सरकार साख इतनी खोती है, तो यह नुकसान लोकतंत्र का


31 दिसंबर 12
संपादकीय
दिल्ली में पिछले एक बरस में अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन जिन शहरी लोगों पर टिके हुए थे, उन्हीं लोगों ने इस बार बलात्कार के खिलाफ सड़कों से लेकर इंटरनेट तक एक मुहिम चलाई। थोड़ा और दूसरी जगहों को देखें, तो इजिप्ट और सीरिया जैसे देशों में, आसपास की कुछ और जगहों पर भी इंटरनेट से आंदोलनकारी आपस में जुड़े। अमरीका तो सोशल मीडिया के मामले में बहुत आगे रहने वाले देशों में है, इसलिए वहां पर न सिर्फ वित्तीय संस्थाओं के खिलाफ चले वालस्ट्रीट पर कब्जा करने का आंदोलन, बल्कि युद्ध-विरोधी आंदोलन, और कई तरह के आंदोलन सोशल मीडिया कहे जाने वाले इंटरनेट पर चलते हैं। भारत में शिक्षित-मध्यमवर्ग के बीच सोशल मीडिया महानगरों और शहरों से नीचे उतरकर कस्बों तक पहुंच चुका है, और यही एक ऐसी जगह है जहां पर लोग देश के सबसे बड़े नेताओं, उद्योगपतियों, खिलाडिय़ों और फिल्मी सितारों से सीधे संवाद कर सकते हैं। इसलिए रात-दिन इसकी अहमियत बढ़ते चल रही है। 
भारत के राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच इस माध्यम के इस्तेमाल को लेकर जागरूकता के कई दर्जे हैं। कुछ लोग रात-दिन इसका इस्तेमाल करते हैं, और कुछ लोग अब तक इससे पूरी तरह परे हैं। लेकिन एक बात तय है कि यह आसान और सस्ती तकनीक और सुविधा, नौजवान पीढ़ी के साथ-साथ हर पीढ़ी के पढ़े-लिखे और इंटरनेट तक पहुंच वाले तबके के बीच पकड़ बनाती चल रही है। इसे सिर्फ एक कुलीन या आभिजात्य तकनीक मानना गलत होगा, क्योंकि इसका मिजाज जरूरत से कुछ अधिक लोकतांत्रिक है। ऐसे में जो लोग इससे परे हैं, वे लोग कुछ न कुछ मौके खो रहे हैं। और यह बात सिर्फ राजनीति की नहीं है, आज देश के मीडिया के तमाम बड़े-बड़े सितारे ट्विटर और फेसबुक पर अपने लिखे हुए और अपने कार्यक्रमों को रात-दिन बढ़ावा देते दिखते हैं। ऐसे में आज की यूपीए सरकार सोशल मीडिया में पिछड़ते दिख रही है। अकेले दिग्विजय सिंह थे जो कि बीच-बीच में अन्ना-बाबा-केजरीवाल के खिलाफ, आरएसएस के खिलाफ कुछ-कुछ ट्वीट करते रहते थे, लेकिन इन दिनों बाकी यूपीए सरकार और कांगे्रस पार्टी के साथ-साथ उनकी भी बोलती बंद सरीखी है। ऐसे में बिना किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता वाली नौजवान पीढ़ी भी मौजूदा हालात को लेकर मौजूदा सरकार पर पिली पड़ी है, और उसका सामना करने के लिए इस सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी की तरफ से कोई नहीं दिखता है। और यह नौबत न एक लोकतंत्र के हिसाब से ठीक है, और न ही चुनाव लडऩे वाली किसी पार्टी के हिसाब से ठीक है। 
एक तरफ तो कांगे्रस पार्टी अपने सबसे नौजवान नेता राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री की तरह देख रही है, और उसी तरह पेश भी कर रही है, दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी जैसे राहुल से एक पीढ़ी बूढ़े नेता हैं जो कि रात-दिन ट्विटर और ब्लॉग पर अपनी बात रखते चल रहे हैं। दूसरी तरफ मोदी की विचारधारा के लोग हैं जो कि इंटरनेट पर अतिसक्रिय हैं। तीसरी बात यह कि देश के बाहर गए हुए हिंदुस्तानियों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि विचारधारा के स्तर पर हिंदुत्व और भाजपा को अपने करीब पाता है। और ऐसे लोगों की टेक्नालॉजी के मोर्चे पर एक बड़ी पकड़ है, और यह बात भी यूपीए के खिलाफ जाती है। कांगे्रस-यूपीए के खिलाफ यह भी जाता है कि उनकी विश्वसनीयता जमीन के नीचे जा चुकी है, और वे देश पर राज कर रहे हैं। ऐसे में हर बुरी बात के लिए लोग उनको जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। सत्ता के खिलाफ नाराजगी का एक बड़ा नुकसान सोशल मीडिया पर यूपीए-कांगे्रस को झेलना पड़ रहा है। यह नौबत सत्ता के घर बैठने की नहीं है। उनके मुसीबत से निपटने वाले लोगों को सोशल मीडिया पर आकर, बाकी मीडिया पर आकर मुद्दों का सामना करना पड़ेगा। आज एक पखवाड़ा हो रहा है, केंद्रीय गृहमंत्री और दिल्ली की मुख्यमंत्री, इन दोनों के अलावा देश का सामना करने यूपीए-कांगे्रस का कोई भी न सड़क पर दिख रहा, और न ही सोशल मीडिया पर। कांगे्रस को तुरंत ही इस नौबत में अपने-आपको बचाने की जरूरत है, बिगड़ी हुई साख वक्त के साथ अपने-आप लौटकर नहीं आ जाएगी। 
हमारी फिक्र कांगे्रस पार्टी का भला या बुरा नहीं है, इस विशाल लोकतंत्र की सरकार अगर अपनी साख इस हद तक खोती है, तो यह नुकसान लोकतंत्र का बहुत बड़ा है। 

यह मौका राजनीति छोड़कर हैवानियत को रोकने का है



संपादकीय
30 दिसंबर 2012
बलात्कार को लेकर आज एक बार फिर लिखने का मन बिल्कुल नहीं है, लेकिन हकीकत यही है कि इस कड़वे और तकलीफदेह मुद्दे से बढ़कर, उससे हटकर, और कोई मुद्दा हमारे पाठकों के लिए अधिक मायने रखने वाला नहीं है। आज निर्भया का अंतिम संस्कार हो जाने के बाद दिल्ली शहर सर्द धुंध के बीच उबल रहा है। और कल रात मौके की नजाकत को देखते हुए प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी दोनों एयरपोर्ट पर निर्भया के शव को लेने पहुंचे हुए थे। देश के गांव-गांव में दलित-आदिवासी-गरीब लड़कियों के साथ रोजाना होने वाले ऐसे मामलों से भी अगर देश नहीं जागा था, तो भी कोई बात नहीं, आज उसके जाग जाने से अगर कानून और न्याय-व्यवस्था में कोई फेरबदल आता है तो एक शहरी निर्भया के बहाने देश में हर किसी लड़की को शायद अधिक हिफाजत मिल सकेगी, बेहतर इंसाफ मिल सकेगा। आज लेकिन इस मौके पर राजनीतिक दलों को एक दूसरे के खिलाफ हिसाब चुकता करने की नीयत को अपने पार्टी ऑफिस में छोड़कर ही सड़क और संसद में बात करनी होगी। आज यह शर्मनाक है कि एक पार्टी जब किसी एक विपक्षी पार्टी के राज के बलात्कार गिनाती है, तो किसी दूसरे राज में उसी पार्टी की सरकार के तहत ऐसे जुर्म हो रहे हैं। अगर ऐसी राजनीति जारी रही, तो महिलाओं के खिलाफ यौन-हिंसा का यह मर्दाना सिलसिला कभी नहीं थम सकेगा। आज तो समाज के तबकों से यह मांग उठनी चाहिए कि राजनीतिक दल किसी राजनीतिक विरोध की बात न करके सिर्फ कानून और न्याय-व्यवस्था को असरदार बनाने का काम करे।
हम एक बार फिर यहां दुहराना चाहेंगे कि अधिक कड़ी सजा तब तक बेमायने होगी जब तक कि आज की मौजूदा सजा दिलवाने की ताकत और क्षमता आज की न्याय-व्यवस्था में न हो। सरकारों की नीयत अदालतों को असरदार बनाने की इसलिए नहीं होती है कि सरकारें अपराधियों से, या फिर अपराधियों के हमदर्द और मददगार  तबकों से भरी हुई हैं। एक-एक करके संसद और देश की विधानसभाओं में करोड़पति-अरबपति भरते चले गए हैं, और अपनी भौतिक-ताकत के चलते इस तबके के लोग बलात्कार जैसे जुर्म के शिकार कम होते हैं। भारत में बलात्कार के आंकड़ों को देखें तो दलित-आदिवासी, गरीब-बेरोजगार, कमजोर और बीमार लड़कियां ही अधिक पिस रही हैं। ऐसे में जब संसद और विधानसभा को जमाने पहले इस तबके पर हो रहे बलात्कार पर फिक्र करनी थी, तब इन सदनों में इन तबकों के दर्द को जानने वाले लोग घटते चले गए थे। इसके साथ-साथ अफसरशाही में, न्यायपालिका में, और जांच एजेंसियों में भी कमजोर तबके के दर्द को समझने वाले लोग घट चुके हैं। यही हाल मीडिया का हुआ है, जिसमें अखबारनवीसों से लेकर मीडिया मालिक तक संपन्न तबके के हो गए हैं, और यह संपन्नता लोगों को बलात्कार से बचाती है। इस तरह देश के फैसले लेने वाले तबके का कोई वर्गहित बलात्कार रोकने से अधिक जुड़ा हुआ नहीं रह गया है।
केंद्र सरकार की आज सबसे अधिक दुर्गति इसलिए है कि वह देश की सत्ता में है। वरना दिल्ली से अधिक भयानक बलात्कार गैर यूपीए राज्यों में भी हो रहे हैं। लेकिन ऐसी राजनीतिक तंगदिली से परे सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को जाते-जाते भी कसम खाकर कानून और व्यवस्था में ऐसा फेरबदल करना चाहिए जिससे कि महिलाओं पर ऐसी ज्यादती रूक सके। अगला चुनाव जीतना और हारना बहुत छोटी बात होगी, देश की आधी आबादी को एक इंसानी हक देना अधिक बड़ी बात है। इस मामले में सरकार ने जो आयोग बनाया है उसके मुखिया जस्टिस जे.एस. वर्मा अच्छी साख वाले हैं, आज देश में बलात्कार के खिलाफ, महिलाओं पर अपराध के खिलाफ एक जागरूकता आई है, और इस माहौल के चलते हुए सभी पार्टियों को संसद और विधानसभाओं में मिलकर एक असरदार फेरबदल का कानून बनाना चाहिए। किसी एक पार्टी, किसी एक सरकार या किसी एक प्रदेश को पीटने का सिलसिला चुनाव के लिए छोडऩा चाहिए, और फिलहाल इस देश की लड़कियों और महिलाओं को ऐसी हैवानियत से बचाने की ईमानदार कोशिश सबको करनी चाहिए।



इस प्रतीकात्मक मौत को सिर्फ दिल्ली में उलझाना उसकी बेइज्जती होगी


विशेष संपादकीय
29 दिसंबर 2012
दिल्ली में गैंगरेप की शिकार लड़की आखिरकार चल बसी। उसके तन-मन और चिकित्सा विज्ञान, इन दोनों की अपनी सीमाएं थीं, और ये मिलकर भी उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाए जो कि इंसानों ने की थी। सामूहिक बलात्कार और उसके बाद भयानक किस्म की शारीरिक हिंसा, यह इंसानों के बस की ही बात है। जानवर अपनी देह की जरूरत पूरी करने के बाद इस तरह की हिंसा नहीं करते। देश में चारों तरफ बलात्कार हो रहे हैं। सरकार में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि पिछले बरस  हर बाईस मिनट पर कहीं न कहीं बलात्कार हुआ। आज जब दिल्ली में लोग यूपीए सरकार और दिल्ली प्रदेश की सरकार को फुटपाथ पर सूली पर चढ़ाने के मूड में हैं, तो पिछले दो दिनों में औसतन देश के हर प्रदेश में कई-कई बलात्कार हुए हैं। बहुत से मामले तो दिल्ली के इस मामले के मुकाबले बहुत अधिक हैवानियत के भी रहे, और वहां पर सरकारों का रूख दिल्ली पुलिस के मुकाबले बहुत अधिक भयानक भी रहा। लेकिन यह मौका एक प्रदेश का बलात्कार दूसरे प्रदेश के बलात्कार से तुलना का न होकर, इस घटना को एक प्रतीक के रूप में मानकर इस पर सोचने का है। 
देश के कुछ दलित लोगों ने, आदिवासी लोगों ने, और गांवों के लोगों ने यह भी महसूस किया कि उनकी लड़कियों के साथ रोजाना ऐसे होने वाले दर्जनों बलात्कारों  को लेकर शहरी समाज, और शहरी मीडिया इस तरह से नहीं उठ खड़े होते। लेकिन आज इस फर्क का भी मौका नहीं है, क्योंकि दिल्ली के इस हादसे को लेकर ही अगर भारत में मुर्दा सरकारें जागती हैं तो उससे आने वाले बदलाव से हो सकता है कि दलित-आदिवासी, गांव-गरीब का भी कुछ बचाव हो सके। इस मौके पर बहुत से लोग दिल्ली में प्रदर्शन की छूट को भारत में महिलाओं पर हिंसा के मुकाबले भी एक बड़ा मुद्दा मान रहे हैं, और बनाने की कोशिश में हैं। प्रदर्शन की आजादी एक अलग बात है, और प्रदर्शन से जिंदगियों का किसी तरह का नुकसान न हो, वह स्थानीय प्रशासन और पुलिस की अपनी जिम्मेदारी है। इसके बीच के टकराव को लेकर एक अलग बहस हो सकती है, लेकिन ऐसी बहस देश के कोने-कोने में हर बरस हो सकती है। आज हम तो यही चाहेंगे कि देश में महिलाओं पर हो रही हिंसा पर ही बात हो, और ऐसी कोई बेचैनी हिंसक न हो, जिसकी वजह से रौशनी महिला के जख्मों पर से हटकर कुछ दूसरे घायलों की तरफ चली जाए। 
दिल्ली की यह बहादुर लड़की एक प्रतीक के रूप में उभरी है, और उसने देश के एक ऐसे तबके को झकझोर कर रख दिया है, जो आमतौर पर शहरी सुविधाभोगी कहलाते आया है। देश का बहुत बड़ा तबका अपनी जाति की वजह से, अपनी गरीबी और अपने देहात की वजह से वैसे ही बेजुबान है। उसके जख्मों के लिए मीडिया मौजूद नहीं है, और अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं की सरकारें भी उसके लिए एक सामंती नजरिया रखती हैं। पिछले कई दिनों में इससे जुड़े मुद्दों पर लिखते हुए हमने यह लिखा है कि किस तरह इस देश में सरकार और समाज दोनों ने महिलाओं के मामले में एक हिंसक-मर्दानगी के साथ राज कर रही हैं। और जब ममता बैनर्जी जैसी महिलाएं सत्ता पर पहुंच जाती हैं, तो फिर वे भी बलात्कार की शिकार महिलाओं के खिलाफ मर्दानी-हिंसक जुबान बोलने लगती हैं। इसलिए सत्ता में महिलाओं की भागीदारी से महिलाओं का कोई अधिक भला होते हमें नहीं दिख रहा है। सत्ता अपने आपमें मर्दानगी बढ़ाने की दवा सरीखी होती है और उसके असर से कुर्सी पर बैठी महिलाएं भी अपने तबके के खिलाफ सोचने लगती हैं। 
आज का एक मुद्दा यह है कि देश में बलात्कार और महिलाओं पर यौन-हिंसा के खिलाफ कानून में कैसा फेरबदल किया जाए, ताकि ऐसी ज्यादती कम हो सके। एक दूसरा मुद्दा यह है कि बलात्कारियों को मौत की सजा दी जाए, या नहीं। जब सड़कों और चौराहों पर भीड़ चीखती होती है, तब वोटों से चुनी गई सरकारें आमतौर पर कड़वे फैसले नहीं ले पातीं। लेकिन हमारा मानना है कि कानून का फेरबदल भीड़ के सिरों को गिनकर नहीं होना चाहिए, बल्कि इस नजरिए से होना चाहिए कि उसके असर से जुर्म कम हों। जो लोग बलात्कार के लिए मौत की सजा मांग रहे हैं, उनको यह समझने की जरूरत है कि आज तो बलात्कारी पांच-सात बरसों में छूटकर बाहर आ जाते हैं। कल जब उनको पता होगा कि बलात्कार की सजा भी फांसी होगी, तो सुबूत खत्म करने के लिए उनके पास सबसे आसान तरीका होगा, बलात्कार की शिकार का कत्ल कर देना। न सुबूत, न गवाह, और न फांसी। इसलिए कानून में फांसी जोड़ देने से बलात्कार तो कम नहीं होंगे, सजा मिलना तो नहीं बढ़ेगा, कत्ल और बढ़ जाएंगे। 
आज के मौके पर अगर लोगों की नाराजगी दिल्ली की एक घटना को लेकर दिल्ली और देश पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी पर केन्द्रित होकर रह जाएगी, तो ऐसी नाराजगी का ऐसा रूख हिंसा रोकने की कोशिशों के खिलाफ जाएगी। आज इस बात को एक मुद्दे की तरह उठाने की जरूरत इसलिए है कि बलात्कार अकेली दिल्ली की दिक्कत नहीं हैं। कल और आज के अखबार ही इस खबर से भी भरे हुए हैं कि किस तरह अकाली दल के राज वाले पंजाब में एक दलित-गरीब-नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, उसके बाद महीने भर में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि उससे हिंसक और अश्लील पूछताछ की गई, और बलात्कारी खुले घूमते रहे, और उसने अपनी जान दे दी। इस पंजाब में तो कांग्रेस की सरकार नहीं है, और कल-परसों ही बलात्कार की कई घटनाओं वाले गुजरात में भी कांग्रेस की सरकार नहीं है। इसलिए दिल्ली के प्रदर्शनों को होने देने या रोकने का मुद्दा अलग है, उस पर अलग बहस होनी चाहिए, और महिलाओं पर हिंसा का मुद्दा पार्टियों से परे का है, हर पार्टी के राज में ऐसा हो रहा है। बल्कि इस मौके पर उन पार्टियों के उन नेताओं की चर्चा जरूर होनी चाहिए जो कि बलात्कार के आरोप झेलते हुए भी अपनी पार्टियों की टिकट पाते हैं और चुनाव जीतकर विधायक या सांसद बनते हैं। एक महिला मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष रहते हुए मायावती की पार्टी के कितने ही मंत्री-विधायक ऐसे जुर्म में शामिल पाए गए, और गिरफ्तार हुए। आज भी देश में दर्जनों ऐसे विधायक और सांसद हैं जो कि बलात्कार, यौन हिंसा, और महिलाओं पर ज्यादती के मामलों में कटघरों में हैं। 
फिर एक बात यह मायने रखती है कि लुंज-पुंज न्याय व्यवस्था के चलते कड़े कानून से क्या होगा? और न्याय व्यवस्था का मतलब सिर्फ अदालत नहीं है, पुलिस से शुरू होकर जेल तक का सिलसिला न्याय व्यवस्था है, और भारत के लोकतंत्र में देश की सबसे बड़ी अदालत के बाद न्याय की हत्या करने का हक भारत के राष्ट्रपति को मिला हुआ है। हमने अपने पहले पन्ने पर कुछ दिन पहले एक विशेष संपादकीय में लिखा था कि किस तरह भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने दो ऐसे बलात्कारी-हत्यारों को फांसी से माफी दी थी जिनको जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने पांच-छह बरस की बच्चियों के साथ बलात्कार-हत्या के मामले में एक सरीखी सजा सुनाई थी। इन अलग-अलग मामलों में अगर देश की हर अदालत से फांसी मिलने के बाद उस फांसी को केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति मिलकर इस तरह माफ कर सकते हैं, तो बलात्कार पर फांसी के प्रावधान को जोडऩे का क्या असर होगा? छोटी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों की जानबख्शी का ऐसा कौन सा तर्क हो सकता था कि देश की हर अदालत के फैसले को कूड़ेदान में फेंकते हुए प्रतिभा पाटिल उनकी फांसी माफ कर देती? लेकिन आज जब देश दिल्ली में प्रदर्शन के तौर-तरीकों पर रोक की बहस में उलझ रहा है, तो ऐसे उलझे हुए लोग राष्ट्रपति की ऐसी माफी के मुद्दे को उठाने की जहमत नहीं उठा सकते। 
दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, या सड़कों को रोकने पर सवाल उठाने वाले मीडिया में भी राष्ट्रपति की ऐसी माफी अनदेखी हो रही है, जबकि हमारे हिसाब से यूपीए सरकार को घेरने का इससे बड़ा शायद ही कोई दूसरा मुद्दा आज हो सकता था। और फांसी की सजा के पूरी तरह खिलाफ रहते हुए, हम यह भी जोडऩा चाहते हैं कि राष्ट्रपति की मर्जी से किसी भी तरह की माफी भारत की न्याय व्यवस्था पर जूते के बराबर है। जब सुप्रीम कोर्ट तक जाकर कोई भी मुजरिम अपना आखिरी मौका हार चुका रहता है, तब उसे वोटों पर चुनी सरकार, और उस सरकार के चुने राष्ट्रपति से माफी का मौका क्यों मिलना चाहिए? 
लेकिन आज की इस सीमित जगह में हम आज के इससे जुड़े हुए सारे मुद्दों को नहीं उठा पा रहे हैं, लेकिन उनको हमने पिछले दस-पन्द्रह दिनों में बार-बार लिखा है। यहां सिर्फ यह लिखते हुए हम बात खत्म करेंगे कि हिन्दुस्तान के जिन इंसानों को भी एक औरत ने पैदा किया है, उनको यह सोचना चाहिए कि आज के इस माहौल में  वे नए साल का जलसा किस हक और हौसले से मना सकते हैं? 

