आज किसी कालिखपुती बात पर न लिखने की कसम है...


31 अगस्त 2012
संपादकीय
आज चाहे कुछ भी हो जाए, हमने यह तय करके रखा है कि कोयले पर, संसद-बहिष्कार पर, अन्ना-बाबा पर, या भ्रष्टाचार पर, कालिखपुती किसी भी बात पर आज नहीं लिखेंगे। इसलिए कि लगातार निराशा को देखते हुए और लगातार उस पर लिखते हुए हमारी खुद की दिमागी हालत गड़बड़ा रही है। और ऐसे में किसी भली बात को सुनने, आगे बढ़ाने और उस पर लिखने की बहुत जरूरत लग रही है। 
सारी कालिख के बीच एक छोटी सी, वैसे तो बिना अहमियत वाली, लेकिन अंधेरी सुरंग में जूगनू की तरह की खबर भारत के लिए अमरीका से आई है। दुनिया की सबसे बड़ी समाचार पत्रिका 'टाईमÓ अपने कवर पेज पर किसे जगह देती है, उसे लोग गौर से देखते हैं। और ऐसे में आज जब सत्यमेव जयते नाम के टीवी प्रोग्राम की वजह से आमिर खान को वहां लिया गया है तो यह एक राहत की बात भी है। चाहे यह कार्यक्रम हिंदुस्तान की बुराईयों की वजह से पैदा क्यों न हुआ हो, यह अपनी भीतरी बुराईयों को उसके सींग पकड़कर उससे मुठभेड़ करने वाला कार्यक्रम रहा और उससे दर्जनभर ऐसे जरूरी मुद्दों पर देश में कुछ दिनों के लिए चर्चा छिड़ी जिन्हें कि दरी-चटाई के नीचे दबाकर रखना हिंदुस्तान का उच्च-मध्यम वर्ग जरूरी समझता है। 
दरअसल धर्म में पाप के लिए प्रायश्चित के जितने रास्ते बनाए गए हैं, वे सब भी जिन सामाजिक कुकर्मों के बोझ से बरी होने के लिए कम पड़ते हैं, उन पापों पर कोई चर्चा इस देश में करना नहीं चाहते। इसलिए एक फिल्मी सितारे ने, अपनी शोहरत और राष्ट्रीयता को छूने वाली साख के साथ-साथ जब यह कार्यक्रम पेश किया, तो भारी असुविधा और हीन भावना के साथ भी, अपराधबोध के साथ भी भारत के लोगों ने इसे देखा। इस पर हम शायद दो बार पहले भी लिख चुके हैं, लेकिन भ्रष्टाचार पर दो सौ बार लिख चुके हैं, और संसद, अन्ना-बाबा पर भी दर्जनों बार लिख चुके हैं। इसलिए आमिर खान की एक कोशिश पर भी एक बार और अगर लिख दें, तो यह जगह की उतनी बड़ी बर्बादी नहीं है, जितनी कि यहां पर किसी और निराशा को एक और बार परोसने पर पाठकों के वक्त की होती, और हमारे लिखने के वक्त की होती।  
टाईम ने अपने कवर पर आमिर की तस्वीर छापी है और लिखा है कि वे बॉलीवुड के ढर्रे को तोडऩे की कोशिश में लगे हैं- भारतीय की सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाकर। क्या एक अभिनेता किसी देश को बदल सकता है। इस कार्यक्रम में  उन्होंने कन्या भू्रण हत्या, मेडिकल पेशे में कथित बेइमानी, इज्जत के नाम पर हत्या और दहेज जैसे संवेदनशील, लेकिन सोच-समझकर अनदेखे किए जाने वाले मुद्दों को उठाया था। समाज को बीच-बीच में आत्मावलोकन, आत्मविश्लेषण, आत्ममंथन, आत्मचिंतन की जरूरत होती है। और भारत या दुनिया के इतिहास में समाज सुधार का काम करने वाले लोग हमेशा ही किसी धर्म या आध्यात्म के चोले में नहीं आए, और न ही वे खादी या उस जैसी किसी और वर्दी में आए। समाज सुधार तो किसी भी तरह की शक्ल में आ सकता है और लोगों को याद होगा कि फौजियों के मनोरंजन के लिए सरहद पर लगातार जाने वाले सुनील दत्त और नरगिस ने बाद में और भी किस्म के काम किए। और आखिर के बरस तो सुनील दत्त साम्प्रदायिकता के खिलाफ देश में हजारों किलोमीटर की पदयात्रा भी करते रहे। इसलिए बिना किसी राजनीतिक मकसद के लोग अगर ऐसा करते हैं तो समाज को ऐसे ही लोगों की जरूरत है, उसे अन्ना-बाबा किस्म की भेड़ की खाल से ढंकी राजनीतिक नीयत की जरूरत नहीं है। 
टाईम पत्रिका भारत के किसी भले काम के लिए कोई सर्टिफिकेट मानी जाए ऐसी जरूरत नहीं है, लेकिन इस देश से बाहर बैठे लोग यहां के बारे में कई बार एक अधिक संतुलित विश्लेषण कर सकते हैं। हम टाईम पत्रिका के इस संपादकीय फैसले के उसी वजह से आज यहां चर्चा के लायक मान रहे हैं, और यह चर्चा उस पत्रिका की नहीं है, भारत के मुद्दों और यहां की एक पहल की है। इससे यह समझने की जरूरत है कि इन मुद्दों पर आमिर खान से परे भी हमीं लोगों को बात करनी होगी, और किसी तरह की मंदिर-मस्जिद, पूजा-प्रायश्चित से हिंदुस्तान के भीतर की यह बेइंसाफी खत्म नहीं होगी, और न ही कुकर्मों के दाग धुलेंगे। इसलिए खुलकर इस पर बात करनी चाहिए। और हमारा यह मानना है कि सत्यमेव जयते में जिन दर्जन भर मुद्दों को उठाया गया, उन मुद्दों को इस कार्यक्रम की चर्चा के बिना भी स्कूल-कॉलेज में, सामाजिक संगठनों में तरह-तरह के मौकों पर बहस का सामान बनाना चाहिए। इनसे एक फिल्मी सितारे को शोहरत मिले या न मिले, हिंदुस्तान के भीतर की इन खामियों को गालियां जरूर मिलनी चाहिए, और इस आत्मविश्लेषण के बाद ही सुधार का रास्ता शुरू होगा।

30 Aug 12


29 Aug 12


27 Aug 12


25 Aug 12


25 Aug 12


25 Aug 12


23 Aug 12


23 Aug 2012


22 aug 2012


22 aug 2012


22 aug 2012


20 aug 2012


18 aug 2012


17 aug 2012


10aug 2012


10 aug 2012


10 aug 2012


8 aug 2012


8 aug 2012


6 aug 2012


6 aug


दंगों पर अदालती फैसलों के दाग कुपोषण पर भी मोदी कमसमझ


30 अगस्त 2012
संपादकीय
भारत के अगले प्रधानमंत्री बनने की चर्चा में नरेन्द्र मोदी का नाम एक तबका बार-बार लेता है। जिन लोगों के इंसानी सरोकार बहुत कम हैं, वे लोग मोदी को देश को चलाने के लिए सबसे सही भी मानते हैं। ऐसे लोगों को कल गुजरात की एक अदालत के फैसले से कुछ सदमा पहुंचा होगा। मोदी राज के सरकारी दंगों में भागीदारी के लिए उनकी एक करीबी मंत्री भी करीब सौ हत्याओं वाले इस मामले में कुसूरवार ठहराई गई हैं। दो दर्जन लोग इन हत्याओं और दंगों के जिम्मेदार माने गए हैं, जिनको तरह-तरह से बचाने की कोशिश मोदी सरकार के नाम इतिहास में दर्ज है। लेकिन गुजरात के दंगों में वहां नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार का जो रूख रहा है, सरकार जो भागीदारी रही है, सरकार ने हजारों हत्याओं के बाद हत्यारों को बचाने के लिए अदालतों में जैसी कोशिश की है, और गुजरात से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अच्छी तरह दर्ज है, और ऐसी साजिशों को हिंदुस्तान के इतिहास ने कभी नहीं देखा था जब दंगाईयों और हत्यारों के वैचारिक-भागीदारों को ही सरकारी वकील बनाया गया था। नतीजा यह हुआ कि मुठभेड़ हत्याओं से लेकर अफसर-प्रताडऩा, और दंगों के मामलों को कमजोर करने की मोदी की साजिशों के चलते मामले गुजरात के बाहर भी भेजे गए, और सुप्रीम कोर्ट ने मानो गुजरात में सीधे अपने कैमरे लगाकर मोदी से कई किस्म के हक छीन लिए। 
लेकिन इतनी बातों में कुछ भी नया नहीं है, सिवाय मोदी की एक करीबी महिला मंत्री को कल सजा मिलने के, और इस बड़े जनसंहार का फैसला आने के। इसलिए आज मोदी पर लिखने का मकसद कुछ दूसरा है। कल नरेन्द्र मोदी ने यह कहा कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग की लड़कियां सेहत के बजाय फैशन पर अधिक ध्यान देती हैं इसलिए वे कुपोषण की शिकार होती हैं। एक इंटरव्यू में कल उनसे गुजरात में कुपोषण की कथित खराब स्थिति के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब हैरान करने वाला है। अमरीकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल  के इंटरव्यू के मुताबिक मोदी का तर्क था कि गुजरात एक शाकाहारी राज्य जहां मध्यम वर्ग का एक बड़ा तबका रहता है जिसके चलते लोग अपने सेहत का ख्याल रखते हैं। उन्होंने कहा, अगर मां अपनी बेटी से कहती है कि दूध पीयो, तो बेटी ये कहते हुए मना कर देती है कि मैं इसे पीकर मोटी हो जाऊंगी। हम इस धारणा में परिवर्तन लाना चाहते हैं। 
गुजरात की हकीकत यह है कि ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वहां के आधे बच्चों का विकास प्रभावित है और पांच बरस से कमउम्र के बच्चों का शारीरिक विकास और कद तक सेहत के पैमाने पर कम है। अब मोदी के बारे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या वे अपने राज्य के आर्थिक विकास के नारों, और शायद आंकड़ों के भी, बीच सबसे गरीब तबके को इस तरह अनदेखा कर रहे हैं? क्या पांच बरस की लड़कियां फैशन का ख्याल रखते हुए, छरहरी दिखने के लिए कम खाती-पीती हैं? देश या किसी भी प्रदेश के आर्थिक सफलता के आंकड़े वहां के समुदाय के आम हाल का सुबूत नहीं होते। भारत की पिछले बरस की मानव विकास रिपोर्ट को देखें तो गुजरात प्रति व्यक्ति ऊंची कमाई वाले राज्यों में कुपोषण का सबसे बुरा शिकार राज्य भी पाया गया। गुजरात को भूख के इंडेक्स पर प्रमुख राज्यों में तेरहवें नंबर पर जगह मिली, ओडि़शा, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम के भी नीचे। मतलब यह कि चुनिंदा कारखानेदारों और कारोबारियों की कमाई से राज्य का प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा तो आसमान तक चले जाता है, लेकिन गरीब तबके की भूख भी नहीं मिट पाती। 
किसी राज्य के विकास के आंकड़े, उसका बजट-आकार बहुत दगाबाज हो सकते हैं। लेकिन नरेन्द्र मोदी जैसे चौकन्ने मुख्यमंत्री से यह बात बड़ी अटपटी और खराब लगती है कि राज्य का कुपोषण लड़कियों के फैशन के फेर से उपजा हुआ है। कुपोषण एक ऐसे गरीब तबके की बेबसी है, जिसकी जिंदगी में दूसरों की उतरन ही फैशन होती है। और पांच बरस की उम्र में तो फैशन के लिए जागरूकता, नरेन्द्र मोदी के पसंदीदा खरबपतियों के परिवारों में भी नहीं होती होगी।

