इनको कसाई कहना, कसाई की बेइज्जती



30 जुलाई 2012
दूसरे कुछ राज्यों के बाद छत्तीसगढ़ ने भी तंबाकू और पान-मसाला के मिले-जुले गुटखा पर रोक लगा दी। पूरे देश में कदम-कदम पर बिकने वाले इस जहर की वजह से देश में दसियों लाख लोगों को मुंह का कैंसर हो रहा है और दूसरे कई किस्म के कैंसर का खतरा इसकी वजह से बढ़ रहा है। दरअसल जितनी आसानी से इसे बेचा जाता है, इसे खरीदकर रखा जा सकता है, और पल भर में खाया जा सकता है, उससे देश में तंबाकू खाने वाले लोगों का तबका तेजी से बड़ा हो गया। अब स्कूलों के बच्चे तक इसके आदी हो चले हैं और इससे सरकार को मिलने वाले बहुत मामूली टैक्स के मुकाबले सरकार का कैंसर के इलाज पर खर्च हजारों गुना है, और इस बीमारी से लोगों की होने वाली अकाल मौत का नुकसान रूपयों में गिना नहीं जा सकता। 
लेकिन इसके बाद गुटखा व्यापारी जब सरकार से अपने मौजूद स्टॉक के निपटारे के लिए पहुंचे तो उन्होंने तर्क दिया कि उनके पास सौ करोड़ का स्टॉक पड़ा है, जिसे बेचने की इजाजत दी जाए। यह कहते हुए गुटखा व्यापारी इस बात को शायद भूल गए कि तकरीबन दो नंबर में ही होने वाले इस कारोबार के पास आज सौ करोड़ का स्टॉक अगर है, तो साल भर में इस धंधे से सरकार को टैक्स कुछ सिक्कों का ही क्यों मिलता है? इस व्यापार में टैक्स चोरी इतने संगठित तरीके से सरकारी मेहरबानी से चलते आई है कि स्टॉक का यह आंकड़ा हंसी का सामान बन गया। 
लेकिन कारोबार के तरीके इसी तरह के रहते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी से लगे हुए कारखाने जिस तरह का जहर हवा में घोल रहे हैं, धरती पर जहरीले पानी की शक्ल में छोड़ रहे हैं, मीलों दूर तक जल, जन, जमीन और जलवायु सबका जीना हराम कर चुके हैं, वे बार-बार सरकार से टैक्स की रियायत, बिजली के रेट में रियायत मांगते दिखते हैं। इन्हीं कारखानों से, जब अफसरों की नींद खुलती है तब, रियायती घरेलू गैस सिलेंडर बरामद होते हैं, प्रदूषण रोकने वाले उपकरण बंद मिलते हैं, और प्रदेश के राज्यपाल इस इलाके से गुजरते हुए हर बार फिक्र करते हैं, लेकिन ये कारखाने बेकाबू हैं। 
और किस्म के कारोबार भी कई किस्म की रियायतें सरकार से चाहती हैं। जैसे इस राज्य में अभी कोई दो बरस पहले एक नर्सिंग होम एक्ट बना जिसके तहत अस्पतालों में हंगामा या तोडफ़ोड़ करने वाले मरीजों के रिश्तेदारों को बहुत कड़ी सजा देने का इंतजाम किया गया है। लेकिन दो बरस के भीतर छत्तीसगढ़ के ऐसे निजी अस्पताल जिस अंदाज में कमजोर तबके की सेहतमंद महिलाओं के अच्छे-भले गर्भाशय को निकालकर उनके बीमा कार्ड की रकम को खा रहे हैं, वह देखना भी भयानक है। इसमें अब तक कुल पौन दर्जन डॉक्टरों के पै्रक्टिस के लाइसेंस निलंबित हुए हैं, लेकिन जुर्म का अंदाज यह है कि राज्य में सौ से अधिक डॉक्टरों को कई-कई बरस की कैद होनी चाहिए। अब एक तरफ ऐसे डॉक्टरों और ऐसे निजी अस्पतालों को बचाने के लिए इस राज्य ने एक कानून बनाया, दूसरी तरफ इंसानियत के खिलाफ इतना बड़ा जुर्म करने वाले लोग अभी तक टकसाल की तरह अस्पताल चला रहे हैं। 
कुछ लोगों ने गर्भाशय कांड के बाद कहा कि डॉक्टर कसाई की तरह काम कर रहे हैं। कसाई होना एक पेशा है, शाकाहारी लोगों को यह पेशा खराब और खूंखार लग सकता है, लगता ही होगा। लेकिन यह कानूनी है और समाज का एक बड़ा तबका मांसाहारी है, इसलिए यह काम इस तबके की मान्यताओं के मुताबिक, और सरकार के कारोबार के मुताबिक जायज है। इसलिए ऐसे डॉक्टरों को कसाई कहना, कसाई की बेइज्जती है क्योंकि वह अपने पेशे के उसूलों और मुल्क के कानून के खिलाफ जाकर भली-चंगी औरतों के गर्भाशय निकालने जैसा काम नहीं करता।
कल ही इसी अखबार के संपादकीय में लिखा गया था कि मीडिया का जो हिस्सा अपराधों के शिकार लोगों की शिनाख्त उजागर करता है, उस पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। जो लोग बेकसूर होते हैं, और दूसरों की हिंसा का शिकार होते हैं, उनके साथ हमदर्दी के बजाय उन पर कैमरों से हमले करने वाले मीडिया के बारे में खुद मीडिया के कारोबारियों को सोचना चाहिए। यही बात हमने कुछ बरस पहले इसी अखबार के संपादकीय में तब लिखी थी जब छत्तीसगढ़ में एक लापरवाह अफसर ने शायद अपनी बीवी के साथ कुछ निजी वीडियो रिकॉर्डिंग की, और फिर मीडिया के एक हिस्से ने उसे टीवी पर दिखाकर उस अफसर को ब्लैकमेल करने की चल रही साजिश में शायद भागीदारी कर ली। उस समय भी हमारा यही मानना था कि ऐसे मीडिया पर कार्रवाई होनी चाहिए जो अपने पेशे के उसूलों के खिलाफ जाकर, अपने दर्शकों-पाठकों की उम्मीदों के खिलाफ जाकर, और किसी व्यक्ति के निजी जिंदगी के अपने हक के खिलाफ जाकर अपने औजारों को हथियारों की तरह इस्तेमाल करता है। 
गुवाहाटी से लेकर मंगलौर तक मीडिया ने जितनी हिंसक अश्लीलता दिखाई है, उससे वह पहली नजर में ही सजा का हकदार दिखता है, और लोकतंत्र को अपने इस हिस्से की मरम्मत करने की जरूरत है जो कि गलाकाट मुकाबले के इस दौर में कैमरे के बंदूक की तरह इस्तेमाल कर रहा है। 
लेकिन मीडिया से परे, जब लोग इस बात को समझ नहीं पाते कि किसी की निजी जिंदगी के, पूरी तरह निजी, और पूरी तरह गैर-सार्वजनिक लम्हों को देखकर मजा लेने और उसे आगे बांटने में हैवानियत क्या है, तो फिर ऐसे लोग न सिर्फ ऐसे ही मीडिया के हकदार होते हैं, बल्कि वे अपने और अपने कुनबे के लिए भी आगे किसी वक्त ऐसे ही खतरे के हकदार भी होते हैं। 
जब तक जुबानदार लोग ऐसी बातों पर बोलेंगे नहीं, ऐसे कारोबारी, ऐसे कारखानेदार, ऐसे डॉक्टर-अस्पताल और ऐसे मीडिया को धिक्कारेंगे नहीं, उसका बहिष्कार नहीं करेंगे, जब तक उसे बाजार से बाहर नहीं करेंगे तब तक हिंसा और अश्लीलता के साथ इस तरह का गलाकाट मुकाबला कारोबारियों के बीच चलता ही रहेगा। लोग अपने आसपास के लोगों की वीडियो रिकॉर्डिंग बाजार में फैलाते रहेंगे, और किसी की भी निजी जिंदगी महफूज नहीं रहेगी। यह तो जाना-पहचाना मीडिया है इसलिए हम उसकी बात भी कर रहे हैं, समंदर में पानी की बूंदों की तरह जो बेशिनाख्त इंटरनेट है, उस पर तो पल भर में किसी का भी बिस्तर चौराहे पर रखा जा सकता है। जब तक ऐसी हिंसक सोच के खिलाफ इंसानों की सोच खुलकर खड़े नहीं होगी, तब तक सबसे घटिया किस्म के इंसान, मुजरिम इंसान, इसी तरह राज करते रहेंगे। 


दिमाग नहीं सिर्फ घमंड है


30 जुलाई 2012
संपादकीय
आज अचानक एक बार फिर बहुत सारी ट्रेन और बस-ट्रक दुर्घटनाओं की खबरें हैं। सब खबरों को जोड़ें तो शायद सौ लोग आज के आज मारे गए हैं। यही हादसा दुनिया के किसी विकसित देश में हुआ होता तो वहां की सरकार हिल गई होती, या कम से कम किसी बीमा कंपनी को सदमा पहुंच गया होता। लेकिन भारत में जिंदगी की कीमत और अहमियत नहीं के बराबर है इसलिए यहां थोक में लाशें उठती हैं और जिंदगी उसी तरह चलती रहती है। देश की एक प्रमुख ट्रेन के डिब्बे में लगी आग में पचास से अधिक मौतों की खबर है, और यह सोच पाना मुश्किल है कि अंतरिक्ष में पहुंचा हुआ देश ऐसे हादसों से बचने की तैयार क्यों नहीं कर पाता और अगर आग लग ही जाए तो उसे बुझाने की तरकीबें वहां क्यों नहीं कर पाता। कहीं स्कूल बस चलाता हुआ ड्राइवर मोबाईल फोन पर बात करते हुए बस को ट्रेन के सामने खड़ा कर देता है और बच्चे मारे जाते हैं। कहीं पर किसी दूसरी वजह से हादसा होता है। 
देश में ट्रैफिक के नियमों से लेकर रेलगाडिय़ों की सुरक्षा तक, एक तरफ तो सरकार की तरफ से कमी रहती है, और दूसरी तरफ लोग भी अपनी खुद की हिफाजत का ख्याल नहीं करते हैं। दुपहिया गाडिय़ों पर चलते लोग आए दिन मारे जा रहे हैं, लेकिन अगर हेलमेट लगाने उन्हें कहा जाए तो आंदोलन शुरू हो जाता है। बेदिमाग लोग ऐसे नियमों के खिलाफ जनता को भड़काते हैं और बेदिमाग लोग यह मानकर चलते हैं कि हेलमेट जैसे नियम पुलिस के अपने फायदे के लिए हैं और जनता उन्हें क्यों माने। इसी तरह लोग महंगी कारें खरीदते हैं, तेज रफ्तार से चलाते हैं लेकिन बेल्ट लगाने से बचकर अपने-आपको होशियार समझते हैं, मानो बेल्ट टै्रफिक पुलिस की हिफाजत के लिए है। यह पूरा सिलसिला इस देश में लोगों में साधारण समझ और समझबूझ की कमी का सुबूत है। लोग लाख रूपये की मोटरसाइकिल अपने बच्चे को लेकर देते हैं, लेकिन उसे हेलमेट लगाने को नहीं कहते।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए हमारी यही सलाह है कि सड़कों पर होने वाली अंधाधुंध मौतों को देखते हुए ट्रैफिक के सारे नियमों को कड़ाई से लागू करना चाहिए। आज हालत यह है कि एक-एक गाड़ी में उनकी निर्धारित क्षमता से दो गुने बच्चे को लादकर स्कूल ले जाया जाता है, और जिस दिन ऐसे किसी वाहन का एक्सीडेंट होगा, बड़ी संख्या में मौतें होंगी। कभी-कभी सरकारी विभाग भारी उगाही की वजह से कानून तोडऩे वालों के साथ रियायत करते हैं, और कभी-कभी निर्वाचित नेता वोटरों की नाराजगी से बचने के लिए किसी नियम को कड़ाई से लागू नहीं होने देते। इन दोनों के बीच एक नौबत यह भी है कि इतनी आबादी वाले देश-प्रदेश में अगर लोगों की सुरक्षा के नियम भी लाठी लेकर पुलिस को ही लागू करवाने हों, तो उतनी पुलिस आखिर इसी जनता के पैसों से ही तो तैनात होगी। इसलिए समाज को ही यह साबित करना होगा कि उसके पास दिमाग है, सिर्फ घमंड नहीं है।

संस्कृति के मवाली ठेकेदार जेल के बाहर आते कैसे हैं?