जुबान से भी बलात्कार, बाकी शरीर जरूरी नहीं


28 दिसंबर 2012
संपादकीय
राष्ट्रपति बन जाने से प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक परेशानी खत्म हो गई हो, ऐसा नहीं है। पिछले हफ्ते भर से उनकी दहलीज पर प्रदर्शन करने पहुंच रहे लोगों के साथ पुलिस के सुलूक को लेकर चारों तरफ तनाव चल ही रहा है, कि इस बीच उनके नए-नए सांसद बने बेटे ने महिलाओं की इज्जत के खिलाफ बेहूदी बातें करके पूरे परिवार को शर्मिंदा कर दिया, और पूरे देश को यह मौका दिया कि वे इस कांगे्रस सांसद को कोस सके । कुछ घंटों के भीतर ही प्रणब मुखर्जी के बेटे (उसके नाम का कोई महत्व इसलिए नहीं है कि वह सांसद इसी नाते है कि वह इनका बेटा है) पर देश के मीडिया में इतने हमले हुए, कि राष्ट्रपति की बेटी को मीडिया-कैमरों के सामने आकर अपने भाई के कहे हुए के लिए माफी मांगनी पड़ी। लेकिन महिलाओं की इज्जत पर कीचड़ उछालने वाला यह अकेला नेता नहीं है। और न ही कांगे्रस इस बारे में अकेली पार्टी है। 
पिछले कुछ दिनों के ही बयानों को देखें, तो कांगे्रस के एक मंत्री की पत्नी को लेकर भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक नरेन्द्र मोदी ने चुनावी सभा के मंच से 'पचास करोड़ की गर्लफे्रंडÓ कहा था। उनके पहले संजय निरूपम ने टीवी पर प्रसारित हो रही एक बहस के बीच भाजपा सांसद स्मृति ईरानी को 'कल तक पैसों के लिए टीवी पर ठुमके लगाने वालीÓ कहा। थोड़ा और पहले जाएं तो ममता बैनर्जी ने कोलकाता के एक चर्चित बलात्कार के बाद कहा था-'औरतों और मर्दों के मेल-जोल की वजह से बलात्कार होते हैंÓ। उन्हीं के पश्चिम बंगाल में सीपीएम के अनिल बसु ने ममता बैनर्जी के संदर्भ में कोलकाता के रेडलाईट इलाके सोनागाछी की चर्चा करते हुए कहा था-'ममता अपने किस ग्राहक से पैसे पाकर 24 करोड़ रूपये चुनाव पर खर्च कर रही हैÓ। केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल जब टीवी पर खबरों में यह बोलते हुए दिखे -'नई-नई जीत, और नई-नई शादी का अपना अलग महत्व होता है। जैसे-जैसे समय बीतेगा, जीत की यादें पुरानी होती जाएंगी। जैसे-जैसे समय बीतता है, पत्नी पुरानी होती जाती है, वह मजा नहीं रह जाता हैÓ। मानो समाजवादी लोग महिला के खिलाफ अश्लील और गंदी बातें कहने में पीछे रहना नहीं चाहते, एनडीए के संयोजक शरद यादव ने महिला आरक्षण विधेयक को लेकर कहा कि इससे सिर्फ परकटी (छोटे बालों वाली) महिलाओं को फायदा होगा। मुलायम सिंह यादव ने महिला आरक्षण के बारे में शरद यादव किस्म की बातें करते हुए कहा था-'केवल बड़े-बड़े घरों की लड़कियां और महिलाएं ऊपर जा सकती हैं...याद रखना... आपको मौका नहीं मिलेगा... हमारे गांव की महिला में आकर्षण इतना नहीं है...Ó। जब पूरा देश बलात्कार की आग में जल रहा है तब आंध्र के प्रदेश कांगे्रसाध्यक्ष बोत्सा सत्यनारायण ने बयान दिया-'चूंकि इंडिया को आधी रात को आजादी मिली थी, उसका यह मतलब नहीं है कि महिलाएं अंधेरा होने के बाद बाहर घूमने की हिम्मत करेंÓ। गोवा के भूतपूर्व मंत्री दिगंबर कामत ने महिला आरक्षण विधेयक के बारे में कहा था-'महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए। राजनीति आप लोगों का दिमाग खराब कर देगी। महिलाओं का समाज को बदलने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। उनको अगली पीढ़ी को बनाने की तरफ देखना चाहिएÓ। मानो वामपंथी अब भी सीखना नहीं चाहते, कल पश्चिम बंगाल में सीपीएम के भूतपूर्व मंत्री अनीसुर रहमान ने कहा-'ममता बैनर्जी ने 24 परगना से रेप पीडि़ता को मंत्रालय बुलवाया था। वह तो समाज से बहिष्कृत लड़की थी। ममता को कोई अच्छी लड़की लाना चाहिए था। मुझे लगता है कि ममता से अच्छी लड़की नहीं हो सकती है। मैं बीस हजार रुपये के साथ कुछ मैडल भी दे सकता हूं। ममता रेप के लिए कितना चार्ज लेंगी?Ó। 
इनमें से अधिकतर बातों को हम खबरों में छापना पसंद नहीं करते, लेकिन हमारे छापे बिना भी इन दिनों टीवी की खबरों में लोग जितनी गंदी बात है, उसके उतने ही रिपीट देख चुकी रहती है, इसलिए उनमें से कुछ बातों को हमने मिसाल की तरह यहां पर रखा है ताकि लोग जान सकें कि उनके नेता किस कदर गंदे और घटिया हैं, और उनके लिए देश की तमाम पार्टियों में, वामपंथियों सहित, भारतीय संस्कृति वाली भाजपा सहित, कितनी बड़ी जगह है। हिंदुस्तान के न सिर्फ मर्द नेता बल्कि महिला नेता भी ओछी बातें करने में पीछे नहीं हैं। और जब देश के जख्म बिल्कुल हरे हैं, रिस रहे हैं, तब भी लोग नमक की तरह अपने बयान उन पर छिड़क रहे हैं। 
यह करते हुए भारत के नेता देश के कानून और चिकित्सा विज्ञान दोनों को गलत साबित कर रहे हैं। इन दोनों ने बलात्कार के जितने तरीके बताए हैं, उनसे ऊपर जाकर भारत के नेता यह साबित कर रहे हैं कि वे अपनी जुबान से भी बलात्कार कर सकते हैं, उन्हें बाकी शरीर की जरूरत इस काम के लिए नहीं रहती।

केंद्र शिकंजा ढीला करके, राज्यों को योजना बनाने दे


27 दिसंबर 2012
संपादकीय
राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री के साथ देश के मुख्यमंत्रियों की गंभीर नीतियों पर बातचीत केंद्र-राज्य संबंधों के पुराने चले आ रहे ढर्रे में फेरबदल की जरूरत से भरी रही। अभी हमारे पास छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का भाषण ही आया है, और हम उसी को बुनियाद बनाकर इस बारे में लिख रहे हैं। यह बात यह है कि बहुत से राज्यों ने केंद्र सरकार से अधिक अधिकारों की मांग की होगी, लेकिन छत्तीसगढ़ ने इस बारे में जो तर्क रखे हैं, वे वजनदार हैं और केंद्र सरकार को पूरे देश के बारे में इन बातों को लेकर सोचना चाहिए। 
भारत के संघीय ढांचे में केंद्र सरकार बहुत से अधिकार अपने पास रखती है, जिसमें कई तरह के टैक्स वह सीधे वसूलती है और फिर इस रकम से देश भर के लिए तरह-तरह की योजनाओं के तहत बजट देती है। ऐसा इसलिए भी जरूरी होता है कि देश के हर प्रदेश की आर्थिक संभावनाएं एक सी नहीं होतीं, और सबका बराबर विकास करने के लिए इसी टैक्स में से किसी राज्य को कम और किसी राज्य को अधिक रकम दी जाती है। राज्यों को दी जाने वाली रकम के अलावा बहुत से खर्चे केंद्र सरकार खुद भी करती है, जैसे सेना पर खर्च, अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर खर्च, विदेश नीति के तहत खर्च, और देश की आंतरिक सुरक्षा जैसे कई मामलों पर खर्च। केंद्र का बजट इस तरह अपनी खुद की योजनाओं पर भी खर्च होता है, और सारे राज्यों के लिए एक जैसी बनाई हुई योजनाओं पर भी जाता है, खास जरूरतों वाले राज्यों पर और अधिक खर्च भी होता है। 
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वहां जो बात उठाई है, उसमें केंद्र सरकार से किसी तनातनी की बात नहीं है। उन्होंने कहा है कि विकास योजनाओं को बनाने और उन पर अमल का हक राज्यों को दिया जाए, अभी दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनती हैं, और राज्य उन पर अमल करने वाली एजेंसी जैसे रह गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र की योजनाएं आमतौर पर राज्यों की सफल योजनाओं पर ही आधारित होती हैं, और राज्यों के पास अपनी योजनाओं को कामयाब करने का दमखम है। छत्तीसगढ़ का यह तर्क इसलिए सही है कि इस राज्य में पूरे देश की सबसे कामयाब राशन-योजना चली है, और देश भर में इससे सबक लिया जा रहा है। केंद्र सरकार तो अपनी तरफ से अनाज की जगह लोगों को नगदी रियायत देने के रास्ते पर है, और उसका जो विरोध छत्तीसगढ़ कर रहा है वह भी ठीक है। लोगों को अगर नगदी मिलेगी, तो वह घर की औरत के हाथ कम आएगी, आदमी उसका बाहर मनचाहा इस्तेमाल अधिक करेंगे। आज अगर बहुत से प्रदेशों की सरकारें इस योजना को लागू करने में नाकामयाब रही हैं, तो उनको छत्तीसगढ़ की कामयाबी से सीखना चाहिए और केंद्र सरकार को, राज्यों की नालायकी का घड़ा गरीब की घरवाली के सिर पर नहीं फोडऩा चाहिए। देश में ऐसा और बहुत सारे मामलों में होता है जब सरकारें अपनी चोरी पर काबू न पाकर योजनाओं को गलत बताने लगती हैं, और उनमें फेरबदल करने लगती हैं।
भारत के संघीय ढांचे को अगर मजबूत करना है, तो केंद्र की योजनाओं को एक फौलादी शक्ल में राज्यों के सिर पर थोप देने के बजाय कुछ पैमानों के साथ उसे राज्यों को देना चाहिए, योजना के लिए भी, और अमल के लिए भी। इससे देश भर के अलग-अलग राज्यों की कल्पनाशीलता की संभावनाएं भी सामने आएंगी और तरह-तरह की योजनाएं बनेंगी। ऐसे प्रयोगों से केंद्र सरकार के सामने भी कई तरह के सफल विकल्प आएंगे। छत्तीसगढ़ ने राशन के मामले में, ग्रामीण स्वास्थ्य के मामले में, बिजली के मामले में देश के सामने बहुत सी सफलताएं रखी हैं, और ऐसा कुछ दूसरे राज्यों ने भी कुछ दूसरे मामलों में किया होगा। दूसरी बात यह कि भारत अपने-आपमें पूरे योरप के सारे देशों को मिलाकर उससे अधिक बड़ा, और उससे अधिक विविधता वाला देश है, जिसकी सारी जरूरतों और संभावनाओं को दिल्ली से बैठकर काबू करना न ठीक है न मुमकिन है। इसी दिक्कत के चलते बड़े राज्यों को छोटा करने की मांग हो रही है, और छत्तीसगढ़ जैसे जो नए छोटे राज्य बने हैं, उनके भीतर अपने-आपमें बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों के विकास के लिए अलग प्राधिकरण भी बनाने पड़े हैं। इसलिए केंद्र सरकार को अपना शिकंजा ढीला करना चाहिए, और राज्यों की प्रतिभाओं का इस्तेमाल नीतियों-कार्यक्रमों के लिए भी करना चाहिए। हर राज्य की अपनी-अपनी स्थानीय खूबियां हैं, जिनको ठीक से समझे बिना, जिनके साथ लगातार जुड़कर रहे बिना, योजना आयोग जैसी संस्थाएं देश को आगे बढ़ाने में बहुत अधिक नहीं जोड़ पाएंगी। छत्तीसगढ़ की आर्थिक कामयाबी के आंकड़े, उसकी अपनी स्थानीय योजनाओं की वजह से हैं, और देश को ऐसे सफल प्रयोगों से सीखना भी चाहिए।

