इक्कीस सौ खुशियां


संपादकीय
31 जनवरी 2013
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इस वक्त प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक विवाह हो रहा है। प्रदेश के सभी धर्मों से लेकर, आदिवासी समाज तक के लोग इसके लिए पहुंचे हैं, और गांव-जंगल सब जगह से आए हुए अमूमन गरीब दूल्हे-दुल्हन का नजारा देखते ही बन रहा है। सरकार इक्कीस सौ जोड़ों की यह शादी अपने खर्च पर करवा रही है, और यह सरकार के सबसे समझदारी के खर्चों में से एक  लग रहा है। इस पर करोड़ों रूपए खर्च जरूर हो रहे हैं, लेकिन छोटे-छोटे गरीब लोगों के इससे कई गुना अधिक पैसे बचेंगे, और इतने गरीब लोगों को इतनी धूमधाम देखने मिलेगी। 
कहने के लिए तो शादी एक बहुत निजी मामला होता है, और इसमें सरकारी दखल नहीं होनी चाहिए। लेकिन सरकार की रियायत, उसका किया हुआ खर्च वहां पर हम सही मानते हैं जहां पर वह कमजोर तबकों की मदद में इस्तेमाल हों, या फिर समाज में एकता को बढ़ाने में काम आता हो। आज जिन इक्कीस सौ जोड़ों की शादी हो रही है, वे अलग-अलग धर्म और जातियों के हैं। आज भी देश के बाकी हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में भी बहुत सी जातियों के लोग दूसरे लोगों के साथ खाते-पीते नहीं हैं। लेकिन आज जब चालीस हजार लोगों का खाना एक साथ बनेगा, तो किस जाति के बनाए हुए खाने को, किस जाति के लोग खाएंगे, क्या पता। ऐसा ही सामाजिक फायदा स्कूलों में दोपहर के भोजन से हो रहा है, लेकिन आज इस सामूहिक विवाह में शामिल और मौजूद पीढिय़ां, जिंदगी में कभी स्कूलों का वैसा फायदा पाने वाली नहीं हैं, इसलिए हम इस सरकारी खर्च का एक सामाजिक योगदान देख रहे हैं। 
इसके अलावा एक-दूसरे के साथ बैठकर शादी जैसे महत्वपूर्ण मौके में भागीदारी भी लोगों को एक-दूसरे के करीब लाएगी। मुस्लिम, ईसाई, या बौद्ध रीतिरिवाजों को, साज-सज्जा को बहुत से हिन्दू लोग पहली बार देख पाएंगे। और खुशी का ऐसा मौका बांटना कम मायने नहीं रखता है। इसलिए इस सरकारी आयोजन के सामाजिक पहलुओं को वैसे तो देश के कुछ समाजशास्त्रियों को यहां रहकर देखना भी चाहिए था, लेकिन जमीन से कटे हुए शिक्षण संस्थाओं की हालत देखते हुए यह कल्पना मुश्किल है कि खुद रायपुर के समाज शास्त्र के कुछ शिक्षक और छात्र कॉलेज-विश्वविद्यालय से एक दिन बाहर निकलकर ऐसा कर रहे होंगे। दरअसल आधी सदी पुरानी किताबों को पढऩा, उनसे पढ़ाना अधिक आसान होता है, असल का अध्ययन बहुत मुश्किल होता है। 
इस मौके पर अगर सरकार के अलग-अलग विभाग कुछ और तरह की जागरूकता फैलाने की कोशिश करते, तो भी वह बहुत अच्छा होता। शादी के बाद लड़की की सेहत, उसके गर्भधारण से लेकर उसकी जचकी तक के बहुत से ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर स्वास्थ्य विभाग या महिला-बाल विकास विभाग को उपहार में पढऩे, या देखने-सुनने की कुछ चीजें इन लोगों को देनी थीं। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में कुछ जातियों में जो बीमारियां अधिक हैं, उसके लिए भी यहां अलग से कैम्प लगाए जा सकते थे। गांव-गांव से लोग यहां आए हैं, उनके बीच शराब के खिलाफ जागरूकता की कोशिश हो सकती थी, रियायती चावल मिलने से होने वाली बचत का परिवार के लिए बेहतर इस्तेमाल सुझाया जा सकता था, अपने शहर-गांव-कस्बे को साफ रखने के बारे में लोगों को कुछ पर्चे दिए जा सकते थे। कुल मिलाकर बात यह कि नए जोड़े की जागरूकता से लेकर, यहां पहुंचे हुए लोगों तक की जागरूकता की एक अलग कोशिश हो सकती थी। लेकिन आने वाले दिनों में और बरसों में जब ऐसा समारोह दोबारा होगा, तब शायद हमारी यह सलाह काम आए। 
कुल मिलाकर आज बहुत खुशी का मौका है कि साधारण आर्थिक स्थिति वाले, या गरीब लोगों के परिवारों की शादियां इस तरह से हो रही हैं, और इसकी वजह से हरेक की जिंदगी पर शादी की वजह से अलग-अलग पडऩे वाला बोझ बचा है। सरकारी खर्च पर यह सामाजिक फेरबदल एक अच्छा फैसला है। 

ऐसे डरावने गांधी को अब बिदा कर देना चाहिए, पूरी तरह से


संपादकीय
30 जनवरी 2013
महात्मा गांधी की जयंती के दिन आज बहुत से सरकारी और सार्वजनिक सालाना कार्यक्रम हो रहे हैं। गांधी की प्रतिमाओं पर मालाएं चढ़ रही हैं, उनकी विचारधारा के ठीक खिलाफ चलने वाले लोग आज उनकी याद में महानता के गीत गा रहे हैं, और उनकी सोच बहुत सहेजकर तालों में बंद कर दी गई है, कि कहीं बाहर निकल न जाए। दरअसल किसी की बातों पर चलने के मुकाबले उसका चबूतरा बनाकर बुत खड़ा कर देना आसान होता है, और सहूलियत का भी होता है, क्योंकि वहां से गांधी नीचे लाठी भी नहीं मार सकते। आमतौर पर चबूतरा इतना ऊंचा बनाया जाता है कि नीचे इक_ा हुए चुनिंदा लोगों तक अगर बापू चाहें, तो भी लाठी न घुमा सकें। इसलिए राजघाट से लेकर गांव-गांव तक के जलसों की बात छोड़ दें, और सोच की बात करें, कि आज गांधी होते तो किस-किस मुद्दे पर वे क्या बोलते? 
जिस गांधी ने सत्य के प्रयोग नाम से अपनी जिंदगी और अपनी सारी मानवीय कमजोरियों को खुलकर दुनिया के सामने एक खुली किताब की शक्ल में रख दिया था, उसी गांधी की कुछ चि_ियों को लेकर आज हिन्दुस्तान में दहशत फैली हुई है कि इन पर इस देश में रोक लगा देनी चाहिए क्योंकि इनसे ऐसा आभास होता है कि गांधी के अपने एक दोस्त से समलैंगिक संबंध थे। जब भी किसी इंसान को भगवान की तरह बना दिया जाए, और फिर प्राकृतिक बातों को कुछ धार्मिक पूर्वाग्रहों के झांसे में आकर अप्राकृतिक करार दे दिया जाए, तो फिर उस इंसान की भगवानियत को बचाए रखने के लिए किसी संभावित सच को कानून से रोक देने की कोशिश होती है। ऐसा ही गांधी के साथ हो रहा है। यह देश समलैंगिकता से बहुत डरा हुआ है, और ऐसी दहशत में डूबे हुए देश में लोग गांधी के सत्य के प्रयोग भी भूल जा रहे हैं, कि उस इंसान ने अपने सारे प्रयोगों, अपनी सारी सच्चाई को खुद होकर सामने रखने का हौसला था। 
दूसरी तरफ गांधी के नाम पर सत्ता में पहुंची हुई पार्टियां, और सत्ता में पहुंच जाने के बाद गांधी को अपने मंच पर टांगने वाली पार्टियां, इनमें से किसी को भी देखें,  तो उनका चाल-चलन गांधी से कोसों दूर है। अपने हर किस्म के कुकर्म के लिए जो नेता और जो सत्तारूढ़ लोग, किसी पेशेवर मुजरिम की तरह अदालत में लुकाछिपी खेलते हुए बचते हैं, वे ही आज बढ़-चढ़कर जनता के पैसों पर गांधी जयंती मनाने में लगे हैं। इस विरोधाभास के खिलाफ अब जनता ने सोचना भी बंद कर दिया है, क्योंकि मुजरिमों को जहां पर आखिरी अदालत के आखिरी फैसले तक पुलिस से सलामी लेने और संसद-विधानसभा में कानून बनाने का हक हो, उस लोकतंत्र में जनता क्या खाकर गांधी के सिद्धांतों पर अमल की उम्मीद कर सकती है? 
लेकिन इससे परे भी बहुत से मुद्दे हैं। आज कमल हासन की फिल्म को लेकर जिस तरह का विवाद छिड़ा हुआ है, शाहरूख खान की एक बात को लेकर जैसा झगड़ा खड़ा किया जा रहा है, इन सबको देखें तो भारत के मीडिया का रूख पूरी तरह से उस सोच के खिलाफ है जिसके तहत गांधी सम्प्रदायों के बीच, समुदायों के बीच लगी हुई आग को बुझाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ जाते थे। आज राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक नेताओं तक, और खासकर मीडिया, जिस तरह से आग को हवा देने का काम कर रहे हैं, उससे लगता है कि गांधी की प्रतिमाओं को भी अब हटा देना चाहिए, और उन चबूतरों पर दंगों के मुद्दे खड़े करने की जगह बना देनी चाहिए। एक दूसरी बात यह है कि इस देश में महिलाओं के साथ जिस तरह की हिंसा हो रही है, और उनके बारे में जितनी तंगदिली से, जितने तंगनजरिए से बातें हो रही हैं, उनके चलते इन आक्रामक और हिंसक तबकों का गांधी या उनकी सोच से क्या लेना-देना रह गया है? आज गांधी जयंती पर जरूरत गांधी के बारे में बात करने की नहीं है, अपने बारे में वो खुद काफी कुछ खुद ही दर्ज कर गए थे और बाकी का दुनिया के बड़े-बड़े इतिहासकारों ने दर्ज कर दिया है। आज जरूरत है तो आज के जलते हुए मुद्दों पर गांधी क्या कहते? ऐसे मुद्दों पर अपने वक्त में उन्होंने क्या कहा था? ऐसी कड़वी चर्चा छेडऩे की। 
गांधी को याद करने का पाखंड बहुत हो गया। अब अगर याद करना है तो गांधीवाद को याद किया जाए, वरना चबूतरों से बुत उतारकर खत्म कर दिए जाएं। वे राह-चौराहों पर खड़े-खड़े हिन्दुस्तान की आज की हिंसा को और भयानक दिखाते हैं। ऐसे डरावने गांधी को अब बिदा कर देना चाहिए, पूरी तरह से। 

पुलिस में संवेदनशीलता के बिना ऐसी मौतें होती रहेंगी


संपादकीय
29 जनवरी 2013
पिछले दो दिनों में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में दो ऐसे हादसे हुए हैं जिनको लेकर लगता है कि पुलिस और प्रशासन में अपनी जिम्मेदारी और अपने अधिकारों के बीच संवेदनशीलता को सीखने की भारी जरूरत है। भारत के बाकी अधिकतर हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में भी पुलिस का रूख लाठी वाला चला आ रहा है। आज वक्त बदल चुका है, लेकिन पुलिस को मजदूरों की तरह, चौकीदार की तरह, चपरासी की तरह इस्तेमाल कर-करके एक तो उसका मनोबल खत्म किया जा चुका है, दूसरी तरफ उसके प्रशिक्षण में जनता के अधिकारों को लेकर कोई फिक्र नहीं है। फिर देश-विदेश में कमजोर लोगों के हक इतने कमजोर हैं कि वे पुलिस के सबसे छोटे कर्मचारी की भी लाठी के नीचे रहते हैं। 
पहला हादसा हुआ जब गणतंत्र दिवस की सुबह मुख्यमंत्री निवास और राज्यपाल निवास के बीच खुली सड़क के किनारे एक महिला पुलिस अधिकारी को मोटरसाइकिल पर एक लड़के-लड़की को किसी हालत में देखना आपत्तिजनक लगा, उसने लड़की के स्कूल ड्रेस में होने की वजह से उन दोनों को थाने ले जाकर उनके घरवालों को बुलवाया और उनके हवाले किया। इस मामले से शर्मिंदगी में डूबी लड़की ने घर पर एक चि_ी छोड़ी और आग लगाकर जान दे दी। आज देश में बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा रोकने को लेकर पुलिस पर भारी दबाव है। उसके चलते भी हो सकता है कि किसी महिला पुलिस अधिकारी ने सुबह की धूप में खुली सड़क पर भी एक नाबालिग लड़की को स्कूल ड्रेस में देखकर कुछ अधिक कड़ी कार्रवाई की हो, और यह भी हो सकता है कि महिला पुलिस के मातहत चलने वाले परामर्श केन्द्र की इसमें कुछ अधिक भूमिका हो सकती हो, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। अभी हम इस मामले में किसी को कुसूरवार नहीं ठहरा रहे हैं, लेकिन यह नौबत आती रहेगी और इसलिए पुलिस को सावधान होने की जरूरत है। कानून को लागू करना, जुर्म को रोकना, और एक कड़वी जिम्मेदारी को पूरा करना, इस पूरे सिलसिले में पुलिस को अधिक संवेदनशील होना पड़ेगा, उसके पुराने तरीके आज की नई पीढ़ी के काम नहीं आएंगे, और बलात्कार से जितनी जानें जाएंगी, उतनी जानें लड़के-लड़कियों को मिलने से रोकने से भी जा सकती है, गैरजरूरी तरीके से उन पर एक नैतिकता की लाठी चलाने से भी जा सकती हैं। इस बात को यहां पर उठाना इसलिए भी जरूरी है कि वेलेंटाईन-डे पर, नए साल के मौके पर पुलिस जिस तरह से बाग-बगीचों से लड़के-लड़कियों को खदेड़ती है, उसके चलते कई किस्म की सामाजिक दिक्कतें आएंगी। कुछ दिन पहले ही हमने ऐसी तस्वीर छापी थी जिसमें नए साल के मौके पर रायपुर के बगीचों में एके-47 जैसी हमलावर राइफल लेकर पुलिस तैनात थी, मानो प्रेमी-प्रेमिकाओं को गोली मारने को कहा गया हो। 
अब दूसरे हादसे पर आएं। कल रायपुर शहर में राज्यपाल का काफिला सड़क से निकल रहा था, और काफी देर तक सड़क पर ट्रैफिक को रोक दिया गया, जो कि राजधानी होने के नाते यहां के लिए आम बात है। एक बीमार और बूढ़ा उसी भीड़ में धूप में खड़े-खड़े चक्कर खाकर गिर गया, उसका कमजोर बेटा भी साथ था, वहां तैनात और ट्रैफिक रोकती पुलिस ने एम्बुलेंस को खबर करने से भी मना कर दिया, और वह बूढ़ा वहीं मर गया। हम इस हादसे को पूरी सत्ता के लिए शर्मनाक मानते हैं, चाहे वह राजनीतिक-शासकीय सत्ता हो, चाहे वह किसी जज या राज्यपाल के लिए इस्तेमाल की जा रही सत्ता हो। सड़कों पर लोगों को रोकना, लाठियां लेकर उनको खदेडऩा, लाल बत्तियों और सायरनों की आवाज से उनमें दहशत पैदा करना, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक सिलसिला है। और इसमें किसी अदालती राहत की उम्मीद हमको इसलिए नहीं दिखती कि खुद जज ऐसे ही काफिलों में, सायरन और लाल बत्तियों में चलते हैं, और जब वे खुद ऐसी सहूलियत से जनता के छिनने वाले हक को नहीं समझ पाते तो किसी जनहित याचिका से क्या समझ लेंगे? सार्वजनिक जगहों पर राजा और प्रजा के फर्क को अंग्रेजों के राज के साथ-साथ खत्म हो जाना था, लेकिन आज सरकार से लेकर संविधान तक, और संसद से लेकर अफसरों तक, हर किस्म की ताकत अपने लिए लालबत्ती-सायरन-काफिला जुटा लेती है। जनता से कटकर सत्ता इस तरह सड़कों पर चलती है कि मानो केचुओं से भरी सड़क पर हाथी चल रहे हों। यह सिलसिला बहुत ही खराब है, और सत्ता के लिए लोगों के मन में हिकारत पैदा करने वाला है। पिछले कुछ महीनों में देश में जगह-जगह जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सत्ता के खिलाफ बहुत आक्रामक तेवर लेकर सामने आई है, और कल रायपुर की सड़क पर जो मौत हुई है, उसके खिलाफ भी एक लोकतांत्रिक आक्रामक जागरूकता खड़ी होने की जरूरत है। कुछ संगठनों को पुलिस के ऐसे वीआईपी कहे जाने वाले इंतजाम के खिलाफ अदालत तक जाना चाहिए। 

