लालबत्ती-सायरन का आतंक

संपादकीय
28 फरवरी 2013
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के सरकारी इलाके में मंत्रियों के बंगलों के ठीक सामने कल विधानसभा उपाध्यक्ष के तेज रफ्तार काफिले से कुचलकर एक छात्रा सड़क पर मारी गई, और पुलिस घंटों तक इसी कोशिश में लगी रही कि कैसे मामले को रफा-दफा किया जाए। हम कई बार इस मौके पर लिख चुके हैं कि इस देश में राजा और प्रजा के बीच फासला जिस तरह से बढ़ाया जा रहा है, उससे प्रजा के मन में राजाओं के लिए हिकारत बढ़ती जा रही है। और सत्ता पर काबिज लोगों के रूख से आगे बढ़कर यह हिकारत लोकतंत्र को निशाना बना रही है जिसे कि सत्ता के नशे में चूर लोग नाकामयाब साबित करने में लगे हैं। एक व्यवस्था के रूप में लोकतंत्र से बेहतर कोई दूसरी व्यवस्था इस दुनिया में अब तक बनी नहीं है, और गांधी जैसे सादगीपसंद महान इंसान की तस्वीर लगाकर इस लोकतंत्र को हांकने वाली भारतीय सत्ता दुनिया में सबसे बुरा मिजाज जाहिर करती है।
इस देश में वीवीआईपी नाम का एक ऐसा दर्जा खड़ा किया गया है जिसकी हिफाजत के नाम पर देश और प्रदेश की सरकारें गरीबों का पेट काटकर खड़े किए गए सुरक्षा दस्ते को झोंक देती हैं। इस दर्जे को जनता के पैसे पर ऐशो-आराम जुटाकर दिया जाता है। और इस दर्जे को सड़कों को रौंदते हुए, इंसानी जिंदगी को रौंदते हुए चलने का विशेषाधिकार भी इस लोकतंत्र के भीतर निकालकर दे दिया गया है। जिस प्रदेश में आधे से अधिक आबादी रियायती चावल की वजह से दिन में दो बार खाना खा पाती है, उसके हक के पैसों से लालबत्तियों और सायरनों वाले बड़े-बड़े काफिले जनता को सड़क के किनारे फेंकते हुए दौड़ते हैं। और यह काम सिर्फ सरकार नहीं करती, राज्यपाल से लेकर हाईकोर्ट के जजों तक, और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों तक, हर किसी को तानाशाह ताकत की इस हिंसक नुमाइश से खूब खुशी मिलती है। कोई कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के इन नए राजाओं से यह पूछे कि ये इतनी तेजी से सायरन बजाते हुए आखिर कौन सी आग बुझाने जाते हैं? आखिर किस जख्मी या बीमार के इलाज के लिए जाते हैं? आखिर कौन से जुर्म को रोकने के लिए जाते हैं? और इनका सड़कों पर इस तरह से जिंदगियों को कुचलते हुए जाने का हक लोकतंत्र के किस हिस्से से मिलता है? 
छत्तीसगढ़ में कल जिस तरह से एक नौजवान छात्रा सत्ता की ऐसी ही बददिमागी के पहियों तले कुचलकर मारी गई, उसके बाद भी अगर यहां के लोग आवाज नहीं उठाते हैं, तो कल बारी उनमें से किसी के बच्चों की होगी, किसी के बूढ़े मां-बाप की होगी, किसी की खुद की भी होगी। इसलिए लोगों को उन अदालतों तक जाकर ऐसे खूनी काफिलों के खिलाफ, ऐसी गैरकानूनी तेज रफ्तार के खिलाफ, ऐसे सायरनों और लालबत्तियों के खिलाफ जनहित याचिका लगानी चाहिए, जिन पर हिंदुस्तानी अदालतें पता नहीं किस कलेजे से इंसाफ करेंगी। जज खुद होकर ऐसे मामलों में अदालती कार्रवाई शुरू कर सकते हैं, लेकिन वे खुद सड़कों पर ऐसी तानाशाही का मजा लेते हैं। जनहित याचिका के अलावा लोगों को लालबत्ती और सायरन के आतंक के साथ चलने वाले लोगों को चुनाव में भी निपटाना चाहिए। एक-एक जज के लिए सड़कों पर पुलिस अलग से इंतजाम करती है, और इन जजों को यह भी समझ नहीं आता कि पुलिस की कमी का रोना रोते हुए सरकार विचाराधीन कैदियों को पेशियों पर नहीं ला पाती। भारतीय लोकतंत्र में इंसाफ की सोच खत्म हो चुकी है। अब यहां पर ताकतवर तबके सहूलियतों और फायदे की एक-एक बूंद को उस अंदाज में दुहते हैं, जिस अंदाज में दूध दुहने वाली मशीनें गाय के थन से खून तक दुह लेती हैं। आज जिसके हाथ ताकत है वे देश-प्रदेश को, लोकतंत्र को, आम लोगों के हक को दुहकर अपने लिए खीर बनवाते चलते हैं। 
ऐसी नौबत में इस देश में बहुत से लोगों का भरोसा नक्सलियों पर अगर हो जाता है, तो उसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। लोगों का भरोसा अगर चुनाव पर से उठ जाता है, और लोग उसे कुछ सौ या हजार रूपये दिलवाने वाला वोट मान लेते हैं, तो उसमें भी कोई हैरानी नहीं है। भारत में लोकतंत्र की हर किस्म की सत्ता पर बैठे हुए लोग लोकतंत्र को एक बुरा नाम दे रहे हैं। हम इस बात को राजधानी की सड़क पर हुई एक मौत से शुरू भर कर रहे हैं, यहां पर खत्म नहीं कर रहे हैं। इससे भी हजार गुने अधिक दर्जे की बददिमागी और बेदिमागी देश के उन हिस्सों में आम जनता के साथ होती है जिन तक मीडिया के कैमरों का ध्यान नहीं है। और वैसे ही इलाकों में नक्सली पनपते दिखते हैं। 

ममता का हैवान मंत्री

संपादकीय
27 फरवरी 2013
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में घने बाजार में आग लगी, और अब तक डेढ़ दर्जन मौतों की खबर आ चुकी है। लेकिन इस बीच वहां पर राज्य सरकार के एक मंत्री ने यह बयान दिया कि यह बसाहट वामपंथी सरकार के समय हुई थी, इसलिए उसी से इसका जवाब मांगा जाए। संविधान की शपथ लेकर सरकार चलाने वाले लोगों से लाशों के बीच खड़े रहकर ऐसे बयानों की उम्मीद लोकतंत्र नहीं करता। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक कटुता इस कदर कड़वी और हिंसक हो चुकी है कि जल्द ही सांप और नेवले की दुश्मनी वाली कहावतों में ममता बैनर्जी का नाम रखकर दूसरी तरफ कांग्रेस और वामपंथियों का नाम रखा जाने वाला है। डेढ़ बरस के अपने कार्यकाल में ममता बैनर्जी ने और उनके मंत्रियों ने, उनकी पार्टी की नेताओं ने जिस किस्म की हिंसक तानाशाही और हैवानियत की बातें की हैं, वे हिन्दुस्तान के किसी भी राज्य में हिंसक गुंडागर्दी और अराजकता का एक नया पैमाना बना चुकी हैं। 
और इसकी शुरुआत खुद ममता बैनर्जी से होती है, जो कि अपनी पार्टी की उसी तरह मालकिन हैं, जिस तरह जयललिता और मायावती अपनी-अपनी पार्टी की हैं, या फिर जैसे लालू यादव अपनी पार्टी के मालिक हैं। भारतीय राजनीति में ऐसा भी नहीं है कि मालिकाना अंदाज में चलती पार्टियों में हर कोई तानाशाह ही हो जाता हो। उड़ीसा में नवीन पटनायक इसकी एक मिसाल हैं, तो दूसरी तरफ आन्ध्र में चन्द्रबाबू नायडू को लेकर भी कभी हिंसक-गुंडागर्दी की शिकायतें नहीं मिली हैं। जिस बंगाल में वामपंथियों को हिंसक-अराजकता और पार्टी की गुंडागर्दी की तोहमत झेलनी पड़ती थी, उसी बंगाल में अब उग्र वामपंथी मेमनों की तरह के मासूम लगने लगे हैं। ममता बैनर्जी इस राज्य में इस अंदाज में काम कर रही हैं मानो वे लीबिया के तानाशाह गद्दाफी या युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन की तरह सत्ता पर काबिज हों। वे इस बात को भूल जा रही हैं कि जिस आपातकाल में वे संजय गांधी गुंडाफौज का हिस्सा थीं, उसी युवक कांग्रेस की वजह से पूरे देश में नेहरू की बेटी को जनता ने पहली बार उखाड़कर फेंक दिया था। तो उसके मुकाबले ममता बैनर्जी की सत्ता का इतिहास भला कितना पुराना है? इसी बंगाल में तीन दशक से अधिक तक वामपंथियों ने लगातार सरकार चलाई, लेकिन उस पूरे दौर में भी कभी किसी कार्टून के लिए लोगों को जेल नहीं भेजा गया, और न ही सवाल पूछने वाले को हत्या की साजिश करने वाला माना गया। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र के नाम पर ममता बैनर्जी की सफेद साड़ी पर लगा हुआ एक बड़ा धब्बा है। 
ममता बैनर्जी केन्द्र सरकार में मंत्री रहते हुए, और अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रहते हुए न तो संविधान की शपथ से मिली हुई जिम्मेदारियों को समझ रही हैं, न ही उनके मन में सार्वजनिक जीवन के राजनीतिक शिष्टाचार के लिए कोई सम्मान रह गया है। यह सिलसिला आने वाले दिनों में अगर जारी रहा, तो न सिर्फ बंगाल के वोटर, बल्कि पूरे देश की जनता यह मनाएगी कि ममता राजनीति से हमेशा के लिए खत्म हो जाएं। उनकी फैलाई हुई गंदगी से बंगाल का विकास दब जा रहा है। अपने वोटरों को खुश करने की खुशफहमी में वे आए दिन जिस तरह अपने मंत्रियों के साथ मिलकर राज्यपाल से लेकर प्रधानमंत्री तक की बेइज्जती करके अपनी इज्जत बढ़ाना मान रही हैं, उस घटिया हरकत को उनके अलावा पूरा देश समझ रहा है। और वे आर्थिक मोर्चे पर नाकामयाब वामपंथी दशकों की नाकामयाबी को भुला देने में बंगाल और बाहर की जनता की मदद कर रही हैं। 
लोकतंत्र सत्ता पर किसी पार्टी का आना और जाना, उसे पिछली सरकारों की नाकामयाबी को गिनाकर हैवानियत दिखाने का मौका नहीं देता। बंगाल में जिंदा जलते हुए लोगों के बीच खड़े होकर ममता का मंत्री जैसी हिंसक बात करते आज सुबह दिखा है, उसका जवाब कानून में तो मुमकिन नहीं है, लेकिन जनता को जहां कहीं भी ऐसी हिंसक बातें सुनाई पड़ती हैं, उसका हिसाब चुनाव में चुकता होना चाहिए।

अमिताभ का भाड़े का सत्याग्रह

संपादकीय
26 फरवरी 2013
भोपाल में कल का नजारा देखने लायक था। वहां सड़कों पर अमिताभ बच्चन सत्याग्रह करते हुए प्रदर्शन कर रहे थे। अपनी ससुराल वाले इस शहर में वे पिछले कई दिनों से हैं, और एक फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं। और उनके प्रशंसकों को डरने की जरूरत नहीं है, एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह अमिताभ का यह प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि पुलिस की लाठियां उन पर पड़तीं। वे महज एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, सत्याग्रह नाम की फिल्म में वे अन्ना हजारे जैसा एक रोल कर रहे थे। हिन्दुस्तान में सबसे मशहूर इस अभिनेता का यह नजारा भोपाल को एक शूटिंग के चलते ही देखना तो नसीब हुआ। 
हमने पहले भी कई बार अमिताभ बच्चन के बारे में यह लिखा है कि इस कुनबे का हर कोई, कारखाने की चिमनियों की तरह टकसाल चलाते हुए कमाई करता है, लेकिन दान देने के मामले में इनका नाम सिर्फ मंदिरों में सामने आया है। इसके अलावा कुल एक दान इनका याद पड़ता है जब अमिताभ ने कुछ किसानों की मदद की जो कि आत्महत्या कर रहे थे। खैर अपनी दौलत का कैसा इस्तेमाल करना है यह हर किसी का निजी फैसला होता है जिस पर हमको अधिक कुछ नहीं कहना है। लेकिन अपनी शोहरत का कैसा इस्तेमाल लोगों को करना चाहिए, और अगर वे नहीं करते हैं तो सामाजिक जवाबदेही को किस तरह अनदेखा करते हैं, यह जरूर हमको चर्चा की बात लगती है। हमने पहले भी लिखा था कि अमिताभ जैसे लोग, या सचिन और लता मंगेशकर जैसे लोग सामाजिक जागरूकता के मुद्दों पर अगर खुलकर सामने आएं, तो उसका असर समाज पर इतना होगा, जितना कि आज किसी नेता या सामाजिक कार्यकर्ता की बात का भी न हो। लेकिन पोलियो ड्रॉप्स जैसे एक इश्तहार को छोड़कर अमिताभ का योगदान सिर्फ मोदी के गुजरात को बढ़ावा देने में रहा। 
जिस भोपाल की सड़़कों पर अमिताभ बच्चन एक फिल्म की शूटिंग करके अपना पेशा पूरा कर रहे हैं और शायद करोड़ों कमा भी रहे हैं, उसी भोपाल में जिस वक्त गैस त्रासदी में हजारों लोग मरे थे, और लाखों की जिंदगी खराब हो गई थी, तब भी अमिताभ की ससुराल उसी शहर में थी। उनके ससुर भोपाल के एक बड़े अखबारनवीस थे और भोपाल की छपी या न छपी खबरों तक अमिताभ की हर किस्म की पहुंच भी थी। लेकिन उन्होंने भोपाल के लोगों की मदद के लिए, न उनके जिंदा रहते कभी आवाज उठाई, एक बयान भी जारी किया, न ही उनके मरने के बाद। हम इसे लोगों का सामाजिक जिम्मेदारी से मुंह चुराना मानते हैं। जिस किसी को समाज ने इतना कुछ दिया है, उससे समाज को कुछ मिलना भी चाहिए। ऐसे भोपाल के ऐसे शिकार लोगों को भी अमिताभ का सत्याग्रह भाड़े पर ही देखने मिला, प्रकाश झा की बनाई जा रही फिल्म के लिए। 
कुछ लोगों को हमारी यह उम्मीद कुछ अधिक लग सकती है। लेकिन आज जब बिल गेट्स जैसे लोग, या अजीम प्रेमजी जैसे लोग अपनी दौलत का आधा हिस्सा समाजसेवा के लिए देने का फैसला ले चुके हैं, और देना शुरू कर चुके हैं, तो हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि हम बाकी खरबपति लोगों को भी याद दिलाएं कि समाज की आज भी बहुत सी जरूरतें बाकी हैं। और अमिताभ बच्चन तो उन लोगों में से हैं जिन्होंने बाल ठाकरे की जीते जी उनको एक निजी दोस्त माना, लेकिन कभी उनकी साम्प्रदायिकता पर किसी सलाह की बात भी नहीं की। उन्होंने मोदी के गुजरात के पर्यटन का मॉडल बनना तय किया, लेकिन मोदी राज के 2002 के दंगों के बारे में उनकी कोई राय ही नहीं है। इसलिए अमिताभ को एक मिसाल की तरह इस्तेमाल करते हुए हम यह सवाल उठाना चाहते हैं कि ऐसे लोग अगर अपने आसपास की ऐसी बेइंसाफी के बारे में भी कोई राय नहीं रखते, तो फिर रात-दिन उनके लिखे जाते ब्लॉग, उनके पोस्ट होते दर्जनों ट्वीट से दुनिया को आखिर क्या मिलता है? 
हमारा मानना है कि हर किसी की यह सामाजिक जिम्मेदारी होती है कि वे अपनी ताकत के मुताबिक दुनिया के सामने दम-खम से सच का साथ दें, और एक्टिंग का पैसा न मिलने पर भी सत्याग्रह करें। 

मरीज के अंगने में इनका क्या काम है?

