कामकाजी महिलाओं में दसियों लाख की कमी?


30 सितंबर 2012
संपादकीय
भारत के पिछले राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (2009-10) के आंकड़े अगर सही है तो 2004-05 के इसी सर्वे की तुलना में देश में काम करने वाली महिलाओं की संख्या में दो करोड़ दस लाख से अधिक की कमी इस दौरान हो गई है। इस मामले पर कल सीपीएम की वरिष्ठ नेता और सांसद बृंदा कारत ने कहा है कि इसके एक गहरे विश्लेषण की जरूरत है कि देश के कामगारों में से महिलाएं इतनी घट क्यों गई हैं। बृंदा ने सरकार का यह पक्ष भी सामने रखा है कि पिछले सर्वे में पन्द्रह बरस से बड़ी बहुत सी लड़कियों ने अपना काम मजदूरी लिखाया था, लेकिन अब उन्होंने पढ़ाई को अपना मुख्य काम लिखाया है। 
इन आंकड़ों में आई ऐसी गिरावट पहली नजर में कुछ अटपटी लगती है। आबादी बढ़ रही है, महिलाओं में शिक्षा बढ़ रही है, और उनके कामकाज के मौके भी बढ़ रहे हैं, इससे ऐसा लगता है कि देश के कामगारों में महिलाओं का अनुपात, कम से कम कम तो नहीं ही होना चाहिए। लेकिन इन आंकड़ों की हकीकत पल भर के लिए छोड़ भी दें, तो एक दूसरी बात पर चर्चा इस बहाने हो सकती है कि महिलाओं को कामकाज, रोजगार, और स्वरोजगार के मौके अधिक दिलाने के लिए क्या-क्या हो सकता है, क्योंकि उससे उनकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, और परिवार से लेकर समाज तक उनको अधिक सम्मान का दर्जा भी मिलेगा। इस बारे में हम छत्तीसगढ़ में पिछले बरसों में की गई कुछ पहल का जिक्र करना चाहेंगे। यहां पर राज्य सरकार ने महिलाओं के लिए सरकारी नौकरी में आने की उम्र सीमा इतनी बढ़ा दी है कि महिलाएं बच्चे हो जाने के बाद, उनकी कुछ बरस देखरेख कर लेने के बाद फिर नौकरी के लिए अर्जी दे सकती हैं। इस राज्य में राज्य सरकार की नौकरियों के लिए एक महिला अब पैंतालीस बरस की उम्र तक अर्जी दे सकती है, जो कि शायद पूरे देश में सबसे अधिक रियायत है। ऐसा इसलिए भी जरूरी था, और समझदारी का काम है कि आदमी को तो न बच्चे पैदा करने होते, न उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करना होता। यह काम करते-करते एक महिला की उम्र इतनी निकल चुकी होती है कि वह कई किस्म की जगहों पर काम ही नहीं पा सकती। इस तरह की कुछ और छूट भी महिलाओं को यहां पर मिली है, और इससे उनके कामकाजी होने की संभावनाएं बढ़ती हैं। एक पुराना सरकारी नारा है कि नारी पढ़ेगी तो विकास गढ़ेगी। एक साक्षर महिला परिवार के बच्चों को भी आगे पढऩे में मदद करती है। इसी तरह एक आत्मनिर्भर और कामकाजी महिला परिवार की कमाई को बढ़ाती ही है, वह समाज में महिलाओं का दर्जा भी ऊपर लाती है। और ऐसी महिला किसी अच्छे या बुरे वक्त में अपनी शादीशुदा बेटी के लिए भी अधिक मददगार हो सकती है। 
लेकिन इन बातों के साथ-साथ बृंदा कारत ने कुछ और बातों को भी उठाया है जिस पर केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्यों को भी गौर करना चाहिए। उन्होंने लिखा है कि सरकार के बहुत से जनकल्याणकारी कार्यक्रमों, जैसे एकीकृत बाल विकास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और दोपहर का भोजन, में महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका है, लेकिन इन कामगार महिलाओं को सरकारी कामगार का दर्जा नहीं मिलता, इसलिए उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पाती। इस तरह सरकार ही उनकी सेवाओं का पूरा इस्तेमाल करती है लेकिन उन्हें न सही दर्जा देती न सही नौकरी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार अपने कई किस्म के कामकाज अब बाहरी एजेंसियों से करवाने लगी है, और वहां पर महिलाओं को काम पर कम रखा जाता है। 
हमारा ख्याल है कि महिला के लिए बेहतर मौके, न सिर्फ देश की उत्पादकता बढ़ाते हैं, बल्कि कामकाजी महिला के परिवार की हालत भी सुधारते हैं, जिनमें बच्चों का खानपान भी शामिल है, और उनकी पढ़ाई, सबका इलाज भी शामिल है। इस तरह एक कामकाजी महिला सरकार पर से कुछ किस्म के बोझ कम भी करती है। ठीक-ठाक खाने वाले बच्चे सरकारी इलाज पर कम बोझ बनते हैं। इसी तरह ठीक-ठाक कमाने वाली महिला अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से परे भी पढ़ाने की सोच सकती हैं। एक आत्मनिर्भर महिला परिवार और समाज की प्रताडऩा के खतरे से भी कुछ हद तक तो उबरती ही है। और हम इस बारे में अधिक चर्चा की संभावना देखते हुए यहां पर सिर्फ इस बात की शुरूआत करके इसे यहीं छोड़ रहे हैं।

editor sunil on twitter


30 sept 2012
*i feel most people who think of a war as a solution 2 any problem, have never suffered a war, even their families have not suffered one.
*one should value a day of life as a poor, hungry daily wage earner would do...
*power and authority of a person or a country comes only at a loss of others.
*one should claim to be a human only when he/she can think beyond boundaries. when humans came, there were none. if i am a prisoner of national boundaries, then i am not a human, i am a national.
*i don’t have pen today, have just eraser, so i m erasing national boundaries since morning :-) & making world peaceful pre-historical.. :-)

जाते हुए जज को लेकर...


29 सितंबर 2012
संपादकीय
भारत के पिछले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.एच. कपाडिय़ा ने इस कुर्सी पर खासी लंबी पारी पूरी की। दरअसल देश के सबसे बड़े जज बनने तक बहुत से लोग उम्रदराज हो जाते हैं, और इस ओहदे पर उनके दिन कम बचते हैं। ऐसे में जस्टिस कपाडिय़ा ने ढाई-तीन बरस लंबा कार्यकाल पूरा किया। उनके ठीक पहले तक जो मुख्य न्यायाधीश थे, वे इतने किस्म के भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गए थे और ऐसे ही लंबे कार्यकाल को उन्होंने देश के शक के बीच पूरा किया, सूचना के अधिकार को कुचलकर जजों की जायदाद छुपाने की कोशिश की, कि उनके जाने तक देश का मुंह कड़वा हो गया था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कई बार जस्टिस के.जी. बालाकृष्णन के खिलाफ कड़वी जुबान में यह लिखा था कि दलित तबके से इस ओहदे पर आने वाले पहले जज होने के बाद भी वे ताकतवर कुर्सी की जानकारी छुपाने में एक शासक की तरह डटे रहे। दूसरी तरफ जस्टिस कपाडिय़ा ने अधिक से अधिक पारदर्शिता की बात कही और ईमानदारी की साख भी जारी रखी।
भ्रष्टाचार और बेईमानी के आरोप से परे रहकर लंबी पारी काम करने वाले कपाडिय़ा के बारे में यह जानकारी शायद कुछ लोगों को न हो कि उन्होंने एक चतुर्थ वर्ग कर्मचारी की तरह जिंदगी शुरू की थी और फिर वे मुंबई में एक वकील के दफ्तर में बाबू बन गए थे। इसके बाद वे एक मशहूर मजदूर-वकील के साथ काम करते हुए वकालत के पेशे की तरफ खिंचे। बाद में वे वकील बने और शानदार कामकाज के चलते बाम्बे हाईकोर्ट के जज बने। तब से लेकर अब तक इक्कीस बरस में उन्होंने जज के रूप में एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली। यह बात कुछ लोगों बड़ी नीरस भी लग सकती है कि पूरी जिंदगी कोई बिना छुट्टी के गुजार दे, लेकिन जिस देश में काम करने की संस्कृति खत्म हो चुकी है, वहां पर अगर लोग इतने समर्पित होकर काम करते हैं, आज के इस मौके पर उसकी भी चर्चा होनी चाहिए। 
आज जब यह देश ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों को अदालत के कटघरे के रास्ते जेल जाते देखने का आदी हो चला है, तब देश की एक सबसे ऊंची कुर्सी से बेदाग जाने वाले को आज यहां पर किसी चरित्र प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है, और हो सकता है कि कुछ और बरस बाद जाकर इनके बारे में भी कोई कड़वी चर्चा सामने आए, लेकिन उससे भी यह सच नहीं बदलता कि चतुर्थ वर्ग कर्मचारी से बढ़कर कोई इंसान इस तरह देश की इस एक सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंच सकते हैं। इससे उन लोगों को भी एक समझ मिल सकती है जो कि आरक्षण के हकदार न होने से अफसोस के साथ जिंदगी गुजार देते हैं। जस्टिस कपाडिय़ा एक अल्पसंख्यक समुदाय के थे, और पारसी होने के नाते वे ऐसे अल्पसंख्यक भी नहीं थे कि उन्हें आरक्षण का किसी भी तरह का कोई फायदा मिला होता। इसलिए देश के करोड़ों लोगों को इस मिसाल से सबक लेना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र में लोग खालिस अपनी मेहनत और काबिलीयत से भी आसमान छू सकते हैं। 
दूसरी बात यह कि जैसे-जैसे लोग जनता की कुर्सियों पर ऊपर के ओहदों पर जाते हैं, वैसे-वैसे उन्हें न सिर्फ अपने कामकाज को साफ-सुथरा रखना चाहिए, बल्कि पारदर्शी भी रखना चाहिए। किसी भी पहाड़ की चोटी चारों तरफ से दूर-दूर से दिखती है। पिछले मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बालाकृष्णन ने जनता और लोकतंत्र की इसी उम्मीद का सम्मान नहीं किया था और अपनी निजी दौलत को एक मोटे और लंबे-चौड़े काले अदालती लबादे के भीतर छुपाकर रखने की हर मुमकिन और नामुमकिन कोशिश की थी। आज के जमाने में, सूचना का हक लागू होने के बाद यह मुमकिन नहीं है। इसलिए आज वे तरह-तरह की जांच से भी घिरे हुए हैं, और कल रिटायर हुए जस्टिस कपाडिय़ा की जनछवि और साख के मुकाबले में खासे कमजोर भी लगते हैं। 
भारतीय लोकतंत्र आज आस्था के बहुत बड़े अकाल से गुजर रहा है। जिस तरह आधी सदी के और पहले का बंगाल का अकाल दसियों लाख जानें ले गया था, उसी तरह आज इस देश में दसियों करोड़ लोगों का भरोसा इस लोकतंत्र पर से खत्म हो चुका है। ऐसे में किसी भी कुर्सी पर आने वाले लोगों को इतिहास और अधिक बारीकी से देखते और दर्ज करते चलेगा। भारतीय लोकतंत्र की एक दूसरी विविधता वाली, और संभावनाओं वाली तस्वीर भी आज सामने आती है, जब एक दलित मुख्य न्यायाधीश के बाद आए एक अल्पसंख्यक पारसी मुख्य न्यायाधीश, एक नए अल्पसंख्यक मुस्लिम न्यायाधीश के हवाले कुर्सी छोड़कर जा रहे हैं।
लेकिन आज यहां लिखने का खास मकसद यही है कि एक तरफ तो देश के निराश लोग यह भी समझें कि अभाव के बीच से बढ़कर एक चतुर्थ वर्ग कर्मचारी किस तरह देश का मुख्य न्यायाधीश बनता है। काम करने वाले लोग यह समझें कि किस तरह अदालती बोझ से निपटने के लिए एक जज इक्कीस बरस तक बिना छुट्टी लिए काम कर सकता है। और तीसरी बात यह कि भ्रष्टाचार के सारी संभावनाओं के चलते हुए भी लोग किस तरह अपना लंबा कार्यकाल ईमानदारी से पूरा करके जा सकते हैं, काबिलीयत से भी। और नए मुख्य न्यायाधीश पर यह भी जिम्मा है कि देश में फैली हुई अनास्था, लोगों के मन में भरा हुआ गहरा शक, खत्म करने में वे अदालती जिम्मेदारी को पूरी तरह पूरा करें।

वल्दियत का ओछा सवाल


संपादकीय
28 सितंबर
उत्तराखंड में इन दिनों एक उपचुनाव चल रहा है जिसमें वहां के कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे उम्मीदवार हैं। उनके खिलाफ चुनावी सभा में प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यारी ने विजय बहुगुणा की वल्दियत पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने कहा कि विजय बहुगुणा को हेमवती नंदन बहुगुणा का बेटा साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट करवाना होगा। पुराने लोगों को याद होगा कि हेमवती नंदन बहुगुणा अविभाजित उत्तरप्रदेश के बहुत बड़े नेता माने जाते थे और राज्य से केन्द्र तक वे बहुत से बड़े ओहदों पर रहे। उत्तरप्रदेश और उसी का हिस्सा, इस उत्तराखंड में उन्हें इज्जत के साथ याद किया जाता है।
इस तरह की जुबान राजनीति में बीच-बीच में सामने आती रहती है, और जिस तरह मीडिया किसी जुर्म और हैवानियत को भी रिपोर्ट करता है, उसी तरह ऐसी बातें भी खबरों में जगह पाती हैं। उनको पूरी तरह अनदेखा करना उसी तरह नामुमकिन होता है जिस तरह जुर्म की खबरों को पूरी तरह छोड़ा नहीं जा सकता। और जिस बुरी बात के खिलाफ लिखना है, उस बात को भी सामने रखते हुए ही उसके खिलाफ तर्क रखे जा सकते हैं। दो ही दिन पहले हमने समाज की सोच और भाषा में कमजोर तबकों और महिलाओं के खिलाफ बेइंसाफी के बारे में लिखा था। अभी वह अखबार रद्दी भी नहीं बन पाया है कि देहरादून से एक खबर यह आई, और दूसरी तरफ मध्यप्रदेश से एक खबर आई है कि राज्य के पर्यटन मंत्री, राजघराने वाले तुकोजी राव ने महिलाओं से बात करते हुए, उन्हें बाघिन और खुद को बाघ, जैसी कोई बात कही। 
सार्वजनिक जीवन में लोगों को अपनी भाषा को लेकर न सिर्फ चौकन्ना होना चाहिए, बल्कि उन्हें न्यायपूर्ण भी होना चाहिए। किसी की आलोचना करना बहुत से मौकों पर जरूरी होता है। लेकिन आलोचना के तर्क न्यायसंगत होने चाहिए, आलोचना के तथ्य खरे होने चाहिए, और आलोचना में इस्तेमाल विशेषणों का वजन खामियों के अनुपात में ही होना चाहिए। ऐसा न हो कि किसी जेबकतरे को जुबानी फांसी दे दी जाए, या सैकड़ों के हत्यारे को लापरवाह कहकर मान लिया जाए कि उसकी आलोचना हो गई। यह एक मुश्किल काम होता है, और बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े अखबारनवीस इसमें चूक जाते हैं, लेकिन फिर भी हम समय-समय पर इसकी अहमियत सामने रखते चलते हैं और लोगों को याद भी दिलाते चलते हैं, और खुद भी आत्मविश्लेषण, आत्ममंथन करते हैं कि अपनी जुबान और अपने तर्कों में हम कहीं बेइंसाफी तो नहीं बरत रहे हैं। 
सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को लेकर जब ओछी बात की जाती है, तो ऐसी बेइंसाफी करने वाले, बड़बोले नेताओं का ही अधिक नुकसान होता है। कुदरत की हकीकत तो यह है कि पैदा होने वाला हर बच्चा जायज होता है, और उसकी मां तय होती है। एक पुरानी लाइन है- मदरहुड इज अ श्योरिटी, फॉदरहुड इज अ प्रॉबेबिलिटी। इसलिए किसी का पिता कौन है, इसको लेकर उस बच्चे या उसकी मां के अलावा किसी और को यह सवाल उठाने का न तो नैतिक हक है और न ही इसका कोई महत्व है। भारतीय संस्कृति का नाम लेकर जो लोग राजनीति करते हैं, उन्हें भारत की पौराणिक परंपराएं भी याद रखनी चाहिए कि यहां तो समाज में औपचारिक रूप से नियोग की प्रथा थी, जिसमें कोई शादीशुदा महिला जरूरत होने पर पति से परे भी दूसरे पुरूष से गर्भवती हो सकती थी, और वैसी संतानें किसी तरह के अपमान का कारण नहीं होती थीं। महाभारत में ही ऐसे उदाहरण हैं, और समाजशास्त्र में भी इसका जिक्र है। इसलिए हम परिवार के बाहर के किसी तीसरे-चौथे व्यक्ति के उठाए गए ऐसे मुद्दों को एक निहायत गैरजरूरी गाली-गलौज से अधिक नहीं मानते और इसको पूरी तरह नामंजूर किए जाने की जरूरत है। जो भी नेता ऐसे बयान देते हैं, वे अपनी पार्टी और अपना खुद का नुकसान भी करते हैं। राजनीति में एक-दूसरे पर हमले करते हुए लोगों को यह याद रखना चाहिए कि वल्दियत की सारी सोच एक अन्यायपूर्ण पुरूष प्रधान समाज की है, और उसको खत्म करने के लिए जरूरत अगर हो तो उसके खिलाफ खासी गंभीर कानूनी कार्रवाई भी लोगों को करनी चाहिए। जिस पार्टी के लोग ऐसे बयान देते हैं, उन पार्टियों को भी अपने लोगों के बारे में सोचना चाहिए।



