नौकरियों में महिला आरक्षण और संवेदनशीलता दोनों जरूरी


संपादकीय
31 मार्च 2013
बिहार ने अभी पिछले हफ्ते ही यह घोषणा की है कि वहां पुलिस भर्ती में महिलाओं को 35 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। और आज एक दूसरी खबर यह है कि देश की पुलिस में महिलाएं कुल 5 (5.33) फीसदी हैं। देश के 15000 पुलिसथानों में से महिला पुलिस थानों की संख्या 499 है। बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा के मामलों से लदे हुए उत्तरप्रदेश में पुलिस में महिलाएं डेढ़ फीसदी से कम हैं। सबसे अधिक महिलाएं महाराष्ट्र पुलिस में हैं, करीब 15 फीसदी। 
आज की एक तीसरी खबर यह है कि गैंगरेप की चर्चित घटनाओं के बाद भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या 25 फीसदी घट गई है। विदेशी महिलाओं की बात करें, तो यह आंकड़ा 35 फीसदी है। 
इस नौबत को अगर देखें तो ऐसा लगता है कि आज से अगर पुलिस में महिलाओं की भर्ती और तैनाती बढ़ाने का काम तेजी से होगा, तो भी पुलिस विभाग में महिलाओं का अनुपात और संतुलन ठीक होने में शायद आधी सदी लग जाएगी। और महिलाओं पर हिंसा के मामले नए नहीं हैं, इनको लेकर फिक्र भी नई नहीं है, महिला आरक्षण की मांग भी नई नहीं है, और इस देश में अब पढ़ी-लिखी महिलाओं की गिनती भी कम नहीं है। सरकारी नौकरियां इतनी गिनी-चुनी रहती हैं कि वहां पर एक-एक पद के लिए सैकड़ों-हजारों उम्मीदवार रहते हैं, और आज तक यह सुनने में नहीं आया कि किसी पद के लिए महिला उम्मीदवार कम पड़ी हों। ऐसे में हर प्रदेश में खासकर महिलाओं के मामलों को देखने वाले विभागों में महिलाओं के अनुपात को तेजी से बढ़ाना चाहिए। छत्तीसगढ़ के बारे में यह बात कही जा सकती है कि यहां पर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाली महिलाओं की उम्र सीमा को बढ़ाकर पैंतालीस बरस तक किया गया है और तैंतीस फीसदी आरक्षण सरकारी पदों पर महिलाओं के लिए है। इसका मतलब यह है कि बच्चों को बड़ा करने के बाद भी कोई महिला सरकारी नौकरी के लिए अर्जी दे सकती है। लेकिन देश भर में ऐसी पहल की जरूरत भी है, और महिलाओं को अर्जी के लायक बनाने के लिए भी ऐसे विशेष प्रशिक्षण और तैयारी की जरूरत है जैसा कि आज देश-प्रदेश में आदिवासी बच्चों के लिए किया जाता है। 
भारत में महिलाओं पर इन दिनों जितने किस्म की हिंसा हो रही है, उससे होने वाला नुकसान देश की सीमाओं के बाहर भी इसकी साख बर्बाद होने की शक्ल में सामने आ रहा है, और आने वाले बरसों में आते भी रहेगा। इससे बचने के लिए बाकी सारे तरीकों के अलावा, एक जरूरत इस बात की भी है कि पुलिस से लेकर वकील तक और जज तक, महिलाओं की तैनाती ऐसे मामलों के लिए हो, और ऐसी महिलाओं की भी एक खास टे्रनिंग हो। भारत में यह बात बहुत आम है कि ताकतवर कुर्सियों पर बैठी हुई महिलाएं भी महिलाओं के हक को नहीं समझ पातीं, क्योंकि हजारों बरस से उनकी दिमागी ट्रेनिंग मर्दों ने ही की हुई है। इसलिए महिला मुद्दों पर, महिला अधिकारों पर सरकारी कुर्सियों पर तैनात महिलाओं में संवेदनशीलता लाने की जरूरत है। फिलहाल छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों में सरकारी नौकरियों में आरक्षण जो तय किया है, उसे भरने का इंतजाम भी करना होगा। सिर्फ आंकड़ों के इंतजाम से हकीकत नहीं बदल पाएगी। और इन आरक्षित आंकड़ों को संवेदनशील भी बनाना पड़ेगा।

छोटी सी बात..


31 मार्च....
अपने और दूसरों के वक्त का ख्याल
जब कभी आप किसी कामकाजी या व्यस्त व्यक्ति से मिलने के लिए बिना फोन किए, बिना समय तय किए पहुंच जाते हैं, तो आप आपसी शर्मिंदगी या अपमान की नौबत ले आते हैं। इन दिनों जब हर किसी के पास फोन की सहूलियत है, तो फोन पर बात करके, समय तय करके ही कहीं जाएं। ऐसा न करने पर या तो आप दूसरे कामकाजी व्यक्ति के काम में रूकावट बनते हैं, या उनकी निजी जिंदगी में दखल। ये दोनों ही बातें ठीक नहीं हैं। 
यह भी ध्यान रखें कि आप जब किसी से मिलने अचानक पहुंच जाते हैं, तब वे किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति से बात करने में लगे हुए हों, जिनसे वे आपके सामने बात करना नहीं चाहते हों। ऐसी बहुत सी स्थितियां रहती हैं। अपने और दूसरों के समय और सम्मान दोनों का ख्याल रखें। 
दूसरी बात यह कि अगर आपसे मिलने तैयार होते हैं, तो वह मुलाकात अंतहीन न हो जाए। यह अंदाज लगा लें कि वे आपके लिए कितना समय निकाल सकते हैं, और उसी हिसाब से अपनी रवानगी तय कर लें। कुछ लोग शिष्टाचार के लिए आपसे चाय-कॉफी पूछ सकते हैं, लेकिन अगर आपकी बहुत अंतरंगता नहीं है, तो पहली बार में आपको इसके लिए मना करना चाहिए और इसके बाद ही अगर वे जोर दें, तो फिर हां या ना कहना आपके बस में होता है। 
यह भी ध्यान रखें कि अगर एसएमएस पर कोई बात हो सकती है, तो व्यस्त लोगों को सीधे फोन करने के बजाय पहले एसएमएस भेजकर देख लें, हो सकता है कि वे किसी बैठक के बीच से भी आपको जवाब दे सकें और फोन पर बात करने की जरूरत न आए। 
अपने और दूसरों के वक्त का ख्याल किए बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकते। 
-सुनील कुमार

घर, बाहर, कहां मनमोहन?

संपादकीय
30 मार्च 2013
फौजी हुकूमत से धीरे-धीरे लोकतंत्र की तरफ बढऩे जा रहे भारत के पड़ोसी बर्मा, या म्यांमार, में साम्प्रदायिक हिंसा का हाल भयानक है। वहां की बौद्ध आबादी वहां के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को थोक में मार रही हैं, और अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। देश के कई शहरों में बड़े पैमाने पर दंगे हो रहे हैं, मुस्लिमों की आबादी अपने घरबार जलते देख रहे हैं, और लाखों लोग बेदखल हो चुके हैं। वहां की बौद्ध-हिमायती समझी जाने वाली सरकार पर यह अंतरराष्ट्रीय आरोप भी लग रहे हैं कि वह मुसलमानों के खिलाफ काम कर रही है। भारत के एक दूसरी तरफ इसी तरह लगे हुए बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ इसी तरह की हिंसा हो रही है, और तीसरी तरफ श्रीलंका में तमिल अल्पसंख्यकों के साथ लंबे समय से भेदभाव के आरोप लगते रहे, लेकिन तमिल आतंकी संगठन लिट्टे चूंकि बराबरी से लंबे समय तक हथियारबंद टक्कर लेते रहा, इसलिए उसका मामला कुछ अलग है। चौथी तरफ पाकिस्तान में हिन्दू आबादी के खिलाफ हिंसा लगातार चलती रहती है, और बीच-बीच में ईसाइयों के खिलाफ भी।
ऐसे पड़ोसी देशों के बीच बसे हुए भारत का वजन आज अंतरराष्ट्रीय मामलों में अधिक होना चाहिए था, लेकिन उसकी बात आज बेअसर रह गई है। इस देश की लीडरशिप कारोबार, और कमाई-खर्च के आंकड़़ों, उदार बाजार व्यवस्था की ही समझ रखने वाली रह गई है। एक वक्त था जब नेहरू का दखल दुनिया के तमाम बड़े-बड़े मामलों में होता था। आज भारत के मामलों में दुनिया के कारोबारी देशों, और अमरीका जैसी गुंडा फौजों का दखल रह गया है। पिछले बरसों में दुनिया में चल रही अमरीकी फौजी हमलावर हिंसा के खिलाफ अगर किसी ने भारत के प्रधानमंत्री का मुंह भी खुलते हुए देखा हो, तो वह सिर्फ सपने में हुआ होगा। लेकिन अफगानिस्तान से लेकर इराक तक, और पाकिस्तान तक जो अमरीकी हमले हो रहे हैं, उनसे परे भारत के पड़ोसी देशों में जो घरेलू हिंसा है, उस पर फिक्र जाहिर करने का हौसला तो हिन्दुस्तान में होना चाहिए। भारत के ये पड़ोसी देश ऐसी आबादी वाले हैं, जो धर्म और जातियां भारत में भी बसी हुई हैं। और अंग्रेजों की गुलामी के चलते, भारत और ये सारे पड़ोसी देश खुली आवाजाही वाले थे, इन सबके साथ जनता की रिश्तेदारियां थीं, और  हैं। इसलिए आज भारत ऐसी बड़ी-बड़ी और लगातार चल रही हिंसा के मामले में भी बेजुबान और बेअसर बैठा रहे, तो यह उसकी विदेश नीति और दूरदर्शिता दोनों का दीवालियापन है। आज भारत के इर्द-गिर्द उसकी ऐसी चुप्पी और बेबसी के चलते ही पड़ोस की बड़ी ताकत चीन का दखल बढ़ते चल रहा है और अंतरराष्ट्रीय जुबान में कहा जा रहा है कि यह भारत के गले में चीनी मोतियों की माला जैसा एक घेरा पड़ रहा है। 
श्रीलंका के तमिलों को लेकर भारत के तमिलनाडु में राजनीतिक दल जिस तरह का दबाव केन्द्र सरकार पर बना रहे हैं, उससे परे भी कुछ और सरहदी राज्यों में आगे-पीछे ऐसी नौबत आ सकती है, आ चुकी है। इसलिए भारत को अपने देश के भीतर घरेलू मोर्चे पर भी राज्यों के साथ समझदारी का एक रिश्ता कायम करना पड़ेगा और यह समझ देश के भीतर विकसित करनी होगी कि विदेश नीति किसी राज्य की नीति नहीं हो सकती, उसके लिए देश और दुनिया के व्यापक नजरिये और व्यापक हितों की जरूरत रहती है। लेकिन पड़ोसी देशों के पहले, अपने भीतर के प्रदेशों को समझाने के लिए भी केन्द्र सरकार का ऐसा असरदार और भरोसेमंद मुखिया चाहिए जिसकी बात पर अलग-अलग पार्टियों के नेताओं को भरोसा हो सके, और जिस पर जनता का भी इतना भरोसा हो, कि उसकी बात को सुनना विपक्षी पार्टियों की भी मजबूरी हो। आज नौबत इसके ठीक उल्टे हैं। अपने कुकर्मों से लदी हुई यूपीए सरकार का मुंह घरेलू मोर्चे पर पूरी तरह बंद है, और संसद में अपनी जिंदगी जारी रखने के लिए वह हर प्रदेश और प्रादेशिक पार्टी से समझौतों को बेबस है।
कल जब यह खबर सामने आई कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यूपीए-3 की सरकार बनने की हालत में, अपने आपको उम्मीदवारी से बाहर घोषित नहीं कर रहे हैं, तो भाजपा ने यूपीए और कांग्रेस के इस भीतरी मामले पर भी खुला बयान दिया कि देश की जनता मनमोहन सिंह को एक बार फिर प्रधानमंत्री देखने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। देश की जनता की तरफ से बोलने का कोई ठेका भाजपा को नहीं मिला है, लेकिन रविशंकर प्रसाद की कही हुई यह बात तर्कसंगत लग रही थी, और खुद कांग्रेस के भीतर मनमोहन सिंह अल्पमत में भी नहीं रह गए हैं। इस तरह अंतरराष्ट्रीय मोर्चों से लेकर देश की सरहद तक, और देश की राजधानी में अपनी पार्टी के भीतर तक इस कदर कमजोर हो चुका मुखिया, कम से कम हिन्द महासागर के क्षेत्र में चीन के लिए एक खुला मैदान छोड़ रहा है। विदेश नीति के ऐसे नुकसान पांच-दस बरसों में सामने नहीं आते, लेकिन लंबे समय में इसके लंबे नुकसान पता लगते हैं।

छोटी सी बात

30 मार्च
शब्दों का आतंक
कहावत-मुहावरे, तरह-तरह के शेर, महान या प्रमुख लोगों की कही हुई सूक्तियां, इन सबका कोई न कोई संदर्भ रहता है। वे किसी खास मौके पर, किसी खास सोच के साथ कही गईं, या गढ़ी गईं बातें होती हैं। इनका इस्तेमाल भाषा की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए तो ठीक होता है, किसी बात का बखान करने के लिए भी ठीक होता है, लेकिन तर्क के रूप में इनका इस्तेमाल ठीक नहीं होता। यह कुछ उसी तरह का है, कि मिठाई बहुत अच्छी होती है, लेकिन पैरों पर पहनने के लिए नहीं होती, और जूते बहुत अच्छे हो सकते हैं, लेकिन खाने के लिए नहीं होते (तब तक जब तक कि जूते खाने लायक कोई हरकत न की जाए)। 
किसी एक मौके पर, या किसी एक बात के लिए, सही ठहराते हुए कहावत-मुहावरा, शेर या सूक्ति, इनको कहीं से निकालकर, कहीं और फिट कर देना, शब्दों का मायाजाल तो हो सकता है, इनसे अखबारों में अच्छी सुर्खियां भी बन जाती हैं, लेकिन इनसे कोई तर्क नहीं बन सकता। इसलिए भाषा की खूबसूरती की खूबी को भाषा के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। यह जरूर हो सकता है कि आपसे बात करने वाले, आपसे कम पढ़े हों, और वे आपकी कही ऐसी पैनी बातों के जवाब में कुछ कहने लायक न रहें, आपके पढ़े-लिखे होने का आतंक उन पर चल जाए, लेकिन जब ऊंट पहाड़ के नीचे आते हैं, तो उनका कद नप जाता है। इसलिए शब्दजाल के बजाय वजनदार तर्कों की आदत रखें, जिंदगी के लंबे सफर में पहाड़ के पास से कभी न कभी गुजरना पड़ता ही है।
- सुनील कुमार

