यूपीए चले बाजार चाहे भौंकें हजार...


संपादकीय
30 अप्रैल 2013
सुप्रीम कोर्ट में आज मनमोहन-सरकार को जो शर्मिंदगी देखनी पड़ी है, वह  भारत के इतिहास में कम बार ही दर्ज हुई होगी, हो सकता है कि शायद कभी नहीं। और यह तो तय है ही कि निजी ईमानदारी के दावे वाले प्रधानमंत्री के राज में तो ऐसा भारतीय लोकतंत्र में कभी नहीं हुआ था, और होना भी नहीं चाहिए। इसी यूपीए सरकार के कोयला घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से, उसकी निगरानी में जो जांच चल रही है, उसकी जांच-स्थिति की रिपोर्ट सीबीआई ने अदालत में पेश करने के बजाय पहले उसे सरकार को दिखाया, उन मंत्रालयों को दिखाया जिनके चेहरों पर इस कोयला-घोटाले की कालिख लगी हुई है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को लेकर सरकार को जो फटकार लगाई है, और जितना धिक्कारा है, वह इस सरकार पर तो असर डालेगा या नहीं, पता नहीं, लेकिन इसने भारत के लोकतंत्र को हक्का-बक्का कर दिया है। 
सुप्रीम कोर्ट ने आज जो कहा, उसकी कुछ बातों को यहां पर देना जरूरी है। 
अदालत ने कहा- ....रिपोर्ट में जानकारी साझा करने की बात क्यों छिपाई गई? 12 मार्च को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को क्यों गुमराह किया और 26 अप्रैल को दिए हलफनामे में ड्राफ्ट में हुए बदलाव का  जिक्र क्यों नहीं था ?.... रिपोर्ट में क्या बदलाव किए गए।  किसके कहने पर रिपोर्ट बदली। तीन लोगों के अलावा किसको-किसको दिखाई।  किस नियम के तहत कानून मंत्री को दिखाई रिपोर्ट।.... सरकार के साथ सूचना साझा किए जाने से पूरी प्रक्रिया को गड़बड़ा दिया है।.... स्टेटस रिपोर्ट सरकार से साझा करने से हमारी जांच की बुनियाद हिल गई है।....सीबीआई की जांच स्वतंत्र होनी चाहिए और उसे कोई प्रभावित न करे। सीबीआई को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त किया जाए। अब पहली कोशिश सीबीआई को राजनीतिक दखल से आजाद कराने की होगी। सीबीआई को राजनीतिक आकाओं से मुक्त कराना होगा और जांच एजेंसी के इनके निर्देश की जरूरत नहीं है।....सीबीआई द्वारा पर्दा डालना सामान्य बात नहीं है।...आपको अपने राजनीतिक मालिकों से निर्देश लेने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों के कहे हुए ये वाक्य टुकड़े-टुकड़े में भी मनमोहन सरकार की करतूत के बारे में तस्वीर साफ करते हैं। और जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं, उसी वक्त देश की संसद भी इस पर फिक्र कर रही है, और देश में जो सोचने-विचारने वाले लोग हैं वे भी यह सोच रहे हैं कि मीडिया, जनसंगठन, अदालतें और विपक्ष कब तक इस सरकार के खिलाफ मामले उठाएंगे, और उनका हश्र क्या होगा? यह नौबत बुरी तरह अलोकतांत्रिक और शर्मनाक हो चुकी है। इस सरकार का हाल ऐसा दिख रहा है कि हाथी बाजार से गुजर रहा है, और कुत्ते उस पर भौंक रहे हैं, और वह बेखबर, बेफिक्र चले जा रहा है। यहां पर हम एक कहावत की तरह की मिसाल दे रहे हैं, इसका मकसद किसी जानवर या इंसान की बेइज्जती नहीं है, लेकिन ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह, यूपीए और कांग्रेस ने इसे अपनी नीति बना लिया है कि हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंकें हजार...।
दो ही दिन पहले सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे पर यह मंजूर करने पर कि उसने कानून मंत्री और कुछ मंत्रालयों से अदालत में देने के पहले रिपोर्ट साझा की थी, हमने इसी जगह कुछ कड़ी बातें लिखी थीं, और आज हम उससे अधिक कड़ी नई बातें लिखना चाहते हैं। हमने लिखा था- यूपीए सरकार ने सार्वजनिक जीवन और लोकतंत्र में नैतिकता और सामाजिक जवाबदेही के पैमानों को एक-एक करके घोलकर पी लिया है। यह कौन कल्पना कर सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में चल रही जांच में भी यह सरकार सीधे दखल रख रही है। इसके बाद फिर बचता क्या है? भारत सुप्रीम कोर्ट सीबीआई से ऊपर देश के बाहर की किसी जांच एजेंसी को लाकर तो जांच करवा नहीं सकता।....देश के लोकतंत्र पर से जनता का भरोसा ऐसी ही बातों से खत्म हो रहा है। जब लोग देख रहे हैं कि ताकत की कुर्सियों पर बैठे तमाम लोग पूरी गिरोहबंदी करके, साजिश और जुर्म के साथ अपनी लूटमार को बचाने में लग जाएं, और सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर रात-दिन जांच की चौकसी करनी पड़े, तो लोग लोकतंत्र को क्यों ढोएं?....इस बीच यूपीए सरकार ने, और कांग्रेस पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि उसे सीबीआई के मामलों में सरकार की ऐसी दखल में कुछ गलत नहीं लग रहा है। इसमें हैरानी कुछ नहीं है, काफी बरस हो गए हैं, यूपीए सरकार को किसी भी गलत काम में, कुछ भी गलत नहीं लगता है।
दो दिन पहले ही हमारी इन बातों के बाद आज सुप्रीम कोर्ट का जो कड़ा रूख इसी तरह का सामने आया है, उसके बाद मनमोहन सिंह किस तरह आज चैन से सोएंगे, यह देश को वेबकैमरे पर लाईव दिखाना चाहिए।  

जनता के नमक का हक अदा न करने वाले सांसदों के लिए


29 अपै्रल 2013
संपादकीय
भारतीय संसद ने काम करना फिर ठप कर दिया है। देश में बहुत से ऐसे मामले संसद के हर सत्र के पहले होते ही रहेंगे, जिनको लेकर संसद में काम न करने का एक रास्ता निकाला जा सके। लेकिन देश की जनता सांसदों की इस हरकत को देख-देखकर थक चुकी है। जिस काम के लिए जनता सांसदों को चुनती है, उन्हें बंगले देती है, हवाई टिकटें देती है, मोटी तनख्वाह देती है, बारातियों जैसा आलीशान खाना फुटपाथ के रेट पर देती है, वह जनता संसद में काम ठप देखकर सिर्फ नफरत करती है, और सांसदों को हिकारत से देखती है। आज ही कुछ ऐसे आंकड़े आए हैं जो बताते हैं कि आजादी के बाद से पांच बरसों में इस बार संसद सबसे कम काम वाली है। कार्यकाल पूरा करने के बावजूद जो सबसे कम उत्पादक रहे, उस पर भारतीय लोकतंत्र कैसा फख्र कर सकता है? लोकसभा सचिवालय के आंकड़े बता रहे हैं कि यह पन्द्रहवीं लोकसभा वक्त की बर्बादी में इसके ठीक पहले कि चौदहवीं लोकसभा से कड़ा मुकाबला कर रही है, और शायद यह पिछली लोकसभा से भी कम उत्पादक रहने जा रही है। लोगों को दो बातें याद रखने की जरूरत है। एक तो यह कि ये दोनों लोकसभा के कार्यकाल यूपीए की सत्ता के रहे, और एनडीए के विपक्ष के रहे। दूसरी बात यह कि यूपीए ने अपने इस दूसरे कार्यकाल में विरोध के बहुत मौके दिए, और एनडीए ने संसद के वक्त की पेटभर बर्बादी की। और संसद की रियायती कैंटीन मेें पेट भर-भरकर भी संसद का पेट खाली रखा। 
यह हालत इतनी शर्मनाक है कि जिस विपक्ष को संसद के भीतर सरकार को घेरना चाहिए, वह सिर्फ टीवी चैनलों की बहसों में यह काम कर रहा है। तो क्या इसे ऐसा समझा जाए कि यह संसद का इलेक्ट्रॉनिक-निजीकरण हो गया है? आज का जमाना आर्थिक उदारीकरण के चलते हर काम के निजीकरण का हो रहा है। और ऐसे में संसद में बहस से बचकर जब विपक्ष सिर्फ टीवी स्टूडियो में, और टीवी कैमरों के सामने, टीवी के परदों पर सत्ता से बहस करता है, तो यह लगता है कि इन सांसदों को खाना भी टीवी चैनलों से ही मांगना चाहिए, और अपना भत्ता भी, वेतन भी इन्हीं चैनलों से लेना चाहिए। जो जनता के पैसों का खाए, और टीवी के धंधे के लिए गाए, उसे क्या कहा जा सकता है, यह पाठक सोचें। उर्दू में इसके लिए एक शब्द है, जिसे संसद अपनी कार्रवाई में घुसने नहीं देती, लेकिन जिसे हम गाली नहीं मानते, सही तस्वीर बयां करने वाला एक शब्द ही मानते हैं। जब देश की गरीब जनता के पसीने के नमक का हक इस संसद के लोग अदा न कर सकें, तो उनके बारे में वह जनता क्या सोचती है, इसे काम न करने वाले सांसद पता लगा लें।
संसद का काम संसद में ही हो सकता है। वहां काम न करके विपक्ष कुछ साबित नहीं करता। हमको विरोध के तरीके में जापान के हड़ताली कर्मचारियों का तरीका याद पड़ता है, जो कि काम के घंटों के बाद अतिरिक्त घंटे काम करके इतना उत्पादन कर देते हैं कि कंपनी परेशानी में पड़ जाती है। अगर भारतीय संसद में विपक्ष को सत्ता को घेरना ही है, तो उसके लिए संसद से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती, जहां पर कि विपक्ष के विशेषाधिकार भी रहते हैं। जहां पर सरकार झूठ बोलने के पहले चार बार सोचने को मजबूर रहती है। ऐसी जगह को छोड़कर विपक्ष को टीवी चैनल सूझते हैं, यह शर्मनाक है। फिर संसद बाकी देश के लिए एक मिसाल भी रहती है। वह प्रदेशों की विधानसभाओं को रास्ता दिखाती है, और इसी किस्म की बर्बादी बाकी जगह भी होने लगती है। विपक्ष को बहिष्कार करने का कोई मुद्दा चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न लगता हो, वह संसद में काम करने से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। अब समय आ गया है कि सरकारी नौकरी की तरह सांसदों और विधायकों के लिए काम नहीं-तो-वेतन नहीं का इंतजाम लागू करना चाहिए। संसद की कार्रवाई जितने घंटे तय होते हैं, उनमें से जितने घंटे सांसद काम करें, उतनी देर उनका मीटर घुमाकर उनको वेतन भत्ते मिलने चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की बर्बादी उस संसद में सबसे अधिक हो रही है, जो संसद अपनी बहसों के लिए आज भी लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज है।

आजम की खुशफहमी से रश्क ही हो सकता है


29 अप्रैल 2013
अमरीका जाने पर हिंदुस्तान के लोगों को होने वाली परेशानियों में एक ताजा नाम जुड़ गया है, उत्तरप्रदेश के एक मंत्री आजम खान का। उनको अमरीका पहुंचने पर एयरपोर्ट पर रोककर एक कमरे में बिठाया गया, और पौन घंटे बाद वहां से जाने दिया गया। उनका आरोप है कि यह काम उत्तरप्रदेश के कांगे्रस के उनके एक विरोधी नेता, और आज हिंदुस्तान के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का किया हुआ है। इसे लेकर उन्होंने अमरीका से ही इतने बयान दिए, कि यहां का मीडिया उससे पट गया। 
खबरों के मुताबिक-आजम खान ने कहा, खुर्शीद ने मेरे खिलाफ साजिश रची। उनके इशारे पर ही मुझसे पूछताछ की गई। आजम ने कहा कि कि हमारी पार्टी के मुखिया जानते हैं कि वास्तव में क्या हुआ और इस घटना के पीछे कौन है। यूपीए को समर्थन पर वह जल्द ही कोई फैसला लेंगे। खान ने कहा, जब एयरपोर्ट पर मुझे अलग ले जाकर पूछताछ की जा रही थी तब हमें रिसीव करने पहुचे भारतीय दूतावास के अधिकारी हमारे साथ अजनबियों जैसा व्यवहार कर रहे थे। वे बिल्कुल खामोश और अलग-थलग थे। मुझे लगता है कि भारतीय दूतावास के अधिकारियों को उनके सीनियर्स ने पहले से ही अलग रहने का निर्देश दे दिया था। आजम खान ने कहा, अमरीका रवाना होने से 24 घंटे पहले अमरीका ने मुझे, मेरी पत्नी और बच्चों को 10 साल का वीजा दिया था। क्या पहले पता नहीं किया गया था कि मैं आतंकी हूं या नहीं? मुझे शक है कि दोनों सरकारों की सहमति से मेरा अपमान हुआ। ये जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज लगती है, क्योंकि देश में अपमान की कोशिशें नाकाम रही हैं।
आजम खान के बारे में इस बयान के बाद दो में से एक ही बात हो सकती है। एक तो यह कि वे मूर्ख हैं। और दूसरी यह कि वे अपने अलावा दुनिया के सारे लोगों को मूर्ख समझते हैं। एक तीसरी बात यह भी हो सकती है कि ये दोनों ही चीजें एक साथ लागू हो रही हों। 
भारत के बहुत से लोगों की दिक्कत यह है कि वे अपने एक मकसद के साथ जीते हैं, ऐसा करते हुए वे किसी को भगवान और किसी को हैवान बताते चलते हैं, यह एक और बात है कि राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से वे कभी अपने भगवान को हैवान बना देते हैं, और कभी किसी हैवान को भगवान बना लेते हैं, और वल्दियत के कॉलम में उसका नाम लिखने लगते हैं। पार्टी और नेता को छोडऩे वाले बहुत से लोग रहते हैं, जिनकी मोहब्बत नफरत की हद तक चली जाती है। ऐसी राजनीति में लोग राजनीतिक वजहों से किसी मुद्दे को उठाएं, वह तो समझ आता है, जब आजम खान जैसे लोग अमरीका जाकर भी अपने पसंदीदा प्रादेशिक, घरेलू और मजहबी वोटों का हिसाब चुकता करने के लिए इतना फूहड़ बयान देते हैं, तो हो सकता है कि अमरीका इस पर कुछ न कहे। मूर्खों के बारे में यह कहा जाता है कि उनसे बहस में उलझना नहीं चाहिए क्योंकि वे पहले समझदार को मूर्खता के अपने स्तर पर उतार लेते हैं, और फिर मूर्खता के अपने अनुभव और हुनर से वे समझदार को पछाड़ देते हैं। इसलिए आज इस आरोप और तर्क का कोई जवाब अमरीका या हिंदुस्तान की सरकार के पास नहीं हो सकता कि आजम खान को अमरीकी हवाई अड्डे पर रोकना भारत-अमरीका की संयुक्त मिलिट्री एक्सरसाइज लगती है। 
अगर सचमुच ऐसी बातों से आजम खान कुछ लोगों पर असर डाल सकते हैं, तो वैसे लोग तरस के हकदार हैं, हमदर्दी के हकदार हैं। और हमको उम्मीद है, आजम खान के वोटर, चाहे वे उनके पीछे ही खड़े हों, उनके मुकाबले अधिक समझदार होंगे, या कम से कम इनकी बातों के मुकाबले अधिक समझदार होंगे। कल के दिन आजम खान यह कहने लगे कि भारतीय उपग्रह अमरीकी जासूसी एजेंसी सीआईए के साथ मिलकर उनके घर के ऊपर नजर रख रहे हैं, ताकि छत पर उनके पहुंचते ही आसमान से उन पर गोलियां दागकर मिलिट्री एक्सरसाइज की जाए, तो हमको पक्का भरोसा है कि आजम खान के किसी भी समर्थक को उस पर भरोसा नहीं होगा। 
पिछले बरसों में भारत में इतनी बार अमरीका की खबरें छपी हैं कि यहां के लोग अब अच्छी तरह जानते हैं कि वहां के अपने सुरक्षा इंतजाम हैं, जिनसे भारत के रक्षा मंत्री रहते हुए जॉर्ज फर्नांडीज को भी गुजरना पड़ा था, और उस वक्त दिल्ली में खुद जॉर्ज की एनडीए सरकार थी। इसके बाद भूतपूर्व भारतीय राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम को भी अमरीका में जांच का सामना करना पड़ा था। इसलिए वहां जाने वाले लोगों को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि वहां उनकी कैसी जांच-पड़ताल होगी। कुछ महीने पहले भारतीय फिल्म अभिनेता शाहरूख खान जैसे जाने-पहचाने चेहरे को भी वहां घंटों पूछताछ का सामना करना पड़ा था, और उस वक्त भी केंद्र में यूपीए सरकार थी जिसकी शाहरूख खान से कोई दुश्मनी नहीं थी। 
हमने पहले भी इस बारे में लिखा था कि जांच से बचने की कोशिश किसी को नहीं करनी चाहिए, और अमरीका में ही नहीं, हिंदुस्तान में भी किसी एयरपोर्ट पर या किसी और जगह किसी को जांच से रियायत क्यों मांगनी चाहिए? देश में ऐसे कितने ओहदे हैं, जिन पर बैठे हुए लोग तरह-तरह के जुर्म में शामिल नहीं मिले हैं? बड़े-बड़े जजों से लेकर बड़े-बड़े मंत्रियों तक और मुख्यमंत्रियों तक लोग जेल आते-जाते रहते हैं। ऐसे में किसी ओहदे की वजह से किसी को छूट क्यों मिले? 
और जहां तक किसी सार्वजनिक जगह की बात है, किसी को भी सुरक्षा से छूट देने का मतलब बाकी लोगों की हिफाजत को खतरे में डालना। अपने-आपको दूसरे इंसानों से ऊपर मानना, या किसी दूसरे देश के उसके नियम-कायदों, उसके इंतजाम से ऊपर मानना, एक बददिमागी है। और हिंदुस्तान की राजनीति और सत्ता ऐसे बददिमाग लोगों से भरी पड़ी हैं।
आजम खान बहुत आत्ममुग्ध और खुशफहम इंसान लगते हैं। उनके लिए भारत और अमरीका एक संयुक्त मिलिट्री एक्सरसाइज करें, उनका यह सोचना हैरान करने वाला है और उनकी ऐसी खुशफहमी से हमको रश्क ही होता है। कोई इंसान अपने को इन दो देशों की साझा फौजी कार्रवाई के लायक समझे, ऐसा अभी तक हम सिर्फ ओसामा बिन लादेन के बारे में सोच सकते थे, भारत के किसी एक राज्य के एक मंत्री के बारे में नहीं। 
आजम खान से इस देश के लोगों को, और अमरीका के लोगों को भी दो बातें सीखनी चाहिए, अपने बारे में कोई कितना ऊंचा सोचे, और दूसरों के बारे में कोई कितना नीचा सोचे, ये पैमाने दोनों देश और उनके लोग उनसे सीख सकते हैं। 
आजम खान ने ऐसी बातें कहकर सबसे पहले अपने प्रदेश के लोगों, अपने साथ के लोगों की बेइज्जती की है कि वे इतने मूर्ख हैं कि ऐसी बातों पर भरोसा करेंगे। दूसरी बेइज्जती उन्होंने अपनी पार्टी की की है, जिसको उन्होंने ऐसी बेबुनियाद बातों में झोंका है। और इस देश की भी उन्होंने बेइज्जती की है, कि यहां के किसी राज्य का कोई मंत्री अपने-आपको भारत और अमरीका की मिली-जुली मिलिट्री एक्सरसाइज के लायक मानता है। इसके साथ-साथ एक बेइज्जती उन्होंने अपनी खुद की भी की है, क्योंकि हम मामूली अक्ल वाले किसी इंसान से भी ऐसी बात की उम्मीद नहीं करते थे।
कुछ हफ्ते पहले एक इंटरव्यू में आजम खान ने कहा था-जब दिल्ली की सड़कों पर सामूहिक बलात्कार के मामले को लेकर सारे हिंदुस्तान का नौजवान पंजों पर खड़ा हो जाता है और सरकार से एक मजबूत कानून की मांग करते है और और ये लगने लगता है केंद्र सरकार को कि तहरीर चौक की तरह कोई इंकलाब आ जाए। तभी सरहदों पर अचानक दो सर उतर जाते हैं। और अगले दिन कोई मामला नहीं रहता और बात खत्म हो जाती है। हमने ये बात उस वक्त भी कही लेकिन हमारी बात का किसी ने नोटिस लिया ही नहीं। खामोश हो गए।
उनके इस बयान को लेकर उनकी समझ को समझा जा सकता है, और शायद उनकी खुद की पार्टी उनकी गैरजिम्मेदारी की हरकतों के साथ खड़ी नहीं रहेगी।

