छत्तीसगढ़ की सालगिरह


संपादकीय
३१अक्टूबर 2012
छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस पल एक प्रेस कांफे्रंस में अपनी सरकार की कई नई नीतियों की घोषणा कर रहे हैं जिनसे मौजूदा उद्योगपतियों से लेकर संभावित पूंजी निवेशकों तक को फायदा होने की उनको उम्मीद है, और साथ-साथ इस राज्य में रोजगार बढऩे से लेकर अर्थव्यवस्था विकसित होने तक का उनका अंदाज है। पिछले कुछ हफ्तों में उन्होंने महानगरों तक जाकर देश-विदेश के उद्योगपतियों और कारोबारियों से इस राज्य में संभावनाओं पर चर्चा की थी, और इस हफ्ते ऐसी चर्चा और आगे बढऩे वाली है। राज्य के स्थापना दिवस के साथ-साथ इस बार एक और बात जुड़ी हुई है कि इस सरकार के इस दूसरे कार्यकाल का यह आखिरी स्थापना-समारोह है क्योंकि अगले बरस चुनाव करीब होने से ऐसा कोई समारोह नहीं होगा। मुख्यमंत्री जिस उत्साह के साथ अपनी अभी तक की उपलब्धियों के आंकड़े सामने रख रहे हैं, और नई नीतियों की घोषणा कर रहे हैं, उन्हें इस राज्य के संदर्भ में तो देखना ही होगा, जिस मध्यप्रदेश का हिस्सा छत्तीसगढ़ सन 2000 तक रहा है, उसके साथ जोड़कर भी इसे देखना होगा। तीसरी बात यह कि देश के आज के बाकी माहौल के साथ भी छत्तीसगढ़ की तुलना करनी होगी।
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने देश में तीन नए राज्य बनाए थे, उन तीनों की तुलना करें तो छत्तीसगढ़ एक अभूतपूर्व और महत्वपूर्ण स्थिरता और निरंतरता का गवाह रहा है। कुछ राजनीतिक साजिशों के बावजूद इस राज्य में सरकारें न पलटी गईं और न ही उन सरकारों के भीतर मुख्यमंत्री को बदलने की नौबत आई। रमन सिंह  सरकार के दस बरस पूरे करने के आसार हैं, और ये दस बरस नए राज्यों को जायज ठहराने के लिए इस देश में आज तक की सबसे बड़ी मिसाल भी रहेंगे। कोई भी दूसरा छोटा राज्य न तो इस तरह राजनीतिक स्थिरता देख पाया, और न ही आर्थिक विकास पा सका। इसलिए छत्तीसगढ़ की कामयाबी भारतीय लोकतंत्र में इस वजह से भी अहमियत रखती है कि इसके बिना बाकी तमाम छोटे राज्य राजनीतिक अस्थिरता, सत्तापलट, सत्ता के अपराध, और विकास में दिक्कतों के मॉडल साबित हुए हैं। छत्तीसगढ़ अकेला ऐसा उदाहरण है जिसे देखकर इस देश में आगे नए छोटे राज्यों को जायज ठहराया जाएगा। 
छत्तीसगढ़ की तरह का ही खनिज सपन्न राज्य झारखंड था। लेकिन अभी यह याद रखना मुश्किल है कि वहां किस पार्टी या गठबंधन की सरकार का कौन मुखिया है, कौन सा पिछला मुख्यमंत्री जेल में है या जमानत पर है, किस पार्टी के नेता कटघरों में हैं। इसी तरह उत्तराखंड कांगे्रस के भीतर बगावत झेल चुका है, भाजपा के भीतर एक निहायत गैरजरूरी सत्तापलट देख चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ अपने साथ पैदा हुए इन दो राज्यों से अलग एक कामयाब राज्य रहा। फिर एक दूसरे पैमाने पर देखें तो खनिज संपन्न झारखंड से लेकर कर्नाटक तक और गोवा तक, जितने राज्य सारी निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमे झेल रहे हैं, उनके मुकाबले छत्तीसगढ़ वैसे किसी भ्रष्टाचार से अब तक बचा हुआ है। इन तीनों बड़े खनिज राज्यों में अदालती दखल इस हद तक हुई कि दसियों हजार करोड़ का भ्रष्टाचार सामने आया, छत्तीसगढ़ अब तक किसी भी कटघरे से बाहर है। इसके अलावा महाराष्ट्र के आदर्श घोटाले, दूसरे कई राज्यों के दूसरे घोटालों से परे छत्तीसगढ़ अब तक साफ-सुथरा बना हुआ है, एक भी मंत्री या एक भी सचिव किसी मामले में न गिरफ्तार हुए, न कुर्सी से हटाए गए। हमारा ख्याल है कि यह बात भी बाहर से आने वाले लोगों के लिए राहत की बात होगी। 
छत्तीसगढ़ जिस तरह कई अंधेरे राज्यों के बीच रौशन बना हुआ है, बिजली की वह हालत भी आज कम मायने नहीं रखती। दूसरी तरफ प्रदेश के सबसे गरीब लोगों के लिए जिस तरह रियायती अनाज की योजना लागू करने, और उसे पूरे देश में सबसे अच्छी तरह, सबसे अधिक कामयाबी से चलाने का सर्टिफिकेट इस राज्य को अनगिनत मौकों पर भाजपा विरोधी यूपीए सरकार से मिला है, वह इस राज्य की हम एक सबसे बड़ी कामयाबी मानते हैं। हमारा राजनीतिक अंदाज तो यह है कि रमन सिंह के पहले कार्यकाल के बाद उनकी पार्टी दुबारा सत्ता में चावल के दाने पर सवार होकर ही पहुंची थी। करोड़ से अधिक की जिस गरीब आबादी में दो वक्त भेट भरकर कभी खाया नहीं, उनको जिस तरह से रियायती अनाज पहुंचाया गया, उसे लेकर प्रदेश के कांगे्रस नेता चाहे जो बयान दें, सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के एक से अधिक लोगों ने छत्तीसगढ़ की तारीफ में अपने नाम से लंबे-लंबे लेख लिखे, यहां आकर, देखकर रिपोर्ट बनाईं, और हिंदू जैसे भाजपा-विरोधी अखबार में प्रमुखता से उनको छापा। यह बात कांगे्रस के कुछ लोगों को कम महत्वपूर्ण लग सकती है, लेकिन जिन लोगों को सबसे गरीब तबके की भूख कम महत्वपूर्ण लगती है, वे छत्तीसगढ़ सरकार की इस योजना और इसकी कामयाबी के खिलाफ कागजों पर बयान जारी करते रह सकते हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के हिस्से के रूप में छत्तीसगढ़ का जो बुरा हाल कांगे्रस की सरकारों ने करके रखा था, उससे उबरकर छत्तीसगढ़ का इतना आगे बढऩा महत्वपूर्ण है।
इस राज्य की, यहां की सरकार की बहुत सी छोटी-छोटी खामियां हो सकती हैं, हैं भी, लेकिन उनको भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा हाल के साथ, उस पैमाने पर ही नापा जा सकता है, उसके लिए अलग से कोई कसौटी नहीं गढ़ी जा सकती। उन तमाम पैमानों पर यह राज्य आज दूसरे लगभग तमाम राज्यों के मुकाबले बेहतर दिखता है।  सांप्रदायिकता से आजाद, जनकल्याणकारी कार्यक्रमों से सबसे गरीब का भला करते हुए, यह देश के आर्थिक विकास की औसत दर के मुकाबले बहुत अधिक रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, और सालगिरह के मौके पर इस राज्य के लिए यह राहत की एक बात है। आने वाला वक्त मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनकी सरकार के लिए राजनीतिक चुनौतियों वाले चुनाव भी लेकर आएगा, और वह एक अलग कसौटी होगी।

हत्यारा दकियानूसीपन सिर्फ हरियाणा में नहीं, यहां भी...


30 अक्टूबर 
संपादकीय
गुजरात से एक भयानक रिपोर्ट आई है कि छत्तीसगढ़ के एक गांव में पे्रम विवाह करने वाले जोड़े पर गांव की पंचायत ने पचास हजार रुपये का जुर्माना लगाया, तो इस नौजवान जोड़े को गांव छोड़कर ही भाग जाना पड़ा। गुजरात के ईंट भ_े में काम की तलाश में पहुंचे इन लोगों ने अपनी बच्ची से छुटकारा पाने के लिए उसे टे्रन में छोड़ा तो एक अखबार में छपी तस्वीर को देखकर साथी मजदूरों से वह बच्ची पुलिस के मार्फत फिर इस मां-बाप की गोद में आ गई। यह लंबी कहानी आज के पहले पन्ने पर  है इसलिए इसके बारे में और अधिक जानकारी यहां लिखने की जरूरत नहीं है, लेकिन कल ही एक दूसरी खबर है कि हरियाणा में पे्रम विवाह करने वाली एक लड़की को मार डालने के जुर्म में उसके घर के सात लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। हरियाणा की खाप पंचायतें तो दकियानूसी और हत्यारे फैसले लेने के लिए बदनाम हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की पंचायत का यह फैसला भी कुल मिलाकर इस छोटी बच्ची को तो मौत की दहलीज तक पहुंचा ही चुका था। और लगे हाथों यह भी चर्चा कर लेना ठीक होगा कि किस तरह छत्तीसगढ़ में हर बरस कई जोड़े पे्रम विवाह न कर पाने पर एक साथ या अलग-अलग आत्महत्या कर लेते हैं।
भारत के समाज को यह समझना होगा कि पे्रम से नफरत करके वह अपने ही बीच के लोगों को ऐसी घोर निराशा में जीने पर मजबूर कर देता है कि उससे समाज की मानसिक सेहत बुरी तरह से खराब हो रही है। आज पे्रम के लिए किसी विदेशी संस्कृति की जरूरत नहीं है, कृष्ण से लेकर कालिदास तक और हिंदी फिल्मों में राजकपूर के भी पहले से लेकर अब तक, कदम-कदम पर पे्रम बिखरा हुआ है। और जिंदगी में पे्रम एक ऐसी भावना है जो लोगों को बेहतर काम करने की तरफ बढ़ाती है और गलत काम करने से रोकती है। ऐसे पे्रम को रोकना अपने ही बच्चों का नुकसान करना है। आत्महत्याओं और हत्याओं की खबरें ही समाज में पे्रम और उससे नफरत की हालत को बताने के लिए काफी नहीं हैं, और हकीकत इन खबरों से हजार गुना अधिक हो। और ऐसे में उस कड़वी हकीकत के चलते नौजवान पीढ़ी की निराशा भी इन खबरों से हजार गुना अधिक हो। जो नाली और गटर से छोटे-छोटे नवजात शिशु बरामद होते हैं, उन हत्याओं और मौतों के पीछे भी समाज का ऐसा नजरिया ही रहता है जो पे्रम संबंधों को इजाजत नहीं देता, दूसरी जाति या दूसरे धर्म में शादी की इजाजत नहीं देता। शादी के पहले बच्चे होने को इजाजत की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
लेकिन हरियाणा को कोसना, और छत्तीसगढ़ की ज्यादती को अनदेखा करना गलत होगा। यहां भी अभी-अभी बिलासपुर एक किसी स्कूल या कॉलेज ने लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाई, और एक किसी जाति के संगठन ने अपनी जाति की लड़कियों की पोशाक पर तरह-तरह की रोक का फतवा जारी किया है। सरकार चूंकि वोटों से चुनकर बनती है, इसलिए सरकार समाज सुधार के ऐसे फैसले आसानी से नहीं ले सकती जो कि मतदाताओं के एक संगठित तबके को नाराज करते हों। इसलिए निर्वाचित सरकारों से परे समाज के लोगों को ही आगे आकर समाज के अपने या पराए तबकों की नाराजगी को झेलना होगा। इसके बिना यह समाज दकियानूसी बने रह जाएगा और यह प्रदेश अपनी नौजवान पीढ़ी की क्षमताओं को कभी हासिल नहीं कर पाएगा। आज की जिस घटना को लेकर हम इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, उसके लिए जिम्मेदार सरपंच पर, पंचायत पर कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसा न होने पर दकियानूसीपन एक संक्रामक रोग की तरह दूसरी जगहों तक फैलने की ताकत रखता ही है।


देह बेचना बुरा, या उस पर काबू?


29 अक्टूबर 2012
आए दिन देश के दूसरे शहरों की तरह मेरे शहर में भी पुलिस किसी लड़की को, उसके दलाल को, और उसके ग्राहकों को पकड़ती है। चेहरा ढांके हुए लोगों की तस्वीरें लेने को अखबारों और टीवी चैनलों के कैमरे टूट पड़ते हैं। पढऩे और देखने वालों को भी कुछ ऐसा चटपटा मिलता है, जो उनकी अपनी जिंदगी में नहीं है, और शायद जिसकी हसरत इस देश के माहौल के चलते अधूरी रह जाती है।
यह बहस भी इस देश में अब बहस में नहीं आती कि वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा दिया जाए। जिस किसी को अपनी इज्जत की फिक्र होती है, वे तमाम लोग इस मुद्दे पर ही बात करने से बचते हैं। वेश्यावृत्ति की हकीकत को जानते हुए भी उसकी मौजूदगी से ही इंकार करने वाले हिंदुस्तानियों की वजह से इस धंधे में जो महिलाएं हैं, उनकी देह पर परजीवियों की तरह बहुत से लोग पलते हैं। जितना ग्राहक उसे झिंझोड़ता है, उससे कम उसे दलाल या पुलिस या दूसरे महकमे के लोग नहीं झिंझोड़ते। यह सब जानते हुए भी चूंकि वह एक असंगठित तबके की है, उसका दर्जा गैरकानूनी है, मुंह खोलते ही वह सजा की हकदार हो जाएगी, इसलिए उसकी कोई आवाज नहीं है। 
दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जहां यह धंधा नहीं होता। कुछ जगहों पर कानून ने इसे इजाजत दी है, बहुत सी जगहों पर कानून इसके खिलाफ है। चीन में यह गैरकानूनी है और आए दिन वहां किसी न किसी शहर में चकलाघरों पर पुलिस के छापे पड़ते रहते हैं। इस देश की चर्चा आज यहां मैं इसलिए कर रहा हूं कि अभी वहां पुलिस महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले एक संगठन पर छापा मारा। वहां एक सामाजिक कार्यकर्ता काम करती है जिसने कुछ महीने पहले वेश्याओं की हालत की तरफ ध्यान खींचने के लिए दो दिन खुद वेश्या का काम करने की घोषणा की थी। 
ये हाईयान नाम की इस महिला का मानना था कि उसके ऐसा करने से जो खलबली मचेगी उससे वेश्यावृत्ति को कानूनी बनाने की मांग मजबूत होगी। और ऐसा हुआ भी। चीन के कानून के मुताबिक वेश्या के लिए सजा है, इसलिए इस महिला ने इन दो दिनों के अपने ग्राहकों से कोई भुगतान नहीं लिया ताकि वह सजा से बची हुई रहे। दूसरी तरफ चीन की हकीकत यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक प्रकाशन के मुताबिक 2010 में चीन में 40 से 60 लाख के बीच वेश्याएं थीं। चीन के छोटे-बड़े हर शहर में इन महिलाओं को सेलून, बार में देह बेचते देखा जा सकता है।
एक दूसरी खबर दो-चार दिन पहले यह थी कि समाज सेवा के एक काम के लिए चंदा जुटाने को ब्राजील की एक 20 बरस की लड़की ने इंटरनेट पर अपना कौमार्य नीलाम किया जिसमें से सबसे अधिक बोली 7 लाख 80 हजार डॉलर की मिली। यह लड़की अभी पढ़ ही रही है और इस कमाई का 90 फीसदी हिस्सा वह समाज सेवा के लिए देने जा रही है। यह बात सीधे-सीधे वेश्यावृत्ति की नहीं है, लेकिन है भी। देह को बेचकर मिली हुई कमाई कोई खुद रखे या उसका इस्तेमाल समाज के लिए करे, उससे देह को बेचने के पहलू पर फर्क नहीं पड़ता। 
लेकिन पिछले दो दिनों में ही खबरों में आई इन दो बातों से परे भारत की हकीकत को अगर देखें तो दसियों लाख लड़कियां और महिलाएं इस काम में लगी हुई हैं। हो सकता है कि ये सारी की सारी किसी बंदूक या चाकू की नोंक पर इस धंधे में उतारी गई हों, लेकिन उससे उनकी आज की हालत पर फर्क नहीं पड़ता। उनका सच यह है कि इस धंधे के बाहर उनमें से बहुत कम लोगों के लिए कोई गुंजाइश रहती है, और उनमें से बहुतों का काम इस धंधे के बिना अब नहीं चल सकता। और जहां तक इन लोगों को इस धंधे से बाहर निकालकर बसाने की बात है, तो हर बरस की बाढ़ की तरह नई लड़कियां इस धंधे में लाई जाती रहेंगी, और पुनर्वास का सिलसिला अंतहीन चलते रह सकता है। 
इन दोनों के बीच एक हकीकत की तरह किसी भी दिन के हिंदुस्तान में दसियों लाख महिलाएं यह काम करती ही रहेंगी। और इससे यह सवाल उठता है कि वेश्यावृत्ति को गलत, खराब, जुर्म, कलंक मानने वाले लोगों के पास, उनके समाज के पास, उनकी सरकार के पास यह काम करने वाली महिलाओं को इंसान का दर्जा देने की क्या तरकीब है? इनसे वसूली और उगाही करने की तरकीब तो है, इनको लूटने और नोंचने की तरकीब तो है, लेकिन इनको अपनी देह की कमाई का भी हक देने का क्या जरिया समाज के पास है? 
कानूनी दर्जा मिलने से देह बेचती महिलाएं गुंडों और पुलिस वाले के मुकाबले अपनी देह की कमाई का अधिक हिस्सा पा सकेंगी। आज यह काम जुर्म होने से उस महिला को बीमारी के खतरों के साथ, अधिकार छिनने के साथ, उसके हक की कमाई का अधिकांश हिस्सा लुट जाने देने पर भी बेबस रखता है। इसके साथ-साथ उस औरत को किसी तरह के इलाज का भी कोई हक नहीं मिल पाता। यह नौबत सिर्फ एक तरह से बदल सकती है कि हिंदुस्तानी आंखें बंद करके हकीकत को नकार देने और कड़वी हकीकत के बिना अपने-आपको बड़े फख्र का सामान मानने का धंधा बंद करें। धंधा करने वाली औरत तो अपनी देह बेचकर धंधा करती है, बाकी हिंदुस्तानी तो अपनी आंखें बंद करके उसे नोंचने को अनदेखा करने का धंधा करते हैं। 
यह देश एक आडंबर में जीता है, यह कुछ चीजों को वयस्क और अश्लील पत्रिकाओं की तरह गद्दे के नीचे छुपाकर रखता है और मान लेता है कि उनका अस्तित्व खत्म हो गया। भारतीय जेलों में समलैंगिकता से उपजे खतरों पर भी जेलों में कंडोम न रखने की हिंदुस्तान की नैतिक जिद से लेकर सेक्स-शिक्षा से उसके परहेज, समलैंगिकता से उसके दहशत और नफरत जैसे कई आडंबरों के बीच यह एक और आडंबर है कि इस देश में वेश्यावृत्ति की मौजूदगी को नकारना, और यह मान लेना कि कानूनी दर्जा न मिलने से वह खत्म हो जाएगी। 
आज बिना कानूनी दर्जे एक महिला अपनी देह पर सारे खतरे उठाते हुए भी न तो अपनी कमाई पूरी पाती, और न ही अपने शोषण के खिलाफ कानून की दहलीज पर जा सकती। उसे उसके न्यूनतम मानवीय अधिकारों से भी दूर रखना, वेश्यावृत्ति के मुकाबले अधिक गंदा धंधा है। वह तो कम से कम, या अधिक से अधिक अपनी देह बेचने तक ही रहती है, बाकी का समाज तो उसकी देह के काम को एक तरफ तो गैरकानूनी करार देता है, दूसरी तरफ उसकी देह में पेट नाम का जो हिस्सा है, उसे भरने को समाज और सरकार अपना धंधा नहीं मानते। यह किसी भी तरह से जनकल्याणकारी लोकतंत्र का नजरिया नहीं हो सकता, और यह सिलसिला बदलना ही चाहिए। दुनिया के जितने सभ्य देश हैं, उन्होंने अपने-आप के साथ फरेब करने का यह धंधा बंद कर दिया है, और वेश्याओं को कामकाजी मानकर उनको पूरे कानूनी हक दिए हैं। ऐसा करना समाज के उन लोगों के भले का भी होगा जो किसी एक या दूसरी वजह से वेश्याओं के पास जाने की जरूरत रखते हैं। उनकी सेहत के लिए भी एक कानूनी और संगठित वेश्यावृत्ति बेहतर होगी। सेक्स जैसी एक बुनियादी जरूरत को भी जब सरकार काबू में रखकर सिर्फ बुरा ही बुरा कर रही है, तो इस काबू की जरूरत क्या है?