25 फरवरी 2013
हैदराबाद बम धमाकों के घायलों को देखने के लिए प्रधानमंत्री और दूसरे कई किस्म के नेता, मंत्री या अफसर पहुंचे। मरीज के बगल में खड़े रहकर उन्होंने मिजाजपुर्सी की, और तस्वीरें खिंचवाईं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की तस्वीरों में उनके चेहरे पर एक नकाब (मास्क) दिख रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री घायलों के बगल में उसके बिना ही हैं। 
जिस शाम हैदराबाद में ये धमाके हुए, उसके अगले दिन ही लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने यह मुद्दा उठाया कि गृहमंत्री चाहते तो पिछली शाम ही हैदराबाद जाकर आ गए होते, और इस सुबह संसद में बयान दे सकते थे। 
इन दो बातों को लेकर एक मामूली समझबूझ दिखाने की जरूरत है। एक तो यह कि अस्पताल में किसी मरीज से, उसके बगल तक जाकर, या उसके कमरे में जाकर हालचाल पूछने से उस मरीज पर ही खतरा बढ़ता है। यह मामूली बात है कि प्रधानमंत्री जिस अस्पताल के जिस कमरे में जाएंगे, वहां पर उनके पहले बहुत से सुरक्षा कर्मचारी पहुंचेंगे, कमरे की जांच-पड़ताल करेंगे, अस्पताल को घेरा जाएगा, बाकी मरीजों की आवाजाही पर दिक्कत होगी। पिछले ही बरस की यह बात है कि चंडीगढ़ में एक अस्पताल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जाना था और चारों तरफ से अस्पताल की घेरेबंदी कर दी गई थी, और बुरी तरह से बीमार एक आदमी को ला रही गाड़ी को अस्पताल के गेट से भीतर जाने नहीं दिया गया, और उसे भीड़ और घेरेबंदी के बीच से दूर के किसी गेट तक जाना पड़ा और वह बीमार सड़क पर ही मर गया। खबरों और फोटोग्राफरों के लिए घायलों से मिलने वाले नेताओं की वहां कोई जरूरत नहीं होती। जहां डॉक्टरों की कुर्सियां खाली हों, अस्पतालों की मशीनें खराब पड़ी हों, दवाईयां नकली या घटिया खरीदी जाएं, वहां पर नेता के जाने से मरीज का क्या भला होगा? इसलिए यह धंधा बंद करना चाहिए। 

मरीजों की भलाई के लिए जरूरी यह है कि नेताओं को अस्पतालों से दूर रखा जाए। कोई चाहे कितने ही बीमार हों, उनका हाल पूछताछ से नहीं सुधरता, बल्कि वहां जाने वालों से ऐसे घायलों को इन्फेक्शन हो जाने का खतरा बहुत अधिक रहता है। दिल्ली में अगर निर्भया से मिलने के लिए लोग पहुंचे नहीं होते, तो हो सकता है कि उसकी जिंदगी बच जाने की उम्मीद एक-दो फीसदी बढ़ गई होती। इसलिए किसी को अदालत जाकर एक जनहित याचिका दायर करनी चाहिए कि घायलों को, बीमारों को देखने के लिए नेताओं के पहुंचने पर बंदिश लगे। दूसरी जनहित याचिका यह लगनी चाहिए कि किसी अस्पताल के अहाते में ऐसा कोई कार्यक्रम न हो जिससे कि वहां मरीजों की आवाजाही पर जरा भी फर्क पड़े। लगे हाथों एक तीसरी जनहित याचिका ऐसी लगनी चाहिए कि सड़कों पर नेताओं के लिए, जजों और राज्यपालों के लिए ट्रैफिक का रोकना खत्म किया जाए। किसी मरीज के मर जाने के आंकड़े तो सामने आ जाते हैं, लेकिन लालबत्ती काफिलों को रास्ता देने के लिए थमे हुए किसी मरीज की हालत अधिक खराब हो जाने के कोई आंकड़े नहीं होते। और चिकित्सा विज्ञान की साधारण सी जानकारी भी रखने वाले लोग बता सकते हैं कि किसी गंभीर मरीज के  इलाज में  शुरुआती कुछ मिनट कितने अधिक मायने रखते हैं। इसलिए जितने किस्म के वीआईपी काम होते हैं, उन्हें इस दर्जे के लोग अस्पतालों से, सड़कों से दूर, अपने घर-दफ्तर में करें। 
अब रही दूसरी बात जो सुषमा स्वराज ने कही। वे चाहती थीं कि धमाकों की लाशें जब उठ ही रही थीं, घायलों को अस्पताल ले जाया जा रहा था, सुबूत जुट रहे थे, उस वक्त केन्द्रीय गृहमंत्री हैदराबाद जाकर वापिस आ जाते, और संसद में बयान देते। यह संसद का अपना एक अहंकार दिखता है कि उसे एक जवाब दर्जनों जानों से अधिक अहमियत रखता लगता है। ज्यादा जरूरी हैदराबाद के घायलों का इलाज है, या फिर दिल्ली से पहुंचे केन्द्रीय मंत्री के साथ अफसरों का फंस जाना? हिन्दुस्तान में राजनीति अकल को दूर ले जाती है, और मौके पर शकल को दिखाना सबकुछ मान लिया जाता है। अमरीका में कुछ बरस पहले जब भयानक तूफान से बड़ी तबाही हुई तो कुछ दिनों तक अमरीकी राष्ट्रपति वहां नहीं गए। इसके बारे में उन्होंने आलोचना होने पर कहा कि वे राहत और मदद के बीच में वहां पहुंचकर रूकावट बनना नहीं चाहते थे। हिन्दुस्तान में भी पहले ऐसे कई मौके रहे हैं जब भूकंप के बाद या किसी बड़े हादसे के बाद प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री आनन-फानन वहां नहीं पहुंचे क्योंकि स्थानीय अफसरों का जरूरी काम उससे थमता। अगर सुषमा स्वराज यह समझती हैं कि केन्द्रीय गृहमंत्री मौके पर जाकर खुद ही उंगलियों के निशान उठाएंगे, बमों के टुकड़े इक_ा करेंगे, तो उनकी शिंदे से ऐसी उम्मीद जायज है। नहीं तो फिर केन्द्रीय जांच एजेंसियों के लोगों का वहां जाना काफी था, और कुछ घंटों के भीतर संसद को जवाब न मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वहां जाकर आने के बाद भी गृहमंत्री के पास कमोबेश वही जवाब होता, जो कि दिल्ली बैठकर हैदराबाद से बातचीत करके वे संसद को दे सकते थे। 
किसी हादसे पर पूछताछ के लिए लोगों का मंडराना, या फिर सरकार से लोगों का यह उम्मीद करना कि हादसे के बीच सरकार के मुखिया वहां क्यों नहीं पहुंचे, एक फिजूल की राजनीतिक बात है, और इससे घायलों का, जांच का, नुकसान छोड़ कुछ नहीं होता। चूंकि इस किस्म के बहुत से मामलों में सरकार और विपक्ष देश और प्रदेशों में, राजनीति से परे रहकर तर्कसंगत और न्यायसंगत फैसले नहीं ले पातीं इसलिए इसमें अदालती दखल जरूरी है। और किसी नेता को उसी हालत में अस्पताल में मरीज के पास जाना चाहिए, जब उसका इलाज करना उसकी डॉक्टरी जिम्मेदारी हो। डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर डॉ. मुरली मनोहर जोशी तक का मरीज के पास क्या काम है? और कुर्सियों पर अगर डॉक्टरी पढ़े हुए नेता भी बैठे हों, तो भी उनको खुद तो मरीज का इलाज करना नहीं है, इसलिए जाकर उसको इन्फेक्शन का खतरा क्यों देना चाहिए? ऐसे लोग मरीजों के लिए सिर्फ मौत के भगवान बनकर पहुंचते हैं। (यह बात मौत के भगवान से माफी मांगते हुए)।

आखिर कब तक?

संपादकीय
25 फरवरी 2013
जिस देश-प्रदेश में चुनाव होने रहते हैं, वहां पर लोग न्याय और तर्क को अलग रखकर, अपने पूरे बाहुबल से किसी भी बात को तोड़-मरोड़कर वोटर के सामने पेश कर देते हैं। ऐसा कई बार देखने में आता है, और दिल्ली में खासकर यह कुछ अधिक चल रहा है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपनी साफ और सपटबयानी के चलते भाजपा से लेकर केजरीवाल तक के निशाने पर रहती हैं। कभी वे कहती हैं कि आसपास के राज्यों से दिल्ली में आने वालों की वजह से इस राज्य के ढांचे पर इतना बोझ पड़ता है, जिसे कि यह राज्य बर्दाश्त नहीं कर पाता और नागरिक सुविधाएं कम पडऩे लगती हैं। 
शहरीकरण के साधारण से जानकार भी यह बता सकते हैं कि जिस शहर पर चारों तरफ से लोग आएंगे, काम तलाशेंगे, वहां की सुविधाएं हमेशा कम पड़ती रहेंगी। लेकिन इस बात को लेकर शीला दीक्षित के बयानों पर बहुत राजनीति हो चुकी है। उन्होंने कल एक बयान दिया कि जिन लोगों को बिजली का बिल भारी पड़ रहा है उनको बिजली की खपत कम करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर लोग चौबीसों घंटे बिजली का इस्तेमाल करते हैं तो वे केवल पांच घंटे का बिल देकर काम नहीं चला सकते। उनके इस बयान में समझदारी की दो बातें हैं, एक तो यह कि बिजली की खपत हर किसी को कम करनी चाहिए। दूसरी यह कि अगर बिजली पूरे वक्त मिलेगी, उसका इस्तेमाल पूरे वक्त होगा तो बिल अधिक आएगा ही। अब दिल्ली देश की राजधानी होने की वजह से अगर पूरे वक्त बिजली पाती है, तो लोगों को भुगतान की अपनी ताकत का अंदाज रखते हुए ही उसका इस्तेमाल करना होगा। 
लेकिन कल ही लोगों ने ये सवाल करने शुरू कर दिए कि शीला दीक्षित खुद कितने एयरकंडीशनर इस्तेमाल करती हैं? यह सवाल जायज इसलिए है कि सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोग जिस बेदर्दी से गरीब जनता के हक का पैसा अपनी सहूलियत पर, अपने ऐशोआराम पर फिजूलखर्च करते हैं, वह एक हिंसक और अश्लील मिजाज दिखता है। भारतीय लोकतंत्र में जनता के पैसों की ऐसी बरबादी से सामंती और शाही आराम जुटाने पर कोई रोक इसलिए नहीं लग पाती है क्योंकि ऐसी रोक लगाने का हक जिस संसद, जिस सरकार और जिस न्यायपालिका का हो सकता है, उन सबके मुखिया रात-दिन खुद ऐसी ही हिंसा का मजा लेते रहते हैं। इसलिए जंगल में शेर से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह दूसरे छोटे जानवरों की हिफाजत के लिए वन्य पशु संरक्षण संघ बनाए। 
बड़े-बड़े बंगलों से लेकर बड़ी-बड़ी गाडिय़ों तक, और बड़े-बड़े दफ्तरों से लेकर अनगिनत एयरकंडीशनरों तक का यह खर्च बेकाबू है। भारतीय लोकतंत्र में इस पर सीमा तय करने की कोई सोच भी खत्म हो गई है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि एक पार्टी को देखकर दूसरी पार्टी, और एक नेता को देखकर दूसरे नेता ऐसी बेशर्मी बढ़ाते चलते हैं। और संसद से लेकर विधानसभाओं तक ऐसे चुने हुए जनप्रतिनिधि बढ़ते चल रहे हैं जो कि गलत धंधों से पहले ही करोड़पति थे, करोड़ों का चुनावी पूंजी निवेश करके अरबपति बनने के लिए जो सांसद-विधायक बने हैं, और जिनकी निजी जिंदगी कालेधन से इसी तरह रौशन और ठंडी रहती है। ऐसे लोगों की बहुतायत भारतीय लोकतंत्र में बढ़ते चले जाने से अब जनता के पैसों पर सत्ता के अहाते बिजली पीते हैं, और उस घाटे की भरपाई जनता बूंद-बूंद बिजली के महंगे दाम देकर करती है। इसलिए भारत में अब जरूरत है कि हर राज्य की हालत को देखते हुए वहां के नेताओं और अफसरों के लिए घर और दफ्तर के आकार तय किए जाएं, उनकी पेट्रोल-बिजली की खपत तय की जाए। इसके बिना आज ही सत्ता जनता के बीच सम्मान जितना खो चुकी है, वह फासला बढ़ते ही चलेगा। यह नौबत लोकतंत्र को एक नाकामयाब मॉडल साबित करने पर उतारू है, कगार तक ला चुकी है। इसके पहले कि जनता का भरोसा पहाड़ी से नीचे खाई में गिर पड़े, सत्ता पर काबिज लोगों में से कुछ सिद्धांतवादी, कुछ ईमानदार, कुछ संवेदनशील लोगों को अपनी बिरादरी के लिए सवाल उठाने चाहिए। यह नुकसान राज करती बिरादरी को आज समझ नहीं आ रहा है क्योंकि लोग अभी भी बुलेट के बजाय बैलेट की राह पर चल रहे हैं। लेकिन आखिर कब तक? आखिर कब तक जनता अपने लिए एक ही बल्ब जलाकर सत्ता के एसी का बिजली बिल पटाएगी? 

अमरीकी परमाणु कूड़ेदान से सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
24 फरवरी 2013
अमरीका में परमाणु कचरे को रखने के लिए वाशिंगटन के करीब जमीन के नीचे जो टैंक बनाए गए थे, वे लीक होने लगे हैं। ऐसे छह टैंक जमाने पहले बने थे और उनकी जिंदगी बीस बरस आंकी गई थी जो कि बहुत पहले पूरी हो चुकी है। अब वहां की सरकार के पास आनन-फानन जवाब देने को यह दिलासा है कि इससे तुरंत कोई खतरा नहीं है। और यह कि इस परमाणु प्रदूषण को जमीन के नीचे के पानी तक पहुंचने में बरसों लग सकते हैं। लेकिन क्या यह दिलासा काफी है? 
पूरी दुनिया में परमाणु तकनीक को लेकर ये सवाल खड़े हो रहे हैं कि सरकारें और परमाणु विशेषज्ञ जिस तरह का भरोसा दिलाते हैं, क्या वह आने वाली कुदरत की किसी भी मार को झेलने लायक है? और कुदरत की मार का ही क्या ठिकाना है कि उसका ठीक-ठीक अंदाज लग सके? कुछ तो इंसानों की खिलवाड़ के चलते, और कुछ कुदरत के अपने हिसाब-किताब के मुताबिक इतने किस्म के हादसे दुनिया में दर्ज होते चलते हैं, कि उनका कोई अंदाज पहले लगा हुआ नहीं रहता। और इसी अमरीका के हॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों को देखें, तो कुदरत के कहर से लेकर दूसरी दुनिया के अंतरिक्षवासियों के हमलों तक, कितने ही किस्म की नौबत ऐसी आ सकती है कि इंसानों की ताकत उस मार का सामना न कर सके। ऐसे में आज इस तरह की परमाणु तकनीक बनाकर उसके इस तरह के इस्तेमाल को बढ़ावा देते चलना, जिसके कचरे को भी आज का विज्ञान ठिकाने न लगा सके, यह एक दहशत पैदा करने वाली नौबत है। 
और भारत के भीतर भी आज तमिलनाडू में बंद है एक परमाणु बिजलीघर को लेकर दुनिया भर के परमाणु-विरोधी लोग तो सवाल उठा ही रहे हैं, पड़ोस का देश श्रीलंका भी डरा हुआ है कि पास का यह बिजलीघर किसी हादसे का शिकार हुआ, तो उसका क्या होगा? दो-चार बरस पहले ही हमने यह देखा है कि जापान में जब सुनामी आया, और वहां का परमाणु बिजलीघर नुकसान का शिकार हुआ, तो उसका प्रदूषण अमरीका के कैलिफोर्निया तक पहुंच गया था, और लोगों को समंदर से दूर रखा गया था, बारिश से बचने की सलाह दी गई थी। भारत जैसे देश को देखें जहां पर कि एक पखाने को बनाने में भी भारी भ्रष्टाचार होता है, वहां पर एक खतरनाक तकनीक के बिजलीघर को बनाने या उससे जुड़े हुए दूसरे किसी भी कूड़ेदान को बनाने में नेता-अफसर-ठेकेदार खा-पीकर दुनिया के लिए खतरा छोड़कर नहीं जाएंगे, इसकी क्या गारंटी हो सकती है? भारत में आज सरकारी काम इतना भरोसेमंद नहीं है कि ऐसी खतरनाक तकनीक को इस्तेमाल किया जाए। और फिर दुनिया के समझदार देश एक-एक करके परमाणु बिजलीघर बंद करते जा रहे हैं। भारत उसी तरह परमाणु बिजली की तरफ आगे बढ़ रहा है, जिस तरह पश्चिम में प्रतिबंधित हो चुकी दवाइयां भारत में इस्तेमाल होते रहती हैं। जिस तरह दुनियाभर में खारिज की जा चुकी तकनीक के लिए भारत एक बाजार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह भारत के लोगों की हिफाजत को यहां की सरकारें कूड़ेदान के लायक मानती हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइट कारखाने की त्रासदी का इतिहास गवाह है कि किस तरह लोगों ने यहां पर जानलेवा हत्यारे जहर इक_ा होने, और रखने की बात उठाई थी, और उस खतरे को कांग्रेस की अर्जुन सिंह की सरकार ने लगातार अनदेखा किया था। बिना परमाणु खतरे के, सिर्फ एक रसायन ने उस वक्त हजारों जानें ले ली थीं, लाखों को धीरे-धीरे बेमौत मारा था, और जाने कितनी पीढिय़ां बर्बाद होते चल रही हैं। इसलिए हिन्दुस्तान परमाणु बिजलीघर और परमाणु कचरे के मामले में भरोसे के लायक सरकारों वाला देश बिल्कुल नहीं है। 
और जब अमरीका की यह ताजा मिसाल बताती है कि वैसा जागरूक और कानूनी झगड़ों वाले देश की सरकार भी ऐसी लापरवाही कर सकती है कि कूड़ेदानों की जिंदगी खत्म हो जाने के बाद भी उनका इस्तेमाल जारी रखे, तो अमरीका की पि_ू हिन्दुस्तानी सरकारें उसी को अपना आदर्श मानकर चलेंगी। अमरीका बाजार के कब्जे में चलने वाला देश है, और दुनिया के कारोबारी बहुत दूर के खतरे को कभी खतरा नहीं गिनते। अमरीका के इस मामले को देखते हुए भारत में भी परमाणु बिजलीघर के बारे में सरकार से सवाल किए जाने चाहिए।