29 जुलाई 2012
संपादकीय
कर्नाटक से कल निकली वीडियो खबरों को देखें तो लगता है कि भारत की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले इस आधुनिक कम्प्यूटर-राज्य को सत्तारूढ़ भाजपा की छत्रछाया में आक्रामक और हिंसक अपराधी हिंदू संगठन गुफा की तरफ ले जा रहे हैं। एक पर्यटन केंद्र के रिसॉर्ट में पार्टी मनाने को ठहरे हुए युवक-युवतियों पर हिंदू जागरण वेदिका के कार्यकर्ताओं ने टीवी कैमरों के साथ जाकर हिंसक हमले किए और कमरों के भीतर घुसकर, बाथरूम में घुसकर लड़कियों को निकला और उन्हें बुरी तरह मारा। ऐसा करते हुए उन्होंने एक तरफ कांगे्रस राज वाले असम की राजधानी गुवाहाटी में पिछले दिनों सड़क पर हुए इसी किस्म के हमले की याद दिला दी और कुछ बरस पहले कर्नाटक में ही एक दूसरे हिंसक अपराधी हिंदू संगठन श्रीराम सेना के किए गए हमलों की याद भी दिला दी जिनमें लड़कियों को पब से निकालकर दौड़ा-दौड़ाकर मारा गया था। इन सभी मामलों में मीडिया ने भी बहुत हिंसक तरीके से हमलावरों का साथ दिया और बेकसूर लड़के-लड़कियों के चेहरों को शर्मनाक तरीके से टीवी पर, इंटरनेट पर डालकर उनके लिए सामाजिक तिरस्कार की गारंटी कर दी। हमारा यह मानना है कि ऐसे सामाजिक प्रताडऩा करने वाले मीडिया को भी अपराधी मानकर उसके जुर्म पर भी मुकदमा चलना चाहिए। गुवाहाटी में ऐसा शुरू भी हो गया है, और यह खुद मीडिया के समझने की बात है कि किसी के अपराधी साबित होने से पहले उसकी शर्मिंदगी में ऐसा भागीदार बनना उसके लिए कितना सही है? टीवी चैनलों के एक-दूसरे से आगे बढऩे की होड़ उन्हें हैवान भी बना रही है, मुजरिम भी बना रही है, और कई मामलों में यह सामने आया है कि ऐसी हिंसा को बढ़ावा देने का काम भी चैनलों ने किया है ताकि उन्हें सनसनीखेज रिकॉर्डिंग मिल सके।
अब देश के बहुत से राज्यों में लड़कियों और महिलाओं पर ऐसे हमले हो चुके हैं जो भारतीय संस्कृति के नाम पर किए जा रहे हैं और ऐसे लोग बरस-दर-बरस किसी सजा से दूर लगातार हिंसक काम कर रहे हैं। कर्नाटक में ही 2009 में ऐसे हमले करने वाले श्रीराम सेना के मुखिया को आज भी मीडिया के सामने बयानबाजी करते देखा जा सकता है जबकि इस गिरोह के गुंडों के चेहरे वीडियो रिकॉर्डिंग में साफ नजर आ चुके थे। पुलिस एक खानापूरी की तरह इनमें से कुछ लोगों की गिरफ्तारी करके इन्हें अदालत में पेश करती है और वहां से ये लोग जमानत पर बाहर आ जाते हैं। बेकसूर लड़कियों पर ऐसे हमले करने वाले गिरोह को, ऐसी हिंसक भीड़ को जमानत क्यों मिलनी चाहिए? ये जिस संस्कृति और विचारधारा की बात करते हुए दूसरों पर हमले करते हैं, उस सोच के मुताबिक वे बाकी समाज पर भी हमेशा के लिए खतरा रहेंगे, और कम से कम उनके मामले पर फैसला हो जाने तक उन्हें जेल में ही रखना चाहिए। लेकिन हिंदुस्तान का सारा कानून बेकसूर को बेहक बनाने वाला भी होता है और सारे मुजरिमों को लोकतंत्र का हर फायदा देने वाला भी। ऐसे में गुंडों के हौसले बढ़ते चलते हैं और बेकसूरों के हक छिनते चले जाते हैं। हिंदुस्तान की एक ऐसी तस्वीर दुनिया भर में सामने आ रही है जो सती प्रथा के दिनों जैसी ज्यादती वाली बदनामी देश को दुनिया भर में दिला रही है। और यह उस समय एक बहुत ही तकलीफदेह विरोधाभास लगता है जब याद पड़ता है कि कोई आधी सदी पहले से इस देश में एक महिला प्रधानमंत्री रहते आई है, और आज भी एक महिला इस देश की सत्ता की मुखिया है। फिर जिस कर्नाटक में जिस भाजपा का राज है, वह गऊ और भारत को दोनों को माता कहती है, और उसके समर्थक साम्प्रदायिक गुंडा-संगठन लगातार इस तरह की हिंसा करते हैं। 
हिंदू साम्प्रदायिक संगठनों का यह नारा है कि भारतीय संस्कृति के खिलाफ जीवनशैली बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लेकिन खुद हिंदू पौराणिक कथाओं में कृष्ण की रासलीला से लेकर अनगिनत लोगों के गंधर्व विवाह तक की मिसालें हैं, इसी हिंदू धर्म के भारत पर एकाधिकार के युग में लिखी गई श्रृंगार रस की अनगिनत कविताएं हैं, सैक्स पर लिखा गया दुनिया का एक सबसे महान गं्रथ कामशास्त्र है, और यह सब उन दिनों की बातें हैं जब भारत में भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के अलावा किसी और के पांव भी नहीं पड़े थे। और जिन आदिवासियों को यह हिंदू धर्म हमेशा से बंदर मानकर कुचलते रहा, जिनको मनुवादी सामाजिक-शरीर में पांव माना गया, उस आदिवासी समाज में दसियों हजार बरस से लड़के-लड़कियों के उन्मुक्त मेल-जोल की सामाजिक व्यवस्था रही, जो कि आज भी घोटुल की शक्ल में कई जगहों पर जारी है। ऐसे भारत में एक नकली भारतीय संस्कृति की वकालत करने के नाम पर साम्प्रदायिक, कट्टर और धर्मांध गुंडों के ऐसे हमले आज की नौजवान पीढ़ी पर नहीं होते, ये पश्चिमी और ईसाई संस्कृति को बदनाम करने के लिए होते हैं। क्या कोई इनसे यह पूछ सकते हैं कि कृष्ण की रासलीला की सारी कहानियां, कदम-कदम पर होने वाले गंधर्व विवाह क्या किसी पश्चिमी और ईसाई असर के तहत थे? क्या कालिदास और वात्सायन ने पश्चिम के प्रभाव में आकर पे्रम और देह वर्णन किया था? 
देश की सबसे बड़ी अदालत को अब सीधा दखल देकर ऐसे तमाम हमलावरों को मुकदमों के फैसलों तक जमानत से दूर रखना चाहिए ताकि देश के अमनपसंद लोग हिफाजत से जी सकें। इसके अलावा ऐसे संगठनों पर कानूनी रोक लगानी चाहिए और इनकी धन-दौलत जब्त करनी चाहिए। तीसरी बात यह कि ऐसे सारे हमलावरों को हिंसा के, अपराध और नफरत के सारे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अधिक से अधिक तरह की दफाओं के तहत सजा देनी चाहिए। भारत की पे्रस परिषद को ऐसी रिकॉर्डिंग प्रसारित करने वाले चैनलों और ऐसी तस्वीरें दिखाने वाले बाकी मीडिया पर भी कार्रवाई करनी चाहिए जिनसे कि हमलों के शिकार लोगों की निजी जिंदगी उजागर होती है और जिससे कि वे सामाजिक प्रताडऩा के अगले खतरे में भी पड़ जाते हैं। ऐसा हुए बिना यह देश दुनिया की नजरों में लगातार गिरते चल रहा है, और इन हिंसक अपराधियों को यह समझ भी नहीं आ सकता कि एक देश को ऐसी बातों से कितना नुकसान झेलना पड़ रहा है, पड़ते रहेगा। और कर्नाटक के इन गुंडों से हम यह भी पूछना चाहते हैं कि जब इसी प्रदेश में एक हिंदू स्वामी के सेक्स की वीडियो फिल्में बाजार में आईं, तो यह संगठन कहां था और इसके दूसरे भाई-बंधु कहां थे?

28 जुलाई 2012


एनडी तिवारी से डीएनए तिवारी तक


28 जुलाई 2012
संपादकीय
कल से पूरे देश में एक शक खत्म हुआ और एक मजाक शुरू हुआ। नारायण दत्त तिवारी एक वक्त कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से हुआ करते थे और मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल जैसे कई ओहदों पर वे अपनी पूरी जिंदगी गुजारते आए हैं। अब एक अदालत की जबर्दस्ती के बाद बलपूर्वक लिया गया उनका खून यह साबित कर गया कि वे उस नौजवान के पिता हैं जो अपनी मां के साथ इस बात को साबित करने के लिए बरसों से अदालत में खड़ा था। यूं तो इस मामले को एक निजी मामला कहकर इसे तूल न देने की उम्मीद नारायण दत्त तिवारी ने की है लेकिन आज यह नैतिक सवाल उठता है कि इस मामले से जुड़े हुए सार्वजनिक महत्व के पहलुओं को अनदेखा करके क्या उन्हें एक बुजुर्ग की तरह बख्श दिया जा सकता है? या सार्वजनिक के हित में इस पूरे मामले पर आगे बहस होनी चाहिए जिससे कि ऐसे बदमजा और मामले न खड़े हो सकें। 
आज से बत्तीस बरस पहले जब नारायण दत्त तिवारी अधेड़ हो चुके थे तब कांग्रेस पार्टी की राजनीति में महत्वाकांक्षा रखने वाली एक शादीशुदा महिला से उनके संबंध हुए और यह बेटा पैदा हुआ। यह एक हादसे का नतीजा नहीं था बल्कि उस महिला से उनके बरसों तक रिश्ते रहे। इसकी सैकड़ों तस्वीरें गवाह हैं, और यह बेटा अपने आपको एन डी तिवारी का बेटा साबित करते हुए जाने कितने बरस से अवैध संतान कहलाने की बदनामी भी ढो रहा था। यहां पर हम इस भाषा को लेकर कहना चाहेंगे कि कोई भी बच्चा या बच्ची कभी अवैध नहीं होते। समाज में किसी औरत-मर्द के रिश्ते शादी के बाहर के हो सकते हैं, आपसी रिश्तों में कुछ वर्जित मामले हो सकते हैं, लेकिन औरत-मर्द के किसी फैसले, किसी गलती या किसी गलत काम से पैदा होने वाले बच्चे का उस फैसले से, गलती या गलत काम से कुछ भी लेना-देना नहीं होता। ऐसे बच्चे पूरा हक लेकर एक इंसान की तरह धरती पर आते हैं, और गैरजिम्मेदार समाज की गालियां का बोझ ढोते हैं। 
इस मामले को हम एक बुजुर्ग की किसी पुरानी गलती को मानकर छोड़ भी देते, लेकिन अदालत का फैसला आ जाने के बाद, उसके पहले डीएनए जांच का फैसला आ जाने के बाद भी जिस तरह से एन डी तिवारी इसे अपने खिलाफ साजिश कह रहे हैं, उससे वे किसी हमदर्दी या रियायत के हकदार नहीं रह जाते, बल्कि वे एक तिरस्कार और मखौल का सामान ही रह गए हैं। शादी से परे औरत-मर्द के रिश्ते में कोई अनोखी बात नहीं है, दुनिया में ऐसे अनगिनत मामले रहते हैं। यह भी रहता है कि सामाजिक और सार्वजनिक प्रतिष्ठा के फेर में लोग बहुत से मामलों में एक कड़वे सच को नकारने के लिए आखिरी दम तक कोशिश करते हैं, और वही कोशिश एन डी तिवारी ने भी की। लेकिन आज जब वे इसे अपने खिलाफ साजिश कह रहे हैं, तो यह साबित होता है कि न तो उनका बेटा, न बेटे की मां साजिश कर रहे हैं, बल्कि एन डी तिवारी का अपना डीएनए ही शायद उनके खिलाफ साजिश कर रहा है। ऐसी गंदी बात कहने की वजह से वे अब सिर्फ आलोचना के लायक हैं, कि अपनी औलाद को वे सामाजिक अपमान और तिरस्कार देते हुए एक हल्के इंसान ही साबित हुए हैं। दूसरी बात यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एन डी तिवारी के चाल-चलन में सिर्फ यही एक बात अकेली गलती नहीं थी। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें आन्ध्र का राज्यपाल बनाया था और वहां राजभवन के बिस्तर से उनकी जो स्टिंग ऑपरेशन वाली वीडियो पूरे इंटरनेट पर छाई हुई हैं, और जिसकी वजह से उन्हें वह कुर्सी छोडऩी पड़ी, उसे भी भुलाना नहीं चाहिए। वे जनता के पैसों वाले राजभवन में रंगरेलियां मना रहे थे और यह बात सार्वजनिक जीवन के मूल्यों के भी खिलाफ है और जनता पर लदने वाले राजभवन के खर्च को भी नहीं भूला जा सकता। 
हम किसी इंसान की अपनी देह की जरूरतों को अनदेखा करना नहीं चाहते। लेकिन जब यह पूरा सिलसिला एक राजनीतिक दल के नेता का, उस पार्टी की महत्वाकांक्षी महिला के शोषण से जुड़ा हुआ हो, तो उसे सार्वजनिक नजरिए से भी देखना जरूरी है। और राजभवन के रंगीले वीडियो तो कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार दोनों के लिए शर्मनाक सुबूत हैं। इस मामले पर लिखना आज हमें इसलिए भी जरूरी लग रहा है कि ऐसे ही मौके होते हैं जब बाकी लोग इससे सबक ले सकें। क्लिंटन से लेकर दुनिया के अनगिनत नेताओं के सामने ऐसे मौके आते हैं जब उनके भीतर का विश्वामित्र भी मेनका के सामने पिघल जाता है। लेकिन इसकी कीमत सार्वजनिक जीवन में बहुत लंबी चुकानी पड़ती है। नारायण दत्त तिवारी की एक बड़ी कमजोरी यह रही कि जब उनका खरा बेटा अदालत में बाप साबित करने की लड़ाई लड़ रहा था तब भी वे वानप्रस्थ आश्रम की उम्र में राजभवन में रंगीनियों में डूबे हुए थे। उनकी जवानी में न खुफिया कैमरे रहे होंगे और न ही डीएनए जांच की सहूलियत थी। आज का जमाना अधिक खतरनाक है, ऐसे दुस्साहसी लोगों के लिए। इसलिए सबको सचेत करने के लिए आज यहां इस मुद्दे पर लिखा जा रहा है। 

सवा करोड़ की आबादी, सवा मैडल पर फख्र !


संपादकीय
27 जुलाई
एक पश्चिमी अखबार में अभी यह रिपोर्ट छपी है कि गरीब देशों को ओलंपिक की कौन से खेलों पर अपना ध्यान लगाना चाहिए ताकि वे कम खर्च की तैयारी में भी मैडल के करीब पहुंच सकें। आज ही एक दूसरी खबर यह है कि तैराकी के लिए कुछ ऐसे नए कपड़े तैयार हुए हैं जो अब तक चले आ रहे कपड़ों के मुकाबले कम पानी सोखते हैं, और इससे तैराकों को मदद मिलती है। यहीं पर यह भी छपा है कि किस तरह कुछ तैराक ऐसे महंगे कपड़ों के खिलाफ हैं क्योंकि उनसे दुनिया के अलग-अलग देशों के खिलाडिय़ों के समान मौके छिन जाते हैं। ओलंपिक हो या कोई दूसरा मौका, इसकी मेजबानी के फैसले से लेकर इसके खेलों के प्रायोजक बनने तक और फिर खिलाडिय़ों की पोशाक तक, बाजार का दखल इतना बड़ा हो चुका है कि कई देश मैडल की दौड़ तो दूर रही, ओलंपिक के मैदानों तक पहुंचने के लायक भी तैयार नहीं हो पाते, और ऐसा भी जरूरी नहीं है कि इसमें हर बार अकेले उनकी गरीबी ही आड़े आती हो, लेकिन गरीबी बहुत जगह आड़े आती है। 
आज जब कुछ घंटों बाद ओलंपिक का उद्घाटन होने जा रहा है तो लंदन से दूर बैठे हम भारत के खेलों की हालत के बारे में सोच रहे हैं। एक तरफ क्रिकेट का खेल है जिसे सरकार के और कानून के हर तरह के हाथों से दूर रखकर हर राजनीतिक दल के नेता गिरोहबंदी करके दसियों हजार करोड़ का सालाना कारोबार कर रहे हैं। लेकिन इस चकाचौंध से दूर दुनिया भर के छोटे-छोटे ऐसे खेल हैं, जिनके खिलाडिय़ों को कई-कई दिन ट्रेन के डिब्बे में बैठकर सफर करना होता है, और दरी पर भूखे पेट सोना होता है। देश भर में यही हालत सुनाई देती है कि कहां कोई राष्ट्रीय खिलाड़ी सड़़क किनारे शराब बेचने को मजबूर है, तो कहां कोई दूसरी राष्ट्रीय खिलाड़ी सड़क पर मिट्टी खोदने का रोजी का काम कर रही है। दूसरी तरफ भारत के कई प्रदेशों से ओलंपिक में जाने के लिए नेता और अफसर, खेल संघों के पदाधिकारी पेटी-बिस्तरे महीनों पहले से बांध चुके थे। आज जब राष्ट्रीय चैंपियन रोजी पर काम कर रहे हैं तब इस देश की अदालत इस मामले से जूझ रही है कि हजारों करोड़ के घपले वाले राष्ट्रमंडल खेलों के सरगना को लंदन जाने दिया जाए या न जाने दिया जाए? एक तरफ सरकार के खेल मंत्री सार्वजनिक रूप से इसके खिलाफ हैं कि कलमाड़ी इस देश के नाम के साथ ओलंपिक जाए, क्योंकि वे अभी भयानक भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तारी के बाद जमानत पर छूटे हुए हैं। दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी का कलमाड़ी अपनी पार्टी का मुंह चिढ़ाता हुआ लंदन की तरफ रवाना होने की फिराक में है। और इस पूरे भ्रष्टाचार की मां-बाप यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी अपने खेल मंत्री और अपने इस कलमाड़ी के बीच की बहस को मानो स्टेडियम की दर्शकदीर्घा में बैठे हुए देख-सुन रही है। 
तकरीबन हर राज्य से यह सुनाई पड़ता है कि खिलाडिय़ों की कैसी बदहाली है, और कैसे बड़े-बड़े खेल संघों पर काबिज नेता, अफसर और दौलतमंद लोग जगह-जगह अहमियत पा रहे हैं। जिस तरह से इस समय राज्याश्रय हुआ करता था, उसी तरह घोर अलोकतांत्रिक तरीके से आज इस देश में खेलों पर ताकतवर तबकों का कब्जा है और खिलाड़ी खेल की सुविधाओं के लिए मानो हाथ में कटोरा लिए खड़े रहते हैं। ऐसा देश अमरीका और चीन का भला क्या खाकर मुकाबला कर सकता है जो कि किलो-किलो सोना लेकर ओलंपिक से लौटते हैं। यह देश आबादी में बड़ा है और बर्बादी में उससे भी अधिक बड़ा है। दुनिया के कई देश पेड़ से अमरूद तोडऩे की तरह मैडल उतारकर आ जाते हैं, ऐसे में भारत ओलंपिक में मिले एक या दो मैडल को लेकर साल भर खुशियां मनाता है। हकीकत तो यह है कि यह पूरी तस्वीर इस देश के तकरीबन हर खेल का हौसला तोडऩे वाली है और सवा करोड़ से अधिक की आबादी अगर सवा मैडल को फख्र का सामान मानती है, तो हमारे हिसाब से यह एक शर्मिंदगी का सामान ही है। 
हिन्दुस्तान को इस ओलंपिक के पहले और इसके बाद भी, अपने खेलों और खिलाडिय़ों को लेकर यह सोचना होगा कि वह किसी भी दूसरे सरकारी ठेके की तरह की बेईमानी इसमें भी जारी रखना चाहता है या फिर अपनी युवा पीढ़ी का खेल का उत्साह खड़ा करना चाहता है? 