यूपीए मंत्रिमंडल में फेरबदल कांगे्रस की यह कोशिश बहुत देर से, बहुत नाकाफी


29 अक्टूबर 2012
संपादकीय
यूपीए सरकार में हुए फेरबदल से यूपीए के भीतर वैसे तो सिर्फ कांगे्रस पार्टी का लेना-देना है लेकिन गठबंधन के बाकी दलों से परे, देश की जनता का इस फेरबदल से सबसे बड़ा लेना-देना है। इस फेरबदल से कुछ लोगों को यह निराशा हो सकती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए मंत्रियों को हटाया नहीं गया। कुछ लोगों को यह निराशा भी हो सकती है कि कुछ दागी लोगों को भी मंत्री बना दिया गया है। लेकिन देश की बाकी राजनीतिक हवा को अगर देखें, तो जिस तरह किसी गंदे तालाब के भीतर का कोई एक हिस्सा अलग से साफ नहीं रह सकता, वामपंथियों को छोड़कर भारत की आज की राजनीति में कोई भी अपने-आपको साफ नहीं रख पाया है। लेकिन इन घिसी-पिटी बातों से परे इस ताजा फेरबदल को देखते हुए यूपीए के पिछले इतने बरस, और आने वाले बरस देखने की जरूरत है। 
यह फेरबदल तो तय था ही, क्योंकि सहयोगी दलों के अलग हो जाने से कई कुर्सियां खाली पड़ी थीं, और कांगे्रस के भीतर के कई नेता भी उतने ही खाली बैठे थे। इस मौके पर कम ही लोगों को यह उम्मीद थी कि कांगे्रस के भविष्य राहुल गांधी सरकार में शामिल होंगे। उसकी एक तर्कसंगत वजह भी थी कि सरकार के रूप में यूपीए अधिक बदनाम और अधिक नाकामयाब है, किस्म-किस्म के कटघरों में खड़ी है, दूसरी तरफ एक पार्टी होने के नाते कांगे्रस के किसी कटघरे में जाने का खतरा न था और न है। इसलिए कांगे्रस जिसे अपने भविष्य के रूप में पेश कर चुकी है उसको कटघरे से दूर रखना भी जरूरी था, और है। इसलिए सोनिया गांधी खुद सरकारी कुर्सी से दूर बनी हुई हैं, राहुल गांधी को दूर रखा गया है, वरना किस मंत्रालय को देखने वाले लोग कब फंस जाएं इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। लेकिन इस फेरबदल के साथ जो माहौल जुड़ा हुआ है उसे अगर देखें तो ऐसा लगता है कि यूपीए की मुखिया के रूप में, और एक पार्टी के रूप में कांगे्रस ने हाथ से फिसलती हुई रस्सी को बहुत देर से थामने की कोशिश की है, और बहुत अनमने ढंग से भी। इस सरकार के आखिरी डेढ़-दो बरस अगर इसके ही पिछले आठ बरसों से कुछ बेहतर रहेंगे, तो यह इस पार्टी के किए नहीं होगा, देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो हवा खड़ी हुई है, उसके चलते होगा। आज नेता और अफसर न सिर्फ यूपीए सरकार में, बल्कि बाकी पूरे देश में भी सहमे हुए हैं, और उसी के चलते लोग राजा-कलमाड़ी की राह पर चलने से बचेंगे। 
यह जरूर है कि चूंकि कांगे्रस पार्टी राजनीति में बनी हुई है इसलिए बढ़ते हुए नुकसान को रोकने का उसका हक भी है, और उसकी जिम्मेदारी भी है। लेकिन इस काम में वह बुरी तरह नाकामयाब रही है। दरअसल भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में कभी ऐसा इतिहास नहीं रहा है कि देश पर राज करने वाली पार्टी की मुखिया, देश के प्रधानमंत्री, और इन दोनों के अगले दावेदार, ऐसे तमाम तीन बड़े लोग देश के साथ अपनी तकरीबन सारी बातचीत पार्टी प्रवक्ताओं के माध्यम से करें। यूपीए और कांगे्रस की यह एक बड़ी नाकामयाबी रही उसके ये तीनों बड़े नेता किसी नाजुक मौके पर कभी जनता के रूबरू नहीं हुए। अधिक पुरानी बात नहीं है, इसी महीने जब रॉबर्ट वाड्रा पर बहुत ही गंभीर आरोप लगे, तो यूपीए के कांगे्रसी मंत्री, कांगे्रस प्रवक्ता और कांगे्रस के कुछ नेता बचाव के लिए टूट पड़े। लेकिन जिस परिवार का दामाद होने की वजह से रॉबर्ट के कारोबारी सौदों की तरफ देश का ध्यान खींचा गया था, वह परिवार यूपीए का मुखिया होने के बावजूद पूरी तरह चुप रहा। भारतीय लोकतंत्र में जनता अपने नेता से ऐसे नाजुक मौकों पर चुप्पी नहीं चाहती, उनकी बात सुनना चाहती है। पार्टी के प्रवक्ता पार्टी से जुड़ी बातों पर बयान देने के लिए रहते हैं। मंत्री सरकार की बात कह सकते हैं। लेकिन जब बात सोनिया परिवार पर आई थी, और अब तक खड़ी है, तो लोग उस परिवार से एक सफाई पाने का हक तो रखते ही हैं। इसकी जगह इंटरनेट पर रॉबर्ट वाड्रा के बहुत ही अहंकारी और अपमानजनक बयान का तोहफा इस देश को मिला। इस पर भी अगर कल सोनिया गांधी कोई जवाब नहीं दिया, तो यह देश के प्रति जवाबदेही की कमी है।
कुछ ऐसा ही हाल कांगे्रस पार्टी और यूपीए का पिछले बरसों में रहा है। इन लोगों ने जनता के बीच उठी बातों पर आखिरी तक चुप्पी रखने की कोशिश की, आखिर तक बचने की कोशिश की, मानो अदालत में कानूनी छूट का इस्तेमाल करके कोई शातिर इंसान बचने की राह निकाल रहे हों। यह सिलसिला भी आम जनता की भावनाओं के पूरी तरह खिलाफ जाता है और लोकतंत्र के तकाजों से भी यह बचने की कोशिश है। मंत्रिमंडल के मौजूदा फेरबदल से सरकार के भीतर के कामकाज पर फर्क पड़ सकता है, लेकिन उसके लिए भी किसी सरकार का आठवां-नौवां बरस काफी देर का मौका रहता है, और सरकार से परे के जो सार्वजनिक सवाल हैं, वे तो जनता के मन में पोस्टर और बैनर की तरह तने हुए हैं ही। 
कांगे्रस पार्टी को इसके बारे में भी सोचना चाहिए, क्योंकि सरकारी कामकाज में सुधार का असर देश की जनता तक पहुंचने में बहुत लंबा समय लगता है। रातों-रात तो फर्क सिर्फ कोई म्युनिसिपल ही ला सकती है, केंद्र सरकार का काम इतने जल्दी नहीं दिखता। लेकिन पार्टी का चाल-चलन पल भर में दिख जाता है, और अब चुनाव तक का आने वाला वक्त कांगे्रस लीडरशिप को उसी फर्क के साथ जनता के सामने रहने का है, और इस दौर में नाजुक और गंभीर मुद्दों पर जनता कांगे्रस के नेताओं को खुद को बोलते सुनना चाहेगी। फिलहाल इस फेरबदल के बारे में हम यही कह सकते हैं कि सुधार की यह कोशिश अगर सिर्फ सरकार के स्तर पर पार्टी द्वारा की जा रही है, तो यह बहुत देर से की गई कोशिश है, जो कि बहुत नाकाफी भी है।

ऐसे पाखंड के चलते बच्चों को देह शोषण से बचाना मुश्किल


28 अक्टूबर 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में राजधानी के पास के एक कस्बे में एक स्कूली बच्चे की मिली हुई लाश के सिलसिले में हत्यारे को पकड़ लिया गया है जिसने बताया कि उस बच्चे से बलात्कार की कोशिश के दौरान दम घुटने से वह मर गया। यह अपराध अपने-आपमें दिल दहलाने वाला भयानक मामला तो है ही, इस मौके पर लोगों को सावधान होने की भी जरूरत है कि बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोग किस तरह के होते हैं और उनसे सावधान रहते हुए अपना बचाव कैसे करना चाहिए। एक तरफ तो बच्चों को इस बारे में जागरूक करने की जरूरत है, दूसरी तरफ बच्चों के मां-बाप को भी यह समझाने की जरूरत है कि बच्चों का देह शोषण किसी दूसरे देश या किसी दूसरी दुनिया की अलग से कोई खामी नहीं है, हमारे अपने बीच में इस तरह की सोच वाले बहुत से अपराधी रहते हैं जिनसे सबको सावधान रहने और करने की जरूरत है। तीसरी बात यह कि स्कूलों को भी न सिर्फ बच्चों को सावधान करने की जरूरत है, बल्कि एक नजर रखने की जरूरत भी है कि स्कूल के कोई कर्मचारी इस तरह की हरकत न करें। बच्चों से बलात्कार के मामले में बहुत से स्कूलों के कर्मचारी, स्कूल बसों के कर्मचारी, शिक्षक या खेल प्रशिक्षक जैसे लोग समय-समय पर पकड़ाते रहते हैं। दूसरी तरफ हमारा यह मानना है कि देह शोषण के सैकड़ों मामलों में से किसी एक की शिकायत ही बच्चे परिवार या स्कूल को कर पाते हैं, और हजारों मामलों में से कोई एक ही पुलिस या अदालत तक पहुंच पाता है। 
दरअसल भारतीय समाज का आम तबका अपने आसपास के लोगों को इतना भला मानकर चलता है कि जब बच्चे भी अपने शरीर से खिलवाड़ की शिकायत करते हैं, तो उन्हीं को डांटकर चुप कर दिया जाता है। इस दकियानूसी और पाखंडी समाज का हाल यह है कि यह किशोर हो चुके बच्चों को भी किसी तरह की यौन शिक्षा देने के खिलाफ है, नतीजा यह होता है कि बच्चों के पास आसपास से मिलने वाले अधकचरे, अश्लील और हिंसक ज्ञान के अलावा और कोई वैज्ञानिक या सामाजिक जानकारी नहीं रह जाती। और सेक्स की किसी भी तरह की चर्चा में भारत की दो पीढिय़ों के बीच इतना बड़ा फासला रहता है कि बच्चे न मां-बाप से बात कर पाते और न ही स्कूल में किसी शिक्षक-शिक्षिका से। 
यह तस्वीर बदलनी चाहिए। बलात्कार और हत्या की नौबत आने के पहले ही देह शोषण के चलते ऐसे बच्चों की पूरी पीढ़ी बड़ी होने तक मानसिक रूप से घायल रहती है, और समाज में उसका योगदान उस तरह से, उतना नहीं हो पाता जितना कि एक स्वस्थ बच्चे का होना चाहिए। इसके अलावा ऐसे जख्मी भावनाओं वाले बच्चे आगे चलकर खुद भी अलग-अलग कई किस्म के गलत कामों में भी उलझ सकते हैं क्योंकि समाज के लिए उनके मन में एक हिकारत की वजह बचपन में ही पैदा हो जाती है।
आज ही हमारे पास एक रिपोर्ट आई है जिसे लेकर, और छत्तीसगढ़ में एक बच्चे के साथ हुए ऐसे जुर्म को लेकर इस मुद्दे पर आज हम यहां लिख रहे हैं। इस रिपोर्ट में 
एक अमरीकी शोध के हवाले से कहा गया है कि बचपन में यौन शोषण का शिकार बने बच्चे शोषण बंद होने के औसतन 22 वर्षों बाद सामने आ पाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, हर चार में से एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। एक मनोचिकित्सक का कहना है कि शोषण का असर दशकों तक बना रहता है और इससे व्यक्ति का चरित्र, व्यवहार, पहचान सब कुछ बदल जाता है। ऐसी स्थिति में अवसाद, चिंता, खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति, नशीले पदार्थ लेना, बड़ी साधारण बात सी है। इससे किसी व्यक्ति के पूरे जीवन पर असर पड़ता है। खासतौर पर तब जब आप इस बारे में किसी से बात नहीं करते हैं। जब आप पहली बार इस बारे में बताते हैं तो ये बड़ा मुश्किल होता है कि लोग इस पर विश्वास करें, और यदि लोग आपकी बात पर नकारात्मक रवैया अपनाते हैं तो आपके लिए दोबारा इस बारे में बात करना नामुमकिन हो जाएगा।
ऊपर के हिस्से उस रिपोर्ट से हमने ज्यों के त्यों यहां पर रखे हैं क्योंकि वे वैज्ञानिक विश्लेषण अलग से लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ में और भारत के बाकी हिस्सों में मां-बाप, स्कूल, सरकार और समाज के भीतर इस खतरे पर चर्चा होना जरूरी है, वरना यह देश ऐसे घायल बच्चों से भरा रहेगा और उससे इस पीढ़ी के साथ अत्याचार के अलावा, इस पीढ़ी की बची हुई पूरी उम्र यह देश नुकसान झेलेगा। विकसित और समझदार देश अपने बच्चों से उनके शरीर के बारे में, और उम्र आने पर सेक्स के बारे में खुलकर चर्चा करते हैं, और ऐसे बच्चे देह शोषण से बचे रहे हैं।

