुरी तरह उजागर भी हो चुका है। इसलिए अब देश के बाकी तबकों को, अपने रोज के कामकाज को अछूता रखते हुए, देश में एक ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जिससे कि सबसे गरीब लोगों के हक पर हो रहा बलात्कार रोका जा सके।


24 जून 2012


एक मामूली सी बात, लेकिन अहमियत की


24 जून 2012
संपादकीय
पिछले कुछ बरसों से लगातार जगह-जगह ट्यूबवेल में गिरे छोटे बच्चों को निकालने की कोशिशें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए दर्शकों की भावनाओं को बांधे रखने का एक आसान सामान बन चुकी हैं। और जिस तरह से सरकारी अधिकारी, कहीं पुलिस और कहीं फौजी कई-कई दिन तक रात-दिन जागकर ऐसी जिंदगियों को बचाने की कोशिश करते हैं, वह भी किसी भी देश-प्रदेश के लिए एक खासा खर्चीला काम होता है। वैसे तो जिंदगी बचाने के लिए खर्च को गिनना गलत बात है लेकिन किस तरह की सावधानी से ऐसे खर्च की नौबत से बचा जा सकता है यह सोचना चाहिए। 
हम अपने आसपास चारों तरफ नालियों पर खुले हुए गड्ढे देखते हैं, बिजली के खुले हुए तार देखते हैं, और जाहिर है कि बहुत सी जगहों पर ट्यूबवेल के ऊपर के ढक्कन गायब मिलते हैं क्योंकि कुछ किलो लोहे के फेर में उस ढक्कन को चोरी करके लोग बेच देते हैं। अब खाली पड़े हुए किसी अहाते में ट्यूबवेल होने के बाद लोग उस पर एक बार तो ढक्कन लगाकर रख सकते हैं, लेकिन उसकी चौकीदारी तो रोज नहीं कर सकते। नतीजा यह होता है कि नालियों के ऊपर के मेनहोल के ढक्कन लोहे के लालच में आनन-फानन चोरी हो जाते हैं और जाकर कबाड़ में बिक जाते हैं। लोगों के लिए ऐसे गड्ढों में गिरकर घायल होने या जान देने का खतरा खड़ा हो जाता है। 
दरअसल देश के लोगों में जब तक दूसरी जिंदगियों के लिए फिक्र न हो, तब तक लोग अपने बच्चों को कमउम्र में तेज रफ्तार और ताकतवर गाडिय़ां देकर सड़कों पर निकल जाने देते हैं, और दूसरे कई किस्म के खतरे पैदा करते रहते हैं। बहुत मामूली से सामान की चोरी से सरकार का, यानी कुल मिलाकर जनता का कितना नुकसान होता है यह जानते हुए भी लोग रेलगाड़ी के डिब्बे से सीट का रैगजीन काटकर उसके झोले बना लेते हैं। कहीं बिजली के तार ले जाते हैं तो कहीं टेलीफोन के केबल। चोरी से जितनी कमाई होती है उससे हजार गुना का नुकसान जनता के पैसों का होता है लेकिन लोगों में इतनी जागरूकता नहीं है कि अपने खुद के इस नुकसान को समझ सकें। जब लोग किसी खड़ी हुई गाड़ी का चक्का चुराकर बेचते हैं तो यह नहीं सोचते कि वह गाड़ी किसी ऐसे डॉक्टर की हो सकती है जो कि उनके घर के किसी की जान बचाने के लिए जिस दिन आने वाला हो, उस दिन उसे वह चक्का गायब मिलेगा। 
किसी देश के लोगों में सार्वजनिक सुविधाओं के लिए, जनता के पैसों के लिए, दूसरों की सुविधाओं के लिए और सबकी हिफाजत के लिए जब तक जिम्मेदारी नहीं आएगी तब तक देश के बहुत सा पैसा, बहुत से लोगों की जिंदगियां इसी तरह बर्बाद होती रहेंगी। और जब ऐसी गैरजिम्मेदारी बहुत पढ़े-लिखे, बहुत दौलतमंद और ताकतवर लोग दिखाते हैं, तो उनकी मिसाल को देखते हुए उनसे इन तमाम पैमानों पर नीचे के लोग, उसी को देश की सभ्यता मान लेते हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में चल रहे अरबों-खरबों के कारखानों को देखते हैं कि बिजली बचाने के लिए वे चिमनियों से प्रदूषण को रोकने वाले उपकरण नहीं चलाते और हवा में जहर घोलते रहते हैं। अब इन लोगों को समाज में इज्जत और ताकत पाते देखने के बाद इनकी काली धूल और इनके धुएं से लदे हुए लोग भला किस तरह की जिम्मेदारी निभाने के लिए जागरूक हो सकते हैं? इंसान अच्छा काम करके दूसरों को अच्छा करने के लिए पे्ररणा दे सकते हैं, और बुरा काम करके उनको बुरा करने का रास्ता दिखा सकते हैं। आज लोगों में अपने फायदे और अपनी सहूलियत के लिए इतनी मतलबपरस्ती हो गई है कि लोग लालबत्ती और सायरन मिल जाने पर सड़क पर पैडल मारकर चलने वाले या ठेला धकेलने वाले लोगों को भी चीख के साथ किनारे फेंक देना चाहते हैं। ताकत बढऩे के साथ-साथ इंसानियत घटने लगती है। और ऐसी बातें भी दूसरे मामूूली, गरीब और कमजोर लोगों में कानून के लिए, सार्वजनिक बातों के लिए हिकारत पैदा कर देती हैं। इसलिए सुधार की शुरूआत ऊपर से होना जरूरी है वरना दबे-कुचले कमजोर लोग तो वैसे भी भड़ास से भरे हुए रहते हैं। 
क्या बहुत मामूली लगती ऐसी बात पर लोग आपस में कुछ बात करेंगे?

23 जून 2012


23 जून 2012


छदाम बचाने के लिए रूपया गंवाए...


23 जून 2012
संपादकीय
भारत में किसी राज्य के विधायकों में से पन्द्रह फीसदी को मंत्री बनाया जा सकता है। भारतीय संविधान में यह सीमा इसलिए तय की गई क्योंकि अधिक मंत्रियों को राज्य की जनता पर अधिक बड़ा बोझ माना जाता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इस सीमा के चलते कुल दर्जन भर मंत्री हैं। और लोग यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि सरकार का खर्चा इससे कम हो गया है। आज इस पर लिखने की नौबत इसलिए आई कि कर्नाटक में एक और मंत्री के इस्तीफा देने से मुख्यमंत्री के पास अब इक्कीस विभाग हो गए हैं। केंद्र की यूपीए सरकार में भी जब-जब किसी मंत्री के इस्तीफे हुए, गठबंधन के दबावों के चलते, और कुछ दूसरी वजहों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर बहुत से विभागों को ढोने की नौबत आती ही रही है। और अगर हम याद करें तो कोयले का घोटाला जिस वक्त हुआ उस वक्त मनमोहन सिंह कोयला मंत्री भी थे।
करीब दस बरस पहले संविधान में संशोधन करके मंत्रिमंडलों में गिनती तय की गई थी। पन्द्रह फीसदी की सीमा से छोटे राज्यों के लिए एक अलग किस्म की दिक्कत खड़ी हुई। सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर गुटों का संतुलन, राज्य के भीतर अलग-अलग इलाकों से मंत्रियों को लेने की मजबूरी, जातियों और धर्मों को मंत्रिमंडल में जगह देने की मजबूरी, महिलाओं को जगह देने की मजबूरी, इन सब सीमाओं के चलते हुए कोई भी मंत्रिमंडल राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के भी सबसे काबिल लोगों से बना हुआ हो, ऐसा कई बार नहीं हो पाता। जिस कर्नाटक की बात से आज हमने यह लिखना शुरू किया है वहां पर 224 सदस्यों वाली विधानसभा के अलावा 75 सदस्य वाली विधान परिषद भी है। इन दोनों में मिलाकर पन्द्रह फीसदी मंत्री बनाए जा सकते हैं। लेकिन इतने बड़े मंत्रिमंडल के बाद भी मुख्यमंत्री के पास इक्कीस विभागों की नौबत आ रही है। छोटे राज्यों में एक-एक मंत्री के पास इतने विभाग होते हैं कि उनमें से किसी का भी काम ठीक से देखना नहीं हो पाता। फाइलें महीनों तक पड़ी रहती हैं, केंद्र सरकार की योजनाओं से हजारों करोड़ लाने की संभावना दम तोड़ देती है। राज्य का अपना बजट खर्च करने में भी दिक्कत रहती है, और अधिक कमाऊ किस्म के कामों में अनुपात से अधिक समय दिया जाता है, उन्हीं को रफ्तार से किया जाता है। नतीजा यह होता है कि कम लुभावने काम सरकार की हर टेबिल के किनारे नीचे कपड़ों में बंधे हुए ग_र बने रखे रहते हैं। 
अब छत्तीसगढ़ में करीब चालीस हजार करोड़ के बजट पर, नब्बे सदस्यों की विधानसभा में से लिए गए दर्जन भर मंत्रियों का मंत्रिमंडल है। दूसरी तरफ पड़ोस के मध्यप्रदेश में इससे करीब डेढ़ गुना बजट के लिए 230 सदस्यों के विधानसभा में से  32 सत्तारूढ़ विधायक मंत्री हैं। जाहिर है कि वहां मंत्रियों के पास काम का बोझ छत्तीसगढ़ के मुकाबले कम ही होगा। जब एक-एक मंत्रालय के हजारों करोड़ के सालाना बजट को खर्च करना महीनों लेट हो जाता है, भ्रष्टाचार, फिजूलखर्ची और बर्बादी पर नजर रखना मुमकिन नहीं होता है, तो वहां पर एक मंत्री पर सरकार के होने वाले खर्च को फिजूलखर्ची मानना अंधा कानून है। संविधान के इस संशोधन से देश का फायदा होने के बजाय नुकसान हो रहा है।
फिर दूसरी बात यह कि राजनीतिक दबावों के चलते हर प्रदेश में सरकार अपनी पार्टी के लोगों और शुभचिंतकों को मंत्री स्तर का दर्जा या ऐसे दर्जे के बिना सुविधाओं सहित कुर्सी देकर राज्य का खर्चा तो बढ़ाती ही हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहुत सारे ऐसे निगम और मंडल हैं जिन पर मनोनीत किए गए लोगों पर सरकार का खर्च किसी मंत्री पर होने वाले खर्च से कम नहीं होता। दूसरी तरफ ऐसे मनोनीत लोग आम जनता के लिए किसी चुनाव के मोर्चे पर जवाबदेही भी नहीं रखते। इससे बेहतर तो यह है कि इस सीमा को काफी कुछ बढ़ाया जाए ताकि विभागों को ऐसे लोग मिलें जो उन्हें पूरा समय दे सकें। इसके लिए एक और बात पर बहस होनी चाहिए कि राज्य की विधानसभा के आकार के साथ-साथ उसके बजट आकार से भी क्या मंत्रियों की संख्या तय हो? जिस राज्य का बजट बहुत बड़ा होगा वहां पर उतने ही विधायकों वाले कम बजट वाले दूसरे राज्य के मुकाबले काम तो बहुत अधिक होगा ही। इसलिए व्यवहारिक नजरिया तो यह होगा कि मंत्रियों पर होने वाले खर्च को फिजूलखर्च न माना जाए और राज्य के विकास, बजट के पूरे और सही इस्तेमाल को महत्वपूर्ण माना जाए। कुर्सियों की यह सीमा पूरी तरह असफल साबित हो चुकी है। राज्यों के भीतर अधिक मंत्री होने से मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी दबावों वाले कोटे को पूरा कर देने के बाद कुछ अधिक काबिल लोगों को भी मंत्री बना सकेंगे जो कि जाति, धर्म, क्षेत्र या गुटों से परे के हों। 
हिन्दी में एक कहावत है-सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। मंत्रिमंडल के खर्च को सस्ता बनाना दरअसल महंगा साबित होता है। अंगे्रजी की कहावत है-पेनी वाइज, पाउंड फूलिश। छदाम बचाने के लिए रूपया गंवाए।