असम में मौतों को रोकने की जरूरत


संपादकीय
26 जुलाई
भारत के उत्तर-पूर्व में हमेशा से किसी न किसी राज्य में हिंसक संघर्ष चलते रहे हैं। इनमें से कई का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं रहा है, और वे अलग-अलग वजहों से होते रहे हैं। आज असम बुरी तरह झुलसा हुआ है, कई दर्जन लोग हिंसा में मारे गए हैं और करीब दो लाख लोग घरबार छोड़कर राहत शिविरों में जाने को मजबूर हो गए हैं। हिंसा फैलती जा रही है और फौज तैनात की गई है। जब हालात इतने खराब हो जाते हैं तो मौतों के थम जाने पर भी उनके सुधरने में बरसों लग जाते हैं। और असम में दिक्कत कुछ दूसरे किस्म की भी है। पहली नजर में यह लगता है कि यह स्थानीय बोडो आदिवासियों और पड़ोस के बांग्लादेश से आकर बसे मुस्लिमों के बीच का टकराव है। लेकिन असम के अपने मुस्लिम भी हैं, और सरहद के पार से आए हुए मुस्लिमों को भी वहां पीढिय़ां गुजर चुकी हैं। ऐसे में आज का यह टकराव नया नहीं है और यह जातीय या धार्मिक संघर्ष भी नहीं है। 
असम की पूरी तस्वीर को साफ करने के लिए यह कॉलम आज काफी नहीं होगा और इसके लिए अलग से लेख छापने की जरूरत है, लेकिन इसके कुछ पहलुओं पर यहां पर आज बात करना जरूरी है, जहां तक कि इस मामले में हमारी सीमित समझ अभी पहुंच रही है। असम में यह टकराव आर्थिक और सामाजिक संघर्ष भी है। आर्थिक संघर्ष इसलिए कि पढ़ाई से लेकर नौकरियों तक, सरकारी और सार्वजनिक सुविधाओं तक और रोजगार के मौकों पर, स्थानीय असमियों और बांग्लादेश से आकर बसे लोगों के बीच वहां पर एक टकराव हमेशा से ही बने रहा है, कभी वह बढ़ता है, और कभी वह सतह के नीचे बस जिंदा रहता है। इन दोनों तबकों के अपने-अपने काफी आक्रामक तेवर रहते हैं, जिनके चलते असम में अमन-चैन आसान बात नहीं रहती। असम में छात्र आंदोलनों का एक उग्र और लंबा इतिहास भी रहा है, और तरह-तरह के सामुदायिक गुटों को लेकर टकराव भी चलते रहे हैं। इसलिए आज वहां पर तुरंत जरूरत तो कानून का राज दुबारा कायम करने की है, मौतों और हिंसा को रोकने की है, ऐसे हालात बनाने की है जिनसे कि लोग घर लौट सकें, उनकी जिंदगी पटरी पर आ सके और लोग एक-दूसरे के अगल-बगल रहने का भरोसा मन में पा सकें। इसके लिए देश की राजनीतिक ताकतों को भी इस वक्त सत्ता की राजनीति या दलीय-मतभेद छोड़कर एक ऐसे सामाजिक समरसता के वातावरण की बात करनी होगी जिसमें बाकी विवादों को आगे चलकर सुलझाने के लिए रखा जाए। जब घर-दुकान में आग लगी होती है तो पुराने हिसाब-किताब के कागज लेकर चुकारा निपटाने नहीं बैठा जाता। दुनिया के समझदार देशों में किसी भी ऐसे तनाव के मौके पर राजनीतिक दल और नेता एक आवाज में अमन के लिए कोशिश करते हैं, भारत में किसी भी राज्य में ऐसी नौबत आने पर ऐसी समझदारी की कमी खलती है। 
आज सिर्फ इतना लिखना है कि इसे धर्म और जाति से जोड़कर, भारतीय नागरिकों और बांग्लादेश से आए हुए लोगों से जोड़कर, सारी जटिलताओं को इस वक्त उठाने का वक्त नहीं है, और अभी मौतों को रोकने के लिए कोशिश की जानी चाहिए। 

प्रणब कम से कम अपनी आज की भावना को ईमानदार साबित करें


25 जुलाई 2012
संपादकीय
भारत के नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आज कहा कि गरीबी को दूर करना देश की सबसे बड़ी जरूरत है। देश के 13वें राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तुरंत बाद अपने पहले भाषण में उन्होंने ने कहा कि आधुनिक भारत के शब्दकोश में गरीबी जैसे शब्द की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। भारत के विकास में गरीबों की हिस्सेदारी की वकालत करते हुए प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भूख से बड़ा कोई अपमान नहीं है। राष्ट्रपति ने कहा कि हमारा विकास वास्तविक लगे इसके लिए जरूरी है कि हमारे देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को महसूस हो कि वह उभरते भारत की कहानी का एक हिस्सा है। भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी पद का भार व्यक्ति के सपनों पर भारी पड़ जाता है। भ्रष्टाचार एक ऐसी बुराई है जो देश की मनोदशा में निराशा भर सकती है और इसकी प्रगति को बाधित कर सकती है। हम कुछ लोगों के लालच के कारण अपनी प्रगति की बलि नहीं दे सकते। 
प्रणब मुखर्जी के रूप में देश को आज चर्चा में आए तमाम नामों के मुकाबले अधिक तजुर्बेकार राष्ट्रपति मिला है, लेकिन गरीबी और भूख की उनकी बातें क्या ऐसे मौके के समारोह में आमतौर पर कही जाने वाली खोखली बातों से कुछ अधिक हैं?  सच तो यह है कि आजादी से लेकर अब तक जिस व्यक्ति ने भारत की अर्थव्यवस्था पर सबसे अधिक काम किया, वे प्रणब मुखर्जी ही रहे। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने कई बजट पेश किए, और इससे परे भी वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई दशकों से सबसे महत्वपूर्ण मंत्रियों में से एक रहे। इसके बाद भी आज अगर अनाज के गोदामों में जगह न होने से खुले आसमान तले अनाज सड़ रहा है, देश के बच्चे अफ्रीका के देशों से भी बुरे कुपोषण के शिकार हैं और प्रणब मुखर्जी की कल तक की पार्टी के मंत्री, मुख्यमंत्री, उस पार्टी के कलमाड़ी, उसके गठबंधन के राजा जैसे लोग अगर एक हिंसक सीमा तक दौलत इक_ी करते हैं, और भ्रष्टाचार के नए-नए 'आदर्शÓ स्थापित करते हैं, तो आज ऐसे प्रणब मुखर्जी के ऐसे दर्द में वजन एकदम से कैसे आ जाएगा? उनकी बातें, उनके कल तक के इतिहास को देखते हुए, और उनकी कल तक की पार्टी की आज की सरकार को देखते हुए आंसू के शक्ल के बनाए गए एक दानवाकार गुब्बारे की तरह हैं जिनके भीतर भरी हुई हवा से अधिक कोई वजन नहीं है। भूख को अगर वे एक अपमान मान रहे हैं, और बंगाल में अपने बचपन में लाखों लोगों को मार डालने वाले अकाल का अपने-आपको गवाह बता रहे हैं, तो यह देश एकदम से अपने सारे अनुभव को भुलाकर उनकी बातों को पचा नहीं पाएगा। प्रणब मुखर्जी अपनी पार्टी के एक बहुत अच्छे मैनेजर रहे, सरकार के एक काबिल मंत्री रहे, देश के बड़े-बड़े उद्योगों से अरबों का चंदा जुटाने की काबिलीयत रखने वाले कारोबार के भरोसेमंद नेता रहे, लेकिन कभी भी वे भूख को मिटाने के लिए नहीं जाने गए। उनसे अंबानियों की भूख तो मिटी, लेकिन कालाहांडी में दम तोड़ते लोगों की भूख नहीं मिटी। इसलिए आज हम उनकी नीयत पर शक किए बिना इतना जरूर याद करना चाहते हैं कि कल तक उनका अपना खुद का रिकॉर्ड क्या रहा है? क्या कल तक जब सुप्रीम कोर्ट सड़ते हुए अनाज-गोदामों को गरीबों में बांट देने का हुक्म दे रहा था तब प्रणब मुखर्जी की ही सरकार उनकी ही अगुवाई के वित्त मंत्रालय की तरफ से इसके खिलाफ अदालत में नहीं खड़ी थी? इसलिए आज के शपथ ग्रहण के जलसे में उनकी कही हुई बातों को ईमानदार साबित करने के लिए उनको अपने ही मातहत जिंदगी भर काम करने वाले कांग्रेसियों पर जो दबाव बनाना होगा, उसके लिए नैतिक अधिकार कहां से आएगा? अब कानूनी रूप से प्रणब मुखर्जी कांगे्रस के नहीं रह गए हैं, और सरकार का हिस्सा भी नहीं रह गए हैं। अब अगले पांच बरस उनके पास खोने को कुछ नहीं है, सिवाय अपने विश्वसनीयता के। इसलिए बेहतर यही होगा कि गरीबी और भूख के बारे में आज की कही हुई अपनी बातों को लेकर वे इस सरकार पर मेहनत करें और अपने सारे घोषित और अघोषित अधिकारों और प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी आज की भावना को ईमानदार साबित करें। उन्होंने बचपन में बंगाल के अकाल में लाखों मौतों को करीब से देखा है, और इसके बाद से आधी सदी, पौन सदी वे इस दर्द से मानो अछूते रहकर, बेअसर रहकर सत्ता की राजनीतिकरते रहे। अब आखिरी वक्त में ईमानदारी से भूख को मिटाने की कोशिश उनको करनी चाहिए।

प्रतिभा पाटिल जाते-जाते भी कड़वी खबर छोड़ जा रही हैं


24 जुलाई 2012
संपादकीय
आज अपना कार्यकाल पूरा कर रहीं भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का जी विवादों से भरा नहीं है। अंधाधुंध और अभूतपूर्व महंगे और कुनबे से पटे विदेश प्रवासों को लेकर कड़वी खबरें आती रहीं, और उसके बाद उन्होंने पुणे में सैनिकों के लिए रखी जगह में से पांच एकड़ पर अपने लिए सरकारी मकान बनवाना शुरू कर दिया। मानो वह भी काफी नहीं था कि आज यह खबर है कि वे महाराष्ट्र के अपने गृहनगर अमरावती में एक संग्रहालय शुरू करने जा रही हैं जिनमें वे राष्ट्रपति की हैसियत से उन्हें दूसरे देशों के प्रमुखों एवं अन्य लोगों से मिले डेढ़ सौ तोहफे रखेंगी। यह संग्रहालय उनके परिवार के एक ट्रस्ट विद्या भारतीय प्रसारक मंडल की देखरेख में चलेगा। राष्ट्रपति भवन का इस बारे में कहना है कि ट्रस्ट ने इसके लिए अर्जी दी थी, और राष्ट्रपति भवन की संपत्ति को एक लिखित समझौते के तहत इस ट्रस्ट को उधार दिया जा रहा है, जिन्हें राष्ट्रपति भवन चाहेगा तो वापिस ले सकेगा। राष्ट्रपति भवन में जिस लिखित समझौते के तहत ये सामान दिए हैं, उसमें किसी समय-सीमा का कोई जिक्र नहीं है।
अब तक देश में परंपरा यह रही है कि सार्वजनिक पदों पर जो लोग रहते हैं, वे कार्यकाल के दौरान पद की वजह से उन्हें मिली तमाम किस्म की भेंट अपने दफ्तर में ही छोड़ जाते हैं, और वह सरकारी संपत्ति में गिनी जाती है, और उन्हें तोषखाना में रखा जाता है। ऐसे सामानों में से डेढ़ सौ सामान रिटायर हो रही राष्ट्रपति के पारिवारिक ट्रस्ट को इस तरह से उधार बताकर दे देना, एक बहुत ही गलत परंपरा की शुरूआत है क्योंकि आने वाले तमाम राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों के गृहनगर तो अलग-अलग जगहों पर होंगे ही, और इस तरह से बिखरे हुए संग्रहालय देश के किस काम के होंगे? 
पाठकों को याद होगा कि इसी अमरावती में कुछ महीने पहले जब चुनाव हुए तो करोड़ या करोड़ों की नगदी के साथ राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के बेटे की गाड़ी पकड़ाई थी। उसके बाद उसका क्या हुआ यह खबर याद नहीं पड़ती है, लेकिन ऐसी कई और छोटी-छोटी अप्रिय बातें उनके साथ जुड़ी रहीं। यह सिलसिला राष्ट्रपति के पद को आलोचना से परे रखने के तर्क को नाजायज ठहराता है। अभी-अभी हमने कल ही इस बारे में लिखा है कि किसी कुर्सी या दफ्तर के किसी अतिरिक्त सम्मान का हकदार नहीं बनाना चाहिए और उस जगह के कामकाज को देखकर ही सम्मान तय करना चाहिए। प्रतिभा पाटिल के ऐसे फैसले पर उनका क्या सम्मान बढ़ेगा? आज ही प्रतिभा पाटिल को लेकर यह कार्टून आया है कि वे दिल्ली से अपने शहर जाने के लिए बाली, ताहिती, होनोलुलु, वेंकुवर, रोम वगैरह होते हुए जाएंगी। इसी तरह की बातें रहीं जिनकी वजह से एक कार्यकाल के बाद दूसरे कार्यकाल के लिए प्रतिभा पाटिल का नाम तक किसी ने नहीं लिया। जिस यूपीए गठबंधन ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया था, उसी की सत्ता जारी रहते हुए भी उनके दूसरे कार्यकाल पर कोई विचार तक नहीं किया गया। पिछले कुछ दिनों से एक दूसरी बात भी राष्ट्रपति पद के बारे में हो रही है कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका सम्मान किसी पद से बढ़ता है, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनसे किसी पद का सम्मान बढ़ता है। अब प्रतिभा पाटिल के बारे में इन दो बातों में से कौन सी बात लागू होती है यह तय करना क्या कोई मुश्किल बात है? 