कांगे्रस के पास अपने-आपको सुधारने का एक मौका आज


27 अक्टूबर 2012 
संपादकीय

यूपीए सरकार की मुखिया कांगे्रस पार्टी कल सरकार और पार्टी दोनों में अगले आम लोकसभा चुनावों के पहले का शायद सबसे बड़ा फेरबदल करने जा रही है। और यह पार्टी आज अपने अस्तित्व का सबसे बड़ा खतरा भी झेल रही है, आपातकाल के बाद। ऐसे में यह मौका कांगे्रस को अपने भीतर सुधार करने, और अपनी गंदगी को कुछ कम करने का एक मौका भी देता है। सरकार से लेकर संगठन तक अपने-आपको अगर आज यह पार्टी बेहतर नहीं बनाती है, तो अगले आम चुनाव में इसका बहुत अच्छा भविष्य नहीं दिखता। दूसरी तरफ यह बात भी है कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बहुत बुरी तरह फंस जाने के बाद हो सकता है कि कांगे्रस को बैठे-ठाले अपनी चुनावी संभावनाएं एक बार फिर नजर आने लगी हों, लेकिन कल के फेरबदल में उसे अपने पर मंडराते हुए खतरों का ही ख्याल करना चाहिए। 
कांगे्रस पार्टी और भाजपा इन दोनों के बीच ही जिस तरह से भ्रष्टाचार का मुकाबला कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक, और महाराष्ट्र से लेकर बाकी जगहों तक दिख रहा है उससे देश की जनता में विपक्ष के लिए जो उम्मीद रहनी चाहिए थी, वह खत्म हो चुकी है। जिस तरह लालू, मुलायम और माया सीबीआई के मामलों के चलते हुए कांगे्रस और यूपीए के खिलाफ नरम चलते हैं, क्या वैसा ही हाल नितिन गडकरी और भाजपा का भी होने जा रहा है? या फिर गडकरी और रॉबर्ट वाड्रा के मामलों को लेकर इन दोनों बड़ी पार्टियों के बीच लेन-देन की आपसी सहमति हो जाएगी? अरविंद केजरीवाल के उठाए हुए ऐसे मुद्दे लोगों को आज ठीक भी लग रहे हैं। लेकिन ऐसे माहौल के बीच आज जब कांगे्रस को अपना पार्टी और सरकार का ढांचा कुछ बदलने का मौका मिल रहा है तो हमारा यह मानना है कि चुनावी संभावनाओं से परे भी इस देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए कांगे्रस को एक बार फिर ईमानदारी को अपनी पार्टी में वापिस लाना चाहिए। जब यूपीए की मुखिया पार्टी के मुखिया के घर तक भ्रष्टाचार के आरोप पहुंचते हैं तो फिर राजा या पवार जैसे सहयोगियों से ईमानदारी की उम्मीद कोई कैसे कर सकता है? कांगे्रस को अपने चाल-चलन को सुधारना चाहिए और अपने भीतर के, अपनी सरकार के भीतर के, अपने परिवार के भीतर के भ्रष्टाचार पर काबू करना चाहिए। आज यह पार्टी विश्वसनीयता इस कदर खो चुकी है कि भाजपा के भीतर अपनी टक्कर के भ्रष्टाचार पर ही उसकी उम्मीद टिकी है कि मुकाबले में दोनों दागी पार्टियां कमोबेश एक जैसी कालिख से कमोबेश एक ही हद तक लिथड़ी हुई चुनाव में सामने रहेंगी। हमारा यह भी मानना है कि अगर इन दोनों पार्टियों का अगले लोकसभा चुनाव तक ऐसा ही हाल रहा तो फिर तीसरे मोर्चे की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं। कांगे्रस को आज अपने लोगों के लिए एक खुली आचार संहिता बनानी चाहिए और बेईमानी करके जेल जाने वालों की गिनती कम करनी चाहिए। यह मौका प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए भी पूरी तरह और बुरी तरह खो चुकी साख के कुछ कतरे वापिस बीनने का है, वे अगर अब भी एक ईमानदार सरकार की कोशिश नहीं कर सकते, तो उन्हें घर बैठना चाहिए।
हम कांगे्रस को यह नसीहत सिर्फ इसलिए नहीं दे रहे हैं कि उसका अगले चुनाव में जीतकर सरकार बनाना जरूरी है, या बेहतर है। हम यह बात इसलिए भी लिख रहे हैं कि कांगे्रस पार्टी अगले लोकसभा चुनाव के बाद अगर विपक्ष में भी रहती है तो भी उसके पास सत्ता के कुकर्मों पर बोलने के लिए मुंह रहना चाहिए। आज कांगे्रस और भाजपा दोनों ही एक-दूसरे के खिलाफ कुछ बोलने का नैतिक हक खो बैठे हैं, और वे बोलने के लिए बोल रहे हैं, जिसकी कोई विश्वसनीयता अब नहीं बची है। एक आखिरी बात इस बारे में हम यही लिखना चाहेंगे कि कांगे्रस को नेहरू और गांधी से जुड़े अपने इतिहास को याद करके अपने-आपको सुधारना चाहिए।

अमरीका में बलात्कार के बाद गर्भ को ईश्वर की मर्जी कहा


26 अक्टूबर 2012
संपादकीय
आज जब भारत अपने कुछ तबकों के इन बयानों को लेकर बदनाम हो रहा है कि बलात्कार के लिए महिलाओं के कपड़े जिम्मेदार होते हैं, काम के लिए उनका रात तक बाहर रहना जिम्मेदार होता है, मोबाइल फोन जिम्मेदार होता है या चाऊमीन जैसे खाने पर बलात्कार की जिम्मेदारी होती है। ऐसे ही वक्त पर अमरीका में यह चर्चा शुरू हुई कि बलात्कार के बाद महिला को गर्भपात का हक होना चाहिए या नहीं? अमरीका की दो पार्टियों में से एक, रिपब्लिकन पार्टी, का रूख हमेशा से यह रहा है कि महिला को किसी भी वजह से गर्भपात का हक नहीं होना चाहिए। अमरीकी समाज में चर्च का खासा वजन रहता है और ईसाई धर्म किसी भी जिंदगी को खत्म करने के खिलाफ रहता है इसलिए गर्भपात का भी वह विरोधी है। इसलिए रिपब्लिकन पार्टी के संकीर्णतावादी लोग महिलाओं को यह हक देना नहीं चाहते कि वे गर्भपात का फैसला करें। 
यह मामला इस बार के चुनाव में कुछ अधिक दूर तक चले गया है। बलात्कार को लेकर अमेरिकी सीनेट के रिपब्लिकन उम्मीदवार रिचर्ड मर्डोक ने बयान दिया है कि अगर कोई महिला बलात्कार की वजह से गर्भवती हो जाती है तो इसे 'भगवान की मर्जीÓ समझना चाहिए। इसका विरोध करते हुए डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा ने कहा, ''मुझे पता नहीं कि इन लोगों के मन में इस तरह के विचार कहां से आते हैं। मैं स्पष्ट कहता हूं कि बलात्कार तो बलात्कार है। यह अपराध है। इसलिए दुष्कर्म के बारे में इस तरह की बातें मुझे बेमतलब की लगती हैं।ÓÓ लेकिन यह पहला और अकेला मौका नहीं है जब बलात्कार और गर्भपात को लेकर रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने बकवास की हो। मर्डोक के अलावा एक दूसरे रिपब्लिकन नेता ने कई बरस पहले कहा था-अगर बलात्कार को रोकने का कोई रास्ता न हो तो महिला को विरोध छोड़कर उसका मजा लेना चाहिए। एक दूसरे रिपब्लिकन नेता ने तकरीबन यही बात कुछ दूसरे शब्दों में कही थी कि बलात्कार की शिकार महिला को उस बुरे मौके का  अच्छे से अच्छा इस्तेमाल करना चाहिए। एक तीसरे नेता ने अभी कहा कि अगर बलात्कार सचमुच होता है तो महिला के शरीर में यह तरकीब होती है कि वह अपने-आपको बंद कर ले। इसी पार्टी एक दूसरे नेता ने कहा कि बलात्कार तो भयानक है लेकिन इसे इस तरह से लेना चाहिए कि इससे एक नई जिंदगी का तोहफा भी मिलता है और इसे ईश्वर का दिया हुआ मानकर मंजूर कर लेना चाहिए। इस पार्टी के नेता बलात्कार के साथ-साथ मजे के लायक बलात्कार, आसान बलात्कार, इमरजेंसी बलात्कार, सचमुच का बलात्कार जैसे कई विशेषण इस्तेमाल करते हुए कैमरों पर रिकॉर्ड हुए हैं।
अब अगर दुनिया में सबसे विकसित देशों में से एक अमरीका की दो सबसे बड़ी पार्टियों में से एक का सार्वजनिक रूप से यह हाल है, तो फिर हिंदुस्तान की खाप पंचायतें रिपब्लिकन पार्टी से कहां अधिक बुरी हैं? और इसी अमरीका से पढ़कर आए नौजवान सांसद, कांगे्रस पार्टी के खरबपति-उद्योगपति नवीन जिंदल अगर इन खाप पंचायतों के साथ नरम रहते हैं तो हो सकता है कि अमरीका में बड़े खरबपतियों की पसंदीदा रिपब्लिकन पार्टी का उन पर असर हो। दरअसल भारत से लेकर अमरीका तक अधिकतर देशों में महिलाओं को लेकर कुछ ऐसा ही रूख है। योरप के कुछ देश जरूर ऐसे हैं जहां पर महिलाओं को पूरा हक मिलता है और बराबरी का दर्जा मिलता है। हम यहां पर सिर्फ देशों की राजनीतिक व्यवस्था की बात नहीं कर रहे। धर्म का भी कुछ ऐसा ही रूख महिलाओं के हक को लेकर रहता है। तमाम धर्मों में औरत और मर्द के बीच जमीन और आसमान का फर्क हकों को लेकर हमेशा से चले आ रहा है। और यह सिलसिला न पढ़ाई-लिखाई के साथ खत्म हो रहा है, न शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के साथ खत्म हो रहा, और न ही लोकतांत्रिक कानून हालात को बराबरी तक ला पा रहा है। सबसे संपन्न या सबसे विकसित, या कानूनी तौर पर सबसे अधिक बराबरी का दावा करने वाले अमरीका में हर चुनाव में औरत की बेइज्जती सामने आती है और औरत के हक खुलकर कुचले जाते हैं। भारत में मानो इसी की बराबरी करने के लिए जगह-जगह बलात्कार होते हैं, और महिला आरक्षण जैसे कानून गहरे दफन कर दिए जाते हैं। अमरीका के बहाने आज भारत में भी इस बात की चर्चा हो सकती है कि महिलाओं को कहां-कहां पर किस-किस तरह गैरबराबरी झेलनी पड़ रही है, झेलनी पड़ती है।

editor sunil on twitter


25oct 2012
* ias ashok khemka says on timesnow that questioning him for 42 transfers in 21 yrs, is like asking a rape-victim why she was raped.
* it is MARKET which changes a letter and becomes WARKET, to promote wars...
* digvijay 2 karan thapar on cnnibn - i had good laugh over vadraji’s ‘mango people’. (mango people would have last laugh in 2014 digvijayji)
* when british military completed 10 times more killings of muslims in iraq-afghan, british govt decided to stop boycott of modi...

भाजपाध्यक्ष गडकरी के पास सिर्फ एक विकल्प बाकी है


25 अक्टूबर
संपादकीय
भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी की परेशानियां मामूली नहीं हैं। एक बड़े कारोबारी होने के नाते उन्होंने अपने उद्योग-व्यापार में हो सकता है कि वे तमाम गलतियां की हों, और गलत काम किए हों, जिनको कि कारोबार की दुनिया में आम माना जाता है। लेकिन जब कोई देश की राजनीति में, सार्वजनिक जीवन और सत्ता में इतने ऊपर तक पहुंच जाए तो फिर वे लोग खुद आम नहीं बच जाते, और आम गलतियों का भी उनका हक नहीं रह जाता। आज जब भारतीय जनता पार्टी और देश का बाकी विपक्ष यूपीए और कांग्रेस पर खुला हमला करने की हालत में थे, उस वक्त नितिन गडकरी के कारोबार को लेकर जितने किस्म की बातें सामने आ रही हैं, उनके चलते भारतीय जनता पार्टी की आवाज छिन चुकी है। अब अगर इस पार्टी को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने आरोपों को, अपनी लड़ाई को अगर विश्वसनीयता देनी है, तो वह नितिन गडकरी की अगुवाई में मुमकिन नहीं है। अभी इस बात का अधिक महत्व नहीं है कि गडकरी की कंपनियों का किया हुआ जुर्म है या नहीं है, यह भी बात मायने नहीं रखती कि उनका किया हुआ सरकार को चूना लगाने के बराबर साबित हो पाता है या नहीं, अभी तो महत्वपूर्ण यह है कि गडकरी के सैकड़ों करोड़ के कारोबारी रिश्ते बहुत संदिग्ध किस्म के रूपयों-पैसों वाले साबित हो रहे हैं, कम से कम खबरों में, और जनधारणाओं में। और कांग्रेस के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ भी आज किसी तरह का कोई सुबूत तो है नहीं, सिवाय खबरों के और जनधारणाओं के। इसलिए भाजपा को और उसके शुभचिंतक राजनीतिक-गैरराजनीतिक संगठनों को यह सोचना होगा कि जनधारणा को किस हद तक कुचलना ठीक होगा। आज यह बात सिर्फ गुजरात और हिमाचल चुनाव की नहीं है, यह अभी से लेकर लोकसभा चुनाव तक की है, और उसके बीच में छत्तीसगढ़ जैसे पांच-सात राज्यों के चुनाव और भी आएंगे। 
यहां यह भी समझने की जरूरत है कि नितिन गडकरी को भाजपा के अध्यक्ष पद पर लगातार दूसरी बार बनाए रखने के लिए पार्टी के संविधान को बदलने का काम भी किया ही जा रहा है, और ऐसे में यह दूसरा कार्यकाल अगर ऐसे आरोपों के साथ शुरू होता है जिसकी वीडियो खबरें रात-दिन टीवी के परदों पर छाई हुई हैं, तो भाजपा अपनी राजनीतिक और चुनावी संभावनाओं को भी कमजोर करेगी। लेकिन बात भाजपा की संभावनाओं भर की नहीं है। बात तो है सार्वजनिक जीवन में किस तरह की कितने आरोपों के बाद लोगों के खुद पीछे हट जाने की। यह जरूरी नहीं है कि सरकारी पैसों में गोलमाल ही सबकुछ हो। इस देश के टैक्स के कानून, कंपनियों के कानून और बैंकों के कानून का भी महत्व उतना ही है जितना कि सरकारी संपत्ति का है। आज जिस तरह झोपड़पट्टियों में गडकरी से जुड़ी हुई कंपनियों के दफ्तर होने के मामले फर्जी साबित हो रहे हैं, वह भाजपा के लिए बड़ी शर्मिंदगी की बात साबित हो चुकी है। इस मामले को और आगे बढऩे नहीं देना चाहिए क्योंकि गडकरी के इस्तीफे में अगर अधिक देर होगी तो उस इस्तीफे का कोई नैतिक वजन भी नहीं बच जाएगा। भाजपा को आज आत्ममंथन करना चाहिए, वरना कल बहुत देर हो चुकी होगी। 


कारोबार के माहौल के हिसाब से हिंदुस्तान बहुत घटिया जगह...