महामहिम प्रणब मुखर्जी


26 दिसंबर 2012
संपादकीय
कर्नाटक में सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी निकली कि अक्टूबर के महीने में वहां गए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के लिए बेलगाम में सर्किट हाउस पर डेढ़ करोड़ रूपए से अधिक खर्च किए गए। और इसके अलावा जिस कमरे में राष्ट्रपति ने कुल एक घंटा गुजारा, उस पर सैंतीस लाख रूपए खर्च किए गए। इस सर्किट हाउस के बारे में सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि इसको एक बरस पहले ही दसियों लाख खर्च करके सजाया गया था, उस वक्त विश्व कन्नड़ सम्मेलन के लिए इसे तैयार किया गया था। 
प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने के बाद इस पद के साथ लिखे जाने वाले महामहिम जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद करवा दिया है, और राष्ट्रपति भवन को पर्यटकों के लिए अधिक समय तक खोल दिया है। लेकिन विचारों की उनकी सादगी का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक वे अपने ऊपर देश और प्रदेशों में होने वाले खर्च को कम न करवाएं। फिर लंबे समय तक देश के वित्त मंत्री रहे हंै, और उनसे बेहतर इस बात को कम ही लोग जानते होंगे कि इस देश की जनता कितनी फटेहाल है। और जनता दो वक्त खाना भी तभी खा पाती है, जब उसे रियायती राशन मिलता है। अब ऐसे में अगर राष्ट्रपति का एक घंटा बिना तामझाम के भी गुजर जाता, तो उस कर्नाटक के दो करोड़ रूपए बच जाते जहां पर बच्चे भयानक कुपोषण के शिकार हैं। और यह उसी बेलगाम की बात है जहां पर आज से पौन सदी के पहले गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में पहुंचे थे, और इस शहर में गांधी की प्रतिमाएं उसी याद में लगी हुई भी हैं। प्रणब मुखर्जी उस बंगाल से आए हुए हैं, जहां उन्होंने अपने जीवन में हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे भयानक अकाल देखा होगा, और दसियों हजार मौतें देखी होंगी। उस बंगाल की राजनीति कांग्रेस के हाथ से निकलने के बाद से लगातार वामपंथियों और ममता बैनर्जी के राज में सादगी की राजनीति रही है। ऐसे प्रदेश से आए हुए प्रणब मुखर्जी, वित्तमंत्री के रूप में देश की हकीकत को देखते हुए अगर राष्ट्रपति के ओहदे पर पानी की तरह बहाया जाने वाला खर्च खत्म नहीं करवाएंगे, तो वे नाम के साथ महामहिम लिखवाना बंद करवाने के बाद भी, महामहिम ही रहेंगे। कुछ समय पहले जब वे छत्तीसगढ़ में आए, उस समय भी यहां पर उनके इंतजाम बहुत सा गैरजरूरी खर्च किया गया था, क्योंकि सरकार में बैठे कई लोगों की दिलचस्पी ऐसे हड़बड़ी के खर्च में होती है जिसमें किसी टेंडर या नियम की जरूरत नहीं रहती।
और यह बात सिर्फ राष्ट्रपति की नहीं है, इस गरीब देश की लोकतांत्रिक सत्ता का इस्तेमाल करने वाले उन सारे लोगों की है जो रात-दिन नाम तो आम इंसान का लेते हंै, लेकिन खास जिंदगी जीने का कोई मौका नहीं छोड़ते। भारत सरकार से लेकर राज्यों के नेताओं तक, और जिला पंचायतों से लेकर म्युनिसिपलों तक, जिसको मौका लगता है वे लोग सत्ता को दुहने में पीछे नहीं रहते। गाडिय़ों के लंबे-लंबे काफिलों में चलते हैं, और अपने घर-दफ्तर पर जनता की खून-पसीने के करोड़ों रूपए खर्च करते हैं। इस देश की सत्ता से सादगी खत्म हो चुकी है। गांधी का नाम लेकर चलने वाले इस देश में गांधीवाद सिर्फ दफ्तरों में टंगी बापू की तस्वीरों तक रह गया है, और  निजी सुविधाओं के लिए जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल बढ़ते चल रहा है। 
राष्ट्रपति को अपने खुद के दौरों को लेकर राज्य सरकारों को यह लिखना चाहिए कि उनके लिए किसी तरह का नया खर्च न किया जाए, और रहने की जो जगह जैसी है, वे उसी में ठहर लेंगे। उनको यह भी करना चाहिए कि अपने दौरों पर राज्य सरकारों द्वारा किए गए खर्च की जानकारी वे मंगवाएं, और उसके बारे में पहले से ही सरकारों को लिखें। वे ऐसा अगर नहीं करते हैं, तो सादगी की राजनीति वाले बंगाल के भी वे नहीं गिने जाएंगे, न ही वे गरीबी को हर बजट में करीबी से देखने वाले वित्तमंत्री कहलाएंगे, और वे सिर्फ महामहिम ही कहलाते रहेंगे, शब्दों में यह लिखा जाए या न लिखा जाए। 

देश की सरकार का हाल सिरकटे मुर्गे जैसा हो गया


25 दिसंबर 2012
संपादकीय
दिल्ली पर देश भर की नजरें जमी हुई हैं। सामूहिक बलात्कार के बाद नाराज भीड़ के उग्र प्रदर्शन पर पुलिस की कार्रवाई, और भीड़ के हमले से, या उस दौरान एक सिपाही की मौत से बहुत से सवाल उठ खड़े हुए हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कई दूसरे सवाल भी उठ खड़े हुए हैं कि दिल्ली राज्य में पुलिस को केंद्र सरकार कब तक और क्यों अपने काबू में रखना चाहती है? दिल्ली में अगर वहां के उपराज्यपाल मौजूद नहीं हैं तो पुलिस पर किसका काबू है? और यह भी कि पुलिस अपनी कार्रवाई के लिए लोगों के पत्थर झेले, और सरकार का ढांचा अपने-आपमें एक धुंध खड़ा करने वाला हो, तो ऐसे में पुलिस क्या करे? 
यह नौबत रातों-रात नहीं आई है। दिल्ली को पूरे राज्य का दर्जा देने और वहां की पुलिस को राज्य सरकार के मातहत करने की बात बरसों से चली आ रही है, लेकिन एक के बाद एक कई पार्टियों की सरकारें देश में आकर चली गईं, इस मामले को किसी ने नहीं सुलझाया। नतीजा यह है कि दिल्ली की पुलिस आज दिल्ली के निर्वाचित सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है, और आज इतने नाजुक हालात में केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए की अगुवा कांगे्रस पार्टी की ही दिल्ली राज्य की मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर को हटाने की बात खुलकर कर रही है। यह नौबत लोकतांत्रिक नहीं है। निर्वाचित सरकार अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी, लेकिन वह जनता के प्रति जवाबदेह तो रहती ही है। दिल्ली में इस दोहरे इंतजाम को तुरंत खत्म करना चाहिए, एक राज्यपाल के मातहत पुलिस को रखना अंगे्रज सरकार के एजेंट के राज को याद दिलाता है। 
दूसरी बात यह कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने यह मुद्दा भी उठाया है कि सामूहिक बलात्कार की शिकार इस लड़की का बयान दर्ज करते हुए पुलिस के अफसर दखलंदाजी कर रहे थे और उन्होंने इसकी जांच की मांग की है। अब सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली की मुख्यमंत्री को ही इतने किस्म के शक हैं, इतने किस्म की शिकायतें हैं, तो बलात्कार की शिकार जनता की नाराजगी अगर पत्थरों को लेकर पुलिस पर टूट पड़ी, तो वह बात हैरान करने वाली नहीं है। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह भी उठती है कि एक बेकाबू भीड़ को संभालने के लिए अगर सत्ता, सत्तारूढ़ पार्टी, और विपक्ष भी, किसी के पास लीडरशिप नहीं है, तो फिर ऐसी ही अराजक हिंसा होगी। और ऐसी हिंसा को, ऐसे हंगामे को रोकते हुए पुलिस की लाठी से भी कई लोग मारे जा सकते थे, कई लोग भगदड़ में भी मारे जा सकते थे। यह नौबत बताती है कि देश की राजधानी में ही सरकार बेबस हो गई है, और एक किस्म से जनआक्रोश के सामने उसकी बोलती बंद हो गई है। कल ही हमने यह भी लिखा है कि किस तरह सत्ता के लोग अपनी आवाज का वजन और असर खो बैठे हैं। 
लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले लोगों के लिए यह नौबत भारी निराशा की है। कांगे्रस के प्रधानमंत्री बेअसर बोलते हैं, उसके गृहमंत्री बेतुका बोलते हैं, सोनिया-राहुल कुछ बोलते नहीं, कांगे्रस की मुख्यमंत्री लगातार पुलिस के खिलाफ बोल रही हैं, कांगे्रस का स्थानीय सांसद और मुख्यमंत्री का बेटा पुलिस कमिश्नर को हटाने को बोल रहा है, और ऐसे में जनता से अपने-आपको काबू में रखने की बात कहने का नैतिक हक किसका रह गया है? और मानो इतना काफी न हो, तो ऐसी लगी हुई आग के बीच कांगे्रस का आंध्र का प्रदेशाध्यक्ष यह सार्वजनिक बयान देता है कि देश को आधी रात को आजादी मिली थी इसका यह मतलब नहीं निकलता की औरतें अंधेरे के बाद भी सड़कों पर घूमें। हमको यह बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा है कि एक राष्ट्रीय पार्टी जो अपने-आपको आजादी दिलाने के सम्मान का हकदार मानती है, जो सौ बरस पुरानी है, जो नेहरू और गांधी की पार्टी रही है, जिस पर इंदिरा गांधी जैसे दबंग महिला ने राज किया था, आज उसके नेता एक के बाद एक मुंह खोलते ही अपनी पार्टी का नुकसान करते दिख रहे हैं। कांगे्रस के कई नेता जस्टिस काटजू के इस बयान को सही साबित करने के लिए ओवरटाईम करते दिख रहे हैं कि हिंदुस्तान के नब्बे फीसदी लोग बेवकूफ हैं।
दिल्ली की पिछले एक हफ्ते की घटनाओं के लिए यहां पर अभी कोई जिम्मेदारी तय न करते हुए भी हम यह तो मानेंगे कि देश की राजधानी और देश, दोनों पर राज करने वाली पार्टी के अलावा, उसकी सरकारों के अलावा, इसके लिए और कौन जिम्मेदार हो सकता है? और दिल्ली के इस बार ठंडा हो जाने के बाद भी ये खतरे कम नहीं हो रहे हैं, दूर नहीं हो रहे हैं। यूपीए और कांगे्रस अगर देश की सत्ता से हट भी जाएंगे, तो भी वे इसे बदहाल छोड़ जाएंगे। आज देश की सरकार का हाल सिरकटे मुर्गे की तरह का हो गया है, जिसकी न दिशा तय है, न दशा।

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की बातें मददगार नहीं


संपादकीय
24 दिसंबर 2012
जब देश के लोगों की भावनाएं घायल रहती हैं, तब जिम्मेदार लोगों को, अपनी भाषा पर, अपनी भावनाओं पर, और अपने तौर-तरीकों पर काबू रखना चाहिए। खासकर ऐसे लोगों को जो कि लोगों की भावनाओं के घायल होने के लिए जिम्मेदार भी होते हैं। कल से लेकर अब तक केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की जो बातें सामने आईं हैं, उनके पीछे की उनकी नीयत अच्छी हो सकती हैं, लेकिन उनका यह कहना कि आज अगर वे बलात्कार-विरोधी प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राओं से बात करेंगे, तो कल के दिन क्या वे प्रदर्शन करने वाले नक्सलियों से भी बात करें, यह कहना ठीक नहीं है। शिंदे के पहले उन्हीं के राज्य महाराष्ट्र से आए यूपीए के पहले गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने भी यही गलती की थी कि उन्होंने नक्सलियों से बातचीत न करने, और इस पूरे मामलों को राज्यों की समस्या बताने की चूक की थी। अब शिंदे ने एक बिल्कुल ही गैरजरूरी विवाद छेड़ दिया है। जब हिन्दुस्तान इस देश के बाहर से उस पर हमला करने वाले लोगों से भी बातचीत करता है, तो देश के भीतर आंदोलनकारियों से बात करने में क्या हर्ज है? और जिस शहर में इस देश की सरकार बैठी है, संसद बैठी है, सुप्रीम कोर्ट बैठी है, और राष्ट्रपति बैठे हैं, वहां पर अगर इतने भयानक अपराध हो रहे हैं तो उस पर अगर पूरे देश में लड़कियों और महिलाओं के साथ-साथ जब मीडिया भी उबला हुआ है, विचलित है, तो सड़कों पर इतनी सर्दी के बीच सर्द पानी की बौछारें झेलकर रात-रात भर जागती महिलाओं से अगर कोई बात कर ले तो उसमें हर्ज क्या है? और यह नौबत इसलिए आ रही है कि दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के  ऊटपटांग बयानों और गलत कार्रवाई को लेकर खुद दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस अफसर को हटाने की मांग की है, और उनके सांसद बेटे संदीप दीक्षित ने भी यही मांग सार्वजनिक रूप से दोहराई है। ऐसे में अगर दिल्ली पुलिस को नियंत्रित करने वाली केन्द्र सरकार के मंत्री भी बात करना नहीं चाहते हैं, तो हमारे हिसाब से प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का बार-बार यह गिनाना फिजूल है कि उनकी तीन-तीन बेटियां हैं। 
कई ऐसे मौके रहते हैं जब लोगों को बंद गले के अपने कोट से बाहर आकर इंसान की तरह भी बर्ताव करना चाहिए। आज अगर इंटरनेट पर लोग प्रधानमंत्री पर यह फिकरा कसते हैं कि क्या आज के जलते हुए राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके विचार जानने के लिए जनता को सूचना के अधिकार के तहत अर्जी देनी होगी, तो यह शर्मनाक नौबत है। इस विशाल लोकतंत्र का प्रधानमंत्री अगर बलात्कार पर मीडिया के मार्फत देश की जनता से बात करने के बजाय एकतरफा राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करता है, तो यह अच्छी बात नहीं है। और ऐसे मौके पर यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी की बातें देश तक नहीं आती-जातीं, गृह मंत्री ऐसी जुबान बोल रहे हैं, जो कि न लोकतांत्रिक हैं, न संवेदनशील, तो यह एक बुरी नौबत है। ऐसे में तकलीफ से गुजर रही देश की जनता, और इस तकलीफ को बढ़-चढ़कर दिखा रहे मीडिया का नजरिया ही देश के सामने आ रहा है, सरकार अपनी सफाई तक देने की हालत में नहीं है। 

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मामले में यह हो गया है कि वह खो गया है...