छोटी सी बात


28 अप्रैल 
निजी बातें न पूछें
भारत में यह आम बात है कि नए लोगों से मिलने पर बातचीत के दौरान लोग उनकी जात, उनके शादीशुदा होने या न होने, बच्चे होने या न होने की जानकारी लेने लगते हैं। लेकिन सभ्य दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में इसे बदतमीजी माना जाता है कि आप शुरुआती कुछ मुलाकातों में ही किसी से उनकी निजी जानकारी लेने लगें। सार्वजनिक जीवन का शिष्टाचार भी इसके खिलाफ है। 
भारत में लोग किसी महिला से सीधे यह पूछने पर उतर आते हैं कि उनके मिस्टर क्या करते हैं? अपने निजी जीवन का सम्मान करने वाले बहुत से लोग ऐसे सवालों पर रूखा जवाब देते हुए झिड़क सकते हैं। इसलिए किसी से अंतरंगता के बिना इस तरह के सवाल कभी न करें। किसी से सीधे-सीधे उनका मोबाइल नंबर मांगने के बजाय अपना मोबाइल नंबर लिखकर उन्हें देना बेहतर होता है, ताकि उनको ठीक लगे, और जरूरत हो तो वे ही आपको फोन लगा लें। 
ऐसी छोटी-छोटी बातें कुछ जगहों पर आपको ऊपर ले जाने में मदद कर सकती हैं, या आपको रोकने का काम कर सकती है। इसलिए शिष्टाचार को सीखने में कोई बुराई नहीं होती, और आप अपनी बेइज्जती करवाने से बचते हैं। 
-सुनील कुमार

पहली बार छत्तीसगढ़ पूरी दुनिया की नजरों में


28 अपै्रल 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में आज शाम होने जा रहा आईपीएल का क्रिकेट मैच इस राज्य के अस्तित्व में आने के बाद से अब तक का सबसे बड़ा खेल आयोजन भी है, और किसी भी किस्म का सबसे बड़ा कार्यक्रम भी है। इससे एकमुश्त इस राज्य का नाम दुनिया के उन तमाम देशों में कम से कम इस हफ्ते के लिए तो लिया ही जाएगा, जहां पर लोग क्रिकेट को शौक से देखते हैं। इसमें राज्य सरकार के कई करोड़ रुपये तो लग रहे हैं, लेकिन इस खर्च का न्यायसंगत और तर्कसंगत आधार यह है कि इससे छत्तीसगढ़ में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की एक शुरूआत हो रही है। 
यह बात सही है कि एक नए राज्य को दुनिया की नजरों में आने के लिए बहुत सी कोशिशें करनी पड़ती हैं। यह राज्य न तो समंदर के किनारे बसा हुआ है कि जहां समुद्री व्यापार और दूसरी वजहों से उसका नाम चर्चा में रहे। और न ही यह किसी अंतरराष्ट्रीय तीर्थ जैसा है कि जिसकी वजह से लोग यहां पर आएं। यहां पर ताजमहल भी नहीं है, और न ही बुद्ध ने यहां का कोई पेड़ छांटा था। ऐसे में इस नए और छोटे राज्य, अविभाजित मध्यप्रदेश की गुलामी से आजाद हुए राज्य, को देश के भीतर ही अपनी मौजूदगी के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी। बिजली के मोर्चे पर कामयाबी से लेकर, गरीबों के राशन के हक को देश में सबसे अधिक मजबूती से उन तक पहुंचाने को लेकर इस राज्य को खबरों में जगह मिली, जिनमें आमतौर पर भोपाल से विरासत में मिली हुई नक्सल हिंसा ही छाई रहती थी। आज भी भारत के भीतर हाल यह है कि बहुत से लोग छत्तीसगढ़ और झारखंड को लेकर, इनकी राजधानियों को लेकर गलतफहमी में रहते हैं। भारत सरकार की सैकड़ों वेबसाईटों पर, देश की कपंनियों की वेबसाईटों पर छत्तीसगढ़ के अंगे्रजी हिज्जे गलत चलते हैं, और उसका नुकसान कम नहीं होता है। इसलिए इस राज्य में जब क्रिकेट जैसे बाजारू बनाए गए खेल का भी एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय जलसा हो रहा है, जिसे लेकर पूरी दुनिया में कम से कम कुछ दिनों के लिए इस राज्य और इस राजधानी का नाम लिया जाएगा, तो यह खर्च जायज है।
आज के जमाने में किसी राज्य का ढांचा सिर्फ सड़कों, बिजली के तारों, और नहरों से नहीं बनता। सूचना के बाजार में उसकी अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी भी जरूरी होती है, और यह काम रातों-रात नहीं हो सकता, कितना भी खर्च करने पर नहीं हो सकता। इसके लिए एक दूरदृष्टि की जरूरत भी पड़ती है, और इसमें सरकार से परे भी कई बाहरी लोगों का योगदान सरकार के खुद के काम के मुकाबले अधिक काम का हो सकता है। छत्तीसगढ़ में आईपीएल के इस क्रिकेट मुकाबले का होना इसी तरह का है, छत्तीसगढ़ क्रिकेट संघ ने सरकार से परे भी कोशिश करके यह मेजबानी हासिल की है, और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की टीम मेजबानी पाने का यह मैच एक कड़े मुकाबले में जीत भी चुकी है। उनके मुख्यमंत्री रहने का यह दसवां साल चल रहा है, और वे क्रिकेट में हैट्रिक की तरह छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में भी हैट्रिक की उम्मीद कर रहे हैं। इस आयोजन से अगर विधानसभा चुनाव पर कोई असर होगा, तो वह क्रिकेट चाहने वाले लोगों से कुछ फायदा मिलने का ही होगा। 
लेकिन इस मौके पर एक बात कहे बिना यह मुद्दा अधूरा रह जाएगा। राजधानी रायपुर सहित पूरे प्रदेश में खेल के मैदानों पर गैरखेल आयोजन रात-दिन चलते हैं। जो राजधानी मीडिया की नजरों में सबसे अधिक रहती है, वहां भी मैदान सिमटते चले गए हैं, और छोटे रह गए मैदानों पर भी तरह-तरह की प्रदर्शनियां लगी रहती हैं। अगर छत्तीसगढ़ के इस अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में आगे कभी खेलने के लिए इस राज्य के खिलाडिय़ों को भी सपना देखना है, तो उनके लिए अपने गांव, कस्बे और शहर के खेल मैदान भी पाना जरूरी होगा। इस मौके पर राज्य सरकार को यह पक्का इरादा घोषित करना चाहिए कि खेल के मैदानों पर कोई भी गैरखेल आयोजन नहीं होने दिया जाएगा। उसके बिना यह राज्य खिलाड़ी नहीं बनेगा, दर्शक ही बना रहेगा। बड़े मौके बड़े इरादों को तय करने के लिए भी इस्तेमाल करने चाहिए, और आज का मौका छत्तीसगढ़ और डॉ. रमन सिंह के लिए ऐसा ही है।

छोटी सी बात


27 अप्रैल 
जहां घूमने जाएं, वहां का देखें-खाएं
किसी देश-प्रदेश या शहर घूमने को जाना हो, तो उसके बारे में पहले पढ़ लेने से वहां का आपका सीमित समय अधिक से अधिक इस्तेमाल हो जाता है। बहुत से लोग स्थानीय गाइड पर जरूरत से अधिक निर्भर हो जाते हैं, या भरोसा कर लेते हैं। कुछ लोग अपने दोस्तों से मिली जानकारी को काफी मान लेते है जबकि ऐसा सच नहीं होता है। इन दिनों इंटरनेट से हर जगह के बारे में जानकारी आसानी से मिल सकती है। 
कुछ लोग नई जगह जाकर भी उन सामानों की खरीदी में जुट जाते हैं, जो कि बड़ी कंपनियों के हैं, और किसी भी जगह मिल सकते हैं। पर्यटकों को स्थानीय हस्तशिल्प, स्थानीय कला-संगीत, स्थानीय व्यंजन और स्थानीय खूबियों पर समय लगाना चाहिए, तभी आपका कहीं घूमने जाना सार्थक हो सकता है। किसी पर्यटन केन्द्र जाकर भी किसी मॉल या शापिंग कॉम्पलेक्स में समय लगाना, फिल्म देखना, खासी बरबादी है। इसलिए जहां जाते हैं वहां की स्थानीय खूबियों पर समय लगाएं, और इन खूबियों को जानने के लिए वहां पहुंचने के पहले ही एक मोटी-मोटी फेहरिस्त बनाकर रखें कि आपको वहां क्या करना है, क्या देखना है। अपने समय और अपने खर्च के बेहतर इस्तेमाल के लिए कई दिन पहले से सफर की तैयारी करनी चाहिए, और उसके लिए जिन दर्जनों बातों की जरूरत पड़ती है, आज की बात उनमें से एक है। बाकी फिर कभी।
-सुनील कुमार

छोटी सी बात


26 अप्रैल 
हर चमकदार चीज सोना नहीं होता
इन दिनों पश्चिम बंगाल में चिटफंड कंपनियों की जैसी धोखाधड़ी पकड़ा रही है, उनके चलते दसियों लाख गरीब लोग अपनी जमा पूंजी खो चुके हैं। इसलिए आपके पास कम पैसे हों या अधिक, उनको लापरवाही से कहीं न लगाएं। यह मानकर चलें कि जो लोग सितारों के सपने दिखाते हैं, वे आमतौर पर धरती पर ला पटकते हैं, और इतनी बुरी तरह पटकते हैं, कि गरीब एक जन्म उठकर खड़े भी नहीं हो पाते।
जमीनों और मकानों के बड़े-बड़े सपने दिखाने वाले लोग कहीं पर बड़े दानदाता बनकर, तो कहीं पर रात-दिन जलसों में अपने चेहरे दिखाकर, बड़े-बड़े इश्तहार छपवाकर,  खुद के अखबार और टीवी चैनल खड़े करके कैसा धोखा देते हैं यह छत्तीसगढ़ में भी लोगों ने देखा हुआ है। इसलिए अपनी रकम को बहुत सावधानी से कहीं पर लगाएं, अगर मेहनत की है तो भी, और चोरी-भ्रष्टाचार की है, तो भी। भ्रष्ट कमाई को भी अगर कहीं फेंकना हो, तो जरूरतमंदों पर खर्च करें, जाहिर तौर पर जो जालसाज दिखते हैं, उनकी सुनहरी योजनाओं पर खर्च न करें।
-सुनील कुमार