यूपी में जुर्म नहीं कम है...


23 जुलाई 2012
उत्तरप्रदेश के एक थाने में फिर एक महिला से सामूहिक बलात्कार की खबर आई है। और जैसा कि हमारे समेत बहुत से लोगों का अंदाज है कि सौ-पचास बलात्कार में से किसी एक में ही उसकी शिकार लड़की या महिला और उसके परिवार की हिम्मत रिपोर्ट लिखाने की होती है। देश का सबसे कमउम्र मुख्यमंत्री देश के सबसे बड़े प्रदेश पर राज कर रहा है और वहां से जुर्म की जो गिनती सामने आ रही है वह शायद इस प्रदेश के इतिहास में किसी भी सरकार के पहले महीनों का एक रिकॉर्ड है।  अब सवाल यह उठता है कि मायावती की जिस सरकार को मुजरिमों की रहनुमा कहते हुए समाजवादी पार्टी थकती नहीं थी, उस सरकार में तो आए दिन सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक, सांसद और मंत्री भी गिरफ्तार होते रहते थे। यहां पर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार में बहुत से ऐसे मंत्री शामिल किए गए जिन पर कई किस्म के जुर्म दर्ज हैं और अब सरकार उन पर से मुकदमे खत्म करते चल रही है। 
ऐसे में जब हर किस्म के अपराधों के आरोपों के घेरे में फंसे लोग लालबत्ती तले, झंडे लहराती गाडिय़ों में, वर्दियों की सलामी लेते चल रहे हैं, तो उनके अपराधी साथियों के हौसले कैसे पस्त होंगे? और इसका एक नतीजा यह हुआ है कि वहां पर माहौल जुर्म के हौसले का बन गया दिखता है। जिस तरह किसी नए थानेदार के आने पर जुर्म शुरू में तो उस थाना-इलाके में कम होते हैं, वैसी ही उम्मीद अखिलेश यादव से उत्तरप्रदेश के अमन-पसंद लोगों को थी। जिस राज्य का नाम और जिसकी साख तरह-तरह के जुर्म से बिगड़ी हुई है वहां पर कुछ बरस पहले का इसी समाजवादी पार्टी का वह चुनावी नारा भी झूठा साबित हो रहा है जिसमें अमिताभ बच्चन टीवी के परदे पर आकर कहते थे-'यूपी में दम है, क्योंकि जुर्म यहां कम है।Ó यह तो गनीमत है कि धर्मनिरपेक्ष मुलायम सिंह के दोस्त अमिताभ बच्चन अब नरेन्द्र मोदी के राज्य का इश्तहार कर रहे हैं, क्योंकि उनकी कही बात अब यहां पर मखौल ही बनती।
आज कि ही एक दूसरी खबर, बलात्कार की इस खबर के साथ, आई जिसमें नाम गिनाए गए हैं कि किस-किस मंत्री ने किस-किस तरह के जुर्म के मुकदमे वापिस लिए जा रहे। उत्तरप्रदेश में जब राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे तब जिस ब्रम्हशंकर त्रिपाठी पर मौत और चोरी की दफाओं में केस चल रहा था, उसे अभी-अभी वापिस ले लिया गया, 2001 से चल रहे इस मामले में जुर्म साबित होने पर दस बरस तक की कैद हो सकती है। पूर्वी उत्तरप्रदेश के एक जाने-माने बाहुबली त्रिपाठी पर से वापिस लिया गया यह मामला अकेला नहीं है। ऐसे बहुत से मामले वापिस लिए जा रहे हैं जिनके खिलाफ लोगों को जनहित याचिका लेकर अदालत जाना चाहिए और उत्तरप्रदेश को बचाना चाहिए। 
आज यह राज्य पिछड़ेपन और गरीबी से जूझ रहा है। यह हालत सिर्फ दिल्ली से अभी-अभी मिले मतदान-भुगतान के दसियों हजार करोड़ से नहीं सुधर सकेगी। इसके लिए वहां का माहौल सुधारना होगा, तभी वहां बाहर से कारखाने और कारोबार पहुंचेंगे। ऐसा न होने पर उत्तरप्रदेश कभी अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाएगा। एक नौजवान मुख्यमंत्री को अपनी पारी साफ-सुथरी शुरू करनी चाहिए, लेकिन यहां उसका ठीक उल्टा हो रहा है। समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए लोग पहले भी तरह-तरह के सार्वजनिक अपराध करते आए थे और मुलामय सिंह की पुलिस उनको छूने से बचती रही थी। वही नौबत आज भी जारी है। इस प्रदेश के कानून-व्यवस्था मामलों को लेकर केंद्र सरकार भी कोई कड़ाई नहीं दिखा पाएगी क्योंकि उसे बचाने में मुलायम सिंह यादव अपनी पूरी ताकत के साथ खड़े रहते हैं। अब सवाल यह है कि लोहिया के नाम पर चलने वाली समाजवादी पार्टी अगर धर्मनिपरेक्ष होने के एवज में इस तरह के अपराधों को अनदेखा करने की उम्मीद लोगों से करती है तो वह बात अब किसी के गले नहीं उतरती। धर्मनिपरेक्ष होने से चारा खाना, या गुंडागर्दी करना कैसे सही ठहराया जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे कि प्रशासन अच्छा होने पर भी मोदी की साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त करने के लायक नहीं माना जा सकता। आज का वक्त अच्छे प्रशासन और धर्मनिरपेक्षता दोनों की मांग करता है, और उससे कम में जनता की उम्मीद को छूना भी मुमकिन नहीं होगा। फिलहाल उत्तरप्रदेश से ऐसे एक-एक जुर्म की खबर इस राज्य को पीछे धकेल रही है। और अखिलेश यादव को यह भी याद रखना होगा कि यह चुनाव उन्होंने जीता कम था, मायावती ने हारा ज्यादा था, अगला लोकसभा चुनाव मायावती के कामकाज से वोट तय नहीं करेगा, सपा के कामकाज से करेगा।

कल के जानकार प्रणब के लिए आज नैतिकता की बात कुछ मुश्किल नहीं होगी?


23 जुलाई 2012
संपादकीय
भारत के नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को लेकर कल शाम से देश भर में जो बहस चल रही है उसमें राष्ट्रपति के पद के सम्मान, उसकी गरिमा जैसी बातों को बार-बार दुहराया जा रहा है। इसके अलावा अन्ना हजारे की टीम ने जिस तरह से प्रणब मुखर्जी को खुलकर भ्रष्ट कहते हुए जो हल्ला किया है उसे भी कांगे्रस पार्टी राष्ट्रपति के पद का अपमान कह रही है। भारत में बहुत सी कुर्सियों और दफ्तरों को लेकर इस तरह की बात समय-समय पर कही जाती है और पांच बरस बाद राष्ट्रपति का ऐसा सरगर्मी वाला चुनाव ऐसी बात पर कुछ अधिक बड़ा मौका लेकर भी आया है। लेकिन हमारा ख्याल है कि सरकार के कामकाज में, भारतीय लोकतंत्र की संसदीय परंपरा में, और इस देश के राजकीय रीति-रिवाजों में जिस तरह के अतिरिक्त सम्मान की बात कही जाती है वह पूरी तरह बकवास है। 
किसी पद का क्या तो सम्मान हो सकता है और क्या अपमान। हर पद, हर कुर्सी और हर पेशे का सम्मान, उस पर काम करने वाले लोगों के अच्छे और बुरे कामों से तय होना चाहिए, और इतिहास में वही होता भी है। किसी व्यक्ति के कामकाज से परे किसी कुर्सी का अलग से कोई सम्मान क्यों होना चाहिए? सड़क किनारे फुटपाथ पर बैठकर जूते पॉलिश करने वाले एक साधारण दिखते इंसान और देश के किसी जज, किसी मंत्री या राज्यपाल-राष्ट्रपति के काम में सम्मान का क्या फर्क हो सकता है? जो अपना काम अच्छे से करे, वही सम्मान का हकदार है, फिर चाहे उसका काम कुछ भी हो। यह तो राजाओं के जमाने से चले आ रही परंपरा है जिसने कुछ कुर्सियों को दूसरी कुर्सियों के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण साबित करने की कोशिश की है। इसलिए जब कोई प्रणब मुखर्जी को भ्रष्ट कहे, तो वह अपमान एक व्यक्ति के रूप में उनका हो सकता है, अभी तो वे राष्ट्रपति का दफ्तर संभाल भी नहीं पाए हैं तो उस दफ्तर का मान-अपमान कहां से आ गया? 
यह एक अलग बात है कि प्रणब मुखर्जी पर कोई आरोप साबित होने से पहले अन्ना की टोली उन्हें बार-बार भ्रष्ट कह रही है, और यह एक बेबुनियाद बात है। उस टोली से एक पुराने आयकर कमिश्नर रहे हुए अरविंद केजरीवाल और सुप्रीम कोर्ट एक बड़े वकील प्रशांत भूषण यह जानते हुए इस जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं कि प्रणब मुखर्जी के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार साबित नहीं हुआ है, और जहां तक आरोपों की बात है तो वह तो तकरीबन तमाम अन्ना-टोली के खिलाफ भी लगे ही हुए हैं। अगर महज तोहमत से कोई मुजरिम हो जाता है तो फिर अन्ना-टोली को अपनी तमाम बैठकें जेल में ही करनी होंगी।
कल निराश करने वाली एक दूसरी बात यह थी कि देश के बड़े-बड़े कुछ संपादकों और वामपंथी पार्टियों के कुछ बड़े नेताओं, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ प्राध्यापकों के बीच नए राष्ट्रपति पर टीवी चैनलों में जो बहस हुई उनमें किसी ने भी हितों के टकराव का वह पहलू नहीं उठाया जो कि हम बार-बार उठा चुके हैं। केंद्र सरकार का कोई भी बड़ा भ्रष्टाचार सामने आने पर भारतीय संसदीय परंपरा के मुताबिक विपक्ष राष्ट्रपति के पास जाकर फरियाद करता है कि सरकार इतनी भ्रष्ट है और राष्ट्रपति उस पर कार्रवाई करे। राष्ट्रपति के कार्रवाई करने की एक बहुत छोटी सी सीमा है लेकिन वह सीमा भी उस वक्त बेमतलब हो जाती है जब राष्ट्रपति के सामने अगले कई बरस तक वैसे ही मामले शायद सामने आएं जिनमें वे खुद फैसलों के हिस्सेदार रहे हैं। यूपीए-2 सरकार में प्रणब मुखर्जी अकेले ही शायद तीन चौथाई मंत्रिमंडलीय समूहों के मुखिया थे। सरकार के भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों में वे कहीं न कहीं मंत्री, मंत्री-समूह के मुखिया, या मंत्रिमंडल के सदस्य की हैसियत से वे शामिल थे, जुड़े हुए थे, जानकार थे, या फिर कम से कम नैतिक रूप से मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी में हिस्सेदार थे। ऐसे में इस यूपीए सरकार को इसके बचे कार्यकाल में वे एक दलविहीन राष्ट्रपति के रूप में किस तरह की सलाह दे पाएंगे? कल से देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर उन पर फिदा हैं कि पचास बरसों का उनका बहुत से मंत्रालयों का अनुभव राष्ट्रपति के कामकाज में उनके काम आएगा। भारत के राष्ट्रपति को इतने लंबे राजनीतिक अनुभव से कोई फायदा हो या न हो, यूपीए सरकार के दो कार्यकालों के भागीदार के रूप में उनके सामने राष्ट्रपति के कामकाज में अड़चन और दुविधा जरूर आएंगी। 
हम उस बात पर लौटें जिससे कि आज के इस मुद्दे पर लिखना तय किया था। भारत को राजतंत्र के रीति-रिवाजों से ऊपर उठकर एक जनतंत्र बनना चाहिए जिसमें कि सारी जनता बुनियादी तौर पर बराबर मानी जाए। किसी भी जनता को किसी अतिरिक्त सम्मान की जरूरत नहीं होनी चाहिए, हर किसी को उनके काम की सहूलियत के लिए जरूरी सुविधाएं मिलनी चाहिए। इस मौके पर सामंती रीति-रिवाजों की चर्चा करते हुए हम यह भी गिनाना चाहेंगे कि दूसरे लोगों की कीमत पर जब इस लोकतंत्र की कुछ कुर्सियों पर बैठे लोग अपने लिए अधिक सुविधाएं जुटाते हैं, अधिक रियायतें पाते हैं, और खासकर तब जबकि उनसे उनके काम का कोई लेना-देना नहीं होता, तो वह सिलसिला अलोकतांत्रिक होता है। अन्ना की टोली को आरोपों को जुर्म बताने की सोची-समझी साजिश से बचना चाहिए, और किसी को भी राष्ट्रपति के ओहदे और दफ्तर को किसी गैरजरूरी इज्जत का हकदार नहीं मानना चाहिए। जो जहां काम करें, वहां गर अच्छे से काम करें, तो ही उन्हें इज्जत का हकदार मानना चाहिए। यूपीए सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री की हैसियत से प्रणब मुखर्जी पिछले आठ बरसों में उस सरकार के अपराधों को रोक पाने में पूरी तरह नाकामयाब रहे हैं। अब वे कांगे्रस पार्टी को बचाने के दौर से बाहर आ गए हैं और राष्ट्रपति की हैसियत से अब उन्हें देश को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन अपने साथियों, अपनी पार्टी, अपनी सरकार के जुर्म के जानकार रहते हुए वे अब अचानक किस तरह से एक नई नैतिकता की बात करेंगे, यह सोचना थोड़ा मुश्किल है। 