कसाब के मौके पर फांसी की सजा और माफी पर चर्चा


संपादकीय
29 अगस्त 2012
सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पर आतंकी हमले के चेहरे, पाकिस्तान से भेजे गए अजमल कसाब की फांसी की सजा बरकरार रखी है। ऐसी ही उम्मीद भी थी कि हाईकोर्ट के फैसले को बदलने की कोई नई जमीन सुप्रीम कोर्ट में निकलकर नहीं आ जाएगी और आज यही फैसला होगा। अब देश में जोर-शोर से यह बात उठेगी कि कसाब को फांसी कब दी जाएगी? केंद्र सरकार या राष्ट्रपति के सामने कसाब की रहम की अगर कोई अपील आएगी, तो उस पर ये दोनों दफ्तर कितने वक्त में फैसला करेंगे, और कसाब को कब तक जेल में रखकर लोगों की बेचैनी बढ़ाई जाएगी। कसाब के पहले के भी कुछ लोग रहम की अपील के चलते बरसों से जेल में फांसी की कतार में खड़े हैं, उनमें से कुछ लोग कुछ निजी किस्म के जुर्म के लिए मिली मौत की सजा वाले हैं और कुछ लोग संसद पर हमले में सजा पाए अफजल गुरू किस्म के हैं। अफजल गुरू को फांसी देने के लिए भारतीय जनता पार्टी सहित बहुत से लोग सरकार को घेरते हैं कि मुस्लिम वोटों के फेर में सरकार इस फांसी पर अमल करने से बच रही है, और रहम की अपील के नाम पर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति के बीच मामले को उलझाकर रखा गया है। आज ही जब यह खबर आई है, तो कुछ ही मिनटों के भीतर गुजरात की एक अदालत से यह खबर निकलकर आ रही है कि वहां के साम्प्रदायिक जनसंहार के अभियुक्त लोगों को अदालत ने बड़ी संख्या में मुजरिम करार दिया है, जिनमें से एक मोदी मंत्रिमंडल की महिला सदस्य भी रह चुकी है। ऐसे मामले में आगे-पीछे घूम-फिरकर हो सकता है कि रहम की अपील तक पहुंचें। 
भारतीय लोकतंत्र में जब कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के अलग-अलग दायरे बांटे गए हैं, तब सुप्रीम कोर्ट से दी गई फांसी की सजा पर सरकार या राष्ट्रपति को दुबारा क्यों विचार करना चाहिए, और क्यों इन्हें उस सजा को पलटने का हक मिलना चाहिए? अदालतों के जज चुनाव लड़कर नहीं आते हैं और वे जनभावनाओं के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं। दूसरी तरफ सरकार चला रहे लोग वोटों की राजनीति के रास्ते से ही सत्ता तक पहुंचते हैं और उनके लिए गए फैसले, खासकर विवेक के इस असाधारण अधिकार वाले फैसले, हो सकता है कि वोटों का ख्याल करते हुए लिए जाएं। इसलिए हमारा यह मानना है कि देश के सभी नागरिकों के साथ, मजहब और जाति, क्षेत्र और विचारधारा, इन सब के आधार पर भेदभाव के खतरे रखने वाला  यह अधिकार खत्म होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उसकी सुनाई सजा को माफ करने या बदलने का कोई हक किसी को नहीं होना चाहिए, क्योंकि न्याय की मांग यही है। अदालतों को निर्वाचन से अलग इसीलिए रखा जाता है कि वे किसी असर के तहत काम न करें। और सरकार या राष्ट्रपति, जो कि असर के इस्तेमाल से कुर्सी तक पहुंचते हैं, असर के इस्तेमाल से दुबारा कार्यकाल पाते हैं या पा सकते हैं, उनको अदालती फैसलों को पलटने का हक देना लोकतांत्रिक न्याय की भावना के ठीक खिलाफ है। 
देश वैसे भी बहुत से जरूरी मुद्दों को अनदेखा करते चलने को बेबस है, क्योंकि गैरजरूरी मुद्दों का सैलाब सुनामी की तरह देश की सोच को अपनी लपेट में ले चुका है, लिए हुए चल रहा है। ऐसे में जिंदगी और मौत को लेकर राजनीति और भेदभाव, पक्षपात और अलोकतांत्रिक विवेकाधिकार भयानक हैं। देश को आज इस गैरजरूरी सरदर्द की जरूरत भी नहीं है। अधिकारों का यह सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए और सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले के बाद किसी सजा पर कोई विचार-विमर्श नहीं होना चाहिए। 
इसके साथ-साथ हमारा यह भी मानना है कि किसी भी सरकार को, लोकतंत्र या अदालत को, मौत की सजा का हक नहीं होना चाहिए और दुनिया के बहुत से सभ्य देशों की तरह भारत को भी मौत की सजा खत्म करनी चाहिए। इस बात को हम देश में आज छाई हुई मौत और माफी की राजनीति से जोड़कर नहीं कह रहे, फांसी की सजा के आज के जितने भी हकदार हैं, उन सभी की सजा को खत्म करके, आगे मौत की सजा के प्रावधान को ही खत्म करके भारतीय लोकतंत्र को एक संवेदनशील लोकतंत्र बनने की तरफ बढऩा चाहिए। मौत की सजा बहुत ही क्रूर है, और दुनिया का इतिहास गवाह है कि बहुत से मामलों में ऐसी सजा पाकर जेल में मौत का इंतजार कर रहे लोग बेकसूर भी साबित हुए हैं। पिछले ही हफ्ते भारत के सुप्रीम कोर्ट ने, नीचे की अदालतों से फांसी की सजा पाकर ऊपर तक पहुंचे एक हत्यारे के मामले में यह पाया कि हत्या के दिन वह नाबालिग था और उसे यह सजा दी ही नहीं जा सकती थी, इस कानून के तहत उस पर यह मुकदमा ही नहीं चल सकता था। उसे नागपुर की जेल से रिहा करने का आदेश हुआ है। अब अगर यह बात फांसी दे देने के बाद साबित होती तो यह जिंदगी अदालत या सरकार, राष्ट्रपति या कानून निर्माता संसद, कौन वापिस लाकर दे सकते थे? दुनिया की सबसे काबिल जांच एजेंसी, स्कॉटलैंड यार्ड वाले ब्रिटेन में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें आधी सदी बाद जाकर अब किसी नई जांच तकनीक से यह साबित हुआ है कि उस वक्त जिसे मौत दे दी गई, वह दरअसल बेकसूर था। इसलिए लोकतंत्र को, इंसानों को मौत की ऐसी सजा देने के हक से अपने को दूर रखना चाहिए जिसे वे न तो पलट सकते, और न ही यह जिंदगी जिनकी दी हुई है। 

मोटा माल गिनाते हुए सुषमा को रेड्डी याद आ रहे थे, या नहीं?


संपादकीय
28 अगस्त 
हिन्दी के एक प्रमुख समाचार चैनल आज तक पर एक बातचीत में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके राजनाथ सिंह उस वक्त घिर गए जब उनसे बहुत तल्खी के साथ सवाल किया गया कि भाजपा के नेता चैनलों पर जाकर बहस में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन संसद में बहस का बहिष्कार कर रहे हैं, उससे बच रहे हैं। मीडिया के खुद के हिसाब से यह सवाल कुछ आत्मघाती था क्योंकि यह एक पार्टी को चैनल पर आने के लिए घेर रहा था और एक खास संदर्भ में इसकी आलोचना भी कर रहा था। लेकिन कुल मिलाकर आज देश के एक बड़े तबके के दिल-दिमाग में सवाल यह है कि संसद का बहिष्कार करके भाजपा, या उसके साथ के कुछ और दल लोकतंत्र को किस तरफ ले जा रहे हैं? हो सकता है कि वे लोकतंत्र की आज की नौबत को चुनाव में तब्दील करना चाहते हों, लेकिन संसद में यूपीए का बहुमत रहते हुए बहिष्कार करने वाले देश को एक और चुनाव में झोंकने की ताकत नहीं रखते। और चुनाव से अभी दो बरस दूर का देश इतने तेज हमलों में घिर गया है, कि जिसकी धार को दो बरस तक बनाए रखना खासा मुश्किल या नामुमकिन होगा। 
कल भाजपा की लोकसभा की नेता ने तौलकर और औपचारिक रूप से कांग्रेस पर यह आरोप लगाया कि उसे कोयले के गोरखधंधे में मोटा माल मिला है। इसका जवाब देते हुए कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि मोटा माल और छोटा माल, इसकी परंपरा भाजपा की रही है, और छोटा माल की मिसाल देने के लिए मनीष तिवारी ने भाजपा के अध्यक्ष रहते हुए लाख रूपए रिश्वत लेने वाले बंगारू लक्ष्मण को याद किया। संसद के बहिष्कार के नाजायज होने पर तो हम पिछले एक हफ्ते में एक से अधिक बार लिख चुके हैं, लेकिन आज इस छोटे और मोटे माल की कुछ चर्चा हो सकती है। सुषमा स्वराज ने जितने जोर के साथ मोटे माल की बात कही, तो उससे कर्नाटक की उनकी एक तस्वीर देश को एकदम से याद आ जाती है जिसमें वे वहां के कुख्यात रेड्डी बंधुओं के सिर पर हाथ रखे हुए खड़ी हैं, और उन्हें आशीर्वाद दे रही हैं। ये रेड्डी बंधु, या उसमें से एक, कर्नाटक में सबसे भ्रष्ट मंत्री होने के आरोप के साथ आज जेल में है, जमानत के लिए उससे दस करोड़ रूपए रिश्वत लेने वाला सीबीआई का जज भी जेल में है, और इन्हीं रेड्डी बंधुओं की अगुवाई में दसियों हजार करोड़ का लौह अयस्क घोटाला वहां के लोकायुक्त ने पाया है, और देश की सुप्रीम कोर्ट तक इन्हीं रेड्डी बंधुओं के दुस्साहस पर हक्का-बक्का है। खुद भाजपा के भीतर ये खरबपति खदान माफिया भस्मासुर की तरह ताकतवर साबित हो चुके हैं जो कि अपनी दौलत की नोंक पर आज भी भाजपा और कर्नाटक सरकार के बंधक बनाए रखते, अगर वे जेल में नहीं होते। 
अगर किसी एक कारोबारी के सबसे अधिक काले कारनामे, सबसे बड़े आर्थिक अपराध, और उसकी सबसे ताकतवर राजनीतिक कुर्सी, इन सबका अगर मेल देखें तो भाजपा के भीतर सुषमा स्वराज के वरदहस्त तले ये रेड्डी बंधु ही दिखते हैं, जिन्होंने विधानसभा के चुनाव में खर्च का पूरे देश का एक रिकॉर्ड ही कागजों से परे स्थापित किया है। इसलिए जब सुषमा स्वराज ने मोटे माल की बात को दम-खम के साथ कहा, तो उनके शब्दों के साथ इसी तरह की नैतिक ताकत नहीं थी। आज इस देश में कांग्रेस और भाजपा के बीच कम और अधिक भ्रष्ट को लेकर कोई उन्नीस-बीस या अठारह-इक्कीस जैसी बात कर ले तो कर ले, लेकिन इन दोनों में से कोई एक पार्टी ईमानदार है, क्या ऐसा भी देश का कोई भोला भी सोच सकता है? जिस एनडीटीवी सर्वे में देश में कांग्रेस के सफाए की भविष्यवाणी की जा रही है, उसी सर्वे में कांग्रेस और भाजपा के भ्रष्टाचार पर जब देश के लोगों से बात की गई तो 54 फीसदी लोग कांग्रेस को भ्रष्ट मानने वाले हैं, और 46 फीसदी लोग भाजपा को भ्रष्ट मान रहे हैं। और यह सर्वे देश के 18 राज्यों में 125 लोकसभा सीटों पर हुआ है। राज्य आधे से अधिक और सीटें एक चौथाई, जो कि पूरे देश के मिजाज को बताने के हिसाब से छांटी गई हैं। ऐसे में छोटा माल और बड़ा माल, ऐसी भाषा और ऐसी बात का क्या वजन है? 
कांग्रेस का कोयला घोटाला हो सकता है कि लाखों करोड़ तक पहुंचे, वह अभी सीएजी के एक अंदाज पर टिका हुआ पौने दो लाख करोड़ का आंकड़ा है। लेकिन अकेले कर्नाटक राज्य में भाजपा के खुद के अपने, सुषमा स्वराज के चहेते, मंत्रियों की अगुवाई में लोहा खदानों से चोरी और डकैती तो लंबी जांच के बाद लोकायुक्त में पन्द्रह-बीस हजार करोड़ की तो स्थापित की ही है, और उसके बाद गिरफ्तारी और मुकदमा शुरू हो चुका है। देश में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को ऐसा लगता है कि भाजपा के नेताओं के बीच संसद के भीतर और संसद के बाहर आपसी मुकाबले के चलते हुए अधिक आक्रामक बनने और दिखने की होड़ लगी है और उसके तहत संसद के ऐसे बहिष्कार का यह काम चल रहा है। हम ऐसा कोई अंदाज तो नहीं लगा रहे, लेकिन हम संसद के ऐसे बहिष्कार के खिलाफ हैं, और भाजपा के मोटे माल की भाषा को नैतिक-वजन वाला नहीं पाते। इस बात को कौन नहीं जानता कि छोटे और मोटे माल के लिए ये पार्टियां लगी रहती हैं, और जब, जहां जिसकी बारी लग जाए, वह कंगारू की तरह माल अंदर कर लेती हैं। लेकिन सुषमा स्वराज की आक्रामकता समझ से कुछ परे है क्योंकि उनके वरदहस्त तले के लोगों ने जो किया है, वह किसी भी एक राज्य के भीतर, किसी भी एक सत्तारूढ़ मंत्री का किया गया भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। वे पता नहीं कल कांग्रेस का मोटा माल गिनाते हुए कर्नाटक के खनिज माफिया के बारे में सोच रही थीं या नहीं? 

संसदीय लोकतंत्र को इस तरह अगुवा कर लेना एक अपराध


27 अगस्त 2012
संपादकीय
इस मुद्दे पर हम और लिखना तो नहीं चाहते थे, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की आज की हालत पर बात करने के लिए यह लिखना जरूरी है। देश के चर्चित कोयला घोटाले पर अपना बयान देने के लिए प्रधानमंत्री संसद में खड़े हुए तो विपक्ष ने उन्हें बोलने नहीं दिया। उनका बयान संसद के रिकॉर्ड में तो आ गया, लेकिन संसदीय लोकतंत्र ने इस मौके का इस्तेमाल खो दिया। यह एक भयानक हालत है जब अन्ना-बाबा जैसे अलोकतांत्रिक-तानाशाह संसद को, उसकी अहमियत को, खत्म करने के लिए पूरे देश को भड़काने में लगे हैं, ऐन उसी वक्त संसद के भीतर से भी इसकी दीवारों पर हथौड़े चल रहे हैं। हो सकता है कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा को यह मौका अगले चुनाव के तरफ देश को धकेलने के लिए ठीक लग रहा हो, लेकिन महीनों से आरोप झेलने वाले प्रधानमंत्री जब एक औपचारिक बयान देने के लिए खड़े हो रहे हैं तो सुनने के बाद उसे खारिज करना विपक्ष का हक बनता है, लेकिन उनकी बात को सुनना विपक्ष की जिम्मेदारी भी बनती है। जब देश में पौने दो लाख करोड़ के नुकसान की चर्चा के बीच मनमोहन सिंह की सरकार आरोपों और संदेहों से घिरी हुई है, उस वक्त भी अगर हजार तोहमतों का जवाब देने के लिए उन्हें संसद के भीतर मौका नहीं दिया जाता, तो यह कैसी संसदीय व्यवस्था है? 
देश में एक लोकतांत्रिक और संसदीय अराजकता खड़ी करने की कोशिश हो रही है, और यह बात अन्ना-बाबा करें वहां तक तो ठीक है क्योंकि इन दोनों का न सच पर कोई भरोसा है और न ही न्याय पर। अपने-अपने नारों को लेकर जो फुटपाथ पर रामलीला दिखाकर, जंतर-मंतर फूंककर कानून बना लेना चाहते हैं, लोकतंत्र का विकल्प बना लेना चाहते हैं, वहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी अगर ऐसे ही कारोबार में लग जाती है तो फिर यह लोकतंत्र के लिए बुरा दिन है। इस देश ने सांसदों को चुना इसलिए है कि वे संसद में जनता के प्रतिनिधि रहकर काम करें। वहां वह अपनी पार्टी के बाहुबल का इस्तेमाल करके अगर पूरी संसदीय व्यवस्था को अगुवा कर लेना चाहते हैं, तो लोकतंत्र इस बात के लिए नहीं है। हम नीतिगत रूप से संसद और किसी भी राज्य की विधानसभा के सीमित रह गए समय के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ हैं, और ऐसे हर मौके पर हमारी यही सलाह रहती आई है कि संसद विपक्ष का हक होता है और सत्ता की जिम्मेदारी। ऐसे हक को लात मारकर विपक्ष जनता को ही लात मारता है। हम अगर इस लोकतंत्र में संसदीय-विपक्ष होते तो हमारी लड़ाई सदन के वक्त को बढ़ाने के लिए होती और फिर उसके बाद उसके एक-एक पल को जनता के प्रति जवाबदेही पूरी करने के लिए होती। मनमोहन सिंह चाहे कोयला घोटाले में जेल जाने लायक हों, जब तक वे प्रधानमंत्री हैं, जब तक संसद जिंदा है, तब तक उन पर लगे आरोपों का जवाब देने का उनका हक है। और संसद को न चलने देना एक बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी है और विपक्ष को अपना यह रूख खत्म करना चाहिए। 
देश को खत्म करने के कई तरीके होते हैं। कई बार हमें यह शक होता है कि अन्ना और बाबा के आंदोलनों का इस्तेमाल चाहे वे खुद देश को सीधे खत्म करने के लिए सीधे-सीधे न कर रहे हों, वे देश को खत्म करने वाले लोगों की हसरत पूरी करने में मददगार जरूर हो रहे हैं। इसी तरह अगर भाजपा को कोयला घोटाले पर कार्रवाई चाहिए, घोटालेबाजों को जेल भेजने की उसकी नीयत है, तो उसे संसद में रात-दिन काम करके, संसद के भीतर और संसद के बाहर घोटालों को उजागर करना चाहिए।

sunil kumar @editorsunil on twitter


26 august 2012
*no-friends-around, is a great situation for learning...
*indian politics is so funny, Left is the only Right...
*i wish propagandists understand difference btvn action on hate-monger accounts, and censorship. probably dont wish 2 look in 2 dictionary.
*i support action against all hate accounts. freedom of speech can not have one law 4 print and another 4 net.
sunil kumar-if you are full of hate, that way is my gate.
*some people get so disappointed when a supreme court rejects an appeal. it is a court, not a radio station playing listener’s choice.
*new tools of history-documentation, record Silence with all fine details :-)
*if u r not abused enough, then u r probably either not correct enough, r u r not speaking enough, r may b both :-)
*indian politics proved science of nature wrong. a diamond called manmohan singh turned in to coal under pressure.
*youngster’s common abuse comes 2 mind, when i look 8 Hindi tv Reality shows. all designed 2 take people away from Harsh Reality of life.

