तेलंगाना के बाद अब और कई नए राज्यों की जरूरत

31 जुलाई 2013
संपादकीय
आंध्र प्रदेश से काटकर तेलंगाना नया राज्य बनाने का कांगे्रस, यूपीए, और केंद्र सरकार का फैसला आधी सदी से अधिक चले आ रहे एक संघर्ष, और सैकड़ों जानों की कुर्बानी के बाद आया है। अधिक अच्छा तो यह हुआ होता कि दशकों पहले यह हो गया रहता, लेकिन लोकतंत्र में जनता के दबाव के बिना बहुत से फैसले कई बार नहीं हो पाते, और कई बार जनता के दबाव में गलत फैसले भी हो जाते हैं। तेलंगाना का फैसला जनता के दबाव में हुआ एक सही फैसला है, और इससे अधिक बड़ा जनआंदोलन लोकतंत्र के भीतर और कुछ भी नहीं हो सकता था। 
आज विचारों के इस कॉलम में हम बहुत अधिक जानकारी भरना नहीं चाहते जो कि समाचारों में आ रही है, और जो इसी अखबार में अलग-अलग लेखों में आएगी। हम आज मोटे तौर पर भारत में छोटे राज्यों की जरूरत की वकालत करना चाहते हैं, जिसके मुताबिक यह फैसला एकदम सही है। इस देश में आजादी के बाद जिस तरह से राज्यों को मिलाकर एक संघीय गणतंत्र खड़ा किया गया, उसके अपने फायदे उस वक्त थे। लेकिन अब विकास के साथ-साथ प्रशासन को मुमकिन बनाने के लिए छोटे राज्यों की जरूरत एक हकीकत है, और कई छोटे राज्यों ने कामयाबी साबित भी की है। पहले बने छोटे राज्यों में हरियाणा आर्थिक विकास में बहुत आगे बढ़ा, और तेरह बरस पहले जो तीन नए राज्य बने, उनमें से छत्तीसगढ़ ने कामयाबी का एक नया रिकॉर्ड कायम किया। आज तेलंगाना के अलावा देश में जगह-जगह नए राज्य बनाने की जरूरत है, और जो बहुत बड़े-बड़े राज्य फीका प्रशासन झेल रहे हैं उनको ऐसे राज्यों में बांटना बेहतर होगा जो नए राज्यों के पैमाने पर पूरे उतरते हों, खरे उतरते हों,  और जहां जनता अपना राज्य चाहती भी हो। कुछ जगहों पर धर्म के आधार पर या देश की सरहद पर फौजी जरूरतों को देखते हुए हो सकता है कि नया राज्य बनाना समझदारी न भी हो। लेकिन जहां-जहां ऐसी गुंजाइश है, वहां पर छोटे राज्यों से उन इलाकों का आगे बढऩा मुमकिन हो पाएगा, बड़े राज्यों के भीतर किसी इलाके से चली आ रही बेइंसाफी दूर होगी। 
कल जब तेलंगाना का फैसला आ जाने के बाद देश भर में इस पर बहस चल रही थी, तब यह बात भी सामने आई कि तेलंगाना इलाके से आंध्र के मुख्यमंत्री पद पर तीन या चार लोग आए। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव भी तेलंगाना इलाके के ही थे। इसके बावजूद तेलंगाना का विकास नहीं हो पाया, तो इसके लिए बाकी आंध्र को क्यों कोसा जाए? लेकिन छत्तीसगढ़ में हम यह बात देख चुके हैं कि छत्तीसगढ़ के श्यामाचरण शुक्ल कम या अधिक वक्त के लिए तीन बार अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इसी इलाके मोतीलाल वोरा पूरे कार्यकाल के लिए अविभाजित मप्र के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन छत्तीसगढ़ के साथ कोई इंसाफ उनके दौर में भी नहीं हो पाया। दो कार्यकाल अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बावजूद दिग्विजय सिंह छत्तीसगढ़ के साथ इंसाफ नहीं कर पाए। और नया राज्य बनने के बाद इस इलाके ने जो तरक्की देखी, वह मध्यप्रदेश में रहते हुए शायद कभी नहीं देख पाता। एक मिसाल गिनाना काफी होगा कि इतनी बिजली पैदा करने वाले छत्तीसगढ़ के ग्यारह लोकसभा क्षेत्रों में खेती के जितने बिजली कनेक्शन दिए गए थे, उससे अधिक बिजली कनेक्शन यहां से बाहर के छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र में कमलनाथ की वजह से दिए गए थे। कदम-कदम पर इस राज्य के साथ परले दर्जे की बेईमानी हुई थी, और यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के नए राज्य बनने के बाद मध्यप्रदेश के नेताओं की यहां कोई कदर नहीं रह गई है। 
अब जनता की राजनीतिक भावनाएं, उनकी क्षेत्रीय उम्मीदें, पहले सरीखी नहीं रह गईं कि उन्हें दूर बैठे कोई भी काबू में रख सके। अब लोग क्षेत्र के आधार पर, धर्म और जाति के आधार पर, औरत और मर्द के आधार पर, उम्र के आधार पर, सत्ता में हिस्सेदारी चाहते हैं और बड़े राज्य में यह सब मुमकिन नहीं है। तेलंगाना का फैसला देर से सही, सही फैसला है, और इसके बाद बहुत से नए राज्य बनने का सिलसिला शुरू होना चाहिए। कुछ लोगों को झारखंड का एक नया और छोटा राज्य बनना एक खराब मिसाल की तरह याद पड़ता है, लेकिन उसकी नाकामयाबी का उस राज्य के आकार से कुछ भी लेना-देना नहीं रहा, वह वहां के भ्रष्टाचार और वहां की राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा, जो कि कोई बड़ा राज्य भी हो सकता था। उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी हमने सत्ता के गठबंधनी-बंटवारे के तहत अस्थिरता आते देखी है, और कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में भी झारखंड से अधिक भ्रष्टाचार देखा है। हरियाणा जैसे नए और छोटे राज्य में सारे भ्रष्टाचार, और सारी राजनीतिक अस्थिरता से निकलकर ही आर्थिक विकास आया है। इसलिए कुछ राज्यों की बुरी मिसालों के साथ-साथ, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की अच्छी मिसाल को भी याद रखना चाहिए।
इस देश में बनने वाले आयोगों की सिफारिशों पर कुछ नहीं होता यह सोचकर हम इस सलाह को देने से रूक सकते हैं कि राज्य पुनर्गठन आयोग बनाना चाहिए और पूरे देश में नए राज्यों की जरूरत और संभावना को तथ्यों और तर्कों के आधार पर देखना चाहिए, लेकिन आज यही सलाह जायज होगी। केंद्र सरकार को अलग-अलग राज्यों के विभाजन पर राजनीतिक फैसले लेने के बजाय ऐसे आयोग को बनाकर उसकी रिपोर्ट पर गंभीरता से चर्चा करनी चाहिए, और बड़े राज्यों के पिछड़े इलाकों को उनकी बाकी संभावनाओं के आधार पर, दूसरे इलाकों को उनकी प्रशासनिक जरूरत के आधार पर नए राज्य बनाने का विचार करना चाहिए। कुछ लोगों को यह देश का बंटवारा लग रहा है। यह सोच नासमझी की है, और जब किसी एक कारोबार का भी चार भाईयों में बंटवारा होता है, तो अधिकतर मामले में वे चारों अलग-अलग भी तरक्की करके संयुक्त कारोबार से आगे निकल जाते हैं। इसलिए अगर दस भी और नए राज्य बनाए जाते हैं, तो इस देश में अभी उसकी जरूरत है। देश में आत्मनिर्भर छोटे-छोटे राज्य रहें, राज्यों के भीतर जरूरत के मुताबिक छोटे-छोटे जिले रहें, तो सरकार का जो बहुत बड़ा बजट दिल्ली से निकलकर गांव तक जाता है, उसका बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा। 

ठाकरे, मोदी और गीलानी के अलगाववाद के खतरे

30 जुलाई 2013
संपादकीय
कुछ समय पहले गुजरात की खबर आई थी कि वहां पर बरसों से खेती कर रहे पंजाबी-सिख किसानों को मोदी सरकार ने नोटिस दिया था कि वे अपने खेत बेचकर चले जाएं, क्योंकि 1948 का मुंबई किरायादारी और खेतिहर जमीन कानून गुजरात में गैरगुजरातियों को खेती की इजाजत नहीं देता। इस मामले की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंची और अभी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार पहली नजर में ऐसे सैकड़ों सिख किसानों के साथ भेदभाव की दोषी लगती है। आयोग ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति की है कि वहां की सरकार यह मानती है कि गैरगुजराती वहां जमीन के मालिक नहीं रह सकते, और सिख किसानों की ऐसी जमीनों के खाते सरकार ने अभी रोक रखे हैं।
एक दूसरी खबर आज ही यह आई है कि जम्मू-कश्मीर में एक कट्टरपंथी और अलगाववादी नेता सईद अली शाह गीलानी ने वहां के स्थानीय लोगों से कहा है कि वे बाहर से आकर काम करने वाले पांच लाख से अधिक मजदूरों को आने की इजाजत न दें, क्योंकि वे स्थानीय संस्कृति बिगाड़ते हैं। कश्मीर में खेती और दूसरे कामों में मजदूरों की कमी की वजह से बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़ से लाखों मजदूर काम पाने जाते हैं। वर्ष 2008 में भी गीलानी ने बिहार के मजदूरों राज्य छोड़ जाने को कहा था, और ऐसे कुछ मजदूरों की हत्याओं के बाद दहशत में बाकी मजदूर छोड़कर चले गए थे। इस बार भी इस नई धमकी से दूसरे राज्यों के मजदूरों मेें कश्मीर में दहशत है। कश्मीर के लोगों का यह मानना है कि ऐसी धमकी से और मजदूरों के चले जाने से कश्मीर की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। 
भारत अपने-आपमें इतनी विविधताओं से भरा हुआ, इतने प्रदेशों वाला, इतनी भाषाओं और संस्कृतियों वाला, इतने पड़ोसी देशों से रोटी-बेटी के रिश्तों वाला, इतने धर्मों वाला, इतने किस्म के काम-धंधों वाला देश है कि यहां पर अगर इनमें से किसी एक आधार पर लोगों की आवाजाही रोकी जाती है, तो देश के भीतर बहुत बुरा तनाव हो सकता है। लोगों को याद है कि महाराष्ट्र में बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक शिवसेना की सोच ने दूसरे प्रदेशों से आए हुए लोगों पर हमले किए, उनको वहां काम करने से रोका, दहशत फैलाई, और अपने लिए स्थानीय वोटरों की हमदर्दी बटोरी। अब अगर एक-एक करके अलग-अलग राज्य दूसरे राज्यों के लोगों से परहेज करने लगेंगे, तो इससे दूसरे राज्यों के गरीब मजदूरों का नुकसान तो कम होगा, परहेज करने वाले राज्यों का नुकसान ही अधिक होगा। पसीना बहाकर रोजी कमाने वाले लोग तो कहीं भी रोजी कमा लेंगे, लेकिन उनकी मेहनत इस्तेमाल करके जो राज्य अपनी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ाते हैं, उनका क्या होगा? अभी कुछ वक्त पहले की ही एक तस्वीर हमको याद पड़ती है जिसमें पंजाब के एक रेलवे प्लेटफार्म पर एक स्थानीय सिख किसान बोर्ड लिए बैठा है कि बाहर से आने वाले मजदूरों को उसके खेतों पर काम करने पर क्या-क्या सहूलियतें मिलेंगी। 
आज गुजरात में नरेन्द्र मोदी हों, या कश्मीर में वहां के अलगाववादी नेता, उनकी सोच इस मामले में एक दिखती है। कश्मीर में तो गीलानी को चुनाव नहीं लडऩा है, लेकिन आज जब नरेन्द्र मोदी पूरे देश के नेता बनने की राह पर चल रहे हैं, तो वे पंजाब के लोगों को, अपने अकाली भागीदारों को इस बात के लिए क्या जवाब देंगे? राष्ट्रीय नेता बनने के लिए सोच भी राष्ट्रीय रखनी पड़ती है, और समझ अंतरराष्ट्रीय रखनी पड़ती है। इन दोनों ही मोर्चों पर नरेन्द्र मोदी को खासी मेहनत करनी है, क्योंकि देश में लीडरशिप के लिए विश्वसनीयता का आज जो शून्य है, उस खाली जगह में पहुंचकर उसे भर देना पहली नजर में एक आसान काम हो सकता है, लेकिन पूरे देश के सांसदों के वोटों से दिल्ली की जो सत्ता बनेगी, उसका मुखिया बनने के लिए पूरे देश की, सभी मजहबों की, सभी भाषाओं की, सभी राजनीतिक विचारधाराओं की एक बेहतर समझ मोदी को लगेगी, और असहमति के लिए, विविधता के लिए एक बेहतर सहनशीलता भी उनको लगेगी। 
आज एक साथ आई दो खबरों को लेकर मोदी और कश्मीर के अलगाववादी नेता दोनों पर एक साथ लिखना पड़ रहा है, और इस नौबत पर भाजपा को सोचना चाहिए, कल उसे मोदी से परे भी अपने सहयोगी दलों को, संभावित सहयोगी सांसदों को, देश की जनता को, और इतिहास को इस रूख पर जवाब देना होगा।