तेलंगाना में देर नाजायज

संपादकीय
28 जनवरी 2013
तेलंगाना राज्य के आंदोलन की रफ्तार बढ़ते जा रही है। दरअसल दो बरस पहले जब केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अचानक ही तेलंगाना बनाने की घोषणा कर दी थी तो वह अधपके से भी कम पका हुआ ख्याल था। वह एक किस्म की चूक थी और उसके तुरंत बाद इस सरकार ने जस्टिस श्रीकृष्णा को इस मुद्दे पर एक आयोग के तहत रिपोर्ट बनाने कहा था। उस रिपोर्ट की सिफारिशों से भी कोई बात बनी नहीं क्योंकि उसने सीधे-सीधे कोई हल नहीं सुझाया गया था और बहुत से विकल्प सामने रख दिए गए थे। लेकिन तेलंगाना का उबाल केंद्र के सामने अब बहुत अधिक विकल्प नहीं रख रहा है। सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन के जो भी लोग तेलंगाना के इलाके में आते हैं उनके सामने भी सिवाय इसके और कोई रास्ता नहीं है कि वे जनभावनाओं के मुताबिक संसद और विधानसभा से इस्तीफे देकर इस राज्य निर्माण के लिए दबाव डालें और वह दौर भी अब शुरू हो चुका है इसलिए इस मुद्दे को केंद्र सरकार और अधिक वक्त तक नहीं दबा पाएगी और उसे इस पर फैसला जल्द लेना होगा, और अगर उसे तेलंगाना में अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो उसे यह फैसला राज्य निर्माण के पक्ष में ही लेना होगा। तेलंगाना की मांग ऐतिहासिक है। इसके बहुत पहले भी वहां के आंदोलन में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और पूरे देश में राज्य का दर्जा पाने के लिए इतनी बड़ी शहादत का इतिहास नहीं मिलता, पुलिस की गोलियों से कोई पौने चार सौ लोग मारे गए थे।
हम यहां पर तेलंगाना राज्य के पक्ष या विपक्ष में उन बारीकियों में जाना नहीं चाहते जिन पर किसी लंबे लेख में ही अधिक जानकारी लिख पाना मुमकिन है। हम छोटे राज्य के निर्माण के अनुभव पर कुछ चर्चा करना चाहते हैं और तेलंगाना के खास संदर्भ में ऐसे अनुभव जोड़कर देखना चाहते हैं। भारत में आजादी के बाद से जब-जब राज्यों का विभाजन हुआ तब-तब बहुत से दूसरे इलाकों में भी राज्य का दर्जा पाने की हसरत आगे आई। इसमें तेलंगाना आजाद भारत के इतिहास में सबसे बड़ी, सैकड़ों जानों की, शहादत देने वाला इलाका था। देश में कम से कम दर्जन भर ऐसे इलाके हैं जो दुनिया के बहुत से देशों से बड़े हैं और भारत के कई राज्यों से बड़े हैं। उनके दावे के पीछे भाषा, भूगोल, अर्थव्यवस्था जैसे कई तर्क भी सही लगते हैं। लेकिन समय रहते केंद्र सरकारों ने राज्य पुनर्गठन आयोग नहीं बनाया। सन् 2000 में जब तीन नए राज्य अटल सरकार ने बनाए तब भी देश के बाकी कई इलाकों को राज्य बनाने के आंदोलन देखते हुए भी ऐसा कोई आयोग नहीं बनाया गया और हर राज्य में अलग-अलग दर्जे के आंदोलन चलते रहे। पाठकों को यह याद होगा कि छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड को राज्य बनाने के पीछे एक आधार यह बनाया गया था कि इनके मूल राज्यों में विधानसभाओं में इनको अलग राज्य बनाने के प्रस्ताव पहले ही पारित कर दिए थे और वे प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास पहले से पड़े हुए थे। लेकिन इसके बाद से किसी और राज्य से न तो ऐसा कोई प्रस्ताव आया और न ही केंद्र सरकार ने मधुमक्खी के छत्ते को और अधिक हिलाया। लेकिन तेलंगाना का आंदोलन आज एक जलती हुई हकीकत है जिसे अनदेखा करना और अधिक मुमकिन नहीं है।
हम छोटे राज्यों के अनुभव की बात कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में बैठे हुए हम मध्यप्रदेश के भोपाल की गुलामी से आजाद होने के फायदे देख रहे हैं और इन दस बरसों का हमारा अनुभव यह है कि जिस तरह अंगे्रजों के राज में लंदन में बैठी हुई ब्रिटिश सरकार भारत का शोषण करती थी, उसी तरह भोपाल में बैठी सरकारें उस वक्त भी छत्तीसगढ़ के शोषण में जुटी हुई थीं जब यहां के दो-दो कांगे्रसी नेता बरसों तक अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस इलाके के मुख्यमंत्री रहते हुए भी इस इलाके को कभी उसका हक नहीं मिला। लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ के लिए किसी किस्म का कोई वजनदार आंदोलन एक दिन भी नहीं चला और इस इलाके को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक फैसले से राज्य का दर्जा मिल गया। तब से लेकर अब तक एक राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ ने जो तरक्की की है, उसका कोई सपना भी भोपाल-राज में छत्तिसगढिय़ा ने नहीं देखा था। लेकिन इसी के साथ ही जो झारखंड भी नया राज्य बना उसकी बदहाली भी देखते ही बनती है। जिस तरह वहां दलबदल, सत्तापलट, जनता की दौलत को सीधे मुख्यमंत्री के स्तर पर लूट खाने का सिलसिला चला उससे लोगों को लगा कि छोटा राज्य कितना बुरा भी हो सकता है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में वैसा दलबदल नहीं हो पाया जिससे कि सरकार गिर पाती, हालांकि उसके लिए कोशिश पूरी हुई। और न ही यहां पर मधु कोड़ा जैसा हाल हो पाया। अब उसके पीछे राजनीतिक दलों की स्थिरता का योगदान रहा या फिर राज्य के बड़े नेताओं की पार्टी और सरकार पर पकड़ ऐसी रही कि छोटा राज्य होने के बाद भी सरकार नहीं पलटी, इतने बारीक कारणों पर हम यहां जाना नहीं चाहते। तो तीन में से इन दो राज्यों के परस्पर विपरीत अनुभव, दोनों ही देश के सामने और तेलंगाना के बारे में सोचते हुए लोग यह भी सोचते हैं। दूसरी एक बात जो तेलंगाना राज्य के आड़े आ रही है वह है आंध्रप्रदेश की मौजूद राजधानी हैदराबाद का तेलंगाना के इलाके में होना। आंध्रप्रदेश के तेलंगाना के बाहर के लोग अगर एक बार तेलंगाना के अलग हो जाने के लिए तैयार हो भी जाएंगे तो भी वे हैदराबाद के एक बड़े व्यापार, रोजगार और अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में शेष आंध्रप्रदेश से बाहर जाने देने नहीं चाहेंगे।
लेकिन हम यहां पर बारीकियों की चर्चा करना नहीं चाहते और केंद्र सरकार को यह सलाह देना चाहते हैं कि तेलंगाना राज्य का निर्माण करने की इस नौबत के पहले उसके पास राज्य पुनर्गठन आयोग के लिए काफी समय था जिसका कोई इस्तेमाल उसने नहीं किया। इसलिए अब और कोई बहाना बनाए बिना उसे सीधे इस राज्य को बनाना होगा। इसमें आने वाली दिक्कतों के लिए किस तरह के राजनीतिक और सरकारी समझौते उसे आंध्र के इन दो प्रस्तावित हिस्सों के बीच करवाने होंगे यह यूपीए सरकार, और मोटेतौर पर कांगे्रस पार्टी का सरदर्द है। लेकिन तेलंगाना को अब राज्य का दर्जा पाने का पूरा हक है और इसमें देर गलत होगी। इसके साथ-साथ देश के दूसरे हिस्सों में ऐसे आंदोलन शुरू हों, उसके पहले ही राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर उससे तेजी से रिपोर्ट लेनी चाहिए। इस देश में अमरीका की तरह करीब पचास राज्यों की गुंजाइश है और उससे ही यह देश अमनचैन से रह सकेगा, तरक्की कर सकेगा।

नंदी नाम का क्या सिर्फ बैल ही बर्दाश्त होगा?


विशेष संपादकीय
27 जनवरी 2013
सुनील कुमार
जयपुर साहित्य समारोह सायास या अनायास विवादों में उलझा हुआ दिखता है। हर बरस कोई न कोई ऐसी बात होती है कि साहित्य से आमतौर पर दूर रहने वाली खबरों में यह समारोह छा जाता है। फिल्मों से लेकर किताबों तक के बाजार के जानकार लोग यह जानते हैं कि कई बार ऐसे विवादों के पीछे एक सोची-समझी चतुराई भी होती है कि किसी लेखक या किसी किताब का बाजार खड़ा किया जा सके। भारत के एक प्रमुख समाजशास्त्री और विचारक आशीष नंदी इतने समय से स्थापित हैं कि उनके लिए ऐसे किसी बढ़ावे की जरूरत नहीं है, इसलिए पिछड़े वर्ग और दलित-आदिवासियों को लेकर उन्होंने भ्रष्टाचार के बारे में जो कहा है, उसे हम किसी बाजारू बढ़ावे का हिस्सा नहीं मानते। आशीष नंदी के खिलाफ आनन-फानन राजनीतिक बयान आने लगे और राजस्थान पुलिस ने उनके खिलाफ दलित-आदिवासी कानून के तहत एक मामला भी दर्ज कर लिया। कानूनी कार्रवाई से परे भी उनके खिलाफ वामपंथी लोग, उदारवादी लोग, और ओबीसी, एसटी, एससी तबकों के साथ हमदर्दी रखने वाले लोग खुलकर उतर आए हैं। लेकिन इस पूरे मामले को हम कई संदर्भों के साथ जोड़कर देखना चाहेंगे।
एक साहित्य समारोह की एक बहस के पैनल में रहते हुए उन्होंने एक बात कुछ व्यापक संदर्भों में कही, और उसका एक हिस्सा निकालकर उनका विरोध शुरू हो गया। वैचारिक असहमति पर आधारित ऐसा विरोध जायज है और उनकी कही बातों से हम भी सहमत नहीं हैं। या शायद ऐसा कहना बेहतर होगा कि हम तकरीबन उससे असहमत ही हैं। लेकिन हमारी असहमति नजरिए को लेकर है, न कि उनके तर्क को लेकर। आशीष नंदी ने अपने हिसाब से भारत के सामाजिक यथार्थ की एक तस्वीर पूरी तरह अपने नजरिए की पेश की है। उनका कहना है कि ओबीसी और दलित-आदिवासी तबकों के लोग भ्रष्टाचार में अधिक शामिल हैं, भ्रष्ट लोगों में अधिकतर इन्हीं तबकों के लोग हैं। उनका यह भी कहना है कि यह समाज में बराबरी की ओर ले जाने का एक रास्ता भी है, और जब तक यह कायम या जारी है, तब वे भारत में लोकतंत्र की संभावनाएं देखते हैं। उन्होंने अपने इस बयान के बाद तुरंत खड़े हो गए विरोध पर और खुलासा भी किया, लेकिन राजनीतिक दलों के लोग तब तक देश भर में उनके खिलाफ आवाज उठाते खड़े हो चुके थे। उन्होंने अपनी तरफ से यह भी साफ किया था कि ऊंची समझी जाने वाली जातियों का भ्रष्टाचार दिखाई नहीं पड़ता है, और पिछड़े हुए तबकों का भ्रष्टाचार तुरंत नजर में आ जाता है। 
इस मुद्दे पर हमारा सोचना बहुत साफ है। किसी भी अहिंसक विचारधारा कानून और पुलिस की कार्रवाई निहायत नाजायज है, और खासकर जब ऐसे मामलों में दलित-आदिवासी तबकों की रक्षा के लिए बनाए गए खासे कड़े कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह बात इस देश में स्थापित होते चलेगी कि इस तबके को लेकर किसी सोच की जगह जेल है। ऐसा कुछ दूसरे मुद्दों को लेकर भारत में पहले से चल ही रहा है। धर्म को लेकर एक ऐसा माहौल बना हुआ है कि अपनी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचने की शिकायत लेकर कोई भी थाने पहुंचे, तो उस पर एक थाना ही कानून कार्रवाई शुरू कर सकता है। पिछले महीनों में इंटरनेट पर अपनी बात रखने को लेकर बहुत से लोग एक कानून कार्रवाई झेल भी चुके हैं। हमारा यह भी मानना है कि आशीष नंदी ने जो कुछ कहा है, उस पर कोई केस नहीं बनता, लेकिन राजनीतिक संतुष्टि के लिए कुछ लोग इसे मुद्दा बना रहे हैं, और कुछ लोग इसे मुकदमा बना रहे हैं। आशीष नंदी का बयान कुल मिलाकर एक वैचारिक जवाब और बहस का हकदार है, न कि किसी विचार और बहस को खत्म करने की बुनियाद। 
उनसे परे अगर हम इस मुद्दे की बात करें तो हमारा साफ मानना है कि आज अगर नंदी के खिलाफ कानून का इस्तेमाल किया जाएगा, तो बात वहीं नहीं थमेगी, और आज जो लोग उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, वैसे वामपंथी और उदारवादी ही कल इससे बड़े निशाने पर होंगे क्योंकि वे ही आमतौर पर खुलकर बोलते हैं। हिंदुस्तान में ऐसे मामलों पर कानून कई दशक पहले बेअसर हो चुके पेनिसिलीन जैसा है, जिसे खारिज कर दिया जाना चाहिए। भारत सैकड़ों बरस पहले से खुले शास्त्रार्थ वाला देश रहा है, चाहे वह शास्त्रार्थ ऊंची जातियों के बीच ही क्यों न होता रहा हो। इस देश में आज जब हर जातियों के सामाजिक अधिकार कानून के रास्ते बराबरी पर लाए जा चुके हैं, तब इन मुद्दों पर गंभीर बहस को जेलों में करवाना नासमझी होगी। आज किसी मंच पर खुली बहस, सामाजिक और राजनीतिक शिक्षण का एक मौका भी रहता है, और ऐसे मौकों पर नंदी से असहमत विचारधारा को भी सुनने वाले मिल सकते हैं। 
दूसरी बात यह भी है कि ओबीसी और एसटी-एससी तबके के लोग आमतौर पर गरीबी से उठकर आते हैं। और जब वे नाजायज तरीके से पैसे कमाते हैं, तो उनके पास उसे छुपाने के लिए पहले की दौलत नहीं होती, जो कि ऊंची समझी जाने वाली जातियों के भ्रष्ट लोगों के पास पहले से होती है। इन पिछड़े लोगों में इतनी धूर्तता भी नहीं होती कि कैसे अपनी ताजा काली कमाई को छुपा सकें, इस नासमझी में भी उनकी कमाई सतह पर तैरती हुई दिखने लगती है। फिर इनके भ्रष्टाचार की एक चर्चा इसलिए भी होने लगती है कि उनसे हिकारत करने वाले, ऊंची समझी जाने वाली जातियों के कुछ लोग, इस बात से भी असहमत रहते हैं कि ये लोग छोटी-छोटी रिश्वत लेने लगते हैं। ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों का मानना रहता है कि रिश्वत की रकम उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के मुताबिक ऊंची होनी चाहिए। ऐसे माहौल में ओबीसी / एसटी / एससी को मानो भ्रष्टाचार का हक नहीं रहता, या वह इस तरह बढ़-चढ़कर दिखता है कि आशीष नंदी जैसे कुछ लोग इन तबकों को सबसे बड़ा भ्रष्ट मान लेते हैं। हमारा बहुत साफ अनुभव यह है कि ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोग अधिक दमखम से, अधिक हक के साथ, अधिक दुस्साहस से बड़ा भ्रष्टाचार करते हैं, जो पैसे वाले हैं वे अधिक बड़ा भ्रष्टाचार करते हैं, और जो राजनीतिक-सरकारी ओहदों पर आने वाले कमजोर समझी जाने वाली जातियों के नवबलवान हैं, वे लोग मुकाबले में छोटे और कम भ्रष्ट हैं।
लेकिन नंदी का एक तर्क बड़ा दिलचस्प है। वे इन कमजोर तबकों के भ्रष्टाचार को सामाजिक असमानता की खाई पाटने का सामान भी मानते हैं। वे इससे लोगों के बीच दौलत और ताकत का एक अधिक बराबर बंटवारा भी देखते हैं, और उनका यह भी मानना है कि इससे भारतीय लोकतंत्र के बने रहने की संभावनाएं बनी हुई हैं। उनकी इस बात से हम सहमत हैं कि अब जब आरक्षण के चलते राजनीतिक और सरकारी पदों पर इन कमजोर तबकों के लोगों को आने का हक मिल चुका है, इन पदों पर वे आ चुके हैं, तो फिर वे चाहें तो अपने भ्रष्टाचार से ही सही, अपने इस पिछड़ेपन को पछाडऩे का काम कर सकते हैं। भ्रष्टाचार को सामाजिक न्याय और कमजोर तबके के सशक्तिकरण का औजार या हथियार मानने की यह आशीष नंदी की अपनी सोच है, इस पर भी और विचार की जरूरत है। जब भ्रष्टाचार भारतीय लोकतंत्र में एक बहुत बड़ी और ताकतवर हकीकत बन चुका है, तो उसे एक मौके की तरह इस्तेमाल करने की आशंका या संभावना को पूरी तरह खारिज कैसे किया जा सकता है?
एक समाजशास्त्री की सोच पर बवाल में कुछ गलत नहीं है, लेकिन उनकी सोच पर पुलिस और अदालत की कार्रवाई गलत है। आज विचारों की जगह पर किसी दौलतमंद प्रकाशक या किसी ऊंची समझी जाने वाली जाति के लोगों का एकाधिकार नहीं रह गया है। आज इंटरनेट की मेहरबानी से सारे बेजुबान तबकों को जुबान मिल गई है, और अब जुबान का जवाब जुबान होना चाहिए, लगाम नहीं। भारत में आज बहुत से लोगों को हर बात का इलाज कानून दिखता है। लेकिन कानून के इस्तेमाल की बदहाली का रोना हर कोई अलग रो रहे हैं। आशीष नंदी की बात से सहमति और असहमति की जगह बहस है, मंच है, लिखना है, और बोलना है। इन सबके बीच नंदी को अदालत में घसीटने से, नंदी अदालत नहीं जाएंगे, कानून का बेजा इस्तेमाल करने वाले नेता लोगों के मंचों पर आ जाएंगे, उनकी किताबों में घुस जाएंगे, उनकी बहसों पर हावी हो जाएंगे। भारत एक ऐसे देश की तरह बर्ताव करने लगा है जिसमें बर्दाश्त खत्म हो चला है। यह बात उसे पूरी दुनिया में एक अभूतपूर्व अपमान दिलाने जा रही है, और ऐसा लगने लगा है कि नंदी के नाम पर इस देश में लोगों को शंकर के मंदिर के बाहर बैठा, या सड़क और सब्जी बाजार में घूमता नंदी ही बर्दाश्त रह जाएगा।