गूगल की सालगिरह पर


संपादकीय
27 सितंबर
दुनिया में आज सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला इंटरनेट सर्च इंजिन गूगल चौदह बरस का हो गया है। इसका नाम और इसका काम, कुछ उसी तरह का हो चुका है जिस तरह कि एक वक्त वनस्पति घी को डालडा नाम से जाना जाता था, और आज भी पाइप से पम्प लगाकर पानी चोरी करने वाले हर पम्प को टुल्लू पम्प लिखा जाता है। आज जब किसी को कोई जानकारी ढूंढनी होती है तो उसे इंटरनेट पर सर्च करना कहने के बजाय, यह कहा जाता है कि गूगल कर लो। इस तरह गूगल एक नाम के बजाय, एक काम बन गया है। 
वैसे तो सालगिरह खुशी का मौका होता है और इस मौके पर किसी कड़वी चर्चा का कोई काम नहीं होता, लेकिन गूगल के बारे में कुछ कड़वी चर्चा किए बिना उसे इस्तेमाल करने वाले दुनिया के लोगों के बारे में अगर बात करें तो ऐसा लगता है कि लोगों की कल्पनाशीलता कहीं इस हैरतअंगेज औजार की वजह से कम तो नहीं हो रही है? हमारी यह बात हो सकता है विकास के खिलाफ रहने वाले कुछ बुजुर्गों की एक तंगदिली और तंगनजरिए की बात लगे, लेकिन फिर भी इस मौके पर गूगल से नफे-नुकसान के बारे में कुछ सोचना चाहिए। आज छोटे-छोटे बच्चे भी इस सर्च इंजिन पर अपनी पढ़ाई और स्कूल के अपने काम के बारे में कोई भी जरूरत होने पर जुट जाते हैं। और हमारी तरह की पेशेवर अखबारनवीस भी इस गूगल के बिना कुछ मिनट भी नहीं गुजार पाते। 
अमरीका की इस कंपनी के इंटरनेट पर इस अनकहे-अनलिखे एकाधिकार से दुनिया पर किस तरह का खतरा हो सकता है, इस बारे में भी बहुत से लोग फिक्र करते हैं। दरअसल गूगल के मार्फत ढूंढी गई किसी भी जानकारी को गूगल न सिर्फ दर्ज करते चलता है बल्कि उसका बाजारू इस्तेमाल भी करता है। कहने को गूगल का यह दावा जरूर है कि वह ऐसी जानकारी को गोपनीय रखता है और लोगों की गोपनीय जानकारी को बाहर उजागर नहीं होने देता। लेकिन यह बात तो जगजाहिर है कि आज के जमाने में कानूनी या गैरकानूनी तरीके से ताकतवर जांच एजेंसियां लोगों की निजी पसंद, निजी जरूरत, इन सबको तलाशती रहती हैं। ओसामा-बिन-लादेन की हत्या को अगर देखें तो सीआईए ने पाकिस्तान में ओसामा के बच्चों के मार्फत उसका डीएनए पाने के लिए एक फर्जी टीकाकरण अभियान चलाया, और संदिग्ध इलाकों में बच्चों को टीके लगाते हुए उनके डीएनए इक_े किए और उसके मिलान से ओसामा तक पहुंचकर उसकी हत्या की। इसलिए कोई बहुत मासूम और भोला बच्चा ही इस बात पर भरोसा करेगा कि अमरीकी सरकार और अमरीकी एजेंसियां इस गूगल में दर्ज होती चल रही जानकारी का इस्तेमाल नहीं कर रही होगी। दरअसल गूगल हो या किसी भी और तरह के दूसरे मुफ्त के ऐसे औजार जो इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को अमरीकी कंपनियां उपलब्ध कराती हैं, उन सबके बारे में यह मानकर चलना चाहिए कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां उनके मार्फत दुनिया के हर इंसान पर न सिर्फ नजर रख रही हैं, बल्कि उससे नतीजे भी निकाल रही हैं। एक अमरीकी फिल्म -एनेमी ऑफ द स्टेट- जिन लोगों ने देखी है उनको करीब पन्द्रह बरस पहले ही यह अंदाज लग गया होगा कि अमरीकी सरकार के राज में वहां के नागरिकों की निजी जिंदगी का क्या हाल होने जा रहा है। और 1998 में बनी इस फिल्म से लेकर अब तक इसकी हर कल्पना अब तक अमल में आ चुकी है। ऐसे में अमरीका से बाहर के देशों में, जहां पर कि, अमरीका को निजी अधिकारों की फिक्र और भी कम है, वहां के लोगों के अधिकारों के लिए अमरीका को कोई फिक्र क्यों होगी? और जब विकलीक्स अमरीका के सारे खुफिया संदेशों को पाकर उनको इंटरनेट पर डाल सकता है, तो यह सोचना भी बेकार है कि अमरीका की पहुंच गूगल के मार्फत दुनिया के लोगों तक नहीं होगी। 
इसलिए इंटरनेट पर लोग जो कुछ भी करते हैं, उससे उनको खतरा तभी तक नहीं है जब तक कि वे महत्वहीन हैं। जिस दिन वे महत्वपूर्ण हो जाएंगे, और उनको नुकसान पहुंचाना या उनको ब्लैकमेल करना अमरीका के फायदे का हो जाएगा, उस दिन अमरीकी एजेंसियां लोगों की तलाशी हुई एक-एक तस्वीर, एक-एक वीडियो क्लिपिंग, इंटरनेट पर दोस्तों से की गई एक-एक बात के सुबूत लेकर लोगों के दरवाजे खटखटाती रहेंगी, जैसे कि वे ओसामा के दरवाजे तक पहुंच गई थीं, और उनसे अपने मनचाहे काम करवा लेंगी। जो औजार आज की दुनिया में लोगों को इतनी बड़ी सहूलियत देता है, उसकी वेबसाइट पर गोपनीय कही जाने वाली जी-मेल जैसी सेवाएं, सीआईए के लिए जानकारी और सुबूत जुटाने वाली एक कंपनी भी हो सकती है। दुनिया में सरकारें, हथियारों के सौदागर, जासूसी एजेंसियां, ये सब हर किस्म के गैरकानूनी तरीकों से अपना काम करती हैं, और इसको याद रखते हुए ही लोगों को गूगल करना चाहिए।


मॉल की रौशनी में भी अंधेरा


संपादकीय
26 सितंबर
अभी तीन मिनट पहले हरियाणा से एक खबर आई है कि जिंद इलाके के एक गांव में एक दलित महिला से तीन लोगों ने बलात्कार किया है। अभी रोजाना यह खबर आ ही रही है कि किस तरह एक दलित लड़की के साथ कुछ लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार करने के बाद उस लड़की के पिता ने आत्महत्या कर ली। उसके बाद बड़ी मुश्किल से पुलिस इस मामले में कुछ लोगों की गिरफ्तारी के लिए तैयार हुई है। 
जिस भारत में आज लोगों को जाति के आधार पर आरक्षण गैरजरूरी लगता है, उनको तकरीबन हर दिन के अखबारों में कहीं न कहीं, किसी न किसी दलित से, आदिवासी से गैरदलित-आदिवासी द्वारा बलात्कार की खबरें भी पढऩे जरूर मिलती होंगी। कहीं किसी सार्वजनिक कुएं से पानी लेने पर दलित के हाथ काट दिए जा रहे हैं तो कहीं इसी तरह की कोई दूसरी ज्यादती हो रही है। कुल मिलाकर भारत के हिन्दू समाज के भीतर का हाल यह है कि सवर्ण तबका न तो दलित आदिवासी को उसका हक देने तैयार है और न ही उसे किसी दूसरे धर्म में वह जाने देना चाहता है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए मध्यप्रदेश में ऊंची कही जाने वाली जातियों का दबदबा इतना है कि दबंग सवर्ण रोज ही किसी दलित से ज्यादती करते हैं, और वहां का सामाजिक वातावरण सुधर नहीं पा रहा है। इसकी कुछ वजहों में से एक यह भी है कि सत्ता पर सवर्ण हावी हैं, और दूसरी बात यह कि जो दलित-आदिवासी सत्ता पर पहुंचते हैं, वे अपने तबके के हितों को अपने खुद के आगे बढऩे के लिए इस्तेमाल करते हैं, और तबका धरे रह जाता है। 
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की बेइंसाफी को हजारों बरसों से चल ही रही है, सभी तरह के कमजोर तबकों के खिलाफ भारत के ताकतवर तबकों के मन में न सिर्फ भारी हिकारत है, बल्कि उन पर जुल्म रात-दिन जारी रहते हैं। दलित-आदिवासी, अल्पसंख्यक, बुजुर्ग, गरीब, महिलाएं, बच्चे, विकलांग, सभी तरह के कमजोर, या कमजोर रखे गए लोगों पर तरह-तरह की ज्यादती चलती रहती है। इन दिनों भारत के बहुत बड़े हिस्से में गणेशोत्सव चल रहा है। गणेश की आरती को अगर ध्यान से सुनें, तो उसके शब्द हैं- ...बांझन को पुत्र दे...। अब इसके शब्दों पर ध्यान दें तो महिला को संतान न होने पर इस तरह से बांझ करार दे दिया जाता है मानो बच्चे पैदा करने के लिए वह अकेली जिम्मेदार है, और ऐसे मामलों में पुरूष में कोई कमी मानो हो ही नहीं सकती। और फिर गणेशजी की आशीर्वाद से अगर संतान हो भी जाए, तो उसका पुत्र होना ही आरती में माना गया है। 
जिन कमजोर तबकों का हमने ऊपर जिक्र किया है, उनको भारत का असभ्य समाज अपनी हिंसा के साथ कमजोर रखते चलता है, तुलसीदास से लेकर, उनके भी पहले के वेदों तक की बात दलितों को याद रहती है कि शूद्र के कानों में वेद के शब्द भी अगर पड़ जाएं तो उनमें पिघला हुआ सीसा भर देना चाहिए। यह दौर आज तक चल रहा है, और हमने इस आरती का जिक्र इसलिए किया है कि धर्म कदम-कदम पर कमजोर तबकों पर हिंसा सुझाते चलता है। उसका सारा साथ ताकतवर तबकों के लिए होता है, वह राजा भी रह सकता है, सेठ हो सकता है, और मर्द तो होता ही है। एक गैरबराबरी वाले समाज में जिस तरह दलित लड़कियों और महिलाओं के साथ रोजाना सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, उसी तरह के हादसे बाकी कमजोर तबकों के साथ भी जगह-जगह होते हैं। कुछ दिन पहले ही नागपुर में पुलिस ने एक आईआरएस अफसर को गिरफ्तार किया जिसने अपनी आईआरएस अफसर बीबी की अश्लील फिल्म बनाकर, उसे ब्लैकमेल करके दहेज वसूलने की कोशिश की थी। अब अगर केन्द्र सरकार की एक बड़ी अफसर के साथ ऐसा हो सकता है तो फिर देश की बाकी महिलाओं के साथ क्या नहीं हो सकता, क्या नहीं होता होगा, क्या नहीं हो रहा है। 
कोई देश सड़कों और पुलों से, जगमगाती रौशनी और लदे हुए बाजारों से बड़ा और महान देश नहीं बनता। जब तक किसी प्रदेश में बराबरी की बात नहीं होती, बेइंसाफी खत्म नहीं होती, तब तक हरियाणा के सारे मॉल मिलकर भी उस प्रदेश को सम्मान नहीं दिला सकते। 

editor sunil on twitter


26 sept 2012
*  when you kill an innocent, it is not end of just that innocent, it is also end of a lot of more innocence all around.
*  @pitrodasam why Right to Info not converted in 2, ‘Responsibility 2 Inform’ ? digital discloser is cheapest & saves RTI efforts.

लोकतंत्र में सूचना का अधिकार नहीं, सूचना की जिम्मेदारी होनी चाहिए...