सत्ता के दो केंद्रों की बात

संपादकीय
29 मार्च 2013

दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी और उसकी अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बारे में अभी एक ऐसी बात कही है, जो कि भारतीय राजनीति में कई बार बहस का मुद्दा बनती है। उन्होंने कहा कि सत्ता के दो केंद्र का मॉडल कारगर नहीं रहा। वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में बात कर रहे थे। उन्होंने इसी सिलसिले में यह भी कहा कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तब राहुल गांधी को किसी को प्रधानमंत्री मनोनीत नहीं करना चाहिए। दिग्विजय सिंह इन दिनों देश में राहुल-लाओ-ब्रिगेड के मुखिया के माने जा रहे हैं, और वे कांग्रेस पार्टी की घोषित नीतियों से, प्रवक्ताओं की कही बातों से परे जाकर भी राहुल गांधी को लेकर बातें कहते हैं। लेकिन अकेले उनकी कही बात पर आज यहां लिखने का हमारा इरादा नहीं है। इसी के साथ-साथ पिछले एक हफ्ते में उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर सबसे कड़ा और बड़ा हमला पार्टी के मुखिया, और कुनबे के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बोला है। उन्होंने अखिलेश सरकार के कामकाज को लेकर जितनी कड़ी बातें कही हैं, उतनी कड़ी बातें तो सपा की खाटी दुश्मन बसपा भी नहीं बोल पाई है। 
मुलायम की बात को अगर देखें, तो अपने ही बेटे, और अपनी ही पार्टी की सरकार से उनकी निराशा कैमरों के सामने फूट पड़ी है। एक तरफ वे पार्टी के मुखिया हैं, और पार्टी की नीतियां तय कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनका बेटा सत्ता चला रहा है, जिससे वे खासे नाखुश हैं। इस तरह उत्तरप्रदेश और समाजवादी पार्टी में आज सत्ता के दो केंद्र साफ-साफ हो गए हैं। कांग्रेस और यूपीए में सत्ता के दो केंद्रों की तरफ दिग्विजय ने हमला बोला है। लेकिन इसके ठीक खिलाफ बिहार में अगर देखें तो जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और पार्टी के मुखिया शरद यादव सत्ता के दो केंद्र बने हुए हैं। केंद्र से लेकर राज्य तक, और एनडीए गठबंधन तक इन दोनों की रीति-नीति में मामूली फर्क दिखता है, लेकिन तालमेल के बीच कोई टकराव नहीं दिखता। 
पार्टी और सरकार इन दोनों के बीच दिग्विजय सिंह के कहे मुताबिक एक इंसान का एकाधिकार होना चाहिए, या फिर अधिकार और जिम्मेदारी के मिले-जुले ऐसे दो केंद्र होने चाहिए? हमारा मानना यह है कि ऐसे दो केंद्र अगर आपसी तालमेल और आपसी समझ के साथ काम कर सकते हैं, तो उससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। पार्टी और सरकार, इन दोनों की प्राथमिकताएं कई बार अलग-अलग भी हो सकती है, और ऐसे में इन दोनों कुर्सियों पर एक-एक पैर रखकर बैठे हुए इंसान के लिए दोनों जिम्मेदारियों से इंसाफ कर पाना नामुमकिन रहता है। और सत्ता के दो केंद्र कोई अनहोनी बात नहीं है। पश्चिम बंगाल में तीन दशक से अधिक तक रही वाममोर्चे की सरकार में तो कई पार्टियां थीं, और ये सारी पार्टियां अपनी नीतियों को लेकर खासी कट्टर किस्म की ईमानदार पार्टियां थीं। फिर भी इतने दशक तक अपने-अपने संगठन, मोर्चा संगठन, और सरकार सब ठीक से चले। इसी दौरान सीपीएम के ज्योति बाबू के सामने प्रधानमंत्री बनने का मौका भी आया लेकिन उन्होंने पार्टी के ऐतिहासिक-गलत फैसले को मंजूर करते हुए कोलकाता में ही काम जारी रखा। इसलिए दिग्विजय सिंह का कहा हुआ कांग्रेस की उस संस्कृति के हिसाब से तो ठीक लगता है, जहां पर नेहरू-गांधी परिवार को कुल देवी-देवता की तरह पूजा जाता है, और उससे परे कुछ न देखा जाए इसलिए तांगे के घोड़े की तरह आंखों के दोनों तरफ ढक्कन लगा दिए जाते हैं। लेकिन यही कांग्रेस सबसे बड़ा सुबूत है कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच तालमेल की कोई कमी नहीं रही, और सत्ता, संगठन के साथ-साथ गठबंधन भी ठीक से चलता रहा। और आज कांग्रेस पार्टी जितनी मुसीबतें झेल रही है, वे प्रधानमंत्री की खड़ी की हुई नहीं हैं, बल्कि प्रधानमंत्री के चुप रहने से, कांग्रेस और यूपीए के बाकी लोगों की खड़ी की हुई हैं। इन नाकामयाबियों के पीछे सत्ता और संगठन का, अध्यक्ष और प्रधानमंत्री का कोई आपसी टकराव नहीं रहा, यह सब कुछ प्रधानमंत्री के काबू से बाहर रखे गए मामलों में ही हुआ। इसलिए दिग्विजय सिंह का एक ही हाथ में सारी लगाम वाला तर्क ठीक नहीं है। ऐसा तर्क अधिक कामयाब हो सकता है, जैसा कि गुजरात में मोदी हैं, लेकिन ऐसा तर्क लोकतंत्र के हित में नहीं है, और किसी संगठन या गठबंधन के हित में भी नहीं है।
हिन्दुस्तान जैसा बड़ा देश, और आज की गठबंधन की राजनीति के चलते सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी के अध्यक्ष, या गठबंधन के किसी और मुखिया को ही सरकार का बोझ दे देना एक बहुत ही गलत फैसला होगा। जिन लोगों को ऐसे दो सत्ता केंद्रों में दिक्कत लगती है, उनको ऐसे दो केंद्रों को परस्पर सहअस्तित्व के साथ रहना सिखाना चाहिए। 

जुलाहे की तरह लट्ठ लेकर टूटने के बजाय अपना काम करें...

संपादकीय
28 मार्च 2013

पिछले हफ्ते भर से मीडिया में संजय दत्त का मामला छाया हुआ है, और इस बात पर लोगों के बीच ल_ चल रहे थे कि राज्यपाल या राष्ट्रपति को संजय दत्त को माफ कर देना चाहिए, या नहीं। इस बीच संजय दत्त की तरफ से, या उनकी सांसद बहन की तरफ से एक बार भी ऐसा बयान नहीं आया था कि वे माफी मांग सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज, और प्रेस कौंसिल के मौजूदा अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने इस बहस को छेड़ा था कि संजय को माफी दे देनी चाहिए, और दिग्विजय सिंह ने आगे बढ़ाया था। हमारे पाठकों ने इस मुद्दे पर हमारा लिखा पढ़ा होगा कि हमने संजय दत्त को एक व्यक्ति के रूप में न मानते हुए, एक मुद्दे के रूप में माना था, और यह लिखा था कि जैसे किसी भी दूसरे कैदी को जेल के भीतर या जेल के बाहर अपनी हुनर का काम करने की छूट मिलती है, वैसा ही संजय दत्त के साथ होना चाहिए, और फिल्मों की कमाई जेल के खजाने में जानी चाहिए। हमने उनके लिए किसी भी तरह की रियायत का विरोध किया था और उनकी क्षमता का, बाकी कामकाजी कैदियों की तरह भी इस्तेमाल करने की सलाह दी थी। अब आज सुबह संजय दत्त ने खुद यह कहकर इस बहस को फिलहाल तो खत्म कर दिया है कि वे सजा से रहम की अपील नहीं कर रहे, और अपने आपको आगे की कैद के लिए पेश करने जा रहे हैं।  
भारत में मुद्दों को छोड़कर, व्यक्तियों पर केन्द्रित बहस मीडिया में इन दिनों इसलिए बढ़ती चल रही है, क्योंकि मुद्दों पर बात कुछ जटिल और मुश्किल होती है, व्यक्तियों और घटनाओं पर बात आसान होती है, उसमें अधिक अकल की जरूरत नहीं पड़ती। देश की जनता का कितना वक्त ऐसी बहसों और बातों में खराब होता है, और बिल्कुल निठल्ले बैठे नेताओं और दूसरे बहसबाजों को मीडिया में आने का मौका मिलता है। और फिर ऐसी सतही बहसों में टीवी के दर्शक बढ़ते हैं, तो वहां पर बाजार को भी इश्तहार देना ठीक लगता है, फायदे का लगता है। प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष जस्टिस काटजू जिन गैरजरूरी मुद्दों में उलझ रहे हैं, उनकी बजाय उनको मीडिया से जुड़े हुए ऐसे मुद्दों को उठाना चाहिए, और उस पर गंभीर बातचीत का एक सिलसिला शुरू करना चाहिए। लेकिन कभी वे पाकिस्तान के अदालती फैसलों पर टूट पड़ते हैं, तो कभी वे मीडिया से बिल्कुल परे के मुद्दों पर चले जाते हैं। किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति के पास जब अपने दायरे का काम करने के लिए ही दिन में चौबीस घंटे कम पडऩे की नौबत हो, तब फिर वे इस तरह जुलाहों की ल_ की तरह का काम न करें। 
जनता के बीच के संगठनों को भी मीडिया पर बात करने का काम करना चाहिए, क्योंकि अब यह कारोबार बहुत बड़े खर्च का होने के नाते, एक बड़े कारोबार का चरित्र पा चुका है, और इसमें से पत्रकारिता या अखबारनवीसी खत्म सी हो गई है। आने वाले दिन और अधिक जलती-सुलगती राजनीति के होंगे, और ऐसे माहौल में बकबकिया नेताओं पर लार टपकाने वाले मीडिया को लेकर अगर जनता नहीं जागेगी, तो बाजार के इश्तहार उसे सामानों के सपनों में सुलाने का पूरा इंतजाम आज भी कर ही रहे हैं। हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी की दिक्कतों पर इस देश की मीडिया का ध्यान उसी वक्त जाता है, जब उसके साथ बलात्कार हो जाता है, या उसकी हत्या हो जाती है, या फिर किसी चटपटी सुर्खी बनाने के लायक कोई और वारदात हो जाती है। इन दिनों तो जब तक ऐसा कोई सनसनीखेज और दिल दहलाने वाला वीडियो फुटेज न हो, तब तक तो ऐसी घटनाएं भी खबर नहीं बन पातीं। 
प्रेस कौंसिल को चाहिए कि मीडिया पर अपना ध्यान रखे, और यहां पर अनसुलझे मुद्दे इतने हैं, कि उन्हीं पर इस कौंसिल को ओवरटाइम करना चाहिए।

छोटी सी बात


28 मार्च
ईश्वर बहरा नहीं हो गया है
भारत में नियम-कानून कड़ाई से लागू नहीं होते, इसलिए लोग अपने घर पर पूजा-पाठ से लेकर शादी-ब्याह तक पूरी हैवानियत के साथ शोर करने वाले लाउडस्पीकर लगाते हैं, और आसपास के लोगों की जिंदगी घंटों से लेकर दिनों तक खराब करते हैं। ऐसा करने के पहले इतना जरूर सोच लें, कि आपके अपने बूढ़े और बीमार मां-बाप अगर ऐसे और इतने शोर को बर्दाश्त न कर पाने की हालत में हों, तो पड़ोस का ऐसा शोर आपको कैसा लगेगा? और जिन बच्चों की पढ़ाई ऐसे गैरजरूरी शोर से तबाह होती है, उनकी जगह अपने बच्चों को रखकर देखें, और फिर अखबारों में उन खबरों को देखें कि इम्तिहान में फेल होने पर बच्चे किस तरह जान दे देते हैं। 
यह भी सोचें कि रात भर जिनकी नींद खराब हो रही है, उनकी जगह अगर आप होते, तो शोर करने वालों को कौन-कौन सी गालियां देते, और फिर जहां तक आपके लाउडस्पीकर की आवाज जाती है, वहां तक की आबादी की गिनती से इन गालियों को गुणा करके देखें, और फिर समझें कि आपको क्या मिल रहा है। 
समझदार के लिए कबीर की कही हुई यही बात बहुत है कि ईश्वर बहरा नहीं हो गया है जो कि उसे सुनाने के लिए इतनी जोर की आवाज की जाए। कबीर की एक और बात याद रखनी चाहिए कि बद्दुआ किसी मरे हुए जानवर की भी नहीं लेनी चाहिए, जिसके चमड़े से बनी हुई धौंकनी से चलती भट्टी में लोहा भी पिघल जाता है। 
अपने आसपास के इतने अधिक लोगों की बद्दुआ का आप पर असर होना तय है, आपके शोर का ईश्वर पर असर हो या न हो, इसमें शक है। 
- सुनील कुमार

छोटी सी बात



26 मार्च
होली तो है लेकिन...
हिन्दुस्तान में बहुत से त्यौहारों के मौकों पर नशा करने का चलन है, और इसके बाद लोग कई बार एक-दूसरे से बहुत किस्म की बदसलूकी भी कर बैठते हैं। जो पीने वाले हैं उनको तो यह लगता है कि नशे में कही हुई बात आई-गई हो जाती है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। लोगों के मन में चुभी हुई बात कई बार तो पूरी जिंदगी नहीं निकल पाती। और रिश्ते कभी पहले जैसे नहीं हो पाते। इसलिए अपने नशे को बंद कमरे तक अगर रख सकें तो ही वह आपके लिए कम नुकसानदेह है, और अगर वह दूसरों के सामने सिर चढ़कर बोलता है, तो फिर वह आपके लिए सेहत से परे भी नुकसानदेह रहता है।
आज हिन्दुस्तान में बड़े-बड़े ताकतवर लोग, अरबों की दौलत के बावजूद जेल जाते दिखते हैं, क्योंकि उनसे कोई जुर्म हो गया, या कोई चूक हो गई। कानून की नजर में गलत काम और गलती दोनों के लिए बड़ी-छोटी सजा है। नशे की हालत में इनमें से कुछ भी अगर आपसे होता है, तो न सिर्फ आपकी जिंदगी जेल में कट सकती है, बल्कि पूरा परिवार तबाह हो सकता है। इसलिए नशे से बचने में ही समझदारी है। अपने पैसे, अपनी सेहत, और आसपास के माहौल का खराब करते हुए जेल जाने जैसे किसी हादसे से बचकर चलना ही ठीक है।
- सुनील कुमार


रंगे हुए चेहरों से निराशावादी कैसे मजहब पहचानेंगे?


26 मार्च 2013
संपादकीय
होली के मौके पर देश के कुछ प्रमुख लोगों में इंटरनेट पर ऐसी सोच लिखना शुरू किया कि एक वक्त भारत में हिंदू-मुस्लिम सब मिलकर ईद भी मनाते थे और होली भी मनाते थे, लेकिन अब मानो माहौल ऐसा नहीं रह गया। जिन लोगों ने ऐसा लिखा वे वैसे तो जानकार लोग हैं, और उनसे ऐसी नासमझी की उम्मीद थी नहीं, क्योंकि हिंदुस्तान की हकीकत यह है कि पिछले दशकों में धीरे-धीरे करके साम्प्रदायिकता घटी है, धार्मिक हिंसा घटी है, और ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि अब लोग पहले के मुकाबले कम मिल-जुलकर त्यौहार मनाते हैं। आज भी भारत में किसी भी धर्म के त्यौहार में लोग मिले-जुले दिखते हैं, और आंकड़े इस बात के सुबूत हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा में इस देश में मरने वाले घटे हैं, दंगे घटे हैं, कफ्र्यू घटे हैं।
लेकिन एक दिक्कत यह है कि जब कुछ चर्चित लोग किसी गैरजिम्मेदारी या नासमझी से एक नाजुक मामले पर ऐसे बयान देने लगते हैं, तो उससे एक बहुत गलत तस्वीर बनने लगती है। यह देश आजादी के वक्त के विभाजन के दौर में खासी हिंसा झेल चुका है। उसके बाद भी दशकों तक इसने बहुत दंगे देखे, और धर्मांधता की नफरत को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। आज इस बात के पूरे खुलासे में जाने का मौका तो नहीं है, लेकिन इतनी बात छेडऩा जरूरी है कि हिंदुस्तान में दंगों के शिकार वे ही शहर अधिक हुए जहां पर हाथ से काम करने वाले हुनरमंद लोग बाजार की नई मशीनों के मुकाबले जिंदा थे। साम्प्रदायिक दंगों ने उन सबको तबाह कर दिया और वे दंगे साम्प्रदायिक नफरत से उपजे थे, या बाजार की साजिश थे, यह एक अलग मुद्दा है। लेकिन आज की बात तो यह है कि आज हिंदुस्तान साम्प्रदायिकता से बहुत हद तक उबर चुका है।
कल ही हमने इस अखबार में ऐसी तस्वीरें छापी थीं, जिनमें मुस्लिम फेरीवाले औरत-मर्द और बच्चे सड़क किनारे फुटपाथ पर रंग और बिगुल बिखेरे अपना कारोबार भी कर रहे थे और हिंदुओं के त्यौहार को रंगीन भी कर रहे थे। बिना हिंदू और मुस्लिम के एक-दूसरे के कोई तीर्थ स्थान पूरे नहीं हैं, कोई शादियां पूरी नहीं हैं, कोई त्यौहार पूरे नहीं हैं। और यही हाल बाकी धर्मों के लोगों के साथ भी एक-दूसरे का है। इसलिए एक नाजायज निराशा की तस्वीर पेश करना बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी है। जस्टिस मार्कण्डेय काटजू से लेकर एक वक्त के नामी पत्रकार रहे प्रीतिश नंदी तक ने आज यह गलत काम किया है। आज जब हिंदुस्तान की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए रोजी-रोटी अधिक जरूरी है, और मंदिर-मजिस्द के झगड़े लोगों को गैरजरूरी लग रहे हैं, तब धर्मांधता को, साम्प्रदायिकता को भारत की आज की हकीकत के रूप में पेश करना, कल से अधिक बड़ी हकीकत के रूप में पेश करना गलत है। दूसरी तरफ आज नई पीढ़ी मोबाइल और मोबाईक को अधिक महत्वपूर्ण मानती है, और ऐसे में होली के रंगों के बीच निराशा बिखेरना गलत है।
बात सिर्फ होली या ईद की नहीं है। जैसे-जैसे भारत में शहरीकरण बढ़ा है, औद्योगिकीकरण बढ़ा है, पढऩे-लिखने के लिए बच्चे दूर-दूर तक जाने लगे हैं, दूसरी जातियों में शादियां बढऩे लगी हैं, और लोगों के लिए आर्थिक विकास, आधुनिक भौतिक सुविधाएं अधिक मायने रखने लगी हैं, लोग साम्प्रदायिकता से दूर जाने लगे हैं, जा चुके हैं। एक तबका तो पूरी दुनिया में ही इस तरह का हमेशा मिलते रहेगा जो कि नफरत पर जिंदा रहेगा। उसकी छुरियों और उसके बमों को मिसाल गिनाकर समाज की एक व्यापक तस्वीर पेश नहीं की जा सकती। ऐसे तबके खबरों में अधिक रहते हैं, लेकिन गिनती में कम। ब्रिटेन और अमरीका जैसे मिली-जुली आबादी वाले विकसित देशों में भी नफरत की आजादी वाले ऐसे छोटे तबके हैं, और वहां वे खबरों में रहते हैं। लेकिन भारत में वह नौबत भी कम ही आ रही है। लोग आतंक के हमलों के पीछे भी मजहब को देखने के बजाय यह देख रहे हैं, कि कौन सी ताकतें भारत के अमनचैन को खत्म करने में लगी हैं। और इसे देखते हुए लोग इन हमलों के पीछे धर्म नहीं देख रहे, आतंक देख रहे हैं। ऐसी बातें पता नहीं जस्टिस काटजू या नंदी जैसे लोगों को क्यों नहीं दिख रही हैं, कि इतने उकसावे और भड़कावे के बावजूद हिंदुस्तान का ताना-बाना आज पहले से अधिक मजबूत बना हुआ है। दो बिरादरियों के बीच आज लहू पहले के मुकाबले बहुत कम बहता है। आने वाले दिनों में हम यह उम्मीद करते हैं कि जिंदगी के असल मुद्दे मंदिर-मस्जिद को इसी तरह हाशिए पर धकेलकर हिंदुस्तान में मायने रखेंगे। पिछले कुछ चुनाव ऐसे गुजर गए हैं जब धर्म की राजनीति करने वालों को भी गैरधार्मिक और गैरसाम्प्रदायिक मुद्दों को ही ऊपर रखना पड़ा है। यह इस देश में, खासकर इसकी जनता में, खासकर सत्ता से दूर के तबकों में, बढ़ती हुई समझदारी का एक सुबूत है, और हम इस समझदारी के बढ़ते चलने की उम्मीद करते हैं।
होली का यह मौका धार्मिक न होकर सामाजिक और सांस्कृतिक अधिक हो गया है, और रंगे हुए चेहरों को देखकर काटजू-नंदी जैसे अनजान निराशावादी भी यह नहीं बता पाएंगे कि कौन किस मजहब का है।