पायदान की तरह इस्तेमाल हो रहा भारतीय संविधान


विशेष संपादकीय
25 जनवरी 2013
सुनील कुमार
देश और प्रदेशों की राजधानियों से लेकर सरकारी दफ्तरों और स्कूल-कॉलेजों तक गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारियां चल रही हैं। देश के संविधान के लागू होने की सालगिरह के मौके पर गांधी, नेहरू और अंबेडकर को याद किया जाएगा और इस संविधान की महानता पर यह देश एक बार फिर आत्ममुग्ध और आत्मसंतोषी  होगा, और देशप्रेम के गाने चारों तरफ इसके लिए एक माहौल खड़ा करेंगे। 
हिंदुस्तान में जो सबसे फरेबी मौके हो सकते हैं, उनमें से एक गणतंत्र दिवस का जलसा होता है। जब कानून को बनाने, और उसमें फेरबदल का हक रखने वाले सांसद कानून को तोडऩे, मोडऩे और बेच देने पर आमादा हों, जब उसे लागू करने की जिम्मेदारी रखने वाली सरकारें उसका बेजा इस्तेमाल करके उसे दुहने में लगी हों, जब समाज के हर किस्म के ताकतवर तबके अपने धनबल और बाहुबल से इस संविधान का गला घोंटने में लगे हों, तब किस तरह का जलसा जायज हो सकता है? आज देश का संविधान ताकतवर तबके के पायदान की तरह उसके सोफे के सामने उसके नीचे रखा हुआ है, पांवों को मदद देने के लिए। ऐसे पायदान पर इसका सुख पाने वाले ताकतवर तबके को तो फख्र हो सकता है, लेकिन इन सोफों के पाए तले जो सौ करोड़ से अधिक जिंदगियां दबी हुई हैं, वे किस वजह से इस जलसे में तालियां बजाएं? 
पूरे देश में खुशी का जो मौका होना चाहिए, उसे सरकारी खर्च पर सत्ता मनाती है और बच्चे उसमें शामिल होते हैं। सरकार और स्कूल-कॉलेज से परे लोगों को पूछें कि देश के संविधान पर आज उन्हें कितना भरोसा है, तो लगभग तमाम आबादी यही कहेगी कि उसके वजन के कागज जितना। और सत्ता है कि इस संविधान में संशोधन का शायद सैकड़ा बना चुकी है, और रोजाना ऐसे नए कानूनों की बात हो रही है, जिनके लिए मौजूदा कानून इतने काफी थे कि किसी नए की जरूरत नहीं है, लेकिन उसके लिए नीयत का डिब्बा खाली था, और इस खाली डिब्बे के चलते अगले तमाम कानून भी अपने वजन के कागज जितनी ही अहमियत वाले होंगे। इस संविधान पर जनता का भरोसा परखने के लिए एक बार अगर देश की सरकारें और सरकारी संस्थाएं, स्कूल-कॉलेज अपने-आपको इन जलसों से अलग कर लें, और देखें कि जनता में इनको मनाने का कितना हौसला बचा है? इसलिए इस संविधान का बेजा इस्तेमाल देश के जिन तबकों को और अधिक ताकतवर होने का मौका देता है, उन्हीं लोगों के लिए यह खुशी का मौका है। इस संविधान, और इसके तहत बने नियम और कानून संविधान की भावना के जितने खिलाफ चले गए हैं, उन पर गणतंत्र दिवस के जलसे नमक छिड़कने हर बरस आ जाते हैं। और इस मौके पर देश भर में जितने किस्म की फरेबी बातें होंगी, वे मानो इस नमक को कमजोर तबके के जख्मों पर रेत-कागज बनकर रगडऩे को आएंगी। 
भारत में चुनावों की निरंतरता को लोकतंत्र की कामयाबी मान लिया गया है। लेकिन लोकतंत्र बेईमान चुनावों में खरीदी गई या जुटाई गई जीत से बनी विधानसभाओं या संसद में खरीद-फरोख्त से बनाई गई सरकारों की बेईमानी का नाम नहीं है। लोकतंत्र लोगों की मर्जी से बनी ऐसी सरकार का नाम है, जो लोगों के भले का काम भी करती है। आज देश और प्रदेश की अधिकतर सीटों पर ऐसे सांसद और विधायक जीतते हैं, जो कि दूसरों के मुकाबले कम बुरे होते हैं, या अधिक ताकतवर खरीददार होते हैं। ऐसे लोग क्या खाकर संविधान की भावना को लागू कर सकते हैं? ऐसे लोग संविधान के, संविधान में, छेद ढूंढ-ढूंढकर उसे छलनी सा साबित कर चुके हैं, जिन छेदों में से हर ताकतवर मुजरिम को मटरगश्ती करने का हक है।
यह मौका हमारी तरह सोचने वालों के लिए बहुत बड़ी निराशा लेकर आया है, और इस अंधेरी सुरंग के आखिर में भी कोई रौशनी नहीं दिखती। हिंदुस्तान की जनता के जिस तबके के पास आज लोकतंत्र से बागी होने की जायज वजहें हैं, उसके पास जुबान नहीं है। और जिनके पास जुबान है, वे शहरी आरामतलबी के चलते किसी बगावत के लायक बचे नहीं हैं। और लोकतंत्र के भीतर रहते हुए बगावत के मुमकिन न होने से, नक्सलियों जैसे लोग लोकतंत्र के बाहर जाकर बागी हो रहे हैं। सच तो यह है कि जंगलों के जिन इलाकों में नक्सली पैर जमा चुके हैं, उन जंगलों से दूर, कांक्रीट के शहरी जंगलों के बीच भी वैसी ही बगावत की नौबत वाली जमीन तो है, उस पर बागियों के छुपने के झुरमुट नहीं हैं, और शहरियों में जान लेने और देने की वह सोच नहीं है। इसलिए गणतंत्र दिवस के जलसे जारी हैं।
लोकतंत्र पर अपने भरोसे के चलते हुए हम अब भी किसी भी किस्म की गैरलोकतांत्रिक बगावत के खिलाफ हैं, लेकिन ऐसी कोई वजह हमको नहीं दिखती कि इस देश में आज संविधान के लागू होने का जलसा मनाया जाए। यह जलसा अपने-आपको धोखा देने का एक मौका रहता है कि इस देश में संविधान लागू हो। पड़ोस के पाकिस्तान की तरह की फौजी बगावत और फौजी राज जैसी खराब नौबत हिंदुस्तान में नहीं आती, और यहां चुनाव लगातार होते हैं, उसी को संविधान और लोकतंत्र की एक कामयाबी मान लेना, अपने-आपको किसी संघर्ष से दूर कर लेने जैसा है। ऐसे तमाम जलसों के मौकों पर लोगों को उन मुद्दों पर बात करनी चाहिए जो कि इस बात के सुबूत हैं कि संविधान को ताकतवर तबका पायदान की तरह इस्तेमाल करता है, अपने लिए और अधिक ताकत की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए। इस संविधान के तहत दिए गए अधिकारों को, मौकों को यह तबका उसी तरह इस्तेमाल करते चलता है जिस तरह कोई औरों के हक के फल खाते चले। और अपनी जिम्मेदारियों को यह तबका उसी तरह दूसरों पर फेंकते चलता है, जिस तरह लोग अपने खाए फलों के छिलके और के घर-दूकान के सामने फेंकते चलते हैं। ऐसी नौबत वाले देश में जिनको यह जलसा मनाने के लायक लगता है, वे या तो ताकतवर हैं, या इन ताकतवरों से लुटे-पिटे नासमझ हैं।

केंद्र-राज्य सरकारों के सामने अब वर्मा-रिपोर्ट, कमेटी बनाने से अधिक मुश्किल काम अब

संपादकीय
24 जनवरी 2013
दिल्ली के पिछले महीने के गैंगरेप के बाद जनआंदोलनों को देखते हुए केंद्र सरकार ने जो कमेटी बनाई थी, उसने महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ प्रस्तावित कानून और कार्रवाई पर अपनी रिपोर्ट कल जमा कर दी। सुप्रीम कोर्ट के एक भूतपूर्व न्यायाधीश जस्टिस जे.एस. वर्मा, हाईकोर्ट की एक रिटायर्ड जज जस्टिस लीला सेठ, और देश के भूतपूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने देश भर से आई अस्सी हजार से अधिक प्रतिक्रियाओं और सुझावों का अध्ययन करने के बाद एक महीने से एक दिन पहले ही अपनी रिपोर्ट बना दी, और इसे पढऩे वाले लोगों को इसकी मुख्य सिफारिशों में और इस अखबार के इस कॉलम में पिछले महीनों में बार-बार लिखी गई बातों में अनगिनत समानताएं मिलेंगी।
इस कमेटी का मानना है कि महिलाओं पर सेक्स अपराध रोकने के लिए और कड़े कानून की जरूरत नहीं है, मौजूदा कानून इसके लिए काफी है, उस पर कड़ाई से अमल की जरूरत है। हमने इस बात को बार-बार लिखा था, और हमने यह भी लिखा था कि जो सरकारें मौजूदा कानून को लागू करने में नाकामयाब रहती हैं, वे अपनी नालायकी को छुपाने के लिए अधिक कड़े कानूनों की बात करने लगती हैं।  दिल्ली की इस घटना को लेकर हमने पुलिस कमिश्नर के गैरजिम्मेदारी के बयानों, और केंद्र सरकार द्वारा उनका साथ देने की भी कड़ी आलोचना की थी, और इस अफसर पर कार्रवाई की सिफारिश भी की थी। जस्टिस वर्मा की कमेटी ने बलात्कार पर मौत की सजा की सिफारिश नहीं की है, और हमने भी बार-बार इसके खिलाफ लिखा था कि पहले तो मौत की सजा ही खत्म की जानी चाहिए, और दूसरी बात यह कि बलात्कार पर मौत की सजा का इंतजाम करने से बलात्कार की शिकार महिला की हत्या का खतरा खड़ा हो जाएगा, क्योंकि बलात्कार पर अगर फांसी मिलने का खतरा रहेगा, तो फिर बलात्कार और हत्या करके गवाह और सुबूत खत्म करना बलात्कारियों को अधिक महफूज लगेगा। जस्टिस वर्मा की कमेटी ने दिल्ली की इस घटना के बाद सरकार से समाज तक की प्रतिक्रिया और उनकी कार्रवाई पर बेहद निराशा जाहिर की है। हमने लगातार दिल्ली के समाज से लेकर सरकार तक के रूख पर कड़ा लिखा था।
इस कमेटी की रिपोर्ट सवा छह सौ पेज से अधिक की है, इसलिए उस पर अभी पूरी बात यहां पर नहीं हो सकती, फिर भी इसलिए लोगों को इस मुद्दे पर जागरूक होना चाहिए कि केंद्र सरकार इस रिपोर्ट को बुनियाद बनाकर कानून में फेरबदल सोचेगी। और यह ऐसा मौका है कि जमीन से अखबारों में होते हुए इंटरनेट तक लोगों को अपनी बात सामने रखनी होगी, तभी जाकर सरकार पर उसका असर पड़ेगा। दिल्ली में जनता का जो प्रदर्शन था, और नौजवान पीढ़ी ने जिस तरह एक गंभीर मुद्दे पर सड़कों पर सरकार की मार झेली, उसे देखते हुए एक तरफ तो जस्टिस वर्मा ने उस प्रतिक्रिया की तारीफ इस रिपोर्ट को जारी करते हुए की है, और दूसरी तरफ देश के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अल्तमस कबीर ने कहा है कि उनकी इच्छा यही थी कि वे भी उस प्रदर्शन में शामिल होते। देश की न्यायपालिका के कल और आज के दो मुखिया अगर सार्वजनिक रूप से इस बात को इतनी तल्खी से कह रहे हैं, तो उसका यह मतलब है कि नौजवानों का प्रदर्शन उन लोगों को छू गया है जो इस देश की सबसे बड़ी अदालत चलाते हैं।
यह रिपोर्ट महिलाओं पर सेक्स अपराधों के आम मामलों के साथ-साथ उस कानून को भी खत्म करने की सिफारिश करती है जिसके तहत भारत के बहुत से सरहदी प्रांतों में सेना और सुरक्षा बलों को एक विशेष कानून के तहत कार्रवाई से बचने का मौका मिलता है। कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्वी राज्यों तक एएफएसपीए नाम का यह कानून देश के अशांत इलाकों में तैनात वर्दीधारियों को महिलाओं के खिलाफ सेक्स अपराधों में भी बचाता है। और इसके खिलाफ लंबे समय से आंदोलन चलते आ रहे हैं। जस्टिस वर्मा कमेटी ने ऐसे मामलों की सुनवाई देश के आम कानून के तहत करने की सिफारिश की है और इस पूरे के पूरे एएफएसपीए कानून पर फिर से विचार करने को कहा है। देश-विदेश के मानवाधिकार आंदोलनकारियों ने इसका स्वागत भी किया है और सत्ता से जुड़े लोगों में कश्मीर के नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अकेले हैं जिन्होंने इस सिफारिश का स्वागत करते हुए इस पर अमल करने की बात कही है। सेना इस कड़ी ढाल की वकालत करते आई है, और इसकी आड़ में ऐसा माना जाता है कि सैनिक बहुत किस्म की ज्यादतियां करते हैं।
कुल मिलाकर आज हम इस रिपोर्ट का पहली नजर में स्वागत करते हुए यह उम्मीद करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें अपने आंसुओं और मुआवजों को अपने पास रखकर एक कड़ी कार्रवाई करें, जो कि एक कमेटी बनाने या कानून में फेरबदल करने के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल काम होगा। फिलहाल राजनीतिक दल यह जान लें कि वे अपनी पार्टियों के बलात्कारियों को बचाने का धंधा अगर बंद नहीं करेंगी, तो किसी भी दिन चौराहों पर जनता उनको पीटेगी।


