एक दिन में जब हिंसा की इतनी खबरें आती हैं तो...

30 जून 2013
संपादकीय
कल का एक दिन ऐसा था जब कश्मीर से लेकर समंदर के किनारे तक दर्जनों शहरों से दिल दहला देने वाली छोटी-छोटी खबरें आईं। कहीं एक आदमी ने सरकारी मुआवजे के लिए अपनी बच्ची को मार डाला, तो कहीं किसी ने सौतेली बेटी को, कहीं जिंदा दफन की गई लड़की लोगों के निकालने के बाद अस्पताल में मर गई, तो कहीं तेरह बरस की गूंगी-बहरी बच्ची से सामूहिक बलात्कार हुआ। पूरा भारत मानो यह दिन एक ऐसी निजी हिंसा में गुजार रहा था जिसकी शिकार सिर्फ बच्चियां थीं। 
दो बातें भयानक हैं। एक तो यह कि हिंदुस्तान में लड़कियां मां के पेट से लेकर वृंदावन के विधवा आश्रमों तक कहीं भी बराबरी का हक नहीं रखतीं। बराबरी तो दूर वे किसी तरह का हक नहीं रखतीं, और मार डालने के लायक समझी जाती हैं। दूसरी बात यह कि ये सारे जुर्म इतने निजी हैं, कि पुलिस या सरकार इनको नहीं रोक सकतीं। नतीजा यह है कि ऐसी खबरें छापें या न छापें, इनसे लोगों को चौकन्ना होने का मौका मिलेगा, या उनके मन एक दहशत से भरेंगे, यह फैसला आसान नहीं रह जाता। ऐसी खबरों को पढ़-पढ़कर, और खासकर टीवी के परदों पर तस्वीरों और आवाज के साथ देखकर संवेदनशील या कमजोर मन के लोगों पर भयानक असर पड़ता है। और इस असर का कोई इलाज नहीं है। इस देश में मानसिक बीमारियों से तकलीफ पा रहे लोगों के इलाज के लिए ही मनोचिकित्सक या परामर्शदाता जरूरत के दस फीसदी भी नहीं हैं, ऐसे में बीमारियों से कम तनाव वाले दर्जे की तकलीफ पा रहे लोग भला कहां से मदद पाएंगे। दूसरा सवाल यह रहता है कि इन खबरों को कू्ररता और हिंसा के खुलासे के बिना भी अगर न छापा जाए, तो समाज के बाकी लोगों को ऐसी स्थितियों से सावधान होने का मौका कैसे मिलेगा? एक को लगी ठोकर से दूसरे लोग सजग हो सकते हैं। और यह दुविधा मीडिया के सामने उसी तरह बनी रहेगी, जिस तरह मां-बाप के सामने यह दुविधा रहती है कि अपने बच्चों को सेक्स की कितनी जानकारी किस उम्र में दें, दें या न दें, उन्हें कैसे सावधान रखें। 
दरअसल हिंदुस्तानी समाज बहुत किस्म की भड़ास के साथ जीता है। सेक्स को लेकर उसके जीवन में कई किस्म की कुंठाएं भरी हुई हैं। समाज वयस्क लोगों को किसी तरह की वयस्क जिंदगी देने के खिलाफ है, और कुछ महानगरों के कुछ चुनिंदा तबकों को छोड़ दें, और अपने हिसाब से जीने वाले कुछ आदिवासी तबकों को छोड़ दें, तो मध्यम वर्गीय और मंझले दर्जों के शहरों वाले लोगों के जीवन में समाज द्वारा थोपी गई रोक ही भरी हुई है। ऐसी भड़ास कहीं हिंसा की शक्ल में निकलती है, तो कहीं सेक्स-अपराधों की शक्ल में। और इसके साथ-साथ नौबत तब और अधिक खतरनाक हो जाती है जब आसपास कोई लड़की या महिला हो, दलित या आदिवासी हो, विकलांग या गरीब हो, जिसके कि हक कभी गिने ही नहीं जाते। भारत में थोड़ी सी ताकत वाले तबके या इंसान के मन में अपने से कमजोर इंसानों, जातियों, या जानवरों के लिए परले दर्जे की हिकारत भरी रहती है, और कानून का बहुत कमजोर अमल होने के कारण लोगों का हौसला ऐसे जुर्म के लिए बढ़ भी जाता है। ऐसे निजी अपराध रोक पाना पुलिस के लिए मुमकिन नहीं है, और इसके लिए भारत के लोगों के मन में  ही फेरबदल जरूरी है जो कि एक बहुत धीमा सामाजिक सिलसिला है और इसमें सदियां लग सकती हैं। फिलहाल एक दिन में जब हिंसा की इतनी वारदातें होती हैं, और इतनी खबरें आती हैं, तो लोगों को उसके बारे में सोचना भी चाहिए और अपनी अगली पीढ़ी को न्यायप्रियता सिखानी भी चाहिए।

शाहरूख के बहाने से

29 जून 2013
संपादकीय
भारत का मीडिया इन दिनों एक खबर में दिलचस्पी ले रहा है कि फिल्म कलाकार शाहरूख खान और उनकी पत्नी गौरी अपने तीसरे बच्चे के एक किराए की कोख के रास्ते ला रहे हैं। और जांच में इस बच्चे के लड़के या लड़की होने की खबरें चर्चा में आईं, तो किसी ने उनके खिलाफ भू्रण-लिंग परीक्षण करवाने की शिकायत भी कर दी। इस जोड़े के दो बड़े बच्चे पहले से हैं, और यह तीसरा बच्चा, या बच्ची इस तकनीक से वे पा रहे हैं। 
आज यहां पर इस जोड़े के बारे में लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, लेकिन भारत जैसे बहुत ही गैरबराबरी वाले समाज में जब बहुत जटिल और महंगी चिकित्सा सुविधा का इस्तेमाल बहुत ताकतवर लोग सरकारी या निजी पैसों से करते हैं, तो इसका एक मतलब यह भी होता है कि देश का चिकित्सा ढांचा ऐसे गिने-चुने लोगों पर खासा खर्च होता है। लोग खूबसूरती के लिए प्लास्टिक सर्जरी करवाते हैं, बदन की चर्बी कम करवाने के लिए कई किस्म के ऑपरेशन करवाते हैं, चेहरों के दाग हटवाते हैं, और जैसा कि इस मामले में हो रहा है, एक महंगी और लंबी मेडिकल तकनीक से वे ऐसे बच्चे पाते हैं। भारत की उदार अर्थव्यवस्था में हर किसी को अपनी मर्जी का खर्च करने की आजादी है। और इसमें खर्च करके मनचाही तकनीक से मनचाहे बच्चे पाने की आजादी भी है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि भारत, या बाकी दुनिया में भी, जहां भूख है, जहां बीमारी है, वहां पर सीमित खाना और सीमित इलाज कहां पर कितना इस्तेमाल हो रहा है? अमरीका में खाने के बाद बचे हुए अनाज से दैत्याकार निजी गाडिय़ों के लिए ईंधन बनाया जाता है, लोग अपने बदन के लिए बहुत किस्म की दवाईयां खाते हैं, जरूरत से अधिक खाकर, फिर जरूरत से अधिक बिजली जलाकर बदन को ठीक रखते हैं, और इसी वक्त दुनिया के बहुत से गरीब हिस्सों में लोग भूखे सोते हैं, उनके बच्चे कुपोषण से मर जाते हैं, और बिना बिजली अंधेरे में जीते हैं। 
दुनिया में धरती की दी हुई चीजों का ऐसा अनुपातहीन बंटवारा पूंजीवादी और उदारवादी अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है। एक तरफ भूख, बीमारी, और अंधेरा, दूसरी तरफ मोटापा, खूबसूरती के लिए इलाज, और चर्बी छांटने को एयरकंडीशन व्यायामशालाओं का इस्तेमाल। यह फासला एक गहरी और चौड़ी खाई की तरह पहले तो दुनिया के संपन्न देशों और गरीब देशों के बीच बढ़ता है, फिर अपने-अपने देश के भीतर संपन्न और विपन्न लोगों के बीच बढ़ता है। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राजनीतिक दलों और सरकारों में जनहित और जनकल्याण की अपनी जवाबदारी खत्म कर ली है, और इसके चलते अब ऐसे फासले घटने की कोई गुंजाइश नहीं है। दूसरी तरफ जहां कहीं ऐसा लगता है कि ऐसी असमानता के चलते हिंसक और हथियारबंद संघर्ष होंगे वहां पर सरकार और बाजार मिलकर पूंजीवाद की ऐसी फौज खड़ी कर लेते हैं कि जिनका मुकाबला हक न पाए हुए तबके प्रतीकात्मक हथियारबंद संघर्षों से कर भी नहीं पाते। 
भारत की बात करें तो यहां पर एक तरफ तो संपन्न तबका अपने किसी भी तरह के खर्च को, और अपनी कितनी भी खपत को अपना हक बताता है, और दूसरी तरफ जनता के पैसों पर पलने वाली सत्ता पर काबिज हो चुके लोग इसी पैसे से करोड़पतियों और अरबपतियों को टक्कर देने वाले खर्च करते हैं। यही वजह है कि सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की बदहाली है, सरकारी अस्पतालों में कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और जनता के पैसों से सत्ता हांकते लोग अपना इलाज महंगे से महंगे निजी अस्पतालों में करवाते हैं। शाहरूख खान तो अपनी कमाई से किसी भी तरह के अस्पताल की कितनी भी क्षमता का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन जब इसी टक्कर के खर्च इस देश में सत्ता अपने पर करती है, तो सरकारी अस्पतालों की मोहताज जनता पर रहम आता है। शाहरूख खान ने तीसरे बच्चे के लिए जैसी तकनीक का सहारा लिया, या लोग जिस तरह चर्बी और पेट छंटवाते हैं, वैसी तकनीक और चिकित्सा क्षमता से शायद बहुत से बच्चों के कटे हुए होंठ जुड़ सकते हैं, लोगों की दूसरी जानलेवा तकलीफें दूर हो सकती हैं। और ऐसे महंगे इलाज से बच्चा पाने के बजाय एक ऐसी समझ भी देश में विकसित की जा सकती है जिससे कि देश में बिना मां-बाप के रह गए बेसहारा बच्चों को गोद लेना भी हो सके। जब बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोग कोई काम करते हैं तो उसकी मिसाल बहुत से दूसरे लोगों के भी काम आती है। इसलिए लोगों के निजी जिंदगी के फैसलों से परे भी हमको यह लगता है कि एक सामाजिक सरोकार को आगे बढ़ाने का काम भी ऐसे मौकों पर शाहरूख खान जैसे लोग कर सकते थे, कर सकते हैं।

कमजोर की मदद, खुद की मदद

28 जून 2013
संपादकीय
उत्तराखंड त्रासदी पर लोग अलग-अलग तरीके से अपनी राय जाहिर कर रहे हंै। कोई इसके लिए  बिना सोचे-समझे किए गए विकास को दोष दे रहा है, तो कोई सरकार के ढीलेपन को, तो कोई किस्मत को। दर्दनाक कहानियां, मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने  में लगे दलों के सदस्यों की जांबाजी के किस्से, और कुछ नेताओं की हल्की राजनीति की खबरों के बीच, आज देश के एक प्रमुख अखबार की पहल पर  समाज की निचली पायदान पर रहते लोगों के लिए हमदर्दी दिखाने के लिए 'कम्पेशन डेÓ  से जुडऩे की अपील की जा रही है। एक ऐसे देश में जहां का दुनिया के अरबपतियों से भरा कार्पोरेट जगत देश की ऐतिहासिक आपदा के समय चुपचाप हाथ बांधे, मुंह सिले बैठा है, अखबार जनता से अपील कर रहा है कि वह अपने लिए छोटे-मोटे काम करने वालों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कोई कदम उठाए, उनका बैंक में खाता खुलवाए, उन्हें  अपना बीमा करवाने में मदद करे, उनकी डॉक्टरी जांच करवाए। अब जब  उत्तराखंड में कुदरत के कहर के शिकार लोगों की लाचारी का फायदा उठाकर दस बीस गुने ज्यादा दाम वसूलने, जीने की जद्दोजहद में अधमरे हो रहे लोगों को लूटने, उन्हें कत्ल करने, उनकी औरतों की इज्जत लूटने, और लाशों से रुपये-पैसे, गहने लूटने की खबरें देखकर मन खिन्न हो रहा है, तब  देश में कुछ अच्छा करने के लिए पहल करने, नेतागिरी दिखाने की यह अपील, बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है।
सबसे पहली बात  तो नेतागिरी दिखाने की ही है। नेतागिरी शब्द बरसों से बहुत नकारात्मक अर्थों में देखा जाता रहा है। 'नेतागिरी करनाÓ  समाज में अर्से से एक न करने जैसे काम के  रूप में देखा जाता है। पिछले कुछ बरसों से कारपोरेट जगत की दया से नेतागिरी शब्द को कुछ इज्जत मिली है, लेकिन घर में, स्कूल-कॉलेज में, दफ्तर में, अक्सर नेतागिरी को एक ना करने लायक काम के रूप में ही प्रचारित किया जाता है- जिससे बड़े पदों पर बैठे लोग नाराज होते हंै, अनुशासन खराब होता है, और इंसान अपने मकसद से भटक जाता है। अपने बच्चों में, छात्रों में  नेतागिरी के गुण पनपाने, उन्हें बढ़ावा देने की  सोची-समझी मेहनत घर या स्कूल में शायद ही कहीं होते दिखती है। समाजशास्त्री मानते हंै, ताकतवर तबके ने अपनी ताकत के लिए चुनौतियों की गुंजाईश खत्म करने के लिए ऐसा माहौल खड़ा किया हुआ है। शायद यह बहुत हद तक सच भी हो, लेकिन यह गौर करने लायक बात है कि क्या हमारे किसी मातहत में एक नेता के गुण पनप जाना इतना डरावना है, कि उसे सोच-समझकर, चालें चलकर ऐसा करने से रोका जाए?  ऐसा करने के फायदे कितने हैं और ऐसा करने का नुकसान किसे सबसे ज्यादा है?
अगर घर के बच्चों में नेतागिरी के गुणों को बढ़ावा दिया जाए, तो उनमें फैसले लेने की कूबत बढ़ेगी। ऐसा करने पर वह अपने अच्छे-बुरे, फायदे-नुकसान के बारे में सोचना शुरू करेंगे। शायद इसके कुछ खतरे हो सकते हों, लेकिन उन पर लगातार नजर रखकर उन्हें बचाया जा सकता है। उन्हें सही दिशा दी जा सकती है। बात-बात पर उनकी तरफ से फैसला लेने की जहमत से माता-पिता, बड़ों को निजात मिल सकती है, और जिंदगीभर उनकी जिम्मेदारी ढोने से वह बच भी सकते हैं। सही, संतुलित और जिम्मेदार सोच के साथ बड़े हुए बच्चे, फैसला लेने के नाकाबिल, अपनी खुद की किसी सोच के बगैर, जिम्मेदारी उठाने की आदत के बिना बड़े हुए बच्चों के मुकाबले अपने और परिवार दोनों के भविष्य के लिए बेहतर हैं। यही बात मातहतों और  उनके ऊपरी अधिकारियों के बारे में कही जा सकती है। इस पूरे काम में बस थोड़ी निगरानी , समूची ईमानदारी और पारदर्शिता की जरूरत होती है, लेकिन हम देखते हंै कि ईमानदारी, जिम्मेदारी और पारदर्शिता ही वे बातें हंै जिनसे आज हर कोई मुंह चुराना चाहता है, लेकिन यह एक अलग बहस का मुद्दा है, आज बात नेतागिरी की हो रही है।  
उत्तराखंड की त्रासदी में हजारों यात्री फंसे, लेकिन अपना दुख भूलकर दूसरों की मदद करने वाली नंदिनी जैसे गिने चुने ही थे। ऐसा इसलिए है कि दूसरों की मदद करने को, किसी मामले में पहल करने को ऐसा गुण मान लिया गया है, जो हर एक में नहीं हो सकता, जिसके लिए बहुत हौसले, बड़ी दौलत, जमा पूंजी, रसूख की जरूरत है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है।  सन् 90 के दशक में जब सरकार के गरीबी दूर करने के कार्यक्रमों के समीक्षा की गई, तो उसमें से एक बात यह भी निकली कि जरूरतमंदों को दरअसल जो चाहिए, वह सब्सिडी, रियायत, मुफ्त सरकारी मदद नहीं, बल्कि फैसला करने का अधिकार, उसकी काबीलियत है, जिसके अभाव में वह किसी मदद के सहारे भी गरीबी से उबर नहीं सकते, क्योंकि गरीबी दूसरी बातों के अलावा जिंदगी में लिए गए उनके गलत फैसलों के कारण भी काफी हद तक है। इसके बाद देश भर में समाजसेवी संस्थाओं ने गरीबों में, खासकर औरतों में फैसला लेने की काबीलियत पैदा करने के लिए कोशिशें शुरू कीं, जिसके लिए उनमें नेतृत्व के गुणों को बढ़ावा देने की कोशिशें हुर्इं, जिनके बहुत अच्छे नतीजे देखे गए। जो नेता, अफसर  प्रजा में नेतागिरी पनपने से खौफ खाते थे, उन्होंने देखा कि नेतगिरी के गुणों से लैस उनकी प्रजा, उनके मतदाता सरकारी योजनाओं का बेहतर लाभ उठाते हंै और इससे उनकी कामयाबी दिखती है, उनका मताधार मजबूत होता है। यह इन कोशिशों का ही एक दूरगामी नतीजा है कि हम देखते हंै कि आज राजनीति में  विकास का मुद्दा इतना अहम हो चुका है, हालांकि इसमें नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि मोदी उस गुजरात राज्य के नेता हंै जहां मजदूर आंदोलनों और समाजसेवी संगठनों का, सहकारिता का पुराना इतिहास रहा है। मोदी के प्रतिद्वन्द्वियों के यह दावे गलत नहीं हंै कि उन्हें पहले से विकास के रास्ते पर चल रहा राज्य मिला है, इसमें गुजराती जनता में अर्से से  बढ़ावा पा रहे नेतृत्व के गुण का भी योगदान है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।
बात वापस अगर अपने आसपास के निचले तबके या कमजोर लोगों को मजबूत बनाने की पहल पर लाएं, तो हम देखेंगे कि हमारे लिए  काम करने वालों में, आर्थिक और सेहत की दृष्टि से मजबूत व्यक्ति, इस लिहाज से कमज़ोर व्यक्ति के मुकाबले हमारे लिए कहीं बेहतर है। उसकी मजबूती से असुरक्षा महसूस किए बिना उसे मजबूत बनाने में, उसकी तरक्की में भागीदारी निभाने में हमें एक अच्छा काम करने का संतोष तो मिलता ही है, हम अपना आनेवाला वक्त भी  सुधार रहे होते हंै। नेतागिरी का बीड़ा उठाने के लिए देश के लोगों से अपील कर रहा अखबार 28 जून को कम्पेशन डे, यानि करुणा या दया दिवस के रूप में मनाने की अपील कर रहा है; लेकिन गौर से देखें तो अपने लिए काम करने वाले को मजबूत बनाकर हम कोई दया , करुणा नहीं दिखाते। विकास के रास्ते पर यह एक शुद्ध लेनदेन है, जिससे उन्हें कुछ आज नजर आने वाले फायदे मिल रहे हंै और हमें  दिली खुशी, समाज में इज़्जत जैसे मानसिक-सामाजिक फायदों के साथ आने वाले दिनों में अपने लिए बेहतर काम करने वाले भी मिल रहे हैं। इस सोच को घर से लेकर दफ्तर और सामाजिक दायरे तक सब कही फैलाने में सबसे ज्यादा हमारा ही फायदा है। हर बात को नफे-नुकसान के तराजू में तौलना ठीक नहीं, लेकिन व्यवहारिकता के लिहाज से सोचकर किया गया काम ही टिकाऊ होता है। और व्यवहारिकता का तकाजा यही है कि हम अपने घर, दफ्तर, समाज में कमजोरों को मजबूत करें। इसके लिए जरूरी नेतागिरी के गुण खुद में, अपने बच्चों में दूसरों में विकसित करें। अपने स्वार्थ  और डर से उबरकर अगर हम यह कर सकें, तो आने वाले समय में खुद पर हम, और हम पर हमारा समाज फख्र कर सकेगा।