23 अक्टूबर
संपादकीय

एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक भारत को कारोबार की सहूलियत के पैमाने पर दुनिया में 132वां देश माना गया है। भारत से बेहतर हालत बांग्लादेश की मानी गई है। यह सर्वे इन पैमानों पर किया गया है-व्यापार शुरू करने की आसानी, निर्माण की इजाजत पाने में आसानी, बिजली कनेक्शन पाने की आसानी, संपत्ति को रजिस्टर करवाने की आसानी, कर्ज पानी की आसानी, पूंजी निवेशकों की सुरक्षा, टैक्स देने में सहूलियत, कारोबारी अनुबंधों को लागू करवाने में आसानी वगैरह।
आज जब देश में कारखानेदारों और कारोबारियों का सत्ता के साथ मिलकर जनता को लूटने के आरोप लगते हैं, तो ऐसे लोग गिनती में कम रहते हैं। अधिक कारोबारी ऐसे रहते हैं जो अपनी पसंद से या मजबूरी में नियम-कायदों के हिसाब से चलना चाहते हैं, लेकिन देश-प्रदेशों में सत्ता उन्हें उस तरह चलने नहीं देती। देश के कानूनों को मिल-जुलकर चूना लगाने की भी एक संस्कृति इस देश में बन गई है, और सरकार से जिन लोगों का वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि अगर काम पूरी ईमानदारी से किया गया, तो एक तो बाजार में बेईमान-कारोबारियों के साथ एक गैरबराबरी का मुकाबला करना होगा, और ईमानदार कारोबारी को सरकार में बैठे लोग भी पसंद नहीं करते कि अगर कारोबारी गलत काम से नहीं कमाएगा, तो सत्ता को रिश्वत क्यों देगा? नतीजा यह होता है कि हर किस्म की चोरी, बेईमानी और भ्रष्टाचार की कमाई में ही हिस्सा-बांटा अधिक हो पाता है। यह तो एक नौबत है। लेकिन दूसरी नौबत यह भी है कि जहां पर किसी ऊपरी कमाई की गुंजाइश न हो, वहां भी भारत में काम करने का मिजाज कुर्सी पर बैठे लोगों का नहीं है। किसी काम को अधिक से अधिक समय तक कैसे रोका जाए कि लोग थक-हारकर खुद ही रिश्वत लेकर पहुंचें, यही सिलसिला अधिक दिखता है। 
यह देश मौसम के हिसाब से कारखानों और कारोबार के लिए माकूल है। यहां जमीन बहुत है, पानी बहुत है, खदानें हैं, मजदूरी सस्ती है, बहुत से बंदरगाह हैं, और इस तरह की बहुत सी दूसरी खूबियां हैं जिनकी वजह से यह सचमुच ही सोने की चिडिय़ा बन सकता था। लेकिन आज अगर दुनिया में 185 देशों में भारत की जगह 132वें नंबर पर आती है, तो इससे पता लगता है कि यहां की संभावनाओं को किस हद तक खत्म किया जा रहा है। आज हिंदुस्तान इन खबरों में डूबा हुआ है कि देश में जमीनी और आसमानी दौलत को सत्ता ने किस तरह कारोबार-माफिया के साथ मिलकर लूट लिया है। लेकिन लूट की यह रकम जितनी है, उससे सौ गुना या हजार गुना अधिक की संभावना खत्म कर देने के आंकड़े किसी सीएजी की रिपोर्ट में नहीं आ सकते। ऐसे में आज अगर लोग बेरोजगार हैं, या लोगों को जिंदा रहने के लिए एक ग्रामीण रोजगार गारंटी देनी पड़ रही है कि साल में एक परिवार को सौ दिन का काम मिलेगा ही मिलेगा, तो यह देश रहम की ऐसी योजनाओं के लायक नहीं है, यह देश बहुत बेहतर संभावनाओं के लायक है जिनको सरकार से लेकर समाज तक ने अपनी खराब नीयत के चलते खराब नियति तक पहुंचा दिया है। इस सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि बहुत से दूसरे देश पिछले साल के इसी सर्वे के मुकाबले इस बार अपनी पिछली जगह से बहुत ऊपर उठ चुके हैं, लेकिन भारत ठीक उसी जगह पर बना हुआ है। भारत के मुकाबले न सिर्फ बांग्लादेश को बेहतर आंका गया है, बल्कि श्रीलंका तो भारत बहुत ही बेहतर माना गया है, वह इस लिस्ट में 81वें जगह पर है। 
इस देश को न सिर्फ अपनी बेईमानी से उबरने की जरूरत है बल्कि इसे बेईमानी की संभावनाएं न रखने वाले सरकारी कामकाज को भी सुधारने की जरूरत है।
एक दूसरा सर्वे जो आज ही सामने आया है उसके मुताबिक एशिया तेजी से पेशेवर और हुनरमंद लोगों की पसंद बनता जा रहा है, लेकिन भारत एक अपवाद बन रहा है। दूसरे देशों में जाकर काम करने की इच्छा रखने वाले भारत से जी चुराने लगे हैं। जीवनशैली के लिहाज से भारत को सबसे नीचे रखा गया है। विदेशी भारत आकर काम काज करने को बहुत तरजीह नहीं दे रहे हैं। इस लिहाज से भारत वियतनाम, कुवैत और सऊदी अरब से भी पीछे है। आर्थिक मोर्चे पर भी भारत से विदेशियों की उम्मीदें टूट रही हैं। इन दोनों सर्वे के नतीजों को मिलाकर देखें, तो लगता है कि यहां न कामकाज की हालत अच्छी है, और न आराम की हालत अच्छी है। इन दोनों सर्वे के नतीजों को और अधिक यहां पर लिख पाना मुमकिन नहीं है, लेकिन इनके बाद किसी को यह हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यहां के आम लोग पहला मौका मिलते ही दुनिया के बेहतर देशों में अपनी संभावनाएं तलाशने लगते हैं।

बिखराव कम खतरनाक, ठहराव अधिक


22 अक्टूबर 2012
अन्ना हजारे के आंदोलन से अरविंद केजरीवाल अलग हो गए, अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से उनके कुछ दूसरे साथी अलग हो गए, या अन्ना हजारे और बाबा रामदेव कभी-कभी अलग होते भी दिखे, तो लोगों को यह लगने लगता है कि यह सामाजिक आंदोलन खत्म हो रहा है, या नाकामयाब हो रहा है। कुछ लोगों ने अब यह नया सवाल उठाया है कि अपनी नई कोर कमेटी बनाने के बाद क्या अन्ना हजारे एक बार फिर अपने आंदोलन में जान फूंक सकेंगे, या फिर केजरीवाल के जाने की भरपाई नहीं हो पाएगी? 
दरअसल लोगों की सोच पक्की इमारतों जैसी हो गई है। लोग सीमेंट और कांक्रीट के मजबूत मकान बनाकर उनके भीतर चैन से सो सकते हैं, और उन्हें आवारगी के साथ बंजारों की तरह जगह-जगह जी लेने वाले लोगों को देखने में भी बेचैनी होती है। ऐसे में लोग एक सामाजिक आंदोलन के लिए कांगे्रस की तरह की सवा सौ साल पुरानी इमारत की तरह मजबूत देखना चाहते हैं। स्थायित्व और निरंतरता लोगों को सुहाती है, और लोग किसी भी बात की अच्छाई या मजबूती को इन दो पैमानों पर खरा उतरता देखकर उसे वजनदार मान लेते हैं। हकीकत ऐसी नहीं होती है।  सामाजिक आंदोलन अगर बिना फेरबदल बहुत लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो वे आंदोलन की शक्ल खो बैठते हैं। उनकी आत्मा भी एक मजबूत इमारत के लोहे या कांक्रीट के ढांचे की तरह हो जाती है, जो दिखने में मजबूत जरूर दिखती है, लेकिन जिसमें वक्त के साथ बदलने के लिए जरूरी लचीलापन नहीं होता। 
यह लंबे समय का तजुर्बा है कि लोग सामाजिक आंदोलन को भी, सामाजिक संगठनों को भी, या तो खानदानी विरासत की तरह चलाने लगते हैं, और अपने बुढ़ापे के पहले अपनी अगली पीढ़ी को पगड़ी रस्म के लिए तैयार कर लेते हैं। जिस तरह अधिकतर वकील वकालत छोडऩे, या गुजर जाने के पहले अपनी कानूनी किताबों की लायबे्ररी और पै्रक्टिस अगली पीढ़ी को देने की हसरत रखते हैं, उसी तरह से लोग सामाजिक आंदोलन की वसीयत भी अपने, जहां तक मुमकिन हो खानदानी, और ऐसा न हो तो समर्थक, वारिसों के नाम करके जाना चाहते हैं। और यह सोच खतरनाक होती है। सामाजिक आंदोलनों में एक बागी तेवर जरूरी होता है, बहुत सी परंपराओं के खिलाफ सुधार के लिए भी, परंपराओं के लिए हिकारत जरूरी होती है। इसलिए अगर अन्ना हजारे के साथ केजरीवाल कुछ बरस रहे, केजरीवाल के साथ कुछ बरस कोई और कार्यकर्ता रहे, और अब वे अपनी-अपनी राह तय करके, अपने-अपने तौर-तरीके तय करके अलग-अलग सफर करने लगें, तो यह नौबत नाकामयाबी न होकर सामाजिक आंदोलनों के लिए एक बेहतर बात होती है। 
जिस तरह किसी तंग गड्ढे में जमा पानी खराब होने लगता है, उसी तरह बिना फेरबदल का एक संगठन बिगडऩे लगता है। लोगों के आने-जाने से उसका उसी तरह फायदा होता है जिस तरह किसी नस्ल में नए खून के आने से होता है। सबने दुनिया की वे जातियां देखी हुई हैं जो कि एक जाति-कबीले के अंदाज में आपस में ही जिंदगी गुजारती हैं। धीरे-धीरे इस रक्त-शुद्धता के आग्रह से वह नस्ल कमजोर होने लगती है। यही हाल वैचारिक आंदोलनों का होता है, यही हाल राजनीतिक आंदोलनों से लेकर कारोबार और कारखानों तक का होता है। 
कुछ समय पहले डिस्कवरी जैसे किसी एक टीवी चैनल पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म आई थी कि कैसे एक मशहूर ऐतिहासिक सैलानी और जगहों की खोज करने वाले एक आदमी ने चीन में या चीन के करीब के बिल्कुल ही अलग-थलग बसे हुए आदिवासी लोगों की एक बस्ती देखी थी। इस जगह बसे हुए लोग वहां तक पहुंचने वाले सैलानियों की खूब खातिर करते थे, क्योंकि भूले-भटके ही लोग वहां तक आते थे। और ऐसे में इस बहुत छोटे से समुदाय के लोग इन सैलानियों के लिए अपनी औरतों को भी पेश करते थे। बिना आधुनिक चिकित्सा के ज्ञान के भी इस समुदाय की यह बड़ी साफ समझ थी कि किस तरह बाहरी खून आकर किसी समुदाय की अगली पीढिय़ों को एक बेहतर नस्ल बनाता है। 
मोटे तौर पर यह कुछ उसी तरह की बात है जैसी कि हिंदुस्तान में एक सबसे ऊंची समझी जाने वाली जाति, और एक सबसे नीची समझी जाने वाली जाति के लोगों के बारे में कहा जाता है कि 'ऊंचीÓ जाति के लोग अगर काले हों, और 'नीचीÓ जाति के लोग अगर गोरे हों, तो वे अधिक खतरनाक होते हैं। मेरा मानना है कि यह समझ भी कुछ उसी तरह की है कि 'ऊंचीÓ जाति और 'नीचीÓ जाति की मिली-जुली औलादें उनमें से किसी भी एक जाति के बच्चों के मुकाबले शायद अधिक तेज होती हों। ऐसी ही समझ के चलते हो सकता है कि उस पहाड़ी इलाके में अकेले बसे एक छोटे से समाज के लोग बाहरी लोगों से उनके जींस पाने में अपना फायदा देखते हों।
ऐसा ही मानना मेरा सामाजिक आंदोलनों के लिए होता है, और ऐसा ही राजनीति के लिए, कारोबार के लिए, संसद के लिए, और अखबार के लिए भी होता है। 
अमरीका को देखें तो वहां के राष्ट्रपति चार-चार बरस दो बार उस कुर्सी पर रहे सकते हैं, और उसके बाद सरकार में उनका काम खत्म हो जाता है। हिंदुस्तान में कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बीस-तीस बरस भी रह सकते हैं, और उनकी सोच चुक जाने के बाद भी वे वहीं कुंडली मारकर बैठे रह सकते हैं। इसी तरह हिंदुस्तान आज रक्त की शुद्धता को लेकर हर चौबीस घंटे में दो-चार हत्याएं करता है, और दूसरी तरफ अमरीका को जातियों और नस्लों का, रंगों और संस्कृतियों का मेल्टिंग पॉट कहा जाता है, जिसके भीतर धातुओं की तरह सब पिघलकर, मिलकर, किसी भी एक धातु से अधिक मजबूत एक मेल बना देते हैं। वहां कोई नस्ल के खालिस होने की जिद पर नहीं अड़े रहते, और यह भी शायद एक वजह है कि वहां के लोग अधिक ताकतवर और कामयाब होते हैं। 
एक दूसरी मिसाल देखें, मेनका गांधी लगातार इस बात की वकालत करती हैं कि किसी खास नस्ल के खालिस कुत्तों को पालने के बजाय, लोगों को सड़कों पर पैदा होने वाले पिल्लों को पालना चाहिए, क्योंकि वे बीमार कम पड़ते हैं, उनकी प्रतिरोधक शक्ति ज्यादा होती है। दूसरी तरफ बहुत सी पीढिय़ों से शुद्ध नस्ल के चले आ रहे जानवर कमजोर रहते हैं, अधिक बीमार पड़ते हैं, अधिक इलाज मांगते हैं। 
एक और मिसाल देखें, तो दुनिया से गायब हो चले कुछ जंगली जानवरों की नस्ल बचाने के लिए कुछ लोगों की यह सोच है कि चिडिय़ाघरों में ऐसे पशुओं की अगली पीढ़ी अगर बढ़ाई जा सके, तो उससे उनके खत्म होने का खतरा कम हो सकता है। कुछ अधिक जानकार लोगों का इस बारे में यह मानना रहता है कि गिनती के उन जानवरों के बीच ही सीमित दायरे के भीतर-भीतर आपसी संबंधों का नतीजा यह होगा कि वे जेनेटिक कमजोरी के शिकार हो जाएंगे। इसलिए बेहतर यह होगा कि जंगलों में ही इन जानवरों की नस्ल आगे बढऩे का माहौल जुटाया जाए।
इसलिए मेरा यह मानना है कि सरकार के भीतर की कोई कुर्सी हो, या किसी सामाजिक आंदोलन के झंडे का डंडा हो, हाथ बदलते चलने चाहिए। मैं अखबार की अपनी लंबी जिंदगी में यह देखते आया हूं कि जब कभी नए लोग आते हैं, तो वे नई सोच भी लेकर आते हैं, नई रौशनी लाते हैं, नई कल्पनाएं लाते हैं। बहुत समय से बसे हुए पुराने लोग पांवों के तलुओं में कड़ी हो जाने वाली चमड़ी की तरह कड़क हो जाते हैं, उनका लचीलापन खत्म हो जाता है और उनकी कल्पनाएं भी चुक जाती हैं। इसलिए अन्ना से अरविंद अलग हों, या अरविंद से सिंह अलग हो जाएं, इसे नुकसान मानने का काम वैसे ही संगठन कर सकते हैं जो कि रक्तशुद्धता के हिमायती हों। कांगे्रस पार्टी से निकलकर एक तरफ ममता बैनर्जी, तो दूसरी तरफ शरद पवार जैसे लोग आगे बढ़े, और इतना आगे बढ़े कि कल तक के इन तिनकों से हाथ मिलाकर चलना कांगे्रस जैसे बूढ़े बरगद की बेबसी हो गई थी, है। सामाजिक आंदोलनों में बिखराव कम खतरनाक होता है, ठहराव अधिक खतरनाक। 
दुष्यंत कुमार ने लिखा था-मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

editor sunil on twitter


22 oct 2012
* when your intentions are questioned every now and then, then dont try to answer, it is just time to move on...
* was there a gun touching haryana chief secretary from behind? he was visibly shaken while serving half truths, quoting high court wrongly..
* why BJP not screaming over transfer of an honest IAS officer of Haryana? simple. IPS sanjiv bhatt of gujarat still alive, & moving courts
* indian politicians, pls respect festivities of godess Durga for 9 days, & dont blame victims of rapes, responsible 4 it. just for 9 days.