राजनाथ सिंह के लिए इस पारी में चुनौतियां राजनीति से परे की भी


संपादकीय
23 जनवरी 2013
भारतीय जनता पार्टी एक बड़ी गलती करने से बाल-बाल बच गई। नितिन गडकरी के दुबारा अध्यक्ष बनने की खबरों के साथ कल का सूरज निकला था। और सूरज के डूबने तक हालात ऐसे बदले कि नितिन गडकरी की जगह एक-दो दूसरे नाम तय माने जाने लगे, और गडकरी को खुद होकर अपने नाम को वापिस लेने का मौका कैमरों के सामने दिया गया। इस फेरबदल का पूरा श्रेय कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के मातहत इनकम टैक्स को देना ठीक इसलिए नहीं होगा कि देश भर में कई महीनों से गडकरी की कंपनियों, और उनसे जुड़ी हुई कंपनियों की सरकारी और मीडिया, दोनों किस्म की तफ्तीश में सब कुछ गड़बड़ मिला था। पहले तो उसे कारोबार के आम तौर-तरीके बताते हुए उसकी गंभीरता को कम कहा गया, फिर पूरी की पूरी पार्टी औपचारिक बैठक करके गडकरी के साथ खड़ी रही, और आरएसएस के दबाव में पार्टी संविधान को बदलकर गडकरी को फिर अध्यक्ष बनाने की खबरें आती रहीं। भाजपा और आरएसएस के आपसी संबंधों पर हम यहां कुछ कहना नहीं चाहते, क्योंकि हर पार्टी या संगठन को अपने सलाहकार रखने का हक रहता है। इसलिए भाजपा जैसी एक बड़ी और राष्ट्रीय पार्टी जब औपचारिक रूप से एक राजनीतिक फैसला करती है, तो वह फैसला ही लिखने के लिए काफी होता है। 
नितिन गडकरी के नाम पर भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से अड़कर बैठी थी, उसका वह रूख आत्मघाती था। एक राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष जिसे कि केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लडऩी थी, वह खुद अगर कानून के शिकंजे में दिख रहा था, तो पहली बात तो यह थी कि नितिन गडकरी को खुद ही कुर्सी छोड़ देनी थी। उन्होंने वह मौका खो दिया, और उसके बाद भी वे अगले कार्यकाल के लिए कमर कसकर डट गए थे। हमारे पाठकों को याद होगा कि गडकरी की कंपनियों के मामले सामने आने के बाद हमने इसी जगह लिखा था कि उनके इस्तीफे से कम किसी चीज से काम नहीं चलेगा। और कल शाम जाकर उनको वही करना पड़ा। हम भाजपा के भीतर की मजबूरियों को नहीं जानते, और उसके भीतर की गुटबाजी या संघ के चर्चित दबाव को भी हम अपने इस कॉलम में चर्चा के लिए जरूरी नहीं मानते। इसलिए भी कि गडकरी पर लगे आरोपों के साथ भाजपा कांगे्रस और यूपीए पर कोई हमला नहीं कर सकती थी। और कांगे्रस के मुकाबले भाजपा में अध्यक्ष के स्तर पर काबिल लोग बहुत अधिक हैं। कम से कम आधा दर्जन ऐसे नाम अभी भी भाजपा में बाकी हैं जो कि अध्यक्ष बनाए जा सकते थे। और राजनाथ सिंह पहले भी इस पद पर रहे हुए हैं, और उनका नाम भी ऐसे ही काबिल लोगों में है। 
अब विचारों की चर्चा में हम नितिन गडकरी के मामले को खत्म करना चाहते हैं क्योंकि सरकार उसे देख रही है, मीडिया उसे देख रहा है, और पार्टी में भी उस कमजोर कड़ी को, उस नाजुक नब्ज को अनदेखा करना आखिर में खत्म कर ही दिया। अब राजनाथ सिंह ऐसे मौके पर दुबारा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन रहे हैं, जब भाजपा ने पिछले बरसों में लगातार कुछ न कुछ खोया है। अपना खुद का महाराष्ट्र खोने के बाद गडकरी पूरे देश के भाजपाध्यक्ष बनाए गए थे, और उसके बाद भाजपा ने जो-जो राज्य खोए हैं, वह एक लंबी लिस्ट है। और जिन राज्यों में गडकरी के पहले से भाजपा की सरकारें थीं, उनमें से ही कुछ राज्य अपने स्थानीय नेतृत्व की वजह से फिर भाजपा के कब्जे में बरकरार रहे हैं। इसलिए राजनाथ सिंह की यह शुरूआत कुछ अधिक चुनौतियों के साथ है, लेकिन गडकरी या दूसरे बहुत सी पार्टियों के बहुत से नेताओं की तरह के दागी वे नहीं हैं, इसलिए वे दूसरों के भ्रष्टाचार पर मुंह खोलकर बोल सकते हैं। बोलने के लिए तो राजनीति में वे लोग भी दूसरों के दामन पर छींटों को गिनाते हैं जिनकी ठुड्डी तक दलदल में डूब चुकी रहती है, लेकिन आने वाला बरस एक कड़ी टक्कर वाले चुनावों का रहेगा, कुछ राज्यों के साथ-साथ देश के आम चुनाव भी होंगे, और उसमें कीचड़ में लथपथ नेता किसी भी पार्टी के अधिक काम के नहीं होंगे। इसलिए राजनाथ सिंह पर भाजपा में बनी सहमति एक तर्कसंगत फैसला लगती है। 
हम भाजपा के भीतर की गुटबाजी को, और उसकी अगली चुनावी संभावना को कम अहमियत का मानते हैं, और हमारे हिसाब से आज राजनाथ सिंह के सामने एक अलग चुनौती है, जो कि एक मायने में गैरराजनीतिक चुनौती भी है। आज जब पूरा देश राजनीति के और सत्ता के भ्रष्टाचार से थक चुका है, तब कांगे्रस ने अपने एक नौजवान को पार्टी का मुखिया सा बना दिया है, जो आज ईमानदारी की वापिसी की बात करता है। यह मौका सचमुच ही ऐसी बात का है। और राजनाथ सिंह को चुनावी नफे-नुकसान से परे यह देखना चाहिए कि वे अपनी पार्टी के मार्फत राजनीति से गंदगी को दूर करने की पहल कैसे कर सकते हैं। आज वामपंथियों को छोड़ दें तो तकरीबन तमाम पार्टियों के लोग भ्रष्टाचार में कम या अधिक हद तक फंसे हुए हैं, और महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में तो वामपंथी भी फंसे हुए हैं और भाजपा तो ऐसे लोगों को टिकट देने की गुनहगार भी है, कांगे्रस, सपा और बसपा की तरह। आज अगर राजनाथ सिंह लोगों के बीच अपनी पार्टी को एक बेहतर विकल्प की तरह रखना चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, सही चाल-चलन, और कानून के एक आम सम्मान की संस्कृति को घोषित रूप से बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि यह न सिर्फ चुनावी संभावनाओं के लिए जरूरी है, बल्कि देश के एक बेहतर वर्तमान और बेहतर भविष्य के लिए भी जरूरी है। हम यही नसीहत समय-समय पर बाकी पार्टियों को देते आए हैं, लेकिन आज भाजपा और राजनाथ सिंह की बारी है। उनको खुलकर भाजपा के लोगों के लिए एक बहुत साफ-सुथरे चाल-चलन की आचार संहिता लागू करनी चाहिए, और पार्टी को उस सादगी की तरफ भी बढ़ाकर ले जाना चाहिए जो कि भारतीय राजनीति से, सत्ता से लापता हो चुकी है। राजनीति और सत्ता में जनता के पैसों की जो बर्बादी होती है, उस पर भी भाजपा को तुरंत लगाम लगाना चाहिए। ये सारे पार्टी के नेताओं के लिए कड़वे तो होंगे, लेकिन अगर भाजपा एक बेहतर पार्टी के अपने नारे के साथ-साथ सत्ता में आना चाहती है, तो उसका रास्ता एक सादगी और एक ईमानदारी के चक्कों पर चलकर ही तय हो सकता है।

वायुसेना की इस कायरता पर कोर्ट मार्शल और सजा जरूरी


संपादकीय
22 जनवरी 2013
छत्तीसगढ़ में हुए एक हादसे के बाद नक्सल मोर्चे पर भारतीय वायुसेना के लोगों की एक बड़ी गैरजिम्मेदारी सामने आई है। राज्य पुलिस के एक जख्मी और लहूलुहान वायरलेस ऑपरेटर को मरने के लिए हेलिकॉप्टर में अकेले छोड़कर एयरफोर्स के आधा दर्जन लोग अपनी जान बचाकर पुलिस थाने चले गए। जंगल के बीच नक्सली गोलियों के लिए एक सिपाही को इस तरह से छोड़कर चले जाना उन बहुत आम मानवीय मूल्यों के खिलाफ भी था, जिन्हें लोग हर किसी के लिए जरूरी समझते हैं। और खासकर भारत की सेना के, वायुसेना के, पायलट सरीखे जिम्मेदार लोगों के रहते हुए पूरी की पूरी एयरफोर्स टीम जिस तरह से चली गई, वह मामला हमारे हिसाब से मिलिट्री कोर्ट मार्शल के लायक है। और जहां तक हमारा अंदाज है, दुनिया की सेनाओं में ऐसे मौकों के लिए सैनिकों से उम्मीद के नियम-कायदे भी होंगे, और उनके चलते ये वायुसैनिक सजा के हकदार हैं। 
सुनने में यह बात कड़ी लग सकती है कि देश की सेना के लोग छत्तीसगढ़ के नक्सल मोर्चे पर मदद के लिए आए हैं, और उनके बारे में ऐसी बात हम लिख रहे हैं, लेकिन यह बात बहुत साफ है कि वायुसेना यहां ड्यूटी पर तैनात है, और वह कोई मदद करने नहीं आई है। इस देश का इतना सारा पैसा सेना पर इसीलिए खर्च होता है कि सरहद पर और देश के भीतर जब जरूरत हो, तब सेना काम आए, और दुश्मन फौज से लेकर कुदरत की मार तक, कई किस्म के मोर्चों पर वह जिंदगियां बचाए। छत्तीसगढ़ का नक्सल मोर्चा खतरनाक तो है, लेकिन न सिर्फ हिंदुस्तान की फौज बल्कि दुनिया की कोई भी फौज इस बात के लिए तैयार रहती है कि लड़ाई में उसकी जान जा सकती है। यह इस पेशे के साथ जुड़ा हुआ खतरा है। फौज से नीचे की जो एजेंसियां हैं, वे भी रात-दिन अपने लोगों को नक्सल मोर्चे पर खो रही हैं। लेकिन सीआरपीएफ हो, या राज्यों की पुलिस हो, ऐसा किसी का किया हुआ याद नहीं पड़ता कि अपने जख्मी साथी को नक्सल घेरे के बीच छोड़कर आधा दर्जन लोग अपने हाथ-पांव संभालते हुए भाग निकलें। इन वायुसैनिकों का यह तर्क भी बहुत ही फर्जी है कि खून इतना अधिक बह रहा था कि वे उस सिपाही को लेकर कई किलोमीटर, कई घंटे नहीं जा सकते थे। जब एक छोटा सिपाही इस कदर जख्मी था, तो साबुत हाथ-पैर वाले आधा दर्जन वायुसैनिकों में से कुछ लोग तो उसके साथ रूक ही सकते थे। यह एक शर्मनाक बर्ताव है, और ऐसी कायरता को माफ नहीं किया जा सकता।
इसी छत्तीसगढ़ में हमने एक बहादुर पुलिस अधीक्षक विनोद चौबे को शहादत की तरफ खुद होकर जाते देखा है, जब उन्होंने नक्सली में घेरे में फंसे अपने सिपाहियों का साथ देने के लिए उस घेरे में भीतर घुसना जरूरी समझा था। और उसमें उनकी जान भी गई, लेकिन पुलिस और वर्दी की एक मिसाल भी कायम हुई कि किस तरह मोर्चे पर बहादुरी दिखाई जाती है। शहीद विनोद चौबे के अलावा  राज्य पुलिस के, सीआरपीएफ के और भी बहुत से लोगों ने बहादुरी दिखाते हुए शहादत को बेहतर समझा, और मोर्चे को छोड़कर कायरों की तरह कोई नहीं भागा। छत्तीसगढ़ सरकार वायुसेना को लेकर केंद्र सरकार से किसी तरह के टकराव में पडऩा नहीं चाह रही इसलिए वह सार्वजनिक रूप से वायुसेना के बर्ताव पर कुछ नहीं बोल रही है, लेकिन राज्य की पुलिस के मन में इस बर्ताव को लेकर बहुत तकलीफ है। हमारा मानना है कि न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देश के किसी भी मोर्चे पर तैनात वर्दीधारी सुरक्षा कर्मचारियों और सैनिकों ने अपनी अलग मानवीय खामियों से परे, मोर्चे की ड्यूटी पर कमजोरियां और कायरता नहीं दिखाई है। बस्तर के इस मामले को लेकर वायुसेना को अपना नाम और अपनी इज्जत साफ रखने के लिए इन पायलटों और वायुसैनिकों का कोर्ट मार्शल करना चाहिए, और उन्हें सजा देनी चाहिए। सेना के लिए देश के लोगों के मन में सम्मान तभी बने रहेगा जब सेना का बर्ताव बहादुरी का होगा, और इंसानियत का होगा।

राहुल गांधी का दूध-भात आज से खत्म, अब कसौटी


संपादकीय
21 जनवरी 2013
कांगे्रस के जिस चिंतन शिविर में परसों राहुल गांधी को एक औपचारिक ताजपोशी हुई है, वह वैसे तो कांगे्रस का घरेलू मामला था और है, लेकिन जब पूरा देश उसका जीवंत प्रसारण देख रहा है तो इस मौके का एक सार्वजनिक पहलू भी है। इसलिए यहां किसी की भी कही हुई बातों को घर के भीतर की बातें मानकर उन पर चर्चा न करना मुमकिन नहीं है। इसलिए राहुल गांधी ने नया पद संभालते हुए जो भावनात्मक भाषण दिया है उस पर भी एक चर्चा यहां होना जरूरी है। उन्होंने अपने परिवार की बहुत सी निजी भावनाओं को सामने रखा, और दर्द से भरी ऐसी यादों में देश के लोगों को छू भी लिया। उन्होंने सरकारी हकीकत पर कुछ ठोस बातें भी कहीं, और हम उन्हीं बातों का बाकी देश के लिए महत्व मानते हैं। पार्टी के भीतर का सही, जब यह पूरा मंच दुनिया के लिए देखने को खुला था, तो जाहिर है कि एक सीमा से अधिक की आत्मग्लानि, अपराधबोध और प्रायश्चित की यहां पर कोई गुंजाइश रहती नहीं, लेकिन फिर भी राहुल गांधी ने जो बातें कहीं, उनमें कांगे्रस और सरकार की कड़वी मौजूदा हकीकत को लेकर एक अधिक खुली हुई बात वे कर सकते थे, और उनको करनी चाहिए थी। 
कांगे्रस का चिंतन शिविर कांगे्रस और गांधी परिवार की यादों की चर्चा से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता था। उसकी अहमियत को एक आत्ममंथन से ही बढ़ सकती थी, और यह आत्ममंथन यादों के बजाय आज अधिक कारगर हुआ होता। लेकिन चुनावी लोकतंत्र में किसी पार्टी और नेता का सही या गलत होना जितना मायने रखता है, उतना ही मायने यह भी रखता है कि उनकी तस्वीर लोगों के बीच कैसी बनती है, उनके बारे में जनधारणा कैसी है। इसलिए उत्तरप्रदेश के चुनाव को गंवा चुके राहुल गांधी के लिए आज यह भी जरूरी था कि वे उस परिवार की शहादत की याद दिलाते हुए लोगों के बीच अपनी एक तस्वीर पेश करें, क्योंकि उस परिवार का होने के नाते कुनबापरस्ती के आरोप तो उन पर लगते ही रहे हैं, और लगते ही रहेंगे। इसलिए कांगे्रस के मंच से जब देश भर के लोगों के बीच राहुल गांधी ने अपनी दर्दभरी यादों को बांटा, तो हो सकता है कि वे उनकी मासूम भावनाएं हों, और हो सकता है कि उनके भाषण लिखने वाले लोगों ने इस मौके का एक राजनीतिक इस्तेमाल किया हो। 
हमारा सोचना है कि शहादत और यादों का जिंदगी की कड़वी हकीकत के बीच एक जरा सा ही इस्तेमाल हो सकता है, और यह इस्तेमाल चुनाव के मौके पर थोड़ा सा और बढ़ सकता है। जो लोग जिंदा रहने की मशक्कत करते रहते हैं उनकी जिंदगी में अपनी खुद की दर्दभरी यादें बहुत होती हैं, और उनका आज भी बहुत दर्द से भरा होता है। राहुल ने अपनी दादी की जिस हत्या का छू लेने वाला जिक्र किया, वह हत्या सत्ता की राजनीति, और सत्ता के खतरों से जुड़ी हुई थी। देश में आज करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनके घरों में उनकी दादी या नानी, उनकी मां या बहन इलाज के बिना गुजर जाते हैं, और उनकी यह बेबसी उनकी किसी सत्ता से जुड़ी हुई नहीं रहती। इसलिए राहुल या उनके परिवार का दर्द उन लोगों को जरूर छू सकता है जिनकी अपनी जिंदगी बहुत अधिक अभावों से भरी हुई नहीं है। लेकिन जो लोग रोज सुबह से रात तक जिंदा रहने का सामान ढूंढते हैं, तिल-तिल मरते हैं, अपने कुनबे की जरूरतों के लिए बेबस रहते हैं, उनकी नजर में तो यही रहता है कि देश या प्रदेश में किस पार्टी ने, किस कुनबे ने कितना लंबा राज किया है। हिंदुस्तान चाहे लोकतंत्र हो, यह लोकतंत्र अगर आधी-आधी सदी से कुछ परिवारों का राज देख रहा है, अगर कुछ पार्टियों का राज देख रहा है, तो अपने सुख और दुख दोनों के लिए यह देश उन्हीं को जिम्मेदार मानता है, और वे ही जिम्मेदार हैं भी। 
राहुल गांधी ने अपने भाषण में जब यह कहा कि जो भ्रष्ट लोग हैं, वे ही भ्रष्टाचार खत्म करने की बात कहते हुए सामने आ जाते हैं। कांगे्रस का सांसद बनने के पहले से राहुल गांधी यह हैसियत रखते थे कि अपने घर में खाने की मेज पर वे कांगे्रस के लोगों के भ्रष्टाचार पर अपनी दादी, अपने पिता, और बाद में अपनी मां से चर्चा कर सकते थे। कांगे्रस के सांसद होने के नाते और फिर कांगे्रस के महासचिव होने के नाते हाल के बरसों में वे कांगे्रस और यूपीए के भ्रष्टाचार पर कुछ अधिक बोल सकते हैं। लेकिन इनका यह बोलना अब सामने आया है, जब उनको अपनी ताजपोशी के मौके पर एक यादगार भाषण देना था। इससे राहुल गांधी, उनकी पार्टी, उनकी सरकार और उनके नेताओं के मन, वचन और कर्म के बीच एक फासला दिखता है। और अगर वे अपनी अगली जिम्मेदारी के लिए, इस नई जिम्मेदारी के लिए ईमानदार हैं, तो उनको मन, वचन और कर्म को आसपास लाने की कोशिश करनी होगी। 
दो दिनों से टीवी चैनलों पर कांगे्रस को लेकर चल रही बहस में राहुल गांधी के कहे एक-एक शब्द पर चर्चा भी शामिल है। और उनकी नई जिम्मेदारी की मुनादी के पहले से ऐसी जिम्मेदारी को लेकर चल रही अग्रिम चर्चा में भी वे ही छाए हुए थे। यह सब कुछ राहुल गांधी को एक इतनी अधिक बड़ी चुनौती के सामने खड़ा कर देता है कि जिसका सामना बहुत मुश्किल है, और कसौटी बस साल भर दूर है। प्रधानमंत्री पद के अगले संभावित कांगे्रसी बनने की उनकी नौबत लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद ही सामने आएगी, और देश में आज उनकी पार्टी का जो हाल है, उसमें यह बात बहुत आसान नहीं लगती। 
कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार आज जितने कानूनी और गैरकानूनी मामलों में उलझी हुई है, वे अगले चुनाव तक खत्म होने नहीं जा रहे। इसके अलावा कांगे्रस पार्टी नेताओं में जिन भ्रष्ट लोगों की चर्चा राहुल गांधी ने खुद ही की है उन लोगों की नीयत, उनके काम सुधरे बिना कांगे्रस की नियति नहीं सुधर सकती। राहुल गांधी के सामने आज दो चीजें हैं। एक तो उनके खुद के सरकारी कामकाज का खाता आज तक खुला नहीं है, इसलिए उनके नाम कोई गलती भी चढ़ी नहीं है, और वे एक साफ-सुथरी सरकार का वायदा करने का बहुत थोड़ा सा ही सही, नैतिक हक रखते हैं। दूसरी बात यह कि वे एक नई पीढ़ी के हैं और राजनीति के परंपरागत भ्रष्टाचार के शिकंजे में चलते सरकारी ढांचे से परे एक नए किस्म का ढांचा भी सोच सकते हैं। पुराने लोगों की पुरानी सोच इस कदर समझौतापरस्त और इतनी यथास्थितिवादी हो चुकी रहती है कि वे कोई बहुत बड़ा  फेरबदल सोच भी नहीं पाते। इसलिए नई पीढ़ी के सामने एक नई संभावना रहती है। 
राहुल गांधी के सामने एक सहूलियत यह भी है कि अगर वे अपनी पार्टी को कड़ाई से ईमानदार बनाना चाहेंगे, तो पार्टी के भीतर उनको कोई रोक भी नहीं सकेगा। इस पार्टी के भीतर एक कुनबे के राज के चलते अगर भ्रष्टाचार होता है तो उसमें हम संदेह का इतना ही लाभ दे सकते हैं कि यह परिवार उस पर काबू नहीं कर सका। लेकिन राजनीति और लोकतंत्र ऐसे संदेह के लाभ के भरोसे नहीं चलते। अगर राहुल गांधी एक सत्तारूढ़ पार्टी के रूप में, अगली चुनावी संभावनाओं वाली पार्टी के रूप में देश के सामने कुछ बेहतर मिसालें रख सकते हैं, तो उसका फायदा पूरे देश को इस तरह से भी मिलेगा कि बाकी पार्टियों को भी अपने भ्रष्टाचार को बचाने के लिए कांगे्रस की मिसालें मौजूद नहीं मिलेंगी।
किसी भी भाषण या बयान को एक सीमा से अधिक महत्व इसलिए नहीं देना चाहिए क्योंकि ऐसी बातें सोच-समझकर कही जाती हैं, और कहने के लिए कही जाती हैं। कहे हुए को करना असली कसौटी होती है, और यह कल से राहुल गांधी के लिए शुरू हो गई है। आज जब वे औपचारिक रूप से पूरी पार्टी की कमान को अपनी मां के साए में थाम चुके हैं, तो वे पार्टी और अपने नेताओं की किसी भी हरकत के लिए किसी और की तरफ नहीं देख सकेंगे। बच्चों के खेल में जो गैरबराबरी के छोटे बच्चे होते हैं, उन्हें खेल की शर्तों में रियायत देते हुए कहा जाता है कि वे दूध-भात हैं। मतलब यह कि वे अभी दुधमुंहे हैं, और शर्तों में छूट के हकदार हैं। राहुल गांधी को उनकी पार्टी और देश ने उनके अधेड़ हो जाने तक दूध-भात की रियायत दी, आज से वह खत्म।