संपादकीय
25 सितंबर
प्रधानमंत्री के सलाहकार सैम पित्रोदा आज दोपहर बाद ट्विटर पर एक प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं जिसमें कोई भी उनसे सवाल-जवाब कर सकेंगे। वे भारतीय प्रधानमंत्री के जनसूचना ढांचे और नई मौलिक सोच जैसे मामलों में सलाहकार हैं, और लोग उनके नाम से जानकार भी हैं कि वे राजीव गांधी के समय से दूरसंचार सलाहकार भी रहे और केन्द्र सरकार के कई तरह के मिशनों पर भी उन्होंने काम किया। आज की उनकी प्रेस कांफ्रेंस सूचना के लोकतंत्रीकरण पर है और उन्होंने लोगों से इस पर सवाल बुलवाए भी हैं। मोटे तौर पर यह मामला देश में बहुत चर्चित एक कानून, सूचना के अधिकार (आरटीआई) से जुड़ा हुआ है। 
आज भारत में देश-प्रदेश में जितने किस्म के भांडाफोड़ हो रहे हैं उनमें से अनगिनत के पीछे सूचना के अधिकार के तहत मिली हुई जानकारी है। आरटीआई देश के सामाजिक आंदोलनों के भीतर एक बहुत आक्रामक अंदाज वाला आंदोलन बन गया है, मीडिया के भीतर आरटीआई का इस्तेमाल एक सबसे बड़ा औजार बन गया है, और सरकार या दूसरे किसी भी संवैधानिक ढांचे, जनता के पैसों पर होने वाले किसी भी काम को लेकर आरटीआई ने घपलों का तौलिया खींच देने जैसा काम किया है। कई प्रदेशों में आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या भी हुई, और बहुत अधिक जगहों पर उन पर हमले भी हुए। यह कानून इसी यूपीए सरकार के पिछले कार्यकाल में बना और इस सरकार की करतूतों और कारनामों को उजागर करने में इसी से सबसे अधिक मदद मिली। जानकार लोगों का यह भी कहना है कि सोनिया गांधी के जिन गैरसरकारी सलाहकारों ने इस कानून की सोच को सामने रखा, आगे बढ़ाया, और ढांचा भी बनाकर दे दिया, उनके खड़े किए हुए इस खतरे की समझ सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं थी, इसलिए वे इसके खिलाफ समय रहते कोई अड़ंगा नहीं लगा पाए, और आज कदम-कदम पर वे लोग फंस रहे हैं। 
खैर, हम आज इस पर यह चर्चा करना चाहते हैं कि सूचना पाने के इस अधिकार को बदलकर सूचना देने की जिम्मेदारी बनाना चाहिए। आज एक जानकारी पाने के लिए लोगों को महीनों तक सरकारी दफ्तरों में धक्के खाने पड़ते हैं। इतनी मेहनत वे ही लोग कर पाते हैं जो खरे आंदोलनकारी होते हैं, पेशे से अखबारनवीस होते हैं, या मेहनतकश-ब्लैकमेलर होते हैं। इनसे परे अगर कोई आम इंसान सूचना पाने की कोशिश करे तो इतने महीनों के धक्के झेलना मुश्किल होता है। और सत्ता चाहे वह सरकार की हो, संसद की हो, या सुप्रीम कोर्ट की हो, उसके मिजाज में आज भी वह पुराना सामंती अंदाज हावी है जो कि किसी भी सूचना को देने से उसे रोकता है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जब जजों के बारे में वह सूचना देने से मना कर देते हैं जो कि छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी को भी देने की मजबूरी है, तो वे इस अधिकार के खिलाफ काम करते हैं। और मजे की बात यह कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इस प्रशासनिक फैसले के खिलाफ आदेश दिया कि जजों के बारे में आरटीआई के तहत जानकारी नहीं दी जाएगी। जिस अदालत का आदेश इस देश में संसद द्वारा पलट देने के पहले तक कानून का दर्जा रखता है, उसका प्रशासनिक फैसला सूचना के अधिकार पर इस कदर बेइंसाफी का था। 
सरकार राजधानियों और जिला मुख्यालयों में हर फाईल, हर कागज को सीधे इंटरनेट पर डाल देने का काम बिना अधिक लागत बहुत आसानी से कर सकती है। जिससे लोग घर बैठे आधी रात को भी किसी भी फाईल को पढ़ सकेंगे और उसमें गड़बड़ी का खतरा घटते चले जाएगा। आज के कम्प्यूटर और संचार तकनीक के जमाने में यह काम आरटीआई इस्तेमाल करने वाले लोगों के धक्के खाने और कागज बर्बाद करने के मुकाबले सस्ता पड़ेगा। सरकार चाहे तो इसकी लागत निकालने के लिए इस पर उसी तरह की मामूली फीस लगा सकती है, जैसी फीस आज भी सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वालों को देनी पड़ती है। इसकी शुरुआत सारे गैरगोपनीय कागजों को लेकर सैम पित्रोदा प्रधानमंत्री के कार्यालय से ही शुरू कर सकते हैं और फिर धीरे-धीरे यह पूरे देश तक फैलने वाली जिम्मेदारी बन सकती है। हमारा तो यह भी सोचना था कि सूचना के अधिकार को लेकर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक जितने मामले जाते रहते हैं, उन पर से किसी पर फैसला देते हुए अदालतें ही शायद खुद होकर इस अधिकार को जिम्मेदारी करार देंगी। लेकिन अदालतों के रूख से भी जाहिर है कि वे खुद बहुत सी बातों को छुपाकर रखना चाहती हैं इसलिए उनसे भी ऐसी उम्मीद शायद कभी पूरी नहीं हो पाएगी।
इसलिए हमारा यह मानना है कि इस देश में पद की गोपनीयता की जो शपथ दिलाई जाती है, उसे बदलकर पद की पारदर्शिता की शपथ बना देना चाहिए। जो गोपनीय बातें हैं वे आज भी सूचना के अधिकार में अलग से दर्ज की गई हैं, और सरकार या दूसरी एजेंसियों को, संवैधानिक संस्थाओं को उनको छुपाए रखने की छूट है। लेकिन इससे परे की जो बातें हैं, उनको लेकर गोपनीयता की शपथ शब्द ही सूचना के अधिकार की लोकतांत्रिक-पारदर्शिता की भावना के खिलाफ है। इसलिए आज जब प्रधानमंत्री के सलाहकार इस मुद्दे पर दुनिया से खुली बातचीत करने जा रहे हैं, तो हमारी सलाह यह है कि अब भारतीय लोकतंत्र को सूचना के अधिकार के तहत हासिल हो सकने वाली हर जानकारी को खुद होकर सामने रख देने की जिम्मेदारी का कानून बना देना चाहिए।

editor sunil on twitter


25 sept 2012
* no cheetah would drop spots just because priyanka or shahrukh promoting fairness cream?
* after rise & fall of Nirmal Baba, some new babas have surfaced on purchased slots of indian tv channels. how they can be legally kicked out?
* naveen jindal got a salary of just above 730 millions/year. naturally poor guy had to take 369 subsidised cooking gas cylinders in a year.

24 sept 2012


23 sept 2012


बेहतर सरकार, फिर भी बदहाल बिहार के गांव


संपादकीय
24 सितंबर 2012
देश में कुछ दूसरे राज्यों से बेहतर माने जाने वाले बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार के पिछले लालू राज से बेहतर सरकार चलाने वाला भी माना जाता है। लालू-राबड़ी का राज वहां खासा लंबा चला था, और उस दौरान न सिर्फ जानवरों का चारा खा लिया गया, बल्कि अपने-आपको समाजवादी कहने वाले लालू यादव ने कुनबापरस्ती का वह हाल दिखाया जो कि गांधी-नेहरू परिवार कुनबापरस्ती के लिए बदनाम रहने के बावजूद नहीं दिखा पाया था। अदालती कार्रवाई के चलते जब लालू को सरकार छोडऩी पड़ी थी तो उन्होंने अपनी घरेलू पत्नी को पल भर में मुख्यमंत्री बनाकर कार की पिछली सीट से स्टीयरिंग संभालने की एक नई मिसाल पेश की थी। उसके बाद वहां पर उनकी पत्नी के भाई से लेकर और लोगों तक सरकार जिस तरह बिछी रही, वह भी इतिहास में दर्ज है। 
लेकिन आज यहां लालू पर चर्चा का कोई मौका नहीं है। मौजूदा मुख्यमंत्री वहां पर एक अधिकार यात्रा निकाल रहे हैं और इसकी शुरूआत में एक विरोध हुआ है जिसे उन्होंने लालू यादव पर जड़ दिया है। हो सकता है कि यह विरोध सही हो, और यह भी हो सकता है कि नीतीश का कहना सही हो। लेकिन इससे भी इस बात पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पांच बरसों में भी बिहार का हाल बहुत बेहतर नहीं हो पाया है। अभी किसी ने राज्य का दौरा करके बीबीसी पर इसके बारे में लिखा है कि विकास और संपन्नता की चकाचौंध वहां पटना से आगे नहीं निकल पाई है। जैसे-जैसे राजधानी से दूर जाएं, वैसे-वैसे जिंदगी के हर दायरे में अंधेरा बढ़ते चलता है। कल ही जब हमने असम और उत्तर-पूर्व के बारे में लिखा, तो वहां भी दिल्ली में बैठी सरकार की नजर पहुंचते हुए बहुत धुंधली हो जाती है। यह हाल हमने अविभाजित मध्यप्रदेश में भोपाल की सरकार का छत्तीसगढ़ को लेकर रूख देखते हुए भी देखा था। अब छत्तीसगढ़ में कुछ लोगों को लगता है कि बस्तर के दूर के इलाके राजधानी रायपुर से अनदेखे रह जाते हैं। 
प्रशासन या शासन, इसके लिए एक व्यवहारिक आकार की जरूरत होती है। एक छोटा राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ ने जो तरक्की की है, उसी के आसपास की तरक्की शायद झारखंड की भी हुई होती अगर वहां पर सरकारें लूटपाट में न लगी होतीं। मुख्यमंत्रियों से लेकर राज्यपाल तक जिस कदर कमाई में और जुर्म में लगे रहे, वैसा तो शायद देश के किसी दूसरे राज्य में कभी दर्ज नहीं हुआ। इसलिए झारखंड को एक छोटे राज्य के रूप में असफल मानना ठीक नहीं है, जब बाड़ ही खेत खाने लगे, तो फसल के कीड़ों को क्या रोना। इसलिए उत्तरप्रदेश हो या बिहार, बहुत बड़े राज्यों के दिन अब नहीं रह गए हैं। छोटे राज्य अस्तित्व में आने के बाद से बेहतर बनने की संभावना रखते हैं। नीतीश कुमार बहुत से मामलों में भले लगते हैं। उनका निजी जीवन शायद लालू यादव के मुकाबले अधिक समाजवादी है, सादगी से भरा है। एनडीए के भीतर रहते हुए भी वे साम्प्रदायिकता के गुलगुले से परहेज करते दिखते हैं। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए वे यह भी कह चुके हैं कि वे 2014 में केंद्र में ऐसी किसी भी पार्टी को सरकार बनाने में साथ देंगे, जो कि बिहार को विशेष दर्जा देगी। 
विशेष दर्जे की ऐसी नौबत ठीक नहीं है। और बिहार के गांवों के बारे में जो खबरें आती हैं, वे कुछ उसी तरह की हैं जैसी कि उत्तरप्रदेश के गांवों के बारे में है। और यह बात भी जाहिर है कि भौगोलिक रूप से देश के बीचों-बीच होने के बावजूद अगर उत्तरप्रदेश और बिहार में उद्योग और व्यापार नहीं पनप पाए हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह देश-विदेश के कारोबारियों का वहां पर भरोसा नहीं पनप पाना भी है। उत्तरप्रदेश को बांटने की मांग लंबे समय से चल ही रही है, बिहार का आकार भी विकराल है। और पहले के मुकाबले पिछले पांच बरस की बेहतर सरकार भी अगर बिहार के गांवों की हालत नहीं सुधार पाई है, तो यह नौबत बदलने के लिए शायद पटना के अलावा एक और राजधानी की जरूरत है। 

एक तजुर्बा, मीडिया गुफा का...


24 सितंबर 2012
नेपाल में इन दिनों एक बड़ा दिलचस्प तजुर्बा हुआ है। मीडिया से जुड़े एक संगठन ने इसी पखवाड़े वहां मीडिया-गुफा नाम का एक प्रयोग किया जिसमें वहां के कुछ चुने हुए पत्रकार शामिल किए गए। इंटरनेट और कम्प्यूटर पर काम करने के आदी पांच पत्रकार 72 घंटों के लिए बिना किसी टेलीफोन के एक कमरे में बंद कर दिए गए। उनको सिर्फ इंटरनेट पर खबरों को देखकर इंटरनेट पर ही लिखना था और उनकी रिपोर्ट्स ग्रामीण इलाकों के आम सरोकारों से जुड़ी हुई बहुत अच्छी रिपोर्ट होने की शर्त भी थी। इस दौरान तैयार की गई रिपोर्ट कुछ समय में सामने रखी भी जाएंगी।
इस बारे में छपी खबर के मुताबिक, आयोजकों का कहना है कि वह केवल इंटरनेट के जरिये मिली जानकारियों से स्टोरी तैयार करने की संभावनाओं का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं जिससे कि ग्रामीण नेपाल को मीडिया में ज्यादा कवरेज दिलाई जा सके। इन पत्रकारों को सिर्फ इंटरनेट की सहूलियत दी गई है और खबरों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए वो उसका हर तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन उन्हें अपना मुंह बंद रखना होगा। 
'इन लोगों को लैपटॉप कंप्यूटर जैसे उपकरण तो दिए गए हैं लेकिन न तो उन्हें फोन पर किसी से बात करने की इजाजत है न ही आपस में। कैंप में शामिल गुनराज लुइतेल ने बताया, नेपाली में गुफा का मतलब पहाड़ की कंदरा होता है। हमारे इतिहास में बुद्घिमान लोग अकसर ज्ञान के लिए गुफाओं में जाकर वक्त बिताया करते थे, अब नई मीडिया के बारे में जानकारी जुटाने की हमारी बारी है।Ó
'इन पत्रकारों से उम्मीद लगाई गई है कि ये लोग स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु में बदलाव, स्त्री पुरुषों और बच्चों से जुड़ी ग्रामीण खबरें तैयार करेंगे। इसका विचार उन्हें फ्रांस में इसी तरह के एक आयोजन से मिला जिसके बारे में उन्होंने इंटरनेट पर पढ़ा था।Ó
'रिपोर्ट में एक पत्रकार ने कहा-यह सीखने को मिलेगा कि सोशल मीडिया को एक उपकरण की तरह कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। केवल इंटरनेट के जरिये खबर ढूंढना और सारे इंटरव्यू इंटरनेट के जरिए करना एक कठिन काम है क्योंकि नेपाल में इंटरनेट का इस्तेमाल उतना नहीं होता, लेकिन एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए यह एक शानदार अनुभव होगा।Ó
'पत्रकारों के साथ तीन रिसर्चरों की एक टीम भी है जो उनके कामकाज और व्यवहार पर नजर रखेगी और उन्हें दर्ज करेगी। इन शोधकर्ताओं का कहना है-हम उनके मानसिक तनाव पर नजर रखेंगे और साथ ही उनकी आदतों में होने वाले बदलाव पर भी। इन जानकारियों का बाद में इस्तेमाल होगा।Ó
अब इस प्रयोग पर अगर आज बात करें तो दुनिया में मीडिया की शक्ल इंटरनेट से दो किस्म से बदल गई है। एक तो यह कि खुद अखबारनवीसों के लिए दुनिया अब बहुत बड़ी हो गई है, पल भर में वे दुनिया भर की बातों को वे जान जाते हैं, और अंगे्रजी के साथ-साथ हिन्दी, दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं या बोलियां जिस तरह से इंटरनेट पर पहुंच चुकी हैं उससे इन भाषाओं-बोलियों वाले लोग भी इंटरनेट को पढऩे लगे हैं और इंटरनेट पर लिखने लगे हैं। लेकिन बात यहीं तक नहीं रह गई है। सिर्फ पाना और देना होता तो भी उसकी एक सीमा होती। इंटरनेट पर तमाम किस्म की वेबसाईटों पर जिस तरह से लोगों के बीच अंतरसंबंध बढ़ रहे हैं, उससे भी लोगों का दायरा अपने शहर और अपने दोस्तों से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुंच चुका है। 
ऐसे में जब कुछ पत्रकार जब यह तय करते हैं कि वे टीवी और टेलीफोन से दूर रहकर इंटरनेट पर ही पढ़कर और लिखकर अखबारनवीसी करेंगे, तो यह कुछ उसी किस्म की बात लगती है जैसी कि कहानियों में किसी पहाड़ पर तपस्या करते हुए किसी ऋषि के बारे में कहा जाता है कि वहां आंखें बंद करके ध्यान करते हुए भी वे पूरी दुनिया की खबर रख लेते थे। कुछ लोगों को त्रिकालदर्शी जो कहा जाता था, वे भी कुछ इसी किस्म की खूबी वाले रहे होंगे और उनके पास टेलीफोन-इंटरनेट के बिना भी गूगल रहा होगा। 
आज इस मुद्दे पर मैं इसलिए लिख रहा हूं कि न सिर्फ इस दायरे में, बल्कि दुनिया के हर दायरे में लोग कभी-कभी एक कसरत के लिए ऐसा कर सकते हैं। लोग अपने बदन को एक कसौटी पर कसने के लिए कभी उपवास करते हैं, तो कभी कई किस्म के योग करते हैं। कुछ लोग कुछ समय के लिए मौनव्रत रखते हैं। कुछ लोग साल के किसी एक पखवाड़े हजामत नहीं बनाते। इन दिनों ऐसे लोग भी मिल रहे हैं जो कि फेसबुक जैसी यारी-दोस्ती और सामाजिक अंतरसंबंधों वाली वेबसाईट पर न जाने के दिन या घंटे तय कर लेते हैं कि इनके बिना किस तरह रहा जा सकता है।
मेरे जैसे कुछ लोग साल में कभी-कभी यह कोशिश भी कर देखते हैं कि पान-सुपारी के बिना कितने दिन रहा जा सकता है। 
फिर से मीडिया गुफा की तरफ लौटें तो यह प्रयोग बड़ा दिलचस्प लगता है। देखने, सुनने, चखने, सूंघने और छूने की शारीरिक क्षमताओं में से मानो एक दो को कुछ देर के लिए पट्टी बांधकर अलग कर दिया गया, और बाकी क्षमताओं को मौका दिया गया कि वे अपने बूते किस तरह काम चला सकती हैं। यह कुछ वैसा ही जैसा कि न देख पाने वाले कुछ लोग अपनी बाकी क्षमताओं में तेज हो जाते हैं। 
तजुर्बे के लिए अगर एक बंद कमरे में बैठकर सिर्फ इंटरनेट पर अगर लोग अपने देश, अपने इलाके और अपने कस्बे को जानना चाहते हैं, और बताना चाहते हैं, तो इससे सिर्फ उनके अपने हुनर की धार की परख नहीं होती बल्कि उनके इलाके की इंटरनेट तक पहुंच, उन इलाकों की इंटरनेट तक पहुंच, उनकी जिंदगी के मुद्दों की इंटरनेट पर जगह, जैसे बहुत से पहलू ऐसे प्रयोग में परखे जाते हैं। 
आज लोग चाहें तो अपने बच्चों को किसी एक ऐसे प्रोजेक्ट का काम दे सकते हैं जिसमें उनके पास इंटरनेट और किताबों की सहूलियत न हो। ऐसे में वे आसपास के जानकार ढूंढ़ेंगे, उनसे मिलेंगे, उनसे कुछ हासिल करने के लिए उनसे बर्ताव सीखेंगे, और यह तजुर्बा उनको दूर तक काम आएगा। आज बच्चे इंटरनेट की अपनी जिंदगी को ही एक पूरी हकीकत सा मान लेते हैं, और बच्चे ही क्यों बड़े भी ऐसा मान लेते हैं इसलिए कोई तो ऐसा प्रयोग हो जिसमें लोगों को इन दिनों चलन में बढ़ चुकी साइबर जिंदगी से लौटकर असल जिंदगी की गुफा में थोड़ा सा वक्त गुजारने मिले। कुछ समय पहले मैंने कहीं पर यह भी लिखा था कि क्या हफ्ते या महीने में कोई एक दिन या कुछ घंटे कुछ लोग बिना फोन और टीवी के भी गुजार सकते हैं।
जहां-जहां सीमाएं तय कर दी जाती हैं, जहां लोगों को सीमित साधनों से काम चलाना होता है, वहां उन्हें वह अनुभव उनको असीमित साधनों के भी बेहतर इस्तेमाल में मदद करता है। मीडिया गुफा की तरह लोग अपनी जिंदगी के किसी दायरे में कुछ वक्त के लिए ऐसी गुफा बनाकर किसी ऋषि या तपस्वी की तरह एकाग्रता की कोशिश कर सकते हैं, और उसके नफे-नुकसान भी देख सकते हैं।

