राम से लेकर रोम तक पारदर्शिता की मिसालें


6 अक्टूबर 12
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ मुहिम चला रहे अरविंद केजरीवाल का ताजा हमला सीधे सरकार पर नहीं है, लेकिन सरकार पर इससे अधिक पैना और कोई हमला हो भी नहीं सकता था। कांगे्रस और यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के निजी कारोबार को लेकर जो दस्तावेज केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े वकील प्रशांत भूषण के साथ मिलकर पेश किए हैं वे कांगे्रस के प्रवक्ताओं और केंद्रीय मंत्रियों के विशेषणों से कमजोर होने नहीं जा रहे। देश की सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी डीएलएफ से रॉबर्ट को पैंसठ करोड़ रूपये से अधिक का ब्याज मुक्त कर्ज मिलने, और फिर इससे इसी कंपनी की इमारतों में बाजार भाव से बहुत कम पर खरीदी करने के आरोप दस्तावेजों और आंकड़ों के जवाब के हकदार हैं, न कि विशेषणों के। जिस तरह भूख का जवाब रोटी ही हो सकती है, लिपस्टिक नहीं, उसी तरह दस्तावेजी आरोप का जवाब दस्तावेजी ही हो सकता है, कल सामने आए विशेषणों से नहीं।
किसी भी नेता के परिवार को कारोबार का पूरा हक है। इसी तरह देश के कानून और जनता को यह जानने का भी पूरा हक है कि इन नेताओं के परिवार किन किस्मों के बड़े कारोबार में लगे हैं और उन्हें कहां से कोई फायदा मिल रहा है। यह इसलिए जरूरी है कि सत्ता तो सत्ता, विपक्ष की ताकत भी लोगों को कारोबारों में मदद करती है, कल ही हमने इसी जगह नेताओं की सिफारिशी चिट्ठियों की चर्चा की थी। आज यह बात तो तय है कि अगर देश की एक सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी ने सोनिया गांधी के दामाद के साथ अविश्वसनीय सी कोई कारोबारी रियायत की है, और इस कंपनी के ढेर सारे काम केंद्र सरकार, दिल्ली की कांगे्रस सरकार, हरियाणा की कांगे्रस सरकार के इलाकों और दायरों में अटके रहते हैं, तो लोगों के मन में यह शक तो खड़ा होगा ही कि ऐसी कंपनी से दसियों करोड़ या सैकड़ों करोड़ की कोई रियायत सोनिया गांधी के दामाद को क्या मुफ्त में ही मिल रही है?
कांगे्रस और यूपीए सरकार के भीतर कांगे्रस के मंत्रियों की पहली प्रतिक्रिया एक हड़बड़ी और आपाधापी की दिख रही है। अरविंद केजरीवाल पिछले बहुत महीनों में कल तब पहली बार हमें इतने तर्कसंगत और न्यायसंगत लगे, जब उन्होंने केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा रॉबर्ट के बचाव पर कहा कि देश के कानून मंत्री को  देश के हित की बात करनी चाहिए, न कि कांगे्रस के कानून मंत्री की तरह बात करनी चाहिए। कांगे्रस के लिए बेहतर यही होता कि रॉबर्ट वाड्रा की तरफ से एक सफाई सामने आती, और दस्तावेजों का जवाब दस्तावेजों से दिया जाता। दूसरी बात सरकार की तरफ से यह आती कि अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण के पेश किए गए कागजात देखे जाएंगे, और जरूरत लगने पर उनके आरोपों की जांच की जाएगी। हमारे हिसाब से तो सरकार को खुद होकर इनमें से हर आरोपों की जांच की घोषणा करनी चाहिए थी, क्योंकि ये आरोप अगर झूठे हैं, तो उनको जांच का कोई डर क्यों हो? और अगर इन आरोपों में कोई दम है तो फिर यूपीए की मुखिया का परिवार जांच से परे रह भी कैसे सकता है? 
