कुपोषण भारत कैसे छोड़े?

31 मई 2013
संपादकीय
बच्चों के लिए काम करती एक संस्था की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले दस सालों में भारत को कुपोषण के कारण कोई 26 खरब रुपयों का नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि कुपोषण के कारण भारत के 20 फीसदी बच्चे कम साक्षर हो पा रहे हैं, कुपोषित बच्चों की कमाई 20 फीसदी तक कम हो सकती है। यही नहीं, इस रिपोर्ट के मुताबिक कुपोषित बच्चों को पढऩे-लिखने में दिक्कत होती है, स्कूलों में उनका प्रदर्शन स्तरीय नहीं रह पाता। तकरीबन आधे कुपोषित बच्चों वाले भारत में पिछले दिनों बाल कुपोषण की स्थिति पर बहुत कुछ लिखा बोला गया है, लेकिन सेव द चिल्ड्रन की इस 'फूड फॉर थॉटÓ कही जा रही इस रिपोर्ट में भारत के लिए अहम बात यह है कि इस रिपोर्ट में हजारों बच्चों में कुपोषण की स्थिति का अध्ययन इथियोपिया जैसे भुखमरी से पीडि़त देश, वियतनाम जैसे युद्ध और संघर्षग्रस्त देश, पेरू जैसे पिछड़े देश के साथ भारत में भी किया गया। देश के योजनाकारों के लिए शायद यह कोई चौंकने वाली बात हो सके।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में कुपोषण के ऊंचे स्तर को राष्ट्रीय शर्म करार दिया था। ऐसे दौर में जब भारत आर्थिक ताकत बनकर उभरा है, उसकी भावी पीढ़ी के पैंतालीस फीसदी का कुपोषित होना आर्थिक तरक्की के तमाम दावों के ऊपर एक सवाल तो है ही। बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता वैश्वीकरण और उदारवादी नीतियों से गरीबी बढऩे की बात करते हैं। बहुतों का यह भी मानना है कि विकास से सब कुछ ठीक हो जाता है, और यह गरीबी और कुपोषण कुछ वक्त की बात है, लेकिन भारत जैसे सामाजिक विविधता और परंपराओं वाले देश में कुपोषण के नतीजों के गहरे सामाजिक असर हो सकते हंै, जिनका इलाज शायद केवल विकास से न हो सके। देश में लिंग, जाति, और संप्रदाय के भेदभाव अभी भी कायम हैं। ऐसे में कुपोषण जैसी स्थिति का सबसे बुरा असर उन पर पड़ता है, जो कमजोर हैं। परिवार के भीतर बच्चियों, महिलाओं पर, और समाज में पिछड़े और दलित लोगों पर।
 सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट में भारत में कुपोषण के कारण अर्थव्यवस्था को हो रहे  नुकसान का अंदाजा लगाया गया है, लेकिन इस रिपोर्ट से परे अगर देखें तो तरक्की की दौड़ में पिछड़ जाने वाले वर्ग में जो असंतोष पनपता है, वह धीमे-धीमे गरीब अमीर के आपसी तनाव का रूप ले लेता है, यह असंतोष तब और बढ़ जाता है, जब देश की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ जाए, और उसमें सामान्य लोगों के लिए भी मौके सिकुड़ जाएं। ऐसे में कमजोर कुपोषित बच्चों और उनके माता-पिता, सामान्य और सम्पन्न बच्चों और उनके माता-पिता की तरह विकास के मौके नहीं हासिल कर पाते। पिछले तीस सालों के दौरान लगातार बढ़ी सम्पन्न और गरीब वर्ग के बीच की खाई, ऐसी हालत में और चौड़ी नजर आती है। दो साल पहले दुनिया भर में चले 'ऑकुपाईÓ आंदोलन के मूल में भी यही निन्यानबे फीसदी गरीब बनाम एक फीसदी अमीर का संघर्ष था। यह आंदोलन दौलतमंदों की अमीरी से गरीबों की जलन के कारण नहीं, बल्कि समाज में गहरे पैठी नाइंसाफी के अहसास के कारण इतना कामयाब हुआ, हालांकि इसका कुछ हद तक श्रेय मर्सिडीज  जैसे गाडिय़ों का प्रचार करने वाली जन संपर्क फर्म 'वर्क हाऊसÓ को भी था, लेकिन वर्क हाऊस अपने काम में वाहवाही इसलिए बटोर सकी कि लोगों के दिलों में नाइंसाफी का अहसास, और उससे नाराजगी थी। कभी-कभार ऐसे सामाजिक असंतोष कितने गंभीर राजनीतिक और सामरिक मोड़ ले लेते हंै, इसकी मिसाल यह खुलासा था कि, इस शांतिपूर्ण आंदोलन पर निगरानी के लिए एफबीआई ने अमरीका की आंतरिक सुरक्षा देखने वाले होमलैन्ड डिपार्टमेंट के साथ मिलकर आतंकवादियों से निपटने वाली टुकड़ी का इस्तेमाल किया। यह नाइंसाफी का एक अलग दौर शुरू करने के लिए काफी था।
हमारा मकसद यहां कुपोषण के बुरे नतीजों को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर डरावना मंजर खड़ा करना नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि कुपोषण के इस ऊंचे स्तर से देश में एक बहुत बड़ा ऐसा वर्ग तैयार हो रहा है, जो कई सारी मुश्किलों के कारण देश में असंतोष को बढ़ावा देगा। यह कल्पना ही की जा सकती है कि ऐसा असंतोष अगर पहले से ही अभावग्रस्त चल रहे इलाकों, लेकिन अब तक नक्सल हिंसा से बचे इलाकों में फैले, तो कौन-कौन सी समस्याएं सरकार और समाज के सामने और खड़ी हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म करार देते हुए कहा था कि यह इस बात का सुबूत है कि इस समस्या से उबरने के लिए सरकार केवल एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के भरोसे नहीं रह सकती, लेकिन क्या खाने की जगह परिवार के मुखिया को नकद थमा देने से इस समस्या में कोई मदद मिल सकेगी? क्या समाज इसके लिए तैयार है या नहीं, इस पर कोई गंभीर अध्ययन किया गया है? और सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही तय करने का है। खाद्य सुरक्षा योजनाओं, एकीकृत बाल विकास योजना, पूरक आहार योजनाओं, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था सबमें भारी लूट और अनियमितताओं का ठोस इलाज किए बिना कुपोषण से लड़ाई, इसके शुरू होने के पहले ही सरकार हार चुकी होती है। ऐसा नहीं है कि यह कोई नामुमकिन काम है। छत्तीसगढ़ ने सार्वजनिक वितरण व्यवस्था में चोरी पर काबू करके बताया है, लेकिन सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। 

मुसीबत के वक्त गैरमौजूद गृहमंत्री

संपादकीय
30 मई 2013
छत्तीसगढ़ के बस्तर में हुई इतनी बड़ी वारदात में कांग्रेस के बड़े नेताओं सहित उन्तीस मौतों के बाद भी देश के गृहमंत्री अमरीका में बैठे हुए हैं। उनके साथ वहां दौरे पर गए हुए अफसर लौटकर आ गए हैं, लेकिन सुशील कुमार शिंदे उसके बाद भी वहां बने हुए हैं। कहने के लिए यह सफाई दी जा रही है कि उन्होंने वहां से मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से बात करके इस हमले की जांच एनआईए से करवाना शुरू कर दिया है, लेकिन देश की राजधानी और प्रदेश की राजधानी में सरकारों की, जांच एजेंसियों की जो बैठकें चल रही हैं, उनके बीच देश का गृहमंत्री गायब है। यह पहला मौका नहीं है जब गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठे नेता से देश को निराशा मिली हो। लोगों को याद होगा कि जब मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था तो उस वक्त के गृहमंत्री शिवराज पाटिल दिनभर मीडिया के सामने आते हुए अलग-अलग कपड़े बदलकर, अलग-अलग जूते बदलकर फैशन परेड सी कर रहे थे। इसके अलावा मुंबई के लिए रवाना होने वाले कमांडो दस्ते का विमान उनके लिए दिल्ली में एक घंटा लेट किया गया था। इसके अलावा भी उन्होंने कई और मौकों पर देश को निराश किया। आज जब प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी बस्तर के इस हमले के बाद हड़बड़ाकर छत्तीसगढ़ पहुंचे, और यहां मुख्यमंत्री-राज्यपाल के साथ बैठक की, तो भी सुशील कुमार शिंदे को अमरीका में बिताए जा रहे अपने निजी वक्त को छोड़कर देश लौटना नहीं सूझा।
हम यह भी नहीं कहते कि सरकार में गृहमंत्री ही सबकुछ होता है, और उनके साथ के छोटे मंत्री किसी काम के नहीं होते। लेकिन देश की जनता की भावनाएं मायने रखती हैं, और निर्वाचित नेताओं के भीतर जिम्मेदारी की भावना है, ऐसा भरोसा जनता को होना भी मायने रखता है। इस मोर्चे पर जब कोई मंत्री मुसीबत के किसी वक्त, हमले के किसी वक्त गायब रहे, तो जनता की नजरों में वैसा मंत्री गिर जाता है। हम यह भी नहीं कहते कि केन्द्रीय गृहमंत्री को छत्तीसगढ़ आकर डेरा डालना चाहिए था, और वे यहां आकर केन्द्रीय गृह सचिव के मुकाबले अधिक काम कर सकते थे, लेकिन हमारा यह जरूर मानना है कि लोकतंत्र में जिन लोगों को इतने अधिकार और इतने ताकत की कुर्सियों पर बिठाया जाता है, उन लोगों को जनभावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए। 
हो सकता है कि अभी जिस पल हम यह लिख रहे हैं, उस वक्त सुशील कुमार शिंदे भारत वापिस लौट रहे हों, लेकिन यह बहुत देर से और बहुत कम बात होगी। केन्द्र सरकार के भीतर और कांग्रेस पार्टी के भीतर जनता के जख्मों पर मरहम रखने में लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। जिस शाम यह नक्सल हमला हुआ, उसी आधी रात को दिल्ली से कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी छत्तीसगढ़ पहुंच गए। पूरी रात वे अस्पताल, एयरपोर्ट और कांग्रेस भवन के बीच दौड़-भाग करते रहे। ऐसा नहीं था कि उनके बिना कोई बचाव काम रूकता, लेकिन उनकी मौजूदगी में एक तरफ तो उनकी पार्टी के घायल लोगों के बीच हौसला बंधाया, दूसरी तरफ भाजपा की राज्य सरकार के ऊपर एक बहुत बड़ा नैतिक दबाव भी राहुल गांधी के यहां आने से पड़ा कि केन्द्र सरकार और उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी इस नुकसान को कितने गंभीरता से ले रही है। हमारा मानना है कि पुलिस कार्रवाई या बचाव की दौड़-भाग में राज्य सरकार की सक्रियता राहुल गांधी के यहां खड़े रहने की वजह से कुछ बढ़ी होगी। इसी तरह देश के गृहमंत्री को मुसीबत के वक्त खुद देश में मौजूद रहना चाहिए, एक गैरमौजूद गृहमंत्री अगर सिर्फ टेलीफोन पर अपना काम पूरा समझ रहे हैं, तो यह बात जनभावनाओं के खिलाफ भी है, और फिर प्रधानमंत्री या सोनिया गांधी के छत्तीसगढ़ आने की भी क्या जरूरत थी? 
कांग्रेस के भीतर और यूपीए के भीतर इस पर चर्चा होनी चाहिए। 

सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार गलत

संपादकीय
29 मई 2013
छत्तीसगढ़ में हुए नक्सल हमले को लेकर राज्य की कांग्रेस पार्टी के तेवर अब भाजपा सरकार पर तीखे हो गए हैं। जाहिर है कि अपने नेताओं का इतना बड़ा नुकसान झेलने के बाद कांग्रेस के बाकी नेताओं की यह नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी भी हो जाती है, और असल जिंदगी की चुनावी राजनीति में चुनावों के कुछ महीने पहले भी अगर राज्य सरकार की एक बड़ी नाकामयाबी पर विपक्ष हमला नहीं करेगा, तो क्या करेगा, और कब करेगा? फिर यह भी है कि राज्य में बचे हुए कांग्रेस नेताओं के बीच आज अपने आपको भाजपा, और भाजपा की राज्य सरकार से लडऩे वाला साबित भी करने का वक्त है, क्योंकि गमी के बीच भी राज्य में कांग्रेस का कोई न कोई अध्यक्ष तो तय होगा ही। यह बात भी है कि इतने बड़े हमले के बाद राज्य सरकार की कार्रवाई, और आने वाले महीनों में कांग्रेस के लोगों को सत्तारूढ़ भाजपा और सरकार के लोगों के बराबर हिफाजत मिलने के लिए भी कांग्रेस के तीखे तेवर जरूरी हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की एक दिक्कत यह भी है कि केन्द्र की यूपीए सरकार की मुखिया कांग्रेस के रहते हुए भी किसी भी मोर्चे पर यूपीए सरकार का हमला छत्तीसगढ़ सरकार पर नहीं हो रहा है, और इस बात पर अफसोस जाहिर करते कांग्रेस नेताओं के नौ बरस पूरे हो गए हैं। 
छत्तीसगढ़ में आज यह मौका कांग्रेस और भाजपा की अलग-अलग राजनीति का नहीं है। एक तरफ बस्तर के इस ताजा हमले की जांच केन्द्र सरकार की एजेंसी एनआईए को राज्य सरकार ने दे दी है, और दूसरी तरफ हाईकोर्ट के एक जज को यह जांच सौंप दी है। इन दोनों के बाद जांच रिपोर्ट का इंतजार करने के पहले, कुछ अफसरों का तबादला हो सकता था, वह भी छत्तीसगढ़ सरकार ने कल कर दिया है। लेकिन आज लाख रूपए का सवाल यह है कि आने वाले महीनों में जब छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार होगा, तब बस्तर की एक-एक कच्ची-पक्की सड़कों पर चुनावी गाडिय़ां किस तरह दौड़ेंगी? और वैसे भी एक अलोकतांत्रिक हिंसक हथियारबंद आंदोलन को बरसों से झेल रहे बस्तर में अगर राजनीतिक प्रक्रिया, चुनाव प्रचार जितनी हिफाजत नहीं मिल सकी, तो क्या होगा? क्या वहां के आदिवासी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से कुछ और दूरी तक कट जाएंगे? ऐसे बहुत से सवाल हैं जो इस बात से अधिक अहमियत रखते हैं कि बस्तर जैसे नक्सलग्रस्त इलाके में कौन सी पार्टी चुनाव जीतती है। कांग्रेस जीते या भाजपा, उससे अधिक महत्वपूर्ण वहां पर नक्सल हिंसा का हारना और लोकतंत्र का जीतना है। आज इस प्राथमिकता के लिए काम करने की जरूरत है, और यह सोचते हुए हमको कांग्रेस का यह फैसला ठीक नहीं लग रहा कि कल वह छत्तीसगढ़ की सर्वदलीय बैठक में शामिल नहीं होगी। कुछ इसी तरह की हरकत संसद में विपक्ष में बैठी भाजपा करते आई है, और दिल्ली में वह संसद के बजाय टीवी चैनलों के स्टूडियो में बैठकर यूपीए से बहस करती है। ऐसे तमाम मौकों पर भी हम संसद, विधानसभा, या किसी बैठक में बातचीत के महत्व को गिनाते आए हैं, और बातचीत का कोई विकल्प हो भी नहीं सकता। 
आज जब छत्तीसगढ़ में होने जा रही सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस को नक्सल खतरे पर अपनी बात को रखना चाहिए, अपनी राय को रखना चाहिए, और आगे के हमलों को रोकने के लिए अपने सुझाव रखने चाहिए, तब बैठक में न जाना एक चुनावी राजनीति हो सकती है, राज्य के भले का रूख हम इसको नहीं मानते। लोकतंत्र में बातचीत तो हम नक्सलियों से भी करने की वकालत करते हैं। जब केन्द्र और राज्य सरकारों से हम बार-बार यह अपील करते हैं कि उन्हें नक्सलियों से भी बात करके हिंसा खत्म करने का रास्ता निकालना चाहिए, तब अगर कांग्रेस और भाजपा साथ बैठकर बातचीत नहीं कर पाते हैं, तो इस संसदीय व्यवस्था में, भारतीय लोकतंत्र में, नक्सलियों जैसे अलोकतांत्रिक और हिंसक आतंकियों से बातचीत का माहौल कैसे बन पाएगा। कांग्रेस के लोगों को हर मुद्दे पर हर पल भाजपा से टकराव सोचने के पहले राज्य के बारे में सोचना चाहिए। आज कांग्रेस का जैसा नुकसान बस्तर के इस हमले में हुआ है, वैसा ही नुकसान आदिवासी समाज के बेनाम और बेचेहरा लोगों का लंबे समय से होते आ रहा है, और लगातार होता है। इस नुकसान को करने वाले नक्सली भी हैं, राज्य की पुलिस भी है, और केन्द्र के सुरक्षा बल भी हैं। लेकिन ऐसी तमाम बेकसूर आदिवासी मौतें शहरी मीडिया तक पहुंचते हुए सिर्फ आंकड़ों की शक्ल में बच जाती हैं। उन मौतों पर अलग से कोई गम नहीं हो पाता। आज बस्तर के इस ताजा हमले को लेकर जो सर्वदलीय बैठक हो रही है, उसकी फिक्र सिर्फ कांग्रेस के नेताओं की मौत तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बस्तर के उन बेजुबान आदिवासियों की मौतों तक भी उसे जाना चाहिए, जिसके वोटों को पाने के लिए इन दोनों पार्टियों के लोग खतरों को झेलते हुए भी नक्सल इलाकों में राजनीतिक कार्यक्रम कर रहे हैं। उसके वोट चाहिए, लेकिन उसकी मौत के लिए फिक्र नहीं चाहिए, यह सोच ठीक नहीं है। सर्वदलीय बैठक में बातचीत आम लोगों की मौतों तक भी जानी चाहिए, और अगर राज्य का मजबूत विपक्ष अपने को इस बैठक से बाहर रखता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के एक मौके को चूक जाना है। रायपुर हो या दिल्ली, कहीं पर भी विपक्ष को बातचीत के किसी भी मौके को खत्म नहीं करना चाहिए। 

नक्सलियों के बयान के बाद अब शक कुछ छंट जाए...