इन लाखों बेघर लोगों के लिए ईश्वर के भक्त कहां हैं?


संपादकीय
23 सितंबर
असम में बाढ़ से बेघर होने वाले लोग सात लाख तक पहुंच गए हैं। और देश के बाकी हिस्से के लोग गैस सिलेंडरों को जिंदगी का अंत मानकर सड़कों पर हैं। किसी तरह की बात असम की इस हालत पर खबरों से परे सुनाई नहीं पड़ती। और पिछले कई हफ्तों से जिस असम में विदेशी नागरिकों पर देशभर में उबाल आया हुआ था, उस असम को आज डूबा हुआ देखकर भी किसी का मुंह नहीं खुल रहा है। यह तो बात हुई देश के सरहदी सूबों के लिए देश के बाकी बीच के हिस्से के मन की बेरूखी की। लेकिन इसके अलावा एक दूसरी बात यह भी सोचने की है कि क्या संपन्नता से लबालब इस देश के एक तबके के भीतर अपने ही देश के इतने मुसीबतजदा लोगों के लिए रहम का एक कतरा भी खड़ा नहीं होता? कुदरत की मार आज असम पर है कल हो सकता है देश के किसी भी दूसरी हिस्से में वह औरों पर भी हो जाए उस दिन यह संपन्न तबका क्या करेगा? आज अपने सिर पर मुसीबत नहीं है, इसलिए दूसरों के जख्मों पर अपने घर बेकार पड़ा मरहम भी लगाने का सिलसिला यहां दिखाई नहीं पड़ता। 
अंग्रेजों के समय से भारत में ईसाई चर्च के लोग जब आए, तो वे पश्चिम के देशों से बहुत सा दान भी लेकर आए और भारत में उन्होंने इलाज और पढ़ाई पर खर्च किया, और यह भी एक बड़ी वजह रही कि इससे पूरी तरह अछूते चले आ रहे भारत के गरीबों में से कुछ लोग, हिन्दू धर्म की प्रताडऩा से बाहर निकलकर ईसाई बने। चर्च में दान देने का एक लंबा रिवाज है, और उस दान का धर्म से परे बहुत जरूरतमंद लोगों पर खर्च करने का भी लंबा सिलसिला दुनियाभर में दर्ज है। धर्म और चर्च की बाकी बहुत सी खामियां हो सकती हैं, हैं, लेकिन उससे परे अगर दान की बात करें तो वह दान चर्च में आने वाले लोगों के खाने-पीने से परे भी खर्च होता है। अब अगर असम में लाखों बेघर लोगों के लिए देश के हर मंदिर, हर गुरुद्वारे में एक दिन में आने वाला दान ही दे दिया जाए, तो हो सकता है उससे असम के लोगों के सिर पर एक चादर आ जाए, और उनके पेट में कुछ रोटी आ जाए। यह भी हो सकता है कि केन्द्र सरकार के पास इन तमाम बातों के लिए खासा इंतजाम हो, लेकिन भारत के लोगों के अपने भले के लिए, अपने बच्चों के सामने एक मिसाल के लिए यह जरूरी है कि वे देश और दुनिया के लोगों की मुसीबत में मदद करने का काम करें ताकि भलमनसाहत की बात भी दूर तक सफर करे। 
आज नफरत की बात तो दूर-दूर तक चली जाती है, और नफरत से उपजी हिंसा बड़ी-बड़ी खबर भी बन जाती है। लेकिन एक-दूसरे के लिए हमदर्दी, मोहब्बत की कहानियां कभी-कभार इक्का-दुक्का सामने आती हैं। सवा करोड़ से अधिक आबादी का यह देश अगर दूसरे देशों, समाजों या धर्मों से दान की एक ऐसी परंपरा सीखे जो कि सीधे गरीबों के काम आए, तो उससे हिन्दुस्तान के लोगों के बीच आपस में भी रिश्ते मजबूत होंगे। आज भारत में धार्मिक स्थानों पर आने वाला दान करीब-करीब पूरी तरह या तो उन्हीं जगहों पर खर्च हो जाता है, या फिर वह पैसा उन्हीं धर्मों के लोगों पर खर्च होता है। अरबों की दौलत रखने वाले धर्मस्थान जालसाजी के शिकार होते हैं, मठों के महंत या वक्फ बोर्ड के लोग अपनी जायदाद को या तो खुद अफरा-तफरी में गंवाते हैं, या उसको बचाने की ताकत नहीं रखते। इसलिए देश में यह जागरूकता जरूरी है कि जो लोग ईश्वर को मानते हैं, उनके मुताबिक जो दूसरे लोग ईश्वर के ही बनाए हुए हैं, लेकिन आज मुसीबत में हैं, उनकी मदद से बड़ी कोई पूजा नहीं हो सकती। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए।

22 sept 2012


22 sept 2012


20 sept 2012


19 sept 2012


19 sept 2012


18 sept


14 sept 2012


editor sunil on twitter


22 sept2012
*i am a great believer in nature, that v reap what v sow. but humans r not as fair as nature. so don’t expect it fair with humans around :-(
*dear international day of peace, please go back, and come back only with some food.
*in this age of toughest competition, the continuous success of apple, proves one thing beyond doubt- excellence and quality matter.
*not only narendra modi, no one else too, could reach 21st century new delhi, walking on dead bodies. all should realize it.

अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक भावना तय कौन करे?


22 सितंबर 2012
संपादकीय
अमरीका की एक भड़काऊ, और अपमान करने वाली फिल्म के खिलाफ बहुत से  दूसरे मुस्लिम देशों के साथ-साथ पाकिस्तान में भी विरोध में हिंसा भड़की है, और साथ में भारत में भी जगह-जगह तनाव सामने आ रहा है। भारत की सरकार ने इसके पहले के बहुत से मौकों की तरह इस बार भी समय रहते इंटरनेट पर इस फिल्म पर रोक लगवाई और एक कड़ा रूख दिखाया कि भारत का अमनचैन इसे लेकर खत्म नहीं होने दिया जाएगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती लोगों को यह लग सकता है कि सलमान रूश्दी की किताब पर भारत में उस समय रोक लगा दी गई थी, जब दुनिया के किसी इस्लामी या मुस्लिम देश में भी उस पर रोक नहीं लगी थी। लेकिन आज यहां हम भारत जैसे किसी लोकतांत्रिक और विविधता से भरे देश के नजरिए से कुछ चर्चा कर रहे हैं।
धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में देश के भीतर ही इतने किस्म के मामले दर्ज होते हैं, लोग गिरफ्तार होते हैं कि उन्हें लेकर बार-बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात सामने आती है। यह बात सही है कि लोकतंत्र में लोगों को अपनी बात कहने का पूरा हक अगर नहीं है, तो लोकतंत्र कमजोर माना जाएगा। लेकिन अपनी बात कहने के लिए अगर अमरीका का कोई ईसाई पादरी कुरान को जलाता है, तो उसकी यह आजादी भारत की संस्कृति से परे की है। लोकतंत्र का किसी एक देश का मॉडल किसी दूसरे देश पर ज्यों का त्यों लागू नहीं हो सकता। अमरीका के लोगों की समझ अलग हो सकती है, डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का काम वहां बर्दाश्त हो सकता है, ठीक उसी तरह जैसे कि सऊदी अरब में सजा देने के लिए सिर काटना वहां बर्दाश्त होता है। लोकतंत्र के साथ-साथ, उसके मूल्यों के साथ-साथ, स्थानीय संस्कृति और स्थानीय परिस्थितियां भी देखनी होती हैं, और किसी भी देश या प्रदेश की सरकार पर जब जिम्मा होता है, तो फिर उसे पहले अपना जिम्मा पूरा करना पड़ता है, फिर उसके साथ-साथ ही नीति और सिद्धांतों की बात हो सकती है। जब किसी इमारत में आग लगी हो, तो उसके भीतर घुसने के लिए मालिक को ढूंढकर चाबी लेने के नियम का सम्मान नहीं किया जा सकता। 
पश्चिमी दुनिया में पोर्नोग्राफी की फिल्में बनाने के लिए बदनाम एक आदमी ने अपने खुद के कलाकारों से अपनी नीयत छुपाकर एक भड़काऊ और आपत्तिजनक फिल्म बनाई, और उसे लेकर दुनिया भर में हिंसा खड़ी कर दी। हमारे हिसाब से लोकतंत्र की ऐसी सीमा भारत में कभी नहीं लाई जा सकती। और लानी भी नहीं चाहिए। न सिर्फ धर्म को लेकर, बल्कि समाज के दूसरे बहुत से कमजोर तबकों को लेकर भी जितने किस्म के हमले होते हैं, उनके पीछे अभिव्यक्ति का अधिकार कितना है और दूसरों की भावनाओं की आजादी का सम्मान करने की जिम्मेदारी कितनी है, यह हमेशा ही देखना होगा। हमारी यह बात बहुत सीधी-सीधी काली-सफेद बात नहीं है। बिना किसी सरहद के एक लंबे सलेटी फासले के बीच कहां पर इंसाफ की शिनाख्त होगी, यह बात भी आसान नहीं है। इसे थानेदार तय करेगा या समाज में उससे ऊपर का कोई और तबका इसे तय करेगा, यह भी आसान नहीं है। फिल्मों के लिए जिस तरह पहले से सेंसर करने का एक इंतजाम है, क्या उसी तरह का कोई इंतजाम छपने और दिखने के बाद चीजों के मूल्यांकन के लिए किया जा सकता है, किया जाना चाहिए, यह भी एक व्यापक बहस की बात है। 
हम अभिव्यक्ति के ऐसे किसी अधिकार के हिमायती नहीं हैं जिसमें लोगों को हिंसा भड़काने की आजादी मिले, दूसरों को नाजायज मुद्दों पर घायल करने की आजादी मिले। ऐसे में कार्रवाई करने के लिए पे्रस कौंसिल की तरह की कोई एक संवैधानिक संस्था देश में होनी चाहिए जो कि शिकायतों पर फिल्म, साहित्य, कला या गैरमीडिया की बातों की जांच कर सके और कार्रवाई की सिफारिश कर सके। थाने के स्तर पर अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक भावना के बीच का फैसला नहीं हो सकता, और इसलिए जिले या प्रदेश के स्तर पर ऐसी एक कमेटी होनी चाहिए जो कि ऐसी बातों पर अपने इलाके, अपने दायरे के स्थानीय मूल्यों को देखते हुए कम से कम विचार-विमर्श कर सके और कोई सिफारिश कर सके।