जो मांगोगे, वही मिलेगा, कहानियों की तांत्रिक अंगूठी अब हकीकत


21 जनवरी 2013
शहरी या आधुनिक जिंदगी मशीनों और उपकरणों पर इस कदर टिकी हुई है कि ऐसे किसी सामान के बेहतर होने का मतलब बहुत से लोगों के लिए जिंदगी बेहतर हो जाना होता है। अभी भी बहुत से लोग ऐसे होंगे जिनको ऐसी सहूलियत के इस्तेमाल की खबर न हो कि बाजार में कोई सामान पसंद आने पर वे उसकी तस्वीर खींचकर पल भर में दुनिया के किसी भी कोने में अपने परिचितों को भेज सकते हैं, और उन्हें पसंद कराकर खरीदना या न खरीदना तय कर सकते हैं। लेकिन आने वाले दिन टेक्नॉलॉजी की ऐसी छलांग देखने वाले हैं कि जिससे आज की सहूलियत पुरातत्व का सामान लगने लगेगी, मतलब यह कि कुछ बरसों में ही आज के सामान ऐसे पुराने हो जाएंगे, मानो वे खुदाई में निकली हुई पुरानी पत्थर प्रतिमाएं हों। 
अभी अचानक एक बड़ी सी ऐसी पेनड्राइव पुराने सामानों में हाथ लगी, जो कि कुछ बरस पहले तक काम आ रही थी। यह 32एमबी की थी। आज इससे हजार गुना अधिक डाटा रिकॉर्ड करने वाली पेनड्राइव इससे दस गुना छोटे आकार की इस्तेमाल हो रही है। और यह जरा से बरसों के भीतर की बात है। यही हाल मोबाइल फोन से लेकर कैमरों तक, हर किस्म के उपकरणों का हो गया है। 
अभी महीना भर ही हुआ कि देर रात को छत्तीसगढ़ की राजधानी में बनी नई राजधानी को दिखाने के लिए कुछ मेहमानों को ले जाना हुआ। वहां की सड़कों पर नाम के बोर्ड बहुत कम थे, और आसपास का सारा इलाका खाली था। लेकिन मोबाइल फोन पर जीपीएस सिस्टम से उस इलाके का नक्शा देखते हुए, स्क्रीन पर अपनी कार का निशान भी देखते हुए जब वहां से बाहर निकले, तो उपग्रह की मदद से बन रहा यह नक्शा सड़क पर कार की मौजूदगी को इतना सही बता रहा था, कि कार के सामने के शीशे को ढांककर भी सिर्फ फोन की स्क्रीन पर देखकर मुड़ती हुई सड़क पर कार को मोड़ा जा सकता था। लेकिन इसके इस्तेमाल को भी कई बरस हो चुके हैं, और अब दुनिया भर में लोग अपनी गाडिय़ों में ऐसे सिस्टम लगाकर चलते हैं जिनमें से आवाज लोगों को रास्ता बताते चलती है। 
अब लोगों के इस्तेमाल वाली टेक्नॉलॉजी में लगातार इतना सुधार हो रहा है, कि फोन या दूसरे उपकरण आवाज को तो अच्छी तरह पहचान भी लेेंगे, उसके साथ-साथ वे आपकी बात को सुनते हुए कदम से कदम मिलाकर जानकारी तलाशने का काम भी करते रहेंगे। 
अब कल्पना करें कि आप किसी से न्यूयॉर्क जाने की बात कर रहे हैं, किसी तारीख की बात कर रहे हैं, किसी एयरलाइंस की बात कर रहे हैं, और वहीं रखा हुआ आपका फोन खुद होकर इंटरनेट पर सब सर्च करते चल रहा है, और आप जब टिकट का अंदाज साठ हजार रुपये बता रहे हैं, तो आपका फोन बोल पड़ता है कि फलां एयरलाइंस में टिकट पचास हजार में अभी हासिल हो सकती है। आप अपनी बीमारी की बात किसी से कर रहे हैं, और आपका फोन उस बीमारी के विशेषज्ञ डॉक्टरों की लिस्ट निकालकर आपको बताते चल रहा है कि कौन से डॉक्टर अभी मिल सकते हैं, और उनमें से किसका नाम आपकी फोनबुक में है, और किससे आपकी बातचीत होते रहती है। फिर आपका फोन खुद होकर यह ढूंढ सकता है कि वह डॉक्टर शहर में है या नहीं, और कब तक वापिसी है।
जरा सोचें कि आप बाजार में किसी एक दूकान में एक जूता पसंद करके उसमें दूसरा रंग पूछ रहे हैं, और उस दूकान में दूसरा रंग नहीं है, और बिना आपके कहे आपका फोन आपको बता देता है कि किस दूसरे मॉल में उसी कंपनी की दूकान में आपके साईज का दूसरे रंग का जूता है। आपकी बातचीत को सुनते हुए, आपसे दस मील आगे तलाश करते हुए आपको बिना मांगे की बात बताते चलने वाला मोबाइल फोन शायद एक बरस भी दूर न हो।
अभी भी इंटरनेट पर या कम्प्यूटर पर आपके मददगार सहायक को आए हुए पांच बरस से अधिक हो चुके हैं। मैं ही पिछले सात-आठ बरस में कई बार ऐसे वर्चुअल-सहायक को इस्तेमाल करने की कोशिश कर चुका हूं जो स्क्रीन पर टंगे रहती है, और आपकी कही बातों को आपके तय किए हुए तरीके से दर्ज करते चलती है। आपका इसका चेहरा, इसकी आवाज, इसका मिजाज, इसका लड़का या लड़की होना, इसकी पोशाक, सब कुछ अपनी मर्जी से तय कर सकते हैं। पिछले पांच-सात बरस में मैं ऐसी नई सहूलियतें परख नहीं पाया हूं, लेकिन मेरा अंदाज है कि अब ऐसे असिस्टेंट खासे अधिक हुनरमंद और होशियार हो चुके होंगे। 
पिछले हफ्ते तक इस मोर्चे पर टेक्नॉलॉजी का जो हाल प्रयोगशालाओं में था, उनमें आवाज को पहचानने, आवाज वाले के मिजाज को पहचानने, और उसके हिसाब से काम करने के लिए कम्प्यूटरों या उपकरणों के दिमाग को इंसान के दिमाग की तरह बढ़ाने का काम चल रहा है। अब मशीनें इंसानों के हाव-भाव को, उनकी आवाज के पीछे के दबाव को, खुशी या गम को पहचानकर उसके मुताबिक काम करना सीख रही हैं। अब आपका फोन अपने कैमरे से आपके चेहरे को देखकर यह तय करने लगेगा कि आप किसी दूसरे से जो बात कह रहे हैं, आप वही बात कहना भी चाहते हैं या दिखावे के लिए ही कह रहे हैं। वैज्ञानिक लगातार इस लाईन पर काम कर रहे हैं कि इंसानी दिमाग कैसे काम करता है, और मशीनी दिमाग कैसे उसी तरह सोच और बर्ताव कर सकता है। 
जिस टेक्नॉलॉजी की हम बात कर रहे हैं, वह एक तरफ तो लोगों की जिंदगी को आसान बनाने वाली है, वक्त बचाने वाली है, और दूसरी तरफ वह उत्पादकता को बढ़ाने वाली भी है। आज भी भारत में भी बहुत से छोटे-छोटे मछुआरे नाव पर से ही मछलियों की तस्वीरें खींचकर व्यापारियों को भेज देते हैं, और नाव के किनारे लगने के पहले उनको सौदा हो चुका रहता है। आज भी दुनिया में जगह-जगह मरीज जांच की मशीनों से घर बैठे जांच के नतीजे डॉक्टर तक भेज देते हैं, और वहां से उनका इलाज तय हो जाता है, दवा घर पहुंच जाती है। 
कम्प्यूटर या फोन की स्क्रीन पर मंडराने वाले वर्चुअल असिस्टेंट की काबिलीयत और खूबियां बढ़ाते चलने का काम चल रहा है, और आने वाले दिनों में हो सकता है कि बातचीत या चैट पर गालियों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को रोकने के लिए दादी या नानी की शक्ल के असिस्टेंट काम करने लगें, जो कि गालियों के कहते ही, या टाईप होते ही आकर दिमाग खटखटाने लगें। 
कुल मिलाकर यह कि आने वाले दिन बड़ी दिलचस्पी से भरे रहने वाले हैं, और लोगों को एक अधिक डिजिटल-सुख की जिंदगी की उम्मीद रखनी चाहिए। टेक्नॉलॉजी ने बाजार से इस कदर हाथ मिला लिया है कि अब आने वाले सामान और सहूलियतें मिलकर इंसान की जेब से हाथ डालकर पैसे निकालने लगेंगे, और लोगों को इसका अहसास रखने के लिए अलग से एक वर्चुअल असिस्टेंट रखनी होगी जो बताते चले कि कहां-कहां बाजार उसे लूट रहा है।

आत्मचिंतन के बिना कांगे्रस का राष्ट्रचिंतन किसी काम का नहीं


संपादकीय
20 जनवरी 2013
कांगे्रस पार्टी बिना किसी वजह आज खबरों में है। कल से जयपुर में उसका एक चिंतन शिविर चल रहा है, और उसमें पार्टी के भविष्य राहुल गांधी औपचारिक रूप से उपाध्यक्ष बनाया गया है। इस फैसले की न कोई जरूरत थी, न इसका कोई महत्व है, क्योंकि कांगे्रस-परिवार का ढांचा पहले से इसी हिसाब से ढला हुआ है और ऐसा ही चले आ रहा था। इससे परे का कुछ होता, तो वह खबर बनती। लेकिन कुनबों की राज वाली पार्टियों में इसकी गुंजाइश नहीं होती है, और कांगे्रस में तो पिछली आधी सदी में बार-बार यही साबित हुआ है कि और कोई गुंजाइश इसमें नहीं है। इसलिए जयपुर की यह घोषणा करने के लिए भी अगर किसी चिंतन की जरूरत पड़ी हो, तो वह हैरानी की ही बात है। लेकिन राहुल गांधी की इस ताजा तरक्की की गैरखबर को छोड़ दें तो इस मौके पर इस पार्टी के लिए कुछ दूसरी बातें को सोचने की जरूरत है, जिस पर कोई चर्चा अब तक होते नहीं दिख रही है। 
कोई अगर यह सोचे कि कांगे्रस पार्टी की आज की दिक्कत यूपीए सरकार की असफलता है, या फिर देश के सामने खड़ी हुई परेशानियां हैं, तो यह एक फर्जी बात होगी। हमारे हिसाब से इस पार्टी के चिंतन शिविर में उन बातों की तो चर्चा करने की जरूरत ही नहीं थी, जिन पर यूपीए सरकार कांगे्रस की अगुवाई में वैसे भी इन बरसों में जवाब देते आई है। आठ बरस के रात-दिन के कामकाज पर विचार करने के लिए अगर किसी पार्टी को दिल्ली छोड़कर जयपुर आना पड़ता हो तो फिर वह न सरकार चलाने की हकदार है और न ही पार्टी चलाने की। कांगे्रस पार्टी की आज की दिक्कतें बिल्कुल अलग हैं। इसे जयपुर में और जयपुर के बाद जिन बातों पर विचार करना चाहिए उनमें सबसे ऊपर है, कांगे्रस का अपनी तमाम खामियों के लिए परले दर्जे का बर्दाश्त। आज यह पार्टी अपने अनगिनत नेताओं के अनगिनत भ्रष्टाचार पर भी अपने चेहरे को शिकन से बचाने की आदी हो गई है। इसके नेता, मंत्री अपने चेहरों पर अहंकार लिए हुए, आक्रामकता लिए हुए इस अंदाज में जनता के सामने आते हैं कि मानो देश के किसी कटघरे में उसके नेता कोई नेता नहीं हैं। जबकि हकीकत इसके ठीक उल्टी है। फिर दूसरी दिक्कत कांगे्रस की यह है कि उसके बड़े-बड़े नेताओं का निजी जीवन नेहरू जैसे नेताओं की सोच से ठीक उल्टा चल रहा है। आज जब कांगे्रस की अगुवाई वाली सरकार, उसके प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री छब्बीस रूपये रोज पर जीने वाले लोगों को गरीब मानने से इंकार कर रहे हैं, तब इसके लखपति नेता कैसे करोड़पति बनते जा रहे हैं, और इसके करोड़पति नेता कैसे अरबपति बनते जा रहे हैं, यह फिक्र भी इस पार्टी को नहीं रह गई है। 
इस पार्टी में कैसे बलात्कार के आरोपियों को टिकट मिलती है, कैसे दूसरे किस्म के बड़े-बड़े अपराधी इसके ओहदों पर बिठाए जाते हैं? आज यह पार्टी जयपुर में महिलाओं की हिफाजत की बात कर रही है। लेकिन अनगिनत मामलों में जब इस पार्टी के बड़े-बड़े ओहदों वाले नेता महिलाओं के खिलाफ हिंसक और अश्लील बयान देते हैं, जब इसकी सरकारों के अफसर महिलाओं को ही बलात्कार के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, तब यह पार्टी चुप रहती है। ऐसी पार्टी का आज नाम के लिए महिलाओं के खिलाफ जुर्म पर चिंता करना फिजूल की बात है। जब कहीं आग लगी हो, तो अपने बंगलों में आराम से ठंडी हवा में रहना, और फिर बाद में आग की तस्वीर को जयपुर में सजाकर उस पर अफसोस जाहिर करना किसी काम का नहीं है। अगर इसे सच ही चिंता करनी थी, तो अपनी पार्टी के चाल-चलन की चर्चा करनी थी, अपने नेताओं के भ्रष्टाचार की चर्चा करनी थी, उनके हिंसक बयानों की चर्चा करनी थी। इसके बिना औपचारिक प्रस्ताव लाकर एक दार्शनिक के अंदाज में बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातों को करने से क्या फायदा? जब जरूरत अपने घर को सुधारने की हो, तो फिर पूरे देश को सुधारने की बात करना, ध्यान को दूसरी तरफ ले जाना है। इस तरह से कांगे्रस किसी किनारे नहीं पहुंचेगी। जिस तरह देश में मौजूदा कानून पर कड़े और असरदार अमल से बचते हुए सरकारें नए और अधिक कड़े कानून की बातें करके लोगों को झांसा देती हैं, उसी तरह से कांगे्रस पार्टी का यह जयपुर चिंतन शिविर एक नए और नौजवान नेता की लीडरशिप की बात करके असल मुद्दे से बचने की राह निकाल चुका है। जिस राहुल गांधी से करिश्मे सी उम्मीद का दिखावा कांगे्रस पार्टी के नेता कर रहे हैं, वे बिना इस नए ओहदे के भी पार्टी के भीतर उसी तरह ताकतवर थे, और पिछले कई बरसों में ऐसा कौन सा दिन था जब प्रधानमंत्री सहित पूरी यूपीए सरकार के भीतर राहुल गांधी का बोलबाला नहीं था? इसलिए एक नए लेबल में यह उसी पुराने लीडर की मार्केटिंग है, जैसे कि बोर्नवीटा अब 'अधिक शक्तिशालीÓ के लेबल के साथ आता हो, या कोई च्यवनप्राश अब 'अधिक असरदारÓ का नारा लेकर बाजार में उतारा जाता हो।  लोगों के मन में आज यह सवाल भी उठ रहा होगा, या उठना चाहिए कि जब नौजवान पीढ़ी की एक लड़की के साथ दिल्ली में हुए भयानक किस्म के सामूहिक बलात्कार के बाद उसकी मौत हुई, और एक पखवाड़े दिल्ली सहित बहुत सा देश विचलित रहा, तो उस पूरे दौर में कांगे्रस के इस नौजवान भविष्य ने क्या कहा, क्या किया? हमको जितना याद पड़ता है, राहुल गांधी का पहला बयान इस लड़की की मौत के बाद श्रद्धांजलि के लिए ही आया था। तो राहुल गांधी आखिर किस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं? और कौन सी पीढ़ी उनकी तरक्की से कांगे्रस से जुड़ जाएगी? जब पूरा देश नौजवानों को सड़कों पर डटे हुए देख रहा था, और जब वह हाल के बरसों का सबसे अधिक विचलित प्रदर्शन था, तो भी अगर कांगे्रस की इस पीढ़ी का नेता कुछ न कहे, तो हम इस चुप्पी को एक साधारण कमजोरी नहीं मानते। जब आग लगी हो तो नेता, खरे नेता अपने प्रवक्ताओं के मुंह से नहीं बोलते, खुद बोलते हैं, खुद जाकर खड़े होते हैं।
जैसा कि दूसरी तमाम पार्टियों ने कहा है कि यह कांगे्रस का अंदरूनी मामला है और इस पर उनको अधिक कुछ नहीं कहना है, हमारा भी मानना है कि यह कांगे्रस का अंदरूनी मामला है, और किसी भी तरह से देश के लिए महत्व का नहीं है।  लेकिन चिंतन शिविर का कोई भी मतलब तब निकलता जब कांगे्रस पार्टी अपने भीतर गहराई तक जमी हुई जड़ों वाली अपनी खामियों से छुटकारा पाने पर भी बात करती। ऐसे आत्मचिंतन के बिना राष्ट्रचिंतन किसी काम का नहीं है।