आस्था से सवाल का मौका

संपादकीय
27 जून 2013
केदारनाथ में फंसे तीर्थयात्रियों को बचाने के लिए सबसे पहले वहां पहुंचने वाले बचाव दल के लोग ही मारे गए। भारतीय वायुसेना के हेलिकॉप्टर में वहां पहुंचे वायुसैनिक, आईटी बीपी के जवान और एनडीआरएफ के जवान हफ्ते भर चौबीसों घंटे वहां लगे रहे, घायलों को बचाते रहे, लाशों के आस-पास सोते रहे। मंदिर से लाशें हटाईं और कीचड़ साफ किया। इस टीम ने शायद सबसे अधिक बीस हजार लोगों को बचाने में हिस्सा बंटाया। और केदारनाथ से बचाव पूरा हो जाने पर इसे लौटने की छुट्टी मिली। लौटते हुए हेलिकॉप्टर दुर्घटना में ये सारे लोग खत्म हो गए।
आज यह मुद्दा और यह मौका यह सोचने का है कि यह दुनिया जिस ईश्वर की बनाई बताई जाती है, जिसका पत्ता भी उसकी मर्जी के खिलाफ नहीं हिलता, उसका हकीकत में दुनिया में क्या दखल है? यह सोचना और समझना जरूरी इसलिए है क्योंकि दुनिया आस्थावानों, आस्तिकों से भरी हुई है और वे अपने तन-मन के बाहर भी इस आस्था को दूसरों पर भारी इस्तेमाल करते हैं। ईश्वर की धारणा और उस पर आस्था लोगों को पिछले जन्म और अगले जन्म से जोड़ती है, स्वर्ग और नर्क बताती है, पाप और पुण्य की फेहरिस्त टांगे रखती है। नतीजा यह होता है कि भारत जैसे देश में शायद तीन-चौथाई आबादी ईश्वर की किसी-न-किसी धारणा के साथ जाती है। यह सोच लोगों को कई किस्म के लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण संघर्षों से रोकती है। धर्म की आड़ में बड़े-बड़े मुजरिम दानदाता कहे जाते हैं और धर्मगुरूओं के इर्द-गिर्द मुजरिमों का जमावड़ा रहता है। प्रायश्चित की सहूलियत धर्म उपलब्ध कराता है, और ईश्वर के नाम को धर्म ही चलाता है, पापियों को भी।
ऐसे में आज यह तो सोचें कि कीचड़ में डूबी ईश्वर की प्रतिमा को साफ करने से लेकर उसके दसियों हजार भक्तों को बचाने तक के काम के हफ्ते भर तक रात-दिन करने वालों को ऐसी मौत इस ईश्वर ने क्यों दी? क्या इसका कोई जवाब आस्थावानों के पास हो सकता है? जो हजारों लोग इस तीर्थ को आते-जाते मर गए या लापता हैं, उनको सक्रिय-आस्थावान होने के बाद भी क्यों ऐसी सजा पा रहे हैं? सिर्फ बद्री-केदार नहीं, हज जाने वाले भी भगदड़ में एक बार में सैकड़ों, कई-कई बार मारे जा चुके हैं। ऐसे भी ईश्वर की दखल कहा जाता है? और अगर उसकी कोई दखल है ही नहीं, तो फिर, उसका नाम लेकर दुनिया की जिंदगी में इतनी बड़ी और इतनी हिंसक दखल क्यों दी जाती है? वैटिकन को एक देश का दर्ज क्यों दिया जाता है? धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने के नाम पर सजा क्यों दी जाती है? ईशनिंदा पर मौत की सजा का इंतजाम क्यों है? क्यों एक धर्म की धारणा और मान्यता दूसरे धर्म का खून रात-दिन बहाती हैं?
ऐसे अनगिनत सवालों के किसी जवाब के बिना लोकतंत्र के कानून में भी धर्मों को, उनकी मान्यताओं को दूसरों के बुनियादी हकों ऊपर दर्जा मिलता है। धर्म लोगों की जिंदगी को रौंदते हुए अपनी मान्यताओं से हत्याएं करते हैं, और उनके ईश्वर उसी तरह चुपचाप सब देखते रहते हैं जैसा कि अभी उत्तराखंड की पहाडिय़ों के ऊपर का ईश्वर देखता रहा। दरअसल ईश्वर को लेकर हमारे मन में कोई दुविधा नहीं है। समाज के ताकतवर लोगों ने कमजोर तबकों का शोषण करने के लिए, उन पर राज करने के लिए, ईश्वर और धर्म की धारणा खड़ी की, और फिर उसे हर दौर के शासक अपनी सहूलियत के लिए इस्तेमाल करते रहे। ईश्वर की इस धारणा ने कमजोर लोगों को इस जन्म में अपनी तकलीफों के लिए, उनके साथ होती आर्थिक-सामाजिक बेइंसाफी के लिए, पिछले जन्म में किए पापों पर निर्भर रहने को मजबूर कर दिया। और मजा यह रहा कि इस मजबूरी का आस्तिक लोग मजा भी लेते हैं। 
आस्था लोगों के मन के भीतर रहती तो भी कोई दिक्कत नहीं हुई होती। इस दुनिया का इतिहास बताता है कि तमाम जंग मिलकर भी जितने कत्ल नहीं कर पाईं, उससे अधिक कत्ल धर्म ने करवाए हैं। समाज में ईश्वर की धारणा की हकीकत समझने की जरूरत है। आस्थावान लोग इस तबाही और इन मौतों पर सोचें, और फिर अपनी जिंदगी के सड़क-पुल खुद बनाएं। 

जनता के दिल-दिमाग के लिए 4-जी का इस्तेमाल

संपादकीय
26 जून 2013
टेलीफोन और इंटरनेट और तेज होने जा रहे हैं। हिंदुस्तान में 4-जी रफ्तार से अब दो घंटे लंबी एक फिल्म का सबसे ऊंची क्वालिटी वाला, हाई डेफिनेशन प्रिंट भी 4-5 मिनटों में घर बैठे डाऊनलोड ले जाएंगे। टेक्नालॉजी जब लोगों के लिए ऐसी सहूलियतें लाती है, तो उनसे जुड़े हुए कुछ पहलुओं पर भी सबको सोचने की जरूरत रहती है।
जब फिल्में, खेलों के मैच, कॉमेडी शो, टीवी सीरियल, संगीत मिनटों में डाऊनलोड किए जा सकेंगे, उनकी क्वालिटी भी बहुत उम्दा होगी, उनको फोन, टेबलेट, कम्प्यूटर या टीवी पर, कहीं पर भी देखा जा सकेगा, तब एक सवाल यह उठेगा कि लोगों को लुभाने वाले कार्यक्रमों के मुकाबिले बेहतर पसंद वाले कार्यक्रम कैसे लोगों तक पहुंच पाएंगे? सामाजिक सरोकार की बातें, गंभीर मुद्दे, दिल-दिमाग के लिए बेहतर कार्यक्रम इस सुनामी के बीच जगह कैसे बना पाएंगे?
कहने को तो आज भी हिंदुस्तान को यह आजादी है कि यहां लोग रात-दिन सास-बहू सीरियलों की दुष्टता देख सकते हैं। और आज भी चौबीसों घंटे, किसी भी समझदारी से पूरी तरह आजाद रहने की आजादी है। लेकिन सस्ती होती, तेज रफ्तार होती नई तकनीक से अब लोगों का सरोकार-समझदारी से नाता और दूर तक टूट जाएगा। ऐसे में समाज के जिम्मेदार तबकों और सरकार को मिलकर यह सोचना चाहिए कि इस सैलाब के बीच समझदारी को सांस कैसे दी जा सकती है। इसके लिए भारत सरकार को ऐसा एक छोटा विभाग बनाना चाहिए जो देश और दुनिया की बेहतर ऑडियो-वीजुअल सामग्री को जुटाकर उसे मुफ्त डाऊनलोड के लिए रखे। इसके लिए सरकार देश भर में ऐसे मुफ्त और तेज रफ्तार सूचना केन्द्र खोल सकती है जहां बैठकर लोग गांधी-नेहरू के भाषणों से लेकर केरल पर्यटन तक की फिल्मों को मुफ्त डाऊनलोड कर सकें। बहुत से लोगों को यह खुली बाजार-व्यवस्था में सरकारी दखल की बात लगेगी, लेकिन जनहित के सरोकारों के लिए सरकारों हमेशा ही बाजार से परे के काम करती ही हैं। बाजारू डाऊनलोड के मुकाबले अगर सरकारें लाइब्रेरियों की तरह की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करेंगी, तो शायद लोगों में से कुछ लोग समझदारी और सरोकार का भी कुछ देख पाएंगे, सुन पाएंगे। ऐसा न होने पर तो लोग बाजारू सुनामी में डूब ही चुके हैं। 
भारत सरकार को एक तरफ तो महान उपन्यासों और किताबों से लेकर ऐतिहासिक दस्तावेजों तक को एक राष्ट्रीय डिजिटल संग्रहालय बनाकर उसमें जोड़ते जाना चाहिए, दूसरी तरफ सूचना केन्द्रों में तेज रफ्तार 4-जी इंटरनेट को मुफ्त में लोगों को देकर उसकी पहुंच को सिर्फ इस संग्रहालय तक सीमित कर देना चाहिए, या उसमें सरकार की वेबसाइटों तक पहुंचने की छूट रहे। ऐसा होने पर बेहतर सामग्री तक लोगों की पहुंच बन पाएगी और उसका इस्तेमाल भी होगा। ऐसी सहूलियत मौजूद लाइब्रेरियों में भी जुटाई जा सकती है, जहां कुछ कम्प्यूटर भी रहें और लोग अपने लैपटॉप-फोन पर भी डाऊनलोड कर सकें। 
इंटरनेट की यह नई रफ्तार, देश की संस्कृति को, ज्ञान को लोगों तक पहुंचाने की एक नई संभावना लेकर भी आई है। केन्द्र सरकार को इसके बारे में तुरंत सोचना चाहिए। यह सबसे कम खर्च में जनता के दिल-दिमाग को सेहतमंद खुराक देने का काम होगा।

