तालिबानी सरकारें और सोता सुप्रीम कोर्ट


संपादकीय
30 नवंबर 2012
अब ममता बैनर्जी को जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की चि_ी मिली है। प. बंगाल में ममता बैनर्जी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ जिस किस्म की तानाशाही चला रखी है, उसको लेकर दुनिया भर में ममता बैनर्जी मखौल का सामान तो बन चुकी हैं, लेकिन बंगाल की बेबसी है कि भारतीय शासन व्यवस्था के मुताबिक वहां के लोगों को पांच बरस तक ममता को ढोना ही है। लेकिन ममता अकेली नहीं हैं। महाराष्ट्र की सरकार पिछले कई बरसों से मंत्रालय से काम करना छोड़कर अजंता और एलोरा की गुफाओं से काम कर रही है। पे्रमी जोड़ों से लेकर फेसबुक और ट्विटर तक वह ऐसी कड़क कार्रवाई कर रही है कि मानो उसे धर्मान्धता, कट्टरता और दकियानूसीपन में तालिबानों से मुकाबला करना हो।
ऐसे में जब अभिव्यक्ति की आजादी की एक आवाज बनकर जस्टिस काटजू ने लगातार सार्वजनिक विरोध किया, तो महाराष्ट्र की सरकार को उस पर गौर करना पड़ा। दूसरा दबाव महाराष्ट्र की सरकार पर पड़ा। इंटरनेट पर आजादी का इस्तेमाल करने वाली नौजवान पीढ़ी का जिसने दुनिया भर में इस सरकार के संकीर्णतावादी पाखंड को खूब लताड़ा। लेकिन जस्टिस काटजू का सीधा-सीधा इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था। वे अपने बड़े सरकारी बंगले की गर्मी में बैठ कह सकते थे कि जब उनकी पे्रस कौंसिल ऑफ इंडिया के पास शिकायत आएगी, तबके उसे देखेगा लेकिन जिम्मेदारी की समझ दरवाजे पर सांकल बजने की राह नहीं तकती, जिम्मेदारी खुद लेकर काम करती है। महाराष्ट्र, बंगाल या राष्ट्रीय स्तर के मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग सोते पड़े हैं। एक अल्पसंख्यक लड़की को फेसबुक पर लिखी एक मासूम बात के लिए गिरफ्तार किया गया लेकिन अल्पसंख्यक आयोग का मुंह भी नहीं खुला। जबकि इस मासूम मामले को पुलिस ने साम्प्रदायिक रंग दिया।
आज इस मामले पर लिखने की जरूरत इसलिए है कि कानून की एक बीस बरस की छात्रा इस देश के आईटी कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची है, तब सुप्रीम कोर्ट इस कानून की संवैधानिकता को परख रहा है। जब कानून की साधारण समझ रखने वालों को आईटी कानून तानाशाह लग रहा था और जब देश के आईटी मंत्री कपिल सिब्बल इस कानून के बड़े व्यापक बेजा इस्तेमाल को सार्वजनिक रूप से मान चुके थे, तब भी सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर इसे क्यों नहीं किया? कल तक सुप्रीम कोर्ट के ही जज रहे मार्कण्डेय काटजू खुलकर लिख रहे थे कि किस तरह संविधान में दिए इस बुनियादी हक को कुचला जा रहा है, तब भी सुप्रीम कोर्ट दरवाजा खटखटाने के इंतजार में सोया रहा। खुद होकर सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म करते इस कानून को क्यों नहीं तौला?
लोकतंत्र में किसी भी पाए की यह चुप्पी खतरनाक है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। एक वक्त था तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू मुख्यमंत्रियों को देश-विदेश के मुद्दों पर हर महीने चि_ी लिखते थे। अब अपनी जिम्मेदारी के दायरे से परे जाकर भी जस्टिस काटजू वह काम कर रहे हैं। अपने अधिकार का इस्तेमाल बेहतर है, बजाय जिम्मेदारी से बचने के। यह बात सुप्रीम कोर्ट को भी समझनी चाहिए।

खबर बनते बच्चे और बेखबर समाज-सरकार


संपादकीय
29 नवंबर 2012
आज दिल दहलाने वाली दो खबरें हैं। एक तो पड़ोस के ओडिशा से ही है जहां स्कूल के एक बच्चे की हाजिरी कम होने से स्कूल ने उस पर ढाई सौ रूपए का जुर्माना लगाया, और उसके मजदूर मां-बाप पर यह बोझ बहुत अधिक था इसलिए इस बच्चे ने खुदकुशी कर ली। दूसरी खबर कर्नाटक की है जहां एक स्कूल टीचर एक बच्चे को सजा के तौर पर लगातार परेशान कर रहा था, और क्लास में ही उसके कपड़े उतरवा दे रहा था, इससे परेशान होकर वह बच्चा मिट्टी तेल लेकर स्कूल पहुंचा और उसे क्लास में ही अपने को आग लगाकर जान दे दी। इन दो खबरों को आज की तारीख के दो हादसे मानकर यह सोच लेना कि ये बच्चे शायद कुछ अधिक संवेदनशील थे, यह काफी नहीं होगा। दूसरी तरफ यह सोचना भी काफी नहीं होगा कि इन दो स्कूलों में शायद बच्चों से कुछ ज्यादती हो रही हो इसलिए इन दो जगहों पर ऐसा हुआ है। खबर इतनी बड़ी बन जाने के पहले ही ऐसे बहुत से तनाव देशभर में करोड़ों बच्चों के साथ चल रहे होंगे, जिसका कोई इलाज आज इस देश की सरकारों के पास नहीं है। और यह समाज अपनी अगली पीढ़ी की जरूरतों से इस कदर बेखबर है कि वह कोई भी  समझदारी दिखाने से लगातार मुकरते रहता है। 
हम बच्चों के मुद्दों पर जरूरत से कुछ अधिक बार लिखते हैं और हो सकता है कि लगातार हमारे संपादकीय को पढऩे वाले लोग इससे कुछ थक भी जाते हों। लेकिन यह मुद्दा हमको बहुत अधिक नाजुक और जरूरी लगता है, दूसरी तरफ समाज और बच्चों के मां-बाप भी इस मुद्दे को जरूरत से कम आंकते हुए दिखते हैं। इसलिए हमारे अकेले के इस कोशिश में लगने के अलावा, समाज के बहुत से तबकों को बच्चों के मुद्दों पर बात करनी होगी, खुलकर बात करनी होगी, और बात करने से अधिक भी आसपास नजर रखनी होगी कि बच्चे के किस तरह के तनाव से गुजर रहे हैं। आज हालत यह है कि पढ़ाई-लिखाई, दोपहर के भोजन के इंतजाम के बाद शायद स्कूलों में बच्चों के और किसी मामले पर सुनने का वक्त भी स्कूलों का नहीं रहता। दूसरी बात यह कि स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओं की एक बड़ी पीढ़ी ऐसी है जो अब भी पुराने तौर-तरीकों से बच्चों के साथ पेश आती है, और बच्चों के आज के तनाव की समझ उसे पूरी नहीं है। अधिकतर बच्चों के मां-बाप उनके लिए सामानों के इंतजाम के बाद बेफिक्र हो जाते हैं, और बच्चों के दिल-दिमाग तक उनकी पहुंच भी नहीं रहती। 
ऐसे में बच्चों को स्कूल और समाज के स्तर पर मानसिक परामर्शदाता की जरूरत है, जो कि देश में आम लोगों के लिए लगभग नामौजूद हैं। देश में आज इस तरह की पढ़ाई भी बहुत सीमित है कि ऐसे परामर्शदाता तैयार हो सकें। आज भारत के स्कूलों में किसी शिक्षक-शिक्षिका के नियमित होने के लिए यह शर्त तो लगा दी गई है कि वे बीएड जैसी पढ़ाई कर चुके हों, लेकिन स्कूलों के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं लगाई गई है कि बच्चों के लिए परामर्शदाता रहें। हमारा सीधा अनुभव यह रहा है कि मनोचिकित्सक के रूप में बड़े-बड़े शहरों में भी इतने कम विशेषज्ञ मौजूद हैं कि वहां तक गरीब की पहुंच नहीं हो पाती, और जरूरत के समय तो बिल्कुल ही नहीं हो पाती। फिर मनोचिकित्सकों के पास परामर्श देने जैसे लंबे काम के लिए समय नहीं होता और किसी भी किस्म की परेशानी या हताशा के इलाज के लिए वे सीधे दवाइयों पर उतर आते हैं। ऐसे में परामर्शदाता का एक अलग तबका रहता है, और होना चाहिए जो कि बच्चों को ठीक से देख सके। 
हम कई बार बच्चों के साथ पारिवारिक हिंसा के मामलों को लिखते हैं, कई बार बच्चों के साथ होने वाले यौन शोषण पर लिखते हैं, यौन शिक्षा की उनकी जरूरत, और कई बार बच्चों के विकास में आड़े आने वाली दूसरी बातों पर लिखते हैं। अब ठोस बात पर आएं, तो हर राज्य को यह चाहिए कि वे अपने विश्वविद्यालयों में बच्चों के परामर्शदाता बनने के ऐसे कोर्स शुरू करें जो कि मनोविज्ञान के छात्र-छात्राओं के आगे पढऩे के काम आए और ऐसी पढ़ाई के बाद के लोगों के लिए हर शहर और कस्बे के स्तर पर ऐसे पद भी बनाए जाएं जहां तैनात परामर्शदाताओं से उस शहर-कस्बे के सभी मां-बाप जाकर अपने बच्चों के बारे में बात कर सकें। भारत में बच्चों की यह धड़क भी खोलने की जरूरत है कि वे तनाव के बीच भी अपने शिक्षक-शिक्षिकाओं से जाकर बात नहीं कर पाते, और इस तरह जान दे देते हैं। कुल मिलाकर स्कूल से लेकर घर तक और पड़ोस से लेकर सरकार तक, हर तबके को बच्चों के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा और उनकी शारीरिक और मानसिक जरूरतों का ध्यान रखना पड़ेगा। यह बात तय है कि जिस देश में एक दिन में दो बच्चे अलग-अलग जगहों पर इस तरह से जान दे रहे हैं, तो उस देश में इस दिन दसियों लाख बच्चे इससे कुछ कम दर्जे के तनाव से गुजर रहे होंगे, लेकिन चूंकि वे अब तक जिंदा हैं, इसलिए उनके तनाव के बारे में कोई खबर भी नहीं बन रही। दिक्कत यह है कि जो बच्चे खबर बन रहे हैं, उनके बारे में भी हर कोई बेखबर बना हुआ है। 

जनता नारों के पार देखने की एक्सरे-निगाह पा चुकी है


संपादकीय
28 नवंबर 2012
बिहार में लालू यादव के मुकाबले बेहतर माने जा रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि अगर वे जनता को बिजली नहीं दे पाए, तो अगले बार वोट नहीं मांगेंगे। दूसरी तरफ बंगाल के सरकारी मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में हर महीने अंधाधुंध रफ्तार से छोटे बच्चों की मौत की खबरें आती हैं, और वे आंकड़े सदमा पहुंचाते हैं। इनसे अलग गुजरात में चुनाव होने जा रहे और चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि वहां पर कांगे्रस किसी कुपोषण की बात को असरदार नहीं बना पाई, और राज्य की कुल जमा तरक्की ही चुनावी मुद्दा रहने जा रही है। इस राज्य में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी दंगों में हजारों बेकसूरों के कत्ल के बाद भी दुबारा जीतकर आए थे, और तीसरी बार उन्हीं के जीतने की बात कही जा रही है। इसके पीछे एक साफ-सुथरी सरकार और भ्रष्टाचार से मुक्त सरकारी दफ्तर एक बड़ा मुद्दा है।
इन सारी बातों को देखें तो यह लगता है कि साम्प्रदायिकता या धर्मनिरपेक्षता को निकम्मेपन या खराब शासन-प्रशासन के विकल्प के रूप में नहीं रखा जा सकता। यह बात साफ है कि पश्चिम बंगाल में लगातार तीन दशक से अधिक तक वाममोर्चे की सरकार रही। और जैसा कि दुनिया भर में साफ है, कम्युनिस्ट पार्टियां गरीब के सबसे करीब रहती हैं। बंगाल में साम्प्रदायिक दंगे तो नहीं हुए, सरकार ने तीन दशक बिना किसी भ्रष्टाचार-कांड के निकाल दिए, लेकिन राज्य की जो दुर्गति हुई, उसका बचाव धर्मनिरपेक्षता नहीं कर सकती। आज कोई यह कहे कि वे गांधीवादी हैं, इसलिए उनका कम काम करना भी बर्दाश्त किया जाए, वह मुमकिन नहीं है। अलग-अलग खूबियों के अलग-अलग इस्तेमाल होते हैं। लालू यादव ने बिहार में पन्द्रह बरस लगातार राज करते हुए साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ पूरे देश में मोर्चा लिया, लेकिन उनकी अपनी सरकार, पार्टी और वे खुद भ्रष्टाचार और कुनबापरस्ती की तोहमत तले दबकर दम तोड़ गए। आज वे न बिहार की सत्ता पर काबिज हैं, और न ही देश की सत्ता में वे भागीदार हैं। और इससे देश-प्रदेश का कोई नुकसान भी नहीं हो रहा है, बिहार की हालत नीतीश कुमार के राज में बेहतर होने की खबर है। वहां पर रात-दिन होने वाले किस्म-किस्म के संगठित अपराधों की वजह से बिहार का नाम खूब बदनाम हो चुका था, और वह तस्वीर एक सत्ता बदलने से मानो रातों-रात बदल सी गई। इसलिए वहां की जनता के सामने नीतीश कुमार के पहले कार्यकाल के बाद जब फिर चुनाव का मौका आया तो उसने एनडीए में भाजपा के साथ रहते आ रहे नीतीश कुमार को फिर से चुना, उसने धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर लालू यादव को दुबारा नहीं चुना। इसी तरह देश में कई जगहों पर अब लोग धर्मनिरपेक्षता या साम्प्रदायिकता के मुद्दों से परे भी सरकारें चुनते आ रहे हैं। मतलब यह है कि अब जिंदगी के बहुत से दूसरे मुद्दे इससे अधिक मायने रखने लगे हैं, और हरे या भगवे रंग के मुकाबले चावल का सफेद रंग और दाल का पीला रंग लोगों को अधिक अहमियत वाला लगने लगा है, और वह रौशनी अधिक मायने वाली लगने लगी है जिसमें इन चीजों के रंग को देखा जा सकता है। 
मोदी या नीतीश कुमार, या ममता बैनर्जी, इनके साथ एक खूबी और जुड़ी हुई है कि इनकी निजी जिंदगी अब तक भ्रष्टाचार के आरोपों से बची हुई है। मोदी के घर पर कांगे्रस पार्टी एक ऐसा टीवी भी नहीं दिखा पा रही है जो बेनामी दौलत हो, या मोदी ने एक कार भी खरीद ली हो, ऐसा भी नहीं कहने मिल रहा है। आज जिस तरह मुंबई में एक आदर्श सोसायटी घोटाले के चलते एक के बाद एक कांगे्रस मुख्यमंत्री हटते चले गए, कांगे्रस और भाजपा के कई नेता जिसमें फंसे हुए हैं, वैसे प्रदेशों वाले देश में अगर कोई नेता निजी भ्रष्टाचार के आरोप से बचे हुए हैं, तो मतदाताओं के लिए वह बात मायने भी रखती है। इसके खिलाफ मिसाल देने के लिए लोग अनगिनत ऐसे नाम गिना सकते हैं जो लोग बुरी तरह भ्रष्ट और बदनाम हैं, लेकिन फिर भी बार-बार चुनाव जीतकर आते हैं, या घूम-फिरकर सत्ता पर आ जाते हैं। हम ईमानदारी और अच्छे शासन-प्रशासन को चुनाव जीतने का अकेला फार्मूला नहीं बता रहे। मोदी के अच्छे शासन-प्रशासन के साथ-साथ उनकी साम्प्रदायिकता भी जुड़ी रही, जुड़ी है, लेकिन उनका चुनावी गणित भी बहुसंख्यक समुदाय के वोटों के धु्रवीकरण का रहा, और उनके राज में इस बहुसंख्यक समुदाय को शिकायत की और कोई वजह भी नहीं रही। इसलिए कुल मिलाकर वे बहुसंख्यक और संतुष्ट मतदाता के बहुमत से जीतकर एक गैरधर्मनिरपेक्ष सरकार फिर बनाने जा रहे हैं। इसलिए धर्मनिरपेक्षपता या ईमानदारी एक सीमा तक राजनीतिक पार्टी या सरकार की मदद कर सकती हैं। लेकिन आज जिस तरह से ममता बैनर्जी की मनमानी और बददिमागी, तानाशाही और बुरी सरकार चल रही है, तो कोई हैरानी नहीं कि अगले चुनाव में लोग बुरी सरकार वाले गैरबददिमाग वाममोर्चे को फिर वहां जिता दें। 
हर चुनाव में कुछ अधिक खास मुद्दे होते हैं, और कुछ कम खास मुद्दे होते हैं। बिहार में नीतीश कुमार का साथ देने वाले गैरसाम्प्रदायिक वोटरों ने भी भाजपा से उनकी भागीदारी को कम खास माना, और लालू के मुकाबले बेहतर सरकार को अधिक खास माना। हर प्रदेश को अपने यहां के ऐसे मुद्दों की शिनाख्त करके काम करना चाहिए, महज चुनाव के लिए नहीं, राज्य की और लोगों की बेहतरी के लिए। और यह बेहतरी बाकी चुनावी मुद्दों के संतुलन को आखिर में बदलने की ताकत भी रखती है। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार रही, लेकिन जो तबके भाजपा के परंपरागत वोटर नहीं थे, वे भी बिजली, चावल और ऐसे कुछ दूसरे जनकल्याणकारी मुद्दों की सफलता से भाजपा के साथ आए, और दो चुनावों में साथ रहे। राजनीतिक विरोध के लिए अगर इस राज्य की विपक्षी कांगे्रस पार्टी सिर्फ नारे गढ़ेगी, तो अपने-आपको धोखे में रखेगी। मोदी के खिलाफ गुजरात में कांगे्रस का कोई नारा असरदार साबित नहीं हो रहा है, क्योंकि उनके मुद्दों को सिर्फ नारा गढऩे के हिसाब से चुना गया है। जनता नारों के पार देखने की एक्सरे-निगाह पा चुकी है।