बिना नए मुद्दे पुरानी फितरत दिखाकर शहरी जिंदगी को तबाह न करें


26 अगस्त 2012
संपादकीय
कल से दिल्ली की खबरें आ रही थीं कि पुलिस के कहने पर वहां मेट्रो के छह स्टेशन बंद कर दिए जा रहे हैं ताकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के घर के घेराव की अरविंद केजरीवाल की मुनादी से निपटा जा सके।  कितनी भीड़ से किस जगह कैसे निपटा जाए यह स्थानीय प्रशासन और पुलिस का नजरिया होता है, और किसी भीड़ के बेकाबू होने से क्या होता है यह अयोध्या से लेकर पिछले हफ्ते की मुंबई तक, देश में जगह-जगह दर्ज है। सरकार के साथ अन्ना हजारे के साथियों का जिस तरह का टकराव चल रहा है उसे देखते हुए यह मानना कुछ लोगों को जायज लग सकता है कि इस प्रदर्शन को रोकने के लिए कई स्टेशनों पर मेट्रो को ही रोकने की तैयारी की गई थी, लेकिन प्रदर्शन से स्थानीय लोगों को जिस तरह की दिक्कत होती, प्रदर्शनकारियों को काबू करने में किस तरह का खतरा हो सकता था, इसके अंदाज को हम पूरी तरह खारिज करना नहीं चाहते। और किसी भी पार्टी की सरकार देश या किसी प्रदेश में जब रहती है, तो वह प्रदर्शनों से अपने हिसाब से निपटती है। इसलिए सूने पड़े हुए मीडिया पर अगर केजरीवाल का आज का आंदोलन बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है, तो देश में असल मुद्दों पर जगह-जगह इतने आंदोलन होते हैं कि उनका महत्व बरसों से दिल्ली में दुहराए जा रहे आंदोलनों से अधिक होता है, यह एक अलग बात होती है कि उनको राजधानी में तैनात कैमरे नसीब नहीं होते।
केजरीवाल के आज के आंदोलन को सरकार ने कुचला है या हर आंदोलन के साथ हर जगह ऐसी ही बचाव की तैयारी होती है, यह बहुत साधारण समझ-बूझ और साधारण जानकारी की बात है। अब सवाल यह होता है कि पिछले बरसों में हर किस्म के आंदोलन बार-बार करके, उसी बात को बार-बार उठाकर जब पिछली बार का आंदोलन अन्ना-टोली ने खत्म किया और इसके बाद राजनीतिक दल बनाने की घोषणा की गई, चुनाव में उतरने की घोषणा की गई, तो आज ऐसा कौन सा नया मुद्दा सामने आया जिसे लेकर केजरीवाल पहले आंदोलन नहीं कर चुके हैं, और आज एक नए प्रदर्शन का मौका है? किसी भी देश-प्रदेश में क्या सरकार का काम ऐसे पेशेवर हो चुके प्रदर्शनकारियों से ही रात-दिन जूझना है, या दूसरे काम भी करना है? क्या बारिश में डूबी दिल्ली को ऐसे किसी एक आंदोलन को बरसों तक झेलना जरूरी है जो कि हर बार उन्हें मिली इजाजत को तोड़कर शहरी जिंदगी को अस्त-व्यस्त करते आया है? इस आंदोलन के पीछे की वजहें जायज हो सकती हैं, लेकिन इस आंदोलन, और इस तरह के किसी भी दूसरे आंदोलन का एक तर्कसंगत, न्यायसंगत आधार भी होना चाहिए। किसी आंदोलन से निपटने का इंतजाम मुफ्त में नहीं होता है, और शहर के लोगों की अपनी जिंदगी में आंदोलनों की तकलीफ को झेलने के अलावा भी बहुत सी तकलीफें रहती हैं। इसलिए चाहे मुंबई में मुस्लिम समाज का आंदोलन हो, चाहे कहीं और रेल रोको हो, या फिर राजधानी में आंदोलन करने के लिए ओवर टाईम कर रहे केजरीवाल का जत्था हो, यह समझना जरूरी है कि आंदोलनकारियों के अलावा भी बाकी जनता के अपने नागरिक अधिकार हैं।
देश की सरकार, यहां की पुलिस के जिम्मे बहुत से ऐसे काम और भी हैं, जिनके लिए सरकारी अमला कम पड़ता है। अदालतों से विचारधाराधीन कैदियों को इलाज के लिए अस्पताल नहीं ले जाया जा पाता क्योंकि पुलिस कम पड़ती है। उनको अदालत में पेशी पर ले जाने के लिए पुलिस नहीं रहती, इसलिए बरस-दर-बरस विचाराधीन कैदी सलाखों के पीछे रहते हैं, जबकि उनके मामलों में अधिकतम सजा शायद महीनों की ही हो सकती है। भ्रष्टाचार किसी एक सरकार की अनोखी खूबी नहीं है। वामपंथियों को छोड़कर बाकी तमाम सरकारों में अलग-अलग दर्जे के भ्रष्टाचार के मामले सामने हैं। ऐसे में क्या हर राजधानी में बारहमासी आंदोलन चलते रहें? यह सिलसिला खराब है। पिछले एक-दो बरस में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों को केंद्र सरकार ने जितना सुना है, उतने वक्त में देश के बहुत से दूसरे तकलीफजदा तबकों की बात भी सुनी जा सकती थी, सुनी जानी चाहिए थी। एक आंदोलन की एक ही कागजी बात को हजारवीं बार दिखाना मीडिया की अपनी सोच-समझ हो सकती है, लेकिन देश की सरकार का पूरा वक्त इसी धंधे में निकल जाना ठीक नहीं है। 
हमारा यह भी मानना है कि अन्ना और बाबा ने अपने आंदोलनों को घोर राजनीतिक बनाकर देश के सामाजिक आंदोलनों की साख चौपट की है। इसलिए अब अन्ना-टोली को अपनी घोषणा के मुताबिक चुनाव लडऩा चाहिए और वहीं अपनी बात रखनी चाहिए। फिलहाल उन्हें देश को चैन से जीने देना चाहिए, कम से कम शहर की सड़कों पर बिना नए मुद्दे सिर्फ पुरानी फितरत दिखा-दिखाकर शहरी जिंदगी को तबाह करना बंद करना चाहिए।

कुदरत की दी हुई दौलत और ताकतवर इंसानों की नीयत...


25 अगस्त 12
संपादकीय
एक तरफ जब दिल्ली से लेकर खनिज प्रदेशों तक यह आग लगी हुई है कि कोयले के घोटाले में अकेली केंद्र सरकार जिम्मेदार है, या फिर राज्यों ने भी नीलामी का विरोध करते हुए खदानों को चुनिंदा लोगों को देने का काम किया था, तब यह नीति अनदेखी रह जा रही है कि किस तरह देश की जनता के हक की खदानें एक-एक करके कारखानेदारों को जा रही हैं। चाहे कोयला हो, चाहे लोहा हो या फिर कोई और खनिज, इनमें से किसी का भी दाम इनसे बनने वाले सामानों के अनुपात में तय नहीं होता है और खदानों को या खनिजों को बहुत रफ्तार से ठिकाने लगा देने का काम देश भर में चल रहा है। 
इस बारे में होना तो यह चाहिए कि खनिजों को सोच-समझकर ही निकाला जाए, सरकार खुद यह काम करे, खनिजों के दाम को उससे बनने वाले सामान के बाजार भाव के मुताबिक कम-अधिक करने का एक अनुपात तय हो। आज तो हालत यह है कि जिस कारखानेदार को खदान मिल जाती है, वह मालामाल हो जाता है, और बाकी कारखाने के सामने एक गैरबराबरी का बाजार-मुकाबला खड़ा हो जाता है। यह बात भी समझ से परे है कि कोयले और लोहे की खदानों को ऐसे लोगों को क्यों दिया जा रहा है जो कि अपने इस्तेमाल से परे उसे खुले बाजार में बेच रहे हैं, खुद का कारखाना न लगाकर केवल धंधा कर रहे हैं। ऐसे कुछ खदान मालिक देश के बाहर भी खनिज भेज रहे हैं, और उनकी गुंडागर्दी का हाल यह है कि दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट उनके इस दुस्साहस पर हक्का-बक्का रह गया था कि किस तरह से कर्नाटक में जब्त पड़ा हुआ लौह अयस्क भी बाहर भेज दिया गया। 
हम अभी कोयले की खदानों या किन्हीं और खदानों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच के झगड़े की बारीकियों में जाना नहीं चाहते क्योंकि रोजाना कुछ नए कागज सामने आ रहे हैं। लेकिन एक बात जो तय है, वह यह कि जनता का हक पूरे देश में बुरी तरह से लूटा जा रहा है और यह सिलसिला बंद होना चाहिए। आज से देश में इतनी गैरबराबरी खड़ी हो गई है कि एक कारखानेदार कुबेर बन गया है, और उसके नीचे लाख-लाख लोग सिर्फ सिर पर टोकरा ढोने की ऊंचाई तक पहुंच पा रहे हैं। यह सिलसिला अगर बंद नहीं हुआ तो गरीबों के बीच की बेचैनी अच्छी बड़ी-बड़ी पार्टियों को उखाड़ फेंके गी। पिछले कुछ बरसों में देश में सूचना का अधिकार आया, अदालतें सरकारों पर पहले के मुकाबले अधिक खुलकर कार्रवाई करने लगीं, और अन्ना-बाबा जैसे लोग कुछ मुद्दों को उठाने में कामयाब रहे, और देश में आमतौर पर बेअसर रहने वाला मध्यम वर्ग भी चाहे एक प्रतीक के रूप में ही सही, भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर कुछ घंटों के लिए तो उतरा ही। ऐसे में यह बात तय है कि खदानों की बंदरबांट और खनिजों का मिट्टी के दाम पर बेचना, बेचैनी बन चुका है और लोग इसके पीछे के धंधे को देख पा रहे हैं। 
पूरे देश में खदानों के इलाकों में नक्सली पैर जमा चुके हैं, और उनकी पकड़ कमजोर होने का नाम नहीं ले रही है। जब तक कुदरत की दी हुई दौलत को ताकतवर तबका अपनी जेब में भरता चलेगा, तब तक बिना जेब वाले गरीब लोग या तो नक्सलियों के साथ जाएंगे, या एक दिन ऐसा आएगा जब खदानों से कमाने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों को वे पूरी तरह खारिज कर देंगे। अन्ना की पार्टी चुनाव जीत सके या नहीं यह एक अलग बात रहेगी, लेकिन अगर वह कुछ हद तक भी ईमानदार रही, तो वह हर किस्म की बेईमानी को उजागर करने में कामयाब हो सकती है। आज सत्ता पर, जो जहां बैठे हैं, उनके आत्ममंथन का समय है। 


हिंसा, नफरत, आतंक फैलाने की आजादी कैसे लोकतांत्रिक?