खुशहाली का बजट, लेकिन सही इस्तेमाल की चुनौतियां

23 फरवरी 13
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का दूसरे कार्यकाल का यह आखिरी बजट चुनाव के हिसाब से लोगों के लिए खुशियां लेकर आने वाला तो माना ही जा रहा था, और ऐसी ही उम्मीद केंद्र सरकार के बजट से भी की जा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ विधानसभा में वित्त मंत्री की हैसियत से आज मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का पेश किया हुआ बजट, और कल का आर्थिक सर्वेक्षण, इस राज्य की आर्थिक हालत को भी सामने रखते हैं और आने वाले कम से कम कुछ बरसों के लिए इसकी दशा और दिशा भी बताते हैं। आज का बजट एक संपन्न, आर्थिक अनुशासन वाले राज्य का सुबूत पेश करता है और देश के बाकी राज्यों के मुकाबले इसे एक बेहतर इंतजाम वाला राज्य भी बताता है। इन बातों को देखते हुए अब यह लगता है कि भोपाल की गुलामी से छत्तीसगढ़ अगर कुछ दशक पहले आजाद हो गया रहता, तो आज यह कहीं और पहुंचा हुआ रहता। दूसरी बात यह लगती है कि देश में नए राज्यों में यह अकेला ऐसा राज्य है जो कि छोटे राज्यों को लेकर उम्मीद जगाता है, और देश में नए छोटे राज्य बनाने के लिए एक तर्क पेश करता है। 
आज के इस बजट से पहले भी पिछले एक बरस में समय-समय पर मुख्यमंत्री-वित्त मंत्री डॉ. रमन सिंह ने कई कमजोर तबकों के लिए उनके हक वाले बहुत से बहुत से कार्यक्रम शुरू किए थे, जिनमें से भोजन के हक की गारंटी पूरे देश के सामने एक मिसाल की तरह थी, और केंद्र सरकार भी इस मामले में राज्य से पिछड़ गई। आज के बजट में अनाज से जुड़े हुए एक दूसरे बड़े फैसले से प्रदेश के दसियों लाख किसानों को फायदा होने जा रहा है। धान खरीदी पर 270 रूपये का बोनस सरकार पर पौने दो हजार करोड़ का बोझ डालेगा, लेकिन इससे किसानों का हाल बेहतर होगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ महीने पहले जब भोजन की गारंटी का फैसला आया था, तब भी हमने सरकार के सवा हजार करोड़ के उस फैसले की तारीफ की थी कि उससे प्रदेश की तीन चौथाई आबादी को फायदा होगा। 
छत्तीसगढ़ की आर्थिक स्थिति के जो आंकड़े आज बजट के बाद मुख्यमंत्री ने पेश किए हैं, उनमें राष्ट्रीय आर्थिक स्थिति के मुकाबले छत्तीसगढ़ देखने लायक है। इसमें से हर आंकड़े हमें यहां पर नहीं दे रहे क्योंकि वे समाचार के पेज पर जा रहे हैं, लेकिन देश की औसत हालत से छत्तीसगढ़ का बेहतर होना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह किसी बंदरगाह से दूर, जमीन से घिरा हुआ राज्य है, और ऐसे राज्य की आर्थिक संभावनाएं सीमित रहती हैं। लेकिन इस राज्य ने बिजली, लोहे, सीमेंट के साथ-साथ खेती और वनोपज से भी आर्थिक स्थिति सुधारी है। दूसरी महत्वपूर्ण बात इस राज्य की अर्थव्यवस्था में यह है कि छोटा और नया राज्य होने से इसका सरकारी खर्च कम रहा, और वह किफायत कुछ हद तक कायम है।
आज के बजट में किसी नए बोझ के बिना, राज्य में लगने वाले टैक्स को बहुत सी चीजों पर घटाया गया है, इससे कुछ टैक्स चोरी भी रूकेगी, और लोगों को राहत भी मिलेगी। लेकिन बजट में बड़ी बात दूसरी है। प्रदेश के अलग-अलग इलाकों के लिए जो इंतजाम रखा गया है, उसमें आदिवासी इलाकों के लिए आबादी के अनुपात से अधिक बजट रखना एक महत्वपूर्ण बात है। 
इस बजट में जितने तबकों और इलाकों के लिए खासी रकम रखी गई है, उनके इस्तेमाल को लेकर सरकार को चौकन्ना होने की जरूरत है। सरकार के बहुत से विभागों में खासा भ्रष्टाचार है, और कई विभाग बहुत बदइंतजामी का शिकार हैं। जिस प्रदेश में हजारों करोड़ की नई राजधानी बनाई गई है, उसी प्रदेश में विधानसभा में अभी ये आंकड़े पेश हुए हैं कि सैकड़ों कन्या शालाओं में शौचालय तक नहीं है। और लोगों का अनुभव यह है कि हकीकत आंकड़ों से कहीं अधिक खराब है। सड़कों के लिए हजारों करोड़ का इंतजाम रहता है, लेकिन उन सड़कों की बदहाली से सरकार के लोग खुद परेशान हैं कि चुनाव के इस बरस में उनका क्या किया जाए। सरकार के भीतर बहुत से निगम-मंडल अपने नेता-अफसर की फिजूलखर्ची और बर्बादी का बोझ ढो रहे हैं, और चूंकि राज्य संपन्नता का शिकार है, इसलिए अब तक लोगों को दिक्कत आ नहीं रही है। लेकिन हम राज्य के भ्रष्टाचार पर, सरकार की फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने की उम्मीद मुख्यमंत्री से करते हैं, क्योंकि उसके बिना बजट के बड़े-बड़े आंकड़े बड़ी-बड़ी जेबों में चले जाएंगे, और गरीब के नाम पर अगले बरस फिर गिना जाएगा कि राज्य की प्रति व्यक्ति आय कितनी बढ़ गई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जरूरत है, और इस मुद्दे को हम बजट से जोड़कर ही देखते हैं। इसके अलावा राज्य की आधी से अधिक आबादी को गरीबी की रेखा के ऊपर लाने की जरूरत है, जिसके लिए उन्हें रियायत अनाज या मुफ्त बिजली देना काफी नहीं होगा, उनको खुद की कमाई वाले काम से लगाना भी जरूरी होगा। 
यह बजट एक बड़ी चुनौती लेकर इसलिए आया है क्योंकि इससे किसी विभाग पर किफायत बरतने का कोई बोझ नहीं आ रहा है, और हर काम के लिए इसमें ढेरों पैसा दिख रहा है। ऐसे में चुनावी बरस की दरियादिल जरूरतें और कमाई का आखिरी मौका बहुत से लोगों को बर्बादी और भ्रष्टाचार के लिए उकसाएगा। ऐसे में इस लंबे-चौड़े बजट के बेहतर इस्तेमाल की गारंटी बहुत जरूरी है, और यह बात बजट के आंकड़ों में कहीं नहीं आएगी, इसे राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही साबित किया जा सकेगा।

आतंकी हमले और देश में एक सहमति की जरूरत

संपादकीय
22 फरवरी 2013
हैदराबाद में कल शाम हुए एक आतंकी धमाके ने कुछ समय से मिली हुई राहत को खत्म कर दिया। यह पूरी तरह से चौंकाने वाले इसलिए नहीं थे क्योंकि कसाब और अफजल गुरू की फांसी के बाद से कई आतंकी संगठन भारत के भीतर से या बाहर से हमले की धमकी दे रहे थे। और जिस तरह के घरेलू-विस्फोटकों से कल लोगों को मारा गया है, वैसा काम देश में सैकड़ों जगह हो सकता है, हजारों जगह हो सकता है। 
आतंकी हमलों से निपटना आसान नहीं होता। अमरीका जैसा देश जो कि दुनिया भर पर हमले करके बहुत सी विचारधाराओं की दुश्मनी खरीदकर रखता है, वह किस कीमत पर, किस तैयारी के साथ अपनी जमीन को हिफाजत से रखता है, इसकी कल्पना हिन्दुस्तान जैसे देश में मुश्किल है। दूसरी बात यह कि जब-जब आतंक के खिलाफ देश में एक राष्ट्रीय जांच एजेंसी की बात होती है, तो मौजूदा केन्द्र सरकार की राय से बहुत से राज्य इत्तफाक नहीं रखते। कुछ पार्टियों और कुछ राज्यों को यह लगता है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता खत्म होगी। अमरीका में आतंक के खिलाफ कामयाबी के पीछे वहां पर केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों का एक अलग किस्म का बंटवारा भी है। बहुत किस्म के जुर्म वहां पर सीधे-सीधे केन्द्रीय जांच एजेंसी के दायरे में अपने आप ही चले जाते हैं। और इनमें आतंक के मामले भी शामिल हैं। भारत में हमारा ख्याल है कि ऐसे राज्य भी, जो कि साम्प्रदायिक आतंक, विदेशी आतंक या नक्सली आतंक को झेल रहे हैं, वे भी केन्द्रीय जांच एजेंसी के मामले में एक तंगनजरिया और तंगदिली दिखा रहे हैं। आज जब नक्सली देश के आधा दर्जन राज्यों में खुलकर काम कर रहे हैं, तब केन्द्रीय जांच एजेंसी राज्यों की इजाजत की मोहताज होकर नक्सलियों के खिलाफ कोई असरदार काम आसानी से नहीं कर सकती। राज्यों को अपनी हिफाजत के लिए भी कुछ किस्म के मामले केन्द्रीय जांच के लिए छोड़ देने चाहिए, इससे उन राज्यों को ही फायदा होगा। 
दूसरी बात यह कि देश के भीतर के जो तबके आतंकी वारदातों में शामिल हैं, वे चाहे जिस धर्म के हों, जिस जाति के हों, उनके भीतर ही उनको अलग-थलग करना जरूरी है। किसी इलाके या किसी सम्प्रदाय के थोड़े से लोग अपनी हरकतों से सारे लोगों को बदनाम भी करते हैं, और अपनी पूरी बिरादरी के लिए देश के बाकी लोगों से शक का खतरा भी झेलते हैं। और ऐसा सिर्फ कुछ अल्पसंख्यक धर्मों के साथ होता हो, ऐसा भी नहीं है। जब किसी बहुसंख्यक धर्म के लोग, भीड़ की शक्ल में, या नेता की तरह दूसरे धर्मों पर हमले करते हैं, तो वे गुजरात के मोदी की तरह अपनी साख भी खो बैठते हैं। इसलिए आज किसी धर्म का नाम लेकर काम करने वाले संगठन अगर ऐसे आतंकी हमले कर रहे हैं, तो उस धर्म के भीतर के लोगों को भी सावधान रहना होगा, वरना उनकी साख भी धीरे-धीरे कमजोर पडऩे लगेगी। 
भारत में राजनीतिक कारणों से या ठोस तथ्यों के आधार पर, यह बात भी बार-बार उठती है कि कांग्रेस या दूसरी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां और उनकी सरकारें आतंक से जुड़े हुए अल्पसंख्यक तबकों के लोगों के साथ रियायत बरतती हैं। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक तबकों का यह मानना है कि उनके साथ भेदभाव करते हुए उन पर सबसे पहले और सबसे कड़ी कार्रवाई की जाती है, वे सबसे आसानी से निशाने पर रहते हैं। अमरीका में भी अश्वेत समुदाय, और दूसरे नस्लीय अल्पसंख्यकों को यह शिकायत रहती है कि वे पुलिस के और जांच एजेंसियों के निशाने पर पूरे समय रहते हैं। यह नौबत आसान नहीं है। न तो किसी तबके को जुर्म के बाद रियायत मिलनी चाहिए, और न ही किसी तबके को हमेशा ही शक की नजर से देखा जाना चाहिए। और हमारा यह कहना आसान है, ऐसा संतुलन बनाकर चलना लगभग नामुमकिन है। जब कभी आतंक को रोकने के लिए कड़े कानूनों का इस्तेमाल होगा, उन कानूनों का बेजा इस्तेमाल भी होगा, और मानवाधिकार कुचले भी जाएंगे। लोगों पर निगरानी रखने के लिए, और उसके नाम पर लोगों की निजी जिंदगी में दखल भी दी जाएगी। भारत जैसे विविधता वाले देश में, धार्मिक और साम्प्रदायिक तनाव के चलते, उग्रवादी विचारधाराओं के चलते नौबत और मुश्किल रहती है। हिन्दुस्तान का हाल अमरीका जैसे देश के हाल से कहीं अधिक जटिल और अधिक कठिन है। 
लेकिन आज की नौबत संसद में इस बात को सोचने की मांग करती है कि कम से कम आतंक के मामलों में राज्य, केन्द्र सरकार को केन्द्रीय एजेंसी के मार्फत काम करने का हक दें, और इसमें राजनीतिक आधार पर रोड़ा बनना बंद करें। 