मोदी के रथ के चक्के में शिवसेना ने डाला डंडा

संपादकीय
25 जून 2013
किसी अच्छे और बुरे मौके पर लोगों की भावनाएं उफान पर रहती हैं। और ऐसे में जरा-जरा सी बातों को लोग बढ़ा-चढ़ाकर लेते हैं, या कहते हैं। आज सुबह टाईम्स ऑफ इंडिया की एक खबर को लेकर भारत के उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष लोग उबले हुए हैं। उत्तराखंड में बचाव में लगे हुए भारतीय वायुसेना के एक मुस्लिम पायलट पर बनाई गई खबर के आखिर में इस अखबार के रिपोर्टर ने उससे पूछा कि उसे हिन्दू तीर्थयात्रियों को बचाते हुए कैसा लगा? इस बात को सेना के एक बचाव अभियान के बीच धार्मिक रंग देने का आरोप लगाते हुए बहुत से लोगों ने अखबार की खूब आलोचना की है। और इस खबर में पायलट का यह जवाब भी छपा है कि जिस दिन उसने भारतीय सेना में काम शुरू किया उस दिन से उसका सिर्फ एक ही धर्म है- हिन्दुस्तानी। 
उत्तराखंड में बचाव का मौका दो-तीन अलग-अलग बातों को सामने ला रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राष्ट्रीय-राज्याभिषेक अभियान के तहत उत्तराखंड जाकर वहां से गुजरातियों को निकालकर लाने की बात जितने आक्रामक तरीके से की, और जिस तरह से शाही गाडिय़ों के काफिलों और हवाई जहाजों से गुजरातियों को वहां से निकालने की खबरें आईं, मानो वे काफी नहीं थीं, और इसलिए नरेन्द्र मोदी ने केदारनाथ मंदिर के आधुनिक पुनर्निर्माण का जिम्मा गुजरात की तरफ से उठाने का प्रस्ताव रखा। उनके इस रूख पर कांग्रेस या किसी दूसरे विरोधी ने कुछ कहा इसके पहले ही एनडीए की एक सबसे पुरानी भागीदार, खालिस हिन्दूवादी, आक्रामक क्षेत्रीयतावादी शिवसेना ने अपने अखबार में संपादकीय लिखकर मोदी को जी भरकर कोसा है, और कहा है कि गुजरात पूरा हिन्दुस्तान नहीं है। इतना तगड़ा हमला मोदी पर एनडीए के भीतर से होने की उम्मीद किसी को नहीं थी, लेकिन इस मौके पर लोगों को एक राष्ट्रीयता की जरूरत को समझना चाहिए, और यह समझना चाहिए कि किस तरह प्रांत या क्षेत्र से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत होती है, और ऐसे अभियान में लगे सैनिक के धर्म को लेकर खबर बनाने से बचने की कैसे जरूरत होती है। 
आज भारत में दो दर्जन से अधिक राज्य हैं। और उत्तराखंड में मुसीबत के इस मौके पर अगर इनमें से हर राज्य के मुखिया वहां जाकर हवाई दौरे करने लगेंगे, अपने-अपने लोगों के लिए अलग-अलग हेलिकॉप्टरों और हवाई जहाजों का इंतजाम करने लगेंगे, अलग-अलग कारों के काफिले चलाने लगेंगे, तो इस देश में मरते दम तोड़ते लोगों के बीच इस तरह का क्षेत्रीय भेदभाव देश की एकता की भावना को उतना ही जख्मी कर देगा जितना कि उत्तराखंड आज है। इस मौके पर राज्यों को, पार्टियों को, मुख्यमंत्रियों को, और नेताओं को सस्ती और लुभावनी बातों से बचना चाहिए। जहां पर उस राज्य के बचे खुचे ढांचे के भीतर भारतीय वायुसेना रात-दिन काम पर लगी हुई है, वहां पर किसी हवाई-बचाव क्षमता की कमी नहीं है कि गुजरात के मुख्यमंत्री बयालीस हेलिकॉप्टर भेजने का प्रस्ताव रखें। यह एक तरह से भारत की वायुसेना की क्षमता और उसकी गंभीरता का मुंह चिढ़ाना है, और दूसरी तरफ उत्तराखंड और देश पर राज कर रही कांग्रेस पार्टी को नीचा दिखाना है। हर प्रदेश के हेलिकॉप्टर अगर तबाह हो चुके उत्तराखंड में घूम-घूमकर वहां पहाड़ों पर फंसे, भूखे-प्यासे मरते हुए लोगों की भीड़ के बीच से अपने प्रदेश के लोगों को छांट-छांटकर उठाकर लेकर आएंगे, तो यह बात बहुत ही खराब होगी। मोदी को अगर उत्तराखंड के पुनर्वास में हाथ बंटाने में इतनी ही दिलचस्पी है तो उनको पहले दिन भी दो करोड़ के बजाय दो सौ करोड़ की मदद की घोषणा करनी थी। गुजरात को वे देश का सबसे संपन्न राज्य बताते हैं, और उसके बजट की एक या दो मिनट की कमाई ही दो करोड़ रूपए है, और उतनी ही मोदी ने भेजने की घोषणा की थी। 
यह बात जाहिर है कि उत्तराखंड को आने वाले दिनों में बहुत किस्म की मदद लगेगी, और आज भी बचाव और राहत में बहुत किस्म की मदद की जरूरत है। नरेन्द्र मोदी को चाहिए कि अगर वे कोई ठोस मदद करना चाहते हैं, तो धर्म, जाति, और प्रांतीयता के भेदभाव के बिना गुजरात प्रदेश की कमाई का एक दिन उत्तराखंड को समर्पित करें, बिना किसी शर्त के, और बिना ऐसी नासमझी की बात किए कि वे केदारनाथ मंदिर के आधुनिक निर्माण का जिम्मा लेना चाहते हैं। केदारनाथ का प्राचीन मंदिर भारत सरकार ने पुरातत्व विभाग के माध्यम से दुबारा खड़ा करवाने की घोषणा की है, और वही उस मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के साथ न्याय होगा, न कि उस मंदिर का आधुनिक पुनर्निर्माण करना। यह मौका राजनीतिक वार करने का नहीं है, जिस राज्य को ऐसा करना हो, वे अपने घर बैठें, और अपने प्रदेश के लोगों को बच जाने के बाद उत्तराखंड की राजधानी से अपने प्रदेश ले जाने का इंतजाम करें। उत्तराखंड आज मोटे तौर पर भारतीय वायुसेना, भारतीय सेना, और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों की मदद से बचाव-राहत में लगा हुआ है, और ऐसे कोई संकेत नहीं है कि ये सब वहां पर कोई लापरवाही बरत रहे हैं। ऐसे में शिवसेना की उठाई बातों को हम सही मानते हैं, और यह बात चूंकि भाजपा की सबसे पुरानी साथी, और एनडीए की भागीदार की तरफ से आई है, इसलिए इसका वजन बहुत अधिक है। मोदी को अपनी शोहरत के रथ की रफ्तार थोड़ी कम रखनी चाहिए, और सिर्फ गुजरात को पूरा देश नहीं मानना चाहिए। 

राहत और बचाव के बाद उससे बड़ी चुनौती सामने

संपादकीय
24 जून 2013
उत्तराखंड पर आई मुसीबत से लोगों का उबरना धीरे-धीरे जारी है लेकिन ये लोग राज्य के बाहर के हैं। तीर्थयात्री और सैलानी, वहां से लौटकर अपने-अपने घरों को पहुंच जा रहे हैं, और उनके घरवाले, उनकी राज्य सरकारें, उत्तराखंड की सरकार, और केन्द्र सरकार सभी राहत की सांस ले रहे हैं। लेकिन अगले हफ्ते-दो हफ्ते के बाद जब वहां पर जिंदा फंसे आखिरी सैलानी-तीर्थयात्री को निकाल लिया जाएगा, तब लाख रूपए का यह सवाल खड़ा होगा कि वह राज्य किस तरह अब अपने पैरों पर खड़ा हो? कुदरत की तबाही से एक करोड़ आबादी वाला यह पहाड़ी राज्य पूरी तरह तबाह हो चुका है। आने वाले कई बरस तक वहां पर हो सकता है कि तीर्थयात्री पहले जितने न पहुंचें, सैलानी कम हो जाएं, और राज्य को खतरनाक मानकर लोग दूसरी जगह घूमने जाएं। ऐसे में आबादी से ढाई गुना पर्यटकों वाला यह राज्य अभी अर्थव्यवस्था को कैसे आगे बढ़ाएगा? 
यह सवाल अधिक अहमियत इसलिए रखता है कि तेरह बरस पहले छत्तीसगढ़ और झारखंड के साथ यह भी एक नया राज्य बना था। उस वक्त से छत्तीसगढ़ तो लगातार तरक्की करते चला गया, झारखंड राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार में डूब गया, और उत्तराखंड अपनी बहुत सीमित संभावनाओं के बीच राजनीतिक अस्थिरता को भी झेलता रहा, और हर बात के लिए दिल्ली की तरफ देखना उसकी मजबूरी भी रही। कमजोर अर्थव्यवस्था के साथ बना यह राज्य आज बहुत खराब हालत में इसलिए है कि इसके लाखों परिवार अपना घर-बार खो चुके हैं, या कारोबार खो चुके हैं, या पर्यटकों और तीर्थयात्रियों पर टिका हुआ रोजगार खो चुके हैं। ऐसे में जब तक राज्य का एक नया मजबूत और भरोसेमंद ढांचा खड़ा नहीं होता है, यहां के लोग भूखे मरने की नौबत में रहेंगे, और आज से महीने-पन्द्रह दिन बाद लोग यहां के लोगों को भूल भी जाएंगे। आज भला किसको याद है कि गुजरात के भुज में आए भूकंप के बाद बेघर हुए लोगों का वहां पर क्या हाल है? लोगों की याददाश्त श्मशान वैराग्य की तरह रहती है जो कि घर पहुंचकर नहाने के साथ ही धुल जाती है। 
लेकिन यह मौका केन्द्र सरकार और उत्तराखंड सरकार इन दोनों के लिए एक संभावना लेकर भी आया है कि ऐसे हादसों के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण के दुनिया के विशेषज्ञों की मदद लेकर इस राज्य के लिए एक ऐसा ढांचा खड़ा किया जाए जो कि यहां की नाजुक भौगोलिक स्थिति, और प्राकृतिक खतरों को झेलने के लायक हो। किसी भी नई इमारत को एक खाली जगह पर बनाना अधिक आसान होता है और उसे अधिक मजबूत भी बनाया जा सकता है। तबाह हो चुका उत्तराखंड का ढांचा ऐसे नए और मजबूत निर्माण का एक मौका भी देश को दे रहा है। दूसरी जरूरी बात यह कि जो लोग उत्तराखंड के तीर्थ स्थानों पर जाते-आते हैं, उनको भी अपनी आस्था का सम्मान करते हुए इस राज्य के पुनर्निर्माण में खुलकर मदद करनी चाहिए, वरना उनकी आस्था की कोई कीमत नहीं रहेगी। देश के बाकी राज्यों को, देश के उद्योगों को चाहिए कि अपने एक दिन की कमाई वे इस राज्य के पुनर्निर्माण के लिए भेजें, क्योंकि यह राज्य पूरे देश के लोगों की मेजबानी करते आया है। छत्तीसगढ़ को भी इस काम में अधिक हिस्सा बंटाना चाहिए क्योंकि यह उसके साथ ही अस्तित्व में आया हुआ राज्य था, और यहां के लोग बड़ी संख्या में तीर्थ और पर्यटन के लिए वहां जाते हैं।
जब तक यहां पर ढांचा खड़ा हो, तब तक के लिए यहां की आबादी को रोजगार देना भी जरूरी होगा, और इसके लिए केन्द्र सरकार को तुरंत ऐसी योजनाएं बनानी पड़ेंगी जिनसे लाखों लोगों को काम मिल सके, और दसियों लाख पेट भर सकें। यह काम राहत और बचाव से अधिक चुनौती भरा होगा।  

हिकारत, हमदर्दी, और हीरो

24 जून 2013
उत्तराखंड की तबाही में जिन लोगों को सरकार की छोटी-छोटी खामियां बड़ी-बड़ी दिख रही हैं, उनमें मीडिया के लोग अधिक हैं, और कांगे्रस विरोधी लोग अधिक हैं। इसी कांगे्रस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के मातहत आने वाली सेना ने जिस तरह से रोज पांच-पांच, दस-दस हजार लोगों को हेलिकॉप्टरों से वहां से निकाला है वह भी देखने लायक है। और जाहिर है कि इस काम में राज्य सरकार की भी कुछ न कुछ हिस्सेदारी रही होगी। लेकिन इन दोनों में से किसी सरकार के कामकाज को लेकर कोई सफाई देना या उनका बचाव करना हमारी दिलचस्पी का आखिरी काम होगा। आज इस बात का मुद्दा कुछ और ही है।
भारत की सेना के कामकाज को टीवी की खबरों में देख-देखकर लोग उसकी तारीफ करने में डूबे हुए हैं। रात-दिन फौजी वर्दियां दिख रही हैं, और कहीं सैनिक बूढ़ों को गोद में उठाकर नदी पा कर रहे हैं, तो कहीं बच्चों को कंधों पर चढ़ाए हुए। कुल मिलाकर आज का माहौल ऐसा है कि आस्थावानों का ईश्वर जिस तबाही को रोक नहीं पाया, उस तबाही से लोगों को भारत की सेना बचा रही है। यह एक अच्छी बात है कि आज देश में लोगों को कोई एक ऐसा तबका मिल रहा है जिस पर जनता का भरोसा बन रहा है, और जनता के मन में उसके लिए इज्जत बनी हुई है, बढ़ रही है। 
यह देश पूजा पर भरोसा करने वाला है। यही वजह है कि केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे तीर्थों में, और वहां आते-जाते हुए पहाड़ी रास्तों पर दसियों हजार लोग इस तरह फंसे हैं। अगर सिर्फ सैलानी होते तो वे इतनी मुश्किल जगह पर गए ही क्यों होते, वे इससे कम मेहनत पर बद्री-केदार के मुकाबले किसी दूसरी जगह पहुंच जाते। ऐसे पूजावादी देश में लोगों की पूजा में भी जुट जाते हैं, एक वक्त वे गांधी-नेहरू, फिर जयप्रकाश नारायण, फिर वीपी सिंह, फिर अन्ना-बाबा, केजरीवाल, ऐसे कई लोगों की पूजा अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग वक्त के लिए, अलग-अलग श्रद्धा-भक्ति से लोग करते दिखते हैं। आज लोग भारतीय सेनाओं को एक राष्ट्रीय गौरव के लायक पा रहे हैं। यह एक अच्छी बात है कि चारों तरफ से बुरी खबरों वाले देश में लोगों को कुछ अच्छा भी मिले, कुछ अच्छा भी लगे।
मेरे दिमाग में कल से जो बात घूम रही है वह यह कि देश के आधा दर्जन राज्यों में नक्सल मोर्चों पर जो पुलिस और सीआरपीएफ जैसे अर्धसैनिक बलों के जवान लगे हुए हैं, और दस-दस बरसों से तैनात हैं, जो लगातार वहां पर थोक में जान खो रहे हैं, क्या उनके बारे में देश को कभी इस किस्म के गौरव की सूझी? ये सारे वर्दीधारी-बंदूकधारी लोग इन मोर्चों पर अपनी पसंद से नहीं गए हैं। अपने घरवालों को छोड़कर किसी को भी बारूदी-सुरंगों के धमाकों में अपने बदन के टुकड़े करवाना नहीं सुहाता, न ही लोगों को नक्सलियों की गोलियां अपनी छाती के भीतर गुदगुदी करते लगतीं, न ही पुलिस-सीआरपीएफ मानसिक बीमारी की शिकार हैं कि उनको जाकर नक्सलियों को मारने में मजा आता है, न ही ये लोग इस कल्पना का मजा लेते होंगे कि जब गले कटे हुए, आंखें बाहर निकली हुईं उनकी लाशें घर पहुंचेंगी तो घरवालों को कैसा लगेगा।
छत्तीसगढ़
एक बहुत ही मुश्किल मोर्चे पर लाख या लाखों जवानों की तैनाती के बरस-दर-बरस गुजरते जा रहे हैं, रात-दिन सिर पर जान का खतरा सवार रहता है, हर कदम धमाके की आशंका रहती है, और इनमें से कोई भी तभी खबरों में आता है जब वह या तो किसी को मार देने के आरोप से घिरा होता है, या फिर खुद मर चुका होता है। लेकिन इस पूरे मोर्चे पर डेढ़ दशक गुजर जाने के बाद भी इनमें से किसी को हीरो का वह दर्जा नहीं मिला जो कि पिछले एक हफ्ते में उत्तराखंड में फौजियों को मिला है। कुछ वर्दियों की की हुई ज्यादती जब खबरों में आती है तो देश ऐसी तमाम वर्दियों को हिकारत से देखता है। लेकिन जब इनकी जानें थोक में जाती हैं, तो कोई हमदर्दी हफ्ते भर बाद भी नहीं बची रहती।
अब चूंकि दोनों ही इसी देश के लोग हैं, दोनों ही वर्दीधारी हैं, इसलिए इन दोनों की तुलना यहां पर इस खास पहलू को लेकर की जानी चाहिए कि इनके योगदान क्या हैं और उनको लेकर इनको कैसी इज्जत मिलती है, मिल रही है।
सेना के जो लोग उत्तराखंड में बचाव में लगे हैं, उन पर मोटे तौर पर जान का कोई खतरा टंगा हुआ नहीं है। वे ऐसे मुश्किल काम को करने के आदी भी हैं, और दुश्मन मोर्चे पर लड़ाई की तैयारी करते हुए वे कई-कई दिनों तक ऐसे मुश्किल हालात में जीते भी हैं। देश की सरहदों पर वे बर्फीली पहाडिय़ों पर महीनों गुजारते हैं, और कारगिल जैसे इलाके में तैनाती के दौरान बहुत बार वे बर्फीले तूफानों मे दबकर शहीद भी हो जाते हैं। उन मोर्चों के मुकाबले आज का उनका बचाव का काम, बहुत आसान है। वे रात-दिन पूरे वक्त शायद काम कर रहे होंगे, लेकिन ऐसी मुसीबत के वक्त न सिर्फ सेना बल्कि पुलिस भी, बहुत सी जगहों पर डॉक्टर भी, अपने सहयोगियों के साथ ऐसे ही रात-दिन काम करते हैं। इसलिए सेना का यह काम आज उनको जो वाहवाही दिला रहा है, वह बचे हुए लोगों के दिल से निकलती दुआ और उसके उपग्रह प्रसारण की वजह से है। 
लेकिन देश के नक्सल मोर्चों पर मच्छरों के काटे मलेरिया से, या नक्सलियों के धमाकों से, उनकी गोलियों से, उनके कुल्हाड़ों से कटते अपने गलों से, जो जवान जान खो रहे हैं, वे देश को कोई नायक नहीं लग रहे। वे हीरो नहीं गिने जा रहे। उनकी वजह से आज नक्सली जंगलों तक रूके हुए हैं, वे अपनी जान गंवाकर उनको रोकने के लिए तैनात न हों तो वे शहरों और राजधानियों में पहुंच जाएं, लेकिन ऐसे अनगिनत ताबूत भी इस देश में पुलिस-सीआरपीएफ को उत्तराखंड में तैनात सेना की तरह का सम्मान नहीं दिला पाते, आज तक नहीं दिला पाए।
दरअसल मीडिया का बनाया हुआ माहौल जब लोगों के सामने आंसुओं का सैलाब पेश करता है, तो कुछ लोग नायक दिखने लगते हैं, और कुछ लोग खलनायक। और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के धंधे की एक यह आसान तरकीब है कि लोगों के सामने एक ऐसी तस्वीर पेश की जाए जिसमें एक खूब अच्छा दिखे और एक खूब बुरा। कभी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित, कभी सरकार और सेना, कभी पुलिस और आदिवासी, कभी मोदी और अडवानी। ऐसे एक बहुत ही विपरीत रंगों वाली तुलना के बिना टीवी के परदों पर वह नाटकीयता नहीं आ पाती, जो कि एक संतुलित हकीकत होनी चाहिए। दरअसल संतुलन की पूरी बात ही नाटकीयता को खत्म कर देती है, और उसके साथ-साथ टीवी की चौंकाने और बांधने वाली संभावना भी खत्म हो जाती है। इसलिए आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने अपने दर्शकों को बांधे रखने के लिए किसी एक को गब्बर और किसी एक को वीरू की तरह पेश करना जरूरी है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को गब्बर की तरह का दिखाना है तो वीरू फौजी वर्दी में मौजूद है। सरकार मानो कुछ भी नहीं कर रही है, और फौज सब कुछ कर रही है। 
यह नाटकीयता, और सोची-समझी नाटकीयता बहुत अधिक लोगों को समझ नहीं आती। आज भी हिंदुस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा टीवी पर आई हुई हर बात को हकीकत इसलिए मान बैठता है क्योंकि वह तस्वीरों और आवाज के साथ रहती हैं। और जब यह टीवी नाटकीयता पर टिका होता है, तो नक्सल मोर्चों पर जान देते हुए पुलिस और बाकी जवान वह नाटकीयता पैदा नहीं कर पाते, और किसी को मार देने के आरोपों में फंसने पर मुजरिमों की तरह, या नक्सल मोर्चे पर मारे जाने पर शहीदों की तरह वे खबरों के एक दिन के बुलेटिन में कुछ मिनटों के लिए आते हैं, और हवा में खो जाते हैं।
उत्तराखंड 
आज उत्तराखंड में लोगों को बचाने का काम कर रही सेना ने खूब मेहनत की है, उसके सैनिक तारीफ के हकदार भी हैं, लेकिन उनके मुकाबले हजार गुना अधिक खतरा उठाकर जो लोग नक्सल इलाकों में सालों तक तैनात रहते हैं, उनको भी शायद यह देश, देश का वह हिस्सा किसी तारीफ का हकदार माने जो हिस्सा आज उत्तराखंड में वर्दियों पर फिदा है। अपने ही देश के भीतर इस तरह, और इस हद तक, अनदेखा रहकर नक्सल मोर्चों पर लोकतंत्र के लिए कुर्बान होते लोगों के मन में यह बात जरूर आ रही होगी कि क्या उनके ताबूत में पहुंच जाने के बाद ही उनको यह देश देश पाएगा?
इसी देश की कुछ वर्दियों के लिए लोगों के मन में हिकारत इस तरह से पनपती है, मानो वे निशानेबाजी के लिए नक्सल-जंगलों में पहुंचे हुए शौकिया शिकारी हों। और बिना ऐसे किसी खतरे को उठाए, बाढ़ में, पहाड़ों पर, फंसे हुए लोगों को बचाने वाले हीरो के लिए लोगों के मन में हमदर्दी है कि वे ही हैं कि इतनी जानें बच पाईं।
लोकतंत्र को बचाने के लिए कुर्बान होते वर्दीधारियों के एक तबके की राष्ट्रीय-अनदेखी की इस नौबत के लिए कुसूरवार कौन है? जनता या मीडिया?

