केंद्र शिकंजा ढीला करके, राज्यों को योजना बनाने दे


27 दिसंबर 2012
संपादकीय
राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री के साथ देश के मुख्यमंत्रियों की गंभीर नीतियों पर बातचीत केंद्र-राज्य संबंधों के पुराने चले आ रहे ढर्रे में फेरबदल की जरूरत से भरी रही। अभी हमारे पास छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का भाषण ही आया है, और हम उसी को बुनियाद बनाकर इस बारे में लिख रहे हैं। यह बात यह है कि बहुत से राज्यों ने केंद्र सरकार से अधिक अधिकारों की मांग की होगी, लेकिन छत्तीसगढ़ ने इस बारे में जो तर्क रखे हैं, वे वजनदार हैं और केंद्र सरकार को पूरे देश के बारे में इन बातों को लेकर सोचना चाहिए। 
भारत के संघीय ढांचे में केंद्र सरकार बहुत से अधिकार अपने पास रखती है, जिसमें कई तरह के टैक्स वह सीधे वसूलती है और फिर इस रकम से देश भर के लिए तरह-तरह की योजनाओं के तहत बजट देती है। ऐसा इसलिए भी जरूरी होता है कि देश के हर प्रदेश की आर्थिक संभावनाएं एक सी नहीं होतीं, और सबका बराबर विकास करने के लिए इसी टैक्स में से किसी राज्य को कम और किसी राज्य को अधिक रकम दी जाती है। राज्यों को दी जाने वाली रकम के अलावा बहुत से खर्चे केंद्र सरकार खुद भी करती है, जैसे सेना पर खर्च, अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर खर्च, विदेश नीति के तहत खर्च, और देश की आंतरिक सुरक्षा जैसे कई मामलों पर खर्च। केंद्र का बजट इस तरह अपनी खुद की योजनाओं पर भी खर्च होता है, और सारे राज्यों के लिए एक जैसी बनाई हुई योजनाओं पर भी जाता है, खास जरूरतों वाले राज्यों पर और अधिक खर्च भी होता है। 
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वहां जो बात उठाई है, उसमें केंद्र सरकार से किसी तनातनी की बात नहीं है। उन्होंने कहा है कि विकास योजनाओं को बनाने और उन पर अमल का हक राज्यों को दिया जाए, अभी दिल्ली में बैठकर योजनाएं बनती हैं, और राज्य उन पर अमल करने वाली एजेंसी जैसे रह गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र की योजनाएं आमतौर पर राज्यों की सफल योजनाओं पर ही आधारित होती हैं, और राज्यों के पास अपनी योजनाओं को कामयाब करने का दमखम है। छत्तीसगढ़ का यह तर्क इसलिए सही है कि इस राज्य में पूरे देश की सबसे कामयाब राशन-योजना चली है, और देश भर में इससे सबक लिया जा रहा है। केंद्र सरकार तो अपनी तरफ से अनाज की जगह लोगों को नगदी रियायत देने के रास्ते पर है, और उसका जो विरोध छत्तीसगढ़ कर रहा है वह भी ठीक है। लोगों को अगर नगदी मिलेगी, तो वह घर की औरत के हाथ कम आएगी, आदमी उसका बाहर मनचाहा इस्तेमाल अधिक करेंगे। आज अगर बहुत से प्रदेशों की सरकारें इस योजना को लागू करने में नाकामयाब रही हैं, तो उनको छत्तीसगढ़ की कामयाबी से सीखना चाहिए और केंद्र सरकार को, राज्यों की नालायकी का घड़ा गरीब की घरवाली के सिर पर नहीं फोडऩा चाहिए। देश में ऐसा और बहुत सारे मामलों में होता है जब सरकारें अपनी चोरी पर काबू न पाकर योजनाओं को गलत बताने लगती हैं, और उनमें फेरबदल करने लगती हैं।
भारत के संघीय ढांचे को अगर मजबूत करना है, तो केंद्र की योजनाओं को एक फौलादी शक्ल में राज्यों के सिर पर थोप देने के बजाय कुछ पैमानों के साथ उसे राज्यों को देना चाहिए, योजना के लिए भी, और अमल के लिए भी। इससे देश भर के अलग-अलग राज्यों की कल्पनाशीलता की संभावनाएं भी सामने आएंगी और तरह-तरह की योजनाएं बनेंगी। ऐसे प्रयोगों से केंद्र सरकार के सामने भी कई तरह के सफल विकल्प आएंगे। छत्तीसगढ़ ने राशन के मामले में, ग्रामीण स्वास्थ्य के मामले में, बिजली के मामले में देश के सामने बहुत सी सफलताएं रखी हैं, और ऐसा कुछ दूसरे राज्यों ने भी कुछ दूसरे मामलों में किया होगा। दूसरी बात यह कि भारत अपने-आपमें पूरे योरप के सारे देशों को मिलाकर उससे अधिक बड़ा, और उससे अधिक विविधता वाला देश है, जिसकी सारी जरूरतों और संभावनाओं को दिल्ली से बैठकर काबू करना न ठीक है न मुमकिन है। इसी दिक्कत के चलते बड़े राज्यों को छोटा करने की मांग हो रही है, और छत्तीसगढ़ जैसे जो नए छोटे राज्य बने हैं, उनके भीतर अपने-आपमें बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों के विकास के लिए अलग प्राधिकरण भी बनाने पड़े हैं। इसलिए केंद्र सरकार को अपना शिकंजा ढीला करना चाहिए, और राज्यों की प्रतिभाओं का इस्तेमाल नीतियों-कार्यक्रमों के लिए भी करना चाहिए। हर राज्य की अपनी-अपनी स्थानीय खूबियां हैं, जिनको ठीक से समझे बिना, जिनके साथ लगातार जुड़कर रहे बिना, योजना आयोग जैसी संस्थाएं देश को आगे बढ़ाने में बहुत अधिक नहीं जोड़ पाएंगी। छत्तीसगढ़ की आर्थिक कामयाबी के आंकड़े, उसकी अपनी स्थानीय योजनाओं की वजह से हैं, और देश को ऐसे सफल प्रयोगों से सीखना भी चाहिए।

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