नेताओं और मीडिया दोनों गैरजरूरी बकबक से बचें

संपादकीय
21 फरवरी 2013
भाजपा और आरएसएस के शिविरों पर आतंकी-प्रशिक्षण का सार्वजनिक बयान देने वाले केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को अपना बयान वापिस लेना पड़ा, अफसोस जाहिर करना पड़ा और इसके साथ ही भाजपा ने संसद में उनके बहिष्कार का अपना फैसला वापिस ले लिया। भारत जितने बड़े लोकतंत्र के गृहमंत्री को जिस जिम्मेदारी के साथ बात करना चाहिए, वह नहीं हो पाया था। यूपीए सरकार के बहुत से दिग्गज मंत्री, खासकर कांग्रेस के, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष, सांसद और प्रवक्ता-पदाधिकारी इन सबने पिछले बरसों में पार्टी की जो फजीहत की है, वह देखने लायक है। हम अभी ऐसे लोगों के कामकाज के बारे में नहीं कह रहे, क्योंकि कामकाज का हिसाब-किताब तो अदालतों में तय हो रहा है, या फिर 2014 के चुनाव में जनता की अदालत में तय होगा, हम अभी सिर्फ बयानबाजी की बात कर रहे हैं। और यह भी एक अजीब बात है कि जिस समय देश में केन्द्रीय गृहमंत्री के बयान को लेकर भाजपा और हिन्दू संगठन उबले हुए हैं, उसी समय छत्तीसगढ़ में यहां भाजपा सरकार के गृहमंत्री अपनी ही सरकार, अफसरों और अपने ही मंत्री-साथियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के बयान दे देकर पिछले बरसों में लगातार खबरों में रहे हैं। लेकिन  देश में कांग्रेस के नेताओं ने दूसरी पार्टियों पर और दूसरे संगठनों पर तो जुबानी हमले किए ही, महिलाओं के खिलाफ अपमान की जितनी बातें इस पार्टी के लोगों ने की हैं, वे इंदिरा और सोनिया जैसी महिलाओं की पार्टी में पता नहीं कैसे खपती हैं। इस मुद्दे पर आज हम यहां बात इसलिए कर रहे हैं कि मीडिया की मेहरबानी से गैरजिम्मेदारी के बयान जिम्मेदारी की बातों के मुकाबले हमेशा अधिक जगह और महत्व पाते हैं। और देश के सामने जो जरूरी सवाल खड़े हैं, वे किनारे धरे रह जाते हैं, और बकवास पर लाठियां चलने लगती हैं। यह सिलसिला देश की सेहत के लिए बहुत ही खराब है और गनीमत यह है कि संसद का सत्र आज शुरू होने के पहले और कोई रास्ता न देखते हुए सुशील कुमार शिंदे को अपना बयान वापिस लेना पड़ा, और देश यह उम्मीद कर सकता है, कि कम से कम अब, कम से कम इस गैरजरूरी मुद्दे पर संसद खत्म नहीं होगी। 
भारत का मीडिया भी देश की जनता के जरूरी और जलते हुए मुद्दों को छोड़कर सतही बातों पर फोकस किए रहता है। यह मीडिया के बाजार के आपसी गलाकाट मुकाबले की वजह से भी है, और मीडिया के भीतर कम जानकार लोगों की भीड़ बढ़ जाने की वजह से भी है। जिम्मेदारी की अखबारनवीसी करने के लिए पत्रकारों को अधिक पढऩा भी पड़ता है, अधिक मेहनत करनी पड़ती है, और आज की चकाचौंध में मीडिया का यह रूख रह नहीं गया है। दूसरी बात यह कि अगर देश के जलते हुए मुद्दों पर, जनता की तकलीफों पर अगर मीडिया का ध्यान रहेगा, तो यह बात इश्तहार देने वाले बाजार को भी पसंद नहीं आती है। इसलिए दुख-तकलीफ की बातों से परे ग्लैमर और चकाचौंध की चटपटी खबरों और तस्वीरों से मीडिया को लबालब करना बाजार को सुहाता है। इसलिए लोगों की जिंदगी की दिक्कतें मीडिया में अपनी अहमियत के मुकाबले कहीं नहीं आ पातीं। दूसरी बात यह कि मीडिया के मालिकान से लेकर, बड़े मीडिया के बड़े-बड़े पत्रकारों तक का हाल अब संपन्न तबके का हो गया है। इसलिए उनकी अपनी जिंदगी और समझ गरीब और जरूरतमंद से परे की हो गई है। इसलिए राजनीति की चटपटी और गैरजिम्मेदार खबरें, सिनेमा और टीवी के गॉसिप मीडिया में बहुत सी जगह घेरने लगे हैं। 
ऐसे में एक तरफ तो जिम्मेदार राजनीतिक दल को अपने नेताओं और अपनी सरकारों के मंत्रियों पर काबू रखना चाहिए। बकबक को वापिस लेने पर पार्टी की साख भी खत्म होती है, और अगली बार किसी सही बयान को देने पर भी देश के लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते। दूसरी बात यह कि मीडिया को एक हरकारे की तरह एक तरफ की खबर को दूसरी तरफ पहुंचाने जैसा काम करने के बजाय, सनसनीखेज बातों पर खुद भी जांच-पड़ताल करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। एक मंत्री या नेता कोई बयान अगर देते हैं, तो उसे ज्यों का त्यों दिखा देने या छाप देने के बजाय बेहतर यह होता कि उन तक पहुंच रखने वाला मीडिया वहीं उन्हें घेरता कि ऐसे आरोपों के सुबूत क्या हैं? इसके बिना देश के लोगों का बहुत सा उत्पादक समय खराब हो रहा है, और यह बात थमनी चाहिए।

आंसुओं का पेशा

संपादकीय
20 फरवरी 2013
छत्तीसगढ़ की विधानसभा में कल बस्तर में एक छात्रावास की बच्चियों के साथ में भयानक बलात्कार पर चर्चा हुई, तो पक्ष और विपक्ष खासे विचलित हो गए। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से लेकर, भूतपूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के एक प्रमुख नेता अजीत जोगी तक ने बहुत शर्मिंदगी जताई। बलात्कार और लड़कियों-महिलाओं के खिलाफ होने वाले दूसरे यौन-अपराधों को लेकर छत्तीसगढ़ की इस बहस में कोई बहुत बड़ा मतभेद सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं है, लेकिन ऐसे ही वक्त देश की कुछ अदालतों में, देश के कई नेताओं में जिस तरह की बात कही जा रही है, वह भी भयानक है। इसमें किसी राजनीतिक दल के लोग पीछे नहीं हैं, और जिन वामपंथियों को हम अधिकतर मामलों में बाकी पार्टियों से बेहतर समझते हैं, उसके नेता भी महिलाओं के खिलाफ बोलने में घोर साम्प्रदायिक, घोर कट्टरपंथी और घोर हिंसक नेताओं को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। 
महिलाओं के मामले में खाप पंचायतों से लेकर, कॉलेजों और राज्य सरकारों तक हर किसी के फतवे जारी हो रहे हैं कि वे क्या करें, और क्या न करें। लेकिन बहुत से राज्यों में छेडख़ानी और मर्दाना धमकियों से सहमकर लड़कियां जिस तरह से दहशत में आत्महत्याएं कर रही हैं, उनमें छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं है। रायपुर से लेकर बस्तर तक  जगह-जगह जिस तरह से लड़कियां यौन प्रताडऩा की शिकार होकर आग लगाकर जान दे रही हैं, वह बात बलात्कार से कम फिक्र की नहीं है। और हमारा यह मानना है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष से लेकर, सरकारी अफसरों और समाज तक, हर किसी की जिम्मेदारी लड़कियों और महिलाओं की हिफाजत की भी है, और उनमें इतना भरोसा पैदा करने की भी है, कि उनके साथ ज्यादती करने वाले सजा पाएंगे। लेकिन हमारा इस बात को कहना आसान है, ऐसा करना मुश्किल है। और छत्तीसगढ़ विधानसभा में जो बहस हो रही है, बस्तर की बच्चियों से बलात्कार पर जो तकलीफ वहां सामने आ रही है, वह पूरा का पूरा एक श्मशान-वैराग्य बनकर रह जाएगा अगर इस तकलीफ को सदन के भीतर छोड़कर विधायक हंसते हुए बाहर आ जाएंगे। बस्तर की इस हैवानियत को उजागर हुए भी कई हफ्ते हो गए हैं। इस बीच में किसी भी पार्टी के ऐसे कितने सांसद और विधायक हैं जिन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र में कन्या छात्रावासों में जाकर दौरा किया हो, बच्चियों से बात की हो, कामकाजी महिलाओं के हाल की खबर ली हो? यह पता लगाया हो कि उनके इलाके में इसके पहले लड़कियों-महिलाओं के खिलाफ जो जुर्म हुए हैं, उनकी तफ्तीश कहां तक पहुंची है, जो मामले अदालत में पहुंचे हैं, उनका क्या हाल है? जब तक जनप्रतिनिधि, सरकार और समाज इस तरह की बारीकी तक जाकर काम नहीं करेंगे, तब तक ये आंसू किसी के काम नहीं आएंगे। किसी सामाजिक संगठन को चाहिए कि वे सारे जनप्रतिनिधियों से ये पूछे कि बस्तर का यह मामला सामने आने के बाद उन्होंने अपने इलाके में क्या किया? अफसरों से यह पूछा जाए कि उन्होंने अपने इलाके में बचाव की नीयत से लड़कियों के स्कूल-कॉलेज या हॉस्टल को जाकर देखा या नहीं? एक बड़े जुर्म या हादसे के बाद हमदर्दी दिखाते हुए अखबारी सुर्खियों को हासिल करना राजनीति की जरूरत हो सकती है, लेकिन इससे न तो अगले हादसे टलते, न अगले जुर्म रूकते। 
इस प्रदेश में और इसी तरह देश के बाकी हिस्सों में भी बच्चों और महिलाओं के, दलित और आदिवासियों के हक बचाने के लिए संवैधानिक संस्थाएं हैं। उनसे भी यह पूछना चाहिए कि बस्तर के लहूलुहान हॉस्टल में जाकर आंसू टपकाकर आने के अलावा इन संस्थाओं में मनोनीत कारधारियों और लालबत्तीधारियों ने प्रदेश में और कितनी जगहों पर जाकर बचाव के बारे में तैयारी देखी? बच्चियों से किसी खतरे के बारे में पूछा? पुराने मामलों की पूछताछ की? हमारा तो यह मानना है कि जिस तबके की भलाई के नाम पर ऐसे संवैधानिक पदों पर लोग बैठते हैं, उन तबकों के लिए अगर वे काम नहीं करते, तो जनता के गाढ़े पसीने के नमक से इन लोगों को मिलने वाली सहूलियतों के लिए शब्दकोष में एक शब्द है, जिसका इस्तेमाल असंसदीय कहा जाएगा, लेकिन नमक का हक अदा न करने वालों के लिए वही शब्द ठीक रहता है। 
हम आज भी पूरे प्रदेश में लड़कियों और महिलाओं को उसी तरह खतरे में देख रहे हैं, जिस तरह से आजादी के बाद से अभी तक हिन्दुस्तान के मर्द खतरा खड़ा करते आए थे। इसे हम कांग्रेस या भाजपा की सरकारों में से किसी एक की नालायकी मानने के बजाय इसे लगातार चल रहे जुर्म की शक्ल में देख रहे हैं। और सिर्फ बलात्कार अलग से नहीं रोके जा सकते, भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक, और टोनही कहकर मार डालने तक बहुत से ऐसे जुर्म हैं जो इस मर्दाना समाज में बलात्कार का माहौल बनाते हैं। इसे पूरा का पूरा खत्म करने के लिए जिस सोच की जरूरत है वह छत्तीसगढ़ की विधानसभा में आने में लंबा समय लगेगा। इसकी दीवार पर अभी तक सैकड़ों बरस पहले की सोच का एक मर्दाना वाक्य लिखा हुआ है जो कि पौरूष (मर्दानगी) का गुणगान करता है। यहां लिखा है- 'संसदीय प्रजातंत्र का पुरूषार्थ या सफलता इस बात पर है कि विधानसभा जनता की कठिनाईयों या दुख-दर्द का हल निकाल सकेÓ। 
इस विधानसभा को अपनी इस सोच पर भी सोचना चाहिए कि कोई बड़ा या अच्छा काम करना क्या सिर्फ पुरूष और पुरूषार्थ का एकाधिकार है? ऐसी सोच के चलते हिन्दुस्तान में महिलाओं पर ज्यादती कभी खत्म नहीं हो सकेगी। 

























लोगों की निजी जिंदगी और सरकार तांक-झांक

संपादकीय
19 फरवरी 2013
दिल्ली में राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष अरूण जेटली के टेलीफोन के कॉल डिटेल्स निकलवाने की पुलिसिया हरकत बहुत ही शर्मनाक है। इस मामले में हमको भाजपा का यह बयान ठीक लगता है कि देश में आपातकाल जैसे हाल बनाए जा रहे हैं जब लोगों की निजी जिंदगी में सरकार इस तरह से तांकझांक कर रही है। और यह बात सिर्फ केंद्र सरकार विपक्षियों के साथ कर रही है ऐसा भी नहीं है। अलग-अलग राज्यों में सरकारें अपने विरोधियों या आलोचकों के साथ ऐसा ही सुलूक करती है। देश में बड़े-बड़े आईएएस अफसरों तक को इस बात का अंदेशा रहता है कि उनके टेलीफोन टैप हो रहे हैं। और यह आम जानकारी रहती है कि आजकल निजी टेलीफोन कंपनियों को धमका-चमकाकर पुलिस के छोटे-छोटे अफसर भी जिस नंबर के चाहें उसके कॉल डिटेल्स निकलवाते रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट तक ऐसे बहुत से गैरकानूनी कॉल डिटेल्स पहुंचे हुए हैं जिनको लेकर सरकार ने पल्ला झाड़ लिया कि उसे नहीं मालूम कि ये किसने निकलवाए हैं। 
भारत के लोकतंत्र में लोगों की निजी जिंदगी की निजता के हक का कोई सम्मान नहीं दिखता। एक तो लोगों को इसकी समझ कम है, दूसरा लोगों को टेक्नालॉजी के खतरनाक इस्तेमाल का अंदाज नहीं है। जब निजी जिंदगी में तांक-झांक से सरकार या किसी जासूस के मार्फत गोपनीय जानकारी किसी के हाथ लगती है, तो उससे लोगों को ब्लैकमेल करके कई तरह के गलत काम करवाए जा सकते हैं। और इससे लोगों की राजनीति, कारोबार, पे्रम-संबंध, पारिवारिक रिश्ते, सभी तरह की बातों में नुकसान पहुंचाया जा सकता है। भारतीय लोकतंत्र में ऐसी तांक-झांक पर बहुत कड़ी सजा और बहुत कड़े जुर्माने का कानून बनना जरूरी है, दूसरी तरफ सरकारी एजेंसियां जितनी आसानी से लोगों की जासूसी करती हैं, उसके भी पैमाने तय करने की जरूरत है, और उसमें कहीं न कहीं सरकार से परे की किसी संवैधानिक संस्था की निगरानी रखना भी जरूरी है। सिर्फ सरकार के हाथ ऐसा हथियार नहीं दिया जा सकता जिसके कि हाथ विरोधियों से हिसाब चुकता करने के लिए खुजलाते ही रहते हैं। जेटली के इस मामले को लेकर यह मुद्दा खबरों में आया है और इसी मौके पर लोकसभा में बहस का मौका भी है, उस पर बात आगे बढऩी चाहिए, और देश को आपातकाल जैसे खतरनाक हालात वाले हथियार इस्तेमाल नहीं करने चाहिए।