28 मई 2013
संपादकीय
बस्तर के ताजा नक्सल हमले में करीब तीस लोगों के मारे जाने के बाद अब हमलावरों की तरफ से बयान जारी करके नेताओं की हत्या के तर्क गिनाए गए हैं, और हमले में मारे गए बेकसूर लोगों के लिए अफसोस जाहिर किया गया है, माफी मांगी गई है। माओवादी हिंसा के जानकार कुछ लोगों को यह बात समझ नहीं आ रही थी कि कांगे्रस पार्टी के ऊपर इतना बड़ा हमला इस छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने क्यों किया है, जहां पर कि उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई भाजपा सरकार ने अधिक की है, और आम जनधारणा यह है कि महेंद्र कर्मा को छोड़कर कांगे्रस के बाकी नेता नक्सलियों के खिलाफ तीखे तेवरों वाले नहीं थे, नहीं हैं। लेकिन नक्सलियों का ताजा बयान भरोसेमंद है, और उसे फर्जी मानने की कोई वजह नहीं है। इसलिए उनका यह तर्क कुछ चौंकाने वाला है कि इस राज्य के शुरू के तीन बरसों में जोगी सरकार में गृह मंत्री रहे नंद कुमार पटेल को उन्होंने इसलिए मारा क्योंकि पटेल के कार्यकाल में बस्तर में पहली बार अद्र्धसैनिक बलों की तैनाती हुई थी। इस बयान को हम आज पहले पन्ने पर पूरा छाप रहे हैं इसलिए उस पर और अधिक चर्चा से कोई फायदा नहीं है, लेकिन इसके आ जाने से छत्तीसगढ़ में और देश के मीडिया में पिछले दो दिनों से छाई हुई, और गढ़ी हुई, चस्पा की हुई खबरें कुछ ठंडी पड़ेंगी। 
बोलचाल की जुबान में यह कहा जाता है कि जितने मुंह, उतनी बातें। छत्तीसगढ़ की इस बड़ी वारदात के बाद सदमे और हैरानी में डूबे हुए लोगों और आपसी मुकाबले में जुटे हुए मीडिया का बर्ताव कुछ इसी किस्म का था। बहुत तरह की अफवाहें तैर रही थीं, और मीडिया उनको लपकने के लिए तैयार भी था। ऊंची कुर्सियों पर बैठे कुछ लोगों के बयान दूसरों को हत्यारा ठहराने वाले भी थे, कई तरह की साजिशों की खबरें इधर-उधर लगवाई जा रही थीं। यह सब उस वक्त हो रहा था जब अंतिम संस्कार चल रहे थे, और अस्पतालों में लोग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। इसलिए नक्सलियों की तरफ से आए हुए इस बयान से कुछ किस्म की साजिशों के शक भी खत्म होने की उम्मीद की जा सकती है।
हम अभी भी छत्तीसगढ़ की राजनीति को इतना हिंसक नहीं मानते कि सरकार में से कोई विपक्ष के नेताओं को मरवाने की सोचेंगे, और न ही हम यह मानते कि कांगे्रस या किसी और राजनीतिक ताकत के कुछ लोग इतनी बड़ी और इतनी हिंसक वारदात के पीछे होंगे। लेकिन अटकलबाजी यहां तक पहुंच गई थी कि इस वारदात से अधिक फायदा किसका हुआ है, किस पार्टी का, या किस नेता का। दरअसल भारत की लोकतंत्र में ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग जितने किस्म के अपराधों में अब तक पकड़ाए जा चुके हैं, तो उसके बाद अब किसी को अफवाहों पर एकदम से शक भी नहीं होता। और नेताओं के खिलाफ जब अफवाह भयानक होती है, तो लोग उस पर तेजी से भरोसा करने का मिजाज भी बना चुके हैं। इसकी वजह से छत्तीसगढ़ में पिछले दो-चार दिनों में थोक की इन हत्याओं के बारे में सुपारी-किलिंग जैसी चर्चा इधर-उधर होने लगी थी, और नक्सलियों के बयान के आ जाने से अब इनके भी थमने की उम्मीद है। वैसे तो नक्सलियों के बारे में भी आम लोगों की सोच इस चर्चा को बढ़ा रही थी कि क्या वे भी अब सुपारी-हत्या करने लगे हैं? उनकी जैसी खूनी-साख है उसे देखते हुए लोगों का यह शक बहुत बेइंसाफी नहीं कहा जा सकता। दूसरी तरफ नेताओं के बारे में भी अगर लोगों को ऐसा शक हो रहा था, तो वह तकलीफदेह था, लेकिन पूरी तरह बेबुनियाद नहीं था। हालांकि हमारा मन इस राज्य के बारे में ऐसी बातों को मानने का नहीं होता। 
नक्सली तो घोषित तौर पर, और अपने खुद के दावों के मुताबिक खूंखार, आतंकी हत्यारे हैं। लेकिन अगर राजनीतिक दलों के लोग किसी दूसरी पार्टी के लोगों को, या अपनी पार्टी के लोगों को हिंसा का निशाना बनाते हैं, तो लोग किस भरोसे से लोकतंत्र और चुनाव में हिस्सा लेंगे? इसलिए नक्सलियों के इस बयान के साथ फिलहाल साजिश की अटकलें थम जाना चाहिए, जनता का विश्वास इतनी दूरी तक टूट जाना खतरनाक होता है, और हम बस्तर में देख ही रहे हैं कि लोकतंत्र पर से जनता का विश्वास हटने की वजह से अलोकतांत्रिक, हिंसक और आतंकी नक्सलियों को किस तरह एक जमीन हासिल हुई है। आने वाला वक्त उसे तो खत्म करे ही, छत्तीसगढ़ के शहरों को भी राजनीति की हिंसा से बचाकर रखे। पिछले दो-तीन दिनों में लोग मानो हर किस्म की बुरी से बुरी बात पर भरोसा करने एक पैर पर खड़े थे, और वह नौबत हमारे लिए बहुत तकलीफदेह थी। 

केंद्र और राज्य में टकराव से परे आपसी समझ का वक्त, जरूरत

संपादकीय
27 मई 2013
छत्तीसगढ़ की राजनीति पर इतिहास के सबसे बड़े नक्सल हमले के बाद जिस तरह प्रधानमंत्री, यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी, और कांग्रेस के भविष्य राहुल गांधी यहां पहुंचे, उसे लेकर एक हलचल होनी थी। कल का दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास का शायद सबसे अधिक हलचल का दिन था, जब लाशों की गिनती में बार-बार गलतियां हो रही थीं, तस्वीरें सैलाब की तरह पहुंच रही थीं, दिल्ली से इतने बड़े नेता अचानक एक साथ बिना किसी तैयारी के पहुंच रहे थे, बस्तर से जख्मी लाए जा रहे थे और लाशें उतर रही थीं, लोग एयरपोर्ट, अस्पताल और मृतकों के घर से लेकर पार्टी-दफ्तर तक दौड़-भाग कर रहे थे। और इस बीच एक अनौपचारिक सी बैठक में दिल्ली से आए लोगों और राज्य सरकार के लोगों के बीच बातचीत के एक-एक शब्द को पढऩे की कोशिश की गई। शब्दों तक तो ठीक था, शब्दों के बीच के फासलों को भी नापने की कोशिश की गई, और मीडिया में अपने-अपने ऐसे अंदाज छपे या दिखे कि चुप्पी और सन्नाटा कितने लंबे थे। मीडिया के लोग इस जिम्मेदारी को तय करने की हड़बड़ी में दिखे कि बस्तर के नक्सल हमले के पीछे की सरकारी लापरवाही अगर थी, तो उसके जिम्मेदार कौन थे? राजनीति के कुछ लोग मीडिया में सुर्खियां जडऩे की कोशिश में लगे रहे, और हड़बड़ी में गलाकाट मुकाबले में काम करता मीडिया अपनी स्क्रीन या अपने पन्नों को ऐसी सुर्खियों के लिए पेश भी करता रहा। इन सबमें अनहोनी कुछ नहीं थी, सिर्फ इतना था कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पहली बार ऐसा कुछ, इतना कुछ, इतने से घंटों में देख रही थी। 
ऐसे माहौल के बीच कल यह बात साफ हुई कि केन्द्र और राज्य सरकार के बीच नक्सल मोर्चे को लेकर किसी तरह का मतभेद नहीं है और दोनों साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ काम जारी रखने वाले हैं। छत्तीसगढ़ में चूंकि सरकार भाजपा की है और विपक्षी कांग्रेस के पास नक्सल मोर्चा सबसे बड़े मुद्दों में से एक मुद्दा रहता है, इसलिए जाहिर तौर पर कांग्रेस एक संगठन के रूप में अपनी हस्ती को बनाए रखने के लिए नक्सल मोर्चे पर भाजपा सरकार की नाकामयाबी को उठाती है। लेकिन सरकारों का काम राजनीति से परे भी किस तरह चल सकता है इसकी एक सबसे अच्छी मिसाल पिछले नौ बरसों में छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार और केन्द्र की यूपीए सरकार है। कल लाशों के बीच राजधानी रायपुर में जो बैठक हुई, उस बैठक को अखबारी सुर्खियों तक लाने में भी कोई बात मददगार नहीं हो पाई। और प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक, बिना किसी टकराव के, बिना किसी आरोप के, मामूली बातचीत, मामूली दरयाफ्त के बाद आगे साथ काम करने के पुराने इरादे को दुहराते हुए अलग हुए। इसके पहले भी कांग्रेस के कुछ लोग इस मौके का इस्तेमाल दो बातों के लिए करते दिखे, राष्ट्रपति शासन की मांग करते दिखे, और राज्य सरकार पर यह तोहमत लगाते दिखे कि उसने कांग्रेस के इतने नेताओं को मर जाने दिया। अगर एक खबर सच-सच छपी है तो भाजपा सरकार पर और मुख्यमंत्री पर एक तोहमत यह भी लगाई गई थी कि वे बचे हुए विपक्षी नेताओं को भी इसी तरह मरवा देंगे। केन्द्र से आए हुए सरकारी और कांग्रेसी नेताओं की दुख-तकलीफ के कुछ शब्दों, या राज्य सरकार की चूक के उनके किसी विश्लेषण पर लोग इसलिए लपक रहे हैं, क्योंकि इससे अधिक और कुछ भी तनाव के इस मौके पर भी सामने नहीं आ पाए। इतने बड़े नुकसान के बीच सदमे में आ गई किसी पार्टी के लोग अगर दिल्ली से यहां आकर भी अपना आपा नहीं खो रहे हैं, अपने लोगों को काबू में रख रहे हैं, तो इसमें उनका एक बड़प्पन भी झलक रहा है। 
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के लोग बहुत दर्द से उपजी कुछ बातों को राज्य सरकार की सुरक्षा इंतजाम के खिलाफ कह रहे हैं, लेकिन इन बातों से परे प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी गंभीरता से निभाते हुए इस मौके को राजनीतिक लड़ाई में तब्दील नहीं होने दिया। और वे तो देश के इस सबसे बड़े पद पर बैठे हुए, एक गंभीर और तकरीबन गैरराजनीतिक इंसान हैं, उनसे परे बिना किसी सरकारी पद वाले, बिना लंबे अनुभव वाले, और पूरी तरह राजनीतिक राहुल गांधी ने भी आधी रात छत्तीसगढ़ पहुंचते ही राष्ट्रपति शासन की सतही और ओछी मांग को खारिज करते हुए अपनी ही पार्टी के लोगों को फटकारा और उनके मुंह बंद किए। सरकारी और गैरसरकारी, इन दोनों स्तरों पर केन्द्र और राज्य के, कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के बीच किसी तरह का कोई टकराव सामने नहीं आया। और सारा टकराव छत्तीसगढ़ के भीतर के कांग्रेस के नेताओं का राज्य सरकार के साथ दिखा, जो कि राजनीतिक रूप से जायज भी है, क्योंकि इन दोनों को कुछ महीनों के बाद ही चुनावी मैदान में आमने-सामने रहना है। 
भाजपा के ही कुछ दूसरे राज्य जिस तरह लगातार केन्द्र से टकराव बनाकर चल रहे हैं, और जिस तरह यूपीए के कुछ राज्य केन्द्र से टकराव करते हुए इन बरसों में दिखे हैं, उनको देखते हुए जब छत्तीसगढ़ सरकार और केन्द्र सरकार के अंतरसंबंधों को देखें तो यह साफ लगता है कि गैरजरूरी टकराव के बिना प्रदेश हित और देश हित के मुद्दों पर किस तरह दो परस्पर विरोधी पार्टियों की सरकारें भी साथ काम कर सकती हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के नेताओं को सबसे बड़ी शिकायत अपने केन्द्रीय मंत्रियों से यही रहते आई है कि वे छत्तीसगढ़ के दौरे पर आते हैं, और राज्य सरकार को तारीफ का तमगा देकर जाते हैं। इस बारे में सार्वजनिक मंचों से भी छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं ने बार-बार अफसोस जाहिर किया और पार्टी हाईकमान से शिकायत की। लेकिन यूपीए सरकार ने इस एक मामले में छत्तीसगढ़ के साथ परस्पर सम्मान और समझ का जो रिश्ता रखा, वह बेबुनियाद नहीं था। छत्तीसगढ़ में पिछले नौ बरसों की सरकार ने केन्द्र के साथ किसी भी तरह के टकराव पर भरोसा नहीं रखा, और बातचीत से राज्य का हर काम होते भी रहा। 
आज जब कुछ राजनीतिक ताकतें केन्द्र और छत्तीसगढ़ सरकारों के बीच एक टकराव देखना चाहती हैं, तब भी वह टकराव खड़ा नहीं किया जा सक रहा। छत्तीसगढ़ के जिस नक्सल मोर्चे को लेकर आज राज्य तकलीफ से गुजर रहा है, गम में डूबा हुआ है, उस मोर्चे पर भी कोई टकराव केन्द्र और राज्य के बीच नहीं है, और   इन दोनों ने मिलकर इस हिंसा से निपटने का इरादा दुहराया है। भारत के केन्द्र-राज्य संबंधों में यह नौबत एक अच्छी, और दोनों तरफ की, समझदारी का सुबूत है, नतीजा है। और देशभर में केन्द्र-राज्य में होने वाले टकरावों को देखें, तो लगता है कि छत्तीसगढ़ और केन्द्र, सरकारों के बीच का तालमेल एक अच्छी लोकतांत्रिक परंपरा है, जो जारी रहनी चाहिए। 