इंसानियत और हैवानियत

23 जून 2013
संपादकीय
उत्तराखंड से आने वाली खबरें दिल दहलाना बंद ही नहीं कर रही हैं। पहले तो कुदरत के नुकसान से लाशों की खबरें, लापता लोगों की खबरें आती रहीं, और बहुत से आस्तिक यह सोचते रहे कि ईश्वर के घर पर जो लोग पहुंचे थे, पहुंचकर लौट रहे थे, या वहां जा रहे थे, उनके साथ ईश्वर ने ऐसा क्यों किया? लेकिन जो नास्तिक थे, वे जानते थे कि ईश्वर को ऐसे हादसों से, ऐसी बेकसूर मौतों से कभी परहेज नहीं रहा, और जिंदगी और मौत में मंदिर-मस्जिद या तीर्थ का कोई दखल नहीं रहता। ऐसे भी कोई सुबूत नहीं है कि ईश्वर के दरबार में पहुंचकर इस तरह जान गंवाने वाले लोग सीधे स्वर्ग जाते हैं। जो मर चुके हैं वे कहां गए हैं इसका अंदाज लगाना तो मुश्किल है, लेकिन उत्तराखंड में जो लोग जिंदा बचे वे वहां के इंसानों के हाथों लूट और बलात्कार के जिस तरह शिकार हो रहे हैं, उससे यह समझ आता है कि ऐसा तीर्थ भी उनको इसी धरती के ऐसे नर्क से नहीं बचा सकता। 
बहुत से लोगों ने चूंकि लूट के बयान दिए हैं, वहां की पुलिस ने लोगों से लूट की रकम और गहने बरामद किए हैं, और ऐसे लुटेरों में वहां के कुछ साधु और कुछ पुजारी भी होने की खबर है। वैसे भी पूरे का पूरा उत्तराखंड तीर्थों से भरा हुआ है, और उससे यह संभावना बनती है कि वहां के लोग आस्तिक अधिक होने चाहिए। पहाड़ों पर लोग आमतौर पर मेजबानी के लिए भी जाने जाते हैं और वहां आने वाले लोगों की खातिर अच्छे से होती है। लेकिन इसके बीच जब वहां धंसे हुए, और फंसे हुए लोगों को लूटने का मौका मिला, तो बहुत से लोगों ने लूटना शुरू कर दिया, भयानक खबरें तो यह भी हैं कि जिंदा लोगों के हाथ काटकर लोगों ने गहने लूटे, दबे हुए लोगों को निकालने के बजाय उनके सामान लूटे और चले गए। जिन लोगों को इंसानियत शब्द से ऐसी खुशफहमी होती है कि इंसानियत सिर्फ अच्छी खूबियों वाली कोई चीज है, और उससे परे की खामियों वाली तस्वीर को हैवानियत कहा जाता है, उनको यह समझ लेना चाहिए कि आज उत्तराखंड में जो हो रहा है वह पूरी तरह से इंसानियत ही है। इंसान अपने भीतर की खामियों को छुपाने के लिए उनके साथ हैवानियत शब्द जोड़ देते हैं, लेकिन हैवान नाम की कोई चीज नहीं होती, और इंसान के भीतर ही उसका एक हिस्सा ऐसी खामियों वाला, ऐसी हिंसा वाला होता है। सच तो यह है कि इंसान कानून के डर से, समाज के डर से, और जवाबी हिंसा के डर से खूबियों वाला बना रहता है, उसका बस चले तो वह अपने मतलब के लिए, अपने फायदे के लिए सारी खामियों पर चलता रहे। 
उत्तराखंड में मरते हुए लोगों के साथ लोग जिस तरह की हिंसा कर रहे हैं, वह इंसानों के भीतर की एक बहुत ही प्राकृतिक, और स्वाभाविक हिंसा है, जिसे लोग बड़ी मुश्किल से दबाकर रखते हैं। जब कभी बिना किसी गवाह अपने फायदे का जुर्म करने का मौका मिलता है, लोग उसमें जुट जाते हैं। इसलिए किसी को भी इंसानों पर ऐसा कोई भरोसा नहीं करना चाहिए, जिसका झांसा इंसानियत शब्द से, मानवीयता शब्द से बनता है। मरते-दम तोड़ते लोगों को लूटने में कुछ भी अटपटा नहीं है। और कोई अगर यह सोचता होगा कि आस्तिक लोग ऐसी हिंसा नहीं कर सकते, तो दुनिया में ऐसे बहुत से सामाजिक शोध हुए हैं जिनमें आस्तिक ही अधिक हिंसक साबित हुए हैं, क्योंकि उनके पास ईश्वर के दरबार में जाकर अपनी आत्मग्लानि को धो लेने की सहूलियत रहती है। उत्तराखंड को तो देवभूमि कहा जाता है, और कहने वाले ऐसी हरकतों को दैत्य या राक्षस की हरकतें कहेंगे, इसका सर्वे होना चाहिए कि ऐसा जुर्म करने वाले लोग आस्तिक हैं, या नास्तिक।

सत्य, अर्धसत्य, और अल्पसत्य

संपादकीय
22 जून 2013
पिछले एक हफ्ते से टीवी की खबरों पर भारत के उत्तराखंड में हुई मौतों की खबरें तो धीरे-धीरे आ रही थीं, लोगों की तकलीफें अधिक आ रही थीं। लाशें बोल नहीं पातीं, लाशों को अभी तलाशा नहीं जा सका है, दर्जनों की गिनती में वे बहकर आकर हरिद्वार में मिली हैं, लेकिन कितनी नहीं मिली हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं। पहाड़ पर कहां-कहां कितने लोग दबकर खत्म हुए हैं, इसका भी कोई ठिकाना नहीं है। इसलिए आज खबरों में वे ही लोग अधिक हैं, जो बचकर लौटे हैं, और उत्तराखंड में ही किसी ठिकाने पर टीवी कैमरों से बात करने की हालत में हैं। ऐसे में अपनों को खोने वाले, कई दिनों से भूखे-प्यासे रहने वाले लोग अगर रोते-बिलखते, चीखते और चिल्लाते अगर यह कहते हैं कि अगर सरकार के पास उनको देने को खाना-पानी भी नहीं है, तो उन पर एक बम ही गिरा दे, तो ऐसा महसूस करने और कहने में कोई हैरानी नहीं है। अब जैसे-जैसे लोग लौटते जा रहे हैं, तो उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक, और देशभर के अलग-अलग शहरों तक लोगों का ऐसा दर्द सामने आ रहा है, और खबरों से परे हो जाने पर भी यह दर्द महीनों और बरसों तक जारी रहेगा, क्योंकि लोगों की तलाश कई महीनों में भी पूरी नहीं हो पाएगी। 
यहां एक छोटा सा सवाल खड़ा होता है जिस पर हम आज यहां लिखना चाह रहे हैं। जब तकलीफ से गुजरे हुए लोग अपनी बात रखते हैं, तो वह सच तो होती है, लेकिन वह एक बड़े सच का बहुत छोटा टुकड़ा होती है। एक पूरा पहाड़ी प्रदेश जहां पर इतने बड़े प्राकृतिक नुकसान से गुजरा हो, गुजर रहा हो, वहां पर पूरी असल दिक्कत एक बहुत बड़ी तस्वीर है, जिसमें सबसे बड़ी हकीकत यह है कि कैसे जिंदगियों को बचाया जाए। ऐसी जिंदगियां कहां दबी पड़ी हैं, यह सिर्फ उन्हीं को पता लग सकता है जो पिछले हफ्ते भर से रात-दिन अपनी जिंदगी खतरे में डालकर लोगों को वहां से निकाल रहे हैं। जो लोग निकलकर टीवी-कैमरों तक पहुंच गए हैं, उनके पास सिर्फ उनका देखा हुआ है, भुगता हुआ है, और उन यादों का दर्द है। लेकिन उनके पास आज दबे हुए लोगों को निकालने की जिम्मेदारी नहीं है, उनके लिए क्या-क्या किया जा रहा है, इसकी जानकारी भी नहीं है, क्या-क्या और करने की जरूरत है, इसका अंदाज भी उनको नहीं है। इसलिए दर्द के साथ उनकी जुबान से निकला हुआ सच न तो पूर्णसत्य है, न असत्य है, न अर्धसत्य है, वह सिर्फ अल्पसत्य है। और ऐसे टुकड़ा-टुकड़ा अल्पसत्य मिलकर उत्तराखंड की आज की त्रासदी, और उससे उबरने की की जा रही कोशिशों की तस्वीर नहीं दिखा सकते। 
जहां पर जिंदगियों को बचाने की जरूरत हो, वहां पर भूख और प्यास कुछ घंटे या कुछ दिन अनदेखी हो सकती हैं, जो लोग किसी ठिकाने पर पहुंचकर जिंदा हैं, उनकी कुछ अनदेखी हो सकती है, लेकिन जिन लोगों की जिंदगी खतरे में है, उनको निकालने में सरकारी एजेंसियां, या सेना क्या कर रही हैं, यह बात मायने रखती है। इसलिए टेलीविजन की खबरों में लोगों के बयान आकर उस राज्य की सरकार को जितना निकम्मा साबित कर रहे हैं, वह हकीकत से परे की तस्वीर है, और वह कुछ ऐसा ही सच है जैसा कि हजार लोगों की भीड़ की एक तस्वीर में से किसी एक चेहरे को निकालकर उसे ही पूरी तस्वीर की तरह पेश किया जाए। एक बात साफ है कि आज उत्तराखंड में हजारों लोग ऐसे दबे हो सकते हैं जिनको अगर निकाला जा सका तो शायद उनमें से सैकड़ों बच भी जाएं। लेकिन जो आज कैमरों के सामने बहुत जोर-जोर से बोल सकते हैं, वे कम से कम भूख से मरते हुए नहीं दिख रहे। मलबे और चट्टानों के तले दबे हुए लोग ऐसे जरूर हो सकते हैं जहां तक आज न सेना पहुंची हों, न कैमरे पहुंचे हों, और न खाना-पानी पहुंचा हो, और जो मरने की कगार पर हों। 
अखबारों और टीवी में एक फर्क यह होता है कि पहली नजर में सतह पर तैरती जो जानकारी खबरें बनाती है, उससे परे भी अखबार के पास अपनी बात को गंभीरता से लिखने के लिए विचारों के पन्ने होते हैं। समाचारों की जानकारी के विश्लेषण, और उस पर अखबार के अपने विचार के संपादकीय पेज से पाठक को खबरों के पन्नों पर तैरती जानकारी को समझने में मदद मिलती है। लेकिन टीवी की खबरों के साथ यह सहूलियत नहीं होती। वहां पर एक खतरनाक बेबसी यह होती है कि मौके पर पहुंचे टीवी-रिपोर्टर को अपनी सीमित समझ के साथ एक असीमित विश्लेषण करने को कहा जाता है, और अपनी मर्जी से तय की गई उसकी बातें अटकलबाजी से लेकर आरोपों तक बिखरी रहती हैं। और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ताकत यह रहती है कि कमसमझ जनता को इन तस्वीरों और इन बातों पर इतना भरोसा रहता है, जितना कि उन चैनलों को खुद नहीं रहता। पहली खबर देने वाले टीवी चैनल आपसी गलाकाट मुकाबले के चलते दर्शकों के बीच एक ऐसा माहौल बना देते हैं कि जिसके तहत ऐसा लगता है कि पर्दों से रिसते आंसू ही पूरी हकीकत हैं। लेकिन ऐसे चैनल बहुत कम होते हैं जो ठोस जानकारी और ठोस विश्लेषण के साथ यह सामने रखें कि कम चटपटी सही, हकीकत क्या है। 
उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है, जिसकी अपनी कई किस्म की भौगोलिक दिक्कतें हैं, सीमाएं हैं, और खतरे हैं। ऐसे में जब आसमान से लेकर जमीन तक एक साथ टूट पड़ते हैं, तो बचाव के जिस पैमाने की जरूरत है, वह पैमाना इस देश में सिर्फ सेना की मदद से पहुंचा जा सकता था, और पहुंचा गया है। ऐसी भयानक नौबत के बीच अगर लोगों को खाने-पीने की कुछ दिक्कत हुई है, और उतनी ही दिक्कतें हुई हैं जिनके चलते वे आज टीवी-कैमरों के सामने जिंदा हैं। ऐसे में अभी जिन जिंदगियों को बचाना बाकी है, उसे छोड़कर अगर बचे हुए लोगों की तकलीफों पर ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, या प्रिंट मीडिया का फोकस रहेगा, तो उससे बचाव और राहत में लगी हुई सरकारों का हौसला पस्त होगा। आम जनता से बहुत बड़ी, अभूतपूर्व, और जटिल स्थिति के विश्लेषण की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन जो मीडिया हजारों करोड़ सालाना के कारोबार वाले हैं, उनको कम से कम कुछ समझदार लोगों को भी रखना चाहिए, ताकि अल्पसत्य से बनी तस्वीर एक पूरी तस्वीर न लगने लगे। 
जिस प्रदेश में आज इतनी बड़ी मुसीबत आई है, इतनी बड़ी बर्बादी हुई है,  उस प्रदेश की सीमाओं को भी समझना चाहिए, उसकी क्षमताओं को भी समझना चाहिए, और आज कुछ बर्दाश्त के साथ ही अपने या दूसरों के दर्द को पेश करना चाहिए। अपनी भूख और प्यास के मुकाबले, मलबे में दबे लेकिन शायद अब तक जिंदा जिंदगियों की अहमियत को भी समझना चाहिए। 

