यूपीए मंत्रिमंडल में फेरबदल कांगे्रस की यह कोशिश बहुत देर से, बहुत नाकाफी


29 अक्टूबर 2012
संपादकीय
यूपीए सरकार में हुए फेरबदल से यूपीए के भीतर वैसे तो सिर्फ कांगे्रस पार्टी का लेना-देना है लेकिन गठबंधन के बाकी दलों से परे, देश की जनता का इस फेरबदल से सबसे बड़ा लेना-देना है। इस फेरबदल से कुछ लोगों को यह निराशा हो सकती है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए मंत्रियों को हटाया नहीं गया। कुछ लोगों को यह निराशा भी हो सकती है कि कुछ दागी लोगों को भी मंत्री बना दिया गया है। लेकिन देश की बाकी राजनीतिक हवा को अगर देखें, तो जिस तरह किसी गंदे तालाब के भीतर का कोई एक हिस्सा अलग से साफ नहीं रह सकता, वामपंथियों को छोड़कर भारत की आज की राजनीति में कोई भी अपने-आपको साफ नहीं रख पाया है। लेकिन इन घिसी-पिटी बातों से परे इस ताजा फेरबदल को देखते हुए यूपीए के पिछले इतने बरस, और आने वाले बरस देखने की जरूरत है। 
यह फेरबदल तो तय था ही, क्योंकि सहयोगी दलों के अलग हो जाने से कई कुर्सियां खाली पड़ी थीं, और कांगे्रस के भीतर के कई नेता भी उतने ही खाली बैठे थे। इस मौके पर कम ही लोगों को यह उम्मीद थी कि कांगे्रस के भविष्य राहुल गांधी सरकार में शामिल होंगे। उसकी एक तर्कसंगत वजह भी थी कि सरकार के रूप में यूपीए अधिक बदनाम और अधिक नाकामयाब है, किस्म-किस्म के कटघरों में खड़ी है, दूसरी तरफ एक पार्टी होने के नाते कांगे्रस के किसी कटघरे में जाने का खतरा न था और न है। इसलिए कांगे्रस जिसे अपने भविष्य के रूप में पेश कर चुकी है उसको कटघरे से दूर रखना भी जरूरी था, और है। इसलिए सोनिया गांधी खुद सरकारी कुर्सी से दूर बनी हुई हैं, राहुल गांधी को दूर रखा गया है, वरना किस मंत्रालय को देखने वाले लोग कब फंस जाएं इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। लेकिन इस फेरबदल के साथ जो माहौल जुड़ा हुआ है उसे अगर देखें तो ऐसा लगता है कि यूपीए की मुखिया के रूप में, और एक पार्टी के रूप में कांगे्रस ने हाथ से फिसलती हुई रस्सी को बहुत देर से थामने की कोशिश की है, और बहुत अनमने ढंग से भी। इस सरकार के आखिरी डेढ़-दो बरस अगर इसके ही पिछले आठ बरसों से कुछ बेहतर रहेंगे, तो यह इस पार्टी के किए नहीं होगा, देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो हवा खड़ी हुई है, उसके चलते होगा। आज नेता और अफसर न सिर्फ यूपीए सरकार में, बल्कि बाकी पूरे देश में भी सहमे हुए हैं, और उसी के चलते लोग राजा-कलमाड़ी की राह पर चलने से बचेंगे। 