त्रासदी का आयात


सुनील कुमार
27 नवंबर 2012
गुजरात कांगे्रस ने विधानसभा चुनावों में वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के राज में कुपोषण को साबित करने के लिए भारत सरकार के, योजना आयोग के, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों पर भरोसा करने के बजाय एक ऐसी फर्जी तस्वीर पर भरोसा किया जो कि श्रीलंका के एक बदहाल बच्चे की थी। वहां पर बाढ़ आने पर राहत शिविर में एक बच्चे की तस्वीर उसकी मां के बांहों में इंटरनेट पर पड़ी थी, उसी तस्वीर को गुजरात का कुपोषण दिखाने के लिए कांगे्रस के विज्ञापनों में छाप दिया गया। नतीजा यह हुआ कि पहले से चुनाव हारती हुई दिख रही कांगे्रस पार्टी एक बहुत शर्मनाक दिखती हालत में फंस गई। गुजरात में संपन्न तबके की बढ़ती हुई संपन्नता और राज्य के कुल आर्थिक विकास के आंकड़ों की चकाचौंध, वहां के कुपोषण की तस्वीरों को पीछे धकेलकर रख देती हैं। ऐसे में यह साबित करना अपने-आपमें कुछ मुश्किल काम था कि गुजरात में भयानक कुपोषण है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट से लेकर यूनीसेफ तक के आंकड़ों की मदद के यह काम हो सकता था, लेकिन कांगे्रस ने एक फर्जी तस्वीर से यह साबित करने की कोशिश करके इस मौके को न सिर्फ गंवा दिया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि मोदी के खिलाफ उसका प्रचार कितना फर्जी है। 
लेकिन बीती रात जब टीवी चैनलों पर इस मुद्दे पर बहस छिड़ी, और कांगे्रस पार्टी इसे विज्ञापन एजेंसी द्वारा छांटी गई एक प्रतीकात्मक फोटो साबित करने पर उतारू हो गई, तो कई लोगों को यह हैरानी हुई कि क्या प्रतीक के रूप में भी गुजरात की एक तस्वीर, कुपोषण का शिकार एक बच्चा भी कांगे्रस को वहां नहीं मिला कि उसे श्रीलंका से ऐसे प्रतीक को आयात करना पड़ा? लेकिन एक मजे की दूसरी बात इसी दौरान चर्चा में सामने आई कि इसी तरह का फर्जीवाड़ा मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2010 में ही किया था जब उनकी सरकार की तरफ से बिहार में छपवाए गए पूरे पेज के इश्तहारों में गुजरात में खुशहाल मुस्लिमों की बेहतर हालत का बखान किया गया था। इस दावे में दिक्कत यह हो गई थी कि इसमें जिन मुस्लिम लड़कियों को कम्प्यूटर पर बैठकर सीखते या काम करते दिखाया गया था, उन लड़कियों की यह तस्वीर उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ में ली गई थी। वहां के शिबली कॉलेज में कम्प्यूटर क्लास की यह तस्वीर मुमताज आलम फलाही नाम के एक पत्रकार ने खींची थी, और गुजरात में मुस्लिमों की खुशहाली साबित करने के लिए इस तस्वीर को राज्य सरकार के विज्ञापन में ले लिया गया था।
कल रात टीवी चैनलों पर बहस देखने वालों को यह हैरानी भी हुई कि कैमरे के सामने बैठे हुए गुजरात कांगे्रस के अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया तस्वीरों के मामले को अधिक क्यों नहीं कुरेद रहे हैं? और फिर इंटरनेट पर थोड़ी सी तलाश करने पर यह भी पता लग गया कि गुजरात प्रदेश कांगे्रसाध्यक्ष इसी साल ऐसे ही फर्जी मामले में फंस चुके हैं। उन्होंनेजब अपने ब्लॉग पर गुजरात के कुपोषण के बारे में लिखा तो उसके साथ गुजरात के एक बच्चे की तस्वीर भी डाली जो कि कुपोषण का शिकार बताया गया। इस पर इंटरनेट के कुछ चौकन्ना लोगों ने आनन-फानन ढूंढ निकाला कि यह बच्चा गुजरात का न होकर पूर्वी अफ्रीका का था और इसकी तस्वीर यूनीसेफ की वेबसाइट से लेकर लगा ली गई थी। इसके बारे में जब लोगों ने ट्विटर पर लिखा तो मोढवाडिया ने अपने ब्लॉग से तुरंत यह तस्वीर हटाई। लेकिन अब तक उनके ब्लॉग का स्क्रीन शॉर्ट इंटरनेट पर तैर ही रहा है, इसीलिए शायद कल रात टीवी चैनलों पर इस बारे में उनकी बोलती बंद थी।
किसी इश्तहार में किसी गलत तस्वीर का चिपक जाना कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। अखबारों में भी कभी-कभी किसी की गलत तस्वीर छप जाती है, कभी-कभी टीवी पर किसी की गलत तस्वीर दिखा दी जाती है। ऐसा एक मामला कुछ समय पहले ही आया था जब एक रिटायर्ड जज ने टाईम्सनाऊ टीवी चैनल के खिलाफ सौ करोड़ रुपये का मानहानि का दावा किया था। लेकिन सरकारी या राजनीतिक विज्ञापनों में सच से परे की ऐसी प्रतीकात्मक तस्वीरें जब झूठी जगहों से उठाकर लगा दी जाती हैं, तो फिर यही साबित होता है कि उन सरकारों के पास अपनी कोई उपलब्धि नहीं है जो उन्हें बाहर से आयात करनी पड़ रही है, या फिर उस राज्य में ऐसी कोई त्रासदी नहीं है कि विपक्ष को दूसरे देशों से त्रासदी की तस्वीरें आयात करनी पड़ रही है। केंद्र या राज्य सरकार से लेकर, उनकी विज्ञापन एजेंसियों तक, और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों तक, हर किसी के पास ऐसी गलतियों से बचने के लिए पूरी गुंजाइश होती है, पूरी क्षमता होती है, और ऐसा होना सिर्फ यही साबित करता है कि बेहतरी या बदतरी की नौबत राजनीति में इस्तेमाल का सामान होती हैं, उनसे नेताओं की कोई भावना जुड़ी हुई नहीं होती।
इससे एक बात यह भी साबित होती है कि सरकारी सत्ता से जुड़े, या विपक्ष में भी रह गए राजनीतिक दलों और नेताओं का तकलीफ भुगतने वाले तबके के साथ किसी तरह का संबंध घटते चले गया है। देश के अधिकांश राजनीतिक दलों का यही हाल है। जब संसद और विधानसभाओं में अरबपतियों और खरबपतियों की गिनती बढ़ते चलती है, तो फिर यह जाहिर है कि अपने प्रदेश में कुपोषण के शिकार लोगों तक जाना भी ऐसे नेताओं का घटते ही चले जाएगा। इश्तहारों में फर्जी तस्वीरों की इस मौजूदा चर्चा से परे भी अगर देखें तो इसी से जुड़ी हुई बात है कि नेताओं की लूट से लहूलुहान कर्नाटक का हाल यह है कि वहां कुपोषण के शिकार जिले रिकॉर्ड बना रहे हैं, आदर्श घोटाले, लवासा घोटाले वाले महाराष्ट्र में आदिवासी इलाकों में कुपोषण के अंतररराष्ट्रीय रिकॉर्ड बन रहे हैं, और इसको साबित करने के लिए हमको किसी फर्जी तस्वीर की जरूरत भी नहीं है। खुद इन राज्यों के मीडिया, इश्तहारों से परे खरी तस्वीरों में ऐसी त्रासदी को साबित करते चले रहे हैं। 
और संसद में रियायती खाना जारी है...

दुनिया में मित्तलों के हाल


संपादकीय
27 नवंबर 2012
भारतीय मूल का लंदन में बसा हुआ जो कारोबारी लक्ष्मी मित्तल दुनिया के सबसे रईस लोगों में गिना जाता है, उस कारखानेदार को फ्रांस से निकालकर बाहर कर देने की चेतावनी वहां की सरकार ने दी है। वहां के एक मंत्री ने यह सार्वजनिक बयान दिया है कि लक्ष्मी मित्त झूठ बोल रहा है और देश की बेइज्जती भी कर रहा है। यह नौबत मित्तल की इस घोषणा के बाद आई है जिसमें कंपनी ने अपने कुछ कारखाने बंद करने की बात कही है। इसके बाद फ्रांस सरकार ने कहा- फ्रांस के मंत्री ने कहा, मित्तल द्वारा 2006 से बोले जा रहे झूठ निंदनीय हैं। उन्होंने कभी अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया। मित्तल के फैसलों से वहां बीस हजार कर्मचारियों का रोजगार खत्म होने जा रहा है और फ्रांस की सरकार इसे लेकर भारी जनदबाव झेल रही है। 
इस बात से हमारा कोई अधिक लेना-देना नहीं होता अगर भारत में इन दिनों विदेशी कंपनियों के घुसने को लेकर एक तनाव बना हुआ नहीं रहता। खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश के यूपीए सरकार के फैसले के बाद अब देश में संसदीय कार्रवाई थम सी गई है, और दसियों लाख लोगों की छोटी-छोटी दुकानों पर खतरे के बादल लोगों को दिख रहे हैं। ऐसे में एक दूसरी बात भी सामने आई है। दुनियाभर में छोटे दुकानदारों को खत्म करने के लिए कुख्यात, दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा कारोबार कंपनी वॉलमार्ट ने भारत में भारती नाम की कंपनी के साथ मिलकर थोक सामानों के बाजार शुरू किए हैं। इस कंपनी पर दुनियाभर में ये आरोप लग रहे हैं कि इसने अपने कारोबार को फैलाने के लिए कई देशों में रिश्वत बांटी है और भ्रष्टाचार किया है। अभी खुद वॉलमार्ट ने अपनी एक भीतरी जांच में अपने लोगों के भ्रष्टाचार को पकड़ा है और भारत में भी इसके आला अफसर निलंबित हुए हैं। लेकिन इस खबर के आने के बाद भी भारत के सांसदों और नेताओं की नींद इस बारे में नहीं खुली है और तीन दिन पहले की इस खबर के बाद भी इस पर कोई हंगामा उस संसद में नहीं हो रहा है जहां पर विदेशी कंपनियों के भारत में खुदरा व्यापार के खिलाफ कार्रवाई थमी हुई है। कुल मिलाकर बात यह है कि अगर भारती-वॉलमार्ट  के अफसरों ने भारत के भीतर रिश्वत बांटी है, तो वह किसी न किसी सरकार के लोगों को तो मिली ही होगी। 
आज दुनियाभर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े कारखानेदारों, बड़े कारोबारियों का यही हाल है। वे अलग-अलग देशों में सरकार की नीतियों, वहां की खदानों, वहां की जमीनों, वहां के पानी-हवा, वहां के लोगों की जेब और जिंदगी, इन सबको उसी तरह से चूसते हैं जिस तरह से किसी के बदन से खून निकाला जाता है। हिन्दुस्तान में बड़े-बड़े लोगों की ऐसी ताकत कदम-कदम पर सामने आ रही है। मित्तल ने जिस तरह की वायदाखिलाफी फ्रांस में की है, वहां की सरकार से जैसा झूठ कहा है, वैसा ही आरोप बोलीविया में जिंदल पर लगा है, और कल ही किसी एक देश में भारत की कंपनी जीएमआर पर लगा है। लेकिन भारत में सरकारों की भ्रष्ट व्यवस्था के चलते हुए यह देश पूरी तरह से कारोबार-माफिया के हाथ चले जा रहा है, कभी भी न उबर पाने के लिए। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि इसी भारती-वॉलमार्ट  के बारे में हमने रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह थोक व्यापार की इजाजत पाकर यह कंपनी भारत में चिल्हर सामान बेच रही है। उस रिपोर्ट के बाद उसको सभी पार्टियों के सांसदों को भी भेजा गया, लेकिन जिंदा दुश्मन पर वार करने के बजाय राजनीतिक दल और उनके नेता-सांसद पसंद यह करते हैं कि हवा में बनी दुश्मन की तस्वीर पर वार किया जाए। हमारी रिपोर्ट छपने के महीनों बाद छत्तीसगढ़ के चेम्बर ऑफ कॉमर्स के लोगों ने जाकर राज्य सरकार से यह शिकायत की कि भारती-वॉलमार्ट थोक की इजाजत पर चिल्हर कारोबार कर रही है। लेकिन न तो केन्द्र ने और न ही राज्य ने इस पर कोई कार्रवाई की है। फ्रांस सरकार के रूख को देखकर अब कम से कम भारत की सरकारों को कुछ सोचना चाहिए, और हौसला जुटाना चाहिए। 

अमिताभ के अफसोस पर...