धर्म का सामाजिक उपयोग करवाने वाले नहीं रह गए

संपादकीय
29 जुलाई 2013
सावन का महीना शुरू होते ही हिन्दुस्तान के एक बड़े हिस्से में हिन्दुओं के कई तरह के त्यौहार शुरू हो जाते हैं। पत्थर की मूर्तियों को दूध नसीब होता है, मिठाइयां नसीब होती हैं, और शिव मंदिर के बाहर बैठे नंदी को भी बेल की पत्तियां मिलती हैं। ऐसे मौकों पर बाहर बहुत से भिखारी जुट जाते हैं और उनको भी भक्तों से कुछ-कुछ मिल जाता है। लेकिन हर बरस आने वाले, बारहों महीने छाने वाले तरह-तरह के त्यौहारों का क्या कोई सामाजिक उपयोग भी रह गया है? 
बहुत से लोग यह मानते हैं कि मंदिरों के बाहर के भिखारियों को कुछ देना बहुत बड़ी समाज सेवा है। जबकि हकीकत इससे दूर है। ऐसे बड़े तीर्थों तक कम लोग ही पहुंच पाते हैं। और जो सबसे कमजोर, सबसे अधिक भूखे रहते हैं वे मंदिर-मस्जिद तक जाने की ताकत भी नहीं रखते। कई किस्म के त्यौहारों पर शहरों में सड़कों के किनारे अलग-अलग धार्मिक या आध्यात्मिक संगठन लंगर खोल देते हैं, प्रसाद बांटते हैं, शरबत पिलाते हैं, और वे मानकर चलते हैं कि इससे गरीबों का भला हो रहा है। यह भला उन सड़कों से निकलते हुए सिर्फ शहरी गरीबों का होता है जो कि भूखे नहीं होते। उनका कुछ खाना बच जाता है, लेकिन असली गरीब ऐसे लंगरों से दूर रहते हैं, जिनके पेट तक ये खाना या पीना नहीं पहुंच पाता। 
दरअसल भारत में धार्मिक त्यौहार सामाजिकता से कट गए हैं, वे धर्मान्धता के शिकार हो गए हैं, कट्टरता के शिकार हो गए हैं, या फिर ऐसी रूढिय़ों और रीति-रिवाजों के शिकार हो गए हैं जिनसे आम जनता का कुछ भी भला नहीं होता। जबकि इस देश में धर्म से अधिकतर आबादी जुड़ी हुई है, और आस्था के इतने फैले हुए, इतने गहरे, और इतने स्थायी बहाव को एक मोड़ दिया जा सकता था, और उसे समाज की जरूरतों से जोड़ा जा सकता था। लोगों की जेब से सिर्फ धर्म के नाम पर पैसा निकलता है, और जो धर्म स्थान जितना अधिक संपन्न होता है, उसके नाम पर उतना ही अधिक पैसा निकलता है। लेकिन उसका समाज के लिए इस्तेमाल बिल्कुल कम होता है। अधिकतर छोटे-बड़े धर्म स्थान ऐसे हैं जिनके पैसों पर वहां के ट्रस्टी, वहां के पंडे-पुजारी, या वहां पर काबिज नेता-अफसर पलते हैं। यह सिलसिला खत्म करने का हौसला किसी सरकार में नहीं होता, और सामाजिक सुधार लाने के लायक भरोसेमंद कोई सामाजिक नेता अब बच नहीं गया। आज के धर्मगुरूओं का हाल यह है कि वे कट्टरता और धर्मान्धता को बढ़ावा देने को अपने खुद के अस्तित्व के लिए जरूरी समझते हैं, और इसलिए वे समाज के शोषकों के साथ मिलकर आम धर्मालुओं को एक धार्मिक अंधेरे में बनाए रखते हैं।
भारत में धर्म के नाम पर लोगों को एक बड़े काम से जोड़ा जा सकता था, लेकिन इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती, क्योंकि ऐसा मोडऩे की साख रखने वाले लोग रह नहीं गए हैं। 

हर चौराहे पर सिर भिड़ाए सांड

29 जुलाई 2013
रात-दिन खबरों को देख-सुनकर कभी-कभी दिल बैठने लगता है कि बुरे के अलावा और क्या कुछ हो ही नहीं रहा है? दुनिया के बहुत से हिस्सों में अलग-अलग किस्म का बुरा हो रहा है, लेकिन हिंदुस्तान में रहते हुए यहां की हवा को देखकर ऐसा लगता है कि देश अपना अधिकतर समय बुरा करने में लगा रहा है। हालांकि यह बात सच इसलिए नहीं है कि देश का अधिकतर हिस्सा तो किसी को दिखता ही नहीं है, और इस अधिकतर हिस्से के पास कुछ बुरा करने की चाह भी हो, तो भी राह नहीं है। खेत में काम करने वाले मजदूर क्या चोरी करेंगे? कैसी जालसाजी कर लेंगे? किसी दूसरे का क्या बुरा कर लेंगे? ऐसे ही अनगिनत गरीब हैं जिनकी जिंदगी में बुरा करने की कोई गुंजाइश भी नहीं है, क्योंकि वे बुरा करके बचेंगे कैसे? 
लेकिन भारत में, यहां की राजनीति में, यहां के कारोबार में, यहां की सरकारी नौकरी में, और यहां के पेशों में, जहां जिसके पास ताकत है, वे उसका इस्तेमाल बुरे के लिए करते हुए दिखते हैं। किसी भी तबके में बुरा करने वालों का अनुपात उस तबके के हाथ में ताकत के अनुपात में ही दिखता है। यह बात तो हुई लोगोंं की, लेकिन इससे परे जब तबकों की बात करें, तो कारोबारियों का तबका जनता के हक लूटने के लिए गिरोहबंदी किए दिखता है, एक पार्टी दूसरी पार्टी को तबाह करने के लिए गिरोहबंदी किए दिखती है, और लोकतंत्र की एक संस्था दूसरी संस्था को कमजोर करने में लगी दिखती है। 
भारत में हवा में सब कुछ इतना हमलावर दिखता है, इतना हिंसक दिखता है कि अमनपसंद लोग मानो अपनी खाट के नीचे छुपकर ही अपनी खाल बचा सकते हैं। इस देश की संभावनाएं, इसके लोगों की ताकत का इतना बड़ा हिस्सा किसी न किसी के खिलाफ लगे दिखता है, कि उसका इस्तेमाल किसी भले और उत्पादक काम में काम हो ही नहीं सकता। संसद, सरकार, अदालतें, मीडिया, और समाज इन सबमें इतने तरह के टकराव चल रहे हैं कि ऐसा लगता है कि टकराव ही भारत का फुलटाईम काम हो गया है। 
इससे एक ऐसी नौबत आ गई है कि देश के लोग झगड़ों और झंझटों का एक कड़ा और ऊंचा पहाड़ी सफर ऐसा कर रहे हैं जो कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। ऐसी कड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए कोई दूसरा काम भी नहीं हो सकता, और वही हाल आज इस देश का हो रहा है। जिस तरह किसी बस्ती के दो बेदिमाग और बददिमाग लोग जब लाठियां लेकर आपस में भिड़ पड़ते हैं, तो आसपास का काम तबाह होता ही है, जब किसी सड़क पर दो सांड सिर भिड़ाए हुए एक-दूसरे की ताकत तौलते हैं, तो आसपास से लोगों की आवाजाही कुछ वक्त को तो थम ही जाती है। हिंदुस्तान में आज सांडों के सिर अलग हो ही नहीं रहे हैं, लाठियां थम ही नहीं रही हैं, अब इनके आसपास कोई काम हो तो कैसे हो?
जब समाज बना तो शायद वह इतने टकराव के हिसाब से नहीं बना था, या कम से कम उसका आगे बढऩा इतने टकराव के साथ-साथ सोचा नहीं गया था। आज बढऩा रह गया है और टकराव बच गया है। इसी तरह लोकतंत्र, और खासकर भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र का ढांचा सिर्फ टकराव के हिसाब से नहीं बना है। आज वैचारिक विचार-विमर्श की जगह जहरीले आरोपों ने ले ली है, लोगों के आपस में बैठने के रिश्ते खत्म हो गए हैं, संसद और विधानसभाएं अंग-भंग का शिकार होकर अर्थहीन हो गई हैं, और जनता के टोकरों की सब्जियों पर मुंह मारते संसदीय-सांड टीवी चैनलों पर सिर भिड़ाए लोकतंत्र की सड़कों से लोगों को डराकर दूर भगाते दिखते हैं। 
सरकारों के अनगिनत मामले सामने आते हैं, और उनके हजार-हजार गुना मामले बिना सामने आए रह जाते हैं कि किस तरह हर ताकतवर कुर्सी के पाए अपने ही नीचे की जमीन को खोदने में लगी है, बेचने में लगी है। इसी तरह कारोबार के मामले सामने आते हैं कि जिसके पास दौलत जितनी ही अधिक इक_ी हो गई है, उससे वे उतने ही अधिक सरकारी दफ्तरों को, अदालतों को, खरीदकर उस दौलत को कई गुना करने में लगे हैं। और यह कई गुना करना उन कारोबारों के अपने बूते का नहीं रहता, वह जनता के हक को लूटकर ही होता है।
ऐसे में कोई देश कैसे आगे बढ़ सकता है? जहां पर सरकारों के मंत्री, पार्टियों के प्रवक्ता और नेता इस आपसी मुकाबले में लगे हैं कि कैसे वे गरीब के मुंह पर अधिक से अधिक थूक सकें, कैसे खाली पेट पर जूते मार-मारकर उन्हें बजा सकें, कैसे वे लुटे हुए लोगों के सामने लूट की दौलत की नुमाइश कर सकें, वहां पर इन इंसानों के भीतर की हिंसा इनकी इंसानियत के ढोंग के साथ लाठी भांजने लगती है। यह मिली-जुली कुश्ती वैसे-वैसे बढऩे लगती है, जैसे-जैसे लोगों के हाथ ताकत बढऩे लगती है।
किसी त्यौहार पर दारू पी लेने के बाद आपस में लाठियां भांजने वाले लोग त्यौहार के बाद काम शुरू होने का सुबूत नहीं होते। इसी तरह रंजिश में एक-दूसरे से भिड़े हुए लोग किसी किनारे नहीं पहुंचते। आज हिंदुस्तान में हाल कुछ ऐसा ही हो गया है। लोग अपनी जिम्मेदारियों पर लाठियां चला रहे हैं, अपने से दूर के हर किसी पर लाठियां चला रहे हैं, और अब तक विज्ञान ने ऐसी तकनीक विकसित नहीं की है कि चलती हुई लाठियों से बिजली बनाई जा सके।
जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा गैरजरूरी, नाजायज, और हिंसक कामों में लग रहा है, कि धीरे-धीरे करके इस मुल्क और इस बिरादरी के आने वाले दिन बेमायने होते चले जाएंगे। कुछ लोगों को आज भी हिंदुस्तान आगे बढ़ते दिख रहा है, लेकिन यह बचा-खुचा आगे बढऩा इसकी संभावनाओं के हिसाब से आगे बढऩा नहीं है, और थोड़ा-बहुत जो यह आगे बढ़ रहा है, तो यह इस हिंसक तरीके से आगे बढ़ रहा है कि गरीबों की गरीबी बढ़ाकर अमीर थोड़े से और अमीर हो जा रहे हैं, और आंकड़ों को मिलाकर पूरे देश की तरक्की बताई जा रही है। 
आने वाले दिन एक ऐसी सड़क दिख रहे हैं जिस पर हर कुछ दूरी पर सिर भिड़ाए हुए सांडों से डरकर लोग भाग रहे हैं। (हालांकि अपनी जिम्मेदारियों से सिर भिड़ाए लोगों की तुलना सांड से करना सांड का अपमान भी है।)