छत्तीसगढ़ के लोकतंत्र पर हुआ, देश का सबसे बड़ा नक्सल हमला

विशेष संपादकीय
26 मई 2013
-सुनील कुमार
बस्तर में कांग्रेस की रैली पर कल हुए नक्सल हमले में अब तक करीब 30 मौतों की खबर है। लेकिन गिनती से अधिक मायने यह बात रखती है कि एक अहिंसक और पूरी तरह से राजनीतिक रैली पर इतना बड़ा हमला देश के इतिहास में लोकतांत्रिक-राजनीतिक आयोजन पर आज तक नहीं हुआ है। अब यह बात साफ है कि नक्सलियों का निशाना सिर्फ कांग्रेस के एक बड़े नेता महेन्द्र कर्मा नहीं थे, जो कि पिछले दो दशक से अधिक समय से नक्सलग्रस्त बस्तर में राजनीति करते हुए भी नक्सलियों के खिलाफ जनता की तरफ से एक मोर्चा लिए हुए थे। नक्सलियों का हमला महेन्द्र कर्मा की हत्या के बाद, बंधक बनाए गए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे पर अपने कब्जे में ही हुआ, और उनको भी बाद में मार दिया गया। इससे जाहिर होता है कि उनकी यह कार्रवाई, और उनकी यह नीयत महेन्द्र कर्मा तक सीमित नहीं थी। 
लोकतंत्र में इस तरह की हिंसा, लोकतांत्रिक संसदीय चुनावों से जुड़े हुए लोगों का हौसला भी पस्त करती है, और जनता को भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुडऩे से डराती है। यह हिंसा इस देश में नई नहीं है, लेकिन आज जितने बड़े पैमाने पर यह हिंसा प्रदेश के और देश के जाने-पहचाने चेहरों के साथ हुई है, उसने लोगों को अधिक हिलाया है। और आज के हालात यह मांग करते हैं कि नक्सल-संघर्ष का हल निकालने के लिए अब तक नाकाफी और नाकामयाब साबित हो चुकी पुलिस कार्रवाई से परे एक राजनीतिक कार्रवाई की भी जरूरत है। ऐसे ही मौके सरकारों को, राजनीतिक दलों को, और लोकतांत्रिक ताकतों को आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन के लिए मजबूर करते हैं, और आज राज्य और केन्द्र सरकारों को ऐसा करना भी चाहिए। 
पहली नजर में यह भी लगता है कि राज्य सरकार की तरफ से इस रैली और इस काफिले की हिफाजत के लिए स्थानीय स्तर पर इंतजाम नाकाफी थे, और वह इलाका बहुत घने जंगल वाला जटिल इलाका था। जैसा कि किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में होता है, नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ किसी सुरक्षा-सलाह के मुताबिक नहीं चल रही थी, और ऐसे में हुए हमले में नुकसान बड़ा हुआ। अगर सरकार की खुफिया जानकारी होती, उसके सुरक्षा इंतजाम ठीक होते तो यह हमला टल सकता था। और अगर इस काफिले को लेकर सुरक्षा की सलाह दी जाती, और मानी जाती, तो नुकसान इतना अधिक नहीं होता। लेकिन सार्वजनिक-राजनीतिक कार्यक्रमों में नेता-जनता की तरफ से इतनी सावधानी नहीं हो पाती। नतीजा यह हुआ कि नक्सलियों के पहले निशाने महेन्द्र कर्मा के अलावा भी भारी संख्या में लोग खत्म हुए और जहां तक नक्सलियों की ताकत का सवाल है, तो इसी छत्तीसगढ़ में उन्होंने केन्द्रीय सुरक्षा बल सीआरपीएफ के कैम्प पर हमला करके पौन सौ जवानों को एक साथ मार डाला था। इसलिए इस खुली रैली को राह पर हमला करके इतना नुकसान पहुंचाना उनकी क्षमता के भीतर ही था। 
यह छत्तीसगढ़ में लोकतांत्रिक राजनीति के लिए एक बड़ा सदमा है और गहरा जख्म है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, अपने सारे मतभेदों के बावजूद लोकतांत्रिक निर्वाचन से सत्ता पर आते-जाते रहने वाली पार्टियां हैं। दूसरी तरफ नक्सली हैं जो कि अपनी पूरी ताकत से लोकतंत्र को खत्म करने के अपने घोषित अभियान में लगे हुए हैं। इसलिए इस लड़ाई में चाहे जिस राजनीतिक दल का नुकसान हो, वह बड़ा नुकसान लोकतंत्र का है। अभी तक ऐसा लगता था कि नक्सली इन दो पार्टियों में से भाजपा को अपना अधिक बड़ा दुश्मन मानते हैं या दुश्मन नंबर एक मानते हैं, लेकिन कांग्रेस पर हुए इस सोचे-समझे हमले से अब यह लगता है कि नक्सलियों की नजर में आज कांग्रेस भी उतनी ही बुरी है जितनी कि उनको राज्य में नौ बरस सत्तारूढ़ भाजपा लगती है। पाठकों को याद होगा कि हर बरस बहुत से स्थानीय भाजपा नेता एक-एक करके नक्सल-शिकार होते हैं, लेकिन बड़ी वारदात न होने से वैसी अलग-अलग मौतें बड़ी खबर नहीं बनतीं। आज कांग्रेस पर यह इतना बड़ा नक्सल हमला है कि उससे पूरी पार्टी हिल गई है, पूरा प्रदेश हिल गया है, और केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, ये दोनों सोच में पड़ गई हैं। छत्तीसगढ़ की जनता इस बात को लेकर भी तकलीफ में हैं कि जो नेता इस हमले में मारे गए हैं, वे लोगों से अपने अच्छे व्यवहार के लिए भी जाने जाते थे। 
आज यह सोचने की जरूरत है कि नक्सलियों ने कांग्रेस पर इतना बड़ा हमला क्यों किया? एक बात तो यह लगती है कि बस्तर में लगातार बढ़ते हुए केन्द्रीय सुरक्षा बलों की वजह से नक्सलियों का जो नुकसान हो रहा था, और छत्तीसगढ़ के बाहर भी दूसरे कुछ राज्यों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों ने नक्सल मोर्चों पर उनका खासा नुकसान किया था, इस बात की नाराजगी नक्सलियों में चली आ रही है। दूसरी बात यह कि बस्तर में राज्य और केन्द्र के सुरक्षा बलों के हाथों बेकसूर आदिवासी ग्रामीण की हत्या जिस तरह होती है, उनको लेकर भी नक्सली अपना विरोध दर्ज कराते आए हैं, और बस्तर के आदिवासी समुदाय में ऐसी हत्याओं के खिलाफ खासी नाराजगी भी है। यही वजह है कि नक्सलियों को इतने बड़े-बड़े हमले करने के मौके मिल रहे हैं, स्थानीय समर्थन मिल रहा है। ऐसा नहीं हो सकता था कि सैकड़ों नक्सली हमले की इतनी तैयारी के साथ कहीं पर तैनात हों, और उन पर किसी स्थानीय व्यक्ति की नजर न पड़ी हो। जब केन्द्र और राज्य के सुरक्षा बल निहत्थे, बेजुबान आदिवासी जिंदगियों को कोलैटरल डैमेज मानकर खत्म करते हों, तो उसके जवाब में नक्सल हमला या नक्सल समर्थन का खतरा तो होना ही था। 
नक्सल मोर्चे पर केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों ने सरकारी बंदूकों को ही इलाज मान लिया है। यह एक बड़ी राजनीतिक चूक है। पिछले बरसों में ऐसे कुछ मौके आए थे जब ये दोनों सरकारें नक्सलियों से बातचीत कर सकती थीं, लेकिन इन दोनों में नक्सल नीति बनाने में अफसर हावी हैं। एक राजनीतिक समस्या का, आर्थिक और सामाजिक अन्याय का हल जब गैर राजनीतिक ताकतें निकालती हैं, तो वे किसी किनारे नहीं पहुंचा पातीं। छत्तीसगढ़ में ही पिछले बरस एक ऐसा मौका आया था जब कलेक्टर के अपहरण के बाद की बातचीत को आगे बढ़ाया जा सकता था, लेकिन सरकार और नक्सलियों के बीच विश्वास की ऐसी जमीन नहीं बन पाई। और हमारा यह मानना है कि ऐसी बातचीत की बुनियादी जिम्मेदारी, प्राथमिक जिम्मेदारी निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार पर आती है, क्योंकि सिर पर कफन बांधकर जंगलों में जिंदगी गुजारने वाले नक्सली अपनी जिंदगी में किसी बातचीत के लिए बेबस नहीं रहते, शांति कायम रखना, लोकतंत्र को जारी रखने वाली सरकारों की बेबसी होती है, और होनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक माहौल के लिए, यहां के संसदीय लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत बड़ा नुकसान रहा, सदमा रहा। इस मौके पर, हिंसक नक्सल-हमले पर राजनीति करने के बजाय हिंसा को खत्म करने के लिए सर्वदलीय राजनीतिक बातचीत होनी चाहिए, पार्टियों में आपस में भी, और नक्सलियों के साथ भी। आज केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनों गम के इस मौके पर एक साथ मिलने वाली हैं, हमदर्दी की इस घड़ी का इस्तेमाल दर्द के अगले मौकों को रोकने में होना चाहिए। 


अदालत दखल दे, और क्रिकेट माफिया खत्म करे

संपादकीय
25 मई 2013
क्रिकेट के आईपीएल को लेकर देश के बड़े-बड़े ताकतवर लोगों के बीच जिस तरह के जुर्म की खबरें आ रही हैं, उनके बीच राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता, और भाजपा के एक बड़े नेता, अरूण जेटली की चुप्पी देखने लायक है। वे भारत में क्रिकेट की राजनीति और गिरोहबंदी में एक बड़े नेता हैं। उन्हीं की तरह कांग्रेस के एक केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ल भी बीसीसीआई के बड़े नेता हैं और घोटालों से घिरी आईपीएल के कमिश्नर हैं। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के केन्द्रीय मंत्री शरद पवार क्रिकेट की राजनीति के एक और बड़े नेता हैं। राजीव शुक्ल की टालमटोल की बातों से परे ये सारे दिग्गज मुंह सिलकर बैठे हैं। और आज की जो सबसे बड़ी खबर है वह यह कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन.श्रीनिवासन के दामाद को पुलिस ने गिरफ्तार किया है क्योंकि उसके खिलाफ पहली नजर में सट्टेबाजों से मिलकर फिक्सिंग करने का मामला बन रहा है। 
अरूण जेटली केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ अखबारों में हर हफ्ते लेख लिखते हैं, और उनके कई लेख हम इसी पन्ने पर छापते भी हैं। आज देश यह उम्मीद कर रहा है कि आईपीएल के नाम पर जुर्म और भ्रष्टाचार के इतने बडे नंगे नाच पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता का मुंह खुलेगा, लेकिन हजारों करोड़ के क्रिकेट कारोबार, और क्रिकेट माफिया के राज में राज्यसभा के दिग्गज नेता की बोलती बंद है। यहां पर हम पिछले दिनों अपनी उठाई हुई एक बात को दुहराना चाहते हैं कि बड़ी कुर्सियों पर, संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने वाले लोग, हितों के टकराव से कैसे बचें। अरूण जेटली दो नावों पर सवार हैं, वे बीसीसीआई के उपाध्यक्ष हैं, क्रिकेट अनुशासन समिति के मुखिया हैं, और राज्यसभा में भाजपा के मुखिया हैं। देश में विपक्ष की जो भूमिका ऐसे मौके पर होनी चाहिए, वैसे मौके पर यह चुप्पी कई तरह के शक खड़े करती है। और ऐसे मामलों में संसद के एक बड़े मुखिया को बाहरी जुर्म भरे कारोबार से अपने को अलग भी रखना चाहिए था। इसी तरह श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष भी हैं, और उसके नियंत्रण में चलने वाले आईपीएल नाम के बाजारू माफिया कारोबार में चेन्नई के टीम की मालिक भी हैं। मतलब यह कि एक जज मौका पडऩे पर अपनी ही जमीन-जायदाद के झगड़े की सुनवाई करने बैठा हुआ है। आज क्या खाकर श्रीनिवासन अपने दामाद के जुर्म और अपनी मिल्कियत वाली टीम की फिक्सिंग पर क्रिकेट नियंत्रण की जिम्मेदारी पूरी कर सकते हैं? 
यह देश की एक शर्मनाक हालत है कि कुछ बरसों से यूपीए की मुखिया कांग्रेस पार्टी के सुरेश कलमाड़ी भयानक अपराधों में मुकदमे झेल रहे हैं, जो कि खेलों की राजनीति और खेलों के सरकारी आयोजन से जुड़े हुए हैं। अब कांग्रेस से लेकर भाजपा तक और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से लेकर अंडरवल्र्ड तक, सबका मिलाजुला कारोबार क्रिकेट के हजारों करोड़ को लेकर चल रहा है। देश का सुप्रीम कोर्ट इस बात को लेकर हैरान है कि किस तरह क्रिकेट संगठन अपने आपको देश के कानून से परे एक अलग देश की तरह मानकर चल रहा है, और देश के खेल मंत्री, कानून मंत्री, संसद के लोग, इनमें से किसी की भी देश के क्रिकेट पर नहीं चल रही। और इस मनमानी को बनाए रखने में, बढ़ाते चलने में कांग्रेस, भाजपा और राकांपा इन तीनों के बड़े नेता शामिल हैं। 
देश की इस मिलीजुली लूट को जिस माफिया अंदाज में चलाया जा रहा है उससे लगता है कि देश में कोई कानून नहीं है, और खेल के नाम पर अंडरवल्र्ड के साथ मिलकर वे लोग धंधा कर रहे हैं, जो अपने आप में अंडरवल्र्ड कहलाने के लायक हैं। इन्हीं तीन नेताओं और उनकी पार्टियों का यह हाल है कि उनका मुंह नहीं खुल रहा। यह एक शर्मनाक नौबत है कि ऐसे राष्ट्रीय अपराध के मौके पर देश की तीन बड़ी पार्टियां करीब-करीब चुप हैं, क्योंकि वे इस कारोबार में अपने नेताओं के मार्फत शामिल हैं। यह एकदम सही मौका है जब अदालत इस मामले में दखल दे, और क्रिकेट माफिया को खत्म करे। ऐसा बेकाबू जुर्म लोकतंत्र में नहीं चलने देना चाहिए। 

अमीर अश्लीलता और गरीब अश्लीलता के बीच फर्क

संपादकीय
24 मई 2013
उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया-कुनबे में, मुख्यमंत्री के चाचा और मुलायम सिंह यादव के भाई रामगोपाल यादव ने अभी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मुंबई की फिल्म अभिनेत्रियों के बारे में बहुत सी बातें कही और सेक्स अपराधों के लिए उनके पहरावे को भी जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने फिल्म अभिनेत्रियों को अश्लीलता के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि ये बॉलीवुड-अभिनेत्रियां मुंबई की बार-बालाओं के मुकाबले अश्लीलता के लिए अधिक जिम्मेदार हैं। वे मुस्लिम समाज के एक कार्यक्रम में बोल रहे थे और उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सरकार ने महाराष्ट्र में डांस बार तो बंद करवा दिए, लेकिन फिल्म और विज्ञापन उद्योग की अश्लीलता पर इस सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की है। उन्होंने कहा कि हजारों बार-बालाएं जो कि इस काम को करके अपनी रोजी-रोटी जुटा रही थीं, आज वे और उनके परिवार दाने-दाने के मोहताज हो गए हैं। लेकिन ऐसी फिल्म अभिनेत्रियों से कोई सवाल नहीं करते जो कि पांच मिनट के एक आइटम सांग के लिए पांच करोड़ रूपए ले लेती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हालात इतने खराब हो गए हैं कि लोग अपने परिवार के साथ बैठकर टीवी के कार्यक्रम नहीं देख सकते, क्योंकि आपको यह पता ही नहीं होता कि कब अचानक बीच में जरा से कपड़ों में अभिनेत्रियां और मॉडल किसी विज्ञापन में दिखने लगेंगी। 
हम आमतौर पर अश्लीलता या नैतिकता के मामले में भारत के नेताओं द्वारा कही गई बातों से असहमत अधिक होते हैं, लेकिन रामगोपाल यादव का यह बयान ऐसा है जिससे कि हम पूरी तरह सहमत हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि जब मुंबई में कांग्रेस-राकपा की प्रदेश सरकार ने डांस बार बंद करवाए थे तब हमने इसका विरोध किया था और भारतीय समाज में वयस्क मनोरंजन की जरूरत बताई थी। उस वक्त हमने कई बार यह बात लिखी थी कि किस तरह शराबखानों में होने वाले बिना नुकसान वाले डांस को बंद करवाकर दसियों हजार गरीब लड़कियों से यह काम छीन लिया गया, और उन्हें इससे अधिक खराब काम करने की तरफ धकेल दिया गया। इसी तरह जो लोग वयस्क मनोरंजन के लिए बार-बालाओं का नाच देखने शराबखानों में जाते थे, मुंबई में अब उनके लिए वयस्क मनोरंजन के नाम पर बदन को खरीदना ही बच गया है। कामकाजी महिलाओं के खिलाफ नैतिकता के पाखंडी मानदंडों का यह फैसला एक ऐसी पार्टी की सरकार ने महाराष्ट्र में लिया जिसकी मुखिया एक महिला है। बिना कुछ सोचे डांस-बार बंद कर दिए गए, और जिस तरह की एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति कर्नाटक में श्रीराम सेना जैसे धर्मान्ध और सांप्रदायिक संगठन हिंसा के साथ थोपते हैं, वैसी हिंसा महाराष्ट्र की सरकार ने कानून बनाकर या नियम के तहत डांस-बार बंद करके दिखाई थी। 
आज मुंबई हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा चकला है, यहां पर लाखों लड़कियां और महिलाएं बदन बेचने के बेबस कारोबार में धकेली जाती हैं। इनके बीच अगर कोई वयस्क मनोरंजन चल रहा था तो उसे अश्लील कहकर बंद कर दिया गया। दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी फिल्मों में नामी-गिरामी अभिनेत्रियां इन बार-बालाओं से बहुत अधिक अश्लील आइटम सांग दिखाकर करोड़ों रूपए कमाती हैं। रामगोपाल यादव की कही हुई बात इस बारे में सौ फीसदी सही है कि महाराष्ट्र की सरकार को ऐसी फिल्म अभिनेत्रियों के काम में अश्लीलता नहीं दिखती। खुद महाराष्ट्र पुलिस का जो सालाना जलसा मुंबई में होता है, उसमें अभिनेत्रियां बार-बालाओं के मुकाबले कम कपड़ों में अधिक अश्लील डांस दिखाती हैं। लेकिन ये अभिनेत्रियां मशहूर और कामयाब, करोड़पति और चर्चित हैं, इसलिए उनके कम कपड़े और अधिक अश्लीलता के लिए सरकार में बर्दाश्त रहता है, मंत्री और संतरी बैठकर उसका मजा लेते हैं। अलग-अलग प्रदेशों में सरकारी कार्यक्रमों में भी ऐसी अभिनेत्रियों को करोड़ों रूपए देकर सार्वजनिक मंचों पर उनका नाच देखा जाता है। लेकिन साधारण लोग शराबखाने में भी ऐसे नाच नहीं देख सकते, क्योंकि सरकार को वे पसंद नहीं हैं, जबकि शराबखानों में जाने वाले लोग सिर्फ वयस्क होते हैं। आखिर इस देश में वयस्क मनोरंजन के पेशे से पैसे कमाने का हक क्या सिर्फ करोड़पति अभिनेत्रियों को है? और फिर बार-बालाओं का डांस तो किसी टीवी चैनल पर भी नहीं आता था, और वे तो उन्हीं डांस-गानों को दुहराती थीं, जो कि मुंबईया फिल्मों में मशहूर हो चुके रहते थे। 
सरकार की नजर में जब अमीर अश्लीलता और गरीब अश्लीलता के बीच फर्क होता है, तो वह सरकार जनकल्याणकारी नहीं रहती। और फिर इस देश में साम्प्रदायिक संगठन अपने आपको नैतिकता का जिस तरह का ठेकेदार साबित करने में लगे रहते हैं, वैसी ही ठेकेदारी अगर कांग्रेस जैसी पार्टी की सरकार भी करती है, तो वह एक और घटिया बात है। रामगोपाल यादव ने एक ही सांस में फिल्मों की अश्लीलता के खिलाफ कहा है, और बार-बालाओं की बेरोजगारी पर फिक्र भी जाहिर की है। उनकी बात बिल्कुल सही है, और उनकी बात में जो लोग सिर्फ आइटम सांग की बुराई देख रहे हैं, वे अपने पूर्वाग्रहों की वजह से उनकी आधी बात को देख रहे हैं और आधी बात को अनदेखा कर रहे हैं। उनके पूरे वाक्य को अगर देखा जाए, तो उससे सहमत हुए बिना नहीं रहा जाएगा। 