बचाव और राहत के लिए मॉडल बनाने की जरूरत

संपादकीय
21 जून 2013

उत्तराखंड में हुई मौतों, और गायब लोगों को देखते हुए ऐसे किसी हादसे के मौके पर तलाश और बचाव की तैयारियों के बारे में सोचना चाहिए, और बारीकी से उसके तरीके निकालने चाहिए। पिछले दिनों हम लगातार आपदा प्रबंधन के बारे में लिख रहे हैं, और आज भी उसी मुद्दे के कुछ दूसरे पहलुओं के बारे में लिखना चाहते हैं। कोई भी राज्य अपने खुद के लोगों के दूसरे राज्य में किसी मुसीबत में फंसने पर कई तरह की जिम्मेदारियों से लद जाता है। अपनी जनता यह उम्मीद करती है कि सरकार मुसीबत में फंसे लोगों की हर मदद करे, और लोकतांत्रिक दबावों के चलते सरकार को ऐसा करना भी पड़ता है। लेकिन यह काम आसान नहीं रहता, क्योंकि कुंभ हो, या अर्धकुंभ, बद्री-केदार हो, या ऐसी ही कोई और बड़ी तीर्थयात्रा, वहां पर गए हुए लोगों का कोई हिसाब-किताब तो रहता नहीं, इसलिए उनकी तलाश में एक और दिक्कत रहती है। मानसरोवर यात्रा, हज, या फिर अमरनाथ की यात्रा ऐसी रहती हैं जिनमें लोगों के नाम दर्ज होते हैं, उन्हें इजाजत मिलने के बाद ही उनका वहां जाना हो पाता है। इसलिए ऐसे तीर्थयात्रियों की जानकारी सरकारों के पास रहती है। 
आज इस मौके पर यह लग रहा है कि राज्य सरकारें अपने लोगों के बीच ऐसा भरोसा बढ़ाएं, कि वे असीमित भीड़ वाली ऐसी यात्राओं पर जाने के पहले, किसी दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाने के पहले अगर चाहें तो अपनी राज्य सरकार को उसकी खबर देकर जाएं। इसे लोकतंत्र में एक बंदिश की तरह लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे लोगों की निजी जिंदगी सरकार के सामने उजागर होती चलेगी, लेकिन जो लोग चाहते हैं कि आड़े वक्त उनकी सरकार उनके काम आए, वे लोग अपनी राज्य सरकार के शुरू किए हुए सूचना केन्द्र में, ईमेल, एसएमएस या फोन से अपने ऐसे सफर की खबर पहले से दर्ज करवा सकते हैं। और केन्द्र सरकार राज्यों के बीच भी ऐसा तालमेल आसानी से बिठवा सकती है कि उत्तराखंड की सरकार को पहले से यह पता होता कि किस-किस तारीख को किस प्रदेश से कितने लोग वहां पहुंचने वाले हैं। आज जब एक हादसा हो गया है तो उसमें फंसे हुए, मुसीबत से घिरे हुए लोगों की हर उम्मीद, और हर शिकायत राज्य सरकार से सुनाई पड़ती है कि बचाव और मदद का क्या-क्या काम नहीं हो पाया। अब सवाल यह भी है कि इतना बड़ा कुदरती हादसा हो जाने पर किसी जानकारी के बिना राज्य की सरकार किस तरह का बचाव कर सकेगी, कितनी मदद कर सकेगी। यह ठीक है कि सारी जिम्मेदारी राज्य सरकार की रहती है, लेकिन जिंदगी तो लोगों की अपनी रहती है। इसलिए एक ऐसी योजना बननी चाहिए और वह लागू होनी चाहिए कि लोगों के नाम-पते, मुमकिन हो तो उनकी तस्वीरें, उनके फोन नंबर, इन सबको ऐसे कुछ मौकों पर सरकार में दर्ज करवाने का एक विकल्प रहना चाहिए, जो लोग चाहें वे दर्ज करवाएं, और जो लोग इस जानकारी को उजागर करना न चाहें, वे न करें। 
आज मोबाइल फोन और इंटरनेट की सुविधा से लोग मुसीबत के वक्त भी संपर्क का कोई न कोई जरिया निकाल ले रहे हैं। अभी पिछले दिनों यह खबर आई थी कि एक इंटरनेट कंपनी ऐसे इलाकों पर गुब्बारों से इंटरनेट संपर्क उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है, जहां पर कि आज यह कवरेज नहीं है। भारत सरकार को तीर्थों और मेलों जैसी भीड़ के मौकों पर इस तरह की अस्थायी संचार सुविधा के बारे में भी सोचना चाहिए। देश में समय-समय पर किसी एक शहर में एक-एक करोड़ तक बाहरी लोग पहुंचते हैं, कुंभ में अभी-अभी ऐसा देखने में आया है। ऐसे मौकों पर अगर सरकारी एजेंसियों के पास लोगों की जानकारी है, तो उनकी बेहतर मदद हो सकती है, उनका बेहतर बचाव हो सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्तराखंड के इस हादसे के मौके पर तेजी से दिल्ली में मदद का इंतजाम किया, और अपने अफसरों को उत्तराखंड में भी तैनात किया है। लेकिन इसकी एक बेहतर योजना का मॉडल तैयार करना चाहिए ताकि वक्त-बेवक्त, समय खराब हुए बिना, सरकार तुरंत अपनी जिम्मेदारी में जुट सकें। कम्प्यूटर और संचार-सुविधा बहुत ही कम दाम की प्रणाली हैं, और उन पर आधारित सूचना और बचाव का ऐसा मॉडल छत्तीसगढ़ भी पूरे देश के सामने रख सकता है। 

कुदरत से ख्याल रखने की इतनी उम्मीदें बेबुनियाद...

संपादकीय
20 जून 2013
उत्तराखंड और उत्तर भारत के कुछ और राज्यों में कुदरत के कहर को लेकर चल रही बहस में अधिक गंभीर लोग पर्यावरण को इंसानों द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह नुकसान लंबे समय में पहुंचाया जाता है, और उससे बहुत लंबे समय के लिए कुदरती कहर झेलना भी पड़ता है, शायद हमेशा के लिए। लेकिन इस नजरिए को ही सब कुछ मान लेने से एक नुकसान यह होगा कि पर्यावरण को बचाने को एक पूरा इलाज मान लिया जाएगा, वह भी सही नहीं होगा। 
यह भी समझने की जरूरत है कि धरती, या धरती से परे की बाकी दुनिया भी, एक चट्टान की तरह की स्थायी व्यवस्था नहीं है। धरती अपने आपमें इंसानों के आने के पहले से कई तरह के फेरबदल देखती आई है, और इस पर ज्वालामुखियों का, भूकंप का, बाढ़ का इतिहास इंसानों के और लाखों बरस पहले का रहा है। मतलब यह कि जब इंसान नहीं थे, जब उन्होंने धरती को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था, उस वक्त भी धरती में ऐसे बदलाव आते थे कि उनके आसपास अगर उस वक्त भी इंसान बसे होते, तो वे थोक में मारे गए होते। आज की एक दिक्कत यह है कि किसी इलाके की सीमाओं को समझे बिना, या उनको अनदेखा करके, उन इलाकों की सरकारें वहां की संभावनाओं के नगदीकरण में जुट जाती हैं। नतीजा यह होता है कि कुदरत की सीमाएं इतनी लांघी जाती हैं, कि उसके खतरे इंसानों पर छाने लगते हैं। हर बार ऐसा भी नहीं होता कि कुदरत कोई बदला निकालती हो। लेकिन कुदरत किसी फौलाद का ढांचा नहीं है कि हावड़ा ब्रिज की तरह उस पर सैकड़ों बरस के लिए भरोसा किया जा सके। दुनिया के किसी हिस्से में ज्वालामुखी से, कहीं पर भूकंप से, कहीं पर बाढ़ से, कहीं पर सुनामी से, कहीं पर तूफान और चक्रवात से, कहीं पर आसमानी बिजली से, और कहीं पर सूखे से, तबाही आती है, और यह तबाही रूकने लायक नहीं होती। इंसानों के पहुंचाए नुकसान से यह तबाही बढ़ती है, लेकिन धरती और दुनिया का इतिहास ऐसे नुकसान के बिना भी आने वाली कुदरती तबाही को देखते आया है। इंसानों ने तो धरती को जितना भी नुकसान पहुंचाया हो, वह तो पिछले कुछ सौ बरस की ही बात है। लेकिन धरती का इतिहास तो लाखों-करोड़ों बरस पुराना है, और जमीन के नीचे जब चट्टानें खिसकती हैं तो बड़े-बड़े इलाके तबाह हो जाते हैं। आज  इसलिए कि ऐसे इलाकों में लोग बसे हुए हैं, ढांचे खड़े हुए हैं, इसलिए तबाही अधिक दिखती है। 
लोग कहीं पर मंदिर-मस्जिद बनाएं, या गुरुद्वारे और चर्च, कहीं पर सैर-सपाटे की जगहें बनाएं, या पहाड़ के ऊपर और समंदर के करीब रहने की जगह, उनको धरती की सीमाओं को भी समझना होगा कि उसमें फेरबदल कभी भी आ सकता है, इंसानों के पहुंचाए जख्मों से परे भी धरती कराह सकती है, आसमान का लहू बरस सकता है। प्रकृति की इन सीमाओं के खतरों को समझे बिना अगर किसी इलाके में लाखों तीर्थयात्री या सैलानी इस तरह जाएंगे, और वहां पर मौसम की कोई मार पड़ेगी, तो उसे न तो सिर्फ मानवनिर्मित विनाश कहना ठीक होगा, और न ही ऐसी किसी जगह की सरकारों को उसके लिए जिम्मेदार ठहराना ठीक होगा। ऐसी तबाही में उनका हिस्सा इसे बढ़ाने वाला तो हो सकता है, लेकिन इसे खड़ा करने वाला नहीं हो सकता। कुदरत के कहर की मार तो इंसानों के कुकर्मो से बढ़ सकती है, लेकिन कुदरत का अपना मिजाज ऐसे फेरबदल का है जो कि धरती, समंदर, आसमान और दूसरे ग्रहों पर होते चलता है, और वह इंसान को देखकर नहीं होता। कुदरत को जो लोग मां मान लेते हैं, वे यह समझने की चूक कर बैठते हैं कि जिस तरह कोई मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है, उसी तरह कुदरत भी इंसानों का ख्याल रखती है। कुदरत का इंसानों से ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, और उससे ऐसी उम्मीद एक ऐसी नाउम्मीदी और सदमे की गारंटी कर देगी जैसी कि आज उत्तराखंड में लोगों को हो रही है, या जैसी कि अमरीका में पिछले बरसों में तकरीबन हर महीने-दो महीने में लोगों को किसी तूफान या बवंडर से हो रही है। 
इसलिए प्राकृतिक विपदाओं को सिर्फ इंसानों की खड़ी की हुई, या बढ़ाई हुई मान लेना गलत होगा। इंसानों के किए हुए से परे भी, कुदरत ने धरती के हर हिस्से को ऐसा नहीं बनाया है कि उन जगहों पर मनचाही गिनती में लोग बसें या पहुंचें, और मनचाहे काम करें। लोगों को धरती और आसमान के, समंदर और नदियों के, खतरों को समझते हुए ही उन जगहों पर रहना या आना-जाना तय करना पड़ेगा। आज इंसानों ने अपने सुख के लिए, शौक के लिए, या रोजगार के लिए ऐसी जगहों पर ऐसे-ऐसे काम शुरू किए हैं, जो कि कभी भी खतरों से खाली नहीं रहेंगे। और इसे कुदरत की मार कहना भी इसलिए गलत होगा कि कुदरत सोच-समझकर वार या मार करने वाली ताकत नहीं है। उसमें अपने आपमें जो तब्दीलियां आती हैं उन पर उसका अपना कोई बस नहीं रहता। आज उत्तराखंड के बहुत ही कमजोर, नाजुक, और अविश्वसनीय प्राकृतिक ढांचे पर इस कदर का भरोसा कर लिया गया है, कि उसका किसी भी दिन टूट जाना हैरानी की बात नहीं होता। और वही हुआ। जिस तरह लोग आग के करीब पेट्रोल नहीं रखते, बिजली के तारों के नीचे खुद नहीं बसते, उसी तरह धरती के खतरनाक हिस्सों के खतरों को समझकर उनसे दूर रहना, दूर बसना ही बेहतर होगा। आज उत्तराखंड में अनगिनत ऐसी शहरी इमारतें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि नदी के किनारे गैरकानूनी बनी हुई थीं। ऐसी सड़कें बह गई हैं, या गिर गई हैं, जो कि पहाड़ को चीरकर बनाई गई थीं। ऐसे खतरे खुद खड़े करके इंसान अगर उनके बीच जिएंगे, वहां घूमने जाएंगे, तो वह खतरे का काम तो रहेगा ही।  आज का विज्ञान, आज का सरकारी इंतजाम, ऐसे कुदरती खतरों के बाद होने वाले नुकसान को कम करने का काम ही कर सकते हैं, उसे रोक नहीं सकते। 
एक वक्त था जब ऐसे तीर्थों पर जाते हुए लोग यह मानकर चलते थे कि वहां से पता नहीं लौटें, या न लौटें। साल-छह महीने न लौटने वालों के श्राद्ध भी कर दिए जाते थे। तब से अब तक वहां की धरती की हालत पहले से खराब ही हुई है, पहले से अच्छी नहीं हुई, लेकिन वहां जाने वाले लोग अब शायद लाखों गुना अधिक बढ़ गए हैं। ऐसे में एक नाजुक इलाके में इतना ही ढांचा विकसित हो सकता है, जो कि कुदरत के किसी बड़े फेरबदल के पहले तक लोगों का साथ दे दे। लोग जिसे प्रकृति की विनाशलीला या कुदरत का कहर कहते हैं, वह कुदरत का एक मामूली और नियमित-अनियमित फेरबदल अधिक है, इंसानों का खरीदा हुआ कहर कम है। इसलिए लोगों को धरती और आसमान की सीमाओं को समझकर अपनी हिफाजत खुद करनी होगी। दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमरीका में ही बवंडर से आने वाली तबाही को रोकने का कोई जरिया नहीं है, तूफान से अपने लोगों को बचाने का कोई जरिया नहीं है। बचाव की सीमा है, कुदरत की सीमा है, इंसानों की हसरत असीमित है, इसलिए लोग अधिक खतरे झेल रहे हैं। यह लोगों को खुद समझना है कि वे कितने खतरे झेलकर अपने शौक, अपने सुख, या अपने आस्था को पूरा करना चाहते हैं। 