पैसों की हिंसा-अराजकता बढ़ाता भारतीय लोकतंत्र

28 जुलाई 2013
संपादकीय
दिल्ली से आए दिन ये खबरें टीवी पर देखने मिलती थीं, कि किस तरह पैसे वाले बिगड़ैल नौजवान रात-रात वहां की सड़कों पर मोटरसाइकिलों के स्टंट करते हैं। यह बात तो जाहिर है कि आज जब आम लोगों के पास काम पर आने-जाने के लिए भी पेट्रोल की मुश्किल होती है, तब स्टंट पर पेट्रोल खर्चने वाले लोग गरीब नहीं होते। और फिर यह भी साफ है कि उनके पास रात-रात ऐसे करतब करने का वक्त होता है, उनके पास महंगी मोटरसाइकिलें होती हैं, उनके पास कानून को तोडऩे का हौसला होता है। फिल्मों और मोटरसाइकिल कंपनियों के खड़े किए गए ऐसे माहौल से निपटना पूरे हिंदुस्तान में पुलिस पर भारी पड़ रहा है। 
ऐसे में बीती रात जब दिल्ली में इन लोगों को पकडऩे के लिए पुलिस ने मोटरसाइकिल के टायर पर गोली चलाई, तो वह एक सवार को लगी और उसकी मौत हो गई। पुलिस का गोली चलाना शायद जरूरत से अधिक था, और इसके लिए कोई दूसरा रास्ता इस्तेमाल करना था। इस पुलिस कार्रवाई की जांच होगी, और गलत पाए जाने पर किसी पर कार्रवाई भी होगी। इससे परे की बात करें, तो देश में कानून तोडऩे के लिए जो हवा बनी हुई है, उससे समाज में दो बिल्कुल अलग-अलग तबके बन गए हैं। एक तो वह तबका जिसके पास अपनी दौलत के हिंसक प्रदर्शन के लिए, कानून तोडऩे के लिए, और फिर अपने-आपको बचाने के लिए, खूब सारी ताकत है। दूसरी तरफ एक बड़ा तबका ऐसा है जो फुटपाथों पर सोते हुए रईसों की गाडिय़ों तले कुचलने का खतरा झेलता है, और उसे उसका हक न ईश्वर देता, और न लोकतंत्र देता। अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ते हुए इस फासले को लेकर कल ही एक खबर आई है कि हिंदुस्तान में संपन्न तबका अधिक संपन्न होते जा रहा है, हो चुका है, और विपन्न तबका अधिक विपन्न होते जा रहा है, हो चुका है। 
जब सड़कों पर संपन्नता का ऐसा अश्लील और हिंसक प्रदर्शन होता है, तो खाली पेट लोगों के मन में संपन्नता के खिलाफ हिंसक आवाज भी उठती है, और लोकतंत्र के खिलाफ एक बड़ी हिकारत खड़ी होती है। फिर पैसों की ऐसी हमलावर हिंसा के पीछे जब हुकूमत की ताकत भी होती है, तो लोगों के मन में हुकूमत से नफरत भी भर जाती है। भारत के लोकतंत्र को, यहां के संपन्न तबके को, और यहां पर सत्ता हांक रहे राजनीतिक वर्ग को इस बढ़ते हुए फासले का खतरा या तो समझ नहीं आ रहा है, या फिर इसी गरीब जनता के खून-पसीने से वर्दीधारी हिफाजत जुटाकर नेता और कारोबारी, अफसर और बाकी कुर्सियों पर काबिज लोग बेफिक्र हैं। दुनिया में आज जगह-जगह सत्ता के खिलाफ, बड़े कारोबारियों के खिलाफ नफरत के आंदोलनों की जो हिंसा दिख रही है, उससे हिंदुस्तान के ताकतवर लोग बेखबर लगते हैं। 
कानून की इज्जत जब और जहां खत्म होती है, वहां पर यह सिलसिला थमता नहीं है। जुर्म बढ़ते चलते हैं, अराजकता बढ़ती चलती है, ऐसी हिंसक मोटरसाइकिलों के इंजनों की ताकत बढ़ती चलती है, और उनकी रफ्तार भी बढ़ती चलती है। इस देश में कानून का राज न सिर्फ साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार से खत्म हो रहा है, बल्कि छोटी-छोटी बातों से जिंदगी के छोटे-छोटे दायरों में भी कानून का सम्मान खत्म हो चुका है। यह सिलसिला हिंदुस्तान के शहरों में आज किसी ज्वालामुखी जैसा फूटा नहीं है, लेकिन यहां के आदिवासी इलाकों के जंगलों में यह नक्सल हिंसा की शक्ल में फूट चुका है। आने वाले दिन हो सकता है कि शहरों में भी गरीब और अमीर के बीच की खाई में से लावे की ऐसी कोई लपट निकले, और फिर वह किसको जलाएगी, किसको छोड़ेगी यह समझना मुश्किल है। आज जंगलों में जब नक्सली वहां ढह चुके लोकतंत्र के खिलाफ बचे-खुचे कानून को भी खत्म करने के लिए धमाके करते हैं, तो उनसे कौन बचता है, कौन नहीं, इस पर भला किसका बस है। कल के दिन दौलत की हिंसा के खिलाफ अगर शहरों में नक्सलियों की तरह के कोई और अराजक लोग खड़े हो जाते हैं, तो कितनी वर्दीधारी बंदूकें किस-किसको बचा लेंगी? इसलिए दिल्ली के इस हादसे, या इस ज्यादती के जांच वाले पहलू से परे भी सोचने की जरूरत है कि पैसों के हिंसा को यह लोकतंत्र कब तक और किस हद तक बर्दाश्त करने वाला है, और किस हद तक बढ़ावा देने वाला है।

महिला नेताओं के दम पर खड़ी पार्टी में महिलाएं माल हो गईं?

संपादकीय 
27 जुलाई 2013
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की सांसद मीनाक्षी नटराजन को सौ टंच का माल कह दिया, हालांकि दिग्विजय सिंह के साथ ही, खुद मीनाक्षी नटराजन ने भी कहा कि यह बयान उनकी तारीफ में दिया गया था। जिस सभा में यह बयान दिया गया है, उसकी फुटेज देखने से भी यह बात कोई बहुत गलत नहीं लगती। राजनीतिक हालात देखते हुए राहुल गांधी के करीबी लोगों में अहम समझी जाती मीनाक्षी नटराजन की सार्वजनिक रूप से बेइज्जती करने की हिम्मत कोई कांग्रेसी करेगा, यह बात गले भी नहीं उतरती। लेकिन यह तो जरूर है कि मीनाक्षी की तारीफ  करते हुए दिग्विजय सिंह से शब्दों के चुनाव में चूक हो गई सौ टंच का माल सुनारी के पेशे या सोने के धंधे से जुड़ी किसी बात के लिए तो सही जुबान मानी जा सकती है, लेकिन मीनक्षी को भले ही ऐतराज ना हो, किसी महिला के लिए माल शब्द का इस्तेमाल एतराज के ही काबिल समझा जाएगा। क्योंकि शब्द जब तक इस्तेमाल नहीं किए जाते, बेजान होते हंै, लेकिन जैसे ही उन्हें इस्तेमाल किया जाता है, वे किसी न किसी सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ जाते हंै, जी उठते हैं। सुनार की दुकान पर आग में तपने और औजारों की मार खाकर गढ़े जाने वाले सोने को तो माल कहा जा सकता है, लेकिन लाखों लोगों की निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि, इस देश की कानून निर्माता के लिए इस शब्द का इस्तेमाल चुनाव की चूक ही जाहिर करता है।
भाषा और जुबान को लेकर पुराने जमाने से आज तक बहुत कुछ कहा गया है। कहा जाता है कि तलवार के जख्म भर जाते हंै, शब्दों से हुए जख्म कभी नहीं भरते। समय के साथ शब्दों के मायने भी बदलते हैं, और उनके प्रति समाज का नजरिया भी। एक समय में चमार शब्द चमड़े का काम करने वालों के लिए इस्तेमाल होता था। धीरे-धीरे इसके इस्तेमाल के संदर्भ इतने हिंसक हो गए कि इसे अछूत कही जाने वाली जाति सूचक करार देकर इसका इस्तेमाल जुर्म करार देना पड़ा। आजादी की लड़ाई के दौरान जात-पांत में बंटे देश को एक तार में जोडऩे बापू ने छुआछूत के शिकार वर्ग को हरिजन कहकर उसे सबके साथ शामिल करने की कोशिश की। जंगलों में रहते आए लोगों को आदिवासी कहा जाता था, लेकिन समाज के हर सदस्य के लिए गरिमा की भावना ने जब से जोर पकड़ा, सरकारी कामकाज में भी हरिजन, आदिवासी जैसे शब्दों की जगह अनुसूचित जाति, जनजाति का इस्तेमाल होने लगा, जिन पर कोई किसी तरह का तकनीकी ऐतराज ना जता पाए। अनारक्षित वर्ग के लिए दशकों से सामान्य श्रेणी का इस्तेमाल होते रहा, लेकिन अब जो वर्ग आरक्षित नहीं है, उसे सामान्य नहीं, अनारक्षित वर्ग कहा जाता है। वैष्णव सम्प्रदाय कृष्ण के लिए उनके श्याम रंग को अलग-अलग तरह से बड़े लाड़ से बखानता है, लेकिन इस सम्प्रदाय से परे किसी को काला, अश्वेत कहना नस्लवादी, अमानवीय समझा जा सकता है। पहले पश्चिम में हर अश्वेत को नीग्रो कह दिया जाता था और भारत में हर दक्षिण भारतीय को मद्रासी, लेकिन समय के साथ जागरूकता बढ़ी और ये गलतियां या बेइंसाफी, या दोनों, सुधार ली गईं। अक्सर लोग आरक्षित वर्ग के लोगों को सरकारी दामाद कह देते हैं। न सरकारी गाली है, न ही दामाद अपशब्द है, लेकिन इन दोनों के मेल से बना यह शब्द इस वर्ग के लिए बहुत अपमानजनक है। पहले शारीरिक दृष्टि से कोई कमजोरी रखने वाले को अपाहिज, विकलांग, दृष्टिहीन, बधिर, मूक, मंदबुद्धि, अस्थिर बुद्धि, कह देना बहुत सामान्य माना जाता था। बहुत से लोग इसमें कोई बुराई नहीं देखते थे, लेकिन इस तरह के लोगों के लिए काम करने वालों ने जब इस वर्ग के लोगों की गरिमा के लिए ऐसे शब्द कितने घातक है यह बात सामने रखी, तो अब किसी के लिए इनमें से कोई शब्द नहीं, 'विशेष जरूरतों वाले व्यक्तिÓ या 'खास तरह से सक्षमÓ का इस्तेमाल किया जाता है। जितनी बार ऐसा किया जाता है, उतनी बार यह बात अपनी जड़ें जमाती है कि इस वर्ग के लोग किसी तरह से हीन नहीं, बस उनकी जरूरतें अलग हंै, उनकी काबिलीयत दूसरों से अलग है। और सच भी है, आंखों से देख नहीं पाने वाले की जरूरत, सामान्य किताबों से पढ़ लेने वाले से अलग होती है, और अंगुलियों के पोरों से ब्रेल लिपि में लिखी बातें पढ़ लेना और हाथों की भाषा से बोल लेना खास काबिलीयत ही तो है! ऐसा सोचने की संवेदनशीलता शब्दों के सही चुनाव से आती है, अपनी जडें़ जमाती है।
समय के साथ समाज की संवेदनशीलता जैसे-जैसे बढऩे लगती है, शब्दों के राजनीतिक, सामाजिक मायने और इस्तेमाल भी उस तरह बदल जाते हंै। हम इसी जगह पर शब्दों की हिंसा पर कई बार बात करते हंै। समाज पहले से ही ऐसे लोगों के अधिकारों के प्रति बहुत लापरवाह और बेफिक्र रहा है, जो कमजोर हंै और पलट कर जवाब नहीं दे सकते। आर्थिक-सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए काम करने वाले संगठन और लोग मानते हैं कि इन्हें तब तक समाज की मुख्यधारा में नहीं लाया जा सकता, जब तक समाज के बीच इन्हें वह गरिमा न मिले, जिस पर इनका हक है। इसके लिए यह तमाम लोग और संगठन बहुत बारीकी से सोचते हैं, और बरसों इनके साथ की गई नाइंसाफी की गहरें पैठी जड़ें खोज-खोजकर उन्हें खोदकर निकालते हंै। इनके साथ बरती जाती जुबानी हिकारत ऐसी ही एक बुराई है, जिस पर बहुत बारीकी से गौर करने की जरूरत समझी जाती है, क्योंकि माना जाता है कि किसी वर्ग विशेष के लिए समाज में एक खास तरह के रवैये के लिए, उसके लिए इस्तेमाल की जाती भाषा सबसे सस्ते और असरकारक तरीके से जिम्मेदार है।
इसलिए जब समाज में सबके साथ इंसाफ की बात हो, जागरूकता और संवेदनशीलता की उम्मीद की जाए, तब शब्दों का सोचे समझे बिना इस्तेमाल ठीक नहीं है। जुबान ही क्यों, एक भी शब्द बोले बिना हमारे हावभाव जो कहते हंै, अब तो वह भी कानून के दायरे में हैं। हर समाज के भीतर सांस्कृतिक संदर्भों में शब्दों के मायने बदल जाते है। राजस्थान के लोकगीत उत्तरभारत में अश्लील माने जा सकते हैं। महाराष्ट्र या छत्तीसगढ़ में किसी महिला को सम्मान से बाई कहा जाता है, लेकिन उत्तरभारत में इस शब्द के मायने ही अलग होते हैं। ऐसा इसलिए है कि शब्द सांस्कृतिक संदर्भों से अपने मायने पाते हंै, और बोलते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहीं जिस जगह, जिस समय, और जिस व्यक्ति के लिए कोई बात कही जा रही है दर असल शब्द उसका दूसरा ही मतलब तो नहीं निकाल कर रख देंगे। सार्वजनिक जीवन में महिला नेताओं के दम पर खड़े राजनीतिक दल के एक बड़े नेता से, महिलाओं के लिए शब्दों के चुनाव में ऐसी भूल की उम्मीद नहीं की जाती।

क्या जनता नक्सलियों को नेताओं की जुबानी हिंसा का विकल्प माने?