22 जून 2012


बारिश और गोदाम


22 जून 2012
संपादकीय
राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति और देश के गठबंधनों की फूट से परे एक ऐसा मुद्दा है जिस पर देश को फिक्र करने की जरूरत है। गोदामों के बिना किस तरह देश भर में अनाज बारिश में सड़ता है और चूहों के पेट में जाता है, इसकी खबर से मीडिया मानसून के बाद भी लबालब रहता है। और यह सिलसिला हम दशकों से देखते चले आ रहे हैं कि किस तरह जनता भूखी है, बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और चूहे अधिक मोटापे की तकलीफ से घिरे हुए हैं। सरकारी गोदाम अनाज को सड़ते देख रहे हंै, बारिश के बाद भूखे इंसानों के देश में अनाज जानवरों का चारा बनाने वाले कारखानों को औने-पौने में बेचा जाता है, और वह सुप्रीम कोर्ट गरीबों में अनाज बांट देने का हुक्म देता है जिसे चुनाव लडऩे की कोई मजबूरी नहीं है और न ही कोई लोकप्रिय और लुभावना फैसला देने की। 
एक तरफ इस देश में भवन निर्माण उद्योग में मंदी की चर्चा है, लोहे के कारखानों और धंधे में ठंडक सुनाई पड़ती है और दूसरी तरफ गोदाम बनाकर भाड़ा कमाने या अनाज को बचाने के मकसद से गोदाम बनाने में कोई उत्साह नहीं दिखता। कहने को सरकार के आंकड़े बता सकते हैं कि कितने बरसों में गोदाम की क्षमता कितनी बढ़ी है, लेकिन नए गोदाम बनाने का काम किसी परमाणु बम के फार्मूले का मोहताज नहीं रहता। जगह-जगह जरूरत के मुताबिक गोदाम बनाकर गैरजरूरी ट्रांसपोर्ट भी रोका जा सकता है और अनाज को भी सडऩे से बचाया जा सकता है। लेकिन सरकार के भीतर इन दोनों कामों में इतनी बड़ी कमाई का धंधा है कि गोदाम बनाना बहुत से लोगों के लिए एक घाटे का काम हो जाएगा। जिस देश से आईआईएम जैसे प्रबंधन संस्थानों से निकले हुए लोग दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों को चलाने का काम करते हैं, अमरीका जैसे देश में जाकर जालसाजी भी कर लेते हैं, वैसे काबिल या चतुर और हुनरमंद लोग इस देश में रहते हुए यहां पर इस बर्बादी को रोकने का काम क्यों नहीं हो रहा?
सरकार के भीतर काम के ऐसे तरीके हैं कि एक तरफ तो लोगों को रोजगार गारंटी के तहत काम देने के लिए किसी भी तरह के काम करवाए जाते हैं जिनका कि आगे जाकर कोई उत्पादक उपयोग हो या न हो। फिर जहां-जहां अनाज अधिक हो रहा है जहां अनाज को गोदाम में रखने की जरूरत है वहां पर गोदाम बनाने के काम में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, बाजार, और इस काम के लिए कर्ज देने वाली वित्तीय संस्थाओं के बीच तालमेल की कमी दिखती है। यह सिलसिला खत्म करके हर राज्य को अपनी-अपनी सारी जरूरतों या अपने सारे उत्पादन के हिसाब से जरूरत के गोदामों की योजना बनानी चाहिए और केंद्र सरकार को उसमें अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। इस काम के लिए अगर सरकार को रियायत पर जमीन देनी पड़ी तो भी कारोबारियों को यह फायदा देना चाहिए ताकि देश का हर बरस का नुकसान रूक सके। आज की हमारी जानकारी यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में खुद सरकार के एक निगम के तहत जितने गोदाम बनते हैं उनकी जमीन सरकार को पूरा रेट देने पर ही मिलती है। और एक बार गोदाम बन जाने पर वह एक फायदे का कारोबार रहता है। छत्तीसगढ़ चूंकि एक रिकॉर्ड उत्पादन का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाला राज्य बन चुका है इसलिए यहां बड़े पैमाने पर यह काम करना चाहिए और हमारी साधारण समझ यह कहती है कि केंद्र सरकार की एजेंसियां भी ऐसे गोदाम किराए पर लेकर उसमें राज्य की जरूरत से अधिक का चावल भी रख सकती हैं, जो कि राज्य के लिए और यहां के कारोबारियों के लिए फायदे का हो सकता है। दूसरी तरफ अनाज से परे बहुत किस्म की ऐसी वनोपज छत्तीसगढ़ में है जिनके गोदाम की जरूरत है। गोदाम रहने से लोग बाजार में हड़बड़ी में बेचने के लिए मजबूर नहीं होते और उन्हें सही दाम मिल पाता है। 
छत्तीसगढ़ सरकार को देश के सामने इस बारे में एक मिसाल पेश करनी चाहिए।

21 जून 2012


चुनाव चिन्ह का एक और इस्तेमाल कर सकती है कांग्रेस पार्टी


संपादकीय
21 जून 2012
कांग्रेस के उत्तरप्रदेश के एक बड़बोले प्रवक्ता राशिद अल्वी ने कल प्रदेश के किसी चुनाव के मंच से समाजवादी पार्टी को जमकर कोसा और मुलायम सिंह यादव को भाजपा का एजेंट कहा। आज जब राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए की मुखिया के तौर पर कांग्रेस पार्टी घर बैठे जीत हासिल करते दिख रही है तब उसके अपने लोग साथ देने वाले लोगों को लात मारने में व्यस्त दिख रहे हैं। और कांग्रेस के प्रवक्ताओं के मामले में यह कोई नई बात नहीं है। जो प्रवक्ता के पद पर नहीं है वैसे लोग, दिग्विजय सिंह सरीखे, भी ऐसी बातें कह रहे हैं जिनसे कि ममता बैनर्जी भड़के या कोई और भड़के। कुल मिलाकर इस पार्टी की यह दुर्गति दिख रही है कि इसके लोग अपने ही शुभचिंतकों को दौड़ा-दौड़ाकर काटते रहते हैं। यह सिलसिला किसी भी पार्टी के लिए अच्छा नहीं होता, और कांग्रेस तो आज जिस नाजुक दौर से गुजर रही है उसमें वह विभाजित विपक्ष पर अपनी उम्मीदें लगाकर अपने साथियों के पर कतरने, उन्हें बेइज्जत करने में लगी है। 
ममता बैनर्जी से लेकर मुलायम सिंह यादव तक के तौर-तरीकों से, उनकी नीतियों से हम अलग-अलग समय पर असहमत होते रहते हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी एक गठबंधन की मुखिया का जिम्मा बहुत ही खराब तरीके से निभा रही है। यह तो उसकी किस्मत तेज है कि मोदी के नाम पर विपक्षी गठबंधन एनडीए में गहरी दरार पड़ी है और राष्ट्रपति चुनाव पर भी एनडीए छिन्न-भिन्न हो गया है। लेकिन इसे कांग्रेस अपना फायदा मानकर अगर चलेगी तो अगले चुनाव तक उसे कुछ और सदमे भी हो सकते हैं जब उसके अपने साथी उसे छोड़ जाएंगे और हो सकता है कि वे एनडीए के साथ हो जाएंगे। अपने कुकर्मो, अपने गलत कामों और अपनी गलतियों से सबक लेकर कुछ सीखने और अपने को सुधारने के बजाय आज कांग्रेस पार्टी सिर्फ दूसरों की मजबूरियों पर घुड़सवारी कर रही है। यह सिलसिला लंबे समय तक नहीं चलता। 
कांग्रेस के प्रवक्ताओं और नेताओं के आत्मघाती रूख के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं जब समय-समय पर उसे अपने प्रवक्ताओं को हटाना पड़ता है, झिड़कना पड़ता है, उनकी बातों को निजी बात कहते हुए पार्टी को उससे अलग करना पड़ता है। सोनिया गांधी के निजी सिपाही और राहुल गांधी के प्रशिक्षक माने जाने वाले दिग्विजय सिंह को तो पार्टी ने पिछले छह महीनों में शायद छह बार खारिज किया है और एक से अधिक बार उन्हें चेतावनी दी है कि वे मनमानी बातें न करें। लेकिन सोनिया गांधी का किसी तरह का काबू अपनी पार्टी पर दिख नहीं रहा है। मां-बेटे जितनी संतुलित बातें करते हैं, और जितना कम बोलते हैं, उनके मुकाबले उनकी पार्टी के बाकी कई नेता और प्रवक्ता मानो कसर पूरी करने में जुट जाते हैं। गठबंधन के एक-एक साथी को समय-समय पर नाराज करके कांग्रेसी बड़बोले सिर्फ यह साबित करते हैं कि उनके पास मुंह है, लेकिन कुदरत ने उस मुंह के ऊपर जो दिमाग रखा है, उसे वे बहुत किफायत से खर्च करते हैं। लोगों को अभी सत्यव्रत चतुर्वेदी का प्रवक्ता के पद से हटाना याद है जब उन्होंने कांग्रेस के ही एक साथी के खिलाफ बकवास की थी। 
कांग्रेस को हम सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि जो पंजा उनका चुनाव चिन्ह है, उसका चुनाव के अलावा बाकी दिनों में एक और इस्तेमाल हो सकता है मुंह पर रखने का।