जंगखोरों के नगाड़ों के बीच समझदारी की बात मुश्किल


संपादकीय
27 अप्रैल 2013
पाकिस्तान की जेल में बंद एक हिंदुस्तानी पर वहां हुए हमले को लेकर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खासा विचलित है। और वह इस बात पर भी विचलित है कि लद्दाख में चीन ने भारत के कहे जा रहे इलाके में घुसपैठ की है, और भारत सरकार इसके खिलाफ फौजी कार्रवाई नहीं कर रही है। पाठकों को याद होगा कि एक भारतीय सैनिक का सिर कटा बदन मिलने के बाद भारतीय मीडिया का एक तबका, और भारतीय राजनीति का एक हिस्सा, इस कदर विचलित थे कि पाकिस्तान के खिलाफ जंग की बातें छिड़ गई थीं, गनीमत कि जंग नहीं छिड़ी। इन्हीं दिनों श्रीलंका में तमिलों के साथ बुरा बर्ताव खबरों में आने पर उसके खिलाफ कड़ी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की मांग होने लगी थी। ये तो कुछ बातें दूसरे देशों के साथ रिश्तों को लेकर हैं। लेकिन इससे परे देश के भीतर के भी ऐसे बहुत से मामले हैं जिनको लेकर जनता के बीच तनाव और आंदोलन के चलते कई किस्म की कड़ी बातें की जाती हैं। 
सच और तथ्य का हर बार जनधारणा से कुछ रिश्ता होना जरूरी नहीं होता। जनधारणा अलग होती है, और हकीकत कई बार उससे बिल्कुल अलग। उत्तेजना में भरी हुई भीड़ के बारे में कहा जाता है कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता, यह बात भी कई जगहों पर लागू होती है। भारत में हाल के बरसों में मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने-आपमें एक भीड़ की तरह बर्ताव करने लगा है, और कई मौकों पर उसने यह साबित किया है कि उसके रूख का दिमाग से अधिक रिश्ता नहीं रह जाता। इसी तरह भारत के भीतर एक ऐसा राजनीतिक तबका है जो अपनी साम्प्रदायिक और धर्मांध राजनीति के चलते पाकिस्तान के साथ युद्ध को भारत की दिक्कतों का एक बड़ा इलाज मानता है, और चीन के खिलाफ फौजी कार्रवाई भी कुछ तबकों को एक आसान इलाज दिखता है। भारतीय टीवी पर कुछ रिटायर्ड फौजी अफसर इस बात पर मलाल करते दिखते हैं कि फौज को दो-दो हाथ करने देने के बजाय दिल्ली में बैठे नेता बातचीत को रास्ता मानते हैं। इन अफसरों की यह सोच उस तंग नजरिए का सुबूत है जिसके तहत लोग अपने हुनर, अपनी खूबी, अपनी ताकत और अपनी शान को ही अकेला हल मानते हैं। एक पुरानी कहावत चली आ रही है कि गिलहरी को नीम का फल मिला, तो हकीम बन बैठी। भारत में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनको महज बंदूक की समझ है, और वे हर खतरे का इलाज बंदूक को मानते हैं। 
जंग की बातें उन्हीं लोगों को सुहा सकती हैं, जिन्होंने जंग से कभी जख्म नहीं खाए हैं। दुनिया के किसी युद्ध से कभी यह साबित नहीं होता कि सही कौन है, किसी भी जंग से महज यह साबित होता है कि अधिक ताकतवर कौन है। दुनिया में एक ऐसा जंगखोर तबका भी होता है, जो लड़ाई के वक्त हथियार और बाकी सामान खपाकर कमाई करता है। ऐसे तबके की तरफ से मीडिया के मार्फत, राजनीति के मार्फत देश को भड़काने की साजिशों में कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। पूरी दुनिया में जंग के सौदागर पूरे वक्त यह काम करते रहते हैं, और भूखों के निवालों के बजाय वे गोलियों को अधिक जरूरी साबित करते रहते हैं। भारत के अलावा भी दूसरे देशों में हथियार-माफिया का यही रूख रहता है, और इसके लिए वे एक नहीं, कई सिर काटकर फेंक सकते हैं। कई बार हमको यह भी लगता है कि फौज के जो रिटायर्ड आला-अफसर लोकतंत्र में विशेषज्ञ-रणनीतिकार की तरह पेश किए जाते हैं, वे भी हथियार-कंपनियों की सेहत के लिए मददगार होते हैं। 
इसलिए हिंदुस्तान हो, या कि कोई और मुल्क, लोगों को अपने दिल-दिमाग पर काबू रखना चाहिए। किसी देश के भीतर ही, उसकी जेलों में अपने ही लोग, अपने ही देश के कैदी को कितनी ही बार नहीं मारते हैं? कई बार मौतें होती हैं, और कई बार ऐसे आरोप भी सामने आते हैं कि जैसे दिल्ली-बलात्कार के मुख्य अभियुक्त के दिल्ली जेल में आत्महत्या के बाद सामने आए हैं। इसलिए अगर किसी दूसरे देश की जेल में किसी दूसरे देश के कैदी पर हमला होता है, तो उसे उस दूसरे देश पर हमला मान लेना, या करार देना ठीक बात नहीं है। कल के दिन भारत की किसी जेल में पाकिस्तान के किसी कैदी पर हमला क्या हो ही नहीं सकता? और क्या वैसे दो-दो हाथ कर लेने की बात ठीक होगी? 
मीडिया से लेकर राजनीति तक, इन तमाम ताकतों को अपनी हस्ती बचाए रखने के लिए कई किस्म के उकसावों की मदद लेनी पड़ रही है। जब जनता के कम जागरूक बनाकर रखे गए तबके के बीच भड़काने वाली बातों पर अधिक दर्शक, अधिक तालियां, अधिक वोट मिल सकते हैं, तो फिर जंग की बातें तेजी से उठाई जाती हैं। 
दुनिया के हर देश में राजनीतिक शिक्षण की जरूरत है, लोकतंत्र और इंसानियत की जरूरतों को समझने की जरूरत है, और जंग के उकसावे से बचने की जरूरत है। हमारा लिखा हुआ चूंकि हिंदुस्तान में ही अधिक पढ़ा जाएगा, या देश के बाहर बसे हिंदुस्तानी ही इसको अधिक पढ़ेंगे, इसलिए यहां पर हिंदुस्तान की मिसालें अधिक हैं। आज भारत में दिक्कत यह है कि किसी पार्टी का कोई ऐसा अमनपसंद बड़ा नेता भरोसेमंद नहीं रह गया है जिसकी कही बातों का असर युद्धोन्मादी लोगों की बातों से अधिक हो। भारत के लिए यह एक खतरनाक नौबत है। भारत के पड़ोस के पाकिस्तान में दुनिया ने देखा हुआ है कि किस तरह युद्धोन्माद युद्ध और आतंक तक ले जाकर छोड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट की नजरों के सामने यूपीए सरकार का ऐसा दुस्साहस


संपादकीय
26 अप्रैल 2013
सीबीआई ने आज सुप्रीम कोर्ट में कोयला घोटाले की जांच की स्टेटस रिपोर्ट को लेकर जो हलफनामा दायर किया है, वह यूपीए सरकार के लिए भयानक है। जांच की स्थिति बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से यह रिपोर्ट मांगी थी, और इस रिपोर्ट के बारे में अदालत ने यह पूछा था कि क्या इसकी जानकारी सरकार के लोगों को बताई गई है, तो देश के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि यह रिपोर्ट सिर्फ जजों की आंखों के लिए बनी है, यह एक गोपनीय दस्तावेज है, और यह सिर्फ अदालत को जांच की प्रगति बताने के लिए बनाई गई है, इसलिए यह रिपोर्ट जजों के अलावा किसी को नहीं बताई गई। लेकिन अदालत के अपने शक थे, जजों ने सीबीआई के निदेशक को एक निजी हलफनामा दायर करने को कहा कि अदालत को दी गई जांच-स्थिति-रिपोर्ट सरकार को नहीं दिखाई गई, और यह भी कि आगे भी यही सावधानी बरती जाएगी। इस पर आज सीबीआई निदेशक ने जो हलफनामा दायर किया, उसमें रंजीत सिन्हा ने दो पन्नों के इस हलफनामे में माना है कि उन्होंने इस मुद्दे पर बनी स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करने से पहले पीएमओ, कानून मंत्री और कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिव को दिखाई थी। लेकिन उन्होंने यह नहीं माना कि इसमें कोई बदलाव किया गया था। 
जो सरकार, और कोयला घोटाले के खास जिम्मेदार कोयला मंत्रालय के अलावा कानून मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय सुप्रीम कोर्ट के जजों की आंखों के लिए ही बनाई गई स्थिति-रिपोर्ट को देख रहे हैं, और उस हालात में भी देख रहे हैं जब प्रधानमंत्री खुद कोयला घोटाले के वक्त के कोयला मंत्री भी थे। अब इसके बाद और क्या बचता है? इस देश में सुप्रीम कोर्ट इस मामले की निगरानी खुद कर रहा हो, उसकी आंखों तले देश का सबसे बड़ा सरकारी वकील एक झूठा भरोसा दिला रहा है, और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का मुखिया जांच रिपोर्ट को उस सरकार के साथ साझा कर रहा है जो कि देश के इस सबसे बड़े घोटालों में से एक के लिए जिम्मेदार हैं। 
यूपीए सरकार ने सार्वजनिक जीवन और लोकतंत्र में नैतिकता और सामाजिक जवाबदेही के पैमानों को एक-एक करके घोलकर पी लिया है। यह कौन कल्पना कर सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में चल रही जांच में भी यह सरकार सीधे दखल रख रही है। इसके बाद फिर बचता क्या है? भारत सुप्रीम कोर्ट सीबीआई से ऊपर देश के बाहर की किसी जांच एजेंसी को लाकर तो जांच करवा नहीं सकता। और केन्द्र सरकार-सीबीआई की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में रात-दिन खड़े होने वाले सरकारी वकील की बात अगर ऐसी फर्जी साबित होती है, तो सुप्रीम कोर्ट क्या अब सरकारी एजेंसियों और सरकारी पदों पर बैठे लोगों से उनके हर शब्द को हलफनामे पर मांगे? फिर हमारा यह भी मानना है किसी अदालत में जजों के सामने जो बात कही जाती है, वह बात हलफनामे जैसी ही होती है, उसके लिए अदालत हलफनामा न भी मांगे, तो भी उसे खरा सच कहना ही मानना चाहिए। 
देश के लोकतंत्र पर से जनता का भरोसा ऐसी ही बातों से खत्म हो रहा है। जब लोग देख रहे हैं कि ताकत की कुर्सियों पर बैठे तमाम लोग पूरी गिरोहबंदी करके, साजिश और जुर्म के साथ अपनी लूटमार को बचाने में लग जाएं, और सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर रात-दिन जांच की चौकसी करनी पड़े, तो लोग लोकतंत्र को क्यों ढोएं? ऐसे लोकतंत्र के बजाय वह नक्सलतंत्र अधिक पारदर्शी है जो कि अपने हिंसक और हथियारबंद आंदोलन के किसी पहलू को नहीं छुपाता,  गांव की चौपाल में अपने अंदाज की अदालत लगाकर जनसुनवाई कहते हुए लोगों का गला रेत देता है। उसमें कहीं कोई छल-कपट या साजिश नहीं है, सीधी-सीधी हिंसा है, लोकतंत्र पर सीधा-सीधा वार है, लोकतंत्र के खिलाफ सीधा-सीधा युद्ध है। लेकिन जिस सरकार को पारदर्शी तरीके से, ईमानदारी से देश को चलाने का जिम्मा दिया गया है वह अपनी लूटमार को दबाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की नजरों के सामने ही ऐसा दुस्साहस दिखा रही है। इस सरकार के मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की इस काबिलीयत से अर्थशास्त्र की दुनिया भी अब तक नावाकिफ थी। और सुप्रीम कोर्ट के एक वकील रहते हुए देश के कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस दुस्साहस से सुप्रीम कोर्ट भी अब तक नावाकिफ रहा होगा, ऐसा हमारा अंदाज है। चूंकि यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत के सीधे-सीधे खिलाफ है, इसलिए इस पर अधिक अटकलबाजी के बजाय हम उसकी कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं, इस बीच यूपीए सरकार ने, और कांग्रेस पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि उसे सीबीआई के मामलों में सरकार की ऐसी दखल में कुछ गलत नहीं लग रहा है। इसमें हैरानी कुछ नहीं है, काफी बरस हो गए हैं, यूपीए सरकार को किसी भी गलत काम में, कुछ भी गलत नहीं लगता है। 

जालसाज पेंटिंग नहीं खरीदते, पेंटर सीएम को खरीदते हैं...


संपादकीय
25 अप्रैल 2013
पश्चिम बंगाल में सैकड़ों या हजारों करोड़ का जो चिट फंड घोटाला सामने आया है, उसने ममता बैनर्जी को अपने साथियों सहित कटघरे में खड़ा कर दिया है। अदालती कटघरा न सही, जनता की अदालत में तो ये सब शक के दायरे में आ ही गए हैं। बरसों से जालसाजी के पूरे अंदाज में चिट फंड के नाम पर लाखों गरीबों की जमा रकम लूटते आ रहे एक जालसाज ने जब मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की बनाई एक पेंटिंग एक करोड़ छियासी लाख रूपए में खरीदी, तब भी किसी समझदार और ईमानदार मुख्यमंत्री की आंखें खुल जानी थीं। इसके बाद इस कंपनी के खिलाफ सेबी जैसी राष्ट्रीय एजेंसी ने राज्य सरकार को सावधान किया था, उसके बाद भी किस तरह ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की अभिनेत्री सांसद इस जालसाज चिट फंड कंपनी के इश्तहारों में आकर उसे बढ़ावा देती रही, खुद ममता के बारे में खबर यह है कि इस चिट फंड कंपनी के दो अखबारों का पिछले बरस उद्घाटन उन्होंने किया था। 
अभी हम इस जालसाज की उस लंबी चि_ी को सुबूत नहीं मान रहे जिसमें उसने सीबीआई को यह लिखा है कि किस तरह तृणमूल कांग्रेस का एक सांसद सोलह लाख रूपए महीने इस कंपनी से पाता था, और कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस के और लोग मिलाकर हर महीने कोई पौन करोड़ रूपए इससे पाते थे। इस जालसाज ने जो लिखा है, उसके मुताबिक तो तृणमूल कांग्रेस का सांसद इस कंपनी को ब्लैकमेल कर रहा था। इसी चि_ी की एक दूसरी बात देश के आज के अखबारों में कहीं छपी है, और कहीं नहीं छपी है। इस जालसाज ने किसी एक संदिग्ध सौदे को करवाने के एवज में चेन्नई की एक महिला वकील चिदंबरम का नाम भी कई जगह लिखा है और उसे करोड़ों रूपए देने की बात भी कही है। उसने प्रणब मुखर्जी के करीबी होने का दावा करने वाले लोगों का नाम भी लिखा है, और उनको भी लंबे-चौड़े पैसे देने की बात कही है। 
ममता बैनर्जी से शुरू करके हम बात को सत्ता और जालसाजों के संबंधों पर ले जाना चाहते हैं। आज देश में सेबी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जो कंपनी सबसे बड़े मामले में उलझी हुई है, उस सहारा की बात करें, तो उसके चर्चित मालिक के साथ देश के बड़े-बड़े लोग उसकी दावतों में दिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दो-चार दिन पहले ही इस कंपनी को फटकार लगाते हुए कहा है कि वह अदालत का बेजा इस्तेमाल कर रही है। इस कंपनी पर जो आरोप लगे हैं, और जो विरोधियों ने नहीं, सेबी जैसी संस्था ने लगाए हैं, उनके मुताबिक, और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक यह कंपनी हजारों करोड़ जमा करने वालों के नाम नहीं बता रही है। यह पूरा सिलसिला शक से भरा हुआ है, और देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश भी इस कंपनी से न वसूली कर पा रहा है, और न ही जानकारी निकाल पा रहा है। ऐसे में वे सैकड़ों तस्वीरें याद पड़ती हैं जिनको सहारा के मालिक अपनी दावतों में आए हुए सत्ता पर काबिज लोगों के साथ खिंचवाते हैं, और पूरे-पूरे पन्ने के इश्तहारों में छपवाते हैं। 
अब एक तरफ देश की सबसे बड़ी अदालत, दूसरा शेयर बाजार को नियंत्रित करने वाली सेबी नाम की संस्था, और तीसरा देश-प्रदेशों की सत्ता, इनमें से अगर किसी को भी जालसाजों से, शक से घिरे हुए लोगों से परहेज नहीं होगा, तो जनता के पैसे इसी तरह डूबते रहेंगे। भारतीय लोकतंत्र में अब यह सामने आ रहा है कि जनता के पैसे उगाहने वाली कंपनियां किस तरह टीवी और अखबार निकालकर अपना एक दबदबा कायम करती हैं, और उसके साथ-साथ सत्ता को रिश्वत देकर, सितारों से अपने इश्तहार करवाकर, किस तरह जनता की आंखों में धूल झोंकते हैं, और बुलबुले के फूट जाने तक वे उसकी सतह पर तैरते और चमकते रंगों की तारीफ खरीदे हुए मीडिया में करवाते चलते हैं। 
जनता से एकदम समझदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। और सरकारों, संवैधानिक संस्थाओं, और लोकतंत्र का स्तंभ होने का दावा करने वाले मीडिया की यह जवाबदेही है कि शक से भरे हुए जालसाजी के कारोबारों का भांडाफोड़ समय रहते क्यों नहीं होता? और क्यों देश के सबसे महंगे वकीलों के सहारे धोखेबाज और जालसाज लोग सुप्रीम कोर्ट तक को बेबस बनाकर चलते हैं। 
बंगाल का यह मामला न अपने किस्म का पहला है, और न आखिरी। गरीब बंगाली की जमा पूंजी जिस तरह सत्ता के पसंदीदा जालसाज, उसकी रहमतले लूट रहे हैं, यह देखने लायक है। सार्वजनिक जीवन का तकाजा तो यह है कि ऐसे जालसाजों से जिन लोगों ने भी फायदा लिया है, और फिर वे चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष की राजनीति में रहे हों, उनको विदा किया जाना चाहिए। ममता बैनर्जी को पौने दो करोड़ से अधिक एक पेंटिंग के लिए जब मिले, तब पार्टी अध्यक्ष का दिमाग ठनका हो या न ठनका हो, एक मुख्यमंत्री के मन तो सवाल उठना ही चाहिए था कि इतना दान देने वाले की नीयत क्या है? 