24 दिसंबर 2012
पिछले एक हफ्ते में भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को एक बार फिर यह मौका मिला है कि वह चौबीसों घंटे का चैनल सड़क पर खड़े रहकर बन सके। जब सड़कें नारों से पटी हों, जब लोग विचलित हों, तो इसी सिलसिले को आगे बढ़ाकर अपनी रोजी-रोटी कमाने के धंधे में चैनल लग गए हैं। एक-दूसरे को पीटने का जो गलाकाट मुकाबला चल रहा है, वह अखबारों में भी कम हो ऐसा नहीं है, लेकिन अखबारों की पहुंच ऐसे मामलों में इस तरह की कभी नहीं हो सकती, और फिर अखबारों में समाचारों से परे विचारों की एक अलग जगह भी होती है। 
टीवी समाचार चैनलों में एक दिक्कत यह हो रही है कि वे समाचार माध्यम बने रहना चाहते हैं, लेकिन समाचारों के भीतर विचारों को डालने के अपने मोह को उसके रिपोर्टर छोड़ नहीं पा रहे। किसी सड़क या फुटपाथ पर खड़े नौसिखिए टीवी रिपोर्टर एक जीवंत प्रसारण पर वहां से जो कुछ कहते हैं, वह ज्यों का त्यों उपग्रह से होते हुए लोगों के घरों तक पहुंच जाता है। अगर वे सिर्फ अपना देखा हुआ सच ही कहें, तो भी बात इतनी न बिगड़े। दिक्कत यह है कि वे अपना सोचा हुआ भी सच की तरह पेश करने में लगे रहते हैं। और जो टीवी लोगों को अपार संभावनाओं वाला दिखता है, उसकी हकीकत यह है कि वह बहुत तंग सीमाओं वाला भी है। मौके पर से संवाददाता की कही हुई बात को जांचने-परखने की कोई गुंजाइश टीवी के समाचार संपादक के पास नहीं होती। लेकिन यहां पर इसकी तंग सीमाएं खत्म नहीं होतीं।
दरअसल जब किसी उत्तेजित भीड़ के बीच मौके पर से टीवी के रिपोर्टर को उन हालात के बारे में कहना होता है तो उसके इर्द-गिर्द की भीड़ उस बात को कैमरे में कैद होने के पहले ही सुनती भी रहती है। ऐसे उत्तेजित घेरे के बीच खड़े होकर बहुत कड़वा सच कहने से किसी की भी एक सामान्य समझ-बूझ उसे रोकती भी है। नतीजा यह होता है कि जिस तरह राजनीति में नेता कोई लुभावनी बात कहते हैं, उसी तरह ऐसे मौकों पर टीवी के रिपोर्टर, उसके स्टूडियो और उसके प्रस्तुतकर्ता एक तरफ तो भीड़ का चेहरा देखकर बात करते हैं, दूसरी तरफ दर्शकों की उस पल की विचलित और जख्मी भावनाओं को देखकर बात करते हैं, और तीसरी तरफ वे इसी काम के गलाकाट मुकाबले में लगे हुए बाकी चैनलों को देखकर भी बात करते हैं। 
जब किसी भी तरह का मीडिया एक नाजुक मौके पर सोच-समझकर अपना संतुलन और आपा खोता है, और उसके नगदीकरण में जुट जाता है, तो फिर वह लोगों को भड़काते हुए अपने माइक्रोफोन को एक हथियार, एक मशाल की तरह इस्तेमाल करने लगता है। पिछले एक हफ्ते में जिम्मेदार से लगने वाले समाचार चैनल भी जिस तरह समाचारों की तरह नारों को लगाते दिख रहे हैं, उससे लोगों के बीच एक ऐसी बेचैनी को बढ़ाया जा रहा है जिसकी न जरूरत है, और न जिसका कोई इलाज है। 
पिछले एक-दो बरस में ऐसे और भी मौके आए जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कभी अन्ना तो कभी बाबा, और कभी केजरीवाल के साथ मिलकर नारे लगाने का काम किया और अक्ल का भारी इस्तेमाल करते हुए, अक्ल को ताक पर रख देने का भी फैसला लिया, उस फैसले पर अमल किया।
अखबारों में ऐसी ही बात के लिए संपादकीय कॉलम होते हैं, और विचारों के अपने पन्ने होते हैं। कोई मामला जब अधिक मायने रखता है, तो उसके बारे में विचारों में विचलित होकर भी लिखा जाता है। लेकिन समाचारों को ऐसी पसंद-नापसंद से परे रखा जाता है, और यह माना जाता है कि समाचारों में विचारों की मिलावट नहीं की जाएगी। अखबारों में एक दूसरा फायदा भी होता है। किसी घटना के होने के बाद संवाददाता से लेकर समाचार संपादक तक को आम तौर पर घंटों मिलते हैं, उस घटना की बारीकियों को ठोंकने-बजाने के लिए, और फिर उनका महत्व तय करने के लिए। टेलीविजन के जीवंत प्रसारण आग बुझाने जैसे काम होते हैं, जिनमें सब कुछ मौके पर ही तय करना होता है।
और अगर बात यहां तक भी रूक जाती, तो भी ठीक रहता। जब टीवी समाचार  चैनलों की दर्शक संख्या का मुकाबला उन चैनलों के जिंदा रहने और न रहने को तय करता है, तो फिर समाचार-विचार से परे मैनेजमेंट के लोग यह तय करते हैं कि किस मुद्दे पर विचलित देश को और अधिक उकसाया या भड़काया जा सकता है। 
अभी जब इस मामले पर जब मैं लिख ही रहा हूं, उसी समय दिल्ली से खबर है कि संसद भवन के पास इन दिनों रोज जुट रही टीवी चैनलों की नब्बे-सौ ओबी वैन वहां से पुलिस ने हटा दी हैं। इन्हीं के मार्फत टीवी कैमरे अपनी रिकॉर्डिंग अंतरिक्ष में उपग्रह तक भेज पाते हैं। मतलब यह कि सरकार या पुलिस ने वहां पर अमन-चैन  बनाए रखने के लिए इनको वहां से हटाना जरूरी समझा है। अभी मैं इस सरकारी फैसले के सही या गलत होने पर नहीं जा रहा, क्योंकि हो सकता है कि टीवी चैनलों के रूख से वहां पर एक बड़े हिंसक टकराव का खतरा बढ़ रहा हो। 
मीडिया का खुद झंडे-डंडे लेकर चलना ठीक नहीं होता। अखबार जब किसी नाजुक मुद्दे पर, किसी नाजुक वक्त पर कैम्पेन-शीट (अभियान का पर्चा) बन जाते हैं तो वे दरअसल कैम्पेन-शिट (अभियान का गू) बन जाते हैं। अखबार तो अभी अपना आपा नहीं खो रहे हैं, लेकिन अधिकतर टीवी चैनल अपने आपे को सोच-समझकर अलमारी में बंद करके सड़कों पर हैं। ऐसे नाजुक मौके पर जब समझदार और जानकार संपादक अखबारों में खबरों को देखते हैं, और उनसे फैल सकने वाली उत्तेजना और नफरत के खतरे को तौलते हैं, तब टीवी चैनलों पर यह सोचने और संतुलन तय करने का काम खत्म ही हो गया है। 
आज अधिकतर समाचार चैनलों ने बलात्कार-विरोधी आंदोलन से लेकर, बलात्कार की हिंसा तक को लेकर अपने-अपने आंदोलन के बैनर सरीखे बना लिए हैं। स्टूडियो में ऐसे परदे बन गए हैं, और खबरों के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, पहले-बार लगाने के लिए हर किसी के अलग-अलग नारे तय हो गए हैं। जब मीडिया के धंधे में लगे हुए पत्रकार समाचार और विचार के इस फर्क को खत्म कर चुके हैं, तो ईडियट-बॉक्स के दर्शक ऐसे दिनों के समाचार बुलेटिनों को एक और रियलिटी शो की तरह देखते हैं, और कुछ समय पहले शायद ऐसे ही किसी मुद्दे पर पीपली लाईव नाम की एक फिल्म भी आई थी।
यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि देश के बाकी मीडिया की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी अभिव्यक्ति की आजादी की बात करता है। इस बात को अधिक लोग नहीं जानते कि भारतीय लोकतंत्र और संविधान में मीडिया के अलग से कोई अधिकार नहीं हैं। एक साधारण नागरिक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जो अधिकार हैं, वही अधिकार मीडिया के हैं। लेकिन एक साधारण नागरिक के ये अधिकार जिन नागरिक जिम्मेदारियों के साथ आते हैं, भारत का मीडिया इस जिम्मेदारी से अपने-आपको आजाद पाता है, बताता है। लेकिन जब मीडिया एक आंदोलनकारी की तरह कलम या माइक्रोफोन को मशाल की तरह उठा लेता है, और जब मीडिया की सुर्खियां बैनरों पर लिखे नारों की तरह हो जाती हैं, तब देश को एक मीडिया की कमी खलने लगती है। आज कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मामले में यह हो गया है कि वह खो गया है। 

बलात्कार विरोधी नौजवानों की भीड़ जोश और होश का आज और कल


23 दिसंबर 2012
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में सामूहिक बलात्कार के बाद बहुत हिंसक तरीके से लड़की को घायल करने की वारदात से दिल्ली के दसियों हजार लड़के-लड़कियां सड़कों पर हैं। लोगों को याद नहीं पड़ रहा है कि राष्ट्रपति भवन के बाहर इस तरह के प्रदर्शन पिछली बार कब देखने मिले थे। राष्ट्रपति से लेकर यूपीए सरकार की मुखिया सोनिया गांधी तक आक्रोश में भरी भीड़ पहुंच रही है, और यह एक दबाव देश में खड़ा हो रहा है कि बलात्कार रूकें, और बलात्कारियों को फांसी हो। 
दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों में जहां पर लोकतंत्र कुछ कम होता है वहां पर हाल के महीनों में नौजवानों की नाराज भीड़ सड़कों पर देखने मिली हैं। मिस्र में अभी ऐसे प्रदर्शन चल ही रहे हैं, और कुछ दूसरे देशों में भी ऐसा ही रूख देखने मिला है। और बात सिर्फ नौजवानों की नहीं है, अमरीका में पूंजीवाद के प्रतीक वॉलस्ट्रीट के खिलाफ जिस तरह 'आकूपाई वॉलस्ट्रीटÓ (वॉलस्ट्रीट पर कब्जा करो) का आंदोलन चला और जिस तरह वह वॉलस्ट्रीट वाले न्यूयॉर्क शहर से परे भी अमरीका के बाकी शहरों तक फैल गया, और अमरीका के बाहर योरप में भी वह दूर-दूर तक पहुंचा, वह देखने लायक था। लेकिन क्या उस आंदोलन का कोई तर्कसंगत अंत हुआ? या फिर वह एक मुद्दे को नारे की तरह हवा में फैलाकर, गुंजाकर, खत्म हो गया? भारत में ही हमने पिछले एक बरस में बाबा रामदेव के आंदोलन को देखा, अन्ना हजारे के आंदोलन को देखा, और अरविंद केजरीवाल के आंदोलन को देखा। ये सब कुछ महीनों तक चलकर खत्म हो गए। आज हालत यह है कि अन्ना और अरविंद एक-दूसरे से सवाल-जवाब करते खड़े दिखते हैं। 
बलात्कार के खिलाफ दिल्ली में सड़कों पर यह आक्रोश समझ में तो आता है, लेकिन यह आक्रोश इस मुद्दे को नारा बनाने से अधिक क्या कर पाएगा, कैसे कर पाएगा यह सोचना थोड़ा सा मुश्किल है। इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं कि हम इस जनआक्रोश को कम आंक रहे हैं, या कि हम इससे कोई जनकल्याण नहीं देख रहे हैं। हम सिर्फ यही सोच रहे हैं कि जनआक्रोश की जो ऊर्जा है उसे किस तरह एक असरदार औजार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। बादलों से धरती पर गिरने वाली बिजली बहुत अधिक ताकतवर होती है, उसके वोल्ट अगर गिनें, तो उतनी बिजली पैदा करने वाले बिजलीघर आसान नहीं होंगे, लेकिन कौंधते हुए, शोर करते हुए, रौशनी फैलाते हुए भी वह बिजली किसी काम की नहीं होती। बहुत सा जनआक्रोश इसी तरह बेकाम हो जाता है, अगर किसी संगठित तरीके से उसे एक सार्थक आंदोलन में तब्दील न किया जाए। और जैसा कि संगठन की अपनी दिक्कत होती है, उसके अपने खतरे होते हैं, जैसा कि हमने बाबा-अन्ना-केजरीवाल के आंदोलन में देख लिया है, तो किस तरह का संगठन किसी आंदोलन से उभरता है, यह बात भी उस आंदोलन के भविष्य के लिए बहुत मायने रखती है। जिस दिन अन्ना के आंदोलन से एक राजनीतिक संगठन उभरा, उसने अन्ना के आंदोलन को ही तोड़कर रख दिया। दूसरी तरफ अगर आपातकाल में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जनता पार्टी नाम का राजनीतिक संगठन नहीं उभरता, तो वह आंदोलन किसी किनारे नहीं पहुंच पाता। इसलिए राजनीति को अछूत न मानते हुए, राजनीति से परहेज न करते हुए भी हमारा यह मानना है कि हर आंदोलन के एक सोचे-समझे तरीके से अगर आगे न बढ़ाया जाए तो वह आसमानी बिजली की तरह कौंधकर खत्म हो सकता है।
इसलिए आज नौजवानों की जो पीढ़ी सड़कों पर बहुत आक्रोश और बहुत निराशा के साथ उतरी है, उसे अपने आंदोलन की ताकत, उसकी कमजोरियों और उसकी संभावनाओं पर सोचना होगा। मिस्र जैसे देश, फिलीस्तीन जैसे देश, जहां पर कि नौजवान पीढ़ी अपने मुद्दों को लेकर जान देने में पीछे नहीं रहती, वैसा कोई माहौल हिंदुस्तान न इस आंदोलन में है, न किसी और आंदोलन में है, और न ही उसकी कोई जरूरत हम देखते। लेकिन जो पढ़ी-लिखी पीढ़ी आज दिल्ली की सड़कों पर दिख रही है उसके करने को कुछ है, और सड़कों से परे भी है। हम उन्हें सड़क से फुटपाथ पर लाने के लिए यह बात नहीं लिख रहे हैं, बल्कि इस आंदोलन की सीमाओं के भीतर उसकी अधिकतम संभावना के इस्तेमाल के लिए यह लिख रहे हैं। इस आंदोलन को सिर्फ एक घटना पर केंद्रित रखकर बहुत तंग-नजरिए का नहीं बनाना चाहिए और इसे महिलाओं पर ज्यादती की व्यापक हिंसा के खिलाफ रखना चाहिए। दूसरी बात यह कि सड़कों पर गुस्से से भरा प्रदर्शन करने से अगर कोई कानून बन सकता होता,  तो पिछले एक बरस में अन्ना-बाबा भी इसमें कामयाब हो जाते। तीसरी बात यह कि लुंज-पुंज लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर कड़े कानून का अलग से कोई वजन नहीं हो सकता, इसलिए इस आंदोलन को इस ढांचे को ही सुधारने का मुद्दा उठाना चाहिए। इसके लिए इस पीढ़ी को सड़कों पर और इंटरनेट पर, चुनाव के दौरान, और बाकी वक्त इस बात को मुद्दा बनाना होगा कि बलात्कार जैसे आरोप से घिरे हुए लोग, महिलाओं पर हिंसक अपराधों से घिरे हुए लोग किन पार्टियों में या किन संगठनों में महत्व पा रहे हैं? जैसे ही ऐसे लोगों को कोई टिकट मिले, ओहदा मिले, उनका चुनाव हो, तो उनके खिलाफ जमकर आवाज उठनी चाहिए, ऐसे लोगों को अहमियत देने वाले नेताओं का भी जमकर विरोध होना चाहिए। जब ऐसी पार्टियों का खुलकर विरोध होगा, तो जाकर लोगों को बलात्कारियों को दूर रखना समझ आएगा।
इससे परे एक दूसरी बात यह कि जिस शहर में किसी लड़की या महिला के साथ ऐसी हिंसा हो वहां की नौजवान पीढ़ी उसकी मदद को सामने आए, लड़कियां जाकर उसके दुख-दर्द में उसके साथ खड़ी रहें, लड़के-लड़कियों सभी की भीड़ बलात्कारियों या हमलावरों के खिलाफ उठकर खड़ी हों। जब तक देश भर में ऐसी पहल नहीं होगी, तब तक सिर्फ दिल्ली से देश नहीं दहलेगा। बहुत से ऐसे आंदोलन जो सिर्फ दिल्ली में होते हैं, वे टीवी के परदों पर ही खत्म हो जाते हैं। इसलिए देश भर में जगह-जगह छात्र-छात्राओं को, बाकी जागरूक पीढ़ी को, अपने-अपने इलाके में हुई हिंसा के खिलाफ उठकर खड़ा होना होगा, उससे कम में कुछ नहीं हो पाएगा। जो लोग यह मानकर चलते हैं कि दुनिया को बदलने वाले बहुत से आंदोलन छात्र-आंदोलनों से ही शुरू हुए हैं, उनको यह भी याद रखना होगा कि हर छात्र-आंदोलन, या हर युवा-आंदोलन किसी नतीजे तक पहुंचने का भी इतिहास नहीं है। इसलिए दिल्ली में पिछले चार दिनों में जुटी हुई इस ऊर्जा को देश भर में जगह-जगह फैलाने की जरूरत है, और उसे जारी रखने की जरूरत है।

