आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मामले में यह हो गया है कि वह खो गया है...


24 दिसंबर 2012
पिछले एक हफ्ते में भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को एक बार फिर यह मौका मिला है कि वह चौबीसों घंटे का चैनल सड़क पर खड़े रहकर बन सके। जब सड़कें नारों से पटी हों, जब लोग विचलित हों, तो इसी सिलसिले को आगे बढ़ाकर अपनी रोजी-रोटी कमाने के धंधे में चैनल लग गए हैं। एक-दूसरे को पीटने का जो गलाकाट मुकाबला चल रहा है, वह अखबारों में भी कम हो ऐसा नहीं है, लेकिन अखबारों की पहुंच ऐसे मामलों में इस तरह की कभी नहीं हो सकती, और फिर अखबारों में समाचारों से परे विचारों की एक अलग जगह भी होती है। 
टीवी समाचार चैनलों में एक दिक्कत यह हो रही है कि वे समाचार माध्यम बने रहना चाहते हैं, लेकिन समाचारों के भीतर विचारों को डालने के अपने मोह को उसके रिपोर्टर छोड़ नहीं पा रहे। किसी सड़क या फुटपाथ पर खड़े नौसिखिए टीवी रिपोर्टर एक जीवंत प्रसारण पर वहां से जो कुछ कहते हैं, वह ज्यों का त्यों उपग्रह से होते हुए लोगों के घरों तक पहुंच जाता है। अगर वे सिर्फ अपना देखा हुआ सच ही कहें, तो भी बात इतनी न बिगड़े। दिक्कत यह है कि वे अपना सोचा हुआ भी सच की तरह पेश करने में लगे रहते हैं। और जो टीवी लोगों को अपार संभावनाओं वाला दिखता है, उसकी हकीकत यह है कि वह बहुत तंग सीमाओं वाला भी है। मौके पर से संवाददाता की कही हुई बात को जांचने-परखने की कोई गुंजाइश टीवी के समाचार संपादक के पास नहीं होती। लेकिन यहां पर इसकी तंग सीमाएं खत्म नहीं होतीं।
दरअसल जब किसी उत्तेजित भीड़ के बीच मौके पर से टीवी के रिपोर्टर को उन हालात के बारे में कहना होता है तो उसके इर्द-गिर्द की भीड़ उस बात को कैमरे में कैद होने के पहले ही सुनती भी रहती है। ऐसे उत्तेजित घेरे के बीच खड़े होकर बहुत कड़वा सच कहने से किसी की भी एक सामान्य समझ-बूझ उसे रोकती भी है। नतीजा यह होता है कि जिस तरह राजनीति में नेता कोई लुभावनी बात कहते हैं, उसी तरह ऐसे मौकों पर टीवी के रिपोर्टर, उसके स्टूडियो और उसके प्रस्तुतकर्ता एक तरफ तो भीड़ का चेहरा देखकर बात करते हैं, दूसरी तरफ दर्शकों की उस पल की विचलित और जख्मी भावनाओं को देखकर बात करते हैं, और तीसरी तरफ वे इसी काम के गलाकाट मुकाबले में लगे हुए बाकी चैनलों को देखकर भी बात करते हैं। 
जब किसी भी तरह का मीडिया एक नाजुक मौके पर सोच-समझकर अपना संतुलन और आपा खोता है, और उसके नगदीकरण में जुट जाता है, तो फिर वह लोगों को भड़काते हुए अपने माइक्रोफोन को एक हथियार, एक मशाल की तरह इस्तेमाल करने लगता है। पिछले एक हफ्ते में जिम्मेदार से लगने वाले समाचार चैनल भी जिस तरह समाचारों की तरह नारों को लगाते दिख रहे हैं, उससे लोगों के बीच एक ऐसी बेचैनी को बढ़ाया जा रहा है जिसकी न जरूरत है, और न जिसका कोई इलाज है। 
पिछले एक-दो बरस में ऐसे और भी मौके आए जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कभी अन्ना तो कभी बाबा, और कभी केजरीवाल के साथ मिलकर नारे लगाने का काम किया और अक्ल का भारी इस्तेमाल करते हुए, अक्ल को ताक पर रख देने का भी फैसला लिया, उस फैसले पर अमल किया।
अखबारों में ऐसी ही बात के लिए संपादकीय कॉलम होते हैं, और विचारों के अपने पन्ने होते हैं। कोई मामला जब अधिक मायने रखता है, तो उसके बारे में विचारों में विचलित होकर भी लिखा जाता है। लेकिन समाचारों को ऐसी पसंद-नापसंद से परे रखा जाता है, और यह माना जाता है कि समाचारों में विचारों की मिलावट नहीं की जाएगी। अखबारों में एक दूसरा फायदा भी होता है। किसी घटना के होने के बाद संवाददाता से लेकर समाचार संपादक तक को आम तौर पर घंटों मिलते हैं, उस घटना की बारीकियों को ठोंकने-बजाने के लिए, और फिर उनका महत्व तय करने के लिए। टेलीविजन के जीवंत प्रसारण आग बुझाने जैसे काम होते हैं, जिनमें सब कुछ मौके पर ही तय करना होता है।