आज की नाकामयाबी पर एक नए कानून का कफन


संपादकीय
24 अप्रैल 2013
कुछ दशक पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में बुरी तरह पेचिश फैला, जिसमें बहुत लोग मारे गए। गांव-गांव तक जब जांच की गई, तो कुछ मरीज ऐसे भी मिले जिन्हें डॉक्टरों ने दवाई का पत्ता देकर रोज एक गोली लेने कहा था, और वे रोज एक गोली ले भी रहे थे, फिर भी वे नहीं बचे। उसकी वजह यह निकली कि वे पत्ते से दवाई को निकालकर खाने के बजाय उसके कवर सहित खा रहे थे। अब ऐसे में वह दवाई असर करे तो क्या करे? और दवा को बेअसर जानकर अगर कोई उसकी खुराक को बढ़ाते चलें, तो उससे भी क्या फर्क पड़ेगा? 
कुछ उसी तरह का माहौल आज देश में बना हुआ है, जब बलात्कार पर कानून को कड़ा करते जाने की कवायद चल रही है। आज माहौल ऐसा हो गया है कि कुछ लोग अगर बलात्कारियों को फांसी देने के खिलाफ बात करें, क्योंकि वे मौत के सजा के ही खिलाफ हैं, तो लोग उन्हें बलात्कारियों का हमदर्द मान लेंगे। लेकिन दवा की पन्नी को उतारे बिना उसकी खुराक बढ़ाने का कोई फायदा हो सकता है? 
कल की एक खबर है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 2001 से लेकर 2010 तक दर्ज किए गए बलात्कार के मामलों में मात्र 36,000 अभियुक्तों के खिलाफ ही जुर्म साबित हो सके। वर्ष 2001 और 2010 के बीच एक लाख चालीस हजार से भी ज्यादा दर्ज किए इस तरह के मामलों में से कम से कम एक लाख ऐसे अभियुक्त थे, जिन्हें सुबूतों के अभाव में बेकसूर करार दिया गया। गौर करने वाली बात ये भी है कि इस एक लाख में 14,500 से भी ज्यादा मामले ऐसे थे, जिनमें अभियुक्तों के खिलाफ नाबालिग लड़कियों का बलात्कार करने का आरोप था। साथ ही इस एक लाख से भी ज्यादा के आंकड़े में करीब 9,000 ऐसे भी मामले थे, जिन्हें पुलिस की शुरुआती जांच के बाद बंद करना पड़ा। 
हम पिछले हफ्ते में दो-तीन बार इस बारे में लिख चुके हैं कि समाज और सरकार, संसद और अदालत, अपनी नालायकी को छुपाने के लिए कानून को अधिक लायक बनाने में जुट जाते हैं। अगर चौकीदार सो रहा है, तो उसकी लाठी की जगह बंदूक, या मामूली बंदूक की जगह मशीनगन दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? अगर कोई बच्चा पढऩे में दिलचस्पी नहीं रखता, तो उसे एक किताब की जगह दस किताबें दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? दरअसल कड़े कानून की कड़ी-कड़ी बातें, लोगों के मुंह को अपने निकम्मेपन की कड़वाहट से बचा लेती हैं। यह सिलसिला बहुत घातक है। जहां समाज में महिला को पैदा होने के पहले से ही बराबरी के हक से परे कर दिया जाए, पेट में ही मार दिया जाए, या पैदा होते ही घूरे पर फेंक दिया जाए, ट्रेन में छोड़ दिया जाए, या पटक-पटककर मार दिया जाए, जहां कदम-कदम पर उससे शारीरिक और मानसिक बलात्कार हो, जहां उसे घर में बराबरी का खाना न मिले, दहेज की कमी से जिसे प्रताडऩा मिले या मर जाने पर मजबूर होना पड़े, जहां उसके साथ हुए बलात्कार की पुलिस जांच देश के आम निकम्मेपन की वजह से कमजोर हो, जहां पर अदालतें एक-एक पीढ़ी लगा दें फैसला करने में, जहां पर आखिरी अदालत के फैसले के बाद भी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों को एक महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल माफ कर दे, उनको फांसी से बचा ले, वहां पर बलात्कारियों को फांसी की सजा का इंतजाम करने से क्या हो जाएगा? अपने काम को ठीक से न करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं, और उनको हांकने वाले, उन पर काबिज लोग कड़े-कड़े कानूनों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और अपने आपको धोखा देने का है। कड़े कानून के झांसे में उन लोगों को आना चाहिए जो कि नर्म कानून को असरदार होते देख चुके हों। आज देश में बलात्कारियों में से अधिकतर, और बाकी किस्म के जुर्मों में भी अधिकतर मुजरिम जब अदालत से छूट जाते हैं, उनमें से अधिकतर बाइज्जत बरी होते हैं, तो नया और कड़ा कानून क्या खाकर किसी को सजा दिला देगा? 
 बलात्कारियों को फांसी का इंतजाम अगर सजा में किया जाता है, तो उससे  एक बात की गारंटी हो जाएगी, कि फांसी से बचने के लिए बलात्कारी अपनी हिंसा की शिकार को मार डालेंगे। जब बलात्कार की सजा फांसी, और उसके बाद हत्या की सजा भी फांसी, तो फिर सुबूत को पूरी तरह खत्म करके अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश में क्या बुराई है? आज अगर कोई बलात्कारी किसी बच्ची या लड़की को, या महिला को, सिर्फ उसकी देह लूटकर जिंदा छोड़ देते हैं, तो चार-छह फांसियों की खबर छपते ही ऐसी जिंदगी बचना खत्म हो जाएगा। लेकिन आज संसद से लेकर सड़क तक जिन लोगों की हस्ती नारों पर चलती है, उनको मौत की सजा का नारा अपनी जनता के लिए, अपने वोटरों के लिए लुभावना लग रहा है। मौत की सजा की मांग खत्म होनी चाहिए, और समाज को, सरकार को, संसद को, अदालत को यह सोचना चाहिए कि कैसे बलात्कार थमें, कैसे जांच बेहतर हो, कैसे अदालतों में जुर्म साबित हो, और कैसे सजा मिले। इससे परे की बात करना आज की नाकामयाबी पर एक नए कानून का कफन ढांकने जैसा है। 

छोटी सी बात


23 अप्रैल 
आज के वक्त में बच्चों को सावधान 
और परिपक्व बनाने की जरूरत
हिन्दुस्तान में इन दिनों जितने तरह के सेक्स-अपराध की खबरें भरी हुई हैं, उनको देखते हुए हर किसी की यह जिम्मेदारी है कि अपने आसपास के कम उम्र के लोगों को दो तरह से सावधान करके रखे। एक तो जिन पर ऐसे अपराधों का खतरा हो, उन्हें खतरों की नौबत गिनाते हुए उनसे बचने की सलाह देनी चाहिए। दूसरी तरफ आसपास के जो नौजवान ऐसी उम्र में हैं कि उनसे सेक्स संबंधों को लेकर कोई चूक हो सकती है, कोई जबर्दस्ती हो सकती है, उनको सावधान करने की जरूरत है कि वे किसी पर भी कोई ज्यादती करने से बचें, किसी तरह की छूट दूसरों से न लें, यह मानते हुए कि किसी साथी की सहमति है देह संबंध बनाने के लिए। देश का कानून लोगों को ऐसी छूट लेने की इजाजत नहीं देता। 
अपने छोटे बच्चों से लेकर अपने जवान बच्चों तक, सबसे इस बारे में जरूरत के मुताबिक खुलकर बात करनी चाहिए और उन्हें सावधान करना चाहिए। वे न तो सेक्स-अपराधों के शिकार बनें, न ही वे सेक्स-अपराधी बनें। छोटे बच्चों से लेकर जवान बच्चों तक, अलग-अलग पर इस तरह के कई खतरे रहते हैं, और सावधानी ही अकेला बचाव हो सकती है। कानून तो अपना काम बाद में करते रहता है, लेकिन समय रहते अपने बच्चों को समझदार बनाना, जागरूक बनाना, जिम्मेदार और सावधान बनाना ही उनकी हिफाजत है। आज के जमाने में छोटे बच्चों से लेकर जवानों तक को कई तरह की जगहों पर, कई तरह की स्थितियों से गुजरना होता है। ऐसे में उनके भीतर परिपक्वता और सावधानी ही उन्हें बचाकर रख सकते हैं। 
-सुनील कुमार

तात्कालिक तनाव के असर में लंबे समय के फैसलों की चूक


संपादकीय
23 अप्रैल 2013
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इंदौर के एक वकील ने जनहित याचिका दायर करके अश्लील सामग्री को देखने वाले लोगों पर भी सजा का इंतजाम करने की मांग की है। उसका तर्क है कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री देखकर लोग बलात्कार जैसे जुर्म कर रहे हैं और इससे समाज के भीतर लोगों की मानसिक सेहत भी खराब हो रही है। उसका कहना है कि आज भारत में लोगों को सेक्स और हिंसा की सामग्री, बच्चों से सेक्स की सामग्री, अश्लील और हिंसक वीडियो गेम, सामूहिक बलात्कार की ट्रेनिंग देने वाली वेबसाइटें, सभी कुछ हासिल है और इससे देश तबाह हो रहा है। काफी अनमने ढंग से सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को मंजूर किया और केन्द्र और राज्य सरकारों को इस पर अपनी राय देने के लिए नोटिस जारी किया है। आज भारत में ऐसी सामग्री तैयार करने, और उसे इंटरनेट पर भेजने पर तो सूचना तकनीक कानून के तहत सजा है, लेकिन इसे देखने वालों पर कोई सजा नहीं है। यह याचिका इसी की मांग कर रही है ताकि इसे देखने में कमी आए। 
यह बात पहली नजर में ठीक लग सकती है, लेकिन यह बहस के लायक मुद्दा है। दुनियाभर में जहां-जहां पोर्नोग्राफी और सेक्स-अपराधों पर शोध हुए हैं, उनके नतीजे इन दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं जोड़ पाए हैं। बहुत ही कम मामलों में ऐसे नतीजे मिले हैं कि पोर्नोग्राफी (अश्लील) देखने वाले लोग सेक्स-अपराधों तक पहुंचते हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे नतीजे भी मिले हैं कि अश्लील सामग्री देखने वाले लोग संतुष्ट होकर, यौन अपराधों से बचते हैं। इसलिए भारत में किन्हीं एक-दो बलात्कार की घटनाओं से पोर्नोग्राफी के जुड़े होने की बात सामने आते ही उसे बलात्कार के लिए जिम्मेदार मान लेना हड़बड़ी की बात होगी। यह बात जरूर है कि इससे लोगों के सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते प्रभावित होते हैं, और बाजारू अश्लीलता का एकदम आक्रामक नजारा देखने के बाद स्वाभाविक देह संबंधों की जगह लोगों को हिंसक और आक्रामक यौन संबंध की बात भी सूझने लगती है, लेकिन फिर भी इसे सीधे-सीधे अपराध से जोड़ पाने जैसी कोई बात भारत में किसी अध्ययन में सामने नहीं आई है। दूसरी तरफ इस देश में शुद्धतावादियों का एक आक्रामक तबका हर किस्म के वयस्क मनोरंजन के खिलाफ झंडे-डंडे लेकर लगा रहता है, और ऐसा विरोध वयस्क लोगों का शायद नुकसान अधिक करता है। 
पोर्नोग्राफी या अश्लीलता के पैमाने बड़े ही धुंधले होते हैं। अलग-अलग देशों में वहां संस्कृतियों के मुताबिक तो वे अलग होते ही हैं, भारत में आज भी एक थानेदार अश्लीलता की शिकायत पर अपनी सीमित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समझ के साथ किसी मामले को अदालत तक ले जा सकता है। ऐसा कोई कानून अगर बनता है कि अश्लील सामग्री को देखना अपराध हो जाए, तो उस कानून का कैसा बेजा इस्तेमाल नहीं होगा? आज भी जगह-जगह पुलिस पर लोगों को यह शक रहता ही है कि वह कहीं नक्सल साहित्य रखकर, तो कहीं चरस की एक पुडिय़ा रखकर, कहीं एक देसी कट्टा रखकर बेकसूरों को फंसाने की तरकीबें जानती है। अब अगर अश्लील सामग्री के खिलाफ, वयस्क मनोरंजन के खिलाफ, पोर्नोग्राफी के खिलाफ ऐसा कानून बन जाएगा, तो किसी के सामान में एक सीडी रखकर उसे जेल भेजने का हथियार पुलिस के हाथ होगा, या किसी के जेब से एक छोटी सी पेनड्राइव की बरामदगी दिखाकर उसे अदालत तक पहुंचाने का इंतजाम आसान होगा। 
आज दरअसल भारत बलात्कारों को लेकर जिस तरह के मानसिक तनाव के अंधड़ से गुजर रहा है, उसमें सेक्स-अपराधों पर काबू के लिए लोग कई किस्म के नुस्खे लेकर आ रहे हैं। हमको कोई हैरानी नहीं होगी कि कुछ दिनों में टीवी पर कोई ऐसे रूद्राक्ष बेचने लगे जिसे गले में पहनने पर लड़की के बलात्कार से बची रहने का दावा किया जाएगा। आज देश में किसी को लग रहा है कि बलात्कारी को फांसी देने से बलात्कार कम होंगे, किसी को लग रहा है कि बलात्कारी को बधिया बना दिया जाए, किसी को लग रहा है कि चौराहे पर फांसी दी जाए, या गोली मारी जाए। जितने मुंह उतनी बातें। लेकिन तात्कालिक तनाव के असर में जो लोग लंबे समय के फैसले लेते हैं, वे आमतौर पर चूक करते हैं। भारत आज ऐसी ही गलतियां करने जा रहा है। आज समाज से लेकर संसद और सरकार तक के लोग, अदालतों के जज, सामाजिक हकीकत, बलात्कार के पीछे के सामाजिक कारणों तक जाने के बजाय सड़कों पर चल रहे प्रदर्शन को शांत करने के लिए आनन-फानन किसी ब्रांड की रामबाण दवा बनाकर पेश करने के फेर में हैं। इससे उस समाज का ही सबसे बड़ा नुकसान होने जा रहा है, जिस समाज की फिक्र करते हुए आंदोलनकारी सड़कों पर हैं। आंदोलन और विरोध का यह रूख ठीक नहीं है, राजनीतिक दलों और नेताओं का उतावलापन ठीक नहीं है, और अदालतों की हड़बड़ी भी ठीक नहीं है। जनआक्रोश की नोंक पर लिए जा रहे फैसले बहुत भारी पड़ेंगे। 
हम भारत के विचलित लोगों से समझदारी की अपील करते हैं, और इसी समाज के भीतर के इंसान बलात्कार कर रहे हैं, उसके सामाजिक इलाज को ढूंढने की सलाह देते हैं। कानूनों को कड़ा बना-बनाकर असरदार नहीं बनाया जा सकता। और संविधान संशोधन, सामाजिक सुधार का विकल्प नहीं हो सकता। 