24 अगस्त
संपादकीय
भारत में अफवाहों की वजह से बढ़े हुए तनाव के बाद जब संसद में यह राय सामने आई कि भड़काने वाली वेबसाइटों पर रोक लगाई जाए, तो आजादी के हिमायती लोगों की तरफ से यह हंगामा शुरू हुआ कि सरकार सेंसरशिप लागू कर रही है। लोकतंत्र के तहत अभिव्यक्ति की जिस स्वतंत्रता का इस्तेमाल करके लोग अपनी बात कहते हैं, अखबारों में लिखते हैं या इंटरनेट पर डालते हैं, वह स्वतंत्रता कुछ नियमों के साथ-साथ मिली हुई है। इस देश में अखबारों को लिखने की पूरी आजादी है लेकिन उनके लिखे हुए को लेकर वे जवाबदेह भी रहते हैं, और आए दिन अदालती कार्रवाई भी झेलते हैं, क्योंकि किसी को यह लगता है कि अखबार ने उसकी मानहानि की है, तो उसके लिए कानूनी ईलाज देश में मौजूद है। लेकिन दूसरी तरफ इंटरनेट की तकनीक का अपना एक ऐसा मिजाज है जो कि बेकाबू जंगली घोड़े की तरह का है, और उस पर लगाम लगाना आसान नहीं है। इसलिए भारत के प्रधानमंत्री के नाम से दर्जन भर ट्विटर अकाउंट खुल जाते हैं, उन पर प्रधानमंत्री की तस्वीर लग जाती है और पहली नजर में लोग धोखा खा सकते हैं कि यह बात मनमोहन सिंह ही लिख रहे हैं। और बात सिर्फ राजनीति या प्रधानमंत्री की नहीं है, इंटरनेट पर ट्विटर से लेकर फेसबुक तक हर प्रमुख व्यक्ति के ढेरों फर्जी अकाउंट बन जाते हैं और कहीं जावेद अख्तर को इस बात का खुलासा करना पड़ता है कि उनका फेसबुक अकाउंट नहीं है तो कहीं किसी और को। 
सिर्फ इसलिए कि इंटरनेट, कम्प्यूटर और संचार तकनीक तक पहुंच के लिए एक आय वर्ग का होना जरूरी होता है, आमतौर पर शिक्षित और शहरी होना भी शायद जरूरी होता है, इसलिए इसे एक अलग कानूनी रियायत दी जाए यह फिजूल की बात है। और जिसके पास न बिजली है, न फोन है, न कम्प्यूटर है, उसके पढऩे के अखबार पर तमाम कानूनी शर्तें लागू रहें, यह एक संपन्न और शहरी सोच है। जो भी जगह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देती है, वहां पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। हम रात-दिन इंटरनेट पर सैकड़ों ऐसी वेबसाइट देखते हैं जो कि गालियों की जुबान में लोगों के खिलाफ, उनके चाल-चलन को लेकर, उनके मां-बाप को लेकर झूठी बातें लिखती हैं। बनाई हुई और गढ़ी हुई तस्वीरें, सही बताते हुए चारों तरफ फैलाई जाती हैं। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे ताकतवर व्यक्ति, जिन्हें कि सुप्रीम कोर्ट में रोज जगह मिलती है, वे भी ट्विटर पर अपनी सबसे नापसंदीदा सोनिया गांधी की तरफ इशारा करते हुए उन्हें विषकन्या लिखते हैं और उनके इर्द-गिर्द के लोगों के लिए गालियां लिखते हैं। इसकी एक सीमा है और इसके खतरे भी सीमित है। लेकिन जब साम्प्रदायिक दंगा फैलाने की नीयत से, हिंसा और नफरत फैलाने की नीयत से, आतंक फैलाने और लाशें गिरवाने की नीयत से, फिल्में गढ़कर, तस्वीरें गढ़कर, खबरों की कतरनें गढ़कर उसे फैलाया जाता है, तो उस पर रोक लगनी ही चाहिए। अभिव्यक्ति की ऐसी किसी स्वतंत्रता को जगह नहीं मिल सकती जो कि दूसरे लोगों की जान लेने की नीयत रखती हो, और उसके लिए जुटी हुई हो। 
ऐसी किसी बदमाशी वाली चीज को रोकना, सेंसरशिप नहीं है, एक संभावित अपराध के खिलाफ वह कानून के तहत कार्रवाई है। सेंसरशिप किसी बात को रोकने के लिए होती है, लेकिन जब कोई जुर्म होते हुए दिखता है तो कानून अपना काम करता है, फिर चाहे वह अखबार हो या इंटरनेट हो। एक अखबारनवीस की हैसियत से हमको यह भी जरूरी लगता है कि अभिव्यक्ति की जिम्मेदार स्वतंत्रता और गैरजिम्मेदार स्वतंत्रता के बीच एक फर्क होना चाहिए। और जब गैरजिम्मेदारी किसी जुर्म की हद तक बढ़ जाए, तो उसके सुबूतों को दर्ज करके उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। जिसके बिना अभिव्यक्ति की जिम्मेदार स्वतंत्रता दिखाने वाले लोगों का महत्व भी समाज में खत्म हो जाएगा। मीडिया के खिलाफ भी बहुत से मौके ऐसे आते हैं जब टीवी चैनलों पर रोक लगती है, किसी पत्र-पत्रिका के अंक जब्त होते हैं, या उसके संपादक-प्रकाशक को गिरफ्तारी झेलनी पड़ती है। लेकिन जब तक पहले से किसी अभिव्यक्ति को रोका नहीं जाए, वह सेंसरशिप नहीं है। और सिर्फ पढ़े-लिखे, शहरी और कम्प्यूटर-जानकार लोगों के लिए अलग से कोई कानूनी रियायत नहीं हो सकती। इंटरनेट का मिजाज ऐसा है जो कि लोगों को इस झांसे में रखता है कि वहां वे बेनाम रहकर, गुमनाम रहकर, जितनी चाहे उतनी नफरत और हिंसा फैला सकते हैं, दूसरों पर कीचड़ उछाल सकते हैं। लोकतंत्र का ऐसा मतलब किसी भी कोने से नहीं होता और लोग अपने कहे, लिखे, टाइप किए हुए हर शब्द के लिए कानून के प्रति जवाबदेह तो रहेंगे ही। वे अपना काम करते हैं, और जब कानून अपना काम करता है, तो कानूनी कार्रवाई सही है या नहीं है, इसे तय करने के लिए अदालत तो रहती ही है।

sunil kumar @editorsunil on twitter


*i do not believe in death as a solution, but then there are some people, nature should take back.
*dear silent sensibles, history documenting your silence in d middle of violence & trouble all around when vocal violents r doing overtime.
*every few years, something or other happens and i feel ...it was only my mistake, i should have expected such an honesty only from a dog...,
*a device 2 wipe floor, clean potty, pack things, floor cover 2 sit, push fly away, fan, knowledge, entertain, just Rs. 2 ! a newspaper.
*at times it is easier to prove a point, but then it is more important to prove that you wish to remain friend. :-)
*many people comment as if borders are more important to them, then the earth. my sympathies.
*if Ekta Kapoor’s Hindi serials(soaps) would b off air 4 a week, millions indian women would lose life without such torture, pain, suffering.
*is BJP demand 4 resignation of manmohan singh, backed and promoted by some Congress leaders from behind the curtain :-)
*paid or unpaid people tweeting 4 propaganda, pls select party/organisation flags as your pix.

कदम-कदम पर सरकारी भ्रष्टाचार और तुरंत कड़ाई की जरूरत


23 अगस्त
संपादकीय
इस वक्त बिलासपुर में सीबीआई का एक छोटा अधिकारी रिश्वत लेते गिरफ्तार हुआ है। उसे केन्द्रीय सतर्कता अधिकारियों ने रंगे हाथों पकड़ा है। कुछ महीने ही हुए हैं कि रायपुर में आयकर विभाग के एक से अधिक अधिकारी रिश्वत लेते पकड़ाए। और यही हाल देशभर में चल रहा है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारी आए दिन पकड़ा रहे हैं, उनके घरों पर अनुपातहीन संपत्ति के लिए छापे पड़ रहे हैं, और कहीं से 25-50 करोड़ मिल रहे हैं, तो मध्यप्रदेश में एक आईएएस जोड़े से सैकड़ों करोड़ का हिसाब और जायदाद बरामद हुए। 
यह हालत भयानक इसलिए है कि सरकार में जब कोई रिश्वत लेकर किसी को रियायत देता है, तो वह रियायत रिश्वत के कई गुना अधिक होती है। बहुत से मामलों में जहां काम या सामान की क्वालिटी घटिया रखकर रिश्वत से काम चला लिया जाता है, वहां पर मामला और गड़बड़ होता है। घटिया सामान से सप्लायर या ठेकेदार को चाहे जो बचत होती हो, उस क्वालिटी की वजह से वैसे सामान या निर्माण समय के पहले दम तोड़ देते हैं और सरकार का लंबा-चौड़ा नुकसान उससे होता है जो कि अफसर-ठेकेदार की मिली हुई कमाई से बहुत अधिक होता है। कई बरस हुए छत्तीसगढ़ में सड़कों में इस्तेमाल हुए घटिया डामर को लेकर कुछ करोड़ रूपए की वसूली ठेकेदारों से निकाली गई, लेकिन सड़कें घटिया होने का नतीजा यह हुआ कि पूरी सड़कें तबाह हो गईं और उनकी पूरी लागत ही गड्ढे में चली गई। मतलब यह कि सरकार को नुकसान पहुंचाकर जो कमाई होती है, नुकसान उससे बहुत अधिक होता है। 
सरकार में जो आम बात हर कोई जानते हैं, वह यह है कि गैरजरूरी सामान खरीद लिए जाते हैं क्योंकि उनका सप्लायर सरकार को बहुत अधिक कमीशन देता है। ऐसा पूरे का पूरा खर्च फिजूल जाता है क्योंकि ऐसे बहुत से सामान कभी बक्सों से नहीं निकलते। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य विभाग में सैकड़ों करोड़ की ऐसी खरीदी हुई जिसमें गैरजरूरी मशीनें, गैरजरूरी सामान ले लिए गए, और ये नकली भी थे, या घटिया थे, गैरजरूरी थे, उनके इस्तेमाल की कोई योजना नहीं थी, और उनके खुलने की नौबत आने के पहले ही सारे मामले जांच और अदालत तक पहुंच भी गए। इस तरह सबसे गरीब और जरूरतमंद लोगों के हक मारकर भी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोग ऐसी कमाई करते हैं जो कि बहुत सी जिंदगियों की कीमत पर ही होती है। इसी तरह केन्द्र सरकार की योजनाओं का हाल होता है। उनके तहत राज्यों को जो हजारों करोड़ मिलते हैं, उनको किस तरह मिल-बांटकर खा लिया जाता है इसकी मिसाल उत्तरप्रदेश में पिछले बरसों में लगातार सामने आ रही है जिनमें अफसरों की हत्याएं भी हुई हैं और अफसरों ने आत्महत्याएं भी की हैं। जब पूरे देश को लोग भ्रष्ट मान रहे हैं, तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है। जिस तरह हर कोना दिखते ही हिन्दुस्तानी लोगों को थूकने का मन करने लगता है, आड़ दिखते ही लोग पेशाब में जुट जाते हैं, उसी तरह कमाई का मौका दिखते ही लोग यह भूल जाते हैं कि ईमानदारी भी कोई चीज है, या बेईमानी की कमाई से कितने सौ-पचास गुना नुकसान देश का हो रहा है। 
इस नौबत में देश और प्रदेशों को भ्रष्टाचार, बेईमानी और रिश्वतखोरी पर नजर रखने के लिए अधिक असरदार, अधिक ताकतवर, अधिक बड़ी निगरानी एजेंसियों की जरूरत है, जांच एजेंसियों की मजबूती की जरूरत है, भ्रष्ट लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत देने का हक सरकार से छीन लेने की जरूरत है, और तेज रफ्तार अदालतों की जरूरत है। हमारा यह भी मानना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में जो अफसर पकड़ाते हैं, उन्हें सरकारी कामकाज से बाहर कर देना चाहिए और उन्हें किसी अधिकार की कुर्सी पर नहीं बैठने देना चाहिए। दूसरी बात यह भ्रष्टाचार की निगरानी रखने के लिए निगरानी एजेंसियों को सरकारी दफ्तरों और टेलीफोन पर नजर रखने के नए अधिकार मिलने चाहिए और खुफिया कैमरों जैसी तकनीक का खुलकर इस्तेमाल सरकारी दफ्तरों में करना चाहिए। केरल के एक मुख्यमंत्री ने अपने दफ्तर में कैमरे लगवाकर उन्हें इंटरनेट पर प्रसारण के लिए शुरू करवा दिया था, पता नहीं उससे सरकार पर वहां क्या असर पड़ा, लेकिन हर प्रदेश को अपनी नई मौलिक तरकीब निकालनी चाहिए जिसके कामयाब होने पर बाकी राज्यों में भी उस पर अमल हो सके। एक आखिरी बात इस सिलसिले में यह कि भ्रष्ट लोगों की संपत्ति को जब्त करने के लिए असरदार कानून बनाना चाहिए। आज देश की संसद भ्रष्टाचार को लेकर ठप्प पड़ी हुई है, लेकिन भ्रष्टाचार पूरे देश में बिखरा हुआ है, कहीं कम और कहीं अधिक। इस बारे में अगर कोई सबक लेेना हो तो बंगाल की वामपंथी पार्टियों से लेना चाहिए जिनके दशकों के निरंतर राज के बाद भी कोई चर्चित भ्रष्टाचार इतिहास में दर्ज नहीं हुआ। 

sunil kumar@ editorsunil on twitter


21 aug2012
*i do not believe in death as a solution, but then there are some people, nature should take back.
*dear silent sensibles, history documenting your silence in d middle of violence & trouble all around when vocal violents r doing overtime.
*no country becomes better because its people think it better than other countries. it becomes better only if its people r better

संसद के खिलाफ खड़ी की जाती हिकारत सही लगने लगती है...