सामंती राजशाही के महंगे प्रतीकों को लोकतंत्र में खारिज किया जाए


22 अक्टूबर
संपादकीय
कई बार किसी एक घटना पर इस जगह का पूरा संपादकीय लिखना हो जाता है और कभी-कभी छोटी-छोटी बहुत सी ऐसी घटनाएं रहती हैं जिनका जाहिर तौर पर एक-दूसरे से कुछ लेना-देना नहीं दिखता, लेकिन उनके बीच एक रिश्ता ढूंढा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में आज बिलासपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने शपथ ली है, और इस समारोह की वजह से हाईकोर्ट के सारे जज यहां पर आए हुए हैं। उनके अलावा मुख्यमंत्री, राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष या बहुत से मंत्रियों की गाडिय़ां या पूरे काफिले सड़कों पर हैं। जगह-जगह चौराहों पर लोगों को रोककर इन गाडिय़ों को निकाला जा रहा है। एक दूसरी खबर कुछ दिनों पहले यह थी कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उस पद के साथ जुड़े हुए सामंती और आडंबर भरे संबोधनों को खारिज कर दिया, और उसके बाद उसी रूख को देखते हुए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने भी अपने संबोधन से महामहिम जैसे शब्दों को हटवा दिया। एक अलग खबर यह थी कि पंजाब में एक बड़े पुलिस अफसर को निलंबित कर दिया गया जिसने अपने बंगले पर ढाई दर्जन से अधिक सरकारी कर्मचारियों को घरेलू कामकाज के लिए रखा हुआ था। 
इन तमाम बातों में जो एक सी बात दिखती है, वह यह है कि भारत के लोकतंत्र में अब सत्ता की ताकत के इस्तेमाल को जनता पसंद नहीं कर रही है, और किसी भी तरह की सत्ता वाले लोगों को अब इसका अहसास हो जाना चाहिए। हमको उस वक्त बहुत तकलीफ से भरी हुई हैरानी होती है जब चुनाव लड़कर जिंदा रहने वाले नेता अपने ही मतदाताओं के बीच गाडिय़ों के काफिले में सायरन बजाते हुए चलते हैं और जिनके लिए सड़कों को खाली करवाया जाता है, चौराहों पर बाकी लोगों को रोका जाता है। इसी तरह हमें तब हैरानी होती है जब कोई जज, राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष या दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग सायरन बजाते हुए तेजी से चलने वाले काफिलों में चलते हैं, मानो उन्हें कहीं आग बुझाने पहुंचना हो। इनकी वजह से जिन लोगों को सड़कों पर रूकना पड़ता है, उनमें आम लोग रहते हैं जिनका वक्त लाल-पीली बत्ती वाले लोगों के मुकाबले अधिक कीमती होता है क्योंकि वे सरकारी तनख्वाह नहीं पाते और उनको अपनी रोजी-रोटी खुद कमानी होती है। 
जहां जनता के पैसों से बंगलों के अर्दली और दूसरे कर्मचारी मिलते हैं, वहां लोगों को सादगी से रहना चाहिए और सरकारी कर्मचारियों को सम्मान का काम करने देना चाहिए। आज इन बड़े ओहदों वाले लोगों के बंगलों पर चौकीदारी से लेकर खाना पकाने और खिलाने तक, बच्चों को नहलाने से कुत्तों को घुमाने तक का भुगतान जनता करती है। यह सिलसिला बहुत सामंती है, खराब है, और ईमानदारी के खिलाफ भी है। नए मुख्य न्यायाधीश कम से कम अपने मातहत लोगों के लिए एक मिसाल पेश कर सकते हैं क्योंकि अदालतों में आए दिन पुलिस की तरफ से यह अर्जी लगाई जाती है कि पुलिस कर्मचारियों की कमी से विचाराधीन कैदियों को पेशी पर नहीं लाया जा सकता, और उनके मामलों की तारीखें आगे बढ़ती हैं। ऐसी कौन सी वजह है कि बड़ी संख्या में पुलिस बंगलों पर घरेलू नौकरों की तरह इस्तेमाल हो, सड़कों पर इन काफिलों के लिए रात-दिन तैनात हो, और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए वह इन लोगों के साथ हथियार लिए चलती हो। जहां पर किसी की जान को कोई खतरा हो, वहां तो सारा सुरक्षा इंतजाम समझ आता है, लेकिन बाकी जगहों की बर्बादी खत्म करनी चाहिए। हमारा तो यह भी सोचना है कि राज्यपाल के साथ हर कार्यक्रम में एक बस में चलने वाले पुलिस बैंड का सिलसिला खत्म करना चाहिए, सलामी गारद खत्म करनी चाहिए, और जनता के काम में इन पुलिस कर्मचारियों को लगाना चाहिए। राजा के साथ गाने-बजाने वाले, और चारण-भाट की तरह के लोग जो चलते थे, वह राजशाही के दिनों में ठीक लगता था। अब इस देश को किफायत से इसलिए भी चलना चाहिए कि यहां की तीन चौथाई आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और उसके पैसों पर अपनी निजी शान-शौकत के लिए सरकारी अमले का मेला बहुत बड़ी बेइंसाफी है।
भारतीय जीवन में एक सादगी की जरूरत है, किफायत की जरूरत है और ऐसा न होने पर बड़े-बड़े दफ्तरों में गांधी की प्रतिमाओं और तस्वीरों का क्या काम है? इस प्रदेश के गरीब उस दिन से दो वक्त खाना खा पा रहे हैं जिस दिन से उन्हें बहुत रियायती चावल मिलना शुरू हुआ है। ऐसे भूखे प्रदेश में शासकीय और राजकीय शान-शौकत की कोई जगह नहीं है। और अगर ऐसा करना हो तो लोग अपने खुद के खर्च से करके देखें कि कितनी शान-शौकत निभ पाती है।

ममता बैनर्जी को जयराम की उन्हीं के शब्दों में राम-राम



21 अक्टूबर
संपादकीय
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भारत सरकार की तरफ से ग्रामीण सड़कों के लिए भेजी गई छह सौ करोड़ की किस्त की चि_ी में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर कटाक्ष करते हुए यह लिखा कि इससे यह भी जाहिर होता है कि 'दिल्ली की मुर्दा-दिमाग सरकारÓ पश्चिम बंगाल के लोगों की जरूरतों के लिए कितनी संवेदनशील है। ऐसा लिखने के बाद खुद जयराम रमेश को यह उम्मीद रही होगी कि ममता बैनर्जी को सरकारी चि_ी में यह लाईन मधुमक्खी की डंक की तरह लगेगी, और वही हुआ। ममता ने कल के कल यह चि_ी अपने फेसबुक पेज पर डाल दी और इसे देश के संघीय ढांचे, केंद्र-राज्य संबंध, शिष्टाचार, सभी के खिलाफ करार दिया। 
अब इस चि_ी के पीछे के मामले को भी समझने की जरूरत है। कुछ समय पहले  ममता बैनर्जी ने एक सार्वजनिक बयान में केंद्र सरकार के बारे में कहा था-'दिमाग से कर चुका एक मरीज, वेंटिलेटर पर रखा जा सकता है। हर कोई जानता है कि मरीज मर चुका है लेकिन कोई भी वेंटिलेटर को बंद करने का काम करना नहीं चाहता, जबकि यह सबको मालूम रहता है कि किसी वक्त तो यह करना ही होगा।Ó ममता बैनर्जी के इस बयान को लेकर जयराम रमेश ने अपनी चि_ी में जो चुटकी ली है, वैसे हंसी-मजाक के रिश्ते अब यूपीए सरकार और उसकी कल तक की भागीदार ममता बैनर्जी के बीच रह नहीं गए हैं। लेकिन केंद्र की यह चि_ी किसी दूसरे राज्य को रहती, तो यह बात आई-गई हो गई रहती, और या फिर हम इसे बहुत ही गलत भी मानते। लेकिन जहां तक ममता बैनर्जी का सवाल है, उन्होंने यूपीए का हिस्सा रहते हुए भी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी से प्रधानमंत्री और बाकी केंद्र सरकार के साथ बहुत किस्म का बहुत बुरा बर्ताव किया हुआ है। लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री कोलकाता गए तो भी कुछ ऐसे मौके आए कि ममता बैनर्जी ने राज्य सरकार की तरफ से चले आ रहे शिष्टाचार की परंपरा को भी नहीं निभाया था।  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बोस इंस्टीट्यूट व कलकत्ता विश्वविद्यालय के विज्ञान कांग्रेस के शताब्दी समारोह का उद्घाटन करने के लिए पहुंचे, ममता बैनर्जी एयरपोर्ट स्वागत के लिए नहीं पहुंचीं, अपने मंत्रियों को भेजा। इसके अलावा कम से कम इतना तो याद पड़ता है कि असम के एक रेल एक्सीडेंट में जब प्रधानमंत्री ने ममता की पार्टी के रेल राज्य मंत्री को वहां जाने के लिए कहा, तो वे प्रधानमंत्री की बात अनसुनी करके ममता बैनर्जी के साथ बंगाल में घूमते रहे। इसके अलावा भी खुद ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी का यह रेल मंत्री जिस तरह इस देश की जरूरतों के लिए भारी हिकारत दिखाते हुए कोलकाता में बैठकर रेल मंत्रालय चलाते रहे, वह अपने-आपमें इस देश के संघीय ढांचे के खिलाफ भी था, राजनीतिक-सार्वजनिक शिष्टाचार के भी खिलाफ था, और घोर तानाशाही भरा हुआ भी था। 
हम इन बातों को जयराम रमेश की लिखी बात की वकालत में पेश नहीं कर रहे, लेकिन जब राजनीतिक शिष्टाचार की बात आती है तो इस देश में जिन लोगों को किसी शिकायत का सबसे कम हक बचता है, उनमें ममता का नाम सबसे ऊपर रहेगा। सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं, एक केंद्रीय मंत्री के रूप में, एक मुख्यमंत्री के रूप में, और तृणमूल कांगे्रस की अध्यक्ष के रूप में उन्होंने किसी भी किस्म के शिष्टाचार के खिलाफ लगातार एक नफरत जाहिर की है। यह तो यूपीए की बेबसी थी कि सरकार को जारी रखने के लिए उसे ममता बैनर्जी की सारी बदसलूकी को बर्दाश्त करना पड़ा, लेकिन अब जब कांगे्रस को चुटकी लेने का एक मौका मिला है तो जयराम रमेश की शायद सोच-समझकर ममता को और भड़का रहे हैं। सरकारी चि_ी में ऐसा लिखा जाए, या न लिखा जाए इसके लिए कोई कानून नहीं है, यह सामान्य शिष्टाचार की बात है और इस मामले में छूट लेकर जयराम रमेश ने यह किया है, और यह ममता को उन्हीं के कहे हुए शब्द वापिस परोस देने का काम है।
हम केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों में राज्यों के अधिक अधिकार के हिमायती हैं। लेकिन केंद्र और राज्य के बीच गैर जरूरी टकराव भी किसी काम का नहीं होता। छत्तीसगढ़ इस बात की एक मिसाल है कि किस तरह बिना टकराव के राज्य का अधिक भला किया जा सकता है। सैद्धांतिक रूप से तो यह सही है कि केंद्र सरकार को राज्यों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए, लेकिन असल कामकाज में रात-दिन ऐसी नौबत आती है कि केंद्र सरकार नरमी बरतकर राज्यों की कमियों को अनदेखा करके आगे की रकम जारी कर सकती है, या फिर वह कमियों को गिनाते हुए रकम में देर भी कर सकती है। भेदभाव के ऐसे बहुत से दूसरे तरीके रहते हैं, जिनका इस्तेमाल भी होता है, लेकिन राज्यों को इससे बचना चाहिए। ममता बैनर्जी की ताजा नाराजगी कोई गंभीर मामला नहीं है, लेकिन उन्हीं के शब्दों में जयराम रमेश ने उनको जो जवाब दिया है, वह बस मजा लेने के लायक है, चाहे वह सरकारी शिष्टाचार के थोड़ा सा खिलाफ ही क्यों न हो।


कन्या भ्रूण हत्यारे, धनपशुओं के देश में गले में बेटी टांगे एक दलित रिक्शेवाला..


20 अक्टूबर
संपादकीय
राजस्थान के भरतपुर से बीबीसी ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें बबलू नाम का एक रिक्शेवाला अपनी सवा महीने की बच्ची को गले से टांगे हुए रिक्शा चला रहा है। इस बच्ची की मां पैदा होते ही गुजर गई, और इसे जिंदा रखने और बड़ा करने का जिम्मा अब अकेले पिता पर ही आ गया है। कल जब पहले पन्ने पर हमने तस्वीर सहित यह रिपोर्ट छापी तो उसे देखकर खुद हमारा ही दिल दहल रहा था। जिस उम्र की बच्ची को लोग गोद से नहीं उतारते, वह धूल, धुएं और धूप के बीच इस तरह से पिता के साथ सड़कें नाप रही है। 
कल जब देश भ्रष्टाचार की खबरों और आरोपों से लबालब था, और जब बड़ी सनसनीखेज सुर्खियों की भीड़ थी, तब इस खबर को सबसे बड़ी खबर की तरह छापने से कुछ लोगों को अटपटा भी लगा। लेकिन इस खबर के बहुत से पहलू हैं, जिनकी वजह से इसे इस तरह छापना हमें जरूरी लगा। एक तो यह कि राजस्थान बच्चियों को पैदा होते ही मार डालने के अनगिनत जुर्म का ठिकाना माना जाता है, जहां पर किसी बच्ची का पैदा होना बहुत से परिवारों के लिए गमी की वजह होती है और जहां एक समय सतीप्रथा के नाम पर महिला को उसके मृत पति के साथ जिंदा जला दिया जाता था, वहां पर आज एक दलित, गरीब रिक्शेवाला अकेले ही अपनी बच्ची की पहाड़ सी जिंदगी उसे अपने साथ-साथ पैडल मारते हुए पार कराने के हौसले वाला दिख रहा है। आज जब भारतीय समाज में ऊंची कही जाने वाली जातियों की, अच्छे-बुरे कैसे भी पैसे वालों की भीड़ बच्चियों को पैदा होने के पहले मार रही है, बच्चियां पैदा करने की वजह से बहू को जिंदा जला रही हैं, तब मुसीबत से गुजर रहा यह गरीब रिक्शेवाला हिला देने वाली एक मिसाल बनकर सामने आया है। इसकी ताकत कम है, जेब शायद है ही नहीं, इसके पास किसी उम्मीद की कोई बहुत बड़ी वजह भी नहीं है, लेकिन हौसला आसमान छूता हुआ। 
आज जब देश के बड़े-बड़े लोग अपनी आने वाली सौ-सौ और हजार-हजार पीढिय़ों तक के लिए, लोगों के हक लूट-लूटकर जमा कर रहे हैं, तब सवाल यह उठता है कि ऐसी गरीबी और ऐसी परेशानी से गुजर रहे इस पिता के लिए इस लोकतंत्र के पास क्या है? समाज के जो ठेकेदार अपने आपको जातियों और धर्मों के रीति-रिवाजों के चलते लड़कियों को मारने का हकदार मान लेते हैं, उनकी सारी कातिल सोच को चुनौती देने वाले इस गरीब, सड़कछाप, रिक्शेवाले के लिए इस समाज के पास क्या है? सच तो यह है कि इस रिक्शेवाले के काम से लेकर, उसकी दलित जाति, उसकी गरीबी तक का हर पहलू सवर्ण, संपन्न और शिक्षित समाज के लिए अनगिनत गालियों और कहावत-मुहावरों का सामान है। इसके बावजूद अपनी इन्हीं तंग सीमाओं के भीतर यह आदमी कितना कुछ सोचने को बेबस करता है! 
दिल्ली और देश की बाकी प्रादेशिक राजधानियों से उठती हुई खबरों के साथ इतनी बेबस गरीबी को अगर मिलाकर देखें तो लोकतंत्र से लेकर ईश्वर तक, और इंसानों तक से भरोसा उठने से कम कुछ नहीं होता। ईश्वर को जो लोग मानते हैं, उनके ईश्वर की की हुई इस बेइंसाफी से लेकर, लोकतंत्र को हांकने वाले लोग जिस कदर ऐसे गरीबों का हक खा रहे हैं, उसे देखते हुए नास्तिक से लेकर नक्सली तक ठीक लगने लगते हैं। और यह भी हो सकता है कि यह एक खबर सामने आ गई इसलिए हम इससे विचलित हो गए। असली हिन्दुस्तान में इस किस्म के बहुत से तकलीफजदा लोग होंगे जिनके लिए किसी के पास इंसाफ नहीं है। और शायद ऐसी ही नौबतें हैं जिनके चलते इस देश में बहुत से लोग (अनुपात में नहीं, गिनती में) ऐसे हो चले हैं जिनको लगता है कि अहिंसा के रास्ते से सबसे कमजोर हिन्दुस्तानी को कभी इंसाफ नहीं मिल सकता। जब हम लाखों करोड़ के घपलों के साथ देश-प्रदेशों पर राज करने वाले लोगों को देखते हैं, तो कुछ देर के लिए हमको भी यही लगता है कि ऐसा सोचने वालों की हताशा बेबुनियाद नहीं है। लेकिन अगर देश को लंबे समय तक हिंसा से दूर रखना है, तो गले में बेटी टांगे घूमते ऐसे गरीब और सत्ता और राजनीति के कारोबार, और कारोबार की सत्ता और राजनीति से खरबपति बने हुए धनपशुओं के बीच का फासला कम करना होगा। 

संदिग्ध अपराधियों से सरकार को दूर रहने की जरूरत...