छोटी सी बात

25 मार्च
ज्ञान की विरासत
जिस मौसम में जो फूल खिलते हैं, या फल बाजार में आते हैं, या जो मौसमी सब्जियां दिखती हैं, उनको लेकर खुद भी जानकारी पाना चाहिए, और अपने आस-पास के बच्चों-बड़ों को बताना भी चाहिए। जरा से तलाशें तो पता लगेगा कि कौन सा फूल किस देश से आया, उसका चिकित्सा में क्या इस्तेमाल है, उसका जिक्र किस पौराणिक कथा में है, और उसकी क्या-क्या खूबियां हैं। ऐसी जानकारी की आदत अगर डाल लें, तो आपके आस-पास का पूरा दायरा उससे फायदा भी पाता है और धीरे-धीरे दूसरे लोग भी कुछ दूसरी जानकारी लाकर आपके साथ बांटते हैं। इसीलिए कहा गया है कि ज्ञान को जितना बांटें, वह उतना ही बढ़ता है। यह बात आपके ज्ञान पर आपको मिलने वाले किसी ब्याज से नहीं बनी है, बल्कि इसलिए बनी है कि ज्ञान की आदत जब आपके आस-पास के लोगों को पड़ती है, तो वे अपना जुटाया ज्ञान भी आपके साथ बांटते हैं। 
अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में आप जो कुछ अच्छी चीजें देकर जा सकते हैं, उनमें ज्ञान की आदत एक महत्वपूर्ण बात हो सकती है, जिसे कि आने वाली कोई भी मंदी छीनकर नहीं ले जा सकेगी। 
- सुनील कुमार

बाजार की अश्लील हिंसा झेलता हुआ हिंदुस्तान

25 मार्च 2013
संपादकीय
भारत में कारोबार कर रही एक कार कंपनी फोर्ड के कुछ ताजा पोस्टर सेक्स और हिंसा के भयानक बाजारू इस्तेमाल की एक मिसाल हैं। इनमें कार के पीछे सामान रखने के हिस्से का बड़ा आकार जताने के लिए ऐसी तस्वीरें बनाई गई हैं जिनमें कार की ड्रायविंग सीट पर अपनी बदचलनी के लिए बदनाम इटली के एक पिछले प्रधानमंत्री की तस्वीर बनी हुई है, और पीछे सामान की जगह हाथ-पैर और मुंह बांधकर डाल दी गई तीन सुंदरियों की तस्वीर बनाई गई है, मानो उन्हें अपहरण करके ले जाया जा रहा हो। और मजा यह है कि इटली की इस फोर्ड कंपनी ने भारत में बनाए गए इस विज्ञापन अभियान से अपने-आपको अलग कर लिया है। 
योरप के जिस देश इटली में कमउम्र की वेश्याओं के साथ खुले रंगरेली मनाने वाले प्रधानमंत्री को भी उस देश ने बर्दाश्त किया था, उस देश की कंपनी भी भारत में बने इन पोस्टरों को बर्दाश्त नहीं कर पाई। इस मुद्दे पर शायद आज हम नहीं लिखते, लेकिन आज ही एक दूसरी खबर ऐसी ही ओछी और ऐसी ही खराब यह है कि लंदन में एक नाईट क्लब ने यह सार्वजनिक घोषणा की है कि वह एक राष्ट्रीय सीना प्रदर्शन सप्ताहांत आयोजित कर रहा है जिसमें खुले गले के कपड़ों वाली महिलाओं को मुफ्त में दाखिला मिलेगा। जिस पश्चिम को भारत के लोग बहुत अश्लील समझते हैं वहां भी कुछ सांसदों ने इसका विरोध किया है, और इसे  बेहूदा करार देते हुए कहा है कि यह सब महिलाओं को नीचा दिखाने वाला कृत्य है। एक तरफ जहां महिलाओं के सम्मान की बात हो रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसे ऑफर के जरिए कुछ लोग प्रचार पाने के लिए निहायत नीचता और फूहड़पन पर उतर आए हैं।
इन दो बातों का भारत में आज महत्व यह है कि यहां पर अदालत से लेकर सेंसरबोर्ड तक यह चर्चा छिड़ रही है कि फिल्मों में अश्लील से अश्लीलतर, और अश्लीलतम होते चले जा रहे आईटम साँग का क्या किया जाए? ऐसे नाच-गाने लोगों को उत्तेजना देते हैं, लेकिन इस उत्तेजना को वयस्कों तक सीमित रखने का कोई चारा भारत के कानून में नहीं दिख रहा है। और ऐसी उत्तेजना कला की किसी जरूरत के चलते हो, किसी विषय को या मुद्दे को दिखाने के लिए हो, तो भी कोई बात है। यह पूरा का पूरा बाजार का एक अंदाज है जो शो-केस में लड़कियों के पुतले खड़े करके सामान बेचते हुए, उन पुतलों पर से कपड़े घटाते चल रहा है। 
बाजार की ऐसी हिंसक साजिश के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। लेकिन इस देश में आवाज अगर आज उठती है तो वह किसी गंभीर कलाकार की बनाई हुई तस्वीर में बिना कपड़ों के बदन के खिलाफ उठती है, यह अनदेखा करते हुए कि हिंदुस्तान का इतिहास किसी भी विदेशी धर्म के यहां आने के पहले से मंदिरों तक में नग्न प्रतिमाओं का रहा है। देवी-देवताओं, हिंदू देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाएं देश भर के मंदिरों में भीतर और बाहर सजी हुई हैं। खजुराहो जैसे मंदिर सेक्स के तरीकों के कैटलॉग की तरह के हैं। लेकिन मकबूल फिदा हुसैन को इस देश के बाहर खदेडऩे में जुटे हुए लोगों को बाजार की हिंसक साजिशें नहीं दिखतीं, क्योंकि वे लोग धर्मांधता और साम्प्रदायिकता की गुंजाइश के बिना जहां हिंसक सेक्स भी हो, उससे बेपरवाह हैं। हिंदू संस्कृति के ऐसे ठेकेदारों को हिंसक सेक्स बुरा नहीं लगता, लेकिन किसी मुस्लिम या ईसाई का नाम अगर जुड़ा हुआ हो, तो फिर उनकी लाठियां निकल पड़ती हैं।
ऐसा देश सेक्स और वयस्क मनोरंजन के लिए किसी सेहतमंद और अच्छे अंदाज वाले कलाकारों के लिए नहीं है। यह देश हिंसक और बाजारू, कारोबारी कल्पनाशीलता के लिए खुला हुआ है। जो लोग ऐसी फोर्ड कार को लेने का सोचें, या इस किस्म के सेक्स-सहारे बिकते दूसरे सामान लेने का सोचें, वे यह भी सोचें कि इनमें बैठा हुआ उनका परिवार कैसा लगेगा? यह देश साम्प्रदायिक हिंसा से लेकर बाजार की हिंसा तक झेल रहा है, और इस पर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। 

यही संगत के आज के नए पैमाने हैं

25 मार्च 2013
इन दिनों दुनिया के शहरी इलाकों में, और कस्बों तक टीवी की खबरों के अलावा टीवी पर होने वाली बहस भी खासी देखी जाती है। और अगर भारत की बात करें, तो तकरीबन रोज कोई न कोई ऐसा मुद्दा खड़ा हो रहा है जिसके चलते समाचार चैनलों को हर शाम से रात तक अपने स्टूडियो में खासी गरमी खड़ी करने का मौका मिलता है। ऐसी बहसों से लेकर अखबारों में लिए जाने वाले साक्षात्कार तक, और मीडिया की ब्रीफिंग या पे्रस कांफे्रंस में सवाल-जवाब तक कुछ बातें साफ दिखती हैं, और एक खामी जाहिर करती हैं।
यह हाल सिर्फ मीडिया का नहीं है, किसी भी पेशे का है, जहां कि समझ कम होने पर लोग एक अधूरी तस्वीर पेश कर पाते हैं, और साधारण समझ वाले लोग उसे पूरी तस्वीर समझ लेते हैं। कमसमझ वाला कोई डॉक्टर किसी एक जांच के नतीजे को मर्ज तय करने की पूरी बुनियाद मान सकते हैं, और उसी बुनियाद पर पूरा इलाज खड़ा कर सकते हैं। इसी तरह कम समझ वाले मीडिया के लोग, या मीडिया के कमसमझ लोग जब किसी से बात करते हुए बहुत से जरूरी और मायने रखने वाले सवाल नहीं करते हैं, तो सुनने वाले वैसे सवालों की कल्पना नहीं कर पाते, और सामने आई तस्वीर को एक पूरी तस्वीर मान बैठते हैं। इसलिए टीवी पर, खासकर हिंदुस्तान के समाचार चैनलों पर, जो बहस होती है, वह उसी स्तर तक पहुंच पाती है, जिस स्तर की समझ उस बहस को हांकने वाले टीवी प्रस्तुतकर्ता की होती है। 
इनमें से कई लोगों से ऐसे कार्यक्रमों के बाद जब मेरी बात होती है, तो मैं उनके न पूछे गए सवाल, न छुए गए पहलुओं, और न उठाए गए मुद्दों के बारे में पूछता हूं और उनके लिए कुछ दिक्कत भी खड़ी करता हूं। लेकिन यही हाल मेरे साथ काम करने वाले अखबारनवीसों का भी रहता है जब वे किसी प्रेस कांफे्रंस, या पे्रस ब्रीफिंग से उन सवालों को पूछे बिना लौट आते हैं जिनके जवाब दर्शक या पाठक जानना चाहते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ठकुरसुहाती या मुसाहिबी के दौर के चलते ताकतवर लोगों से दिक्कत वाले सवाल नहीं किए जाते, और वैसे माहौल में सवालिया अखबारनवीस कड़क हड्डी की तरह खटकते हैं। 
अखबारों में जब इंटरव्यू छपते हैं, तो मुझ जैसे लोग उनको पढऩे के पहले यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि इंटरव्यू लेने वाले कौन लोग हैं। इंटरव्यू देने वाले तो जाहिर है कि चर्चित और अहमियत वाले होंगे ही, इंटरव्यू लेने वाले की समझ अगर कम हो, और जैसा कि आमतौर पर होता ही है, तो फिर इंटरव्यू देने वाले इस पूरी बातचीत को अपनी मर्जी के बयान में तब्दील कर देते हैं, और लेने वाले बातचीत की लंबाई से खुश होकर सिर्फ श्रोता बन जाते हैं। जबकि श्रोता, दर्शक या पाठक बनने का हक श्रोता, दर्शक या पाठक का होता है, इंटरव्यू लेने वाले का नहीं। और जब कमसमझ लोग, कम तैयारी के साथ इंटरव्यू लेते हैं, तो समाज के लिए जरूरी जवाब सामने नहीं आ पाते, और बिना किसी घेरेबंदी के खुश लोग इंटरव्यू को एक भाषण की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं, अपने विचारों के प्रचार के लिए एक मौका पा जाते हैं।
आज चूंकि टीवी पर होती बहस लोगों की सोच पर बहुत दूर तक असर डालती है, इसलिए इसमें आ रही गिरावट और इसके अधूरेपन से एक फिक्र खड़ी होती है। अच्छे-खासे, नामी-गिरामी टीवी सितारे भी बिना तैयारी के उन घाघ लोगों के बीच रिंग मास्टर की तरह बैठ जाते हैं, जो पेशेवर हैं। अपनी बात को कहने, दिक्कतों के सवालों से बचने में वे माहिर होते हैं, और कमसमझ पत्रकार की उनकी हसरत अक्सर ही पूरी होती रहती है। कई बार टीवी पर शेरों के बीच बैठे रिंग मास्टर को देखकर यह भी लगता है कि ऐसे प्रस्तुतकर्ता आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि करोड़ों लोग उन्हें देख रहे होंगे। और जब यह गिनती ही एक उपलब्धि का एहसास कराती है, तो फिर अपने काम में सुधार और बेहतरी की जरूरत को कमसमझ अपने पास फटकने भी नहीं देती। 
अभी मैं टीवी की बहस की बाजारू जरूरतों पर चर्चा भी नहीं कर रहा, जिनके चलते टीवी-प्रस्तुतकर्ताओं को बहस को बेदिमाग हो जाने की हद तक पैना बनाए रखना पड़ता है। समझदारी की बात को काटकर, बखेड़े की बात को बढ़ाने की कोशिश इस मूर्ख इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मजबूरी बना दी गई है, इसलिए मैं उस  मजबूरी से परे-परे की बात ही कर रहा हूं।
पिछले हफ्ते भी शायद इसी से मिलते-जुलते एक मुद्दे पर लिखना हुआ था कि जस्टिस काटजू ने पत्रकारों के लिए अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता की जो बहस शुरू की है, उसमें होना क्या चाहिए। आज फिर इसी मिलते-जुलते मुद्दे पर लिखना इसलिए हो रहा है कि यह पूरा हफ्ता फिर से कई चैनलों पर ऐसी आधी-अधूरी बहस देखते हुए गुजरा जिसके पीछे या तो उस चैनल की अपनी कोई कारोबारी नीयत थी, या फिर प्रस्तुतकर्ता की कमसमझ थी। नतीजा यह हुआ कि लंबी-लंबी बहस देखने के बाद मेरे जैसे साधारण समझ वाले इंसान के मन में न पूछे गए सवालों की लंबी फेहरिस्त बची रह गई। 
यहीं पर आकर लगता है कि लोगों को अच्छे और बुरे टीवी चैनल, अच्छे और बुरे अखबार, अच्छे और बुरे पत्रकार के बीच फर्क करना सीखना होगा, ताकि देखने और पढऩे में, सुनने में उनका वक्त जाया न हो। आज जब हर किसी के पास मीडिया के भीतर दर्जनों विकल्प मौजूद हैं, तो फिर उनमें से बेहतर को अगर नहीं छांटा गया, तो रोज का वक्त खासा खराब होगा। आज तो काम की बात सुनने का, देखने का ही वक्त नहीं है, तो फिर फिजूल की बात में वक्त कैसे और क्यों खराब किया जाए?
इंटरनेट पर कुछ ऐसी वेबसाईटें हैं जो बताती हैं कि इन दिनों कौन लोग क्या पढ़ रहे हैं, क्या देख रहे हैं। इनमें से भी अगर सही लोगों को आप नहीं देखते हैं, तो लापरवाह लोगों की लापरवाह पसंद से छांटे गए लिंक ही आप देखते रह जाएंगे। इसलिए अपनी पसंद को लेकर बहुत सावधान रहने की जरूरत है। आप क्या देखते हैं, और क्या पढ़ते हैं, उससे भी यह तय होता है कि आप क्या बनते हैं। इसलिए जिस तरह एक वक्त कहा जाता था कि इंसान अपनी संगत से पहचाने जाते हैं, उसी तरह आज लोग इस बात से पहचाने जाते हैं कि वे कौन से अखबार पढ़ते हैं, उनकी बातचीत में कौन से लेखक चर्चा में आते हैं, वे टीवी के सामने बैठकर किस चैनल पर क्या देखते हैं, यही संगत के आज के नए पैमाने हैं।