संपादकीय
26 नवंबर 2012
अमिताभ बच्चन ने कल अपने बेटे की फिल्म गुरू देखी और इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि इसमें अभिनय के लिए अभिषेक को कोई पुरस्कार नहीं मिला। इसके साथ ही उन्होंने शिगूफे के अंदाज में एक बात लिखकर और फिर अधूरी छोड़ दी कि वे इसे आगे बढ़ाना नहीं चाहते नहीं तो बहुत से लोगों को दिक्कत हो जाएगी। ब्लॉग और ट्विटर की मेहरबानी से अब फिल्मी सितारे किसी मीडिया के मोहताज नहीं रहे हैं, और अब मीडिया खुद ही रोजाना जाकर, घंटे दर घंटे झांककर ऐसे बड़े चर्चित लोगों की बातों को देखते रहता है। इसलिए अमिताभ बच्चन की कही हुई बात भी आज खबर बन गई, और न कही हुई बात भी खबर बन गई। 
तरह-तरह के जो पुरस्कार और सम्मान बंटते हैं, उनके बारे में हम हमेशा से यह लिखते आए हैं कि जब तक उनके पैमानों को लेकर, निर्णायकों को लेकर और चुनने की पूरी प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता न हो, तब तक तो किसी को भी कोई पुरस्कार या सम्मान नहीं लेना चाहिए। लेकिन मजे की बात यह है कि जो अमिताभ बच्चन आज पुरस्कारों के चयन के खिलाफ लिख रहे हैं, वे खुद अब तक शायद सैकड़ों पुरस्कार और सम्मान ऐसे पा चुके हैं, जिनमें से शायद ही किसी के बारे में उनको शिकायत रही हो। इसलिए आज अपने बेटे की एक फिल्म में उसके अभिनय को लेकर उनकी शिकायत पूरी तरह से नाजायज है और तर्कसंगत न होकर वह एक पिता के मन का दर्द ही अधिक है। लेकिन हम आज की बात अमिताभ बच्चन पर शुरू करके उन्हीं पर खत्म करना नहीं चाहते। आज का मुद्दा उससे अधिक बड़ा है। 
देश में केन्द्र सरकार और प्रदेशों की सरकारें हर बरस बहुत सारे सम्मान और बहुत सारे पुरस्कार बांटती हैं। इनमें बहुत से राजकीय सम्मान भी हैं जिनको लेकर कई बार यह विवाद होता है कि कुपात्र सम्मानित हो गए और सुपात्र इसके बिना मर-खप गए। पहली बात तो यह कि सरकारों को सम्मानों से परे रहना चाहिए। चूंकि सरकारें वोट पाकर सत्ता में आती हैं, और अगले चुनाव में वे फिर वोटों की मोहताज होती हैं, इसलिए किसी भी सम्मान के हकदार छांटते हुए वे अपनी विचारधारा की पसंद-नापसंदगी, जाति, धर्म, क्षेत्र जैसी बातों को अनदेखा नहीं कर सकतीं। सम्मान और पुरस्कार तय करने के लिए बने हुए निर्णायक मंडलों के स्तर पर ही सरकारें आमतौर पर अपनी पसंद की गुंजाइश बना लेती हैं और आगे चलकर ऐसे निर्णायक सरकार की मर्जी का ख्याल भी रखते हैं। हम बार-बार यह भी लिखते आए हैं कि बिना पारदर्शिता के तय होने वाले सम्मान या पुरस्कार पाने वाले लोग अपने आपको एक ऐसी कटु आलोचना के लिए सामने भी खड़ा कर देते हैं कि उनका अगर कोई महत्वपूर्ण योगदान रहा भी हो, उनमें प्रतिभा रही भी हो, तो विवाद से उसका अपमान ही होता है। दुनिया में जो दो-चार पुरस्कार और सम्मान सबसे अधिक चर्चित और प्रतिष्ठित हैं, उनमें सरकार का दखल नहीं है। नोबल पुरस्कार, फिल्मों के ऑस्कर पुरस्कार, और पत्रकारिता का पुलित्जर पुरस्कार, इनसे अधिक मशहूर और जाने-माने कोई दूसरे पुरस्कार-सम्मान नहीं हैं, लेकिन इनके पीछे सरकारें नहीं हैं। 
भारत में हम जगह-जगह देखते हैं कि सरकारें जहां-जहां इस काम में पड़ती हैं इस कदर औसत लोग पुरस्कार या सम्मान पा जाते हैं, कि जिन लोगों के नाम पर ये सम्मान रखे जाते हैं, कई मौकों पर ऊपर बैठे उन लोगों को भी मलाल होता होगा कि उनके नाम का इस्तेमाल न हुआ होता तो बेहतर होता। अमिताभ बच्चन ने आज इस मुद्दे पर चर्चा का मौका दिया, भले ही वे ऐसी आलोचना करने का कोई हक न रखते हों, इसके लिए हम उनके आभारी हैं। 

भली बातों के साथ जुड़ी बुरी बातें


26 नवंबर 2012
किसी अच्छे काम का भी क्या कोई बुरा नतीजा हो सकता है? आज की असल जिंदगी में ऐसे बहुत से मामले होते हैं जिनमें किसी अच्छी तकनीक से लेकर सरकार की किसी अच्छी योजना तक, बहुत सी बातों का बुरा नतीजा हो सकता है। और जब एक आम नजरिए से किसी जटिल या फैले हुए मुद्दे को टुकड़े-टुकड़े में देखा जाता है, तो कोई टुकड़ा अपने-आपमें बहुत भला लग सकता है, लेकिन उसके साथ के वैसे दूसरे टुकड़े उससे बिल्कुल ही अलग हकीकत बयां करने वाले हो सकते हैं। 
कुछ मिसालों के साथ अगर बात करें, तो देश भर में जगह-जगह रियायती राशन, खेती के लिए मुफ्त या रियायती बिजली के चलते हुए बहुत से लोगों का यह मानना है कि मजदूरों का या देश की अर्थव्यवस्था का उससे एक नुकसान भी हो रहा है। खेती की रियायती बिजली से छत्तीसगढ़ जैसे धान उत्पादक राज्य धरती के जितने पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे होने वाला नुकसान अभी तुरंत नहीं दिख रहा है, और हो सकता है कि यह इस राज्य में कभी भी न दिखे, और धरती पर कुल मिलाकर इसका असर पड़े। 
कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि धान की फसल के लिए जरूरी पानी इतनी आसानी से मुफ्त की बिजली से मिल जाने की वजह से, और धान के हर दाने के वाजिब दाम पर, आनन-फानन खरीद लिए जाने पर यहां के किसान किसी दूसरी फसल के बारे में कम सोच पा रहे हैं। दूसरी तरफ एक तबके का यह मानना है कि धान का सिलसिला जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में इतना मजबूत हो गया है, तो उसका दूसरा नतीजा यह हो रहा है कि धान से परे की स्थानीय और असंगठित परंपरागत फसलें, कोदो या कुटकी, या इस तरह के दूसरे मोटे अनाज अब उगाना भी बंद हो गया है, और रियायती चावल के चलते अब गरीब-आदिवासियों के खाने में  चावल से परे की विविधता भी खत्म हो रही है।
विविधता जहां भी खत्म होती है, उसके नुकसान इतनी पीढिय़ों के बाद पता लगते हैं कि तब तक इतिहास की किताबों को दीमक खा चुके रहते हैं और ऐसे नुकसान के लिए जिम्मेदार सोच भी चल बसी होती है। मोटे तौर पर यह समझने की जरूरत है कि कुदरत ने इतनी विविधता खड़ी ही न की होती अगर वह दुनिया की बेहतरी की न होती। लेकिन बात सिर्फ विविधता की नहीं है कि विविधता से परे की जाहिर तौर पर अच्छी दिखने वाली योजनाओं के कुछ बुरे नतीजे भी चार कदम पीछे चलकर आते हैं। दूसरी भी बहुत सी अच्छी बातें ऐसी होती हैं जिनके बुरे नतीजे होते हैं। 
अब जैसे देह के धंधे को लें, तो दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहे जाने वाला यह काम भारत जैसे देश में आम तौर पर लुके-छुपे चलता है। सरकार ने इस काम को गैरकानूनी और जुर्म बना रखा है, इसलिए लोगों की यह जरूरी जरूरत परदे के पीछे ही पूरी होती है। एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर जैसे छोटे शहर में भी एक संगठित और जाना-पहचाना रेडलाईट एरिया था। धंधा करने वाली महिलाएं वहीं बसी हुई थीं, उन सबकी पुलिस या सरकार को शिनाख्त भी थी, और उनसे अगर किसी को कोई बात करनी होती थी, तो जाकर बात की जा सकती थी। वह इलाका सरकार के उत्साही अफसरों ने खत्म कर दिया, क्योंकि वह कानून के खिलाफ था, लेकिन दुनिया का कोई कानून इस जरूरत को किसी भी देश में न तो खत्म कर पाया है और न ही इस धंधे को। 
आज पूरे हिंदुस्तान में देह का धंधा टेलीफोन पर चलने लगा है, और जिन शहरों में भी चकलाघर थे, उनसे परे यह काम घर बैठे या राह चलते होने लगा है। नतीजा यह हुआ है कि मोबाइल नंबरों की सहूलियत के साथ अब ऐसा ध्ंाधा करने वाली महिलाएं (हालांकि बहुत छोटी गिनती में ऐसा धंधा करने वाले आदमी भी हैं, इसलिए महज औरतों को कोसना एक किस्म से बेइंसाफी भी होगी) कानून की पकड़ से लगभग हमेशा ही बाहर रहेंगी, और उसमें हमें कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि हम इस धंधे को कानूनी बनाने के हिमायती हैं, दिक्कत यह है कि वे किसी भी इलाज या जांच से भी परे रहेंगी। 
दुनिया के जिन देशों में वेश्यावृत्ति कानूनी है, वहां पर वेश्याओं से संगठित गुंडों और पुलिस की उगाही खत्म सी हो जाती है। दूसरी तरफ वे दलालों को बड़ा हिस्सा दिए बिना खुद अपनी कमाई पाती हैं। अब यहां पर अच्छी बात के बुरे नतीजे वाली दो बातें हैं। एक तो वेश्यावृत्ति के खिलाफ जाहिर तौर पर अच्छा दिखने वाला कानून किस तरह इस धंधे में जुर्म को बढ़ावा दे रहा है, यह जाहिर है। दूसरी बात यह कि एक अच्छी तकनीक, मोबाइल फोन, की सहूलियत की वजह से अब वेश्याएं सेहत को बचाने के कार्यक्रमों की पहुंच से बाहर हो गई हैं। आज सरकार या कोई स्वास्थ्य संगठन चाहे कि वे पेशा करने वाली महिलाओं तक पहुंचकर उन्हें एड्स से बचाव के तौर-तरीके समझाएं, तो यह तबका अब हवा में घुल चुका है। 
न्यूयॉर्क टाईम्स में मुंबई की एक रिपोर्ट छपी है कि किस तरह अब वहां के बड़े पुराने और बड़े-बड़े चकलाघर धंधा खो रहे हैं क्योंकि अब देह का धंधा करने वाली महिलाएं मोबाइल फोन पर ही कहीं भी ग्राहक जुटा लेती हैं, और चकलाघर नाम की इमारत में उनकी मौजूदगी घटती चली जा रही है। 
इसका नतीजा यह हो रहा है कि ऐसी बिखरी हुई महिलाओं के बीच एड्स जैसी जानलेवा बीमारी का फैलाव अंदाज के बाहर हो गया है, बल्कि सरकारी आंकड़े भारत में एड्स को, एचआईवी को घटता हुआ भी बतलाने लगे हैं। अब सवाल यह उठता है कि संगठित चकलाघर के बिखर जाने के बाद चारों तरफ बिखरी यहां की महिलाओं में से, इस धंधे में आने वाली नई महिलाओं में से, कितनों तक सरकारी आंकड़ों की पहुंच हुई होगी? लेकिन आज का मुद्दा सिर्फ यह धंधा नहीं है, बल्कि कई अच्छी तकनीकों और योजनाओं का बुरा नतीजा भी है।
अब न नई तकनीक को रोका जा सकता, और न ही योजनाओं को उनके मामूली बुरे असर की वजह से टाला जा सकता। यह कुछ उसी तरह का है कि किसी दवा का भला असर होने के साथ-साथ उसका एक बुरा असर भी होता है, लेकिन भले असर के अधिक मायने रखने की वजह से उस बुरे असर को अनदेखा किया जाता है। मोबाइल फोन हो, या रियायती बिजली हो, या सरकार की बेहतर मजदूरी वाली योजनाएं हों, इन सबसे जो भी नुकसान हो रहे हैं, उनका अंदाज मान लें कि पहले लगा पाना मुमकिन भी नहीं था, तो भी अब इनके शुरू होने के बाद उनका अंदाज लगाना चाहिए और उनसे बचाव के रास्ते निकालने चाहिए।
अब जैसे छत्तीसगढ़ में सरकार ने करीब सौ रुपये में गरीबों को पैंतीस किलो चावल देने की योजना बनाई। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसकी वजह से गरीब तबके में शराबखोरी बढ़ी है, यह तबका निकम्मा हो गया है, मजदूरों के बाजार में या तो मजदूर मिलते नहीं, या फिर उनकी मजदूरी बहुत बढ़ गई है। हो सकता है कि इसमें से तमाम बातें कुछ या अधिक हद तक सच भी हों, लेकिन सरकार की इतनी बड़ी योजना के साथ-साथ अगर इस तबके में जागरूकता का एक अभियान भी चलता कि रियायती चावल के अलावा भी परिवार की सेहत और पढ़ाई, इलाज और बेहतरी की बहुत सी जरूरतें हैं, और गरीबों को न कोई फिजूलखर्ची करनी चाहिए और न ही कामचोरी। तो ऐसी जागरूकता से हो सकता है कि सरकार की जनकल्याण की योजनाओं का फायदा लोगों को अधिक होता, और भले कार्यक्रमों के बुरे नतीजे घटते। 
ऐसी मिसालें अनगिनत हैं। टीवी के बढ़ते हुए चैनलों के साथ-साथ हिंदी के मनोरंजक चैनलों में महिलाओं के नाम पर जैसे नुकसानदेह टीवी सीरियल एकता कपूर जैसे लोग बना रहे हैं, उससे देश की आबादी का एक हिस्सा तो दिमागी रूप से बीमार या विचलित हो ही चुका है। अब टीवी की तकनीक इसमें क्या कर सकती है? एक भली तकनीक का भी बुरा नतीजा ऐसा हो सकता है, और उससे बचाव के कुछ दूसरी रास्ते ही निकालने होंगे। किसी सरकार या समाज की दूरदर्शिता ऐसे में काम आती है कि बदलते वक्त और तकनीक के साथ-साथ खड़े होते जाते नुकसानों को कम करने की कोशिश रोजाना जारी रहे।

दारू माफिया के बाड़े जैसी गोलीबारी क्या कल संसद में भी होने लगेगी?


संपादकीय
25 नवंबर 2012
दिल्ली के कुख्यात पोंटी चड्ढा हत्याकांड में एक ऐसे कुख्यात नेता को गिरफ्तार किया गया है जो कि उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष था, और सरकारी अंगरक्षक के साथ इस हत्याकांड में शामिल पाया गया है। फरारी के बाद पुलिस ने उसे पकड़ा है और उसके ठिकाने से इस हत्याकांड में इस्तेमाल पिस्तौल भी बरामद की गई है। इस संवैधानिक पद पर सत्ता की मेहरबानी से मनोनीत होने वाले इस सुखदेव सिंह नामधारी के खिलाफ दर्जनों मामले उत्तराखंड में चल रहे थे, जिसमें से आठ मामले हत्या के थे, उसके हथियार लाइसेंस को रद्द करने की मांग कई बार की जा चुकी थी। 
यह पूरा सिलसिला सत्ता के बेजा इस्तेमाल का एक भयानक सिलसिला है। एक तरफ तो ऐसे कुख्यात व्यक्ति को इतने मामलों के चलते हुए भारतीय जनता पार्टी की उत्तराखंड सरकार ने मनोनीत किया था, और कांग्रेस सरकार ने भी आने के बाद अपराधों का ऐसा रिकॉर्ड रहते हुए इस नामधारी को हटाने के लिए कुछ नहीं किया। और तीन बरस से यह आदमी कांग्रेस सरकार के तहत भी इस संवैधानिक पद पर बना हुआ था क्योंकि कांग्रेस पार्टी हटाकर कोई आरोप झेलना नहीं चाहती थी। ऐसा लगता है कि या तो इस राज्य की जनता में ऐसे मनोनयन के खिलाफ अदालत तक जाने की जागरूकता नहीं रखती, या फिर ऐसे गुंडे-मवालियों के खिलाफ अदालत तक जाने का हौसला लोग नहीं जुटा पाते। कुल मिलाकर बात यह है कि मुजरिमों से आज भारत में शायद ही किसी पार्टी को कोई परहेज रह गया हो। कश्मीर से लेकर पश्चिम बंगाल तक, और गुजरात से लेकर उत्तर-पूर्व के राज्यों तक, सत्ता के लोग तरह-तरह के अपराध करते दिखते हैं, और हर राजनीतिक दल के प्रवक्ता ऐसे लोगों को संगठन में पद देते हुए, सरकार में पद देते हुए, चुनाव में टिकटें देते हुए इस तर्क का इस्तेमाल करते हैं कि जब तक अदालत से कोई गुनहगार साबित न हो जाए, तब तक उसे मासूम मानना ही लोकतंत्र है। 
इससे बड़ा बोगस और अलोकतांत्रिक कोई तर्क नहीं हो सकता। आज हर राजनीतिक दल के पास इतने कार्यकर्ता रहते हैं, इतने नेता रहते हैं कि वे संगठन, सत्ता और संविधान के पदों पर, चुनावी मैदान के लिए, ऐसे लोगों को छांट सकते हैं जिनके खिलाफ ऐसे मामले दर्ज न हों। अब इसी नामधारी की बात करें तो इसके खिलाफ तीन दर्जन से अधिक मामले चल रहे हैं, जिनमें हत्या, हत्या की कोशिश और डकैती जैसे मामले भी हैं। पूरे माफिया अंदाज में शराब का जो धंधा उत्तर भारत में सत्ता की भागीदारी के साथ चल रहा है, उसके बीचों-बीच अगर यह नामधारी जाकर फिर एक जुर्म में हिस्सेदार बनता है, तो इसके बाद भी कोई राजनीतिक दल उसे उम्मीदवार बनाने को तैयार हो जाएगा। हमने हिन्दुस्तान की राजनीति में जुर्म से रिश्ते के बेमिसाल मामले देखे हैं जो अलग-अलग विचारधाराओं को पसंद आते भी दिखते हैं। भारतीय जनता पार्टी का एक पुराना साथी, अकाली दल पंजाब में ऐसे लोगों को टिकट देकर संसद में लेकर आता है जिनकी अकेली खूबी यही है कि वे इंदिरा या किसी और के हत्यारे के जीवनसाथी हैं या हत्यारों के घरवाले हैं। समाजवादी पार्टी उत्तरप्रदेश से फूलनदेवी नाम की एक ऐसी भूतपूर्व डकैत को संसद लेकर आती है जिस पर दर्जनों हत्याओं का मामला था, और जिस पर यह तोहमत भी थी कि अपने पर हुए बलात्कार का हिसाब चुकता करने के लिए उसे उसने खुद खड़े रहकर बंदूक की नोंक पर दूसरे खेमे की महिलाओं से वैसे ही सार्वजनिक और सामूहिक बलात्कार करवाए थे। उप्र-बिहार में कई पार्टियां जेलों में बंद लोगों को उम्मीदवार बनाती हैं, और हथकड़ी-बेड़ी में ये लोग संसद पहुंचते हैं। इसी किस्म का हाल जगह-जगह भाजपा का, कांग्रेस का, तृणमूल कांग्रेस का, और बाकी पार्टियों का है। इस नामधारी को सारे अपराधी-रिकॉर्ड के बाद भी भाजपा ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के संवैधानिक पद पर बिठाया था मानो इस पार्टी के पास उस पूरे राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय में एक भी शरीफ नहीं बचा था। 
भारत की राजनीति से लोगों को हिकारत और नफरत हो चुकी है, और चूंकि सत्ता के बेशर्म और बेजा इस्तेमाल में सारे राजनीतिक दल एक हमाम के भीतर बिना तौलियों के घूम रहे हैं, इसलिए सबकी शर्म एक-दूसरे से खत्म हो चुकी है। आज हमको इस बात की भी तकलीफ है कि एक मासूम सामुदायिक इस्तेमाल की जगह, हमाम, को हमें मुजरिमों के मामले में एक मिसाल की तरह इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इस देश की अदालतों को दखल देकर ऐसा इंतजाम करना पड़ेगा कि मुजरिमों को ऐसी कुर्सियों पर लाने का सत्ता का हक खत्म हो, और जिस पुलिस की हवालात में ऐसे नेताओं को होना चाहिए, वह पुलिस इन मुजरिमों को सलामी देने को बेबस न हो। भारतीय लोकतंत्र में यह सिलसिला बहुत शर्मनाक है, और लोगों को जगह-जगह पार्टियों से और नेताओं से ऐसे मामलों में सवाल करने चाहिए। वर्ना वह दिन अधिक दूर नहीं है कि दारू माफिया के बाड़े में हुई गोलीबारी जैसी गोलीबारी कल संसद में भी होने लगे।