स्याहीसोख्ते को कुछ सूखा भी रखें


22 अप्रैल 2013
आज के कॉलम की यह सुर्खी उन लोगों को कुछ मुश्किल से समझ आएगी, जिन्होंने अपने बचपन की शुरूआत डॉटपेन जैसी कलम से की है। जिन लोगों ने स्याही भरने वाली कलम का इस्तेमाल भी किया हो, उनको भी आमतौर पर स्याहीसोख्ते की जरूरत नहीं पड़ती रही होगी। इसका चलन और इसकी जरूरत उस समय की बात है जब कलम को स्याही की दवात में डुबा-डुबाकर लिखा जाता था, और एक बार की स्याही से कुछ शब्द ही कागज पर दर्ज हो पाते थे। उस वक्त कलम की निब पर लगने वाली स्याही पर काबू नहीं रहता था, इसलिए कुछ शब्द अधिक गीले रह जाते थे। इसी तरह वैसे कलम से किए गए दस्तखत गीले रह जाते थे, और उनका कानूनी दर्जा खत्म न हो जाए इसलिए वैसी कलम के साथ-साथ स्याहीसोख्ता भी इस्तेमाल होता था जो अधिक गीली लिखावट को सोख लेता था। 
अब इस भूली-बिसरी याद की जरूरत आज इसलिए पड़ी कि मैं बीच-बीच में कुछ घंटे खबरों से परे रहने की नौबत से गुजरता हूं, तो एक फर्क सा लगता है। और इस फर्क को सोचने की कोशिश करते हुए, समझने की कोशिश करते हुए स्याहीसोख्ते की मिसाल सूझी। 
आज का वक्त अनगिनत अच्छे और बुरे अखबारों का है, टीवी की खबरों और इंटरनेट का है, एसएमएस पर मिलते खबरों के बुलेटिन का है, और पल-पल पहुंचती ईमेल-खबरों का भी है। नतीजा यह है कि सूचना का बोझ इतना अधिक है कि दिमाग का हाल कुछ बेहाल सा हो जाता है। रात तक तन चाहे जितना थके, या न थके, मन तो बुरी तरह थक चुका होता है, खासकर उन लोगों का जो अपने पेशे या दिलचस्पी से, चाहे या अनचाहे खबरों के सैलाब में सराबोर रहते हैं। अंगे्रजी में इसके लिए एक शब्द इस्तेमाल होता है, इनफरमेशन-ओवरलोड।
किसी कागज पर से गीली स्याही को अगर हटाना हो तो स्याहीसोख्ते (ब्लॉटिंग पेपर) का इस्तेमाल होता है। लेकिन अगर यह स्याहीसोख्ता ही अगर पहले से नमी से लबालब हो, तो वह और गीलेपन को कैसे सोखेगा? कुछ इसी तरह का हाल दिल और दिमाग का रहता है। कहने को तो इंसान का दिमाग दुनिया के सबसे तेज और सबसे बड़े कम्प्यूटर के मुकाबले भी अधिक तेज और अधिक क्षमता का होता है, लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी कम्प्यूटर पर जब पन्ने जरूरत से अधिक खुले होते हैं, हर पन्ने पर कुछ न कुछ काम चलते रहता है, जब उस कम्प्यूटर पर जानकारी एक सीमा से अधिक दर्ज रहती है, तो वह कम्प्यूटर भी जवाब देने लगता है। कभी ऐसा कम्प्यूटर टंग जाने (हैंग) लगता है, तो कभी पूरा चूर-चूर (क्रैश) हो जाता है। अगर हमारे दिल-दिमाग में दर्ज और घूम रही बातों का सैलाब समंदर के नमकीन पानी और रेत को हर कुछ पल में आंखों में झोंक रहा है, तो उन आंखों से बहुत दूर तक दिखना भी बंद हो जाता है, और आसपास का अंदाज लगना भी गड़बड़ा जाता है।
ऐसी नौबत से बचने का एक ही जरिया है, और यह भी हो सकता है कि मेरे जैसे लोग बहुत अधिक न हों, जो कि पल-पल दुनिया की नब्ज पर हाथ रखने पर भरोसा रखते हों। लेकिन जो लोग भी अपने दिल-दिमाग के स्याहीसोख्ते को गैरजरूरी नमी से भिगाकर रखते हैं, उनको यह खतरा समझना चाहिए कि उनका ध्यान, उनकी सोच, उनके नतीजे, और उनकी प्रतिक्रिया, ये सबके सब तब मंदे पड़ जाते हैं, जब उनमें नई बातों को सोखने की क्षमता नहीं बचती। इसलिए आज के सूचना-ओवरलोड के वक्त में ठंडे दिल-दिमाग से कुछ सोचने के लिए यह जरूरी है कि दिन का कुछ वक्त  फोन, टीवी, इंटरनेट, और मेरी तरह के अधिक बोलने वाले दोस्तों से परे भी गुजारा जाए। ऐसा वक्त कुछ सोचने का मौका भी देगा, और समझने का भी। और ऐसा मौका टीवी-इंटरनेट के चलते हुए मुमकिन नहीं हो सकता। 
एक वक्त टीवी को बुद्धू बक्सा कहा गया था। अब अनगिनत चैनलों के साथ इस ईडियट बॉक्स की ताकत और अधिक बढ़ गई है। अब उसने दिमाग को पूरी तरह कुंद कर देने, और फिर मंद कर देने की ताकत हासिल कर ली है। और अब उसका फोन और इंटरनेट से इसी काम में तगड़ा मुकाबला चल रहा है। 
एक वक्त बड़े बुजुर्ग कहा करते थे कि अच्छी जिंदगी के लिए मोटा खाओ और मोटा पहनो। मोटा कपड़ा सस्ता भी होता था, और टिकाऊ भी। इसी तरह मोटा अनाज सेहत के लिए बेहतर हुआ करता था, आज भी बेहतर रहता है, यह एक और बात है कि उसे अब गरीबी और फटेहाली की बेबसी मान लिया गया है, और पैसे वाले लोग बारीक से बारीक अनाज पसंद करने लगे हैं, जो कि सेहत के लिए चाहे अच्छे न हों। 
मोटा खाओ और मोटा पहनो की बात से यह भी आज लग रहा है कि लोगों को खबरों की मोटी-मोटी बातों तक पहुंचकर रूक जाना चाहिए। हर खबर के बारीक से बारीक खुलासे तक जाने की न तो जरूरत होती है, और न ही उतनी बारीक जानकारी किसी काम की होती है। आज दिमागी दीवालियापन लोगों को किसी एक बात की खबरों के बीच इस कदर घेर देता है, कि दुनिया की दूसरी जरूरी बातें धरी रह जाती हैं, जिनको टीवी की खबरें अपना धंधा चलाने के लिए फायदे की नहीं पातीं। 
कुल मिलाकर इस पल मैं यही सोच रहा हूं कि किस तरह दिन के कुछ घंटे अगर खबरों के, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सैलाब के हमलों से आजाद रहें, तो जिंदगी कितनी सेहतमंद हो सकती है? और इसके लिए जरूरी है कि अपने तन-मन के स्याहीसोख्ते को कुछ सूखा भी रखा जाए।

ईश्वर दिखाने वाले, देखने वाले और सरकार की जिम्मेदारी


संपादकीय
22 अप्रैल 2013
पश्चिम बंगाल में एक चिटफंड कंपनी गरीबों के सैकड़ों करोड़ लेकर भाग गई दिख रही है, और इसके एजेंट का काम करने वाले दसियों हजार लोग सड़क पर आ गए हैं, लाखों लोग अपनी जमा रकम शायद खो ही चुके हैं। एक खबर यह है कि एजेंट का काम करने वाली पचास बरस की एक महिला ने आत्महत्या कर ली है। और इस कंपनी का धोखेबाज दिख रहा कर्ताधर्ता ममता बैनर्जी की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी का करीबी बताया जा रहा है। कल ही इस अखबार ने पहले पन्ने पर इस कंपनी की एक तस्वीर छापी थी कि यह किस तरह बंगाल में सबसे अधिक पूजे जाने वाले लोगों में से एक, मां शारदा के नाम पर बनाई गई थी, और उनकी तस्वीर के साथ चलाई जा रही थी। इसमें बहुत बड़ी हैरानी की बात इसलिए नहीं थी, और है, कि धोखेबाज और दगाबाज मुजरिमों के लिए आध्यात्म और धर्म एक बड़ी सहूलियत पनाहगार रहते हैं। 
आज भारत में रिजर्व बैंक से लेकर, शेयर बाजार को नियंत्रित करने वाली सेबी तक है, आर्थिक घोटाले करने वालों पर नजर रखने के लिए सरकार की एजेंसियां हैं, राज्य सरकारों की जगह-जगह अपनी एजेंसियां हैं, मीडिया में आती खबरें हैं, अखबारों में छपते इश्तहार हैं, और उन सब पर सोती हुई सरकारें हैं। जब लोग सैकड़ों या हजारों करोड़ खो चुके रहते हैं तब जाकर ऐसी कंपनियों के खिलाफ जांच-पड़ताल शुरू होती है। जब साजिश करने वाले लूटमार करके भाग चुके रहते हैं, तब सरकारी एजेंसियां उनके पांवों के निशान परखना शुरू करती है। 
यह एक बहुत शर्मनाक हालत है कि केन्द्र और राज्य सरकारों को ऐसी धोखाधड़ी और जालसाजी तब समझ आती है जब मीडिया इन खबरों को छापने के कई महीने पूरे कर चुका होता है। यह सिर्फ बंगाल की ही बात नहीं है, देश में जगह-जगह कहीं चिटफंड कंपनियां, तो कहीं दूसरे तरह से लोगों की रकम जमा करने वाली कंपनियां गुब्बारे की तरह फूलकर, फैलकर अपना समां बांध चुकी होती हैं, सुनहरे सपने दिखाकर गरीबों को लूट चुकी होती हैं, और सरकार तब तक उनकी जांच भी शुरू नहीं कर पाती। हम छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनों में ऐसी किसी एक कंपनी के हाथों लुटे हुए लोगों को देखते हैं, और इसके तुरंत बाद कोई दूसरा जालसाज आकर कुछ दूसरे किस्म के हसीन सपने दिखाने लगता है। 
लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तक सड़कों पर जालसाजी का एक बड़ा ही अनोखा तरीका चलता था। किसी राहगीर को धोखेबाज रोकते थे, उसे सड़क पर ईश्वर दिखाने का झांसा देते थे, और बेवकूफ लोग अपना सामान इन धोखेबाजों को देकर उनके कहे मुताबिक दस या बीस कदम चलते थे, और ईश्वर का इंतजार करते थे। ईश्वर तो नहीं आता था, पीछे मुड़कर देखने पर धोखेबाज जरूर गायब हो गया मिलता था। आज बहुत सुहाने सपने दिखाने वाली कंपनियां इसी किस्म की हैं।  पेड़ लगाने से होने वाली कमाई के नाम पर अभी एक-दो दशक पहले देश के कुछ नामी-गिरामी घरानों ने हजारों करोड़ इक_े किए, और उनके इश्तहार ईश्वर दिखाने के दर्जे के ही थे, वे दावा करते थे कि रूपए पेड़ों पर उगते हैं। आज रूपए तो रूपए, वो पेड़ भी कहीं नहीं उगे हैं, और लुटे हुए लाखों लोग सदमे से नहीं उबर पाए हैं। 
इसलिए एक तरफ जहां हम सरकार से वक्त रहते जांच करने और धोखाधड़ी को रोकने की उम्मीद करते हैं, वहीं हम दूसरी तरफ उन लोगों को भी अक्ल के इस्तेमाल की नसीहत देना चाहते हैं जो हर चमकदार चीज को सोना मानकर उसके पीछे लग जाते हैं। अगर दुनिया में इतना ही सोना होता, तो लोग फिर भला पीतल के बर्तनों में खाना क्यों खाते, पानी क्यों भरते? इसलिए कानून और जिम्मेदारी चाहे सरकार की हो, पैसा तो अपना खुद का है। और जिनका पैसा गाढ़े पसीने की कमाई का होता है, उन्हें करिश्मों की तरह कमाई के सपने नहीं देखने चाहिए। बड़ी-बड़ी कंपनियां आज सत्ता की मेहरबानी से बड़े-बड़े हसीन सपने दिखाकर लोगों को तब तक लूटती हैं, जब तक उनका बुलबुला फूट नहीं जाता। फूटने के ठीक पहले तक ऐसे बुलबुलों पर बहुत से रंग चमकते दिखते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी रंग हकीकत नहीं होता, वह पल भर की जिंदगी की सतह पर दूसरे रंगों का प्रतिबिंब ही होता है। इनकी हकीकत को न समझकर ईश्वर देखने जो लोग आगे बढ़ते हैं, उनका अपने हाथ का सबकुछ खो बैठना तय रहता है।

बच्चों पर पुलिस का जिम्मा बाद में, पहले अपना जिम्मा भी सोचे समाज


संपादकीय
21 अप्रैल 2013
बलात्कार कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर बार-बार लिखा जाए और अच्छा लगे, यह भी हम जानते हैं कि बार-बार इस मुद्दे पर लोग पढऩा भी नहीं चाहते। कल ही हमने यह लिखा है कि इस मुद्दे पर सिर्फ पुलिस से हर उम्मीद करना गलत होगा और समाज को अपने बारे में सोचना होगा, खुद भी कुछ करना होगा। 
आज हम भारत में बलात्कार को लेकर एक छोटे पहलू पर बात करना चाहते है, बच्चों को लेकर। बच्चों से बलात्कार जैसी दिल दहलाने वाली, दिल बैठा देने वाली वारदातें सामने आई हैं, वे खबरों में छप रही हैं, उनके बारे में यहां पर जानकारी लिखने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस बारे में देश को क्या करना चाहिए यह चर्चा बहुत जरूरी है। बच्चों से बलात्कार तो खबरों में आ जाते हैं, लेकिन हम लगातार जिस मामले को उठाते हैं, वे हैं बच्चों के देह शोषण के। बच्चों के साथ इतने किस्म के यौन अपराध उन्हीं के परिवार के लोग, परिवार के आस-पास के लोग, पड़ोस के लोग, स्कूलों के शिक्षक-प्रशिक्षक करते हैं कि उन पर भरोसा भी मुश्किल होता है। भारत का अनुभव यह है कि यह देश अपने भीतर की बुराईयों को अनदेखा करने पर भरोसा रखता है, और अपनी हर बुराई को पश्चिम पर थोपकर खुद हो लेता है कि इसकी अपनी संस्कृति बुराईयों से और विकृतियों से आजाद है। यह देश अपने लोगों की शारीरिक और मानसिक जरूरतों को भी मानने से इंकार कर देता है, अपने इतिहास को मानने से इंकार कर देता है। आज के भारत में संस्कृति के ठेकेदारों का तो तबका बात-बात पर डंडे-झंडे लेकर सड़कों पर रहता है, उसे इस देश के इतिहास और पुराण को लपेटकर अलग रख दिया है, और इंसानों की तन-मन की जरूरतों को नकारने को यह तबका भारतीय संस्कृति मानता है। इसलिए इस देश में बच्चों के यौन शोषण को लेकर कोई बात नहीं हो सकती, और जब ऐसा शोषण करने वाले लोग अपने जुर्म को दबा-छुपाकर ऐसी हरकतों को जारी रख पाते हैं, तो उनमें से कुछ लोग बलात्कारी होते हैं। छोटे बच्चों से बलात्कार, और उसके साथ-साथ उनसे दिल दहला देने वाली हिंसा, रातों-रात पैदा होने वाली नीयत नहीं है। यह धीरे-धीरे मौका पाकर बढ़कर इस हद तक पहुंचने वाली हिंसा और विकृति है। इसलिए अगर समाज जल्द इस पर रोक नहीं लगा सकता, तो इसका बढ़ते जाना तय भी रहता है। देश के बच्चों को सेक्स अपराधों से बचाना इसलिए जरूरी है कि एक तो यह उनका बुनियादी हक है, दूसरा यह कि ऐसे जख्म उनकी जिंदगी के आखिर तक भर नहीं पाते, और देश के भविष्य में उनका उतना योगदान नहीं हो पाता जितना कि इन जख्मों के बिना हुआ रहता। इसलिए एक बच्चे को तबाह करने से, उस समाज का भविष्य भी तबाह होता है। 
भारतीय समाज को पुलिस और सरकार का मुंह देखने के बजाय अपने बच्चों की हिफाजत खुद करने की सारी कोशिशें पहले कर लेनी चाहिए, सारी सावधानी पहले खुद बरत लेनी चाहिए, और उसके बाद जाकर सरकार से, पुलिस से कोई उम्मीद जायज मानी जा सकती है। जब परिवार के पहचान के लोग घर के भीतर बलात्कार करें, तो इस हिंसा के शिकार बच्चों को बचाने के लिए पुलिस पहले तो पहुंच ही नहीं सकती। बाद में भी पुलिस का दखल तभी हो सकता है जब इन बच्चों की बातों पर भरोसा करके घर वाले पुलिस तक पहुंचें। इसलिए हर घर को, हर मोहल्ले और इमारत को, हर स्कूल और टीम को, अपने बच्चों की हिफाजत के बारे में पहले खुद सोचना होगा, बच्चों को समझदार बनाना होगा, और पाखंडी शुद्धतावादियों के झंडे-डंडों से डरे बिना बच्चों को स्कूलों में सावाधानी के लायक शारीरिक शिक्षा देनी होगी। छत्तीसगढ़ में पिछले महीनों में बहुत ही गरीब और बेजुबान आदिवासी बच्चियों के आश्रमों और हॉस्टलों में जिस तरह के सामूहिक बलात्कार हुए, जिस तरह के लगातार बलात्कार हुए, उससे सबक लेकर आगे की रोकथाम के लिए जिस तरह की बचाव-तैयारी की हम उम्मीद कर रहे थे, राज्य स्तर पर वैसी कोई तैयारी दिख नहीं रही, और जो मामले सामने आए, उन्हीं के मुजरिमों पर मुकदमे पर आकर बात थम गई है। राज्य स्तर पर समाज के भीतर जैसी हलचल होनी चाहिए थी, वैसा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा।
आखिर में एक बात और जो कि हमने कल भी लिखी थी। वर्दी में मौजूद पुलिस अपनी कई किस्म की खामियों के चलते एक बहुत आसान, सहूलियत वाला, और हर मौके पर मौजूद निशाना बन जाती है। लेकिन दशहरे के रावण को जला देने से जितनी बुराईयां जलती हैं, उतने ही खतरे किसी एक खराब पुलिस को निशाना बनाने से टल सकते हैं। ऐसे लुभावने नारे लगाकर राजनीति और सामाजिक आंदोलन के लोग टीवी कैमरों पर जगह तो पा सकते हैं, लेकिन इससे समाज के भीतर का खतरा कम नहीं होगा। सिर्फ पुलिस को हर मर्ज की दवा मान लेना, और हर हादसे पर पुलिस को सजा दिलवा देने की जिद करना, असल मर्ज को अनदेखा करना होगा। भारत के आंदोलनकारियों को एक संतुलन और अनुपात भी समझना होगा कि किस बात के लिए समाज खुद जिम्मेदार है, और किस बात के लिए सरकार या पुलिस, और किस हद तक। एक मामूली बीमारी के लिए इन दिनों कई किस्म की जांच होती है, और तब जाकर इलाज तय होता है। बलात्कार जैसे विचलित कर देने वाली वारदातों के बाद बिना सोचे-समझे सिर्फ सत्ता पर, सिर्फ पुलिस पर हमलों से समाज अपने भीतर की खामियों को भी नहीं समझ पाएगा, और अपनी बीमारी का इलाज भी नहीं पा सकेगा। 