सार्वजनिक जीवन में सोनिया गांधी और उनका परिवार अब तक सरकार पर लगते आ रहे आरोपों से परे, निजी आरोपों से बचे हुए रहे। लेकिन यह बात तो जाहिर है कि देश का सबसे ताकतवर परिवार जनता की खुर्दबीनी निगाहों से परे रहने का हकदार नहीं हो सकता। लोग जैसे-जैसे सार्वजनिक जीवन में ऊपर जाते हैं, वैसे-वैसे उनका जीवन अधिक पारदर्शी होने की उम्मीद दुनिया करती है। और उत्तरप्रदेश के पिछले चुनाव में जिस तरह प्रियंका गांधी अपने पति और बच्चों के साथ चुनाव प्रचार में लगी रहीं, जिस तरह रॉबर्ट वाड्रा ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि राहुल के बाद प्रियंका राजनीति में आएंगी, और समय आने पर फिर वे राजनीति में आएंगे, तो उसके बाद फिर यह परिवार एक निजी जिंदगी के दावे की रियायत नहीं पा सकता। हमारा तो ख्याल यह है कि इस चुनाव प्रचार के मंच पर जब प्रियंका ने अपने बच्चों को भी पेश किया था तो उन्होंने अपनी ही एक पुरानी अपील के खिलाफ काम किया था कि उनके बच्चों की तस्वीरें कहीं न छापी जाएं। इसी तरह रॉबर्ट की राजनीति में आने की घोषणा भी अटपटी थी, बेमौके की थी, और उत्तरप्रदेश के मतदाताओं को देश की सबसे बड़ी और लंबी कुनबापरस्ती की याद दिलाने वाली भी थी। कुल मिलाकर वह बात बदमजा थी, और हमारे जैसी समझ रखने वालों के मुताबिक कांगे्रस के लिए आत्मघाती भी थी। जो पार्टी एक कार्यसमिति होने का मुखौटा रखती है, उसके बड़े फैसले अगर इस कार्यसमिति के बाहर नेहरू-गांधी परिवार के राजनीतिक और गैरराजनीतिक सदस्य बताते हैं, या लेते हैं, तो उससे पार्टी की शान नहीं बढ़ती। और आज जब कांगे्रस के प्रवक्ता और कांगे्रस की तरफ से यूपीए में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद इन आरोपों को सोनिया गांधी के परिवार पर हमला बताते हैं, तो यह भी साफ दिखता है कि चुनाव प्रचार के मंच और सही समय पर राजनीति में आने की घोषणा के बाद प्रियंका परिवार निजी जीवन की इस तरह की रियायतों का हकदार नहीं रह जाता कि उनके कारोबार पर भी कोई सवाल न उठें। और फिर कारोबारी कागजों को कोई साजिश क्यों मानना चाहिए? 
अब हम राजनीति में दो किस्म के दिन लद गए देखते हैं। एक तो उस नेहरू के दिन लद गए हैं जिसने अपनी निजी संपत्ति भी राष्ट्र के नाम कर दी थी। दूसरा यह कि अब इस बात का कोई महत्व नहीं दिखता कि राजा की बीवी संदेह से परे होना चाहिए। एक वक्त इटली के रोम के पुराने रोमन सम्राट जूलियस सीजर से जब यह पूछा गया था कि उसने अपनी बीवी को तलाक क्यों दे दिया, तो उसका जवाब था कि सीजर की बीवी को शक से ऊपर होना चाहिए। और यह बात दुनिया भर में सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता के लिए सबसे बड़े पैमाने की तरह की हो गई। यह बात तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन भारत में इससे भी बड़ी एक मिसाल राम ने पेश की थी, जो परले दर्जे की कू्रर और अन्यायपूर्ण बात भी थी, एक किसी ओछे इंसान की कही एक बात को सुनकर राम ने अपनी पत्नी को ही घर से निकाल दिया था कि राजा को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए, और संदेह से परे का जीवन ही जीना चाहिए, उसके परिवार को भी।
राम से लेकर रोम तक से सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता की ये जो मिसालें पौराणिक कथाओं से लेकर इतिहास तक दर्ज हो चुकी हैं, उनके लिए किसी भी ईमानदार के मन में कोई हिकारत नहीं होनी चाहिए। गांधी और नेहरू के जाने को आधी सदी से अधिक हो चुका है, लेकिन उनके बारे में उनके विरोधी भी महज यह कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी निजी संपत्ति देश को दी ही है, देश से कुछ कमाया नहीं। कांगे्रस गांधी और नेहरू का नाम लेकर जीती है, उसे ऐसे दस्तावेजी-आरोपों पर जवाबी और जुबानी आरोपों से काम नहीं चलाना चाहिए, काम इस तरह चलने वाला भी नहीं है। अब कदम-कदम पर सुप्रीम कोर्ट दखल देने को तैयार है, या बेबस है। इसके पहले कि यूपीए सरकार को बेबसी में कोई जांच करवानी पड़े, उसे खुद होकर इन आरोपों के साथ के कागजात की जांच करवानी चाहिए। यह सवाल सिर्फ सोनिया परिवार, कांगे्रस या यूपीए सरकार की साख का नहीं है, इससे देश में लोकतंत्र की साख भी खतरे में पड़ती है। 

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