कुछ सवाल कुकुरमुत्ते ही उठा सकते हैं, बरगद नहीं


संपादकीय
24 नवंबर 2012
आज दो नई पार्टियों की चर्चा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में रहे हुए पी.ए. संगमा अब किताब छाप वाली नई राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं जिसका नाम राष्ट्रीय जनता पार्टी रखने की घोषणा उन्होंने की है। दूसरी तरफ लोग अरविंद केजरीवाल की नई पार्टी के नाम की उम्मीद सोमवार को कर रहे हैं। आने वाले चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर, और अलग-अलग प्रदेशों में भी नए राजनीतिक दल खड़े होंगे, इनमें से कुछ को चुनाव आयोग की मान्यता मिल पाएगी, और कुछ बिना मान्यता, बिना चुनाव चिन्ह मैदान में रहेंगे। ऐसे राजनीतिक दलों और उनकी चुनावी मैदान में मौजूदगी के मायने समझने की जरूरत है। 
आज जब देश के खासे बड़े हिस्से में मतदाता के सामने जो दोनों-तीनों राजनीतिक दल रहते हैं, उनके बीच नीति और सिद्धांत, साख और कार्यक्रम को लेकर कोई खास फर्क नहीं रह जाता, जब मुजरिमों के लिए तकरीबन सभी राजनीतिक दलों में एक ही किस्म का लगाव दिखता है तब मतदाता के सामने पसंद बहुत मुश्किल हो जाती है। दूसरी बात यह कि जब बड़े-बड़े संगठित दल बहुत से कमाऊ मुद्दों पर या तो एक साथ हो जाते हैं, या सत्ता के फैसलों को विपक्ष अनदेखा करने लगता है, या आम जुबान में एक नूरा-कुश्ती होने लगती है, तो जनता के सामने फिर पसंद की एक दुविधा आ खड़ी होती है, और कहीं पर लिखा जाता है कि नागनाथ और सांपनाथ में से जनता किसे चुने? ऐसा लिखने वाले अखबार वाले नाग और सांप की मासूमियत को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। ऐसे ही मौकों पर बहुत फक्कड़ किस्म के, सनकी और सिरफिरे कहे जाने वाले ऐसे अकेले उम्मीदवार या ऐसी छोटी सी पार्टी की अहमियत सामने आती है, जिसका न अधिक कुछ दांव पर लगा होता, और न ही जिसे कुछ मिलने की उम्मीद ही होती। ऐसे ही लोग इन चुनावों में कुछ असुविधा खड़ी करने वाले सवाल उठा सकते हैं, और राजनीति के संगठित भ्रष्टाचार के लिए चुनावी दौर एक मामूली सी दिक्कत खड़ी कर सकते हैं। 
अभी हम अरविंद केजरीवाल की पार्टी को इस दर्जे की पार्टी से कुछ अधिक महत्वपूर्ण इसलिए मान रहे हैं क्योंकि उन्होंने देशभर में अभूतपूर्व सवाल खड़े किए हैं, एक नए नेता और नई पार्टी के रूप मेें लोगों में एक अभूतपूर्व जिज्ञासा पैदा की है, और वे वोटों की लड़ाई में कामयाब चाहे न हों, वे सवाल खड़े करने में तो कामयाब हो ही चुके हैं। और मीडिया के बारे में इस देश के किसी राजनीतिक तबके की चाहे जो भी सोच हो, हकीकत यह है कि अब हिन्दुस्तानी मीडिया को एकमुश्त न कोई खरीद सकता, और न ही कोई इसे एकमुश्त दबा सकता। फिर मीडिया का ढांचा भी अब परंपरागत बरगद की तरह का नहीं रह गया है, और अब इसके तले हरियाली की शक्ल लिए हुए घास भी पनपने लगी है, सोशल नेटवर्किंग के मार्फत। आज इस देश में बड़े लंबे-लंबे संपादकीय लिख कर भी हमारे जैसे लोगों को जितना उत्तेजित नहीं कर सकते, जागरूक नहीं कर सकते, उतना काम फेसबुक पर कॉलेज की एक लड़की दो लाईनें लिखकर कर सकती है, कर चुकी है। इसलिए अरविंद केजरीवाल और उनका असर कुछ बरस पहले के उनके जैसे नए चुनावी-तिनके से अलग हो सकता है। हिन्दुस्तान के मीडिया इतिहास में यह पहला मौका है जब राह चलते एक फटीचर इंसान की तरह के अरविंद केजरीवाल, जब चाहें जहां चाहें, देश के सारे मीडिया को इक_ा कर सकते हैं। और उनसे हमारी कई मायनों में असहमति अलग रही, यह हकीकत है कि उनके जैसे धारदार सवाल उठाने का काम आज देश के मीडिया में भी कोई नहीं कर रहा है। 
इसलिए उनकी राजनीतिक पार्टी हो, या संगमा की पार्टी हो, इनके महत्व को कम आंकना ठीक नहीं है। हो सकता है कि ये मौसमी फूल, या मौसमी कांटे की तरह की हों, और एक चुनाव के बाद ये खत्म हो जाएं, लेकिन एक मौसम का इस्तेमाल कम नहीं होता। कुदरत ने बहुत से ऐसे कीट-पतंग बनाए हैं, पेड़-पौधे बनाए हैं, जिनकी जिंदगी बस एक मौसम की होती है, कुछ की तो कुछ दिनों की ही होती है। लेकिन उससे उनकी भूमिका कम नहीं हो जाती। इसलिए हम आने वाले चुनावी मौसम के हिसाब से भी ऐसी नई पार्टियों और ऐसे नए लोगों के आने का स्वागत करते हैं, जो कि संसद और विधानसभाओं की तस्वीरें चाहे न बदल सकें, लेकिन जो चुनावों को बाहुबलियों की कुश्ती से परे, एक अधिक लोकतांत्रिक तस्वीर बना सकें। कुछ सवाल कुकुरमुत्ते ही उठा सकते हैं, जिनको अगले मौसम में अपनी जिंदगी की कोई परवाह नहीं होती, बरगद नहीं उठा सकते जिनको अगले सौ बरस की फिक्र होती है।  (बरगद से माफी के साथ यह मिसाल)।

देश को कुछ और जवाब चाहिए


संपादकीय
23 नवंबर 2012
कल ही दो अलग-अलग मामलों में दो गंभीर आरोप सामने आए हैं। एक में मुंबई के आतंकी हमले का मुकाबला करने वाले एक कमांडो ने यह कहा कि उसे इस हमले में घायल होने के बाद न तो इलाज की सुविधा मिली और न ही उसकी बकाया रकम मिली। उसकी पेंशन भी पिछले तेरह महीनों से नहीं मिली है और बिना दस्तखत का जो प्रशस्ति पत्र उसे मिला था, उसे दस्तखत के लिए जमा करने के बाद से आज तक वह भी वापिस नहीं मिला है। चूंकि इस कमांडो का मुद्दा अरविंद केजरीवाल ने उठाया है इसलिए कुछ लोगों को यह लग सकता है कि यह सरकार के खिलाफ मुहिम का एक हिस्सा है, लेकिन जो लोग सरकारी कामकाज को करीब से जानते हैं, उनका यही अनुभव है कि किसी शहीद का परिवार हो या ऐसा कोई बहादुर हो, उनके मामलों में काम का सरकारी तौर-तरीका कोई रियायत नहीं बरतता। 
इस मामले में अभी केन्द्र सरकार और इस रिटायर्ड कमांडो के बीच बातें और सामने आएंगी, इसलिए इस विवाद के तथ्यों पर अभी हम कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन नौकरी से बाहर जाते हुए लोगों के लिए नौकरी में बचे हुए लोगों का रूख बहुत भयानक होता है। यह तो एक छोटे से अधिकारी का मामला है, बड़े-बड़े अफसर कुर्सी से बाहर होते ही, बहुत छोटे-छोटे कर्मचारियों की मेज के सामने खड़े होने को बेबस हो जाते हैं। सरकार को अपने कामकाज में सुधार करके उसमें कुछ रहमदिली लानी चाहिए ताकि उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचे हुए लोग दफ्तरों में धक्के खाने को बेबस न हों। 
दूसरी बात यह कि देश के भीतर या सरहद पर, किसी भी जगह बहादुरी दिखाने वाले लोगों के साथ एक अलग बर्ताव जरूरी है। इसके लिए नियम कायदों में कुछ रियायत की अगर जरूरत पड़े तो वह भी करना चाहिए। इसी कमांडो की बात अगर लें, तो उसके वकील का यह कहना है कि अगर मुंबई हमले में जख्मी होने के बाद उसे अनफिट करार देकर नौकरी से अलग करना ही था, तो ऐसा 9 महीनों बाद भी किया जा सकता था ताकि उसकी नौकरी पन्द्रह बरस की पूरी हो जाती, और वह पूरी पेंशन का हकदार हो जाता। आज सरकारी नौकरियों से निकलने के पहले ही बड़े-बड़े अफसर, बड़े-बड़े जज अपने लिए ऊंची कुर्सियों का इंतजाम करके रखते हैं, ऐसी रहमदिली अपने मातहत छोटे लोगों के लिए भी दिखाई जा सकती है। यह बात इसलिए भी जरूरी है कि आज भारत में जब ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोग नीच से नीच काम करते हुए पकड़ा रहे हैं, तब बहादुरी का जज्बा दिखाने वाले कुछ गिने-चुने लोगों के साथ अगर इस लोकतंत्र का बर्ताव ठीक नहीं होगा, तो ऊंची कुर्सियों से लोगों की नफरत और हिकारत बढ़ती ही चली जाएगी। केन्द्र सरकार को कल सामने आए इस आरोप को लेकर सारे तथ्य सामने रखने चाहिए क्योंकि एक बहादुर कमांडो की शिकायत अगर सही है तो देश उससे बहुत विचलित होगा। 
दिल्ली और आसपास के राज्यों में एक माफिया के अंदाज में राज करने वाले शराब कारोबारी की हत्या के बाद यह सामने आया है कि कुछ रिटायर्ड कमांडो उसके बॉडीगार्ड की तरह काम कर रहे थे। हमारा मानना है कि ऐसी नौबत के पीछे सरकार की एक अनदेखी भी रहती है, जो कि सुरक्षा कर्मचारियों, सैनिकों के रिटायरमेंट के बाद उनके लिए किसी तरह की पुनर्वास योजना नहीं बनाती। आज देश भर में कई किस्म की सुरक्षा जरूरतें हैं, इनमें सेवानिवृत्त सैनिकों और सिपाहियों के लिए काम तय हो सकते हैं जो कि वे नौकरी से बाहर आने पर भी कर सकें। कुछ ऐसे काम आज हैं भी, लेकिन ऐसे और बहुत से कामों की जरूरत है, दूसरी तरफ निजी सुरक्षा एजेंसियों में अप्रशिक्षित और संदिग्ध किस्म के लोग बहुत सारा काम पाते हैं। 
दूसरी तरफ सीएजी के एक छोटे अफसर ने कल ही यह आरोप लगाया है कि 2जी घोटाले से होने वाले संभावित नुकसान की जो सनसनीखेज रिपोर्ट देश को हंगामे में डुबाकर चल रही है, वह अंदाज सही नहीं है, और इस छोटे अफसर ने कई बार फाइलों पर ही इससे असहमति दर्ज की थी। उसका यह भी कहना है कि संसद की लोकलेखा समिति के विपक्षी अध्यक्ष, भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी से घर जाकर सीएजी के कुछ लोग मिले थे, और इस 2जी रिपोर्ट पर लोकलेखा समिति की रिपोर्ट बनाने में उन्होंने कुछ मदद भी की थी। डॉ.जोशी ने इस बात को गलत बताया है। इस मामले में भी फाइलों की जांच की जरूरत है ताकि सीएजी जैसी एक संवैधानिक संस्था के भीतर अगर किसी दुर्भावना से संभावित घाटे को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है तो सीएजी का वह रूख भी उजागर होना चाहिए। दूसरी तरफ लोकलेखा समिति एक बहुत अहमियत वाली संसदीय संस्था है और उसके बारे में कही गई बात पर भी सभी पहलुओं से तथ्य सामने आने चाहिए। सिर्फ सरकार ही कटघरे के लायक नहीं होती, लोकतंत्र की सभी संस्थाएं देश के लिए जवाबदेह होती हैं। 
कल ये दो आरोप सामने आए हैं, और इन पर सभी पक्षों को अपना पक्ष सामने रखना चाहिए। 