लंदन की इस हिंसा के पीछे की वजहों को समझना चाहिए

संपादकीय
23 मई 2013
लंदन की सड़क पर कल एक भयानक नजारा था। दो मुसलमान नौजवानों ने एक ब्रिटिश सैनिक को सड़क पर छुरे से मार डाला, और वहीं खड़े रहकर लाश के साथ छुरा लिए हुए तस्वीरें खिंचवाई। लोगों से बात करते रहे, और फरार होने की कोशिश नहीं की। इसके अलावा उन्होंने लाश को फुटपाथ से खींचकर सड़क पर रख दिया। उन्होंने यह घोषणा की कि ब्रिटिश सैनिक हर दिन मुसलमानों को मारते हैं, इसलिए वे जवाब में यह कर रहे हैं। उन्होंने वीडियो कैमरों के सामने कहा- वो हमसे लड़ रहे हैं, इसलिए हमको भी उनसे लडऩा चाहिए, आंख के बदले आंख, कान के बदले कान। 
उनका और लंबा बयान आज ही खबर में छप रहा है, इसलिए हम उसे यहां पर और खुलासे में नहीं दे रहे। लेकिन दुनिया के मुसलमानों के बीच अमरीका-ब्रिटेन और इस पश्चिमी फौजी गिरोह के खिलाफ बढ़ती चली जा रही नफरत का यह एक सुबूत है। हम इस किस्म की किसी भी हिंसा के खिलाफ हैं, लेकिन इस हिंसा की नौबत के पीछे की वजहों को अगर देखा नहीं जाएगा, तो ऐसी हिंसा थम भी नहीं सकेगी। दुनिया के सबसे विकसित और सुरक्षित पश्चिमी देश पूरी तरह से कभी आतंकी हिंसा से बच नहीं सकेंगे, अगर वे दुनिया के चुनिंदा देशों पर हमले करके अनगिनत बेकसूर कत्ल करना बंद नहीं करेंगे, जिसे कि फौजी जुबान में कोलेटरल डेमेज कहा जाता है, मानो इंसानी जिंदगी गेहूं के साथ पिस जाने वाले घुन की तरह की ही हो। 
पिछले दिनों अमरीका के बॉस्टन में एक छोटे धमाके में कुछ मौतें हुई थीं, उनके पीछे भी इसी तरह की नफरत थी कि अमरीका दुनिया के बेकसूर मुसलमानों को थोक में मार रहा है। आज इक्का-दुक्का ऐसे जवाबी हमले अमरीका या ब्रिटेन में हो रहे हैं, लेकिन यह बात अहमियत नहीं रखती कि आज मुसलमानों में से कुछ लोग जवाबी हमलों में कितना नुकसान कर रहे हैं, मायने यह बात रखती है कि पूरी दुनिया के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय कानूनों के रहते हुए भी किस तरह अमरीका और उसके गिरोह के बाकी देश बेकसूरों पर हवाई हमले करके थोक में लाशें गिरा रहे हैं। और यह काम किसी देश में लोकतंत्र लाने के नाम पर हो रहा है, तो किसी देश को रासायनिक हथियारों का भंडार बताने के लिए झूठे सुबूत खड़े करके हो रहा है, तो कहीं पर आतंकियों को मारने के नाम पर हो रहा है। कल के दिन इस अमरीका को अगर इतने झूठ भी हमलों के लिए नसीब नहीं होंगे, तो वह किसी देश में एक महिला पर उसके पति की हिंसा को रोकने के नाम पर भी हवाई हमले करके पूरी बस्ती की जान ले लेने का काम करेगा। 
छत्तीसगढ़ के जंगलों में जिस तरह पड़ोस के प्रदेशों से हाथी आए हुए हैं, और वे गांवों की फसलों को कुचल रहे हैं, और उन पर कोई काबू नहीं हो पा रहा है, उसी तरह अमरीका बेकाबू है। हाथी तो बेबसी में किसी इलाके में पहुंचते हैं, क्योंकि उनके लिए जंगलों में पानी नहीं रह गया है, दूसरी तरफ अमरीका तेल और पानी के भंडार काबू में करने के लिए अलग-अलग देशों में वहां की जिंदगियों को रौंद रहा है, और एक के बाद दूसरे देश में अपनी पि_ू सरकारों को बिठा रहा है। यह पूरा सिलसिला आज लोगों को मुस्लिम देशों के खिलाफ लग रहा है, और है भी, लेकिन कल के दिन भारत पर अगर अमरीका को हमला करना होगा, तो कुछ भारतीय आतंकी करार देकर अमरीका की किसी वारदात के लिए जिम्मेदार ठहराए जाएंगे, और भारत में जगह-जगह अमरीकी द्रोन हमला करेंगे, बम बरसाएंगे, और थोक में यहां मौतें होंगी। भारत के कुछ मूर्ख लोग ही यह भरोसा करेंगे कि भारत पर अमरीका ऐसा नहीं कर सकता। अमरीका जिस तरफ बढ़ रहा है, वह पूरी दुनिया को अपना गुलाम बनाने की एक फौजी तैयारी है, और उससे कोई भी देश निशाने से परे नहीं है। 
इसलिए आज मुसलमानों के कई गुना होते कब्रिस्तानों को अनदेखा करना ठीक नहीं है, वरना एक दिन बाकी देशों में भी आबादी को तय करना अमरीकी द्रोन तय करेंगे। लंदन की इस हिंसा के पीछे की वजहों को समझना चाहिए। 

लाशें किससे नाराज हों?

संपादकीय
22 मई 2013
बस्तर में अभी पुलिस और सुरक्षा बलों की गोलियों से मारे गए, पहली नजर में बेकसूर लगते, आदिवासी ग्रामीणों के परिवारों के लिए केंद्र सरकार ने भी पांच-पांच लाख रुपए के मुआवजे की घोषणा की है। इसके साथ ही केंद्रीय सुरक्षा बल सीआरपीएफ ने भी इसमें जांच की घोषणा की है। ग्यारह महीने पहले बस्तर के इसी इलाके में इसी तरह बेकसूर डेढ़ दर्जन आदिवासियों को राज्य और केंद्र की बंदूकों ने मार डाला था, और उसके बाद भी जांच और मुआवजे का यही सिलसिला शुरू हुआ था। मुआवजा तो शायद बंट गया होगा, जांच का अभी तक कोई ठिकाना नहीं है, न सीआरपीएफ की जांच का और न ही राज्य सरकार की शुरू की हुई न्यायिक जांच का। अगर दिल्ली में ऐसी कोई वारदात हुई होती, तो बात महीनों और बरसों तक नहीं गई होती। बात की बात में केंद्र सरकार के बयान आए होते, बात की बात में गिरफ्तारियां हुई होतीं, और तो और सुप्रीम कोर्ट का दखल भी एक-दो दिनों में ही हो चुका होता। लेकिन बस्तर, देश के बाकी तमाम आदिवासी इलाके भी, दिल्ली से बहुत दूर हैं, दिल्ली की नजरों से बहुत दूर हैं, दिल्ली के दिल से बहुत दूर हैं। इसलिए बस्तर की थोक में की गई हत्याएं भी जजों के मन को नहीं छू पातीं। 
लेकिन आज वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार आधा दर्जन राज्यों में सक्रिय नक्सल हिंसा को लेकर अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी पूरी करे। यूपीए सरकार की शुरुआत से ही केंद्र का यह रुख रहा कि यह राज्यों की समस्या है केंद्र की नहीं। और इस बात से हमारी शुरू से असहमति रही कि यह किसी तरह से अकेले राज्यों की समस्या नहीं है। इसमें केंद्र की हिस्सेदारी जरूरी है। जिस वक्त कश्मीर की बात होती है, पंजाब की बात होती है, उत्तर-पूर्वी राज्यों में उग्रवादी हिंसा की बात होती है, तो केंद्र का दखल हो जाता है, या कम से कम केंद्र की पहल हो जाती है। नक्सल मोर्चे पर केंद्र में सिवाय सुरक्षा इंतजामों में मदद के, और कुछ नहीं किया है। जबकि देश भर में बिखरी हुई इस अलोकतांत्रिक, आतंकी और हिंसक राजनीतिक विचारधारा से निपटना केंद्र सरकार की एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी होनी चाहिए।  हमारा यह भी मानना है कि आज की यूपीए सरकार में भीतर से ऐसे लोग हावी हैं, ऐसे लोगों का दबदबा है जो कि देश की जमीनी राजनीति से नहीं आए हैं। सोनिया गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक और चिदंबरम से लेकर कपिल सिब्बल तक अनगिनत ऐसे लोग हैं जो कि शहरी, संपन्न और सवर्ण पृष्ठभूमि से आए हैं, और उन्होंने आदिवासियों को महज राजपथ के जलसों में ही देखा होगा। मिट्टी से जुड़े न होने की यह दिक्कत है कि यूपीए सरकार में कोई यही नहीं समझ रहे कि नक्सल मोर्चे को बातचीत और राजनीतिक पहल से किस तरह सुलझाया जाए, यह केंद्र की जिम्मेदारी है। 
जमीन पर आज राज्य सरकारें नक्सली हिंसा से जूझ रही हैं, और छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में कभी पुलिस का ऐसा ढांचा नहीं रहा कि इतनी बड़ी हिंसा से, और ऐसी आतंकी घटनाओं से पुलिस निपट सके। नतीजा यह है कि आज केंद्र और राज्य की वर्दियां मिलजुल कर जब इन इलाकों में काम करती हैं, तो उनमें तालमेल की कमी भी रहती है और अपने आप में राज्य की पुलिस और इन केंद्रीय सुरक्षाबलों की ट्रेनिंग भी नागरिक इलाकों में ऐसे मोर्चे पर काम करने की है नहीं। फिर जैसा कि हमने पिछले दिनों में लगातार लिखा है, देश-प्रदेश में लोकतांत्रिक संस्थानों के बेअसर और कमजोर रहने से, उनमें बैठे लोगों के गैरजिम्मेदार और निष्क्रिय रहने से एक ऐसी नौबत आ गई है कि वर्दीधारी सरकारी बंदूकों को ही सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की ताकत रखने वाला मान लिया गया है। यह सिलसिला खतरनाक है और राजनीतिक नासमझी का है। जब देश के प्रधानमंत्री बिना चुनाव लगातार राज्यसभा के रास्ते से आते हैं, जब केंद्र सरकार की मुखिया बिना जमीनी अनुभव के घर से पार्टी और सरकार चलाती हैं, जब  आर्थिक विशेषज्ञ रहने को गृहमंत्री बनने की पर्याप्त काबिलीयत मान लिया जाता है, तो फिर देश ऐसी मुसीबतों से नहीं उबर सकता। 
बस्तर की इन ताजा मौतों के जख्म इसलिए नहीं भर जाएंगे क्योंकि वे दिल्ली के कैमरों और कमरों की पहुंच से दूर के हैं। वे जंगल के पत्तों की तरह हरे रहेंगे, क्योंकि उनको लोकतंत्र ने और तो कुछ नहीं दिया, सरकार के हाथों शोषण दिया, और नक्सल-पुलिस के हाथों इस तरह की बेवक्त की मौत दी है। अब भी शहरी लोकतंत्र को इस बात की फिक्र नहीं है कि ऐसी हत्याओं की न्यायिक जांच समय पर हो जाए। और यह बात हर जिम्मेदार नेता, सरकार और पार्टी को भारी पड़ेगी। आज दिक्कत यह है कि बस्तर की ऐसी हत्याओं के पीछे राज्य और केंद्र दोनों के सुरक्षाबल हैं इसलिए दोनों में से किसको चलाने वाली पार्टी से लाशें नाराज होंगी? 