पुलिस के साथ-साथ समाज खुद भी आईना देखे और सोचे


संपादकीय
20 अप्रैल 2013
दिल्ली में हुए एक बलात्कार के बाद देश में आज लोग फिर बहुत तकलीफ में हैं। पांच बरस की बच्ची से पड़ोस के नौजवान ने कई बार बलात्कार किया और उसके शरीर में बोतल भीतर भरकर मरने के लिए छोड़ दिया। यह भयानक खबर दिल्ली की होने से मीडिया पर छाई हुई भी है, और जिस किस्म की दिल दहलाने वाली जानकारियां इस बच्ची के साथ हुए जुल्म को लेकर आ रही हैं, उससे भी पूरे देश के लोग हिल गए हैं। हम इस पर जाना नहीं चाहते कि दिल्ली की वारदात देश के बाकी इलाकों की वारदातों के मुकाबले खबरों में अधिक जगह पाती है, और सरकार उससे अधिक हिलती है, जरूरी यह है कि ऐसे मुद्दे के पहलुओं पर इस मौके पर बात हो। 
कुछ लोगों ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को इस मामले को लेकर हटाने की बात कही है। इसके बाद प्रदर्शन कर रही लड़कियों में से एक को पुलिस के एक मंझले अफसर ने अस्पताल में ही थप्पड़ें मारीं, और उसे निलंबित कर दिया गया। इस मामले में पुलिस पर यह भी एक आरोप लगा है कि उसने इस मामले को दबाने के लिए बच्ची के परिवार को कुछ रूपए देकर मुंह बंद रखने के लिए कहा। इसलिए हमारा यह मानना है कि पुलिस कमिश्नर से इस्तीफा दिल्ली की पिछले कुछ महीनों की वारदातों को लेकर भी मांगा जा रहा है, पुलिस कमिश्नर के पिछले बर्ताव को लेकर भी मांगा जा रहा है, और उन्होंने पिछले एक-दो बरस में जैसी बेरहमी के बयान दिए थे, उनको लेकर भी मांगा जा रहा है। लेकिन हम इस मौके पर दिल के साथ-साथ दिमाग की भी कुछ बातें करना चाहते हैं। 
पुलिस कमिश्नर को हटाने के मौके पहले तो आए थे, जब उनके बेदिमागी के बयान आए थे। लेकिन आज के बलात्कार के इस मामले को देखें, तो उसका विश्लेषण करने की जरूरत है कि ऐसे जुर्म कितने रोकने लायक होते हैं, पुलिस उनमें क्या कर सकती है, और पुलिस की किस दर्जे की लापरवाही की जिम्मेदारी किस दर्जे के अफसर तक जाकर थमनी चाहिए। आखिर कुसूर को किसी न किसी जगह पर ले जाकर तो तय करना ही होगा, वरना इस देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति तो हर बात के लिए जिम्मेदार हैं ही, ऐसे हर मामले में उन्हीं से इस्तीफा मांगना चाहिए, या फिर किसी राज्य की घटना को लेकर मुख्यमंत्री या राज्यपाल से सीधे इस्तीफा मांगना चाहिए। लेकिन कोई व्यवस्था तैश से तय नहीं हो सकती, उसके लिए एक न्यायसंगत, तर्कसंगत और संतुलित तरीका होना चाहिए। इस मामले में पड़ोस के नौजवान ने एक बच्ची से बलात्कार किया, जिसे पुलिस ने एक या दो दिन में गिरफ्तार कर लिया। इसके पहले पुलिस ने इस बच्ची के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करने में शायद कुछ घंटों या एक दिन की देरी की, उसकी जिम्मेदारी पुलिस स्टेशन से ऊपर ले जाना ठीक नहीं है। इस बात की जांच करने के बाद कुसूरवार मिलने पर वैसे थाना अफसर पर कार्रवाई होनी चाहिए। प्रदर्शन करती लड़की को जिस अफसर ने पीटा, उसे आनन-फानन निलंबित कर दिया गया। इसके बाद अब पुलिस पर और कौन सी कार्रवाई की जा सकती है? लेकिन ऐसे मौके पर इस वारदात को लेकर पुलिस कमिश्नर को हटाने का मतलब देश की आज की पूरी व्यवस्था की खामियों की हकीकत को अनदेखा करते हुए उसके नाम पर एक अफसर को हटाने से तो असली मर्ज बहस में ही नहीं आ पाएगा। 
बलात्कार के बहुत से मामले पुलिस के रोके नहीं रूक सकते। जब तक परिवार और समाज में लड़की और महिला की जगह इज्जत और बराबरी के हक की नहीं होगी, जब तक इस देश की न्यायव्यवस्था में पुलिस से लेकर जज तक को महिलाओं के मुद्दों पर संवेदनशील नहीं बनाया जाएगा, जब तक न्यायव्यवस्था को कारगर नहीं बनाया जाएगा, तब तक किसी अफसर को हटाने या फांसी की सजा लाने की बातें सिवाय भावनाओं के कुछ नहीं रहेंगी, और इनसे असली खतरों की तरफ से ध्यान हट जाएगा। बीमारी की वजहों के इलाज को छोड़कर, बीमार के चेहरे पर पाउडर-लाली लगाने को इलाज समझने में यह देश माहिर है। असल मुद्दे पर टिके रहने से कुसूरवारों को दिक्कत हो सकती है, इसलिए वे लोग अपने ही कई तरह के मुखौटों से सतही वजहों को जिम्मेदार बताते हुए खुद बचे रहते हैं। भारतीय लोकतंत्र में सरकार, अदालत और संसद की खामियों, गैरजिम्मेदारियों पर गंभीर बात होने के बजाय, भारतीय समाज की गंभीर खामियों पर बात होने के बजाय, सड़कों की भीड़ एक अफसर या एक मंत्री का सिर मांगते हुए बीमारी की जड़ों को अनदेखा करती है। यह सिलसिला देश और समाज के लिए बहुत खतरनाक है। इस बच्ची से बलात्कार हो जाने तक उसमें सरकार या पुलिस की क्या खामी रही? समाज को भी सड़कों पर आने के साथ-साथ बैठकर ठंडे दिल से आईना देखना चाहिए, और अपने मर्जों का इलाज खुद भी ढूंढना चाहिए। 
पिछले करीब आधे बरस में यह देश जब-जब बलात्कार को लेकर हिला है, उन तमाम मौकों पर निशाना सिर्फ सरकार पर रहा, चाहे वह उन सारे मामलों में लापरवाही के लिए जिम्मेदार रही हो, या फिर सरकार की नजरों से दूर ऐसे जुर्म सिर्फ दो लोगों के बीच हो गए हों, जिनको रोकना पुलिस के लिए मुमकिन न रहा हो। इसलिए रोके जा सकने वाले, और न रोके जा सकने वाले मामलों के बीच फर्क अगर यह समाज नहीं करेगा, तो फिर वर्दी को गाली देते हुए हर मामले के लिए उसे जिम्मेदार ठहरा देना लोकतंत्र में सबसे आसान है। लोगों की वर्दियां उतरती रहेंगी, लेकिन समाज के भीतर लड़कियों और महिलाओं के बदन पर से कपड़े भी शायद इसी रफ्तार से बलात्कारी उतारते रहेंगे।

गटर और कांटों से माफी सहित

संपादकीय 
19 अप्रैल 2013
मध्यप्रदेश में कल एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि उसने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कुछ महिलाओं के खिलाफ भद्दी और ओछी बातें कही थीं। इसके अलावा उसने मुख्यमंत्री की पत्नी को लेकर भी कुछ गलत बातें कही थीं। अब इस्तीफे के बाद उसने अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों के बीच पहुंचकर कुर्सी  को लात मारकर आने की बात कही, और मानो इस्तीफे की वजह काफी नहीं थी, उसने इसके बाद सार्वजनिक रूप से और भी गंदी-गंदी बातें कहीं। और राज्य की भाजपा के लिए मानो इतनी फजीहत और गंदगी काफी नहीं थी, उसके प्रदेश अध्यक्ष ने कांग्रेस नेताओं की पत्नियों को लेकर फूहड़ बातें कहकर कसर पूरी कर दी। 
दिक्कत यह है कि सार्वजनिक जीवन में रोजाना ऐसी बदबूदार बातों से निपटने का जिम्मा यह समाज दूसरे नेताओं पर छोड़कर बेफिक्री से बैठे रहता है। कहने के लिए बहुत से साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता अपने आपको बुद्धिजीवी नाम के एक काल्पनिक तबके का हिस्सेदार मानते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बुद्धि का इस्तेमाल करने के बजाय यह तबका आमतौर पर अपनी खोपड़ी पर हेलमेट लगाए हुए अपने घर की छत तले चुप बैठे रहता है।  इस तबके  का मानो समाज के किसी और हिस्से लेना-देना न हो, और नेताओं की फैलाई जा रही गंदगी से इन बुद्धिजीवियों के बच्चों को बचाना मानो दूसरे नेताओं की जिम्मेदारी हो। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि समाज में जो तबका इस गंदगी को समझ सकता है, इसे समझता है, वह सिर्फ अपनी आंखों का इस्तेमाल करता है, अपने कानों का इस्तेमाल करता है, दिमाग में उसे सोख लेता है, लेकिन अपने मुंह का, अपनी ऊंगलियों का, और अपनी उस तथाकथित बुद्धि का कोई इस्तेमाल नहीं करता। और तो और, किसी चुनावी मौके पर भी ऐसा कोई पढ़ा-लिखा, समझदार तबका अपनी समझ का और अपनी जिम्मेदारी का इस्तेमाल नहीं करता।
आज राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत सी पार्टियों के नेता मुंह खोलते हैं, और गटर जैसी बदबू आती है। मीडिया अपने पापी पेट के फेर में गंदगी को तश्तरी में पेश करने का आदी है, क्योंकि अच्छी बात के मुकाबले गंदी बात को अधिक दिलचस्प बनाने की एक संस्कृति मीडिया ने बना रखी है। ऐसे में अगर समाज के जिम्मेदार लोग अपनी खोल और खाल की फिक्र छोड़कर अगर सवाल उठाना शुरू नहीं करेंगे, तो इससे होने वाला नुकसान कांटों की फसल की तरह बढ़ते ही चलेगा, और राजनीति में यह संस्कृति बढ़ती चलेगी कि हर पार्टी के कुछ लोग महज गंदगी फैलाने के लिए ओवरटाईम पर रखे जाएंगे। 
राजनीतिक दलों से भी यह सवाल किए जाने चाहिए कि वे गंदगी फैलाने वाले अपने नेताओं का कब तक बर्दाश्त करेंगे। वीडियो तकनीक की मेहरबानी से अब बहुत से मामलों में नेताओं के लिए अपने मुंह से उगली हुई गंदगी से मुकर जाना आसान नहीं रह गया है, और इसीलिए इन दिनों पहले के मुकाबले इस्तीफे कुछ होने लगे हैं। लेकिन जनता के जागरूक तबकों को ऐसे मौकों पर खड़े होना चाहिए, और आक्रामक होकर इस्तीफे मांगने चाहिए। इस्तीफों के अलावा अगले चुनाव में ऐसे गटर को हराने के लिए भी लोगों को कोशिश करनी चाहिए, ऐसी कोशिश तभी असरदार और कारगर होगी जब वह गैरराजनीतिक लोगों द्वारा की जाएगी। (हमारी आज की बात में मिसाल के लिए गटर और कांटों का जो इस्तेमाल हुआ है, उसके लिए हम उनसे माफी चाहते हैं, क्योंकि ये दोनों ही ऐसे इंसानों से बेहतर होते हैं।)

हिन्दू ध्रुवीकरण के इस जंगल में.. मोदी या ठाकरे में एक की जगह


संपादकीय
18 अप्रैल 13
एनडीए के भीतर मोदी की राह में एक नया रोड़ा खड़ा हो गया है, शिवसेना का। ठीक मोदी की तरह हिन्दू और हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली शिवसेना महाराष्ट्र में और एनडीए में भाजपा की सबसे पुरानी और बड़ी सहयोगी पार्टियों में से एक है। नीतीश कुमार मोदी के नाम पर भाजपा से अलग राह चलते दिख ही रहे थे, कि अब उद्धव ठाकरे भी बहुत साफ-साफ शब्दों में सामने आ गए हैं। शिवसेना के अखबार सामना में पार्टी की नीति की घोषणा करते हुए कहा गया है कि मोदी के नाम पर अगर कुछ सीटें जुटेंगी, और कुछ पुराने बड़े साथी अलग हो जाएंगे, तो वह नुकसान बड़ा होगा। इससे अलग भी कुछ बातों में शिवसेना ने पिछले हफ्तों में अडवानी से लेकर सुषमा तक के विकल्प प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के लिए सुझाए थे, और उस वक्त मोदी के नाम का विरोध तो नहीं किया था, लेकिन मोदी के नाम के दूसरे विकल्पों को बड़ी लकीर की तरह पेश किया था। 
नीतीश कुमार मोदी को गुजरात के साम्प्रदायिक दंगों के लिए जवाबदेह मानते हुए पिछले कुछ बरसों से उनके नाम से कतराते दिख रहे हैं, हालांकि जैसा कि हमने कुछ ही दिन पहले इसी जगह लिखा है, गुजरात दंगों के वक्त केन्द्र सरकार का हिस्सा रहते हुए नीतीश कुमार ने कभी मोदी के खिलाफ किसी कार्रवाई की बात नहीं उठाई थी जबकि वह उनकी केन्द्रीय मंत्री के रूप में एक नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी थी। उस बात को इतिहास में दर्ज करके आज के बहस के लिए आया-गया मान भी लें, तो भी अब सवाल यह उठता है कि अपने आपको धर्म निरपेक्ष साबित करने की कोशिश करते हुए जो काम नीतीश कुमार कर रहे हैं, मोदी विरोध का वही काम अपनी पूरी साम्प्रदायिकता के साथ जीने वाली शिवसेना भी कर रही है। एनडीए के भीतर इन दो बिल्कुल अलग-अलग सिरों की सोच एक सी क्यों है यह सोचने की जरूरत है। 
एक तरफ नीतीश कुमार को मोदी के मुखिया बनने पर एनडीए का हिस्सा रहते हुए बिहार में मुस्लिम या गैरसाम्प्रदायिक, गैरधर्मान्ध वोटों के नुकसान का खतरा है, दूसरी तरफ एनडीए के भीतर ही किसी सरकार बनने की नौबत में मोदी जैसे ताकतवर नेता के सामने गठबंधन के बाकी साथियों की हस्ती मामूली रह जाएगी। यह खतरा एनडीए के बाकी साथियों पर भी है, लेकिन वे मोदी की पीठ पर सवार होकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता देखते हैं। एनडीए के एक बड़े भागीदार की शक्ल में जब नीतीश कुमार अपने जदयू को अलग कर लेने की बात करते हैं, तो एक खतरा यह भी होता है कि क्या वे कांग्रेस की लीडरशिप वाले यूपीए का बाहर या भीतर से साथ देंगे? ऐसा होने पर एनडीए का सपना दोगुना दूर हो जाएगा, और भाजपा के भीतर के मोदी विरोधी इस बात को पार्टी के सामने बार-बार रख रहे हैं। 
लेकिन ठीक दूसरी तरफ मुंबई में उद्धव ठाकरे के सामने दो किस्म की मजबूरियां हैं। एक तो यह कि बाल ठाकरे के गुजर जाने के बाद अब उन्हें अपने बागी भाई राज ठाकरे के मुकाबले अपने आपको शिवसेना का ताकतवर नेता साबित करना है, और दूसरी तरफ अपने साथी दल भाजपा के मुकाबले महाराष्ट्र में अपने को जिंदा भी रखना है। भाजपा शिवसेना पर अपना दबाव पिछले चुनावों में धीरे-धीरे बढ़ाते आई है, और एक राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक भाजपा में महाराष्ट्र के भीतर अपनी सीटें बढ़ाने का सिलसिला जारी रखा है। दूसरी बात यह कि हिन्दू वोटों को लेकर हिन्दुस्तान के भीतर एक साम्प्रदायिकता खड़ी करने, धार्मिक कट्टरता बढ़ाने, और हिन्दू-मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने की जो राजनीति शिवसेना शुरू से महाराष्ट्र में करती आई है, इस सारे काम में उद्धव ठाकरे हिन्दू राजनीति की शतरंज की बिसात पर वजीर नरेन्द्र मोदी के मुकाबले प्यादे बनकर रह जाएंगे। इसलिए शिवसेना का मोदी विरोध हिन्दू राजनीति को लेकर अपने अस्तित्व को बचाने का काम भी है, और उसकी इस सोच को गलत भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि साथी के भले के लिए अपनी कुर्बानी देने का नाम राजनीति नहीं है। शिवसेना को हिन्दू मुद्दों पर अपना अस्तित्व बनाए रखना है, और जब मोदित्व ब्रांड का हिन्दुत्व महाराष्ट्र के बाजार में पड़ोस के गुजरात से एक बेहतर और आकर्षक पैकिंग में आकर वोटरों तक पहुंचेगा तो शिवसेना के लिए वह भयानक बर्बादी का होगा। उद्धव ठाकरे के विरोध के पीछे एक दूसरी वजह भी हो सकती है, लेकिन वह इस पहली वजह के साथ-साथ ही हो सकती है, अकेली वजह नहीं। पिछले बरसों में नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह शिवसेना से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने वाले राज ठाकरे को महत्व दिया है, उससे शिवसेना के सीने पर सांप लोटना स्वाभाविक है। और कल को अगर मोदी की अगुवाई में एनडीए देश पर राज करने के लिए आता है, तो वह राज महाराष्ट्र के राज ठाकरे के लिए अधिक अहमियत की संभावनाओं को लेकर भी आ सकता है। इसलिए उद्धव ठाकरे का मोदी विरोध जायज है। एक जंगल में दो शेरों के सिर नहीं छुप पाते, और साम्प्रदायिकता के इस जंगल में मोदी और ठाकरे में से किसी एक की ही गुंजाइश रहेगी। 
एनडीए का विश्लेषण करने वाले लोगों के लिए यह बड़ी दिलचस्पी का सामान है, हमारे लिए भी। 