संसद में भावना की मौत आंकड़ों के कहकहे


संपादकीय
22 नवंबर 2012
भारतीय संसद के आज शुरू हुए सत्र को लेकर देश की जनता देख रही है कि काम कैसे-कैसे न किया जाए इसकी तैयारी चल रही है। यह तैयारी मुद्दों को लेकर कम है, इसे लेकर अधिक है कि कैसे-कैसे, किन लोगों का साथ पाया जा सकता है और कैसे दूसरे पक्ष को नीचा दिखाया जा सकता है, उसे शिकस्त दी जा सकती है। इस दौरान जनता के काम का बहुत सा संसदीय कामकाज रूका पड़ा है जिससे सौ करोड़ आम लोगों को फर्क पड़ा होता। संसद के पिछले कुछ सत्र इसी तरह तबाह हुए और इस सत्र का भी यही हाल हो सकता है। खास लोगों की कुश्ती में आम लोग गुठली हुए जा रहे हैं।
आज भारतीय संसद की जो तस्वीर देश के सामने है, वह मुद्दों को जोड़कर बनी तस्वीर नहीं है, आंकड़ों के पैबंद जोड़कर बनी हुई है। जिस तरह संविधान के बारे में कहा जाता है कि संविधान के शब्द, और संविधान की भावना, उसी तरह संसद के बारे में भी कहा जा सकता है कि संसद के मुद्दे और संसद के आंकड़े। आज भारतीय संसद आंकड़ों के सैलाब पर तैरती-उतराती दिख रही है, इसकी भावना खो गई है, इसके मुद्दे पीछे की खाली सीटों पर बैठे हैं। सामने की कुर्सियों पर आंकड़े कलफ के कड़क कपड़े पहनकर बैठे हैं, और राज कर रहे हैं।
क्या जनता सांसदों को एक गिरोहबंदी के लिए चुनती है? अगर संसद के भीतर विचारों के बजाय, बहस के बजाय महज आंकड़ों के गिरोहों का टकराव होना है, तो फिर देश में उम्मीदवार क्यों चुने जाएं? सिर्फ पार्टियों के चुनाव चिन्हों के बीच चुनावी मुकाबला हो जाए, और उसके बाद लोकसभा में भी पार्टियां उसी तरह अपने सांसद मनोनीत कर दें, जिस तरह राज्यसभा में करती हैं। उससे आंकड़ों का खेल भी आसान हो जाएगा और उससे माल्या, अंबानी अपने अमर सिंहों को अधिक सहूलियत से संसद में भेज सकेंगे, लोकसभा में भी।
आज किसी मतदान के पहले भी संसद में खेमेबाजी इतनी तगड़ी हो गई है कि मानो पूरे ही वक्त दलबदल कानून के तहत बहस हो रही हो। विचार खेमों में बंटे हुए हैं, दिल और दिमाग को पार्टी ऑफिस में छोड़कर सांसद मानो पार्टी का एजेंडा भर लेकर संसद में आते हैं। क्या लोकतंत्र के भीतर, एक अच्छी, तगड़ी, सेहतमंद, उत्पादक और सार्थक संसदीय बातचीत का यह कोई तरीका हो सकता है? संसदीय व्यवस्था की भावना में रोजाना की बहस में ऐसी किसी खेमेबंदी तो संसद बनाने वालों ने सोची भी न होगी? फिर अब तो पार्टियां कई वजहों से एक-दूसरे के साथ मिलकर सत्ता को बचाने या गिराने की कबड्डी खेलती हैं। इस टीम को बनाने में पैसों का इस्तेमाल तो एक से अधिक बार साबित हो चुका है, चर्चा यह भी रहती है कि सीबीआई और सत्ता पक्ष एक ही कबड्डी टीम में रहते हैं। लोगों का यह भी मानना रहता है कि बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के फायदे के मामलों में भी कई बार रहस्यमयी सहयोग खड़े हो जाता है।
जनता इससे थक चुकी है और अब उसकी आंखों में सांसदों की वह रियायती थाली भी खटकने लगी है जो कुपोषण के शिकार बच्चों के मुंह के निवाले छीनकर सजती है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। सांसद सदनों में बात न करें, टीवी समाचार चैनलों के स्टूडियो में बैठकर अपनी राय रखें तो फिर उन्हें रियायती खाना भी स्टूडियो से ही मिलना चाहिए। देश की जरूरतें इस तरह किनारे, हाशिए पर रहें और संसदीय बाहुबल की पंजाकुश्ती में सदन ठप पड़ा रहे यह शर्मनाक है। हम इसके लिए अभी सरकार और विपक्ष की अलग-अलग जिम्मेदारी तय नहीं कर रहे लेकिन यह नौबत शर्मनाक है।
लोग संसद को कोस-कोसकर थक चुके हैं। ऐसे देश का भरोसा सरकार और न्याय-व्यवस्था पर से भी टूटते चल रहा है। लोकतंत्र को ऐसा कमजोर बनाने का सिलसिला संसद में खत्म हो। जनता ने सांसदों को संसदीय काम के लिए चुना है, लगातार बहिष्कार किसी तरह का जनहित नहीं हो सकता।

कसाब और बाकी बातें


21 नवंबर 2012
संपादकीय
पाकिस्तान से आकर मुंबई पर आतंकी हमला करने वाले अजमल कसाब नाम के नौजवान को आज सुबह फांसी दे दी गई। भारतीय लोकतंत्र की सारी अदालतों  को पार करते हुए कसाब रहम की सारी अपीलें भी खो चुका था, और अब उसके सामने फांसी ही बची थी। एक खतरा यह था कि सरकार के राजनीतिक फैसलों के तहत अगर उसकी रहम की अर्जी पर राष्ट्रपति (मतलब सरकार) के फैसले में देर होती तो भारत-पाक, मुस्लिम, रहमदिली, जैसे कई आरोप हवा में तैरने लगते। लेकिन संसद पर हमले के मामले में फांसी पाए हुए अफजल गुरू की तरह कसाब का मामला लंबा नहीं खिंचा। लोगों को अहसास होता, उसके पहले उसका कफन-दफन भी हो गया। 
इस मौके पर, मुंबई हमले और कसाब से जुड़े हुए पहलुओं पर बात होनी चाहिए, और भारत में मौत की सजा, अदालती और सरकारी रफ्तार पर भी। भारत और पाकिस्तान के बीच के आतंकी तनाव पर भी अभी सोचना चाहिए, और इससे जुड़ा हुआ मुद्दा ही है पाकिस्तान के भीतरी हालात का।
पाकिस्तान में जब तक लोकतंत्र में फौज का बेजा दखल बने रहेगा, जब तक वहां पर कट्टरपंथी, आतंकी, धर्मांध ताकतें हावी रहेंगी, तब तक भारत पर खतरे बने ही रहेंगे। जमीनी सरहद पाकिस्तान के साथ इतनी लंबी है, और हिन्दुस्तान की अपनी समंदरी सरहद इतनी फैली हुई है, कि पाकिस्तान की ओर से आतंकी साजिशों से पूरी तरह निपटना मुमकिन भी नहीं होगा। ऐसे में पाकिस्तान के भीतरी हालात सुधारना भारत के लिए न सिर्फ जरूरी है, बल्कि फायदेमंद भी है। सरहद की चौकसी पर दोनों देशों के खरबों रूपये सालाना खर्च होते हैं और दोनों पर पीढ़ी दर पीढ़ी भूख और कुपोषण से खोखली होती चली आ रही हैं। आज अगर योरप के देशों के साथ मिलकर देखें, तो भारत-पाक तनाव में खर्चीली फिजूलखर्ची के साथ जीते हैं और योरप के दर्जन भर अलग-अलग देश, एक देश के प्रदेशों की तरह। आतंकी हमलों से बचने के लिए सरहदों से परे भी देश के भीतर जितनी महंगी चौकसी करनी पड़ती है, उस खर्च के बचाकर दोनों देश अपने लोगों की जिंदगी बेहतर बना सकते हैं। इस मामले में भारत एक बड़ा देश है, अधिक कामयाब लोकतंत्र है, और अधिक ताकतवर भी है। इसलिए उसको आगे बढ़कर पाकिस्तान में अमन के लिए मदद करनी होगी। यह बात इसलिए भी जरूरी है कि फौजी नजरिए से भी पाकिस्तान का चीन या अमरीका की जेब में रहना भारत के लिए बड़ा खतरा होगा। 
जहां तक भारत के भीतर की बात है, तो यहां पर कुछ लोग अब यह हिसाब लगाने में लगे हैं कि कसाब को फांसी काफी पहले दी जा सकती थी, उसमें देर हुई। ऐसा मानने वाले लोगों को यह समझना चाहिए कि कसाब की जिंदगी मायने नहीं रखती, भारत का एक परिपक्व लोकतंत्र बने रहना, और दिखना, मायने रखता है। कसाब को सजा देने में अगर भारत में सरकारी या अदालती हड़बड़ी की जाती, तो पाकिस्तान के खिलाफ आज तक का सबसे बड़ा मामला विश्वसनीयता खो बैठता। इसलिए भारत का इंसाफपसंद बने रहना ही जरूरी नहीं था, उसका वैसा दिखना भी जरूरी था। अंतरराष्ट्रीय समर्थन बिना आज कसाब के पीछे के उसके संभावनाओं को लेकर पाकिस्तान पर क्या दबाव बन सकता है? आज भारत की आज ऐसी अंतरराष्ट्रीय ताकत भी नहीं है कि वह पाकिस्तान पर सीधा हमला करके आतंकी मुजरिमों को खुद खत्म कर दे, जैसा कि अमरीका ने कर दिखाया। इसलिए भारत सरकार की कसाब के मामले में पूरी कार्रवाई लोकतांत्रिक, न्यायप्रिय, और गंभीर रही। ऐसा ही होना भी चाहिए।
अब एक बात रह जाती है भारत में मौत की सजा को लेकर। हम मौत की सजा के खिलाफ हैं और भारतीय कानून में इसे खत्म करना चाहिए। दुनिया सभ्य देशों में एक-एक करके इसे खत्म भी किया जा रहा है। इस हिंसक सजा को खत्म करना चाहिए। फिर सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर भी अभी बात चल रही है कि फांसी के इंतजार में लोग जेलों में पांच-दस बरस तक खड़े और पड़े रहते हैं। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के बाद देश में और कोई रास्ता नहीं रखना चाहिए। रहम की अपील का सिलसिला वोटों से चुनी गई सरकारों की मर्जी का मोहताज होता है, और यह राजनीतिक विकल्प अलोकतांत्रिक है। आज अगर पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने के नाम पर, या के लिए, कसाब की फांसी टल जाती तो क्या होता? इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ी अदालत के आखिरी फैसले के बाद किसी फेरबदल का आज का इंतजाम खत्म किया जाना चाहिए।
मुंबई हमले के मुजरिम को एक पुख्ता केस बनाकर सजा दिलवाने में भारत को कामयाबी मिली है, लेकिन इससे अधिक इस बात में मिली है कि उसने एक इंसाफपसंद मुल्क की तरह हर जरूरी लोकतांत्रिक मौके भी कसाब को दिए।

बोलने की आजादी खत्म करने वालों के लिए चुप्पी का विकल्प नहीं


20 नवंबर 2012
संपादकीय
जिन लोगों ने बनाई गई तस्वीरों में गुफा काल के आदिमानव के हाथों में पत्थर से बना हुआ हथियार देखा होगा, वे ही लोग भारत के आज के आईटी एक्ट को समझ सकते हैं। सूचना तकनीक के कानून के नाम पर इस देश में आज लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ जो चल रहा है, उससे घोषित आपातकाल के बिना ही एक आपातकाल लागू हो गया है। आज जिस प्रदेश, जिस शहर की सरकार चाहे, वह अपने यहां के इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों के खिलाफ असली या नकली शिकायत खड़ी करके उनको गिरफ्तार कर सकती है, उनको जेल भेज सकती है। और इसकी जो कुछ सबसे बड़ी मिसालें अभी सामने आई हैं, वह कांगे्रस पार्टी की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार के तहत है। वहां पर कुछ महीने पहले एक शिकायत पर एक कार्टूनिस्ट को गिरफ्तार किया गया, और फिर उस पर अदालत की लताड़ भी सरकार को मिली। मानो उससे कोई सबक न लेते हुए अब मुंबई पुलिस ने एक ऐसी युवती को गिरफ्तार किया है जिसने इंटरनेट पर फेसबुक पर यह मासूम बात लिखी थी कि बाल ठाकरे की तरह रोजाना ही लोग मुंबई में गुजरते हैं और उसके लिए मुंबई को बंद करना ठीक नहीं है। बाल ठाकरे की स्थानीय शोहरत की दहशत में सहमी हुई राज्य सरकार और उसकी मुंबई पुलिस ने आनन-फानन इस लड़की को गिरफ्तार किया, इस फेसबुक पोस्टिंग को पसंद करने वाली एक दूसरी लड़की को भी गिरफ्तार किया, और उन पर साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने की दफाएं लगाई गईं। 
यह तो अच्छा हुआ जो इस देश में आज जस्टिस काटजू नाम का सुप्रीम कोर्ट का एक रिटायर्ड जज ऐसा है जो कि प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष की हैसियत से मुंह खोलना जानता है, बोलने से परहेज नहीं करता। इसलिए पिछले कुछ मामलों की तरह ही इस बार भी जस्टिस काटजू ने खुलकर इंटरनेट पर लिखा, और महाराष्ट्र सरकार को अपनी कुर्सी से एक चि_ी लिखी। उनकी बात को हम यहां ज्यों का त्यों इसलिए दे रहे हैं क्योंकि इस संपादकीय में इन मुद्दों पर हमारे जो तर्क होते, उनमें से कई तर्क जस्टिस काटजू की चि_ी में आ गए हैं, और उन्हीं मुद्दों पर कानून की उनकी व्याख्या को हम अपने शब्दों में यहां दुहराना नहीं चाहते। 
जस्टिस काटजू द्वारा पृथ्वीराज चह्वाण को भेजे पत्र में कहा है-'दोनों युवतियों को मुंबई पुलिस ने सांप्रदायिक भावनाओं को क्षति पहुंचाने की कोशिश करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। लेकिन किसी बंद का विरोध करना किसी संप्रदायिक भावना से जुड़ा नहीं है। संविधान की धारा 19 1 ए के अन्तर्गत देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया गया है। हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में रहते है न कि किसी तानाशाही व्यवस्था वाले देश में। ऐसे में किसी भी व्यक्ति को जिसने कोई अपराध नहीं किया उसे गिरफ्तार करना धारा 341 और 342 के तहत एक अपराध है।Ó जस्टिस काटजू ने आगे लिखा है-'यदि आपको मेरे द्वारा बताये गए तथ्य सही लगते हैं तो वह तत्काल प्रभाव से दोनों युवतियों की गिरफ्तारी के आदेश देने वाले पुलिस अधिकारियों से लेकर गिरफ्तारी को अंजाम देने वाले पुलिस कर्मियों को निलंबित करें और इन सभी दोषी पुलिस वालों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर मामला दर्ज करवाया जाय। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो मैं यह मान लूंगा कि आप संविधान की शपथ के तहत लोकतांत्रिक तरीके से एक राज्य की सरकार को चलाने में असमर्थ हैं, और फिर इसके आगे कानून अपना काम करेगा।Ó
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने इसका कोई जवाब न देते हुए अपने किसी अधिकारी को यह शिकायत आगे बढ़ा दी। और इस अधिकारी ने इस बारे में जस्टिस काटजू से कोई बात करना भी मुनासिब नहीं समझा। इसका जिक्र करते हुए जस्टिस काटजू ने एक दूसरी चि_ी मुख्यमंत्री चव्हाण को लिखी जिसमें उन्होंने कहा-'कृपया इस बात की गंभीरता को समझे और इस मामले को इतने हल्के तौर पर न लें क्योंकि यहां पर स्वतंत्रता का सिद्धांत दांव पर लगा हुआ है। पूरा देश यह जानना चाहता है कि आपने क्या कार्रवाई की है। इसलिए मैं आपसे यह अनुरोध करूंगा कि कृपया मुझे तुरंत यह बताएं कि आप इस मामले में क्या कर रहे हैं। हम लोकतंत्र में जी रहे हैं या नहीं? क्या संविधान में सुनिश्चित की गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महाराष्ट्र पर लागू नहीं है? संविधान की धारा 21, जिसे की लागू रखने की संवैधानिक शपथ आपने ली है, क्या वह आपके राज्य में लागू नहीं है? कृपया यह समझ लें कि इस मामले में आपके पास चुप्पी साधे रखना एक विकल्प नहीं है। पूरा देश इस जाहिर तौर पर गैरकानूनी गिरफ्तारी के खिलाफ भड़का हुआ है। इसलिए आप मेरे इस सवाल के जवाब के मार्फत पूरे देश को यह बताएं कि फेसबुक पर एक मासूम बात लिखने पर इस युवती को क्यों गिरफ्तार किया गया है और आपने सत्ता के इस पूरी तरह बददिमाग बेजा इस्तेमाल पर ऐसा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की है?Ó
यहां से हम जस्टिस काटजू की बात के आगे कुछ दूसरे तर्क लिखना चाहते हैं। बाल ठाकरे के गुजरने पर महाराष्ट्र की सरकार और पुलिस की हड़बड़ाहट देखने के लायक थी। यह पहला मौका रहा होगा जब बिना किसी तनाव के, बिना किसी दंगे या हिंसा के सरकार की तरफ से एक महानगर के लोगों से यह कहा गया कि जब तक कोई जरूरी काम न हो, लोग अपने घरों से न निकलें। आम तौर पर उग्र रहने वाली शिवसेना ने और बाल ठाकरे के समर्थकों ने ऐसी कोई चेतावनी नहीं दी थी और न ही कोई हिंसा सड़कों पर थी। लेकिन मुंबई में बड़ी संख्या में ऐसे समर्थकों की नाराजगी से बचने के लिए सरकार ने शिवाजी पार्क नाम के मैदान पर बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार की इजाजत दी, और उसके बाद जो आसार थे उनके चलते अब वहां पर बाल ठाकरे के स्मारक की मांग सरकार के सामने रख दी गई है। दूसरी तरफ फेसबुक पर यह लिखने वाली लड़की के चाचा के अस्पताल में घुसकर सैकड़ों या दर्जनों शिवसैनिकों ने भारी तोड़-फोड़ की। 
यहां पर यह भी याद करना जरूरी है कि किस तरह पिछले दिनों एक हवाई अड्डे पर वित्त मंत्री चिदंबरम की फोटो खींचने पर एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया था। एक दूसरे व्यक्ति को चिदंबरम के बेटे के खिलाफ ट्विटर पर कुछ लिखने वाले को मुंहअंधेरे उसके घर जाकर गिरफ्तार करके लाया गया था। उस ट्वीट के बारे में हम नहीं जानते इसलिए उस पर हम अपना कोई फैसला नहीं सुनाते, लेकिन क्या यह ऐसा मामला था जिसमें पुलिस उस व्यक्ति को नींद से जगाकर गिरफ्तार करती? 
कुल मिलाकर बात यह है कि सत्ता का बर्दाश्त अब खत्म हो चला है। वह सत्ता जरूरी नहीं कि सरकार चला रही सत्ता हो, वह सत्ता किसी भी तरह के धनबल, बाहुबल, या जनबल की सत्ता हो सकती है। आज एक बड़ी दिक्कत यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के जो सबसे बड़े झंडाबरदार हिंदुस्तान में हुए, उन गांधी और नेहरू की कांगे्रस पार्टी की सरकारें आज बढ़-चढ़कर अभिव्यक्ति को कुचल रही हैं, और एक भयानक राक्षस की तरह का बनाया गया आईटी एक्ट इनके हाथों हथियार की तरह काम आ रहा है। आज लोगों को मुंह भी खोलने के पहले यह सोच लेना चाहिए कि आज आपातकाल तो लागू नहीं है, लेकिन बोलने पर भी सेंसरशिप जरूर लागू है, और खासकर इंटरनेट पर बोलने पर। कांगे्रस पार्टी ऐसे कई मामलों पर चुप्पी साधे हुए है, लेकिन  इतिहास लेखन का तकाजा है कि किसी के पास भी चुप्पी का कोई विकल्प नहीं होता। अपने ही अपराधों पर कांगे्रस की चुप्पी दर्ज होते चल रही है, ममता बैनर्जी की भी, और भी इस तरह के लोग हों तो उनकी भी।