छोटी सी बात

24 मार्च 13
हासिल को छोड़ हसरत के पीछे
किसी और की लिखी हुई बात को जो लोग अपने नाम से आगे बढ़ाते हैं, उनकी चोरी पकड़ाना इन दिनों आसान हो गया है। इंटरनेट पर ऐसी बात डाली जाए या कहीं छपने के लिए दी जाए, कुछ लोग ऐसी बातों के चुनिंदा शब्द लेकर इंटरनेट पर उसकी असल ढूंढ सकते हैं। और चोरी करने वालों के नाम की मिट्टी पलीद हो सकती है। इसलिए कोशिश करें कि आपको अच्छी लगी हुई बात, उसके लिखने वालों या कहने वालों के नाम के साथ  ही आप आगे बढ़ाएं। जब आप ऐसी किसी बात को फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट करते हैं तो यह माना जाता है कि यह आपकी ही कही हुई बात है, इसलिए वहां पर या तो उसे अज्ञात नाम के साथ डालें, या नाम मालूम हो तो उसके साथ लिखें। 
आपको चाहे अच्छा लिखना न आता हो, अच्छी चीजों को छांटना भी आता है, तो भी आप एक पारखी तो माने ही जाते हैं। और पारखी हुनरमंद हों, या न हों, पारखी के रूप में उनकी इज्जत होती ही हैं। इसलिए आप जिस इज्जत के हकदार हैं, उसे छोड़कर उस इज्जत के पीछे न भागें, जिसके कि आप हकदार नहीं हैं। ऐसी ही बात के लिए किसी समय मैंने लिखा था कि लोग हासिल को छोड़, हसरत के पीछे भागते हैं।
सुनील कुमार 

मुशर्रफ की वापिसी और, भारत में सोचने की जरूरत

24 मार्च 2013
संपादकीय
पांच बरस बाद पाकिस्तान के फौजी तानाशाह रहे जनरल मुशर्रफ देश लौटे। उनके ये दावे अभी कसौटी पर चढऩे बाकी हैं कि वे ही पाकिस्तान का भला कर सकते हैं, लेकिन यह बात अपनी जगह ठीक है कि आज पाकिस्तान न सिर्फ कट्टरपंथ, आतंकी हिंसा, बदअमनी और भ्रष्टाचार के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें वहां के लोग मौजूदा मुखिया आसिफ अली जरदारी के बजाय दूसरे कई विकल्पों की तरफ देख रहे हैं। भारत के लिए जनरल मुशर्रफ की घरवापिसी के तुरंत कोई मायने चाहे न निकल रहे हों, लेकिन भारत की विदेश नीति में, भारत की फौजी तैयारियों में यह हाल के बरसों की शायद एक सबसे बड़ी घटना है, और इस पर दिल्ली में आज बारीकी से नजर रखी जा रही होगी।
लेकिन हम यहां आज मुशर्रफ के आने से पाकिस्तान में पडऩे वाले फर्क पर अधिक सोचना या बात करना नहीं चाहते, यह जरूर चर्चा करना चाहते हैं कि सत्ता पर काबिज किसी ताकत के पूरी तरह नाकामयाब और गैर भरोसेमंद साबित हो जाने पर लोग किस तरह दूसरे रास्तों की तरफ देखने लगते हैं। पाकिस्तान में वैसे तो लोकतंत्र उस देश के बनने के बाद से अब तक जड़ें जमा नहीं पाया, लेकिन इसका मौका कई पार्टियों को, और कई नेताओं को कुछ बार तो मिला ही। उनकी नाकामयाबी के बाद ही फौजी तानाशाही वहां सत्ता पर आ सकी, और मानो इस फौजी तानाशाही को भी शिकस्त देते हुए वहां की कुछ खुफिया ताकतें इस तानाशाही को भी शिकस्त देने में कामयाब बताई जाती हैं। भारत को इस पूरे मामले में यह सोचना चाहिए कि लोकतंत्र की असफलता किस तरह भारी पड़ती है। दिल्ली आज अगर यह सोचकर एक खराब सरकार चला रही है कि वह अपनी मनमानी कर सकती है, और हिंदुस्तान में फौजी बगावत का कोई खतरा नहीं है, तो दिल्ली की हुकूमत को यह देखना चाहिए कि पाकिस्तान में किस तरह धर्मांधता, कट्टरपंथ, खुफिया ताकतों, और अदालतों की अलग-अलग ताकतों ने चुनी हुई सरकारों को हटाने का, गिराने का काम किया है। भारत में आज सरकार ने, यूपीए सरकार ने अपने गलत कामों से देश में एक ऐसा माहौल बनाया है कि लोगों को मोदी एक विकल्प लगने लगा है, लोगों को सत्ता में अदालती दखल न सिर्फ जायज लगने लगी है, बल्कि जरूरी भी लगने लगी है। अन्ना-बाबा और केजरीवाल जैसे अलोकतांत्रिक और अराजक लोग भी जनता को भले लगने लगे हैं। और न सिर्फ दिल्ली की सत्ता, बल्कि राज्यों में बिखरी देश भर की निर्वाचित सरकारों, उन्हें हांक रहे नेताओं और अफसरों की विश्वसनीयता भी जनता में खत्म सी हो चुकी है।
पाकिस्तान से भारत की कोई तुलना नहीं की जा सकती, ऐसा मानने वाले बहुत से लोग हैं, अधिकतर लोगों को पाकिस्तान के साथ भारत की इस तरह की चर्चा भी तर्कहीन लगेगी। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इन दोनों हालातों के बीच, सरहद के दोनों तरफ जो एक बात एक सी है, वह है लोकतंत्र की नाकामयाबी की, जनता का भरोसा उठ जाने की। इन्हीं दो बातों के चलते सरहद के दोनों तरफ अदालतों को सरकार के काम के बीच पहले के किसी भी वक्त के मुकाबले अधिक दखल देने की नौबत आ चुकी है। भारत में आज केंद्र और राज्य सरकारों के खिलाफ, यूपीए से लेकर मोदी तक की सरकारों के खिलाफ कितने ही किस्म की जांच आज सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में करवा रहा है। और यह नौबत निर्वाचित सरकारों के लिए, लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। यह कुछ उसी तरह की बात है कि किसी घर में बहू के रसोईघर जाने पर सास को खड़े रहकर निगरानी रखनी पड़े कि वह कुछ निकालकर खा न ले।
पाकिस्तान से भारत किन-किन मायनों में अलग है, यह एक अलग बात है। लोकतंत्र को परास्त करने में इन दोनों ही देशों में सत्ता पर काबिज लोग, उनके कुनबे किस तरह की गुंडागर्दी कर रहे हैं, यह देखें, तो फिर सरहद के दोनों तरफ मिलती-जुलती कितनी ही बातें दिखती हैं। इन बातों को देखकर सबक लेने की जरूरत है। 

बलात्कार के बाद, पुलिसिया बलात्कार

संपादकीय
23 मार्च 2013
उत्तरप्रदेश तकरीबन रोज ही वहां की समाजवादी पार्टी की सरकार को शर्मिंदगी दिलाता है। कहने को वहां पर एक पढ़ा-लिखा और नौजवान, दूसरी पीढ़ी का वारिस मुख्यमंत्री है, लेकिन वहां का हाल बदहाल है। दलितों के खिलाफ, महिलाओं के खिलाफ जितने किस्म के जुल्म और जुर्म वहां पर हो रहे हैं, उनको लेकर इसी पार्टी की छह बरस पहले की एक सरकार के प्रचार में अमिताभ बच्चन का वह इश्तहार आज कार्टून की तरह लगता है कि यूपी में दम है, क्योंकि जुर्म यहां कम है। 
अब अमिताभ बच्चन यहां आकर देखें, और उस दलित महिला से बात करके देखें जिसके साथ एक गैरदलित ने बलात्कार किया, और जब वह पुलिस में रिपोर्ट लिखाने पहुंची तो वहां के बड़े अफसर ने उससे उसकी उम्र पूछी, बच्चों की उम्र पूछी, और फिर टीवी कैमरों के सामने ही पुलिस की भीड़ के बीच कहा- इतनी पुरानी औरत से कौन रेप करेगा? अब उत्तरप्रदेश के अफसर इस बात पर माफी मांग रहे हैं, और इस अफसर से इस बयान पर जवाब मांगा गया है, लेकिन यह सब तो सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि वहां पर वीडियो कैमरे मौजूद थे और यह गंदा और ओछा बयान, यह हिंसक नजरिया, और यह जुबानी जुर्म टीवी पर छा गया, तो सरकार के पास शर्म से डूबकर माफी मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा। लेकिन देशभर के थानों में कोई ऐसे कैमरे तो तैनात रहते नहीं कि उनकी नजर पुलिस की ऐसी हिंसा पर लगातार टिकी रहे। 
लेकिन आज की इस बात में हम पुलिस के साथ-साथ मीडिया के रूख को भी लपेटना चाह रहे हैं। कल से दिख रही इस खबर को आज जब इंटरनेट पर बहुत से अखबारों और बहुत से टीवी चैनलों की वेबसाइटों पर देखा गया, एजेंसी की वेबसाइटों पर देखा गया, तो बहुत सी ऐसी जगहें थीं जहां पर इस खबर से इस महिला के दलित होने की बात हटा दी गई थी। और यह पहला ऐसा मौका नहीं है। इसके पहले भी दर्जन भर बार ऐसी नौबत झेल चुके हैं जब बहुत से प्रमुख समाचार स्रोत किसी महिला के या हिंसा के शिकार किसी इंसान के दलित होने की बात को गायब कर देते हैं। और हमारा यह भी मानना है कि ऐसा गलती से नहीं होता है, एक गलत नीयत से ऐसा होता है। दलितों के बीच यह बात चर्चा में रहती है कि भारत के मीडिया ने मालिकों से लेकर पत्रकारों तक, दलितों और आदिवासियों का अकाल है। इन तबकों में अल्पसंख्यकों की भी गिनती कम है, लेकिन फिर भी है। दूसरी तरफ जिन लोगों के फैसले से मीडिया में समाचार और विचार तय होते हैं, उनमें सवर्णों, ऊंची कमाई वाले तबकों, ऊंचे कारोबार वाले लोगों, शहरी और शिक्षित लोगों का बोलबाला है। और तो और, इस पढ़े-लिखे पेशे में भी, इस देश में बहुत पढ़ी-लिखी महिलाओं की जगह बहुत ऊंची कुर्सियों पर बहुत कम है। अगर देखें कि कितने अखबारों या कितने टीवी चैनलों में कोई महिला संपादक है, तो याद भी नहीं पड़ेगा, मिसाल के लिए भी एक नाम नहीं सूझेगा। इसी तरह पत्रकारों के बीच दलित-आदिवासी नाम गिनती के भी मुश्किल से सुनाई पड़ेंगे। 
यह नौबत पुलिस में भी है, लेकिन पुलिस में आरक्षण होने की वजह से दलित और आदिवासी आ रहे हैं। लेकिन गैरआरक्षित तबकों में ऊंची जातियों का बोलबाला है, और वह ब्राम्हणवादी सोच पुलिस के बर्ताव में जगह-जगह दिखती है। देशभर के पुलिस थानों में बिना किसी परवाह के हनुमान मंदिर बना दिए जाते हैं, थानों के भीतर दीवारों और मेज पर हिन्दू देवी-देवताओं का कब्जा है, और यह बात दलितों के खिलाफ एक सवर्ण सोच की तरह सामने आती हैं, दलित महिला पर हमला करती है, बलात्कार के बाद उससे दुबारा बलात्कार करती है। इस देश में पुलिस और मीडिया इन दोनों को जाति को लेकर, गरीबी को लेकर, महिलाओं को लेकर, और अल्पसंख्यकों को लेकर, संवेदनशीलता सिखाने की जरूरत है। उत्तरप्रदेश में जिस पुलिस अफसर ने ऐसा हिंसक बयान दिया है, उसे कम से कम कई बरस की कैद होनी चाहिए। अगर आज के कानून में यह इंतजाम नहीं है, तो यह इंतजाम किया जाना चाहिए। जब पुलिस अपनी नजरों से, अपने बर्ताव से, अपनी जुबान से, और अपनी भाषा से बलात्कार की शिकार महिला पर और बलात्कार करेगी, तो कोई महिला किस हौसले से शिकायत करने थाने जाएगी? इस मामले में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री को सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए और ऐसे हिंसक अफसर को तुरंत बर्खास्त करना चाहिए। 