सतह के नीचे तक का सच

18 फरवरी 2013
रोज की जिंदगी में सच को लेकर बहुत तरह की बातें होती हंै। महान लोगों की किसी वक्त लिखी गई सूक्तियों से लेकर कुछ कहावतों तक से यह नसीहत मिलती है कि सच बोलना ही बेहतर होता है। सुनने में यह बात अच्छी भी लगती है क्योंकि यह सोच की ईमानदारी से जुड़ी हुई बात होती है। जो लोग अच्छा सोचते हैं, वे ही सच बोल भी सकते हैं। जिनका दिल-दिमाग, और जिनकी हरकतें कालिख से पुती हुई होती हैं, उनके लिए सच बोलना मुमकिन भी नहीं होता। इसलिए सच की राह पर चलने का एक फायदा यह भी होता है कि लोग बुरा या गलत करने से बच जाते हैं। सच को बहुत बड़ा औजार मानकर चलने वाले गांधी को अगर देखें तो लगातार सच कहकर उन्होंने अपने-आप पर काबू भी रखा था। अपनी हरकतों और कामकाज को एक भली और सही कही जाने वाली राह पर भी रखा था। लेकिन गांधी जैसे कुछ चुनिंदा लोगों को अगर छोड़ दें, तो फिर बाकी लोगों की जिंदगी में सच से नफा और नुकसान क्या है? 
जहां तक आम लोगों की बात है, तो उनकी जिंदगी हमेशा सच के लायक सही से भरी नहीं होती। और जहां तक आम लोगों के आसपास के दूसरे आम लोगों की बात है, तो उनकी जिंदगी भी सच के बर्दाश्त के लायक नहीं होती। सच की बात कहना तो आसान है, सच को कहना खासा मुश्किल इसलिए है कि जब-जब सच कुनैन की गोली की तरह कड़वा हो जाएगा, तब-तब आसपास के लोगों के दिल-दिमाग उसके जायके को बर्दाश्त करने के लायक नहीं रह जाएंगे। 
जिस तरह कुदरत ने कुछ खूबसूरत और नर्म, रंगीन और खुशबूदार फूलों के साथ कांटे बनाए हैं, उसी तरह रोज की जिंदगी में सच के साथ कुछ ऐसे झूठ होते हैं, जो नुकसान की नीयत से नहीं बनते, लेकिन जो सच को बर्दाश्त के लायक बना देते हैं। ये झूठ किसी कुनैन की गोली का चढ़े हुए मीठे रंग की तरह होते हैं जो कि कड़वे सच का स्वाद जाने बिना उसे निगलने में मदद करते हैं। ऐसी गोलियां या ऐसी दवाएं कभी एक कैप्सूल के भीतर आती हैं, तो कभी उन पर एक मीठी सतह चढ़ी होती है ताकि वे पेट में जाकर अपना काम तो कर दें, लेकिन जुबान को बर्दाश्त के बाहर की तकलीफ न दें। 
निजी जिंदगी से लेकर कामकाज तक, और सड़क-चौराहों तक, अगर सच की शिनाख्त होने लगे, तो जिंदगी मुश्किल हो जाएगी। न सिर्फ सरकारी कामकाज, या सार्वजनिक जिंदगी, बल्कि सामाजिक जिंदगी और निजी जिंदगी में भी लोगों की निजी सोच कई बार दूसरों की सोच से टकराव वाली होती है, या रगड़ खाते चलती है। जब दो अलग किस्म की सोच एक साथ बहुत आसानी से नहीं मिलतीं, तो जिस तरह मशीन के पुर्जों के भीतर तेल डालकर उनका घिसना रोका जाता है, उनकी रगड़ घटाई जाती है और उन्हें काम के लायक बनाया जाता है, उसी तरह कुछ किस्म के झूठ लोगों को एक-दूसरे के साथ जीने के लिए, काम करने के लिए, कारोबार करने के लिए, या फिर सफर करने के लिए तैयार करते हैं। 
टे्रन के किसी लंबे सफर में अगर आसपास बैठे मुसाफिर अपनी सारी सोच को ईमानदारी के साथ एक-दूसरे को परोस दें, तो उनका सफर शायद साथ में पूरा ही नहीं हो सकेगा। इसलिए बहुत से लोग सच को बोलने से बचते हुए, अपने मन के भीतर रखे हुए सफर पूरा कर लेते हैं, और बहुत से लोग एक झूठी हामी भरते हुए राह गुजार लेते हैं। कुछ अधिक होशियार लोग हां में हां मिलाते हुए कुछ ऐसे मासूम झूठ भी कह लेते हैं जिनसे किसी का नुकसान नहीं होता, जो बोलने वाले खुद पर बहुत असर नहीं करते, और जिससे माहौल का खराब होना थम जाता है। 
भारत में आरक्षण को लेकर, साम्प्रदायिकता को लेकर, अयोध्या से लेकर मोदी तक और आतंक की वारदातों के पीछे के किसी धर्म या जाति के लोगों तक, बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जिन पर बात करते हुए लोग अपने भीतर के सच को सतह के नीचे बनाए रखने पर कभी मजबूर रहते हैं, तो कभी वे अपने सच से परे भी थोड़ा बहुत झूठ बोल लेते हैं। 
ठीक ऐसा ही निजी जिंदगी में होता है। जहां लोगों के रिश्ते परिवार, सामाजिकता, या भावना से बने होते हैं, वहां भी उनको निभाने के लिए लोगों को कदम-कदम पर सच को भीतर रखना होता है, सच के खिलाफ चर्चा के दौरान भी चुप रहना होता है, और कभी-कभी अपने सच के खिलाफ जाकर भी कुछ ऐसा झूठ कहना होता है जो कि किसी नुकसान की नीयत से नहीं कहा जाता, लेकिन जो किसी नुकसान को रोकने की नीयत जरूर रखता है। एक दोस्त किसी दूसरे से कर्ज मांगे, और वह यह झूठ कह दे कि उसके पास अभी देने को नहीं है, तो यह झूठ हो सकता है कि रिश्तों के आगे चलकर खराब होने के खतरे से बचने के लिए हो। इसी तरह के झूठ परिवार के भीतर, लोगों की निजी जिंदगी में हो सकते हैं, जो कि रिश्तों को खराब होने से बचाने के लिए कहे गए हों। 
जितना मुश्किल किसी कड़वे सच को कहना हो सकता है, उससे कहीं अधिक मुश्किल कड़वे सच को सुनना और बर्दाश्त करना हो सकता है। कुदरत ने इंसान की बर्दाश्त की जो ताकत बनाई है, वह आज के हर किस्म के संबंधों, और हर किस्म के कामकाज की जरूरतों के हिसाब से बनी हुई बिल्कुल ही नहीं है। लोगों की सहनशीलता की क्षमता सीमित है, और तकलीफदेह सच की फसल आज की जिंदगी की जरूरतों के चलते, मजबूरियों के चलते लहलहाती ही चलती है। इन दोनों के बीच तालमेल आसान नहीं है। कहने के लिए निजी से लेकर कामकाज तक के रिश्ते इतने नियम-कायदों में ढले हुए हैं कि उनके बीच अधिक रगड़, अधिक तनाव की नौबत आनी नहीं चाहिए। लेकिन इंसान, उनके तन और मन, वो किसी मशीन के ढले हुए नहीं हैं, इसलिए उनके बीच यह रगड़ रहती ही है। इंसानों के बीच न सिर्फ बुनियादी फर्क होता है, बल्कि वक्त-वक्त पर उनकी सोच में भी फर्क होता है, उनकी जरूरतों में फर्क होता है। इसलिए किसी भी वक्त दो अलग-अलग इंसानों के बीच का तालमेल न सिर्फ उनके मिजाजी फर्क को झेलता है, बल्कि उस पल के उनके फर्क को भी झेलता है। और यह पूरी तरह सच के साथ चल नहीं सकता।
और अगर देखें, तो बिल्कुल बारीकी से बनाई गई मशीनों, और उनके पुर्जों के बीच तो कोई रगड़ रहनी ही नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी यह रहती ही है, और इसीलिए तेल से लेकर ग्रीस तक का इस्तेमाल होता है। अच्छी से अच्छी मशीन भी एकदम सही नाप की बनने के बावजूद, बिना तेल, बिना चिकनाई पल भर भी काम नहीं कर पाती। इंसानों की जिंदगी में रोजाना इस्तेमाल होने वाले झूठ, या झूठ से कम की ऐसी चुप्पी जो कि सहमति कहलाती है, या किसी बात को अनसुना करना, या किसी वारदात को अनदेखा करना, यह सब उसी किस्म के मशीनी-तेल हैं। 
इसलिए सूक्तियों और कहावतों का सच कागजों पर सौ फीसदी खरा होता है, असल जिंदगी में वह उतना ही खरा हो सकता है जितना कि असल जिंदगी का बर्दाश्त खरा हो। यह बर्दाश्त जितना खुरदरा होगा, चिकनाई वाला उतना ही तेल जिंदगी की रोज की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए लगता है। 

जेटली और काटजू की बहस से उठे कुछ मुद्दे


संपादकीय
18 फरवरी 2013
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और भारतीय प्रेस परिषद के मौजूदा अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू फिर खबरों में हैं। अब भाजपा हाथ धोकर उनके पीछे लगी है कि काटजू हाथ धोकर गैरकांगे्रसी राज्य सरकारों के पीछे लगे हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के एक सक्रिय वकील रहे हुए अरूण जेटली  के बीच शुरू हुई इस ताजा तनातनी को भाजपा ने एक औपचारिक मुद्दे के रूप में उठा लिया है। और जस्टिस काटजू भी पीछे नहीं रह गए हैं, उन्होंने भी खुलकर इसका जवाब दिया है। हम बयानों पर अधिक न जाकर दो मुद्दों पर बात करना चाहते हैं जिनसे इस ताजा बहस को गंभीरता से जोड़ा जा सकता है। 
भाजपा का यह आरोप है कि जस्टिस काटजू को यूपीए सरकार ने रिटायरमेंट के बाद प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष पद पर बिठाया है, और इस संवैधानिक पद पर बैठकर भी वे कांगे्रस का काम कर रहे हैं। भाजपा ने यह भी मांग की है कि रिटायरमेंट के बाद जजों को किसी सरकारी नियुक्ति पर नहीं रखना चाहिए। दूसरी बात यह उठ रही है कि जस्टिस काटजू भारत के हर किस्म के मामलों से लेकर पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों तक हर किसी पर बयान दे रहे हैं, और इसके चलते वे लगातार खबरों में हैं, विवाद में भी। पे्रस काउंसिल जिस तरह से बिना दांत और नाखून वाला जानवर है, उसके चलते वह किसी राज्य सरकार का कुछ बिगाड़ नहीं सकती, सिर्फ चि_ियां लिख सकती हैं। इसलिए उनके किसी भेदभाव से भी भाजपा की राज्य सरकारों का कुछ बिगडऩा नहीं है। दूसरी बात अपनी सफाई में जस्टिस काटजू ने कही है कि किस तरह उन्होंने कई मामलों में कांगे्रस की सरकारों के खिलाफ सख्त चि_ियां लिखीं, और उन पर राज्य सरकारों को मजबूर होकर कार्रवाई भी करनी पड़ी। राज्य सरकारों से भेदभाव का आरोप हमको पूरी तरह फिजूल का लग रहा है, और अरूण जेटली ने जाने क्या सोचकर, जाने  किस मकसद से इसे उठाया है। 
लेकिन जेटली और भाजपा के उठाए दूसरे मुद्दे से हम सहमत हैं कि जजों को रिटायरमेंट के बाद किसी ऐसी कुर्सी पर बिठाने का काम सरकारों के हाथों में नहीं  होना चाहिए, जहां बैठकर वे अपने को बनाने वाली सरकारों के साथ रियायत कर सकें। ऐसी सारी पसंद और नियुक्ति संवैधानिक पदों पर होती है, और इन पदों को लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए बनाया गया है, और वहां पर अगर सरकारी पसंद इस तरह कायम रहेगी, तो इन पदों का पूरा मकसद ही खत्म हो जाएगा। पूरे देश में राज्यों में भी रिटायर्ड जजों को, आईएएस और आईपीएस अफसरों को संवैधानिक पदों पर, या सुविधाओं से जुड़ी दूसरी कुर्सियों पर बिठाने की लंबी परंपरा है। और बहुत से प्रदेशों में यह भी देखने में आता है कि जज या अफसर उस राज्य की ऐसी कुर्सियों पर आने के लिए रिटायर होने के पहले सरकारों के साथ रियायत करते हैं। इस सिलसिले के खिलाफ हम बरसों से लिखते आ रहे हैं। अगर संवैधानिक पदों पर अदालतों और सरकारी कामकाज के अनुभवी लोगों को लाना जरूरी है, तो उसके लिए पूरे देश के स्तर पर एक पैनल बनना चाहिए, और उसमें से लोगों को छांटते हुए आखिरी फैसला अकेली राज्य सरकार, या अकेली केंद्र सरकार का नहीं होना चाहिए। देश भर की ऐसी नियुक्तियों के लिए राज्यों के लिए यह नियम भी होना चाहिए कि उस राज्य का कोई मूल निवासी, या वहां पर जज-अफसर रहा हुआ कोई व्यक्ति उस राज्य के किसी पद पर रिटायरमेंट के बाद न आए। इसके बिना पक्षपात और भेदभाव की गारंटी हम तय मानकर चलते हैं। और अरूण जेटली-भाजपा ने जो सुझाव दिया है, उसकी शुरूआत भाजपा अपने राज्यों से कर सकती है, और यह नीति घोषित कर सकती है कि उन राज्यों में काम कर चुके लोगों को रिटायरमेंट के बाद वहां नियुक्त नहीं किया जाएगा। एक अच्छी परंपरा और एक साफ-सुथरे सिलसिले को शुरू करने के लिए भाजपा को दूसरों का मुंह नहीं देखना चाहिए, और खुद पहल करके एक नई परंपरा कायम करनी चाहिए। इसी तरह केंद्र सरकार के तहत आने वाले संवैधानिक पदों पर लोगों को मनोनीत करने के लिए एक पारदर्शी कमेटी होनी चाहिए, जिसमें देश के कई संवैधानिक संस्थाओं के मुखिया सरकार और प्रतिपक्ष के मुखिया के साथ बैठकर खुलकर बातचीत करके नाम छांटें। 
अब काटजू विवाद से जुड़ी दूसरी बात। क्या काटजू को एक संवैधानिक पद पर रहते हुए रात-दिन हर किस्म के मुद्दों पर बयान जारी करना चाहिए? हमारा ख्याल है कि यहां पर वे एक चूक कर रहे हैं। लोकतंत्र उन्हें कुछ भी कहने का हक देता है, लेकिन जब वे दुनिया के हर मुद्दे पर रात-दिन बोलते हैं, तो एक तो उनकी बात की गंभीरता खत्म होती है, दूसरी बात यह कि विवादों के खड़े होने से उनकी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी विवादों में घिरती है। जब किसी दफ्तर या कुर्सी का एक अधिकार किसी को मिलता है, तो उसको लेकर नियम-कायदों से परे भी कुछ किस्म की जिम्मेदारियां साथ में जुड़ी हुई मिलती हैं। इसमें अपने दायरे को सीमित रखने की जिम्मेदारी भी रहती है। भारत में पे्रस के तहत आने वाले मीडिया का जिस विस्फोटक पैमाने पर विस्तार हुआ है, उसे देखते हुए जस्टिस काटजू के पास चौबीस घंटों का वक्त भी पे्रस काउंसिल के लिए ही कम पडऩा चाहिए। ऐसे में वे मोदी सरकार की साम्प्रदायिकता को लेकर अगर पे्रस से परे की बात करते हैं, पाकिस्तान की अदालतों पर बात करते हैं, तो ये बातें उनके काम में अड़चन तो पैदा करती ही हैं। पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष के ऐसे बयान की नौबत क्यों आनी चाहिए कि जेटली राजनीति छोड़ें। इस बयान का काटजू की संवैधानिक जिम्मेदारी से कुछ लेना-देना नहीं है और इससे मीडिया के प्रति उनकी जिम्मेदारी निभाने में दिक्कत आ रही है। 
काटजू का मुद्दा तो उनके निजी बर्ताव का मुद्दा है, जिसे वे सुधार सकते हैं। लेकिन जो मुद्दा अरूण जेटली ने रिटायरमेंट के बाद के लिए उठाया है, उस पर तो न सिर्फ भाजपा के राज्यों को बल्कि सभी राज्यों को, केंद्र सरकार को अमल करना चाहिए। किसी भी राज्य में वहां काम कर चुके, या वहां के मूल निवासी लोगों को रिटायरमेंट के बाद के किसी भी पद पर नहीं रखना चाहिए। और हम तो यह भी सुझाएंगे कि भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर अपने इस नेता की इस सलाह को चुनाव घोषणापत्र में शामिल करना चाहिए। 