दारू से लेकर निवाले तक पर एकाधिकार आखिर किस तरह?


19 नवंबर 2012
संपादकीय
दिल्ली में शराब के एक कारोबारी की भाई के हाथों मौत और फिर उस भागीदार भाई की भी बॉडीगार्डस् के हाथों मौत की खबर ने वहां के अखबारों में बाल ठाकरे को एक किनारे कर दिया। दिल्ली, उत्तरप्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे कई राज्यों में पॉन्टी चड्ढा नाम के शराब कारोबारी की इस तरह की सनसनीखेज मौत बहुत बड़ी खबर इसलिए भी थी कि बसपा की मायावती से लेकर समाजवादी पार्टी के नेताओं तक इस कारोबारी की ऐसी पकड़ थी कि दारू से लेकर दलिया तक उसी अकेले का एकाधिकार सरकारी कारोबार पर चलता था। अपने पिता के साथ एक दारू भ_ी के बाहर सड़क किनारे तली मछली बेचकर जिंदगी शुरू करने वाला पॉन्टी चड्ढा आज इतना बड़ा हो चुका है कि उसकी दौलत के बारे में छह हजार करोड़ से लेकर दस हजार करोड़ तक का अंदाज लगाया जा रहा है, और अनपढ़ किस्म के इस कुनबे को लेकर दुनिया भर के अखबारों में रिपोर्ट छप रही हैं।
इस मामले पर लिखने की एक वजह यह है कि इसके बहुत से पहलू हैं। हमारे अखबार के नियमित लेखक और सुप्रीम कोर्ट के कमिश्नर के प्रमुख सलाहकार बिराज पटनायक ने इस पॉन्टी चड्ढा की कंपनी को उत्तरप्रदेश में दलिया और पोषण आहार का दस हजार करोड़ का ठेका देने के बारे में पिछले दिनों रिपोर्ट दी थी कि उत्तरप्रदेश सरकार ने यह काम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के खिलाफ जाकर किया, और इसी आदमी को यह ठेका देने के लिए ठेके की शर्तों में ऐसी बातें जोड़ी गईं कि उन्हें यही अकेला पूरा कर सके। अब कुपोषण के शिकार उत्तरप्रदेश के बच्चों के दलिए के हक को भी अगर सत्ता और एक कारोबारी मिलकर इस हद तक खा लेते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट क्या चूल्हे पर हंडी चढ़ाकर खुद बच्चों के मुंह में कौर डाले?
कारोबार में तरक्की तो ठीक है, लेकिन जब सरकार के बदनाम दारू कारोबार पर देश के सबसे बड़े राज्य पर अकेले पूरा शिकंजा हो, एक पार्टी के जाने के बाद दूसरी पार्टी के राज में भी हो, तो फिर इतनी बड़ी ताकत के सामने लोकतंत्र का बौना हो जाना तय है। सड़क किनारे से अगर कोई सिर्फ सरकार के साथ धंधा करके आसमान तक पर कब्जा कर ले, तो ऐसा काम सिर्फ जमीनी लोगों के हक छीनकर ही कोई ऐसा काला बादल बन सकता है। ऐसे लोगों से सत्ता का अंतहीन घरोबा बिना सुबूत भी यह साबित करता है कि लोकतंत्र कितने में बिक रहा है।
इससे परे एक दूसरे पहलू पर भी नजर डालना ठीक है। जब छह हजार करोड़ से लेकर बीस हजार करोड़ के बीच की दौलत का बंटवारा दो-तीन लोगों में होना हो, तब भी अगर भागीदार सगे भाईयों के बीच ऐसी फिल्मी और नाटकीय हत्याएं होती हैं, तो फिर लोगों को महाभारत के भाईयों के बीच सुई की नोंक के बराबर की जमीन के बंटवारे से हुए युद्ध को भी याद करना चाहिए। और इससे हमको एक दूसरी बात यह भी याद पड़ती है कि जो लोग भाई को अधिक अहमियत देते हुए बहुत गहरे दोस्त को भाई कहते हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि भाई सरीखा दोस्त तो ठीक है, लेकिन क्या दोस्त सरीखा भाई भी उनके पास है? दुनिया का इतिहास बताता है कि जब भाईयों के बीच दीवार उठती है, तो वह हिंदुस्तान और पाकिस्तान जैसी उठती है कि क्रिकेट में जीत भी बर्दाश्त न हो। इसलिए दिल्ली के इस खून-खराबे को देखते हुए तमाम दौलतमंद भाईयों को (बहनों के बीच इतने खून-खराबे का खतरा हमको नहीं दिखता है इसलिए यहां चर्चा सिर्फ भाईयों की हो रही है), अपने हिसाब-किताब खून-खराबे की नौबत के पहले ही साफ-साफ कर लेने चाहिए। 
देश की राजधानी के इर्दगिर्द के इतने सारे राज्यों में बदनाम कारोबार में अगर कोई इतना बड़ा जागीरदार बन जाता है, तो देश की जांच एजेंसियां क्या सोती रहती हैं? इसी से ऐसी अफवाहें भी सच लगती हैं कि मरने के पहले तक इस कारोबारी का दिल्ली में भी बहुत से दिग्गज नेताओं से कारोबारी रिश्ता था।

बाल ठाकरे


संपादकीय
18 नवंबर 2012
पिछले कुछ दिनों से शिव सेना के संस्थापक मुखिया बाल ठाकरे की सेहत को लेकर चली आ रही खबरें अब श्रद्धांजलियों में बदल गई हैं। और जैसा की हिंदुस्तान में आम तौर पर होता है, गुजर गए किसी के बारे में कड़वी बात कहना बुरा मन जाता है, इसलिए आज अधिकतर पार्टियों के नेता सम्हालकर उनकी खूबियों को तलाशकर उन्हीं के बारे में बोल रहे हैं। इनमें एक बात सबसे अधिक कही जा रही है कि बाल ठाकरे के दिल में जो होता था वही उनकी जुबान पर होता था। लेकिन नेताओं और मीडिया के बड़े-बड़े लोगों के मन में आज जो है, वह उनकी जुबान पर नहीं है। आज बाल ठाकरे के बारे में उनमें से कोई बात शायद ही कही जा रही हो जो उनकी फिलासफी थी। तो आज कम से कम हम तो यहाँ उन बातों पर बात कर लें।
बाल ठाकरे की राजनीति नफरत से शुरू होकर नफरत पर ही खत्म हो गई। शुरुआत हुई मुंबई में आकर कारोबार करने वाले गुजराती और मारवाड़ी व्यापारियों का विरोध करने से, और दक्षिण भारत से आकर काम करने वाले मजदूरों और कामगारों में दहशत फैलाने से। इसे करते हुए बाल ठाकरे ने मुंबई में कम्युनिस्टों के थोड़ी सी रही पकड़ को भी खत्म किया, और  घोर क्षेत्रवाद , मराठीवाद, हिन्दुवाद को  खड़ा करते हुए उन्होंने शिव सेना नाम के एक अराजक संगठन को खड़ा किया जिसने भड़काऊ मुद्दों को लेकर हर वक्त कानून तोडऩे का काम किया। शिवसेना और बाल ठाकरे की धाक मुंबई और आस-पास के कुछ इलाकों में इतनी रही, की वहां उनके फतवे चलते रहे। पाकिस्तान की टीम क्रिकेट खेलने वहां नहीं जा सकी और अच्छे भले नामी गिरामी इतिहासकार, साहित्यकार, नाटककार, उनके लोगों के हाथों पिटते रहे। 
बाल ठाकरे खुलकर हिटलर के प्रशंसक बने रहे, और अपनी इसी सोच के चलते वे इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी के समर्थक रहे। हिटलर ने नस्लवाद की तरह बल ठाकरे हमेशा उग्र और आक्रामक हिंदुत्व को बढ़ावा देने वाले रहे, और मुसलमानों के खिलाफ वे हमेशा ही जहर उगलने वाले रहे। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाने वाले उग्र हिन्दुओं के साथ पुलिस को उसी तरह रियायत करने की अपील की थी जिस तरह पंजाब के पुलिस के कुछ लोगों ने खालिस्तानी आंदोलनकारियों के साथ की थी। जिन लोगों को बाल ठाकरे की असल जिंदगी, सोच और कम ठीक से जानने हों, उनके लिए हिन्दुस्तानी मीडिया काम नहीं आएगा। विकिपीडिया पर जाकर कोई देखे तो सारी बातें दिखेंगी। 
महाराष्ट्र की राजनीति में सता तक पहुंचने को तो लोग सही होने का सुबूत मानते हैं, उनको याद रखना चाहिए कि गुजरात दंगों में हजारों के सरकारी साजिश में हत्या के बाद भी मोदी चुनाव जीत गए थे, और बहुत से जाने माने मुजरिम भी चुनाव जीत जाते हैं। शिव सेना ने सत्ता में आने के बाद भी कानून तोडऩे के अपने तौर-तरीके नहीं बदले और उत्तर भारतीयों के खिलाफ उसकी हिंसा इस तरह जारी रही मानों मुंबई हिंदुस्तान के बाहर की कोई रियासत हो, और वहां पर ठाकरे सेनाओं का राज चलता हो। देश में साम्प्रदायिकता की सबसे अधिक बातें करने वाले लोगों में बाल ठाकरे सबसे ऊपर रहे। 
बाल ठाकरे के रिश्ते मुंबई के बड़े बड़े लोगों से रहे, बड़े-बड़े फि़ल्मी सितारे उनकी शरण में आए दिन दिखते रहे, इसलिए भी कि फिल्म निर्माण से लेकर सिनेमाघरों तक के कर्मचारी संगठनों तक शिव सेना का राज चलता है। देश की कारोबार राजधानी पर इस तरह की पकड़ के फायदे कितने हैं, उसके बिना सुबूतों के किस्से इन्टरनेट पर हैं, लेकिन बिना सुबूत की बातों पर क्या बात की जाए। 
आज देश की सरकार और महाराष्ट्र की सरकार के लोग बाल ठाकरे के अहसानमंद भी हैं कि उन्होंने संसद में सरकार को गिरने से बचाया था। इसलिए कोई भी बाल ठाकरे की खामियों की कोई चर्चा भी नहीं कर रहा। लेकिन इन बातों के बिना बाल ठाकरे का कोई मूल्यांकन नहीं हो सकता। 