20 जून 2012


सरहद के दोनों तरफ हलचल, उधर नए पीएम, इधर राष्ट्रपति


20 जून 2012
संपादकीय
भारत और पाकिस्तान के बीच सरहद पर कल दोनों फौजों के बीच गोलियां चलीं। युद्धविराम की शर्तों के खिलाफ किस तरफ से क्या हुआ इस पर हम अभी कोई अटकल लगाना नहीं चाहते और न ही किसी एक तरफ की तरफदारी करना चाहते। लेकिन यह एक दिलचस्प सिलसिला है कि सरहद के एक तरफ जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रधानमंत्री को हटाकर एक नया प्रधानमंत्री बनाया जा रहा है, तभी सरहद के दूसरी तरफ एक राष्ट्रपति की रवानगी हो रही है और नए राष्ट्रपति की तैयारी चल रही है। इन दोनों हालात में और बहुत सी बातें मिलती हुई नहीं हैं, लेकिन दोनों तरफ हलचल चल रही है। 
भारत की एक दूसरी उथल-पुथल केंद्रीय राजनीति के उस गठबंधन, एनडीए, में हो रही है जिसे कि केंद्र में आज सत्तारूढ़ यूपीए का विकल्प माना जा रहा है और इस बार की तनातनी थोड़ी सी अधिक गंभीर इसलिए लग रही है क्योंकि यह एनडीए के भीतर के साम्प्रदायिकता से थोड़े परे खड़े हुए नीतीश कुमार की तरफ से शुरू हुई है। दरअसल एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के भीतर भावी और संभावित सत्ता संघर्ष के लिए नरेन्द्र मोदी और बाकी तकरीबन तमाम नेताओं के बीच रस्साकसी चल रही है। भाजपा के भीतर मोदी को खारिज करने वालों की कमी नहीं है और भाजपा के बहुत से रणनीतिकार यह भी मानते हैं कि मोदी मंजूर नहीं होंगे, न एनडीए के भीतर, और न मतदाताओं के बीच। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से ऐसी ही एक नौबत के बारे में लिखते आ रहे थे कि मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर कोई मंजूर नहीं करेगा, लेकिन आज राष्ट्रपति चुनाव के बीच में भाजपा एनडीए के भीतर काफी अलग-थलग सी पड़ गई है, और भाजपा के भीतर मोदी अलग-थलग पड़ गए हैं। इतना जरूर है कि भाजपा पर जिस संघ परिवार के काबू की बात कही जाती है, वह अपने मिजाज के मुताबिक मोदी के साथ है। 
नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने मोदी को खारिज करते हुए यह साफ किया है कि गुजरात के दंगों के वक्त मोदी का क्या रूख था। लेकिन अब लालू यादव से लेकर पासवान तक और कांगे्रस से लेकर वामपंथियों तक हर किसी को यह सवाल उठाने का हक बनता है कि इतने बरस बाद नीतीश को अब समझ आ रहा है कि दंगों में मोदी का क्या हाथ था? भारतीय राजनीति में यह एक बड़ा दिलचस्प मोड़ है कि जब सत्तारूढ़ यूपीए के भीतर उसकी एक हमेशा की बागी ममता बैनर्जी ने पूरे गठबंधन को एक शर्मिंदगी में डुबाने की नौबत ला दी थी, तब यूपीए तो उससे उबर गया, दूसरी तरफ एनडीए भारी शर्मिंदगी में डूब गया है। शिवसेना जैसी भाजपा की पुरानी और भरोसेमंद पार्टी शिवसेना ने खुलकर भाजपा की मर्जी के खिलाफ जाने की घोषणा की है और यूपीए के कांगे्रसी उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति चुनाव का वोट देने की वकालत की है। उसने इसके साथ-साथ नीतीश कुमार के उठाए हुए इस मुद्दे को भी सही करार दिया है कि एनडीए अगले चुनाव के पहले प्रधानमंत्री पद के अपने प्रत्याशी को तय करे और घोषित करे। दिल्ली की खबरें ये हैं कि भाजपा के भीतर अपने-आपमें इस बात को लेकर अंतरविरोध चल रहे हैं कि प्रणब मुखर्जी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा किया जाए या न किया जाए। 
भारतीय राजनीति में जब यूपीए हर कोने से लात खाते दिख रही थी, उस वक्त वह राष्ट्रपति चुनाव में मतदान के पहले ही, परचा भरने के पहले ही जीती हुई दिख रही है और विपक्ष न सिर्फ हारा हुआ दिख रहा है बल्कि इस मौके पर उसके भीतर न पटने लायक दरारें दिख रही हैं। आज जब मोदी को बचाने के लिए संघ परिवार खुलकर सामने आया है और आरएसएस ने कहा है कि अगला प्रधानमंत्री हिंदुत्व की विचारधारा का होना चाहिए, तो इस मुद्दे को उठाने वाले नीतीश कुमार के सामने, आमने-सामने की लड़ाई की नौबत आ गई है। दरअसल एनडीए के भीतर समय-समय पर ऐसी पार्टियां रही हैं जो कि मोदी जैसी साम्प्रदायिकता के साथ नहीं चलतीं, लेकिन गुजरात की राजनीति से परे केंद्र की राजनीति में वे भाजपा के साथ बनी रहीं क्योंकि सत्ता पर आने या उसकी संभावना पाने का और कोई जरिया भाजपा से यारी के अलावा था नहीं। नीतीश कुमार का मोदी से परहेज कोई नया नहीं है, एक-दो बरस में वह कई बार उजागर हो चुका है, लेकिन आज राष्ट्रपति चुनाव के मौके पर जब भाजपा एक गठबंधन के रूप में मजबूती से एक दिखना चाहती थी, तब वह नीतीश कुमार, बाल ठाकरे और शायद अकालियों की तरफ से भी अकेली पड़ गई है। और इस नौबत के पीछे सिर्फ मोदी जिम्मेदार नहीं हैं, यह भाजपा के लिए एक अलग फिक्र की बात भी है। 

19 जून 2012


19 जून 2012


बच्चों की चौकसी जरूरी, उन्हें जागरूक बनाना भी


19 जून 2012
संपादकीय
फ्रांस के लिए भारत में काम कर रहे वहां के एक सरकारी अधिकारी को बेंगलूरू में गिरफ्तार किया गया है जिस पर उसकी भारतीय मूल की पत्नी ने ही तीन बरस की बेटी के साथ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई थी और मेडिकल जांच में उस बच्ची की ऐसी ज्यादती साबित भी हुई है। यह मामला बहुत से लोगों को हिला सकता है। किसी के लिए अपने खुद के बच्चों से अधिक और भला कौन सी चीज महत्वपूर्ण हो सकती है? और बहुत से लोग यह भी सोचेंगे कि ऐसा बाप दिमागी-मरीज भी होगा और विकृत सोच का भी होगा, इसीलिए उसने ऐसा किया होगा। कुछ लोग उसे चौराहे पर फांसी देने की वकालत करेंगे और कुछ उसे राक्षस या पिशाच कहेंगे। लेकिन इस भयानक हादसे को लेकर जिन बातों पर सोचना चाहिए उन पर बहुत कम बात होगी।
कुछ ही हफ्ते हुए हैं जब हमने आमिर खान के टीवी शो सत्यमेव जयते को लेकर इसी जगह बच्चों की यौन प्रताडऩा को लेकर लिखा था और भारत के लोगों को सावधान रहने की नसीहत दी थी। दरअसल बच्चों के साथ बड़े ऐसा कर सकते हैं, यह बात भारत की सोच को गवारा नहीं होती। लोग यह मानकर चलते हैं कि यह पश्चिम की विकृति है और भारत उससे अनछुआ है क्योंकि यहां कि संस्कृति एक गौरवशाली संस्कृति है। लेकिन हकीकत यह है कि पश्चिम ऐसे मामलों को लेकर अधिक चौकन्ना है और वहां ऐसे हादसे होने के पहले ही रूक जाने की गुंजाइश अधिक होती है। भारत में ऐसे मामले सामने नहीं आ पाते क्योंकि न घर में लोग बच्चों की ऐसी शिकायत सुनने को तैयार रहते और न ही स्कूल में बच्चों के साथ ऐसे दोस्ताना बर्ताव वाले कोई परामर्शदाता होते जो कि इस काम के लिए प्रशिक्षित हों, जानकार हों और हमदर्दी रखते हों। 
अभी एक-दो हफ्ते के भीतर ही दक्षिण भारत से एक खबर आई थी कि एक पिता अपनी बच्ची के साथ बलात्कार के लिए अपने दोस्तों को महीनों से बुलाकर यह काम करवाता था। पिछले एक पखवाड़े से हरियाणा के एक अनाथाश्रम की खबरें मीडिया में रोजाना हैं कि किस तरह वहां छोटे-छोटे बच्चों से किस्म-किस्म के बलात्कार होते थे। ऐसी बीमार सोच और ऐसी विकृति दुनिया के विकसित और संपन्न देशों के मुकाबले भारत में हो सकता है कि कुछ अधिक हो क्योंकि न तो यहां बड़ों को अपनी ऐसी खामियों से छुटकारा पाने के लिए मानसिक चिकित्सा या परामर्श उपलब्ध है और न ही बच्चों को शिकायत करने का कोई जरिया है। समाज इस तरह का दकियानूसी है और हकीकत को अनदेखा करने वाला है कि जब तक एक धमाके की शक्ल में ऐसी बातें सामने न आएं, भारतीय समाज उसका नोटिस ही नहीं लेता। यह सिलसिला बहुत भयानक है क्योंकि बचपन में इस तरह के शोषण के शिकार लोग आगे चलकर जब बड़े होते हैं तो उनकी क्षमताओं का देश और समाज को उतना फायदा नहीं हो पाता जितना फायदा कि एक अच्छे बचपन वाले बच्चे के बड़े होने पर उससे हो सकता है।
इसलिए आमिर खान के शो के बाद श्मशान वैराग्य की तरह फिक्र करने वाले और अगले हफ्ते तक उसे भुला देने वाले लोगों को चाहिए कि बच्चों की यौन प्रताडऩा के मुद्दे पर अपने-अपने दायरे के भीतर ही खुलकर चर्चा करें और बच्चों को जागरूक बनाने की कोशिश करें। सिर्फ अपने बच्चों की हिफाजत काफी नहीं है। अपने पूरे दायरे, मुहल्ले और शहर, फुटपाथ और प्लेटफॉर्म, जहां-जहां बच्चे खतरे झेलते दिखते हैं, उनकी मदद करनी चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि एक भी बच्चा अगर ऐसे किसी हादसे का शिकार होता है, और आगे चलकर वह खुद समाज से अपनी ऐसी प्रताडऩा का हिसाब चुकता करने की सोचता है तो फिर उस हिसाब में हो सकता है आज चुप बैठे हुए लोगों की अगली पीढिय़ां भी शिकार हो जाएं। इसलिए दुनिया में आप और आपकी आने वाली पीढिय़ां तभी तक महफूज रह सकती हैं जब तक कि दुनिया में जुल्म और ज्यादती पर काबू रहे। अपने घर-परिवार से सावधानी बरतना शुरू करना चाहिए और इसके बाद समाज को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए इस जागरूकता को, इस चौकसी को बढ़ाते चलना चाहिए।

18 जून 2012


माधुरी के पड़ोसी, रंगा-बिल्ला और बलात्कारी!