सोनिया गांधी के बारे में शरद यादव की सही बात


संपादकीय
21 सितंबर 2012
आज देश के सबसे बड़े विपक्षी गठबंधन के खालिस हिंदुस्तानी मिजाज वाले मुखिया शरद यादव ने एक इंटरव्यू में कहा कि यह विपक्ष की गलती थी जिसने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध किया था। उन्होंने कहा-सोनिया गाँधी को पूरा देश (नेता) मान गया था। देश की सबसे बड़ी पार्टी सोनिया गाँधी को (नेता) मान गई थी। हम कौन होते हैं ये कहने वाले कि वो इस देश में कब आईं। वो बैठतीं तो ढाई या तीन साल रहतीं, अच्छी होती तो रहतीं, बुरी होती तो हट जातीं। देश की जनता ने उन्हें जनादेश दे दिया। ये सच है ना। सोनिया गाँधी को प्रधानमंत्री बनना चाहिए था। अगर वो प्रधानमंत्री होतीं तो आज ये स्थिति नहीं होती, क्योंकि उन्हें पार्टी चलानी है। मनमोहन सिंह ने एक बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और हार गए। उन्होंने तो कॉर्पोरेशन का चुनाव भी नहीं लड़ा। सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री होतीं तो बिल्कुल बेहतर होता। देश इस तरह गड्ढे में नहीं जाता। पी. चिदंबरम, मोंटेक सिंह और प्रधानमंत्री को हटाए बिना देश नहीं चल सकता। ये लोग देश को जानते ही नहीं हैं। ये लोग अमरीका और यूरोप के लोगों के अंदाज में अंग्रेजी बोलते हैं।
शरद यादव एनडीए के भीतर सबसे अधिक संतुलित और समझदार बातें करने के लिए जाने जाते हैं। उन्हें हम खालिस हिंदुस्तानी इस हिसाब से लिख रहे हैं कि वे जानते हुए भी अंगे्रजी का इस्तेमाल नहीं करते, विदेश नहीं जाते और अपने रहन-सहन में वे ठेठ देशी देहाती जैसे रहते हैं। एनडीए के भीतर रहते हुए भी वे साम्प्रदायिकता से दूर रहते हैं, और यही वजह है कि अपने कुछ साथी दलों की सोनिया गांधी से नफरत से दूर रहते हुए वे आज तथ्य और तर्क की बात कह रहे हैं, जिसे कि भारत के आज के विपक्ष के लिए कुछ असुविधा की बात भी लोग मान सकते हैं। हमारा भी यही मानना है कि लोकतंत्र में नेता का, और खासकर सरकार चला रहे नेता का निर्वाचित होकर आना जरूरी होता है। मतदाताओं के प्रति जवाबदेही बहुत सी बातें सिखा देती हैं। उत्तरप्रदेश के चुनावों में चाहे राहुल गांधी को एक बुरी शिकस्त मिली हो, या उम्मीद जितनी कामयाबी न मिली हो, हमारा यह मानना है कि चुनाव की आंच ने उनको तपाकर कुछ तो मजबूत किया ही होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर उनके सबसे बड़े सहयोगी योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया तक, जमीन से जुड़े हुए लोग ये लोग नहीं हैं। ऐसे में जो सोनिया गांधी कांगे्रस पार्टी और यूपीए को चलाती हैं, उनकी अपनी हादसों से भरी हुई निजी जिंदगी, उनकी जान पर मंडराता खतरा, और भारत की उनकी सीमित समझ के चलते उन्होंने प्रधानमंत्री निर्वाचित हो जाने के बाद भी दुनिया के लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा पद संभालने से मनाही कर दी थी। हम शरद यादव के अंदाज पर कोई अंदाज नहीं लगा सकते कि सोनिया गांधी मनमोहन सिंह से अधिक कामयाब होतीं या नहीं, लेकिन हमारा यह मानना है कि इस विशाल देश का जो भी मुखिया हो, वह न सिर्फ जनता के बीच से चुनकर आए, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जनता से मुखातिब होने का हौसला भी जिसके भीतर हो। आज मनमोहन सिंह क्या सोचते हैं, इसे शायद उनके आसपास के कुछ लोग जानते हों, बाकी देश को कुछ-कुछ महीनों के बाद कभी उसकी एक झलक मिलती है। यह सिलसिला इस देश की जनता में अपने खुद के लोकतंत्र के लिए भरोसा कायम रखने वाला नहीं है और लोग इसी वजह से प्रधानमंत्री को मजाक का सामान मानते हैं। सरकार के दूसरे कुछ ओहदे ऐसे हो सकते हैं जो सरकारी नौकरों से चल सकें, लेकिन इस लोकतंत्र का मुखिया जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होना चाहिए, और जनता की नब्ज पर उसका हाथ सीधे टिका होना चाहिए।
सोनिया गांधी ने अपनी तरफ से जनता की नब्ज तक पहुंचने की एक कोशिश की थी, जो अब भी जारी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनाकर उन्होंने जनता के बीच काम करने वाले कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपने आसपास रखा था और उनकी राय केंद्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करते आ रही हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि अनगिनत घोटालों के मूकदर्शक बने रहे मनमोहन सिंह को अगर मतदाताओं के बीच आना-जाना होता, तो वे अपनी निजी ईमानदारी के दावे को काफी न मानते हुए, अपनी टोली को भी ईमानदार रखने की फिक्र करते। सोनिया गांधी की शोहरत और उनकी लोकप्रियता पर टिके हुए मनमोहन सिंह इस देश के प्रति जवाबदेह नहीं रह गए थे, नहीं रह गए हैं। ऐसे में उनके मुकाबले कम आर्थिक समझ रखने वाले कोई दूसरे लोग बेहतर हो सकते थे। 
शरद यादव की बात गौर करने के लायक है, और आगे जाकर फिर कभी विदेशी मूल की बात अगर शरद यादव के साथी सोचें तो उन्हें इस बात पर भी सोचना चाहिए।

तकलीफ और नुकसान से बचाने के नाम पर तकलीफ और नुकसान


संपादकीय
20 सितंबर 2012
खुदरा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को निवेश की छूट, और डीजल के दाम बढऩे के खिलाफ देश की बहुत सी राजनीतिक पार्टियों ने आज बंद करवाया है जिसका कम या अधिक असर चारों तरफ से सामने आ रहा है। ये दोनों मुद्दे पिछले कई महीनों से हवा में तैर रहे थे, और इन्हीं को लेकर भारत के सत्तारूढ़ गठबंधन यूपीए में दरार पड़ चुकी है, और कांगे्रस के बाद इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी, तृणमूल कांगे्रस सरकार और गठबंधन से बाहर आने की मुनादी कर चुकी है। लेकिन आज की यहां की बात यूपीए नहीं है, बल्कि देश है, और बंद है। 
चाहे कोई भी राजनीतिक दल या संगठन बंद के पीछे हो, उसका नुकसान पूरे इलाके को झेलना पड़ता है। और भारत में कहने को चाहे पुलिस और स्थानीय सरकार लोगों की हिफाजत के लिए मौजूद हो, यह बात अपनी जगह तय है कि बंद के आतंक के चलते लोग अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए भी हौसला नहीं जुटा सकते।  कहने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बंद के खिलाफ कई तरह के फैसले दिए हैं, लेकिन सड़कों पर हिंसा पर उतारू भीड़ के सामने ऐसे कोई फैसले काम नहीं आते। और राजनीतिक दलों की सरकारें भी ऐसे बंद को लेकर भीड़ से किसी टकराव की न ताकत रखतीं और न ही उनकी नीयत बंद के सिलसिले को बंद करने की रहती। लेकिन यह सिलसिला सबसे कमजोर तबके पर सबसे बुरी मार करता है। जो लोग रोज कमाते-खाते हैं, जो रोज बिकने वाले सामान बेचते हैं, उनके उस दिन के चाय-समोसे अगले दिन दुगुने तो बिकने से रहे। यही हाल रोज के काम वाले मजदूरों का होता है और गरीब फेरीवालों का भी होता है। 
केंद्र सरकार के किसी फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की रेलगाडिय़ों को रोक देने से दिल्ली की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है, दिल्ली तो विमान से सफर करती है, और आज तक हिंदुस्तान का कोई बंद हवाई अड्डों को तो बंद करवा नहीं पाया। फर्क तो पड़ता है उन मुसाफिरों को जो इन रेलगाडिय़ों से सफर करते हैं, बसों से चलते हैं या किराए के रिक्शे-आटो से चलते हैं। बंद करवाते जो नेता घूमते हैं, उनके घरों के लिए निजी गाडिय़ां रहती हैं। लेकिन जो मुसाफिर सामान सहित स्टेशन या बस अड्डे पर फंस जाते हैं, जो घर से अस्पताल नहीं जा पाते, उन पर बंद का फर्क पड़ता है। बड़ी-बड़ी होटलों में ऐसे बंद के दिन रेस्त्रां भी चलते हैं और शराबखाने भी। लेकिन जो गरीब यहां नहीं जा पाते, उनको खाना भी नसीब नहीं हो पाता। गैरबराबरी का यह सिलसिला कारखानों तक जारी रहता है। आज के बंद में कोई कारखाना तो बंद है नहीं, बड़ी कंपनियों के दफ्तर भी बंद नहीं हैं, लेकिन सबसे गरीब तबके की जिंदगी बंद है। इससे सरकार की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? अगर बंद करवाने वाले यह सोचते हैं कि इससे सरकार को एक दिन में टैक्स का इतना नुकसान हुआ है, तो यह सोच झांसा देने वाली है। टैक्स वाले सारे बड़े सामान तो अगले दिन भी बिक जाएंगे, जो नहीं बिकेगा वह छोटे लोगों का सड़क किनारे का सामान। 
इसलिए हम सरकार का विरोध करने के लिए बंद का तरीका जनतांत्रिक नहीं मानते, जनता के हितों के खिलाफ मानते हैं। और भीड़ की ताकत के बल पर ऐसे किसी बंद को कामयाब बना लेने से कुछ भी साबित नहीं होता। चूंकि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता, इसलिए लोग भीड़ से उलझते नहीं हैं। आज शाम तक इस बंद के बारे में जनता का खुद होकर किया गया स्वस्फूर्त बंद जैसी बातें  बयानों में जारी होने लगेंगी, यह सार्वजनिक बयानबाजी का फिर एक बड़ा झांसा होगा। कोई गरीब कभी बंद नहीं चाहते। इसलिए यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए और उस गरीब जनता को तकलीफ और नुकसान से बचाना चाहिए जिसे तकलीफ और नुकसान से बचाने के नाम पर यह ज्यादती की जाती है।

जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसको दुश्मन की क्या दरकार...


संपादकीय
19 सितंबर 2012
गठबंधन की राजनीति की अनगिनत किस्म की बेबसी होती है। एक ईमानदार को बेईमानों के गिरोह का सरगना बनकर सब कुछ अनदेखा करना पड़ता है, एक देश के प्रधानमंत्री को विदेश नीति के मामले में एक साथी दल के प्रादेशिक हितों के सामने हथियार डाल देने पड़ते हैं, रात-दिन जनता को दिखाने के लिए भागीदारों के बीच डब्ल्यू-डब्ल्यू-एफ की तरह की मिली-जुली नूरा कुश्ती चलानी पड़ती है, और लगातार एक अस्थिरता के बीच जीना पड़ता है। राजनीति के बारे में हमेशा से कहा जाता रहा है कि सियासत हैरान कर देने वाले हमबिस्तरों का खेल है। केंद्र की यूपीए सरकार को देखें तो यह बात सही लगती है। 
यूपीए की पिछली पारी में उसको एक ईमानदार, सिद्धांतवादी, जनकल्याणकारी वामपंथी मोर्चे का साथ था, और वह साथ उस समय खत्म हुआ जब इस विशाल लोकतंत्र का प्रधानमंत्री अमरीकी राष्ट्रपति के कदमों पे बिछा चला जा रहा था, और वहां इस देश की तरफ से एक फर्जी सर्टिफिकेट बनाकर चांदी की तश्तरी पर रखकर पेश कर रहा था कि भारत की जनता बुश से बहुत मोहब्बत करती है। हकीकत तो यह थी कि अमरीका की तरफ अपने पेशे और धंधे के लिए टकटकी लगाकर उम्मीद से देखने वाले एक छोटे तबके से परे बाकी लोग तो इस हमलावर देश से नफरत करते हैं, या उससे दहशत खाते हैं, और बहुत से मामलों में दोनों ही। ऐसी बुशपरस्ती के चलते वामपंथी साथियों ने यूपीए-1 को ईमानदार बनाए रखने की भी भरसक कोशिश की और उसका कोई दाम भी नहीं वसूला। लेकिन उसी बंगाल की ममता बैनर्जी के सामने वैसी कोई मजबूरी नहीं थी। उनको अपनी सरकार के लिए दाम भी वसूलना था, और बंगाल के वोटरों के बीच नाम भी वसूलना था। इसलिए कल शाम इस सरकार से उनकी समर्थन वापिसी की जो मुनादी हुई है, वह अगर पूरी हो जाती है तो भी किसी को हैरानी नहीं होगी और अगर एक बार फिर शेरनी एक कछुए की तरह सिर को भीतर समेट लेती है, तो भी किसी को हैरानी नहीं होगी। लेकिन इस देश में गठबंधन की राजनीति के चलते ऐसी नौबत दूसरों के सामने भी समय-समय पर आई है। उत्तरप्रदेश को अगर देखें तो वहां मायावती के साथ भारतीय जनता पार्टी का मोहब्बत और नफरत का जिस तरह का रिश्ता अभी के ताजा इतिहास में दर्ज है, वह  इससे भी अधिक सिद्धांतहीन था, और इससे भी अधिक दगाबाजी से भरा हुआ था। लेकिन एक राज्य का वह मामला आज की यहां की चर्चा में अधिक इस्तेमाल का नहीं है। 
अब ममता बैनर्जी के समर्थन वापिसी की बात करें तो अलग-अलग वक्त पर वे बहुत से मुद्दों को लेकर कई किस्म की कोशिश करती रही हैं। इनमें से कुछ मुद्दे सही थे, और कुछ मुद्दे ऐसे लगते थे कि मानो वे शोहरत के लिए उठाए गए हों। ममता का बहुत सारा विरोध लोगों को हाथीदांत की तरह लगता था, जो कि यूपीए सरकार और गठबंधन के मुखियाओं को चबाने के लिए नहीं था, जनता को दिखाने के लिए था। केंद्र सरकार के कांगे्रसी मंत्रियों और कांगे्रस के अनगिनत प्रवक्ताओं और नेताओं की तरफ से ममता पर जवाबी हमले होते रहते थे, और इन सबके बीच न सिर्फ सरकार चलती रही है, बल्कि ममता उसमें अपने मंत्रियों को अपनी चप्पलों की तरह रखती और हटाती रही। आने वाले एक-दो दिनों में यह साफ होगा कि ममता की पार्टी, तृणमूल कांगे्रस, का कांगे्रस और यूपीए से कैसा रिश्ता रहेगा। लेकिन न सिर्फ यूपीए बल्कि कोई भी गठबंधन अगर ऐसे किसी साथी के बिना अपना काम चला सकता है, तो वह बेहतर है। हम पश्चिम के पूंजीवादी मीडिया के इस विश्लेषण से सहमत हैं कि ममता की वजह से बहुत से आर्थिक फैसले नहीं हो पाए। और ममता का यह विरोध वामपंथियों के ईमानदार, सिद्धांतवादी और गंभीर विरोध की तरह नहीं था, यह वोटरों की वाहवाही का विरोध अधिक था। और फिर इस विरोध को दर्ज करने का तरीका इस कदर तमाशों से भरा हुआ था, कि वह किसी भी गठबंधन के भागीदार के लिए बहुत बेइज्जती का भी था। गठबंधन की सरकार चलाने वाले लोगों की बेबसी अपनी जगह ठीक है, लेकिन इस विशाल देश के घरेलू मामले और इसके विदेशी मामले, इसकी गरीबी की रेखा के नीचे की आधी आबादी, इसकी आगे बढऩे की संभावनाएं, इनमें से कोई भी बात इतनी कम अहमियत की नहीं है कि उसे एक भागीदार बंधक बनाकर अपने तलुओं तले रख ले। किसी सरकार की निरंतरता के अपने नफे हो सकते हैं, और उस निरंतरता का जुगाड़ करने के अपने नुकसान भी हो सकते हैं। केंद्र सरकार ममता बैनर्जी की फरमाइश पर विविध भारती की तरह गाने बजाती है, या संसद में राग सहमत गाने के लिए गायकों को भाड़े पर जुटाती है, इन दोनों के अपने-अपने नुकसान हैं। लोकतंत्र के दायरे में रहते हुए अगर यूपीए सरकार आज इतने किस्म की मुसीबतों को खरीद नहीं चुकी होती, तो एक मजबूत यूपीए को ममता भी इस तरह से लात नहीं मार पाती। लेकिन चोरी में पकड़ाए हुए, चारों तरफ से मार खाए हुए इंसान को राह चलते लोग भी चपत लगाते चलते हैं, यह तो ममता नाम की शेरनी है जिसने एक पंजा चलाकर इस सरकार पर कुछ निशान बना दिए हैं। बड़े-बुजुर्ग एक वक्त कह गए हैं-जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसको दुश्मन की क्या दरकार...
लोकतंत्र की एक हसरत ही हो सकती थी कि केंद्र में एक मजबूत और ईमानदार सरकार की निरंतरता बनी रहे। यह हो सकता है कि सीबीआई और कोयले की कमाई के चलते, देश में अपराधों से लदे उत्तर और दक्षिण धु्रव की मदद से यूपीए-2 भी अपनी पूरी जिंदगी जी सके, लेकिन उसकी इज्जत का तो ऐसा फलूदा बना हुआ है कि जिसमें कोयले की किरकिरी सबसे अधिक है। आज यहां ममता के हटने के बाद इस सरकार को हो सकने वाले किसी खतरे पर इससे अधिक चर्चा मुमकिन नहीं है, लेकिन भारत की राजनीति को समझने में जिनकी दिलचस्पी हो, वे अगले दो-चार दिन को, पिछले एक-दो कार्यकाल के साथ जोड़कर विचार-विमर्श कर सकते हैं।

19 sept 2012 editor sunil on twitter


*how many still have any faith in state of indian democracy?
*in indian politics and governance, individual (criminal) ‘performance’ first, team score second, public interest last. what a democracy !!
*definition by vatsayan- Orgasm- a feeling indian politicians achieve when they could loot the country to the best of their stamina.
*no bpl needs more than 6 cylinders/yr. & income-tax payers should b out of it. jindal 369/yr !