22 अगस्त 2012
संपादकीय
कोयला घोटाले को लेकर संसद के दोनों सदन थम गए हैं। एक तरफ भाजपा है जो कि प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग रहे हैं और दूसरी तरफ कांगे्रस पार्टी है जिसके मंत्री जाकर राज्यसभा के ताजा-ताजा बने उपसभापति से सदन की कार्रवाई को दिन भर के लिए स्थगित कर देने को कह रही है, और कार्रवाई स्थगित कर भी दी गई। देश की सबसे बड़ी पंचायत, देश के सबसे बड़े भ्रष्टाचार पर बात करने के बजाय थमी पड़ी है, और उसका यह वक्त लौटने वाला भी नहीं है। पिछले कुछ बरसों में संसद के बहुत से कामों को सड़क पर करने की जिद अन्ना से लेकर बाबा तक, इस किस्म के बहुत से लोगों ने की है, और देश के अनगिनत जंगलों में नक्सलियों ने पूरी की पूरी संसद को ही खारिज कर दिया है। तो अब देश के सामने बातचीत की जगह कौन सी बची है? राज्यों में विधानसभाएं इसी तरह का बर्ताव देख रही हैं, कि लोग, निर्वाचित लोग किसी जरूरी मुद्दे पर तैयारी के साथ, तर्क के साथ बहस करने के बजाय अपने मतदाता वर्ग को सहलाने के लिए हंगामों में लगे रहते हैं और सदन छोड़कर बाहर जाते रहते हैं। यही हाल संसद देख रही है। प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग करना एक बात है, यह मांग हम अपने इसी कॉलम में पिछले करीब दो बरसों से कर रहे हैं जब से यह बात साफ हो गई कि मनमोहन सिंह ने अपने मातहत चल रहे भ्रष्टाचार को कोशिश करके अनदेखा किया और अपने हाथों पर दस्ताने पहनकर यह साबित करने की कोशिश की कि उनकी उंगलियों के निशान तो किसी भी मौका-ए-वारदात पर नहीं है। इस मांग को आज बहुत देर से उठाकर भाजपा सोनिया गांधी पर निशाना लगाने की संभावना के इंतजार को अब खत्म कर रही है। वरना कोई भी जिम्मेदार विपक्ष मनमोहन सिंह से जमाने पहले से इस्तीफा मांग चुका होता। भाजपा की आज की यह मांग, अब जाकर सिर्फ टू लिटिल, टू लेट ही कही जा सकती है। 
और सुबह से सोच-समझकर भूली हुई यह पार्टी अब शाम को घर लौट रही है तो लौटते ही हंगामा कर रही है। मनमोहन सिंह से इस्तीफे की मांग करते हुए संसद में बहस के वक्त को खत्म कर देना देश के साथ बहुत बड़ी ज्यादती है। संसद हो या राज्यों की विधानसभाएं हों, जवाबदेही से बचने के लिए सत्ता तो यह चाहती ही है कि सदन न चले, सदन की कार्रवाई के दिन कम से कम हों। लेकिन विपक्ष के लिए यही सदन एक ऐसा मौका होता है, एक ऐसा ठिकाना होता है, जहां पर सरकार उसे कोई भी जानकारी देने से मना नहीं कर सकती। यह जानकारी सदन की चर्चा में न भी आए, तो भी सरकारी फाईलों से निकलकर बाहर तक आ जाती है जिसका सदन के बाहर भी इस्तेमाल विपक्ष कर सकता है। हमारा तो यह साफ मानना है कि एक जिम्मेदार विपक्ष को किसी भी लोकतंत्र में सदन के पल-पल का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सरकार अपने कुकर्मों को लेकर घिर जाए, घिरी रहे, और जनता के सामने उसके कुकर्म उजागर हों। कल जिस तरह राज्यसभा में सरकार के संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला जाकर नवनिर्वाचित उपसभापति से दिन भर सदन स्थगित कर देने को कहते हुए पकड़ाए, और उसके बाद उनकी फरमाईश पर सदन स्थगित हो गया, इसे हम एक बहुत ही अलोकतांत्रिक, असंसदीय और अनैतिक नौबत मानते हैं। इससे देश की संसद के इस उच्च सदन का सम्मान घटा है। इसे लेकर न सिर्फ इस मंत्री वाली सरकार को अपने संसदीय बर्ताव के बारे में सोचना चाहिए बल्कि सत्तारूढ़ कांगे्रस पार्टी से आए हुए नए उपसभापति को भी सोचना चाहिए कि इस घटना से उनके और सदन के सम्मान पर आंच आई है, या नहीं? इस घटना से नक्सल कब्जे के जंगलों से लेकर, जंतर-मंतर और रामलीला मैदान तक संसद के खिलाफ खड़ी की जा रही हिकारत सही लगने लगती है। इसे मंत्री की सलाह, और उसे मानने, न मानने के उपसभापति के अधिकार जैसे तकनीकी बचाव की ढाल से बचाने की कोशिश बेकार है क्योंकि देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन में अगर अदालती जिरह में मुजरिम के बचाव जैसे कानूनी दांवपेंच इस्तेमाल किए जाएंगे तो उससे इसकी इज्जत नहीं बढ़ेगी। 
और जब सरकार की कोशिश यह है कि सदन न चले, तो उसी समय भाजपा भी सरकार-विरोधी रूख दिखाते हुए, प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगते हुए, इसी कोशिश में मदद कर रही है, तो यह पूरी तरह से गलत फैसला है, और भाजपा को चाहिए कि वह सदन में ओवरटाईम करे, कार्रवाई का समय बढ़ाने की जिद करे, दिन बढ़ाने की जिद करे, और सदन के पल-पल का बखूबी इस्तेमाल करे। संसद के ये अलग-अलग हिस्से लोगों को बुरी तरह निराश कर रहे हैं, और ऐसे में जब लोग अलोकतांत्रिक और तानाशाह अन्ना-बाबा या नक्सलियों के साथ हमदर्दी और अधिक करने लगेंगे तो नुकसान पूरे देश का होगा। 

235 एकड़ जंगल फर्जी पट्टे बना 50 करोड़ में बेचा


माइनिंग कंपनी को फायदा पहुंचाने पूर्व कलेक्टर, डीएफओ भी फंसे
राजस्व मंडल में भी हुआ खेल अब निरस्त करवाने रिवीजन
शशांक तिवारी
रायपुर, 21 अगस्त। सरगुजा जिले के रामचंद्रपुर इलाके में करीब 50 करोड़ के जमीन घोटाला मामले की जांच पूरी हो गई है। सरकारी और घने जंगल की जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेचने की अनुमति देने के लिए तत्कालीन कलेक्टर जी.एस.धनंजय को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस मामले में डीएफओ और एसडीएम के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। राजस्व बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष टी.राधाकृष्णन ने जमीन को फर्जी पट्टे पर चढ़ाने की अनुमति दी थी। इस मामले में रेवेन्यू बोर्ड में रिवीजन केस दायर किया जा रहा है। 
जमीन घोटाले पर सरकार ने सरगुजा कमिश्नर से जांच रिपोर्ट मांगी थी। कमिश्नर एम.एस.पैकरा ने अपनी रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। रामचंद्रपुर  ब्लॉक के इंदरपुर में कोल ब्लॉक के लिए 94 हेक्टेयर (करीब 235 एकड़) सरकारी जमीन निजी कंपनी फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड को बेच दी गई। घोटाले का मास्टर माइंड लालजी यादव को बताया गया है। कमिश्नर ने जांच के बाद यादव समेत पटवारी, नायब तहसीलदार, उप पंजीयक सहित अन्य दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के भी निर्देश दे दिए हैं। जमीन बेचने की अनुमति निरस्त करने के आदेश कलेक्टर को दिए गए हैं। 
बताया गया कि इस मामले की जांच के लिए जल संसाधन मंत्री रामविचार नेताम ने भी अनुशंसा की थी। मुख्य सचिव सुनील कुमार ने भी स्थानीय नेताओं की शिकायत पर राजस्व विभाग से रिपोर्ट मांगी है। कमिश्नर श्री पैकरा ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में बताया कि उन्होंने जांच रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। सूत्रों के मुताबिक तत्कालीन कलेक्टर धनंजय के अलावा तत्कालीन डीएफओ वी.एस.ध्रुव, एसडीएम राठौर को गलत तरीके से अनुमति देने के  मामले में जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराया गया है। यह बताया गया कि पट्टा 34 लोगों को 1972 में आबंटित किया जाना बताया  गया। जबकि उक्त प्रकरण तहसील कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। 
राजस्व पट्टा को देखने से यह पता चलता है कि पुराने दस्तावेज हासिल कर नाम चढ़ाए गए हैं। जबकि वर्ष 72 में राजस्व पट्टे के दस्तावेज अलग तरीके के थे। जिन लोगों के नाम से पट्टे जारी किए गए उनमें से कई लोग उस वक्त पैदा भी नहीं हुए थे। यह भी पता चला है कि कथित पट्टाधारी लोगों में से कई पड़ोसी राज्य झारखंड के रहवासी हैं। सूत्र बताते हैं कि फर्जी तरीके से खरीद-बिक्री में जिला प्रशासन के ऊपर से नीचे तक तमाम अफसरों की भूमिका रही है। कथित पट्टाधारियों ने नायब तहसीलदार के यहां जमीन बेचने के लिए अनुमति मांगी।
नायब तहसीलदार ने जांच कर प्रतिवेदन कलेक्टर को भेज दिया और कलेक्टर ने जमीन बेचने की अनुमति दे दी। दिलचस्प बात यह है कि पट्टे की जमीन बेचने की अनुमति देने के मामले में कलेक्टर ही अधिकृत होते हैं। नायब तहसीलदार को अपने यहां प्रकरण दर्ज करने का भी अधिकार नहीं होता। लेकिन इस मामले में प्रक्रिया उलट दी गई। तत्कालीन डीएफओ ने अपनी रिपोर्ट में जमीन वृक्षारोपण योग्य बता दिया था। जबकि उसके बड़े हिस्से में अभी भी सघन वन है। इसे बेचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 
यह बात सामने आई है कि जमीन एसकेएस इस्पात को बेचने की कलेक्टर ने अनुमति दी थी। लेकिन फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड के नाम से रजिस्ट्री कर दी गई। इस पूरे मामले में उप पंजीयक को भी दोषी ठहराया गया है। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश कमिश्नर द्वारा पहले ही दिए जा चुके हैं। 
फर्जी पट्टे बनाकर जंगल की जमीन को बेचने के इस षडय़ंत्र के खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है। 235 एकड़ जमीन को मात्र 50 करोड़ रुपए में बेच दिया गया है जबकि इस जमीन पर करोड़ों के सिर्फ पेड़ ही हैं। यह कोल ब्लाक एसकेएस इस्पात और प्रकाश इण्डस्ट्रीज को आबंटित हुआ है। जमीन की इस अफरा-तफरी के खुलासे से अधिकारी भी भौंचक हैं। इस मामले में प्रारंभिक तौर पर सिर्फ पटवारी और नायब तहसीलदार का ही निलंबन हुआ है। कमिश्नर की जांच रिपोर्ट के बाद जमीन की अनुमति देने वाले अफसरों के अलावा खरीद-बिक्री करने वालों पर भी कार्रवाई होने की संभावना है। शासन जल्द ही इस मामले में कार्रवाई कर सकता है। 

यह वक्त महज हक के इस्तेमाल का नहीं, जिम्मेदारी का भी


संपादकीय
21 अगस्त
मुंबई में इस वक्त महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अकेले नेता राज ठाकरे एक रैली करने जा रहे हैं। सरकार की इजाजत न मिलने पर भी उन्होंने अपना यह फैसला कायम रखा, और उनके मुद्दे पिछले दिनों मुंबई में मुस्लिम समाज द्वारा की गई तोडफ़ोड़ और हिंसा के हैं। असम और म्यांमार में मुस्लिमों पर हिंसा का विरोध करते हुए मुंबई के मुस्लिम समाज के दसियों हजार लोग जुटे थे और  वह भीड़ बेकाबू और हिंसक होकर शहीदों के स्मारकों पर भी पिल पड़ी थी। वहां पर तोडफ़ोड़ की तस्वीरों में पूरे देश के लोगों को विचलित कर दिया था, कर दिया है, और लोगों ने इसे देश के खिलाफ किया गया काम माना। 
यह बात सही है कि तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं, और कम से कम इस एक मामले में शहीदों के स्मारक पर लात मारते हुए लोग इसी विरोध प्रदर्शन वाले थे, और मीडिया में तैरती उनकी तस्वीरों के पीछे कोई विदेशी हाथ नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि किसी भी समाज या शहर में जब एक बड़ी भीड़ नाराजगी के साथ जुटती है तो उसमें से कुछ या अधिक लोग कानून के खिलाफ कई मौकों पर हिंसा करने लगते हैं। इस बात को लेकर सारे प्रदर्शनकारियों को, या उनके विरादरी को देश के खिलाफ मान लेना भी गलता होगा, और शहीद स्मारक का अपमान करने वाले लोगों की शिनाख्त के साथ-साथ उन पर कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। इस मामले में आज लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि असम की आग अभी ठंडी नहीं पड़ी है। वहां पर तो लाखों लोग आज बेघर हैं ही, देश भर से शायद लाख या लाखों लोग अपने कमाने-खाने की जगह छोड़कर उत्तर-पूर्वी राज्यों में लौट गए हैं, दहशत के बीच, जान बचा कर। ऐसे में आज जरूरत देश और प्रदेशों की सरकारों को हालात सम्हालने देने की है, चाहे वे किसी भी पार्टी की सरकारें हों, चाहे वे किसी भी राज्य में हों या देश में हो। ऐसी नौबत के बीच राज ठाकरे का मुंबई में यह प्रदर्शन, या फिर किसी और पार्टी या नेता का कहीं और प्रदर्शन हो, वह निहायत गलत है। किसी धर्म या जाति के लोग बिना किसी संगठित राजनीतिक दल के भी कहीं-कहीं भीड़ की शक्ल में इक_ा हो रहे हैं, और वे हिंसा भी कर रहे हैं। उत्तरप्रदेश में एक महावीर प्रतिमा पर मुस्लिम समाज के लोगों का प्रदर्शन हुआ और इसका कोई तर्क भी नहीं था। लेकिन तनाव के दौर में बहुत किस्म के गलत काम होते हैं, और यही वक्त होता है जब संगठित और सुलझे हुए लोगों को अपने निजी और अपने संगठन के तात्कालिक फायदे को छोड़कर, भूलकर एक दरियादिली दिखानी चाहिए। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उनके बाकी परिवार वाली शिवसेना, ये दोनों ही संगठन अपनी शुरुआत से ही मुस्लिम-विरोधी या गैरमराठी-विरोधी जाने-पहचाने जाते हैं। ऐसे में इनके किसी प्रदर्शन के जायज होने पर भी आज का वक्त ऐसे काम का नहीं है। ऐसा करके राज ठाकरे उन लोगों के बीच कुछ राजनीतिक फायदा तो पा सकते हैं जो लोग पिछले दिनों मुंबई में हुई हिंसा को लेकर नाराज हैं, या शहीदों के अपमान को लेकर पूरे देश में विचलित हैं। लेकिन उनके जख्मों पर मरहम लगाने के लिए भी, हिंसा के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के लिए भी, आज के माहौल में ऐसे प्रदर्शन की न तो जरूरत है, और न ही राष्ट्रीय एकता और शांति के हिसाब से इसकी कोई गुंजाईश है।
हम इस बारे में आज मुंबई से दूर रहते हुए भी इसलिए लिख रहे हैं कि कल के दिन देश के तनाव के माहौल में हमारे इर्द-गिर्द भी अगर कोई किसी मुद्दे पर ऐसे प्रदर्शन की बात सोचे, तो उसके खतरों के बारे में हम अभी भी अपने आसपास के लोगों को आगाह कर दें। हर किसी को नाजुक मौकों पर प्रदर्शन के अपने अधिकार के इस्तेमाल की जिद के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि जिस लोकतंत्र ने प्रदर्शन का यह अधिकार दिया है, उसी लोकतंत्र ने किस तरह की जिम्मेदारियां भी दी हैं। लोकतंत्र एक ही सिक्के के दो पहलुओं, अधिकार और जिम्मेदारी, की तरह है, और किसी सिक्के का सिर्फ एक पहलू कोई कीमत नहीं रखता। इसलिए देश भर में जहां भी लोग राज ठाकरे की तरह की बात सोच रहे हैं, उन्हें अपनी उत्तेजना, अपने फायदे, अपने  प्रदर्शन पर फिलहाल काबू रखना चाहिए। 

