कन्या भ्रूण हत्यारे, धनपशुओं के देश में गले में बेटी टांगे एक दलित रिक्शेवाला..


20 अक्टूबर
संपादकीय
राजस्थान के भरतपुर से बीबीसी ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें बबलू नाम का एक रिक्शेवाला अपनी सवा महीने की बच्ची को गले से टांगे हुए रिक्शा चला रहा है। इस बच्ची की मां पैदा होते ही गुजर गई, और इसे जिंदा रखने और बड़ा करने का जिम्मा अब अकेले पिता पर ही आ गया है। कल जब पहले पन्ने पर हमने तस्वीर सहित यह रिपोर्ट छापी तो उसे देखकर खुद हमारा ही दिल दहल रहा था। जिस उम्र की बच्ची को लोग गोद से नहीं उतारते, वह धूल, धुएं और धूप के बीच इस तरह से पिता के साथ सड़कें नाप रही है। 
कल जब देश भ्रष्टाचार की खबरों और आरोपों से लबालब था, और जब बड़ी सनसनीखेज सुर्खियों की भीड़ थी, तब इस खबर को सबसे बड़ी खबर की तरह छापने से कुछ लोगों को अटपटा भी लगा। लेकिन इस खबर के बहुत से पहलू हैं, जिनकी वजह से इसे इस तरह छापना हमें जरूरी लगा। एक तो यह कि राजस्थान बच्चियों को पैदा होते ही मार डालने के अनगिनत जुर्म का ठिकाना माना जाता है, जहां पर किसी बच्ची का पैदा होना बहुत से परिवारों के लिए गमी की वजह होती है और जहां एक समय सतीप्रथा के नाम पर महिला को उसके मृत पति के साथ जिंदा जला दिया जाता था, वहां पर आज एक दलित, गरीब रिक्शेवाला अकेले ही अपनी बच्ची की पहाड़ सी जिंदगी उसे अपने साथ-साथ पैडल मारते हुए पार कराने के हौसले वाला दिख रहा है। आज जब भारतीय समाज में ऊंची कही जाने वाली जातियों की, अच्छे-बुरे कैसे भी पैसे वालों की भीड़ बच्चियों को पैदा होने के पहले मार रही है, बच्चियां पैदा करने की वजह से बहू को जिंदा जला रही हैं, तब मुसीबत से गुजर रहा यह गरीब रिक्शेवाला हिला देने वाली एक मिसाल बनकर सामने आया है। इसकी ताकत कम है, जेब शायद है ही नहीं, इसके पास किसी उम्मीद की कोई बहुत बड़ी वजह भी नहीं है, लेकिन हौसला आसमान छूता हुआ। 
आज जब देश के बड़े-बड़े लोग अपनी आने वाली सौ-सौ और हजार-हजार पीढिय़ों तक के लिए, लोगों के हक लूट-लूटकर जमा कर रहे हैं, तब सवाल यह उठता है कि ऐसी गरीबी और ऐसी परेशानी से गुजर रहे इस पिता के लिए इस लोकतंत्र के पास क्या है? समाज के जो ठेकेदार अपने आपको जातियों और धर्मों के रीति-रिवाजों के चलते लड़कियों को मारने का हकदार मान लेते हैं, उनकी सारी कातिल सोच को चुनौती देने वाले इस गरीब, सड़कछाप, रिक्शेवाले के लिए इस समाज के पास क्या है? सच तो यह है कि इस रिक्शेवाले के काम से लेकर, उसकी दलित जाति, उसकी गरीबी तक का हर पहलू सवर्ण, संपन्न और शिक्षित समाज के लिए अनगिनत गालियों और कहावत-मुहावरों का सामान है। इसके बावजूद अपनी इन्हीं तंग सीमाओं के भीतर यह आदमी कितना कुछ सोचने को बेबस करता है! 
दिल्ली और देश की बाकी प्रादेशिक राजधानियों से उठती हुई खबरों के साथ इतनी बेबस गरीबी को अगर मिलाकर देखें तो लोकतंत्र से लेकर ईश्वर तक, और इंसानों तक से भरोसा उठने से कम कुछ नहीं होता। ईश्वर को जो लोग मानते हैं, उनके ईश्वर की की हुई इस बेइंसाफी से लेकर, लोकतंत्र को हांकने वाले लोग जिस कदर ऐसे गरीबों का हक खा रहे हैं, उसे देखते हुए नास्तिक से लेकर नक्सली तक ठीक लगने लगते हैं। और यह भी हो सकता है कि यह एक खबर सामने आ गई इसलिए हम इससे विचलित हो गए। असली हिन्दुस्तान में इस किस्म के बहुत से तकलीफजदा लोग होंगे जिनके लिए किसी के पास इंसाफ नहीं है। और शायद ऐसी ही नौबतें हैं जिनके चलते इस देश में बहुत से लोग (अनुपात में नहीं, गिनती में) ऐसे हो चले हैं जिनको लगता है कि अहिंसा के रास्ते से सबसे कमजोर हिन्दुस्तानी को कभी इंसाफ नहीं मिल सकता। जब हम लाखों करोड़ के घपलों के साथ देश-प्रदेशों पर राज करने वाले लोगों को देखते हैं, तो कुछ देर के लिए हमको भी यही लगता है कि ऐसा सोचने वालों की हताशा बेबुनियाद नहीं है। लेकिन अगर देश को लंबे समय तक हिंसा से दूर रखना है, तो गले में बेटी टांगे घूमते ऐसे गरीब और सत्ता और राजनीति के कारोबार, और कारोबार की सत्ता और राजनीति से खरबपति बने हुए धनपशुओं के बीच का फासला कम करना होगा। 

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