संजय दत्त को माफी देने की जस्टिस काटजू की बात पर

विशेष संपादकीय
22 मार्च 2013
-सुनील कुमार
सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज मार्कण्डेय काटजू बिना खबरों में आए कोई हफ्ता नहीं गुजार पाते। और ऐसा भी नहीं कि वे खबरों में आने के लिए ऐसा करते हैं। वे जो करते हैं, उसके पीछे की वजह अहमियत की होती है। उनकी ताजा बात है फिल्म अभिनेता संजय दत्त को माफी देने की अपील। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को जो सजा दी है, उसमें उसे अभी साढ़े तीन बरस जेल में और गुजारने होंगे। ऐसे मामलों में राज्यपाल द्वारा माफी की एक पुरानी मिसाल गिनाते हुए जस्टिस काटजू ने कहा है कि संजय दत्त किसी अपराध को करने में शामिल नहीं था, उसने खासी सजा भुगत ली है, और अब उसे माफ कर देना चाहिए। ऐसा ही खयाल आज सुबह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जाहिर किया है, और हमें अधिक हैरानी नहीं होगी कि आज का सूरज ढलने तक कुछ दूसरे राजनीतिक दल, या कुछ दूसरे संगठन, कुछ महत्वपूर्ण लोग संजय दत्त की हिमायत में ऐसी बात कहें। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी उस महाराष्ट्र में सत्ता का हिस्सा है जहां के राज्यपाल को इस तरह की किसी माफी का हक है। 
हम संजय दत्त के लिए अलग से किसी रियायत के हिमायती नहीं हैं, लेकिन सजा के पीछे की सोच, और सजा के असर पर इस मामले से परे भी कुछ विचार करने की जरूरत है। संजय दत्त ने मुंबई धमाकों के जिम्मेदार माफिया लोगों से एके-47 जैसा हमलावर हथियार लिया, और अपने पास रखा। उनका इससे अधिक और कोई जुर्म नहीं था। बीस बरस पहले के इस जुर्म के लिए वे कई बरस अदालत के चक्कर लगा चुके हैं, और कई बरस जेल में काट चुके हैं। इसके बाद के बरस उन्होंने बिना किसी जुर्म के गुजारे हैं, और फिल्म अभिनय के अपने पेशे का काम किया है। ऐसे में साढ़े तीन बरस के लिए उनको जेल भेजना, और बाकी की कैद देना एक जायज सजा है, जो कि उनकी जगह के किसी भी दूसरे इंसान को मिली होती। लेकिन यहां पर सजा के प्रावधानों में एक नए किस्म के लचीलेपन की बात हम सोच रहे हैं। 
क्या ऐसा कुछ हो सकता है कि कानून में फेरबदल करके ऐसा इंतजाम किया जाए कि गैरपेशेवर मुजरिमों की ऐसी कैद कुछ कट जाने के बाद, उनकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के लिए किया जा सके? मिसाल के तौर पर अगले जितने बरस संजय दत्त को कैद में काटने हैं, क्या उसकी जगह उनको अपने पेशे का काम करते रहने देने की रियायत दी जाए, और उसकी पूरी कमाई को समाज में इस्तेमाल किया जाए? और क्या ऐसी रियायत कम कमाई वाले, कम चर्चित, कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले दूसरे लोगों को भी दी जा सकती है? क्या इससे मुजरिम और सजा को एक अधिक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है? ऐसी कई बातें इस मामले को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद बातचीत के लायक हैं। जब कभी किसी कानून या व्यवस्था में किसी फेरबदल की बात होती है, तो वह ऐसी किसी एक घटना, या कुछ घटनाओं के बाद ही शुरू होती है। कुछ महीने पहले दिल्ली में निर्भया से हुए बलात्कार के बाद आज देश में एक नया कानून लागू हुआ है। उसी हादसे के बाद के माहौल से वह कानून बना, और अब लागू हुआ। इसलिए अगर संजय दत्त को लेकर एक नई चर्चा शुरू होती है, और कानून में एक ऐसा लचीलापन लाया जाता है, जिसका बेजा इस्तेमाल रोका जा सके, और जिससे समाज का कुछ फायदा हो सके, सजायाफ्ता की जिंदगी को खराब करने के बजाय उसका समाज के लिए कोई उत्पादक उपयोग हो सके, तो उसके बारे में सोचना चाहिए। 
हम इसी मामले को लेकर सोचते हैं, तो लगता है कि जिस तरह जेल के भीतर कैदियों से तरह-तरह के काम करवाए जाते हैं, या जैसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही जेल के कैदी बाहर खाने-पीने की दुकान चलाते हैं, पेट्रोल पंप चलाते हैं, कई शहरों में कैदी बैंड पार्टी बनाकर बाहर जाकर काम करते हैं, और उनकी कमाई जेल में जमा होती है, तो यह भी एक रास्ता निकल सकता है कि संजय दत्त को रोज जेल से बाहर जाकर उनके हुनर का काम करने दिया जाए, और उसकी कमाई को जेल में जमा किया जाए, और उन्हें उसमें से उतना ही हिस्सा मिले, जितना कि किसी कैदी को मिलता है। ऐसा आज देश में जगह-जगह आम कैदियों को जेल के बाहर जाकर काम करने मिल रहा है, ताकि जब वे सजा काटकर बाहर निकलें, तो भूखे न मरें, या बेरोजगार न हों। 
दुनिया के कई दूसरे देशों में भी सजा के कई किस्म के तरीके रहते हैं। भारत में भी अभी-अभी किसी जज ने किसी को गौशाला में जाकर काम करने की सजा दी है। हम राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा किसी भी तरह की माफी देने के खिलाफ हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दी गई सजा के बाद किसी एक व्यक्ति द्वारा उसमें माफी या छूट नाजायज है। लेकिन हम अदालतों द्वारा ही सजा में ऐसे लचीलेपन को सुझा रहे हैं, जिससे किसी मुजरिम को सजा तो मिले, लेकिन साथ-साथ समाज को उसका फायदा भी मिले, वह मुजरिम भी सजा के बाद सामान्य जिंदगी के लायक बचे। अगर सुप्रीम कोर्ट इस सजा में एक शर्त के साथ ऐसी फेरबदल करता है कि सजा के आने वाले बरसों की संजय दत्त की पूरी कमाई मुंबई धमाकों के शिकार परिवारों के लिए मिल जाएगी, या मुंबई की हिफाजत पर खर्च की जाएगी, या नशे से छुटकारे के लिए इस्तेमाल की जाएगी, तो वह ऐसे मामलों में एक बेहतर और सार्थक सजा होगी। 
लोकतंत्र में ऐसे लचीलेपन की गुंजाइश अगर अदालत को मौजूदा कानूनों में नहीं मिलती है, तो कानून में संशोधन करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए। बहुत ही दुर्लभ किस्म के मामलों में अदालतें कई तरह की रियायतें कभी न कभी पहली बार करती हैं। हम ऐसी रियायत के बजाय लचीलेपन के ऐसे संशोधन की सिफारिश करेंगे, जो जजों के भी विवेक की मनमानी पर न टिके, और एक नीति-सिद्धांत, पैमाने के आधार पर चले। संजय दत्त को कैद के अगले बरसों में, आम कैदियों की बैंड पार्टी की तरह जेल से रोज बाहर आकर शूटिंग में हिस्सा लेने मिले, तो अपने किस्म का यह एक नया मामला होगा, लेकिन इससे सजा की सोच को एक सकारात्मक मोड़ भी मिलेगा, और आगे के लिए मिसाल भी बनेगी।
हमने आज की बात जस्टिस काटजू की बात से शुरू जरूर की है, लेकिन हम उनकी माफी की बात से सहमत नहीं हैं, हम कैद के तौर-तरीके में समाज के भले के लिए एक फेरबदल सुझा रहे हैं। 


छोटी सी बात

22 मार्च 2013
तलवार चलाएं, लेकिन तौलकर
संसद और विधानसभाओं में लोगों की कही बातों पर कई बार यह सुनने मिलता है कि उनके कहे शब्दों को असंसदीय मानकर सदन की कार्रवाई से मिटा दिया जाता है। ऐसा होने पर उन शब्दों को सदन की कार्रवाई के साथ खबरों में लिखा भी नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे शब्द गाली ही हों, यह भी जरूरी नहीं है। बहुत से ऐसे शब्द जो कि एक सच को बयां करते हैं, उनको भी असंसदीय मान लिया जाता है।
 अब जैसे कामचोर शब्द है, जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी के काम को नहीं करते, उन्हें कामचोर कहते हैं, लेकिन यह शब्द असंसदीय मानकर कार्रवाई से निकाल दिया जाता है। इसी तरह बेईमान, नमकहराम जैसे शब्द हैं, जो असल जिंदगी में कई लोगों के ऊपर सही साबित होते होंगे, लेकिन संसद और विधानसभा इन्हें बर्दाश्त नहीं करते। इसलिए बहुत से शब्द असंसदीय हो सकते हैं, अनुचित नहीं। इनका इस्तेमाल अगर सावधानी से तौलकर किया जाए, तो वे कहीं से भी गाली में नहीं आते। अब जैसे जनता के पैसों से रियायती खाना खाने वाले सांसद अगर अपनी जिम्मेदारी का काम न करें, तो भी उनके लिए एकदम सही शब्द संसद में इस्तेमाल नहीं हो सकते, बाहर तो हो ही सकते हैं। 
लेकिन इसकी यहां पर चर्चा का एक मकसद है। बहुत तीखे शब्द बहुत तेज धार की तलवार सरीखे होते हैं, उनके चौकन्ने और संतुलित इस्तेमाल के बिना वे जिसके हाथ होते हैं, उसी को काटकर रख सकते हैं। इसलिए जब तक शब्दों को तौलने की काबिलीयत न हो, तब तक तीखे शब्दों से बचना चाहिए। अगर किसी समझदार और संवेदनशील के खिलाफ बेजा इस्तेमाल किया जाए, तो आपके शब्द आपको ही घायल कर सकते हैं। इसलिए अपनी समझ से आगे बढ़कर तलवार चलाना ठीक नहीं है। पुराने लोग कहते थे कि जितनी चादर हो, पैर उतने ही फैलाने चाहिए। उसी तरह समझ जितनी हो, उसी के मुताबिक हमलावर लफ्जों का इस्तेमाल करना चाहिए।
-सुनील कुमार

खास के लिए आम सजा क्यों?

संपादकीय
22 मार्च 2013
महाराष्ट्र विधानसभा के कुछ विधायक आज अदालत में पेश होने वाले थे क्योंकि उन्होंने एक पुलिस अफसर पर विधानसभा भवन के गलियारे में हमला किया था। इस पुलिस अफसर को विशेषाधिकार हनन के आरोप में विधानसभा में पेश होने के लिए बुलाया गया था, और उसका कुसूर यह बताया गया था कि उसने मुंबई की सड़क पर किसी विधायक की गाड़ी का चालान किया था। विधायकों की यह हरकत निगरानी कैमरों में कैद हो गई और विधानसभा अध्यक्ष को इसके प्रसारण के बाद पुलिस और जनता से माफी मांगनी पड़ी, और हमलावर विधायकों पर जुर्म दर्ज किया गया है। पांच विधायकों को इस हमले के लिए निलंबित किया गया है और चौदह लोगों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जा रही है। यह पुलिस अफसर सड़क पर विधायक की गाड़ी का इसलिए चालान कर रहा था क्योंकि वह अधिक रफ्तार से जा रही थी। अफसर अस्पताल में है और उसने बयान दिया है कि किस तरह इन विधायकों ने उस पर हमला किया। इस मामले पर हम पिछले दो दिनों में इसलिए नहीं लिख पाए क्योंकि यूपीए सरकार ने इसका मौका नहीं दिया। और आज अगर अखबार छपने जाने तक यूपीए सरकार का इससे बड़ा कोई कारनामा नहीं आता है तो आज पाठक इसके बारे में पढ़ सकेंगे। 
एक पुरानी बात चली आ रही है कि ताकत बिगाड़कर रख देती है, और पूरी ताकत पूरी तरह से बिगाड़कर रख देती है। एक तो सांसदों और विधायकों की ताकत वैसे भी बहुत रहती है और गुजरात के कांग्रेस सांसद टोलनाके पर बंदूक लहराते कैमरे पर कैद होते हैं, तो उन पर पुलिस कार्रवाई करने के जिम्मे वाली मोदी सरकार उनको भाजपा में ले आती है। पंजाब विधानसभा में एक सत्तारूढ़ मंत्री या विधायक गालियां देते हुए कैमरे पर कैद होते हैं तो उनकी यह वीडियो रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर मौजूद है लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी से विधानसभा अध्यक्ष बने सदन के जिम्मेदार ने इस गाली-गलौज को सदन की कार्रवाई से भी नहीं निकाला। उत्तरप्रदेश में मायावती के, समाजवादी पार्टी के जाने कितने विधायक कत्ल से लेकर बलात्कार तक गिरफ्तार हुए हैं और जेल में हैं। इन दोनों ही पार्टियों के मंत्रियों को भी ऐसी जेल नसीब हुई है। पिछले दो-चार दिन की ही बात करें तो उप्र में समाजवादी पार्टी के एक विधायक के कॉलेज की सामूहिक नकल पर अफसरों पर दबाव डालकर पूरे मामले को खत्म करवाने की वीडियो रिकॉर्डिंग टीवी की खबरों में मिनटों तक दिखती रही। छत्तीसगढ़ में सांसद-विधायक ऐसे किसी जुर्म में फंसे हुए इसलिए नहीं हैं क्योंकि यहां की संस्कृति अलग है, और यहां की जनता इसे बर्दाश्त भी नहीं करेगी। लेकिन यहां भी अपनी गाडिय़ों पर नंबर प्लेट की जगह विधायक लिखवाकर घूमने वाले विधायकों की कोई कमी नहीं है और विधानसभा का इससे अपमान होता है, लेकिन सदन की अवमानना का नोटिस जनता नहीं दे सकती, सिर्फ विधायक दे सकते हैं, इसलिए विधायकों की इस मनमानी के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता। 
यहां पर हम पहले कई बार लिखी गई अपनी पुरानी बात को दुहराना चाहेंगे कि भारत में सत्ता और ताकत के अलग-अलग दर्जे तय करके उनके लिए सजा में ताकत के अनुपात में बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए। जब एक सांसद या विधायक कोई जुर्म करते हैं, तो उनके पकड़ाने, कटघरे तक पहुंचने, और सजा पाने की गुंजाइश बहुत कम रहती है। इसलिए ताकत के दर्जों के हिसाब से अलग अदालतों का इंतजाम रहना चाहिए, और अलग सजा का भी। कल से देश जिन सीबीआई छापों को लेकर हिला हुआ है, उनके बारे में भी हमारा यही मानना है कि सत्ता की ताकत वाले मंत्रियों के घर से अगर टैक्स चोरी की गाड़ी पकड़ाती है, या किसी अरबपति के घर से टैक्स चोरी की गाड़ी पकड़ाती है, तो उस पर साधारण जुर्माने की सजा नहीं होनी चाहिए। उनकी इज्जत का ख्याल रखते हुए, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और संपन्नता का ख्याल रखते हुए उन पर बाकी लोगों के मुकाबले कई गुना अधिक जुर्माना लगाना चाहिए, ताकि उन्हें बड़े नोटों की गड्डी खोलनी न पड़े। 
लेकिन लोकतंत्र में कानून और अदालत की कोई भी ताकत सारे लोगों को सजा नहीं दिला सकती। बहुत किस्म की सजा सिर्फ जनता की अदालत मेें हो सकती है, और वहां इंसाफ के लिए जनता के बीच एक जागरूकता जरूरी है। देश की ऐसी पार्टियां जो कि भ्रष्टाचार पर जीती हैं, वे जनता को खरीदने का रास्ता आसान समझती हैं। इसीलिए हम चुनावों में बहुत से उम्मीदवारों को, और कुछ पार्टियों को अंधाधुंध खर्च करते देखते हैं। जनता का एक हिस्सा इस खर्च का चुनावी मजा भी ले लेता है और शायद वह इस हताशा में भी ऐसा करता है कि दोनों भ्रष्ट लोगों में से कोई भी जीते, वह देश-प्रदेश को तो लूटेगा ही, इसलिए इस बहती गंगा में वे भी हाथ क्यों न धो लें। और जब तक जनता अपने हक को मुर्गा-बकरा, कंबल-साइकिल पर बेचती रहेगी, भ्रष्ट मुजरिम इसी तरह सत्ता में आते रहेंगे। 
इसलिए आज इस देश में कानून में ऐसे फेरबदल की जरूरत है जिससे कि सरकारी या संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोग, मंत्री-अफसर, सांसद-विधायक, जज, और पैसों की ताकत वाले लोग, इन सबके लिए खास सजा का इंतजाम हो। 

छोटी सी बात

21 मार्च 2013
आज भी हिज्जों का महत्व है
इन दिनों इंटरनेट की मेहरबानी से बहुत से देशों में लोग एक-दूसरे के दोस्त बन जाते हैं और फेसबुक या ट्विटर जैसी वेबसाईटों पर एक-दूसरे से बातचीत भी करते हैं। इनमें अंग्रेजी वाले बहुत से लोग रहते हैं, लेकिन बहुत से ऐसे भी रहते हैं जो गैरअंग्रेजी जुबान वाले हैं, लेकिन इंटरनेट पर अनुवाद की आसान और मुफ्त सहूलियत के चलते वे एक-दूसरे से बात कर लेते हैं। लेकिन इंटरनेट ने अंग्रेजी जुबान के हिज्जे बदलकर रख दिए हैं। लोग शब्दों को अलग तरीके से लिखने लगे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए यह याद रखने की जरूरत है कि नेट पर अनुवाद करने वाले सॉफ्टवेयर इस तरह की नई स्पेलिंग का सही अनुवाद नहीं कर पाते। उनकी डिक्शनरी में परंपरागत स्पेलिंग ही रहती है। इसलिए यह याद रखें कि अगर आपका संपर्क बहुत से ऐसे लोगों से है, जो कि मशीनी अनुवाद से ही आपकी बात पढ़ पाते हैं, और अपनी बात अंग्रेजी में बदलकर लिख पाते हैं, तो ऐसे लोगों से संपर्क करते हुए हिज्जे पूरे-पूरे लिखें। 
और एक दूसरी बात जो हम पहले भी कई बार सुझाते आए हैं कि दुनिया की ऐसी कोई बात नहीं है जिसे कि बिना गाली-गलौज न लिखा जा सके। इसलिए ऐसे ही शब्द लिखें जिन्हें आपके बुजुर्ग भी पढ़ सकें, और आपके बच्चे भी। गालियां या गंदे शब्द आपकी साख को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि आपको अंदाज भी नहीं होगा।
-सुनील कुमार