18 जून 2012
कल ट्विटर पर फिल्म अदाकारा माधुरी दीक्षित ने लिखा कि आसमान पर एक तारे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। उन्होंने एक सर्टिफिकेट भी इसके साथ इंटरनेट पर डाला। उन्होंने अंतरिक्ष के इस हिस्से-ओरियन (कॉन्स्टलेशन) ज्योतिपुंज, की जानकारी भी लिखी। 
अपनी खराब आदत के मुताबिक मैंने इंटरनेट पर इस जानकारी को सर्च करना शुरू किया तो पता लगा कि स्टार फाउंडेशन नाम की कोई अमरीकी बाजारू संस्था  दो-चार हजार रूपये लेकर किसी के भी नाम पर एक तारे का नाम रखने का सर्टिफिकेट बनाकर भेज देती है और लोग उसे लेकर खुश हो सकते हैं कि उनका नाम ब्रम्हांड में  अमर हो गया है। स्टार फाउंडेशन की वेबसाईट पर ऐसे नामकरण के दाम भी लिखे हुए थे और सर्टिफिकेट के नमूने भी बने हुए थे कि कितने दाम पर किस तरह का सर्टिफिकेट बनाकर भेजा जाएगा।
मुंबई में बरसों सबसे कामयाब रह चुकी अभिनेत्री माधुरी दीक्षित शादी के बाद शायद दस-बीस बरस अमरीका जाकर रहीं और अब लौटकर मुंबई में फिल्म और टीवी पर काम कर रही हैं। उनसे यह उम्मीद की जा सकती थी कि पहले तो खुद इस तरह के झांसे में न आएं कि आकाशगंगा के किसी तारे का नाम उनके नाम पर रखा जा रहा है, और फिर उनसे यह उम्मीद भी की जाती है कि वे खरीदी हुई ऐसी शोहरत को अपनी शान मानते हुए खुद उस पर खुशियां मनाने का इश्तहार न करें। उनकी इस ट्वीट पर कल ही मैंने उनको फेसबुक और ट्वीट पर खबर भेजी कि उन्होंने इसे खरीदा है या उन्हें यह नामकरण मुफ्त मिला है। लेकिन उसका कोई जवाब नहीं मिला और कल स्टार फाउंडेशन की वेबसाइट के आधार पर खबर बनाने का वक्त निकल गया था।
अखबार की जिंदगी में जैसा होता है, आज यह खबर बीबीसी की वेबसाइट पर आ गई, इसलिए मुझे इसे पहले पेज की बड़ी खबर बनाने के बजाय इसे अपने इस कॉलम में इस्तेमाल करना बेहतर लगा। 
मशहूर होने की हसरत लोगों से कई किस्म के काम करवाती है। दुनिया में दर्जनों ऐसी फर्जी संस्थाएं हैं जो कि लोगों को कोई सम्मान या पुरस्कार देने के नाम पर हर बरस एक जलसा करवाती हैं, उनमें भाड़े पर जाने वाले कुछ भूतपूर्व राज्यपाल, कुछ भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रहते हैं। उनमें देश के सबसे बड़े फिल्मी सितारे या खिलाड़ी या कुछ और चर्चित लोगों के सम्मान का जिक्र होता है, और उनके साथ-साथ देश भर के छोटे-बड़े शहरों के सैकड़ों ऐसे लोगों का सम्मान होता है जिनसे उसके लिए वसूली की जाती है। अपने-अपने इलाके में खासे बदनाम, खासे बुरे लोग जब दिल्ली-मुंबई जाकर देश के नामी-गिरामी लोगों के साथ कोई सम्मान पाने की खबर लाकर अपने इलाके में छपवाते हैं, तो उनकी हकीकत जानने वाले हैरान रह जाते हैं कि ऐसे बाजारू, या कुकर्मियों को इतना बड़ा राष्ट्रीय सम्मान किसलिए दिया गया? 
ऐसे कई सम्मानों की हकीकत समय-समय पर मेरे सामने आती रही है और कुछ लोगों ने तो अपने साथ-साथ मेरे लिए भी सम्मान का भुगतान करने का प्रस्ताव रखा था ताकि इस इलाके में उनका नाम मेरे थोड़े बहुत कम बदनाम नाम के साथ गिना जाए। ऐसी शोहरत से दूर रहने का पक्का इरादा अब तक तो मुझे रोकते रहा है। 
लेकिन ऐसी तमाम बातें कल उस वक्त फिर याद आ गईं जब माधुरी दीक्षित अपने खुद के प्रचार के लिए, अपनी इस खरीदी हुई शोहरत को इंटरनेट पर डाला, बिना यह बताए हुए कि उसने इसके लिए भुगतान किया है।
इसी तरह दुनिया में कुछ आटोबायोग्राफिकल सोसायटियां हैं जो कि अलग-अलग विषयों से जुड़े हुए लोगों को आए दिन चि_ी भेजती रहती हैं कि उनका नाम ऐसी एक आटोबायोग्राफिक किताब के लिए छांटा गया है और वे अपने परिचय और फोटो के साथ प्रमाणपत्र के लिए कितने डॉलर भेजें। बहुत से लोग भुगतान करके ऐसा फर्जी सम्मान पाते हैं और फिर अपने-अपने इलाके के मीडिया में उसका प्रचार भी करवाते हैं। 
हमारे अखबार के पाठकों को याद होगा कि कुछ महीने पहले ही हमने देश के एक सबसे बड़े उद्योगपति, कांगे्रस के सांसद और नौजवान खिलाड़ी नवीन जिंदल की एक खबर की जांच करके उसकी असलियत छापी थी कि उनके अमरीकी विश्वविद्यालय ने वहां के एक मैनेजमेंट स्कूल का नाम उनके नाम पर इसलिए रखा है क्योंकि जिंदल ने वहां पहले करोड़ों रूपये दान दिए और उसके आधार पर विश्वविद्यालय ने यह फैसला लिया। जिंदल की खुद की जारी की गई खबर में ऐसे दान से खरीदे गए नाम का कोई जिक्र नहीं था, और देश के बड़े-बड़े अखबारों में इस खबर को छापने वाले बड़े-बड़े अखबारनवीसों ने भी इस बहुत जाहिर सी बात को भी टटोलने की कोशिश नहीं की थी और जिंदल की खबर उनकी मर्जी के मुताबिक छाप दी थी। 
दरअसल मीडिया की ऐसी अनदेखी के पीछे उसका खुद का अपना बदलता हुआ मिजाज है। एक वक्त आजादी की लड़ाई के वक्त मीडिया को मिशन माना जाता था। बाद में वह मिशन, प्रोफेशन हो गया, और अब वह इंडस्ट्र्री हो गया। इसलिए एक इंडस्ट्री को मैनेज करने के तरीके अलग होते हैं और आज मीडिया उसी तरह से मैनेज भी होता है। इसलिए खरीदे गए सम्मानों पर कोई सवाल नहीं होते। 
लेकिन हम सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं उनसे उम्मीद करते हैं कि ऐसी खरीदी हुई शोहरत के बारे में उनको खुलासा करना चाहिए कि इसके लिए उन्होंने कितना भुगतान किया है। 
कुछ लोगों को देखें तो मानो शोहरत के बिना उनका जी ही नहीं भरता। रात-दिन भुगतान करके अलग-अलग मंचों पर माईक, माला और महत्व पाकर मशहूर होने के लिए कुछ चेहरे हर जगह पर पहचाने जाते हैं। लेकिन दो-चार हजार रूपये में जो शोहरत खरीदी जा सकती है, उसके लिए माधुरी दीक्षित जैसी पहले से मशहूर, और इज्जत हासिल कर चुकी अदाकारा भी अपने-आप पर फख्र करे, यह कुछ अटपटा है और उनकी शान के खिलाफ भी है। 
कल के दिन माधुरी दीक्षित के ठीक बगल का सितारा कोई चाहे तो दो-चार हजार रूपये में परम आदरणीय रंगा और प्रात: स्मरणीय बिल्ला के नाम पर भी रखवा सकता है। उनके बगल में दाऊद इब्राहीम से लेकर निठारी के बलात्कारियों तक के नाम के सितारे हो सकते हैं। क्या उसके बाद भी माधुरी दीक्षित अपने इस सम्मान के लिए अपने प्रशंसकों का शुक्रिया अदा करते हुए ट्वीट करेंगी?
ऐसी शोहरत किस काम की, और किस नाम की?

अंधेरे से सबक की जरूरत


18 जून 2012
संपादकीय
उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की अखिलेश-सरकार ने एक पखवाड़े के लिए बाजारों को शाम सात बजे बंद करना तय किया है ताकि बिजली बचाई जा सके। पूरा प्रदेश दिन में कई घंटे अंधेरे में डूबा रहता है, और कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बड़े शहरों को छोड़कर अधिकतर गांवों में कुछ घंटे ही बिजली आती है। अब चूंकि कोई चुनाव भी सामने नहीं है इसलिए सरकार के सामने यह मजबूरी भी नहीं है कि वह खाली खजाने को नोंचकर दूसरे राज्यों से महंगी बिजली खरीदे और अपने लोगों को दे। लेकिन उत्तरप्रदेश की यह नौबत आज बहुत सी बातों पर सोचने को मजबूर करती है।
इस फैसले का सबसे पहला विरोध उन बड़े-बड़े रईस मॉल्स की तरफ से आया है जहां पर कि संपन्न तबका खरीददारी और तफरीह के लिए जाता है। यहां की रौनक शाम के घंटों से शुरू होती है और देर रात तक चलती है जबकि बाकी बाजारों को बंद करवा दिया जाता है। हिंदुस्तान में यह एक अजीब सा रिवाज है कि जो सबसे महंगे होटल और बाजार हैं, वे देर रात तक या चौबीसों घंटे कारोबार कर सकते हैं, और साधारण बाजार रात दस-ग्यारह बजे बंद करवा दिए जाते हैं। रात ग्यारह के बाद किसी गरीब को एक प्याली चाय खरीदना नसीब नहीं हो सकता, दूसरी तरफ सितारा होटलों के लिए यह शर्त रहती है कि वहां चौबीसों घंटे चाय-कॉफी और खाने-पीने की सहूलियत मौजूद रहे। कोई भी मॉल जिंदा रहने की जरूरत नहीं होता, मुहल्ले की दुकान जरूर हो सकती है। लेकिन मुहल्ले की दुकान से शाम सात के पहले खरीददारी हो सकती है, और बिजली कटौती की वजह से उसे बंद करने पर लोगों का काम भी नहीं रूकता। इससे आज के बाजार में सबसे ताकतवर तबके का दबदबा पता लगता है जो कि पूरी-पूरी इमारत की एयरकंडीशनिंग को डीजल जनरेटरों से करने की घोषणा कर चुका है, और यहां पर यह सवाल भी उठता है कि डीजल के ऐसे इस्तेमाल को सरकारी रियायत क्यों मिले? पैसे वालों के लिए जो मॉल बनते हैं उनको कोई भी बिजली आम जनता के अंधेरे की कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए, और उनको किसी तरह का रियायत डीजल भी नहीं मिलना चाहिए। और ऐसी नौबत में हम एक सामाजिक तनाव का खतरा भी देखते हैं। आसपास का शहर जब अंधेरे में डूबा होगा तब किसी मॉल की चमक-दमक लोगों के मन में कैसी नफरत पैदा करेगी?
दूसरी बात यह कि राज्यों में अगर आधे से अधिक दिन तक बिजली कटौती रहती है, तो वहां पर नेताओं और अफसरों के सरकारी घर-दफ्तर में बिजली को ऊंट की रफ्तार से पीने वाले एयरकंडीशनरों पर सबसे पहले रोक क्यों नहीं लगती? अभी कुछ हफ्ते पहले ही जब कश्मीर में बिजली में किसी तरह की दिक्कत आई थी और हफ्तों तक कुछ इलाका बिना बिजली के था तो वहां के नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने बंगले की बिजली भी कटवा दी थी। इससे कुछ सबक और नसीहत लेते हुए अगर अखिलेश यादव कटौती की शुरूआत सरकारी ऐशो-आराम से करते तो बेहतर होता। भारत में आज पेट्रोल और डीजल से लेकर बिजली तक का अकेला सबसे बड़ा ग्राहक सरकारी तबका ही है। इसलिए इसके खर्च में कटौती तुरंत करनी चाहिए, और सबसे पहले भी करनी चाहिए। बाकी लोगों की बारी बाद में आनी चाहिए।
अब एक बात यह कि उत्तरप्रदेश में चालीस फीसदी बिजली बरबाद और चोरी होती है। जिस चीज की किल्लत हो, उसकी इतनी बड़ी बरबादी को रोकने के लिए कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? इससे जुड़ी हुई एक दूसरी बात यह है कि सरकार जनता को घरेलू इस्तेमाल के लिए, और किसानों को खेतों के लिए बहुत से राज्यों में बिजली मुफ्त देती है या रियायत पर देती है। इस रियायत को जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का कोई दूसरा रास्ता निकालना चाहिए और बिजली की ऐसी मीटरिंग होनी चाहिए कि कोई भी इस्तेमाल बिना हिसाब-किताब के न हो। यह एक मुश्किल काम है और पहाड़ की चढ़ाई जैसा है, लेकिन इसके सिवाय और कोई इलाज उत्तरप्रदेश के अंधकार जैसी भयानक बीमारी का नहीं है। 
इस पूरे मामले से जुड़ी ये कतरा-कतरा बातें हैं, और इससे परे भी कई दूसरे पहलू हो सकते हैं, हैं। इन पर चर्चा करनी चाहिए क्योंकि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में आज अगर जरूरत से अधिक बिजली है, तो जरूरत से बहुत अधिक फिजूलखर्ची भी है। सरकार से लेकर कारोबार तक, हर जगह बचत की कोशिश होनी चाहिए क्योंकि बिजली की बचत में एक बड़ी कमाई है और धरती की भलाई है।

