नाली-गड्ढों में गिरने से बचने के लिए


01 अक्टूबर 2012
ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजराइली ने एक बार कहा था कि झूठ तीन तरह के होते हैं, झूठ, सफेद झूठ और आंकड़े। जब एक अंगे्रज प्रधानमंत्री ने यह बात कही थी तो उसका मतलब साफ है कि वह सरकारी आंकड़ों की बात कर रहा था। आज भी कमोबेश हाल वही है। जब सरकारी आंकड़ों की बुनियाद पर किसी नतीजे तक पहुंचा जाता है, तो एक बड़ा खतरा यह रहता है कि कोई दूसरा सरकारी या गैरसरकारी आंकड़ा आकर उस नतीजे की नींव हिला सकता है। 
मिसाल के लिए किसी राज्य में किसी जुर्म के आंकड़े अगर बहुत तेजी से बढ़ते हैं या बहुत तेजी से गिरते हैं, तो उनका मतलब हकीकत में रातों-रात जुर्म का इतना कम या इतना अधिक हो जाना नहीं होता। उसका एक मतलब यह भी होता है कि मौजूदा सरकार ने आंकड़ों को दर्ज करने की अपनी सोच में फेरबदल किया हो सकता है। छत्तीसगढ़ के ही आंकड़ों को लें, तो यहां एक बरस पहले तक हजार से अधिक किसान आत्महत्या करने वाले दर्ज हुए थे। इसके बाद के इस पिछले बरस में आंकड़ों के इस कॉलम में कोई दर्ज नहीं हुआ। 
जो लोग छत्तीसगढ़ की हकीकत को जानते हैं, उनका अनुभव यह रहा है कि किसानी से जुड़ी आत्महत्याएं यहां पर शायद ही होती हों। छत्तीसगढ़ के एक चौकन्ने पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल ने इस पर जमीनी मेहनत भी की थी और एक रिपोर्ट तैयार की थी। (देखें बॉक्स)
लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो में आत्महत्याओं को दर्ज करने का जो तरीका है उसके चलते किसी भी किसान की आत्महत्या के साथ ही उसके पेशे का जिक्र कुछ लोगों को इस अभियान का सामान जुटा देता था कि उतनी आत्महत्याएं किसानी की वजह से हुई हैं। कुछ राज्यों में जहां पर किसान एक अलग किस्म की महंगी फसल के लिए बहुत अधिक कर्ज लेकर खेती करते हैं, वहां पर घाटा लंबा-चौड़ा होने का खतरा भी रहता है। महाराष्ट्र में ऐसे कई हादसे सुनाई पड़े हैं जो कि सच भी साबित हुए हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्याओं को किसानी की आत्महत्याएं साबित करके जिस तरह का प्रचार देश भर में हुआ, उसके चलते शायद इस प्रदेश में अब पुलिस ने आत्महत्या करने वाले के पेशे में किसान लिखना ही बंद कर दिया है। और करीब ग्यारह सौ का आंकड़ा पिछले बरस शून्य पर आ गया। 
इसलिए आंकड़ों से कोई नतीजा निकाल लेना, एक बहुत ही आसान सा लगता काम भी होता है, लेकिन उस नतीजे का हकीकत से सचमुच कुछ लेना-देना हो, ऐसा जरूरी भी नहीं होता। 
लेकिन आंकड़ों पर बात शुरू करके, आंकड़ों पर खत्म करने आज का मकसद नहीं है। इससे कुछ परे जाएं, तो रोज की जिंदगी बहुत से लोग ऐसे मिलते हैं जो उनको मालूम जानकारी को ही संपूर्ण सत्य मानकर नतीजे निकालते रहते हैं। वे अपने को हासिल एक कतरा सच को ही सब कुछ मानकर, किसी भी और बात को, सच के किसी दूसरे कतरे की मौजूदगी की गुंजाइश को भी मानने से इंकार कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि जिस तरह कोई बेईमान वैज्ञानिक या शोधकर्ता चुनिंदा आंकड़ों के बूते कोई नतीजा निकाल लेते हैं, उसी तरह के नतीजे कोई लेखक या पत्रकार भी निकाल लेते हैं, चुनावी विश्लेषक निकाल लेते हैं, और तो और, खुफिया जानकारी के बूते कोई फौजी या पुलिसिया रणनीति बनाने वाले लोग भी निकाल लेते हैं। 