महान खूबियों से कोसों दूर, और खामियों से लदे हुए नेताओं का यह नतीजा


20 अगस्त 2012
संपादकीय
भारत में अभी-अभी हुई ताजा हिंसा के लिए एक बार फिर पाकिस्तान का हाथ खबरों में आया है। भारत ने पाक सरकार से विरोध दर्ज किया है कि उसकी जमीन से गढ़ी हुई तस्वीरें अफवाहें फैलाने और हिंसा के लिए इस्तेमाल की गई हैं, और पाकिस्तान ने इस बात के सुबूत हिंदुस्तान से मांगे हैं। मुंबई हमलों के ढेर से सुबूतों के आ जाने के बाद न तो भारतीय कानून के तहत, और न ही पाकिस्तानी कानून या सरकार के तहत अब तक किसी को सजा हो पाई है। इसलिए यह सोचना मुनासिब नहीं होगा कि भारत में अफवाहों को हवा देने के लिए जिम्मेदार कहे जाने वाले पाकिस्तानी लोगों पर कोई कार्रवाई जल्द होगी। 
सवाल यह उठता है कि आरोपों की नाल पाकिस्तान की तरफ घूम जाने से, या कि घुमा देने से कितने वक्त तक काम चलेगा? क्या इससे आज के हिंसक हालात को लेकर भारत की जिम्मेदारी कुछ कम हो सकती है? क्या केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, और राजनीति से परे के सामाजिक नेता इस बात से बरी हो सकते हैं कि यह देश इतने नाजुक हाल में कैसे रखा गया है, या आ गया है कि सरहद पार से आए किसी कंकड़ से भी यह चूर-चूर हो जाए? दरअसल जब आसानी से कोई दुश्मन मिल जाता है तो लोग अपनी जिम्मेदारी से बरी होने की एक चूक करने लगते हैं। जैसे किसी घर के भीतर जब एक बच्चे की शिनाख्त शरारत के लिए खूब अच्छे से हो जाती है, तो हर गड़बड़ के लिए लोगों के पास उसका एक नाम तैयार रहता है कि उसने ही यह किया होगा। इसी तरह मुहल्ले के एक बदमाश का नाम बहुत से लोगों की गलतियों के लिए याद रखकर, भले लोग अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाते हैं। यह सिलसिला तबाही से बचाव की अपनी जिम्मेदारी और अपनी तैयारियों को कमजोर करने का काम भी करता है। 
आज इक्कीसवीं सदी के इस साइबर-जमाने में क्या कोई देश किसी दूसरे देश से ऐसी उम्मीद भी कर सकता है कि वहां से बर्बादी की कोशिशें नहीं होंगी? किसी देश में बड़े-बड़े आंदोलनों को परदे के पीछे से सहारा और बढ़ावा देकर उस देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशें बाजारू मुकाबले वाला कोई दूसरा देश नहीं करेगा? अंतरराष्ट्रीय संबंध और किसी देश की राजनीति या सरकार, इनमें से कुछ भी महज नैतिकता के आधार पर नहीं चलते। कूटनीति का नाम बदलकर राजनय कर दिया गया था क्योंकि कूटनीति शब्द अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन हकीकत तो यही है कि बाजार से लेकर फौज तक, और अंतरराष्ट्रीय असर तक के मुकाबले में अपने-आपको जिंदा रखने के लिए बहुत से देशों को घोषित और अघोषित रूप से अनैतिक काम करने पड़ते हैं, या सोच-समझकर अनैतिक काम किए जाते हैं। ऐसे में अगर कोई देश इतना नाजुक बना हुआ है कि सरहद पार के कुछ दर्जन कम्प्यूटरों से आई अफवाहों से यह देश झुलस जाए, तो यह झुलसने वाले देश की शराफत की मासूमियत नहीं है, यह उसकी कमजोरी है और हिफाजत की कमी है। 
हिंदुस्तान में आज की इस हिंसा और आज के इस क्षेत्रीय-आपसी तनाव से परे पिछले ही पखवाड़े आधे देश में अंधेरा देखा है। जानकार लोगों का अंदाज यह है कि यह अंधेरा भारत की अपनी बिजली-व्यवस्था की कमजोरी और गड़बड़ी के चलते हुआ। इसमें तो कोई दुश्मन भी नहीं था। लेकिन कल्पना करें कि किसी दुश्मन देश में बैठे कम्प्यूटर घुसपैठिए अगर भारत के बिजली कम्प्यूटरों, या रेल और टेलीफोन कम्प्यूटरों में घुसकर इंतजाम को तबाह कर दें, तो क्या होगा? बैंकों के कम्प्यूटरों को तबाह कर दिया जाए, तो क्या होगा? खातेदार क्या बैंकों में आग लगाने की नौबत में नहीं आ जाएंगे? तो ऐसा एक साइबर हमला इस देश को गृहयुद्ध में भी धकेल सकता है, और यहां कि अर्थव्यवस्था को भी चौपट कर सकता है। सरहद पार से आए फर्जी वीडियो या तस्वीरों की बात कुछ ऐसी ही लगती है कि भारत ने अपनी इमारत सिर्फ शीशों से बना रखी है, और पत्थरों से बचाव की उसकी कोई समझ नहीं है। 
हम आज की इन अफवाहों के लिए एक आसान कुसूरवार मिल जाने को तसल्ली का सामान मानने से इंकार करते हैं। हिंदुस्तान को अपने इंतजाम को सुधारना होगा, अपनी चौकसी तेज रखनी होगी, अपने लोगों को बर्दाश्त सिखाना होगा, देश के भीतर तनाव की वजहें घटानी होंगी, और इनमें से किसी भी कमी की तोहमत किसी दुश्मन देश पर लगाना नाजायज होगा। यह देश इतनी नाजुक दीवारों के साथ न तो दूसरे देशों के बीच सुरक्षित है, और न ही इतनी कमजोर कागजी दीवारों के साथ यह किसी किस्म के तनाव देश के भीतर ही झेल सकता। और यह सारी तैयारी पांच बरसों तक ही देश पाने वाली सरकारों के बस की नहीं है, ऐसी सरकारें बनाने वाली राजनीतिक पार्टियों के बस की भी नहीं है। यह तैयारी दूरदर्शी, बड़े और ताकतवर नेताओं के बस की बात है, जिन्हें महान नेता कहा जा सके। ऐसी महान खूबियों से कोसों दूर, और खामियों से लदे हुए नेताओं का यह नतीजा है कि आज यह देश एक कंकड़ फेंककर झुलसाया जा सकता है।  

नीयत का तेल-घी न हो तो कढ़ाही का आकार बढ़ाने से हलुवा नहीं बन जाता


संपादकीय
19 अगस्त
भारत ने पाकिस्तान से इस बात की शिकायत की है कि एक समुदाय की हिंसा या एक समुदाय पर हिंसा के झूठे नजारे दिखाने वाले गढ़े हुए वीडियो वहां से हिन्दुस्तान पहुंचे थे और उनकी वजह से यहां हिंसा भड़की। पाकिस्तान का नाम आने के पहले भी संसद में इस बात को लेकर नाराजगी थी और इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर रोक  की बात भी हो रही थी और यह बात भी हो रही थी कि कैसे थोक के एसएमएस पर रोक लगाई जाए। लेकिन लोगों की समझ और इस टेक्नालॉजी के बेकाबू मिजाज को देखें तो रोक की यह बात कुछ उसी किस्म की लगती है जैसे चाकू से गले कटने पर सब्जी काटने के चाकुओं पर रोक लगा दी जाए। यह मामला औजारों का नहीं है, यह औजारों को हथियार बनाकर इस्तेमाल करने वाले इंसानी मिजाज का मामला है। 
पाकिस्तान की बात क्यों करें, हिन्दुस्तान के भीतर जितने लोग जितने तरह की बातें फेसबुक पर, ट्विटर पर, एसएमएस और एमएमएस पर डाल रहे हैं, उनके लिए हो सकता है कि पाकिस्तान से हथियार बनाकर उनके हाथों में थमाया गया होगा, लेकिन इस साइबर हथियार से गोलियां तो हिन्दुस्तानी ही दाग रहे हैं। टेक्नालॉजी का जो इस्तेमाल आज दुनिया के हर दायरे में हो रहा है उसके चलते इस पर किसी तरह की रोक मुमकिन नहीं है। हथौड़े से कोई कत्ल हो जाए, तो पूरी दुनिया के हथौड़ों पर रोक लगा दी जाए तो उससे हथौड़े वाले कातिल को तो दूसरा औजार ढूंढना पड़ेगा, लेकिन दुनिया के कल कारखाने उससे थम जाएंगे। इसलिए तकनीक को कोसने और उस पर रोक लगाने की मांग भावनात्मक अधिक है, उसका व्यवहारिक पहलू कुछ नहीं है। दूसरी तरफ सरकार के पास आईटी कानून इतना सख्त है कि उसके तहत कार्रवाई की जा सकती है, और इंटरनेट या टेलीफोन, कम्प्यूटर या सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें ऐसी टेक्नालॉजी से लैस हैं कि उन पर किया गया कोई भी काम अदालत तक अमूमन साबित किया जा सकता है। यहां पर फिर हम यह याद दिलाना चाहेंगे कि एक औजार को हथियार बनाकर नफरत फैलाने या हिंसा के लिए उकसाने का काम जो लोग कर रहे हैं, उन्होंने अपने आसपास किसी को भी ऐसी कम्प्यूटर-हरकत के लिए जेल जाते नहीं देखा होगा। अगर सरकार की जांच एजेंसियां असरदार होतीं, सरकारों में नफरतजीवी लोगों पर, ऐसे संगठनों पर कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक हौसला होता, तो लोग इस लापरवाही से, या इस दुस्साहस से आग को बढ़ाते नहीं चलते। यह तो आज की संसद से लेकर सड़क तक की फिक्र श्मशान वैराग्य से अधिक कुछ नहीं है, क्योंकि लोग समकालीन इतिहास में अपनी फिक्र दर्ज कराना चाहते हैं। जब जो बातें खबरों में होती हैं, लोग उनके बारे में चर्चा में हिस्सा इसी तरह लेते हैं, जिस तरह राह से गुजरते जनाजे में लोग कंधा लगाते दस कदम चल लेते हैं। यह दौर निकल जाएगा और इसके बाद न संसद में इसकी चर्चा होगी, और न सड़क पर। 
हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि देश का साइबर कानून तो बहुत कड़ा बना दिया गया है, लेकिन इस पर अमल और इसके इस्तेमाल का जिम्मा उन्हीं लोगों पर है जो लोग दूध में मिलावट पर अठारह बरस बाद फैसला करवा पाते हैं। ऐसे लोग जब तक अपने रजिस्टर में कार्बन लगा सकेंगे, तब तक नफरतजीवी लोग, आतंक और तबाही फैलाने वाले लोग हजारों मील शहरी जंगल और जला चुके होंगे। आज भारत में किसी भी कानून के तहत होती जो कार्रवाई दिखती है, वह मोटे तौर पर राजधानियों की हिफाजत के लिए होती है, और जहां मीडिया का फोकस है, वहां होती है। जिस हिन्दुस्तान में गरीब, ग्रामीण और बेजुबान लोग बसते हैं, वहां शायद इस कार्रवाई का दो-चार फीसदी भी नसीब नहीं होता। लेकिन इस फर्क को देखने की जहमत भी न मीडिया उठाता, और न ही संसद के लंबे-लंबे आंसू सने भाषणों की बाद में कोई याद रह जाती। रातों रात कोई हिफाजत नहीं बढ़ सकती। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक को सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं को छोड़कर हौसले से और ईमानदारी से आतंकियों और बदमाशों पर कार्रवाई करनी पड़ेगी, तेजी से करनी पड़ेगी, और अदालती इंतजाम ऐसा करना पड़ेगा कि वहां भी तेजी से बदमाशों को सजा मिल सके, इसके बिना आज की तरह के खतरे बने रहेंगे, और लोग संसद में श्मशान की तरह की बात करते रहेंगे कि गुजरने वाला कितना भला था। 
भारत के लोगों को इंसाफ और सामाजिक जवाबदेही सिखा और समझा पाना आसान बात नहीं है। देश की राजनीतिक ताकतों की इसमें दिलचस्पी भी नहीं है। इसलिए लोग तो एक-दूसरे को ऐसे भड़काऊ संदेश और तस्वीरें भेजते ही रहेंगे। जब तक हर शहर, हर दायरे, हर बिरादरी के ऐसे मुजरिमों में से कुछ-कुछ जेल नहीं जाएंगे तब तक बाकी लोगों को अपनी कानूनी जिम्मेदारी समझ भी नहीं आएगी। देश के कानून में और अधिक कड़ाई की जरूरत बिल्कुल नहीं है, मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की जरूरत है। सरकारों में नीयत का तेल-घी न हो, और कढ़ाही का आकार बढ़ाते चले जाएं, तो उससे हलुवा नहीं बन जाता। 