प्रतिरक्षा सचिव को ही सीएजी बनाने के खिलाफ कुछ तर्क


संपादकीय
21 मई 2013
भारत के अगले सीएजी आज के प्रतिरक्षा सचिव शशिकांत शर्मा होंगे। वे विनोद राय की जगह लेंगे, जिनकी वजह से यूपीए सरकार को पिछले बरसों में लगातार खासी दिक्कत झेलनी पड़ी थी। वैसे तो यह दिक्कत सीएजी की वजह से नहीं, अपनी खुद की हरकतों की वजह से झेलनी पड़ी थी, लेकिन देश की इस बड़ी संवैधानिक कुर्सी, कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (महालेखापरीक्षक) का ऐसा तीखा तेवर शायद पहली बार सामने आया, और पिछले दो बरसों से ऐसा लगने लगा था कि सीएजी भी इस देश में विपक्ष है। कुछ लोगों को केन्द्र सरकार और सीएजी के बीच का इतना टकराव शायद अच्छा न लगता हो, लेकिन घोटालों पर घोटाले जब चल रहे हों तो कोई भी ईमानदार ऑडिटर हाथ पर हाथ धरे कैसे बैठे रह सकता है? 
लेकिन आज का हमारा सोचना गुजर रहे सीएजी पर नहीं है, आने वाले सीएजी पर है। प्रतिरक्षा मंत्रालय देश का सबसे अधिक खरीदी करने वाला मंत्रालय है और आजादी के बाद से लेकर अब तक खरीदी के सबसे बड़े घोटाले इसी मंत्रालय से जुड़े हुए रहे हैं। ऐसे में आज तक जो प्रतिरक्षा सचिव वह कल जब सीएजी होगा, तो अपने खुद के सचिव-कार्यकाल के मामलों को सीएजी की हैसियत से उसे देखना होगा। हमारी बहुत साधारण समझ यह कहती है कि यह हितों के टकराव का एक बहुत खुला हुआ मामला रहेगा, जिसमें आज के संभावित-संदिग्ध अफसर को भी कल का जांच-अफसर बना दिया जाएगा। इस देश के लोकतंत्र में इतनी साफ-साफ बात लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं? और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कोई अपील क्यों नहीं हो रही है? यह हमारी समझ से परे है। 
इसके पहले भी बहुत से मौकों पर हमने हितों के टकराव को लेकर केन्द्र और राज्य की कई संवैधानिक-कुर्सियों के बारे में लिखा है। राज्यों में पुलिस से रिटायर हुए लोगों को सीधे मानवाधिकार आयोग में बिठा दिया जाता है। उसी राज्य में, उन्हीं के कार्यकाल के मामलों को लेकर आयोग में शिकायत होती है, हो सकती है, और वे ही कुर्सी पर बैठे हुए हैं, तो ऐसी संवैधानिक संस्था का क्या महत्व रह जाएगा? राज्यों में सूचना आयुक्त की कुर्सी पर उसी राज्य के रिटायर अफसर को बिठा दिया जाता है, और ऐसे अफसरों को अपने ही कार्यकाल के मामलों की सूचनाएं विभागों द्वारा न देने के मामलों की शिकायतों पर सुनवाई करनी पड़ती है। कैसे वे निष्पक्ष होकर सुनवाई कर सकते हैं? इस देश में अदालतों पर बोझ इसलिए भी बढ़ रहा है कि जिन संवैधानिक संस्थाओं को अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए, वहां पर तोतों को बिठाने में सत्ता को बड़ी राहत लगती है। हमारा ख्याल है कि ऐसी नियुक्तियों के खिलाफ भी अदालत में जाने पर इनको गलत ठहरवाया जा सकेगा। इससे जुड़ी हुई दूसरी बात यह भी है कि जब देश में संवैधानिक संस्थाएं नाकामयाब रहती हैं, बेकसूर रहती हैं, सत्ता की पि_ू रहती हैं, तब देश में अलोकतांत्रिक ताकतें मजबूत होती हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में जिस तरह से पुलिस और सुरक्षा बलों ने, पहली नजर में, बेकसूर लगते बालिग-नाबालिग, औरत-मर्द आदिवासियों को घेरकर मारा है, उस पर छत्तीसगढ़ का मानवाधिकार आयोग, यहां का महिला आयोग, यहां का बाल आयोग (या बाल कल्याण परिषद), आदिवासी आयोग, ये सारे के सारे चुप बैठे हुए हैं, घर बैठे हुए हैं।  ऐसी किसी भी वारदात के बाद न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, बल्कि दूसरे प्रदेशों में भी, और राष्ट्रीय स्तर पर भी संवैधानिक संस्थाओं पर काबिज, ऐशोआराम का मजा लेते लोग अपने को मनोनीत करने वाली सत्ता से वफादारी निभाते दिखते हैं, बजाय अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को निभाने के। 
लोकतंत्र के लिए संवैधानिक लड़ाई लडऩे वाले लोगों को चाहिए कि वे सुप्रीम कोर्ट तक जाकर सत्ता द्वारा मनोनयन के लिए ऐसे पैमाने तय करवाएं जिनसे कि न तो लोग अपने ही कार्यकाल वाले राज्य में मनोनयन पा सकें, न ही अपने कार्यकाल के तुरंत बाद मनोनयन पा सकें, और न ही नाजुक और संवेदनशील कुर्सियों के बाद उससे टकराव की संभावना वाली किसी संवैधानिक कुर्सी पर जा सकें। प्रतिरक्षा सचिव के तुरंत बाद किसी का सीएजी बनना हमारे हिसाब से बहुत ही खतरनाक नौबत है, और इससे केन्द्र सरकार में हो रही बेईमानी को पकडऩे की गुंजाइश खत्म ही हो जाएगी। हमारा दूसरा यह भी मानना है कि ऐसे आला अफसर भी जब नौकरी के बाद की ऐसी संवैधानिक नियुक्ति को मंजूर करते हैं, तो क्या उनको खुद को यह बात समझ नहीं आती कि उनका ऐसा करना ठीक नहीं है? 
पाठकों को याद होगा कि प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाने के खिलाफ भी हमने यह तर्क दिया था कि यूपीए सरकार के घोटालों के खिलाफ जब विपक्ष राष्ट्रपति के पास जाएगा, तो उस कुर्सी पर उनको वही आदमी तो बैठे मिलेगा जो कि यूपीए के तकरीबन हर मंत्री-समूह का मुखिया रहा हुआ है, और जिसकी उंगलियों, और अंगूठे के निशान यूपीए के हर सही-गलत फैसले पर लगे हुए हैं। ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति की हैसियत से यूपीए सरकार के खिलाफ अपनी जिम्मेदारी भला कैसे पूरी कर सकेगा? यह बात राज्य से लेकर केन्द्र तक, और राष्ट्रपति से लेकर सीएजी तक सभी कुर्सियों पर लागू हो रही है, और इस पर सुप्रीम कोर्ट की दखल को न्यौता देना चाहिए ताकि एक संविधान संशोधन करके हितों के टकराव को हमेशा के लिए खत्म किया जाए।

पिछले हत्याकांड की बरसी के पहले ही दूसरा हत्याकांड, पिछली जांच का क्या हुआ?


संपादकीय
20 मई 2013
बस्तर में पांच हफ्ते बाद बेकसूर गांववालों की थोक में हत्या का एक बरस पूरा हो गया रहता, कि वहां सुरक्षा बलों ने फिर कुछ बेकसूर गांववालों को घेरकर मार डाला। सरकार ने आनन-फानन न्यायिक जांच की घोषणा कर दी है, और मरने वालों के परिवारों को पांच-पांच लाख रूपए देने की भी। इसके बीच यह सवाल खड़ा हुआ है कि 11 महीने पहले 19 गांववालों को मार डालने की वारदात की न्यायिक जांच अब तक किसी किनारे पहुंची नहीं है, और हाईकोर्ट के उसी जज को इस दूसरी वारदात की जांच भी दे दी गई है। यह बात बहुत अजीब भी है, और एक न्यायिक जांच के साथ दूसरी वारदात की न्यायिक जांच को इस तरह जोड़ देना गलत भी लग रहा है। पहली नजर में यह दिख रहा है कि नक्सलियों के नाम पर गांव के बेकसूर लोगों को मार डाल गया है, और इसीलिए मुख्यमंत्री ने बिना देर किए पांच-पांच लाख जैसा बड़ा मुआवजा देने का ऐलान भी कर दिया है। 
बस्तर की हालत बहुत खराब है। वहां की बातें खबरें तभी बनती हैं, जब कम से कम मौत हो चुकी हो। यह मौत सरकारी बंदूकों से हो, या नक्सली बंदूकों से, मौत आदिवासियों की ही हो रही है। सिर्फ नक्सल-पुलिस मोर्चे पर कुछ गैरआदिवासी वर्दीधारी जवान मारे जाते हैं, लेकिन दोनों तरफ की गोलियों से मरने वाला सबसे बड़ा तबका बस्तर का बेकसूर आदिवासी तबका है, जो कि हजारों बरस से वहां बिना इन बंदूकों के चैन से रहते आया था।  और आज भाजपा की राज्य सरकार, और केन्द्र की कांग्रेस-लीडरशिप वाली यूपीए सरकार, दोनों के वर्दीधारी बस्तर में तैनात हैं, और इस बार की यह कार्रवाई इन दोनों की मिलीजुली कार्रवाई थी। पिछले बरस बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा में गांव के आदिवासियों की एक बैठक पर सीआरपीएफ और उसके कमांडो दस्ते ने गोलीबारी की थी, जिसमें 19 लोग मारे गए थे और उसमें भी 12 से 16 बरस तक के बच्चे शामिल थे। हैरानी की बात यह है कि मानो उस सामूहिक हत्याकांड की बरसी मनाने के लिए इस बार फिर बीजापुर जिले में ही गांववालों की वैसी ही एक धार्मिक-सांस्कृतिक बैठक पर हमला किया गया और बच्चों सहित 8 लोगों को मारा डाला गया। उस वक्त भी राज्य सरकार ने सीआरपीएफ पर कोई तोहमत इसलिए नहीं लगाई थी क्योंकि बस्तर के मोर्चे को सम्हालने में सीआरपीएफ का खासा हाथ है, और राज्य सरकार केन्द्र से इस मुद्दे पर मतभेद उजागर करना नहीं चाहती थी, या शायद मतभेद ही नहीं चाहती थी। इस बार आदिवासियों को इस तरह थोक में मार देने का मामला आने वाले चुनाव से कुछ महीने पहले ही हुआ है, इसलिए इसे लेकर सरकार और पार्टियां अधिक चौकन्ना हैं। 
बस्तर के आदिवासियों को मौतों से पहले सरकार की जितने किस्म की प्रताडऩा झेलनी पड़ रही है, उससे वहां की नक्सली हिंसा कम होने के बजाय बढ़ते चले जाने का खतरा है। एक कलेक्टर के अपहरण के बाद उसकी रिहाई के लिए राज्य सरकार ने नक्सलियों के साथ बातचीत करके जिस तरह इस मोर्चे पर हिंसा घटाने की पहल की थी, वह बहुत धीमी चल रही है, और कुछ दर्जन लोगों की रिहाई पर बातचीत से अधिक कुछ नहीं हो पाया है। हमको पिछले बरस यह उम्मीद थी कि नक्सलियों के छांटे हुए शांतिवार्ताकारों के साथ सरकार बातचीत को बैठक की शर्तों से आगे भी ले जाएगी, और बस्तर में अमन-चैन की कोशिश करेगी, लेकिन वैसा होते दिख नहीं रहा है। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार की नक्सल-नीति को सिर्फ पुलिस विभाग केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ मिलकर चला रहा है। न तो राजनीतिक स्तर पर नक्सल हिंसा को थामने की कोशिश हो रही, न ही सामाजिक स्तर पर। इससे परे एक बात यह भी है कि बस्तर के आदिवासी इलाकों में सरकार की साख को बढ़ाने वाले सरकारी कार्यक्रमों से भ्रष्टाचार खत्म भी नहीं किया जा सका है। आज भी वहां पर सरकार का पैसा कई जेबों से होते हुए पहुंचता है, और आदिवासी यह जानते हैं कि उसे पूरी मजदूरी का उसका हक भी नक्सली ही दिला सकते हैं। यह नौबत ठीक नहीं है। और सरकार के आंकड़ों में यह नौबत कभी झलक भी नहीं सकती। लेकिन आज नक्सलियों को बस्तर के आदिवासियों के बीच अगर जगह मिली हुई है, तो उसके जिम्मेदार नक्सली नहीं है, सरकार के अफसर और सरकार के नेता इसके जिम्मेदार हैं। 
अब हम इस किस्म की हिंसा को रोकने की बात करें, तो इसके लिए पुलिस और बाकी सुरक्षाबलों के ऊपर निर्वाचित और लोकतांत्रिक नेताओं का काबू होना जरूरी है। आज छत्तीसगढ़ में पुलिस विभाग अकेले ही नक्सल इलाकों के मुद्दे तय कर रहा है। सरकार ने आदिवासी इलाकों के लिए जो विकास प्राधिकरण बनाए हैं, वे सिर्फ सरकारी योजनाओं तक सीमित हैं। आदिवासी लोगों के बुनियादी मानवाधिकारों की समझ आंकड़ों को नहीं हो सकती। और जब जंगलों के जानलेवा मोर्चों पर लंबे समय तक बंदूकें तैनात रहती हैं, तो वे कानून का सम्मान खोने लगती हैं, क्योंकि उन मोर्चों पर मारो या मरो की नौबत सिर पर टंगी रहती है। इसलिए राज्य सरकार को नक्सल मोर्चे पर पुलिस और सरकारी कार्यक्रमों से परे सामाजिक पहल करने की जरूरत है, और इसके लिए यह भी जरूरी है कि ज्यादती करने वाले सुरक्षा कर्मचारियों को न बचाया जाए। कल ही उत्तरप्रदेश में एक संदिग्ध आतंकी की हत्या के आरोप में तीन दर्जन से अधिक पुलिसवालों पर जुर्म दर्ज हुआ है, बस्तर में ऐसी नौबत साल में कई बार आ रही है, और इस बारे में सरकार को पारदर्शिता से काम करना चाहिए, और न्यायिक जांच का आदेश देना काफी नहीं है, वह जांच कहां तक पहुंची है, यह भी देखना चाहिए। 
इस बार की जनगणना में छत्तीसगढ़ के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। बस्तर से आदिवासी आबादी घट जाना, सदमा पहुंचाने वाली बात है। राज्य में आदिवासी आबादी करीब तैंतीस फीसदी से घटकर करीब इकत्तीस फीसदी (सवा फीसदी की कमी) रह गई है। इतने लोग मारे तो नहीं गए हैं, लेकिन यह अंदाज है कि वे सरहद पार करके पड़ोसी राज्य में चले गए हैं, क्योंकि यहां पर वे पुलिस और नक्सलियों के बीच पिस रहे हैं। एक तरफ नक्सली उन्हें पुलिस का मुखबिर कहकर उनका गला रेत रहे हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस उन्हें नक्सल हिमायती बताकर जेलों में डाल रही है, मार रही है। इन दो बंदूकधारी खेमों के बीच इस राज्य का कोई राजनीतिक तबका रह ही नहीं गया है। काम इस तरह से नहीं चल सकता। वर्दीधारी लोग अगर ऐसे नाजुक मोर्चे पर लोकतंत्र को बचा सकते हैं, तो फिर पूरे देश पर ही वर्दीधारियों का राज होना चाहिए। लोकतंत्र में वर्दीधारी बंदूकें निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के कहे मुताबिक, उनकी मदद के लिए हो सकती हैं, वर्दियों वाले दिमाग राज करें, ऐसा लोकतंत्र में नहीं हो सकता। इसलिए बस्तर में सुरक्षा बलों से परे जनप्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। 
यह याद रखने की जरूरत है कि पंजाब के आतंक के दिनों में सिर्फ केपीएस गिल की पुलिस पर सबकुछ नहीं छोड़ा गया था, वहां अमन का रास्ता तब निकला था जब अर्जुन सिंह को राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल बनाकर भेजा गया था, और उन्होंने राजनीतिक बातचीत शुरू करके आतंक पर काबू पाया था। छत्तीसगढ़ की लोकतांत्रिक ताकतों को अभी हुई इन मौतों से सबक लेकर अपनी संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारियां समझनी चाहिए, जो कि जांच, मुआवजे, और आरोप से ऊपर की हैं। और राज्य की जनता को यह जानने का हक है कि ग्यारह महीने पहले के बस्तर के हत्याकांड की न्यायिक जांच का सफर आज कहां तक पहुंचा है।