उत्तराखंड से सबक

संपादकीय
19 जून 2013
उत्तराखंड में बारिश और बाढ़ के चलते जो भूस्खलन हुआ है, उससे तबाही के मंजर देखकर लोग हिल गए हैं। मौतों के आंकड़े आज अगर सहमा नहीं रहे हैं, तो भी आने वाले दिन बहुत से अधिक गुमनाम, बेनाम चेहरों की तस्वीरें ला सकते हैं, जो कि कमजोर तबकों के होने की वजह से अब तक मीडिया में दर्ज नहीं हो पाए हैं। एक आशंका ऐसी है कि मौतें हजार से अधिक भी हो सकती हैं। इस हादसे को लेकर कुछ पहलुओं पर बात होनी चाहिए, ताकि इससे जहां-जहां जो सबक लिया जा सके, इस बार के नुकसान के बाद बचाव के उस मौके को न खोया जाए। 
पर्यावरण के नजरिए से बात करें तो धरती के लोगों ने धरती का जितना बेदिमाग नुकसान किया है, उसके चलते समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग हिस्से धरती और आसमान पर उसका दाम चुकाते हैं। कहीं आसमान पर ओजोन की सतह का छेद धरती के लिए खतरा खड़ा करता है, तो कहीं धरती के भीतर गहरे भूकंप आते हैं, और लाखों लोग मारे जाते हैं। कुदरत के साथ हो रही ज्यादती को खत्म करने की एक बड़ी जरूरत, एक बड़ी बहस का अलग मुद्दा है, उसको हम यहां अभी नहीं छू रहे। यहां अभी सिर्फ उन बातों पर चर्चा कर रहे हैं जो कि सतह पर दिख रही हैं, और जिनको मामूली तैयारी से सुधारा जा सकता है। इसमें आपदा प्रबंधन जैसी कागजी तैयारी से लेकर पर्यटन केन्द्रों के ढांचों, शहरी बसाहट की योजना, और पर्यटन सुविधाओं की बात है। 
भारत के पर्यटन केन्द्रों के ढांचों को देखें तो उनमें गैरकानूनी बसाहट इस कदर बढ़ती चली गई है, कि एक तरफ वह कानून तोडऩे वाले लोगों को थोड़ी सी अधिक कमाई का मौका देती है, लेकिन दूसरी तरफ भारत की पर्यटन संभावनाओं को ऐसे गैरकानूनी निर्माण धीरे-धीरे करके खत्म भी कर रहे हैं, क्योंकि संपन्न दुनिया से आने वाले पर्यटक इस तरह की बदहवास बसाहट को किसी शौक की मजबूरी में ही झेलते हैं, ऐसी बेतरतीबी उनकी पसंद नहीं होती। विकसित और साफ-सुथरी दुनिया को अगर देखें, तो उनके मुकाबले भारतीय तीर्थ और पर्यटन केन्द्र रोजाना की बाजारू कमाई के हमलों से जख्मी कर दिए गए हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को सभी तीर्थ और पर्यटन केन्द्रों को अवैध कब्जों, अवैध निर्माण और अवैध बसाहट से आजाद करना चाहिए, और इन जगहों को कानून का सम्मान करने वाले शहर-कस्बों में बदलना चाहिए। इसके साथ-साथ जो महत्वपूर्ण दर्शनीय जगहें हैं, उनको तबाह करने का काम भी रफ्तार से और बेदर्दी से देशभर में होता है। देश के सबसे बड़े तिरूपति मंदिर में मंदिर के सामने से मुख्य ढांचे को पूरा देखा भी नहीं जा सकता क्योंकि उसके ठीक सामने बड़ी बेअक्ली से लोहे का एक नया शेड खड़ा कर दिया गया है। ऐसा ही हाल बहुत से दूसरे पर्यटन केन्द्रों का हो रहा है, जहां पर तीर्थों, और स्मारकों पर कहीं आस्था के सिंदूर पोते जा रहे हैं, तो कहीं बाजार उनको खासे दूर तक घेर ले रहा है, और कहीं नेता-अफसर-ठेकेदार मिलकर उन जगहों पर बड़े-बड़े निर्माण कर दे रहे हैं। पर्यटन केन्द्रों, स्मारकों, आस्था केन्द्रों को सरकार और समाज ने मक्खियां बनकर घेर लिया है, और परजीवी की तरह उन पर अपना रोजगार टिका दिया है। इस सिलसिले में एक बहुत बड़े फर्क की जरूरत है, वरना हर दिन कुछ दर्जन नए लोग एक छोटे से रोजगार की तलाश में पर्यटन को और अधिक निचोडऩे में लग ही जाते हैं। 
दूसरी तरफ पर्यटन सुविधाओं के ढांचे को अगर देखें, तो विदेशी सैलानियों के हिसाब से ही नहीं, भारत की भाषा बोलने वालों के हिसाब से भी, हर पर्यटन केन्द्र लुटेरों की बस्ती लगता है, जिस पर किसी का कोई काबू नहीं है। स्थानीय रोजगार के नाम पर ऐसी स्थानीय लूट को प्रशासन बढ़ावा देता है, बचाता है, जिससे कि लोग एक हिकारत भरे तजुर्बे के साथ वहां से लौटते हैं। होटलों से लेकर टैक्सी-बसों और खच्चरों तक, पंडे-पुजारियों से लेकर गाईड तक, और हस्तशिल्प के सामानों से लेकर खानपान की दुकानों तक, भीड़भरे पर्यटन केन्द्रों और तीर्थों को शासन-प्रशासन ने पूरे देश में ही बाजार के रहमोकरम पर छोड़ दिया है। जबकि सरकार का काम अपनी जगहों को आने वाले पर्यटकों की मेहमाननवाजी के हिसाब से नियम-कायदों से चलाने का रहना चाहिए। आज हालत यह है कि हिन्दुस्तान की अधिकतर जगहों पर जाते हुए लोग पूरे वक्त एक शक से घिरे रहते हैं कि वे सही दाम और सही रेट दे रहे हैं, या किसी लूट का शिकार हो रहे हैं? वे लौटने तक लूटपाट या जुर्म से बचे रहेंगे, या बुरी यादें लेकर आएंगे। खाते हुए पूरे वक्त लगता है कि साफ खाना-पानी मिल रहा है, या कि गंदगी से कोई बीमारी पा जाएंगे। इक्कीसवीं सदी और अंतरिक्ष में पहुंचा हुआ भारत जब अपने देश के सबसे बड़े पर्यटन केन्द्रों और तीर्थों को गंदगी और घूरों से आजाद नहीं कर पाता, तो वह अपनी एक साख को खोता भी है। सैकड़ों या हजारों बरस पहले जिन लोगों ने इस देश में ऐसी जगहें बनाई थीं जिनको देखने दुनियाभर से लोग आते हैं, या कुदरत ने ऐसी जगहें दी हैं जिन पर पहुंचकर लोगों को लगता है कि धरती का जन्नत यहीं पर हैं, उन जगहों को बर्बाद करने में सरकार भी बाजार की तरह का ही बर्ताव करती है। पर्यटन के ढांचे को बेहतर और दोस्ताना, संगठित और योजनाबद्ध बनाने की जरूरत है, और यह उन जगहों पर भी जरूरी है जहां पर उत्तराखंड की तरह की प्राकृतिक विपदाएं नहीं आतीं। 
अब बात रह जाती है आपदा प्रबंधन की तैयारियों की। जहां पर आने वाले खतरे इंसानी काबू के बाहर के होते हैं, वहां पर ऐसी तैयारियों की जरूरत है कि मुसीबत आए, तो उसका नुकसान कम से कम हो, बचाव तेज रफ्तार हो, और मरम्मत जल्द हो सके। अभी हमारे पास ऐसी कोई वजहें नहीं हैं कि उत्तराखंड में चल रहे बचाव को हम खामियों से भरा गिनें, लेकिन देश के बाकी बहुत से हिस्सों में समय-समय पर यह बात सामने आती है कि भगदड़ में होने वाली थोक मौतों से लेकर दूसरे किस्म के हादसों तक, सरकारों की तैयारियां बहुत कमजोर रहती हैं। इस मौके पर हर प्रदेश को आपदा प्रबंधन की अपनी तैयारी को बेहतर बनाना चाहिए, और अगर हो सके तो उत्तराखंड जैसे मौकों पर, अपने आपदा प्रबंधन के कुछ अफसरों को चुपचाप देखकर कुछ सीखने के लिए भेजना भी चाहिए। 
यह मामला एक और अधिक लंबी बातचीत का है, लेकिन इसके कुछ पहलुओं को छूकर हम इसे और लोगों की चर्चा के लिए यहीं छोड़ रहे हैं। 

बलात्कार के जख्मों का लहू लेकर सीपीएम विरोधी नारे लिखती ममता

18 जून 2013
संपादकीय
एक बार फिर ममता बैनर्जी ने बलात्कार और हत्या की शिकार कॉलेज छात्रा के परिवार के ताजा जख्मों पर अपनी नफरत का नमक छिड़का है। उन्हें रात सोते में वामपंथियों को डरावने सपने दिखते हैं, और जागते हुए वे पूरे वक्त दुनिया के हर जुर्म के लिए वामपंथियों को मुजरिम ठहराते चलते हैं। खैर, वामपंथी पार्टियां चूंकि राजनीति में हैं, इसलिए वे ममता के हमलों को झेलने की ताकत रखती हैं, और लगातार ऐसी तोहमत झेल भी रही हैं, लेकिन एक महिला मुख्यमंत्री के हैवानियत के बयान झेलने की ताकत ऐसे गरीबों में नहीं बचती जिन्होंने बलात्कारियों और हत्यारों के हाथों अपनी बेटी को अभी-अभी खोया है।
जिस दिन से ममता ने बंगाल को संभाला है, कुर्सी तो संभाल ली, अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी और अपना आपा खो दिया। खासकर बलात्कार की शिकार महिलाओं को लेकर जिस किस्म की कू्ररता और गैरजिम्मेदारी के हिंसक और हमलावर बयान मुख्यमंत्री की तरफ से उसके राज की बलात्कार-शिकार महिलाओं को झेलने पड़ रहे हैं, उसकी कोई दूसरी मिसाल हिंदुस्तान में नहीं है। उन राज्यों में भी नहीं है, जहां पर महिलाओं की हालत बंगाल के मुकाबले अधिक खराब है, जहां पर बलात्कार बंगाल के मुकाबले अधिक होते हैं, वहां पर भी महिला मुख्यमंत्री तो दूर, कोई पुरूष मुख्यमंत्री भी ऐसे हिंसक बयान देते इतिहास में दर्ज नहीं हैं। ममता बैनर्जी अपनी चुनावी राजनीतिक नफरत के चलते वामपंथियों पर जो हमले करना चाहती हैं, उसके लिए वे बलात्कार की शिकार महिलाओं के बदन से लहू उठाकर दीवारों पर वामपंथ-विरोधी नारे लिख रही हैं, और उनकी यह हरकत लोकतंत्र में उनके बयानों पर थूक देने के लायक है। जिस मुख्यमंत्री के ओहदे की जिम्मेदारी राज्य के लोगों को जुर्म से बचाने की होती है, उसके राज में लगातार ऐसे जुर्म हों, और खुद मुख्यमंत्री एक घटिया और हिंसक राजनीति में जुट जाए, उससे अधिक शर्मनाक और क्या हो सकता है?
कल बलात्कार-हत्या के दस दिन बाद शिकार लड़की के घर जाने पर ममता बैनर्जी से लोगों ने कुछ सवाल पूछे, और उस पर भड़ककर उन्होंने इस सबको सीपीएम का काम बताया। लोगों को याद है और खबरों में दर्ज है कि किस तरह राजधानी कोलकाता में हुए एक बलात्कार के बाद ममता बैनर्जी ने उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की माक्र्सवादी साजिश बताया था, और शिकायत को झूठा करार दिया था। इसके तुरंत बाद उन्हीं की पुलिस ने जब जांच में बलात्कार की शिकायत को सही पाया था, तो जांच के जिम्मेदार एक बड़े अफसर को ममता बैनर्जी ने उसकी कुर्सी से हटाकर हाशिए पर धकेल दिया था। जब राज्य की मुख्यमंत्री किसी जांच के पहले बलात्कार की शिकार महिला को शिकायत के कुछ घंटों के भीतर ही एक साजिश करार दे दे, तो उसके बाद पुलिस की जांच सही होने की गुंजाइश वैसे भी कम हो जाती है।
ममता बैनर्जी इस बात की मिसाल हैं कि किसी महिला के ऊंचे ओहदे पर आ जाने से उसके राज में महिलाओं की हालत बेहतर हो जाने की उम्मीद बेबुनियाद है। और खुद मुख्यमंत्री बलात्कार की शिकार महिलाओं के बदन पर उन्हीं के लहू से जब माक्र्सवादी-षडयंत्रकारी लिखने लगे, तो उस राज में इंसाफ की क्या गुंजाइश रह जाती है? हमारा यह मानना है कि देश के सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक हर किसी की दखल का मौका ममता बैनर्जी तकरीबन हर महीने देती हैं, और इन संवैधानिक संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारी पूरी भी करनी चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव तो पांच बरस बाद ही होंगे, और बयानों को लेकर किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करना भी ठीक नहीं होगा, लेकिन एक गैरजिम्मेदार, हिंसक, हमलावर और अलोकतांत्रिक-तानाशाह मुख्यमंत्री की बदजुबानी पर लगाम लगाने के लिए सरकार-बर्खास्तगी से परे के कदम उठाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट आज अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगा तो ममता बैनर्जी को वह उनके हिंसक बयानों के लिए जेल भेज सकता है। कानून की हमारी बहुत मामूली समझ बताती है कि बलात्कार की शिकार महिला की नीयत पर शक करने वाले, सरकारी कुर्सी पर बैठे किसी के लिए भी सजा का इंतजाम कानून में है, और ऐसे शक से जब मुख्यमंत्री जांच को प्रभावित करने लगे, जब  बलात्कार के शिकार और उसके परिवार पर साजिश की तोहमत लगाने लगे, तो ऐसे मुख्यमंत्री को मौजूदा कानून के तहत कैद का इंतजाम है, और संवैधानिक संस्थाओं को, अदालत को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। लोकतंत्र अनदेखी और चुप्पी का तंत्र नहीं है। अदालतें इस बात का इंतजार नहीं कर सकतीं कि उनके पास जब कोई शिकायत आएगी तब वे कार्रवाई करेंगी। ममता बैनर्जी को जेल भेजने का पूरा मामला मौजूद है, और लोकतंत्र को अपना जिम्मा निभाना चाहिए।

बहुत देर से लिए कमजोर फैसलों की कीमत चुकाते यूपीए-कांग्रेस

संपादकीय
17 जून 2013
आज जिस वक्त हम ये लाइनें लिख रहे हैं, दिल्ली में यूपीए सरकार का मंत्रिमंडल बदलने को है, और कांग्रेस संगठन में कल एक बड़ा फेरबदल हुआ है। लोकसभा चुनाव को तो वैसे करीब एक बरस बाकी है, लेकिन कुछ राज्यों के चुनाव कुछ महीने बाद ही होने हैं, और यह फेरबदल इन दोनों के हिसाब से काफी लेट हुआ है, जिसका असर पता नहीं विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में पड़ सकेगा या नहीं। 
इस पर लिखने की जरूरत आज इसलिए लग रही है कि कांग्रेस पार्टी अपने संगठन के भीतर, और अपनी अगुवाई वाली यूपीए सरकार में समय रहते फेरबदल नहीं कर पाई, और पूरे नौ बरस इसी तरह की लेटलतीफी का शिकार हुए। बहुत से मंत्रालय खाली पड़े रहे, और उनका काम दूसरे मंत्रियों की जेब में टंगी एक और कलम की तरह उन पर टांग दिया गया। नतीजा यह हुआ कि वक्त पर फैसले नहीं हुए, फैसलों पर अमल नहीं हुआ, और अमल हुआ तो उसके नतीजे सामने नहीं आए। और तो और यूपीए सरकार ने पिछले नौ बरसों में प्रदेशों के राजभवनों में भी वक्त पर राज्यपाल मनोनीत नहीं किए, जबकि पिछले राज्यपाल कई जगहों पर एनडीए सरकार के बनाए हुए थे और उनके कार्यकाल खत्म होने के बाद भी एक-एक बरस से ज्यादा वक्त तक वे काबिज रहे। छत्तीसगढ़ ऐसे राज्यों में से एक रहा जिसमें के.एम. सेठ कार्यकाल पूरा होने के बाद डेढ़ बरस तक राज्यपाल बने रहे। यह एक ऐसा दीवालियापन था जिसमें देश की सबसे बड़ी कांग्रेस पार्टी के नेताओं और उसके पसंदीदा लोगों में से कोई नाम तक यूपीए सरकार को नहीं सूझा। 
आज शाम यूपीए मंत्रिमंडल में फेरबदल के नाम आएंगे, इसलिए उनके बारे में अभी से अधिक कुछ कहना ठीक नहीं है, लेकिन बड़े-बड़े मंत्रालय कभी यूपीए के भागीदारों के जेल जाने से, सरकार छोडऩे से खाली पड़े रहे, और अभी फिर वही हाल दिख रहा है। सरकार चलाने या गठबंधन और पार्टी चलाने का यह तरीका इस गठबंधन को चाहे जैसा पड़ा हो, देश को तो भारी पड़ा है, और इसका नतीजा अगले चुनाव में यूपीए को देखने मिल सकता है। दूसरी बात यह कि कांग्रेस पार्टी ने अलग-अलग प्रदेशों में अपने जिन नेताओं को जिम्मा दिया है, उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो कि अपना खुद का राज्य खो चुके हैं, अपनी पिछली जिम्मेदारियों के राज्य खो चुके हैं, और अब उनको नए राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। न सिर्फ कांग्रेस के सामने, बल्कि भाजपा के सामने भी यह दिक्कत दिखती है कि राज्यों में हार चुके अपने खाली बैठे नेताओं को कहीं न कहीं फिट करने के लिए उनको दूसरे राज्यों में चुनाव जितवाने का जिम्मा दिया जाता है। और इसका नतीजा आमतौर पर वैसे राज्यों की अपनी संभावनाओं के खिलाफ जाता है। इसकी एक मिसाल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी रहे, जिन्होंने महाराष्ट्र खोया, और उसके बाद उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया, और फिर वे तकरीबन सारे ही राज्य अपनी अगुवाई में हारते चले गए। कुछ ऐसा ही दिग्विजय सिंह का रहा, जो मध्यप्रदेश को खोने के बाद उत्तरप्रदेश गए, और वहां पार्टी लगातार बुरे हाल में रही, और अब उनको आन्ध्र सहित कुछ और राज्यों का प्रभारी बनाया गया है। कहीं-कहीं ऐसे नेताओं की अगुवाई में कोई राज्य अगर जीता भी जाता है, तो वहां पर हो सकता है कि स्थानीय मुद्दे भी जीतने में मदद करते हों। छत्तीसगढ़ में एक समय की बात है कि यहां कांग्रेस के प्रभारी सचिव के लिए दिल्ली से मिर्जा इरशाद बेग को रखा गया था, जो गुजरात में खुद अपने सारे चुनाव हारे हुए थे। 
एक सरकार, खासकर गठबंधन सरकार, और एक संगठन, खासकर पूरे देश में फैला हुआ सौ बरस से पुराना संगठन, बहुत सी बेबसियों वाले होते हैं, लेकिन एक नजर में हमको लगता है कि यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी इन दोनों के भीतर फैसले लेने में अंधाधुंध देर की गई, और फिर इतने समझौतों वाले फैसले लिए गए कि पार्टी ने, और गठबंधन ने अपनी संभावनाएं खो दीं। आने वाले महीनों में कांग्रेस और यूपीए का काम लोग बारीकी से देखेंगे और उनका चुनाव पर बहुत अधिक असर पड़ेगा।