17 जून 2012


17 जून 2012


17 जून 2012


तालिबान और अमरीकी बराबर के जिम्मेदार


17 जून 2012
संपादकीय
पाकिस्तान की खबर है कि वहां तालिबानियों ने अमरीकी अगुवाई वाली नेटो फौजों के किए जा रहे द्रोन हमलों का विरोध करते हुए उन इलाकों में पोलियो के टीके लगाने पर रोक लगा दी है। हिंद महासागर के इस इलाके में पाकिस्तान में अब तक पोलियो के मामले बचे हुए हैं और दो ही दिन पहले हम वहां के बच्चों की तस्वीरें देख रहे थे जिनमें वे पैरों में लगे उपकरणों की मदद से चल रहे थे। मजहब और नफरत के आधार पर दहशतगर्दी फैलाने वाले तालिबानियों का अपने खुद के मजहब के बच्चों के भले और बुरे से लेना-देना नहीं रह गया है। आज पोलियो के टीके नहीं लगेंगे और कल यह तकलीफ बढ़ती चली जाएगी तो आसपास के देशों को जो खतरा बढ़ेगा वह तो अलग रहेगा, लेकिन खुद पाकिस्तान के भीतर, और गरीब मुसलमानों की आबादी में जाने कितने ही और बच्चे पोलियो के शिकार होंगे। 
यहां पर दो बिल्कुल अलग-अलग बातें सोचने की हैं। इन दोनों का एक-दूसरे से सीधे-सीधे तो कोई लेना-देना तो नहीं है, लेकिन इस मामले में वे दोनों ही बातें असर कर रही हैं। पिछले बरसों में जिस तरह अमरीका और उसके पि_ू देशों में दुनिया के मुस्लिम देशों पर हमले किए हैं उनसे संस्कृतियों के टकराव की एक ऐसी तस्वीर बनी है जिससे मुस्लिम दुनिया का अमरीका और उसके गिरोह के बाकी लोगों पर से भरोसा उठ गया है। इसी से जुड़ी एक दूसरी बात कुछ बरस पहले हिंदुस्तान के उत्तरप्रदेश में सामने आई थी जहां पर गरीब मुस्लिम बस्तियों में यह अफवाह फैल गई थी कि अमरीका से बनकर आए पोलियो ड्रॉप्स में ऐसी दवाई मिलाकर भेजी जा रही है जिससे कि इन्हें लेने वाले बच्चों के आगे जाकर मां-बाप बनने की गुंजाइश खत्म हो जाएगी और दुनिया से मुस्लिम आबादी धीरे-धीरे घटती चली जाएगी। अमरीका की साख इतनी खराब होने, और उसकी हैवानियत पर लोगों का इतना अधिक भरोसा होने का नतीजा था कि मुस्लिम बस्तियां ऐसे टीकों से बच रही थीं। एक दूसरी घटना अभी पिछले साल की ही है जब अमरीका ने ओसामा बिन लादेन को तलाश करने के लिए पाकिस्तान के डॉक्टरों का इस्तेमाल किया और टीके लगवाने के नाम पर ही ओसामा के ठिकाने तक सीआईए पहुंची थी और फिर वहां कमांडो कार्रवाई में उसे मारने का दावा किया गया। उस वक्त भी हमने इसी कॉलम में यह बात उठाई थी कि इलाज और टीकाकरण की आड़ में अमरीका ने यह फौजी कार्रवाई की है जो कि गलत है। आज वैसी कार्रवाई का ही नतीजा है कि बेवकूफ तालिबान अपनी ही बिरादरी को टीकों से दूर रख रहे हैं क्योंकि टीकों पर से उनका भरोसा उठ गया है। यह सिलसिला खतरनाक होना ही था। दुनिया भर में डॉक्टरों को और एंबुलेंसों को फौजी या पुलिस की कार्रवाई, हमलों और जासूसी से परे रखा जाता है क्योंकि जंग के दौरान भी इन लोगों पर हमले नहीं किए जाते। अमरीका ने ओसामा की तलाश के नाम पर दुनिया के इस नियम को कुचल डाला, और अभी पिछले दिनों ही पाकिस्तान में इस काम में मदद करने वाले डॉक्टर को तैंतीस बरस की कैद सुनाई गई है। और इस सजा के जवाब में ऐसे ही आंकड़ों में पाकिस्तान को आने वाली अमरीकी मदद में कटौती की गई।
इन मामलों को देखें तो समझ आता है कि किसी देश या राजनीतिक विचारधारा को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना क्यों जरूरी है। लेकिन दूसरी बात यह है कि अमरीकी जनता जिस तरह की सोच के साथ आधुनिक जिंदगी के मजे लेने की आदी हो गई है, उसमें वहां पर सारे हमलों के बावजूद लोग बुश को दुबारा वोट देते हैं। ऐसी दुनिया गरीब और लहू-लुहान मुसलमान लोगों का भरोसा नहीं जीत पाएगी। आज अमरीकी संस्कृति मुसलमानों को जाहिल और हमलावर साबित करने में लगी हुई है।  पूरी दुनिया का समाचार और विचार-मीडिया जिस तरह अमरीकी असर से लदा हुआ है, उसके ग्राहक ऐसी तस्वीर को सच भी मान रहे हैं। लेकिन इसके पीछे के ऐतिहासिक और मौजूदा कारणों को नहीं देखा जा रहा है। भारत जैसा देश जिसकी बातों का आधी सदी पहले तक बहुत वजन रहता था, उसको भी ऐसे मामलों में अपना मुंह खोलना चाहिए क्योंकि इतिहास चुप्पी को भी दर्ज करता है। और अब तो इंटरनेट के सर्च इंजनों की मेहरबानी से कुछ शब्दों को टाईप करके ढूंढना भर होता है और पता लग जाता है कि किस मामले में किस नेता ने या देश ने कुछ भी नहीं कहा था। आज पाकिस्तान में अगर नासमझी और दहशत के चलते पोलियो बढ़ता है तो पूरी दुनिया पर आगे-पीछे उसका असर होगा। इसके लिए हम तालिबानियों और अमरीकियों को बराबर का जिम्मेदार मानते हैं।