13 sept 2012


अविश्वास के गहरे अंधेरे में डूबा हुआ देश...


संपादकीय
18 सितंबर 2012
आज एक खबर यह है कि एक नौजवान ने ठीक काम न मिलने की वजह से, और महंगाई की वजह से आत्महत्या कर ली। दूसरी खबर यह है कि एक युवती ने आत्महत्या कर ली जो कि शायद उसकी बेरोजगारी की वजह से है। तीसरी तस्वीर हमारे सामने है जिसमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वृद्धावस्था पेंशन पाने के लिए गरीबों का समंदर सा दिख रहा है। इसके साथ-साथ पिछले कुछ हफ्तों की तरह आज भी यह खबर है कि किस तरह देश के बड़े-बड़े नेताओं और कारखानेदारों ने खदानों को लूटा, हजारों एकड़ जमीनें पाईं, और कैसे-कैसे वे अरबपति से खरबपति हुए। सरकारों ने तो अपनी तरफ से उनको यह सब कुछ दे ही दिया है, किसी के उठाए गए मुद्दे को लेकर अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है, सीबीआई तक पहुंच गया है तब जाकर सरकार इन खदानों पर दुबारा सोच-विचार कर रही है। 
इसी से जुड़े हुए मुद्दों पर रोज लिखना हमको अच्छा तो नहीं लगता है, लेकिन जब लाशें टंगी हुई रहें, और वे महंगाई-बेरोजगारी पर टंगी रहें, तो आज और किस मुद्दे पर लिखा जाए? देश की हालत भयानक है। ऐसी कोई वजह नहीं बची है कि देश के आम लोगों को सरकार पर, लोकतंत्र पर भरोसा रहे। नक्सली नेता ऐसे में जब सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई की बात करते हैं, तो उन्हें सरकार की खत्म हो चुकी साख का पूरा भरोसा रहता है, उन्हें लोकतंत्र की बदहाली पर पूरा भरोसा रहता है, उन्हें भारत में अमरीकी और गरीबी के बीच समंदर से फासले का पूरा भरोसा रहता है। हिंदुस्तान की जनता अगर इतनी अमनपसंद नहीं होती, उसे धर्म के मार्फत पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, यह जन्म और अगला जन्म गिनाते हुए संघर्ष से दूर नहीं रखा गया होता, तो वह सरकार और ताकतवर तबकों के खिलाफ आज उठ खड़ी हुई रहती। देश की हालत बहुत ही खराब है। एक तरफ कुपोषण से देश के बच्चों की हालत अफ्रीका के गरीब देशों के मुकाबले भी बहुत अधिक खराब है, और दूसरी तरफ सत्ता की मेहरबानी से देश को लूटना आसमान तक पहुंच गया है। सारी अदालतें, सारी जांच एजेंसियां मिलकर भी व्यक्तिगत रूप से सज्जनता का दावा करने वाले प्रधानमंत्री के मातहत हुए सारे भ्रष्टाचार को कैसे वापिस ले जा पाएंगी? कोयले की दिक्कत से आने वाले बरस इस देश के अंधेरे में डूब सकते हैं, लेकिन जनता के मन में आज ही इतना अंधेरा छाया हुआ है, कि उस अंधेरे के बीच घूमने-फिरने में, मोर्चा जमाने में हथियारबंद नक्सलियों को एक सहूलियत लगती है।
और अभी देश के अगले चुनाव दो साल दूर हैं। खरीदे गए, या तोड़े-मरोड़े गए, किसी भी तरह से जुटाए गए आंकड़ों से चलती यह जुगाड़ सरकार बनी रहने का इस सरकार को पूरा हक है। लेकिन यह हक देश को ले जा कहां रहा है? और जब दिल्ली की गंगोत्री से गंदा पानी बहकर निकलता है तो बाकी राज्यों को भी अपनी नीयत गंदी करने का हक सा मिल जाता है। इसलिए अब किसी राज्य में पचीस-पचास हजार करोड़ का लौह अयस्क घोटाला हो रहा है तो कहीं पन्द्रह-बीस हजार करोड़ का ग्रेनाइट घोटाला। और इनको देखते हुए म्युनिसिपलों या पंचायतों को कौन सी राह दिखती है? और इन सबको देखते हुए आम जनता को सिवाय भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अविश्वास करने के और कौन सी राह दिखती है? 
कुल मिलाकर सिलसिला बहुत खतरनाक कगार पर आकर खड़ा हुआ है। लोगों के मन में अनास्था और अविश्वास ने गहरे घर कर लिया है। और आज सरकार को किसी भी तरह का टैक्स देने के पहले लोगों के मन में यह बात आती है कि उसका कितना हिस्सा चोरी में चले जाएगा? और जब उसके दिए टैक्स की चोरी ही होनी है, तो फिर वह टैक्स दे ही क्यों? 

editor sunil on twitter


18 sept 2012
* Swami Vivekanand would not have said so many good things, if he knew that someday narendra modi would tweet those everyday :-(
* without friction, no manthan, no vish, no amrit. difference of opinion makes it interesting.
* indian police should stop mention of condoms from scene of crime r 2 prove motives of couples caught in hotels. dont make it sound a crime.

आज के राजाओं को क्या हक प्रजा से मजाक करने का?


संपादकीय
17 सितंबर 2012
निर्वाचित सत्ता पर बैठे हुए लोग जब अपने मन, वचन या कर्म से लोगों को आहत करते हैं, तो हैरानी होती है। ऐसा करने वाले लोग कम नहीं होते, और किसी एक छापे वाले नहीं होते। अलग-अलग कई किस्म की पार्टियों के लोग, कई उम्र के लोग, कई जाति और धर्म वाले लोग ऐसा करते मिलते हैं और तब यह हैरानी होती है कि क्या इन्हें अपने खुद के अगले चुनाव की फिक्र नहीं है? और या फिर इन्हें जनता की याददाश्त पर सुशील कुमार शिंदे जितना ही भरोसा है?
एक बहुत ही लड़ाकू, और कमजोर लोगों की हिमायती ममता बैनर्जी को दशकों के कड़े संघर्ष के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता मिली, तो उन्हें बलात्कार की शिकार, शिकायत करती महिलाएं वामपंथी साजिश की भागीदारी लगने लगीं। दिल्ली में कांगे्रस की बुजुर्ग और आमतौर पर संवेदनशील रहने वाली मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दूसरे प्रदेशों से वहां आकर रहने वालों के बारे में कई बार निहायत गैरजरूरी और कड़वी बात कही जो कि दिल्ली को ढोने वाले मजदूरों और कामगारों पर हमले सरीखी भी थी। अभी सुशील कुमार शिंदे ने चाहे मजाक में ही सही, लेकिन जिस तरीके से जनता की याददाश्त पर मजाक किया है, वह भी राजनीतिक कमसमझी का सुबूत माना जाएगा, या फिर एक लापरवाह चूक। आज कांगे्रस और यूपीए के कोई मंत्री जनता के साथ मजाक का हक नहीं रखते, जिस तरह पूरी दुनिया में बलात्कार को लेकर बनने वाले लतीफे बहुत कू्रर और हिंसक माने जाते हैं, उसी तरह आज भारत की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियां, केंद्र और राज्यों में अपने भ्रष्टाचार के बाद इस मजाक का हक खो बैठी हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह की अल्पसंख्यकों को लेकर किसी मजाक का हक इस जिंदगी में मोदी को नहीं मिल सकता, सरकारी फिजूलखर्ची को लेकर मजाक करने का हक मायावती को नहीं मिल सकता, कुनबापरस्ती को लेकर मजाक का हक सोनिया-राहुल को नहीं मिल सकता, टेलीफोन को लेकर मजाक का हक राजा को नहीं मिल सकता, खेलों को लेकर मजाक का हक कलमाडिय़ों को नहीं मिल सकता, सरकारी खदानों को लेकर मजाक का हक जिंदलों को नहीं मिल सकता, बच्चों के साथ प्यार करने के मजाक का हक निठारी कांड के बलात्कारियों को नहीं मिल सकता, और हिंदुस्तान को लेकर किसी तरह के मजाक का हक कसाब को नहीं मिल सकता।
देश भ्रष्टाचार की आग में झुलसा हुआ उसी तरह पड़ा हुआ है जिस तरह कि सिवकासी में पटाखा कारखानों की आग में झुलसे हुए लोग बिना दवाईयों के सरकारी अस्पताल में पड़े रहते हैं। ऐसे में किसी ओछी बात, हल्की बात या मजाक की जगह बस टीवी के लॉफ्टर कार्यक्रमों तक ठीक है, जनता के साथ ऐसे मजाक या ऐसी बातें जले पर नमक छिड़कने की तरह हैं। सुशील कुमार शिंदे एक विनम्र नेता हैं, इसलिए शिवसेना से लेकर शरद यादव तक ने उन्हें नरमी के साथ यह याद दिला दिया कि वे कुछ कम बोलें। आज जनता का बर्दाश्त खत्म हो गया है। जो लोग चीजों को बहुत गंभीरता से लेते हैं, सोचते हैं और चर्चा करते हैं, उनके बीच कहीं-कहीं यह बात भी सामने आ रही है कि क्या भारत में आज एक गृहयुद्ध जैसी नौबत नहीं आ सकती? नेताओं को और सत्ता चलाने वाले लोगों को हमारी सलाह यही है कि यह वक्त गैरजरूरी बयान देने का, लोगों को और अधिक बेइज्जत करने का, और मजाक करने का नहीं रह गया है। राजा और प्रजा के बीच मजाक का कोई रिश्ता नहीं हो सकता। और आज हिंदुस्तान की सत्ता जिस अंदाज में जनता के हक जिस हद तक लूट रही है, उसके बाद यह सत्ता जनता के द्वारा, जनता के लिए चुनी गई सत्ता नहीं है, यह कालेधन से खरीदी गई, कालेधन को कमाने के लिए बनी सत्ता है और इसका जनता के साथ मजाक का कोई हक नहीं है।
मीडिया को देखते ही मुंह खुल जाना किसी कानून के तहत अनिवार्य नहीं है। इसलिए जब तक किसी मुद्दे पर किसी हक के साथ बोलने का हक न लगे, तब तक लोग चुप क्यों नहीं रहते? एक पुरानी कहावत चली आ रही है कि समझदार इसलिए बोलते हैं कि उनके पास बोलने को कुछ है, और नासमझ इसलिए बोलते हैं कि वे कुछ बोलना चाहते हैं।

छोटे से गांव का बड़ा सा हौसला


गरियाबंद से लौटकर गंगा सिंह ठाकुर 
सढ़ौली के पौने दो सौ नौजवान सुरक्षा बलों में

तस्वीरें- संतोष तिवारी रायपुर, 17 सितंबर। गरियाबंद जिला मुख्यालय से महज दो किलोमीटर दूर स्थित सढ़ौली गांव के युवकों में देश प्रेम का जज्बा देखते ही बनता है। दो हजार की अबादी वाले इस गांव के पौने दो सौ युवा सीआरपीएफ, एसएफ, कोबरा बटालियन, आईटीबीपी, जिला पुलिस और नगर सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में गांव के तीन जवान शहीद हो गए हैं। उनकी याद में गांव में स्मारक बनवाए गए हैं। गांव के लोगों को युवाओं पर नाज है, पर उन्हें इस बात का डर हमेशा रहता है कि नक्सली लोग पुलिस वालों को अपना दुश्मन मानते हैं। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि बस्तर में चल रहा संघर्ष खत्म होना चाहिए। 


सढ़ौली गांव का इतिहास करीब 70 वर्ष पुराना है। यह गांव आजादी के पहले से बसा हुआ है। ग्राम पंचायत की जनसंख्या लगभग दो हजार है। यहां हल्बा (आदिवासी)जाति के लोग अधिक संख्या में निवास करते हैं। इसके अलावा गोंड, साहू और ब्राम्हण समाज के लोग भी यहां दशकों से हैं। गांव के कई परिवार ऐसे हैं जहां के 3 से 4 बेटे पुलिस में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हाल ही में गांव के जवान भृगुनंदन चौधरी जो कि कोबरा बटालियन गया (बिहार) में पदस्थ थे। 
नक्सल मुठभेड़ में गया में शहीद हो गए हैं। परिवार के लोग इस दुख से अभी तक नहीं उबर पाए हैं। इस परिवार के मुखिया नरहरराम जिला बल में आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं। हरदेव के दो पुत्र चेतक कुमार बीएसएफ में और डायमंड कुमार सीआईएसएफ में है। अपने अविवाहित पुत्र भृगुनंदन की शहादत को पिता भूल नहीं पा रहे हैं। वे अभी भी छुट्टी पर चल रहे हैं। वे कहते हैं कि इस गांव के युवा पुलिस की नौकरी पसंद करते हैं। युवाओं को गांव के लोग भी प्रोत्साहित करते हैं।  
नरहर राम ने बताया कि उनके परिवार का एक और जवान कालेश्वर सिंह बीएसएफ दिल्ली में पदस्थ था। 6 दिसंबर 2000 को ट्रेनिंग के दौरान तबियत खराब हो जाने से उसकी मौत हो गई थी। कालेश्वर को पढ़ाने वाले शिक्षक दौवाराम ने उसकी याद में गांव में प्रतिमा बनाई है। यह प्रतिमा गांव के युवओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। इसके अलावा नारायणपुर में एसएफ में पदस्थ इस गांव के युवक डिगेश्वर शांडिल्य भी शहीद हो चुके हैं। यहां निवासरत लोगों की  आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, पर वे अपनी मेहनत और लगन से बेरोजगारी के कलंक को मिटा रहे हैं। इस माह 7 और युवाओं का नगर सेना में चयन हुआ है। 
गांव के 72 वर्षीय भैयाराम नाग के घर जब यह संवाददाता और छायाकार पहुंचे तो वे कुछ समय के लिए वे सहम गए। वे हमें खुफिया विभाग (दादा) के लोग समझ बैठे थे। परिचय देने के बाद उन्होंने बताया कि उनके चार बेटे पुलिस में है। दो पुत्र प्रेमलाल एवं एकेश्वर कुमार जिला बल में है। तीसरा पुत्र सदानंद असम रायफल में और चौथा पुत्र त्रिलोचन नाग बीएसएफ में तैनात है। श्री नाग ने बताया कि वे पेशे से टेलर रहे हैं। उन्होंने अपने चारों बेटों से कहा था कि उनके पास धन-दौलत नहीं है पढ़ लिख लोगे तो हमाली करने से बच जाओगे। बेटों ने उनका सपना साकार  किया।
गांव के हरदेव प्रसाद दुबे को भी दूसरे लोगों की तरह अपने दो पुत्रों पर गर्व है। उनके दो पुत्र पीताम्बर प्रसाद एसएफ और टेमन लाल जिला बल में है। उन्होंने बताया कि वे इस बात से बहुत खुश हैं कि सुविधाओं के अभाव में भी गांव के युवा इतिहास रच रहे हैं। 
गांव के शिक्षक केजूराम, अवधराम और बिंदुराम ने बताया कि गांव में धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। यहां राधा कृष्ण मंदिर में हर मंगलवार को रामायण पाठ होता है। गांव वालों के सहयोग से तीन मानस भवन बनवाए गए हैं। धार्मिक आयोजनों में युवाओं की भी भागीदारी होती है। इससे उन्हें सद्विचार और अच्छे कार्य करने की शिक्षा मिलती है। गांव में धान रखने के लिए दो हल्बा कोठी है जहां करीब दो सौ गाड़ा धान रखा जा सकता है। गांव के युवा पुलिस की भर्ती निकलने पर एक-दूसरे को बताते हैं। वे इसके लिए आवश्यक तैयारियां भी मिल-जुलकर करते हैं। जब किसी का चयन पुलिस में हो जाता है तो गांव-समाज के लोग उसका सम्माान करते हैं। इस गांव के युवाओं को वर्दी पर घमंड नहीं गर्व है। 
जर्जर भवन में पढ़ते हैं बच्चे
गांव के सरपंच बसंत कुमार शाडिल्य खुद 8वीं तक ही पढ़ सके इसका उन्हें दुख है। उन्होंने बताया कि गांव में हाईस्कूल तक की कक्षाएं चल रही हैं। कक्षा लगाने कमरों की कमी है। हाईस्कूल की पढ़ाई जर्जर भवन में हो रही है। उन्होंने स्कूल में एक योग शिक्षक की भी जरूरत बताई । उनका कहना है कि बच्चे शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहेंगे तो अच्छे इंसान बनेंगे। 
सांसद-विधायक की घोषणाओं पर अमल नहीं
जिला मुख्यालय गरियाबंद से सढ़ौली दो किलोमीटर और खट्टी गांव 7 किलोमीटर है। खट्टी गांव तक सड़क नहीं बन पाई है। कच्ची सड़क पर इतने गड्ढ़े है कि बारिश में लोगों को सड़क किनारे खेत से होकर चलना पड़ता है। सढ़ौली गांव की सड़क बनाने सांसद चंदूलाल साहू, विधायक डमरूधर पुजारी कई बार घोषणा कर चुके हैं, उनकी घोषणा पर अमल नहीं हुआ है। इस मांग को लेकर गांव के लोग पिछले दिनों कलेक्टर दिलीप वासनिक से मिलने भी पहुंचे थे। उन्होंने बारिश के बाद सड़क निर्माण कार्य शुरू करवाने का आश्वासन दिया है। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आजादी के बीच का टकराव