26 जुलाई 2013
संपादकीय
राजनीति किस तरह बददिमाग और बेदिमाग, दोनों ही एक साथ हो सकती है यह देखना हो तो आमतौर पर कांगे्रस के प्रवक्ताओं और नेताओं को देखना चाहिए, एक भूतपूर्व कांगे्रसी और वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को देखना चाहिए, और ताजा मामले को लें तो भाजपा के प्रवक्ता और उसके सांसद चंदन मित्रा को देखना चाहिए। चंदन मित्रा ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए नापसंद करने वाले अमत्र्य सेन से भारत रत्न का सम्मान वापिस लेने की बात कहकर मीडिया में कुछ जगह अपने लिए भी घेर ली, और कांगे्रस के प्रवक्ताओं और गैरप्रवक्ताओं का पहले पन्ने पर एकाधिकार कुछ कम कर दिया। लेकिन अमत्र्य सेन तो अपना बचाव करने की ताकत खुद रखते हैं, उनके हिमायती बड़े-बड़े लोग हैं, और चंदन मित्रा की भाजपा ने उन्हें इस बयान के लिए छिटक भी दिया है, लेकिन गरीबों के खाने को लेकर कल से देश हक्का-बक्का है। पहले इस पार्टी के एक फिल्मी सितारा रहे प्रवक्ता राज बब्बर ने बारह रूपयों में मुंबई में पेट भरवाने का दावा किया, और मानो गरीबों के दिल पर यह लात काफी नहीं थी, तो कुछ देर के भीतर ही कांगे्रस के एक दूसरे बुजुर्ग सांसद रशीद मसूद ने दिल्ली में पांच रूपए में पेट भर खाना खिलाने का दावा किया और यह भी कहा कि वे खुद पांच रूपए से कम का खाना एक वक्त में खाते हैं।
कांगे्रस पार्टी को यह समझ ही नहीं आ रहा है कि गरीबी और महंगाई इन दोनों की मार झेल रही आधी से अधिक आबादी के दिल पर कांगे्रसियों की ये लातें कितनी जोर से पड़ती हैं। कबीर सैकड़ों बरस पहले कह गए थे कि गरीब की आह नहीं लेना चाहिए क्योंकि मरे हुए चमड़े से जो धौंकनी चलती है, उसकी हवा से भी लोहा जलकर भस्म हो जाता है। जब मरे हुए की आह से भी लोहा पिघल जाता है, तो फिर गरीब की आह में तो बहुत ताकत होती है। इसका अंदाज लगने में अभी शायद एक बरस का समय बचा है, 2014 के चुनावों में जनता पांच रूपए में पेट भर खाना खाकर वोट डालने आएगी।
भारतीय राजनीति में सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाली कांगे्रस एक वक्त गांधी और नेहरू की पार्टी भी मानी जाती थी। और अमत्र्य सेन से लेकर ज्यां द्रेज तक गरीबों के हिमायती जो अर्थशास्त्री हैं, उनकी नीतियों को समझने के बाद भी अगर सोनिया गांधी की पार्टी हिंसक बातें करना बंद नहीं करती है, तो यह हिंसा साम्प्रदायिक हिंसा से किसी भी तरह कम नहीं है। इस देश के लोग खूब जानते हैं कि कांगे्रस के नेता, और बाकी नेता भी, किस तरह का खाते हैं, क्या-क्या खाते हैं, कितना-कितना खाते हैं, कितनी पीढिय़ों के लिए खाते हैं, खाते-खाते कैसे जेल जाते हैं, यह सब कुछ जनता बरसों से रोज देखते आ रही है। उसे मालूम है कि अब यह कांगे्रस पार्टी उस नेहरू की कांगे्रस पार्टी नहीं है जो अपनी खुद की निजी जायदाद देश को देकर जाए, जनता को अब यह मालूम है कि नेहरू की पार्टी, और उससे सीखकर तकरीबन बाकी तमाम पार्टियां भी देश को अपनी निजी जायदाद मानकर चलती हैं, दुहती हैं, लूटती हैं। ऐसे माहौल में मुंबई में बारह रूपये में और दिल्ली में पांच रूपये में खाना खाकर पेट भरवाने का दावा एक हिंसा से कम नहीं है। और ऐसे लोग जब टीवी कैमरों के सामने अपनी पूरी हिंसक बातों के साथ बकवास करते हैं, तो पार्टी ऐसी हर हिंसा के साथ दसियों लाख वोट खो बैठती है। आज देश भर में चुनावी माहौल को लेकर जो सर्वे टीवी और अखबारों में दिख रहा है, उसमें कांगे्रस की इतनी दुर्गति मतदाताओं के करवाए नहीं हुई है, यह दुर्गति खुद कांगे्रस के नेताओं के करवाए हुई है। कांगे्रस पार्टी के भविष्य राहुल गांधी ने कल ही यह कहा है कि देश में बहुत गुस्सा है। इस गुस्से के पीछे की वजहें राहुल गांधी को अपनी ही पार्टी के भीतर मिल सकती हैं। यह सिलसिला, यह हिंसक सिलसिला, ये हिंसक हमले, थमने चाहिए। चुनावों से परे भी हमारी फिक्र यह है कि कांगे्रस के, और बाकी पार्टियों के भी ऐसे ओछे, बददिमाग, बेदिमाग, और हिंसक हमलों से लोगों की आस्था लोकतंत्र में कम हो रही है। क्या जनता नक्सलियों को नेताओं की जुबानी हिंसा का विकल्प माने?

गरीब की भूख के दुख-दर्द की समझ रखने वाले हाशिए पर

संपादकीय
25 जुलाई 2013
आज देशभर से ऐसी खबरें आने लगी हैं कि स्कूलों में दोपहर के भोजन में कहां छिपकली निकल रही है, और कहां मेंढक निकल रहा है। यह भी खबर आ रही है कि बिहार में जहां दो दर्जन बच्चे खाने में मिलाए गए जहर, या जहरीले तेल की वजह से मारे गए हैं, वहां पर स्कूली शिक्षक पढ़ाई से परे का खिलाने का यह काम करना नहीं चाहते। सरकार की बहुत सी जनकल्याणकारी योजनाओं को लेकर नाकामयाबी की ऐसी कहानियां किसी भी सरकार के तहत निकल सकती हैं, लगातार निकलती हैं। लेकिन जब इनको गरीबों के हक से जोड़ दिया जाता है, जब इन योजनाओं को लेकर एक ऐसी तस्वीर बनाई जाती है कि इनमें जितना भला गरीबों का होता है, उससे कहीं अधिक नुकसान उनका होता है, तो गरीबी से परे के लोग यह सोचने लगते हैं कि ऐसी योजनाओं को बंद कर देना ठीक है। 
आज यह सोचने की जरूरत है कि जब सरकार, समाज, और राजनीतिक ताकतें मिलकर गरीब और कमजोर तबकों को उनका हक देने में नाकामयाब हैं, तब  क्या इस नाकामयाबी, बेईमानी, चोरी की सजा इन गरीब और कमजोर लोगों को दी जाए? जब ताकतवर तबके की नीयत लूटने की हो, और जब सत्ता का सुख पाने वाले लोग नालायक साबित हों, तो फिर योजनाओं को अव्यवहारिक करार देना आसान होता है। यह कुछ उसी किस्म का है कि जब मौजूदा कानून पर अमल ठीक से नहीं हो पाता, तो फिर कानून नया बनाने की बात होने लगती है। यह सिलसिला खतरनाक है, और सबसे कमजोर तबके के लिए सबसे खतरनाक है। जिन लोगों ने भूख देखी नहीं है, ऐसे लोगों को गरीब बच्चों के खाने की योजना बनाने में शामिल किया जाता है। अब सांसदों की जो सलाहकार समिति दोपहर के भोजन किस्म के खाने के अधिकार पर विचार करती है, उसमें खरबपति कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल को रखा गया है। यह तो सरकार और संसद, पार्टी और सांसद, इनका विशेषाधिकार है कि किस कमेटी में कौन रहे, लेकिन जब ऐसे लोग भूख पर बात करने के लिए मनोनीत किए जाते हैं, या मनोनयन को ऐसे लोग मंजूर कर लेते हैं, तो यह खबर अपने आप में एक बहुत पैना और धारदार कार्टून लगती है। 
कुछ लोगों को यह भी लगता है कि गरीबी को जिंदा रखने के लिए लोगों को रोजगार देने के बजाय भीख की तरह खाना दिया जाता है। लेकिन ऐसे लोगों ने भी कभी भूख भोगी नहीं है। भूख जब पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को कुपोषण में किसी तरह खींचतान कर जिंदा रखती है, तो समाज में मुकाबले की लड़ाई में ऐसे कुनबों के लोग पिछड़े हुए ही रह जाते हैं। जो लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही खान-पान, जात-पात और संपन्नता की ताकत से आगे चले आते हैं, उनको भूखे तबके के मुंह और पेट के दाने खटकने लगते हैं। रोजगार रातों-रात नहीं मिल सकते। इसलिए जब तक लोगों को अपनी मेहनत की कमाई से बाजार भाव का खाना जुटाने की ताकत न मिले तब तक उनको सरकारी रियायत देना जरूरी है। इसी से जुड़ा हुआ मामला स्कूलों में दोपहर का भोजन का है, महिलाओं और बच्चों के पोषण आहार का है, वृद्धावस्था पेंशन का है, और ऐसी ही बहुत सी दूसरी गरीब-कल्याण की योजनाओं का है। भूखे पेट कोई पढ़ाई भी नहीं हो सकती, और जब खाना जुटाने के लिए बच्चे बाल मजदूरी को बेबस हों, तो वे स्कूल भी नहीं पहुंच सकते। इसलिए आज भारत में संवेदनशील और समझदार ऐसे लोगों की जरूरत है जिनको भूख की समझ हो। आज न सिर्फ संसद बल्कि देश की हर विधानसभा अरबपतियों से भरती चल रही है। ऐसे में गरीब को दी जा रही रियायत इन संपन्न आंखों में किरकिरी की तरह खटकती है। आज जब दोपहर के भोजन को लेकर देशभर में चर्चा चल रही है, तो गरीबों की बात को रखने वाले लोग भी होने चाहिए, जो कि अब संपन्न मीडिया में भी घटते चले गए हैं। जो लोग  ऐसी समझ रखते हैं, वे बाजार के दबाव में चलने वाले मीडिया में भी हाशिए पर हैं, और अपनी-अपनी पार्टी के भीतर भी।

मोदी का वीजा रोकने की अपील लाशें गिराए बिना की जा रही है..