देश की ऐसी नौबत बहुत फिक्र की है


संपादकीय
18 अगस्त
कल संसद में पेश सीएजी की रिपोर्ट कोई नया सदमा लेकर नहीं आई है क्योंकि इस तरह के आंकड़े देखने का आदी अब यह देश हो चुका है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके दायें हाथ मोटेंक सिंह अहलूवालिया को 26 रूपए रोज खर्च करने वाला गरीब नहीं दिखता है, लेकिन अंबानियों को दसियों हजार करोड़ का फायदा, जीएमआर को हजारों करोड़ का फायदा, कोयला खदान पाने वाले कारखानेदारों को लाखों करोड़ का फायदा देकर इस सरकार ने टेलीफोन कंपनियों को दिए हजारों-लाखों करोड़ के फायदे का सिलसिला जारी रखा है। यूपीए सरकार की साख का हाल आज यह है कि उस पर बेईमानी और भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप लग जाए, जनता आंख मूंदकर उसे सही मानेगी। कांग्रेस पार्टी के वकील प्रवक्ता जिस तरह से सीएजी के खिलाफ बोलते हुए अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं वह बात अदालत में सबसे बुरे मुजरिमों को बचाने की वकील की कोशिश से अधिक कुछ नहीं लग रही है। और इस हालात के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह बात पूरी तरह से बेतुकी लगती है कि वे व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं और उनके खिलाफ कोई भी बात साबित होगी तो वे राजनीतिक जीवन से सन्यास ले लेंगे। वैसे भी कांग्रेस पार्टी के भीतर आने वाले चुनाव के बाद मनमोहन सिंह के लिए सन्यास की बात जोरों से चल ही रही है, और हमारा आज का ऐसा अंदाज है कि इन तमाम बातों से मनमोहन सिंह बेदाग शायद निकल भी नहीं पाएंगे। इसलिए राहुल गांधी की जगह बनाने को, या फिर दागदार साबित होने पर, किसी न किसी वजह से उनका सन्यास तय दिखता है। हालांकि एक वक्त हम भी उनको शरीफ मानते थे और पिछले बरसों में हमने बार-बार उनके नाम यह नसीहत लिखी थी कि इस गंदगी को छोड़कर उन्हें पढ़ाने के लिए चले जाना चाहिए और किताबें लिखनी चाहिए। लेकिन वे एक ऐसे शाकाहारी और ईमानदार गब्बर बने रहे, जिनके गिरोह में सांभा से लेकर कालिया तक हर कोई लूटपाट करते हुए ओवरटाइम करते रहा। ऐसी ईमानदारी किस काम की? और मनमोहन सिंह आज किस मुंह से आरोप साबित होने पर सन्यास की बात करते हैं? उनकी सरकार, उनके मंत्रिमंडल और उनके दफ्तर, इन सबके भ्रष्टाचार में शामिल होने की बातें दर्जनों मामलों में सामने आ चुकी है, और हमारा यह मानना है कि उनका इस सन्यास की बात कहने का कोई नैतिक अधिकार भी नहीं रह गया है।
केन्द्र सरकार की ऐसी गिरी हुई साख इस देश की एकता, अखंडता और इसके अमन-चैन सबको प्रभावित कर रही है। आज जगह-जगह जब बहुत से प्रदेशों में एक-दूसरे के खिलाफ तनाव फैला हुआ है, जब आधा दर्जन प्रदेशों से उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग छोड़-छोड़कर वापिस लौट रहे हैं, तब अगर एक असरदार और ईमानदार प्रधानमंत्री देश में होता, यूपीए गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी के अनगिनत साथी भ्रष्टाचार में जेलों में नहीं होते, तो ऐसे नेताओं की एक आवाज पर देश में शांति भी लौट पाती, और लोग भी अपनी-अपनी पढ़ाई, अपनी-अपनी नौकरी की जगहों पर महफूज बने रहते। लेकिन आज इन लोगों का कुछ बोलने का मुंह ही नहीं बचा है। इस बारे में हर कुछ हफ्तों में हमको लिखना पड़ता है क्योंकि एक दमदार प्रधानमंत्री के वजन की जरूरत कहीं न कहीं दिखती है। इस देश के दो बड़े मुखिया, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी, दोनों राजनीति की कड़ी और कड़वी समझ से दूर के हैं और दोनों ही अपने साथियों पर निर्भर हैं, और इन साथियों में बेईमानों की गिनती कम नहीं है। राजनीति समझने वाले इनके आसपास के सबसे बड़े नेता को राष्ट्रपति भवन भेजकर कांग्रेस ने जो रूख दिखाया है, उसके बारे में बहुत से लोगों का यह मानना है कि राहुल गांधी को सरकार की लगाम पकड़ाने का रास्ता साफ किया गया है। लेकिन अब यूपीए गठबंधन के भीतर उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी के पास ऐसा कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं बचा है जो सरकार, गठबंधन, पार्टी और देश सबको समझता हो और सबके बीच उसकी बात का वजन हो। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने का बाद अब तो शायद विपक्ष से बात करने के लिए भी कांग्रेस के पास किसी नेता का टोटा पड़ जाएगा। देश की ऐसी नौबत बहुत फिक्र की है।

sunil kumar @editorsunil on twitter


17 Aug 2012


* rumours on net, sms. this is collateral cost of democratization of medium. totally beyond check. u check a thousand, act, & 10,000 more...
* some politicians words 4 peace r sandwiched in such thick layer of IFs & BUTs, the intention of peace not even visible in their statements.
* hindu and muslim fanatics, both parasites thriving on each other. and they send greeting cards to each-other for long life.
*hindus troubled in pakistan, muslims troubled in india, north-easterners troubled in many parts of india, FANATICS ARE LOVIN IT...
* microphone of history is so sensitive, it records silence of people who have a voice and keeping silence when it is trouble around.
* look at capitalism! when india is burning, in trouble, in shelters, running 4 life, there is News - ‘Sensex gains 88 points in early trade’

editor sunil kumar on twitter


16 Aug 2012

* only a society with vocal ignorants and silent sensibles would tolerate ANNAs and BABAs...
* baba ramdev says- Corrupt and hoarders of black money should not be allowed in Parliament. (WHAT ABOUT KARNATAKA ASSEMBLY BABA...?!?!)
*in the middle of black money and white money, the indian color box also has huge saffron money..
*some trying 2 take back india 2 Ramlila & jantar-mantar days. & it suits 2 cave-ideology. but people r more mature now, just media isn’t.
*anyone coloured in a religion had never been trustworthy in my experience...., like ramdev
*being secular is like being virgin. either you are, or you are not.
*baba after anna, reminds me of relay race... :-)

घर पर चुप बैठे अमनपसंद और ओवरटाईम करते नफरतजीवी


17 अगस्त 2012
संपादकीय
टेलीफोन और इंटरनेट की तकनीक का इस्तेमाल करके भारत में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों के बीच एक दहशत फैलाई गई और नतीजा यह है कि दक्षिण से लेकर पश्चिम तक के महानगर छोड़कर उत्तर-पूर्व के लोग वापिस भाग रहे हैं। संसद में आज इस नौबत को लेकर यह भी बात उठी कि एसएमएस या इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग तक पर किस तरह की रोक लगाई जाए ताकि साजिशें कारगर न हो सकें।  इसके पहले पिछले कुछ दिनों से लगातार कुछ वीडियो क्लिप जोड़-तोड़कर, कुछ तस्वीरों को छेड़छाड़ करके, और कुछ असली तस्वीरों को भी, जगह-जगह फैलाकर किसी एक धर्म के लोगों, किसी एक इलाके के लोगों के खिलाफ नफरत फैलाने की हरकत चल ही रही थी। और जिस तरह कुछ बरस पहले बात की बात में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह को लोगों ने हाथोंहाथ ले लिया था, उसी तरह आज हिंदुस्तान के लोग हवा में तैर रही अफवाहों को अपने कंधों पर चढ़ाकर दूर-दूर तक बांटकर आ रहे हैं। संसद में फेसबुक और ट्विटर जैसी वेबसाईटों पर जैसी नफरत फैलते दिख रही है, और जितना खुलकर लोग अपने नाम के साथ इस नफरत को आगे बढ़ा रहे हैं, उससे यह बात जाहिर है कि ऐसे लोग चाहे फीसदी में न आते हों, चाहे इनका अनुपात न के बराबर हो, लेकिन ये तालाब के पूरे पानी को गंदा करने की ताकत रखने वाले अकेले इंसान (मछली को क्यों गाली देना?) हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब साम्प्रदायिक लोग, नफरतजीवी लोग अतिसक्रिय होकर ओवरटाईम करते हैं, तब जिम्मेदार और अमनपसंद लोग सिर्फ उसे पढ़ते रहते हैं तो नफरत का मुकाबला आखिर कैसे हो सकता है? टेक्नॉलाजी ने सरकार के हाथ काटकर रख दिए हैं, और सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में। तकनीक का मिजाज ऐसा है कि वह पहाड़ से उतरती तूफानी नदी की तरह है, जिस पर कोई बांध बनाना मुमकिन नहीं है। इसलिए आज संसद में सिर्फ एक भावना देखी है, कोई संभावना नहीं देखी है। अब जैसा कि नकली नोट बाजार से असली नोटों को खदेड़कर बाहर कर देते हैं, उसी तरह नफरत लोगों के बीच से मोहब्बत को खदेड़कर बाहर करने की ताकत कुछ अधिक रखती है। धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर दूसरों को भगाने, मारने, जलाने की हसरत रखने वाले लोग अधिक असरदार होते हैं। मोहब्बत की बजाय नफरत में एक करने की ताकत कुछ अधिक होती है। और फिर जिनके भीतर नफरत भरी हुई है, उनको ऐसी ताकतों की मदद भी मिल जाती है जो दुनिया के जाने किस कोने पर बैठे रहकर भारत की तबाही देखना चाहती हैं। यह नौबत भयानक है। और अभी तो भारत में बहुसंख्यक समुदाय को विचलित करने वाली कोई अफवाह हवा में नहीं है। अगर ऐसी कोई नौबत आएगी तो उस दिन राजनीतिक दल अपनी लार को पता नहीं किस रूमाल से पोंछ सकेंगे और देश-प्रदेश की सरकारें पता नहीं कैसे अफवाहों से उपजी आग को बुझा सकेंगी। इस पूरे खतरे का एक ही इलाज है, देश के लोगों के बीच समझबूझ को बढ़ाना और नफरत फैलाने वालों को उजागर करना। यह बात सुझाना हमारे लिए आसान है लेकिन इस पर अमल करना और इसे कामयाब करना, नाकामयाबी से थोड़ी ही अधिक गुंजाइश की बात है। देश के ऐसे तमाम लोगों को अपने आसपास के लोगों के बीच मुंह खोलना होगा जो कि देश का भला चाहते हैं, सभी इंसानों का भला चाहते हैं। चुनिंदा तबकों का बुरा चाहने वाले लोग तो बहुत हैं, उनकी राजनीतिक हसरतें भी हैं और साम्प्रदायिक हसरतें भी। इन सबको उजागर करने वालों की अपनी साख भी अच्छी होनी चाहिए। और यह साख सिर्फ धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता या सद्भावना के मोर्चे पर अच्छी साख नहीं हो सकती, इसका ईमानदारी के मोर्चे पर भी अच्छा होना जरूरी है, वरना भ्रष्ट, बेईमान और चोर की बात पर कौन भरोसा करेगा। यह पूरी बात हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि लोगों को इस चर्चा को आगे बढ़ाना होगा, वरना हिंसक लोग तो जुटे हुए हैं ही। 

कुकर्मों से लदी सरकारें क्या काबू कर सकती हैं?


16 अगस्त 2012
संपादकीय
कर्नाटक में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों पर हमले की अफवाह फैली तो बात की बात में दसियों हजार लोग रेलवे स्टेशन पर इक_ा हो गए और असम की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी में पांव धरने की जगह भी नहीं बची। यह उस वक्त हो रहा है जब असम झुलसा हुआ है, जल रहा है और अपने घर से बेदखल है। यह उस वक्त हो रहा है जब मुंबई में मुसलमानों ने असम-म्यांमार की मुस्लिम मौतों के खिलाफ एक हिंसक प्रदर्शन वहां किया, यह उस वक्त हो रहा है जब असम को लेकर दिल्ली में एक राजनीति भी चल रही है और लगी आग के बीच हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के मुद्दे भी उठाए जा रहे हैं। ऐसे में कर्नाटक छोड़कर भाग रहे उत्तर-पूर्वी लोगों को वहां की सरकार, वहां की सत्तारूढ़ भाजपा, आरएसएस से लेकर असम सरकार और केंद्र सरकार तक, हर किसी ने यह दिलासा दिया है कि इन लोगों को कर्नाटक में कोई खतरा नहीं है और वे छोड़कर न जाएं। लेकिन अपनी जान पर जिनको खतरा लगता है वे छोड़कर भाग रहे हैं। यह खतरनाक नौबत उस असम में और कैसे हालात पैदा करेगी जहां पर आज भी हालात बेकाबू हैं और सेना तैनात है। कर्नाटक की अफवाह वहां पहुंचते ही वहां हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया है, और यह जख्म जल्दी भरने वाले भी नहीं हैं। 
उत्तर-पूर्व के लाखों लोग कर्नाटक में पढ़ रहे हैं या बसे हुए हैं। उनके बीच ऐसी दहशत फैलने से देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से और बाकी देश के बीच आपसी समझ की एक कमी फिर सामने आती है, और इसके लिए बाकी देश ही जिम्मेदार है जो कि सरहदी सूबों को साथ रखने में कमजोर है। यह एक भयानक नौबत है कि देश के भीतर ही एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश में सिर्फ इसलिए खतरा झेल रहे हैं कि वे उस प्रदेश के हैं। यह बात भारत के लोकतांत्रिक और विविधतावादी ताने-बाने के ठीक खिलाफ है। और ऐसी नौबत के पीछे हमें बहुत सी ताकतें जिम्मेदार लगती हैं। कर्नाटक में साम्प्रदायिकता, दंगों और हिंसा का एक इतिहास रहा है। पिछले बरसों में वहां पर श्रीराम सेना जैसे साम्प्रदायिक संगठन ने पश्चिमी या ईसाई संस्कृति का आरोप लगाते हुए जिस तरह के खुले हिंसक हमले किए, उससे भी वहां के अमनपसंद हिंदू समाज की साख चौपट हुई है। धर्म और संस्कृति के ऐसे गुंडा-ठेकेदारों के चलते कर्नाटक में युवा पीढ़ी या आधुनिक समाज के बीच भारी दहशत बनी हुई है और बरसों से जारी ऐसी हिंसा को खत्म करने के लिए कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कुछ भी नहीं किया। बल्कि पाठकों को याद होगा कि इस सरकार के एक से अधिक मंत्रियों ने समय-समय पर सार्वजनिक रूप से बहुत ही दकियानूसी किस्म की बातें लड़कियों और महिलाओं के पहरावे को लेकर की, वहां के स्कूलों में गीता को अनिवार्य करने की बातें कीं, और कुल मिलाकर साम्प्रदायिक-समानता का माहौल खराब किया। यही वजह है कि आज जब उत्तर-पूर्व के लोगों को मारने की अफवाह वहां फैली तो असुरक्षा की दिमागी हालत के बीच जीते वहां के अल्पसंख्यक लोगों या उत्तर-पूर्वी लोगों को आनन-फानन इस पर भरोसा हो गया। इस तरह कर्नाटक की सत्तारूढ़ पार्टी, वहां की सरकार और वहां के हिंदू संगठनों में से कुछ इस खतरनाक नौबत के लिए जिम्मेदार हैं। यहां दो और बातों को याद दिलाना जरूरी है कि किस तरह श्रीराम सेना का मुखिया तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में यह कहते वीडियो कैमरे पर कैद हुआ था कि वह मोटे भुगतान के एवज में वहां दंगा करवा सकता है। दूसरी घटना भी इसी संगठन को लेकर है जिसके लोग कर्नाटक में कुछ महीने पहले पाकिस्तान का झंडा फहराकर यह तनाव फैलाना चाहते थे कि यह झंडा मुसलमानों ने फहराया है। इस मामले में श्रीराम सेना के लोग गिरफ्तार भी हुए हैं और जांच में यह बात साबित भी हुई है। 
केंद्र सरकार इस नौबत के लिए इसलिए जिम्मेदार है क्योंकि पूरे देश के लोगों को अपनी हिफाजत का जो भरोसा एक मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे हो सकता है, वह देश से गायब है। मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी तक, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन में एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी नीयत पर, जिसकी ताकत पर और जिसकी लीडरशिप पर पूरे देश को भरोसा हो। इसलिए विश्वास की यह कमी भी इस दहशत के पीछे है। 
यह एक बहुत खतरनाक हालत इसलिए है कि ऐसी कुछ हत्याओं से, ऐसी कुछ अफवाहों से देश के किसी भी राज्य में किसी दूसरे राज्य लोगों को भगाया जा सकता है, या लोग खुद ही छोड़कर भाग सकते हैं क्योंकि उन्हें अपनी जान खतरे में दिखती है। ऐसे में कैसे यह देश एक रह पाएगा और कैसे लोगों के मन एक रह पाएंगे? ऐसे खतरनाक हालत में भी आज देश की कुछ राजनीतिक ताकतें और कुछ लिखने-पढऩे वाले लोग अपनी साम्प्रदायिक विचारधारा के मुताबिक आग को भड़काने में लगे हुए हैं। इस नौबत से निपटना पूरी तरह हम कर्नाटक और देश की सरकारों की जिम्मेदारी मानते हैं, और ये दोनों ही अपने-अपने कुकर्मों के तले इस कदर दबी हुई सरकारें हैं कि इनकी बात पर किसी को कोई भरोसा शायद ही हो। यह हालत बहुत फिक्र पैदा करती है।

ऐसी ही एक और सालगिरह का कितना जश्न मनाया जाये?