छत्तिसगढिय़ा को खाने का हक इतिहास में दर्ज होने का दिन


22 दिसंबर 2012
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ के इतिहास में कल का दिन सबसे अधिक मायने रखने वाले दो-चार दिनों में से एक रहा, जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने एक वायदे के मुताबिक राज्य का खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक पारित करवाया, और प्रदेश के हर व्यक्ति को भोजन का हक दिया। सरकारी रियायत पर अनाज के दायरे से प्रदेश का एक बहुत छोटा कमाऊ तबका ही बाहर रहेगा और 56 लाख परिवारों में से गरीब और जरूरतमंद 50 लाख परिवारों को भोजन का कानूनी अधिकार मिल गया। भोजन के अधिकार को कानूनी दर्जा देने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बन गया है, और इस मामले में केंद्र की यूपीए सरकार भी पीछे रह गई है। वैसे भी केंद्र सरकार भोजन के अधिकार वाले जिस विधेयक पर काम कर रही है, उसके लागू होने पर भी छत्तीसगढ़ में इससे  आधे ही लोगों को फायदा मिल पाता, राज्य का अपना विधेयक करीब दुगुनी आबादी को यह फायदा देने जा रहा है। 
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले नौ बरसों में छत्तीसगढ़ की खाद्यान्न योजनाओं, और उन पर एक अविश्वसनीय हद तक कामयाबी का अमल दिखाकर केंद्र सरकार से लेकर योजना आयोग तक के इस भाजपा सरकार की तारीफ के लिए मजबूत करके छोड़ा था। सोनिया गांधी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य, जनकल्याणकारी-अर्थशास्त्री ज्यां दे्रज जैसे लोग छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तारीफ में लंबे-लंबे लेख लिखते आए हैं, और उन्हें सैद्धांतिक आधार पर भाजपा-विरोधी रहते आया अखबार 'द हिंदूÓ पहले पन्ने पर छापते भी आया है। देश-विदेश में जगह-जगह छत्तीसगढ़ की इस कामयाबी को जो तारीफ मिली, वह तो अलग रही, हमारा यह भी मानना है कि राज्य की सबसे गरीब आधे से अधिक आबादी को इस सरकार के चलते जब जिंदगी में पहली बार दो वक्त पेट भर खाना मिला, तो उसने पिछले चुनाव में रमन-सरकार को दुबारा चुना। ऐसा माना जाता है कि चुनाव की वैतरणी डॉ. रमन सिंह ने चावल के दाने को नाव की तरह इस्तेमाल करके आसानी से पार कर ली थी। लेकिन चुनाव से परे भी सत्ता का जो इस्तेमाल उन्होंने सबसे गरीब तबके के लिए पहले भी किया, और कल भी साबित किया, वह छत्तीसगढ़ के सबसे गरीब लोगों की जिंदगी में एक बड़ी मदद की तरह है, और उनके इस बड़े और जायज हक की इज्जत इस नए कानून से हुई है। 
यहां पर हम इस नई योजना के आंकड़े और फायदा पाने वाले तबकों की अधिक चर्चा इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि ये सारी जानकारी समाचार के पन्नों पर जा रही है। हम इस कानून के पीछे की सोच और चुनौती की बात करते हैं। यह फैसला अब गरीब तबके तक अनाज के हक पर राज्य के बजट का करीब 23सौ करोड़ रुपये खर्च करने जा रहा है। यह बजट के पांच फीसदी से अधिक होगा। जिन लोगों को यह लगता है कि यह गरीबों को कुछ अधिक ही दिया जा रहा है उनको यह समझना चाहिए कि यह खर्च राज्य के तीन चौथाई से अधिक आबादी पर हो रहा है। और राज्य की मौजूदा सारी संपन्नता यहां के उन प्राकृतिक स्रोतों पर टिकी हुई है, जिन पर यहां के हर इंसान का बराबरी का हक है। इसलिए इसे जहां एक तरफ हम सबसे गरीब का आज तक का सबसे अधिक भला मान रहे हैं, वहीं हम इसे राज्य पर किसी तरह का बोझ मानने से इंकार करते हैं। यहां के गरीबों को जिंदा रहने का हक मिले, उनके   बच्चों को कुपोषण से आजादी मिले, यहां के बूढ़े रह गए, अकेले रह गए इंसानों को खाने का हक मिले, यह सब चुनावों के फायदे से परे भी वह जिम्मेदारी है जिसे लोग इंसानियत कहते हैं। एक तरफ खदान मालिक और कारखानेदार अरबपति और खरबपति बनते चलें, और उसी राज्य में लोग खाने का हक भी न पाएं तो यह बहुत बड़ी सामाजिक ज्यादती होती। इसलिए लोगों के पेट भरने का जो सिलसिला पिछले बरसों में डॉ. रमन सिंह ने शुरू किया है, उसका साथ देश के वामपंथी लोग, दुनिया भर के उदारवादी विचारक भी भाजपा से अपनी असहमति को अलग रखकर दे रहे हैं। 
यहां पर हमारी एक छोटी सी सलाह भी छत्तीसगढ़ सरकार को है। बहुत गरीब लोग अनाज से परे भी कई किस्म की तंगी के साथ जीते हैं। इस तबके में घर के मुखिया लोगों की पीढिय़ां, पढ़ाई-लिखाई से अछूती रह गई हैं। उनके बीच यह सामाजिक जागरूकता भी कहीं-कहीं नहीं है कि वे सरकार के इस फैसले से उनके घर को होने वाली बचत का कैसे बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए इस बड़े फैसले के साथ-साथ राज्य सरकार को फायदा पाने वाले तबकों के बीच यह समझ और सोच भी पहुंचानी चाहिए कि इस बचत का वे अपने परिवार के खानपान, पोषण आहार और पढ़ाई-इलाज जैसी बातों में क्या इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसी जागरूकता का लंबा असर होगा, यह जरूर है कि उसे सीधे-सीधे किलो या वोटों की गिनती में नापा-तौला नहीं जा सकेगा। लेकिन एक जनकल्याणकारी सरकार को जागरूकता की ऐसी जिम्मेदारी भी पूरी करनी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के कुछ लोगों का यह मानना है कि चावल की शुरू की गई रियायत से लोगों में शराब पीने की आदत बढ़ी है क्योंकि उनके घर रियायती चावल की वजह से खासी बचत हो रही है। ऐसी बातों से परिवारों को बचाने के लिए सरकार को एक जागरूकता-अभियान चलाना चाहिए।
भारत के दूसरे प्रदेश और देश की सरकारों को छत्तीसगढ़ से एक सबक लेना चाहिए। यहां के इस खाद्य सुरक्षा कानून और गरीबों के खाने के हक पर पूरे देश में अमल होना चाहिए। जैसा कि कल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने भाषण में कहा है कि इससे शिशु मृत्यु दर और जननी मृत्यु दर में भी कमी आएगी। दुनिया भर के स्वास्थ्य-वैज्ञानिकों का यह भी मत है कि कुपोषण से बचकर कोई नस्ल आगे चलकर मजबूत होते चलती है, और खाना सिर्फ जिंदा रहने के लिए जरूरी नहीं है, यह अगली पीढिय़ों को बेहतर बनाने के लिए भी जरूरी है। छत्तिसगढिय़ा सबले बढिय़ा जैसा नारा साबित करना, खाली पेट या कुपोषण के शिकार लोगों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए कल इस प्रदेश में जो हुआ है, उसे खत्म कर पाना, बदल पाना या घटा पाना आगे की किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं होगा। 
हमारा मानना है कि दुनिया के भोजन के हक के विशेषज्ञ जानकार छत्तीसगढ़ की इस पहल को तारीफ के लायक पाएंगे। हम हमेशा से इस हक के हिमायती रहे हैं, और हमारे पाठक इन मुद्दों पर हमारे संपादकीय, और विशेषज्ञों के लेख पढ़-पढ़कर थके हुए भी हैं। लेकिन हमारा मानना है कि सबसे गरीब और सबसे बेजुबान के हक का सम्मान राजनीति से परे की बात है, और इसके लिए डॉ. रमन सिंह तारीफ के सबसे बड़े हकदार हैं।

नन्हीं बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों की फांसी माफ की थी महिला राष्ट्रपति ने

21 दिसंबर 2012
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
पिछले एक महीने में हिंदुस्तान में तीन-चार मुद्दों पर लोगों को सोचने पर बेबस किया है। फांसी की सजा पाए हुए लोगों के मामलों में राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान में चुनिंदा तरीके से बरसों की देरी, मौत की सजा के प्रावधान, बलात्कार के मामलों में मौत की सजा, और इंसाफ की रफ्तार। बेबस महिला पर होने वाले सामूहिक बलात्कार से लेकर कसाब तक की खबरों को लेकर ये बातें लोगों के मन में उठ रही हैं। और बलात्कार के मामलों के साथ-साथ उन पर नेताओं-अफसरों के रवैये पर भी बात उठ रही है जो कि कभी बलात्कार की शिकायतों को फर्जी बताते हैं तो कभी महिलाओं के तौर-तरीकों को भी बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। ऐसे जुर्म के बाद महिला नेताओं का क्या रूख रहता है, यह भी देखने लायक है। इन मामलों पर पिछले दिनों हमने अलग-अलग लिखा है, लेकिन कल एक ऐसी खबर आई है जिसकी वजह से आज इन सारे मामलों को मिलाकर लिखना जरूरी है।
आज जब पूरे देश में यह बात उठ रही है कि बलात्कार की शिकार महिला से पूछताछ भी कोई महिला आईपीएस करे, तब यह भी देखने की जरूरत है कि ताकत की कुर्सी पर बैठी हुई महिलाओं का रूख मुसीबत की मारी या मर्दानगी की हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए क्या होता है। उत्तरप्रदेश में पांच बरस की एक बच्ची के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई। उसे निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हर अदालत ने मौत की सजा दी। लेकिन माफी की उसकी अपील राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने मंजूर कर ली। उत्तरप्रदेश में ही छह बरस की एक बच्ची के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या करने वाले को नीचे से ऊपर तक हर अदालत ने मौत सुनाई, लेकिन प्रतिभा पाटिल ने उसकी फांसी को उम्रकैद में बदल दिया। अभी राष्ट्रपति के पास बलात्कार पर फांसी के जो मामले माफी के लिए पड़े हैं, उनमें एक मामला हरियाणा का है जिसमें हत्यारे ने अपने भाई के साथ मिलकर उस परिवार के पांच लोगों को मार डाला था, जिस पर परिवार की एक लड़की से उसने बलात्कार किया था। मार्च 1999 से उसका मामला राष्ट्रपति के पास पड़ा हुआ है। इन तेरह बरसों की जिंदगी उसे राष्ट्रपति की वजह से मिली है। 
ऐसे मामलों को लेकर यह सवाल उठता है कि निचली अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बचाव का हर मौका मिलते हुए भी जिस मुजरिम को हर अदालत ने सिर्फ फांसी का हकदार पाया है, उनको माफ करने का हक किसी राष्ट्रपति को क्यों होना चाहिए? और राष्ट्रपति के दफ्तर की तो मुहर होती है, मोटे तौर पर तो ऐसे मामलों में केंद्र सरकार की सिफारिश से ही सब कुछ होता है, और यह केंद्र सरकार धर्म, जाति, क्षेत्र जैसी बातों को ध्यान में रखते हुए अपने वोटों को बचाते हुए भी ऐसे फैसले लेती है। तो ऐसा जान बचाने या जान ले लेने का आखिरी अधिकार अगर वोटों के आधार पर तय होता है, या निजी पसंद-नापसंद के आधार पर तय होता है, तो फिर कुर्सियों पर बैठे नेता ईश्वर भी बन बैठे हैं। एक तो लोकतंत्र देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के आखिरी फैसले के बाद विवेक से इस तरह के फेरबदल करने की इजाजत नहीं दे सकता, और भारत के संविधान का यह प्रावधान लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है। दूसरी बात यह कि जिस तरह एक-एक फाईल को राजनीतिक कारणों से दस-दस बरस से अधिक तक टांगकर रखा जाता है, उससे फांसी की सजा का सारा मकसद ही खत्म हो जाता है। हम पूरी तरह से फांसी के खिलाफ हैं, और इस सजा को खत्म करने के हिमायती हैं। लेकिन जब तक यह प्रावधान भारतीय कानून में बना हुआ है, तब तक राष्ट्रपति कानून से ऊपर केंद्र सरकार के साथ मिलकर विवेक का जो इस्तेमाल कर रहे हैं, वह पूरी तरह विवेकहीन है। 
अब हम आते हैं महिलाओं से महिलाओं को मिलने वाली सुरक्षा पर। एक तरफ देश में महिला आरक्षण का तर्क चल रहा है कि उससे महिलाओं की ताकत बढ़ेगी। दूसरी तरफ हम देख रहे हैं कि सोनिया गांधी की राज्य सरकारें, शीला दीक्षित की सरकार, ममता बैनर्जी खुद, इन सबका और इनके अफसरों का रूख बलात्कार के मामलों में, महिलाओं के हक छीनने के मामलों में भारी नकारात्मक और निराशाजनक रहा है। ममता बैनर्जी तो खुद ही एक असली बलात्कार को नकली बताने में, अपने खिलाफ साजिश साबित करने में जुट गई थीं, दिल्ली में केंद्र सरकार के बड़े अफसर, पुलिस कमिश्नर जब महिलाओं के तौर-तरीकों को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं तो सोनिया से लेकर शीला तक सब चुप रहते हैं। यही हाल देश और प्रदेशों में महिला आयोगों में बैठाई गईं राजनीतिक महिलाओं का है। और कल आई खबर के बाद अब यह साबित होता है कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने के बाद एक महिला भी बलात्कारी-हत्यारे मर्द को माफी देने का काम करती हैं। तो आज किस उम्मीद से महिलाओं को बचाने के लिए महिलाओं की तरफ देखा जाए? और किस फांसी का इंतजाम बलात्कारियों के लिए करने का सोचा जा रहा है? ऐसी कौन सी फांसी रहेगी जिसको माफ करने के लिए इस लोकतंत्र के भीतर पूरी तरह अलोकतांत्रिक राष्ट्रपति अपनी कलम लिए तैयार नहीं बैठे रहेंगे? छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार करके उनकी हत्या करने वालों को नीचे से ऊपर तक की अदालत जब फांसी देती है तो राष्ट्रपति, वह भी एक महिला राष्ट्रपति, से ऐसे मुजरिमों को माफी कैसे मिल जाती है? आज जब दिल्ली के गैंगरेप को लेकर राजधानी के लोगों को देश भर की मीडिया पर देखकर देश के सभी तबके विचलित हैं, तब यह प्रदर्शन राष्ट्रपति भवन की तरफ और प्रतिभा पाटिल की घर की तरफ क्यों नहीं मुड़ता? और राष्ट्रपति के रहम के हक का इस्तेमाल फाईल के भीतर करने वाली केंद्र सरकार की अगुवा सोनिया गांधी, उसके मुखिया मनमोहन सिंह के घर तरफ क्यों नहीं मुड़ता? 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम लगातार राष्ट्रपति के ऐसे हक के खिलाफ लिखते आए हैं, आज पाठक सोचें कि अगर ऐसा हक सुप्रीम कोर्ट से भी मौत की सजा पाने वाले बलात्कारी-हत्यारों को बचाने के काम आ रहा है, तो पांच और छह बरस की उन मासूम बच्चियों के दिल पर ऊपर उस जन्नत में क्या गुजर रही होगी? अगर ऐसे बलात्कारी-हत्यारों को जहन्नुम से बचाना राष्ट्रपति का हक है, तो उस हक को छीनकर कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए। 

मोदी ने गुजरात बरकरार रखा भाजपा ने हिमाचल खो दिया...