बेईमानों के लिए दोस्ताना माहौल


16 जून 2012
संपादकीय
कर्नाटक के खरबपति गिरफ्तार पूर्व भाजपाई मंत्री और बेल्लारी के खनिज माफिया को जमानत देने के लिए करोड़ों रूपये की रिश्वत की नगदी के साथ गिरफ्तार आंध्र के  सीबीआई जज के घर पर आज सुबह सीबीआई ने छापा मारा। वे पिछले बहुत दिनों से हिरासत में थे और उनके परिवार से करोड़ों की नगदी जब्त की जा चुकी थी। हमारी तरह के साधारण समझ-बूझ के लोगों को इस बात की हैरानी होती है कि गिरफ्तारी के बहुत दिनों बाद, और कई मामलों में हफ्तों बाद जब पुलिस या सीबीआई घर-दफ्तर की तलाशी लेती है, तब क्या पकड़ाए गए ऐसे लोगों के ठिकानों पर कोई सुबूत मिलता होगा? कभी-कभी यह भी लगता है कि क्या ऐसी जांच सोच-समझकर देर से की जाती है ताकि लोगों को बचने का मौका मिल जाए? हम सीबीआई की साख पर अन्ना या बाबा-टोली की तरह सवाल खड़े नहीं कर रहे, लेकिन जांच के तरीकों को लेकर हो रही हैरानी को जाहिर कर रहे हैं। 
इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए सूझ रही है क्योंकि अमरीका में भारतीय मूल के एक बड़े कारपोरेट अफसर रजत गुप्ता को वहां की अदालत ने कुछ घंटे पहले ही कुसूरवार पाया है और आने वाले दिनों में उन्हें सजा सुनाई जा रही है। कुछ महीने पहले ही रजत गुप्ता का मामला हुआ था, और महीनों के भीतर ही उनके मामले की सुनवाई होकर उन्हें सजा भी हो जाएगी। और व्यापार-कारोबार में गैरसरकारी आर्थिक भ्रष्टाचार को लेकर दी जा रही यह सजा, भारत में चलन में नहीं है। दूसरी तरफ भारत में यह भी देखा-सुना नहीं गया है कि किसी ताकतवर का मामला इस रफ्तार से निपट जाए, खासकर उस वक्त जब उसे सजा होने के आसार साफ-साफ दिख रहे हों। भारत में जांच और मुकदमे का हाल यह है कि भैंस की छठवीं पीढ़ी के मर जाने के बाद निचली अदालत से चारा खाने वालों को पहली सजा हो पाती है। दूसरी तरफ कमजोर लोगों का भारत में हाल यह है कि एक बलात्कार के मामले में पांच बरस की कैद काटने के बाद अब एक व्यक्ति को ऊपर की अदालत में बेकसूर पाते हुए बरी कर दिया है। देश भर में ऐसे मामले लाखों हैं जिनमें फैसले के इंतजार में जेल में पड़े हुए विचाराधीन कैदी अधिकतम संभव सजा से अधिक कैद काट चुके हैं।
अमरीका में आर्थिक अपराधों को लेकर लोग चौकन्ना इसलिए भी रहते हैं क्योंकि वहां बाजार में भी आर्थिक अपराधों पर कैद का इंतजाम है और टैक्स चोरी के मामले में भी कैद है। भारत में जब कभी गैरसरकारी आर्थिक अपराध को लेकर किसी कैद की बात होती है तो देश भर का बाजार हड़ताल पर चले जाता है। यही वजह है कि इस देश में सरकारी और गैरसरकारी जुर्म कम होने का नाम ही नहीं लेते। दूसरी तरफ ऐसे लचर कानून को भी लागू करने वाली एजेंसियां खासी दूर तक बेईमान रहती हैं, जांच एजेंसियां बेअसर तो रहती ही हैं, बहुत से मामलों में वे भ्रष्ट या राजनीतिक दबाव तले दब जाने वाली भी रहती हैं। फिर अदालतों की रफ्तार के बारे में हमने ऊपर भैंस की पीढिय़ों का लिखा ही है। कुल मिलाकर भारत में सरकार और अदालत का सारा माहौल चोरों के लिए दोस्ताना रहता है और ईमानदार इनमें फंसकर जिंदगी भर भड़ास में जीते हैं। 
भारतीय जांच एजेंसियों को किस तरह राजनीतिक दखल से दूर रखा जाए, किस तरह उनके भीतर की बेईमानी को हटाया जाए और किस तरह अदालतों को एक पीढ़ी के भीतर ही फैसला सुनाने जितना तेज किया जाए, यह सब सोचने के मुद्दे हैं। और घोर अविश्वास को ऐसे माहौल में जनता कभी नक्सलियों की बात को मानने पर बेबस रहती है तो कभी अन्ना-बाबा जैसे अलोकतांत्रिक तानाशाहों की बात को। लोकतंत्र जब इतना बड़ा शून्य लोगों की जिंदगी में खड़ा कर देता है तो फिर उस जगह पर घुस जाने की सुविधा बंदूकधारी नक्सलियों को भी होती है और भगवाधारी बाबा को भी।

15 जून 2012


अपनी ही उम्मीद के खिलाफ कांगे्रस को फिर नसीहत


15 जून 2012
संपादकीय
आंध्र में चाहे कांगे्रस से बागी होकर निकले जगन मोहन रेड्डी ने अपनी दौलत से यह जबदरस्त जीत हासिल की हो, जीत तो जीत है, और कांगे्रस के पास भी दौलत की कोई कमी तो थी नहीं। चुनाव के बिना भी जगन मोहन रेड्डी का दबदबा और असर कांगे्रस के मंत्रियों पर दिख रहा था, विधायकों और सांसदों पर दिख रहा था। इसलिए कांगे्रस के मुख्यमंत्री रहे अपने पिता के राज में अरबपति-खरबपति हो जाने से ही जगन मोहन की यह जीत नहीं आई है। और फिर बाकी राज्यों में इक्का-दुक्का उपचुनावों को अगर देखें तो दक्षिण से लेकर उत्तर तक हर जगह कांगे्रस हारती हुई दिख रही है। जिस यूपीए गठबंधन के राज में साथी दलों को हजारों और करोड़ के भ्रष्टाचार की छूट दी गई थी, वह गठबंधन भी आज कम से कम एक ममता बैनर्जी के मामले में टूटा हुआ दिख रहा है क्योंकि ममता पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं, उनके खिलाफ सीबीआई के पास कोई केस नहीं है और शायद इसलिए वे किसी दबाव में भी नहीं है। नतीजा कुल मिलाकर कांगे्रस की फजीहत का है और अभी तो अगले आम चुनाव आने बाकी ही हैं। 
हम पिछले हफ्तों और महीनों में लगातार कांगे्रस के आत्ममंथन की जरूरत बताते आए हैं और आज फिर वैसा ही एक मौका है। गांधी के सिद्धांतों का सफाया, नेहरू की आर्थिक नीति का सफाया, कांगे्रस की दूसरी बहुत सी बातों का सफाया, किफायत की जिंदगी का सफाया करते-करते कांगे्रस के नेताओं ने अपनी चुनावी संभावनाओं का सफाया भी कर दिया है। देश के नक्शे में आज कांगे्रस के इतने कम राज्य बच गए हैं कि अलग-अलग जगहों पर वह क्षेत्रीय दलों की पीठ पर बैठे बगुले की तरह जी रही है। ऐसी परजीवी हो चुकी कांगे्रस में भी आज सोच-विचार नहीं दिखता है। जिस उत्तरप्रदेश में देश को एक के बाद एक कई कांगे्रसी प्रधानमंत्री दिए, उस उत्तरप्रदेश  से आज कांगे्रस को शर्मनाक शिकस्त के अलावा कुछ नहीं मिलता। और इसके बाद भी कांगे्रस के चापलूस नेता इस बात को काफी मान लेते हैं कि किस तरह हार के इस दाग को इस पार्टी के भविष्य के कुर्ते से दूर रखा जाए। ऐसे में यह विशाल लोकतंत्र काम नहीं करता। 
कांगे्रस की इस दुर्गति की बहुत सी वजहें हैं। इसकी मुखिया सोनिया गांधी तक पार्टी के लोगों की पहुंच एकतरफा है। जब वहां से इजाजत मिलती है तभी कुछ चुनिंदा लोग वहां पहुंच पाते हैं। वे खुद जनता तक किसी तरह नहीं पहुंच सकतीं। और हम उनके विदेशी मूल के होने को लेकर उनकी कोई कमजोरी नहीं मानते क्योंकि उन्होंने भारत को काफी देखा हुआ है, लेकिन देश में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी की अध्यक्ष का काम इससे काफी अधिक संपर्क मांगता है। सोनिया गांधी देश की जमीन से, अपनी खुद की पार्टी के लोगों से उस तरह से जुड़ी हुई नहीं हैं। न ही उनकी पसंद के प्रधानमंत्री अपनी पूरी जिंदगी में कभी जनता से या मतदाताओं से सीधे जुड़े रहे। वार्ड, म्युनिसिपल या विधानसभा-लोकसभा क्षेत्र में चुनाव लडऩे या मतदाताओं से संपर्क रखने जैसा कोई काम उन्होंने कभी नहीं किया है और आज भी वे एक सरकारी बाबू की तरह बंद कमरे में काम करने के आदी हैं। इस तरह कांगे्रस पार्टी का जनता से जुड़े रहने का रास्ता अब सिर्फ राहुल गांधी रह गए हैं जिनकी क्षमता बहुत सीमित दिखती है, गनीमत बस यही है कि अभी तक कांगे्रस में बहुत आम हो चले और गहरे पैठ गए भ्रष्टाचार से वे अलग हैं। लेकिन अब तक ईमानदार बने रहना कोई काबिलीयत की बात, कम से कम हम नहीं गिनते। इस देश के भविष्य को, इस लोकतंत्र को हांकने वाले एक संभावित नौजवान (या अधेड़?) नेता को क्या इससे कुछ अधिक खूबियों वाला नहीं होना चाहिए? 
राष्ट्रपति चुनाव से लेकर राज्यों के उपचुनावों तक, जंतर-मंतर से शुरू होकर रामलीला मैदान तक पहुंचने वाले किस्म-किस्म के जनआंदोलनों तक, कांगे्रस पार्टी किस कदर और इस कदर घिरी हुई है कि आगे का रास्ता उसके लोग किस तरह से देख पाते हैं, यह हमारे लिए हैरानी की बात है। यह एक तकलीफ की भी बात है क्योंकि साम्प्रदायिकता के खिलाफ अगर कोई पार्टी पूरे देश में एक व्यापक संभावना रखती है तो वह कांगे्रस पार्टी ही है। राज्यों में राजनीतिक परजीवी पंछी जैसी हस्ती इतनी बड़ी पार्टी को आज नहीं सुहाती। इसे गांधी और नेहरू को दुबारा याद करते हुए, गरीबों के इस देश में ईमानदारी की जरूरत को एक बार फिर समझते हुए, और सत्ता के अपने दलालों से अपने-आपको आजाद करते हुए एक बार फिर जिंदा होने की कोशिश करनी चाहिए। यह पार्टी सत्ता में रहे या विपक्ष में रहे, एक बड़ी साम्प्रदायिकता-विरोधी पार्टी इस लोकतंत्र के लिए जरूरी है और कांगे्रस इस ऐतिहासिक जरूरत को भूलकर सिर्फ एक मैनेजर की तरह सरकार को चला रही है और लोकतंत्र को वह एक कारोबार या कारखाने जैसा मान रही है।
आज की राजनीतिक हवा को देखते हुए हम इस पार्टी के लिए इन बातों को लिख रहे हैं जिन पर उसके भीतर किसी सोच-विचार की उम्मीद हमें दिखती नहीं है।

14 june


आर्थिक पैकेज, सीबीआई या फिर सीधे नगदी?