धार्मिक अवैध कब्जे-निर्माण और अनदेखा करते अफसर


संपादकीय
19 जनवरी 2013
सुप्रीम कोर्ट ने कल अपने एक पुराने आदेश को दुहराया है जिसमें सड़कों के किनारे, चौराहों पर, और सार्वजनिक जगहों पर किसी भी तरह के धार्मिक निर्माण, या प्रतिमा स्थापना के खिलाफ कड़ाई से कार्रवाई की बात कही है। यह आदेश कुछ बरस पहले भी आया था, और उसके बाद से लगातार हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही हर किस्म का धार्मिक अवैध कब्जा, अवैध निर्माण देखते आ रहे हैं। धर्म से जुड़ा हुआ ऐसा जुर्म इसलिए अधिक खतरनाक होता है कि जब इनको हटाने की बात आती है तो किसी आम इमारत की तरह इनको नहीं हटाया जा सकता, और अफसरों को एक हिंसक धर्मांध विरोध का सामना करना पड़ता है। दूसरी बात धार्मिक अवैध कब्जों के साथ यह भी रहती हैं कि उनके आसपास चारों तरफ तरह-तरह की दुकानदारी शुरू हो जाती हैं, भयानक शोरगुल होने लगता है, और रास्ता जाम होने लगता है। कुल मिलाकर एक धार्मिक अवैध निर्माण पूरे इलाके का जीना हराम कर देता है, या उस राह से गुजरने वालों के लिए दिक्कतें खड़ी करने लगता है। और सत्ता चलाने वाले नेता और अफसर इनसे डरे-सहमे इसलिए रहते हैं कि ऐसे अवैध कब्जे और निर्माण करवाने वाले स्थानीय दादा वोटरों की नाराजगी का चाकू टिका देते हैं। 
किसी भी प्रदेश में राजधानी को हंडी से निकाले हुए नमूने के दाने की तरह माना जाता है जिससे कि बाकी दानों के पक जाने का अंदाज लगता हो। रायपुर शहर चारों तरफ से तरह-तरह के धार्मिक कब्जों, और धार्मिक अराजकता का शिकार है। धार्मिक जुलूस सरकार के नियमों को कुचलते हुए सड़कों पर हथियारों के साथ निकलते हैं, और दिन-दिन भर लोगों की जिंदगी ट्रैफिक जाम में तबाह हो जाती है। धर्म से परे भी शादी-ब्याह जैसे जुलूस इन दिनों बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में बांधे हुए दर्जनों लाउडस्पीकरों के साथ निकलते हैं, और न सिर्फ रास्ते बंद हो जाते हैं, बल्कि उस शोर से उस सड़क का बहुत देर तक का सारा काम खत्म हो जाता है। बीमार, बूढ़े, और छोटे बच्चों का, अस्पतालों में भर्ती लोगों का पता नहीं कितना बुरा हाल होता होगा। और इसी राजधानी में हम देखते हैं कि वीआईपी कहे जाने वाले कुछ इलाकों में जिला मजिस्ट्रेट के खास हुक्म से लाउडस्पीकर के किसी भी तरह के इस्तेमाल पर रोक लगी होती है, और इसके नोटिस सड़कों के किनारे लगा दिए जाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल की नींद आम जनता की नींद से अधिक हक कैसे रख सकती है? शासन चला रहे लोगों, या राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे हुए लोगों को खुद ही यह सोचना चाहिए कि वे अपने लिए गैरबराबरी की इस हिफाजत को जुटाकर, अपनी जिम्मेदारी वाली आम जनता को किस भयानक नौबत में छोड़ दे रहे हैं? 
हमारा तो यह मानना है कि मानवाधिकार आयोग के नाम पर सत्ता की सारी सहूलियत भोगने वाले लोगों को भी चाहिए कि खुद होकर ऐसे शोरगुल पर कार्रवाई करें। लेकिन असल बात तो यह है कि स्थानीय प्रशासन में कलेक्टर के स्तर पर जो कार्रवाई होनी चाहिए, म्युनिसिपल के स्तर पर जो कार्रवाई होनी चाहिए, उस न्यूनतम जिम्मेदारी के लिए हमको इस जगह लिखना पड़ रहा है, सुप्रीम कोर्ट को बार-बार आदेश देने पड़ रहे हैं, और कल शायद किसी को मानवाधिकार आयोग भी जाना पड़े। यह नौबत खराब है। जनता के पैसों पर काम करने वाले लोगों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, चाहे वे अफसर हों, चाहे नेता, और चाहे जज या राज्यपाल हों। जैसे-जैसे लोग अपनी जिम्मेदारी से कतराते हैं, भले लोगों का भरोसा लोकतंत्र पर से उठते जाता है कि यह एक बेअसर, बेइंसाफ इंतजाम है। और दूसरी तरफ बुरे लोगों का भरोसा लोकतंत्र पर बढ़ते चले जाता है कि वे इसके तहत जैसी चाहे वैसी गुंडागर्दी कर सकते हैं। 
यहां हम एक बार फिर राजधानी के बहाने से पूरे प्रदेश के स्थानीय अधिकारियों को याद दिलाना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बिना भी उनकी कुछ जिम्मेदारियां हैं, और जनहित में नियम-कानून को कड़ाई से लागू करवाना उनका काम है। इससे बचने वाले लोग हो सकता है कि हमेशा ही बचे रह जाएं, लेकिन लोग ऐसे अफसरों को ही याद रखते हैं, जो अपनी जिम्मेदारियों से कतराने के बजाय ईमानदारी से उनको पूरा करने का काम करते हैं। इसी प्रदेश में कुछ अफसरों ने अपनी तैनाती के हर शहर में इतना काम किया, जितना कि न उनके पहले किसी ने किया था, न उनके बाद में। मतलब यह कि जो काम करना चाहते हैं, उनके लिए इस व्यवस्था के भीतर ही खासी गुंजाइश है। 
राजधानी रायपुर में सड़कों के बीच ऐसे मंदिर भी बने हुए हैं, जिनके चारों तरफ से दसियों हजार स्कूली बच्चे रोज निकलते हैं, और ये मंदिर ट्रैफिक के लिए पूरी तरह आड़ बनकर खड़े हैं। ऐसी जगहों पर अगर किसी बच्चे की जिंदगी जाएगी तो उसके लिए इन मंदिरों के भीतर बैठे भगवान जिम्मेदार होंगे, या ऐसे अवैध कब्जे और अवैध निर्माण वाले मंदिर को बढ़ावा देने वाले नेता और अफसर? 

मलाईदार तबके को क्यों मिले रियायती सिलेंडर?


18 जनवरी 2013
संपादकीय
यूपीए सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय का कल का फैसला कुछ निराश करने वाला है। पेट्रोलियम रियायतों को लेकर सरकार एक तरफ घाटे के पहाड़ खड़े हो जाने का खतरा गिनाते हुए आए दिन भाव बढ़ाती है, दूसरी तरफ विपक्ष और जनता की तरफ से भाव बढ़ाने का विरोध होता है। इसके बीच का एक रास्ता घाटे को कम करने का निकाला जाता है, लेकिन गैरजरूरी रियायत को खत्म करने, और पेट्रोलियम की खपत को घटाने के लिए कोई कल्पनाशीलता नहीं दिखाई जा रही। दिल्ली से दूर बैठे हमारी तरह के साधारण सोच के लोगों को कई रास्ते सूझते हैं, और हैरानी यह होती है कि सरकार भाव बढ़ाने से परे नहीं सोच पाती।
केंद्र सरकार ने एक परिवार को एक बरस में मिलने वाले रियायती सिलेंडर छह से बढ़ाकर नौ कर दिए हैं। इससे रियायत बढ़ गई और घाटा बढ़ गया। जो बात हम पिछले कई मौकों पर इसी जगह सुझाते आए हैं, वैसी बात सरकार को या तो सूझी नहीं, या फिर सरकार में फैसला लेने वाले लोग अपना उतना सा भी घाटा नहीं चाहते। भारत के आयकरदाता तबके को पेट्रोलियम रियायत का कोई हक नहीं होना चाहिए, और सबसे आसानी से ऐसा रसोई गैस के मामले में ही किया जा सकता था। इसी तरह जो लोग आयकरदाता नहीं भी हैं, उनमें से भी अधिक संपन्न कुछ लोगों को कुछ पैमानों पर मलाईदार तबका साबित करते हुए रियायत से बाहर रखा जा सकता था। तकनीकी आधार पर कई लोग आयकर नहीं देते, लेकिन उनकी दौलत, उनके खर्च, गाडिय़ों की उनकी मिल्कियत जैसे कई पैमानों पर एक नया कार्ड बनना चाहिए, मलाई की रेखा के ऊपर। गरीबी की रेखा के नीचे की तरह एक दूसरे तबके की शिनाख्त होनी चाहिए और इसे रियायत से बाहर करना चाहिए। 
दूसरा तरीका इस्तेमाल होना था निजी डीजल गाडिय़ों पर खरीदी के समय ही एकमुश्त अतिरिक्त टैक्स लगाकर। इससे बड़ी-बड़ी दानवाकार गाडिय़ों से सरकार कुछ वसूली कर पाती। आज सारे के सारे डीजल का भाव बढ़ाने से उसका कुछ हिस्सा जनता के ऊपर भी बोझ बनेगा, और डीजल के बोझ को गरीब और मलाईदार पर एक जैसा नहीं डालना चाहिए। तीसरी बात यहां पर यह है कि पेट्रोल की खपत घटाना चाहिए, सड़कों पर गाडिय़ों का बोझ घटे और प्रदूषण कम हो। अब पेट्रोल को सरकार शायद कोई रियायत नहीं देती है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाकर निजी गाडिय़ों को कम करने का कोई बड़ा अभियान देश में नहीं चल रहा है। यहां पर भी हमारा मानना है कि देश की सबसे छोटी कारों को छोड़कर, उससे बड़ी जितनी भी कारें हैं, उनकी इंजन क्षमता के आधार पर उन पर एक अतिरिक्त लक्जरी सेस (टैक्स पर टैक्स) लगाना चाहिए, और इस लक्जरी सेस को सीधे-सीधे सार्वजनिक परिवहन के लिए बसों की शक्ल में शहरों को दे देना चाहिए। इससे मलाईदार तबके पर बोझ बढ़ेगा और उसका फायदा गरीब जनता को, निम्न मध्यमवर्ग को बसों की शक्ल में मिलेगी। इस तरह हर महंगी कार की हर सीट एक-एक बस-सीट बढ़ाती चली जाएगी। 
आज सरकारों की सोच अलग-अलग विभागों में बंटी हुई है। आटोमोबाइल उद्योग कभी निजी गाडिय़ों पर बोझ बढऩे नहीं देगा, दूसरी तरफ पेट्रोलियम मंत्रालय सिर्फ पेट्रोलियम के दाम बढ़ाने से परे कुछ नहीं सोचता। इसकी एक वजह यह भी है कि सत्ता में फैसला लेने वाले लोग सारे के सारे करोड़पति हो गए हैं, और उनकी घोषित कानूनी कमाई भी लाख रुपए महीने से अधिक हो गई है, वे सारे के सारे लोग बड़ी-बड़ी गाडिय़ों जैसे सुख को जनता के पैसों पर पाने के हकदार हो गए हैं। इसलिए सबसे गरीब के हकों पर सोचना अब रह नहीं गया है। यूपीए सरकार में जो निर्वाचित लोग हैं, उनको भी अब इतनी चुनावी समझ नहीं रह गई है कि बड़ी-बड़ी गाडिय़ों वाले कम संख्या के मतदाताओं पर एक बोझ बढ़ाकर, उसे सीधा गरीबों की बसों के लिए देकर सरकार अधिक वोट भी पा सकती है। 
लेकिन कुछ हफ्ते पहले हमने इसी जगह बड़े डीजल ग्राहकों की कारोबारी खपत के बारे में लिखा था, और कल के सरकार के फैसले में ऐसे थोक ग्राहकों को रियायत से बाहर किया गया है। हमने उस वक्त जो लिखा था उसका एक हिस्सा यह था-''...बड़े कारखाने, बड़े दफ्तर, शॉपिंग मॉल, रेस्त्रां और बड़ी दूकानें, मोबाइल फोन के टावर जैसी बहुत सी जगहों पर जनरेटर का इस्तेमाल होता है। इनके डीजल को रियायत का हक क्यों होना चाहिए? इन दिनों बड़ी-बड़ी डीजल गाडिय़ों का चलन बढ़ते चल रहा है, दानवाकार गाडिय़ां सड़कों पर तो बहुत बड़ी जगह घेरती ही हैं, रियायती डीजल पर चलकर ये प्रदूषण भी फैलाती हैं। सिर्फ संपन्न तबके के इस्तेमाल की निजी डीजल गाडिय़ों को रियायत का हक क्यों होना चाहिए? कई जगहों पर कारखानों में भट्टियों में डीजल का इस्तेमाल होता है, यहां पर कोई रियायत क्यों दी जानी चाहिए? इसी तरह भवन निर्माण के काम में, कहीं-कहीं पर खेतों में, जिनमें संपन्न तबके के खेत भी हैं, वहां पर डीजल की महंगाई उनकी लागत में जुडऩी चाहिए, न कि देश के बाकी गरीबों के कंधों पर इसका बोझ आना चाहिए।...ÓÓ
कल सरकार ने डीजल की मौजूदा रियायत से थोक ग्राहकों को बाहर कर दिया है। उसे जल्द से जल्द महंगी कारों से बसों का इंतजाम करना भी शुरू कर देना चाहिए। 