20 दिसंबर 2012
संपादकीय
गुजरात और हिमाचल, दोनों के चुनावी नतीजे मिलाकर देखें, तो भाजपा के लिए  इन दो राज्यों के चुनाव नुकसान के रहे। जिस हिमाचल प्रदेश में उसकी सत्ता थी, वहां अदालती कटघरे में खड़े हुए, केंद्रीय मंत्रिमंडल छोडऩे को मजबूर हुए, वीरभद्र सिंह ने चुनाव के अकेले सेनापति के रूप में भाजपा को परास्त कर दिया। हम इसे किसी भी पार्टी के लिए एक शर्मनाक नौबत मानते हैं कि उसे जुर्म के मामलों में बुरी तरह फंसे हुए किसी नेता की अगुवाई में चुनाव लडऩा पड़े, लेकिन हिमाचल में कांगे्रस को स्थानीय दबाव और पकड़ के चलते वीरभद्र सिंह को कमान देनी पड़ी थी और हमारी तरह आदर्श की बात करने वालों की नसीहत धरी रही। चारों तरफ तैरती भ्रष्टाचार की रिकॉर्डिंग वाली सीडी के चलते हुए भी वीरभद्र सिंह वहां जीत गए। लेकिन इस सत्ता पलट के ठीक उल्टे गुजरात में नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार शानदार तरीके से चुनावी जीत पाकर भाजपा के भीतर अपना दमखम एक बार फिर साबित कर चुके हैं। इसलिए भाजपा के जिन दो राज्यों में चुनाव हुए, उनमें से एक मोदी तकरीबन उसी जगह बने हुए हैं, और हिमाचल में भाजपा ने एक आरोपी कांगे्रस नेता के हाथों सत्ता खो दी है। 
अब अगर देखें कि इन दो राज्यों के ऐसे परस्पर विरोधी नतीजों के पीछे क्या वजह है? तो एक तरफ राष्ट्रीय भाजपा का यह तर्क है कि हिमाचल में हर चुनाव में सत्तापलट की पुरानी परंपरा रही है। दूसरी तरफ हिमाचल के भाजपा के कुछ नेताओं  का यह कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का नुकसान हिमाचल चुनाव में हुआ है। इन दोनों तर्कों के बीच अगर हिमाचल को देखें तो यह भी लगता है कि एक तरफ कांगे्रस अगुवाई वाली यूपीए की केंद्र सरकार की जो बदनामी देश भर में फैली है, उसका नुकसान भी हिमाचल में कांगे्रस को हुआ होगा, और वीरभद्र सिंह पर दर्ज भ्रष्टाचार के जुर्म का नुकसान भी वहां कांगे्रस को ही हुआ होगा, फिर भी वहां भाजपा निपट गई। दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की उतनी ही बदनामी गुजरात भी पहुंची होगी, लेकिन नरेन्द्र मोदी के राज में उसका कोई असर नहीं हुआ। लगातार इतने बरस से चल रही सत्ता के खिलाफ जनता में एक स्वाभाविक नाराजगी आ जाती है, उसका असर भी नहीं हुआ। चुनाव के पहले गुजरात में कुपोषण के आंकड़े सामने आए जो कि चौंकाने वाले थे, लेकिन उसका असर भी नहीं हुआ। और नरेन्द्र मोदी करीब-करीब उतनी ही सीटों के साथ जीतकर आ गए।  इसलिए दिल्ली के मुद्दे उन्हीं राज्यों में अधिक असर करते दिख रहे हैं, जहां पर राज्य की सरकार का काम दमदार नहीं है। और नरेन्द्र मोदी का काम वहां पर आर्थिक मोर्चे पर दमदार है, इसमें क्या शक है। आर्थिक मोर्चे से परे 2002 के गुजरात दंगों के जो दाग मोदी पर लगे हैं, उनके चलते भी वे वहां बहुसंख्यक समुदाय के बहुमत के साथ अब एक स्थाई सरकार की तरह हो गए हैं, और चुनावी जीत का एक सफल फार्मूला उन्होंने समझ लिया है। मोदी के बारे में एक दूसरी बात इस चुनाव में यह रही कि उन्होंने खुद ऐसी हवा को बढ़ावा दिया कि वे भाजपा के सबसे संभावित राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देश के प्रधानमंत्री पद के अगले दावेदार हो सकते हैं, और इन चुनावों में किन्हीं मुद्दों की गैरमौजूदगी की नौबत में मीडिया गुजरात के नतीजों की राष्ट्रीय संभावनाओं पर ही बात करते रह गया। चुनाव तो हो रहा था गुजरात का, लेकिन बात हो रही थी प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की। नरेन्द्र मोदी ने अपने पिछले दो चुनावों में कांगे्रस के सिर्फ राष्ट्रीय नेतृत्व पर हमले किए, इससे एक तरफ जहां उन्होंने गुजरात के कांगे्रस नेताओं को देखने के लायक भी नहीं जैसा साबित किया, और दूसरी तरफ अपने-आपको एक राष्ट्रीय नेता भी साबित किया। कल उन्होंने जापान के चुनावों में वहां लीड कर रही एक पार्टी के मुखिया को बधाई संदेश भेजा, जबकि भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं को शायद यह मालूम भी नहीं होगा कि जापान में चुनाव हो रहे हैं, और वहां कौन सी पार्टी लीड कर रही है।
इन दो नतीजों को अगर देखें तो एक बात साफ लगती है कि सरकारी कामकाज कुल मिलाकर अगर बेहतर होता है, तो पार्टी पीछे रह जाती है, और सरकार का मजबूत मुखिया अपनी पार्टी को फिर चुनाव जिता देता है। कुछ बरस पहले के चुनावों में दिल्ली, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यही हुआ था। और गुजरात में तो भाजपा और नरेन्द्र मोदी के बीच का तनाव साफ था। उनको वहां किसी राष्ट्रीय नेता की जरूरत नहीं थी, और एक तरह से नरेन्द्र मोदी इस चुनाव को मोदी छाप पर बटन दबाकर वोट डालने का चुनाव बना चुके थे, और मानो यह कहा गया था कि कुछ तकनीकी मजबूरियों से वोटिंग मशीन पर मोदी की जगह कमल निशान लगाया गया था। मोदी की जीत को अब हम 2002 और 2007 की जीत से ऊपर उठ चुकी जीत मानते हैं, और इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि उनकी सरकार से जनता को, वहां के कारोबारियों को मोटे तौर पर कोई शिकायत नहीं थी। कांगे्रस का पूरा चुनावी अभियान भी देखें, तो भी उनके पास मोदी के खिलाफ फूहड़ और झूठे इश्तहारों के अलावा कोई मुद्दे नहीं थे। अपनी ऐसी सरकार के दम पर ही मोदी अकेले ही पूरी पार्टी को, बाकी संघ परिवार को हाशिए पर रखकर अकेले चुनाव लड़कर जीत गए, उस पूरे राज्य में उनके अलावा न कोई संगठन और न कोई नेता बच गए हैं। और दंगों के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान सिर्फ सरकार में लगाया था, और बेहतर कामकाज से उनको यह नतीजा मिला है। देश के बाकी राज्यों को भी मोदी के गुजरात से इतना तो समझने का मौका मिलता ही है कि बेहतर सरकार सीधे-सीधे बेहतर नतीजों तक ले जाती है।
इन दो राज्यों के चुनावों में मोदी एक ही राज्य जिता सकते थे, और वह उन्होंने जिता दिया। उनकी पार्टी से बगावत करके निकलने वाले लोग एक किस्म से पंचतत्व में विलीन हो गए हैं। और हिमाचल के नतीजे साथ-साथ आने से यह भी जाहिर है कि दिल्ली में कांगे्रस के भ्रष्टाचार से मोदी को गुजरात में कोई चुनावी फायदा मिला हो, ऐसा भी नहीं है। इस मौके पर कांगे्रस के बारे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि उसने पिछले तीन चुनावों में धीरे-धीरे करके अपनी हस्ती खत्म की, और वहां पर अपनी लीडरशिप के स्तर पर ऐसा शून्य खड़ा किया है जिसमें कि किसी न किसी विपक्षी आंधी का आकर घर बना लेना तय था ही। आज कांगे्रस के पास हिमाचल को लेकर एक बार फिर बददिमाग हो जाने का मौका है कि भ्रष्टाचार कोई चुनावी मुद्दा नहीं होता। लेकिन बाकी देश कांगे्रस के साथ हिमाचल की तरह बर्ताव करेगा, ऐसा नहीं है। इसलिए आज कांगे्रस जितनी राहत में दिख रही है, अगले आम चुनाव के आसार वैसी राहत के हैं नहीं। 

आंसू भरी आंखों में दूरदृष्टि नहीं हो सकती


19 दिसंबर 2012
संपादकीय
जिस वक्त संसद में बलात्कार पर फिक्र हो रही है, और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के घर के बाहर चल रहे प्रदर्शन को तोडऩे फायर बिग्रेड की पानी की धार चल रही है, उसी वक्त हम तीन दिनों आज दूसरी बार बलात्कार पर लिख रहे हैं। दिल्ली दरअसल देश और मीडिया दोनों के दिल में रहने वाली जगह है। दिल्ली बोलकर देखें तो दिल ही किस्म का शब्द लगता है। इसलिए वहां होने वाले हर हादसे पर देश की फिक्र कुछ अधिक होती है। वहीं हुए इस जुर्म के चलते अगर देश ऐसे और अधिक जुर्म रोकने के लिए, कम करने के लिए कुछ कर सकता है, तो इससे देश की उन तमाम जख्मी या मुर्दा लड़कियों-महिलाओं पर भी कुछ मरहम लग जाएगा, जो कि  जगह-जगह इसी तरह के सामूहिक बलात्कार की शिकार होकर जिंदा जला दी जा चुकी हैं, तेजाब से बदशक्ल बनाई जा चुकी हैं, या थानों में दुबारा-तिबारा बलात्कार झेल रही हैं। 
लेकिन हमारी फिक्र यह है कि जया भादुड़ी के आंसुओं से लेकर मीरा कुमार की तकलीफ तक के चलते लोकसभा और राज्यसभा एक अधिक कड़े कानून की जरूरत गिना रही हैं। दूसरी तरफ इन सदनों से बाहर सार्वजनिक रूप से देश के चर्चित चेहरे बलात्कार पर मौत की सजा मांग रहे हैं, और बलात्कारियों को बधिया बना देने की मांग भी कर रहे हैं, ताकि वे आगे किसी बलात्कार के लायक न रह जाएं। जब कभी कुछ हादसों के तुरंत बाद नए कानून की मांग होती है, तो विचलित देश को लुभावने आंसू पेश करने के लिए बहुत से लोग ऐसी बातें कहते हैं, जो हकीकत का एक हिस्सा ही रहती हैं। जैसे आज हर कोई बलात्कार पर अधिक कड़े कानून की वकालत करते हुए अपनी फिक्र को दर्ज करा रहे हैं। लेकिन इनमें से कम ही लोग ऐसे हैं जो इस बात पर एक लंबे आत्मविश्लेषण की बात उठाएं कि मौजूदा कानून का कितना इस्तेमाल आज की न्याय-व्यवस्था के भीतर हो पा रहा है। यह ठीक है कि कानून काफी कड़ा होना चाहिए, लेकिन पिछले कानून को लागू करने का इंतजाम देखे बिना सिर्फ कानून को कड़ा करते चले जाना कुछ वैसा ही है जैसा कि सरकारी अस्पतालों में बिना तकनीकी अमले के महंगी मशीनों को खरीदते चलना। कड़े कानून से कुछ नहीं होता जब तक कि मौजूदा कानून पर अमल ही इतना नर्म हो, बोगस हो कि उसका कोई मानसिक दबाव ही बलात्कारियों पर न हो, तो नए कानून के पहले पुराने के इस्तेमाल के बारे में बात करनी चाहिए। यह इस्तेमाल अधिक मुश्किल काम है, इसके लिए पूरे देश में बिखरे हुए नेताओं को अपने पसंदीदा लोगों को जुर्म करने के बाद बचाने की अपनी नीयत बदलनी होगी, पुलिस और न्यायपालिका के लोगों को अपना भ्रष्टाचार कम करना होगा, नालायकी खत्म करनी होगी, और अपने बर्ताव में इंसानियत कही जाने वाली एक संवेदनशीलता लानी होगी। समाज के भीतर महिलाओं की इज्जत बढ़ानी होगी। और जब इतने सारे मुश्किल काम करना सब लोगों के लिए लगभग नामुमकिन सा हो, तो ऐसे लोग मिलकर कानून को और कड़ा करने की बात करते हैं। जिसके लिए इस देश के दो बड़े-बड़े गोल कमरों में बैठकर हजार से कम लोग कुछ दिनों में ही एक नया कानून बना सकते हैं। एक आसान मुखौटे को बनाने का काम सड़कों के किनारे हर बरस रावण बनाने वाले लोग करते ही हैं, लेकिन अपने भीतर के, अपने आसपास के रावण को मारने के मुश्किल काम से मुंह चुराकर सिर्फ दशहरे पर पुतला जलाने में सबको बहादुरी लगती है। ऐसा ही रावण इस वक्त देश की संसद में मारा जा रहा है। इस संसद में उन तमाम पार्टियों के लोग बैठे हैं जिन पार्टियों की राज्य सरकारों के राज में आए दिन सामूहिक बलात्कार हो रहे हैं, और ऐसी लड़कियों को जलाकर मारा जा रहा है, उनके साथ इन सरकारों की पुलिस, इन सरकारों के नेता अपनी हिंसा के साथ कहीं शारीरिक बलात्कार कर रहे हैं, तो कहीं जुबान से बलात्कार कर रहे हैं। और जुबान से बलात्कार में तो राज कर रही महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। यह बात भुलाए नहीं भूलती कि किस तरह मुख्यमंत्री बनते ही ममता बैनर्जी को अपनी राज में हो रहे बलात्कार, उनकी सरकार को बदनाम करने की साजिश लगने लगे थे। वह तो भला हो उनकी पुलिस का, जिसने कि ऐसी बददिमाग मुख्यमंत्री की सनक का ख्याल किए बिना यह साबित किया कि बलात्कार कोई राजनीतिक साजिश नहीं था, और वह सच में ही हुआ था। दो दिन पहले ही हमने महिला आयोगों की महिला सदस्यों के बारे में भी इसी तरह की बात लिखी है जिसे दुहराने की आज यहां जरूरत नहीं है। इसके अलावा तेज रफ्तार अदालती कार्रवाई जैसी कुछ और बातों को हमने उसमें लिखा था, जिनके बिना आज की यहां की बात पूरी नहीं हो सकती, लेकिन उन सारी बातों को इतनी जल्दी यहां दुहराना ठीक नहीं है। इसलिए दो दिन पहले के संपादकीय 'देश की राजधानी में सड़क पर ऐसे बलात्कार से उठे सवालÓ के साथ-साथ ही इसे देखें।
देश की तकलीफ और संसद के आंसुओं के इस मौके पर नए कानून को बनाने की हड़बड़ी पर हम इतना ही कहना चाहते हैं कि आंसू भरी आंखों में दूरदृष्टि नहीं हो सकती।