संपादकीय
14 जून 2012
देश में जब भी कोई ऐसी राजनीतिक घटना होती है जिसमें बहुत सी पार्टियों को मिलजुलकर कोई फैसला लेना होता है या कि गठबंधनों के बीच कोई मुकाबला होता है तो भारत का लोकतंत्र मंडी में नीलाम होते हुए दिखता है। कल ही झारखंड में विधायकों के घरों पर सीबीआई ने छापे मारकर बहुत सी रकम के हिसाब-किताब जब्त किए हैं जो कि पिछले दिनों वहां हुए राज्यसभा चुनाव में दी गई रिश्वत से जुड़े हुए माने जा रहे हैं। इसी तरह पिछले बरसों में लगातार कभी संसद के मतदान के दौरान तो कभी किसी राज्यसभा के चुनाव की जोड़तोड़ में लंबी-चौड़ी रिश्वत का खेल सामने आया है। ऐसा सबसे अश्लील मामला नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार के दौरान जब झारखंड के सांसदों को खरीदकर सरकार बचाई गई थी, लेकिन देश के कानून के चलते उन बिकाऊ सांसदों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई थी। बाद में परमाणु संधि के समय जो मामला हुआ वह अभी तक सीबीआई और अदालत में चल रहा है। आज राष्ट्रपति की कुर्सी अपने मनचाहे उम्मीदवार के लिए खरीदने को कौन-कौन सी पार्टियां कितना खर्च करेंगी, कौन से विधायक या सांसद कितने में बिकेंगे इसके बारे में चौराहों पर खड़े लोग बातें कर रहे हैं। 
लेकिन इससे परे एक बात और लग रही है जिस पर आज हम पिक्सटून भी बना रहे हैं, क्या वोटों को जुटाने के लिए, पार्टियों की बाहें मरोडऩे के लिए केन्द्र सरकार सीबीआई का भी इस्तेमाल करेगी? आज जब पिछड़ों और दलितों के इस देश के बहुत से मसीहा अपनी अरबों की दौलत का कोई हिसाब न बता पाने की नौबत में सीबीआई और अदालतों के कटघरों में खड़े हैं, तब क्या जांच एजेंसी की किसी किस्म की रहम या रियायत की कीमत पर समर्थन जुटाने से यह सरकार परहेज करेगी? हम सीबीआई पर अभी कोई कीचड़ नहीं उछाल रहे, लेकिन यूपीए सरकार को हांक रहे लोगों के कुर्ते तो कालिख से लदे हुए ही हैं, इन लोगों को किसी संदेह का लाभ देने की तो कोई बात ही नहीं हो सकती। ऐसे में राष्ट्रपति बनने जा रहा कोई भी इंसान कितने सम्मान का हकदार होगा? और उसे चुनने वाली पार्टियां, उनके गठबंधन, अपनी कामयाबी के लिए कितनी इज्जत पाएंगे? एक दूसरा पहलू यह भी है कि प्रणव मुखर्जी से लेकर मनमोहन सिंह तक जिन लोगों के नाम राष्ट्रपति भवन के लिए लोग ले रहे हैं, उनमें से, या उस तरह के कुछ और लोगों में से ऐसे लोग भी निकल आएंगे जिनके खिलाफ आने वाले दिनों में अदालत में किसी मुकदमे की नौबत आए। लालू-मुलायम-जया-करूणानिधि जैसे लोगों को यह बात बहुत अच्छी लगेगी कि राष्ट्रपति भवन में भी एक भ्रष्ट बैठ जाए और उसके कटघरे में जाने की नौबत भी आए, ऐसे में इन तमाम लोगों के नाम अलग रखकर यह भी मुद्दा उठाने का दिल करता है कि जो लोग सरकार में ऐसी कुर्सियों पर नहीं रहे हैं, जो आगे जाकर कटघरे के लायक पाई जा सकती हैं, उन्हीं लोगों के नाम राष्ट्रपति पद के लिए सोचने चाहिए। यह तो बहुत ही शर्मनाक बात होगी कि कल के दिन मनमोहन सिंह राष्ट्रपति बनने के बाद किसी अदालत के आदेश से सीबीआई की जांच के घेरे में आएं और उनके खिलाफ चार्जशीट की नौबत आने पर वे अपनी कुर्सी छोड़ें। आज तो सरकार और राजनीति में कम ही लोग ऐसे दिख रहे हैं जिनके सिर पर ऐसी तलवार न मंडरा रही हो। कम से कम यूपीए सरकार में बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर पिछले सात-आठ बरसों से बैठे हुए लोगों के बारे में तो अधिक भरोसा राष्ट्रपति पद को लेकर नहीं हो रहा है। 


13 जून 2012


13 जून 2012


पूरी तरह नाकामयाब भारत का चुनाव आयोग


13 जून 2012
संपादकीय
आंध्र के उपचुनावों में पैसों का जिस कदर बोलबाला दिख रहा है वह लोकतंत्र के लिए भयानक है। कांगे्रस के मुख्यमंत्री रहे वाईएसआर रेड्डी की दुर्घटना मौत के बाद उनके बेटे जगन मोहन हजारों करोड़ की दौलत के साथ राजनीति के बाजार में आए हैं और यह सिर्फ कांगे्रस की बदनीयत नहीं हो सकती कि कांगे्रसराज में हुई इस कमाई को अब वह अपने इस बागी कपूत के नाम से जोड़कर उसे जेल भेज दे। आंध्र हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाने वाले जगन मोहन को जब अपनी अनुपातहीन संपत्ति के मामले में जांच से कोई रियायत नहीं मिली तब जाकर सीबीआई ने छापे मारे, जांच की और आंध्र की कांगे्रस सरकार के पिछले और मौजूदा मंत्रियों को भी दबोचा, और जगन मोहन भी फिलहाल हिरासत में हैं। 
ऐसे में आंध्र की राजनीति में पैसों का बोलबाला तो होना ही था और लोगों का कहना है कि ये देश के सबसे महंगे चुनाव या उपचुनाव हो रहे हैं। हमारा ख्याल है कि बगल के कर्नाटक में भाजपा के मंत्री रहे रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी में जो रिकॉर्ड-खर्च किया होगा उसकी बराबरी शायद आंध्र में अभी नहीं हो सकेगी। खैर जब दस-बीस करोड़ रूपये एक-एक चुनाव क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं तो एक-दूसरे से इनकी तुलना बेमायने इसलिए है कि दस करोड़ का खर्च भी भारतीय लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है और बीस करोड़ का लोकतंत्र भी। हैरानी इस बात पर है कि देश का चुनाव आयोग बहुत से तकनीकी मामलों में तो पुख्ता इंतजाम करने के लिए दुनिया भर में साख पा चुका है, लेकिन देश भर से अफसरों को चुनावी ड्यूटी में झोंकने के बावजूद वह कालेधन के चुनावी इस्तेमाल को रोक नहीं पा रहा है। इसका नतीजा यह है कि पूंजीनिवेश की तरह यह खर्च हो रहा है और विधायक या सांसद बनते ही लोग इसकी वापिसी का धंधा शुरू कर लेते हैं। ऐसे में संसद और विधानसभाओं में अरबपति और खरबपति बढ़ते चल रहे हैं, और गरीब की दिक्कतों की समझ वहां खत्म होती जा रही है। ऐसे ही सदनों में जब बहुमत वाली पार्टी सरकार बनाती है तो उसके भीतर भी नीतियां बनाने वाले लोगों में, सरकार के मंत्रियों में गरीबों की हिस्सेदारी खत्म सी हो गई है और यही वजह है कि आज देश की दौलत खरबपतियों को मिट्टी के मोल देने में सभी पार्टियों की सरकारों के भीतर एक मुकाबला चल रहा है। 
इस बारे में चुनाव आयोग को और देश की अदालतों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी क्योंकि संसद और सरकार चलाने वाले लोग भ्रष्टाचार के साथ हमबिस्तर होना सीख चुके हैं, उसके मजे से वाकिफ हैं। यह पूरा मामला लोकतंत्र को एक बिल्कुल ही महत्वहीन व्यवस्था बना चुका है और मजे की बात, या तकलीफ की बात यह है कि पांच बरस में एक बार पैसों से प्रभावित करके खरीदे या पाए जाने वाले वोटों को जनता की मर्जी कहा जा रहा है। यह मर्जी कुछ उसी किस्म की हो गई है जैसी कि चुनावी रैलियों और आमसभाओं में भुगतान करके लाई गई जनता की मर्जी होती है। अगले आम चुनावों तक अगर चुनाव आयोग कालेधन के इस्तेमाल पर रोक का कोई असरदार तरीका ढूंढ नहीं पाया तो वह भयानक बात होगी क्योंकि वह आम चुनाव गरीबों और गरीबों की जुबान को पूरी तरह खत्म कर देने वाले साबित होंगे।
देश की सवा अरब आबादी से आईआईएस जैसे संस्थानों, भारतीय राजस्व सेवा के अफसरों को बतौर चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाता है इसके बाद भी चुनावों में काला धन का इस्तेमाल सौ-सौ गुना बढ़ा है। आखिर यह क्या हो रहा है? आंध्र में यह उपचुनाव है,आम चुनाव नहीं। और इस उपचुनाव में यह बेकाबू  खर्च नहीं, लोकतंत्र को खरीदना है।  चुनावी मशीनरी चुनाव के केवल चुनिंदा हिस्से को काबू करके वाहवाही लूट रही है। असाधारण संवैधानिक शक्तियों के बाद भी वह मतदान केंद्र लूटे न जा सकें, फर्जी मतदान न हो सके, जैसी स्थितियों पर ही काबू पा सकी है। उसने तकनीकि रुप से ही एक अनुशासन कायम किया है लेकिन असल भावना से नहीं। अभी कुछ दिन पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ने विदाई ली और नए ने काम सम्हाला, ऐसे मौकों पर एक बहस छिडऩी चाहिए कि चुनाव आयोग और न्यायिक तंत्र को मिलकर काम करना होगा। जिस तरह से संसद में अपराधों और कटघरों में खड़े लोगों के खिलाफ असरदार फैसले नहीं ले पाई है उससे ये पालीटिकल नेता सहज महसूस करते हैं। 

लंबाई-चौड़ाई, या फिर गहराई?


