कारोबार के माहौल के हिसाब से हिंदुस्तान बहुत घटिया जगह...

23 अक्टूबर
संपादकीय

एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे के मुताबिक भारत को कारोबार की सहूलियत के पैमाने पर दुनिया में 132वां देश माना गया है। भारत से बेहतर हालत बांग्लादेश की मानी गई है। यह सर्वे इन पैमानों पर किया गया है-व्यापार शुरू करने की आसानी, निर्माण की इजाजत पाने में आसानी, बिजली कनेक्शन पाने की आसानी, संपत्ति को रजिस्टर करवाने की आसानी, कर्ज पानी की आसानी, पूंजी निवेशकों की सुरक्षा, टैक्स देने में सहूलियत, कारोबारी अनुबंधों को लागू करवाने में आसानी वगैरह।
आज जब देश में कारखानेदारों और कारोबारियों का सत्ता के साथ मिलकर जनता को लूटने के आरोप लगते हैं, तो ऐसे लोग गिनती में कम रहते हैं। अधिक कारोबारी ऐसे रहते हैं जो अपनी पसंद से या मजबूरी में नियम-कायदों के हिसाब से चलना चाहते हैं, लेकिन देश-प्रदेशों में सत्ता उन्हें उस तरह चलने नहीं देती। देश के कानूनों को मिल-जुलकर चूना लगाने की भी एक संस्कृति इस देश में बन गई है, और सरकार से जिन लोगों का वास्ता पड़ता है, वे जानते हैं कि अगर काम पूरी ईमानदारी से किया गया, तो एक तो बाजार में बेईमान-कारोबारियों के साथ एक गैरबराबरी का मुकाबला करना होगा, और ईमानदार कारोबारी को सरकार में बैठे लोग भी पसंद नहीं करते कि अगर कारोबारी गलत काम से नहीं कमाएगा, तो सत्ता को रिश्वत क्यों देगा? नतीजा यह होता है कि हर किस्म की चोरी, बेईमानी और भ्रष्टाचार की कमाई में ही हिस्सा-बांटा अधिक हो पाता है। यह तो एक नौबत है। लेकिन दूसरी नौबत यह भी है कि जहां पर किसी ऊपरी कमाई की गुंजाइश न हो, वहां भी भारत में काम करने का मिजाज कुर्सी पर बैठे लोगों का नहीं है। किसी काम को अधिक से अधिक समय तक कैसे रोका जाए कि लोग थक-हारकर खुद ही रिश्वत लेकर पहुंचें, यही सिलसिला अधिक दिखता है। 
यह देश मौसम के हिसाब से कारखानों और कारोबार के लिए माकूल है। यहां जमीन बहुत है, पानी बहुत है, खदानें हैं, मजदूरी सस्ती है, बहुत से बंदरगाह हैं, और इस तरह की बहुत सी दूसरी खूबियां हैं जिनकी वजह से यह सचमुच ही सोने की चिडिय़ा बन सकता था। लेकिन आज अगर दुनिया में 185 देशों में भारत की जगह 132वें नंबर पर आती है, तो इससे पता लगता है कि यहां की संभावनाओं को किस हद तक खत्म किया जा रहा है। आज हिंदुस्तान इन खबरों में डूबा हुआ है कि देश में जमीनी और आसमानी दौलत को सत्ता ने किस तरह कारोबार-माफिया के साथ मिलकर लूट लिया है। लेकिन लूट की यह रकम जितनी है, उससे सौ गुना या हजार गुना अधिक की संभावना खत्म कर देने के आंकड़े किसी सीएजी की रिपोर्ट में नहीं आ सकते। ऐसे में आज अगर लोग बेरोजगार हैं, या लोगों को जिंदा रहने के लिए एक ग्रामीण रोजगार गारंटी देनी पड़ रही है कि साल में एक परिवार को सौ दिन का काम मिलेगा ही मिलेगा, तो यह देश रहम की ऐसी योजनाओं के लायक नहीं है, यह देश बहुत बेहतर संभावनाओं के लायक है जिनको सरकार से लेकर समाज तक ने अपनी खराब नीयत के चलते खराब नियति तक पहुंचा दिया है। इस सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि बहुत से दूसरे देश पिछले साल के इसी सर्वे के मुकाबले इस बार अपनी पिछली जगह से बहुत ऊपर उठ चुके हैं, लेकिन भारत ठीक उसी जगह पर बना हुआ है। भारत के मुकाबले न सिर्फ बांग्लादेश को बेहतर आंका गया है, बल्कि श्रीलंका तो भारत बहुत ही बेहतर माना गया है, वह इस लिस्ट में 81वें जगह पर है। 
इस देश को न सिर्फ अपनी बेईमानी से उबरने की जरूरत है बल्कि इसे बेईमानी की संभावनाएं न रखने वाले सरकारी कामकाज को भी सुधारने की जरूरत है।
एक दूसरा सर्वे जो आज ही सामने आया है उसके मुताबिक एशिया तेजी से पेशेवर और हुनरमंद लोगों की पसंद बनता जा रहा है, लेकिन भारत एक अपवाद बन रहा है। दूसरे देशों में जाकर काम करने की इच्छा रखने वाले भारत से जी चुराने लगे हैं। जीवनशैली के लिहाज से भारत को सबसे नीचे रखा गया है। विदेशी भारत आकर काम काज करने को बहुत तरजीह नहीं दे रहे हैं। इस लिहाज से भारत वियतनाम, कुवैत और सऊदी अरब से भी पीछे है। आर्थिक मोर्चे पर भी भारत से विदेशियों की उम्मीदें टूट रही हैं। इन दोनों सर्वे के नतीजों को मिलाकर देखें, तो लगता है कि यहां न कामकाज की हालत अच्छी है, और न आराम की हालत अच्छी है। इन दोनों सर्वे के नतीजों को और अधिक यहां पर लिख पाना मुमकिन नहीं है, लेकिन इनके बाद किसी को यह हैरानी नहीं होनी चाहिए कि यहां के आम लोग पहला मौका मिलते ही दुनिया के बेहतर देशों में अपनी संभावनाएं तलाशने लगते हैं।

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