लचीले लोकतंत्र में धर्म का कट्टरवादी इस्तेमाल


संपादकीय
17 नवंबर 2012
आयरलैंड में एक भारतीय महिला की मौत से कानूनों पर, सामाजिक राजनीतिक जीवन पर धर्म के दखल पर बहस एक बार फिर छिड़ गई है। दुनियाभर में इस घटना पर हुई तीखी प्रतिक्रिया के बाद आयरलैंड की सरकार ने इस मामले की जांच करवानी शुरू की है। उसने यह भी कहा है कि इस जांच का दायरा क्या होगा, यह कैसे की जाएगी, इस बारे में मरने वाली भारतीय महिला सविता हलप्पनवार के परिवार वालों से चर्चा की गई है, लेकिन आज इतनी उदारता दिखाने से क्या आयरलैंड की सरकार  धर्म की भेंट चढ़ गई एक नौजवान जिंदगी का नुकसान पूरा कर सकती है? क्या इस घटना के बाद दुनिया का एक विकसित देश कहलाता आयरलैंड अपने कानून में महिलाओं के साथ इंसाफ करने का दम भर पाएगा? क्या वह अपने देश की महिलाओं को पुरुषों जितनी ही गरिमा और समता से जीने का हक देने का दावा कर पाएगा? क्योंकि जिस धार्मिक सोच के कारण सवित हलप्पनवार को जिंदगी के लिए जरूरी होने पर भी गर्भपात की इजाजत नहीं दी गई, और उसे जान गंवानी पड़ी, उसमें  इंसान की गरिमा, ईश्वर के सामने सबकी समता और जीने के हक पर जोर दिया जाता है।
लेकिन एक जानकारी के मुताबिक गर्भपात के मसले पर दुनिया के ज्यादातर देश महिलाओं के साथ नाईंसाफी करते हंै। आधे से भी ज्यादा देशों में बलात्कार, पारिवारिक यौन शोषण,  सेहत और जीवन के गंभीर  खतरे, सामाजिक या आर्थिक, किन्हीं भी वजहों से महिलाओं को गर्भपात का फैसला करने की इजाजत नहीं होती है। राष्ट्रसंघ  इन हालात में  गर्भपात की इजाजत महिलाओं को देने की बात करता है लेकिन  सामाजिक-राजनीतिक जीवन पर धर्म की पकड़ इतनी मजबूत है कि इसमें महिलाओं के साथ नाइंसाफी करने के रास्ते खोज लिए जाते हैं- मिसालन यह कैसे तय किया जाए कि महिला का जीवन खतरे में है,या अगर महिला की जिंदगी बचाने उनकी गरिमा, उसकी समता की बात है, तो भ्रूण की जिंदगी का क्या? धार्मिक कट्टरपंथियों के आगे झुकती सरकारें हो या प्रजातंत्र में वोट की राजनीति करने को मजबूर धार्मिक सोच के दबाव में आ जाने वाली सरकारें , दोनों ही गर्भपात करवाने के महिला के हक की बलि लेते नहीं झिझकती.. आयरलैंड तो फिर धार्मिक कट्टरपंथी के लिए मशहूर देश रहा है। जहां बरसों दो ईसाई समुदायों के बीच झड़पें हुर्इं, गृह युद्ध चला है, और आज भी ईसाई  पंथों में  एक-दूसरे के प्रति, और वहां दूसरे देशों से आकर बसे लोगों के प्रति नफरत साफ देखी जा सकती है।  लेकिन जब ऐसी नफरत में जीती जनता का फायदा सरकार उठाने लगती है, तो राजनीति और सामाजिक जीवन पर धर्म और उसके सौदेबाज हावी हो जाते हंै, और जनता के मानवाधिकार  खतरे में पड़ जाते हैं। खासकर प्रजातांत्रिक देशों में धर्म और जनता के बीच का यह टकराव बहुत साफ दिखाई देता है। पिछले दिनों कोलकाता और उत्तरपूर्व भारत के  चर्चों ने  महिलाओं-युवतियों को पाश्चात्य , जिस्म  की नुमाईश करने वाले कपड़े पहनकर इतवार की प्रार्थना में गिरजाघर ना आने की ताकीद की गई। पंजाब में आतंकवाद के दिनों में महिलाओं को साड़ी पहनने या बिन्दी लगाने से मना किया जाता था। मुस्लिम महिलाओं पर हिजाब को लेकर तरह-तरह की पाबंदियां हैं ही। मिजोरम में पिछले दिनों वहां के सबसे ताकतवर गिरजे प्रेस्बिटेरियन चर्च ने युवकों को रविवार सॉकर खेलने से ही मना कर दिया क्योंकि यह उनके रविवार की प्रार्थना के आड़े आती थी। कुछ बरसों पहले मिजोरम के मुख्यमंत्री ने देशभर से आए  पत्रकारों के सामने यह कुबूला कि वहां चर्च सरकार के जिम्मे आने वाले बहुत से काम अपने तरीके से करता है। उन्होंने बताया कि इनमे ईसाई नौजवानों का एक संगठन लोगों को शराब सिगरेट जैसी बुराइयों से मुक्त करने कुछ इस तरह काम करता है जो देखने में शायद सही लगे, लेकिन उनसे लोगों के राजनीतिक और मानव अधिकारों का हनन होता है।
कानून अपने हाथ में लेकर इंसाफ करने की इजाजत लोकतंत्र  की व्यवस्था में नहीं है  इसमें कायदा तोड़कर शराब पीने वाले को सजा मिलने में देर हो सकती है। शायद सुबूतों के अभाव में वह सजा से बच भी सकता है। इस तरह की तमाम प्रक्रियाओं में बहुत सा वक्त और पैसा खर्च होने के बाद भी इंसाफ से सबको संतोष होने की कोई गरंटी नहीं होती, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी ही है। अफसोस की बात यह है कि  इंसान की गरिमा को आजादी और समता के उसके  अधिकार को अहमियत देने वाली इस व्यवस्था के लचीलेपन का फायदा उठाने के लिए निहित स्वार्थी राजनीतिज्ञ धार्मिक सोच को हथियार बनाते हंै। हाल ही में हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में बराक ओबामा के माता-पिता की शादी की वैधता पर सवाल उठाकर उन्हें नाजायज औलाद ठहराने की कोशिश की गई। राजनीतिक मकसद के लिए धार्मिक सोच  से खिलवाड़ का यह घिनौना तरीका था।  गर्भपात संबंधी कानून पर अमरीका और ब्रिटेन समेत अनेक यूरोपीय देशों में अर्से से बहस होती रही है। गर्भपात नहीं करवाने के कारण इन देशों में किशोरी माताओं की समस्या पैदा हो गई है। समलैंगिक शादियों को मान्यता देना  दुनिया के ज्यादातर देशों की सरकारों को अगर भारी पड़ता है तो केवल इसलिए  कि उन्हें प्रजा की धार्मिक सोच की चिंता होती है। वह जनता को दिमागी संकरेपन की ऐसी बातों से उबारने की मेहनत करने की जगह, धार्मिक कट्टरपंथियों के साथ  मिलकर जनता की भावनाओं का फायदा उठाने  का रास्ता ही चुनते हंै। भारत में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना राजनीतिक मकसद के लिए धर्म के बेजा इस्तेमाल की शायद सबसे बड़ी, और शर्मनाक  मिसाल है। जिसमें विदेशी हमलावरों द्वारा रामजन्म स्थान पर मस्जि़द बनाने की दलील देते हुए बरसों पुराना, दूसरे धर्म का एक ढांचा, एक निर्वाचित, संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाली सरकार की सहमति से गिराए जाने का आरोप  है। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह ने एक बार फिर कहा है कि बाबरी ढांचा उनकी सहमति से गिराया गया। सूबे  के मुखिया की ऐसी हरकत का खामियाजा इस देश ने भुगता।  बाबरी ध्वंस के बाद देश में लोगों के दिल कौमी अधार पर बंट गए और उसके बाद हुए दंगों में हजारों बे कुसूर जानें गर्इं। पाकिस्तान समेत मुस्लिम कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसे देशों से लेकर भारत जैसे उदारवादी और अमरीका, ब्रिटेन, आयरलैंड जैसे पश्चिम के विकसित देशों तक सबमें यह बात देखने को मिलती है।
यह सामाजिक जीवन पर धर्म के असर की नहीं, राजनीतिक मकसद के लिए धर्म के बेजा इस्तेमाल की मिसाल है।   वह आयरलैंड, जहां  के कॉलेजों में पढऩे दुनिया भर से विद्यार्थी आते हंै वहां की आबोहवा में महिलाओं के खिलाफ, इंसानी गरिमा के खिलाफ धर्म के नाम पर ऐसा जहर घुलना कि किसी की जान जाने की परवाह न हो,  सबके लिए एक गंभीर मुद्दा है। धर्म तो जीवन जीने का एक तरीका होना चाहिए, किसी की जान लेने का बहाना नहीं। ईसा से लेकर राम, पैगम्बर, बुद्ध,नानक, सबने इंसान में भगवान देखने, कमज़ोर, गरीब, मजलूम, मुश्किल में पड़े हुए की मदद में जान तक दे देने की बात कही है- फिर सविता हलप्पनवार से जिंदा रहने के लिए गर्भपात करवाने का हक छीनकर उसे मर जाने देने से कौन से धर्म किस  कानून की रक्षा हुई है? 

नेताओं की बेवकूफियां और बॉबी जिंदल की नसीहत


संपादकीय
16 नवंबर 2012
अमरीका में लूसियाना प्रांत के गवर्नर, रिपब्लिकन पार्टी के नेता बॉबी जिंदल ने अपनी पार्टी के नेताओं से बेवकूफाना बातें करना बंद करने को कहा है। अमरीका में राष्ट्रपति चुनावों के लिए प्रचार की शुरुआत में बराक ओबामा के हारने का डर था ,लेकिन धीरे-धीरे जिस तरह  उनकी हार जीत में बदलती गई, उसमें रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं की इन बेवकूफाना बातों का बड़ा योगदान माना जा रहा है। बॉबी जिंदल ने कहा कि रिपब्लिकन पार्टी को मतदाताओं के व्यवहार के बारे में आनन-फानन कुछ कहने से बचते हुए, उनकी अक्लमंदी की इज़्ज़त करनी चाहिए, और एक-एक  मतदाता को गंभीरता से लेना चाहिए, उसके दिल में यह भरोसा दिलाना चाहिए कि रिपब्लिकन पार्टी भविष्य के उसके सपने पूरे करेगी। उन्होंने कहा कि अब तक जो भी हुआ, अब नेताओं की, पार्टी के भीतर और बाहर बेवकूफाना बातें एक भी दिन बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
भारतीय मूल के बॉबी जिन्दल अमरीका की विपक्षी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी के बड़े नेता हंै, इसलिए अमरीकी राजनीति में उनकी कही बातें चुनाव में हारे हुए दल के आत्ममंथन के तौर पर देखी जा सकती हंै। लेकिन भारतीय  राजनीति के आज के हालात देखते हुए यह कहा जा सकता है कि बॉबी की बातें हिन्दुस्तान के ज्यादातर नेताओं के लिए भी एक नसीहत हो सकती है। अमरीका में राष्ट्रपति चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी ने देश में अल्पसंख्यकों, महिलाओं, गरीबों, यानि हर हिसाब से कमजोर तबकों के प्रति संवेदनहीनता दिखाई। रिपब्लिकन नेताओं ने ओबामा की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर टीका करते हुए कहा कि अकेली मां के बच्चे मजबूत नेता नहीं बनते। बराक ओबामा की मां के शादी के समय तीन महीने की गर्भवती होने जैसी बातें भी रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से चुनाव प्रचार में उछली गई। रिपब्लिकन पार्टी ने अमरीकी जनता की सूझ बूझ और उसकी जरूरतों को  हाशिये पर धकेलते हुए, अपने दल के राष्ट्रपति के  वाईट हाऊस में रहते शिक्षा स्वास्थ्य जैसी समाजिक सुरक्षा के बारे में उसके दिल में खौफ पैदा कर दिया। उसे लगा कि मुद्दे की बात न कर के, सनसनीखेज  बातें करके, अमरीकी कट्टरपंथ के सहारे वह पूंजीपतियों के हक में चुनाव जीत जाएगी, लेकिन बराक ओबामा ने जब कहा कि एक कुंवारी मां का बेटा, और एक काले  मजदूर की बेटी, ऊंची शिक्षा पाने का मौका मिलने पर देश के राष्ट्रपति और प्रथम महिला बन सकते हंै, तो अमरीकी जनता ने मध्यमवर्ग और गरीब जनता को शिक्षा के मौकों से वंचित रखने वाली रिपब्लिकन पार्टी की नीतियों की तरफ ओबामा का इशारा समझा। इस मुद्दे को, चुनाव लड़ रहे दो राजनीतिक दलों के नेताओं की  सोच के फर्क को समझा,और ओबामा को जिता दिया।  अब मिट रोमनी कह रहे हैं कि ओबामा को अल्पसंख्यकों ने ,विद्यार्थियों ने जिता दिया, अमरीकी जनता के 47 फीसदी लोग कभी  रिपब्लिकनों के लिए मत नहीं देंगे, वगैरह-वगैरह।  
अमरीका और भारत की संस्कृतियों में बहुत फर्क होते हुए भी, कमज़ोर तबकों, महिलाओं, गरीबों, अल्पसंख्यकों के बारे में  नेताओं  की  संवेदनहीनता दोनों  देशों में एक जैसी ही क्रूर  है। दोनों देशों के ज्यादातर नेता  जनता की अक्लमंदी और  सूचना विस्फोट के इस दौर की नजाकत समझे बगैर, जनता को अपनी जेब में पड़ा हुआ मानकर ऊल-जलूल बातें किए रहते हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं आता कि दर्जनों चैनलों और उनसे भी बड़ी तादाद में अखबारों के रहते उनकी यह संवेदनहीनता जनता के सामने उजागर होने से नहीं बचती, और जनता को उनकी दलीलों से उबकाई आने लगी है। हिमाचल के एक गांव में मोदी अगर जनता के आगे किसी नेता की पत्नी को 50 करोड़ की बताते हंै, या अगर श्रीप्रकाश जायसवाल पुरानी पत्नी को ,बासी  उबाऊ कहते हंै, या मुलायम गांव की औरतों को अनाकर्षक  कहते हंै,या सलमान खुर्शीद अगर केजरीवाल को फर्रुखाबाद से जिंदा लौटकर बताने की चुनौती देते हैं, तो यह बातें अब उन सभाओं तक सीमित नहीं रह जाती, पूरे देश में परोस दी जाती है। अगर एक चैनल और अखबार चुप रहता है, तो दूसरे खबर दे देते हैं। एक साथ इतनी बड़ी संख्या में मौजूद तमाम चैनलों अखबारों को प्रभावित कर पाना किसी नेता या दल के बस की बात अब नहीं रही। मीडिया जनता को यह बताने में कोई देर नहीं करता कि जो उसे भविष्य में ले जाने का दम भरते  हंै उनके दिल दिमाग कैसे हंै, और जनता के लिए दायित्वों के प्रति उनमें कितनी गंभीरता है। बॉबी जिंदल ने चुनावी लोकतंत्र की नब्ज पकड़ते हुए अपनी पार्टी के नेताओं से कहा है कि वह मतदाता की अक्लमन्दी के बारे में किसी मुगालते में न रहे, उसे भविष्य का भरोसा दिलाने वाली नीतियां बनाए, और वैसी ही जुबान बोले। 
भारतीय प्रजातंत्र में कितनी भी खामियां चाहे क्यों न रही हो, यहां के मतदाताओं ने समय-समय पर अपनी अक्लमंदी जरूर दिखाई है। यही वजह है कि 26/11 के मुम्बई हमलों से दहले देश को आतंकवाद का डर दिखाकर कौमी खेमों में बांटने की भाजपा की कोशिश नाकाम कर के, उसने यूपीए को एक हारा हुआ चुनाव जिता दिया। बिहार और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम, दलित  मतों को लुभाने की कांग्रेस की तमाम ताकत और कोशिशें नाकाम करते हुए उसने इन दो राज्यों में उसकी हस्ती ही मिटा दी। भले ही जनता के सवालों के जवाब देने की बजाए ज्यादातर नेता निहायत ही शर्मनाक और संवेदनहीन बयान देते रहे, लेकिन मत देने वाले ,अपने हाथ में आए मौकों का अपने हक में ज्यादा से ज्यादा उपयोग की समजह रखते हैं। उन्होंने यह उत्तर प्रदेश में रायबरेली, और अमेठी में कांग्रेस को हराकर जता दिया, जहां सोनिया गांधी के दामाद मोटरसाईकिल पर रैली निकालकर राजनीति में  अपने प्रवेश की भविष्यवाणी कर आए थे।  छत्तीसगढ़ में नक्सली धमकियों और तमाम तरह के दुष्प्रचार के बावजूद मतदाता भूखे पेट में अनाज डालने वाली सरकार को बार-बार कुर्सी सौंप रहे हैं। कट्टरपंथी, क्षेत्रवादी, दकियानूसी, झूठे  रवैये को बार-बार खारिज करके उसने अपनी अक्लमंदी  साबित की है।
लेकिन क्या फिर भी भारत के ज्यादातर नेताओं ने जनता की इस सूझबूझ का  संज्ञान  लिया है? लगता है अपनी नाकामी और भ्रष्टाचार का जवाब नहीं ढूंढ पाने वाले, जनता के मुद्दे समझ  की सूझ, या गम्भीरता , या नीयत नहीं रखने वाले देश के ज्यादातर नेताओं को ऐसी बातों के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता है। मनमोहन सिंह, सोनिया को जब तब ललकारते मोदी को अपने संयम से जवाब देने वाली सोनिया की पार्टी के नेताओं ने पिछले दिनों गुजरात में जो गंदगी फैलाई, उससे तो ऐसा नहीं लगता कि नेताओं को जनता की समझ बूझ का कोई डर है। कहा जा रहा है कि बॉबी जिंदल 2016 मे अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव लडऩे की हसरत रखते हैं।  अपने मकसद पर उनकी नजर वैसे ही टिकी है, जैसे अर्जुन की नजर मछली की आंख पर टिकी थी। इसलिए 2016 के पहले वह अपना घर आंगन यानि रिपब्लिकन पार्टी को चुस्त-दुरुस्त कर लेना चाहते हैं। बॉबी  सौ फीसदी मतदाताओं का समर्थन जीतने की हकाल करते हंै, और सच भी है, जिस दिन कोई राजनीतिक दल सौ फीसदी मतदाताओं का समर्थन जीतने का फैसला कर लेगा,  सियासी  बुराइयां, संवेदनहीनता, भ्रष्टाचार अपने आप कम होने लगेगी। जनता तो इसमें अपनी भूमिका निभाती है, कसर नेताओं के तय करने में है।  बॉबी ने जैसी नसीहतें दी हैं वैसी तो भारत के राजनीतिक दलों की चिंतन, संवाद बैठकों में कभी उभर कर नहीं आती। उल्टे यहां तो अपने नेताओं की  बेवकूफियों को स्वीकारने का दम भी  ज्यादातर राजनीतिक दल नहीं दिखा पाते। इसलिए मोदी की पत्नी के बारे में दिग्विजय के बयान पर कांग्रेस की प्रमुख कुछ नहीं कहती, और भाजपा की प्रवक्ता अपने पार्टी प्रमुख द्वारा विवेकानन्द को दाऊद जैसा बताने पर उनके बयान को सही ठहराने की कोशिश करती है, लेकिन  मीडिया की दया से यह कसर जिंदल पूरी कर दे रहे हैं। कमी इतनी ही रह जाती है कि भारत में जैसा भ्रष्टाचार है, और उसका पता लगाने, उसे रोकने के लिए सरकारी धन की जैसी फिजूलखर्ची यहां करनी पड़ती है, गुंजाईश अमरीका में नहीं है। अगर वैसा हो पाता तो शायद भारतीय नेताओं को जिंदल से इस बारे में भी कोई काम की नसीहत मिल जाती, लेकिन अगर ऐसा होता, तो भी क्या हमारे नेता उस पर अमल कर पाते?