संपादकीय
16 सितंबर 2012
अमरीका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुछ अलग किस्म की है। वहां पहले से मुनादी करके एक ईसाई चर्च का पादरी कुरान के पन्ने भी जला सकता है, और जैसा कि अभी सामने आया है, अश्लील फिल्म बनाने के लिए पहचाने जाने वाले एक डायरेक्टर ने इस्लाम पर एक ऐसी फिल्म बनाई जिसे लेकर मध्य-पूर्व के देशों में भारी तनाव पैदा हो गया है और हिंसा हो रही है। भारत में भी इस फिल्म को लेकर जगह-जगह कुछ विरोध हो रहा है, और एक खतरा यह मंडरा रहा है कि इंटरनेट पर सबसे बड़ी मौजूदगी वाले गूगल ने इस फिल्म को अमरीका के लोगों के लिए हटाने से मना कर दिया है। गूगल ने कुछ देशों में वहां के कानून के मुताबिक इसकी वीडियो क्लिप पर रोक लगा दी है। 
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावना के बीच का यह टकराव नया नहीं है। कितना वक्त गुजर गया जब भारतीय मूल के एक अंगे्रजी लेखक सलमान रश्दी ने अपने कुछ उपन्यासों में ऐसा लिखा जिसे लेकर ईरान के उस वक्त के सबसे बड़े धार्मिक नेता अयातुल्ला खोमैनी ने मौत की सजा या हत्या का फतवा जारी किया था। इसके बाद बांग्लादेश की लेखिका तस्लीमा नसरीन के लिखे को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर तनाव रहा और कई देशों में उनके खिलाफ तरह-तरह के फतवे जारी हुए, और आज भी भारत में उन्हें रहने की इजाजत तो मिली है, लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे वामपंथी मिजाज के राज में उनको वहां आने से रोक दिया गया है। बहुत से भारतीय लेखक भी तस्लीमा के लिखे से असहमत हैं और वे उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से परे का बताते हैं। तस्लीमा पर न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के आरोप हैं, बल्कि अपने निजी जीवन को लेकर या कल्पना के आधार पर उनकी सेक्स की बातों को साहित्य से परे का माना गया है। पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले डेनमार्क के एक कार्टूनिस्ट ने इस्लाम से जुड़े कुछ कार्टून बनाए, जिनको लेकर दुनिया के बहुत से देशों में मुसलमानों ने उग्र विरोध भी किया और उस कार्टूनिस्ट के सिर पर एक बड़ा ईनाम भी रखा।
अमरीकी कानून को अगर देखें तो वहां पर एक कानून धार्मिक स्वतंत्रता का भी है। और भारत के गुजरात में मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म होने का आरोप लगाते हुए अमरीका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को वीजा देने से रोक दिया था। ऐसे अमरीका में अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार किसी एक धर्म के लोगों पर सोच-समझकर हमला करने के लिए इस्तेमाल होता है, तो यह उस तबके की धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ भी है। इसलिए अमरीका हो या कोई दूसरा देश हो, जब तक कोई व्यवस्था लोकतांत्रिक है, और सभी धर्मों को बराबरी से देखने की बात करती है, तब तक उसमें इन दो अधिकारों के बीच एक बहुत नाजुक संतुलन वहां की सरकार और वहां की न्याय-व्यवस्था को कायम करना ही होगा। न तो एक अंधाधुंध धार्मिक स्वतंत्रता चल सकती, और न ही अंधाधुंध अभिव्यक्ति की आजादी चल सकती। इस मामले में पहली नजर में ऐसा लगता है कि अमरीका को अपने इस फिल्म निर्माता के काम पर सोचना होगा की अमरीकी जमीन से दुनिया के लोगों की धार्मिक भावनाओं को किस कदर भड़काने और कुचलने की आजादी दी जा सकती है। 
इस सिलसिले में एक और बात पर सोचना होगा वरना यह मुद्दा अधूरा रह जाएगा। दुनिया में राजनीतिक दर्शन, शासन व्यवस्था और धार्मिक भावनाओं के कई किस्म के मेल अलग-अलग जगहों पर लागू हैं। इनके बीच सामाजिक संस्कृतियों और रीति-रिवाजों की जटिलताएं भी गहरे बैठी हुई हैं। योरप के कई देशों में मुस्लिम महिलाओं के बुर्के और हिजाब के खिलाफ कानून बनाए जा रहे हैं क्योंकि वहां की अपनी सांस्कृतिक और राजनीतिक सोच यह मानती है कि यह महिलाओं पर एक कू्रर प्रतिबंध है और योरप के माहौल में इससे एक सामाजिक नुकसान हो रहा है। दूसरी तरफ मुस्लिम समाज इसे अपने भीतर का प्रतिबंध नहीं, अपना हक मानते हुए कानूनी लड़ाई लड़ रहा है कि बुर्के और हिजाब पर अगर रोक लगाई जाएगी तो यह मुस्लिम समाज के रीति-रिवाज के खिलाफ तो होगी ही, यह बात मुस्लिम लड़की या महिला के अपने पहनावे की पसंद के हक के खिलाफ भी होगी। ऐसे कुछ तनाव अलग-अलग देशों में वहां की संस्कृतियों के आधार पर चल ही रहे हैं। लेकिन इन सारे देशों में वहां के कानून के तहत जो धार्मिक स्वतंत्रता मिली हुई है उसके चलते एक संवैधानिक जटिलता भी ऐसे मुद्दों पर खड़ी हुई है।
भारत में भी हम बहुत सारे मुद्दों पर, बहुत से धर्मों और जातियों को लेकर टकराव देखते हैं। भारत में तो यह चार कदम आगे चलकर इतिहास के साथ टकराव भी बन चुका है जहां पर कि बहुत पुराने-पुुराने निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य, अब एक नए शुद्धतावादी अभियान के तहत नकारे जा रहे हैं और इतिहास को जलाया जा रहा है, शोध संस्थानों को तबाह किया जा रहा है।  आज जब इस बात को हम लिख रहे हैं तभी दिल्ली में इस बात पर एक तनाव चल रहा है कि वहां जवाहर लाल नेहरू केंद्रीय विश्वविद्यालय में छात्रों के बहुत से तबकों ने मिलकर गाय और सुअर का मांस खाने का एक कार्यक्रम रखा था। इन दो किस्म के मांस से हिंदू और मुस्लिम भावनाओं को परहेज है। दूसरी तरफ भारत के ही बहुत बड़े हिस्से की बहुत बड़ी आबादी को इन दोनों से कोई परहेज नहीं है। उत्तर-पूर्व के राज्य, बंगाल, केरल, दक्षिण के कुछ और हिस्से, और देश में जगह-जगह बिखरे हुए आदिवासी इलाके ऐसे हैं जहां पर गोमांस खाया जाता है। दूसरी तरफ वैदिक काल का जो इतिहास भारत में अनगिनत इतिहासकारों ने दर्ज किया है, उसमें हिंदुओं के ही बहुत से समुदायों में गोमांस खाने का प्रचलन रहा है। इसलिए आज भारत के बहुत से इलाकों, धर्मों और जातियों के लोग यह मानते हैं कि उनके परंपरागत खानपान पर हिंदू या मुस्लिम समाज के एक हिस्से की सोच के चलते अगर रोक लगाई जाती है तो यह उनकी खानपान की स्वतंत्रता के खिलाफ है। 
अब बात अमरीका की फिल्म से शुरू करके हम दिल्ली के जेएनयू तक इसलिए लेकर आ रहे हैं कि आज दुनिया राजनीतिक दर्शन, शासन-व्यवस्था, सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाज, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे बहुत से पहलुओं के बीच चल रही है। इन सबके बीच एक तालमेल बिठा पाना आसान बात नहीं है। न तो हमें आज अमरीकी सरकार की इस नौबत के पीछे वहां की सरकार की कोई साजिश दिखती, और न ही भारत में गाय या सुअर खाने की जिद के पीछे कोई सरकारी या राजनीतिक साजिश दिखती। अब यह अलग-अलग सरकारों पर बोझ है कि वे अपने दायरे के लोगों के हक और उनकी जिम्मेदारियों को लेकर एक मिली-जुली समझ कैसे विकसित करें, और कैसे अपने लोगों को काबू से लेकर बर्दाश्त तक समझा सकें। इसके बाद की जिम्मेदारी बाकी दुनिया के लिए भी आ जाती है, क्योंकि आज किसी के लिखे हुए या गढ़े हुए काम को बांध लेने के लिए कोई सरहद नहीं है। पल भर में तस्वीरें या फिल्में दुनिया के आरपार सफर कर लेती हैं, और कहीं वे वाहवाही पाती हैं, कहीं वे तबाही लाती हैं। इस पूरे उलझे हुए हालात का कोई आसान इलाज हमारे पास नहीं है, लेकिन इतना जरूर लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अगर बहुत ओछे किस्म का, गैरजिम्मेदार इस्तेमाल होता है, तो उससे आहत होने वाले तबके की भावनाएं अधिक महत्वपूर्ण मानी जानी चाहिए। 
दुनिया में आज अमरीका की फौजी साजिशों की वजह से उसकी सांस्कृतिक साख भी कमजोर हो चुकी है, खत्म सी हो चुकी है, इसीलिए एक गैरसरकारी अमरीकी फिल्म के हिस्से देखते ही कई जगहों पर अमरीका के खिलाफ एक ऐसी हिंसा हुई है, जो कि किसी के खिलाफ भी नहीं होनी चाहिए। दुनिया का भरोसा वापिस जीतने की कोशिश भी अमरीका को ही करनी होगी, और खासकर तब तक तो करनी ही होगी जब तक कि दुनिया की हर जिंदगी उसकी बंदूक के काबू में न आ जाए।
-सुनील कुमार

डीजल रियायत पूरी तरह गलत, दाम बढऩा सही


संपादकीय
15 सितंबर 2012
देश का मीडिया कल से कहीं पर समाचारों के बीच में जोरों से कराह रहा है कि मार डाला, कहीं पर वह डीजल बम फोड़ रहा है। देश के विपक्ष की तरह मीडिया भी यह साबित करने में जुट गया है कि डीजल के दाम की बढ़ोतरी सरकार की ज्यादती है, और यह नहीं होना चाहिए था। अधिक में खरीदकर सरकारी रियायत की मदद से  कम में बेचने का सिद्धांत गरीबों की मदद करने के लिए होता है। जब यह मदद बड़े लोग इस्तेमाल करने लगते हैं तो यह गरीबों के हक पर एक ऐसी मार होती है जो कि दिखने में गरीबों की मदद लगती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी-अभी एक गैस एजेंसी से करोड़ों की कालाबाजारी पकड़ाई है और यह पूरी की पूरी केंद्र सरकार से आई हुई रियायत थी। लेकिन अभी आज की बहस में हम रियायत की चोरी को छोड़ भी दें, और सिर्फ रियायत ऐसे इस्तेमाल को देखें, जो कि रियायत का हकदार नहीं है। 
डीजल कहां-कहां इस्तेमाल होता है? सबसे बड़ा हिस्सा शायद ट्रकों में लगता है जो देश के आर-पार सामान लाते-ले जाते हैं। इन सामानों में गरीबों के इस्तेमाल का सामान होता है, और देश की आधी आबादी शायद ट्रकों में आने वाले सामान का पचीस किलो प्रति व्यक्ति, प्रति महीने से अधिक का इस्तेमाल नहीं करती। दूसरी तरफ संपन्न तबका है जिसके एसी से लेकर फर्नीचर और कालीन तक, फ्रिज और टीवी तक, मोटरसाइकिल और कारों तक, अनगिनत सामान की खपत है, और उसके भवन निर्माण जैसे कभी-कभी के कामों के ट्रक-इस्तेमाल को भी अगर जोड़ लें, तो उसकी ट्रांसपोर्ट की जरूरत शायद हर महीने पांच सौ किलो से अधिक बैठती है। ट्रांसपोर्ट का यह हिस्सा जो कि गैरगरीब के सामानों का है, उसे कोई रियायत क्यों मिलनी चाहिए? 
बड़े कारखाने, बड़े दफ्तर, शॉपिंग मॉल, रेस्त्रां और बड़ी दूकानें, मोबाइल फोन के टावर जैसी बहुत सी जगहों पर जनरेटर का इस्तेमाल होता है। इनके डीजल को रियायत का हक क्यों होना चाहिए? इन दिनों बड़ी-बड़ी डीजल गाडिय़ों का चलन बढ़ते चल रहा है, दानवाकार गाडिय़ां सड़कों पर तो बहुत बड़ी जगह घेरती ही हैं, रियायती डीजल पर चलकर ये प्रदूषण भी फैलाती हैं। सिर्फ संपन्न तबके के इस्तेमाल की निजी डीजल गाडिय़ों को रियायत का हक क्यों होना चाहिए? कई जगहों पर कारखानों में भट्टियों में डीजल का इस्तेमाल होता है, यहां पर कोई रियायत क्यों दी जानी चाहिए? इसी तरह भवन निर्माण के काम में, कहीं-कहीं पर खेतों में, जिनमें संपन्न तबके के खेत भी हैं, वहां पर डीजल की महंगाई उनकी लागत में जुडऩी चाहिए, न कि देश के बाकी गरीबों के कंधों पर इसका बोझ आना चाहिए।  जो तबके आयकरदाता हैं, उनको डीजल या रसोई गैस की रियायत क्यों मिलनी चाहिए? रसोई गैस के सिलेंडर भी दो अलग-अलग रंगों के बन जाने चाहिए, और सारे आयकरदाता तबके को इस रियायत से बाहर करके सरकार को सब्सिडी पर खर्च घटाना चाहिए।  इसी तरह सरकारों और स्थानीय संस्थानों की गाडिय़ों में बहुत सा डीजल खर्च होता है, इसका बोझ केंद्र सरकार पर आने के बजाय इन्हीं संस्थाओं पर आना चाहिए ताकि इनको अपने बजट के भीतर उसका इंतजाम करना सीखना पड़े।
कुल मिलाकर देखें तो रियायत की एक ऐसी तस्वीर डीजल और रसोई गैस से बनती है जिसमें अपात्र तबके की खपत खासी है। सब्सिडी का यह मॉडल अब जानलेवा साबित हो रहा है और सरकार को एक कड़वी गोली का इस्तेमाल करके इस बीमारी से छुटकारा पाना चाहिए। जहां तक सबसे गरीब तबके की बात है तो उस तक इस सब्सिडी को पहुंचाने के दूसरे रास्ते निकलने चाहिए। रसोई गैस की रियायत के हकदार जो लोग हैं, उनकी पक्की शिनाख्त करके उनके खातों में यह सब्सिडी सीधे जाना चाहिए, न कि ऐसे सिलेंडरों के रास्ते जिनको कि काले बाजार में खुलकर इस्तेमाल किया जाता है और केंद्र सरकार का राज्यों की ऐसी लापरवाही पर कोई काबू भी नहीं रहता। 
आज विपक्ष और मीडिया का लगभग तमाम हिस्सा चाहे जो कहे, डीजल, रसोई गैस या मिट्टी तेल की सारी सब्सिडी, अनाज पर दी जाने वाली सारी रियायत आखिर जनता के ही खजाने से आती है। इसमें जहां पर चोरी बेकाबू हो, गैरहकदार तबका जहां इसका इस्तेमाल करता हो, वहां पर इसे खत्म करके, गरीब तबके की ऐसी सीधी मदद के रास्ते निकालने चाहिए जहां पर दूसरा तबका उसका इस्तेमाल न कर सके। भारत की राजनीति और यहां के मीडिया की त्रासदी यह है कि लुभावने नारों को खड़ा करने के लिए सरकार या विपक्ष की किसी बात के खिलाफ आवाजें उठने लगती हैं। आज देश में विपक्ष की जो राज्य सरकारें केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ खड़ी हैं, उनमें से कितनी ऐसी हैं जिन्होंने पिछले आठ बरस में केंद्र सरकार के बढ़ाए हुए दाम के ऊपर अपने प्रदेश में बैठे-ठाले अधिक टैक्स पाने से परहेज किया हो? हम इसे सैद्धांतिक और राजनीतिक ईमानदारी नहीं मानते कि केंद्र के बढ़ाए दाम का तो विरोध करें, लेकिन उस बढ़े हुए दाम पर अपने प्रदेश की जनता से और अधिक टैक्स भी वसूल करें। राज्य यह तय कर सकते हैं कि वे केंद्र के बढ़ाए हुए दाम का विरोध करते हैं और इसलिए वे अपनी जनता पर इस बढ़े हुए दाम पर अधिक टैक्स का बोझ नहीं लादेंगे।
जिस तरह जाति-आधारित आरक्षण में मलाईदार तबके को बाहर करने की बात उठती है, उसी तरह सरकारी रियायत से भी मलाईदार तबके को फायदा पाने से दूर रखना चाहिए। और जहां पर दूर रखना आसान न हो, वहां पर रियायत को खत्म करके, आर्थिक रूप से कमजोर तबके को वैसी रियायत किसी दूसरे रास्ते से सीधे पहुंचाना चाहिए। डीजल की महंगाई को लेकर नारे और कार्टून तो ठीक हैं, लेकिन इस देश में जब बड़े-बड़े केंद्रीय मंत्री, बड़े-बड़े सांसद और खरबपति कारखानेदार रियायत गैस सिलेंडरों को सैकड़ों में इस्तेमाल करते हैं, तो वह रियायत जनता की जेब से क्यों जाए? केंद्र सरकार के ही आंकड़े आज पारदॢशता की वजह से पेट्रोलियम कंपनियों की वेबसाईटों पर मौजूद हैं जो बताते हैं कि दिल्ली में खरबपति कांगे्रस सांसद नवीन जिंदल के घर एक साल के तीन सौ पैंसठ दिनों में तीन सौ पैंसठ से अधिक रियायती रसोई गैस सिलेंडर पहुंचाए गए। ऐसी रियायत आखिरी उसी सरकारी बजट से जाती है जिसमें पैसों की कमी से देश की आधी आबादी कुपोषण की शिकार है।