मुर्दा पीढ़ी का करवट बदलना


 संपादकीय
17 जनवरी 2013
कब्रिस्तान के मुर्दों की तरह चुप बैठी रहने वाली जनता की जगह सड़कों पर उतरी हुई जनता लोकतंत्र के लिए अधिक काम की होती है। आमतौर पर पांच बरस में एक बार वोट देकर लोग चुप बैठ जाते हैं, और ऐसी ही लोगों के लिए एक समय राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच बरस इंतजार नहीं करतीं। आज पाकिस्तान में सड़कों पर यही नजारा है, और पिछले एक बरस से अधिक समय से भारत में भी ऐसा ही देखने मिल रहा है। यह जरूर हो सकता है कि लोग कुछ गलत मुद्दों को लेकर सड़कों पर हों, यह भी हो सकता है कि उनकी मांगें जायज न हों, लेकिन आज भारत में एक अच्छी नौबत यह है कि परंपरागत मीडिया का एकाधिकार टूटने के बाद इंटरनेट और दूसरे नए मीडिया-मंचों पर लोग खुलकर एक-दूसरे के विचारों का विरोध भी कर रहे हैं। कुछ लोग हिंसक बातें कर रहे हैं, तो कुछ दूसरे लोग हिंसा का विरोध भी कर रहे हैं। नतीजा यह है कि हवा में कुछ विचार भी तैर रहे हैं। पिछले बहुत से बरसों में हिन्दुस्तान में हवा में आमतौर पर मोबाइल फोन की तरंगें तैरते हुए दिखती थीं, और नई-नई गाडिय़ों से उठने वाला धुआं, उनका शोर हवा में तैरता था। अब कुछ बातें भी तैर रही हैं। चाहे ये अन्ना-बाबा-केजरीवाल की उठाई हुई हों, या बलात्कार के खिलाफ खुद होकर नौजवान पीढ़ी और महिलाओं की उठाई हुई हों, हवा में आवाजें हैं। और ये आवाजें टेलीफोन और गाडिय़ों की न होकर, दिल और दिमाग से निकली हुई आवाजें हैं। 
आज दुनिया की हवा ही कुछ अलग दिख रही है। अमरीका में भी वॉलस्ट्रीट पर कब्जा करने का आंदोलन फैलते-फैलते कहां तक नहीं पहुंचा। इसी तरह अरब देशों में जगह-जगह आंदोलन फैले और उनको कुचलने के लिए कहीं सरकारें जुटीं, तो कहीं विदेशी ताकतों ने बागियों को बढ़ावा दिया। पाकिस्तान आज बरसों के बाद इस तरह का एक आंदोलन देख रहा है, और फिर इसके पीछे चाहे फौज ही क्यों न हों। सड़कों पर लोग जब उतरते हैं, तो वे उसके बाद के चुनावों में अधिक दिलचस्पी से हिस्सेदारी भी करते हैं। और आज भारत हो या पाकिस्तान, अमरीका हो या सीरिया, इसी हिस्सेदारी की अधिक जरूरत है। यह भी हो सकता है कि ये सारे आंदोलन शहरी और पढ़े-लिखे तबके के हों, लेकिन इस तबके की जागरूकता के बिना किसी भी देश के लोकतंत्र में जनता की हिस्सेदारी इनके हिस्से जितनी तो कम रहेगी ही। इसलिए हम हर तरह के आंदोलनों, और उनके सरकारी-गैरसरकारी जवाब, सबको एक लोकतांत्रिक महत्व का पाते हैं। भारत का इतिहास गवाह है कि इमरजेंसी के पहले से जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में जो आंदोलन शुरू हुआ था, वह छात्र आंदोलन की शक्ल में शुरू हुआ था, और बढ़ते-बढ़ते उसने जनता पार्टी की शक्ल लेकर चुनावों में नेहरू की बेटी को सरकार से बाहर कर दिया था। इसलिए घर बैठी नौजवान पीढ़ी के मुकाबले, आंदोलन करती नौजवान पीढ़ी अधिक काम की होती है। 
अब दो-चार बातें जो इस नौबत से जुड़ी हुई हैं। पहली तो यह कि आंदोलन करने वाली पीढ़ी, या ऐसे तबके की राजनीतिक शिक्षा जरूरी होती है। और राजनीतिक शिक्षा का मतलब चुनावी राजनीति की शिक्षा नहीं है। जिंदगी की हकीकत को जानना, समाज और अर्थव्यवस्था को जानना, सामाजिक अन्याय को समझना, ये तमाम बातें राजनीतिक शिक्षण में आती हैं। इसलिए जो आंदोलन खुद होकर भी शुरू हो गए हैं, उनको भी उनके मकसद की मंजिल तक पहुंचाने के लिए एक राह बनाने की जरूरत होती है, वरना वे आंदोलन अपनी सारी ताकत को फिजूल में खोकर नाकामयाब हो जाते हैं, और जितनी विश्वसनीयता आंदोलन की खोती है, उससे अधिक उस आंदोलन के मुद्दे की खो जाती है। इसलिए लोगों का सड़कों पर आना जरूरी है, अखबारों से लेकर टीवी चैनलों तक और इंटरनेट तक उनका छाना जरूरी है, और उनकी बातों का विश्लेषण होना भी जरूरी है। जनता के आंदोलन भारत की पौराणिक कथाओं के समुद्र मंथन की तरह के हैं, जिनके बिना न अमृत निकलता, न जहर। और रोज की जिंदगी में देखें तो मथे बिना दूध-दही से मक्खन भी नहीं निकलता। इसलिए आज लोगों के बीच वैचारिक मंथन और मथने का जो दौर चल रहा है वह इस देश में मुर्दा पीढ़ी के करवट बदलने सरीखा है। अब बदली हुई करवट से एक बेहतर फेरबदल आ सके इसके लिए मेहनत करनी है। 

खानदानी हथियारों के सहारे जारी लोकतंत्र में लूटपाट पीढ़ी-दर-पीढ़ी


 संपादकीय
16 जनवरी 2013
हरियाणा में सीबीआई की अदालत में एक पिछले मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे अभय चौटाला दोनों को शिक्षकों की नियुक्ति में भ्रष्टाचार के लिए कुसूरवार ठहराते हुए सजा सुनाई है, सजा की घोषणा कुछ दिन बाद होगी। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। ऐसा भी नहीं है कि चौधरी देवीलाल के समय से लेकर अब तक हरियाणा में इस कुनबे के कारोबार को लेकर लोगों को भ्रष्टाचार का अंदाज नहीं था। लेकिन अब तीसरी-चौथी पीढ़ी भी भ्रष्टाचार करने में लगी है, तो सवाल यह उठता है कि भारतीय राजनीति में कुनबापरस्ती के चलते लूटपाट का हक कितने पीढिय़ों तक जारी रहेगा? एक समय था जब भारत में राजवंशों का राज था, और बाप से बेटे को गद्दी मिलती थी जनता को लूटने के लिए, अपने महल और किले बनाने के लिए, और मोहब्बत का मजाक बनाने के लिए ताजमहल बनाने के लिए भी। ऐसे लूटपाट की परंपरा देश की आजादी के बाद भी इतने अश्लील और हिंसक तरीके से जारी रहेगी यह किसी ने उस वक्त नहीं सोचा था जब लोग अंग्रेजों से आजादी के लिए जान दे रहे थे। आज देश के अधिकतर हिस्से में, अधिकतर राजनीतिक दलों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग काबिज हैं, और अपने बाप-दादा से मिले हुए हथियारों को लेकर लूटपाट करने में लगे हुए हैं। यही लोग पार्टियां चलाते हैं, यही लोग चुनाव में टिकट पाते हैं, यही लोग जीतकर आते हैं, संसद और विधानसभाओं में पूरे कुनबे सहित बैठते हैं, मर जाने पर फिर इन्हीं के घरवाले टिकटें पाते हैं, और देश पर कुनबों का राज जारी है। भारतीय राजनीति में और देश-प्रदेश की शासन व्यवस्था में इन कुनबों का राज जारी है। और अगर यह राज नेक काम करने में लगे रहता, तो भी कोई शिकायत नहीं होती। लेकिन आज तो भारत के राजनीतिक परिवारों में मरने वाले नेता अपने कानूनी और गैरकानूनी सभी किस्म के हथियार-औजार विरासत में अगली पीढ़ी को देकर जाते हैं, और राजनीति-समाजसेवा का एक मुखौटा भी देकर जाते हैं जिसके चलते अलग से कोई नकाब लगाने की जरूरत नहीं रहती। 
सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक इस बात पर भारी फिक्र चल रही है कि अपराधियों को चुनाव लडऩे से कैसे रोका जाए। और यह फिक्र पूरी तरह से बेमानी इसलिए है कि जिन लोगों के हाथ में कानून को कड़ा करने या नया कानून खड़ा करने की ताकत है, उनमें बहुतायत ऐसे लोगों की है जिनके हाथ रंगे हुए हैं, रिश्वत के पैसों से रंगे हैं, बेईमानी से रंगे हैं, और तरह-तरह के लहू से भी रंगे हैं। ऐसे में यह लोकतंत्र अमरीका के एक वक्त के माफिया-राज की तरह का हो गया है जिनका सभी किस्म के गैरकानूनी कारोबार पर एकाधिकार था। आज भारत में हर किस्म के कारोबार में राजनीति के लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से घुसे हुए हैं। किसी में उनके कुनबे काम कर रहे हैं, और किसी में उनके भागीदारों के नाम हैं। ऐसे में जब बरसों तक सत्ता पर काबिज लोग बरसों पुराने मामलों में सजा पाते हैं, तो लगता है कि ऐसे भ्रष्ट और चोर-डकैत इन मामलों के बाद के सत्ता के इन बरसों में क्या यही सब नहीं करते रहे होंगे? और फिर यह तो पहली अदालत की सजा है, इसके बाद तो चौटाला बाप-बेटे हाईकोर्ट जाएंगे, सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, और अगर वहां से भी दस-बीस बरस बाद यही सजा कायम रहेगी, तो तब तक वे लोग फिर हरियाणा पर राज करते रहेंगे। और यह हाल सिर्फ इसी प्रदेश या इसी पार्टी का नहीं है, देश के बहुत से राज्यों में बहुत से ऐसे परिवार ऐसे ही माफिया-राज को चला रहे हैं। 
देश में दो तरह के सुधार की जरूरत है। एक तो चुनाव सुधारों की, ताकि अपराधी चुनाव न लड़ सकें, और पुलिस की सलामी पाने के हकदार सांसद-विधायक न बन सकें। दूसरी बात यह कि ताकतवर तबके के भ्रष्टाचार पर तेजी से फैसले के लिए अलग से फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने चाहिए, और ऐसे लोगों के लिए साधारण लोगों के मुकाबले दोगुना-तीनगुना सजा का इंतजाम होना चाहिए। इसके बिना ताकतवर तबका कभी सजा नहीं पा सकेगा, और देश कभी इंसाफ नहीं पा सकेगा। कानून से परे की एक बात यह है कि जनता को कुनबापरस्ती को परास्त करने का काम करना चाहिए। एक कुनबे के एक से अधिक को कभी वोट न देने का एक आंदोलन जब तक इस देश में नहीं चलेगा, तब तक खानदानी हथियारों के सहारे जनता की लूटपाट खत्म नहीं होगी। और राजनीति में कुनबापरस्ती की एक बड़ी त्रासदी देश को यह झेलनी पड़ती है कि- कत्ल भी करते हैं, और हाथ में तलवार भी नहीं। 

एक के बदले दस सिर की सोच सही नहीं...


संपादकीय
15 जनवरी 2013
भारत-पाक सरहद पर दो भारतीय सैनिकों की जिस बुरी तरह हत्या हुई, और उसमें से एक का सिर गायब किया गया, उसे लेकर भारत बुरी तरह विचलित है। एक तरफ तो शहीदों के परिवार खबरों में बने हुए हैं, दूसरी तरफ देश के नेता, देश का मीडिया बहुत उत्तेजित भी हैं। यह उत्तेजना और आक्रोश कल उस वक्त सिर चढ़कर बोलते दिखे जब लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि अगर भारत अपने शहीद का सिर नहीं ला सकता है तो सरहद पार से दस सिर तो लाकर दिखाए। उनकी इस बात को लोग उनकी तकलीफ से उपजी हुई उत्तेजना मान रहे हैं, और देश में ऐसा सोचने और बोलने वाली वे अकेली नहीं हैं। देश के इसी माहौल को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने जाकर लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता से मिलकर सरहद के तनाव और उस पर सरकार की कार्रवाई की जानकारी उनको दी। 
भारत का मीडिया इन दो सैनिकों की शहादत को लेकर जिस जुबान में खबरों को दिखा रहा है, उससे लोगों की उत्तेजना बढ़ रही है, और अलग-अलग राजनीतिक दलों के लोगों के लिए भी यह जरूरी सा हो चला है कि वे ऐसी ही आक्रामक जुबान बोलें। लेकिन जब देश की सुरक्षा और देश के व्यापक हितों की बात रहती है, तो आपा खोकर कहीं नहीं पहुंचा जा सकता। इस मुद्दे पर हमने कुछ दिन पहले जो संपादकीय लिखा था, वह भारत के उन राष्ट्रवादी लोगों को पसंद नहीं आया होगा जो कि पाकिस्तान पर हमले से कम कुछ नहीं सोचते। लेकिन ऐसा युद्ध देश को सस्ता नहीं पड़ता, न भारत को न पाकिस्तान को। सरहद के दोनों तरफ इतनी बड़ी गरीब आबादी है कि उनके भूखे पेट से दाने निकालकर हथियारों पर खर्च करना राष्ट्र का गौरव मानना ही गलत होगा। गौरव का पहला पैमाना तो यह होगा कि दोनों देश अमनचैन से रहना सीखें, अपने-अपने गरीब लोगों को न्यूनतम मानवीय अधिकार देने का इंतजाम करें। आज इन दो लोगों की शहादत में जो कू्ररता दिखाई गई है, उससे विचलित मीडिया और नेता यह भी भूल रहे हैं कि पिछले बरसों में सरहद पर ऐसी ही सैकड़ों शहादतें और भी हुई हैं। पाकिस्तान के साथ भारत की सरहद के अलावा भी दूसरे देशों के साथ भारत की सरहद है, और वहां पर भी या तो सैनिकों की शहादत हुई है, या दोनों तरफ की बेकसूर इंसान मारे गए हैं। दरअसल भारत और उसके पड़ोसी देशों के पूरे इलाके अपनी-अपनी जमीन की आतंकी हिंसा से भी झुलस रहे हैं, और तरह-तरह के अंदरूनी आंदोलन भी वहां चल रहे हैं। पिछले महीनों में भारत की राजधानी ने जैसे आंदोलन देखे हैं, वैसा ही एक बड़ा आंदोलन कल से पाकिस्तान की राजधानी में संसद के सामने चल रहा है। इसलिए अपनी-अपनी स्थानीय और अंदरूनी दिक्कतों से निपटने के साथ-साथ भारत, पाकिस्तान, और बाकी पड़ोसी देश सरहद पर के किसी तनाव पर एक बुरी नौबत में फंसते हैं। इनको पड़ोसी देश के साथ एक अंतरराष्ट्रीय सोच वाला रिश्ता तय करना होता है, लेकिन साथ-साथ अपनी जनता को यह भरोसा भी दिलाना होता है कि उनकी सरकार देश की हिफाजत करने की ताकत रखती है। भारत में यह मुद्दा तब और नाजुक हो जाता है जब केंद्र में कांगे्रस की अगुवाई वाली सरकार रहती है, जिस पर मुस्लिम-नरमी की तोहमत लगाते हुए विपक्ष की भाजपा हिंदू-हमदर्दी को एक आक्रामक राष्ट्रवादी मुद्दा भी बनाती है। भारत में कुछ ताकतें पाकिस्तान के मुद्दे को एक मुस्लिम मुद्दा बना देने में लगी रहती हैं, और इस बहाने भारत के मुस्लिमों पर चाहे-अनचाहे जुबानी हमले होते हैं। 
यह मौका पाकिस्तान के भीतर के किसी काबू का इसलिए नहीं है कि वहां सरकार और अदालत के बीच एक बड़ी तनातनी चल रही है, और वहां की फौज को सियासी हुकूमत का चस्का लगा हुआ है। इनसे परे तालिबानी और दूसरे कई किस्म के आतंकी वहां पूरे लोकतंत्र को ही खत्म करने में लगे हुए हैं। इतनी दिक्कतों के बीच वहां की सरकार अगर भारत के साथ किसी छोटी या बड़ी जंग की बात सोचे तो उसमें हैरानी नहीं होगी। लेकिन हिन्दुस्तान के लोगों को किसी उकसावे में आए बिना देश के व्यापक हितों को सोचना होगा, और सरहद की हकीकत को भी सोचना होगा। सिर्फ भावनाओं से शहादत का सम्मान नहीं हो सकता। किसी भी जंग में और हजारों जानें जाएंगी। देश के हर इलाके में शहीदों के ताबूत लौटेंगे। ऐसी नौबत के लिए कोशिश करना ठीक नहीं है। जब हम व्यापक हितों की बात करते हैं, तो भारत को एक बड़े देश के रूप में आसपास के देशों के साथ अमनचैन के रिश्ते के लिए बड़ी कोशिश करने की वकालत भी हम करते हैं। जिस देश में लोकतंत्र अधिक मजबूत है, वही देश तो दूसरे कमजोर लोकतंत्रों को संभलने में मदद कर सकता है। जंग के लिए किसी हमले से कोई बात नहीं सुलझेगी, इससे महज जंगखोर लोगों का एक अहंकार ही पूरा होगा, और ऐसे लोग जंग के जख्मों से परे, सरहद से परे रहने वाले रहते हैं।
सुषमा स्वराज ने तकलीफ में आपा खोकर जो बात कही है, उससे उनको और देश को उबरना होगा। कोई भी लड़ाई बहुत बड़े और लंबे जख्म देकर जाती है। हर एक शहादत अगर इतने बड़े देश को इतना अधिक विचलित कर जाएगी, और उसे जंग में झोंक देगी, तो जंग के सौदागर हर हफ्ते ऐसा करवाने लगेंगे, और हिंदुस्तान की सारी ताकत मिलकर भी सरहद पर हर सैनिक को बचाने में कम पड़ेगी। जज्बातों से परे एक हकीकत को भी समझना चाहिए, उसके बिना एक अंधा, हिंसक और आक्रामक राष्ट्रवाद, वाद के रूप में सफल रहेगा, राष्ट्र के रूप में वह राष्ट्र को असफल कर जाएगा। 