भरोसे की इमारत उठेगी ईंट दर ईंट


संपादकीय
18 दिसंबर, 2012 
भारत में आकर रहमान मलिक ने क्या कहा, और क्या नहीं कहा, इसे लेकर बहुत कुछ कहा गया... मलिक के दौरे के पूरे समय संसद और गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान उनकी एक-एक बात को खुर्दबीन से परख कर, मीडिया के एक तबके ने एक-एक मुद्दा बयानबाजों को जिस तरह परोसा और जिस तरह नेताओं ने उन पर बयानबाजी की,  वह शायद उनकी सियासी मजबूरी रही होगी। संसद में विपक्षी दलों को सरकार को घेरने मुद्दे की जरूरत थी, तो बेहद लम्बे खिंचे गुजरात चुनाव प्रचार में, विकास की बातें कर-कर के थक चुके नरेन्द्र मोदी को पाकिस्तान को कोसना, शायद मतों के ध्रुवीकरण का ज्यादा आसान तरीका लगा। बहरहाल मलिक के दौरे का मूल्यांकन करते हुए यह कहना बेजा नहीं होगा, कि वह संसद के सत्र और गुजरात के सनसनीखेज चुनावों के बीच भारत आना उनके खिलाफ काम कर गया, लेकिन रहमान मलिक के भारत दौरे को सिरे से खारिज करते हुए, सद्भावना को बेकार कवायद बताने से पहले, यह सोचना भी जरूरी है कि उन्होंने भारत में आकर जिस तरह से बातें कीं, क्या उनसे कुछ साल पहले का, पाकिस्तान का कोई गृह मंत्री यह कर सकता था?और यह भी, कि  मलिक की भारत यात्रा के बुनियादी मकसद, एक उदार वीजा नीति के अमल से दोनों देशों की सामान्य जनता की कितनी मुश्किलें आसान हो जाएंगी। यह बात भी अहम है, कि एक ऐसे पड़ोसी देश से दुश्मनी कितनी लम्बी खींचना ठीक होगा, जहां इस देश के कई लोगों की रिश्तेदारी है, जिसकी जनता के कई रिश्तेदार यहां रहते हंै, जिसके साथ भारत के व्यापार और पर्यटन विकास की ढेरों गुंजाईश है, जिसके भारत के साथ अच्छे सम्बन्ध हो तो सीमापार के आतंकवाद को नाथने में यकीनन आसानी हो सकती है, और इस पर आज बर्बाद हो रहे भारत के कितने ही संसाधन बचाए जा सकते हंै। यह बात नजरअन्दाज करना भी ठीक नहीं होगा, कि मलिक एक उदार वीजा नीति पर अमल की शुरुआत के लिए आए थे, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारियों की आमदरफ्त पर लगी बन्दिशें कम होनी हंै, इसके कारण अब दोनों देशों के 65 बरस यह उससे अधिक के बुजुर्गो और बच्चों के पाकिस्तान और भारत पहुंचते ही वीजा दे दिया जाएगा। यह वीजा नीति भारत और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्रियों एस.एम.कृष्णा और हिना रब्बानी खार के बीच इस बरस सितम्बर में हुए समझौते के तहत लागू हो रही है, उसमें सामूहिक पर्यटन  के अलावा वीजा के लिए की जाने वाली अर्जियों के 45 दिनों के भीतर निपटारे की बात भी कही गई है। पहले यात्रा के 24 घंटे पहले जारी किए जाने वाले वीजा से दोनों तरफ के यात्रियों को होने वाली दिक्कतों से इस नीति में छुटकारा दिया गया है। यह वीजा नीति केवल दूसरे देश से आने वाले नागरिकों के लिए बनाई गई एक अकेली नीति भर नहीं है। यह दोनों देशों के बीच भरोसा कायम करने की एक और पहल है, जिसके लिए दोनों देशों की सरकारों की कोशिशें तारीफ के काबिल है,  क्योंकि इससे दोनों देशों की अवाम को एक-दूसरे से मिलने-जुलने, एक-दूसरे के यहां आने-जाने, एक-दूसरे को करीब से देखने समझने के पहले से ज्यादा मौके, पहले के मुकाबले बहुत कम दिक्कतें झेलकर मिल जाएंगे। इससे भी अच्छी बात यह है कि इसका फायदा दोनों तरफ की एकदम सामान्य जनता उठाएगी। 
एक उदार वीजा नीति पर अमल शुरू करवाने रहमान मलिक का यहां आना और 26 /11 जैसे मसलों पर खुल कर बोलना, पाकिस्तानी सरकार के किसी नुमाइन्दे के लिए आसान नहीं रहा होगा। अगर मलिक ने कुछ ऐसी बातें कही हंै, जिस पर भारत के कुछ नेताओं, मीडिया के एक तबके को एतराज है, तो पाकिस्तान में भी ऐसा तबका है, जिसे दोनों देशों के बीच किसी भी तरह की उदार पहल, दोनों देशों की जनता को करीब आने के लिए दिए जा रहे किसी भी मौके पर एतराज है, लेकिन यह बात भी ध्यान देने लायक है, कि जहां इतने बरसों पाकिस्तान की कोई सरकार कश्मीर सिवाय भारत के बारे में कोई बात नहीं करती थी, वहीं पाकिस्तान की मौजूदा सरकार ने लगातार भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिशें जारी रखी हंै। अगर भारत सीमापार से आतंकवाद झेल रहा है, तो पाकिस्तान सरकार भी अपने घर-आंगन में तालिबानी धमकियों, आतंकवाद, अमरीकी ड्रोन हमलों, आईएसआई का दबाव, सरकार और न्यायपालिका में टकराव और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से जूझ रही है। उसके एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री को सर्वोच्च न्यायालय के हुक्म पर पद छोडऩा पड़ा है। इन सबके बीच पाकिस्तान सरकार का सरबजीत के बारे में दरियादिली दिखाना या भारत की न्यायपालिका का बुजुर्ग चिश्ती को मुकदमा खत्म होने से पहले पाकिस्तान जाने देना, ऐसे कदम हैं, जिनसे दोनों देशों के बीच तनाव कुछ हद तक कम होता है। आधी-पौनी सदी तक तनाव और नफरत झेलते आ रहे दोनों देशों में ऐसी ताकतें मौजूद हैं, जिनकी दुकानदारी इनके बीच नफरत, शक और बदमजगी से ही चलती हैं। दोनों देशों की अमन पसन्द जनता की मुश्किल यह है कि उकसावे की एक चिंगारी जहां तनाव कई गुना बढ़ाने की ताकत रखती है, वहीं भरोसे का एक-एक कदम उठाने में बहुत वक्त लग जाता है।
रहमान मलिक पंजाब में जन्मे थे, जो हिस्सा अब पाकिस्तान का पंजाब कहलाता है, लेकिन भारत के पंजाब में पिछले दिनों टेक्नोलॉजी के करिश्मे से बात की बात में एक इमारत खड़ी हो गई। ऐसा करिश्मा उन मामलों में तो देखा जा सकता है, जिनमें मामला मशीन, कंक्रीट लोहे का हो, लेकिन जहां सरहदी इंसानी जज़्बात और लहूलुहान इतिहास की बात आती है, भरोसे की इमारत ईंट-दर-ईंट ही खड़ी हो सकती है। ऐसे समय में, जब दोनों देशों के मीडिया में एक ऐसा आक्रामक तबका सक्रिय हो, जो दोनों तरफ के नेताओं के बयानों पर हमेशा भेडिय़े की तरह झपटने को तैयार हो, जहां अपनी राजनीतिक विचारधारा के तहत सरकार की पाकिस्तान संबंधी नीतियों का विरोध देश के प्रमुख विपक्षी दल की मजबूरी हो और जहां कौमी रूप से संवेदनशील समझे जाते एक राज्य में विभाजनकारी ठहराए जाते नेता के लिए सरहदी मुद्दे उठाकर वोट हासिल करना वक्त की नजाकत हो, ऐसे समय में मलिक के दौरे से दोनों देशों के साधारण लोगों को होने वाले फायदे की बात नजरअन्दाज नहीं की जा सकती। हालांकि यह सच है कि उदार वीजा नीति पर समझौता कृष्णा और रब्बानी खार पहले ही कर चुके थे, लेकिन पाकिस्तान जिन सुलगते हालात में अपनी हस्ती टिकाए हुए है, उनमें सितम्बर में किए हुए वायदे को दिसम्बर तक निभा पाना और उसे आगे ले जाने की कोशिश करना रहमान मलिक की सरकार की एक उपलब्धि है। भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों के बीच के तनाव में दो पक्ष जरूर हैं, लेकिन भारत सरकार के पीछे एक सुदृढ़ प्रजातांत्रिक व्यवस्था है, जो मजबूत संवैधानिक आधार पर खड़ी है, जबकि पाकिस्तान की मौजूदा सरकार अपने देश में जैसे-तैसे पैर टिकाए रखने की कोशिश भर कर रही है। दो देशों की सरकारों के बीच का यह संबंध बराबरी का नहीं है और हर तरह की कमजोरी और दबाव के बावजूद इसे मजबूत बनाने की कोशिशें कर रही पाकिस्तान सरकार को इसका श्रेय मिलना ही चाहिए। इस देश में रहमान मलिक के बयानों से नाराज लोगों को इस बात पर गौर करने की जरूरत है।
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देश की राजधानी में सड़क पर ऐसे बलात्कार से उठे सवाल


17 दिसंबर 2012
संपादकीय
दिल्ली में कल रात एक निजी बस में अपने एक दोस्त के साथ जा रही एक मेडिकल छात्रा के साथ बस के ही आधा दर्जन मुसाफिरों ने बलात्कार किया और उन दोनों के साथ मारपीट करके उन्हें चलती बस से फेंक दिया। लड़की की हालत अस्पताल में नाजुक बताई जा रही है, और पुलिस मुजरिमों की तलाश में लगी है।
दिल्ली में बलात्कार के मामलों को देखें तो दिल दहलने लगता है। औसतन हर दिन वहां एक से अधिक बलात्कार पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज हो रहे हैं, और अगर एक अंदाज लगाया जाए, तो इससे कई गुना अधिक बलात्कार पुलिस तक नहीं भी पहुंचते होंगे। लेकिन सड़क पर दौड़ती हुई बस के भीतर मुसाफिर गिरोहबंद होकर अगर यह जुर्म करते हैं, तो फिर बोलने के लिए मानो शब्द ही नहीं बच जाते। और यह हाल उस दिल्ली का है जिसके तकरीबन हर सड़क पर रात से सुबह तक पुलिस या तो तैनात रहती है, या गश्त करती रहती है। किसी एक घर में किसी अकेली महिला से बलात्कार तो समझ में आता है, लेकिन सार्वजनिक बस में, देश की राजधानी की सड़कों पर, अपने दोस्त के साथ जा रही एक पढ़ी-लिखी लड़की के साथ ऐसी ज्यादती बहुत से सवाल खड़े करती है। 
यह याद रखने की जरूरत है कि इसी शहर में कुछ महीने पहले जब एक कामकाजी महिला के साथ चलती हुई कार में कुछ लोगों ने अपहरण के बाद बलात्कार किया था, तो यहां की मूर्ख पुलिस कमिश्नर ने बयान दिया था कि कामकाजी महिलाएं रात आठ बजे के बाद अपने परिवार के पुरूषों के बिना अकेले न निकलें। इनके अलावा बहुत से दूसरे सत्तारूढ़ लोगों ने राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक लड़कियों के कपड़ों को बलात्कार के लिए जिम्मेदार मर्दानगी-उत्तेजना के लिए जिम्मेदार ठहराया था। और दिल्ली में सरकार चला रही एक महिला मुख्यमंत्री से लेकर देश की मुखिया एक दूसरी महिला तक के दिल्ली में रहते हुए, पुलिस के अफसर किस तरह की नालायकी की बातें करते हुए बचे रहे। उनको सत्ता से कोई फटकार तक नहीं मिली। 
भारत में मर्दों के सेक्स-अपराध की कहानियां भयानक हैं। और पुलिस तक पहुंचने वाले आंकड़े इसलिए समंदर में डूबे एक हिमखंड के बाहर निकले जरा से सिरे सरीखे हैं, क्योंकि बलात्कार के बाद शिकायत करने पहुंची महिला के साथ भारत में पुलिस खुद बलात्कार करने में जुट जाती है, और अदालतों में बरसों तक उसके तन-मन के साथ बलात्कार सी ज्यादती चलती रहती है। उत्तरप्रदेश में अभी दो दिन पहले ही बलात्कार की शिकार एक महिला शिकायत करने पुलिस तक पहुंची और वहां पुलिस अफसर ने फिर उससे बलात्कार कर दिया। और ऐसे ही मामलों के चलते हुए किसी महिला और उसके परिवार की यह हिम्मत भी नहीं होती कि हिंसा झेलने के बाद वे बरसों की सामाजिक प्रताडऩा और झेलें, और बलात्कार झेलें। इसलिए हम इस देश में बलात्कार की रिपोर्ट को अविश्वसनीय दर्ज की कम पाते हैं। बरस-दर-बरस अदालतों के गलियारों में कोई महिला बैठकर कब तक लोगों की निगाहों का सामना कर सकती है। और खासकर तब जब बलात्कार की शिकार महिलाओं में सबसे बड़ा हिस्सा गरीब, दलित-आदिवासी, कमजोर सामाजिक स्थिति वाली महिलाओं का है। वे क्या खाकर अमीर या ताकतवर, अपराधी मर्दों के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ सकती हैं?
महिला के खिलाफ हिंसक सोच सिर्फ कानून से जाने वाली नहीं है। कानून से परे इससे जुड़े एक पहलू पर तुरंत काम होना चाहिए, वह है महिलाओं से होने वाली ऐसी तमाम ज्यादती को मामलों की बंद अदालत में तेज रफ्तार सुनवाई का। सेक्स अपराधों की शिकार सारी लड़कियों या महिलाओं के लिए पहली पुलिस रिपोर्ट से लेकर, डॉक्टरी जांच और आखिरी अदालत तक की सुनवाई तक का पूरा सिलसिला संवेदनशील बनाने की जरूरत है। शुरू से अंत तक ऐसी लड़की या महिला की शिनाख्त सिवाय जरूरी कानूनी कागजात के, अलग रखनी चाहिए, ताकि वह आगे की सामाजिक प्रताडऩा से बच सके। इसके अलावा तेज रफ्तार की सुनवाई होनी चाहिए, ताकि बलात्कारियों को सजा होते दिखे। हमारा यह भी मानना है कि बलात्कारियों की अगर जायदाद है तो अपराध साबित होने पर उसका एक हिस्सा भी बलात्कार की शिकार महिला को मिलना चाहिए। सिर्फ कैद से समाज तक वह बात नहीं जा पा रही है जिससे कि ऐसे इरादों वाले दूसरे लोगों का हौसला पस्त हो। 
हमने राष्ट्रीय महिला आयोग और प्रदेशों के महिला आयोगों में बैठे लोगों की बातें ऐसे मामलों में एक सदमे के साथ सुनी हुई हैं। लोगों को याद होगा कि असम की राजधानी गुवाहाटी की सड़क पर एक लड़की के साथ शारीरिक छेडख़ानी और सामूहिक जुल्म के जिस मामले में अभी अदालत से सजा हुई है, उसकी जांच के लिए जब राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य पहुंची थीं, तो उन्होंने हंसते-खिलखिलाते तस्वीरें खिंचवाई थीं, और कई तरह की बकवास की थी। आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी अपने ही कार्यकर्ताओं में से ऐसे संवैधानिक पदों पर लोगों को बिठा देती हैं, जबकि इसके लिए देश में महिला अधिकार के आंदोलन में लंबे समय से जुड़े हुए कार्यकर्ता सड़कों पर ही रहते हैं। इस मामले को लेकर लोगों को अदालत तक जाना चाहिए कि संवैधानिक पदों पर लोगों को मनोनीत करने के लिए कुछ पैमाने तय हों, और सत्तारूढ़ पार्टी या विपक्ष से रिश्ता रखने वाले लोगों के मनोनयन से किसी निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं हो सकती। 
अभी यहां पर हम महिलाओं के लिए समाज में चली आ रही सांस्कृतिक ज्यादती की अधिक चर्चा नहीं करते, लेकिन इतना जरूर यहां याद दिलाना चाहेंगे कि जिस देश में प्रधानमंत्री लालकिले से आजादी के भाषण में दर्जन-दर्जन बार सिर्फ 'आम आदमीÓ कहता हो, वहां पर आम औरत को लोग बलात्कार के ही लायक अगर मानेंगे तो उसमें हैरानी की क्या बात है? और प्रधानमंत्री से दो पीढ़ी कम उम्र के अरविंद केजरीवाल जब क्रांतिकारी नारों के साथ अपनी पार्टी बनाते हैं, तो उसका नाम 'आम आदमी पार्टीÓ रखते हैं। और इन बातों पर न तो किसी महिला आयोग का ध्यान जाता और न ही देश की अदालतों का। यह बात शायद अधिक लोगों को मालूम ही नहीं है कि भारत के कानूनी कामकाज की भाषा में एक नागरिक को मर्द ही मानकर लिखा और बोला जाता है। जब तक ऐसी गैरबराबरी खत्म करने की कोशिश चारों तरफ से नहीं होगी, तब तक बलात्कार के शिकार महिलाओं से फिर बलात्कार होना जारी ही रहेगा।

