राहत और बचाव के बाद उससे बड़ी चुनौती सामने

संपादकीय
24 जून 2013
उत्तराखंड पर आई मुसीबत से लोगों का उबरना धीरे-धीरे जारी है लेकिन ये लोग राज्य के बाहर के हैं। तीर्थयात्री और सैलानी, वहां से लौटकर अपने-अपने घरों को पहुंच जा रहे हैं, और उनके घरवाले, उनकी राज्य सरकारें, उत्तराखंड की सरकार, और केन्द्र सरकार सभी राहत की सांस ले रहे हैं। लेकिन अगले हफ्ते-दो हफ्ते के बाद जब वहां पर जिंदा फंसे आखिरी सैलानी-तीर्थयात्री को निकाल लिया जाएगा, तब लाख रूपए का यह सवाल खड़ा होगा कि वह राज्य किस तरह अब अपने पैरों पर खड़ा हो? कुदरत की तबाही से एक करोड़ आबादी वाला यह पहाड़ी राज्य पूरी तरह तबाह हो चुका है। आने वाले कई बरस तक वहां पर हो सकता है कि तीर्थयात्री पहले जितने न पहुंचें, सैलानी कम हो जाएं, और राज्य को खतरनाक मानकर लोग दूसरी जगह घूमने जाएं। ऐसे में आबादी से ढाई गुना पर्यटकों वाला यह राज्य अभी अर्थव्यवस्था को कैसे आगे बढ़ाएगा? 
यह सवाल अधिक अहमियत इसलिए रखता है कि तेरह बरस पहले छत्तीसगढ़ और झारखंड के साथ यह भी एक नया राज्य बना था। उस वक्त से छत्तीसगढ़ तो लगातार तरक्की करते चला गया, झारखंड राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार में डूब गया, और उत्तराखंड अपनी बहुत सीमित संभावनाओं के बीच राजनीतिक अस्थिरता को भी झेलता रहा, और हर बात के लिए दिल्ली की तरफ देखना उसकी मजबूरी भी रही। कमजोर अर्थव्यवस्था के साथ बना यह राज्य आज बहुत खराब हालत में इसलिए है कि इसके लाखों परिवार अपना घर-बार खो चुके हैं, या कारोबार खो चुके हैं, या पर्यटकों और तीर्थयात्रियों पर टिका हुआ रोजगार खो चुके हैं। ऐसे में जब तक राज्य का एक नया मजबूत और भरोसेमंद ढांचा खड़ा नहीं होता है, यहां के लोग भूखे मरने की नौबत में रहेंगे, और आज से महीने-पन्द्रह दिन बाद लोग यहां के लोगों को भूल भी जाएंगे। आज भला किसको याद है कि गुजरात के भुज में आए भूकंप के बाद बेघर हुए लोगों का वहां पर क्या हाल है? लोगों की याददाश्त श्मशान वैराग्य की तरह रहती है जो कि घर पहुंचकर नहाने के साथ ही धुल जाती है। 
लेकिन यह मौका केन्द्र सरकार और उत्तराखंड सरकार इन दोनों के लिए एक संभावना लेकर भी आया है कि ऐसे हादसों के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण के दुनिया के विशेषज्ञों की मदद लेकर इस राज्य के लिए एक ऐसा ढांचा खड़ा किया जाए जो कि यहां की नाजुक भौगोलिक स्थिति, और प्राकृतिक खतरों को झेलने के लायक हो। किसी भी नई इमारत को एक खाली जगह पर बनाना अधिक आसान होता है और उसे अधिक मजबूत भी बनाया जा सकता है। तबाह हो चुका उत्तराखंड का ढांचा ऐसे नए और मजबूत निर्माण का एक मौका भी देश को दे रहा है। दूसरी जरूरी बात यह कि जो लोग उत्तराखंड के तीर्थ स्थानों पर जाते-आते हैं, उनको भी अपनी आस्था का सम्मान करते हुए इस राज्य के पुनर्निर्माण में खुलकर मदद करनी चाहिए, वरना उनकी आस्था की कोई कीमत नहीं रहेगी। देश के बाकी राज्यों को, देश के उद्योगों को चाहिए कि अपने एक दिन की कमाई वे इस राज्य के पुनर्निर्माण के लिए भेजें, क्योंकि यह राज्य पूरे देश के लोगों की मेजबानी करते आया है। छत्तीसगढ़ को भी इस काम में अधिक हिस्सा बंटाना चाहिए क्योंकि यह उसके साथ ही अस्तित्व में आया हुआ राज्य था, और यहां के लोग बड़ी संख्या में तीर्थ और पर्यटन के लिए वहां जाते हैं।
जब तक यहां पर ढांचा खड़ा हो, तब तक के लिए यहां की आबादी को रोजगार देना भी जरूरी होगा, और इसके लिए केन्द्र सरकार को तुरंत ऐसी योजनाएं बनानी पड़ेंगी जिनसे लाखों लोगों को काम मिल सके, और दसियों लाख पेट भर सकें। यह काम राहत और बचाव से अधिक चुनौती भरा होगा।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी पोस्ट को कल के ब्लॉग बुलेटिन श्रद्धांजलि ....ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ...आभार।

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  2. उत्क्रुस्त , भावपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति

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