कुदरत को नुकसान के एवज में मिले कोड़े


22 जुलाई 2012
संपादकीय
चीन की बाढ़, अमरीका का सूखा, वहीं पर तूफान, जापान में एक साथ सुनामी और बाढ़, इस तरह के कुदरत के कहर का सिलसिला पिछले बरसों में लगातार बढ़ते चल रहा है, और मौसम के इन तीखे तेवरों को लेकर अब एक सवाल यह उठ रहा है कि कौन से देश, कौन से प्रदेश और कौन से शहर इससे निपटने के लिए कितना खर्च करें? ऐसी नौबत साल में शायद दस-बीस दिन ही किसी इलाके को झेलनी पड़ती है। कुछ जगहों पर हमेशा से ज्वालामुखी या भूकंप के खतरे बने रहते थे, लेकिन अब नई-नई जगहों पर नई-नई कुदरती मुसीबतें सामने आ रही हैं, और इनका दर्जा भी पहले से बहुत ऊंचा हो चुका है। जो नए ढांचे खड़े हो रहे हैं, उनके लिए तो इस दर्जे की तैयारियां काफी अधिक दाम पर भी की जा रही हैं, लेकिन जहां पहले ऐसी कोई आशंका नहीं थी, वहां पर तो कोई तैयारी भी नहीं थी। इसलिए दुनिया के मौजूदा ढांचे में किस तरह कोई फेरबदल करके इन नई मुसीबतों के लिए तैयारी कर सकते हैं? पिछले एक-दो साल में ही योरप में ज्वालामुखी से निकलने वाली राख ने कुछ हफ्तों के लिए वहां जिंदगी तहस-नहस कर दी थी। योरप में ही जिस तरह से हिम युग की वापिसी दिख रही थी उससे भी लोग हैरान थे क्योंकि दुनिया भर में तो ग्लोबल वॉर्मिंग की बातें चल रही हैं। अमरीका में लोग लू से मारे जा सकते हैं, यह पहले किसने सोचा था? दूसरी तरफ रूस की बाढ़ में डेढ़-दो सौ लोग मारे गए और ब्रिटेन बेमौसम की बरसात की मार झेलता रहा।
हमने हिंदुस्तान की एक सबसे बड़ी पर्यावरण-जानकार सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सुनीता नारायण का उनकी पत्रिका डाऊन टू अर्थ का संपादकीय दो-चार दिन पहले ही इसी पेज पर छापा था जिसमें उन्होंने बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन में रिश्ता समझने का वक्त, गिनाया था। उन्होंने लिखा था-सच बात तो यह है कि बदलाव हमारे वर्तमान और भविष्य में होंगे ही। चूंकि दुनिया ने बढ़ते तापमान का असर अभी देखना शुरू ही किया है, चरम मौसमी घटनाओं के कारण समझाने वाले  पिछले कई सालों के आंकड़े अस्तित्व में ही नहीं हैं। इसलिए ज्यादा से ज्यादा यही किया जा सकता है कि एक मॉडल के आधार पर  दुनिया भर में बढ़ रहे तापमान के असर की भविष्यवाणी की जाए। 
उनके तर्क चूंकि अभी-अभी हमने छापे हैं इसलिए उन्हें यहां दुहराना ठीक नहीं है और हम बात वहां से कुछ अलग भी ले जाना चाहते हैं। इंसान जितने किस्म से कुदरत को कुचल रहे हैं, उसे देखते हुए यह माना जाना चाहिए कि कुदरत भी इसका हिसाब आगे-पीछे चुकता करेगी। और यह सब तो तब है जब आज धरती पर अमीरी और गरीबी के बीच का फासला एक सीमा तक ही पहुंचा है और यह आगे बढ़ते जाना तय है। जब यह फासला और अधिक भयानक हो जाएगा, तब अमीर तबके की खपत भी भयानक बढ़ जाएगी। और उससे धरती के गर्म होने, यहां पर प्रदूषण बढऩे की नौबत भी अधिक भयानक हो जाएगी। उनका एक नतीजा इस तरह के चरम मौसम की शक्ल में भी सामने आएगा। लेकिन इंसान के बनाए हुए इस खतरे से परे अगर दुनिया की इस आकाशगंगा में कुछ ऐसे फेरबदल हों जो इंसान काबू से परे हों तो क्या होगा?
आज तो यह धरती इंसानों के बिगाड़े हुए माहौल की मार को नहीं झेल पा रही है, इस पर उम्मीद से परे की कोई और मार पड़े तो क्या होगा?
हिंदुस्तान के मामले में देखें तो यह बात कई तरह के बहस के लायक लगती है कि देश के एक हिस्से में बाढ़ और दूसरी हिस्से में सूखे से निपटने के लिए नदी-जोड़ योजना का नफा क्या होगा, और नुकसान क्या होगा? यह मामला बहुत अधिक जानकार लोगों के बीच के तर्क-वितर्क का है इसलिए इस बारे में हमारी अपनी कोई विशेषज्ञ राय नहीं है। लेकिन पहली नजर में यह ठीक लगता है कि पानी को सूखे इलाकों की तरफ मोड़ा जाए। लेकिन इससे इन इलाकों के पर्यावरण पर पडऩे वाले असर का ठीक-ठीक अंदाज लगाना क्या आज मुमकिन है? और यह भी कि क्या इतनी बड़ी योजना से कम कोई ऐसी योजना बन सकती है जिसका असर सीमित हो? यह कुछ उसी तरह की बात है जिस तरह कि बड़े बांधों के मुकाबले पर्यावरणवादी लोग छोटे बांधों की वकालत करते हैं। लेकिन यह जरूर है कि भारत के एक हिस्से में बाढ़ को कम करके, दूसरे हिस्से से सूखे को कम किया जा सके, और सारे सूखे हिस्से में जमीन के भीतर भी रिसकर जाने वाला पानी अधिक पहुंचे, तो उसके कई फायदे भी हो सकते हैं। 
मौसम के कोड़े को आज दुनिया के बहुत से हिस्से बहुत बुरी तरह झेल रहे हैं। और अमरीका जैसा ताकतवर देश भी इस मार को हल्का करने का कोई तरीका नहीं निकाल पा रहा है। भारत को भी यह सोचना शुरू करना चाहिए कि वह कुदरत को पहुंचाए जा रहे नुकसान को कम कैसे करे। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी जरूरी बात यह भी रहेगी कि विकसित और संपन्न देशों की मतलबपरस्ती के चलते कुदरत को जो बड़ा नुकसान पहुंचाया जाता है, उसे रोकने के लिए ऐसे देशों पर दबाव कैसे बढ़ाया जाए।

यह पानी में डूबना नहीं है, यह कचरे में डूबना है...


21 जुलाई 2012
संपादकीय
आज जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर बारिश के पानी से चारों तरफ से घिर गई है, अनगिनत बस्तियों में घरों में पानी घुस चुका है और नौबत यह है कि लोगों को रस्सी पकड़कर सड़क पार करनी पड़ रही है तो यह मौका कुछ आत्ममंथन के लिए सही है। आने वाले दिनों में ऐसे और भी दिन होंगे जब लोग पानी की वजह से घर से नहीं निकल सकेंगे और उनके पास सोचने का समय रहेगा। 
जब सड़कों से परे बस्तियां भी पानी में डूबी हैं, तो सबसे गरीब लोगों की बस्तियां सबसे पहले डूबती हैं, इसलिए कि उन पूरी बस्तियों को ऊंचा करने की लागत कौन उठाए? हालत यह है कि कुछ बरस पहले बनी छत्तीसगढ़ हाऊसिंग बोर्ड की भी एक कॉलोनी शहर और विधानसभा के बीचोंबीच लगातार हर बरस डूबती है, और शायद उसका कोई इलाज दिखता भी नहीं है। यह एक कॉलोनी तो योजना की गड़बड़ी की वजह से है, लेकिन चारों तरफ जो पानी जमा है उसके पीछे सरकार की योजना की गड़बड़ी के साथ-साथ शहर में लोगों में सफाई की समझ की कमी भी है। एक तरफ जब स्थानीय शासन का काम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर डालकर लोकतंत्र को नीचे तक पहुंचाने की कोशिश होती है, तब स्थानीय जनप्रतिनिधि अगर अपना जिम्मा ठीक से पूरा नहीं करते तो उससे न सिर्फ शहर डूबता है बल्कि निर्वाचित लोकतंत्र की साख भी डूब जाती है। सरकार के खिलाफ तो हमेशा ही लिखा जा सकता है, लेकिन साथ-साथ यह भी सोचने की जरूरत है कि पानी बहाकर ले जाने के लिए बनी नालियों की जब सफाई होती है तो हर पचास कदम पर उन नालियों से इतना कूड़ा निकलता है कि जगह-जगह घूरा बन गया दिखता है। इतने कचरे को नालियों में डालने वाले लोग डूबने के ही हकदार रहते हैं। और वही हो भी रहा है।
कई बरस हुए, राज्य सरकार ने पॉलीथीन पर तरह-तरह की रोक की मुनादी की, लेकिन न तो उसका कोई असर हुआ, न सरकार ने कोई कार्रवाई की और न ही पॉलीथीन के विकल्प पेश किए गए। नतीजा वही हुआ जो बरसों पहले मुंबई में हुआ जब दो-दो दिन तक लोग घर नहीं लौट पाए थे। आज छत्तीसगढ़ की राजधानी में पानी निकलने की गुंजाइश अगर नहीं बची है तो इसके पीछे इस किस्म का कचरा भी जो कि न घुलता है और न ही बहता है। वह जगह-जगह जमकर हजारों बरस के लिए बोझ बन जाता है। बरसों से यह बात भी चल रही है कि म्युनिसिपल ठोस कचरे के निबटारे के लिए बड़ी योजना बनाने जा रही है। लेकिन कचरे से भी कमाने की नीयत है, या फिर स्थानीय संस्था और सरकार के बीच राजनीतिक टकराव का नतीजा है, कचरे का निबटारा हो ही नहीं पा रहा है। शहरी जिंदगी में कचरा पैदा करना बढ़ते चल रहा है और उसे ठिकाने लगाने की कोई योजना नहीं है। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने इसके पहले एक-दो बार लिखा है कि इस राज्य में सामानों की पैकिंग पर इस हिसाब से टैक्स लगाना चाहिए कि उनमें कागज, प्लास्टिक, कांच, धातु और पॉलीथीन का कितना-कितना इस्तेमाल हुआ है। इस पूरी पैकिंग पर एक कचरा-टैक्स लगाना चाहिए और आज के संगठित महंगे सामानों के जमाने में यह काम बड़ी दुकानों से आसानी से शुरू हो सकता है। इससे गरीबों के सामान पर अधिक असर नहीं होगा, और गैरजरूरी महंगी पैकिंग वाले महंगे सामान कचरे के बोझ पर टैक्स देंगे। इससे पर्यावरण को लेकर और कचरे को लेकर लोगों में जागरूकता भी आएगी। 
आज जो पानी जमा है, वह म्युनिसिपल और राज्य सरकार के विभागों की मिली-जुली जिम्मेदारी है, और शहर की जनता की जिम्मेदारी भी है। अगर लोग रोजाना पूरे  वक्त नालियों को कचरे से पाटते रहेंगे तो कोई भी सरकार न तो उन नालियों को साफ कर सकेगी, और न ही बारिश के पानी को रफ्तार से निकाल सकेगी। हमारा तो यह मानना है कि कचरे के नाम पर सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोगों को कमाने का मौका ही क्यों दिया जाए? वह पैसा भी तो आखिर जनता की जेब से ही जाएगा। उसके बजाय लोगों को जागरूक कर अपने कचरे का निबटारा ठीक से करना चाहिए, और उसके भी पहले कचरा पैदा करने में कमी करनी चाहिए। एक वक्त किसी समझदार ने यह कहा भी था कि कोई भी समाज उतना ही अच्छा होता है जितना कम कचरा वह पैदा करता है। 

20 जुलाई 2012


लाइसेंस लेकर राहुल गाड़ी चलाएं, तो आखिर उसमें बुरा क्या है?


20 जुलाई 2012
संपादकीय
हिंदुस्तानी मीडिया के हाथ से राष्ट्रपति चुनाव के तोते उड़े ही थे कि राजेश खन्ना ने गुजरकर सबको काम दे दिया। लेकिन अंतिम संस्कार के साथ कुछ घंटों में समाचार चैनलों की टीआरपी को घटना ही था, उस वक्त राहुल गांधी के एक बयान को मीडिया ने इतना महत्वपूर्ण बना दिया, जितना महत्वपूर्ण शायद कांगे्रस पार्टी के भीतर भी किसी ने उसे नहीं लिया होगा। राहुल ने कल कहा कि वे पार्टी और सरकार में अब अधिक सक्रियता के लिए तैयार हैं और नई या बड़ी भूमिका निभाने के लिए भी। इसे लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अटकलों का सैलाब सा आ गया और हर चैनल के स्टूडियो विश्लेषकों से लबालब हो गए। 
अब अगर इस बयान के मतलब और वजन को मीडिया की भूख से परे देखें और समझें, तो इसमें इस कदर बावला हो जाने जैसा कुछ नहीं था। एक ही दिन पहले सोनिया गांधी ने कहा था कि राहुल गांधी अपनी भूमिका खुद तय करेंगे। अब इस बयान से परे अगर सोचें, तो कांगे्रस पार्टी के हमेशा से चले आ रहे पारिवारिक ढांचे में नेहरू-गांधी परिवार के लोगों की भूमिका कोई पार्टी तो तय करती नहीं, वे खुद ही तय करते हैं। या संजय और राजीव के लिए इंदिरा ने कुछ तय किया था, कुछ इन लोगों का खुद का तय किया हुआ था। सोनिया गांधी की राजनीतिक पारी खुद उन्होंने तय की, और राहुल गांधी की राजनीति और सरकार में उनकी अब तक शुरू न हुई पारी भी घर के भीतर ही तय करने की बात रही। सोनिया गांधी के इस बयान को उत्तरप्रदेश चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी और उनके पति राबर्ट वढेरा के उस बयान के साथ देखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने यह कहा था कि राहुल खुद यह तय करेंगे कि उन्हें कब पार्टी या सरकार में क्या करना है। इस परिवार के बयान चाहे कितने ही कुनबापरस्त लगें, सामंती लगें, ये बयान सच हैं और खुलकर हकीकत को बयां करते हैं। अब इस परिवार के बारे में कांगे्रस के कोई पदाधिकारी या प्रधानमंत्री क्या खाकर कुछ तय करेंगे? जिस परिवार की शोहरत और जिसके असर पर यह पार्टी एक परजीवी प्राणी की तरह जीती है, और जिसके बिना इस पार्टी को अपने किसी भविष्य की कल्पना भी नहीं हो सकती, न तो उस परिवार के बारे में तय करने का इस पार्टी में और किसी को कोई हक है, और न ही पार्टी को अपने खुद के बारे में कुछ तय करने का हक है। दरअसल इस कुनबे के राज से बाहर निकल जाने के बाद पी.वी. नरसिंह राव के राज में पार्टी और उसकी सरकार ने जो दुर्गति पाई थी, उसके बाद से कांंगे्रस ने सोनिया परिवार की पीठ पर सवार होकर ही चुनावी-वैतरणी पार करना मुमकिन पाया था। इसलिए इस पार्टी की व्यवस्था को कुनबापरस्त कहें, या चुनावी समझ वाला कहें, यह परिवार तो शायद पार्टी के बिना किसी तरह जी लेगा, यह पार्टी इस परिवार के बिना शायद कहीं की नहीं रहेगी। कांगे्रस ने नेहरू-गांधी परिवार के बिना सीधे खड़े हो पाने की ताकत जमाने पहले खो दी है, और हम इस परिवार और पार्टी की कुनबापरस्ती के बारे में चाहे जो कहें, इसके बिना पार्टी का कोई अस्तित्व भी नहीं दिखता। 
ऐसे में राहुल के एक बयान को लेकर मीडिया गिने-चुने शब्दों के इतने अधिक मतलब निकाल रहा है, इतने दूर तक की बहस कर रहा है, जितना कि हकीकत में मतलब नहीं निकल रहा है। लेकिन इस मुद्दे पर आज लिखते हुए हम उस एक पहलू की बात करना चाहते हैं जो मीडिया में नहीं उठ रहा है, वह यह कि आज ऐसी कौन सी भूमिका है जो कि पार्टी और सरकार में राहुल गांधी से परे है? संगठन को लेकर, नीतियों को लेकर और सरकार के कार्यक्रमों को लेकर यूपीए गठबंधन और कांगे्रस पार्टी के भीतर जहां-जहां सोनिया-राहुल जैसा चाहते हैं, वैसा ही होता है। गठबंधन का जो हिस्सा कांगे्रस के ही काबू से परे है, वहीं पर इन मां-बेटे की नहीं चलती, बाकी तो सब कुछ वैसे भी इन्हीं के हिसाब से चलते आया है और चलते रहेगा। इसलिए राहुल गांधी का यह कहना कि वे और अधिक जिम्मेदारी के लिए, और अधिक सक्रिय हिस्सेदारी के लिए तैयार हैं, और वक्त का फैसला पार्टी या सरकार के नेता करेंगे, एक बेमतलब की बात है जिसका बहुत अधिक मतलब वह मीडिया निकाल रहा है जिसके पास राजेश खन्ना के अंतिम संस्कार के बाद एक सूनापन छाया हुआ था। यह बहस टीवी समाचारों पर कुछ उसी तरह की दिखती है कि एनडीटीवी यह कहे कि अब खबरों को तय करने में उसके संचालक प्रणव राय की अधिक सुनी जाएगी, या टाईम्स नाऊ यह कहे कि अब उसके संपादक अर्नब गोस्वामी बहस के मुद्दे अधिक तय करेंगे। 
जो घर की बातें रहती हैं, उनमें घर के सबसे अधिकार संपन्न सदस्य के बारे में अधिक अटकलबाजी की जरूरत नहीं रहती, और वही नौबत कांगे्रस पार्टी या सरकार में उसके हिस्से के भीतर सोनिया-राहुल की है। न सिर्फ कांगे्रस बल्कि आज देश भर में अनगिनत राजनीतिक दलों में कुनबापरस्ती की जो हालत है, उसे देखते हुए अब कांगे्रस की कुनबापरस्ती को हम अलग से, अधिक, कोसना नहीं चाहते। जब लोहियावादी लोगों को अपने कुनबे से परे कुछ नहीं दिख रहा है तब नेहरू-गांधी परिवार की मिसाल इस सिलसिले में कैसे दी जा सकती है। लेकिन इसके साथ-साथ आज की यह चर्चा उस मुद्दे पर पहुंचना ही चाहिए कि राहुल गांधी की एक अधिक हिस्सेदारी आखिर क्या मायने रखेगी? आखिर पिछले कुछ हफ्तों से दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे लोग राहुल का झंडा उठाकर क्यों घूम रहे हैं? और क्या राहुल गांधी मनमोहन सिंह सरकार की किसी नाकामयाबी की वजह से सामने लाए जा रहे हैं? ऐसे बहुत से मामले हैं जिनको लेकर अटकल चल रही है। लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि किसी भी पार्टी को अपना अगला नेता, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद का अगला उम्मीदवार तय करने का हक होता है जैसा कि देश में हर राजनीतिक परिवार में समय-समय पर किया है। इसलिए चुनावी रणनीति के रूप में या कांगे्रस संगठन के भीतर सत्ता के हस्तांतरण के लिए अगर ऐसी कोई ताजपोशी होती भी है तो वह राहुल गांधी के ऐसे किसी बयान पर टिकी हुई नहीं रहेगी। 
कांगे्रस पार्टी बहुत लंबे समय से एक धर्मालु की तरह चल रही है और उसे अपने देवी-देवता तय करते हुए किसी को अधिक जवाब देने की जरूरत नहीं है। और यह एक बेहतर नौबत रहेगी जब राहुल गांधी या कोई भी और अधिकार संपन्न नेता, औपचारिक रूप से सरकार या संगठन में जवाबदेह भी रहे। अधिक जिम्मेदारी का मतलब अधिक जवाबदेही भी होगा, और वह एक अधिक लोकतांत्रिक नौबत रहेगी। पीछे की सीट पर बैठकर कार चलाने से बेहतर होगा कि लाइसेंस लेकर कोई नेता अच्छी और बुरी ड्राइविंग के लिए जिम्मेदारी भी रहे। 