हिंदी के आज के हाल पर कुछ सोच-विचार की उम्मीद के साथ


संपादकीय
14 सितंबर 2012
आज के दिन हिंदी दिवस मनाया जाता है। लोग इस भाषा के बारे में कई तरह की बातें लिखते हैं और सालाना श्रद्धांजलि के अंदाज में इस भाषा के महत्व को याद किया जाता है। ऐसे मौकों पर बहुत से लोग भावुक होने लगते हैं और राष्ट्रभाषा की उपेक्षा गिनाते हुए वे हिंदी सेवा की जरूरत पर बोलने और लिखने लगते हैं। हिंदी सेवा, हिंदी सेवक जैसे शब्द पूरे वक्त कहीं न कहीं हवा में तैरते रहते हैं। बहुत से लोग इसी नाम से बनाए गए संगठनों की कुर्सियों पर काबिज रहते हैं, कुछ लोग इसे एक पूर्णकालिक पेशे की तरह भी बना लेते हैं और वे हिंदी सेवक का दर्जा पाकर एक किस्म की शहादत की कोशिश में लग जाते हैं। यह माहौल कुछ उसी तरह का लगता है जैसे घूरों पर पलती गायों के देश में लोग पूर्णकालिक गौसेवक हो जाते हैं। गाय को सिर्फ पालीथीन वाला घूरा नसीब होता है और गौसेवक गाय के हिस्से की रोटी खाने लगते हैं।
हिंदी भाषा की सेवा बड़ा मजेदार शब्द है। हिंदी को कम पढऩे वाले कोई विदेशी अगर सुनेंगे तो वे हिंदी को मां समझेंगे और उन्हें लगेगा कि ऐसे सेवक मां के पैर दबाने में लगे रहते हैं। हम अपनी साधारण समझ से जब यह सोचते हैं कि इस बड़े देश में सबसे बड़ा हिस्सा जब हिंदी बोलने वालों का है, तो फिर हिंदी इस्तेमाल करने वालों का बुरा हाल क्यों है? कुछ लोग इस बात को मुगल राज तक ले जाएंगे जब भारत में उर्दू का प्रचलन शुरू हुआ और सरकारी कामकाज उसमें होने लगा। फिर अगर देखें तो ईस्ट इंडिया कंपनी आई और देश का सरकारी काम, अदालती काम उर्दू के साथ-साथ अंगे्रजी में भी होने लगा। फिर जब भारत के आजाद होने का वक्त आया, देश के संविधान को बनाने की बात आई, तो दुनिया के बहुत से संविधानों की मिसालें अंगे्रजी में थीं, और भारत का उस वक्त का सत्ता का तबका अंगे्रजी जानने-समझने वाला था, तो कानून अंगे्रजी में बना। सरकार का कामकाज भी आजादी के बाद अंगे्रजी में शुरू हुआ, इसलिए देश के बीच के एक बड़े हिस्से को छोड़कर बाकी राज्यों में हिंदी बोलचाल की भाषा भी नहीं थी, बोली भी नहीं थी। 
भारत के नक्शे को अगर देखें तो दिल्ली से शुरू होकर हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान इतने राज्य ही अपने थोड़े या अधिक हिस्से में हिंदी बोलने वाले थे, बाकी के तमाम राज्य हिंदी से परे की दूसरी जुबानों वाले थे। और जिन राज्यों को यहां हम गिना रहे हैं, इनके भीतर भी क्षेत्रीय बोलियां बहुत ताकतवर थीं, जैसे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी, और दो-तीन और बोलियां, ऐसा हाल हिंदी भाषी इन प्रदेशों का भी था। जैसे भोजपुरी में, राजस्थानी में, हरियाणवी और गढ़वाली में कितने ही किस्म की फिल्में बनती हैं, संगीत रिकॉर्ड होता है, साहित्य लिखा जाता है, लोकगीत चले आ रहे हैं। इनकी लिपि देवनागरी होने से इनको हिंदी भाषी मान लिया गया और वह गिनती हकीकत से थोड़ी दूर रही। 
लेकिन यह भी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था, और हिंदी से सत्ताहीन तबके, कमजोर तबके, उद्योग-बाजार और आयात-निर्यात से परे के तबके, तकनीकी शिक्षा और उच्च शिक्षा से परे के तबके अपना काम चलाते रहे और कमजोर बने भी रहे। चूंकि कामयाबी का एक रिश्ता अंगे्रजी से एक सदी से अधिक से बना हुआ था, इसलिए वह चलते रहा, और देश के बाहर हिंदुस्तान का अधिकतर लेना-देना अंगे्रजी भाषी देशों से था इसलिए भी वह चलते रहा। जो लोग अंगे्रजी नहीं जानते-समझते थे, और जिनके लिए हिंदी में ऊंची पढ़ाई करना मुश्किल था, बाहरी दुनिया से संपर्क मुश्किल था, कम्प्यूटर से लेकर टेक्नालॉजी तक का काम मुश्किल था, वे पीछे रहते चले गए। और जिस तरह पीछे रह गई एक पीढ़ी की अगली पीढ़ी के पीछे रहने का खतरा अधिक रहता है, उसी तरह का हाल हिंदी बोलने वालों का हुआ। दूसरी तरफ हिंदी को एक भावनात्मक मुद्दा मानने वाले लोग उसकी सेवा के नाम पर अंगे्रजी के विरोध को आक्रामक तरीके से बढ़ाते रहे, और हिंदी इलाकों में एक के बाद दूसरी पीढ़ी अंगे्रजी की जानकारी के बिना, अंगे्रजी में काम करने वाले राज्यों के लोगों से पीछे रहती चली गईं। 
भाषा को लेकर आज इस जगह इस चर्चा में अपने विचार लिखने के लिए हमारे पास दो छोटी-छोटी बातें हैं। एक तो यह कि हिंदुस्तान में जो लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं उनको यह भी समझना होगा कि जिस शुद्ध हिंदी को वे राष्ट्रभाषा करार देना चाहते हैं, वह हिंदी यहां की राष्ट्रभाषा नहीं रही, नहीं है, और नहीं रहेगी। मुगलों की उर्दू और अंगे्रजों की अंगे्रजी आने के पहले भी हिंदुस्तान के आज के कुछ हद तक के हिंदी भाषी राज्यों में स्थानीय और क्षेत्रीय बोलियों की इतनी जबर्दस्त पकड़ थी, और आज भी है कि आज की खड़ी बोली जैसी हिंदी, शुद्ध कही जाने वाली हिंदी, मोटे तौर पर बहुत सीमित थी। जिस तरह हिंदी को अलग, और हिंदुस्तानी को अलग मान लिया जाता है, उससे हिंदी का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। आज की हिंदी के साथ उर्दू, अंगे्रजी, और हिंदुस्तान की दर्जनों दूसरी भाषाओं और बोलियों ने मिलकर जो हिंदुस्तानी जुबान बनाई है, उसमें से फेंटकर सिर्फ खालिस हिंदी को जब अलग कर लिया जाता है, और उसे एक सेवा की तरह की भावना से जोड़ दिया जाता है तो वह बाकी हिंदुस्तानियों के काम की नहीं रह जाती। जिस तरह किसी मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम समाधि या दरगाह पर जब इनमें से किसी एक ही धर्म के रीति-रिवाज, उसी धर्म के रंगों को लेकर हावी हो जाते हैं, तो दूसरे धर्म वहां से हटना बेहतर समझते हैं। इसी तरह का हाल हिंदी का हुआ, और हिंदी इलाकों को यह ठीक से पढऩे-समझने भी नहीं मिला कि गैरहिंदी राज्यों में, खासकर दक्षिण के राज्यों में हिंदी किस हद तक बेकाम की जुबान है। उसका न कोई अस्तित्व है, न उसकी वहां कोई जरूरत है। वहां हिंदी जानने, समझने और बोलने वाले लोग ऐसे कामगार हैं जिनका कि भारत के हिंदी भाषी राज्यों से कामकाज का वास्ता पड़ता है। इससे परे वे अपनी क्षेत्रीय भाषा में खुश हैं और आगे बढऩे की संभावनाएं देने वाली अंगे्रजी जुबान के साथ खुश हैं।
हिंदुस्तानी से अपने-आपको अलग करने के फेर में शुद्धतावादी हिंदी ने अपने दायरे को बहुत सीमित कर लिया। वरना एक वक्त था जब पे्रमचंद जैसे लेखक उर्दू को भी समझते थे, उर्दू में भी लिखते थे, और जब वे हिंदी लिखते थे, तो वह गरिष्ठतावादी, शुद्धतावादी हिंदी से परे की हिंदुस्तानी जुबान होती थी, यही वजह है कि वह आसानी से लोगों के समझ आती थी, और आज पौन सदी बाद भी वह आज के बहुत से हिंदी लेखन के मुकाबले समझने में अधिक आसान है। हिंदी की सेवा या शुद्धता के नाम पर जो लोग लगे रहते हैं, उन्हीं से इस भाषा की संभावनाओं को नुकसान हुआ। किसी भाषा का असरदार होना, उसकी संवाद-क्षमता का अधिक होना जरूरी होता है, न कि उसका शुद्ध होना। हिंदी को जब लगातार शुद्ध बनाए रखने की ऐसी कोशिशें हुईं कि वह अधिक से अधिक लोगों की समझ से परे होती चली गई, तो वह अपना असर और खोती चली गई, क्योंकि वह कम लोगों के इस्तेमाल की रह गई। हिंदी के साथ एक दिक्कत और यह हो गई है कि अंगे्रजी से नापसंदगी के चलते हिंदी के जो लोग अंगे्रजी से परहेज करने लगे, उनका ज्ञान-संसार भी सीमित रहने लगा, और ज्ञान के विकल्प की तरह उन्होंने भावनाओं और विशेषणों का इस्तेमाल अधिक किया।
भाषा इस्तेमाल के लिए होती है, उसका मकसद किसी से अपने पैर दबवाना नहीं है, उसका मकसद किसी एक की बात को दूसरे तक पहुंचाना है। भाषा एक औजार की तरह है जो अगर अच्छी तरह अपना काम करे, हुनरमंद कारीगर के काम में उससे मदद मिले, तो ही उस औजार की इज्जत है। जिस घन से अच्छा वार हो सके, वह लोहे का भी अच्छा। और जिसके वार से चोट न पहुंचे, वह सोने का घन भी किसी काम का नहीं। इसलिए भाषा को बांहें फैलाकर दूसरी भाषाओं और बोलियों से मिलकर चलना चाहिए, उन्हें गले मिलाकर चलना चाहिए। भाषा से बिल्कुल परे की एक मिसाल हम यहां देना चाहेंगे जो कि हमें अपने किस्म की बेमिसाल बात लगती है। सिखों के सबसे महान ग्रंथ गुरूग्रंथ साहिब को देखें तो गुरूनानक देव ने उस वक्त के मुस्लिम, हिंदू, दलित, सभी तबकों के संतों की बातों को सिखों के इस गं्रथ में उनके नाम सहित जोड़ा। गुरूनानक चाहते तो उन्हें सिर्फ अपनी बातों से ही यह गं्रथ पूरा कर देने से कौन रोक सकता था? दुनिया के अधिकांश धार्मिक गं्रथ सिर्फ अपनी ही बातों के होते हैं। लेकिन धर्मों की ऐसी दुनिया में जब गुरूनानक देव ने बेझिझक दूसरे धर्मों को इतना महत्व दिया, तो उनकी उस दरियादिली से भी यह गं्रथ इतना महत्वपूर्ण बन पाया। इसी तरह का हाल जुबान के मामले में अंगे्रजी का रहा, जिसने दुनिया की दर्जन भाषाओं से सैकड़ों शब्दों को हर बरस अपने में शामिल करने का सिलसिला चला रखा है और अंगे्रजी के शब्दकोषों में ऐसी लिस्ट हर साल जुड़ती भी है। 
विचार के इस कॉलम में इस बड़े मुद्दे पर पूरा लिखना मुमकिन नहीं है इसलिए हम आधी-अधूरी बात को ही यहां छोड़ रहे हैं, यहां उठाए गए कुछ पहलुओं पर कुछ सोच-विचार की उम्मीद के साथ।