24 जुलाई 2013
संपादकीय
गुजरात के दाग-धब्बों से घिरे मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को अमरीका का वीजा न मिले इसके लिए शायद पैंसठ भारतीय सांसदों ने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को चि_ी लिखी है। इसमें से हो सकता है कि कुछ सांसदों के दस्तखत असली न हों, लेकिन कम से कम कुछ लोगों के तो असली होंगे ही, और आज का मुद्दा आंकड़ा नहीं है, यह पहल है। पाठकों को याद होगा कि पिछले एक दशक से नरेन्द्र मोदी अमरीका और योरप के मानवाधिकार संगठनों के निशाने पर तो हैं ही, वे इसके अलावा वहां की सरकारों, संसदों, और धार्मिक स्वतंत्रता आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं के निशाने पर भी हैं। अमरीका में बार-बार एक बड़ा बहुमत उनको वीजा देने के खिलाफ रहा है, और अभी वहां गए हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमरीका से मोदी को वीजा देने की अपील भी की है। ऐसे में भारत के सांसदों द्वारा अमरीका से की गई अपील के बारे में अलग-अलग विचार सामने आए हैं। कुछ लोगों ने इसे भारत के एक मुद्दे को अमरीकी दखल तक ले जाने के बराबर माना है, और वामपंथी सांसद सीताराम येचुरी ने यह साफ किया है कि वे किसी दूसरे देश के वीजा-फैसले के बारे में कुछ कहने के खिलाफ हैं।
अब सवाल यह उठता है कि भारत के सांसदों को भारत के एक मामले को लेकर अमरीका से ऐसी अपील करनी चाहिए थी, या नहीं। यह पहला मौका नहीं है कि भारत के भीतरी मामलों में दुनिया के दूसरे देशों में हिंदुस्तानियों ने पहल की हो। आज तक की सबसे बड़ी कार्रवाई तो 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर है जिन पर दुनिया के कई देशों में सिख बिरादरी ने मुकदमे चलाने की कोशिश की है, वहां की संसदों से भारत के खिलाफ कार्रवाई की अपील की है। भारत के एक मानवाधिकार आंदोलनकारी डॉ. बिनायक सेन की नक्सल मामलों में गिरफ्तारी के खिलाफ योरप की शायद एक से अधिक संसद ने विचार किया था, और वहां से भारत सरकार तक अपील भी आई थी। इसलिए भारत के किसी मामले में देश के बाहर विचार होने का यह पहला मौका नहीं है।
आज दुनिया के देशों के बीच सरहदें सब कुछ नहीं बांट देतीं। आज जब बांग्लादेश में आग लगने से मजदूर मारे जाते हैं, तो काम की खराब स्थितियों के खिलाफ दुनिया के दूसरे देशों में भी आवाज उठती है। बाल मजदूरी दुनिया के किसी भी देश में हो, उससे बने हुए सामान खरीदने के खिलाफ दुनिया के विकसित देशों में कानून बने हुए हैं, या सरकारों ने ऐसे नियम बनाए हैं। इसलिए मोदी को अमरीका का वीजा देने के खिलाफ अगर भारत के लोग अमरीका से अपील करते हैं, तो यह गुजरात के दंगों में हजारों बेकसूर मुसलमानों की साजिश के तहत की गई हत्या के मुद्दे को उठाना है, और इसे पूरी तरह गैरजरूरी या नाजायज नहीं कहा जा सकता। कश्मीर के मामले को दुनिया के कई देशों में उठाया जाता है, भारत के लोगों द्वारा ही उठाया जाता है। इसी तरह कभी श्रीलंका के तमिल मुद्दे को, कभी भारत की गैस त्रासदी को, दुनिया का ध्यान खींचने के लिए अलग-अलग जगहों पर उठाया जाता है। 
दूसरी तरफ लोगों ने यह देखा है कि पश्चिम के देशों में मोदी और गुजरात का लंबा बहिष्कार करने के बाद पिछले एक बरस में मोदी के बारे में अपना रूख इसलिए बदला है क्योंकि वे दंगों के बाद भी दो चुनाव जीतकर एक अविश्वसनीय बहुमत के साथ लोकतांत्रिक सत्ता पर लौटे हैं, और उसे अनदेखा करना दुनिया के लिए मुमकिन नहीं है। हालात के साथ खयालात बदलने की बात पुरानी है। अगर इतिहास को देखते हुए भी भविष्य तय होगा, तो हिटलर की जर्मनी का शायद अब तक बहिष्कार जारी रहता। इसलिए गुजरात का बहिष्कार भी अगर धीरे-धीरे खत्म होगा, तो वह दुनिया के रिवाज के मुताबिक बात ही होगी। लेकिन सांसदों का गुजरात मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करना नाजायज नहीं कहा जा सकता, यह उनकी अपनी सोच का फैसला है कि वे कहां-कहां जाकर मोदी का विरोध करना चाहते हैं। मोदी समर्थकों को इसको बुरा कहने का हक तो है, लेकिन उनको याद रखना चाहिए कि अमरीका से ऐसी अपील लाशें गिराए बिना की जा रही है, और यह अहिंसक अपील है, न कि गुजरात के दंगों जैसी।

कांग्रेस को व्यंग्य बर्दाश्त नहीं

संपादकीय
23 जुलाई 2013
मुंबई में एक छोटे से रेस्त्रां में जब अपने बिल के नीचे यूपीए सरकार के खाने-पीने पर व्यंग्य कसते हुए प्रिंट करना शुरू कर दिया, तो वह युवक कांग्रेसियों की नाराजगी का शिकार हो गया। (समाचार पहले पेज पर)। ये नौजवान पहुंचे और रेस्त्रां बंद करवा दिया। इसे लेकर इंटरनेट पर सोशल मीडिया में बवाल मच गया और कांग्रेस की आपातकाल की सेंसरशिप से लेकर दूसरे किस्म की बर्दाश्त की कमी, सब कुछ लोगों को याद पड़ गई। इस देश में मजाक का हक खत्म करने का जो सिलसिला ममता बैनर्जी ने बंगाल में चलाया हुआ है, उसे राहुल गांधी के नौजवान अब मुंबई तक ले आए। कांग्रेस के लिए यह एक राजनीतिक खुदकुशी सी है, कि बैठे ठाले वह दुनियाभर में गाली खाने का काम करे। उस रेस्त्रां को तो पल भर में एक शोहरत मिल गई, और कल से उसे शायद कई गुना अधिक कारोबार भी मिलने लगेगा, लेकिन कांग्रेस पार्टी दिल्ली से लेकर मुंबई तक हर कहीं बेकाबू साबित हो रही है। 
पुराने लोगों को याद होगा कि किस तरह नेहरू-गांधी की जिंदगी में उन पर हजारों कार्टून बने, उनमें से बहुत से बहुत जहरीले भी थे, लेकिन कभी उन्होंने बर्दाश्त की कमी नहीं दिखाई। बाद में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी ने जब सेंसरशिप लागू की तब देश की सबसे बड़ी कार्टून और व्यंग्य की पत्रिका शंकर्स वीकली के संपादक ने उस पत्रिका को विरोध में बंद ही कर दिया। इसके बाद कभी-कभार ऐसा कोई मामला इमरजेंसी के बाद आया, लेकिन अधिकतर मामले हिन्दू हिंसक संगठनों ने किए। दूसरी तरफ एक हिन्दू राजनीतिक दल शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे पेशेवर कार्टूनिस्ट थे, और उनका बर्दाश्त भी खासा था। ममता बैनर्जी ने पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने के बाद वहां पर सेंसरशिप के मुकाबले और अधिक कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी, और किसी सवाल पूछने वाले को, या किसी कार्टूनिस्ट को सीधे नक्सली करार दे दिया, या अपनी हत्या की साजिश रचने वाला करार देकर उसके खिलाफ जुर्म कायम करवा दिया। दूसरी तरफ देश में जगह-जगह हिन्दू संगठनों ने कहीं मकबूल-फिदा-हुसैन के खिलाफ इतने मामले दर्ज करवाए कि उन्होंने देश के बाहर मर जाने को पसंद किया, बजाय देशभर में घूम-घूमकर कटघरों में खड़ा होने के। हाल के बरसों में जयपुर साहित्य समारोह में देश के एक विख्यात समाजशास्त्री आशीष नंदी के खिलाफ जिस तरह से मुकदमे दर्ज किए गए, उसमें भारत में बर्दाश्त के खात्मे का एक नया मामला सामने रखा। 
भारत का लोकतंत्र परिपक्व होने का नाम ही नहीं ले रहा है, और एक-दूसरे के देखा-देखी धार्मिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, प्रांतीय, और जाति आधारित संगठन अधिक कट्टरता, धर्मान्धता, साम्प्रदायिकता और नफरत के साथ हमलावर होते चल रहे हैं। ऐसे में गांधी और नेहरू की कांग्रेस पार्टी के लोग जाकर जिस तरह से गुंडागर्दी करके एक रेस्त्रां को बंद करवाते हैं, तो उससे रेस्त्रां का कोई नुकसान नहीं होता, यह पार्टी खुद ही आत्मघाती नुकसान झेलती है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी की रीति-नीति, और उसका कामकाज बेकाबू हो गया है, और जगह-जगह इस पार्टी को अपने ही नेताओं, अपने ही प्रवक्ताओं की बातों का खंडन करना पड़ रहा है, उनसे पार्टी को अलग घोषित करना पड़ रहा है। कल जिस वक्त राहुल गांधी दिल्ली में अपने नेताओं को पार्टी लाइन पर चलने की नसीहत दे रहे थे, ऐन उसी वक्त उसके नौजवान साथी मुंबई में गुंडागर्दी से रेस्त्रां बंद करवा रहे थे। आज उनको देश के सामने यह साफ करना चाहिए कि क्या यह उनकी पार्टी लाइन है? या इस पर कांग्रेस कोई कार्रवाई करेगी? 

गरीब जनता की किडनी निकालकर बेचती सत्ता

संपादकीय
22 जुलाई 2013
तम्बाखू के विज्ञापनों पर रोक लगाने के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज केन्द्र सरकार को फटकार लगाई है कि रोजाना लोग कैंसर से मर रहे हैं और सरकार तम्बाखू उद्योग के साथ सांठ-गांठ करके उस पर रोक लगाने से बच रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में बाम्बे हाईकोर्ट द्वारा जारी एक स्थगन को भी खारिज कर दिया जो कि तम्बाखू के प्रचार पर काबू लगाने के लिए सरकारी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट ने दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि सरकारी वकील ने अदालत में गैरमौजूद रहकर तम्बाखू उद्योग की मदद की। 
बड़े कारोबारियों के साथ सरकार की साजिश की कहानियां दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक बिखरी पड़ी हैं। सत्ता हांक रहे लोगों के सिर पर जो चांदी की जूती मार सके, उसके जूते उठाकर घूमने के लिए सत्ता उतारू दिखती है। ऐसी कौन सी अदालत है जहां पर आए दिन सरकारी वकील जनता और सरकार के हितों के खिलाफ ही साजिश में भागीदार न रहते हों? जिलों से लेकर हाईकोर्ट तक, और सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश के अनगिनत ट्रिब्यूनलों तक, जगह-जगह सरकार के दबाव, और कारोबारियों के पैसों की ताकत से इंसाफ को कुचलने, खरीदने, या उसके पैरों में बेडिय़ां डालकर उसे बरसों तक एक ही जगह पड़े रहने देने का धंधा देख-देखकर जनता तो सब समझ चुकी है, लेकिन इस लोकतंत्र के पास उसका कोई ईलाज नहीं है। इसलिए नहीं है कि जिस डॉक्टर को ईलाज का लाइसेंस देकर सत्ता पर बिठाया गया है, संसद मेें भेजा गया है, वे डॉक्टर मरीज की किडनी निकालकर बेचने में लग गए हैं। पिछले बरसों में टूजी घोटाले से लेकर, कोयला घोटाले तक, और कर्नाटक की खदानों से लेकर महाराष्ट्र की आदर्श सोसायटी तक, गली-गली में सत्ता पेशेवर मुजरिम की तरह काम करती है। और अदालतें ऐसे पेशेवर लोगों को रोकने की ताकत नहीं रखतीं, क्योंकि पुलिस से लेकर दूसरी जांच एजेंसियों तक, वकीलों से लेकर सुबूतों और गवाहों तक, फोरेंसिक जांच करने वाली प्रयोगशालाओं तक, मुकदमे की इजाजत देने वाले नेताओं और अफसरों तक, कदम-कदम पर लोग बिकने को तैयार हैं। और ऐसे में अदालत आज बहुत से मामलों में लाठी लेकर सड़क पर उतरती है, अपनी निगरानी में सीबीआई की जांच करवाती है, आए दिन सरकार से हलफनामे जमा करवाती है, और सरकारें हैं कि वे आदतन और पेशेवर मुजरिमों की तरह इंसाफ की आंखों में मिर्च झोंकने में लगी रहती हैं। 
न सिर्फ तम्बाखू उद्योग, बल्कि देश का हर बड़ा उद्योग, हर बड़ा कारोबार, हर बड़ा कारोबारी न सिर्फ सरकारी फैसलों को खरीदने की ताकत रखता है, बल्कि अदालती फैसलों को अपनी मर्जी तक लेट करने की ताकत रखता है। ऐसी ही खबरों को पढ़-पढ़कर लोगों के मन में लोकतंत्र के खिलाफ एक हिंसक हिकारत पैदा होती है, और लोगों को लगता है कि सिवाय नक्सल किस्म की हिंसा के, देश के सबसे गरीबों को, कमजोर तबकों को, कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। देश में बहुत से लोकतांत्रिक और इंसाफपसंद लोगों का यह मानना बढ़ते चल रहा है कि भारतीय लोकतंत्र जनता को बचाने के लायक नहीं बच गया है। जहां पर लोगों के फेंफड़ों को  खोखला करने वाले मौत के सौदागरों का साथ देने के लिए सरकार का वकील ही अदालत से गायब हो जाए, ऐसे वकील का वकालत का लाइसेंस भी खत्म होना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट को ऐसे वकील को सजा भी देनी चाहिए। हाईकोर्ट के दिए हुए स्थगन आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को हाईकोर्ट के खिलाफ इस बात के लिए कहना भी चाहिए, कि सरकारी वकील की जो गैरमौजूदगी सुप्रीम कोर्ट को दिख रही है, वह हाईकोर्ट के जज को क्यों नहीं दिखी? जहां जनता की सेहत का मामला हो वहां पर अगर हाईकोर्ट के जज भी बेदिमाग तरीके से सिर्फ मौजूद लोगों को सुनकर फैसला देते रहेंगे, तो ऐसी खुली साजिश के खिलाफ तो कितने मामलों में लोग हाईकोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकेंगे? 
हमारा मानना है कि सरकारी वकील से लेकर जज तक, अगर किसी ने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि इससे एक साजिश में उनकी हिस्सेदारी दिखती है। सुप्रीम कोर्ट की लताड़ खाकर अब हो सकता है कि सरकारों में बैठे लोग मौत बांटते तम्बाखू उद्योग को बचाने के लिए एक नया कानून भी बनाने लगें, और यह भी हो सकता है कि मौत के सौदागर संसद में एक बहुमत भी अपने पक्ष में खरीद लें। यह नौबत इस देश में नक्सल हिंसा को सही करार देने की खतरनाक नौबत है। और जनता के हक की पुलिस का घेरा अपने लिए जुटाकर सत्ता और संसद इस नक्सल हिंसा से बचे रहते हैं, और लोकतंत्र को कतरा-कतरा बेचते रहते हैं। ऐसे मामलों पर जब तक जनता के बीच खुलकर अधिक चर्चा नहीं होगी, तब तक जनता की किडनी निकालकर सत्ता इसी तरह बेचती रहेगी।

पच्यासी की उम्र में एक चने ने तबीयत से उछाला एक पत्थर...