भारतीय राजनीति में मुखौटों और भेड़ की खाल का महत्व

16 जून 2013
संपादकीय
बिहार के आज के माहौल को लेकर पिछले दो दिनों से एक मुद्दा यह भी उठ रहा है कि अगर गठबंधन के तहत कोई चुनाव लड़ा गया था, तो उसकी सरकार में से किसी एक पार्टी के बाहर होने पर, दुबारा चुनाव के लिए जाना चाहिए, या फिर जो पार्टी सत्ता में बची है उसे काम जारी रखने का नैतिक अधिकार होना चाहिए। दरअसल भारतीय चुनावी लोकतंत्र में इस किस्म की बहुत सी स्थितियों पर तीन अलग-अलग बातें लागू होती हैं, नैतिकता, संवैधानिकता और राजनीति। इनमें से नैतिकता की जगह अब राजनीति से निकलकर शब्दकोश में चली गई है। संवैधानिकता लोगों को और पार्टियों को इस बात की इजाजत देती है कि वे थोक में दलबदल करके सरकार गिरा दें, या बचा लें। संवैधानिकता इस बात की इजाजत भी देती है कि पकड़ में आए बिना सांसदों या विधायकों को खरीदकर सरकार बचा ली जाए, या बना ली जाए। संविधान को ऐसी किसी नौबत से परहेज नहीं है। इसलिए नीतीश कुमार के सामने ऐसी कोई अड़चन नहीं है कि वे अल्पमत की सरकार न चला सकें, या फिर कांगे्रस की बाहरी या भीतरी मदद लेकर सरकार को न बचा सकें। जहां तक नैतिकता की बात है, तो उस बिना पर अगर सरकारें आती-जाती रहें, और नए चुनाव होते रहें, तो पांच बरस के हर दिन चुनाव आचार संहिता लागू रहेगी। इसलिए नैतिकता सस्ती नहीं आती, और खासे महंगे चुनाव लेकर आती है, और भारत जैसा लोकतंत्र उतनी नैतिकता बर्दाश्त नहीं कर सकता। और अब आखिरी बात रह जाती है राजनीति की, तो उसके बारे में दुनिया का इतिहास यह लिखते आया है कि राजनीति बड़े नामुमकिन किस्म के हमबिस्तर एक कर देती है। कब कौन इसके साथ हो लेते हैं, और कब कौन अलग हो लेते हैं, इस पर कोई नीति-सिद्धांत लागू नहीं होते। इसलिए बिहार की जनता के चुने हुए गठबंधन को खत्म करने पर नीतीश कुमार जनता के साथ ऐसी कोई गद्दारी नहीं कर रहे हैं, जो पूरे देश में, हर प्रदेश में अधिकतर पार्टियां, अधिकतर समय नहीं करती रहतीं। 
कल कांगे्रस पार्टी की तरफ से एक बड़े बयान में यह कहा गया था कि नीतीश कुमार धर्मनिरपेक्ष रहते हुए एक गलत पार्टी में थे। लोगों को याद होगा कि अटलबिहारी वाजपेयी के बारे में भी समय-समय पर राजनीति के जानकार एक नारे की तरह यह लिखते थे कि वे एक बुरी पार्टी में एक भले आदमी थे। कुछ लोग उन्हें एक कट्टरवादी पार्टी में उदारवादी नेता मानते थे, और कुछ लोग उन्हें भाजपा का मुखौटा भी लिखते थे। इन तमाम बातों का कोई मतलब इसलिए नहीं रहता कि भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत ऐसे सारे मुखौटों को समय-समय पर उतार देती है, और बता देती है कि 2002 में मोदी को किस-किसने बर्दाश्त किया था। उस लिस्ट में वाजपेयी का नाम भी था, अडवानी का नाम भी था, और नीतीश कुमार का नाम भी था। आज लालू यादव यह बात ठीक याद दिला रहे हैं, कि उस वक्त एनडीए सरकार को जिस तरह रामविलास पासवान ने गुजरात के मानवसंहार के मुद्दे पर छोड़ा था, उस वक्त तो नीतीश कुमार सरकार के मंत्री ही बने रहे थे। इसलिए आज नैतिकता की दुहाई बोगस है। नीतीश कुमार की आज की धर्मनिरपेक्षता भेड़ की खाल की तरह की है, जिसे लोग अपनी सहूलियत से जुटा लेते हैं, और इस्तेमाल कर लेते हैं। और आज एनडीए को टूटते हुए देखने के लिए कांगे्रस को अचानक नीतीश कुमार गलत गठबंधन में फंसे हुए सही धर्मनिरपेक्ष लगने लगे हैं।
जिन लोगों को भारतीय राजनीति में नैतिकता और सिद्धांतों को देखना हो, उनके लिए सिर्फ एक पार्टी बचती है, वामपंथी पार्टियां। इससे परे दूसरी पार्टियों और गठबंधनों में भेड़ की खाल को तैयार रखा जाता है, रामलीला सरीखे मुखौटों को तैयार रखा जाता है, और रोज सुबह उनका इस्तेमाल तय किया जाता है। बिहार के आने वाले दिन कांगे्रस और नीतीश कुमार की गलबहियां देख सकते हैं, और लालू यादव नीतीश कुमार के सारे विरोधाभासों को उजागर करते रह सकते हैं।

वे दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था...

संपादकीय
15 जून 2013
भारत में राजनीति के बारे में गालियों की जुबान में बात करने वाले लोग कई बार कहते हैं, कि राजनीति बहुत कुत्ती चीज होती है। एक तो दुनिया की अधिकतर जुबानों में जानवरों के लिए भारी हिकारत है, और कुत्ते-कुतिया का नाम गालियों की तरह इस्तेमाल किया जाता है। उसमें भी मादा जानवर को और अधिक बड़ी गाली के लायक माना जाता है। इसलिए जब भारत में राजनीति को लोग भारी-भरकम गाली देने के लायक मानते हैं, तो बेवफाई के लिए मशहूर इंसानी कौम सबसे वफादार समझे जाने वाले प्राणी का नाम गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। और आज पटना से लेकर दिल्ली तक वफा और बेवफा पर जितने किस्म की शेर-शायरी चल रही है, वह इंसानों के असली मिजाज को बता रही है। सत्रह बरस पुराने रिश्ते जब टूट रहे हैं, तो भाजपा और जदयू के बीच मीडिया के कैमरों के सामने जिस तरह की जुबान में बात हो रही है, उसे सुनकर इंसानों से परे के वफादार नस्ल के सारे नर और मादा मुस्कुरा रहे होंगे। 
दरअसल जब रिश्ते टूटते हैं, और दिल फटते हैं, राहें अलग होती हैं, तो बीते बरस या बीती पूरी जिंदगी की बातें लोगों को नई तल्खी के साथ सूझती हैं। जदयू के शिवानंद तिवारी आमतौर पर समझदारी की बात करते सुनाई पड़ते हैं, लेकिन आज उनका बयान आता है कि इस तरह भाजपा अछूत थी, और जदयू के साथ आने की वजह से अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बन पाए थे। अब डेढ़ दशक पहले के अछूतोद्धार के एहसान को आज गिनाकर तिवारीजी अपने ही कद को कम कर रहे हैं। यह मामला कुछ उसी तरह का है कि जब कोई बहू दहेज प्रताडऩा की रिपोर्ट लिखाती है, तो ससुराल के लोगों को वह बदचलन लगने लगती है, जब कोई नौकर नौकरी छोड़ता है, तो मालिक को वह चोर लगने लगता है, जब मालिक किसी नौकर को निकालता है, तो नौकर को मालिक लूटने वाला लगने लगता है। जब शादीशुदा आदमी और औरत के बीच तलाक होने लगता है, तो पसीने की गंध खटकने लगती है, छोटी-छोटी बातें बड़ी-बड़ी शिकायत बनकर सामने आने लगती हैं। 
 आज भाजपा और जदयू के बीच वही हाल चल रहा है। जो नीतीश कुमार आज भाजपा के नरेन्द्र मोदी को साम्प्रदायिकता का पिशाच करार दे रहे हैं, वही नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए हजारों मुसलमानों के कत्लेआम के लिए गुनहगार ठहराए जा रहे थे, तब नीतीश कुमार बहुत मजे में दिल्ली में बैठे उसी एनडीए की सरकार के मातहत रेलगाड़ी चला रहे थे। उस वक्त वे उसी केन्द्रीय मंत्रिडल के सदस्य थे, जिस पर देश के किसी राज्य में सत्ता की मेहरबानी से ऐसा भयानक साम्प्रदायिक मानवसंहार होने पर वहां की सरकार को बर्खास्त करने की जिम्मेदारी भी थी। उस वक्त नीतीश कुमार कुर्सी पर बने रहे, सरकार में बने रहे, और एनडीए की पूरी सरकार हार जाने तक बने रहे। आज वे साम्प्रदायिक नरेन्द्र मोदी के मुद्दे पर अपने हाथों तिलक लगाकर शहीद का दर्जा पा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी उस वक्त की एनडीए के मातहत मुख्यमंत्री के रूप में जदयू को मंजूर थे, अब प्रधानमंत्री के रूप में मंजूर नहीं हैं? तो क्या उस वक्त गुजरात में जला और काट दिए गए हजारों मुसलमानों के प्रति नीतीश कुमार वाले केन्द्रीय मंत्रिमंडल की जिम्मेदारी कुछ कम थी? और आज एनडीए के भागीदार के रूप में वह जिम्मेदारी बढ़ गई है? मोदी लहू सने सीएम के रूप में मंजूर था, और आज दस बरस बाद बिना किसी नए जुर्म के वह भावी पीएम-प्रत्याशी के रूप में नामंजूर है? शायद राजनीति के ऐसे ही विरोधाभासों और ऐसी ही विसंगतियों के चलते उसे तरह-तरह की गालियां दी जाती हैं, और वफादार जानवरों को नाहक ही बदनाम किया जाता है। जानवरों में से भला कौन ऐसे रहते हैं जो कि अपने गिरोह में दूसरों को शामिल करने के लिए मंत्री पदों का चारा दिखाते हों, या बोटियां दिखाते हों? ये सारी हरकतें तो इंसान ही करते हैं, और आए दिन करते हैं। 
फिलहाल हम बड़ी दिलचस्पी से यह देख रहे हैं कि नीतीश कुमार या उनके दूसरे साथियों को 2002 के गुजरात दंगों की याद अब और कितनी आती है, मोदी के हाथों पर उनको कितना लहू दिखता है। बरसों से हमबिस्तर चले आ रहे भाजपा और जनता दल यूनाइटेड को एक-दूसरे की देह की कौन-कौन सी बरसों पुरानी गंध अब खटकती है, यह देखना दिलचस्प होगा। ऐसे ही मौके के लिए किसी ने कभी लिखा था- वे दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था...।

सरहदों से परे अगला विश्वयुद्ध क्या इंटरनेट पर लड़ा जाएगा?

संपादकीय
14 जून 2013
आज जब भारत सरकार अमरीका से इस बात की पूछताछ कर रही है कि इंटरनेट-जासूसी में भारत के कौन-कौन से राज अमरीका ने हासिल किए हैं, उसी वक्त मुंबई की खबर आ रही है कि वहां के पुलिस अफसरों के बैंक खातों को कुछ साइबर-मुजरिमों ने हैक कर लिया, और उनकी तनख्वाह के पैसे निकाल लिए। देश के सबसे बड़े शहर के पुलिस के अफसरों से अपने खातों को लेकर बहुत लापरवाही हुई होगी ऐसा नहीं लगता। दूसरी तरफ अमरीका लगातार चीन पर यह आरोप लगा रहा है कि वहां बैठकर हैकर अमरीकी सरकार और सेना के कम्प्यूटरों में घुसपैठ कर रहे हैं और जानकारी चुरा रहे हैं। तीसरी खबर जो सबसे अधिक छाई हुई है, वह है एक अमरीकी कम्प्यूटर-कामगार के जानकारी चुराने की, और अमरीकी सरकार द्वारा नागरिकों की खुफिया निगरानी करने का भांडाफोड़ करने की। इस बीच विकीलीक्स के संस्थापक जूलियस असांज के बयान भी खबरों में हैं जिसमें उन्होंने इस अमरीकी भांडाफोड़ करने वाले को बधाई दी है और यह भी कहा है कि जब वे (जूलियस असांज) भारत में शरण चाहते थे तो भारत सरकार ने उन्हें शरण नहीं दी थी। 
इन सारी खबरों से कुल मिलाकर जो तस्वीर बनती है वह यह कि दुनिया भर के कम्प्यूटर, सेनाओं और खुफिया एजेंसियों की जानकारियां, और लोगों के निजी बैंक खाते या ईमेल जैसे अकाउंट, ये सारे के सारे किस कदर नाजुक हैं। इनमें कभी भी घुसपैठ हो सकती है, इनकी जानकारी चोरी हो सकती है, और कम्प्यूटर-इंटरनेट पर टिकी हुई कोई भी व्यवस्था किस तरह से चौपट की जा सकती है। भारत में आज अगर देखें तो इस पर चीन या अमरीका जैसे देश की साइबर-सेना, या दुनिया का कोई साइबर-आतंकी संगठन मामूली सी कोशिश से ऐसा हमला कर सकते हैं जिससे कि इस देश के ट्रेन और प्लेन के सारे रिजर्वेशन, बैंकों के खाते, एटीएम से रूपए निकालना, इंटरनेट और टेलीफोन, एसएमएस और ईमेल, इन सबको पूरी तरह तबाह किया जा सकता है, और उस हालत के लिए यह देश तैयार हो ऐसा नहीं लगता। दूसरी तरफ तबाह करने से परे आज भी भारत के निजी और सरकारी कम्प्यूटर नेटवर्कों में दुनिया भर से कैसी-कैसी घुसपैठ हो रही है, इसकी इस देश में कोई चर्चा नहीं होती, क्योंकि शायद इस देश की सरकार अपनी कमजोर तैयारी और बचाव को उजागर नहीं होने देना चाहती। लेकिन यही ऐसा मौका रहता है जब किसी देश-प्रदेश को, बाजार-कारोबार को, और लोगों को सारे कम्प्यूटर और संचार व्यवस्था के बिना अपनी जिंदगी का एक दिन चलाने की कल्पना करनी चाहिए और देखना चाहिए कि वे कौन-कौन से काम नहीं कर पाएंगे, कौन-कौन से काम कैसे कर पाएंगे। 
आज जब सरहदों को लेकर दुनिया भर की सरकारें बड़ी चौकन्ना रहती हैं, और फौजी साज-सामान की खरीददारी पर देश के बजट का खासा बड़ा हिस्सा खर्च किया जाता है, तब इस बात की शायद अनदेखी हो रही है कि देश के भीतर एक साइबर हमला करके किस तरह पूरे देश में बदअमनी, अराजकता फैलाई जा सकती है, रोजाना की जिंदगी ध्वस्त की जा सकती है, जनता का विश्वास सरकार और बैंकों पर से खत्म किया जा सकता है, मुसीबत के वक्त लोगों को फोन से मरहूम किया जा सकता है, और यहां तक कि किसी देश की फौजी तैयारियों वाले कम्प्यूटरों को ध्वस्त करके सरहदों को खतरे में डाला जा सकता है। ऐसे साइबर हमले को किसी देश की सरहद से दूरबीन से, आसमान में टंगे उपग्रह से, और टोही हवाई जहाजों से देखा भी नहीं जा सकेगा। ऐसे हमले बंद कमरों से कब हो जाएंगे, यह पता तभी लगेगा जब सरकारों की और लोगों की निजी, गोपनीय, खुफिया या फौजी तैयारियों की जानकारी उसी तरह इंटरनेट पर बिखरी हुई मिलेगी जिस तरह एक अकेले विकीलीक्स ने अमरीकी दूतावासों की चि_ियों को करोड़ों की संख्या में इंटरनेट पर मुफ्त में बांट दिया है। यह सिलसिला अगर समाज के लोगों की निजी जिंदगी को उजागर करने के लिए एक संगठित अपराध और संगठित सामाजिक हमले के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, तो लोगों के चौकन्ना रहना शुरू करने के पहले-पहले समाज का बड़े पैमाने पर विघटन किया जाना भी हो सकता है। जब लोगों का सरकार पर से भरोसा उठ जाएगा, परिवार के लोगों का परिवार के बाकी लोगों पर से, कारोबारियों का एक-दूसरे से, एक देश का दूसरे देश पर से, तो फिर दुनिया का ढांचा चरमरा जाएगा। हमारा अंदाज यह है कि तीसरा विश्वयुद्ध जमीन पर न लड़ा जाकर इंटरनेट पर लड़ा जाएगा, और हर किस्म की महत्वपूर्ण जानकारी की लाशें चारों तरफ बिखरी दिखेंगी। 