11 जून 2012
इंटरनेट की मेहरबानी से दुनिया के बहुत से देशों की तरह-तरह की बिरादरियों के अलग-अलग सोच के अनगिनत लोगों से बात-मुलाकात होती रही है। फेसबुक जैसी कुछ ऐसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटें हैं जिनकी मेहरबानी से लोगों को एक-दूसरे के बारे में इतना कुछ पता लगते रहता है जिसे कि दुनिया के बहुत से लोग खतरनाक भी मानते हैं लेकिन इन खतरों के बावजूद लोग अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते ही चलते हैं। 
ऐसे ही कुछ लोगों से पिछले महीनों में जो बातें हुईं उनसे यह सोचने का मौका मिला कि पारिवारिक रिश्तों से परे दोस्ती के बारे में लोगों का क्या सोचना होता है। 
अधिकतर लोग दोस्ती की लंबाई को एक बड़ा मायने रखने वाला पैमाना मानते हैं कि किससे उनकी दोस्ती तीस बरस पुरानी है या बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की दोस्ती है। लेकिन इस बारे में जब कुछ अधिक बातचीत होती है तो समझ में आता है कि हर लंबी दोस्ती समझ और भरोसे की गहराई वाली नहीं होती। बहुत से मामलों में लोग एक-दूसरे पर एक सीमा तक ही भरोसा करते हैं और पुरानी दोस्ती को इसलिए जारी रखते हैं कि बुढ़ापे की बीवी की तरह, बुढ़ापे के दोस्त को अब कहां बदलने जाएं।
जब मैं इस मामले में बहस को आगे बढ़ाने के लिए कुछ अलग किस्म के सवाल खड़े करता हूं, और कई बार तो खुद भी असहमत रहते हुए शैतान के वकील की तरह बहस में जुट जाता हूं, तो लोग कुछ परेशान भी होते हैं। क्योंकि ये बातें आम सोच से थोड़ी सी अलग भी होती है और कुछ सोचने पर मजबूर भी करती हैं। 
ऐसे ही किसी से बात करते हुए जब मैंने कहा कि रिश्तों की लंबाई या चौड़ाई के बजाय उनकी गहराई अधिक मायने रखती है। और यह मामला कुछ उसी तरह का है कि छह इंच चौड़ा एक गड्ढा जब दो-चार सौ फीट गहरा खोदा जाता है तो ही उसमें से पंप लगाकर पानी निकाला जा सकता है। उतनी ही खुदाई अगर सतह पर ही लंबी-चौड़ी खोद दी जाए तो उससे मिट्टी के एक ढेर के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। और अगर छह इंच चौड़े एक गड्ढे को जमीन पर लंबाई, दो-चार सौ फीट तक सतह पर ही ले जाकर पूरी की जाए, तो उससे नाली जरूर बन सकती है, गंदे पानी को दूर ले जाने के लिए, लेकिन उससे कोई पानी मिल नहीं सकता। इसलिए हर बार लंबे रिश्ते और लंबी दोस्ती ही ज्यादा अच्छे हों यह जरूरी नहीं है। कई बार बहुत कम लंबे-चौड़े दिखने वाले लेकिन बहुत गहरे संबंध अधिक अच्छे हो सकते हैं। 
कुछ लोग दोस्ती या पे्रम-संबंधों में जरूरत लगने पर भी जल्दी-जल्दी फेरबदल को गलत मानते हैं, या उसका हौसला नहीं जुटा पाते हैं। उसकी वजह यह रहती है कि वे अपनी साख को लेकर फिक्रमंद रहते हैं कि हर बरस उनका कोई एक नया भागीदार रहता है, हर कुछ बरसों में उनका करीबी दोस्त बदल जाता है, या हर कुछ बरस में उनकी जिंदगी की लड़की या महिला बदल जाती है। ऐसी हिचक या ऐसा डर लोगों को कुछ अनचाहे और कुछ कमचाहे संबंधों को ढोने के लिए चाबुक लगाते चलते हैं। अनमने और आधे मन से लोग पुरानी तरह मुस्कुराते हैं और नए मुखौटे में जीते हैं। इस मुखौटे के साथ आगे के रिश्ते को भी कुछ लोग पुराने रिश्ते की लंबाई से जोड़कर खासा लंबा बता देते हैं, लेकिन दरअसल यह लंबाई एक गांठ के बाद जोड़कर बढ़ाई गई लंबाई की तरह होती है जो लंबी दिखाने के लिए बनाई गई होती है। 
इसलिए असल जिंदगी हो या फेसबुक, पीठ पर लदी बोरी की तरह ढोए जाते रिश्तों के तले दबे लोग आगे-पीछे दम तोड़ ही देते हैं, लेकिन उनको हमेशा से ही कई किस्म के मुखौटे हासिल हैं जो रिश्तों को पहले की तरह का ही साबित करते चलते हैं। 
आज इस मामले पर लिखने का इरादा सुबह-सुबह एक कार्टून देखकर हुआ जिसमें मानो एक सिनेमाघर के सामने दो काउंटर हैं, एक पर लंबी कतार है जिस पर बोर्ड लगा है-सुविधाजनक झूठ। और दूसरा काउंटर खाली पड़ा है जिस पर लगा बोर्ड कह रहा है-असुविधाजनक सच।
सच यही है कि दोस्ती हो या पे्रम, बहुत अधिक सच के साथ इनकी लंबाई अधिक नहीं चल पाती, और बहुत अधिक घरोबा भी लंबा नहीं खिंचता। बहुत करीबी रिश्तों में भी सच बहुत करीब नहीं रहने देता। इसलिए सच की उपयोगिता की एक सीमा है। सच के इस पहलू के बारे में शायद कुछ महीने पहले भी मैंने लिखा था कि इंसानी मिजाज और सामाजिक-पारिवारिक अंतरसंबंध बहुत अधिक सच के लायक बने हुए नहीं रहते। रिश्तों में जब बहुत अधिक गहराई हो, तो ही वे शंकर के नीलकंठ की तरह जहर को गले में समाकर जिंदा रह सकते हैं। लेकिन ईश्वर की धारणा के ऐसे ऊंचे दर्जे पर आखिर कितने लोग पहुंच सकते हैं? 
इसलिए रिश्तों की लंबाई को एक बड़ा पैमाना मानने वाले लोग दरअसल गहराई नापने का औजार नहीं रखते हैं और इसलिए वे सतह पर दिखती हुई लंबी-चौड़ी समझ को ही सब कुछ समझ बैठते हैं। पूरी जिंदगी जितने लंबे रिश्तों के बाद उतनी ही लंबाई के मलाल के बजाय क्या जरूरत और मुमकिन लंबाई के रिश्तों की गहराई की बेहतर यादें बेहतर नहीं? यह पूरी चर्चा बहुत से लोगों के लिए असुविधा की हो सकती है, जैसी असुविधा कसरत को कहने पर चर्बी को होती है। लेकिन असहमति और अलग सोच के साथ-साथ इस बारे में लोगों को अपनी और पराई मिसालों की लंबाई-चौड़ाई और गहराई मन के भीतर तो एक बार नापकर देखनी ही चाहिए। 

12 जून 2012


प्रणव के बाद यूपीए और कांग्रेस को चलाएगा कौन, बचाएगा कौन?

संपादकीय
12 जून 2012
राष्ट्रपति चुनाव को लेकर यूपीए सरकार की जो फजीहत दिख रही है, उसे देखें और एक अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने भारत की आर्थिक हालत पर उसे जो खराब दर्जा दिया है, उसे देखें, तो कुल मिलाकर लगता है कि यूपीए का कार्यकाल तो बचा है लेकिन न उसकी साख बची है और न ही देश के हालात पर उसका कोई काबू बचा है। देश की ही क्या बात करें, केन्द्रीय मंत्रिमंडल पर भी प्रधानमंत्री और यूपीए की मुखिया, इन दोनों का कोई काबू बचा हुआ नहीं दिखता। किसी विदेशी रेटिंग एजेंसी की ही बात हम नहीं करते, आज इतना बड़ा सत्तारूढ़ गठबंधन, समाजवादी पार्टी जैसे बड़े बाहरी साथी के रहते हुए भी अपनी मर्जी के राष्ट्रपति को बनवाने की साधारण सी समझबूझ या चतुराई नहीं रखता, ममता बैनर्जी जैसे अपने पारा-मिजाज साथी को समझाने की समझ नहीं रखता, तो उस गठबंधन को आज हिन्दुस्तान की अधिकतर दिक्कतों के लिए जिम्मेदार तो ठहराया ही जाएगा। आज सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी खुशकिस्मती यही है कि उनके खिलाफ जो भाजपा एक विकल्प बनकर उभरकर आ सकती थी वह राज्यों में जगह-जगह कांग्रेस और यूपीए की टक्कर की लग रही है और कांग्रेस-यूपीए से कहीं अधिक आपसी कलह भाजपा के भीतर दिख रहा है और भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए में दिख रहा है।
लेकिन इस किस्म की टक्कर की कलह चुनावी तसल्ली का सामान तो हो सकती है, ऐसी कलह न तो देश के भीतर देश की अर्थव्यवस्था की साख बनाती, और न ही दुनिया की नजरों में। यह हालत उस गरीब हिन्दुस्तानी के पेट पर लात सरीखी है जो कि देश की राजनीति, नेताओं की बेईमानी और निकम्मेपन, अदूरदर्शिता और गैरजिम्मेदारी, इन सबसे परे खून-पसीना एक करके रोज मेहनत करते हैं और दो जून की रोटी की उम्मीद करते हैं। दिल्ली में या किसी राज्य की राजधानी में जब एक करोड़ की रिश्वत ली जाती है तो देश या प्रदेश के सौ-दो सौ करोड़ के हितों को बेच दिया जाता है। चाहे आसमान में तैरती टेलीफोन की तरंगें हों या कोयले की खदानें हों, जनता के हक को मिट्टी के मोल बेचकर निजी कंपनियों को सोने सा फायदा दिया जा रहा है, और इसी के चलते बाजार में देश की साख खत्म हो रही है, खत्म हो चुकी है। आज जिस राष्ट्रपति भवन के लिए यूपीए सरकार के सबसे बड़े मंत्री, प्रधानमंत्री से भी बड़े मंत्री, प्रणव मुखर्जी की बात चल रही है, उनकी तमाम निजी काबिलियत के बावजूद हमने उनके खिलाफ कुछ दिन पहले इसी जगह लिखा था कि उन्हें राष्ट्रपति बनाना बहुत गलत होगा और अनैतिक होगा क्योंकि यूपीए सरकार के तीन चौथाई मंत्रिमंडलीय समूहों के मुखिया प्रणव मुखर्जी ही है और सरकार के हर बड़े फैसले में उनका हाथ है। कल को जब कोई भ्रष्टाचार का बड़ा मामला यूपीए के इस कार्यकाल के दौरान का आएगा तो देश का विपक्ष किस राष्ट्रपति के पास जाकर उसकी शिकायत करेगा? हितों का टकराव इतना बड़ा खतरा रहेगा जिससे कि प्रणव मुखर्जी बच नहीं पाएंगे। इसलिए उनका नाम इस पद के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है लेकिन हमें हैरानी इस बात पर है कि राष्ट्रपति चुनाव में आंकड़ों के हिसाब-किताब में लगे राजनीतिक दल इस पहलू की तरफ न सोच रहे हैं न बोल रहे हैं। 
यूपीए की मुखिया के तौर पर कांग्रेस को अब से लेकर अगले आम चुनावों तक एक लगातार आत्म मंथन, आत्म विश्लेषण और प्रायश्चित की जरूरत है। अपने कार्यकाल के कुकर्मो की सुनामी से, भूकंपों से उसका अपना घर ऐसा तबाह हो चुका है जैसा कि जापान में दो बरस पहले भूकंप और सुनामी साथ-साथ आने से हुआ था। कोई भी समझदार पार्टी दूसरी पार्टी के कुकर्मों और तबाही को देखकर अगर तसल्ली से बैठी रहती है, तो उसकी अपनी तबाही तय रहती है। आज कांग्रेस पार्टी इसी तरह का खतरा झेल रही है। सोनिया गांधी के हाथ से अगर प्रणव मुखर्जी निकलकर राष्ट्रपति भवन चले जाते हैं तो उनको मुसीबतों से निकालने वाला कौन इंसान बचेगा यह सोचना भी मुश्किल है। उनके बाकी मंत्रियों में से ढेर सारे कटघरों में हैं या उनके सिर पर जेल जाने का खतरा टंगा हुआ है। ऐसे में अब तक भ्रष्टाचार के किसी आरोप से बचकर चलते हुए प्रणव मुखर्जी के हटने के बाद तो यह सरकार पूरी तरह खोखली हो जाएगी और कांग्रेस पार्टी भी कमजोर हो जाएगी। अगर भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति के लिए पार्ट टाईम काम करने की कोई व्यवस्था होती तो फिर प्रणव मुखर्जी रोजाना दो-चार घंटे यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी के मामले भी निपटाते और बाकी समय राष्ट्रपति भवन का काम करते तो काम चल जाता। लेकिन प्रणव मुखर्जी के जाने के बाद दुनिया के बाजार में यूपीए सरकार और भारत की अर्थव्यवस्था की रेटिंग और गड्ढे में जाने का खतरा दिखता है।