22 जुलाई 2013
हिंदुस्तान में सबसे आम जो बातें सुनी जाती हैं, और मतलब यह कि कही जाती हैं, उनमें सबसे ऊपर है- हमारे अकेले के किए क्या होगा?
यह बात सदियों से चली आ रही एक कहावत से भी उपजी हुई हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। और मानो इसी को गलत साबित करने के लिए इस देश की 85 बरस की एक वकील, लिली थॉमस, ने सुप्रीम कोर्ट तक जाकर एक ऐसा फैसला हासिल किया जिससे कि इस देश के सारे मुजरिम-नेता हिल गए हैं। और सिर्फ मुजरिम-नेता नहीं हिले हैं, उनके वो राजनीतिक आका भी हिल गए हैं जो कि चुनाव जीतने के लिए, वसूली और उगाही के लिए जुर्म और मुजरिमों को खासा पसंद करते हैं। 
भारत की कहावतों में औरत की जगह इतनी भी नहीं होती कि एक नाकामयाब चने को भी जनाना माना जाए, और चने के साथ भी 'सकताÓ शब्द इस्तेमाल होता है। इस सोच को खारिज करते हुए लिली थॉमस ने अपने से छोटी उन तमाम पीढिय़ों को भी एक तमाचा मारा है जो कि जवान मुर्दों की तरह खामोश रहते हुए इस मुल्क को एक कब्रिस्तान में तब्दील कर चुके हैं। साठ बरस की वकालत के बाद इस उम्र में आकर उन्होंने जिस हौसले के साथ हिंदुस्तान के इस सबसे बड़े गिरोह के साथ जो टकराव मोल लिया है, उस पर अगर इसका बस चले तो वे लिली थॉमस को सौ-सौ बार मार डालें। लेकिन आज उनकी जान चली जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट की कायम की हुई हकीकत नहीं बदलने वाली है।
एक समाचार रिपोर्ट के मुताबिक- 'छह दशकों से वकालत कर रहीं 85 वर्षीय लिली थॉमस के चेहरे पर आज संतुष्टि साफ तौर पर देखी जा सकती है। वो खुश हैं कि 2005 से चलाई गई उनकी मुहिम आखिरकार रंग लाई, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक मामलों में दोषी पाए गए राजनेताओं को पद से हटने और चुनावों में भाग नहीं लेने का आदेश जारी किया। ऐसा समझा जा रहा है कि ये फैसला अब देश की राजनीतिक दिशा को बदलने में एक मील का पत्थर साबित होगा और लिली थॉमस इस बात पर बेहद खुश हैं। लिली कहती हैं कि इस देश को भ्रष्ट या गुंडे चलाएं, ये नहीं हो सकता। इसलिए तो मुझे जनप्रतिनिधित्व कानून के उस अंश पर आपत्ति थी, जिसमें प्रावधान किया गया है कि दोषी करार दिए जाने के बाद भी जनप्रतिनिधि अपनी कुर्सी पर बने रह सकते हैं अगर वो उस अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस धारा को गैर संवैधानिक मानते हुए आदेश पारित किया कि किसी भी हाल में आपराधिक मामलों में दोषी पाए गए जनप्रतिनिधि को कुर्सी पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।Ó
इस हौसले को देखकर याद पड़ता है कि अपने-अपने वक्त में जब भी कोई जुल्मी भाड़ फोड़ा गया है, वह अकेले चना ने ही फोड़ा है। गांधी के साथ उनकी बनिया बिरादरी नहीं खड़ी थी, उनके गुजराती लोग नहीं खड़े थे, उनके साथ बैरिस्टरों का कोई समूह भी नहीं खड़ा था। उनके साथ तो दरअसल शुरूआत में हिंदुस्तान के वे तमाम रायबहादुर भी नहीं खड़े थे जो कि अंगे्रज सरकार में ईश्वर देखते थे, और जिनको गोरे तलुओं का स्वाद जुबान चढ़ चुका था। और गांधी की बात ही क्यों करें। उनसे सदियों पहले कबीर नाम का एक इंसान हुआ था, जिसके साथ उसकी जात के लोग नहीं थे, उसके मजहब के लोग नहीं थे, उसके साथ उसके पेशे वाले बुनकरों का कोई संगठन भी नहीं था। वह पूरी तरह खालिस अकेला था, लेकिन खरा था। गांधी भी अकेले थे, लेकिन खरे थे। 
आमतौर पर खरों की खैर नहीं होती। लेकिन जो अपनी खैर की परवाह किए बिना लड़ते हैं, वे ही अकेले चने रहते हुए भी भाड़ को फोड़ पाते हैं। इसलिए ऐसे ही अकेले चनों की गौरवशाली परंपरा को लिली थॉमस ने आगे बढ़ाया है। उन्होंने राजनीति से अपराधियों को बाहर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की और वहां अदालत को इस फैसले पर बेबस किया कि कैसे-कैसे मुजरिम नेताओं के चुनाव लडऩे पर कैसी-कैसी रोक लगाई जाए। आज हिंदुस्तान की संसद में भरे मुजरिम, और मुजरिमों से भरी पार्टियां आपस में सिर मिलाए हुए बैठकें कर रहे हैं कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कुचलने के लिए  संविधान में फेरबदल किया जाए और उसमें मुजरिमों के लिए इज्जत की जगह बनाई जाए। 
अकेले चने सब कुछ फोड़ सकते हैं, उसकी नीयत होनी चाहिए, उसमें खरापन होना चाहिए, और लडऩे का हौसला होना चाहिए। लिली थॉमस को देखकर दुष्यंत कुमार की लिखी हुई यह बात याद पड़ती है-
कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता, 
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।
हिंदुस्तान का लोकतंत्र मध्यप्रदेश पर्यटन के नारे की तरह का है जो कहता है- एमपी अजब है, सबसे गजब है। इस देश में आपातकाल से लेकर अब तक जब-जब संसद ने निराश किया, सरकार मुजरिम बन गई, राजनीतिक दल जीत की चाह में सौ फीसदी खोटे साबित हो गए, तब-तब अदालत में एक उम्मीद दिखाई। आज देश की सबसे बड़ी अदालत हाथ में झाड़ू लेकर संसद और विधानसभाओं की सफाई का काम भी कर रही है क्योंकि मुजरिमों के आका वहां बैठकर थूक रहे हैं। 
यह नौबत उस लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है जो अपने-आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, जो इसे गौरवशाली कहता है। मुजरिमों को गोद, कंधे, और सिर पर बिठाकर उनकी पेशाब से गीला लोकतंत्र गौरवशाली नहीं हो सकता। आज यह लोकतंत्र ऐसी तिकड़में निकाल रहा है कि किस तरह जनता के सूचना के अधिकार से अपने मुजरिम नेताओं की पार्टियों को परे रखे। यह तिकड़म निकाल रहा है कि कैसे मुजरिमों को अपनी गाडिय़ों में तिरंगा फहराने का हक देकर देश की वर्दियों को उन्हें सलाम करने की जिम्मेदारी दे। 
ऐसे लोकतंत्र की इस नौबत को खारिज करने के लिए 85 बरस की डेमोके्रेसी की लड़ाका नौजवान लिली थॉमस की जरूरत है, 25 बरस की उम्र में जींस पहनकर डेनिमक्रेसी वाले मुर्दों की नहीं।

यह फैसला बदलना चाहिए

संपादकीय
20 जुलाई 2013
मेडिकल कॉलेज में दाखिले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेडिकल पढ़ाई की दूकान वालों के लिए खुशियों का पैगाम लेकर आया है। इस देश में सिर्फ एक मेडिकल कॉलेज की जांच अभी दिल्ली में चल रही है, और सिर्फ इसी बरस के दाखिले में उस एक कॉलेज में डेढ़ सौ करोड़ की काली कमाई का अंदाज है। ऐसे में देश में जब ऐसे सैकड़ों कॉलेज हैं और उनमें दाखिले में जब हर बरस खरबों की काली कमाई  का अंदाज है, तो फिर यह फैसला सवाल खड़े करता है कि इससे किसका भला होने जा रहा है? देश के मुख्य न्यायाधीश जब जाते-जाते आखिरी दिन यह फैसला देते हैं, और बेंच के एक जज उनके साथ होते हैं, एक खुलकर खिलाफ होते हैं, तो जाहिर तौर पर यह फैसला अपील के लायक है।
केंद्र सरकार  को जनकल्याण की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। अगर मौजूदा कानून की ऐसी जनविरोधी व्याख्या हो सकती है, तो इस व्याख्या वाले फैसले के खिलाफ अदालती इलाज तो ढूंढना ही चाहिए, इसके खिलाफ अगर कानून में फेरबदल करने की जरूरत हो, तो वह भी करना चाहिए। पिछले बरसों में देश की सुप्रीम कोर्ट ने जो बहुत ही बाजार-समर्थक फैसले दिए हैं, यह उनमें से एक है, और इसके पीछे दो जजों के बहुमत की जो सोच है, वह इसी बेंच के तीसरे और असहमत जज की कड़ी असहमति से उजागर भी हो जाती है। 
पूरे देश में मेडिकल दाखिले के लिए एक ही इम्तिहान से निजी कमाऊ कॉलेजों की दूकानदारी पर लात पडऩे वाली थी, इसलिए ऐसे कॉलेजों के हिमायती इस प्रचार में लगे थे कि इससे राज्यों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बड़े और विकसित राज्यों के ही बच्चे भर जाएंगे, जबकि हर राज्य को यह छूट थी कि वह अपने कॉलेजों की राज्य की सीटों पर अपने ही बच्चों को दाखिला दे। छत्तीसगढ़ में यह लागू भी है। ऐसे में दूसरे प्रदेशों के बच्चों के आ जाने का हौव्वा खड़ा करना एक झूठी बात थी। 
देश में जब स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी है तब मेडिकल की सीटें बरसों तक कम रखकर उनमें दाखिले के लिए भारी भ्रष्टाचार होते आया है। बहुत से दूसरे जरूरी क्षेत्रों की ही तरह शिक्षा से भी सरकार के हाथ धो लेने के बाद अब वह दिन कब के हवा हो चुके, जब गरीब माता-पिता की प्रतिभाशाली संतानें डॉक्टर, इंजीनियर बन जाया करती थीं। अब उदार शिक्षा व्यवस्था में  निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा मनमानी केपिटेशन फीस की वसूली पर कोई प्रभावी रोक नहीं है। इन तमाम बातों से भी अलग, मेडिकल शिक्षा की काबीलियत और इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों को  अलग-अलग राज्यों और संस्थानों के लिए 6 से 15 तक परीक्षाएं देनी पड़ती थी, जिन पर बहुत सा समय पैसा तो खर्च होता ही, उन्हें और उनके  परिवारों को बहुत परेशानी भी होती थी। फिर अंत में बाकी जगह दाखिला मिल जाने के बाद वह एक कॉलेज में दाखिला लेते और बाकी कॉलेजों में उन्हें दाखिला देने वाली सीटें खाली रह जाती तो उन्हें भरने की कवायद होती जो कि पैसों और मानव संसाधन का एक गैर जरूरी और बड़ा खर्च था।  
इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए खुद सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में एक काबिल एजेंसी द्वारा सामान्य  प्रवेश परीक्षा को जरूरी करार दिया था। ताजा फैसले के बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि उसमें इस पुराने फैसले की बातों पर भी ध्यान नहीं दिया गया है। भारतीय चिकित्सा परिषद जैसी संवैधानिक संस्था की दक्षता और विशेषज्ञता पर सवाल खड़े करते हुए निजी संस्थाएं खोलने के बुनियादी अधिकारों की तरफदारी की गई है।  मेडिकल में दाखिला पाने के लिए अलग-अलग परीक्षाएं देने वाले लाखों उम्मीदवारों और उनसे दोगुने उनके माता-पिता की बजाए,सुप्रीम कोर्ट का फैसला अरबपति कालेबाजारियों का भला करने वाला है। अपने आखिरी फैसले के रूप में जस्टिस अल्तमस कबीर ने बहुत निराश किया है। इस फैसले को हर हाल में बदलना चाहिए। चाहे अदालत से, चाहे संसद से। 