देशी अखबार, विदेशी संपादक


20 मई 2013
भारत में किसी विदेशी नागरिक को अखबार का संपादक बनाने पर रोक है, ऐसा कहते हुए जनता पार्टी के मुकदमाप्रेमी अध्यक्ष डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने अदालत में केस किया हुआ है। उनकी शिकायत द हिन्दू अखबार के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन से है जो कि अमरीकी नागरिक हैं। भारत का अखबार कानून यह मांग करता है कि यहां के किसी अखबार का संपादक भारत का नागरिक हो या अमूमन भारत में रहता हो। इस अखबार के मैनेजमेंट का कहना है कि उन्होंने जब सिद्धार्थ को संपादक बनाया, तब उन्हें इस कानून की पूरी जानकारी थी, और उन्होंने सोच-समझकर ही कानून के हिसाब से ही यह नियुक्ति की थी। 
इस बीच कल एक दूसरी दिलचस्प खबर आई है जिसके मुताबिक बिड़ला के अखबार हिन्दुस्तान टाईम्स में दक्षिण अफ्रीका के एक बड़े अखबार के प्रधान संपादक निकोलस डेव को संपादकीय विभाग का मुखिया बनाया गया है। इस बारे में हिन्दुस्तान टाईम्स के मैनेजमेंट ने मीडिया के पूछे सवालों के जवाब में कुछ नहीं कहा है, लेकिन निकोलस ने अपने अखबार में काम छोडऩे की जानकारी देते हुए हिन्दुस्तान टाईम्स में काम शुरू करने की खबर छापी है। 
अब बहुत से लोगों को यह हैरानी हो सकती है कि अखबारनवीसों से भरे हुए हिन्दुस्तान में एक विदेशी संपादक, या संपादकीय-प्रमुख की जरूरत क्या है? डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी को शायद अदालत तक दौड़ लगाने का एक मौका न मिले, क्योंकि भारत के कानून में सिर्फ संपादक की कुर्सी के लिए विदेशी न होने का नियम है, संपादकीय विभाग का प्रमुख होने के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। यह भी बहुत दिलचस्प बात है कि भारत के दो बड़े अखबार जिनका नाम 'हिन्दूÓ से शुरू होता है, वे ही गैरभारतीय नागरिकों को संपादकीय का मुखिया बना रहे हैं ! और डॉ. स्वामी की विदेशी मूल से, या विदेशी नागरिकों से नफरत अखबारों से बहुत पहले से शुरू हो चुकी है जब उन्होंने सोनिया गांधी के खिलाफ इसी मुद्दे को लेकर एक लंबा अभियान चलाया था, और आज भी वे ट्विटर पर राहुल गांधी और सोनिया गांधी के लिए चुनिंदा विशेषणों वाली गालियों का इस्तेमाल करते हैं। 
लेकिन डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी से परे अगर कुछ बात करें, तो मीडिया के नजरिए से अखबार में विदेशी संपादक की बात हो सकती है। सिद्धार्थ वरदराजन चाहे विदेशी नागरिक हों, लेकिन वे भारत के हैं और भारत को किसी भी दूसरे भारतीय जितना समझते हैं, इसलिए द हिन्दू को उनको फायदा उतना मिल सकता है जितना कि विदेश में पढ़े, और विदेश को देखे हुए किसी भारतीय के अनुभव का मिल सकता है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान टाईम्स में एक खालिस विदेशी, और भारत में कभी न रहे हुए अखबारनवीस को मुखिया बनाकर उस अखबार में बुलाया जा रहा है, जिसके मालिक के घर पर गांधी रहा करते थे, और उसी घर पर उनकी जान गई थी। यह बड़ी दिलचस्प बात है कि जिस दक्षिण अफ्रीका के गोरों की बदसलूकी से एक काला मोहनदास करमचंद गांधी, महात्मा गांधी बना, उसी दक्षिण अफ्रीका के एक गोरे अखबारनवीस को आज बिड़ला का अखबार मुखिया बनाकर लेकर आ रहा है। 
मैं सिर्फ एक दिलचस्प बात यहां रख रहा हूं, दक्षिण अफ्रीकी लोगों से या गोरों से, या विदेशी अखबारनवीसों से किसी परहेज का मकसद नहीं है। बीबीसी में सबसे लंबे समय तक काम करने वाले मार्क टुली तो हिन्दुस्तान आकर काम करते-करते हिन्दुस्तानी ही हो गए, और हिन्दुस्तान के सबसे बड़े राजकीय सम्मानों में से एक उन्हें मिला। आज भी वे हिन्दुस्तान के सबसे अच्छे जानकार अखबारनवीसों में से एक गिने जाते हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान के लोग दुनिया के दूसरे देशों में जाकर मीडिया में बड़ी कुर्सियों पर हैं। मुंबई में पैदा हुए फरीद जकारिया आज अमरीका में सबसे बड़े पत्रकारों में से एक हैं। 
दरअसल बाहर के किसी को लेकर आना किसी भी कारोबार के लिए बेहतर होता है। अपने लोगों, भीतरी लोगों की क्षमता और कल्पनाशीलता, दोनों की एक सीमा होती है। धीरे-धीरे लोग काम के लिए, लोगों के लिए, और मुद्दों के लिए अच्छे या बुरे पूर्वाग्रह विकसित कर लेते हैं। अखबारनवीसी में यह और अधिक होता है। लोग लंबे समय तक काम करते हुए अपनी ही लिखी पुरानी बातों के कैदी होकर रह जाते हैं। चूंकि कतरनें सम्हालकर रखी जाती हैं, आज की तारीख में इंटरनेट पर उनको ढूंढना भी आसान होता है, इसलिए लोग एक बार किसी मुद्दे पर जो सोच लेते हैं और कह देते हैं, उससे खिसकना उनके लिए भारी पड़ता है। ऐसे जमे हुए और टिके हुए लोगों की सोच और उनका रूख दोनों ही बहुत जम जाते हैं। जिस तरह जमे हुए पानी के नीचे पत्थरों पर काई जम जाती है, टंकी की दीवारों पर काई जम जाती है, उसी तरह किसी एक पेशे में, खासकर सोचने-विचारने वाले पेशे में इस तरह की काई जल्दी जमती है। नतीजा यह होता है कि नई सोच के साथ नई पहल का सिलसिला धीमा पड़ जाता है। 
न सिर्फ अखबारनवीसी और इंसानी सोच के मामले में, बल्कि फसलों के मामलों में, और जानवरों या इंसानों के मामले में, नया खून बहुत मायने रखता है। फसलों में दो अलग-अलग किस्मों को मिलाकर तैयार की गई फसल अधिक उत्पादक होती है और कीड़ों के हमलों को झेलने की अधिक ताकत भी रखती है। जानवरों में क्रॉस ब्रीड कहे जाने वाले जानवर अधिक मजबूत होते हैं और उनमें बीमारियों के लिए प्रतिरोधक शक्ति अधिक होती है। इंसानों में भी अलग-अलग धर्मों और जातियों, नस्लों और रंगों, देश और प्रदेश के लोगों के बीच होने वाले संबंधों से बनने वाली अगली पीढ़ी चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से बेहतर होती है, और जो जातियां अपने भीतर ही भीतर के रक्त संबंधों पर जोर देती हैं, वे धीरे-धीरे कमजोर पडऩे लगती हैं, इसकी भी बहुत सी मिसालें हैं। 
मेरा यह निजी मानना रहता है कि जब इलाज की जरूरत हो तो मेडिकल कॉलेज में काम करने वाले डॉक्टर, बाहर के डॉक्टरों के मुकाबले बेहतर होते हैं। इसकी सीधी सी वजह यह है कि वहां उनको लगातार पढऩे मिलता है, छात्र-छात्राओं के सवालों के जवाब तलाशने होते हैं, और अपनी ब्रांच के अलावा बहुत सी दूसरी ब्रांच के विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह-मशविरे का मौका भी मिलता है। एक ब्रांच और दूसरी ब्रांच के विशेषज्ञों के बीच जानकारी और अनुभव के ऐसे अंतरसंबंधों से दोनों का अनुभव बढ़ता है, ज्ञान बढ़ता है। कमोबेश ऐसा ही हाल एक देश के किसी एक पेशेवर से दूसरे देश के उसी पेशे के इंसान या कि दूसरे पेशे के इंसान के मिलने पर होता है। 
इसलिए अगर दूसरे देश से कोई पत्रकार आकर यहां के अखबार का मुखिया बन रहा है, तो वह मेरे हिसाब से एक अच्छी बात है। बल्कि पत्रकारों से परे भी बहुत से ऐसे लोग रहे हैं, जो कभी पत्रकार नहीं रहे, लेकिन मीडिया में आने के बाद उन्होंने पुराने दिग्गज पत्रकारों के मुकाबले भी बेहतर काम किया। भारत में कुछ बहुत बड़े नामी-गिरामी ऐसे संपादक रहे जो कि पत्रकार भी नहीं थे, और सीधे संपादक बने, लेकिन जिन्होंने अपने लिखने का लोहा मनवाया, और जिनके अखबार उनके नाम से जाने जाते थे। 
विदेशी मुखिया के आने से भारत के भीतर के उन नामी-गिरामी और आत्ममुग्ध लोगों को भी एक चुनौती मिलेगी कि घूम-फिरकर उन्हीं लोगों में से किसी को संपादक बनाना मालिक की मजबूरी नहीं है। और बाहर से आए हुए लोगों के साथ एक यह बात भी रहेगी कि वे एक बहुत ही प्राकृतिक और सामान्य जिज्ञासा के साथ भारत को सीखेंगे, समझेंगे, और अपने ताजा विचार बनाएंगे। इस देश के हर पहलू के बारे में टीवी के पर्दों पर सौ-सौ बार अपनी जमी-जमाई सोच को दुहराने वाले संपादकों और पत्रकारों से परे, बाहर से आए हुए लोग एक ताजा समझ सामने रखेंगे। इसके साथ-साथ ऐसे लोग बाहर के अपने अनुभव को भी इस देश में काम करते हुए यहां के मीडिया से बांटेंगे। 
मैं उस दहशत का हिमायती नहीं हूं जिसे एक विदेशी के भारतीय अखबार के संपादक बन जाने पर भारतीय लोकतंत्र के खतरे में पड़ जाने के आसार दिखते हैं। भारत का कानून यहां के मीडिया में विदेशी पूंजीनिवेश की सीमा भी बांधकर चलता है। मेरे हिसाब से यह गैरजरूरी इसलिए है कि यहां के जो मीडिया-मालिक हैं, उनमें से बड़े-बड़े तो तकरीबन कोई न कोई कारोबार ऐसा कर ही रहे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र को चोट पहुंचाने वाला है। इसलिए विदेशी आकर यहां पर और क्या बुरा कर लेंगे? आज जब तरह-तरह के घोटाले सामने आते हैं, तो उनमें कभी एक मीडिया-समूह, तो कभी दूसरा मीडिया समूह जुड़ा हुआ मिलता है। इसलिए विदेशी संपादक, अखबार-मुखिया, या पूंजीनिवेश, इनसे दहशत खाने की जरूरत नहीं है। 

बाजारू बन चुकी क्रिकेट को जुर्म बनने से रोकने की जरूरत

संपादकीय
19 मई 2013
भारत में बीबीसीआई नाम का एक अनोखा संगठन है, जो जनता के बीच क्रिकेट को कंट्रोल करता है, जनता के पैसों को दुहता है, देश की क्रिकेट टीम को चुनता है, लेकिन अपने-आपको सूचना के अधिकार के भीतर नहीं आने देता, जो कि देश के छोटे-छोटे जनसंगठनों पर भी लागू है। एक तानाशाह साम्राज्य की तरह यह क्रिकेट संगठन हजारों करोड़ रूपये सालाना इधर से उधर करता है, लेकिन उसका हिसाब किसी को नहीं देता। और इस देश का खेलमंत्री भी इस संगठन को छू नहीं पाता क्योंकि इसे माफिया अंदाज में चलाने वाले लोगों में कांगे्रस और एनसीपी के केंद्रीय मंत्री हैं, भाजपा के अरूण जेटली जैसे बड़े नेता हैं, और ऐसे बड़े कारोबारी हैं जो कि आईपीएल जैसे क्रिकेट-कारोबार की टीम के मालिक भी हैं। 
जिस देश में गरीब खिलाडिय़ों को जूते न मिलते हों, खेल की पोशाक न मिलती हो, सोने को किसी खाली कमरे में दरी न मिलती हो, पेट भरने को दूध या अंडा न मिलता हो, वहां पर यह अकेला खेल राष्ट्रीय खेल की तरह इतने बड़े कारोबार में उलझा हुआ है कि बड़े-बड़े उद्योग शरमा जाएं। और इसकी चर्चा की जरूरत आज इसलिए भी अधिक पड़ रही है क्योंकि पिछले बरसों में लगातार आईपीएल के ऐसे-ऐसे घोटाले सामने आए हैं कि इसके एक पिछले बड़े पदाधिकारी ललित मोदी देश छोड़कर बाहर बैठे हैं, और खिलाड़ी जेल में पड़े हैं। इसकी बैठकों को देखें तो देश के सबसे महंगे होटलों में इसके पदाधिकारी इस तरह आते-जाते हैं मानो कारोबार की दुनिया की सबसे बड़ी बैठक हो रही हो। 
सरकार को इस संगठन के सट्टेबाजी से लेकर अंडरवल्र्ड की धंधेबाजी तक पर काबू पाने के लिए गंभीरता से सोचना चाहिए। और यह काम आसान नहीं होगा। यूपीए सरकार पर सुबह के उसके नाश्ते को लेकर भी चढ़ाई करने वाले राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली भी क्रिकेट के कारोबार में एक बड़े कारोबारी हैं, और एनसीपी के शरद पवार भी इसका चुनाव लड़कर क्रिकेट की लगाम थामने वाले सारथी बनने की हसरत रखते हैं। हिंदुस्तान में क्रिकेट ने जिस तरह से अपने-आपको बाजारू बना लिया है, और खेल के साथ-साथ जिस भाषा में खिलाडिय़ों को खरीदने और बेचने की बात होती है, वह देखने लायक है। जिस खेल में खिलाडिय़ों को सदियों पहले के गुलामों की तरह खरीदा जाता है, और खिलाड़ी बिकते हैं, नीलाम होते हैं, तो फिर ऐसे बिके हुए खिलाड़ी दाऊद के हाथ भी नीलाम हो सकते हैं, और किसी छोटे सट्टेबाज के हाथ भी। जिस अंदाज में आईपीएल के मैच होते हैं, उनमें जिस तरह से मैदान में मनोरंजन का नाच-गाना होता है, वह इस गरीब देश के गरीब खिलाडिय़ों  के मुंह चिढ़ाने की तरह होता है।
आज सही मौका है जब सरकार को बीसीसीआई की मनमानी को खत्म करना चाहिए, उसे देश के प्रति जवाबदेह बनाना चाहिए। बाजारू बन चुकी क्रिकेट को जुर्म बनने से रोकने की जरूरत है।

इस रेट पर तो कारखानेदार सीबीआई के पूरे अमले को खरीदने की ताकत रखते हैं


संपादकीय 
18 मई 2013
भारत में बहुत निराशा का दौर चल रहा है। ऐसा लगता है कि सरकारों से लेकर लोकतंत्र के बाकी हिस्सों तक, और आम लोगों तक, कोई भी भरोसे के लायक नहीं रह गए हैं। रोज की खबरों को देखें, सुनें, या पढ़ें, लोग हैरान होते हैं कि क्या सोचकर, किस पर भरोसा करें। 
हफ्ते भर में दो वारदातें ऐसी हुई हैं जिनमें 75-80 बरस उम्र की दो महिलाओं से अलग-अलग प्रदेशों में बलात्कार हुआ। एक के घर एक आदमी पानी मांगने गया, और उससे बलात्कार किया। दूसरी को एक आदमी ने बेटे के लिए बहू दिलाने का वादा किया, और बलात्कार किया। इसी तरह एक खबर यह भी कि मूक-बधिर और मानसिक रूप से कमजोर बच्चियों से भी बलात्कार किया गया। दूसरी तरफ पिछले तीन दिनों से देश के नामी-गिरामी करोड़ों कमा रहे क्रिकेट खिलाडिय़ों की सट्टेबाजों के साथ मिलकर देश और दुनिया को धोखा देने की खबरों का सैलाब देशभर में बिखर गया है। आज की खबर है कि किस तरह कोयला घोटाले की जांच करते सीबीआई के दो अफसर सात लाख रूपए की रिश्वत लेते खुद सीबीआई की सतर्कता शाखा ने गिरफ्तार किए हैं। अब जिस घोटाले में लाखों करोड़ रूपये का फायदा कारखानेदारों को देने की जांच चल रही है, उसमें अगर एसपी दर्जे के अफसर सात लाख रूपए में बिक रहे हैं, तो एक-एक कारखानेदार इस रेट पर सीबीआई के पूरे अमले को खरीदने की ताकत रखता है। 
कहीं पर कोलगेट हो रहा है, कहीं पर रेलगेट हो रहा है, कहीं पर मैचगेट हो रहा है, और अब यह जांचगेट हो गया है। कुछ बरस पहले संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेने वाले सांसदों को जब बर्खास्त किया गया था, तब उसकी जांच के लिए जो कमेटी बनी थी उसके अध्यक्ष पवन बंसल थे। अब पवन बंसल बर्खास्त हो चुके हैं, क्योंकि रेलगेट ने यूपीए सरकार को कालिख से पोत दिया है। एक गेट की जांच करने वाले दूसरे गेट में फंस रहे हैं। तो आखिर क्या होगा? क्या अगला कोई गेट जजगेट होगा? या (मनमोहन) सिंहगेट होगा? यह सिलसिला आखिर थमेगा कहां? कहां पर जाकर लोगों की नीयत थमेगी, हवस थमेगी, लूट थमेगी? 
आज जब खबरों के बीच नक्सल इलाकों में 15-17 बरस की आदिवासी लड़कियां बंदूक थामे हुए लोकतंत्र के खिलाफ लड़ते दिखती हैं, जब ये खबरें आती हैं कि पुलिस-नक्सल मुठभेड़ के बीच छोटे-छोटे बच्चे पुलिस के हथियार उठाकर भाग रहे थे, तो भी क्या यह देश यह नहीं सोचेगा कि देश-प्रदेश की राजधानियों ने उनसे बहुत दूर बसे हुए आदिवासी इलाकों का भरोसा क्यों खो दिया है? जिस नक्सलवाद या माओवाद को समझने के लिए खासी राजनीतिक समझ चाहिए, उसे अनपढ़-आदिवासी लोग इतनी आसानी से क्यों समझ ले रहे हैं? क्यों उनकी राजनीतिक लड़ाई की ताकत और सोच, पढ़े-लिखे और शहरी लोगों की सोच से बहुत अधिक आगे है? 
इन बातों से परे भी कुछ दूसरी कतरा-कतरा खबरें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि भारत का ताकतवर तबका क्यों इस देश की पौराणिक परंपराओं की कुछ अच्छी बातों को सिरे से ही खो बैठा है? आज ही अमरीका की यह खबर है कि वहां की एक सबसे बड़ी और सबसे कामयाब कंपनी, एप्पल के पिछले बरस गुजरे मालिक स्टीव जॉब्स की पत्नी अपनी विरासत का इस्तेमाल जनसेवा के लिए कर रही है। वहां की एक दूसरी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स अपनी आधी दौलत जनसेवा के लिए देकर दुनियाभर के खरबपतियों से भी ऐसा ही करवाने का दौरा कर रहे हैं। इसी के साथ-साथ भारत के उद्योगपति हैं जो कि सरकारों के साथ मिलकर देश को लूटने में लगे हैं। कल ही इसी जगह हमने काफी कुछ इसी बारे में लिखा है, इसलिए इन बातों को अधिक दोहराना जरूरी नहीं है। लेकिन देश के साथ बाजार और सरकार के जो बाहुबली जिस तरह बलात्कार कर रहे हैं, क्या उसी से प्रेरणा और मार्गदर्शन पाकर देश के मर्द बच्चियों से लेकर बूढ़ी महिलाओं तक से बलात्कार नहीं कर रहे? नेताओं, अफसरों, और कारोबारियों की नीयत और मर्दों की हिंसक मर्दानगी, इन दोनों पर ताले डालने के लिए क्या जज ही रात-दिन कोशिश करते रहेंगे? 
आज हम यहां जो लिख रहे हैं, उसमें बहुत अधिक नई बातें नहीं है। लेकिन फिक्र नई है, फिक्र की ऊंचाई नई है। आखिर तीन बरस से नीचे और अस्सी बरस से अधिक, किस उम्र पर जाकर मर्द की बलात्कारी नीयत थमेगी? और कितने अरब या कितने खरब कमा लेने के बाद नेता-अफसर-ठेकेदार, इनकी नीयत थमेगी? और यह देश और कितने गेट देखने को मजबूर होगा? ऐसी ही नौबत में इन गेट को देखकर थके हुए लोग हथियारबंद नक्सलियों के साथ लाल गलियारे पर चल निकलते हैं। लेकिन आम जनता के पैसों से सबसे महंगी हिफाजत के बीच जीने वाले सत्ता पर काबिज लुटेरे नक्सलियों के हथियार से खासे दूर रहते हैं, और इसीलिए उनका हौसला जारी है। इन बातों पर फिक्र करने की जरूरत है, और आज बीते कल की जरूरत से अधिक बड़ी जरूरत है।

पैसे वाले लुटेरों के हिन्दुस्तान में गरीब की ईमानदारी को सलाम...