मुजरिमों की तरह काम करती हुई सरकार


संपादकीय
17 फरवरी 2013
देश में अभी यह बहस खत्म होने का नाम नहीं ले रही है कि अफजल गुरू को जिस अंदाज में भारत सरकार ने या उसके मातहत आने वाली दिल्ली जेल में फांसी दी है, उसमें मृतक के परिवार के कौन-कौन से हक छिने हैं, और सरकार ने कौन-कौन से नियम तोड़े हैं, किस-किस बात को लेकर एक तंगदिली दिखाई है। कश्मीर देश के बहुत से लोगों की नजरों में खटकते रहता है, और देश की ऐसी आबादी को इस बात में कोई ज्यादती नहीं लगती कि संसद पर हमला करने के एक मुजरिम ने फांसी नियमों से परे जाकर, घरवालों को बताए बिना दे दी जाए, और फांसी के बाद उसकी लाश को भी उसके परिवार को कफन-दफन के लिए न दिया जाए। 
भारत के भीतर लोग एक-दूसरे से किस तरह से कटे हुए हैं, इसकी यह एक बड़ी मिसाल है। देश के किसी हिस्से में कुछ बेचेहरा बलात्कारियों की शिकार एक बालिग लड़की के लिए पूरा देश, या कम से कम उसका एक बड़ा शहरी हिस्सा उठ खड़ा होता है, वहीं पर बस्तर में जब बहुत गरीब, आदिवासी, नाबालिग बच्चियों के साथ महीनों तक बलात्कार होता है, तो दिल्ली का दिल भी नहीं पसीजता। यही हाल उत्तर-पूर्वी राज्यों का है, जहां पर सैनिकों द्वारा लगातार किए जा रहे बलात्कार के बावजूद उनको बचाने वाले कानून के खिलाफ उत्तर-पूर्व की महिलाएं कपड़े उतारकर इन सैनिक संस्थानों के सामने सड़क पर प्रदर्शन करती हैं, और बाकी देश में शायद ही यह कोई खबर बनती हो। इसलिए उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक लोगों की यह शिकायत बनी रहती है कि उनकी तकलीफ बाकी हिन्दुस्तान के लिए कोई मायने नहीं रखती। और इस बाकी हिन्दुस्तान में ऐसे लोग भी काफी हैं जो कश्मीर को भारत का हिस्सा मानना नहीं चाहते, और उनमें से कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि इस हिस्से को पाकिस्तान को ही क्यों न दे दिया जाए। ऐसे लोगों को न  कश्मीर का इतिहास मालूम है, न भारत की फौजी जरूरतें मालूम हैं, न अंतरराष्ट्रीय हकीकत मालूम है, और न ही इंसानियत मालूम है। इसलिए ऐसे लोगों के माथे पर जब उस परिवार के लिए कोई शिकन नहीं आती जिसके एक सदस्य को फांसी पर चढ़ाने की खबर तक नहीं की गई, तो फिर कश्मीर के लोग अपने आपको दूसरे दर्जे के नागरिक मानेंगे ही। 
यूपीए सरकार इस कदर की ऐतिहासिक गलतियां करते चल रही है कि आगे जाकर किताबों में उसका जवाब देना भी भारी पड़ेगा। यह वही कश्मीर है जहां से भारत के पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेस के सबसे बड़े नेता जवाहर लाल नेहरू आए थे। उस कश्मीर के साथ आज ऐसा सुलूक हो रहा है कि लोगों को अपने पिता या पति की लाश भी नहीं मिल रही है। हमारा मानना है कि देश में आबादी के एक बड़े हिस्से की भावनाओं के सैलाब पर सवारी करते हुए जो सरकार गलत काम करती है, वह सरकार आने वाले किसी दिन खुद भी ऐसे गलत कामों का शिकार होती है। इस देश में जरनैल सिंह भिंडरावाले के आतंक को खड़ा करने वाली कांग्रेस पार्टी ने यह भुगता भी है, और अपनी प्रधानमंत्री को खोया भी है। कश्मीर के लोगों को आज फौज के बल पर कुचलकर रख देना किसी तरह का ऐतिहासिक इलाज नहीं है। दुनिया का इतिहास बताता है कि जिस देश-प्रदेश को, जात-बिरादरी को, अंतहीन कुचला जाता है, वह फिर कफन को सिर पर बांधकर मुकाबले को खड़ा हो जाता है। फिलीस्तीन से लेकर ऐसी बहुत सी मिसालें दुनिया में बिखरी हुई हैं। इसलिए भारत सरकार को, इस देश के प्रदेशों को ऐसी हरकत दुबारा करने से बचना चाहिए। सरकार का काम किसी मंच के सामने इक_ा संगीतप्रेमियों की फरमाइश पर गाने गाना नहीं है। उसे दिक्कतें झेलकर, नुकसान झेलकर भी इंसाफ करना चाहिए। 
अफजल गुरू के फांसी के तरीके, उसकी खबर को घर तक न पहुंचने देना, चि_ी को पोस्ट ऑफिस में रोक रखना, ये सारे तौर-तरीके किसी पेशेवर मुजरिम के हो सकते हैं, किसी इज्जतदार सरकार के नहीं हो सकते। किसी मुजरिम के भी हक होते हैं, उसके कुनबे के हक होते हैं, जिनको कुचलकर कोई सरकार इतिहास में इज्जत नहीं पा सकती। 

इसके लिए सही गालियों को अखबार इजाजत नहीं देता


संपादकीय
16 फरवरी 1013
महाराष्ट्र में कांगे्रस-एनसीपी की राज्य सरकार के एक मंत्री ने अपने बच्चों की शादी में फिजूलखर्ची का ऐसा भयानक प्रदर्शन किया है कि एनसीपी के नेता शरद पवार को अपनी पार्टी के इस मंत्री को लताडऩा पड़ा। जो महाराष्ट्र सूखे से गुजर रहा है, और जहां पर कुपोषण से मौतें हो रही हैं, हजारों किसान हर बरस आत्महत्या के रिकॉर्ड में दर्ज हो रहे हैं, वहां पर ऐसी अश्लील और हिंसक दावत के बारे में मंत्री की सफाई यह है कि राज्य के एक सिंचाई ठेकेदार ने इसका इंतजाम किया था। और महाराष्ट्र में सिंचाई के ही ठेकों को लेकर दसियों हजार करोड़ के घपलों की खबरें महीनों से बनी हुई हैं। 
सार्वजनिक जीवन में किफायत की बात, सादगी की बात खत्म ही हो चुकी है। जो लोग राजनीति और सत्ता के चलते कुछ बरसों में ही करोड़पति से लेकर अरबपति होने लगते हैं, उन लोगों को अपने ही इलाकों में ऐसा भयानक और अमानवीय प्रदर्शन करते हुए कोई झिझक नहीं होती। और महाराष्ट्र के भूख से मरते हुए बच्चे, कुपोषण के शिकार कंकाल की तरह दिखते हुए बच्चे अपनी तस्वीरों से दुनिया को डराते हैं। अभी चार-छह दिन पहले ही हमने इसी महाराष्ट्र की एक रिपोर्ट छापी थी कि किस तरह गरीबी से थके मां-बाप ने पांच-दस हजार रूपये में अपने बच्चों को बेच दिया था, और प्रशासन ने ही ऐसे बत्तीस बच्चों को छुड़ाया था। ऐसे देश-प्रदेश में किस तरह लोग अपनी ताकत से बढ़कर, अपनी क्षमता से बढ़कर, इस किस्म के हिंसक खर्च करते हैं, जिनको देखते हुए लोग अगर नक्सलियों को अपना हमदर्द मानते हैं तो वे कोई चूक नहीं करते हैं। इसी महाराष्ट्र के कुछ हिस्से में जहां आदिवासी हैं और जंगल है, वहां पर नक्सली अपने पैर जमाए हुए हैं। और कोई हैरानी नहीं कि धीरे-धीरे नाकामयाब लोकतंत्र सिमटते चले जाएगा और नक्सली बढ़ते चले जाएंगे। 
महाराष्ट्र में एनसीपी भी गांधी-नेहरू की कांगे्रस पार्टी का हिस्सा रह चुकी है और वहां से अलग होने के बाद भी यह पार्टी कांगे्रस के साथ भागीदारी में ही सरकार चला रही है। इसके मुखिया शरद पवार एक किसान नेता होने का दावा करते हैं। उनके एक मंत्री प्रफुल्ल पटेल देश के विमान मंत्री रहते हुए अपने बच्चों के लिए विशेष सरकारी विमान भेजते हुए खबरों में घिरे हुए ही हैं। दूसरी तरफ उनकी बेटी और वे खुद देश की सबसे रईस रिहायशी योजना, लवासा को लेकर खबरों में हैं। उनके भतीजे अजित पवार को सिंचाई घोटालों के आरोपों के बीच महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था। और आज उनका एक मंत्री भूखे-सूखे महाराष्ट्र के मुंह पर शाही दावत खाने-खिलाने के बाद थूक रहा है। यह हैवानियत राजनीति में लोगों को पता नहीं कहां से सीखने मिलती है, और इसके लिए सही गालियां देने को अखबार इजाजत नहीं देता।

निर्वाचित लोगों जैसा बर्ताव करने को मजबूर अदालतें...


संपादकीय
15 फरवरी 2013
भारतीय लोकतंत्र में एक बहुत बड़ा विरोधाभास चल रहा है। जो अदालत किसी चुनाव के बिना काम करती है, जिस पर वोटरों की नाराजगी की दहशत नहीं होती, वह एक-एक करके जनता के हित और हक के मामलों को उठा रही है। दूसरी तरफ न्यायपालिका से परे जो विधायिका (संसद-विधानसभा) है, और जो कार्यपालिका (सरकार) है, उनके कामकाज जनता के लिए संवेदनाशून्य होते चल रहे हैं। जबकि सांसद-विधायक हर पांच बरस में जनता के सामने जाकर खड़े रहने को मजबूर हैं, और उनको, और उनकी सरकारों को जनता के हक और हित के लिए अधिक फिक्रमंद भी होना चाहिए, अधिक जवाबदेह भी होना चाहिए, लेकिन ऐसा रह नहीं गया है। यही वजह है कि आज इस देश में अदालतों को छोड़कर लोकतंत्र के बाकी स्तंभों के लिए लोगों के मन में एक परले दर्जे की हिकारत भर गई है। 
वीवीआईपी और वीआईपी कहे जाने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए जिस तरह से जनता का पैसा झोंका जाता है, उसको लेकर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई भी कर रहा है और नाराजगी भी जाहिर कर रहा है। लेकिन हमारा अनुभव यह है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक जजों की हिफाजत में, सड़कों पर उनकी आवाजाही में ठीक उसी तरह की फिजूलखर्ची होती है, जैसी कि सत्ता भोगने वाले तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण लोगों की होती है। यह वीवीआईपी तबका एक नई राजशाही बनकर उभरा है, और मानो यह मनुवादी व्यवस्था के तहत राजा का दर्जा पाया हुआ है, जिसके कि सड़क पर निकलते हुए बाकी जनता को शूद्रों की तरह पांव तले कुचलना जायज है। यह सिलसिला लोकतंत्र पर से लोगों का भरोसा खत्म कर रहा है। और इस पर आज अगर सुप्रीम कोर्ट में बात हो रही है तो यह किसी किनारे तक भी पहुंचनी चाहिए। हम हमेशा से यह लिखते आ रहे हैं कि सत्ता और संवैधानिक पदों पर, अदालती कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को यह हक क्यों मिलना चाहिए कि वे दूसरों को पीछे छोड़ते हुए सड़कों पर आगे बढ़ें? जगह-जगह ऐसे हादसे होते हैं कि पांच बरस के ऐसे राजा, या नौकरी रहने तक के जज, या ऐसी ही दूसरी कुर्सियों पर बैठे लोगों के काफिलों के लिए जब जनता को रोका जाता है, तो बीमार चौराहों पर ही मर भी जाते हैं। 
और जिस देश में साढ़े सात सौ लोगों पर एक पुलिस है, वहां पर छोटे-छोटे गली-मोहल्ले के नेता भी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए पुलिस के बंदूकधारियों को साथ में लेकर चलते हैं, उनका चपरासियों की तरह इस्तेमाल करते हैं, और इस तरह के माहौल में रहने वाले ये पुलिस वाले बाद में किसी संघर्ष वाले मोर्चे के लायक रह भी नहीं जाते। पुलिस का मनोबल खत्म करने के लिए ऐसा माहौल बहुत होता है। इसके साथ-साथ नेताओं के भ्रष्टाचार को देख-देखकर भी ऐसी ड्यूटी पर रहने वाली पुलिस के अधिक भ्रष्ट हो जाने की सीधी-सीधी गारंटी होती है। जिस देश-प्रदेश में आधे से अधिक आबादी गरीबी की रेखा के नीचे जीती हो, जिस देश-प्रदेश में सुप्रीम कोर्ट को यह दखल देनी पड़ती हो कि विचाराधीन कैदियों को संभावित सजा से अधिक तक जेलों में रखा जा रहा है क्योंकि पेशी पर ले जाने को पुलिस नहीं है, वहां पर सत्ता की मेहरबानी से लोगों को निजी अर्दली की तरह बंदूकधारी पुलिस मिली हुई है। हमारा ख्याल है कि ऐसे मामलों को लेकर अगर कोई जनहित याचिका लेकर अदालत जाए, तो ऐसी तैनाती करने वाले लोगों से इस खर्च की पूरी वसूली का आदेश निकल सकता है। 
सत्ता पर बैठे लोगों को आज देश का बदलता हुआ माहौल समझने की जरूरत है। अब सूचना के अधिकार से लेकर, सड़कों के आंदोलन तक, और अदालतों की एक सक्रिय दखल के चलते बहुत से मामले ऐसे उधडऩे जा रहे हैं, जिनको सत्ता पर बैठे लोग अब तक अपने नीचे दबाकर रखते थे। देश का माहौल बदलते चल रहा है, और जनता के हक का पैसा अगर सत्ता अपने पर इसी तरह खर्च करना जारी रखेगी, तो तय है कि एक तरफ सत्ता पर नक्सलियों जैसे अलोकतांत्रिक और हिंसक आंदोलनों के वार बढ़ेंगे, और दूसरी तरफ अदालतों का वार भी उन पर होगा। यह नौबत बदलनी चाहिए कि जनता के सामने वोटों के लिए गिड़गिड़ाने वाले लोगों को आज अदालतें किफायत सिखाएं, और उनकी जिम्मेदारी सिखाएं। 