मनमोहन-सोनिया माफीनामों के खाली पर्चे छपवाकर रखें

संपादकीय
21 मार्च 2013
केन्द्र की यूपीए सरकार के बारे में लिखने को अब कुछ नया अधिक बचा नहीं है। कल उसका साथ छोड़कर जाने वाली डीएमके के नेता के परिवार पर आज सुबह सीबीआई के छापे पड़े और डीएमके के लोग जितना कुछ कहें, उससे अधिक यूपीए सरकार को कहना पड़ा। तमिलनाडू की राजनीति से आए केन्द्रीय वित्त मंत्री पी.चिदम्बरम ने सीबीआई की इस कार्रवाई को गलत समय पर किया गया कहा, और खुद होकर यह माना कि इससे एक गलत तस्वीर बनी है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने सीबीआई की इस कार्रवाई को गलत वक्त पर किया हुआ कहा है। उन्होंने कहा है कि यह छापा नहीं पडऩा था और सरकार पता लगाएगी कि इसके पीछे कौन है। 
हमने कुछ समय पहले यह लिखा था कि यूपीए सरकार को मानो किसी डॉक्टर ने एक पर्चा लिखकर दिया है कि दिन में तीन बार वह कोई न कोई भयानक बड़ी गलती करे। इसलिए आज वह इसी अंदाज में काम करते हुए अपने पिछले दो साल गुजार चुकी है, और अगला एक साल इसी तरह गुजारने जा रही है। इस सरकार को हर वक्त मदद करने वाला मुलायम सिंह यादव को बेमौके, बिना वजह खुलकर गालियां बकने वाले केन्द्रीय मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा की माईक की आवाज गूंजना अभी बंद हुआ भी नहीं था, कि इस सरकार को डीएमके के जाने के बाद समाजवादी पार्टी की जरूरत आन पड़ी है। और इस नौबत के आने के बाद भी यह केन्द्रीय मंत्री डंके की चोट पर खुलकर बोलता रहा कि वह माफी नहीं मांगेगा। पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार बेकाबू दिखती है, बेदिमाग दिखती है, और बदमिजाज भी दिखती है। और इन्हीं विशेषणों को, हर दिन सामने आने वाले नए-नए मामलों के साथ जोड़कर कब तक तो हम लिखते रहें और कब तक हमें पढऩे वाले लोग इसे पढ़ते रहें? आज हालत यह है कि जिस तरह किसी सरकारी कागजात में जानकारी भरने के लिए खाली जगह छूटी रहती है, उसी तरह यूपीए सरकार को अपने माफीनामे छपवाकर रखने चाहिए और रोज सबेरे प्रधानमंत्री उसमें गलत करने वाले अपने मंत्री या नेता का नाम भरें, काम भरें, जिससे माफी मांगनी है उसका नाम भरें, और उसे मीडिया को जारी करें। इससे कम से कम हर दिन मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का खासा वक्त बचेगा और गलत कामों के बाद माफी तेजी से जारी हो सकेगी। 
डीएमके कोई दूध के धुले लोगों की पार्टी नहीं है। उसके भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले कटघरों में खड़े हैं। लेकिन कल समर्थन वापिसी और आज सुबह छापे, इससे ऐसे घोषित भ्रष्ट लोगों को भी एक नए किस्म की विश्वसनीयता मिल रही है। और हो सकता है कि यह कार्रवाई जरूरी हो, लेकिन इस कार्रवाई की कोई विश्वसनीयता आज नहीं रह गई है। कुल मिलाकर बात यह है कि इस सरकार के दाएं हाथ को यह नहीं मालूम है कि उसकी बाएं हाथ किसकी जेब काट रहा है, और बाएं हाथ को यह नहीं मालूम है कि इसका दायां हाथ बस में किस महिला को पकड़ रहा है। इस गठबंधन के सिर को नहीं मालूम है कि इसका पैर उसे कहां ले जा रहा है, और इसके पैर को नहीं मालूम है कि इसका सिर इसे कहां ले जाना चाहता है। ऐसे में इस गठबंधन, और खासकर उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी का आज सबसे बड़ा यही हक बनता है कि वह अगले चुनाव में उम्मीदवार बनकर जनता के सामने जा सके। 
इस सरकार को चलाने वाली कांग्रेस पार्टी नरसिंह राव के जमाने से सांसदों की खरीद-फरोख्त में फंसी हुई है, और बाद में लगातार ऐसी चर्चाएं रही हैं कि यह पार्टी सीबीआई का इस्तेमाल करके संसद के भीतर समर्थन जुटाती है। इसके बारे में देश की जनता को ऐसी तमाम चर्चाओं पर भरोसा है, ऐसा हमको लगता है। और इस भरोसे को मजबूत करने के लिए कांग्रेस और यूपीए के नेता खासी मेहनत भी कर रहे हैं, और ओवरटाईम कर रहे हैं। 
सुना है कि नेहरू इस पार्टी के इतिहास से इस्तीफा भेजने वाले हैं।

राष्ट्रीय हितों पर हावी क्षेत्रीय हित का विरोध होना चाहिए...

संपादकीय
20 मार्च 2013
श्रीलंका को लेकर भारत में केन्द्र की यूपीए सरकार के खिलाफ उसका ही कल तक का भागीदार एक दल, डीएमके, जिस तरह से खड़ा हो गया है उसे लेकर हमने कल ही यहां पर चर्चा की थी, लेकिन उस मुद्दे पर आज फिर बात को आगे बढ़ाने की जरूरत है। केन्द्र सरकार का हाल बेहाल और बदहाल तो दिख रहा है, लेकिन डीएमके इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ जा रही है। केन्द्र में भाजपा भी उसका साथ देते नहीं दिख रही है, क्योंकि देश के राष्ट्रीय हितों के मुकाबले अगर एक प्रांत तक सीमित एक राजनीतिक दल एक क्षेत्रीय चुनौती को इस तरह से खड़ा कर रहा है, तो वह कल देश के सामने एक ऐसी खराब मिसाल रखेगा, जिसे कि भाजपा की राष्ट्रीय सरकार भी नहीं सुलझा पाएगी। 
श्रीलंका में तमिलों के साथ हुई ज्यादतियों को लेकर डीएमके की राजनीति के बारे में कल देर रात तक अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषकों का यही मानना रहा कि वह बेमौके पर बरसों पुराने ऐसे मानवसंहार को लेकर यूपीए गठबंधन को तोड़ रहा है जिससे उसका कुछ घरेलू टकराव चल रहा था। डीएमके के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के चलते आज यह पार्टी केन्द्र में यूपीए सरकार के लिए शर्मिंदगी की सबसे बड़ी वजह बनी हुई है। और डीएमके के मुखिया, उसके मालिक, करुणानिधि की बेटी इसी भ्रष्टाचार के मामले में महीनों तक जेल में रही, इसलिए उनका दर्द जायज है, लेकिन उनकी राजनीति नाजायज है। क्षेत्रीय दलों को यह बात समझनी होगी कि किसी देश के साथ उनके प्रांत के किसी मजहब या किसी जाति के लोगों को लेकर अगर कोई शिकायत है तो वह भारत के राष्ट्रीय हितों से ऊपर नहीं जा सकती। इसीलिए केन्द्र और राज्य के संबंधों में विदेश नीति को पूरी तरह केन्द्र सरकार के एकाधिकार में रखा गया है। कल भी हमने सरसरी तौर पर इस बात को छुआ था कि अगर अलग-अलग राज्य अलग-अलग देशों के साथ टकराव खड़े करेंगे तो उससे भारत की फजीहत होगी। कल के दिन अगर कश्मीर भारत-पाक संबंधों पर सवाल उठाएगा, अरूणाचल भारत-चीन संबंधों में अपनी दिक्कत ढूंढेगा, पश्चिम बंगाल और असम बांग्लादेश के साथ अपनी सरहदी दिक्कतों को देश से अधिक महत्वपूर्ण मानेंगे, राजस्थान पाकिस्तान के साथ टकराव ढूंढने लगेगा, और कोई प्रदेश भूटान के साथ, कोई बर्मा के साथ, और कोई नेपाल के साथ भिड़ जाएगा, तो देश का क्या होगा?
डीएमके ने अपनी ताजा हरकत से भारतीय राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों को लेकर चलने वाली केन्द्र की गठबंधन सरकारों को किस-किस तरह के समझौते करने पड़ते हैं, और ऐसे समझौते देश को कितने भारी पड़ सकते हैं? यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। एक भ्रष्ट पार्टी के भ्रष्ट मुखिया का भ्रष्ट कुनबा, अपनी खाल को बचाने के लिए, अपने खानदानी हिसाब को चुकता करने के लिए भारतीय लोकतंत्र को चला रहे गठबंधन को इस तरह से ब्लैकमेल करे, यह ठीक नहीं है। इससे आम जनता चाहे क्षेत्रीय दलों की इस हरकत को ठीक से समझ सके या न समझ सके, इससे क्षेत्रीय दलों की साख एक तबके के रूप में खराब हुई है। ममता बैनर्जी ने अपने घमंड और अपनी बदतमीजी के चलते बांग्लादेश के साथ अपने प्रदेश के टकराव को भारत से ऊपर रखा और मनमोहन सरकार के लिए एक शर्मिंदगी खड़ी की। 
यह एक ऐसा मौका है जिसमें भारत के वामपंथी दलों को एक अधिक समझदारी दिखाने की जरूरत है, लेकिन उनमें से कम से कम एक नेता टीवी की बहस पर लगातार स्थानीय तमिल मुद्दों को राष्ट्रीय हित से ऊपर दिखाते हुए बहस कर रहे हैं। वामपंथियों को ऐसी बहस को संसद में समर्थन या विरोध तक नहीं ले जाना चाहिए, और इस मुद्दे पर यूपीए सरकार को गिराने की किसी सोच का साथ नहीं देना चाहिए। यूपीए सरकार को गिराने या हटाने या खारिज करने की सौ दूसरी वजहें हो सकती हैं, लेकिन श्रीलंका के मुद्दे पर इसे हटाने या इसे अकेला छोडऩे का एक बड़ा नुकसान देश की विदेश नीति में, देश के केन्द्र-राज्य संबंधों में एक गलत मिसाल के रूप में होगा, जो कि नहीं होना चाहिए। 

छोटी सी बात

19 मार्च 2013
सोचें, फिर पोस्ट करें
पहले लोग कहते थे कि आपकी पहचान इससे होती है कि आपके दोस्त कैसे हैं। अब आपकी पहचान इससे होती है कि फेसबुक या ट्विटर पर कैसे लोग आपके दोस्त हैं, आप वहां पर क्या लिखते हैं या पोस्ट करते हैं, आपके दोस्त आपकी बातों पर क्या लिखते हैं। इंटरनेट की मेहरबानी से आज किसी के बारे में भी कुछ पता लगाना हो, तो लोग ऐसी सोशल वेबसाईटों पर चले जाते हैं, और आपकी साख वहीं पर बनती या बिगड़ती है। बड़ी कंपनियों में लोग किसी को काम पर रखने के पहले इंटरनेट पर उसके हालचाल को ठोक बजा लेते हैं, और लोगों को नौकरी न मिलने पर  यह भी पता नहीं लग पाता कि उन्होंने किस वजह से मौका खोया। इसी तरह शादी-ब्याह के रिश्ते भी कुछ गंदी या गलत बातों को आपके पन्ने पर देखकर होते-होते रह जाते हैं। 
दोस्तों के बीच इंटरनेट पर जो बात होती है, उस दौरान लोग यह भूल जाते हैं कि इन बातों को कई पीढिय़ां देख सकती हैं, और आपकी वजह से आपके आगे-पीछे के लोगों को भी शर्मिंदगी झेलनी पड़ सकती है। 
इंटरनेट की तकनीक ऐसी है कि कई बार बिना अधिक सोचे लोग पोस्ट कर देते हैं, और वह बात हाथ से निकल जाती है।
सुनील कुमार

देश के भीतर उलझे, शर्मिंदा, नेताओं की बोलती बंद...

19 मार्च 2013
संपादकीय
भारत आज एक कमजोर लीडरशिप को भुगत रहा है। केंद्र सरकार ऐसी बेबस लग रही है, कि वह न अपनी मर्जी का कोई कानून बना पा रही, न कोई संविधान संशोधन कर पा रही, न विपक्ष के साथ कोई बहस कर पा रही, न पड़ोसी देशों के साथ उसके रिश्ते काबू में हैं, न अपने मंत्रियों को बकवास करने से वह रोक पा रही है। और अब आज जिस तरह से यूपीए सरकार का एक बड़ा साथी, डीएमके उसे छोड़कर जाने को है, उससे फिर यही साबित होता है कि घर-बाहर कहीं भी अब उसके हाथ में कुछ नहीं रह गया है। जिस सरकार का एक कैबिनेट मंत्री उसके एक बड़े मददगार को बिना जरूरत, बिना उकसावे, खुलेआम गालियां दे, देश का गद्दार कहे, और उसके बाद सरकार तो माफी मांगे, वह मंत्री माफी से इंकार कर दे और कहे कि वह इसके बजाय कुर्सी छोड़ देगा, उस सरकार के बारे में क्या कहा जाए? 
जुआरियों की जुबान में कहें, तो यूपीए का कोई पांसा सीधा पड़ते नहीं दिख रहा है। घुड़दौड़ की जुबान में कहें, तो प्रधानमंत्री या यूपीए की मुखिया के हाथों कोई लगाम नहीं रह गई है। बस इतना रह गया है कि हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे घटिया दर्जे के गठबंधन-समझौतों के तहत देश को बेचकर यूपीए ने अपने नौ साल पूरे किए हैं। यह जिंदगी भी कोई जिंदगी है? गांधी-नेहरू का यह देश इस देश के हक को रोज बेचकर रोज की जिंदगी खरीदते देख-देख अब यूपीए को कोसने के सिवाय क्या कर रहा है? और अगले चुनाव का मौका मिलने तक वह कर भी क्या सकता है? 
आज की यह बात पड़ोस के दो देशों के साथ चल रहे एक संसदीय तनाव को लेकर कर रहे हैं। पाकिस्तान की संसद ने पिछले दिनों एक प्रस्ताव पारित किया और अफजल गुरू की फांसी, और कफन-दफन को लेकर भारत की निंदा की। इस बात को भारत के भीतरी मामलों में दखल करार देते हुए भारत की सरकार, संसद और विपक्ष ने पाकिस्तानी संसद के खिलाफ एक प्रस्ताव यहां पारित किया। अब दो दिनों के भीतर यह नौबत आ खड़ी हुई है कि श्रीलंका में तमिलों के व्यापक मानवसंहार को लेकर श्रीलंका के खिलाफ भारत की संसद में एक प्रस्ताव आ रहा है। और जाहिर है कि दूसरे देशों की संसद के प्रस्ताव को अपने देश में दखल मानने का एकाधिकार भारत के पास तो है नहीं, श्रीलंका इसे अपने घरेलू मामलों में दखल मानेगा। और सवाल यह भी उठेगा कि तमिलों के जिस हथियारबंद संगठन लिट्टे ने श्रीलंका में हजारों को मारा था, भारत से गई हुई शांति सेना के हजार से अधिक सैनिकों को मारा था, जिस लिट्टे ने राजीव गांधी को मारा था, आज उसकी हिंसा के खिलाफ श्रीलंका की घरेलू कार्रवाई को अपनी संसद में लाकर क्या भारत बाकी देशों के सामने यह मौका नहीं रख रहा कि वे भी भारत के मामलों पर अपनी संसद में निंदा करें? 
जब भारत के जाती मामले दूसरे देशों की संसदों के लायक नहीं माने जाते, तो फिर उस लिट्टे के खिलाफ श्रीलंका सरकार की कार्रवाई पर भारतीय संसद कैसे निंदा करेगी, खासकर तब जब उसी लिट्टे के खिलाफ भारतीय फौज को भेजने का फैसला इस देश ने लिया था। भारत में कहीं बांग्लादेश से आए हुए लोगों के साथ ज्यादती की खबरें आती हैं, तो कहीं पाकिस्तान के साथ सरहद पर कश्मीर के कुछ हिस्सों को लेकर तनाव रहता है। ऐसे तनाव पड़ोस के और देशों के साथ भी हैं। ऐसे में आज भारत में सरकार का मुखिया, सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया, इतने कमजोर हो गए हैं कि अपने देश के भीतर भी उनकी बात का वजन नहीं रह गया है। घरेलू मोर्चे पर कमजोर होने से आज भारत अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर ऐसे फैसलों के लिए बेबस हो रहा है, जो शायद उसकी विदेश नीति के बहुत फायदे के न हों। और इस देश में चुनाव के खासे पहले से राजनीति चुनाव के हिसाब से, उसके नारों के मुताबिक ढल गई है, और अंतरराष्ट्रीय संबंध ऐसे नारों की नावों पर सफर नहीं करते। 
एक वक्त नेहरू की लीडरशिप में यह देश अंतरराष्ट्रीय मामलों में दुनिया के आधा दर्जन महत्वपूर्ण देशों में से एक रहता है। आज इसकी कोई आवाज नहीं रह गई है। और ऐसा नहीं कि यह देश कमजोर हो गया है, देश आज भी अपने आकार की वजह से, अपने आर्थिक विकास की वजह से ताकतवर है, लेकिन घर के भीतर उलझे, और शर्मिंदा, इसके नेताओं की बोलती बंद है। यह बहुत फिक्र की नौबत है, और इससे आज हो रहे नुकसान खासे दूर तक जाएंगे।