औरों से अलग होने की हिम्मत रखने की हिम्मत


17 दिसंबर 2012
चार दिन पहले जब राज्यसभा में मायावती ने अपने जमीनी अंदाज में ऊंची कुर्सी पर विराजमान सभापति से यह सवाल किया कि वे रोज दोपहर 12 बजे के बाद सदन से चले जाते हैं, तब आरक्षण और कोटे के विधेयक पर कैसे बात होगी, तब बहुत से लोगों को लगा कि उनका कहने का अंदाज गलत था और संसद में अध्यक्षता कर रहे लोगों के बारे में ऐसी ऊंगली नहीं उठानी चाहिए। लेकिन हकीकत यह थी कि मायावती का सवाल हकीकत था, और उनके अंदाज के बिना इस तरफ लोगों का ध्यान गया भी नहीं होता कि महत्वपूर्ण मामलों के बीच राज्यसभा के सभापति रोजाना सदन से चले जाते हैं। 
दुनिया में प्राकृतिक न्याय के बहुत सारे मुद्दों के बारे में लिखते हुए मुझको यह बात बार-बार लगती है कि प्राकृतिक न्याय से परे बने हुए शिष्टाचार और रीति-रिवाजों का अगर एक सीमा से अधिक ख्याल किया जाता है तो फिर वह वैसा ही हो जाता है जैसा कि किसी ईश्वर की आराधना में आडंबरों की चमक के पीछे ईश्वर छुप जाता है। (ईश्वर का जैसा हिसाब-किताब दिखता है, उसे आदमी मानकर चलना ही ठीक है, उसके औरत होने की गुंजाइश नहीं है।) आज दुनिया के दो देशों के बीच रिश्तों की बात हो, या किसी संसद या विधानसभा के भीतर कही जा रही भाषा की बात हो, शिष्टाचार असल पर हावी हो गया है। सांसद और विधायक घंटों इस बात पर बहस कर लेते हैं कि कौन से शब्द संसदीय हैं, और कौन से शब्द संसदीय नहीं हैं, लेकिन इस बीच वे मुद्दे खो जाते हैं, जो इतनी ही बहस के दौरान दसियों हजार मौतें ले आते हैं। इसलिए कई बार बहुत खुरदरे अंदाज में खरी-खरी बातें जरूरी हो जाती हैं। 
दुनिया का कारोबार इन दिनों कागजी फूलों सरीखा हो गया है। लोग एक दूसरे के बारे में कुछ कहते हुए सच कहने से कतराने लगे हैं, और कुछ कहने या लिखने के पहले की-बोर्ड पर ऊंगलियां थम जाती हैं, कागज पर कलम रूकती है, और माइक्रोफोन के सामने जुबान अपने को संभालती है कि जिसके बारे में कहा जा रहा है, उनके चेहरे इसे देख-सुन-पढ़ कर कैसे बनेंगे? 
इस मुद्दे की इसलिए सूझी कि दुनिया में लोगों के निजी इस्तेमाल के सामान बनाने वाली एप्पल नाम की कंपनी को खड़ा करने वाले, और बड़ा करने वाले, अब गुजर गए स्टीव जॉब्स के काम के तरीकों पर कुछ लोगों ने लिखा है। दुनिया की सबसे कामयाब कंपनियों में से एक, और बहुत ही मौलिक-उत्कृष्टता के लिए दीवाने इस इंसान का काम का तरीका दुनिया की किसी भी मैनेजमेंट-किताब से परे था, उनसे उल्टा था। और यह तो साबित हो चुका इतिहास है कि वह अपने-आपमें सबसे कामयाब तरीका भी था। 
इस चर्चा का मकसद यह नहीं है कि लोग अपने साथ काम करने वाले लोगों पर भरोसा न करके, सिर्फ अपनी ही सोच को सही मानकर, दीवानगी की हद तक अपनी पूरी कंपनी को उस सोच पर झोंक दें। ऐसा किसी एक बिरले के साथ ही हो सकता था, और उसे आदर्श मानकर उसके तौर-तरीकों पर अमल करने वाले औंधे मुंह गिर जाएं यही खतरा अधिक हो सकता है। लेकिन फिर भी इस बिल्कुल अलग अंदाज को देखना जरूरी भी है, और उतना ही जरूरी है इस दुस्साहस को देखना कि किस तरह  अब तक चले आ रहे नियम-कायदों के खिलाफ जाया जा सकता है। 
स्टीव जॉब्स के बारे में कहा गया है कि वे अपनी कंपनी के भीतर आम सहमति बनाने पर कोई भरोसा नहीं रखते थे, और एक तानाशाह के अंदाज में महज अपने दिल की बात सुनते थे। वे एक बावले से ऐसे मुखिया थे जो कि बहुत बारीकी तक जाकर चीजों को देखते थे और कारोबारी मुखिया होने के बावजूद वे सामानों की खूबसूरती और खूबी पर इतना ध्यान देते थे जो कि कारोबार के लोग कभी नहीं दे पाते। 
अपनी कंपनी की बैठकों में उनको यह कहते हुए सुना गया था कि एप्पल के लोगों ने कंपनी की साख को तबाह कर दिया है, और इसके लिए इन तमाम लोगों को एक-दूसरे से नफरत करनी चाहिए। इसके अलावा स्टीव जॉब्स कंपनी के सबसे बड़े लोगों की बैठकों में ऐसी गालियों के लिए भी जाने जाते थे, कि जिनके खिलाफ कोई कानून तक जा सकता था। 
इन भीतरी बातों को छोड़ भी दें, तो यह तो दुनिया का देखा हुआ ही है कि किस तरह अपने जिंदगी के आखिरी महीनों तक उन्होंने जब एप्पल के किसी सामान को दुनिया के सामने पेश किया तो कार्यक्रम के स्टेज पर वे कभी किसी औपचारिक कपड़ों में नजर नहीं आए, और एक ऐसी साधारण जींस और टी-शर्ट में वे दिखते रहे जिसमें कि उनकी कंपनी का सफाई कर्मचारी भी रोजाना दिखता होगा। 
बात किसी एक इंसान की नहीं है, एक अंदाज की है। दुनिया के बंधे-बंधाए तौर-तरीकों के सींखचों के बीच जो लोग गुलाम हो जाते हैं, वे औसत दर्जे के रह जाते हैं। ऐसे लोग अगर कामयाब भी होते हैं, तो भी अपनी खूबियों के साथ जितनी कामयाबी उनके लिए मुमकिन हो सकती थी, वे उसके करीब भी नहीं पहुंच पाते। इसलिए जो लीडर होते हैं, उनको बंधे-बंधाए तौर-तरीकों से परे भी सोचना होता है। 
मायावती की जिस बात से यह चर्चा शुरू हुई थी, उस मायावती में भारतीय राजनीति में कामयाब होने के ऐसे कोई नुस्खे नहीं थे, जिनके लिए हिंदुस्तान के कामयाब नेता जाने जाते हैं। न वे किसी खास कुनबे की थीं, न वे अपने तौर-तरीकों को बहुत आकर्षक कह सकती हैं, और उनको मिजाज लोकतांत्रिक तो बिल्कुल ही नहीं है। ऐसे में वे सबसे गरीब तबके की राजनीति करते हुए, एक अकेले अपने दम पर एक पूरी पार्टी को अगर खड़ी कर सकीं, तो इसके पीछे उनके नेता कांशीराम के बाद की उनकी अपनी मौलिक सोच, और सार्वजनिक जीवन के तौर-तरीकों के लिए उनकी हेठी की ताकत भी रही।
इसलिए बाकी लोगों से अलग होने से जिनके दिल दहलते हों, वे अपनी मुमकिन-ऊंचाईयों तक पहुंच भी नहीं पाते। दुनिया के कामयाब देशों को देखें, वहां के लोगों को देखें तो कुल मिलाकर यह समझ आता है कि जो लोग परंपराओं और तौर-तरीकों की जंजीरों को तोड़कर आगे बढऩे का हौसला रखते हैं, वे ही लोग लीडर बन पाते हैं। औसत दर्जे के लोग हाल और फिलहाल को जारी रखते हुए औसत ही रह जाते हैं। 
इस बात को कुछ और साफ करके समझना हो तो कुछ मिसालें देखी जा सकती हैं। दुनिया में दलितों के लिए सबसे अधिक मददगार एक धर्म के रूप में बौद्ध धर्म को शुरू करने वाले गौतम बुद्ध शायद क्षत्रिय राजकुमार थे। एक अलग तरीके से दलितों और कमजोर-अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े एक हिमायती गांधी, इन तबकों से परे के सवर्ण-बनिया जाति के थे, और आसानी से एक मुनीम की नौकरी पा सकते थे। बंगाल से लेकर आंध्र और छत्तीसगढ़ तक, सबसे कुचले हुए, शोषित और आदिवासी लोगों के मुद्दों को हथियारबंद होकर उठाने वाले अधिकतर नक्सल नेता सवर्ण तबके के थे और हैं। इन सबके सामने यह सुविधा थी कि वे अपने वर्ग या वर्ण के भीतर मजे से अपनी खूबियों के बल पर सहूलियत की जिंदगी जी सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने तबके के तौर-तरीकों को तोड़कर आगे बढऩा तय किया, अपनी पगडंडी खुद बनाई, जो कि आज अपने-अपने किस्म का राजमार्ग बन गई है। 
इसलिए औरों से अलग होने की हिम्मत रखने की हिम्मत होनी चाहिए। 

अमरीका को लगी ठोकर से यहां संभलने की जरूरत


संपादकीय
16 दिसंबर 2012
अमरीका के एक स्कूल में एक सिरफिरे समझे जा रहे नौजवान ने गोलियों से दर्जनों बच्चों को भून दिया, उस पर कल ही हमने इसी जगह लिखा। इसलिए आज उस पर नया लिखने को कुछ नहीं है। लेकिन इस हत्यारे से जुड़ी हुई जो खबरें आई हैं उन पर भारत के लोगों के सोचने का भी एक पहलू है। इस नौजवान की मां को बंदूकों से बहुत मोहब्बत थी और वह अपने बेटों को पास की एक शूटिंग-रेंज पर ले जाया करती थी, जहां पर कि बंदूकों के शौकीन बहुत से लोग पै्रक्टिस के लिए आया करते थे। और वह बंदूकों के अपने संग्रह के बारे में भी लोगों से फख्र के साथ बात किया करती थी। दो दिन पहले जब वह अपने बेटों के हाथों मारी गई, तब उसी की बंदूक उसके खिलाफ इस्तेमाल हुई और इसके बाद वह बेटा इसी मां के स्कूल जाकर वहां छब्बीस और लोगों को मार बैठा। 
हिंदुस्तान में बड़े बुजुर्ग हमेशा से यह कहते हैं कि घर का वातावरण अच्छा रखना चाहिए। यहां की कहानियों में यह लिखा हुआ है कि किस तरह मां के पेट में रहते हुए अभिमन्यु ने चक्रव्यूह तोडऩा सीखा। इसी तरह इस देश में यह भी माना जाता है कि जब कोई महिला मां बनने वाली होती है, तो उसे अच्छा सुनना चाहिए, अच्छा देखना चाहिए। कुल मिलाकर बात यह है कि पैदा होने के पहले, या पैदा होने के बाद, लोगों को एक बेहतर माहौल की जरूरत होती है। जो लोग यह मानते हैं कि लोग पैदाइशी अच्छे या बुरे होते हैं, वे विज्ञान के कुछ आधे-अधूरे नतीजों को मान बैठते हैं, या फिर हमेशा से चली आ रही तर्कहीन कहावतों और मुहावरों को। दरअसल होता यह है कि किसी भी बच्चे की सोच बनने में उसके आसपास के माहौल का ही पूरा असर होता है। यह माहौल परिवार का भी हो सकता है, पड़ोस का भी हो सकता है, स्कूल या दोस्तों का भी हो सकता है। और आज के जमाने में इन सबसे परे, टीवी और इंटरनेट का भी हो सकता है। इसलिए जब कोई मां अपने बच्चे के सामने बंदूकों के अपने शौक को गर्व के साथ बखान करती है, और जब कोई बच्चा बचपन से ही इन बंदूकों के बीच सांस लेते बड़ा होता है, तो उसके इन बंदूकों के इस्तेमाल करने का खतरा भी बढ़ जाता है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि बंदूकें किन्हीं मुजरिमों के मारने के, बुरे लोगों को मारने के काम नहीं आतीं, वे अधिकतर मामलों में सिर्फ बेकसूरों को मारने के काम आती हैं। कभी अपने को, कभी अपने जीवनसाथी को, और जैसा अभी हुआ, अपनी मां को और उस मां की नौकरी वाले स्कूल के दर्जनों लोगों को।
इसलिए लोगों को यह सोचने और समझने की जरूरत है कि उनके और उनके बनाए हुए माहौल का असर बच्चों पर बहुत दूर तक पड़ता है। जो मां-बाप बीड़ी-सिगरेट पीते हैं, उनके बच्चों के इस लत में पडऩे का खतरा अधिक होता है। ऐसा ही हाल बदजुबानी का है, जो लोग बातचीत में गालियां देते हैं, उनके बच्चे या उनके आसपास के बच्चे इन बातों को तेजी से सीखते हैं। जो बच्चा अपने पिता के हाथों अपनी मां से बदसलूकी देखते बड़ा होता है, वह आगे चलकर पिता से नफरत तो करता ही है, उसके खुद के हिंसक होने के खतरे बढ़ जाते हैं। हिंदुस्तान के आम परिवारों में लोग बच्चों के सामने बात करते हुए सामाजिक न्याय को भूल जाते हैं। कहीं कोई परिवार गरीबी को मूर्खता बताने लगता है, तो कहीं किसी आरक्षित तबके को सरकारी दामाद कहने लगता है। ऐसी सारी भाषा लोगों के मन में बचपन से ही बैठते चलती है और बड़े होने पर ऐसे बच्चों की सोच बदलने की गुंजाइश कम रहती है। आज इस पर लिखने का हमारा मकसद यह है कि भारत के मां-बाप इस पूरे हादसे को लेकर, और उसके पीछे इस हत्यारे नौजवान की मां की शौक और पसंद को देखते हुए, अपने खुद के बारे में सोचें-विचारें। यह देखें कि क्या उनकी कोई बात तो उनके बच्चों को गलत राह पर नहीं धकेल रही। अमरीका के इस हादसे से अगर हिंदुस्तान के मां-बाप, खुद बड़ी ठोकर खाने के पहले अपने को संभाल सकें, तो उसी में समझदारी है।

दर्जनों अमरीकी बच्चों की हत्या के आगे-पीछे की वजहें...


संपादकीय
15 दिसंबर 2012
अमरीका के एक स्कूल में कल जिस तरह एक सिरफिरे समझे जा रहे नौजवान ने ऑटोमेटिक बंदूकों से 26 लोगों को मार डाला, उससे पूरा देश तो हिल ही गया है, दुनिया भर में लोग ऐसी बड़ी हिंसा के बारे में फिक्र करने को मजबूर हो गए हैं। हर कुछ महीनों के बाद अमरीका से किसी स्कूल या कॉलेज, या किसी और जगह इसी तरह से थोक में भयानक हिंसा की वारदात सामने आती है। और हर बार ये सवाल उठते हैं कि अमरीकी नागरिकों को निजी सुरक्षा के नाम पर अनगिनत हथियारों की खरीद के जो हक मिले हुए हैं, क्या वे जरूरत से अधिक आजादी साबित नहीं हो रहे हैं? हथियारों को बनाने वाली कंपनियां वहां की सरकार और राजनीतिक पार्टियों के बीच लगातार एक आक्रामक लॉबिंग करके ऐसा माहौल बनाकर रखती हैं कि बड़े-बड़े ऑटोमेटिक हथियार लेकर रखना भी व्यक्तिगत आजादी है। आज तक ऐसी जितनी भी वारदातें हुई हैं उनमें किसी में भी किसी पुलिस या फौज के हथियार से इतनी अधिक हत्याएं नहीं हुईं, जैसी कि कल हुई है। ऐसे तमाम मामले निजी हथियारों से किए गए, और उसके बावजूद वहां पर हथियार उद्योग की ताकत इस पर रोक लगने नहीं देती।
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि ये हत्याएं हथियारों के आसानी से मिलने की वजह से नहीं हैं, और लोग निजी जिंदगी के तनाव से ऐसी हिंसा करते हैं। निजी जिंदगी का तनाव तो भारत में भी कम नहीं है, अमरीका के मुकाबले यहां हजार गुना अधिक ही है, क्योंकि यहां गरीबी अधिक है, बेइंसाफी अधिक है, सरकारी दफ्तरों में सुनवाई नहीं है, अदालतों में फैसले नहीं है, संसद के लोग बार-बार भ्रष्ट साबित होते हैं, लेकिन उसके बाद भी किसी तरह का तनाव इतनी बड़ी हिंसा तक नहीं पहुंच पाता, क्योंकि ऐसे भयानक हथियार निजी लोगों के पास न रहना भी एक वजह है। इसलिए कुतर्क के लिए यह कहा जा सकता है कि हथियार अपने आप तो किसी की हत्या करते नहीं, और इंसान ही ऐसा करते हैं। इंसान ऐसा करते जरूर हैं, लेकिन इंसान इन हथियारों के हाथ में होने पर ही इतने अधिक लोगों को मार पाते हैं। 
एक दूसरी बात अमरीका के बारे में यह भी है कि अपनी फौज के मार्फत अमरीका पूरी दुनिया में जिस तरह की हिंसा करता है, उसका एक असर भी अमरीकी समाज पर पड़ा है। अमरीका में आज लाखों ऐसे भूतपूर्व सैनिक हैं जिन्होंने वियतनाम से लेकर इराक तक के मोर्चों पर हिंसक कार्रवाई की, और आज वे उस मानसिक विचलन और त्रासदी से उबर नहीं पा रहे हैं। उनका अपना अफसोस उनको मार डाल रहा है। ऐसे देश में जब हॉलीवुड की फिल्में बंदूकों की संस्कृति को रात-दिन बढ़ावा देती है, जब वहां के वीडियो गेम भी बच्चों को बचपन से हिंसा से वास्ता देते चलते हैं, तो आगे चलकर यह पीढ़ी अपने हाथ असली हथियार आने पर, चारों तरफ के हथियार के माहौल को आगे बढ़ाने का काम कर बैठती है। इतने हथियारों के साथ अमरीका किसी तरह की अमन-चैन की उम्मीद नहीं कर सकता। इतने बेकसूर लोगों, और खासकर बच्चों का इस तरह से मारा जाना बहुत तकलीफदेह है। लेकिन हमारा यह भी मानना है कि अमरीकी सेना के ड्रोन हमले जिस तरह से अफगानिस्तान, इराक और पाकिस्तान में बेकसूर बच्चों को थोक में मारते हैं, उनको देख-देखकर भी खुद अमरीकी समाज हिंसा के प्रति संवेदना खो बैठा है। अमरीका के भीतर मीडिया के मार्फत ऐसी बेकसूर फौजी-हत्याओं की खबरें तो पहुंचती ही हैं, और इनकी वजह से भी समाज का एक तबका मानसिक रूप से बीमार होता होगा, हिंसक होता होगा, और इस हद तक पहुंचता होगा। इसलिए आज इस मौके पर भारी अफसोस और तकलीफ के साथ यह लिखते हुए भी हम इन दो-तीन बातों पर अमरीकी समाज और सरकार से विचार करने की अपील करेंगे। हथियारों के धंधे पर रोक लगे, निजी लोगों के हथियारों पर रोक लगे, दुनिया भर में अमरीका की हिंसा खत्म हो, और हॉलीवुड किस्म की हिंसक संस्कृति को बढ़ावा देना खत्म हो।