19 अक्टूबर 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक रफ्तार से जिस रायगढ़ जिले में कारखाने लग रहे हैं, और खदानों का काम चल रहा है, वहां पर एक सामाजिक कार्यकर्ता पर छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े निजी उद्योग जिंदल से जुड़े हुए लोगों के हमले का मामला आज अदालत में पेश हुआ है और जिंदल के दो बड़े अफसरों ने आज आत्मसमर्पण किया है। इस चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ पहले भी जिंदल की तरफ से कानूनी कार्रवाई की गई थी और उसमें कई महीनों तक रमेश अग्रवाल को जमानत नहीं मिल सकी थी। इसके बाद रायगढ़ शहर के बीच बाजार में दिन-दहाड़े उनकी दूकान में घुसकर लोगों ने उनको गोलियां मारी थीं। अब जब अदालत में यह मामला पहुंचा है और जिंदल के बड़े अफसरों ने महीनों के बाद जाकर आत्मसमर्पण किया है तो तेजी से कारखानों और खदानों के मामले में बढ़ते हुए छत्तीसगढ़ की दशा और दिशा पर सोचने की जरूरत है। अभी हम अदालत में पहुंचे इस मामले पर कोई अटकल नहीं लगाते, क्योंकि भारत में जब कोई एक पक्ष बहुत बड़ा ताकतवर हो, तो वैसे मामले दशकों तक अदालत में घिसट सकते हैं, और उसके बाद भी उनमें इंसाफ हो सके ऐसा जरूरी नहीं होता। लेकिन इस मामले पर आखिरी फैसला आने के पहले ही छत्तीसगढ़ में ऐसी नौबत रोज बनी रहेगी, बनी हुई है, इसलिए इस पर चर्चा अभी जरूरी है। 
छत्तीसगढ़ के इतिहास में कारखानेदारों को लेकर जो सबसे भयानक बात दर्ज है वह मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के कत्ल की है। बाद में यह साबित हो गया कि कारखानेदारों ने मजदूरों को कुचलने के लिए, उनकी मांगों को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए इस राज्य के इतिहास के सबसे बड़े मजदूर नेता को ही खत्म कर दिया था। और तब से लेकर अब तक कारखानों और खदानों के धंधों में कमाई इतनी अधिक हो गई है कि अब किसी भी व्यक्ति को मिटा देना, हटा देना खरबपतियों को एक आसान रास्ता दिख सकता है। रायगढ़ के रमेश अग्रवाल के मामले में यह बात छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक की अदालतों और ट्रिब्युनलों में दर्ज है कि उन्होंने पर्यावरण के बहुत सारे अपराधों को उठाया और उनकी वजह से कारखानों और खदानों के लोगों को हजारों करोड़ का नुकसान भी शायद हुआ। ऐसे ही किसी मामले की वजह से अगर उन पर हमले का फैसला ऐसे ताकतवर लोगों ने लिया है, तो उसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। लेकिन इस राज्य के सामाजिक कार्यकर्ताओं को, मीडिया को, नेताओं और अफसरों को, हर किसी को यह समझना होगा कि कारखानों और खदानों की ऐसी दानवाकार ताकत के ऐसे हत्यारे इस्तेमाल के खिलाफ अगर तमाम तबकों ने मिलकर काम नहीं किया, तो इस राज्य में किसी को भी मिटा देना आसान रहेगा, किसी को भी बदनाम करके खत्म करना आसान रहेगा। आज किसी एक कारखानेदार के हाथों किसी एक की बारी आएगी, कल किसी दूसरे के हाथों किसी दूसरे की बारी आएगी। और जहां तक पिस्तौल से किसी को मारने की बात है, तो हिन्दुस्तान के अनगिनत अदालती मामलों में यह साबित हो चुका है कि पांच-दस लाख रूपए में ही भाड़े के हत्यारे मिल जाते हैं, और अड़ंगा बने हुए लोगों को कैसे मिटाया जाता है, यह शहीद शंकर गुहा नियोगी के मामले से साबित हो भी चुका है। 
हमारा मानना है कि कारखानों और खदानों की इस भयानक आर्थिक ताकत के खिलाफ किसी का खड़ा होना आसान बात नहीं होती। इतनी बड़ी कमाई के धंधे के लिए कारोबारी लोग सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं, दूसरी जगहों पर भी कहीं सूचना के अधिकार के आंदोलनकारियों को कत्ल करवाते रहे हैं, तो कहीं वे जजों से लेकर अफसरों और नेताओं तक, मीडिया से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक खरीद-फरोख्त करते आए हैं। ऐसे जज पिछले कुछ महीनों में ही गिरफ्तार होकर जेल में भी हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि कुदरत के खजाने को लूटने में जब लोग लगे हैं तो उनकी राह में जो छोटे-मोटे लोग अपनी असहमति लेकर, या अपने सवाल लेकर खड़े होते हैं उनको हटाना अगर इसी तरह जारी रहेगा तो इस धरती को बचाने वाली कोई भी नहीं बचेंगे। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे अपराधों में घिरी हुई कंपनियों को सरकार अपने अलग-अलग कार्यक्रमों में प्रायोजक बनाना भी बंद करे क्योंकि हत्या की कोशिश के मामलों में फंसी कंपनियां अगर सरकार के साथ, राज्यपाल के साथ मंच पर दिखती हैं, तो उसका असर तो जांच करने वाले छोटे-छोटे थानेदारों तक होता ही है। इसके अलावा जनता का भरोसा भी सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से उठ जाता है। इसलिए इंसाफ के हक में यह जरूरी है कि जब तक बदनाम कंपनियां अदालत से बरी होकर बाहर न निकल जाएं, तब तक उनको सार्वजनिक प्रतिष्ठा देना बंद किया जाए। 

खराब नीयत की मार अगर वापस लौटेगी, तो क्या होगा?


संपादकीय 
18 अक्टूबर
राहुल गांधी, उनका परिवार, उनकी सरकार आज चारों तरफ से तरह-तरह के आरोपों को झेल रहे हैं, लेकिन उनके खिलाफ अदालत में दायर किए गए एक फर्जी मामले को सुप्रीम कोर्ट ने आज खारिज किया है। इसमें राहुल गांधी के खिलाफ बलात्कार का एक आरोप समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने लगाया था, जो कि आज भूतपूर्व विधायक है और उस पर अदालत ने बीस लाख रूपए का जुर्माना भी लगाया है। राजनीति में इतने निचले स्तर पर गिरकर एक-दूसरे का विरोध करना एक खतरनाक सिलसिला है। किसी को भी बरसों तक अदालत के कटघरे में खड़ा किया जा सकता है और आज की तारीख में भारत में जिस तरह मीडिया में सुनवाई का सिलसिला चल निकला है, उसकी मदद से किसी को भी कुछ चुनावों तक परेशान किया जा सकता है और उसका नुकसान भी किया जा सकता है। चूंकि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट का है और उसने इतना कड़ा जुर्माना भी लगाया है, इसलिए हमें इस मामले में आगे कोई फेरबदल होने की गुंजाइश नहीं दिखती है और इस पर हम यहां लिख रहे हैं।
कांग्रेस के प्रवक्ता ने इस फैसले के बाद देश के मीडिया और राजनीतिक दलों से निजी मामलों को लेकर इस तरह के झूठे हमले न करने, और ऐसे हमलों में मददगार न होने की अपील की है। उनकी यह बात सही है, कई मौकों पर ऐसे हमले होते हैं जिनका कोई आधार नहीं होता लेकिन दूसरी तरफ भारत की राजनीति में अगर याद करें तो कांग्रेस से बड़ा कोई और उदाहरण नहीं मिलेगा। पुराने लोगों को याद होगा कि किस तरह आपातकाल के दौरान जगजीवन राम को जनता पार्टी में जाने से रोकने के लिए, या उनके चले जाने के बाद उनसे हिसाब चुकता करने के लिए संजय-मेनका गांधी की पत्रिका सूर्या ने जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम और उनकी एक महिला मित्र के घर के बाथरूम के तस्वीरों का पूरा एलबम ही पत्रिका के एक अंक में छापा था, और उस हरकत की कोई दूसरी मिसाल न तो भारत के मीडिया के इतिहास में हैं और न ही भारत की राजनीति के इतिहास में। 
खैर, उतनी पुरानी बात से उबरना भी चाहिए क्योंकि जगजीवन राम की बेटी को ही कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा का अध्यक्ष बनाया। लेकिन आज भी भारत के मीडिया में, मीडिया से परे के इंटरनेट पर लगातार इतने किस्म के झूठ चलते रहते हैं जिसकी कोई हद नहीं। इन्हीं में राहुल गांधी के खिलाफ बलात्कार के इस आरोप को कांग्रेस विरोधी, साम्प्रदायिक ताकतें, तथाकथित राष्ट्रवादी ताकतें रात-दिन फैलाती रहीं। आज भी ऐसी सैकड़ों वेबसाइटें हैं जो कि देश के बहुत से नेताओं के खिलाफ उनके मां-बाप कोई और होने किस्म की गंदी बातें फैलाती रहती हैं, और लोग उनको बिना सोचे-समझे और आगे बढ़ाते रहते हैं। इसलिए हम आज की अपनी बात को राहुल गांधी को राहत देने वाले इस फैसले से परे, लोगों के इस मिजाज पर ले जाना चाहते हैं। 
इंटरनेट और कम्प्यूटर के इस जमाने में यह बहुत आसान हो गया है कि लोग किसी भी अफवाह या आरोप को बिना सोचे-समझे, बिना ठोके-बजाय आगे बढ़ा दें। पल भर में किसी के खिलाफ ऐसी कोई बात हजारों लोगों तक भेजी भी जा सकती है और लाखों लोगों तक पहुंच वाली वेबसाइटों पर डाली भी जा सकती है। लेकिन जो लोग ऐसा करते हैं वे आज तो सार्वजनिक जीवन के किसी व्यक्ति के खिलाफ अपनी नफरत को आगे बढ़ाते हैं, क्या वे यह भी सोचना चाहेंगे कि कल के दिन उनके ही परिवार के किसी व्यक्ति के खिलाफ कम्प्यूटर पर छेड़छाड़ से बनाई गई किसी अश्लील तस्वीर के साथ कोई भी बात हजारों लोगों को भेजी जा सकती है? यह खतरा समझना जरूरी इसलिए है कि आज किसी एक को निशाने पर रखकर ऐसे हमले किए जा रहे हैं, तो कल इससे हौसला पाकर, एक रास्ता देखकर दूसरे लोग अपने पसंद के किसी दूसरे निशाने पर हमले कर सकते हैं। आज की टेक्नालॉजी ऐसी है कि ऐसी हरकत को कोई रोक नहीं सकता, और दुनिया की तमाम अदालतें मिलकर भी हर बदमाश को सजा दे नहीं सकतीं। इसलिए आज जिनकी नीयत खराब है, उनको यह याद रखना चाहिए कि कल उनके खिलाफ भी किसी और की नीयत खराब हो सकती है और हो सकता है कि उस दूसरे की नीयत कुछ अधिक ही गंदी हो।

दिग्विजय अपने उठाए शक तर्कसंगत अंत तक ले जाएं...


17 अक्टूबर 2012
संपादकीय
कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद को हर किस्म के हमलों से बचाना वैसे तो कांगे्रस पार्टी के हर व्यक्ति की धार्मिक जिम्मेदारी है, और इसे जरूरत से कुछ अधिक गंभीरता से निभाने की उम्मीद भी लोग दिग्विजय सिंह से करते हैं। क्योंकि वे कांगे्रस पार्टी, यूपीए गठबंधन, और यूपीए सरकार से परे एक ऐसा एजेंडा लेकर चलते हैं जो सोनिया और राहुल के निजी एजेंडा जैसा भी दिखता है और साम्प्रदायिक संगठनों के खिलाफ अर्जुन सिंह के बाद बेसहारा हो गया एजेंडा भी दिखता है। वे अपने-आपको  मखौल का सामान बन जाने देने की हद तक जाकर कुछ पर हमले करते हैं और कुछ का बचाव करते हैं। अगर याद करें तो यूपीए सरकार-गठबंधन और कांगे्रस पार्टी के भीतर जिनका दिल-दिमाग जनता के सामने आता है, उनमें से एक भी दिग्विजय सिंह के साथ नहीं दिखते, और वे सीधे सोनिया-राहुल की वकालत और हिमायत करते एक अलग किस्म के सिपहसालार हैं। 
अभी दिग्विजय सिंह ने रॉबर्ट वाड्रा को लेकर कल एक इंटरव्यू में काफी खुलासे से जो बात कही, उस पर आज चर्चा हम करना चाहते हैं। सोनिया के दामाद को हमले से बचाने के लिए उनका एक तर्क यह था कि अडवानी के बेटे-बेटी के बारे में, या वाजपेयी के दत्तक-दामाद को लेकर कांगे्रस पार्टी कभी कोई बयान नहीं दिया क्योंकि कांगे्रस परिवार के लोगों को अलग रखने की नीति रखती है। उनसे पूछा गया कि ऐसा भी तो हो सकता है कि इन लोगों के खिलाफ कांगे्रस के पास कुछ न हो, तो उनका कहना था कि कांगे्रस के पास ऐसा सब कुछ है, लेकिन कांगे्रस परिवार के लोगों के खिलाफ उसके इस्तेमाल पर भरोसा नहीं रखती। दिग्विजय सिंह की यह बात एक शरारत से भरी हुई है। जिस वक्त कांगे्रस के राजघराने का दामाद दर्जनों करोड़ की नाजायज दिखती कमाई के मामले में फंसा हुआ है, जब एक ईमानदार समझे जाने वाले अफसर ने रॉबर्ट वाड्रा के मामलों को पहली नजर में गलत तरीके से हुआ बताया है, तो इन मामलों की जांच से भी परहेज करती हुई कांगे्रस पार्टी और यूपीए सरकार, और इसकी जेबी राज्य सरकारें एक शर्मनाक तस्वीर पेश कर रही है, और ऐसे में कुछ और लोगों के परिवारों के ऐसे संदिग्ध तरीके से पेश करके दिग्विजय सिंह कोई अच्छी सोच सामने नहीं रख रहे हैं। 
लेकिन हम अब इस बयान के आगे की बात भी करना चाहते हैं। सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं, उन्हें सार्वजनिक जीवन के दूसरे लोगों के बारे में किसी गंभीर अपराध की, या गलत काम की खबर लगती है, तो इस देश और इसके लोकतंत्र की उनसे यह उम्मीद होती है कि उस पर रहम करना छोड़कर, उसे बचाना और छुपाना छोड़कर उनको अपनी सारी जानकारी देश के हित में जांच एजेंसियों को देनी चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि किसी अपराध की जानकारी रहते हुए अगर कानूनी समझ रखने वाले लोग इस जानकारी को लोकतंत्र की जिम्मेदार और संबंधित संस्थाओं तक नहीं पहुंचाते हैं, तो वे न सिर्फ एक गलत काम करते हैं, बल्कि ऐसे अपराध में हिस्सेदार भी हो जाते हैं। इसलिए जब दिग्विजय सिंह यह कहते हैं कि उनके या उनकी पार्टी के पास ऐसी जानकारियां थीं, तो सार्वजनिक राजनीति का तकाजा यह है कि वे हवा में शक घोलने के बजाय सुबूत सामने रखें, और लोगों के प्रति रहम दिखाने की दरियादिली साबित करने के बजाय, उनके गुनाह साबित करें, या फिर ऐसी बिना सुबूत की चर्चा न करें। दूसरी बात यह कि दिग्विजय सिंह को अपने पास की ऐसी सारी जानकारी जांच एजेंसियों को देनी चाहिए, क्योंकि देश को अगर अटल-अडवानी के परिवार ने भी कोई चूना लगाया है, तो उसकी जांच होनी चाहिए, इंसाफ होना चाहिए, वसूली होनी चाहिए। लेकिन आज जब कांगे्रस के दामाद पर इतने गंभीर मामले खड़े हो रहे हैं, तो ऐन उसी वक्त इस तरह की बेबुनियाद चर्चा छेडऩा कम से कम उस तरह की कोई दरियादिली तो नहीं है जैसी कि दिग्विजय सिंह साबित करना चाह रहे हैं।
कुछ लोग नई सरकार द्वारा पिछली सरकार के कामकाज के खिलाफ जांच, या गड़बडिय़ों पर कार्रवाई के भी खिलाफ रहते हैं। इसके लिए संपन्न तबके में विच-हंटिंग, चुड़ैल का शिकार, जैसा एक शब्द ईजाद कर लिया है। इसका कुल मिलाकर मतलब यह होता है कि अगर हर सरकार अपने से पहले की सरकार के जुर्मों को अनदेखा करके चले, तो वह विच-हंटिंग की तोहमत नहीं झेलेगी। लेकिन ऐसी रियायत सत्ता पर आए नए लोग अपने घर से पैसे लाकर नहीं देते। जिस जनता के जिस खजाने को वे खुद लूटते हैं, उसी जनता के उसी खजाने की पिछली लूट को वे माफ कर देने को राजनीतिक दरियादिली बताते हैं। लोकतंत्र में किसी को ऐसा हक नहीं मिल सकता कि वे जनता के खजाने की लूटपाट को अनदेखा भी करें। ऐसा करने का हक किसी को नहीं है, और ऐसी जानकारी पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने की जिम्मेदारी हर किसी पर है, दिग्विजय सिंह पर भी।
लालकृष्ण अडवानी के बेटे-बेटी के बारे में तो कभी कोई विवाद याद नहीं पड़ता, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक-दामाद रंजन भट्टाचार्य का कामकाज एनडीए के छह बरसों में खूब चर्चा में था, और उसे लेकर सिर्फ ऐसे लोग ही रियायत की दरियादिली कर सकते हैं जिनके अपने आसपास छुपाने का बहुत कुछ हो। दिग्विजय सिंह को खुलकर ये सारी बातें सामने रखनी चाहिए, लंबे समय से सार्वजनिक जीवन जीते रहने के कारण जनता के प्रति उनकी यह जवाबदेही भी बनती है। 
और चलते-चलते हम एक बात और याद दिला दें, रॉबर्ट वाड्रा किसी तरह से महज पारिवारिक सदस्य नहीं हैं। अभी उत्तरप्रदेश के पिछले ही चुनाव में उन्होंने खुलकर चुनाव प्रचार किया, अपने पूरे परिवार के साथ वे प्रचार के मंच पर रहे, मीडिया को इंटरव्यू दिए, उसमें राहुल के बाद प्रियंका, और प्रियंका के बाद खुद के राजनीति में सही समय पर दाखिल होने की घोषणा उन्होंने की, तो उन्हें किस तरह से कोई एक निजी कारोबारी बता सकता है? राजनीति और सार्वजनिक जीवन में ऐसा नहीं हो सकता कि अपनी सहूलियत से लोग कभी सार्वजनिक बन जाएं, राजनीतिक बन जाएं, और फिर कभी वे निजी जिंदगी का दावा करने लगें। और देश के कानून के मुताबिक आज जमीनों के जितने मामलों में रॉबर्ट वाड्रा का नाम फंसा है, वे सारे सौदे देश की एक कंपनी के साथ हुए हैं, जिस कंपनी को देश के कानून के तहत बहुत किस्म की जवाबदेही बनती है। और फिर जिस किस्म की सरकारी रियायतों के साथ रॉबर्ट वाड्रा के काम होने के आरोप हैं, उसमें भी वे एक निजी नागरिक की रियायत के हकदार नहीं रहते। कुल मिलाकर यह कि जो चर्चा दिग्विजय सिंह ने शुरू की है, उसे उन्हें ही एक तर्कसंगत अंत तक ले जाना होगा, वरना उनकी बातें अपना पूरा भरोसा खो बैठेंगी।

ईमानदार अफसरों को बचाने की मुनादी करने वाले प्रधानमंत्री कहां हैं?