रियायती खाने से हट्टे-कट्टे पहलवानों की कुश्ती जारी

18 मार्च 2013
संपादकीय
भारत की राजनीति में घुली हुई कड़वाहट किसी राजनीतिक दल का नफा या नुकसान, जो भी करे, वह भारतीय लोकतंत्र का बहुत बुरा नुकसान कर रही है। अभी-अभी कहीं पर यह बात चल रही थी कि भारतीय संविधान को बनाने के लिए जब संविधान सभा में विचार-विमर्श चल रहा था, बहस चल रही थीं, तब इस देश के महान नेताओं के इतने महान भाषण वहां पर हुए थे, कि वे आज भी ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। और ऐसी महानता वहां पर किसी एक विचारधारा का एकाधिकार नहीं थी, बहुत सी विचारधाराओं के साथ-साथ महानता का दर्जा जुड़ा हुआ था, और संसद द्वारा प्रकाशित इस पूरी बहस को अगर पढ़ें, तो पढ़ते ही रह जाएं। दूसरी तरफ इन दिनों संसद में, संसदीय जांच समितियों में, सर्वदलीय बैठकों में, और टेलीविजन की बहसों में, भारतीय राजनीतिक दल एक हिंसक कट्टरता के साथ अपनी बात पर अड़े हुए हैं, और किसी संसदीय विचार-विमर्श की संभावना खत्म हो गई है। आज संसद में बहस का हाल देखकर एक समझदार ने यह कहा कि जिस देश की संविधान सभा में महीनों तक सार्थक बहस चलती थी, अब उस देश की संसद में दस मिनट भी एक स्वस्थ, न्यायसंगत और तर्कसंगत बहस नहीं हो सकती।
जिस संसद को भारतीय लोकतंत्र में जनता के निर्वाचित लोगों के बीच देश के हाल पर, मौजूदा कानून पर, नए कानून बनाने पर, और देश-विदेश में सरकार के कामकाज पर बहस के लिए, नीतियां बनाने के लिए बनाया गया था, आज वह संसद एक ऐसा अखाड़ा बनकर रह गई है, जिसमें रियायती खाना खाकर हट्टेकट्टे बने पहलवान एक-दूसरे को पछाडऩे के लिए जोर-आजमाईश करते हैं। यह कुश्ती कुछ लोगों के बीच एक खूंखार कुश्ती रहती है, और कुछ लोगों के बीच ऐसी नूराकुश्ती रहती है, जो पहले से फिक्स रहती है। क्या यह रियायती खाना ऐसी कुश्ती के ऐसे अखाड़े के लिए जनता की अतडिय़ों से निकालकर लाया जाता है? 
लोकतंत्र में खानदानी दुश्मनी जैसी कड़वाहट और हिंसा की कोई जगह नहीं रहनी चाहिए। लेकिन आज राजनीतिक दलों के बीच बातचीत खत्म हो गई है, विचार-विमर्श पूरी भारतीय राजनीति से खत्म हो गया है, और अब आंकड़ों का मोर्चा खुलने तक राजनीतिक दल संसद और विधानसभाओं के भीतर भी गिने-चुने शब्दों को रटाए हुए तोतों की तरह गिनी-चुनी बातें करते हैं, और किसी गरममिजाज पंछी की तरह एक-दूसरे पर चोंच मारते हैं। यही वजह है कि लोगों का भरोसा लोकतंत्र पर से कम होते जा रहा है, और जिस सरकार पर नजर और काबू रखने का काम संसद और विधानसभाओं का होना चाहिए, वह नजर और काबू रखने का जिम्मा और बोझ अब अदालतों पर पड़ गया है। हम इस बारे में पहले भी लिखते आए हैं कि भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका के बीच एक बहुत महीन संतुलन का जो ढांचा इस संविधान में बनाया गया है, उसमें सरकार और संसद अपनी जिम्मेदारियों से कतरा रहे हैं, और लोकतंत्र की यह तिपाई एक पैर पर खड़े बगुले जैसी दिखने लगी है। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है कि दोपहर के भोजन से लेकर राष्ट्रमंडल खेलों के भ्रष्टाचार तक, और टूजी घोटाले से लेकर बलात्कारों तक की जांच और कार्रवाई के लिए जजों को डंडे लेकर बैठना पड़ रहा है। एक तरह से भारत अदालती तानाशाही के खतरे की तरफ बढ़ रहा है, और लोकतंत्र इस हिसाब से बनाया नहीं गया था।
देश ऐसी खराब नौबत में आकर खड़ा है कि आम जनता आज कुछ नहीं कर सकती। सबके सब लोगों को, तमाम पार्टियों को जनता एक साथ भला कैसे खारिज कर दे, और करने का सोच भी ले, ठान भी ले, तो चुने किसे? तो आज भारत के राजनीतिक दल और यहां के नेता, अलग-अलग विचारधाराओं के चलते हुए भी एक अघोषित गिरोहबंदी के तहत काम कर रहे हैं, और जनता को टीना फैक्टर की सजा दे रहे हैं, देयर इज नो ऑल्टरनेटिव, (आज कोई विकल्प नहीं है)।

मधुमक्खी के छत्तों में घुसने के शौकीन जस्टिस काटजू..

18 मार्च 2013
लगातार खबरों में बने रहने वाले जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने पत्रकारिता की पढ़ाई को लेकर एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। हम कुछ मुद्दों को लेकर जस्टिस काटजू के बड़बोलेपन के खिलाफ रहे हैं लेकिन यह एक मामला ऐसा है जिस पर कहना उनकी जिम्मेदारी थी, उनका कहा हुआ सही है, या नहीं यह एक अलग बात है। उन्होंने प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष की हैसियत से एक कमेटी बनाई है, यह तय करने के लिए कि एक पत्रकार की न्यूनतम योग्यता क्या होनी चाहिए, और इस पर मीडिया से जुड़े हुए लोगों और जानकार लोगों ने उन पर चढ़ाई कर दी है। 
उन्होंने यह कहा कि चिकित्सा, कानून या पढ़ाने जैसे पेशों के साथ पढ़ाई-लिखाई की एक योग्यता जरूरी होती है, लेकिन पत्रकारिता में आने के लिए ऐसा कुछ नहीं है। इसलिए बहुत बार लोग पत्रकारिता की बहुत ही कम या नाकाफी ट्रेनिंग लेकर ही इस पेशे में आ जाते हैं, और उससे बहुत नकारात्मक असर पड़ता है क्योंकि वे जर्नलिज्म के ऊंचे पैमानों को नहीं निभा पाते। जस्टिस काटजू ने आगे कहा कि अब वक्त आ गया है जब एक कानून बनाकर कुछ योग्यता अनिवार्य करनी चाहिए। उन्होंने इस मामले के सही पहलुओं को देखने के लिए एक कमेटी बनाई है जो यह सुझाएगी कि पत्रकार बनने के पहले कौन सी योग्यता होनी चाहिए। 
इसके खिलाफ सबसे कड़ी प्रतिक्रिया हिंदुस्तान के एक ऐसे पत्रकार की आई है, जो मेरी नजर में देश का सबसे अच्छा पत्रकार है। आऊटलुक पत्रिका के संपादक विनोद मेहता ने पिछले दशकों में जितने अच्छे अखबार निकाले, उतने हिंदुस्तान के इतिहास में किसी ने नहीं निकाले। और शायद उनका बहुत अच्छा होना भी उनके बंद होने के पीछे की एक वजह रही होगी। लेकिन अभी हम अच्छे अखबार और उनके बंद होने जैसे बातों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि उनसे एक अखबारनवीस की काबिलीयत पर छिड़ी यह मौजूदा बहस अलग रह जाएगी। विनोद मेहता ने जस्टिस काटजू के खिलाफ कहा कि यह सोच पूरी तरह बकवास है, और उन्होंने अपने खुद के बारे में कहा कि वे खुद बीए फेल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के कुछ सबसे महान पत्रकार किसी डिग्री के बिना ही महान बने।
जस्टिस काटजू की कही बात एक अच्छी बहस के लायक है। हिन्दी अखबारनवीसी एक वक्त भारत में हिन्दी साहित्यकारों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का एकाधिकार रही। पत्रकारिता के इतिहास के बहुत बड़े हिस्से को देखें, तो हिन्दी में जो काम अखबारों में हुआ, वह आज के समाचारों के और विचारों के माने हुए और प्रचलित, दोनों ही किस्म के पैमानों से खासा अलग था। और उसका मकसद भी अलग था। वह दौर सीमित संख्या में पढ़े-लिखे लोगों का था, जो कि जाहिर तौर पर समाज के उच्च आयवर्ग के थे, या ऊंची समझी जाने वाली जातियों के थे। और ऐसे ही लोग साहित्य को पढऩे और लिखने वाले लोगों में अधिक थे, या हावी थे। उन दिनों हिन्दी साहित्य से परे हिन्दी पत्रकारिता का कोई अस्तित्व नहीं था। और यह कल्पना भी मुश्किल है कि आज के विनोद मेहता या बरखा दत्त सौ बरस पहले हिन्दुस्तान में बिना कविता-कहानी लिखे हुए पत्रकार माने गए रहते। कम से कम उनका साहित्य में किसी न किसी तरह का दखल तो जरूरी ही माना गया रहता। आज की अखबारनवीसी या आज के मीडिया के कामकाज में ऐसी किसी जरूरत की जरूरत नहीं रह गई है। इसलिए कल तक की अच्छी भाषा, आज के मीडिया के कामकाज में एक छोटी जरूरत बन चुकी है, और आज की बड़ी जरूरत मीडिया के दायरे में आने वाले मुद्दों के बारे में एक बेहतर समझ हो चुकी है। अब इस बेहतर समझ के बारे में कुछ समझा जाए।
आजादी के बाद के हिंदुस्तान में देश का ढांचा बना, संविधान बना, सरकार, संसद और अदालतों के कामकाज की शुरूआत हुई, केंद्र और राज्यों के संबंधों का खुलासा हुआ, बाजार और कारोबार पर खबरों का सिलसिला बढ़ा। अखबारों के पन्ने बढ़े, पाठकों की जरूरतें बढ़ीं, और पाठकों की समझ भी बढ़ी। पूरी दुनिया के साथ समाचार और विचार का लेन-देन बढ़ा, और देश के भीतर विज्ञान और तकनीक के विकास से मीडिया में काम करने के लिए समझ की जरूरत भी बढ़ी। 
जस्टिस काटजू का यह सोचना है कि बाकी कुछ पेशों की तरह मीडिया में काम करने के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता होनी चाहिए, और वह क्या होनी चाहिए इसके बारे में वे एक कमेटी बनाकर उससे राय मांग रहे हैं। 
विनोद मेहता की मिसाल बहुत अच्छी है। मैं उससे सहमत हूं, क्योंकि मैं खुद कॉलेज में पहले बरस में साइंस में फेल हो चुका हूं, और उसके तुरंत बाद अखबार में काम करते हुए, खींचतानकर किसी तरह इम्तिहान देकर बीए पास किया। और जो कुछ सीखा, वह अखबारनवीसी करते हुए ही सीखा। आज भी जो लोग पत्रकारिता की डिग्री लेकर आते हैं उनकी डिग्री एक सीमा से अधिक काम की मुझको नहीं लगती है, लेकिन उसकी एक दूसरी वजह है। पत्रकारिता का कोर्स, और उसकी पढ़ाई-लिखाई का हाल इस कदर बदहाल है, कि मुझ तक आने वाले ऐसी डिग्रीधारी जाहिर तौर पर भारी कमजोर रहते हैं। लेकिन यह जरूर होगा कि भारत और दुनिया के जो सबसे अच्छे पत्रकारिता संस्थान हैं, वहां के पढ़े हुए लोग पत्रकारिता की एक बुनियादी समझ लेकर निकलते होंगे, और वे जहां काम करते होंगे, अपने खुद के उस स्तर से बेहतर रहते होंगे, जो कि इस पढ़ाई के बिना उनका रहा होता। 
यहां इस बारीक फर्क को समझने की जरूरत है। विनोद मेहता बीए फेल होकर भी आज देश के सबसे अच्छे पत्रकार हैं, लेकिन वे अगर बीए पास होते, या उन्होंने पत्रकारिता का कोई अच्छा कोर्स किया होता, तो हो सकता वे आज अपने-आपसे बेहतर होते। इसलिए बहस के लिए हम पल भर को यह मान लें कि पत्रकारिता की पढ़ाई या किसी और तरह की पढ़ाई को पत्रकार बनने के लिए अनिवार्य न भी किया जाए, तो भी उसमें बुराई क्या है? आज पत्रकारिता, और अब यह सिर्फ पत्र से जुड़ी कारिता नहीं रह गई है, अब यह कागज और कलम से बिल्कुल परे का मीडिया बन चुकी है, यह पत्रकारिता तरह-तरह के अज्ञान से भरी दिखती है, और तरह-तरह की नासमझी का शिकार भी दिखती है। आज जब समाचारों और विचारों से मीडिया देश की एक बड़ी आबादी तक असर डालता है, तो इसके अपने लोगों में ज्ञान और समझ, मीडिया की तकनीक और अभिव्यक्ति जैसी कुछ बुनियादी बातों की जरूरत को जरूरी क्यों नहीं समझा जाता?
मैं अपने तजुर्बे से यह कह सकता हूं कि हिंदुस्तान में गैरअंगे्रजी मीडिया के लोगों को अगर अंगे्रजी की समझ है, तो यह समझ उनके ज्ञान और उनकी समझ को बेहतर बनाती ही है। ऐसा नहीं कि अंगे्रजी न जानने वाले लोग अच्छे नहीं हुए हैं, लेकिन दूसरी भाषाओं की समझ बहुत काम की होती है। इसी तरह जिस देश और समाज में मीडिया के लोगों को काम करना है, वहां की शासन प्रणाली, सरकारी व्यवस्था, समाज के ढांचे, राजनीतिक और दीगर विचारधाराएं, देश और समाज का इतिहास, कारोबार के नियम-कायदे, संवैधानिक संस्थाएं, इनकी समझ किसी पत्रकार को क्यों नहीं होनी चाहिए? और ये बातें पत्रकारिता की बुनियादी तकनीकी जरूरतों से अलग है। 
मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि हिन्दी और अंगे्रजी के जिन अखबारों को मैं देख पाता हूं, उनमें से बहुत से ऐसे हैं जिनमें काम करने वाले पत्रकार अपनी आधी-कामकाजी जिंदगी इस पेशे में गुजारने के बाद भी ठीक से यह नहीं समझ पाते कि लोकतंत्र में, या इंसानियत में सामाजिक न्याय, प्राकृतिक न्याय की जरूरतें क्या हैं। अपने-आपके जातिगत, अपने पारिवारिक आयवर्ग, अपने सामाजिक तबके से मिले पूर्वाग्रहों को ही वे सामाजिक हकीकत मानते हैं, और पूरी की पूरी हकीकत उसे ही मान लेते हैं। इसलिए भारत के पत्रकारों को पत्रकारिता की बुनियादी सीख और जानकारी के साथ-साथ, लोकतंत्र की बुनियादी सीख की भी जरूरत है, इंसाफ की बुनियादी सीख की भी जरूरत है। इसलिए एक अनिवार्य शर्त के रूप में न सही, खुद होकर लागू किए गए कुछ पैमानों के रूप में पत्रकारों को एक पढ़ाई-लिखाई से गुजारना, उससे गुजरने के बाद उन्हें पत्रकार बनाना या मानना, इसमें कोई बुराई नहीं है। इसे एक शर्त के रूप में थोंपने की बात बहुत से लोगों को नागवार गुजर रही है, लेकिन ऐसे लोग अपने पेशे के आज के हाल को देखें, तो उनको लगेगा कि ऐसी कोई शर्त इसी पेशे का भला अधिक करेगी।
विनोद मेहता जैसी मिसाल अनगिनत हैं। डॉ. अब्दुल कलाम को लेकर कहा जा सकता है कि वे कोई बहुत अधिक पढ़े-लिखे मिसाइल वैज्ञानिक नहीं थे, फिर भी उनका योगदान बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोगों से अधिक था। जिस राधाकृष्णन के नाम पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है, उन्होंने न बीएड किया था, न एमएड। लेकिन वे बहुत उम्दा शिक्षक थे। दुनिया में जब भी तर्कों को काटने के लिए मिसालों का इस्तेमाल होता है, तो वे मिसालें कुतर्क अधिक होती हैं, तर्क कम होती हैं। किस्से-कहानियों से पैमाने तय नहीं होते। गांधी के सत्य के प्रयोगों को अगर देखें, तो उस पैमाने पर आज हर अधेड़ या बूढ़े इंसान को अपने काबू को तौलने के लिए बच्चों के साथ बिना कपड़े सोने की इजाजत मिलनी चाहिए, लेकिन कहानियों से पैमाने नहीं बनते। 
इसलिए जब मीडिया अपने-आपको इतना महत्वपूर्ण मानता है कि वह किसी भी तरह के बाहरी काबू के खिलाफ बागी हो जाता है, तो फिर उसे अपनी इस अहमियत को देखते हुए अपने काम करने वाले लोगों की समझ और काबिलीयत की अहमियत भी समझनी चाहिए। यह जरूर है कि एक नासमझ या कमसमझ पत्रकार अपने अखबार के लिए अधिक काम का होता है, अधिक उत्पादक होता है, क्योंकि ज्ञान और पत्रकारिता की तकनीक मिलकर बहुत से खबरों को गलत साबित कर देते हैं। और जब यह समझ नहीं होती, तो पत्रकार खूब लिखते हैं, किसी जांच-परख के बिना उनका लिखा पत्थर पर लिखी लकीर जैसा होता है। लेकिन यह लोकतंत्र और समाज के हित में नहीं है। इसलिए पत्रकार बनने के लिए पढ़ाई-लिखाई की कुछ शर्त, इस पेशे में खुद होकर भी अपनाई जानी चाहिए। और इसके साथ-साथ चूंकि मौजूदा कामकाजी पीढ़ी अभी चौथाई या आधी सदी और काम करती रहेगी, इसलिए इसकी भी काम के साथ-साथ ऐसी ट्रेनिंग होनी चाहिए जिससे कि इसका ज्ञान बढ़ सके और समझ भी बढ़ सके।
जस्टिस काटजू ने मधुमक्खी के इस छत्ते को छेड़कर एक ऐसी बात को चर्चा में लाने का काम किया है जिसे मीडिया में शायद ही कोई छेड़ता हो। कुछ लोगों ने इसे सीधे-सीधे एक शर्त, कानून बनाकर लादी जा रही शर्त मान लिया है, लेकिन अगर इसे मीडिया के अपने खुद के पैमानों की तरह देखा जाए, तो उसमें क्या बुरा है? और बिना कानूनी शर्त अगर ऐसा हो सकता है, तो इससे मीडिया का और लोकतंत्र का बहुत भला होगा। आज बिना काबिलीयत हिन्दुस्तान में जिन दो पेशों में सबसे अधिक संभावनाएं हैं, उनमें एक राजनीति है, और दूसरी पत्रकारिता। इन दोनों में ही बिना कानूनी बंदिश, यह तस्वीर बदलनी चाहिए। मैं पहले भी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के लिए लीडरशिप के ऐसे पाठ्यक्रम की वकालत करते रहा हूं जो उन्हें देश और लोकतंत्र की समझ दे सके। ऐसी ही जरूरत मीडिया को भी है। 