बरगद की शाखाएं, और दूब

संपादकीय
13 जून 2013

लालकृष्ण अडवानी के मामले को लेकर देश में एक बहस शुरू हुई है कि उम्रदराज नेता कब नए लोगों के लिए रास्ता साफ करें। इसके अलावा यह भी कि राजनीति, सरकार, या सार्वजनिक जीवन के दूसरे पहलुओं में बुजुर्ग और जवानों का कैसा अनुपात या मेल होना चाहिए। लोकतंत्र में कोई कानून बनाकर सरकारी नौकरियों से परे, अधिक उम्र की सीमा तो तय नहीं की जा सकती लेकिन इस पर देश के लोगों की सोच तो ढाली ही जा सकती है। 
कल रात एक टीवी चैनल एनडीटीवी पर इस मुद्दे पर बहस चल रही थी तो उसमें मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट जैसे बहुत से कम उम्र के सांसदों के चेहरे दिखाए जा रहे थे कि राजनीति में कुछ नौजवान चेहरे भी हैं। इस फेहरिस्त में दूसरी पार्टियों के लोग भी थे। लेकिन अधिकतर चेहरे ऐसे थे जो कि अपनी खानदानी विरासत में संसद की एक सीट को पाकर दूसरी पीढ़ी या तीसरी पीढ़ी के सांसद-विधायक थे। सवाल यह उठता है कि ऐसे लोगों को कैसे युवा नेता माना जाए? कहने को तो राजीव गांधी इस देश के सबसे नौजवान प्रधानमंत्री थे, लेकिन वे कुछ विपरीत परिस्थितियों में उस जगह पहुंचे थे, और अगर वे इंदिराजी की हत्या के बिना भी प्रधानमंत्री बने होते तो भी वे अपने कुनबे के तीसरी पीढ़ी के प्रधानमंत्री होते, और उनकी कम उम्र उनके आड़े नहीं आती, ठीक उसी तरह जिस तरह की आज उनके बेटे राहुल गांधी के आड़े उम्र नहीं आने वाली है।
लेकिन आज की बात हम जवानों पर नहीं, बूढ़ों पर, बुजुर्गों पर रखना चाहते हैं। इंसानी मिजाज को अगर देखें तो अस्सी बरस के जवान और अठारह बरस के बूढ़े दोनों ही दिखते हैं। जो सरकारी नौकरी जिंदा लोगों को मुर्दा बना देने के लिए बदनाम रहती है, उसमें सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे कई ऐसे जवान आला-अफसर दिखते हैं जो उतना ही काम करते हैं, जितना कि अस्पताल में वेंटिलेटर पर सांस ले रहा कोई मरीज करता हो। दूसरी तरफ बहुत से ऐसे अफसर रहते हैं जो कि रिटायर हो जाने के बाद भी, पांच-दस बरस बाद भी दिन में बारह घंटे काम करने की अपनी आदत से बाज नहीं आते। ऐसा ही हाल राजनीति के लोगों का है, जिनमें बहुत से लोग जवानी में अजगर की तरह पड़े रहते हैं, और कुछ लोग मोतीलाल वोरा की तरह रहते हैं जिनको सोनिया-राहुल के साथ कदम से कदम मिलाकर रफ्तार से चलते हुए देखकर लोग हक्का-बक्का रह जाते हैं, और इन लोगों को यह भी अंदाज नहीं रहता कि कमरे के भीतर भी वे किसी भी जवान के मुकाबले दुगुने घंटे काम करते हैं। इसलिए देह का उम्र से काम को लेकर बहुत अधिक रिश्ता नहीं रहता। 
लेकिन बात देह तक सीमित नहीं रहती। बात तजुर्बे और सोच की भी रहती है, और इस बात की भी रहती है कि यह तन और मन आने वाले कितने कल के लिए अपने को देखते हैं। कुछ ही हफ्ते पहले इसी पन्ने पर एक कॉलम में पश्चिम के एक अर्थशास्त्री की सोच का जिक्र किया गया था कि किस तरह समलैंगिक लोग दीर्घकालीन नीतियों की नहीं सोच पाते क्योंकि वे लोग आने वाली अपनी किसी पीढ़ी की कल्पना नहीं करते। अब भारतीय राजनीति या सार्वजनिक जीवन को देखें, तो ऐसा लगता है कि लोग अपनी देह के आखिरी दिन तक देश को अपनी लीडरशिप देना चाहते हैं, और उसके ठीक अगले ही दिन अपने वारिसों को उस कुर्सी पर देखकर ही अस्थियों का विसर्जन चाहते हैं। सार्वजनिक जीवन में कुनबापरस्ती का ऐसा कब्जा बुढ़ापे को बदनाम और जवानी को मिली कुर्सी को नाजायज ठहराता है। और आज अगर हिन्दुस्तान की राजनीति में कोई यह सोचे कि बुजुर्ग और जवान का अनुपात क्या रहे, तो उनको यह भी सोचना चाहिए कि अपने कुनबे के बुजुर्ग से विरासत में जवान को मिली सत्ता को जवान गिना जाएगा, या बुढ़ापे की सत्ता की निरंतरता? जहां तक जवानी के सोच की बात है, तो अपने कुनबे के बूढ़े-सयाने से मिली विरासत के साथ-साथ वह बूढ़ी सोच भी तो नए जवान को ढोनी पड़ती है। इसलिए ऐसे जवान सांसद या विधायक पता नहीं कितनी नई सोच लेकर आ पाते होंगे जिनको खानदानी सोच को भी ढोना पड़ता है। 
जिन बूढ़े या बुजुर्ग लोगों को यह लगता है कि उनके बिना यह दुनिया नहीं चल सकती, पार्टी नहीं चल सकती, उनकी संस्थाएं नहीं चल सकतीं, उनके बारे में बहुत पहले किसी समझदार ने एक कब्रिस्तान पर एक तख्ती लगाई थी कि यहां पर ऐसे बहुत से लोग दफन हैं, जिनको यह खुशफहमी थी कि उनके बिना दुनिया नहीं चल सकेगी। दुनिया का इतिहास, और इंसानों से पहले का, कुदरत का इतिहास इस बात का गवाह है कि हर पेड़ और पौधे के पत्ते और फल झड़कर नए पत्तों और फलों के लिए जगह बनाते हैं। और कुदरत से यह नसीहत लेने की भी जरूरत है कि कोई पेड़ अपने खुद के अगले पेड़ों के लिए, अपनी अगली पीढ़ी के लिए फल बचाकर नहीं रखते, छांह बचाकर नहीं रखते। उनके फलों के बीज पंछियों के मार्फत दूर-दूर तक सफर करते हैं और कड़ी मिट्टी या चट्टानों में जगह निकालकर अपनी जिंदगी खुद बनाते हैं। राजनीति में भी अमरीका की मिसाल बहुत ताजा और सामने है। वहां के कामयाब, लोकप्रिय या बेहतर राष्ट्रपति बिना किसी कुनबे के इतिहास के, पहली पीढ़ी के रहे हैं। दूसरी तरफ बूढ़े राष्ट्रपति बुश के जवान राष्ट्रपति बेटे बुश ने अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी बदनामी दर्ज कराई है, और अमरीका के सबसे बेवकूफ राष्ट्रपति के रूप में इतिहास में जगह पाई है। दूसरी तरफ ओबामा जैसे ऐसे राष्ट्रपति हैं जो भुखमरी की झोपड़ी से निकलकर यहां तक पहुंचे, और बुशों के मुकाबले बेहतर साबित हुए। 
भारत की राजनीति में जवान बेहतर हों, और बूढ़े खराब, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सत्ता के आने-जाने की बात कहते हुए नौजवान पीढ़ी को अधिक मौका देने की बात वे लोग अधिक करते हैं जिनके पास अपनी सारी काबिलीयत महज उम्र है, कम उम्र। नई पीढ़ी के मायने अगर नया ज्ञान और नई कल्पनाएं हैं, तब तो ठीक है, नई पीढ़ी का मतलब अगर अधिक मजबूत बदन है, तो उससे किसी राजनीति, या लोकतंत्र, या समाज का कोई भला नहीं होने वाला। अच्छे हों या बुरे, काम और मेहनत के मामले में मनमोहन सिंह आज भी हिन्दुस्तान के नब्बे फीसदी जवानों के मुकाबले रोज अधिक घंटे और साल में अधिक दिन काम करते हैं। वे 16-365 से अधिक काम करते हैं। इसलिए उम्र हर किसी के आड़े आती हो यह जरूरी नहीं है, लेकिन नए लोगों के आने से जो नई सोच आ सकती है, नया फेरबदल आ सकता है, उसका एक फायदा अलग रहता है। लेकिन ऐसी नई पीढ़ी के लोगों की एक सोच तो हो! 
इसलिए पीढिय़ों का यह टकराव दरअसल अधिक मौकों पर काबिज रहने की, या अधिक मौकों को पाने की नीयत अधिक लगती है, और इस नीयत से हमको कोई भला होते नहीं दिखता। अडवानी को हटाकर उनसे एक पीढ़ी कम के मोदी को लाना चुनावी राजनीति में वोटों के हिसाब से फायदे का हो सकता है, लेकिन जहां तक सोच और काम की बात है, तो 2014 के बाद के बरसों में भी शायद अडवानी मोदी के मुकाबले बहुत बेहतर काम करने वाले, और काम की जरूरत के लिए खासे तन्दरूस्त रहेंगे, उनकी पेट की गड़बड़ी और दस्त के शायद अब दूर हो ही चुके हैं।
पीढिय़ों के फर्क पर बहस का यह सिलसिला सिर्फ उम्र को लेकर चलना फिजूल का है, अपने आसपास अगर हम देखें तो अनगिनत जवान मुर्दे दिखते हैं, और अनगिनत साठे पर पाठे भी दिखते हैं। दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के जो बुजुर्ग और दिग्गज नेता विद्याचरण शुक्ल गुजरे, वे अस्सी के हो जाने के बाद भी अपनी आत्मकथा पूरी करने को लेकर किसी हड़बड़ी में नहीं थे, और यह कहते रहे कि बुढ़ापे में उसे पूरा करेंगे। सोच जवान होनी चाहिए, सपने जवान होने चाहिए, इन्हीं पंखों पर बदन उड़ता है, और उम्र का बोझ उसे रोक भी नहीं पाता। जो लोग यह मानते हैं कि बरगद सिर्फ अपनी शाखाओं को फैलाते हैं, और अपने तले किसी दूसरी किस्म की घास को भी नहीं पनपने देते, उनकी बात कुछ हद तक ठीक हो सकती है, लेकिन कुदरत को अगर देखें, तो वह बरगद से परे भी पनपती है, और तकरीबन सारी की सारी कुदरत बरगदों के साये से परे पनपी है। 

एक तीसरी राह का मौका

संपादकीय
12 जून 2013
भारत के राजनीतिक दलों में मोदी से जुड़ी हुई ताजा घटनाओं को लेकर करवट बदली जा रही है। जो एनडीए के भीतर थे, जो आज एनडीए में हैं, और जो कल तक यूपीए में थे, ऐसे दल आने वाले दिनों के लिए चुनावी संभावनाएं देख रहे हैं। और यह टटोलना अस्वाभाविक इसलिए नहीं है कि देश के दो बड़े गठबंधनों में उनके मुखिया-दलों के अलावा जो पार्टियां हैं, वे ऐसी मध्यमार्गी पार्टियां हैं जिनके पांव एक नाव से दूसरी नाव पर जाते हुए नहीं लडख़ड़ाते। इनमें इतनी बड़ी संख्या में नेता और उनकी पार्टियां शामिल हैं, कि पिछले तीन-चार चुनावों में देश ने इनके हर किस्म के गठबंधन, पालाबदल, और हमबिस्तरी को देखा है। कश्मीर के नेशनल कांफ्रेंस से शुरू करें तो बसपा, तृणमूल, जैसी कितनी ही पार्टियां हैं जो कि एक वक्त एनडीए के साथ रहीं, फिर कभी यूपीए के साथ रहीं, कभी इन दोनों से बाहर रहीं, और अब इनमें से कई लोग एक नए गठबंधन की संभावनाओं को भी टटोल रहे हैं। 
किसी भी नाम से अगर एक तीसरा मोर्चा बनता है, तो उसमें आने के लिए बहुत सी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों की संभावना बनती है। कश्मीर की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां, तृणमूल, जदयू, सपा, राजद, टीआरएस, डीएमके, एडीएमके, राकांपा, मनसे, बीजद, वामपंथी, इस तरह की लिस्ट बहुत लंबी है, जिनमें से कुछ लोग जो एक-दूसरे से भारी परहेजी हैं, उनको छोड़कर बाकी की गिनती ऐसी बन सकती है कि उनके बिना केन्द्र में यूपीए या एनडीए की सरकार ही न बन सके। और एक ऐसी नौबत लाई जा सकती है कि केन्द्र में गठबंधन सरकार की जगह, गठबंधनों की मिलीजुली सरकार बने। कांग्रेस और भाजपा के कट्टर साथियों से परे की पार्टियां मिलकर ऐसा समीकरण बनाने की ताकत रखती हैं, और उनकी जीती लोकसभा सीटों के साथ समझौते के बिना 2014 की केन्द्र सरकार न बने, ऐसी नौबत भी लाई जा सकती है। और ऐसी नौबत को भी हम कैसे खारिज कर सकते हैं कि यह तीसरा मोर्चा सरकार बनाने की हालत में आए, और यूपीए या एनडीए उसके भीतर जाकर या बाहर से उसका समर्थन करे। कुछ लोगों को लग सकता है कि यह तराजू के एक पलड़े पर बहुत से मेंढकों को एक साथ तौलने जैसा काम होगा, लेकिन क्या ऐसा ही लोगों को पच्चीस साल पहले उस वक्त नहीं लगता था जब लोग कांग्रेस का एक विकल्प सोचते थे? आपातकाल ने देश में कांग्रेस का पहला मजबूत विकल्प सामने रखा था, बाद में जनमोर्चा नाम का विकल्प आया, फिर एनडीए बना, फिर यूपीए बना, और आज मोदी के नाम पर जो सहमति और असहमति हो रही है, उससे फिर ऐसे किसी तीसरे विकल्प की राह खुल सकती है। 
ऐसा कोई विकल्प अगर वामपंथियों को साथ में लेकर बन सकता है, तो वह अनिवार्य रूप से एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प भी रहेगा, बाजार के भ्रष्टाचार से काफी हद तक आजाद भी रहेगा, और साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ भी रहेगा। ऐसे विकल्प के रास्ते में कुछ प्रांतीय-आंतरिक टकराव भी रहेंगे, लेकिन कोई भी बड़ा गठबंधन ऐसे टकरावों से आजाद नहीं रह सकता और उनसे उबरकर ही उसे एक नई राह बनानी पड़ेगी। बिहार में लालू और नीतीश में से कोई एक ही ऐसे गठबंधन में रह सकेंगे, बंगाल से ममता या वामपंथी इनमें से कोई एक ही इसमें रह सकेंगे, कश्मीर की दो पार्टियों में से कोई एक ही इसमें रह सकेगी, लेकिन आज देश में क्षेत्रीय दलों की अपने-अपने इलाकों में जितनी पकड़ है, उसके चलते तीसरे मोर्चे की संभावनाएं निकल सकती हैं, और ऐसी कोई संभावना ही यूपीए और एनडीए की बददिमागी का जवाब हो सकती है। एक तरफ यूपीए ने अपनी सरकार के दौर में जितने तरह के गलत काम किए हैं, उनको लेकर वह एक कड़े सबक की हकदार है, और दूसरी तरफ एनडीए की मुखिया भाजपा ने जिस एकतरफा तरीके से मोदी की ताजपोशी की है, उससे वह भी एक विभाजन की हकदार बनती है। आने वाले दिन भारतीय राजनीति में बड़ी दिलचस्पी के साबित हो सकते हैं, और कुछ लोगों को तीसरे मोर्चे के साथ-साथ एक राजनीतिक अस्थिरता का खतरा दिख सकता है, ऐसे लोगों को पिछले नौ बरस की यूपीए की स्थिरता का नुकसान भी देखना चाहिए।