पे्रम के पर्व पर गुंडों और सरकार के हमले


14 फरवरी 2013
संपादकीय
एक और वेलेंटाइन डे आकर चले गया। दुनिया के अधिकतर देशों में पे्रम के पर्व के रूप में मनाया जाने वाला यह दिन पश्चिम की ईसाई सभ्यता से निकला है, और इसलिए भारत में एक तबका इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ मानने लगा है। और इस दिन को बहुत से हिंदू संगठन, धर्मांध संगठन, नफरतजीवी संगठन अपने अस्तित्व को दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल करने लगे हैं और सड़कों पर हिंसा से लेकर फतवे जारी करने तक अपने नाम को छपवाने लगे हैं। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकार ने सरकारी स्तर पर इस दिन को मां-बाप की पूजा का दिन बना दिया है, और सरकार के एक आदेश के तहत प्रदेश की सभी स्कूलों में बच्चों के मां-बाप को आमंत्रित कर, उनके बच्चों से उनकी पूजा करवाई जा रही है। बच्चे अपने मां-बाप का सम्मान करें, इसके लिए साल में किसी एक दिन को  तय करने की जरूरत नहीं है। यह तो इस देश की संस्कृति और सभ्यता का रोजाना का एक हिस्सा होना चाहिए, और इसके लिए स्कूलों में सरकारी समारोह की तो बिल्कुल ही जरूरत नहीं है। दूसरी बात यह कि नौजवानों के बीच पे्रम के इस पर्व को खत्म करने के लिए बच्चों के मां-बाप से पे्रम का दिन बना देना, एक अलग किस्म की सामाजिक नासमझी है, और इस राज्य में यह फैसला सरकार का है। 
इंसानों की जिंदगी में कई किस्म के रिश्तों की जरूरत होती है, और जब ऐसे सारे रिश्ते अपने-अपने किस्म से स्वस्थ रहते हैं, तब जाकर लोगों का विकास ठीक से होता है। न तो पे्रमी-पे्रमिका मां-बाप की जगह भर सकते, न भाई-बहन पति-पत्नी की जगह भर सकते, न ही दोस्त घरवालों की जगह भर सकते, और न ही घरवाले दोस्त की जगह भर सकते। इसलिए किसी एक को किसी दूसरे का विकल्प बना देना एक बहुत ही असामाजिक बात तो है ही, यह इंसानी मिजाज के भी खिलाफ है, और ऐसे थोपे गए विकल्प से नौजवान पीढ़ी के मन में बुजुर्गों के लिए, समाज के लिए, और सरकार के लिए एक भड़ास भरती चलती है। आज जब छत्तीसगढ़ के बाग-बगीचे संगीनों के साए में दोस्तों को वहां घुसने से रोक रहे हैं, तो इससे पुलिस और प्रशासन के लिए भी नौजवानों के मन में भारी हिकारत पैदा होती है। और गरीब-मध्यमवर्ग के लड़के-लड़कियां, जो कि महंगे रेस्त्रां नहीं जा सकते, वे आखिर ऐसे दिन एक-दूसरे से मिलने के लिए कहां जाएंगे?
इसलिए कृष्ण जैसे पे्रम के प्रतीक वाले इस देश में पे्रम के नाम पर जब एक दहशत पैदा होती है, और लोगों को मिलने नहीं दिया जाता है, तो ऐसे लोग सुनसान जगहों पर जाने को बेबस होते हैं, और वहां पर जुर्म का शिकार भी होते हैं। छत्तीसगढ़ में इस बात पर हमको हैरानी होती है कि शिव सेना और उसके जैसे दूसरे धर्मांध संगठन खुलकर फतवा जारी करते हैं कि अगर लड़के-लड़कियां किसी सार्वजनिक जगह पर साथ मिले तो उन्हें राखी बंधवाई जाएगी। ऐसे फतवों के बाद भी जब पुलिस और प्रशासन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करते, तो ऐसे लोगों का हौसला बाकी गुंडागर्दी के लिए भी बढ़ता है।
हमने पहले भी ऐसे मौकों पर लिखा था कि समझदारी की बात यही है कि समाज अपने नजरिए को हकीकत को मानने वाला बनाए। आज जब इस देश की संस्कृति में जवान लड़के-लड़कियों का मिलना रोका नहीं जा सकता, वे जब साथ-साथ पढ़ रहे हैं, काम कर रहे हैं, मोबाइल और मोबाइक के जमाने में उनका घूमना-फिरना एक आम बात हो गई है, तो उनकी आज के जमाने की जरूरतों को एक कानूनी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की जरूरत है। इसके बिना समाज में बलात्कार, आसपास के लोगों का दूसरे किस्म का देहशोषण, बच्चों के साथ बुरा सुलूक, वेश्याओं के साथ असुरक्षित संबंध जैसे बहुत से खतरे बढ़ते चल रहे हैं। भारत का आज का गैरमहानगरीय इलाका बहुत ही पाखंडी मानसिकता के साथ जी रहा है जहां पर कि कुछ लोग यह मानकर, और साबित करते हुए चल रहे हैं कि भारत की संस्कृति में प्रेम कभी था ही नहीं। जबकि यहां का इतिहास और पुराण कृष्ण की तरह-तरह की रासलीलाओं से लेकर वात्सायन के विस्तृत सेक्स-ग्रंथ तक से भरा है और श्रृंगार रस का साहित्य भारत के एक युग में पहाड़ सा पैदा हुआ है। ऐसे देश में एक राजनीतिक सोच भारतीय संस्कृति के एक फर्जी इतिहास का दावा करते हुए प्रेम के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाती है। हिन्दू धर्म के ठेकेदार बनते हुए लाठियां लेकर ये लोग वेलेंटाइन डे पर, नए साल पर जिस तरह से प्रेमी-प्रेमिकाओं पर, दोस्त लड़के-लड़कियों पर हमले करते हैं उनको रोकने में सरकारों की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। यह माहौल आज की नौजवान पीढ़ी को ऐसे लठैतों की नजरों से बचने पर मजबूर करता है। और चूंकि परिवारों के लोग भी अपने जवान बच्चों की जरूरतों को नहीं समझते इसलिए यह पीढ़ी कहीं कोने ढूंढती है तो कहीं कोई दूसरी खाली जगहें। 
हम यहां पर यह भी लिखना चाहते हैं कि एक नौजवान पीढ़ी की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को कुचलते हुए अगर कोई समाज अपने आपको बहुत शुद्धता पर टिका समाज मानता है तो वह ऐसी पीढ़ी के सामाजिक योगदान भी संभावनाओं को पहले कुचलता है। अपनी अपूरित जरूरतों के साथ भड़ास और कुंठा से जीने वाले नौजवान अपने समाज और देश-प्रदेश में अपनी पूरी क्षमता से कुछ नहीं जोड़ पाते। इंसानी ताकत से दुनिया के जो देश आगे बढ़े हैं उन सब में इंसान को बहुत बड़ी निजी आजादी मिलने का इतिहास है। जो देश वर्तमान की जरूरत को नहीं समझता, उस देश का भविष्य कभी उसकी संभावनाओं जितना अच्छा नहीं हो सकता। भारत का छत्तीसगढ़ जैसा इलाका इसी तरह अपनी संभावनाओं को खो रहा है। अपनी जवान पीढ़ी में अगर भड़ास बोई जा रही है, तो उससे कभी बहुत मीठे फल मिल भी नहीं सकते।

जनता के पैसों पर रईसी के साथ-साथ लूटमार भी


13 फरवरी 2013
संपादकीय
भारत के वीवीआईपी कहे जाने वाले लोगों के लिए इटली से साढ़े तीन हजार करोड़ से अधिक दाम पर दर्जन भर आलीशान हेलिकॉप्टर खरीदने में सैकड़ों करोड़ की रिश्वत का मामला सामने आया है। और भारत में संसद से सड़क तक महीनों से तैर रहे इन आरोपों पर केंद्र सरकार ने कुछ नहीं किया था, और कल जब इटली में इस कंपनी के मुखिया को भारतीय सौदे के लिए रिश्वत देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, तो भारत सरकार ने कुछ घंटों के भीतर ही सीबीआई जांच के आदेश दे दिए। यह देश बोफोर्स के समय से फौजी खरीदी में भ्रष्टाचार से हिला हुआ है, और अब तो कुछ दर्जन करोड़ का भ्रष्टाचार कई सौ करोड़ के भ्रष्टाचार तक पहुंचा हुआ दिख रहा है। लेकिन हमारी आज की फिक्र भारत सरकार में बैठे हुए लोगों की रिश्वतखोरी की तो है ही, उसके साथ-साथ एक बड़ी फिक्र यह है कि गरीबी की रेखा के नीचे जीते हुए इस देश में वीवीआईपी कहे जाने वाले सत्ता पर काबिज लोगों के लिए महल जैसे आराम वाले ये हेलिकॉप्टर लिए जा रहे हैं, जिनके बारे में एक खबर यह है कि अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इन्हें बहुत महंगा बताते हुए खारिज कर दिया था। जिस देश में छब्बीस रूपये रोज पर जिंदा रहने वाले को सरकार गरीब नहीं मानती है, उस देश के नेता सैकड़ों करोड़ के हेलिकॉप्टर में घूमने जा रहे हैं, और हजारों करोड़ की इस खरीद में सैकड़ों करोड़ की रिश्वत देने के आरोप में इटली में सरकारी एजेंसी गिरफ्तारियांं कर रही है। 
इस देश में लोकतंत्र पर लोगों का भरोसा अब कायम रहने की कोई खास वजह नहीं रह गई है। जिनके हाथों में सत्ता है वे कर्नाटक में खदानों से खरबपति हो चुके हंै, वे महाराष्ट्र में आदर्श नाम का जालसाजी भरा भ्रष्टाचार करते हैं, वे गरीबों के इलाज में हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार करते हैं, और वे गरीबों के पैसों पर ऐशोआराम का हवाई-सफर जुटाते हैं, और उस खरीदी में फिर अरबपति हो जाते हैं। हिंदुस्तान की ऐसी लूटमार ऐतिहासिक है। बहुत सी पार्टियां, बहुत सी सरकारें इसमें लगी हुई हैं, और अगर एक दूसरे देश से ऐसी कानूनी कार्रवाई सामने नहीं आती, तो भारत की सरकार और भारत की जांच एजेंसियां तो इस घोटाले पर बैठकर उसे दबा ही रही थीं। 
अब ऐसे में क्या तो रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी की निजी ईमानदारी की चर्चा को देखा जाए, और क्या तो मनमोहन सिंह नाम के प्रधानमंत्री की निजी ईमानदारी के दावों को सुना जाए। जब इनकी अगुवाई में चल रहे एक मंत्रालय और एक देश की सरकार का ऐसा हाल चल रहा है, तो निजी ईमानदारी की हकीकत या उसका मुखौटा किसके काम का है? ऐसा मुखिया किसी काम का नहीं रहता जो खुद सादगी से रहता हो, अपनी ईमानदारी की छवि पर फिदा रहता हो, और जिसके मातहत इस गरीब देश को लूटने में लगे रहते हों। इस गरीब देश में अगर गिने-चुने नेताओं के हवाई सफर के लिए दर्जन भर ऐसे हेलिकॉप्टर लिए जा रहे हैं, जिन्हें की दुनिया के सबसे ताकतवर अमरीकी राष्ट्रपति के लिए भी महंगा पाकर खारिज किया जा चुका है, तो भारत में लोकतंत्र है कहां? दो-तीन दिन पहले ही हमने फिजूलखर्ची को लेकर इसी जगह पर लिखा था कि ऐसा लगता है कि कुनबापरस्ती का राजतंत्र भारत और पड़ोसी देशों में चल रहा है। आज का यह हाल सुनकर फिर वैसा ही लगता है। और उसी-उसी बात को हम कितनी बार लिखें? और जब हमारे सरीखे लोग लिखते हुए थक जाते हैं, और देश के लुटेरे थकान के करीब भी नहीं पहुंचते, तो फिर देश के नक्सली पर्चे और पोस्टर लिखने लगते हैं। 
रक्षामंत्री ए.के. एंटनी की सीबीआई जांच की घोषणा पर आज इस देश में किसको भरोसा हो सकता है? और यह बात हम सीबीआई के बारे में नहीं कह रहे हैं, यह बात हम ऐसी किसी जांच के पूरे होने, और उस पर किसी संभावित अदालती कार्रवाई के होने, और उसके किसी किनारे पहुंचने के बारे में कह रहे हैं। बोफोर्स से लेकर आज तक किस सरकारी बेईमानी, लूट और डकैती पर किसको सजा हो गई है? और इक्का-दुक्का चौटालाओं को निचली अदालत से अगर सजा हुई भी है, तो उनके सामने संपन्नता से खरीदी जा सकने वाली कानूनी मदद का लंबा सफर अभी बचा हुआ ही है। यह देश ऐसे हर भ्रष्टाचार के साथ और निराशा में डूब रहा है। हेलिकॉप्टर जब उतरता या उड़ता है, तो आसपास जुटी हुई हिंदुस्तानी गरीबों की भीड़ की आंखों में धूल झोंकता है। हजारों करोड़ के ये हेलिकॉप्टर ऐसी जनता के बीच उतरने के पहले ही इटली और दिल्ली में रहते हुए जनता की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। 

सरहद पार के दुश्मनों से अधिक खतरनाक


12 फरवरी 2013
संपादकीय
सीबीआई ने अपने ही एक वकील के खिलाफ मामला दर्ज कराया है जिसने  2-जी घोटाले में फंसी एक कंपनी के साथ बात करके उसकी मदद की थी। यह बात सुनने में भयानक लगती है कि सरकारी जांच एजेंसी का वकील अपनी एजेंसी के केस को ही कमजोर करने में लग जाए, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हिंदुस्तान में यह बात पहली बार सुनाई पड़ रही हो। ऐसा बहुत से मामलों में होता है जब सरकारी वकील किसी अभियुक्त की मदद करने में जुट जाते हैं और केस को कमजोर बना डालते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि सरकार का कोई चेहरा नहीं होता, सरकार बहुत सी बातों की परवाह नहीं करती। और ऐसा भी नहीं कि यह हाल भारत में सरकारों के भीतर सिर्फ वकीलों का है। टैक्स वाले जितने विभाग हैं, उनके बहुत से अफसर टैक्स चोरों के सलाहकार या सीए की तरह काम करते हैं, और उन्हें अधिक से अधिक रास्ते दिखाते हैं कि कैसे टैक्स चोरी किया जाए। पुलिस के जांच अधिकारी बहुत से मामलों में मुजरिमों को सुबूत खत्म करने और गवाहों को खरीदने की राह दिखाते हैं। कंस्ट्रक्शन वाले सरकारी विभागों में ठेकेदार और अफसर मिलकर पहले से टेंडर तय करते हैं कि किस तरह सरकार को अधिक से अधिक चूना लगाया जा सकता है, और उसके दाम लोहा-सीमेंट के रेट पर वसूले जा सकते हैं। ऐसे सारे मामलों में कानून को और अधिक कड़ा करने की जरूरत इसलिए है कि पंछियों को डराने के लिए खेत में खड़ा किया गया पुतला ही अगर सारी फसल को खा जाए, किसी गोदाम का चौकीदार ही सारा माल चोरी कर ले, इलाज करने वाला डॉक्टर ही किडनी निकालकर बेच दे, और सेक्स-हिंसा के शिकार बच्चों की मदद करने वाले लोग ही बलात्कारी हो जाएं, तो फिर इस दुनिया के बचने की संभावना कहां बचती है?
जब कभी किसी सरकारी विभाग का कोई बड़ा घोटाला सामने आता है, तो यह बात जाहिर रहती है कि विभाग के भीतर के ही कुछ लोग साजिश में शामिल रहते हैं। सरकारी घपले बिना सरकारी भागीदारी के नहीं होते। वे ऐसी चोरी जैसे नहीं रहते जिनमें घर के भीतर का कोई शामिल न हो, और फिर भी चोरी हो जाए। बहुत से सरकारी विभागों में अगर कोई ठेकेदार, कोई सप्लायर बिना बेईमानी काम करने की नीयत रखते हों, तो उनको जल्दी से जल्दी धंधे से बाहर करने में लोग जुट जाते हैं। सरकारी वकील भी बहुत से विभागों में ऐसे रहते हैं, जिनको इस काम पर रखने के पहले सत्ता में बैठे हुए लोग इस बात की गारंटी कर लेते हैं कि उनके यार-दोस्तों के खिलाफ मामले कमजोर करने के लिए ऐसे वकील तैयार रहेंगे या नहीं। कुल मिलाकर सरकार के भीतर के लोग सरकार के खिलाफ जुटे रहते हैं, तभी जाकर देश में इतनी बेईमानी होती है। 
ऐसी गद्दारी के खिलाफ अलग से कड़ा कानून बनना चाहिए। ऐसे लोगों को निचली अदालत के फैसले के बाद धंधे से बाहर तब तक रखना चाहिए जब तक कि ऊपरी कोई अदालत उस फैसले को पलट न दे। और ऐसे लोगों की कमाई से जुटाई गई दौलत भी सरकार को निचली अदालत के फैसले के बाद अपने कब्जे में तब तक रोककर रखनी चाहिए जब तक कि देश की आखिरी अदालत उनको बरी न कर दे। घर के भीतर बैठे हुए गद्दार, सरहद पार के दुश्मन के मुकाबले अधिक खतरनाक होते हैं, और हमारा यह मानना है कि सरकार को अपने अफसरों और अपने वकीलों पर शक होने पर, खुलकर उनकी रिकॉर्डिंग करनी चाहिए, स्टिंग ऑपरेशन करने चाहिए, और कड़ी कार्रवाई से बाकी सरकारी लोगों के सामने ऐसी मिसाल पेश करनी चाहिए कि वे ऐसा हौसला न करें। ऐसे लोग भीतर ही भीतर से सरकारी ढांचे को पूरी तरह खोखला कर देते हैं, और इससे होने वाला नुकसान नाम के लिए तो सरकार का होता है, यह होता तो दरअसल जनता के हक का है। इसलिए ऐसी साजिशें जनता के साथ गद्दारी रहती हैं, और ऐसे लोगों को इन पेशों में बने रहने का, ऐसी कुर्सियों में बने रहने का कोई हक नहीं होना चाहिए। दिक्कत यह है कि भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए सरकार के भीतर उनसे बड़े-बड़े भ्रष्ट लोग जुट जाते हैं। 

जनता को सांस्कृतिक भत्ता!!