संपादकीय
17 मई 2013
दो दिनों में जब दो खबरें इंसानों की सोच के दो सिरों से आती हैं, तो उनको जोड़कर देखे बिना मन नहीं मानता। गुजरात से आई एक खबर ने सुकून दिया ही था कि वहां के एक गरीब ऑटोरिक्शा वाले ने अपनी जमीन किसी को बेची थी। और वह जमीन खरीददार के नाम चढ़ी नहीं थी, इसलिए सरकार ने जब वह जमीन टाटा नैनो के कारखाने के लिए ली, तो एक करोड़ नब्बे लाख रूपए का मुआवजे का चेक राजू भारवाड़ नाम के इस ऑटो वाले को भेज दिया। इस जमीन को उसके पिता 25 बरस पहले बेच चुके थे। उसने तुरंत जाकर अफसरों को वह चेक लौटाया और कहा कि चाहे वह जमीन नए मालिक के नाम पर न चढ़ी हो, उस चेक का मालिक उसका खरीददार ही है। राजू और उसकी बूढ़ी मां ने इस काम को तुरंत ही करना सही और जरूरी माना। उसके पास उस पल तो यह मौका था ही कि घर आए इस चेक को वह अपने खाते में डालकर पल भर में करोड़पति बन जाता, लेकिन उसका पूरा परिवार आज 6 हजार रूपए महीने की कमाई में जीता है, और उसकी मां से लेकर उसके बच्चों तक सब इस चेक को लौटाकर खुश हैं। 
दूसरी खबर है आईपीएल के करोड़पति खिलाड़ी श्रीसंत और दो दूसरे लोगों की जिन्होंने करोड़ों रूपए का मेहनताना खेलने के लिए पाने के बाद भी सट्टेबाजों के साथ मिलकर साजिश की, और डेढ़ सौ से अधिक देशों के अरबों क्रिकेट दर्शकों के साथ धोखा किया। 
हिन्दुस्तान में किसी पैसे वाले बेइमान के बारे में आमतौर पर यह कह दिया जाता है कि उसके पास ऊपर वाले का दिया पहले का ही इतना है कि वह और चोरी-बेइमानी क्यों करेगा? भारत के समाज में कई किस्म के जो पूर्वाग्रह हजारों बरस से चले आ रहे हैं, और जिनको मनुवादी व्यवस्था ने आगे बढ़ाया है, यह उनमें से एक है। राजाओं और सामंतों के टुकड़ों पर पलने वाले चारण और भाट जब उनका गुणगान करते थे, तो उसमें उनकी संपन्नता की ढेर-ढेर तारीफ भी होती थी। वह सोच आज इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में भी चली आ रही है। आज किसी कमजोर तबके से आए हुए, गांव की जमीन से उठे हुए सरकारी अफसर के बारे में बाजार में हिकारत के साथ यह चर्चा होने लगती है कि वह तो पांच-पांच सौ रूपए रिश्वत ले लेता है। इसे लोग एक घटिया बात मानते हैं कि कोई रिश्वत में इतनी छोटी रकम ले ले। इन्हीं मामलों में अगर कोई अफसर दबाकर मोटी रिश्वत ले, तो उसके लिए लोगों के मन में कम से कम यह हिकारत नहीं रहती कि वह छोटे मुंह वाला दो टके का आदमी है।  भारत की जुबान अगर देखें, तो गरीब के लिए हजार किस्म के हिकारत वाले हिंसक कहावत-मुहावरे चलन में हैं। कोई उन्हें फटीचर कहता है, कोई कंगला कहता है, और कोई मुंह न लगाने के लायक। हिन्दी में कहावत-मुहावरे या लोकोक्ति के शब्दकोष देख लें तो उनमें गरीब या कंगाल के लिए जगह-जगह नीच शब्द का इस्तेमाल हुआ है, मानो गरीबी कोई नीचता की बात हो। गरीब को कहीं तुच्छ कहा जाता है तो कहीं घटिया कहा जाता है। एक कहावत में उसे कहा गया है- गरीब आदमी चंडाल बराबर, गरीब की जोरू और उमदा खानम नाम (नाम बेगमो जैसा)। एक दूसरी कहावत में कहा गया है- कि गरीब समाज के लिए अभिशाप होता है। एक दूसरी लोकोक्ति है- गरीब के तीन नाम लुच्चा, पाजी, बेईमान, और इसके अर्थ को समझाया गया है कि गरीबी में व्यक्ति का ईमान घट जाता है। यही लोकोक्ति मराठी और पंजाबी में भी इसी तरह के अपमान वाली है। एक दूसरी कहावत है कि गरीब से परोसगारी नहीं करवानी चाहिए, वह थोड़ा-थोड़ा ही परोस सकेगा।
आज कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक, और मुंबई से लेकर पश्चिम बंगाल तक, कदम-कदम पर तो पैसे वाले लूटमार करने में लगे हैं, लेकिन आज भी गरीबी को लोग गाली की जगह ही इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में एक फिल्म का यह गाना याद आता है जो पिछले दिनों अदालत तक पहुंच गया था। फिल्म चक्रव्यूह का बागी तेवरों वाला यह गाना कहता है- कांग्रेस की महामारी ने हमारा भट्टा बिठा दिया, चले हटाने गरीबी गरीबों को हटा दिया। शरबत की तरह देश को गटका है गटागट, आम आदमी की जेब हो गई है सफाचट। बिड़ला हो या टाटा, अंबानी हो या बाटा, सबने अपने चक्कर में देस को है काटा। अरे हमरे ही खून से इनका इंजिन चले धकाधक। 
जिस देश में गरीबी को गाली माना जाएगा, और उन गरीबों का भला करने के नाम पर लूट-डकैती राजनीतिक रिवाज बन जाएगी, उस देश में वैसे रिवाज के खिलाफ आज जंगलों में, तो कल शहरों में बगावत से लहू बहना तय है। सरकार की मेहरबानी से हिन्दुस्तान में जो क्रिकेट दसियों हजार करोड़ का कारोबार बन गया है और जिसमें कांग्रेस, भाजपा से लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस तक के बड़े-बड़े अरबपति ठेकेदार बन गए हैं, उसके मार्फत देश की जनता को दिया जा रहा धोखा गाली के लायक है, गरीबी नहीं। 
अहमदाबाद के गरीब राजू की ईमानदारी को सलाम।

भारत के आसमान पर हॉलीवुड लायक कहानी

16 मई 2013
संपादकीय
भारत के विमानों के साथ पिछले कुछ दिनों में तीन अलग-अलग किस्म के ऐसे मामले हुए जिनको सोचकर हवाई सफर से डर लग सकता है। सबसे पहले एयर इंडिया की एक अंतरराष्ट्रीय उड़ान के दो पायलटों को निलंबित किया गया क्योंकि उन्होंने अपनी जगहों पर एयर होस्टेस बिठा दी थी, और दोनों जाकर घंटेभर सो गए थे। उन्होंने विमान को ऑटोमोड में डाल दिया था जिससे कि वह साधारण स्थितियों में कुछ समय तक चल सकता था, लेकिन मौसम की खराबी, उपकरणों की गड़बड़ी या किसी और तरह की अचानक आई दिक्कत को वहां बैठीं एयर होस्टेस नहीं झेल सकती थीं। मुसाफिरों से भरा यह विमान जिस तरह खतरे में डाला गया था, उसकी हवाई कारोबार में दूसरी कोई मिसाल नहीं है। दूसरा मामला रायपुर से कोलकाता जा रहे एक विमान के साथ हुआ, जो कि आसमान की हवा में एक बड़ा खाली हिस्सा आ जाने से अचानक सीधे नीचे गिरा और काफी नीचे आने के बाद थमा। इसमें कई लोग जख्मी भी हुए। तीसरा मामला भोपाल के आसमान के ऊपर हुआ, यहां से गुजरते हुए विमान के दो पायलटों में से एक पायलट कॉकपिट से बाहर आया, और अपनी जगह उसने विमान के किसी और कर्मचारी को भीतर नहीं भेजा, जैसा कि नियम होता है। और बाद में जब वह भीतर जाने की कोशिश करने लगा तो दरवाजा ही नहीं खुला। इसके बाद कॉकपिट में बचे अकेले पायलट ने पास के भोपाल एयरपोर्ट से इजाजत लेकर वहां इमरजेंसी लैंडिंग की। इन तीनों मामलों की अलग-अलग जांच हो रही है।
अब अगर ये तीनों किस्म के हादसे एक साथ हुए होते तो क्या होता? अगर एयर होस्टेसों को पायलट की जगह पर बिठाकर पायलट सोने चले गए होते, उसी वक्त आसमान में कोई एयर पॉकेट आया होता और विमान झटके से नीचे गिरता, और इस झटके से मुसाफिरों के बीच सोए पायलट उठते, और कॉकपिट का दरवाजा नहीं खुलता, तो क्या हुआ होता? इन तीनों हालात को एक साथ जोड़कर अगर देखें, तो हॉलीवुड से लेकर मुंबई तक स्पीड जैसी रोमांचक फिल्म बन सकती है। और दो हफ्तों के भीतर, शायद दस दिनों के भीतर ये तीनों मामले भारत के ही तीन मुसाफिर विमानों के साथ हुए हैं। इनमें से लापरवाही वाली दो घटनाओं में भारत की सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया शामिल है, जिसके पायलट सो गए, और दूसरी घटना में एक पायलट कॉकपिट के बाहर बंद हो गया। 
मुसाफिरों की हिफाजत में ऐसी लापरवाही के पीछे भारत में एक दूसरी वजह भी है। जो लोग ऐसी लापरवाही के खिलाफ कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होते हैं, वे लोग अपने खुद के विशेषाधिकारों, और हवाई अड्डे से लेकर विमान के भीतर तक अपनी खातिरदारी से खुश रहते हैं। जब बड़े-बड़े मंत्री, अफसर या जज विमानों में चलते हैं, तो उनके लिए सारा खास इंतजाम हो जाता है। इसलिए उनको आम मुसाफिरों की तकलीफें, या आम मुसाफिरों का खतरा दिखता ही नहीं। जिस अंतरराष्ट्रीय उड़ान पर दोनों भारतीय पायलट एक साथ सोने चले गए, क्या उन्होंने ऐसा किया होता अगर उस उड़ान पर कोई मंत्री चलता होता? या सुप्रीम कोर्ट का कोई जज होता? इसलिए जितना चौकन्नापन, जितनी सुविधा, और जितनी सुरक्षा सारे लोगों को मिलनी चाहिए, जब उसका एक अनुपातहीन बड़ा हिस्सा एक छोटे से खास तबके पर खर्च होता है, तो बाकी के आम तबके को सरकारी कर्मचारी गुठली की तरह समझ लेते हैं। 
अभी तक हमने किसी को इन तीनों घटनाओं को जोड़कर इनके एक साथ होने पर खड़े हुए रहते खतरे के बारे में सावधान करते भी नहीं सुना है, इसलिए हम आज इस मुद्दे को यहां उठा रहे हैं, और लोगों को इनको लेकर सरकार से और उड़ानों को नियंत्रित करने वाली संस्था से, विमान कंपनियों से, सार्वजनिक जवाब-तलब करना चाहिए। जो आज सवाल नहीं पूछेंगे वो कल अपनी जिंदगी ऐसी ही खतरे में डालेंगे। दूसरी बात यह कि ऐसी लापरवाही से सिर्फ हवाई मुसाफिरों को बचाने की जरूरत हो, ऐसा भी नहीं। देश भर की सड़कों पर रात-दिन लालबत्तियों के जो काफिले चलते हैं, वे बाकी लोगों के हक रौंदते चलते हैं। यही वजह है कि जजों से लेकर मंत्रियों तक को इस बात का अंदाज ही नहीं लगता कि सड़कों पर जनता की दिक्कत क्या है, सड़कों पर खतरे क्या हैं। इसलिए हम इन विमानों की लापरवाही जैसे मामलों को इस देश में आम और खास लोगों के बीच के फासले से जोड़कर देखते हैं, कि जहां पर खास नहीं हैं, वहां पर आम के भी फिक्र की जरूरत नहीं है।