भ्रष्टाचारी पर कार्रवाई न हो तो वे पे्ररणास्रोत बन जाते हैं


19 जुलाई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ लोकायुक्त की रिपोर्ट में केंद्र और राज्य सरकार के भयानक भ्रष्टाचार पर उनके विचारों के साथ-साथ राज्य सरकार के जिस भ्रष्टाचार की मिसालें दी गई हैं, उनके बारे में सरकार, राज्यपाल, उच्च न्यायालय, विधानसभा और जनता, इन सबको सोचने की जरूरत है। राज्य के बड़े-बड़े भ्रष्ट अफसरों के नाम और मामले गिनाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बरसों गुजर जाने के बाद सरकार ने लोकायुक्त की सिफारिशों पर कार्रवाई नहीं की और भ्रष्ट लोगों को बचाया।
प्रमुख लोकायुक्त एल.सी. भादू ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह निर्विवाद तथ्य है कि जैसे-जैसे उद्योग, साधन संपन्नता, आर्थिक उन्नति में वृद्धि हुई है वैसे-वैसे भ्रष्टाचार, अवचार, प्रशासनिक अकर्मण्यता, भेदभाव, पक्षपात, पद का दुरुपयोग भी तेजी से बढ़े हैं। पिछले पांच वर्षों में तो इस समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। वर्ष 2011 में केंद्र व राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, पद का दुरुपयोग के असंख्य ममाले सामने आए हैं। जिनमें भ्रष्टाचार का आकार एवं प्रकार दोनों बहुत बढ़ गए हैंं। उदाहरण स्वरूप 2जी स्पेक्ट्रम, एशियाई खेलों के आयोजन में भ्रष्टाचार, खनन पट्टे जारी करने में भ्रष्टाचार, मनरेगा, प्रधानमंत्री सड़क एवं वन क्षेत्र की सभी योजनाओं में भ्रष्टाचार के मामले भी प्रकाश में आए हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस समय कोई भी सरकारी योजना भ्रष्टाचार रहित नहीं है।   
लोकायुक्त अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार सक्षम प्राधिकारी को भ्रष्ट लोक सेवक के खिलाफ तीन माह में कार्रवाई कर अवगत कराने का प्रावधान है। परंतु लोकायुक्त की अनुशंसा पर वर्षों तक कोई समुचित कार्रवाई नहीं की जाती। क्योंकि कार्रवाई उसी विभाग के अधिकारियों द्वारा की जाती है इसलिए विभाग के अधिकारी निष्पक्ष रूप से जांच कर भ्रष्ट लोक सेवक के खिलाफ कार्रवाई कर दंडित करने के विपरीत उसको बचाने का करते हैं। जस्टिस भादू ने कहा है कि राजनेताओं व नौकरशाही को विभिन्न प्रकार के मामलों में असीमित विवेकाधिकार है। विवेकाधिकार के उपयोग में पारदर्शिता नहीं होना ऐसा विषय है जब तक इस पर समुचित नियंत्रण नहीं किया जाएगा। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल है। 
दूसरे राज्यों का हाल भी कमोबेश इसी तरह का है, और छत्तीसगढ़ का भी। जो जाने-पहचाने, स्थापित और संगठित, योजनाबद्ध भ्रष्टाचार करने वाले विभाग हैं, उनके अफसरों के पकड़ाने के बरसों बाद भी उन पर अगर जांच रिपोर्ट के आधार पर भी अगर कार्रवाई नहीं होती है तो विवेक का ऐसा अधिकार घोर अलोकतांत्रिक है। इससे यही साबित होता है कि देश और प्रदेशों में अन्ना हजारे जिस किस्म की पारदर्शिता वाले लोकपाल की बात कर रहे हैं, वैसी स्वायत्तता और स्वतंत्रता के बिना अब काम चलना नहीं है, और हालात सुधरने नहीं हैं। इस बार विधानसभा के इस सत्र के आखिरी दिन लोकायुक्त की जो रिपोर्ट पेश हुई है, वैसी रिपोर्ट इसके पहले के बरसों में भी सामने आती रही है। साफ-साफ भ्रष्टाचार के जो मामले हैं, वे ही अधिकारी अगर सरकार की ऊंची कुर्सियों पर बैठकर दस-दस, बीस-बीस बरस बैठकर कार्रवाई से बचे रहते हैं, तो फिर यह न्यायपालिका के दखल का मामला भी बनता है। इस राज्य में हमने यह भी देखा है कि लोक सेवा आयोग में भ्रष्टाचार और रिश्वत के सुबूतों वाले जो मामले सामने आए और जिनमें आयोग के अध्यक्ष-सदस्य फंसे हुए थे, उनके खिलाफ सुबूतों को भी कमजोर करते हुए जांच खत्म कर दी गई है। सरकार के भीतर के संगठित भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक साहस अगर नहीं दिखाया जाएगा तो सत्तारूढ़ पार्टी विपक्ष की कमजोरियों के बदौलत ही सत्ता पर वापिसी की उम्मीद कर सकती है। 
प्रदेश में भाजपा के बहुत से लोग भी यह मानते हैं कि सरकारी अमले में भ्रष्टाचार बेकाबू है और पिछले बरसों में यह लगातार बढ़ते गया है। जब तक भ्रष्ट लोग जेल जाने के बजाय सत्ता की कमाऊ कुर्सियों पर काबिज रहेंगे, तब तक दूसरे भ्रष्ट लोगों का हौसला तो बढ़ते ही चले जाएगा। हर विभाग में अपने बड़े लोगों के भ्रष्टाचार के मामले जांच और सुबूत के बिना भी सारे अमले को मालूम रहते हैं। और फिर जब ऐसे लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता तो फिर वे अपने सारे साथियों और नीचे के लोगों के प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। 
राज्य सरकार को उसके सामने पड़े हुए भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलों पर से धूल झड़ानी चाहिए और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से भ्रष्ट लोगों को बचाने की चली आ रही परंपरा को तोडऩा चाहिए। 

19 जुलाई 2012


19 जुलाई 2012


हिंसक मर्दों से अधिक मर्द


18 जुलाई 2012
संपादकीय
कांगे्रस पार्टी, उसकी सरकारें और देश की संवैधानिक संस्थाओं में बिठाए गए उसके पसंदीदा कांगे्रसी, ये सब देश में एक तंग नजरिए वाली कट्टरता के हिमायती दिख रहे हैं। पिछले बरसों में मुंबई में डांस बार बंद किए गए और हजारों लड़कियों को एक अपेक्षाकृत सुरक्षित वयस्क मनोरंजन के पेशे से हटाकर बेरोजगारी या देह के धंधे की तरफ धकेल दिया गया। तब से लेकर अब तक महाराष्ट्र में कांगे्रस की गठबंधन सरकार वही रूख दिखा रही है और अब तो पार्टियों पर छापे मारकर एक पुलिस अफसर जो चाहे वह कर रहा है, शराबखाने जल्द बंद करवाए जा रहे हैं और कांगे्रस इस बात को भूल रही है कि मुंबई अब एक टापू जैसा शहर नहीं है वह पूरी दुनिया के कारोबार का एक हिस्सा है और उसे अपनी इस भूमिका के साथ जुड़ी हुई अंतरराष्ट्रीय उम्मीदें पूरी भी करनी हैं। 
दूसरी तरफ पाठकों को याद होगा कि कुछ महीने पहले राष्ट्रीय महिला आयोग की कांगे्रसी अध्यक्ष ममता शर्मा ने देश की लड़कियों के लिए एक बेहूदा बयान दिया था कि उन्हें सेक्सी कहलाने पर बुरा नहीं मानना चाहिए। एक नया शब्दकोष गढ़ते हुए इस कांगे्रस नेता ने संवैधानिक पद पर बैठकर सेक्सी और सुंदर को एक बराबर करार दिया था। उस बयान पर हुए हंगामे के बाद कल इन्हीं ममता शर्मा का एक बयान आया है कि देश की महिलाओं को अपने कपड़ों के बारे में सावधान रहना चाहिए क्योंकि उन पर जितने हमले हो रहे हैं वे पश्चिम की अंधी नकल करने की वजह से हो रहे हैं। यह बात उन्होंने कांगे्रस राज वाले असम की राजधानी गुवाहाटी में हुए एक सार्वजनिक हमले के बारे में चर्चा करते हुए कही। इसी हमले की जांच के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग की जो टीम असम पहुंची थी, पहले तो वहां पहुंचते ही राज्य के परंपरागत स्वागत की बड़ी सी टोपी पहनकर इस टीम की महिलाएं देर तक खिलखिलाते हुए तस्वीरें खिंचवाती रहीं, और फिर जांच के बाद इस टीम की एक महिला ने सार्वजनिक सेक्स-हिंसा की शिकार लड़की का नाम उजागर करने का गैरजिम्मेदारी का काम भी भरी पे्रस कांफे्रंस में किया। इसके बाद मानवाधिकार आयोग को अपनी इस सदस्या को इस जांच से अलग करना पड़ा क्योंकि पूरे देश के मीडिया ने इस पर एक साथ थू-थू किया और इस सदस्या के खंडन को झुठलाते हुए उसके बयान की वीडियो रिकॉर्डिंग प्रसारित की। लगे हाथों हम कांगे्रस पार्टी को यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि हरियाणा में जब खाप पंचायतें पे्रमी जोड़ों की हत्याओं के फतवे जारी कर रही थीं, तब इस पार्टी का नौजवान, अमरीका-शिक्षित सांसद नवीन जिंदल इन पंचायतों का सार्वजनिक हिमायती बनकर सामने आया था। इंदिरा और सोनिया की अध्यक्षता वाली कांगे्रस पार्टी का यह कौन सा रूख है? आज से पौन सदी पहले इस पार्टी के सबसे बड़े नेता जवाहर लाल नेहरू अपनी अंतरराष्ट्रीय समझ की वजह से जिस तरह की उदार जिंदगी के हिमायती थे, वह पूरा सिलसिला उसी तरह कूड़ेदान में फेंक दिया गया है जिस तरह नेहरू की आर्थिक नीतियों को फेंक दिया गया है। आज इस पार्टी की मनोनीत, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष जिस तरह की गैरजिम्मेदारी के बयान दे रही है, उन बयानों को अगर नेहरू युग की महिलाओं पर लागू किया जाए तो उनमें से बहुतों के साथ तो फिर रोजाना ही छेड़छाड़ जायज ठहराई जाती। 
कुछ साम्प्रदायिक ताकतें भारत में एक ऐसी पश्चिम-विरोधी, ईसाई-विरोधी संस्कृति को खड़ा करना चाहती हैं, जैसी पाखंडी संस्कृति इस देश में कभी नहीं रही। सैकड़ों बरस पहले बने हुए खजुराहो के मंदिर देखें, सैकड़ों बरस पहले वात्सायन के लिखे कामशास्त्र को देखें, श्रृंगार रस की संस्कृत से लेकर हिंदी तक की कविताओं में सुंदरता और पे्रम रस के मादक वर्णन को देखें, सैकड़ों बरस पुरानी भारतीय चित्रकला में नारीदेह की खूबसूरती देखें, हिंदू मंदिरों में देवी-देवताओं तक की मूर्तियों में देह-वर्णन देखें, इतिहास और साहित्य में सामाजिक जीवन का चित्रण देखें, किसी भी कोने से यह देश दकियानूसी और पाखंडी नहीं था। बाद में मुगलकाल से लेकर अंगे्रज राज तक, इस्लाम और ईसाईयत के असर में इस देश में कई तरह की तंगदिली समाज में लाई गर्इं, जो इन मजहबों के यहां आने के पहले तक नहीं थीं। 
आज सोनिया गांधी की अगुवाई में कांगे्रस पार्टी को एक तरफ तो यह तोहमत झेलनी पड़ती है कि सवा अरब के देश में उसे हिंदुस्तानी मूल के कोई नेता प्रधानमंत्री बनाने के लिए नहीं सूझ रहे थे? और यह कि देश की सबसे पुरानी पार्टी को आज दूसरे देश से आई हुई एक महिला चला रही है। दूसरी तरफ इस महिला की जो अंतरराष्ट्रीय समझ होनी चाहिए, वह उसकी पार्टी और उसकी सरकारों में कहीं नहीं झलक रही। मुंबई से लेकर असम तक और राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर इस पार्टी की सरकारों के अफसरों तक, महिलाओं की इज्जत के मामले में इस पार्टी की समझ का दीवाला निकला हुआ है। यह पार्टी एक पुरूषप्रधान हिंसक सोच वाली कट्टर संस्कृति को उसी तरह बढ़ावा दे रही है जिस तरह शिवसेना या श्रीराम सेना देती हैं, जिस तरह से मुस्लिम पंचायतें या खाप पंचायतें फतवे जारी करती हैं। 
वोटों को लेकर दहशत में इस कदर जीने से अच्छा है कि सही बातों को लेकर, एक सुधारवादी और प्रगतिशील सोच के साथ विपक्ष में बैठना। आज जब कांगे्रस पार्टी अपनी सरकारों के काम और अपने नेताओं के बयान में कोई खामी नहीं देखती तो इतिहास में उसकी यह खामी अच्छी तरह दर्ज होगी। इक्कीसवीं सदी के हिंदुस्तान के अठारवीं सदी की गुफा में ले जाना सोनिया गांधी के कार्यकाल के साथ दर्ज हो रहा है। एक तरफ इस देश में आसमान को चीरते हुए रॉकेट अंतरिक्ष तक उपग्रह ले जाने की शायद चौथाई या आधी सदी पूरी कर रहे हैं, और दूसरी तरफ मानो ये रॉकेट पिछली एक-दो सदी पीछे पहुंचकर देश को गुफा के भीतर ले जाकर छोड़ रहे हैं। 
जब पूरा देश लड़कियों और महिलाओं पर हर दिन हजारों हमले देख रहा है, दर्जनों बलात्कार हर दिन दर्ज हो रहे हैं, और सैकड़ों लड़कियां इसका हौसला जुटाए बिना चुप रह जा रही हैं क्योंकि कांगे्रसराज में शिकायत करने पर उसकी मेडिकल जांच बाद में होगी, ममता शर्मा का पैनल उसकी फैशन जांच पहले करेगा। जिस देश में संविधान की कुर्सियों पर इस कदर बेरहम महिलाएं, एक महिला की अध्यक्षता वाली पार्टी बिठा रही है, उस देश में भला हिंसक हमलों की शिकार कौन सी लड़की या महिला इंसाफ की उम्मीद कर सकती है?
पिंकी प्रमाणिक नाम की खिलाड़ी की यह सेक्स-जांच हो रही है कि वह औरत है या मर्द। लेकिन इस देश में बहुत सी महिलाओं के बारे में हम उनके बयान पढ़कर ही यह बता सकते हैं कि वे हिंसक मर्दों के मुकाबले कहीं अधिक मर्द हैं।