और अगर बात यहां तक भी रूक जाती, तो भी ठीक रहता। जब टीवी समाचार  चैनलों की दर्शक संख्या का मुकाबला उन चैनलों के जिंदा रहने और न रहने को तय करता है, तो फिर समाचार-विचार से परे मैनेजमेंट के लोग यह तय करते हैं कि किस मुद्दे पर विचलित देश को और अधिक उकसाया या भड़काया जा सकता है। 
अभी जब इस मामले पर जब मैं लिख ही रहा हूं, उसी समय दिल्ली से खबर है कि संसद भवन के पास इन दिनों रोज जुट रही टीवी चैनलों की नब्बे-सौ ओबी वैन वहां से पुलिस ने हटा दी हैं। इन्हीं के मार्फत टीवी कैमरे अपनी रिकॉर्डिंग अंतरिक्ष में उपग्रह तक भेज पाते हैं। मतलब यह कि सरकार या पुलिस ने वहां पर अमन-चैन  बनाए रखने के लिए इनको वहां से हटाना जरूरी समझा है। अभी मैं इस सरकारी फैसले के सही या गलत होने पर नहीं जा रहा, क्योंकि हो सकता है कि टीवी चैनलों के रूख से वहां पर एक बड़े हिंसक टकराव का खतरा बढ़ रहा हो। 
मीडिया का खुद झंडे-डंडे लेकर चलना ठीक नहीं होता। अखबार जब किसी नाजुक मुद्दे पर, किसी नाजुक वक्त पर कैम्पेन-शीट (अभियान का पर्चा) बन जाते हैं तो वे दरअसल कैम्पेन-शिट (अभियान का गू) बन जाते हैं। अखबार तो अभी अपना आपा नहीं खो रहे हैं, लेकिन अधिकतर टीवी चैनल अपने आपे को सोच-समझकर अलमारी में बंद करके सड़कों पर हैं। ऐसे नाजुक मौके पर जब समझदार और जानकार संपादक अखबारों में खबरों को देखते हैं, और उनसे फैल सकने वाली उत्तेजना और नफरत के खतरे को तौलते हैं, तब टीवी चैनलों पर यह सोचने और संतुलन तय करने का काम खत्म ही हो गया है। 
आज अधिकतर समाचार चैनलों ने बलात्कार-विरोधी आंदोलन से लेकर, बलात्कार की हिंसा तक को लेकर अपने-अपने आंदोलन के बैनर सरीखे बना लिए हैं। स्टूडियो में ऐसे परदे बन गए हैं, और खबरों के आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, पहले-बार लगाने के लिए हर किसी के अलग-अलग नारे तय हो गए हैं। जब मीडिया के धंधे में लगे हुए पत्रकार समाचार और विचार के इस फर्क को खत्म कर चुके हैं, तो ईडियट-बॉक्स के दर्शक ऐसे दिनों के समाचार बुलेटिनों को एक और रियलिटी शो की तरह देखते हैं, और कुछ समय पहले शायद ऐसे ही किसी मुद्दे पर पीपली लाईव नाम की एक फिल्म भी आई थी।
यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि देश के बाकी मीडिया की तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी अभिव्यक्ति की आजादी की बात करता है। इस बात को अधिक लोग नहीं जानते कि भारतीय लोकतंत्र और संविधान में मीडिया के अलग से कोई अधिकार नहीं हैं। एक साधारण नागरिक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जो अधिकार हैं, वही अधिकार मीडिया के हैं। लेकिन एक साधारण नागरिक के ये अधिकार जिन नागरिक जिम्मेदारियों के साथ आते हैं, भारत का मीडिया इस जिम्मेदारी से अपने-आपको आजाद पाता है, बताता है। लेकिन जब मीडिया एक आंदोलनकारी की तरह कलम या माइक्रोफोन को मशाल की तरह उठा लेता है, और जब मीडिया की सुर्खियां बैनरों पर लिखे नारों की तरह हो जाती हैं, तब देश को एक मीडिया की कमी खलने लगती है। आज कम से कम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मामले में यह हो गया है कि वह खो गया है। 

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