प्रतिमाओं का पाखंड

संपादकीय
15 मई 2013
अमरीका में बसे हुए भारतवंशियों को उपग्रह-टीवी के माध्यम से अपनी बात कहते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी कहा कि सरदार पटेल की एक प्रतिमा गुजरात में इतनी ऊंची बनाई जा रही है कि वह अमरीका की विख्यात स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दो गुना ऊंची होगी। इस बात को दो दिन भी नहीं गुजरे थे कि तमिलनाडु से खबर आई कि वहां तमिल-अम्मा की एक प्रतिमा सौ करोड़ की लागत से बनने वाली है। एक तीसरी खबर कई महीने पहले से महाराष्ट्र से आई हुई है कि वहां पर समंदर के भीतर शिवाजी की 321 फीट ऊंची प्रतिमा बनाई जाएगी और उसके लिए समंदर में जगह छांटी जा रही है। यह प्रतिमा भी अमरीकी स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से ऊंची बनाने की तैयारी है। जिस उत्तरप्रदेश में भूख से दो लोगों की मरने की खबर है, वहां पर पिछली मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में उनकी प्रतिमाएं, अंबेडकर की प्रतिमाएं, कांशीराम और बसपा के चुनावी निशान हाथी की प्रतिमाएं सैकड़ों करोड़ से बनाई गई थी, और वह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। प्रतिमाओं का धंधा बहुत भयानक है। कल को महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार आएगी, तो शिवाजी के साथ-साथ बाल ठाकरे की प्रतिमा भी समंदर में लगाने का काम होगा। आज भी मुंबई शहर के बीच के सैकड़ों एकड़ के रेस कोर्स को बाल ठाकरे का स्मारक बनाने की मांग शुरू हो गई है। 
किसी भी तरह के स्मारक हों, उनको लेकर यह बात साफ होनी चाहिए कि क्या वे जनता के पैसों से बनाए जा रहे हैं? क्या वे ऐसे लोगों के हैं जो कि राष्ट्र के निर्विवाद प्रतीक हैं? जैसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा अगर कहीं बनती है, तो वह किसी पार्टी या जाति की प्रतिमा नहीं रहती। लेकिन आज जिंदा लोग, जो कि किसी भी दिन जेल जा सकते हैं, उनकी प्रतिमाएं अगर जनता के पैसों पर बनती हैं, तो उनके जेल जाने के बाद क्या सरकारी खर्च पर ही प्रतिमा के इर्द-गिर्द सलाखें भी लगाई जाएंगी? फिर दूसरी बात यह कि सरदार पटेल जैसे किसी व्यक्ति की प्रतिमा को बनाने के लिए अमरीका की किसी प्रतिमा को पैमाना क्यों बनाया जाए? उससे दुगुनी या उससे ऊंची प्रतिमा बनाने में सैकड़ों करोड़ या हजारों करोड़ खर्च करने के बजाय उतने पैसों से उन्हीं की याद में कोई एक ऐसा संस्थान बनाया जाए, जो कि समाज का सचमुच भला कर सके। आज न तो गांधी की, न सरदार की, और न ही शिवाजी की प्रतिमा की कोई जरूरत है। इनके नामों पर काफी कुछ रखा जा चुका है, और इनका नाम इतिहास में तरह-तरह से दर्ज है। किसी जाति या क्षेत्र, धर्म या पार्टी के पसंदीदा चेहरे को लेकर, स्थानीय गौरव को लेकर अगर एक पार्टी या एक सरकार ऐसा काम करते हैं, तो इससे अगली सरकार और उसे चलाने वाली पार्टी के सामने फिजूलखर्ची की एक मिसाल बनती है। पूरे देश में सरकारी खर्च पर ऐसे प्रतीक खड़े करने पर रोक लगनी चाहिए। आज उत्तरप्रदेश में भूख से अगर मौतें हो रही हैं, तो यह मायावती के हाथी के पथरीले पैरों तले दबकर हुई मौत से कम कुछ नहीं है। 
भारत अभी तक सामंती पाखंडों में जी रहा है। अभी तक यहां प्रतिमाओं का शौक उसी तरह का है जिस तरह हर सड़क के किनारे हर कुछ फर्लांग पर रंग पोतकर कोई मंदिर बना दिया जाता है, किसी प्रतिमा को बिठा दिया जाता है, और फिर वह पूरी जिंदगी के लिए लड़ाई की एक जड़ बन जाती है। यहां पर जिंदगी की असल जरूरतें पूरी नहीं होतीं, और लोग भावनाओं को भड़काने के लिए प्रतिमाओं की कद-काठी के मुकाबले में लग जाते हैं। भारत की अदालत को ऐेसी फिजूलखर्ची में दखल देने की गुंजाइश शायद न दिखे, लेकिन समाज के जागरूक तबकों को मुंह खोलना चाहिए। लोगों को इलाज नहीं है, पढ़ाई नहीं है, ऐसे सरकारी संस्थानों का निजीकरण होते चल रहा है, और सरकार अपने पैसे को स्मारकों पर खर्च कर रही है। अमरीका की बराबरी करना हो, तो उस देश में भी सीखने लायक कुछ अच्छी चीजें हैं। वहां की सरकारें रात-दिन चोरी-डकैती के मामलों में अदालतों में, जेल या हिरासत में नहीं रहतीं। पहले उस किस्म के कद की बराबरी कर ली जाए, तो फिर भारत में इतना पैसा हो जाएगा कि हमको प्रतिमाओं पर खर्च को फिजूलखर्ची नहीं कहना पड़ेगा। जब कोई किसी दूसरे के कद के मुकाबले अपने को नापते हैं, तो वे अपने आपको कमजोर और छोटा समझते हैं। जिस अमरीका की प्रतिमा से दुगुनी ऊंची प्रतिमा बनाने की घोषणा नरेन्द्र मोदी ने की है, उस अमरीका के धार्मिक समानता कानून के तहत वे तोहमतों से घिरे हुए हैं, और वहां की धरती पर पांव देने के हकदार भी नहीं हैं। उनको अगर अमरीका को नीचा दिखाना है, तो वह प्रतिमा बनाने से नहीं होगा, समानता दुगुनी ऊंची करने से होगा। 

केन्द्र और राज्य में कांग्रेस और भाजपा

संपादकीय
14 मई 2013
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह महीने भर की लंबी विकास यात्रा पर निकले हुए हैं जिसमें वे तकरीबन सभी विधानसभा क्षेत्रों में जाएंगे। दूसरी तरफ राज्य में विपक्ष, कांग्रेस पार्टी भी महीने भर की परिवर्तन यात्रा पर निकली हुई है। मुख्यमंत्री सरकार की तरफ से आम लोगों के लिए जो जनकल्याण और विकास की योजनाएं हैं,  उनके कार्यक्रम भी करते चल रहे हैं। यह चुनाव के पहले सत्तारूढ़ भाजपा का सबसे बड़ा जनसंपर्क भी है।  इस राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बीच सड़कों पर उस तरह की लड़ाई नहीं चलती, जैसी कि कुछ दूसरे राज्यों में चलती है। और यहां पर दोनों ही बड़ी पार्टियों के लोग जनता के बीच जाकर अपनी बात रख रहे हैं। 
चुनाव के पहले किसी राज्य में जनता के सामने अपने मुद्दे रखना, उसे दिमागी रूप से चुनाव के लिए तैयार करना होता है, और लोकतंत्र में मतदाताओं का ऐसा राजनीतिक शिक्षण जरूरी है, जनता के फायदे का है, और लोकतंत्र के फायदे का है।  बीच-बीच में इन दोनों ही पार्टियों से कुछ लोग राज्य और केन्द्र की अपनी विरोधी सरकार को लेकर सिर्फ जुबानी जमाखर्च वाले आक्रामक और बेबुनियाद बयान देते हैं, जिनमें घिसे-पिटे नारों वाली बेअसर बातें रहती हैं, और वे कई वजहों से मीडिया के मार्फत जनता तक पहुंच भी जाती हैं। आज जब केन्द्र और राज्य, इन दोनों सरकारों के खिलाफ नौ-नौ बरस के कार्यकाल को लेकर कहने के लिए विपक्ष के पास ठोस बातें होनी चाहिए, तब अगर ये दोनों पार्टियां अपने लंबे अनुभव के बावजूद अगर तथ्यों के बजाय नारों की बातें करती हैं, तो हमारा अंदाज यह है कि मतदाताओं पर उसका असर अब कम होता है। केन्द्र और राज्य दोनों के पास इतने लंबे कार्यकाल के बाद जनकल्याण की बहुत सी योजनाएं हैं, और अपने अच्छे कामों को गिनाने की समझ इन दोनों में होनी चाहिए। ऐसे में राज्य में चुनाव शुरू होने के करीब 6 महीने पहले के ऐसे राजनीतिक जनसंपर्क ठोस बातों पर टिके रहना बेहतर होगा। 
छत्तीसगढ़ विधानसभा संसद के मुकाबले इन बरसों में अधिक जिम्मेदार इस तरह से रही कि राज्य के किसी मुद्दे को लेकर पूरे के पूरे सत्र खराब नहीं किए गए, इसके पीछे एक तरफ विपक्ष की अधिक जिम्मेदार भूमिका भी रही, और दूसरी तरफ डॉ. रमन सिंह की सरकार ने विपक्ष के साथ गैरजरूरी टकराव नहीं पाला। यहां पर तुलना करते हुए यह याद रखना भी जरूरी है कि संसद में यूपीए जितने तरह के भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी हुई थी, वैसी नौबत भी छत्तीसगढ़ में रमन सरकार की नहीं थी, और शायद इसीलिए संसद में भाजपा जितनी आक्रामक थी, छत्तीसगढ़ में विपक्षी कांग्रेस के पास वैसे कोई मुद्दे नहीं थे। 
आज इन दोनों यात्राओं के मौकों पर हम छत्तीसगढ़ के राजनीतिक चरित्र और यहां के राजनीतिक माहौल को देखते हुए कुछ तसल्ली जाहिर करना चाहते हैं। आज देश के बहुत से राज्यों में मुख्यमंत्री जिस तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, जेल जा रहे हैं, अदालती कटघरों में खड़े हैं, मंत्रियों के इस्तीफे हो रहे हैं, बड़े-बड़े अफसर जेल जा रहे हैं, सत्ता पलट हो रही है, विधायक खरीदे-बेचे जा रहे हैं, राष्ट्रपति शासन लग रहे हैं, ऐसी बातों से आजाद रहते हुए छत्तीसगढ़ ने पिछले साढ़े नौ बरस में एक राजनीतिक स्थिरता हासिल की है, और यही वजह है कि विपक्ष के पास भी आज इस राज्य में कोई ठोस मुद्दा नहीं है, खासकर देश के बाकी राज्यों के मुकाबले बिल्कुल भी नहीं है। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में यहां की सत्तारूढ़ भाजपा के पास देश में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया कांग्रेस पार्टी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर के, केन्द्र सरकार के इतने मुद्दे हैं, कि छत्तीसगढ़ में आज भाजपा के हाथ सत्ता का प्रचार भी है, और केन्द्र सरकार के खिलाफ भांडाफोड़ भी है। इस माहौल में छत्तीसगढ़ की कांग्रेस पार्टी के पास आज अपने प्रचार में पैनापन लाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि रमन सिंह सरकार छत्तीसगढ़ में इतने बुरे काम नहीं कर रही है, जितने कि देश में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने किए हैं। ऐसे में कांग्रेस अपने प्रचार में धार कैसे लाएगी यह भी देखना है, और वह किसी परिवर्तन की जरूरत को कैसे साबित करेगी यह भी देखना होगा। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के सामने यह एक कड़ी चढ़ाई है। 

एक कतरा झूठ से बाकी सच भी...

13 मई 2013
एक वक्त था जब झूठ दो तरह के होते थे, एक मामूली झूठ, और दूसरा उससे ऊंचे दर्जे का, सफेद झूठ। बाद में एक पश्चिमी नेता ने एक तीसरे किस्म का झूठ जोड़ा, आंकड़े। आंकड़े जो तस्वीर बताते हैं वे कई बार सही नहीं होतीं। आंकड़े अपने आपमें अक्ल नहीं रखते, और उनका मतलब निकालना जिनको न आए, उनको झांसा देने के लिए आंकड़ों को तरह-तरह से पेश किया जा सकता है, किया जाता है। 
इन दिनों एक और झूठ चल रहा है जो कि आंकड़ों से बड़ा है और रफ्तार से किसी संक्रामक रोग की तरह फैलता है। यह है, इंटरनेट। जिन लोगों को इंटरनेट की अधिक समझ नहीं रहती, या दुनिया के मामलात की ही अधिक समझ नहीं रहती वे बहुत रफ्तार से डिजिटल झांसे में आ जाते हैं। किसी तस्वीर को देखकर वे तेजी से मान लेते हैं कि चूंकि दिख रहा है, इसलिए वह सही है। 
दिल को छू लेने वाली एक तस्वीर अभी कुछ दिनों से इंटरनेट पर दौरा कर रही है जिसके साथ की जानकारी में बताया गया है कि वह इराक के एक अनाथाश्रम की  है, और मां खो चुकी यह छोटी बच्ची वहां पर फर्श पर चॉक से मां बनाकर उसके भीतर सोई हुई है। अंतरराष्ट्रीय मदर्स डे के मौके पर यह तस्वीर लोगों को छूते हुए और तैरती रही। लेकिन एक मामूली तलाश ने बताया कि इसका इराक से कोई लेना-देना नहीं है, और यह तस्वीर किसी दूसरे देश में किसी दूसरे अभियान के लिए बनाई गई थी, पोस्टरों पर इसका इस्तेमाल हुआ था। 
यहां पर एक सवाल यह उठता है कि भावनाओं को छूने वाला ऐसा कोई काम जायज है, या नाजायज है? कुछ लोगों को लग सकता है, शायद अधिकतर लोगों को लग सकता है, कि एक नेक काम के लिए किसी तस्वीर के ऐसे इस्तेमाल में क्या खामी है? लेकिन आज एक गलत जानकारी को फैलाना जितना आसान है उतना ही आसान ऐसी गलत जानकारी को पकड़ लेना भी है। और नेक काम के लिए एक झूठ के इस्तेमाल का उजागर हो जाना भी महज वक्त की बात रहती है। जब ऐसा भांडा फूटता है, तो दिल को लगने वाली बाकी असली बातों, असली तस्वीरों पर से भी लोगों का भरोसा उठ जाता है। मतलब यह कि उससे पल भर को तो फायदा दिखता है, लेकिन लंबे समय का लंबा नुकसान भी उससे हो जाता है। 
कुछ और झूठ इंटरनेट पर तैर रहे हैं, इनमें से एक बलात्कार की गोली के बारे में है। पश्चिम के देशों में रेप-पिल नाम से कुख्यात एक दवा पर अब तरह-तरह की रोक लग रही है। ऐसी अनगिनत वारदातें हुईं जिनमें किसी लड़के या आदमी ने अपने साथ की लड़की या महिला को पीने की किसी चीज में यह गोली दे दी, और उसके बाद कई घंटों के लिए होश गायब होने पर उसके साथ बलात्कार किया। इसलिए आज पश्चिम में लड़कियों को इस बात के लिए भी सावधान किया जाता है कि वे अपने किसी दोस्त के लाकर दिए हुए गिलास को भी मंजूर करने के पहले चार बार सोच लें। 
अब इस रेप-पिल के बारे में खासे जानकार लोग भी यह जानकारी फैला रहे हैं कि एक बार इस गोली को ले लेने पर वह लड़की या महिला जिंदगी भर मां नहीं बन सकती। इस बात की जब जांच की तो पता लगा कि इस दवाई को बनाने वाली किसी भी कंपनी ने इसके असर के खाने में ऐसी कोई जानकारी नहीं लिखी है। और अधिक जांच करने पर पता लगा कि इस दवा का ऐसा कोई असर नहीं होता। इस दवा का जो असर होता है उससे सावधान रहना जरूरी है, और इस सावधानी को फैलाना भी जरूरी है, लेकिन जब इसकी एक बात झूठी साबित होगी, तो इसकी सही बातों पर से भी लोगों का भरोसा उठ जाएगा। 
यहां पर हिन्दी की एक बहुत मशहूर कहानी हार की जीत याद आती है। सुदर्शन की लिखी हुई इस कहानी में बाबा भारती नाम के एक आदमी का एक घोड़ा जब एक डकैत खड़क सिंह खरीदने को तैयार रहता है, लेकिन बाबा बेचने को तैयार नहीं रहते। बाद में वह एक बूढ़ा और बीमार बनकर रास्ते से गुजरते हुए बाबा भारती से मदद मांगता है, और रहम खाकर बाबा उसे गांव तक छोडऩे को तैयार हो जाते हैं। वे उसे घोड़े पर बिठाकर चलते हैं, और खड़क सिंह अचानक उस घोड़े को लेकर भाग जाता है। बाद में बाबा भारती उससे अपील करते हैं कि वह लूटने के इस तरीके के बारे में किसी को न बताए, वरना लोगों का भरोसा बूढ़े-बीमार, गरीबों पर से उठ जाएगा। यह बात खड़क सिंह को इतनी छूती है, कि वह बाद में आकर बाबा का घोड़ा बांधकर चले जाता है। 
किसी सच बात के उजागर होने पर कैसा-कैसा नुकसान हो सकता है, और किसी झूठ बात के उजागर होने पर कैसा-कैसा नुकसान हो सकता है, यह सोचने की बात है। खड़क सिंह का सच उजागर होता, तो भी जरूरतमंद लोगों की साख खराब हो जाती कि वे लुटेरे निकल सकते हैं। इसी तरह इंटरनेट पर बुराई के खिलाफ कोई भली बात लिखते हुए भी अगर कोई झूठ लिखा जाए, तो उससे जो सचमुच में अनाथ हैं, उनकी साख खराब हो जाती है, उनकी मदद से लोग हिचक सकते हैं। दवाईयों का जो खराब असर सचमुच होता है, वह भी भरोसा खो सकता है, और लोग वैसे असर को भी एक झूठा प्रचार मान सकते हैं। इसलिए अच्छी नीयत से, अच्छे मकसद से भी अगर झूठ के चक्के लगाकर कोई गाड़ी दौड़ाई जाती है, तो वह लंबा सफर नहीं कर पाती। उसके मुकाबले चार पैरों पर धीरे-धीरे चलने वाले जानवरों की पीठ पर सफर अधिक भरोसेमंद रहता है। 
इसीलिए गांधी हमेशा साध्य के साथ-साथ साधन की भी पवित्रता की बात करते थे और सच को लेकर उनकी जिद इतनी रहती थी कि वे किसी नेक मकसद के लिए भी सच को जरा सा भी छुपाना, या झूठ को जरा सा भी मिलाना बर्दाश्त नहीं करते थे। और उनकी वह सोच इस कदर वैज्ञानिक थी कि आज के इंटरनेट के जमाने में वह अपने आपको पूरी तरह सही साबित करने के अलावा जरूरी भी साबित करती है, क्योंकि अगर कहने वाले की, और बात की साख जरा भी डांवाडोल हुई, तो फिर वह पूरी की पूरी गड्ढे में जा गिरती है। 
इसलिए किसी बात को परखे बिना अगर आगे बढ़ाया जाता है, तो वह बात अपने सच हिस्सों की साख को भी खो बैठती है, और बात को आगे बढ़ाने वालों की साख को भी खत्म कर देती है।