क्रिकेट होना चाहिए


17 जुलाई 2012
संपादकीय
भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट सिरीज की घोषणा पर जैसी उम्मीद थी, वैसी ही प्रतिक्रियाएं आई हैं। कांगे्रस ने इसका स्वागत किया है, भाजपा ने इसका विरोध किया है, और शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निजी मित्र सुनील गावस्कर ने इसका विरोध किया है। यह मुद्दा एक अच्छी बहस के लायक है और इंटरनेट पर यह बहस छिड़ भी गई है। क्रिकेट पे्रमी इसमें कोई बुराई नहीं देखते हैं, और दूसरी तरफ हिंदुस्तान में बहुत से लोगों को यह लगता है कि मुंबई पर आतंकी हमले का मामला अब तक सुलझा नहीं है, पाकिस्तान के तेवर बदले नहीं हैं, उसकी तरफ से खतरा घटा नहीं है, तो ऐसे में उसके साथ क्रिकेट क्यों खेलना चाहिए।
हमारा यह मानना है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान, इन दोनों ही देशों में जब आपसी रिश्तों की बात आती है तो सरकारों का रूख अलग होता है, जनता का रूख अलग होता है। आज भी एक तरफ जब सरहद पर तनाव बना हुआ है और इन दोनों देशों के बीच बातचीत का कोई नतीजा निकलते नहीं दिख रहा है तब सरहद के दोनों तरफ हजारों गैरसरकारी, गैरराजनीतिक, गैरफौजी लोग ऐसे हैं जो कि लगातार अमन की कोशिश में लगे हुए हैं। इन लोगों में लेखक हैं, पत्रकार हैं, कलाकार हैं और दूसरे बहुत से तबकों के लोग हैं। हम क्रिकेट को ऐसा ही एक तबका गिनते हैं जिसमें यह दमखम है कि दोनों देशों को कड़े मुकाबले के साथ-साथ, साथ-साथ खड़ा भी कर सकता है। यह बात सही है कि भारत पर बहुत से आतंकी हमलों के पीछे पाकिस्तान की जमीन पर बसे हुए लोगों का हाथ साबित हुआ है, और पाकिस्तान की कुछ कट्टर ताकतें भारत विरोध को अपनी ताकत मानती हैं, लेकिन उससे इन दोनों देशों में शांति की जरूरत कम नहीं होती। हकीकत तो यह है कि अपनी-अपनी जमीन पर करोड़ों बहुत ही गरीब लोगों को लेकर बसे हुए इन दोनों देशों को जंग के हथियारों पर अंतहीन खर्च करने के बजाय उस पैसे का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। यह भी जरूरी है कि दोनों के बीच कारोबार बढ़े, ताकि आपसी मुनाफा बढ़े। यह भी जरूरी है कि इनमें से किसी की जमीन पर ऐसे लोग न पनपें जो कि सरहद की दूसरी तरफ हमले करें।
लेकिन सरकार और फौज के काम करने के तरीके कुछ अलग होते हैं। जिन ताकतों को चुनावों में जीतना होता है, उनके तौर-तरीके हमेशा ही अमनपसंद नहीं होते। वोटरों के जज्बात कुरेदकर चुनाव जीतने की बेबसी या पसंद भी किसी की हो सकती है। ऐसे में सरकारों से परे, कट्टरपंथी, धर्मांध और आतंकी ताकतों से परे लोगों को ही आपस में मिलकर फासले दूर करने होंगे। इसमें संगीत और फिल्म अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं, और क्रिकेट भी हमारा मानना है कि ऐसा ही कर सकता है। सवाल यही है कि जब तक किसी दूसरे मोर्चे पर तनाव या हमले चल रहे हैं, तब तक खेल के मोर्चे पर एक मैदान में उतरा जाए, या नहीं? हमारा मानना है कि ऐसे किसी मैच से न तो किसी देश का यह दावा कमजोर पड़ता कि उस पर आतंकी हमले हो रहे हैं और ऐसे हमले थमने चाहिए, मुजरिमों को सजा मिलनी चाहिए। पाकिस्तान की क्रिकेट टीम ने हिंदुस्तान के खिलाफ अलग से कोई ऐसा जुर्म नहीं किया है कि उसका बायकॉट किया जाए। खेल से दोनों देशों में चल रहा तनाव कम ही होगा। सरहद के तनाव या फौज और आतंक के तनाव कभी क्रिकेट का हिस्सा नहीं रहे। न सिर्फ दो देशों के बीच, बल्कि एक देश के भीतर भी बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब लोग फासलों को भूलकर एक-दूसरे का साथ देते हैं। कम से कम तीन ऐसे मौके पिछले पांच बरस में ही आए हैं जब शिवसेना ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए दो बार अपनी भागीदार भाजपा को छोड़कर सोनिया गांधी का साथ दिया, जिनके कि वह हमेशा खिलाफ रही है। इसके अलावा परमाणु मुद्दे पर भी शिवसेना खुलकर यूपीए का साथ दिया और एनडीए के परमाणु-विरोध से अपने को अलग रखा। अभी पिछले दिनों ही बाल ठाकरे ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर इंदिरा गांधी की खासी तारीफ की थी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि शिवसेना कांगे्रस के साथ हो गई है। 
दो देशों के बीच के फौज और आतंक के तनाव के साथ अगर कोई चाहें तो क्रिकेट को और गीत-संगीत को, किसी भी बात को जोड़ सकते हैं। लेकिन हम सरहद के दोनों तरफ अमन की वकालत करते हुए तमाम गैरसरकारी कोशिशों को आगे बढ़ाने की सिफारिश करेंगे, और सरकारी कोशिशों को भी अलग से आगे बढ़ाना चाहिए।

16 july 2012


16 july 2012


अपने और दूसरों के वक्त की कद्र


16 जुलाई 2012
किसी एक शहर में पूरी जिंदगी गुजारने के बहुत से नफे होते हैं और कुछ नुकसान भी। नुकसान यह कि जिन लोगों से इतने बरसों में सामाजिक संबंध बनते हैं, यारी-दोस्ती होती है, कारोबारी काम पड़ता है, उन सब लोगों की एक-दूसरे से कुछ उम्मीदें बंधती हैं। ये उम्मीदें किसी जरूरत से जुड़ी हुई हों तो उनकी एक अलग अहमियत होती है, लेकिन जब ये उम्मीदें सिर्फ शिष्टाचार को लेकर जुड़ी हुई हों तो मामला कुछ दिक्कत का हो जाता है। 
मामूली जान-पहचान से ऊपर जब अधिक गहरे रिश्ते हों तो लोग यह उम्मीद भी करते हैं कि बड़े या छोटे सुख-दुख के मौकों पर वे एक-दूसरे के साथ आकर खड़े रहेंगे। यह उम्मीद या ऐसी जिम्मेदारी का अहसास बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुंच जाते हैं कि लोग एक गमी पर तीन बार जाते हैं और एक खुशी के मौके पर भी तीन-चार दावतों में जाते हैं, या उन्हें लोग बुलाकर उनका इंतजार करते हैं। लोग कहीं से गुजरते हुए रास्ते में पडऩे वाले दोस्तों और परिचितों से मिलने के लिए उनके घर-दफ्तर पर रूक जाते हैं, बिना फोन किए हुए। नतीजा यह होता है कि कुछ लोगों के जरूरी काम का हर्जा होने लगता है। 
कुछ परिचित अस्पताल में रहें, या घर पर बीमार रहें, कुछ लोग उन्हें देखने जाने, और फिर कमरे के भीतर जाकर बिस्तर तक पहुंच, मिजाजपुर्सी करने को जरूरी मान बैठते हैं, फिर चाहे इससे मरीज को और अधिक तकलीफ हो जाने का खतरा ही क्यों न हो। कुछ मरीज भी ऐसे होते हैं जो ऐसी उम्मीद करते हैं, और उनके घरवाले उनकी हड्डी जुडऩे तक के कुछ महीने आने-जाने वाले लोगों को झेलने में ही थक जाते हैं। 
अब सवाल यह है कि कुछ लोगों की शहरी और कामकाजी जरूरतों के चलते उनकी बेबसी के साथ-साथ उनसे कितने शिष्टाचार निभाने की उम्मीद की जाए? और जो लोग अपनी बेबसी से, या पसंद से बाकी लोगों के मुकाबले अधिक घंटे काम करते हैं, अधिक दिन काम करते हैं वे सामाजिक शिष्टाचार से किस तरह की रियायत के हकदार माने जाने चाहिए? फिर यह भी कि इलाज, अखबार जैसे कुछ किस्म के  पेशे ऐसे रहते हैं जिनमें वक्त की पाबंदी जरूरी होती है, ऐसे में अगर यार-दोस्त भी बिना फोन किए, बिना समय तय किए पहुंच जाएं तो उनसे कोई कितना रिश्ता निभा सकता है? 
मैं इसी अखबार में एक छोटे से कॉलम में कभी-कभी इन छोटी-छोटी बातों को लिखने की कोशिश करते रहता हूं, इसलिए कि अपनी अधिक काम करने की आदत के चलते बहुत से मौकों पर सामाजिक शिष्टाचार निभाना मुमकिन नहीं होता, और खासकर अपने काम के वक्त, अखबार को लेट करने की कीमत पर तो कभी भी नहीं होता। इसलिए मैं चारों तरफ यह बात लोगों को सुझाते भी रहता हूं कि आज की जिंदगी में वक्त तय करके ही कहीं जाना ठीक रहता है और मिसाल के लिए मैं खुद इस नसीहत पर सौ फीसदी अमल करने की कोशिश भी करता हूं। 
दरअसल यह जरूरी इसलिए भी है कि आपसी संबंधों के बावजूद हर किसी के लिए, हर वक्त, हर नौबत में, हर किसी की मौजूदगी में आपसे शिष्टाचार निभाने मुमकिन नहीं होता। और इस बात को लेकर मुंह में कुछ कड़वाहट घुले, इससे बेहतर है कि वक्त तय करके कहीं आना-जाना।
एक दूसरी बात जो खलती है, वह है लोगों को किसी भी तरह ही मुलाकात या मीटिंग के खत्म होने का अहसास नहीं होना। आज की भागमभाग के बीच यह बात बहुत जरूरी है कि हर मीटिंग के शुरू होने के वक्त के साथ-साथ उसके खत्म होने के वक्त को भी तय कर लिया जाए। बहुत से लोग तीन बजे तय मुलाकात पर चार बजे पहुंचते हैं और फिर बैठे ही रह जाते हैं। यह सिलसिला भी खतरनाक होता है क्योंकि दूसरे लोगों को इस मुलाकात या बैठक के बाद भी कुछ और काम हो सकता है। इसलिए तय समय पर पहुंचना बेहतर है, और वहां से रवानगी का वक्त भी पहले से तय कर लेना चाहिए। 
मुलाकात के ऐसे वक्त के बीच भी लोग इस बात को भूल जाते हैं कि मुलाकात का मकसद क्या है? वे काम की बात को बहुत आसानी से किनारे करके, किसी दिलचस्प बात को बोलने या सुनने में भिड़ जाते हैं, और जब मुलाकात खत्म होने लगती है तब वे काम की बात शुरू करते हैं, जिसका एक मतलब यह भी होता है कि वह मुलाकात उम्मीद से दुगुनी चले। उम्मीद से दुगुना किसी इश्तहार के लिए तो एक अच्छी लाईन हो सकती है लेकिन काम से लदे हुए किसी इंसान पर मुलाकात की दुगुनी लंबाई भारी पड़ सकती है। 
इसी तरह लोगों के न्यौते पर कहीं आना-जाना अगर मुमकिन न हो तो भी लोग रफ्तार से बुरा मानने पर आमादा हो जाते हैं। यह सिलसिला एक अलग किस्म का दबाव पैदा करता है जो कि सारे रिश्तों के लिए सारे समय सेहतमंद नहीं होता। बुरा मानने के बजाय लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि हर किसी के पास हर दावत में पहुंचने का वक्त, हर किस्म की नौबत के बीच नहीं निकल पाता। किसी की मौत के बाद के अंतिम संस्कार का वक्त और उसके बाद की शोक-सभा का वक्त, कई बार दिन के कामकाजी घंटों में ही रहता है। अब कुछ पेशेवर लोग, कुछ कारोबारी और कुछ नौकरीपेशा लोग, ऐसे वक्त पर इन जगहों पर नहीं पहुंच पाते। इसलिए दिन हो या रात, खुशी का मौका हो या गम का, लोगों को अपनी उम्मीदें कुछ काबू में रखने चाहिए। इसके बिना निराशा अधिक होती है। 
अपने आसपास कुछ बहुत शुभचिंतकों के परिवारों में भी कई बच्चों के जन्मदिन पर हर बरस होने वाली दावतों को लेकर आखिर में मैंने ही उन लोगों से अनुरोध किया कि इतना अधिक वक्त निकाल पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं होता है और इतनी अधिक दावतें खाना सेहत के लिए खतरनाक है, इसलिए मुझे बुलाना कम करें। कोई बुलाए और जाना न हो, तो वह बात भी अपनी ही छाती पर बोझ बनी बैठी रहती है।  
हो सकता है कि ऐसे न्यौतों और ऐसी उम्मीदों के पीछे एक बड़ी आबादी ऐसे लोगों की हो जो कि काम के बोझ से दबे हुए नहीं रहते, और वे किसी भी वक्त अपनी मर्जी का काम कर सकते हैं। लेकिन बेबसी, या अपनी पसंद से, काम से लदे रहने वाले लोगों के लिए यह कुछ दिक्कत की बात रहती है। 
निजी बातों से परे भी अगर देखें तो एक छोटे दायरे के लोगों के शिष्टाचार के ऐसे संबंध आमतौर पर किसी गंभीर मुद्दे पर गंभीर बातचीत को आगे नहीं बढ़ाते। एक-दूसरे से कुछ जाने और कुछ सीखने का मौका ऐसी तमाम मुलाकातों में बहुत कम इसलिए रहता है, क्योंकि उन्हीं लोगों से बार-बार, बार-बार मिलना होता है, उनसे भला कोई कितना नया सीख सकेंगे? इसलिए नये लोग, नये दायरे और नये मुद्दे ही समाज के लिए अधिक उत्पादक बातचीत वाले हो सकते हैं। बहुत करीबी लोगों के दायरे लोगों को अपने नरम बिस्तर की तरह आरामदेह तो लगते हैं, और नये लोगों से नये मुद्दों पर बातचीत एक नई पहाड़ी पर चलने की कसरत की तरह तकलीफदेह भी रहती है, लेकिन नई राह पर सफर कुछ अधिक फायदे का काम होता है।  यह भी तभी हो सकता है जब आसपास के महज शिष्टाचार के संबंधों के अलावा नये लोगों और नये मुद्दों पर बातचीत की गुंजाइश निकाली जाए।
इन दो बातों को जोड़कर देखें तो भी यह जरूरी होता है कि अपने खुद के भले के लिए, समाज के भले के लिए, महज-शिष्टाचार को घटाया जाए, वक्त का बेहतर इस्तेमाल किया जाए और कामकाज के मुद्दों पर बात की जाए। कुछ लोग जिंदगी का आनंद लेने की तरह एक सीमित दायरे के भीतर पूरी जिंदगी रोजाना कई घंटे गुजारने के आदी हो जाते हैं। यह सिलसिला निजी रिश्तों के लिए तो बेहतर हो सकता है, लेकिन क्या इससे दुनिया का भी कुछ भला होता है? 
इसलिए अपने और दूसरों के वक्त की कद्र करना सीखना चाहिए।