छोटी सी बात

17 मार्च
पढ़े और आगे बढ़ाएं
जो लोग कोई अखबार या पत्रिका खरीद पाते हैं, वे उसको इस्तेमाल करने के बाद आस-पास के कुछ गरीब और जरूरतमंद लोगों को देकर उनको पढऩे का एक मौका दे सकते हैं। और ऐसा न करके वे महीने के आखिरी में 5-10 रुपए की रद्दी भी बेच सकते हैं। लेकिन कुदरत के दिए हुए पेड़ों को काटकर जो कागज बनता है उसका अधिक से अधिक बार इस्तेमाल होना हर किसी की जिम्मेदारी है। कई लोग पंछियों को दाना देने से लेकर चीटियों को आटा देने तक, बहुत किस्म के काम करके समझते हैं कि वे दान-धर्म का कोई काम कर रहे हैं, या समाज सेवा कर रहे हैं। इससे ज्यादा अच्छा और जरूरी यह है कि वे ज्ञान दान करें, और आस-पास के लोगों को पढऩे का एक मौका दें। अच्छे अखबार और अच्छी पत्रिकाओं को लोग अगर दूसरों तक देते हैं, तो उनके पुराने अंक भी लोगों के काम तो आते ही हैं। 
इसी तरह अपनी पढ़ी हुई उन किताबों को दूसरों को देने की दरियादिली दिखाने का हौसला भी दिखाएं, जिन किताबों की जरूरत आपको दुबारा नहीं पडऩे वाली है। किस्से-कहानियों या कविताओं की बहुत सी ऐसी किताबें हो सकती हैं जो आपको डिक्शनरी या इनसाइक्लोपीडिया की तरह रखना जरूरी न हो। ऐसी किताबों को दूसरों को देने से लोगों का पढऩा बढ़ेगा और इन किताबों का जीवन भी सार्थक होगा।
-सुनील कुमार

बलात्कारों से लदा हुआ यह कैसा अजब-गजब देश-प्रदेश

17 मार्च 2013
संपादकीय
एक तरफ हिंदुस्तान दुनिया के सामने अपने-आपको विस्मयकारी या अविश्वसनीय पर्यटन स्थल साबित करने में लगा हुआ है। दूसरी तरफ देश में देशी और विदेशी सैलानियों के साथ जो सुलूक हो रहा है, उसके बाद किसको यहां आने का हौसला होगा, यह सोचने की बात है। हर बरस दर्जन भर से अधिक विदेशी सैलानी महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले सामने आते हैं, और जो महीनों तक खबरों में छाए रहते हैं। बहुत से देश अपने नागरिकों के लिए चेतावनी जारी करते हैं कि वे हिंदुस्तान संभलकर जाएं। और जिन खतरों को वे गिनते हैं उनमें सिर्फ आतंकी खतरे नहीं हैं जो कि नक्सल मोर्चो पर या कश्मीर जैसे कुछ अशांत इलाकों में खड़े हो सकते हैं, ये खतरे उन लोगों से भी हैं जो कि पेशेवर मुजरिम नहीं हैं, आतंकी नहीं हैं, लेकिन अपराध करने से नहीं चूकते। और यह सोचना गलत है कि जो हिंदुस्तानी आदमी अपने आसपास की चार बरस की बच्ची से लेकर सत्तर बरस की बूढ़ी महिला से, हर किसी से बलात्कार करते पकड़ाते हैं, जिनके लिए बेटी का रिश्ता भी रोक नहीं बनता, वे विदेशी सैलानियों से बलात्कार के सपने न देखते हों। मध्यप्रदेश में दो दिन पहले अपने पति के साथ साइकिल पर सफर कर रही एक स्विस महिला के साथ जिस तरह का सामूहिक बलात्कार हुआ है, उसके दाग धोने में मध्यप्रदेश पर्यटन के लाखों हाथ भी अगर टीवी के परदों पर नाच-नाचकर उसे अजब और गजब प्रदेश बताएंगे, तो भी वे दाग नहीं धुलेंगे। 
हमारा यह भी कहना नहीं है कि बलात्कार के सारे मामले सरकार रोक सकती है। लेकिन किसी देश-प्रदेश में कानून का राज किस हद तक है, वहां के लोगों को सजा की गंभीरता कितनी समझ आती है, यह तो उस प्रदेश की सरकार और वहां के समाज की जिम्मेदारी है ही। भारत के अधिकतर हिस्सों में विदेशी सैलानियों को लूट लेने की फिराक में वहां के स्थानीय व्यापारियों से लेकर गाडिय़ों और होटलों वाले लोग लगे रहते हैं। और अपनी स्थानीय जुबान में बात करते हुए वे लोग समझते हैं कि सैलानी उनकी साजिशों को नहीं समझेंगे। लेकिन जो लोग अपनी जमीन से हजारों मील दूर आए रहते हैं, वे यहां के लोगों के चेहरों को देखकर, उनके आपसी लहजे को देखकर भी सब समझ लेते हैं। और यह देश न सिर्फ विदेशियों के सामने, बल्कि देश के सैलानियों के सामने भी इतनी खराब तस्वीर पेश करता है जिसकी हद नहीं। देश के बड़े-बड़े पर्यटन केंद्रों और ऐतिहासिक जगहों पर पान की पीक से लेकर पेशाब तक इस कदर बिखरी रहती हैं, कि किसी भी सफाईपसंद इंसान का वहां खड़े रहना भी मुश्किल होता है। खाने के सामान गंदे, रेलगाडिय़ों के डिब्बे गंदे, पखानों में जाना मुश्किल, किसी भी कतार में धक्के, दलालों का बोलबाला, और ऊपर से चारों तरफ आती बलात्कार की खबरें। कोई किस हौसले से इस देश में आकर घूम सकते हैं? 
हिंदुस्तान को अगर आज की मुकाबले वाली दुनिया में खड़े रहना है तो उसे अपने तौर-तरीके सभ्य करने होंगे इसके बिना इसकी पर्यटन की संभावनाएं भी घटती चली जाएंगी। जिस देश के किसी इंसान के साथ हिंदुस्तान में ऐसा सामूहिक बलात्कार होता है, उस देश से यहां आने वाले लोग शायद घटकर चौथाई भी नहीं रह जाते होंगे। और ऐसे जुर्म एकदम से बंद नहीं हो सकते, घट भी नहीं सकते, और आज तो ये बढ़ते ही चल रहे हैं। ऐसा लगता है कि इस देश की सरकारों को खुद होकर देशी और विदेशी सैलानियों के लिए यह चेतावनी जारी करनी चाहिए कि वे कहां-कहां न जाएं, कब-कब न जाएं, कैसे-कैसे घूमें। और मध्यप्रदेश में हुआ यह ताजा जुर्म तो ऐसी महिला के साथ हुआ है जो कि अपने पति के साथ सफर कर रही थी। उसके बारे में तो हिंदुस्तानी दकियानूसों का यह तर्क भी नहीं चल सकता कि महिलाओं के कपड़े-लत्तों से बलात्कारियों को उकसावा मिलता है, या किसी महिला का चाल-चलन ठीक नहीं था। 
भारत में कानून का राज बेहतर बनाने के लिए खासी मेहनत करनी होगी, इस काम में कानून को कड़ा बनाना सबसे ही हल्का काम है। एक सबसे मुश्किल काम कानून पर अमल होगा, और उससे भी मुश्किल काम एक सुरक्षित सामाजिक वातावरण पैदा करना होगा। इस देश के जितने भी अजब और गजब राज्य हैं, उनको अलग-अलग, और मिलकर भी यह सोचना चाहिए कि बलात्कार जैसी हिंसक घटनाओं को रोकना कैसे होगा, और इसकी कोशिश के बाद सैलानियों से होने वाली बाकी बदतमीजी पर भी बात करनी होगी। देश के तौर-तरीके बेहतर बनाने होंगे और लोगों के बीच यह समझ भी पैदा करनी होगी कि उनके अच्छे या बुरे बर्ताव से उनकी आने वाली पीढिय़ों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ेगा। जो समाज न ऐसी दूरदृष्टि रखता, न जिसमें आगे बढऩे की महत्वाकांक्षा है, वह समाज जुर्म से लेकर बदसलूकी तक के नुकसान भी नहीं समझ सकता। मध्यप्रदेश देश की बलात्कार राजधानी बन चुका है, वहां पर दलितों के खिलाफ जुर्म सबसे अधिक हैं, ऐसी तमाम बातों के बारे में तुरंत सोचने-विचारने की जरूरत है।

छोटी सी बात

16 मार्च 2013
गंदी बातों के हिस्सेदार
आपके आसपास जब कोई गलत बात हो रही हो, कोई झूठ बोल रहा हो, या जो मौजूद नहीं है उसके बारे में कुछ गंदी बातें हो रही हों, तो सबसे सहूलियत की बात यह होती है कि चुप रह जाना। लेकिन ऐसी चुप्पी उस गलत काम में हिस्सेदारी से कम कुछ नहीं होती। हो सकता है कि किसी झुंड के तमाम गैरजिम्मेदार लोगों के बीच इंसाफ की बात कहकर आप बिल्कुल अकेले रह जाएं, अलग-थलग पड़ जाएं, लेकिन लंबी जिंदगी में अपना ऐसा हौसला ही आपको ताकत देता है। 
यह मानकर चलें कि जो लोग आज किसी एक के खिलाफ नाजायज बातें कहते हैं, वे कल किसी दूसरे के खिलाफ भी वैसी बातें कह सकते हैं और तीसरे नंबर पर हो सकता है कि आपकी बारी आ जाए या आपके घर के किसी और की। किसी दूसरी लड़की या महिला के बारे में गलत चाल-चलन की कोई बात चल रही हो, तो जरा सोचें कि वहां पर चुप रहकर आप एक ऐसी नौबत को बढ़ावा देते हैं कि कल आपके घर की किसी लड़की या महिला के बारे में भी ऐसी बात हो सके। 
जो जिम्मेदार लोग होते हैं, वे गलत बात को बढऩे से रोकते हैं, और आसपास सुनने वाला कोई भी न हो, तो कम से कम वे ऐसी गैरजिम्मेदार भीड़ का हिस्सा नहीं बनते। याद रखें, गंदी बातें कैरमबोर्ड के स्ट्राइकर या गोटियों की तरह होती हैं, जो सामने जाते दिख सकती हैं, लेकिन लौटकर वे आपकी तरफ भी आ सकती हैं। 
-सुनील कुमार

सीएम-डिप्टी सीएम की रसोई में राज्यभर का खाना पकेगा?

संपादकीय
16 मार्च 2013
महाराष्ट्र सरकार का एक इश्तहार दिल दहला रहा है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री, इन दो के बंगलों के लिए हाईक्वालिटी के खाने के सामान के लिए टेंडर निकला है जो सौ करोड़ रूपये से अधिक का है। यह हाल उस महाराष्ट्र का है जहां पर आज मुख्यमंत्री एक बेहतर और शायद ईमानदार नेता माना जाता है, जहां पर राज्य के एक बड़े हिस्से में सूखा पड़ा है, लोगों के पास पीने को पानी नहीं है, जानवरों के लिए लगाए गए राहत शिविरों में घोटालों की रिपोर्ट आ रही हैं, जहां पर बच्चों की आबादी में से आधी आबादी कुपोषण की शिकार हैं, जहां पर गरीब अपने बच्चों को कुछ हजार रूपयों में बेच रहे हैं, और सरकार के अफसर ही ऐसे दर्जनों बच्चों को छुड़वा भी रहे हैं, जहां पर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बच्चों की बड़ी आबादी को दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो रहा है। और यह वही महाराष्ट्र है जहां पर अभी कुछ दिनों पहले सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक मंत्री ने शादी की इतनी बड़ी दावत दी, कि इंकम टैक्स को उसकी जांच शुरू करनी पड़ी, और खुद शरद पवार को उस पार्टी की निंदा करनी पड़ी, पार्टी में जाने के बाद। यह हाल तब है जब सोनिया गांधी की नजरों में महाराष्ट्र की भुखमरी, वहां का कुपोषण और वहां के सूखे कुएं, बच्चों और जानवरों की भयानक तस्वीरें रात-दिन सामने आ रही हैं। लेकिन सोनिया गांधी के ही प्रधानमंत्री की अगुवाई वाले योजना आयोग का यह पैमाना है कि छब्बीस रूपए रोज जो जिंदा रहने पर खर्च करते हैं, वे भारतीय गरीब नहीं माने जा सकते। 
यह वही महाराष्ट्र है जहां पर किसानों की खुदकुशी के मामले देश में सबसे अधिक दर्ज हो रहे हैं, बरसों से हो रहे हैं। यह वही महाराष्ट्र है जहां लवासा जैसे प्रोजेक्ट को लेकर शरद पवार के परिवार पर अरबों के फायदे वाले कारोबार में भागीदारी की खबरें आती हैं। यह वही महाराष्ट्र है जहां पर सिंचाई घोटाले के आंकड़े सदमा पहुंचाते हैं कि पानी की एक बूंद नहीं पहुंच पाई, और नेताओं की कंपनियों ने निर्माण ठेकों से अपनी तिजोरियां भर लीं। यह वही महाराष्ट्र है जहां आदर्श घोटाले जैसे मामले होते हैं जिनमें एक-दो-तीन पता नहीं कितने कांग्रेसी मुख्यमंत्री डूब जाते हैं। और इस महाराष्ट्र में ऐसा इसलिए भी हो पाता है क्योंकि यहां पर इसी तरह के राजनीतिक तौर-तरीकों वाले भाजपा के कल तक के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की कंपनियां तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप झेलती हैं, और उन्हें पद छोडऩा पड़ता है। यह महाराष्ट्र अगर भूखा नहीं मरेगा, और यह अगर सूखा नहीं मरेगा, तो भला और किस प्रदेश का इतनी संपन्नता के बाद भी ऐसे मरने का हक बनता है? 
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री इन दो के बंगलों पर एक बरस में सौ करोड़ से अधिक का खाना शायद इसीलिए खरीदा जा रहा है कि इस प्रदेश के कुपोषण के शिकार सारे बच्चों को ये अपने बंगले पर खिलाएंगे। और शायद इन्हीं बंंगलों पर राज्य में खुदकुशी करने वाले किसानों की तेरहवीं का खाना बनेगा। इसके बिना कैसे दो लोग सौ करोड़ से अधिक का खा सकते हैं? आज की तारीख में इस हिन्दुस्तान में और खासकर इस महाराष्ट्र में नेहरू और गांधी की पार्टी के ये नेता अपने खुद के लिए तो इतना खाना खरीदेंगे नहीं। पूरे राज्य के भूखों का खाना शायद इनकी रसोई में ही बनेगा। फिलहाल यह टेंडर देखने लायक है, और इसीलिए हम आज के पहले पन्ने पर इसे छाप रहे हैं।