रश्क होता है कि अफ्रीका के पास मंडेला है

संपादकीय
19 जुलाई 2013
दक्षिण अफ्रीका को देखकर रश्क होता है। वहां नेल्सन मंडेला की सेहत ठीक होने के लिए पूरा देश, और बाहर की दुनिया भी दुआ कर रही है। अफ्रीका में शायद ही कोई ऐसा हो जो मंडेला के लिए फिक्र ना कर रहा हो। और यह तब, जब वे किसी कुर्सी पर नहीं हैं, उनके कुनबे का कोई कुर्सी पर नहीं है, और सरकार  में उनका कोई दखल नहीं है। उन्हें चुनावों में किसी को टिकिट नहीं देनी है, ना ही औद्योगिक नीतियों में फेर बदल करके अरबों के फेरबदल करने हैं, ना हथियारों की बड़ी खरीद में उनके कोई भूमिका है, लेकिन 95 साल के इस बुजुर्ग नेता के बीमार पड़ते ही उनके देश के राष्ट्रपति अपना विदेश दौरा रद्द कर देते हैं। सही मायनों में वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपिता हैं, जैसे कि एक वक्त हिंदुस्तान में गोडसे-गैंग के अलावा बाकी लोगों के लिए गाँधी थे।
मंडेला को देखकर रश्क इसलिए होता है कि इतने बड़े हिंदुस्तान में एक भी इंसान या भगवान ऐसा नहीं है जिस पर लोगों को इतना और ऐसा भरोसा हो। जिस तरह ईश्वर ने अपने आते जाते भक्तों को उत्तराखंड में मौत दी है, उससे उसके इन्साफ पर भी बड़े सवाल खड़े हो गए हैंं, इसलिए अब लोगों को लगता है कि भरोसा करें तो किस पर करें? लेकिन अफ्रीका में ऐसा नहीं है। वहां घर बैठे  हुए भी बरसों से मंडेला की बात का इतना वजन था कि दुनिया भर की संस्थाएं उनके मुंह से अपने बारे में एक अच्छी बात कहलवाने के लिए मरी जाती थीं, क्योंकि उनकी एक तारीफ घर बैठे दान की बौछार करवा देती थीं।
आज हिंदुस्तान टुकड़ा-टुकड़ा हुए जा रहा है, लोगों के बीच सिर्फ जहर घुला दिख रहा है, और इस देश को थामकर रखने वाला कोई नहीं है। देश में जनता की भलाई के लिए जरूरी इतने काम बाकी हैं, लेकिन लोगों ने जिस संसद को चुनकर बनाया है, उसकी बजाय देश के सांसद टीवी स्टूडियो में बहस करते हैं, संसद का बहिष्कार करते हैं। लोगों के लिए जनसेवा के नाम पर राजनीति इतनी मतलबपरस्त हो गई है कि अब नेता और उनकी पार्टियाँ सत्ता की बात करते  हैं, सेवा की नहीं।  आज इस देश में नेताओं और पार्टियों के बीच जो गैंग-वार  चल रहा है, उसे कोई कानून दूर नहीं कर सकता, उसके लिए राष्ट्रीय सहमति बनाने के लायक किसी इंसान की जरूरत है, और ऐसे कोई इंसान बच नहीं गए हैं। कुछ महीने पहले जिस अन्ना  हजारे को बहुत से लोग देश की एक उम्मीद समझने का धोखा खा बैठे थे, वे अन्ना हजारे कल कहते हैं कि मोदी सांप्रदायिक नहीं हैं। देश में आम सहमति बनाने वाला कोई कद्दावर नेता नहीं रह गया है जिसके पीछे मौका आने पर पूरा देश खड़ा हो जाए। जब तक अदालतें चाबुक नहीं फटकारती, भ्रष्टाचार चलता रहता है, जब तक चुनाव आयोग छापे नहीं मारता, शराब-नकदी चुनावों में बंटती रहती है। जब तक कैग आंखें नहीं दिखाती देश की संपत्ति की बंदरबांट पूरी बेशर्मी से जारी रहती है। अगर संवैधानिक  संस्थाएं ना हों, तो नियम कायदे नैतिकता की बातें करने वाला कोई ना बचे, लेकिन  संवैधानिक संस्थाओं की स्वयत्तता भी विवाद  से परे नहीं है, ऐसे में सारा दारोमदार न्यायपालिका पर आन पड़ा है।  
लेकिन न्यायपालिका के भरोसे लोकतंत्र चलाने की कोशिश खतरनाक हो सकती है। आपातकाल के दौरान और उसके बाद भी कई मौकों पर न्यायपालिका के फैसलों पर सवाल खड़े किए गए हंै, बहुत से जजों के फैसले, निष्ठा, सवालों के कटघरों में लाए गए हैं। ऐसे में लोकतंत्र के इस पाये पर उसका  सारा बोझ डालना इस देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन अगर हम चारों तरफ देखे तो पाते हंै कि जिन लोगों पर इस देश को चलाने की जिम्मेदारी डाली गई है  और जिन्हें देश की सवा अरब जनता के लिए फैसले करने का हक दिया गया है उन्हें ना देश की पड़ी है, ना जनता की। उनके लिए अपने स्वार्थ, अपनी पसंद और अपनी नफरतें ही सब कुछ हैं। अपने आप में सिमटे इन नेताओं की नजर इस देश की जनता पर पडऩे ही नहीं पाती है। एक पत्रकार ने कहा है कि नेल्सन मंडेला के चेहरे को देखें तो उस पर 27 साल जेल काटने की कड़वाहट का कोई निशान तक नहीं दिखता, बस एक मुस्कान फैली हुई है, लेकिन हमारे यहां बेनी प्रसाद वर्मा, ममता बैनर्जी, मनीष तिवारी ,कपिल सिब्बल, नरेन्द्र मोदी,राज ठाकरे जैसे तमाम नेताओं के चेहरे देखें तो वह नफरत और तंज से टेढ़े ही दिखते हंै। अगर मंडेला को 27 बरसों की जेल के बाद अपने सपनों का दक्षिण अफ्रीका बनाने का मौका मिला तो इन नेताओं की हसरतें भी कोई ऐसी अधूरी नहीं रही है कि इनके चेहरों पर मुस्कान की एक लकीर तक ना दिखे।
दुख इस बात का है कि  उनके चेहरे, उनका लहजा  उनके विरोधियों को तो नहीं सहमाता, क्योंकि वह भी कमोबेश उनके ही जैसे हंै, लेकिन इन सबको देखकर देश की जनता सहम जाती है कि इन नेताओं से वह क्या उम्मीद करे, किसके आगे अपना दुखड़ा रोए। बड़ी-बड़ी लच्छेदार जुबान में आग उगलते राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक नेताओं में ऐसा एक भी नहीं है जिसकी सेहत को कोई आंच आए, तो पूरा देश उसके लिए प्रार्थना करने जुट जाए।
राजनीति, धर्म और समाज से परे भी ऐसी कोई हस्ती इस सवा अरब के देश में नहीं है। यह नुकसान इन नेताओं का नहीं है, क्योंकि इन्होंने अपनी जड़ें मजबूत कर ली हंै, अपने स्वार्थ यह साध चुके हंै। यह नुकसान इस देश की जनता का है जो लोकतंत्र पर भरोसा कर के ऐसे लोगों के हाथ में अपना भविष्य सौंपती है। लोकतंत्र की उस व्यवस्था का है जिसके भरोसे  रोज सुबह से शाम अपने जीवन के संघर्षों में उलझी जनता जीती है, लेकिन दिन ब दिन उसका भरोसा छला जाता है। वह ज्यादा से ज्यादा संघर्ष में धकेली जाती है, ताकि उसे अपनी रोजमर्रा की मुसीबतों से सिर उठाने का मौका ही ना मिले कि वह इन बातों पर गौर करने के लिए सांस भी ले सके। अपने स्वार्थ में डूबे ऐसे नेता, अफसर ,व्यापारी , धर्म समाज के प्रमुख अपने मद में चूर यह नहीं समझते, कि वह जो कर रहे हंै उससे उनके पैरों तले जमीन बहुत तेजी से सिकुड़ती जा रही है, क्योंकि एक ना एक दिन जनता इन्हें अपना नेता बनाने की भूल पर पछताएगी। अफसोस इस बात का नहीं है कि तब यह अपने पैरों पर खड़े होने लायक नहीं बचेंगे। खौफ इस बात का है कि वह दिन आने तक यह इस देश के लोकतंत्र का क्या हाल कर चुके होंगे!