यह जरूर है कि चूंकि कांगे्रस पार्टी राजनीति में बनी हुई है इसलिए बढ़ते हुए नुकसान को रोकने का उसका हक भी है, और उसकी जिम्मेदारी भी है। लेकिन इस काम में वह बुरी तरह नाकामयाब रही है। दरअसल भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में कभी ऐसा इतिहास नहीं रहा है कि देश पर राज करने वाली पार्टी की मुखिया, देश के प्रधानमंत्री, और इन दोनों के अगले दावेदार, ऐसे तमाम तीन बड़े लोग देश के साथ अपनी तकरीबन सारी बातचीत पार्टी प्रवक्ताओं के माध्यम से करें। यूपीए और कांगे्रस की यह एक बड़ी नाकामयाबी रही उसके ये तीनों बड़े नेता किसी नाजुक मौके पर कभी जनता के रूबरू नहीं हुए। अधिक पुरानी बात नहीं है, इसी महीने जब रॉबर्ट वाड्रा पर बहुत ही गंभीर आरोप लगे, तो यूपीए के कांगे्रसी मंत्री, कांगे्रस प्रवक्ता और कांगे्रस के कुछ नेता बचाव के लिए टूट पड़े। लेकिन जिस परिवार का दामाद होने की वजह से रॉबर्ट के कारोबारी सौदों की तरफ देश का ध्यान खींचा गया था, वह परिवार यूपीए का मुखिया होने के बावजूद पूरी तरह चुप रहा। भारतीय लोकतंत्र में जनता अपने नेता से ऐसे नाजुक मौकों पर चुप्पी नहीं चाहती, उनकी बात सुनना चाहती है। पार्टी के प्रवक्ता पार्टी से जुड़ी बातों पर बयान देने के लिए रहते हैं। मंत्री सरकार की बात कह सकते हैं। लेकिन जब बात सोनिया परिवार पर आई थी, और अब तक खड़ी है, तो लोग उस परिवार से एक सफाई पाने का हक तो रखते ही हैं। इसकी जगह इंटरनेट पर रॉबर्ट वाड्रा के बहुत ही अहंकारी और अपमानजनक बयान का तोहफा इस देश को मिला। इस पर भी अगर कल सोनिया गांधी कोई जवाब नहीं दिया, तो यह देश के प्रति जवाबदेही की कमी है।
कुछ ऐसा ही हाल कांगे्रस पार्टी और यूपीए का पिछले बरसों में रहा है। इन लोगों ने जनता के बीच उठी बातों पर आखिरी तक चुप्पी रखने की कोशिश की, आखिर तक बचने की कोशिश की, मानो अदालत में कानूनी छूट का इस्तेमाल करके कोई शातिर इंसान बचने की राह निकाल रहे हों। यह सिलसिला भी आम जनता की भावनाओं के पूरी तरह खिलाफ जाता है और लोकतंत्र के तकाजों से भी यह बचने की कोशिश है। मंत्रिमंडल के मौजूदा फेरबदल से सरकार के भीतर के कामकाज पर फर्क पड़ सकता है, लेकिन उसके लिए भी किसी सरकार का आठवां-नौवां बरस काफी देर का मौका रहता है, और सरकार से परे के जो सार्वजनिक सवाल हैं, वे तो जनता के मन में पोस्टर और बैनर की तरह तने हुए हैं ही। 
कांगे्रस पार्टी को इसके बारे में भी सोचना चाहिए, क्योंकि सरकारी कामकाज में सुधार का असर देश की जनता तक पहुंचने में बहुत लंबा समय लगता है। रातों-रात तो फर्क सिर्फ कोई म्युनिसिपल ही ला सकती है, केंद्र सरकार का काम इतने जल्दी नहीं दिखता। लेकिन पार्टी का चाल-चलन पल भर में दिख जाता है, और अब चुनाव तक का आने वाला वक्त कांगे्रस लीडरशिप को उसी फर्क के साथ जनता के सामने रहने का है, और इस दौर में नाजुक और गंभीर मुद्दों पर जनता कांगे्रस के नेताओं को खुद को बोलते सुनना चाहेगी। फिलहाल इस फेरबदल के बारे में हम यही कह सकते हैं कि सुधार की यह कोशिश अगर सिर्फ सरकार के स्तर पर पार्टी द्वारा की जा रही है, तो यह बहुत देर से की गई कोशिश है, जो कि बहुत नाकाफी भी है।

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