जमीन खोकर लुटे हुए राजधानी की सड़कों पर


16 जुलाई 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के उद्योगग्रस्त जिले रायगढ़ से आए आदिवासियों का जुलूस आज राजधानी रायपुर में विधानसभा घेरने के लिए पहुंचा। उनके प्रदर्शन को रोककर उन्हें वहां तक पहुंचने नहीं दिया गया, लेकिन उन्होंने अपनी बात तो यहां रख ही दी। पिछले एक-दो बरस में हमने बहुत से ऐसे मामले सुबूत सहित छापे हैं जिन्हें इस खनिज संपन्न राज्य में सिर्फ खनिज की वजह से आने वाले कारखानों के लिए आदिवासी किसानों की जमीनें बहुत संगठित साजिश करके खरीदी जा रही हैं। और इस पर राज्य सरकार का कोई काबू भी नहीं दिख रहा है। ऐसे दर्जनों मामले अब तक सामने आए हैं जिनमें कारखानों के लिए आदिवासी की जमीन सीधे खरीदना मुमकिन न होने से कारखानेदारों ने अपने आदिवासी कर्मचारियों या आदिवासी जमीन दलालों के नाम से आदिवासी-जमीनें खरीद लीं, और आदिवासी जमीन के लिए बने हुए कानून की आंखों में नोट झोंक दिए। हमारा यह मानना है कि एक साजिश के तहत ऐसा करने वाले, और फिर उस जमीन को अपने कारखाने या खदान के इस्तेमाल का कागजात में जोड़कर कानूनी शर्तें पूरी कर लेने वाले लोगों पर आदिवासी प्रताडऩा कानून के तहत भी कार्रवाई होनी चाहिए। जानकारों का ऐसा मानना है कि छत्तीसगढ़ के दर्जनों बड़े उद्योग इसके घेरे में आ जाएंगे इसलिए सरकार इतनी बड़ी कार्रवाई करने से बच रही है। हो सकता है कि ऐसी बड़ी कार्रवाई से इस राज्य में पूंजीनिवेश और कारखाने लगना कुछ धीमा हो जाए, लेकिन आदिवासियों के खेत, उनके मकान, गरीब किसानों की जमीनों की ऐसी लूटपाट की कीमत पर ऐसे पूंजीनिवेश का कोई मतलब नहीं है। 
एक तरफ यह राज्य बस्तर से लेकर सरगुजा तक और राजनांदगांव-कवर्धा तक लगातार नक्सल हिंसा को झेल रहा है। जिस तरह के इलाकों में आज आदिवासी जमीनों को कारखानेदार ठग रहे हैं, उसी तरह के इलाकों में नक्सल आंदोलन के फैलने और पनपने का एक बहुत साफ खतरा सामने है। इसे अनदेखा करते हुए जब गरीबों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है, खुले बाजार की हिंसक व्यवस्था के तहत कारखानेदारों को यह छूट मिली हुई है कि वे किस्म-किस्म के धोखे देकर आदिवासियों की जमीन हड़प सकते हैं, तो इसे महज खरीद-बिक्री बताना एक बड़े जुर्म को अनदेखा करना है। राज्य सरकार को अपनी जनकल्याण की जिम्मेदारी के तहत भी धोखाधड़ी के इस ध्ंाधे पर सबसे बड़ी कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि जो बेजुबान आदिवासी अपनी आखिरी जमीन भी खो बैठेंगे, तो उसके बाद हो सकता है कि हिंसा ही उनके पास एक रास्ता बच जाए। लोकतंत्र जब लोगों के हक बचा नहीं सकता तब लोग नक्सलियों की तरफ देखने पर मजबूर हो सकते हैं, और छत्तीसगढ़ को ऐसी नौबत से बचना चाहिए।

आज राजधानी रायपुर में निकले इस जुलूस में रायगढ़ के एक जाने-माने और दमदार सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल पर गोलियों से हुए हमले का मुद्दा भी उठाया गया। उद्योगग्रस्त रायगढ़ और आसपास के इलाके में बरसों से रमेश अग्रवाल जनता की तरफ से लड़ रहे हैं और जिंदल जैसे बड़े, और राजनीतिक ताकत वाले उद्योग समूह के खिलाफ उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी-बड़ी कानूनी लड़ाई जीती है और जिंदल को इससे हजारों करोड़ का नुकसान भी हुआ है। खुद नवीन जिंदल की कांगे्रस पार्टी वाली यूपीए सरकार के एक कांगे्रसी पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को निर्देश देकर जिंदल के खिलाफ पर्यावरण कानून तोडऩे के लिए आपराधिक मुकदमा चलाने को कहा था और वह अभी रायगढ़ की जिला अदालत में चल ही रहा है। पाठकों को यह भी याद होगा कि रमेश अग्रवाल को जिंदल की एक शिकायत पर मानहानि के एक मुकदमे में ऐसा गिरफ्तार किया गया था कि शायद महीनों तक उनकी जमानत नहीं हो पाई थी। ऐसे ताकतवर कारखानेदारों के खिलाफ रमेश अग्रवाल हों, या कोई इक्का-दुक्का अखबार हों, या फिर सरकारी अधिकारी हों, इन सबको दौलत का बुलडोजर कुलचने के लिए काफी होता है। कानून तोडऩे वालों को, गरीबों के हक छीनने वालों को दानवाकार ताकत हासिल नहीं करने देनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल इसी रायगढ़ जिले से आए हुए हैं, और उद्योगों की गुंडागर्दी के खिलाफ उनकी आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती है। ऐसी चुप्पी भी इतिहास में दर्ज होते रहती है, और विपक्ष के ऐसे विरोध के न होने से राज्य सरकार भी इन अपराधों पर कार्रवाई करने से बच रही है।
हमारा मानना है कि जहां पर खनिज हैं वहां पर तो कारखानेदारों को आना ही आना है। आज नहीं आएंगे तो कल आएंगे, और अगर इस राज्य ने अपने आदिवासियों के हक में अगर संविधान की विशेष व्यवस्था का उपयोग करते हुए वहां की खदानों पर अलग से रायल्टी लगाई तो उससे स्थानीय विकास की शक्ल बदल सकती है। डॉ. रमन सिंह की सरकार से हम चाहेंगे कि वे इस संवैधानिक विकल्प पर विचार करें और राज्यपाल के अधिकारों से आदिवासी इलाकों में निकलने वाले खनिजों से कमाई बढ़ाने का काम करें। जानकारों का मानना है कि इस अकेले फैसले से हर बरस हजारों करोड़ रूपये इन इलाकों के विकास के लिए आ सकते हैं। अगर यह बात सही है तो इसे करने में देर क्यों होनी चाहिए?
जमीन खोकर लुटे हुए आदिवासी जब राजधानी की सड़कों पर आते हैं तो राजनीति और राजाओं को जागकर उनकी बात सुननी चाहिए।

15 जुलाई 2012


15 जुलाई 2012


15 जुलाई 2012


एक दिन के कुछ अखबारों की कुछ सुर्खियां, एक नजर में


15 जुलाई 2012
संपादकीय
0 तिलकडीह। पिंकी पर जुल्म से उसके गांव में गुस्सा और हैरत
0 गरियाबंद। युवती के हाथ-पांव बांधे और फिर उठा ले गए नक्सली
0 गुवाहाटी। बदसलूकी करने वालों ने लड़की को सिगरेट से भी जलाया
0 असम। जंगल गश्त के दौरान सेना के जवानों ने किशोरी से की छेड़छाड़
0 तिल्दा-नेवरा। विवाहित युवती ने आग लगाकर की खुदकुशी, दहेज प्रताडऩा का आरोप
0 भिलाई। चरित्र संदेह पर ली पत्नी और बच्चे की जान
0 भोपाल। एनआरआई दुल्हें ने दिया धोखा, पहले से था शादीशुदा
0 बेंगलुरू। डेंटिस्ट पति ने पत्नी को मूत्र पीने को किया मजबूर
0 रांची। पांच साल की बच्ची को गर्म चाकू से दागा, तीन माह पूर्व खाला ने बच्ची को 11 हजार में बेच दिया था
0 उस्मानाबाद। बदनामी का खौफ, आत्मदाह करने वाली लड़की की मौत
0 अहमदाबाद। महिला ने पुलिस पर लगाया दुष्कर्म का आरोप
0 भोपाल। ऑपरेशन के दौरान पेट में छूटा कपड़ा, महिला की मौत
0 गुवाहाटी। लड़की से सरेआम जुल्म के लिए टीवी पत्रकार ने उकसाया था
0 कोलकाता। छात्राओं से कहा गया कपड़े उतारो
0 रतनपुर। चीरहरण का एमएमएस...
0 राजिम। नहीं मिला नाबालिग अपहृत छात्रा का सुराग
0 जशपुर। जशपुर में भी नाबालिग छात्रा का अपहरण
0 कोलकाता। पिंकी पर रेप का आरोप ज्योतिर्मय सिकदर के पति अवतार सिंह के कहने पर लगाया था
0 नई दिल्ली। कोख से आ रही कराह क्यों नहीं सुन पाते हम, कन्या भू्रण हत्या रोकने का कानून दम तोड़ रहा
0 नई दिल्ली। अस्पताल में प्रसव के लिए आई महिला से दुष्कर्म की कोशिश
0 बीजापुर। राशन ढोकर 24 किलोमीटर पैदल ले जाती महिलाएं
0 मुरादाबाद। बलात्कार के आरोप में बड़ी संख्या में पुलिस जेल में
0 गुवाहाटी। लड़की पर सरेआम जुल्म में कांगे्रस नेता का हाथ-अखिल गोगोई
0 अहमदाबाद। एनआरआई महिला ने सीआईडी हिरासत में करोड़ों की जमीन के कागजों पर दस्तखत करवाने के लिए अफसरों द्वारा रेप का आरोप लगाया
0 नई दिल्ली। पन्द्रह बरस की लड़की से बलात्कार
0 नई दिल्ली। तेरह बरस की लड़की से बलात्कार
0 गुजरात। लड़की को नशा कराकर बलात्कार, वीडियो फिल्म बनाई, फैलाई
0 बंगाल। उत्तरी चौबीस परगना के एक गांव में 33 महिलाओं से बलात्कार, विरोध करने वाले की हत्या के 10 बरस पूरे हुए
0 तमिलनाडु। भूतपूर्व डीएमके विधायक नौकरानी से बलात्कार, हत्या में गिरफ्तार
0 अहमदाबाद। किराए की कोख वाली गर्भवती महिला से अपहरण और बलात्कार मामले में नया मोड़
0 नागपुर। सोलह बरस की लड़की से बलात्कार, युवक गिरफ्तार
0 हुगली (बंगाल)। यौन प्रताडऩा के बाद महिला की हत्या से पता लगा कि पुर्नवास केंद्र की विचलित, गूंगी, बहरी महिलाओं से बाहरी लोगों द्वारा नियमित रूप से बलात्कार
0 बहरामपुर (उड़ीसा)। नौ बरस की भूखी, पीटी जाती घरेलू नौकरानी से बदन पर जलाने के निशान
0 अमृतसर। गोद ली गई सात साल की बच्ची से पिता द्वारा बलात्कार की कोशिश, मां ने की बच्ची की हत्या
0 जयपुर। दो नवजात कन्याएं फेंकी गईं, ट्रेन के डिब्बे के शौचालय की सीट से फेंकी गई बच्ची ने रेलवे पटरी पर दम तोड़ा
0 मुंबई। सेक्स अपराधों की शिकार महिलाएं प्रताडऩा और अपमान के डर से शिकायत करने में पीछे
0 उत्तरप्रदेश। अजीत सिंह के बेटे ने महिलाओं के खिलाफ खाप पंचायत के तालिबानी फैसले का समर्थन किया
0 पूर्णिया। पे्रमी जोड़े को घर के बाहर घसीटा, रस्सियों से बांधा मारा, गर्म सलाखों से दागा
0 अहमदाबाद। इशरत जहां मुठभेड़ हत्या के जांच अफसर की कमर टूटी
0 नासिक। सोलह बरस की आदिवासी लड़की बलात्कार के बाद 23 हफ्ते की गर्भवती पाई गई
0 नई दिल्ली। तेजाब हमले की शिकार सोनाली ने इंसाफ पाने की 9 बरस लंबी  कोशिश में निराशा के बाद मरने की इजाजत मांगी
0 पाकिस्तान। दो दिन की बच्ची जिंदा दफन की
0 दक्षिण भारत। पिता ने नवजात बेटी को बदसूरत मानकर जिंदा दफन किया
0 नई दिल्ली। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बच्चियों से सर्वाधिक बलात्कार मप्र में
0 नई दिल्ली। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बच्चों से बलात्कार देश में 29.7 फीसदी बढ़े, मप्र, उप्र और महाराष्ट्र में देश भर के 44 फीसदी से अधिक
0 बिहार। अररिया जिले में महिला ने 62 रूपये में बच्चा बेचा
0 उत्तरप्रदेश। महिलाओं के बाजार जाने और फोन रखने पर रोक लगाने के खाप के खतरे का और पार्टियों, संगठनों ने समर्थन किया
0 कोरबा। गाज गिरने से महिला की मौत
हे राम ! 
हजारों बरस पहले एक पति ने अपनी समर्पित पत्नी पर जुल्म करके उसे घर से निकाल दिया था, तबसे अब तक महिलाओं पर तरह-तरह के जुल्म जारी हैं।