14 अगस्त 2012
संपादकीय
आजादी की एक और सालगिरह आकर खड़ी हो गयी है। हर बरस मानो वह मुंह चिढ़ाने आ जाती है। गांवों से लेकर शहरों तक जगह-जगह गाँधी और नेहरू को याद किया जायेगा, आजादी के आन्दोलन के भगत सिंह और बाकि लोगों को भी याद किया जायेगा, और देश अगले दिन से फिर उसी रफ्तार से, उसी ढर्रे पर चलने लगेगा। आज़ादी पर उन लोगों का हक बने रहेगा जिनके हाथ में किसी भी किस्म की ताकत है, राजनीति, सरकार, पैसों, या किसी और किस्म की ताकत। लेकिन जिनके पास कोई ताकत नहीं है, वे लोग आजादी के मायनों से दूर पड़े रहेंगे।
कहने को तो सबके हक बराबरी के हैं, लेकिन एक खरबपति कारखानेदार की जमीन की जरूरत या हवस के मुकाबले उस जमीन के असल मालिक गरीब किसान की कोई आजादी है? खदानों से लेकर आसमानी लहरों तक पर अगले सैकड़ों बरसों के लिए काबिज हो जाने वाले लोगों के मुकाबले इस कुदरती दौलत के असल मालिकों की कोई आजादी है? हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में अमीर की मर्जी के मुकाबले गरीब की कोई आजादी है? यह पूरा सिलसिला अदना लोगों को आजादी का अहसास कराते रहने, उसके झांसे में रखने का है। जिस तरह कोई महाराज या बापू अपने प्रवचन में लोगों को स्वर्ग का अहसास करते रहते हैं, उसी तरह साल में दो चार बार हिन्दुस्तानी लोगों को आजादी का अहसास कराया जाता है। 
लेकिन हिन्दुस्तानी जम्हूरियत की बदहाली इतनी है कि चुनी हुई सरकार के मुकाबले आज लोग ऐसे हवाई नारों को सर पर बिठाने लगे हैं, जिन पर सिर्फ नासमझ लोगों को भरोसा होना चाहिए था। जब लोकतंत्र की जवाबदेह सरकार, अदालत, संसद, सब बेअसर और नकामयाब होने लगें, तो फिर लोग नारों को सर पर पोथी की तरह सजा लेते हैं, और नारों की राह से जन्नत पहुँचने पर भरोसा करने लगते हैं। आज दिल्ली में एक भगवा बाबा जिस हिकारत के साथ यह मुनादी कर रहा है कि वह चाहे तो इस मुल्क के प्रधानमंत्री तो लाल किले से कल झंडा फहराने से रोक सकता है, और इस चुनौती पर भी देश को गुस्सा नहीं आ रहा, तो इसका मतलब यह नहीं कि बाबा पर देश का भरोसा है, इसका मतलब यह है कि जनता का सरकार पर, प्रधानमंत्री पर से भरोसा खत्म हो गया है। आज आजादी की सालगिरह के मौके पर यह एक बड़ी नाकामयाबी है कि तानाशाह अन्ना-बाबा के फतवों को लोग सुन रहे हैं। जैसे मोदी की साम्प्रदायिकता उनके बेहतर राज की साख को मिट्टी में मिला देती है, जिस तरह लालू का चारा उनकी धर्मनिरपेक्षता को मिट्टी में मिला देता है, उसी तरह आज देश के सरकार के कुकर्म लोकतंत्र की साख को मिट्टी में मिलाकर अन्नातंत्र-बाबातंत्र को एक विकल्प बना रहे हैं। 
यह सिलसिला भयानक है। एक तरफ देश के बहुत बड़े हिस्से में नक्सल पाँव पसार चुके हैं, सरहद के सूबों में अलग खतरे खड़े ही हुए हैं, और ऐसे में दिल्ली पर किसी को भरोसा नहीं है। अन्ना के लोग जिस अंदाज में देश की संसद को एक-मुश्त गालियाँ बक रहे हैं, अदालतों पर लोगों को इन्साफ का भरोसा नहीं है, ऐसे में किस आजादी की सालगिरह हम मानाने जा रहे हैं? इस देश में लोगों में समझ का दीवाला निकला हुआ है, राजनीतिक दल चाहते भी यही हैं कि लोगों की समझ कम ही रहे। हिंदुस्तान का लोकतंत्र चुनावों की निरंतरता के मामले में जरूर कामयाब है, और हर पांच बरस में चुनावी उम्मीदवारों को यह आजादी रहती है कि वे मनचाहे भुगतान पर मनचाहे वोट खरीद सकें, वोटरों को आजादी रहती है कि वे मनचाहे रेट पर अपने वोट बेच सकें। और लोकतंत्र को आजादी रहती है कि वह अपने-आपको जिंदा और तरक्की करता बता सके। 
ऐसी ही एक और सालगिरह का कितना जश्न मनाया जाये?




फ्रीडम को इस कदर फ्री मान लेना गांधी-नेहरू ने कभी सोचा भी न होगा...


13 अगस्त 2012
हरियाणा का कांगे्रस सरकार का गृहमंत्री अपनी एक भूतपूर्व कर्मचारी की प्रताडऩा-आत्महत्या के बाद से फरार है। वैसे तो तकनीकी रूप से यह मंत्री निर्दलीय निर्वाचित होकर आया था, लेकिन वह कांगे्रस सरकार में मंत्री बनाया गया। इस बारे में अखबार और टीवी रंगे पड़े हैं, इसलिए यहां पर हम उससे जुड़ी तमाम बातों को दुहराना जरूरी नहीं समझते, लेकिन क्या अपने कल तक के गृहमंत्री की आज की फरारी पर इस पार्टी की महिला अध्यक्ष की चुप्पी काफी है? जिस दिल्ली में सोनिया गांधी रहती हैं, उसी दिल्ली में यह महिला खुदकुशी को बेबस हुई, और उसने जिसे जिम्मेदार ठहराया है, कल तक वह बाहुबली मंत्री और कारोबारी, माफिया सरगना जैसे अंदाज वाला नेता मजे में फरार है।  पुलिस उसके घरों पर छापे मार रही है और मानो एक राष्ट्रीय पार्टी, और हरियाणा में सत्तारूढ़ कांगे्रस का इससे कोई लेना-देना ही नहीं है। 
हो सकता है कि कानूनी रूप से कुछ कहना कांगे्रस पार्टी और सोनिया गांधी की मजबूरी न हो, लेकिन क्या नैतिक रूप से, सामाजिकता के रूप से, और जिस बोलचाल की जुबान में इंसानियत कहा जाता है (जो कि इंसानियत की पूरी तस्वीर के मुकाबले एक अद्र्धसत्य से कुछ नहीं), उसके हिसाब से सोनिया गांधी को एक महिला की ऐसी दुर्गति करने वाले अपने मवाली-मंत्री को लेकर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए? 
दरअसल आज सरकार और राजनीतिक दलों की तमाम सोच कानूनी जिम्मेदारी पर आकर रूक जाती है। अगर कोई बात उनकी कानूनी जिम्मेदारी नहीं है, और उनके लिए दिक्कत वाली है, तो वहां वे जेब से एक घिसा-पिटा तर्क निकालकर पेश कर देते हैं कि कानून अपना काम करेगा। यहां पर सवाल यह है कि देश का कौन सा कानून किसी पार्टी को या किसी सरकार को उसके किसी शिकार से माफी मांगने से रोकता है? उसे मुआवजा देने से रोकता है? यही हाल पिछले दिनों नारायण दत्त तिवारी को लेकर सामने आया जब वे एक निजी इंसान के रूप में बरसों तक अदालती लड़ाई लडऩे और एक मां-बेटे को बदनाम करने का काम करते रहे, और आखिर में जाकर वे उस बच्चे के बाप साबित हुए। इस मामले को भी दिल्ली में बैठी कांगे्रस ने मुंह बंद करके देखा।
अब सवाल यह उठता है कि जब अदालत तक किसी को कुकर्मी, जुल्मी या बेईमान साबित कर देती है, तब भी अगर पार्टी ऐसे लोगों के खिलाफ चुप रहती है तो उस पार्टी के सिद्धांत क्या हैं? ऐसे लोग पार्टी में बने भी रहते हैं। क्यों कांगे्रस पार्टी या ऐसी ही कोई दूसरी पार्टी अपने ऐसे लोगों से कोई जुर्माना नहीं वसूलती? क्यों उनकी जायदाद का कोई हिस्सा सार्वजनिक काम के लिए दान नहीं दिलवाती? और कुछ नहीं तो अपने नेताओं और मंत्रियों की हिंसा और ज्यादती के शिकार लोगों को मुआवजा दिलवाने जैसा बहुत साधारण समझ का प्राकृतिक न्याय यह पार्टी क्यों नहीं करती? और जब कांगे्रस किसी नेक काम को नहीं करती, तो यह बात देश की बाकी पार्टियों के सामने एक मिसाल की तरह काम आती है और बाकी पार्टियां भी फिर उसी तरह के अपने कुकर्मों को इस मिसाल के साथ सही ठहराने लगती हैं। 
पिछले दिनों मैंने कहीं पर यह भी लिखा कि कांगे्रस के राज्यसभा में मनोनीत सांसद श्रीकांत वर्मा और उनकी पत्नी वीणा वर्मा का बेटा अभिषेक वर्मा आज देश की सुरक्षा के खिलाफ दस किस्म की दलाली करते पकड़ाया है। खुद इसी यूपीए सरकार की एजेंसियां उसके खिलाफ मुकदमे चला रही हैं। ऐसे में यह पार्टी देश की जनता से इस बात के लिए माफी क्यों नहीं मांगती कि उसकी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करते हुए इस कुनबे के चिराग ने पूरे देश में अंधेरा फैलाने का धंधा चला रखा था, और कांगे्रस की या तो इस पर कोई नजर नहीं थी या फिर हथियारों के इन सौदों में, दलाली और जासूसी में उसकी भागीदारी थी।
इस देश में यह बेशर्मी हैरान कर देने वाली है कि जब बड़े-बड़े ताकतवर लोग फंसते हैं तो वे अदालत के बजाय जनता की अदालत की बात करने लगते हैं। और जब जनता की तरफ से असुविधा के सवाल उठते हैं तो नेता और पार्टी एक अलग ढाल उठा लेते हैं कि कानून अपना काम कर रहा है। 
दरअसल अंगे्रजी का एक शब्द इस देश में बहुत गलतफहमी खड़ी करता है। गलतफहमी कहें, या खुशफहमी। फ्रीडम, यानी आजादी को लोगों ने फ्री (मुफ्त) मान लिया है। यह फ्रीडम बहुत सी जिम्मेदारियों के साथ आती है, जिसमें से हर जिम्मेदारी को पूरा करवाना कानूनी की लाठी का काम नहीं होता, लोगों का खुद का काम भी होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक दल अभी-अभी आए आंकड़ों के मुताबिक सैकड़ों करोड़ का चंदा लेने वाली पार्टियां अगर इस दौलत से उन बेकसूर लोगों को कोई मुआवजा भी नहीं दे सकती, जिनके साथ इनके नेताओं ने बलात्कार किया हो, आत्महत्या को बेबस किया है, जिनकी हत्या की है, जिन बच्चों को पैदा किया है, तो इन पार्टियों को फ्रीडम के सिर्फ लड्डू ही फ्री में क्यों मिलें? चुनाव आयोग के नियम, सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संसद के बनाए कानून, सब मिलकर भी किसी भी देश में तथाकथित इंसानियत को लागू नहीं करवा सकते, और लोगों से उनकी नैतिक जिम्मेदारी पूरी नहीं करवा सकते। 
लेकिन फ्रीडम इतनी फ्री नहीं रहती, उसमें कानून से परे के इंसाफ की भी उम्मीद जुड़ी रहती है। यूपीए की मुखिया होने के नाते कांगे्रस पार्टी को, और उसकी मुखिया होने के नाते सोनिया गांधी को देश को बहुत से मामलों में जवाब देना चाहिए। जिम्मेदारी से कतराना किसी को महान नहीं बनाता। इस विशाल लोकतंत्र को अपनी निरंतरता और और मजबूती के लिए दुनिया भर में इज्जत से देखा जाता है। खुद यहां के नेताओं को अपनी पार्टियों को इज्जत के लायक बनाना चाहिए। जब तक इंसान हैं तब तक किसी भी पार्टी या सरकार तले तथाकथित हैवानियत होती ही रहेगी। इससे तो बचा नहीं जा सकता, लेकिन ऐसे मौकों पर नैतिकता का यह तकाजा है कि ऐसे हैवानों के मुखिया बेकसूर होने पर भी अपने लोगों के किए की भरपाई करें, और एक प्राकृतिक न्याय की मिसाल पेश करें। 
ऐसे में इन नेताओं के भले की एक बात यहां कह सकते हैं कि इससे उनको वोटों का भी नफा ही होगा, नुकसान नहीं। 
फ्रीडम को इस कदर फ्री मान लेना गांधी-नेहरू ने कभी सोचा भी न होगा...