निजी जीवन में हिंसक दखल वाला पश्चिमी मीडिया, और उसके ग्राहक


संपादकीय
8 दिसंबर 2012
ब्रिटेन के एक अस्पताल में काम कर रही भारतीय मूल की एक नर्स मरी हुई मिली है, जिसने कि ब्रिटिश राजकुमारी केट के बारे में आए एक मसखरे फोन पर केट की सेहत की पूरी जानकारी दे दी थी, और एक ऑस्ट्रेलियाई रेडियो स्टेशन के इस मसखरे प्रसारण के बाद वह शर्मिंदगी से गुजर रही थी। दो बच्चों की मां यह नर्स टेलीफोन पर कहे गए इस झूठ के झांसे में आ गई थी कि फोन लगाने वाली केट की बुजुर्ग रिश्तेदार है। इस मौत पर ब्रिटिश राजघराने से लेकर ऑस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री तक ने अफसोस जाहिर किया है, लेकिन इस रेडियो स्टेशन ने एक लाईन के अफसोस के बाद मजे से चटखारे लेते हुए उस फोन कॉल की रिकॉर्डिंग को प्रसारित करना जारी रखा। इस हादसे के बाद ब्रिटिश मीडिया में इस बात पर फिर चर्चा छिड़ी है कि किसी के निजी जीवन में मीडिया का दखल किस हद तक बर्दाश्त किया जाना चाहिए और किस तरह के नाजायज दखल के खिलाफ एक कानून बनाने की, या रोक लगाने की जरूरत है। लोगों को याद होगा कि किस तरह ब्रिटेन की राजकुमारी डायना फ्रांस में अपने दोस्त के साथ कार से जाते हुए, पीछा करने वाले फोटोग्राफरों की तेज रफ्तार कार के चलते हुए एक सड़क हादसे में मारी गई थीं। और किस तरह पिछले दिनों उन्हीं के बेटे-बहू के फ्रांस जाने पर एक निजी इमारत में उनके रहते हुए उनकी कुछ कम कपड़ों की तस्वीरें बाहर से खींची गईं, और उनको दुनिया भर में बेचा गया। 
भारत इस मामले में इसलिए बेहतर देश है कि यहां पर बड़े लोगों की निजी जिंदगी में तांकझांक की अपनी सीमाएं हैं। इसके लिए कानून की हद तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती और समाज की अपनी परंपराएं ही ऐसी हैं कि लोग न तो अधिक नग्नता-अश्लीलता को बर्दाश्त करते, और न ही लोगों की निजी जिंदगी को यहां छापने या दिखाने का कोई चलन है। सोनिया गांधी की बीमारी हो, या किसी और किसी फिल्मी सितारे के अस्पताल में रहने का मामला हो, अगर लोग उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने  की अपील करते हैं, तो मीडिया उसे आमतौर पर मान भी लेता है। पिछले दिनों शायद इसी जगह हमने लिखा भी था कि निजी जिंदगी को खत्म करने का सबसे बुरा मामला इमरजेंसी के दौरान सामने आया था, जब कांगे्रस छोड़ रहे, या छोड़ चुके जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम की एक महिला मित्र के साथ की बंद कमरे की तस्वीरें मेनका गांधी ने अपनी पूरी पत्रिका भरकर छापी थीं, ताकि जगजीवन राम पर हमला किया जा सके। बिना किसी सार्वजनिक महत्व की तस्वीरों से ऐसा घटिया निजी हमला इंदिरा गांधी की बहू और संजय गांधी की बीवी की हैसियत से मेनका गांधी ने खुशवंत सिंह की सलाह पर निकलने वाली अपनी पत्रिका 'सूर्याÓ में किया था, और वह भारतीय पत्रकारिता में शायद सबसे ही घटिया धब्बा था। लेकिन उससे परे लोग खुद ही ऐसे कामों से बचे रहते हैं, और ब्रिटेन सहित योरप से ऐसी अनगिनत मिसालें सामने आने पर भी उससे कोई हौसला नहीं लेते।
इस हादसे में भारत से गई हुई एक नर्स की मौत परिवार से परे भी तकलीफ की बात है, क्योंकि अपनी नौकरी को पूरी जिम्मेदारी से कर रही यह नर्स, एक झूठे मजाक के झांसे में आकर शायद सदमे में चल बसी, या शर्मिंदगी में उसने अपनी जान दे दी। हम मीडिया के इस तरह के किसी भी हक के खिलाफ हैं जिसमें झूठ बोलकर, झांसा देकर कोई ऐसी निजी जानकारी निकाली जाए, जिसका कोई सार्वजनिक महत्व नहीं है, और जिससे कोई जनहित जुड़ा हुआ नहीं है। पश्चिम को अपने तौर-तरीकों के बारे में फिर सोचना चाहिए। वे मजे लेने को ऐसी छूट जारी रखें, या इस पर रोक लगाएं, यह पूरी तरह से उनका निजी मामला भी हो सकता है और चूंकि आज पूरी दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, इसलिए यह हमारे लिखने का मामला भी हो सकता है। कुल मिलाकर यह शर्मनाक रूख खत्म होना चाहिए, और ऐसे मीडिया के ग्राहकों को भी अपनी पसंद, समझ और परख के बारे में सोचना चाहिए की ऐसी हिंसक दखल को बढ़ावा देकर, या बर्दाश्त करके वे अपने-आपको कैसा साबित करते हैं।

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