संपादकीय 
16 अक्टूबर 2012
हरियाणा से जो ताजा खबर सामने आई है, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए इस हिसाब से शर्मनाक है। देशभर में राजनीतिक दखल और निजी पसंद-नापसंद से परे प्रशासन चलाने के हिसाब से जो केन्द्रीय सेवाएं बनाई गई हैं, उनके एक अफसर को रॉबर्ट वाड्रा की जमीनों के चलते हुए विवाद के बीच उस वक्त हटा दिया गया जब उसने इन सौदों को संदिग्ध मानते हुए और सरकार को चूना लगाने वाला मानते हुए रोक दिया। हरियाणा के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने, जैसी कि उनसे उम्मीद की जाती थी, कुछ घंटों के भीतर ही इस अफसर को वहां से हटा दिया। 
आज जब इस अफसर के कामकाज को हम देख रहे थे, तो बीटेक, पीएचडी, एमबीए, एमए, इतनी डिग्रियों को अव्वल दर्जे में पाने वाले इस अफसर को 1993 से लेकर अब तक की इक्कीस बरस की नौकरी में 43 तबादले झेलने पड़े। लेकिन यह ताजा तबादला राज्य सरकार को ही भारी पड़ेगा, केन्द्र सरकार को भारी पड़ेगा, कांग्रेस पार्टी को भारी पड़ेगा, और इस अफसर के फैसले से जिस डीएलएफ-वाड्रा सौदे को फायदा हुआ है, उसे भी भारी पड़ेगा। हमारा यह मानना है कि देश में आज राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जैसा माहौल बना हुआ है उसके चलते आजकल में ही कोई अदालत तक जाकर इस सौदे और तबादले का मामला उठा सकते हैं। और वैसी हालत में भ्रष्टाचार के आरोपों से वैसे भी लदी चल रही कांग्रेस पार्टी को यह सब भारी पड़ेगा। इस ताजा घटना को देखते हुए पिछले कुछ महीनों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बार-बार कही गई यह बात एक लतीफे की तरह साबित होती है कि ईमानदारी से काम करने वाले अफसर न डरें, सरकार उनके साथ खड़ी रहेगी। आज जब हरियाणा के इस अफसर, डॉ. अशोक खेमका के हाल को देखें, तो हैरानी होती है कि प्रधानमंत्री किस देश की बात कर रहे हैं। क्या वे भारत से परे किसी और देश में ऐसे अफसरों के बचाव की बात कर रहे थे? 
लेकिन आज का मुद्दा हम सिर्फ इस घटना तक सीमित रखना नहीं चाहते, क्योंकि अभी इसकी जांच होनी बाकी है, नतीजे सामने आना बाकी है। और यह अकेली ऐसी जगह नहीं है जहां अफसरों के साथ ऐसा सुलूक होता हो। हम यह बात उठाना चाहते हैं कि सरकारी अफसरों, या कर्मचारियों के साथ जो बर्ताव देशभर में केन्द्र या राज्य सरकारों में होता है, उसे किस तरह न्यायसंगत और तर्कसंगत बनाया जा सकता है और कैसे अच्छे काम करने के लिए सरकारी अमले का हौसला बढ़ाया जा सकता है।  बहुत से राज्यों में यह देखने में आया है कि किस तरह कई अफसर खुद भी अतिउत्साह में सत्तारूढ़ पार्टी के मेंबर की तरह काम करने में जुट जाते हैं। हालांकि आज देश के अधिकतर अफसरों को यह बात समझ आ गई है कि उनके कामकाज किसी भी दिन किसी अदालत के कटघरे में जवाब देते हुए खड़े रह सकते हैं। और एक बहुत जिम्मेदार और अनुभवी बड़े अफसर ने पिछले दिनों इस अखबार से बातचीत करते हुए अनौपचारिक चर्चा में यह कहा था कि भारत की सरकारों में अब किसी गलत काम को मैनेज करने के दिन लद चुके हैं। अब सूचना का अधिकार आने के बाद, अदालतों की सक्रियता के बाद और सामाजिक आंदोलनों के बढऩे के बाद अब गलत कामों को छुपाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में अगर हरियाणा के एक आईएएस अफसर ने देश के सबसे ताकतवर परिवार के दामाद के कारोबारी हितों के खिलाफ इतना बड़ा और कड़ा आदेश जारी किया, तो यह मानकर चलना चाहिए कि उसके पीछे ठोस सुबूत रहे होंगे। आज की तारीख में जब किसी कमजोर और गरीब के खिलाफ भी कोई बहुत बड़ा आदेश, गलत जारी करना आसान नहीं है, तो फिर सोनिया गांधी के दामाद के खिलाफ गलती या गलत काम करने का हौसला भला कौन कर सकता है? 
देश में नौकरशाही, सरकारी अमले को, और राजनीतिक-संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों को अब या तो पारदर्शिता का सम्मान करना होगा, या फिर अपने अपमान के लिए तैयार रहना होगा। हरियाणा का यह मामला तूल पकड़ेगा, यह तो तय है ही, कांग्रेस के कुछ लोग इस मामले में भी हो सकता है कि उसके मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा की तरह अनर्गल बातें करके पार्टी और सोनिया परिवार के लिए अधिक फजीहत खड़ी करें। सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट के घपले के मामले में बेनीप्रसाद वर्मा ने खुलकर यह कहा कि सलमान 71 लाख जैसी छोटी रकम के लिए क्या गड़बड़ करेंगे, रकम 71 करोड़ होती तो कोई बात हो भी सकती थी। रॉबर्ट वाड्रा के जमीनों के सौदे दसियों करोड़ के नफे वाले हैं, ये तो बेनीप्रसाद वर्मा के पैमाने और उनकी उम्मीदों पर भी खरे उतरते हैं। इस पर वे या कोई और मंत्री कुछ कहेंगे? 

बलात्कार सरकार और पुलिस से नहीं सोच से ही थम सकते हैं


15 अक्टूबर 2012
संपादकीय
बेंगलुरू की खबर है कि वहां राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालय के अहाते में एक लड़की से आठ लोगों ने बलात्कार किया। रोज ऐसी खबरें छापने के पहले हमारा दिल बैठने लगता है कि बहुत से मां-बाप ऐसी खबरों के बाद अपनी बच्चियों को पढऩे, खेलने, काम करने या किसी और जरूरत से बाहर भेजने से हिचकेंगे। इस फिक्र से परे भी सबसे बड़ी बात तो यही होती है कि एक लड़की पर ऐसा जुल्म हो रहा है, और पिछड़ी सोच की जातिवादी, पुरूषप्रधान व्यवस्था वाले हरियाणा से लेकर देश के सबसे आधुनिक माने जाने वाले बेंगलुरू तक यही चल रहा है। हमने पिछले दिनों में इस बारे में लगातार लिखा है और उसकी बहुत सी बातों को यहां दुहराए बिना ही हम कुछ नई बातों को लिखना चाह रहे हैं। 
दुनिया के किसी भी समाज में, देश-प्रदेश में पुलिस या सरकार बलात्कार को रोक नहीं सकतीं। महिलाओं के काम के मौके, पढ़ाई के मौके बढ़ते चले जाने से ऐसे खतरे की नौबत भी बढ़ती चली जा रही है। लेकिन साथ-साथ समाज में जागरूकता आने की रफ्तार शून्य सरीखी है। लोग अभी भी महिलाओं को जूतियों की तरह समझते हैं और उन्हें बलात्कार का सामान मानकर चलते हैं। नतीजा यह होता है कि एक महिला पर हुए ऐसे जुल्म के बाद उसकी बची पूरी जिंदगी पर इसका इतना गहरा जख्म होता है कि वह उससे उबर ही नहीं पाती। दूसरी तरफ समाज पर इसकी एक और लागत आती है, सरकार और पुलिस के मत्थे ऐसे मामलों की जांच का बहुत लंबा-चौड़ा बोझ आता है और उसके जिम्मे के दूसरे काम रूक जाते हैं। 
लेकिन कोई अगर किसी सरकार या पुलिस बलात्कार को कम करने की उम्मीद करे, तो वह एक खोखली और बेबुनियाद उम्मीद ही होगी। बलात्कार एक ऐसा जुर्म नहीं है जिसे कि लोगों के दिल-दिमाग में झांककर पुलिस रोक ले। जब तक समाज में लोगों की जरूरतें पूरी नहीं होंगी, लोगों को अपनी जिम्मेदारियों और दूसरों के अधिकारों का अहसास नहीं होगा, जब तक सामाजिक बराबरी की सोच विकसित नहीं होगी, जब तक महिलाओं का सम्मान नहीं होगा, तब तक हिंदुस्तान जैसे देश में देवी की प्रतिमाओं की ही पूजा होती रहेगी, जिंदा देवियों के साथ बलात्कार होते रहेगा, उन्हें दहेज के लिए जलाया जाता रहेगा। ऐसा देश एक तरफ तो वह रूख साबित करता है जिसे कि कोई हैवानियत कहे, दूसरी तरफ ऐसा देश अपनी महिलाओं के कामकाज की उत्पादकता भी नहीं पा सकता, क्योंकि बहुत सी महिलाओं का बाहर काम करने का साहस नहीं होता, बहुत सी महिलाओं को बेहतर और बराबरी की पढ़ाई नसीब नहीं होगी, और जिंदगी का उनका दायरा छोटा बने रहेगा। ऐसा कोई देश दुनिया में आगे नहीं बढ़ सकता जो कि अपनी महिलाओं को बराबरी का दर्जा न देता हो।
सोनिया गांधी की अगुवाई वाले इस देश में यह भी समझने की जरूरत है कि आज तक महिला आरक्षण क्यों नहीं आ पा रहा? भारतीय संस्कृति की बात करने वाले भाजपा के इस देश में यह समझने की जरूरत है कि उसके नेता जगह-जगह महिलाओं से बदसलूकी करके कैसे बचे रहते हैं, और उसकी पार्टी के राज में जगह-जगह महिलाओं से बलात्कार के आंकड़े कांगे्रसी राज्यों से टक्कर लेने वाले कैसे रहते हैं? ममता बैनर्जी के राज वाले पश्चिम बंगाल में यह समझने की जरूरत है कि वहां पर बलात्कार के किस तरह वे खुद अपने खिलाफ एक राजनीतिक साजिश करार देती हैं, और उसके बाद क्या किसी तरह की गंभीर जांच और कार्रवाई की संभावना बच जाती है? यह भी समझने की जरूरत है कि हरियाणा के बलात्कारों पर वहां जाकर सोनिया गांधी ठीक से दिल्ली लौट भी नहीं पाई थीं कि उनकी पार्टी के नेता वहां बलात्कारों के पीछे शिकार की सहमति के सार्वजनिक बयान कैमरों पर देने लगते हैं। यह पूरी की पूरी राजनीतिक सोच पुरूषप्रधान तो है ही, सामाजिक न्याय की भी कोई जगह इसमें नहीं है। दरअसल सभी तरह की सरकारें और राजनीतिक पार्टियां इस देश में इतने अधिक अपराधों और आरोपों से लद गई हैं, कि एक व्यापक सामाजिक सुधार किसी भी प्राथमिकता में नहीं रह गया है। समाज की सोच को बदलने के पहले लगभग हर पार्टी और सरकार को यह देखना पड़ रहा है कि उसके कितने लोग जेल के भीतर हैं और कितने बाहर। 
चाहे कोई सा भी प्रदेश हो, ऐसी हालत जारी रहने तक हम बलात्कार में किसी तरह की कमी की उम्मीद नहीं कर सकते। और यह देश ऐसे जुल्म के साथ एक बहुत ही असभ्य देश तो बने ही रहेगा, यह अपनी संभावनाओं तक कभी भी नहीं पहुंच पाएगा।