छत्तीसगढ़ की इंजीनियरिंग शिक्षा में कोशिश करके अराजकता...


15 नवंबर 2012
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की इंजीनियरिंग शिक्षा लगातार खबरों में बनी हुई है। निजी कॉलेजों, सरकारी कॉलेजों, तकनीकी विश्वविद्यालय और राज्य सरकार का तकनीकी शिक्षा विभाग एक-एक मुद्दे पर आपस में गुत्थमगुत्था हैं। इस पूरी उलझन में विश्वविद्यालय का अपना अधिनियम, तकनीकी शिक्षा के नियम नियंत्रित करने वाली केंद्र सरकार का संगठन एआईसीटीई, राज्य सरकार के तरह-तरह के निर्देश, निजी इंजीनियरिंग विश्वविद्यालयों की नियमों को तोड़कर अंधाधुंध कमाई के लिए छात्र-छात्राओं को धोखा देने की अंतहीन कोशिशें तो हैं ही, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लगाए गए मामले, वहां से आए आदेश भी इस उलझन को बढ़ा चुके हैं। फिर कॉलेजों की पढ़ाई किसी सड़क को बनाने जैसे नहीं रहती कि छह महीने बाद भी वह शुरू हो तो भी काम चल जाता है। पढ़ाई और परीक्षा का पूरा सिलसिला तारीखों से बंधा हुआ भी होता है, और समय पर काम न होने से इस पढ़ाई के साथ-साथ आगे के इम्तिहानों पर भी असर होता है, पढ़कर निकलने वालों की नौकरी पर भी असर होता है।
अभी जो कुछ मुद्दे सामने आए हैं, उनसे ऐसा लगता है कि राज्य सरकार की तरफ से विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय के काम में लगातार ऐसी दखल दी जा रही है जो कि छात्रों के व्यापक हित की न होकर निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की दिखती है और इससे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता भी बर्बाद होते दिखती है। नतीजा यह हो रहा है कि सैकड़ों छात्र-छात्राओं को महंगे निजी कॉलेज तरह-तरह से नियम तोड़कर दाखिला भी दे रहे हैं, और फिर सैकड़ों छात्र-छात्राओं के हित का तर्क देकर विश्वविद्यालय पर यह दबाव भी डलवा रहे हैं कि वह भी नियम तोड़े। यह सिलसिला बहुत खराब इसलिए है कि किसी के दबाव में कोई भी नियम तोड़े, उसके ऊपर आज नहीं तो कल एक अदालती कार्रवाई का खतरा मंडराते ही रहेगा। और फिर यह खतरा उन्हीं पर सबसे अधिक होगा जिन्हें कि उन नियमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार बनाया गया है। देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों के लोग इस तरह के कई मुकदमे झेल रहे हैं, और जिस विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय या तकनीकी शिक्षा विभाग की चर्चा हो रही है, उसके भी कई लोग अदालती कटघरों में हैं। 
यह लिखने का ताजा मामला इसलिए बना कि अभी फिर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की गलत व्याख्या करते हुए निजी कॉलेजों में दाखिलों का महंगा दौर चालू कर दिया गया है। अभी तक की खबरें बताती हैं कि ऐसे सैकड़ों दाखिलों के पीछे तकनीकी शिक्षा विभाग से ऐसे आदेश भी निकल रहे हैं जो कि विश्वविद्यालय अधिनियम के खिलाफ हैं। राज्य शासन के ही बनाए हुए एक विश्वविद्यालय को अगर विभाग के मातहत एक निचले दर्जे के कर्मचारी की तरह रखना है, तो फिर उसका अधिनियम बनाकर उसे विश्वविद्यालय जैसी जिम्मेदारी का काम क्यों दिया गया है? निजी कॉलेज अरबों की कमाई हर बरस कर रहे हैं। ऐसी कमाई के चलते उनके दबाव बनाने के तरीके भी वजनदार हो जाते हैं। जब देश की सबसे बड़ी अदालत तक वे महंगी लड़ाई लड़ सकते हैं, लड़ते आ रहे हैं, तो फिर उनके हित में सरकारी और विश्वविद्यालय के नियमों की कुर्बानी देने की हड़बड़ी सरकार को क्यों होनी चाहिए? इन कॉलेजों का मीडिया पर भी इतना बड़ा बजट खर्च होता है कि आज इनकी खामियों को, इनके गलत कामों को उजागर करने में शायद ही किसी की दिलचस्पी बचती हो। लेकिन यह सिलसिला शिक्षा के स्तर के लिए भी ठीक नहीं है, और नियमों को तोड़कर जिन सैकड़ों लोगों को दाखिले दिए जा रहे हैं, उनके मामले कल अगर एआईसीटीई से या किसी अदालत से खारिज होते हैं, कॉलेजों पर कार्रवाई होती है, उनकी मान्यता खत्म होती है, तो इसके लिए अराजकता को बढ़ाने की आज की कोशिशें ही जिम्मेदार होंगी। 

मोबाइल, मोबाइक, और गर्लफे्रंड


संपादकीय
11 नवंबर2012
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के एक कार्यक्रम में सड़क दुर्घटनाओं में मौतों के बारे में बोलते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की कही हुई एक बात को लेकर टीवी चैनलों में चटपटी खबर बन रही है। उन्होंने कहा कि अच्छी बाईक हो, अच्छा मोबाइल हो और साथ में अच्छी गर्लफ्रेंड हो तो एक्सीडेंट तो होगा ही। उन्होंने इस वाक्य के साथ-साथ यह भी कहा कि सड़क मौतों के पिछले आंकड़ों को देखने पर पता लगता है कि जहां अच्छी सड़कें हैं वहां दुर्घटना-मौतें अधिक हो रही हैं और मरने वाले लोगों में मोटरसाइकिल चलाने वाले नौजवान अधिक है। डॉ. रमन सिंह ने सुझाव दिया कि रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाइयों को हेलमेट देकर उन्हें उसके इस्तेमाल का संकल्प दिलाएं। उनकी कही बात में कहीं भी सच्चाई की कमी नहीं है और उसका कोई भी हिस्सा लड़कियों के लिए अपमानजनक नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि लड़कियां चेहरे पर स्कार्फ बांध लेती हैं, लेकिन हेलमेट नहीं लगातीं। 
हमारे पाठकों को मालूम है कि हम अपने पन्नों पर लगातार हेलमेट जरूरी करने के लिए अभियान चलाते हैं। और लोगों को यह भी याद दिलाते हैं कि दूसरा सिर मिलना दुनिया में सिर्फ गणेशजी का विशेषाधिकार रहा है बाकी लोगों को अपने सिर को खोने पर उसकी कोई भरपाई नहीं मिल सकती। शासन के स्तर पर भी हम लगातार जगह-जगह यह सलाह देते हैं कि राज्य में हेलमेट के नियम को कड़ाई से लागू करना चाहिए। यह अच्छी बात है कि एक अस्पताल के कार्यक्रम में सड़क दुर्घटनाओं पर मुख्यमंत्री ने इस गंभीर बात को मजाक के साथ कहा और कम से कम उस वजह से वह बात खबरों के लायक समझी गई। वर्ना हेलमेट को कुछ लोग अपना दुश्मन समझते हैं, और ऐसा मानकर चलते हैं कि पुलिस इसे अपने सिर की रखवाली के लिए दूसरों के सिर पर लदवाती है। 
पुलिस और सरकार के पास दुर्घटना-मौतों के जो आंकड़े रहते हैं वे मौतों के रहते हैं। लेकिन मौत से पहले भी सिर की चोट की वजह से अनगिनत लोग जिंदगी भर के लिए तरह-तरह की तकलीफ का शिकार हो जाते हैं, और उनकी गिनती सरकार के किसी आंकड़े में नहीं आ पाती। हर सड़क-मौत के पीछे ऐसी सैकड़ों तकलीफ भरी जिंदगियां रहती हैं जिनके इलाज में उनके परिवार तबाह हो जाते हैं। ऐसे सैकड़ों लोग रहते हैं जिनकी उत्पादक जिंदगी ऐसे एक हादसे के बाद खत्म हो जाती है। और यहां पर यह चर्चा भी जरूरी है कि जब जो पार्टी विपक्ष में रहती है वह सरकार के हेलमेट के इरादे को तहस-नहस करने में इस तरह लग जाती है कि मानो लोगों के सिर दुर्घटना के बाद बच गए, तो वे धरती पर बोझ हो जाएंगे। छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि जब कांग्रेस सरकार ने हेलमेट लागू करने की कोशिश की तो भाजपा सड़क पर उतर आई थी। और अभी जब रमन सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में विपक्ष के नेताओं को सहमत कराकर हेलमेट लागू करने की कोशिश की तो राजधानी रायपुर की कांग्रेस पार्टी ने अपने खुद के नेताओं की सार्वजनिक सहमति के बाद नारा लगाया था कि हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को। 
जहां राजनीति इस कदर गैरजिम्मेदार हो, जहां पर लोग खुद के सिर के लिए बेखबर हों, वहां पर मुख्यमंत्री ने नौजवानों के बारे में यह बात कही है और हम उससे पूरी तरह सहमत हैं। उन्होंने लोगों के सिर की फिक्र की है, बहनों को याद दिलाया है कि वे राखी पर अपने भाई को हेलमेट लेकर दें, पहनने की जिद करें। और उन्होंने मोबाइल, मोबाइक और गर्लफ्रेंड के बारे में जो कहा है, उस सच को अनदेखा करने वाले लोग शायद सड़कों पर तांगों के घोड़ों की तरह आंखों को ढांके हुए चलते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे अपेक्षाकृत तंगदिल सामाजिक रीति-रिवाज वाले राज्य में भी शहरी सड़कों पर रात-दिन नौजवान लड़के-लड़कियों को मोटरसाइकिलों पर, स्कूटरों पर देखा जा सकता है, एक-दूसरे में मगन देखा जा सकता है, अकेले रहने पर मोबाइल फोन पर डूबे हुए देखा जा सकता है, और इनमें से कोई भी हेलमेट लगाए नहीं दिखता। तो मुख्यमंत्री की कही हुई बात का कौन सा हिस्सा झूठा या अपमानजनक है? अभी कल ही यह खबर थी कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अगले चार बरस वहां के राष्ट्रपति भवन वाईट हाउस में रहने वाले अपने परिवार की बेटियों को अपने बॉयफ्रेंड साथ ठहराने के हिसाब से वहां कमरों को इंतजाम किया है। जो सामाजिक हकीकत है उससे मुंह चुराकर कौन सा नेता समाज का भला कर सकता है? छत्तीसगढ़ में कुछ लोग अगर गर्लफ्रेंड शब्द को आपत्तिजनक मानते हैं तो यह उनकी समझ की कमी भी है, और हकीकत की अनदेखी भी है। 
सरकार से हमारी गुजारिश है कि बिना देर किए हुए हेलमेट को कड़ाई से लागू करना चाहिए, इससे दुर्घटनाएं बचेंगी, जिंदगियां बचेंगी और तेज रफ्तार ट्रैफिक के बीच गाड़ी चलाते मोबाइल फोन पर बात करना भी कम होगा। हम अपनी तरफ से लगातार इस बात के लिए अभियान चलाते हैं,और सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। इससे सत्तारूढ़ पार्टी को वोटों का कोई नुकसान नहीं होगा, हर अच्छा फैसला शुरू में कुछ विरोध झेलता ही है, लेकिन जब इस छत्तीसगढ़ के हर परिवार को मोटरसाइकिलों या दुपहियों पर निकले अपने लोगों की वापिसी का अधिक भरोसा होगा तो वे सरकार के इस फैसले पर उसकी तारीफ भी करेंगे। 

आधार कार्ड से सीधी रियायत से सबसे गरीबों का भला तय


संपादकीय
10 नवंबर 2012
केन्द्र सरकार दो महीने बाद एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू करने जा रही है। देश के हर नागरिक के लिए बन रहे आधार नाम के पहचान पत्र के मार्फत लोगों को केन्द्र सरकार से मिलने वाली मदद सीधे उनके बैंक खातों तक भेजना शुरू किया जाएगा। दो बरस में देश के चौदह राज्यों तक इसका विस्तार करने की घोषणा की गई है। अभी की जानकारी यह कहती है कि गरीबों, छात्र-छात्राओं को मिलने वाले तरह-तरह के अनुदान सीधे उनके बैंक खातों में चले जाएंगे। इससे एक तो लोगों को चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, दूसरा इस काम में लगने वाला वक्त घटेगा, भ्रष्टाचार घटेगा, और जरा-जरा सी मदद के लिए लोगों को कई-कई दिनों तक कतार में नहीं लगना पड़ेगा। 
देश के एक बड़े कम्प्यूटर विशेषज्ञ नंदन निलेकेणी की अगुवाई मेें आधार नाम की यह योजना चल रही है और इस पर पूरा अमल हो जाने के बाद भारतीय नागरिकों के तरह-तरह पहचान पत्र खत्म होकर इसी एक कार्ड में वे शामिल हो जाएंगे। ऐसे शायद दर्जन भर से अधिक पहचान पत्रों की अलग-अलग जरूरत इससे खत्म हो जाएगी। ये एक अलग बात है कि निजी जिंदगी की स्वतंत्रता के हिमायती बहुत से लोग इस आधार कार्ड को खतरनाक भी मान रहे हैं क्योंकि एक साथ सरकार के हाथ लोगों की निजी जिंदगी से जुड़ी इतनी अधिक जानकारी आ जाएगी कि उसका खुफिया या राजनीतिक बेजा इस्तेमाल भी किया जा सकेगा।
लोगों को नगद सब्सिडी देने के खिलाफ भी कई तरह के तर्क  हैं कि उनका बेजा इस्तेमाल सब्सिडी पाने वाले परिवारों के भीतर भी हो सकता है। लेकिन आज जब हम अलग-अलग दरवाजों के सामने खड़े हुए सैकड़ों लोगों की भीड़ जगह-जगह देखते हैं और उसमें भारी भ्रष्टाचार की शिकायतें देखते हैं, तो लगता है कि बैंक खातों में सब्सिडी सीधे पहुंचाना अधिकतर मामलों में गरीबों और जरूरतमंदों के फायदे का हो सकता है। स्कूल के बच्चे स्कॉलरशिप के लिए हर बरस एक-दो बार दिन-दिन भर बैंकों के बाहर खड़े रहते हैं। इसी तरह वृद्धावस्था पेंशन जैसी मामूली बात के लिए चल बसने के करीब पहुंच चुके लोगों की भीड़ देखते नहीं बनती। भारत में सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को ऐसा लगता है कि गरीबों के वक्त की कोई कीमत नहीं है, जबकि उनकी जिंदगी में अपने वक्त की जरूरत संपन्न तबके से कहीं अधिक होती है। उनका वक्त उनके जिंदा रहने, रोजी-रोटी जुटाने, घर का काम करने जैसी कई बातों के लिए जरूरी होता है। हिन्दुस्तान की आबादी में एक फीसदी भी लोग ऐसे नहीं होंगे जिनकी निजी जिंदगी की गोपनीयता में किसी सरकार या खुफिया एजेंसी की दिलचस्पी हो। इसलिए पहली नजर में हमको यह लगता है कि सबसे गरीब तबके को अगर बिना बीच की लूट और डकैती के उसके नाम से निकली हुई रियायत सीधे मिल सके तो इससे अच्छी कोई और बात नहीं हो सकती। 
छत्तीसगढ़ सरकार ने रियायती राशन के मामले में देश में सबसे बड़ी कामयाबी पाई है और चोरी को अधिकतम संभव सीमा तक रोका है। हमारी सरकार से यह गुजारिश है कि आधार कार्ड को लेकर उसे तेजी से काम करना चाहिए और केन्द्र सरकार में कोशिश करके इस राज्य को सबसे पहली लिस्ट में जुड़वाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि यहां के करोड़ों लोगों को फायदा मिल सके।