जब सच के मौजूदा कतरों को लोग पूरे का पूरा सच मानने की गलती करते हैं, तो कई बार वे गलती नहीं करते हैं, सोच-समझकर गलत करते हैं। गलत के पीछे एक सोची-समझी नीयत भी होती है। लोगों को यह पता होता है कि उन्हें हासिल जानकारी के खिलाफ भी किसी दूसरी जानकारी के होने की गुंजाइश बहुत है। लेकिन कभी कामचोरी की नीयत से, तो कभी अखबारनवीस होने पर एक बड़ी और बड़ी नाटकीय खबर बनाने के फेर में लोग कुछ ही दूरी पर पड़े या खड़े सच के बाकी कतरों को अनदेखा करते हैं। 
इंसान का मिजाज कुछ सनसनी फैलाने, कुछ नाटकीयता पैदा करने, और अपने-आपको चर्चा में रखने का भी होता है। ऐसे तमाम लोग अद्र्धसत्य को पूर्णसत्य की तरह पेश करके लोगों के चेहरों को देखते हैं कि उन पर कैसा रस बिखरा दिखता है।  ऐसा करते हुए लोग किसी तालाब के पानी की सतह पर तैरती हुई जलकुंभी को ही पेश करते हैं, तालाब की सारी हकीकत की तरह। लेकिन जिन झीलों में पानी की गहराई में तलहटी में सीप के भीतर मोती होते हैं, उन सीपों तक डुबकी लगाने की जहमत कौन उठाए? इसलिए लोग सतह पर तैरते कचरे को तालाब या झील की पूरी हकीकत की तरह पेश कर देते हैं। 
आज यहां लिखने का मकसद लोगों को यह सोचने पर कुछ मजबूर करना है कि किस तरह वे अपने मिजाज को अधिक तर्कसंगत और अधिक न्यायसंगत बना सकते हैं। एक औसत दर्जे के, या घटिया इंसान की तरह तो जीना अद्र्धसत्य के साथ भी हो सकता है, लेकिन राजनीति और सरकार को छोड़कर जिंदगी के बाकी दायरों में अद्र्धसत्य के साथ बहुत ऊंचाई पर पहुंच पाना नामुमकिन सा होता है। इसलिए लोगों को अपने मिजाज को ही जिम्मेदारी का बनाना चाहिए, और बदनीयत की आधी झूठी बातों को कहने की राजनीतिक मिसालों को बाकी दुनिया पर भी लागू नहीं मानना चाहिए। 
राजनीति और सरकारी कामकाज खबरों में रहते अधिक हैं, लेकिन जिंदगी में इनसे परे भी बहुत सी बातें मायने रखती हैं। आधे सच पर टिकी हुई बाजार की रणनीति अगर कोई तय करेंगे, तो उनके सामान बाजार में पहुंचकर औंधे मुंह गिर जाएंगे। इसलिए नतीजे निकालने के बेहतर तरीकों को जब तक कोई इस्तेमाल न करे तब तक मुसाहिबों की भीड़ में चापलूसी के कालीन पर चलते हुए लोग यह सोचते हैं कि आपातकाल के अनुशासन-पर्व से संजय-इंदिरा सत्ता पर काबिज बने रहेंगे, या फिर यह सोचते हैं कि छह बरस के अटलराज के बाद इंडिया शाइनिंग एक हकीकत है, और सरकार में वापिसी तय है। और यह हाल सिर्फ इन दो सरकारों का नहीं रहा, चुने हुए तथ्यों, खरीदे हुए तर्कों और विश्लेषणों की नींव पर टिकी हुई बहुत सी उम्मीदें, बहुत सी सत्ता को गिराकर इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं। 
आम जिंदगी के रोजाना के बहुत से फैसले एक तर्कसंगत सोच से बेहतर हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए किसी अंधविश्वास पर आस्था की तरह तर्कहीन विश्लेषणहीन नतीजे मददगार नहीं होते। इसके लिए एक वैज्ञानिक नजरिए से सभी संभव और असंभव बातों को विश्लेषण में अपनी बात कहने का मौका देते हुए ही उनकी मदद पाई जा सकती है। सुनने, सोचने, नतीजा निकालने और बोलने में ऐसा संतुलन बहुत आसान भी नहीं होता, लेकिन जो लोग ऐसे संतुलन के साथ साइकिल चलाना सीख लेते हैं, वे अगल-बगल के नाली-गड्ढों में गिरने से भी बच जाते हैं।