11 फरवरी 2013
ब्राजील की एक खबर है कि आर्थिक परेशानी से गुजरने के बावजूद उसने अभी यह घोषणा की है कि वहां सारे कर्मचारियों की हर महीने पचीस डॉलर (करीब तेरह सौ रूपये), दिए जाएंगे ताकि वे उसे सांस्कृतिक चीजों पर खर्च कर सकें। वे उससे फिल्में देख सकें, किताबें खरीद सकें, या फिर संग्रहालय जा सकें। 
वहां की सरकार का यह मानना है कि वह गरीबों के पेट के लिए तो इंतजाम कर रही है, लेकिन गरीब को संस्कृति तक पहुंच की जरूरत भी होती है। इसके लिए वहां पर न्यूनतम मजदूरी से पांच गुना अधिक तक (सत्रह सौ डॉलर हर महीने, 91 हजार रूपये) पाने वाले लोगों तक इस सहूलियत को बढ़ाने का विचार चल रहा है। इसके लिए सरकार एक इलेक्ट्रॉनिक कार्ड देगी, जिसका भुगतान कर्मचारियों की कंपनियां करेंगी, और उस पर उन्हें आयकर की छूट मिलेगी। 
ब्राजील में न्यूनतम वेतन से पांच गुना पाने वाले करीब पौने दो करोड़ लोग हैं, और इतने लोगों के लिए अगर 25-25 डॉलर संस्कृति पर खर्च होंगे, तो सरकार का मानना है कि संस्कृति को बहुत बढ़ावा मिलेगा। 
ब्राजील एक ऐसा देश है जो किसी धर्म, संस्कृति या आध्यात्म को लेकर अहंकार में नहीं जीता। हजारों बरस से वह मूल निवासियों, या आदिवासियों का देश रहा, और तीन सौ बरस वह पुर्तगाल का गुलाम रहा। बाद में भी उसने वहां कई बार तानाशाही देखी और फौजी हुकूमत देखी। लेकिन ऐसे सारे दौर से निकलते हुए उसकी कला एक उदारता के साथ आगे बढ़ती रही, और वहां के सांबा लोकनृत्य से लेकर आधुनिक कलाओं तक उसकी दखल पूरी दुनिया में आज बनी हुई है।                                                                     ब्राजील की सड़क किनारे बनी एक कलाकृति
ऐसा देश आज अगर कला और संस्कृति के नाम पर हिंदुस्तान के देश-प्रदेशों की तरह भ्रष्टाचार से भरी हुई सरकारी खरीदी करने के बजाय अपने लोगों को मनपसंद फिल्म-संगीत, और किताबें देखने-खरीदने के लिए संस्कृति-भत्ता दे रहा है, तो उससे कुछ सीखने की जरूरत है। भारत में भोपाल के भारत भवन से लेकर छत्तीसगढ़ तक और केंद्र सरकार के सांस्कृतिक-मठों तक, कला और संस्कृति में सरकार की दखल उसी तरह की दिखती है जिस तरह किसी भी सरकारी ठेके और खरीदी में रहती है। छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव में साठ हजार रूपये पाकर पद्मश्री तीजन बाई ने अपनी लोककला का प्रदर्शन किया था, और कुछ मिनटों के लिए स्टेज पर फिल्मी नाच-गाने के लिए आने वाली करीना कपूर को करोड़ों रूपये दिए गए थे। 
सरकार संस्कृति को किस तरह काबू में रखना चाहती है यह भोपाल में अशोक वाजपेयी जैसी एक अफसर की मर्जी के राज के इतिहास में दर्ज है, उसी तरह दिल्ली में इंदिरा और राजीव के पसंदीदा इक्का-दुक्का संस्कृति-सामंतों की मर्जी से देश भर में कला की उत्कृष्टता तय होती थी, और कलाकारों की महानता का दर्जा तय होता था। कला को राज्याश्रय का यह सिलसिला इस खतरनाक हद तक चलते रहा है, और चल रहा है, कि आज सत्ता की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारधारा के आधार पर कला की उत्कृष्टता तय हो रही है। इसके अलावा सरकारों में कला की ठेकेदारी करने वाले लोग सरकारी विभागों के सप्लायरों की तरह कलाकारों को स्थापित करने, या हाशिए पर भेज देने के फैसले घर बैठे करते हैं। 
भारत में कला का पूरा सिलसिला सरकारी मनमानी, बेईमानी, और सत्ता-सामंतों का गुलाम हो गया है। लोक कलाओं से लेकर शास्त्रीय कलाओं तक, हस्तशिल्प से लेकर लोक विधाओं तक का भविष्य कुछ गिनेचुने लोग तय करते हैं। इन सबमें कला के लोगों का कोई दखल नहीं रहा गया है, कला की समझ की कोई भूमिका नहीं रह गई है और कला का आनंद लेने वाले लोगों की कोई आवाज नहीं रह गई है।
संस्कृति के हिसाब से, कला के हिसाब से यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि सत्ता पर काबिज विचारधाराएं अपने हिसाब से अपने देश-प्रदेश की कला का न सिर्फ वर्तमान और भविष्य तय करती हैं, बल्कि वे कला-संस्कृति का इतिहास भी तय करने लगी है। मिसाल के लिए आज कला में नग्नता को लेकर देश की हिंदूवादी विचारधारा का एक बहुत छोटा आक्रामक और हिंसक, साम्प्रदायिक और नफरतजीवी तबका जगह-जगह कला पर हमले कर रहा है। और यह हमला सिर्फ हुसैन पर नहीं है कि एक मुसलमान कलाकार ने कैसे हिंदू देवी-देवताओं को बिना कपड़ों के बना दिया, यह हमला हिंदू कलाकारों के कामों पर भी है। अब एक नई शुद्धतावादी आक्रामकता ने पूरे इतिहास को नकारने का काम शुरू कर दिया है। हिंदुस्तान का इतिहास गवाह है कि सैकड़ों बरस से पूजा की जगहों पर भी, मंदिरों के भीतर और बाहर, हिंदू देवी-देवताओं नग्न प्रतिमाएं लदी पड़ी हैं। लेकिन एक नवशुद्धतावादी, नवधर्मांध, नवसाम्प्रदायिक, और नवनकारात्मक सोच पूरे इतिहास को खारिज कर देने पर आमादा है।
शास्त्रीय कलाएं तो हमेशा से सत्ता के साथ रही हैं, और तानसेन कभी किसी गरीब की आवाज नहीं उठा सकते थे। ऐसे में लोककलाएं लोकजीवन से निकलकर आने की वजह से, वहां टिकी रहने की वजह से लोगों के संघर्ष की आवाज भी रहती थीं। अब उसे जिंदा रखने का जो ठेका सरकारों ने ले लिया है, उसकी वजह से वहां पर अब चारण और भाट पद्मश्री पाते हैं, और संघर्ष की बात करने वाले दफन कर दिए जाते हैं। लोककलाओं का एक बड़ा योगदान लोकसंघर्ष में रहते आया था, उसे सभी विचारधाराओं वाली सरकारों ने साजिशों के तहत खत्म कर दिया। अब उसी तरह अभिनंदन ग्रंथों का जमाना आ गया है, जिस तरह सैकड़ों बरस पहले से राजा के चाटुकार पत्थरों पर खुदवाते आए थे। 
ब्राजील की यह मिसाल हिंदुस्तान में पता नहीं कितने लोगों को समझ आएगी, लेकिन भारत से कम लोकतंत्र देखने वाले इस देश में संस्कृति की समझ आज भारत से अधिक दिख रही है। यह संस्कृति जनता को जमीन से जोडऩे वाली संस्कृति है, और जनता को कला-संस्कृति में अपनी समझ और सोच को इस्तेमाल का हक देने वाली संस्कृति है। क्या आज भारत में अधिक लोग इसकी अहमियत को सोचने की हालत में भी छोड़े गए हैं? या फिर लोगों की आंखें करीना कपूर की हथेलियों ने ढांक दी हैं?

बेतहाशा भीड़ और हादसे


11 फरवरी 2013
संपादकीय
कुंभ से लौटते तीर्थयात्रियों में रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में तीन दर्जन से अधिक लोग मारे गए। कल ही वहां पर मौनी अमावस्या का संगम स्नान होने से करोड़ों लोगों ने डुबकी लगाई थी। और इलाहाबाद के सारे स्टेशनों पर लाखों लोगों की भीड़ मौजूद थी। धार्मिक आस्था के चलते कुंभ में हर उम्र के लोग थे, ठंड होने से अधिक सामान के साथ थे, और अधिकतम संभव रेलगाडिय़ां भी जाहिर है कि काफी नहीं थीं। जब किसी तीर्थयात्रा में लोग धार्मिक कैलेंडर के आधार पर उमड़ते हैं, तो उस तीर्थ पर ऐसे हादसे होते ही हैं। दुनिया में जो सबसे नियंत्रित तीर्थयात्रा है, उस हज में भी सऊदी अरब जैसी कड़क सरकार के इंतजाम में बड़ी संख्या में लोग मरते आए हैं, 2006 में हज के आखिरी दिन साढ़े तीन सौ, 2004 में ढाई से अधिक, 1994 में पौने तीन सौ से अधिक, और 1990 में डेढ़ हजार से अधिक तीर्थयात्री मारे गए थे। और यह सब दुनिया के एक सबसे संपन्न देश के सबसे कड़े नियमों के तहत होने वाले, परमिट लेकर आने वाले तीर्थयात्रियों के साथ हुआ था। वहां पर इंतजाम का दर्जा भी कुंभ से बहुत अधिक ऊंचे दर्जे का होता है क्योंकि दुनिया भर से आने वाले लोगों का उसमें कोटा तय है। भारत के कुंभ में तो देश की कितनी भी जनता कभी भी पहुंच सकती है, और पहुंचती है।
लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं निकलता कि लोग महूरत या धार्मिक कैलेंडर के हिसाब से तीर्थ नहीं करेंगे, या फिर किसी जगह की क्षमता से बहुत अधिक भीड़ नहीं पहुंचेगी। ऐसे हादसों को कम करने के लिए सरकार को और प्रशासन को, रेल जैसे विभाग को अच्छी तैयारी करनी पड़ती है। छत्तीसगढ़ में ही सबसे अधिक भीड़ वाले डोंगरगढ़ के मेले में आते-जाते बहुत लोग सड़क हादसों में मारे जाते थे। वहां पर कलेक्टर रहते हुए गणेश शंकर मिश्रा ने पहली बार ऐसा इंतजाम किया था कि ये मौतें खत्म ही हो गई थीं। इसलिए जिस कुंभ के इंतजाम पर सैकड़ों करोड़ रूपये खर्च किए जाते हैं, वहां पर अगर देश-प्रदेश की सरकार और रेल विभाग मिलकर भी ऐसे हादसे को टाल नहीं सकते, तो इसमें सिर्फ भीड़ जिम्मेदार नहीं है, सरकारी इंतजाम भी जिम्मेदार है। 
ऐसे हादसे से यह सबक लेने की भी जरूरत है कि राज्यों में चाहे इससे छोटे पैमाने पर ही जो तीर्थ होते हैं, उनमें ऐसे हादसे न हों। इसके लिए देश के सभी राज्यों को अपने कुछ चुनिंदा अफसरों को कुंभ का इंतजाम देखने और उसकी खूबियों और खामियों से सीखने के लिए उनको वहां भेजना चाहिए। और इस तरह के धार्मिक या दूसरे मौकों को किसी प्राकृतिक विपदा से निपटने की तैयारियों के साथ-साथ जोड़कर देखना चाहिए। भारत ऐसी विविधता वाला देश है कि यहां साल भर तरह-तरह के हादसे अलग-अलग इलाकों में होते रहते हैं, कुछ कुदरत के किए हुए, और कुछ इंसानों की, मशीनों की चूक से। ऐसे हादसों के बाद भी जिंदगियों का नुकसान कम से कम करने के लिए एक तैयारी रहनी चाहिए। और हम बार-बार यह लिखते हैं कि ठोकर किसी को लगे, बाकी लोगों को उससे सबक लेना चाहिए।

भारत और पड़ोस के कई देश कुनबों और बेईमानी में एक से


10 फरवरी 2013
संपादकीय
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पच्चीस एकड़ जमीन पर बने अपने नए महल में रहने चले गए हैं। वहां की एक अदालत ने उनके खिलाफ यह कहा था कि वे राष्ट्रपति रहते हुए अपनी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के कामकाज को सरकारी घर से नहीं देख सकते। अब राजधानी लाहौर में वे एक बेहद सुरक्षित बनाए गए इस मकान में रहने गए हैं, जिसका बम भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसके भीतर हेलिकॉप्टर और छोटे जेट विमान उतरने के लिए हवाईपट्टी बनाई गई है और इसके लॉन पर दस हजार लोग एक साथ बैठ सकते हैं। और यह पूरा महल जरदारी के एक विवादास्पद प्रॉपर्टी व्यापारी दोस्त ने बनाकर तोहफे में दिया बताते हैं। जहां पर यह बिलावल हाउस बना है, उसी के पास पाकिस्तान के एक पिछले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का महल तीन सौ एकड़ जमीन पर बना है जिसके भीतर एक निजी चिडिय़ाघर भी है। पाकिस्तान के एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के दामाद, और एक गुजर चुकीं प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पति रहते हुए आसिफ अली जरदारी अपने भ्रष्टाचार की वजह से मिस्टर टेन परसेंट कहे जाते थे। अब इस घरेलू पार्टी का अगला नेता बेनजीर-जरदारी के बेटे बिलावल को बनाया गया है। 
जिस पाकिस्तान में लोगों को खाना नसीब नहीं है, जहां बाढ़ के बाद बरसों तक लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ता है, जहां करोड़ों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, वहां पर भ्रष्ट नेताओं का पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस तरह सत्ता पर काबिज रहना और अश्लील-हिंसक खर्च करना बताता है कि वहां लोकतंत्र की क्या हालत है। लेकिन दूसरी तरफ भारत की हालत अगर देखें तो यहां भी आधी सदी से अधिक वक्त से इसी किस्म की कुनबापरस्ती राजनीतिक दलों में चली आ रही है, और आल-औलाद के साथ-साथ दामादों और पे्रमिकाओं तक को सत्ता देकर जाने की लंबी-चौड़ी मिसालें हैं। इसके साथ-साथ लोग किस कदर अंधाधुंध दौलत सत्ता पर रहते हुए बनाते हैं, इसकी खबरें आती हैं। देश के सबसे फटेहाल उत्तरप्रदेश में लगातार सत्ता पर काबिज रहने वाले मुलायम सिंह का कुनबा अदालत में अनुपातहीन दौलत का मुकदमा झेल रहा है, और वहीं सरकार चलाने वाली मायावती का भाई सैकड़ों करोड़ का नगद पूंजीनिवेश कंपनियों में कर रहा है। इसी तरह सोनिया गांधी का दामाद लंबे-चौड़े संदिग्ध पूंजीनिवेश के आरोप झेल रहा है, और ऐसे ही आरोपों के चलते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को कुर्सी छोडऩी पड़ी। और भी बहुत से प्रदेशों में कुनबापरस्ती और भ्रष्टाचार का मिला-जुला कारोबार लोकतांत्रिक राजनीति के नाम पर पीढिय़ों से चले आ रहा है। 
हिंद महासागर के इस पूरे इलाके में लोकतंत्र किसी देश में कमजोर रहा और कहीं मजबूत रहा, लेकिन एक बात जो सभी जगह बराबर रही, वह रही कुनबों की राज की। एक तरफ बांग्लादेश, दूसरी तरफ श्रीलंका, तीसरी तरफ पाकिस्तान, और सबसे बड़ा भारत, इन सबमें सत्ता पर गिनेचुने कुनबों का अंतहीन राज इतिहास में दर्ज है। अंगे्रजों के आने से राजशाही जो खत्म हुई थी, उसने नया मुखौटा लगाकर इन सारे चुनावी-लोकतंत्र वाले देशों में नई राजशाहियां कायम कर लीं, और देश-प्रदेश इससे उबर ही नहीं पाए। इन देशों के अलावा भूटान या नेपाल में राजशाही चलती रही है, और वहां भी कुछ कुनबों का ही बोलबाला रहा। यह एक भयानक नौबत है जिसमें कि कहने के लिए तो लोकतंत्र है, लेकिन इन लोकतंत्रों को हांकने वाली ताकतें गिनेचुने कुनबों के हाथ में चली आ रही हैं। और जब ऐसे कुनबे भ्रष्ट और बेईमान भी हो जाते हैं, तो फिर इस लोकतंत्र को ढोने वाली गरीब जनता के हक बचने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। 
एक वक्त था जब हिंदुस्तान में नेहरू ने अपनी निजी जायदाद देश के नाम कर दी थी। आज हाल यह है कि उन्हीं की पार्टी के नेताओं की दौलत सत्ता की मेहरबानी से गैस के गुब्बारे की तरह फूलकर आसमान पर जा रही है। और इसने देश में एक ऐसी मिसाल कायम की है जिससे कि बाकी पार्टियों को अपने कुकर्मों को खपाने के लिए एक तर्क मिल जाता है। इन तमाम गरीब देशों में सत्ता पर आए हुए नेता कहां से तो इतनी दौलत जुटा लेते हैं, और कहां से वे इतनी बेशर्मी जुटा लेते हैं कि खुलकर उसका ऐसा हिंसक प्रदर्शन करते हैं। और फौजी तानाशाही के शिकार पाकिस्तान से लेकर फौजी तानाशाही से बचे हुए हिंदुस्तान तक का हाल जब भ्रष्टाचार और उसकी ऐसी नुमाइश में एक सरीखा दिखता है, तो फिर लगता है कि लोकतंत्र आखिर है कहां, उसका क्या मतलब रह गया है, और उसमें क्या संभावनाएं बच गई हैं कि कहीं मिस्टर टेन परसेंट तो कहीं मिस्टर फिफ्टीन परसेंट से ये देश आजाद हो सकें?