संजय दत्त को रियायत से गरीबों की छाती पर लात


संपादकीय
17 अप्रैल 2013
सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की चर्चित अर्जी पर उन्हें आगे की सजा काटने के लिए जेल पहुंचने में चार हफ्ते की मोहलत दी है, ताकि वे अपनी चल रही फिल्मों को पूरा कर सकें। यह फैसला कुछ अलग किस्म का है, क्योंकि संजय ने अपनी अधूरी फिल्मों में लगी लागत और उनमें लगे और लोगों के कामकाज को भी गिनाया था और छह महीने बाद जेल पहुंचने की छूट मांगी थी। इस पर उन्हें एक महीने काम करने का मौका दिया गया है। 
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश या फैसला कुछ अटपटा लगता है। किसी व्यक्ति के कामकाज को लेकर, कारोबार को लेकर उसे इस तरह की छूट अगर दी जाती है, तो इसकी मिसाल देते हुए देश में जेल जाने वाले हर कामकाजी को अर्जी देने का एक रास्ता मिल जाएगा कि उनको भी अपने घर के काम निपटाने हैं। ऐसा कौन सा मुजरिम हो सकता है जिस पर कारोबार, घर या पेशे की जिम्मेदारियां बची हुई न हों? संजय दत्त के ही केस में जिन और लोगों को सजा सुनाई गई थी, और जिनकी सजा संजय दत्त की तरह ही जारी रखी गई है, ऐसे तीन बुजुर्ग लोगों की ऐसी ही अर्जियां सुप्रीम कोर्ट ने कल खारिज कर दी थीं। इन तीनों का कहना था कि उनकी दया की अर्जी राष्ट्रपति के पास अभी रखी हुई है, और उस पर फैसला होने तक उन्हें भी जेल न पहुंचने की रियायत दी जाए। अदालत ने इसे नहीं माना, और संजय दत्त की अर्जी को माना कि उनकी फिल्मों में पौन तीन सौ करोड़ लगे हुए हैं, इसलिए उन्हें इन्हें पूरा करने की इजाजत दी जाए। अब सवाल यह उठता है कि जिस पर ज्यादा पैसे लगे हुए हैं, उसके लिए कानून अलग कैसे हो? किसी बहुत बारीक कानूनी नुक्ते को लेकर हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने बाकी तीनों अर्जियों के मुकाबले संजय की अर्जी को कुछ अलग पाया होगा, लेकिन इससे एक बहुत बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हमारे जैसे साधारण समझ के लोगों को एकदम से यह लगने लगा कि अरबपतियों के लिए कानून का नजरिया कुछ अलग है। सच और जनधारणा, इनमें बड़ा फर्क होता है। और इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। जब एक ही नाव पर सवार चार लोग सुप्रीम कोर्ट से किसी किस्म की रहम की अपील कर रहे हैं, तो उसी वक्त उनमें से एक को छूट और बाकी को जेल, इससे जनता के बीच पैसों की ताकत को लेकर एक सोच तो बनेगी ही। इसी मामले की अधिक जानकारियों को अगर देखें तो यह बात साफ है कि एक दूसरी महिला, 75 साल की जैबुन्निसा 8 महीने जेल में गुजार चुकी हैं। उसे भी संजय दत्त की तरह 5 साल की सजा सुनाई गई है, वह बीमार है, ऑपरेशन के बाद बुरी हालत से गुजर रही है, गरीब है, और संजय दत्त के बाहर रहते-रहते उसे तुरंत जेल पहुंचना है। 
संजय दत्त के मामले में हमने अपनी एक अलग सोच उसे सजा मिलने के तुरंत बाद लिखी थी, जब जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने संजय को माफी देने की एक औपचारिक अपील की थी। तब हमने इसी अखबार में संपादकीय में लिखा था- ''क्या ऐसा कुछ हो सकता है कि कानून में फेरबदल करके ऐसा इंतजाम किया जाए कि गैरपेशेवर मुजरिमों की ऐसी कैद कुछ कट जाने के बाद, उनकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के लिए किया जा सके? मिसाल के तौर पर अगले जितने बरस संजय दत्त को कैद में काटने हैं, क्या उसकी जगह उनको अपने पेशे का काम करते रहने देने की रियायत दी जाए, और उसकी पूरी कमाई को समाज में इस्तेमाल किया जाए? और क्या ऐसी रियायत कम कमाई वाले, कम चर्चित, कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले दूसरे लोगों को भी दी जा सकती है? क्या इससे मुजरिम और सजा को एक अधिक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है? ऐसी कई बातें इस मामले को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद बातचीत के लायक हैं। जब कभी किसी कानून या व्यवस्था में किसी फेरबदल की बात होती है, तो वह ऐसी किसी एक घटना, या कुछ घटनाओं के बाद ही शुरू होती है। कुछ महीने पहले दिल्ली में निर्भया से हुए बलात्कार के बाद आज देश में एक नया कानून लागू हुआ है। उसी हादसे के बाद के माहौल से वह कानून बना, और अब लागू हुआ। इसलिए अगर संजय दत्त को लेकर एक नई चर्चा शुरू होती है, और कानून में एक ऐसा लचीलापन लाया जाता है, जिसका बेजा इस्तेमाल रोका जा सके, और जिससे समाज का कुछ फायदा हो सके, सजायाफ्ता की जिंदगी को खराब करने के बजाय उसका समाज के लिए कोई उत्पादक उपयोग हो सके, तो उसके बारे में सोचना चाहिए। हम इसी मामले को लेकर सोचते हैं, तो लगता है कि जिस तरह जेल के भीतर कैदियों से तरह-तरह के काम करवाए जाते हैं, या जैसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही जेल के कैदी बाहर खाने-पीने की दुकान चलाते हैं, पेट्रोल पंप चलाते हैं, कई शहरों में कैदी बैंड पार्टी बनाकर बाहर जाकर काम करते हैं, और उनकी कमाई जेल में जमा होती है, तो यह भी एक रास्ता निकल सकता है कि संजय दत्त को रोज जेल से बाहर जाकर उनके हुनर का काम करने दिया जाए, और उसकी कमाई को जेल में जमा किया जाए, और उन्हें उसमें से उतना ही हिस्सा मिले, जितना कि किसी कैदी को मिलता है। ऐसा आज देश में जगह-जगह आम कैदियों को जेल के बाहर जाकर काम करने मिल रहा है, ताकि जब वे सजा काटकर बाहर निकलें, तो भूखे न मरें, या बेरोजगार न हों।ÓÓ 
सुप्रीम कोर्ट को यह चाहिए था कि काम को लेकर, या आराम को लेकर, देश के कैदियों के लिए मौजूदा इंतजाम के तहत संजय दत्त को दिनभर काम करने की छूट देता, और बैंड बजाकर लौटने वाले कैदियों की तरह वापिस आकर जेल में रात गुजारने का हुक्म देता। लेकिन अभी जो आदेश अदालत ने दिया है, उससे देश के कमजोर और गरीब लोगों की छाती पर एक लात पड़ी है। 

सवाल पूछने वाले का फायदा हो, या न हो...


16 अप्रैल 
छोटी सी बात
कुछ ऐसे लतीफे लंबे समय से चल रहे हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को सवाल पूछने को कहते हैं, और फिर किसी बात का जवाब उनके पास नहीं रहता। और आखिर में जब बच्चे थक जाते हैं, तो मां-बाप कहते हैं कि पूछो-पूछो, अगर पूछोगे नहीं, तो सीखोगे कैसे। 
दरअसल बच्चों से बात करने का एक मतलब यह भी होता है कि उनके सवालों के जवाब सोचते हुए, आपको अपनी नासमझी या अपने अज्ञान का अंदाज लग जाता है। बच्चे कद-काठी और उम्र में छोटे होते हैं, लेकिन उनके छोटे-छोटे सवाल ऊंट जैसे बड़े-बड़े लोगों के लिए पहाड़ बनकर आते हैं, और अपनी अक्ल और अपने ज्ञान पर फिदा खुशफहम लोगों को उनका कद बता जाते हैं। 
सवालों का सामना करना अपना खुद का ज्ञान बढ़ाना होता है। सवाल पूछने वालों का ज्ञान तो तभी बढ़ सकता है जब आपके पास जवाब हों, लेकिन आपका ज्ञान तो सवाल सुन-सुनकर ही बढऩे लगता है, अगर आप उनके जवाब अपने खुद के लिए भी आगे-पीछे ढूंढ लें। 
इसके लिए दो बातें सबसे जरूरी होती हैं, बच्चों से मिलना, जो कि आमतौर पर जिज्ञासु होते हैं, और ऐसे नए लोगों से मिलना जो कि आपसे कुछ पूछ सकते हैं। लेकिन होता यह है कि लोग इन दोनों तबकों से बचते हुए अपने उन्हीं करीबी लोगों से बार-बार मिलते हैं जो दिमागी कसरत करने को मजबूर न करें। हौसला कुछ बढ़ाएं, और सवालों का सामना करें। 
- सुनील कुमार

हादसों के हिन्दुस्तानी इस्तेमाल, अमरीका से सबक की जरूरत


संपादकीय
16 अप्रैल 2013
अमरीका के बॉस्टन में अभी से कुछ घंटे पहले हुए धमाकों से जितना वह शहर हिला है, उससे कहीं अधिक अमरीका हिल गया है। दस से अधिक बरस पहले न्यूयॉर्क पर हुए आतंकी हमले के बाद अमरीकी जमीन पर क्या यह एक आतंकी हमला है, यह बात अभी खुद अमरीका को साफ नहीं है। और किसी देश पर हुए आतंकी हमले में दो मौतों को लेकर यहां पर हमारे लिखने का भी कुछ नहीं है, लेकिन हम ऐसी घटना के बाद सरकार के बर्ताव को लेकर चर्चा करना चाहते हैं। अमरीकी राष्ट्रपति ने उनके लिए इस भयानक घटना को लेकर अपने बयान में बहुत साफ-साफ कहा- हम लोग अभी तक नहीं जानते हैं कि ये धमाके किसने और क्यों किए हैं। लोगों को कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए जब तक कि हमारे पास सारे तथ्य न आ जाएं। लेकिन किसी को भी कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए। हम लोग इसकी जड़ तक जाएंगे और खोज निकालेंगे कि ये किसने और क्यों किए हैं।
भारत में अगर इतनी बड़ी नहीं, कोई छोटी घटना भी हुई होती, तो नेताओं के बयान एक-दूसरे की तरफ उंगली उठाने वाले रहते। अगर पश्चिम बंगाल में ऐसा हुआ होता, तो ममता बैनर्जी इसे वामपंथियों की हरकत बताती, अपनी जान लेने की साजिश बताती, और अपनी सरकार को बदनाम करने की हरकत बताती। इसी तरह दिग्विजय सिंह इसे हिन्दू आतंकी हरकत बताते, नरेन्द्र मोदी इसे केन्द्र सरकार की नरमी का नतीजा बताते, और यह सिलसिला इसी तरह चलते रहता। लोगों को यह भी याद है कि जब मुंबई पर कसाब और उसके आतंकी गिरोह का हमला हुआ, तो दिल्ली में उस वक्त के गृहमंत्री शिवराज पाटिल मॉडलिंग करते हुए मीडिया के कैमरों पर ही दिन में तीन बार कपड़े बदले हुए दिख गए, जो विमान दिल्ली से कमांडो दस्ते को मुंबई ले जा रहा था, उसे शिवराज पाटिल के साथ जाने के लिए घंटे भर रोका गया था, महाराष्ट्र के उस वक्त के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख जब हमला काबू आ जाने के बाद ताज होटल पहुंचे थे तो उनके साथ उनका फिल्म अभिनेता बेटा था, और उस बेटे का एक फिल्म निर्माता-निर्देशक था, जिसकी मुंबई हमले पर बनी फिल्म अभी जारी हुई है। 
लेकिन शिवराज पाटिल और विलासराव देशमुख जैसे लोग अकेले नहीं थे। आज सुबह से भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जो बयान जारी किया गया है, वह अमरीकी राष्ट्रपति को भेजी गई एक चि_ी है, जिसमें उन्होंने बम विस्फोटों की निंदा करते हुए इसे मूर्खतापूर्ण तथा कायरतापूर्ण करार दिया और आतंकवाद से लडऩे में भारत की ओर से हर तरह की मदद की पेशकश की। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को लिखे पत्र में मनमोहन सिंह ने कहा, आतंकवाद से लडऩे में भारत और अमेरिका के बीच महत्वपूर्ण सहयोग को देखते हुए हम आपको पूर्ण सहयोग की पेशकश करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत आतंकवाद से लडऩे में अमेरिकी नागरिकों के साथ है। उन्होंने कहा, भारत के लोग हमले की कड़े शब्दों में निंदा करने में मेरे साथ हैं। अब भारतीय प्रधानमंत्री की यह चि_ी उस वक्त अमरीका पहुंच गई है जब खुद अमरीका इसे आतंकी घटना नहीं मान रहा है, और जांच को प्रभावित किए बिना वह सभी किस्म के नतीजों के लिए अपने दिमाग को खुला रखकर चल रहा है।  अमरीकी राष्ट्रपति अपने देश के भीतर नागरिकों को भड़कने से बचाने के लिए एक बहुत ही जिम्मेदारी की, संतुलित और न्यायसंगत बात कह रहे हैं- हम लोग अभी तक नहीं जानते हैं कि ये धमाके किसने और क्यों किए हैं। लोगों को कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए। और ऐसे में भारत इसे आतंकी घटना बताकर अमरीका की मदद करने भी जा रहा है! 
और एक वक्त नेहरू का जो भारत पूरी दुनिया के मामलों में दखल और वजन रखता था, आज उसके पुराने दोस्त देशों में, पड़ोस में, इराक से लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक आए दिन अमरीकी द्रोन हमलों में दर्जनों बेकसूर मारे जा रहे हैं , लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री का कभी मुंह नहीं खुला। अभी चार दिन पहले ऐसे ही एक हमले में आधा दर्जन से अधिक बच्चे मारे गए, पश्चिमी मीडिया पर अमरीकी कब्जे के बावजूद उन लाशों की तस्वीरें दुनिया का दिल दहलाने के लिए बाहर आ गई, लेकिन मनमोहन सिंह का दिल नहीं दहला, उनका कोई बयान नहीं आया कि अमरीका देख समझकर हमले करे, और आतंकियों को मारने के नाम पर बेकसूर बच्चों पर द्रोन से बम बरसाना बंद करें। भारतीय प्रधानमंत्री को न तो उस फौजी कार्रवाई में कोई खामी दिखी, न अमरीका के फर्जी बहानों में कोई खामी दिखी, और न उन्हें बेकसूर बच्चों की लाशों के बिछ जाने में कोई अंतरराष्ट्रीय आतंक दिखा। लेकिन अमरीका में हुए एक धमाके से भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में मेज हटाकर दरी बिछा दी गई, और गमी मनाना शुरू कर दिया गया। 
भारत को, यहां के नेताओं को, यहां की सरकारों को अपनी प्रतिक्रिया काबू में रखना सीखना चाहिए। एक-दूसरे को कोसने के लिए, अपनी साख को बचाने के लिए, कहीं किसी की चापलूसी करने के लिए, एक-एक हादसे का जैसा हिन्दुस्तानी इस्तेमाल होता है, उससे बचने के तरीके भारत के अमरीकापरस्त नेता, कम से कम अमरीकी राष्ट्रपति से तो सीख लें। 

