जस्टिस काटजू को बीस फीसदी पता नहीं कहां देखने मिले...


संपादकीय
9 दिसंबर 2012
भारतीय प्रेस परिषद के प्रमुख जस्टिस मार्कंडेय काट्जू ने एक सेमिनार में यह कहकर खबरों में कुछ खलबली खड़ी कर दी कि नब्बे फीसदी भारतीय बेवकूफ हैं। उनके सिर में दिमाग नहीं होता। उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मात्र दो हजार रुपए देकर देश की राजधानी दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़काए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि दंगे भड़काने के लिए किसी धार्मिक स्थान पर मात्र शरारत करने की जरूरत होती है और उसके बाद लोग लडऩा शुरू कर देते हैं। उनके अनुसार 1857 से पहले देश में सांप्रदायिकता नहीं थी लेकिन अब हालात अलग हंै और अस्सी फ ीसदी हिंदू और मुसलमान सांप्रदायिक हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 150 बरसों में भारतीय आगे के बजाए पीछे गए हैं क्योंकि अंग्रेजों ने लगातार सांप्रदायिकता का जहर घोला है। जस्टिस काट्जू के अनुसार अंगे्रजों की नीति साफ थी कि भारत में राज करने का एकमात्र रास्ता है कि हिंदुओं और मुसलमानों को आपस में लड़ाया जाए। उन्होंने कहा कि ये एक दुष्प्रचार था कि हिंदी हिंदुओं की भाषा है और उर्दू मुसलमानों की भाषा है। जस्टिस काट्जू ने कहा कि वो ये कटु बातें इसलिए कह रहे हैं ताकि भारतीयों को पूरे खेल का पता चले और वो बेवकूफी ना करें।
जस्टिस काटजू के साथ एक बात अच्छी है, और एक बात बुरी। वे कबीर के अंदाज में खरा-खरा कहते हैं, लेकिन एक गलत युग में कहते हैं। जब हिंदुस्तान में लोकतंत्र नहीं था, जब मानवाधिकार नाम की कोई चीज नहीं थी, जब अदालतें नहीं थीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम का शब्द किसी ने सुना नहीं था, तब कबीर धर्म के खिलाफ, आडंबर और कट्टरता के खिलाफ, पाखंड और धर्मांधता के खिलाफ इतना कुछ कहते थे कि आज वे अपनी दो-दो लाईनों की एक-एक साखी के लिए हर प्रदेश में अलग-अलग गिरफ्तार किए जा सकते थे। फिर बाद में जो लोग खुलकर बोलने वाले रहे, उनमें नेहरू एक रहे जिनका यह हौसला था कि वे मंच और माईक से लोगों को जाहिल कह सकते थे, कहते थे। बाद के बरसों में कड़वी बात न कहने का चलन ऐसा बढ़ा कि लोग बोलने का हौसला न रहने के लिए गांधी की इस बात को तर्क की तरह इस्तेमाल करने लगे कि सच तो कहो लेकिन कड़वा सच न कहो। यह बात गांधी ने किसी संदर्भ में कही थी, और उनकी नरम और मीठी बात पर भी देश हिल जाता था। इसलिए कड़वा कहने से बचने का रास्ता उनके सामने खुला हुआ था और उनकी अपनी जिंदगी इंसानियत के लिए एक सबसे कड़ी और कड़वी मिसाल की तरह सामने थी, जिस पर खुद अमल करने के बाद उनको अधिक कुछ कड़वा कहने की जरूरत नहीं थी। 
एक वक्त ऐसा होता था जब लोग किसी के मरने पर शोकसभा में ही उसके बारे में सारे सच छुपाकर सारे झूठे विशेषण कहा करते थे। आजकल लोगों के जिंदा रहते-रहते उनके बारे में ऐसा कहने का रिवाज बन गया है। कहीं कोई छत्तिसगढिय़ा सबसे बढिय़ा जैसा नारा लगाते हैं, तो कहीं कोई भारत को दुनिया का सबसे गौरवशाली देश मानते हैं। ऐसे माहौल के बीच जस्टिस काटजू ने जो कहा है, वह पहाड़ी नदी की जंगली रफ्तार की धार के खिलाफ तैरने जैसा है, और जाहिर है कि इसी वजह से वह लोगों को खटकने वाली बात है। खटकने का सच से कुछ लेना-देना नहीं रहता। दुनिया के बाकी बहुत से देशों की तरह हिंदुस्तान में भी सिर बहुत हैं, दिमाग गिनती में बहुत कम हैं। जस्टिस काटजू ने जो कहा है उसे बिना चतुराई वाला एक बयान कहा जा सकता है, और बहुत सारे लोग कुनैन की कड़वी गोली को शहद में लपेटकर खिलाने के हिमायती होते हैं। लेकिन हमको उनकी यह खरी-खरी जुबान ठीक लगती है। हालांकि साम्प्रदायिकता के मामले में, धर्मांधता के मामले में उन्होंने अस्सी फीसदी हिंदुस्तानियों का जो अंदाज लगाया है, उससे हम कुछ असहमत हैं। बीस फीसदी लोग साम्प्रदायिकता से परे उनको पता नहीं कहां दिखे होंगे। 
सच को समझना उसी तरह जरूरी है जिस तरह की किसी बीमारी की जांच करके उसकी वजह का पता लगाया जाए। मीठी बातों से हिंदुस्तान का समाज सुधरने वाला नहीं है। एक के बाद एक देश में ऐसे बहुत से चुनाव होते हैं जब यह समझ आ जाता है कि लोग किस हद तक धर्म के शिकंजे में हैं, धर्मांधता के शिकंजे में हैं, कट्टरता और पाखंड के शिकंजे में हैं, जातिवाद में डूबे हुए हैं, संकीर्ण क्षेत्रवाद के शिकार हैं, और किस तरह समाज में गैरबराबरी के हिमायती हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह महाराष्ट्र की फेसबुक-गिरफ्तारियों को लेकर जस्टिस काटजू की एक चि_ी पर लिखा था, जो कि उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को लिखी थी। उसके बाद उन्होंने ममता बैनर्जी को भी फटकारा, और अब उन्होंने भारत के लोगों को धर्म और साम्प्रदायिकता के संदर्भ में बेवकूफ कहने का हौसला दिखाया है। हो सकता है कि उनकी इतनी बयानबाजी, और चि_ियां भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के उनके काम के दायरे में न आते हों, लेकिन वे कम से कम खरा-खरा सच बोलने का हौसला तो रखते हैं। आज जब देश में संवैधानिक कुर्सियों पर बिठाई गई मनचाही कठपुतलियां, अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराते दिखती हैं, अपने को बिठाने वाली सत्ता के तलुवे चाटते दिखती हैं, तब जस्टिस काटजू एक फर्क लेकर आए हैं, और हम उनकी बातों के साथ हैं।

1 टिप्पणी:

  1. aapki baat se puri tarah sahmat... sampurn bharat ne dharm, karm ya naitikta me ekjut ta dikhayi ho ya nahi, katu satya se muh chhupane me bharatiya samaj ekjut hai, aur ab ye hamari sanslriti ka hissa ban chuka hai

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