कांगे्रस एक विश्वसनीय विपक्ष जितनी भी बची नहीं दिखती


14 अक्टूबर 2012
संपादकीय
सवा लाख वोटों से जिस संसदीय सीट को प्रणब मुखर्जी ने जीता था, वहां उनके बेटे की लीड खींचतानकर ढाई हजार रह गई। सच कहा जाए तो यह बेटा चुनाव हार ही गया। दूसरी तरफ उत्तराखंड में ताजा-ताजा मुख्यमंत्री बनाए गए विजय बहुगुणा की खाली की गई संसदीय सीट पर उनका बेटा चुनाव हार गया। कांगे्रस के लिए कल का दिन एक बड़ी शिकस्त का दिन रहा, और अगर उसे अपने आने वाले दिन इससे और अधिक खराब नहीं करने हैं तो उसे एक गहरे आत्मचिंतन की जरूरत है। इन दोनों सीटों पर रॉबर्ट-कांड के बाद मतदान हुआ था, और उसका भी असर आखिरी दौर में नतीजों पर जरूरत हुआ होगा। लेकिन हम इन दो नतीजों को आने वाले आम चुनावों के लिए किसी तरह का एडवांस सुबूत नहीं मान रहे हैं, और आज की राजनीति पर हम एक व्यापक चर्चा का यह मौका देख रहे हैं। 
कुनबापरस्ती का ऐसा हाल पहले भी कांगे्रस को कई जगहों पर शर्मिंदगी दे चुका है। पाठकों को याद होगा कि छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर जब कमलनाथ को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते इस्तीफा देना पड़ा तो उन्होंने अपनी जगह अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनवा दिया था। और जीत गई पत्नी को उन्होंने तब हटवा दिया जब वे खुद अदालत से बरी हो गए, और दुबारा सांसद बनना चाहते थे। ऐसी अदला-बदली के खिलाफ मतदाताओं ने नाराजगी दिखाकर कमलनाथ को हरा दिया था। उत्तराखंड का हाल देखें तो विजय बहुगुणा को कांगे्रस के ही लोगों के भारी विरोध के बावजूद मुख्यमंत्री बनाया गया था। उसी वक्त उनकी बहन और उत्तरप्रदेश कांगे्रस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने पार्टी को विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक हार दिलाई थी।  अब गुजरात और हिमाचल में अगले महीने होने वाले विधानसभा आम चुनाव के मौके पर कांगे्रस के सिर पर एक हार, और एक लगभग हार के घड़े फूटे हैं। इस पर भी अगर कांगे्रस की नींद नहीं खुलती है, उसे समझ नहीं आती है, तो फिर उसे प्रदेशों और देश के चुनावों में अपनी संभावनाओं को तलाशने का क्या हक है? 
चुनाव के लिए जा रहे राज्यों से परे भी, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कांगे्रस की दुर्गति देखने लायक है। भाजपा की सरकार से लडऩे से अधिक ताकत इस पार्टी की इस राज्य में इसलिए लग रही है कि भीतर से पार्टी को गिराने में लगे लोगों को कैसे रोका जाए? छत्तीसगढ़ में कांगे्रस के भीतर का माहौल पूरी तरह बेकाबू और आत्मघाती है। पिछले दो विधानसभा चुनाव इस राज्य में कांगे्रस ऐसे ही आत्मघात के चलते हारी, और लोकसभा के दो चुनावों में भी उसका यही हाल रहा। कांगे्रस के भीतर का देश का माहौल बहुत ही अजीब है। यह देश के एक सबसे बड़े राजनीतिक दल का माहौल नहीं है, और न ही इस पार्टी का आज का चाल-चलन किसी संगठन जैसा रहा गया है। पूरी तरह एक कुनबे पर टिके हुए इस संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी भी आज यही कुनबा है, और यह बात बहुत विरोधाभासी भी लगेगी कि यही कुनबा इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत भी है। जिस तरह सूरजमुखी का सारा खेत सूरज की दिशा बदलने के साथ-साथ अपना चेहरा उस तरफ मोड़ते चलता है, उसी तरह देश की सबसे पुरानी यह पार्टी अपना चेहरा इसी कुनबे की तरफ रखकर वहां से किसी आकाशवाणी का इंतजार करती है। जब एक परिवार की पसंद या नापसंद को पूरी की पूरी पार्टी अपनी नियति मान लेती है, तो फिर उस पार्टी की शोहरत के कम या अधिक होने के साथ-साथ ही पार्टी की संभावनाएं कम या अधिक होती हैं। इन दो उपचुनावों में एक बात यही एक सी है कि दोनों में कुनबे के लोगों को ही टिकट दी गई, उम्मीदवार बनाया गया, और जैसी कि हमारी निजी सोच है, कुनबापरस्ती के खिलाफ एक फैसला इन चुनावों में दिखा है, और आगे भी दिखना चाहिए। 
लेकिन इससे परे भी इस पार्टी के नेता महिलाओं के मामलों को लेकर, भ्रष्टाचार के मुद्दों पर, सामाजिक आंदोलनों को लेकर जिस तरह से लोकतंत्र के खिलाफ एक गहरी हिकारत की नुमाइश करते चल रहे हैं, जितने हिंसक और अश्लील बयान दे रहे हैं, उनसे भी देश के लोगों की इज्जत को ठोकर लगी है। इस पार्टी के लोग जिस कदर बेईमानी और लूटपाट के मामलों में घिरे हैं, उससे भी देश का बर्दाश्त इसके लिए खत्म हुआ है। जितने किस्म के नाजुक मौकों पर समझदारी और संवेदनशीलता की बात की जरूरत होती है, उन तमाम मौकों पर कांगे्रस के नेता-प्रवक्ता-मंत्री, भारी घमंड के साथ बदसलूकी करते दिखते हैं। एक से बढ़कर एक गंदी और ओछी बातें करते हुए इस पार्टी के बड़े-बड़े नेता और मंत्री इस अंदाज में मुकाबला करते हैं कि कहीं वे अपने दर्जे के दूसरे नेताओं से पीछे न रह जाएं। जिस अंदाज में सोनिया गांधी के दामाद ने इस देश को एक बनाना रिपब्लिक (कमजोर और अस्थिर लोकतंत्र) कहा और यहां की आम जनता का मखौल उड़ाते हुए जिस तरह उसे मैंगो पीपुल कहा, वैसा तो कोई तानाशाह कुनबा ही अपने अहंकार में कह सकता था। और इस पर यह कुनबा, यह पार्टी अब तक पूरी तरह चुप है। यह नौबत कल आए इन दो चुनावी नतीजों से परे और कुछ भी नहीं ला सकती थी। पिछले एक-दो बरस में यह देश कांगे्रस की अगुवाई वाली सरकारों के जितने किस्म के जुर्म देख चुका है उसको देखते हुए इस पार्टी के तीन सबसे बड़े नेता, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी, शायद ही मुंह खोलते हों। सत्ता और सत्तारूढ़ गठबंधन के मुखिया प्रवक्ताओं के भरोसे देश के लोगों में भरोसा कायम नहीं रख सकते। लेकिन यह एक बड़ी अजीब नौबत है कि दुनिया के इस सबसे विशाल लोकतंत्र पर राज करते गठबंधन के तीन सबसे बड़े नेताओं तक देश की न कोई पहुंच है, और न खुद होकर वहां से कोई दिव्यवाणी नीचे आती। एक तरह से यह भयानक संवादहीनता की नौबत है जिसमें कांगे्रस के ही सबसे बड़े नेताओं के लिए यह एक बड़ी कामयाबी मानी जाती है कि वे अपनी अध्यक्ष से मिलकर बात कर सकें। यह नौबत धीरे-धीरे करके इस पार्टी को जनता से काट चुकी है, और जनता को इस पार्टी से काट चुकी है। 
इस पार्टी को किसी सलाह की जरूरत भी नहीं है, और हमको इस पार्टी के भविष्य की कोई फिक्र भी नहीं है। लेकिन हमको इस देश के लोकतंत्र की फिक्र जरूर है जिसके आने वाले दिनों में कांगे्रस की हालत एक विश्वसनीय विपक्ष जितनी भी बची हुई नहीं दिखती। जब कांगे्रस पर से देश का भरोसा पूरी तरह खत्म रहेगा, तो उस वक्त की सत्ता चलाते लोगों पर कांगे्रस के उठाए सवालों का क्या वजन रहेगा? लोकतंत्र के हित में यही होता है कि विपक्ष विश्वसनीय रहे। आज कर्नाटक के भ्रष्टाचार के चलते देश में भाजपा के कहे हुए का वजन भी नहीं रह गया है, लालू, मुलायम और माया के अपने-अपने भ्रष्टाचार के चलते यूपीए के बाहर के इन दलों का भी कोई वजन नहीं रह गया है। यही वजह है कि कांगे्रस पार्टी इस कदर बेकाबू हो गई है। कल के आसार जो आज दिखते हैं, वे देश में सत्तापलट दिखा रहे हैं, और वैसे दिन साख खोई कांगे्रस पार्टी देश में मजबूत विपक्ष के लायक भी नहीं रह जाएगी।

राजचिन्हों का सम्मान खत्म करते राजा, और हिकारत करती प्रजा


13 अक्टूबर 2012
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

कल छत्तीसगढ़ की एक सड़क पर एक कार दिखी जिसमें नंबर प्लेट के ऊपर लिखा हुआ था-सामान्य नागरिक। सड़कों पर इन दिनों हजारों ऐसी कारें दिखती हैं जिन पर भारी और हल्के, असली और नकली ओहदों वाले लोग अपने कुर्सी का आतंक लिखवाते हैं। नंबर नहीं लिखवाते, उसकी जगह आतंक लिखवाते हैं। और यही आतंक देश भर में सामने आया है। उत्तरप्रदेश में एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि उसने अपने मनचाहे तबादले करवाने के लिए एक अफसर का अपहरण करवा लिया था और यह बात एक बड़ी खबर बन गई। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खामियां चाहे हजार हों, उसकी कुछ खूबियों में एक यह भी है कि वह कुछ असल और सही मुद्दों पर भी जनमत को भड़का सकता है। और इन दिनों कुछ पार्टियां ऐसे जनमत के भड़कने के आतंक की फिक्र करते हुए कुछ कार्रवाई भी करने लगी हैं। 
लेकिन एक दिन का अखबार राजा और प्रजा के बीच फर्क का कितना मोटा दस्तावेज हो सकता है, इसे देखना हो तो आज ही देख लें। कल रात से टीवी पर वह वीडियो क्लिप आ रही है जिसमें गुजरात में गांधी के जन्म स्थान पर कांगे्रस सांसद टोल टैक्स नाके पर अपनी पहचान बताने के बजाय अपनी बंदूक लहराते हुए, कर्मचारियों पर तानते हुए उनको धमका रहा है। उसी के कुछ घंटों के भीतर उत्तरप्रदेश में अपहरण करने वाले सपा मंत्री का इस्तीफा होता है। तकरीबन उसी समय हरियाणा के एक कांगे्रस नेता का यह बयान पार्टी के लिए शर्मिंदगी खड़ी करते दिखता है कि बलात्कार की नब्बे फीसदी घटनाओं में लड़की या महिला की सहमति रहती है। इसी दौरान देश के कानून मंत्री और उनकी बीवी के एक ट्रस्ट में दसियों लाख के घपले की सीएजी रिपोर्ट सामने आती है जिसमें विकलांगों के उपकरणों के नाम पर फर्जी दस्तखत करके यह रकम खा ली गई है। इसी दौरान यह खबर आती है कि महाराष्ट्र सरकार को हाईकोर्ट के कुछ दिन पहले के एक आदेश को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लेना पड़ा कि राजचिन्हों के साथ खिलवाड़ करके कार्टून बनाने वाली असीम त्रिवेदी ने कोई राजद्रोह नहीं किया था। इसी दौरान छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की सरकार में यह चर्चा सुनाई देती है कि यहां की सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद ने व्यस्त बाजार की सड़क पर गई और नो-पार्किंग में खड़ी उनकी गाड़ी के चालान पर संसद की अवमानना का नोटिस भिजवाया है, उस पर आगे क्या किया जाए? इसी दौरान यह खबर आती है कि पश्चिम बंगाल में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार में छात्रा के पिता ने तृणमूल कांगे्रस के एक छात्र नेता पर आरोप लगाया है। इसी दौरान देश के सूचना आयोगों के एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री यह कह रहे हैं कि सूचना के अधिकार सीमित किए जाने चाहिए, और अधिकारियों को बचाने के प्रावधान किए जाने चाहिए। आज की सुबह ही पश्चिम बंगाल से यह खबर आना शुरू हुई कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की खाली की गई संसदीय सीट से पहले राऊंड में उनके बेटे पीछे चल रहे थे। कुछ घंटे पहले की एक दूसरी खबर थी कि हिमाचल में किस तरह भाजपा के भीतर भारी बेचैनी चल रही है कि पार्टी ने उस सांसद को विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाया है जिसे कि 2005 में सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए पकड़ाने पर संसद से निकाला गया था। 
और इसके बीच ये तस्वीरें तैर रही हैं कि किस तरह अरविंद केजरीवाल सलाखों के पीछे है।
देश में राजा और प्रजा के बीच का फासला एक दरिया सा चौड़ा हो चुका है। रात-दिन सत्ता की इस तरह की बददिमागी, उसके आतंक, उसके लूटपाट को देखते हुए लोगों के मन में बहुत तकलीफ है। एक तरफ लोग महंगाई की मार झेल रहे हैं, और दूसरी तरफ यह देख रहे हैं कि उनके हक का खजाना किस तरह से देश के गिने-चुने लोग मिलकर लूट रहे हैं। और लुटेरों का तबका किस तरह की कुनबापरस्ती दिखाते हुए अपनी चाकू-छुरी, और अपने नकाब अगली पीढ़ी को देकर जा रहे हैं। सुबह की पहली खबर जब प्रणब मुखर्जी के बेटे के पीछे रहने की आई, तो वह ठंडी हवा के एक झोंके की तरह थी, कि किस तरह रात-दिन लगते जख्मों पर एक मरहम लग सकता है। इस देश का राष्ट्रपति बनने के बाद अगर प्रणब मुखर्जी का बेटा बंगाल से कांगे्रस का विधायक ही बने रह जाता, तो इस कुनबे का महत्व क्या कम हो जाता? लेकिन मेरे बाद मेरा बच्चा, यह सिलसिला खत्म ही नहीं हो रहा है। यह शर्मनाक है कि पूरी जिंदगी राजनीति में गुजारने के बाद प्रणब मुखर्जी को अपनी पार्टी का ऐसा कोई नेता-कार्यकर्ता, अपना कोई अनुयायी ऐसा नहीं मिला जिसे कि वे अपनी जगह संसद का चुनाव लड़वाते? अब तो राष्ट्रपति रहने के बाद उनको दुबारा कोई चुनाव भी नहीं लडऩा है कि जिसके लिए वे अपनी ही औलाद को सीट पर बिठाकर कब्जा करके रखते, और बाद में जरूरत पडऩे पर वहीं से दुबारा चुनाव लड़ते। उनका बेटा विधायक तो था ही, और उसे सांसद बनाने के लिए विधानसभा की एक सीट को गैरजरूरी तरीके से खाली करवाकर गरीब देश पर बोझ भी लादा गया। राष्ट्रपति बन जाने के बाद भी सार्वजनिक जीवन में जनता से, राजनीति और सत्ता से और कुछ-कुछ हासिल कर लेने की हसरत, हसरत नहीं हवस ही कही जा सकती है।
संसद और सारी विधानसभाओं को मिलाकर देश में दस हजार से कम ही सीटें हैं। इनमें से संसद के दोनों सदनों में मिलाकर पौन हजार सीटें ही, और प्रदेशों की विधानसभाओं-विधान परिषदों में कुल मिलाकर चार हजार सीटें हैं। लेकिन इन पांच हजार से कम कुल सीटों पर सवा अरब की आबादी में से किस तरह गिने-चुने कुनबे, अपनी कई-कई पीढिय़ों तक हावी हैं, किस तरह किस्म-किस्म के अपराधी बार-बार इनमें मौका पाते हैं। किस तरह बार-बार मुकदमे झेल रहे लोग इनमें पहुंचते हैं। किस तरह इन सदनों में एक-एक करके करोड़पति, अरबपति, और खरबपति बढ़ते चले जा रहे हैं। और किस तरह इन सदनों के मार्फत देश और प्रदेशों में सरकार चलाने वाले लोग कारखानों और कारोबार के माफिया के साथ भागीदारी करके देश के सोने को चांदी के दाम पर लुटेरों को थमा रहे हैं। आज इस देश में इस राजनीतिक चेतना की जरूरत है कि चुनावों में खरबपतियों को, सत्तारूढ़ लोगों के कुनबों को किस तरह खारिज किया जाए। आज कांगे्रस पार्टी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के निजी कारोबारी दस्तावेजों को लेकर पैदा हो रहे शक का जवाब देने के लिए यूपीए सरकार के बड़े-बड़े मंत्री कतार लगाकर खड़े हैं। लेकिन इतिहास को थोड़ा सा और खंगालें तो पता लगता है कि जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अपने शुरू किए गए अखबार नेशनल हेराल्ड में अपने दामाद फिरोज गांधी को मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया था, और शायद ही किसी को आज यह याद रख गया है कि फिर जब 1964 में इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड को बनाया गया तो यही दामाद फिरोज गांधी उसके पहले चेयरमेन बनाए गए। उन्हें 1950-52 में पहले प्रांतीय पार्लियामेंट का सदस्य बनाया गया और फिर रायबरेली से कांगे्रस टिकट पर सांसद। अब सवाल यह उठता है कि इस देश के प्रधानमंत्री को अपने परिवार के लिए अपनी पार्टी से और अपनी सरकार से और कितना कुछ चाहिए? यह एक जानकारी नेहरू का सम्मान कुछ कम भी करती है क्योंकि उनसे लोग ऐसी तंगदिली-तंगनजरिए की उम्मीद नहीं करते थे।
ऐसे में एक असीम त्रिवेदी जब राजचिन्हों को तोड़-मरोड़कर कार्टून बनाता है तो उसे एक ऐसा राजद्रोह माना जाता है जो कि इस देश की सरकार के खिलाफ सिर्फ हथियारबंद बगावत करवाकर सत्ता को पलटने की साजिश और उकसावे पर लागू होता है। आज जब उत्तरप्रदेश में तिरंगा झंडा लगी कार वाला मंत्री एक अफसर को दहशत में लाकर मनचाहे तबादले करवाने के लिए उसको अगुवा करता है, तो राष्ट्रीय झंडे और राष्ट्रीय चिन्ह का अपमान एक कार्टूनिस्ट करता है या ऐसा मंत्री? आज देश में सत्ता के नंगे नाच का जो माहौल है उसके चलते यह साफ है कि राजचिन्हों का, राष्ट्रीय प्रतीकों का, राष्ट्रीय सम्मान का सबसे बड़ा अपमान सत्ता पर बैठे लोगों में से ही बहुत से लोग कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश के जिस राज्यपाल को अपने कार्यक्रम शुरू और खत्म होते समय राष्ट्रगान बजने की सामंती परंपरा हासिल थी, उसके राजभवन के बिस्तर के नजारे जब इंटरनेट पर चीख-चीखकर नाच रहे थे, तो राष्ट्रगान का अपमान उस बूढ़े राज्यपाल की हरकतें कर रही थीं या कि देश का कोई कार्टूनिस्ट? 
हम अरविंद केजरीवाल से बहुत से मुद्दों पर, अधिकतर मुद्दों पर असहमत रहते आए हैं, लेकिन आज सत्ता की बेशर्मी का जो माहौल चारों तरफ, अधिकतर पार्टियों में दिख रहा है, उसके मुकाबले, उसका सामना करने के लिए और किया भी क्या जा सकता है? जब सत्ता की राजनीति इस कदर बेफिक्र हो जाए कि वह गांधी-नेहरू से लेकर सिद्धांतों के बाकी दूसरे किस्मों के तमाम पैमानों को गटर में फेंक दे, तो किसी न किसी को तो बावला होकर अपने-आपको सड़कों पर झोंक ही देना होगा। आज अरविंद केजरीवाल यही काम कर रहे हैं।