छोटी सी बात

15 अप्रैल 
धोखे के फेर में पडऩे के पहले सोचें...
टीवी के परदे पर एक के बाद दूसरा जालसाज छाए रहता है। पहले निर्मल बाबा नाम का एक आदमी लोगों को बेवकूफ बनाता रहा, अब कुछ दूसरे बाबा यही काम कर रहे हैं। इनके झांसे में आने वाले लोगों को यह सोचना चाहिए कि स्वर्ग दिलाना अगर इतना ही आसान होता, तो ऐसे बाबा धरती के लोगों को स्वर्ग ले जाने के लिए एक ट्रैवल एजेंसी ही खोल चुके होते। इसलिए किसी के झांसे में आने से पहले, किसी के करिश्मे पर भरोसा करने के पहले, अपनी अक्ल, सामान्य तर्क, और विज्ञान की  कुछ बुनियादी बातों पर भी गौर कर लेना चाहिए। 
किसी समझदार ने कभी यह लिखा था कि जब दुनिया का पहला मूर्ख, दुनिया के किसी जालसाज से मिला, तो उसी वक्त धर्म का आविष्कार हुआ। वह बात आज भी लागू होती है, और अब वह धर्म से बढ़कर आध्यात्म नाम की दूकान पर भी बिकने लगी है, और कई रंगों की पैकिंग में जन्नत बाजार में है। 
उन्हीं लोगों को इन सब मदद की अधिक जरूरत होती है, जिनके सीने पर अपने ही गलत कामों का बोझ सवार होता है। कभी यह सोचकर देखें कि अगर खुद सारे काम ही अच्छे करें, तो किसी बाबा की जरूरत ही क्या होगी? 
- सुनील कुमार

2002 का जुबानी लकवा आज का बड़ा बड़बोला

संपादकीय 
15 अप्रैल 2013
जनता दल यूनाइटेड के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज देश में सबसे अधिक उत्सुकता से देखे जा रहे नेता हैं। अगले लोकसभा चुनाव में उनका क्या रूख रहता है इस पर हर किसी की नजरें हैं। कल उन्होंने अपनी पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाते हुए जितनी बातें कही हैं, वे मायने रखती हैं। इन बातों को तीन अलग-अलग नजरियों से देखा जा सकता है। कांगे्रस को ये बातें कम लगती हैं, जिसका मानना है कि नीतीश कुमार अगर खुलकर भाजपा के मोदी के खिलाफ आज अगर सामने नहीं आते हैं, तो उनका साम्प्रदायिकता विरोध बोगस है। दूसरा नजरिया भाजपा का है, जो अब शायद मोदी की ताजपोशी को जरूरी और सही दोनों मान रही है, और अगली सरकार में नीतीश को साथ रखना उसे जरूरी और ठीक लग रहा है। इसलिए वह इन दोनों नावों पर एक साथ सवारी करना चाह रही है। तीसरा नजरिया खुद नीतीश की पार्टी का है, जो कि मिली-जुली जुबान बोल रही है, और इसके भीतर शरद पवार जैसे लोग नरमदलीय हो गए हैं, और नीतीश गरमदलीय हो गए हैं। कुल मिलाकर बात मोदी पर आकर अटकी है, बाकी भाजपा से नीतीश को कोई परहेज नहीं है। 
कल नीतीश कुमार ने मोदी पर हमले करने के साथ-साथ जिस तरह की बात अटल और आडवानी को लेकर कही है, उसके हिसाब से वे मोदी के बिना भाजपा के किसी दूसरे प्रत्याशी को प्रधानमंत्री मानने के लिए तैयार बैठे हैं। वे अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल को राजधर्म का मानते हैं। यहां पर आकर साम्प्रदायिकता पर उनका रूख एक भारी समझौते का रूख है। भारत का ताजा इतिहास इस बात का गवाह है कि अभी दस बरस पहले जब नरेन्द्र मोदी की सरकार गुजरात में हजारों अल्पसंख्यक मुसलमानों के कत्ल के लिए सीधे-सीधे या परदे के पीछे से जिम्मेदार थी, तब अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली में एनडीए के प्रधानमंत्री रहते हुए अफसोस जाहिर करने से अधिक कुछ नहीं कर रहे थे। और देश की सरकार का राजधर्म तो यह कहता है कि उसे देश के एक प्रदेश में संवैधानिक सत्ता के कातिल हो जाने पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। अफसोस तब राजधर्म नहीं कहा जा सकता जब संविधान की शपथ लेकर कोई राजगद्दी पर काबिज हो। और नरेन्द्र मोदी ने तो कम से कम अदालत के कटघरे तक पहुंच जाने का खतरा उठाते हुए जो कहा वो किया। अटल बिहारी वाजपेयी तो इस मामले में अपनी साख के हिसाब से वह मुखौटा बने रहे जो कि बहुत से लोगों को बाकी भाजपा के मुकाबले अधिक बर्दाश्त हो जाता है, और जिस गुणगान करते हुए आज नीतीश कुमार अटल बिहारी को राजधर्मी करार दे पा रहे हैं। 
ऐसा कोई धर्म नहीं होता, और ऐसा कोई राज नहीं होता जिसमें देश के लिए जिम्मेदार कोई प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी की एक प्रदेश सरकार के राज में इस कदर मानवसंहार देखते हुए सिर्फ अफसोस से हाथ मलते रहे। अगर नीतीश कुमार के कल भी वह सरकार मंजूर थी और आज भी वे वैसी ही सरकार पाने की हसरत रखते हैं, तो यह उनका एक खोखलापन अधिक है। जिस तरह की ईमानदारी की वे बातें करते हैं, वैसी ईमानदारी का उनका चाल-चलन नहीं है। जो उस वक्त मोदी को बचाने वाली केंद्र सरकार का हिस्सा रहा, आज वह इस आधार पर मोदी से परहेज की बात कर सकता है, या भाजपा को इसकी नसीहत दे सकता है? पूरी दुनिया का अदालती इतिहास यह बताता है कि किसी जुर्म में खुलकर हिस्सेदारी जरूरी नहीं होती, उस जुर्म के वक्त मुजरिम के साथ खड़े रहना, उसका हिमायती बने रहना भी काफी होता है। आज जो नीतीश कुमार मोदी के खिलाफ देश में सबसे बड़े लड़ाके बने हुए हैं, वे अटल सरकार में ताकतवर कैबिनेट मंत्री थे, और उस नाते वे मोदी सरकार के खिलाफ किसी कार्रवाई की बात कर सकते थे, उनको करनी चाहिए थी। आज जो रात-दिन बढ़-चढ़कर मोदी के खिलाफ बोल रहे हैं, 2002 में वे गुजरात की सारी हिंसा को नंगी आंखों से देख रहे थे, और मौनी बाबा बने हुए थे। आज वे साम्प्रदायिकता को लेकर जिस नैतिकता और मानवीयता का झंडा उठा रहे हैं, उस डंडे का, उस हाथ का हक वे 2002 में खो चुके हैं। 
फिलहाल राजनीति को लेकर बहुत अधिक नैतिकता की बात करना फिजूल है, इसलिए कांगे्रस इस बात का मजा ले सकती है कि एनडीए में फूट पड़ती दिख रही है, हम इस मौके पर लोगों को यह याद दिला रहे हैं कि आज की नीतीश कुमार की यह जुबान, 2002 में लकवे का शिकार थी।

हिंदुस्तानी सचमुच बहुत ठंडे मिजाज के...

15 अपै्रल 2013
तमिलनाडु के सलेम में एक गरीब औरत अपने पति और दो बच्चों के साथ जब सुबह-सुबह के अंधेरे में अस्पताल पहुंची तो उसे भर्ती करने के लिए नर्सों ने हजार रुपये रिश्वत मांगी। पैसे न होने पर उसे निकाल दिया, और उसने बाहर सड़क पर एक नाली के करीब बच्चे को जन्म दिया। अब अस्पताल इस मामले की जांच कर रहा है। 
अस्पतालों में गरीबों का ऐसा हाल नया नहीं है। पिछले महीनों में छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे कई राज्यों में सरकारी बीमा कार्ड से रकम निकाल लेने के लिए बड़े-बड़े अस्पतालों ने साजिश करके जवान महिलाओं के गर्भाशय निकाल दिए। उनको कैंसर का डर दिखाया और रातों-रात उनके बदन से खिलवाड़ करके उन्हें मौत के करीब ला दिया। जिस गर्भाशय को अधेड़ हो जाने के बाद किसी-किसी मामले में जांच के बाद निकालना ठीक समझा जाता है उसे 25 बरस की उम्र में ही निकाल फेेंका। 
चूंकि गरीब को उस काल्पनिक ईश्वर ने भी तकलीफ के लायक माना है, इसलिए उस ईश्वर की भावना का सम्मान करते हुए, उसकी योजना के मुताबिक उसके भक्तजन अपनी पूरी कोशिश लगा देते हैं कि किस तरह इन गरीबों को और तकलीफ दी जाए, लूटा जाए। देश के कई हिस्सों में ऐसे गरीबों की किडनी निकालकर बेच देने के मामले में सामने आए, कहीं उनका खून निकालकर कोई डॉक्टर बेच देता है तो कहीं बदन का कोई और हिस्सा।
छत्तीसगढ़ में जब यह गर्भाशय कांड हुआ और साबित हुआ कि हजारों महिलाओं के गर्भाशय उनकी भरी जवानी में निकालकर फेंक दिए गए, तो भी सरकार ढीली-ढाली रही। सरकार के एक ताकतवर बड़े आदमी का यह कहना था कि अगर कड़ी कार्रवाई की गई तो इस छोटे से राज्य के सैकड़ों डॉक्टर जेल में रहेंगे। अब सवाल यह उठता है कि ऐसे डॉक्टरों को बचाकर या अस्पताल के दूसरे भ्रष्टाचार में शामिल ऐसे कर्मचारियों को बचाकर सरकार किसका भला कर रही है, जिनकी वजह से गरीब मां को नाली के किनारे बच्चे को जन्म देना पड़ता है?
इस देश में अब एक अलग कानून की जरूरत है, जिसकी वकालत हम लंबे समय से करते आ रहे हैं। जो लोग बहुत ही गरीब लोगों के साथ भ्रष्टाचार करते हैं, उनके लिए एक अलग सजा का इंतजाम होना चाहिए। ऐसा भ्रष्टाचार करने वाले अगर ताकतवर हैं, तो उनके खिलाफ और भी कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। ऐसा न होने पर बेजुबान और बेबस गरीब को कोई सामाजिक न्याय नहीं मिल सकता। जिस तरह से इस देश के संविधान में दलितों और आदिवासियों को ज्यादती से बचाने के लिए अलग से कानूनी बचाव दिया गया है, उनके साथ ज्यादती करने वालों को कड़ी सजा का इंतजाम किया गया है, वैसा ही इंतजाम गरीबों के साथ भ्रष्टाचार करने वाले गैरगरीबों के लिए किया जाना चाहिए। और ऐसा इंतजाम महिलाओं के लिए भी किया गया है जिनको कानून में अतिरिक्त सुरक्षा दी गई है। इसी तरह गरीब को भी सीधे-सीधे एक अलग दर्जा देने की जरूरत है।
आज अगर ताकतवर तबके के लोग गरीबों के साथ भ्रष्टाचार की ज्यादती करते हैं, और उनके मामलों की सुनवाई भी दस-बीस, पचीस बरस तक चलती है, तो कोई गरीब ऐसी लंबी सुनवाई नहीं झेल सकते। इसलिए इस देश में अगर फास्ट ट्रैक कोर्ट की जरूरत है, तो दलित-आदिवासी की तरह, महिलाओं की तरह, गरीबों के लिए अलग अदालत होनी चाहिए। जिस तरह एक गैरदलित-आदिवासी अगर दलित-आदिवासी पर हिंसा करते हैं, तो उसकी तेज रफ्तार सुनवाई अलग अदालत में होती है, उसी तरह गरीब से भ्रष्टाचार करने वाले गैरगरीब को तेजी से सजा मिलनी चाहिए। 
इसी सोच को एक और पहलू तक बढ़ाने की जरूरत है। गरीबों के खिलाफ भ्रष्टाचार में भी जहां पर इलाज या अनाज से जुड़ा हुआ भ्रष्टाचार है, तो उस पर तेजी से सुनवाई, अधिक कड़ी सजा तो होनी ही चाहिए, किसी भी अदालती फैसले के पहले ऐसे मामलों में गरीब को तुरंत राहत का इंतजाम भी होना चाहिए। उसे उसके हक का अनाज या इलाज पाने के लिए अदालती कार्रवाई की राह देखने पर बेबस नहीं किया जाना चाहिए। 
कुछ लोगों को यह लग सकता है कि जिस तरह आज कुछ मामलों में लोगों को शक होता है कि कोई महिला झूठी रिपोर्ट लिखाती है, कोई-कोई दलित -आदिवासी शायद कभी झूठी रिपोर्ट लिखाते हैं, उसी तरह हो सकता है कि कोई गरीब भी गैरगरीब के खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखाए। लेकिन सामाजिक न्याय की राह में ऐसे खतरे तो रहेंगे ही। एक महिला मुख्यमंत्री के राज में एक महिला को नाली के किनारे बच्चे को जन्म देना पड़े, तो यह जाहिर होता है कि इस मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ अनुपातहीन संपत्ति का मामला अदालत तक क्यों पहुंचा होगा और वहां पर जयललिता कटघरे में क्यों है?
गरीबों के इलाज और अनाज के हक पर जब ताकतवर तबके इस तरह से डाका डालते हैं, और जब ऐसा काम नक्सल पहुंच के इलाकों से बाहर होता है, तो कुछ फिल्म और उपन्यास याद पड़ते हैं। इसी किस्म की शहरी ज्यादतियां से जूझने के लिए कुछ कहानियों में खबरदार शहरी नाम के कुछ ऐसे किरदार बनते हैं, जो कानून को हाथ में लेकर अदालत से पहले ही इंसाफ करने में जुट जाते हैं, क्योंकि अदालतें गरीब और अमीर के बीच ज्यादती की लड़ाई में कोई इंसाफ शायद ही कर पाती हैं। 
जब डॉक्टरों के संगठित भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, तो लोग सड़क पर उनके फैसले की बात करने लगते हैं। लोगों के बीच यह चर्चा होती है कि कुछ मुस्लिम देशों की तरह चौराहों पर उन्हें टांग देना चाहिए। मैं किसी को भी टांगने के खिलाफ हूं, लेकिन लोगों की सोच हिंसक हो जाने को समझ सकता हूं, और मेरे पास भारत के आज के लोकतंत्र में इस सोच को ठंडा करने के लिए पानी की कोई बोतल नहीं है। 
हिंदुस्तानी सचमुच ही बहुत ठंडे मिजाज के लोग होते हैं...