खुश रहने की सालगिरह


14 जनवरी 2013
'छत्तीसगढ़Ó अखबार की आज सालगिरह है। कई दशक पहले इसे उस वक्त के एक वरिष्ठ पत्रकार रावलमल जैन ने शुरू किया था और सात बरस पहले उन्होंने इस अखबार को एक नई पीढ़ी के हवाले किया, आगे बढ़ाने के लिए। तब से लेकर अब तक हम इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि अखबार के पन्नों पर अखबारनवीसी की साख बनी रहे। हो सकता है कि कभी-कभी हम इसमें कामयाब भी न रहते हों, लेकिन ऐसी किसी भी नाकामयाबी से, चूक से सीखना न हुआ हो, ऐसा नहीं होता। जब जनता से, जमीन से, और कुदरत से जुड़े हुए मुद्दों को लेकर ईमानदारी और गंभीरता से लिखने की कोशिश होती है, तो वह कई बार कुछ तबकों को खासी हमलावर भी लगती है। भारत के मौजूदा लोकतंत्र में ऐसे हमलावर तेवर से किसी का बहुत नुकसान होता हो, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि इस लोकतंत्र में सच की ताकत के मुकाबले ताकत की ताकत बहुत अधिक है। और फिर यह भी होता है कि खरी बातें, खटखने वाली बातें भी हो जाती हैं। लेकिन ऐसे में भी ये बरस अफसोस के नहीं रहे। बहुत से लोगों का यह सोचना रहता है कि सच कहना बहुत भारी पड़ता है। लेकिन हमारा अनुभव यह रहा है कि बोझ को ढोने की थोड़ी सी हिम्मत रहे, तैयारी रहे, तो सच उतना भारी भी नहीं होता। लेकिन जो लोग रीढ़ की हड्डी को, कमर और बांहों को, कंधों को जरा भी तकलीफ देना नहीं चाहते, उनके लिए बोझ का बहाना बड़ी सहूलियत से करीब ही खड़ा मिलता है। 
लेकिन आज इस मौके पर कुछ दूसरी जो बातें लगती हैं, उनमें एक यह कि हिन्दी अखबार को पढऩे वाले उसके अच्छे और बुरे पर उस तरह से खुलकर बात और बहस नहीं करते, जिस तरह अंगे्रजी, या हो सकता है हमारी नजरों से परे भी कुछ दूसरी भाषाओं के अखबारों के पाठक करते हों। और इस बात को काटने के लिए कुछ लोग ऐसे गिनाए जा सकते हैं जो कि अखबारों में कई बार लिखकर भेजते हैं, और उनके वैसे खत छप भी जाते हैं। लेकिन इन नामों की गिनती अगर देखें, इनके तबके को अगर देखें, इनकी फिक्र के दायरे को अगर देखें, तो यह साफ लगता है कि अखबार की पहुंच, और उसके समाचार-विचार के दायरे का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा ही ऐसे लोगों की फिक्र का सामान होता है। बचे हुए सारे मुद्दे, सारे सामान, किसी थाने के अहाते में पड़ी जब्त साइकिलों के ढेर की तरह धूल और धूप खाते रह जाते हैं। इसलिए जब इंसान और बाकी कुदरत से जुड़े मामलों की बात आती है, तो हिन्दी में सोचने वाले लोग भी बहुत कम गिनती में ही मुंह खोलते हैं, और उनमें से भी बहुत कम लोग ही कलम उठाते हैं या टाईप करते हैं। नतीजा यह होता है कि हिन्दी के अखबार कई बार एकतरफा रह जाते हैं, वे सिर्फ बोलते हैं, सुनते नहीं, क्योंकि उनको बोलने वाले लोग चुप हैं।
दुनिया के जो सबसे अच्छे अखबार होते हैं, वे तभी अच्छे हो पाते हैं जब उनको पढऩे वाले लोग खुलकर कहने वाले लोग भी रहते हैं। सच तो यह है कि अखबारनवीसी से परे भी, दुनिया के किसी भी काम में अगर लोगों की प्रतिक्रिया न मिले, तो अच्छा काम करने वालों का हौसला भी चुकने लगता है। कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एड्स नियंत्रण के प्रचार के लिए केंद्र सरकार से आए पैसों की बंदरबांट के दौर में दुनिया के मशहूर गज़ल गायक गुलाम अली का कार्यक्रम यहां करवा दिया गया था, जिसमें न परख रखने वाले सुनने वाले थे, और न किसी को सम पर सिर हिलाना आ रहा था। नतीजा यह था कि गुलाम अली को गाने में मुश्किल हो रही थी। अखबारों के मामलों में सम पर सिर हिलाने के बजाय उनको एक बेरहम कसौटी पर कसने वाले लोग होने चाहिए ताकि उनके अपने अखबार बेहतर हो सकें। 
कुछ कहने वाले लोग इंटरनेट पर एक बेहतर और बंधनमुक्त मंच पाने की वजह से अपनी बात को वहां कहकर अपनी बेचैनी को निकाल लेते हैं, और इससे भी छपे हुए अखबारों का कुछ नुकसान होता ही है। और अखबारों के अस्तित्व को इंटरनेट पर समाचार-विचार के चलते नुकसान बढ़ते चल रहा है। जो अखबार चौबीस घंटे बाद रद्दी हुआ करते थे, वे एक छोटे तबके के लिए अब अपने छपने के पहले ही रद्दी हो चुके रहते हैं, क्योंकि लोग अपनी दिलचस्पी की बात इंटरनेट तक पहुंच रहने पर पल-पल पाते रहते हैं, और ऐसा जो तबका है वह तबका अखबार को खरीदने वाला तबका तो है ही, यह तबका अखबार के इश्तहार के कारोबार को चलाने वाला तबका भी है। इसलिए जब तक कोई अखबार इंटरनेट के सैलाब के बीच अलग-थलग खड़े रहने की पहचान नहीं रखेगा, तब तक वह लंबे समय तक शायद नहीं रहेगा। इसलिए हम एक तरफ तो वक्त से मुकाबला करने की कोशिश में लगे रहते हैं, दूसरी तरफ एक अलग पहचान की कोशिश भी चलती रहती है। इन दोनों के बिना छपे हुए मीडिया की बहुत लंबी गुंजाइश नहीं है, और जैसे-जैसे दुनिया के देश आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर आगे बढ़ रहे हैं, वे अखबार खोते भी जा रहे हैं। 
जहां तक अखबार के अच्छे होने और अच्छे बने रहने की बात है, तो वह बहुत हद तक हमारी समझ से भी परे की बात है। लोग चाहते हैं कि वे अखबार रियायत पर रद्दी के मोल पाएं, और अखबार ईमानदार बने रहें। कुछ हद तक यह नौबत रॉबिनहुड सरीखी लगती है कि अखबार अपने बाहुबल से, अपने जोड़-तोड़ से, अपने समझौतों से ऐसी रियायत जुटाकर पाठकों को रस्ते का माल सस्ते में देते चलें। और बाजार में अखबारी मुकाबलों के इसी अंदाज के घर कर जाने के बाद अब इस अंदाज पर हैरानी भी होती है। यह नौबत कुछ उसी किस्म की लगती है कि मानो आग बुझाने जाती दमकल, या किसी जख्मी को लेने जाती एंबुलेंस, आते-जाते इश्तहार भी जुटाते जाती, ताकि उसका डीजल का, ड्राइवर का खर्च निकलते रहता। और जिस तरह अब भारत के लोकतंत्र में लोग यह सवाल नहीं करते कि लाखों के खर्च की चुनाव सीमा रहते हुए भी लोग करोड़ों खर्च कैसे करते हैं, कहां से करते हैं, कुछ वैसी ही अनदेखी हिन्दुस्तान के अखबारों के पाठक उसके दाम की करते हैं। यह नौबत कुछ वैसी है कि डॉक्टर मरीज को देखने की फीस न ले, और अपने खर्च को सिर्फ दवा कंपनियों के भरोसे चलाए। तो फिर उसके बाद ऐसे डॉक्टर जो लिखेंगे, और क्यों लिखेंगे, यह उन्हीं के समझने की बात होगी। 
अखबार के कारोबार की यह नौबत ऐसी है कि हम बरस-दर-बरस बिना किसी जलसे के, बिना धूमधाम के, और संभावित प्रायोजकों को महानता का दर्जा देने का समझौता किए बिना, ठीक उसी तरह रोज अखबार का काम करते हैं, जैसा कि कुदरत अपना रोज का काम करती है, बिना किसी धूमधाम के।
जिस तरह किसी ने लंबे अर्से पहले सरकार के बारे में कहा था कि लोगों को   वही सरकार नसीब होती है, जिसके कि वे हकदार होते हैं, हमारा ख्याल है कि लोगों को वैसे ही अखबार नसीब होते हैं, जिसके कि वे हकदार होते हैं। इसलिए यह नियमित पाठकों की जिम्मेदारी होती है कि वे अपने अखबार को खबरदार करते चलें, खबरदार बनाए रखें। इसी तरह किसी देश या प्रदेश का लोकतंत्र, जो कि सरकार से परे का भी बहुत बड़ा हिस्सा होता है, वह लोकतंत्र भी उतने ही अच्छे अखबारों का हकदार होता है जितना कि वह अच्छे अखबारों को बढ़ावा देता है। 
लेकिन कुल मिलाकर हम खुश हैं, कि इस काम में हैं। 

एक आदमी जो एक व्यवस्थित तरीके से नियमित काम करता है, उसे न कभी काम का बोझ लगता, न वह थकता। वह अपनी सीमाएं जानता है, और अपने पर लिए हुए सारे काम को एक उचित समयसीमा में पूरा करता है। किसी आदमी को कड़ी मेहनत नहीं मारती, उसे व्यवस्थित तरीके की कमी मारती है, या फिर नियमित काम न करने की आदत। -मोहनदास करमचंद गांधी
(गांधी की लिखी इस बात को हम ज्यों का त्यों यहां लिख रहे हैं। हालांकि हम उनकी इस भाषा से पूरी तरह असहमत हैं जिसमें वे आदमी लिखकर उसमें शायद औरत को शामिल मान लेते हैं, या फिर औरत के बारे में अलग से लिखने की जरूरत ही महसूस नहीं करते। काम के बारे में उनकी ऊपर की बात ठीक है, लेकिन औरत की अनदेखी की उनकी जुबान बहुत निराश करती है, क्योंकि सौ बरस पहले भी कम से कम उनसे तो यह उम्मीद की जाती थी कि वे मन, वचन और कर्म तीनों से औरत को न सिर्फ बराबरी का दर्जा देते, बल्कि आगे भी बढ़ाते। गांधी इस मोर्चे पर कम से कम भाषा के मामले में तो कमजोर साबित हुए ही हैं। उनके वक्त में भी औरतें सती बनाई जाती थीं, और उन्हें बचाने के लिए भाषा की राजनीति में भी बेइंसाफी खत्म करने की जरूरत थी। बहरहाल उनकी यहां कि बात को हम काम के सिलसिले में भी यहां रख रहे हैं। -सुनील कुमार)


इस बार तो गंगा का पानी बहकर बेकार हो गया...


संपादकीय
14 जनवरी 2013
इलाहाबाद में हर बारह बरस में होने वाला महाकुंभ आज से शुरू हुआ है। इसमें करोड़ों लोगों के पहुंचने का अंदाज है। हिन्दुओं का यह मेला, दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है। और इसकी खबरें, तस्वीरें पूरी दुनिया का ध्यान खींचती हैं। स्थानीय उत्तरप्रदेश सरकार इसके इंतजाम को एक बड़ी चुनौती मानती है, और रेल विभाग के लिए भी यह देशभर से लोगों को लाने और ले जाने का एक बड़ा काम रहता है। जहां पर रोजाना दसियों लाख लोग पहुंचते हों, वहां पर जहां इंतजाम की समस्याएं और चुनौतियां रहती हैं, वहीं पर सरकार और समाज के लिए कुछ संभावनाएं भी पैदा होती हैं। महीनेभर से कुंभ की खबरों को देखते हुए, और छापते हुए जो कमी हमको खली है, वह ऐसी संभावनाओं को इस्तेमाल न करने की है। 
चूंकि यह पूरा मौका हिन्दू धर्म के इर्द-गिर्द है, इसलिए इसका इस्तेमाल हिन्दू धर्म के लोगों के बीच एक जागरूकता लाने के लिए भी किया जा सकता था। बालविवाह से लेकर कन्या भ्रूण हत्या तक, और दहेज प्रताडऩा से लेकर छुआछूत तक बहुत सी बातें हिन्दुओं का अपार नुकसान कर रही हैं। जातपात को लेकर प्रेम और प्रेम विवाह के खिलाफ तकरीबन हर दिन उत्तर भारत में ही कहीं न कहीं से हत्या की खबर आती है। फिर यह भी है कि हिन्दू धर्म के भीतर दलित तबके के साथ नीची जात कहकर जो भेदभाव किया जाता है, उस पर जो हिंसा की जाती है, वह बात भी भारत के सामाजिक तानेबाने को तोडऩे वाली है। इस भेदभाव के चलते देश की आबादी का दलितों का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू धर्म के भीतर बगावत के लिए बेबस होता है और उनमें से अधिकतर लोग बौद्ध बनने की तरफ बढ़ते हैं। इस वर्ण व्यवस्था के चलते हुए समाज के सबसे कमजोर तबके को सबसे अधिक हिंसा और बेइंसाफी भी झेलनी पड़ती हंै। 
ऐसे हिन्दू समाज का जब बारह बरसों का सबसे बड़ा मेला लग रहा है, तो न सिर्फ उत्तरप्रदेश की सरकार को, या केन्द्र सरकार को इस मौके पर वहां आते-जाते और पहुंचे हुए लोगों के बीच एक सामाजिक जागरूकता की कोशिश करनी चाहिए थी, बल्कि बाकी प्रदेशों की सरकारों को भी इसके लिए कोई योजना बनानी चाहिए थी। आज देशभर के रेल्वे स्टेशनों पर कुंभ जाने वाले लोगों की भीड़ इक_ा होती है, और अब वहां से वापिस आते हुए लोग भी स्टेशनों पर डेरा डाले रहेंगे। केन्द्र और राज्य सरकारों को अपने समाज सुधार या कमजोर तबकों के कल्याण के बजट में से ऐसे लोगों के बीच जनजागरण की योजना बनानी चाहिए थी, जो कि हिन्दू समाज के भीतर हैं, और धार्मिक भावना से कुंभ आ जा रहे हैं। इतना बड़ा यह मौका बरसों पहले से तय था, लोककला मंडलियों से लेकर जागरूकता के पर्चों तक, फिल्मों और दूसरे किस्म के प्रचार तक, लोगों के बीच समझदारी की बात छेड़ी जा सकती थी, और सफर के लंबे समय में उनको सोचने के लिए मजबूर किया जा सकता था। आज भारत में बलात्कार की जितनी घटनाएं हो रही हैं, महिलाओं पर हिंसा की जितनी घटनाएं हो रही हैं उनमें हिन्दू समाज अगर बाकी लोगों से अधिक जिम्मेदार नहीं है, तो कम से कम बराबरी का जिम्मेदार तो है ही। और हिन्दुओं के भीतर महिला के हक जितने बुरे हाल में हैं, उनको देखते हुए भी इस समाज के लोगों के बीच धार्मिक यात्रा के इस मौके पर, धर्म में से ही कुछ सकारात्मक कहानियों को ढूंढकर, नसीहत को ढूंढकर एक ऐसी जागरूकता की कोशिश होनी चाहिए थी। 
हम धर्म और धार्मिक आस्था के आलोचक होते हुए भी उसे एक हकीकत मानते हैं कि अधिकतर लोगों की जिंदगी में उसका एक महत्व है। इसलिए उसके साथ-साथ चलते हुए कुछ किस्म की सामाजिक जागरूकता लाई जा सकती है, और कुछ सुधार किए जा सकते हैं। इस मौके पर सरकारें ऐसे धार्मिक और आध्यात्मिक गुरुओं को जोड़कर भी समाज सुधार की बात छेड़ सकती थीं, जिनको मानने वाले बहुत से लोग हैं। लेकिन किसी भी सरकार में इस मौके का ऐसा कोई इस्तेमाल नहीं किया। इस देश में मार्केटिंग और मैनेजमेंट के बड़े-बड़े गुरू हैं, लेकिन उनका कोई इस्तेमाल करके लोगों के बीच समझदारी फैलाने की कोई योजना बनती, तो वह महाकुंभ के इस मौके का समाज के लिए उपयोग होता। 
लेकिन हो सकता है कि आज की इस चर्चा पर विचार करके, अलग-अलग धर्मों के छोटे और बड़े मौकों पर कोई सरकार या कोई दूसरे संगठन जागरूकता की दूसरी संभावनाएं तलाशें। इस बार तो गंगा का यह पानी बहकर बेकार हो गया, अगली बार शायद देश की अलग-अलग नदियों पर लगने वाले मेलों का उपयोग संस्कृति के विकास के लिए हो सके, जो कि नदियों के साथ हजारों बरस से जुड़ी हुई बात है।