आलोक प्रकाश पुतुल की रिपोर्ट का हिस्सा
असल में आत्महत्या के जो जिलेवार आंकड़े तैयार होते हैं, उसमें एक श्रेणी मृतक के पेशे का होता है। जब किसानों की आत्महत्या की बात होती है तो किसी भी कारण से आत्महत्या करने वाले किसान को किसान श्रेणी के आंकड़े में रख लिया जाता है।
उदाहरण के लिए पिछले बुधवार (2008) को छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर भरइहापारा के किसान कार्तिक राम सतनामी ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। कार्तिक के परिजन बताते हैं कि इस साल आम की फसल में उसे भारी मुनाफा हुआ था। लेकिन फसल बेचने से जो रकम उसे मिली थी उसका बड़ा हिस्सा वह शराब पीकर खत्म कर रहा था। घरवालों में इस बात को लेकर कहा-सुनी हुई तो बुधवार को कार्तिकराम ने शराब के नशे में ही कीटनाशक पी कर आत्महत्या कर ली।
जाहिर है, इस आत्महत्या को किसान की आत्महत्या के रूप में दर्ज किया गया है और जब वर्ष 2008 में किसानों की आत्महत्या के आंकड़े तैयार किए जाएंगे तो उसमें कार्तिकराम सतनामी का नाम भी शामिल हो जाएगा।
किसानों के विस्थापन और जल-जंगल-जमीन के मुद्दे पर लंबे समय से आंदोलन चलाने वाले नदी घाटी मोर्चा के गौतम बंदोपाध्याय इसे महज आंकड़ों का खेल बताते हैं। उनका कहना है कि इस तरह के आंकड़ों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मदद मिल रही है और वे इसे मुद्दा बना कर किसानों को नकदी फसलों की ओर धकेलने का काम करेंगे।
गौतम कहते हैं-बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैव विविधता को खत्म करने का काम कर रही हैं और इस तरह के आंकड़े चाहे-अनचाहे उनकी मदद करेंगे। खेती में असफलता के कारण किसानों की आत्महत्या न हो तो भी राज्य में किसानों की आत्महत्या की बढ़ी हुई दर तो चिंताजनक है ही। गौतम इसके पीछे तर्क देते हुए कहते हैं,औराज्य के बड़े पूंजीपति, विधायक, सांसद और मंत्री भी जब आयकर जमा करते हैं तो वे अपना पेशा कृषि ही बताते हैं।
किसानों की जनसंख्या का आंकड़ा इसी तरह के घालमेल से तैयार होता है। ऐसे में स्वभाविक रूप से आत्महत्या करने वालों की संख्या में बतौर किसान दर्ज होने वाले लोगों की संख्या अधिक होती है।
छत्तीसगढ़ में औद्योगिकीकरण और आत्महत्या जैसे मुद्दे पर पिछले कई सालों से काम कर रहे लंदन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स के प्रोफेसर जोनाथन पैरी किसानों की आत्महत्या को इतना सरलीकृत किए जाने के खिलाफ हैं।
प्रोफेसर पैरी के अनुसार, किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को संपूर्णता में देखने की जरूरत है। जिस तरह के आंकड़े सामने आए हैं, उससे भ्रम पैदा होता है। ये बात तो साफ समझ में आती है कि इन आँकड़ों पर गंभीरता से काम नहीं हुआ है।

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