आधी आबादी के हक में

संपादकीय
18 जुलाई 2013
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विवाह सुधारों पर मंत्रियों के समूह के सुझावों को मंजूरी देते हुए पति की पुश्तैनी जायदाद में तलाकशुदा पत्नी को हिस्सा देने का रास्ता खोल दिया है। समाज सुधार का यह कदम अभी कार्यपालिका के स्तर पर उठाया गया है। इसे संसद की मंजूरी मिलने पर यह कानूनी रूप में अमल में भी आ जाएगा। जिस देश में बरसों से महिला आरक्षण का मामला संसद में लटका पड़ा है वहां केंद्रीय मंत्रिमंडल के ऐसे फैसले का क्या हश्र होगा यह आने वाले दिन बताएंगे, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह औरतों के हक में उठाया गया एक अहम कदम है, और सभी को इसका समर्थन करना चाहिए। वर्ना हमारे जैसे देश में जहां पिछले नौ बरसों से काबिज सरकार अपनी तमाम अहम योजनाओं को आम आदमी  एजेंडा कहती है, जिसका प्रधानमंत्री हर साल लालकिले से देश से बातें करते हुए सिर्फ आम आदमी की बातें करता है और जहां एक राजनीतिक दल  का नाम फख्र से 'आम आदमी पार्टीÓ रखा गया है, वहां औरतों, और वह भी आम औरतों की बातें कम ही हुआ करती हैं।
कोख में आते ही बिन मांगी बन जाती औरतों के लिए हमारे देश में आम तौर पर नजरिया कितना हिंसक, असंवेदनशील और ऐतराज़ के लायक है इस बारे में हम अक्सर लिखते रहे हैं। हमने मौका मिलते ही अपने पाठकों का ध्यान  इस ओर खींचा है कि  किस तरह औरतों के लिए हिकारत हमारी जुबान में, हमारे रस्मोरिवाजों ,सोच में कूट कूटकर भरी हुई है,मिसालन हमने आम आदमी पार्टी के गठन पर लिखा था '... मतलब यह कि भारत की करीब आधी आबादी से उस पार्टी के नाम को तो काट ही दिया गया है। जब कभी सत्ता में बैठे हुए कोई लोग कायर साबित होते हैं, या किसी को कायर साबित करना होता है, तो लोग उन्हें ले जाकर चूडिय़ां भेंट करते हैं। मानो चूडिय़ां कायरता का एक प्रतीक हों। और यह काम उस कांग्रेस के लोग भी करते हैं, जिसकी मुखिया इंदिरा गांधी को अटल बिहारी बाजपेयी तक ने दुर्गा कहा था, और जिसे बांग्लादेश बनवाने वाली साहसी महिला माना जाता था, परमाणु परीक्षण करवाने वाली महिला माना जाता था। इसी तरह उस भाजपा के लोग चूडिय़ों को कायरता के प्रतीक के रूप में ले जाकर अफसरों को भेंट करते हैं, जो भाजपा भारतमाता की तस्वीर की पूजा करती है, जो कि  विजयाराजे सिंधिया जैसी नेता की पार्टी रही है. .....इस देश की अदालतों में कानून में नागरिक के लिए पुरूष का शब्द ही इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कि समाज का, अदालत का, और कानून बनाने वालों का रूख पता लगता है...लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हुए भारत के प्रधानमंत्री दस-दस बार आम आदमी की चर्चा करते हैं, मानो आम औरत का कोई दुख-दर्द ही नहीं है, उसकी कोई हस्ती ही नहीं है,जबकि चिकित्सा विज्ञान की हकीकत यह कहती है कि आम औरत के भीतर तो आम आदमी हो सकते हैं, औरत के भीतर ही होते हैं, आम औरत कभी आम आदमी के भीतर नहीं होती। लेकिन सोच और भाषा की यह नाइंसाफी हिंसा की हद तक फैली हुई है, और इसका कोई अंत नहीं दिखता है।Ó 
इस देश में पैदाईशी भेदभाव भुगतती औरतों के मुसीबतें अनगिनत  हंै, ऐसे में उनके हक में कोई ऐसा कानून बनाना बहुत जरूरी है जो उन्हें ना इंसाफी  से बचाए, बराबरी का दर्जा दे, और मर्दों की ही तरह मौके दे।  हम खुशकिस्मत हंै कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में रहते हैं, जहां सरकार ने औरतों को 45 बरस की उम्र तक सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने की छूट दे रखी है।  पैदा होते से ले कर शादीब्याह बाल बच्चों की जिम्मेदारियों से निपटते, उनकी जिंदगी के 45 साल गुजर ही जाते हैं। उसके बाद शायद उन्हें अपने बारे में सोचने का मौका मिलता है, लेकिन तब तक उनके हाथ से बहुत से मौके निकल चुके होते हैं। यह बात समझने की है कि संवेदनशीलता दिखाने वाली छत्तीसगढ़ सरकार से सीख लेने वाली कितनी सरकारें हंै, कितने दल हैं। अगर सारे दल आधी आबादी के लिए इतनी संवेदनशीलता दिखाते,तो महिला आरक्षण विधेयक बरसों से कानून बनने की राह देखते पड़े नहीं रहता। अच्छी बात है कि देश के प्रमुख दल इस कानून के पक्ष में हंै। यह सच है कि अकेले कानून बना देने भर से संवेदनशीलता नहीं आ जाती, सरकारी तंत्र को कानून की भावना के हिसाब से संवेदनशील बनाना जरूरी होता है, वर्ना अभी  दो तीन दिन पहले ही हमने देखा कि महिलाओं,लड़कियों के लिए तरह-तरह की कल्याणकारी योजनाएं बनाने वाली मध्यप्रदेश सरकार की नाक के नीचे एक पुलिस वाले ने कैसे एक बूढ़ी महिला को सरेआम बेरहमी से पीटा। जाहिर था अपने मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता उस तक नहीं पहुंची थी, ना उसे अपने प्रांत की सरकार के मिजाज का कोई खौफ था।
यह सच है कि कानून, योजनाएं बनाने भर से कुछ नहीं होता, लेकिन यह भी सच है कि कुछ करने के लिए कानून बनाने की जरूरत होती है। दहेज विरोधी कानून इसकी मिसाल है कि किस तरह इसके कारण आज कम से कम लड़के वालों को इसे तोडऩे पर झुंड के झुंड जेल जाने का डर रहता है। इससे वधुपक्ष को फायदा हुआ है इससे इंकार नहीं किया जा सकता, इसलिए सामाजिक, पारिवारिक, और राजनीतिक स्तर पर कमजोर औरतों के हक में माहौल बनाने के लिए जरूरी कानून बनाने की पहल तो होनी ही चाहिए। सरकार अपने तंत्र को उसके अमल के लिए संवेदनशील ना भी बना सके, तो उसका लाभ पाने वाला तबका उसका फायदा उठा लेता है। अगर कानून होगा, तो उसके टूटने का विरोध, और तोडऩे के नतीजों का डर रहेगा, इसलिए औरतों के हक में केंद्रीय मंत्रिमंडल का यह फैसला स्वागत योग्य है। आज तक तलाक के बाद घर समाज से काटकर अलग थलग कर दी जाने वाली औरत के साथ इस कानून से इंसाफ होगा, इसमें भी शक नहीं। वर्ना अपने जीवन के बरसों पति के परिवार के लिए खपा देने वाली औरत उससे तलाक मिलते ही उसके परिवार के लिए अस्तित्वहीन हो जाती है। यह कानून शादी के दौरान पति के परिवार के लिए उसका योगदान करेगा। अभी दो दिन पहले ही लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि महिला आरक्षण विधेयक का उनका दल समर्थन करेगा। ऐसा ही रुख देश के सभी दल केन्द्रीय मंत्रिमंडल  के इस प्रस्ताव के लिए जताए तो देश की आधी आबादी के लिए उनकी फिक्र साबित हो सकेगी। 

दोपहर के भोजन से हुई मौतें, और उससे जुड़े कुछ दूसरे मुद्दे

17 जुलाई 2013
संपादकीय
बिहार के एक गांव के स्कूल में दोपहर का भोजन खाने के बाद बड़ा बुरा हादसा हुआ और बीस बच्चे जान खो बैठे। अपने किस्म का देश का यह सबसे बड़ा हादसा है, और इसके पहले दोपहर के भोजन में कहीं ऐसा कुछ हुआ भी नहीं था। एकदम से बिहार सरकार निशाने पर है, होना भी चाहिए, क्योंकि इतने मासूम बच्चे एकमुश्त ऐसे गुजर जाएं तो दिल दहलना स्वाभाविक है। इसकी जांच के बाद सजा तय होना एक अलग बात है, लेकिन आज देश में दोपहर के भोजन के आंकड़ों के साथ जोड़कर ही इस हादसे को देखना चाहिए। 
देश के सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन गर्म, ताजा पका हुआ  मिलता है। इसकी वजह से गरीब परिवारों पर से बोझ हटा भी है और बच्चों में कुपोषण कम भी हुआ है। जो बच्चे स्कूल नहीं आते थे, ऐसे गरीब बच्चों के लिए यह खाना एक आकर्षण भी बना है। दोपहर के भोजन का फायदा पाने वाले बच्चे बारह करोड़ से अधिक हैं, और ये आबादी के दस फीसदी के करीब हैं। ऐसे में बिहार के इस हादसे को देखने के साथ-साथ यह भी समझना होगा कि जब बारह करोड़ बच्चे, स्कूल के छोटे कर्मचारी, पकाने वाले लोग, इतने सब लोग जहां दशकों से रोज खाना खाते हैं, वहां पर एक ऐसा हादसा अनुपात से बढ़ाकर देखने पर गरीबों की भलाई की इस योजना की विश्वसनीयता कम होगी। इससे जिन बच्चों की जान जा चुकी है, उनसे परे भी करोड़ों गरीब बच्चों का एक नुकसान हो सकता है। इसलिए राष्ट्रीय महत्व की योजनाओं में होने वाले हादसों को उनके आकार के अनुपात में देखकर ही उनके बारे में लिखना चाहिए, सोचना चाहिए, और उनकी चर्चा करनी चाहिए। देश में हर बरस बहुत सी ऐसी शादियां होती हैं जिनमें कुछ सौ लोगों का खाना बनता है, और उसे खाकर भी दर्जन भर लोगों के साथ ऐसा हादसा हो जाता है। इसलिए बिहार की स्कूल में बच्चों के गुजर जाने के इस मामले में सजा तय करने के साथ-साथ, इससे सबक लेना चाहिए और बाकी देश में ऐसी कोई चूक न हो, उस पर ध्यान भी देना चाहिए। 
हम इस अखबार में राष्ट्रीय महत्व के जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के बारे में इस बात का ख्याल रखने की कोशिश करते हैं। टीकाकरण कार्यक्रम में कहीं-कहीं पर एक-दो बच्चों की मौत हो जाती है। इसी तरह परिवार-नियोजन के ऑपरेशनों में कभी-कभी किसी महिला की मौत पर हंगामा होता है। इनके साथ-साथ यह भी समझना चाहिए कि जब दस-दस करोड़ बच्चों को टीके लगते हैं, जब दसियों लाख महिलाओं के ऑपरेशन होते हैं, तो कोई एक-दो हादसे ऐसे हो सकते हैं, उन पर कड़ी जांच होनी चाहिए, लेकिन उन पर दहशत फैलने जैसी खबरें नहीं बननी चाहिए। उनसे एक मौत के साथ तो इंसाफ हो सकता है, लेकिन रूकने लायक अनगिनत और मौतें थमना रूक भी जाता है। 
बिहार के स्कूल के इस हादसे को लेकर हो सकता है कि देश के भीतर बाजार का वह गिरोह फिर सक्रिय हो जाए, जो कि स्कूलों में पके हुए खाने के बजाय पैकेट में बंद, कारखानों में बना हुआ खाना देने का अभियान चलाए हुए है। इस मौके पर अगर देश की भावनाएं अनुपात से अधिक विचलित की जाएंगी, तो हो सकता है कि बाजार इसका फायदा उठाकर बच्चों की सेहत को खराब करने वाला खाना सप्लाई करने का काम पा ले। इसलिए बीस बच्चों की मौत को दशकों से चले आ रहे रोजाना के बारह करोड़ बच्चों के खाने से जोड़कर ही समझना चाहिए। 

महाराष्ट्र के डांस बार पर से रोक खत्म, एक सही फैसला

संपादकीय
16 जुलाई 2013
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले छह बरस से मुंबई के डांस बार पर राज्य सरकार द्वारा लगाई गई रोक को खत्म कर दिया है। कांग्रेस-एनसीपी की महाराष्ट्र सरकार ने जब यह रोक लगाई थी तब भी हमने इस फैसले का विरोध किया था और इसे एक दकियानूसी कदम बताया था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि इन बरसों में हमने दर्जनभर से अधिक बार इसका जिक्र करते हुए कांग्रेस पार्टी की आलोचना की थी, और कहा था कि बार में काम करने वाली दसियों हजार लड़कियां इसके बाद कुछ और अधिक बुरा पेशा करने के खतरे में पड़ गई थीं, और वयस्क मनोरंजन के लिए ऐसी जगहों पर जाने वाले लोग कुछ और खतरनाक बालिग तफरीह की तरफ मुड़ गए। 
शुद्धतावादियों की सोच जिस तरह के सामाजिक सुधार का दावा करती है वैसा सुधार होने के बजाय समाज का नुकसान अधिक होता है। महाराष्ट्र देश का सबसे विकसित और आधुनिक राज्य माना जाता है लेकिन उस राज्य में शिवसेना जैसी सोच के चलते कई राजनीतिक ताकतों के मन में शुद्धतावादी होने की बात उड़ान भरने लगती है। लेकिन यह सिलसिला खतरनाक है और निजी पसंद-नापसंद की आजादी के खिलाफ है ही। मुंबई से लेकर असम तक और राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर इस पार्टी की सरकारों के अफसरों तक, महिलाओं की इज्जत के मामले में इस पार्टी की समझ का दीवाला निकला हुआ है। यह पार्टी एक पुरूषप्रधान हिंसक सोच वाली कट्टर संस्कृति को उसी तरह बढ़ावा दे रही है जिस तरह शिवसेना या श्रीराम सेना देती हैं, जिस तरह से मुस्लिम पंचायतें या खाप पंचायतें फतवे जारी करती हैं। 
मुंबई के डांस बार शराबखाने थे और वहां पर सिर्फ वयस्क ग्राहक ही पहुंचते थे। बिना डांस के भी वहां बार चल रहे हैं, जहां सिर्फ बालिग लोगों को ही दाखिला है। इसलिए अगर शराब पीने के साथ-साथ लोग मनोरंजन के लिए नाच देख लेते थे तो उसमें ऐसी कोई सामाजिक बुराई नहीं थी जो कि वेश्यावृत्ति या और कई किस्म के देह संबंधों से अधिक खराब रही हो, या अधिक खतरनाक रही हो। इस देश की संस्कृति में दरबारी नृत्यांगनाओं से लेकर कोठों की तवायफों तक, और सामाजिक जलसों में स्थानीय लोक नर्तकियों तक की लंबी परंपरा रही है। और डांस बार बंद हो जाने के बावजूद देश में जगह-जगह सबसे महंगी होटलों में कैबरे जैसे डांस चलते ही हैं। इसलिए डांस बार पर प्रतिबंध ने ऐसी कोई चीज देश में नहीं रोक दी थी जो कि इस देश के रईसों को हासिल न हो। आज भी देशभर में निजी पार्टियों में हर तरह के डांस के लिए देश-विदेश की नर्तकियां कतार लगाकर काम ढूंढती हैं। 
हिन्दुस्तान को जिस पाखंड से आजाद होना चाहिए, और जिसके लिए कट्टर धर्मान्ध और दकियानूसी लोग अड़े रहते हैं, उनकी पसंद का काम कांग्रेस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र की सरकार करे, यह शर्मनाक था। इससे देश में उस हिंसक संस्कृति को बढ़ावा मिलता है जो कि वेलेंटाइन डे पर या नए साल की दावत पर हमले करती है। आज भी सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले के बाद एक खबर यह है कि महाराष्ट्र सरकार इसके कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही है। अब कांग्रेस-एनसीपी सरकार की यह जिद खत्म होनी चाहिए, और बिना खतरों वाला यह वयस्क मनोरंजक लोगों को मिलने देना चाहिए। डांस बार में अगर कोई अधिक नुकसानदेह चीज है तो वह शराब है न कि डांस। शराब जारी रहे और डांस रोक दिया जाए, यह बहुत ही बेवकूफी की बात थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को खत्म करके एक सही फैसला दिया है। 
वयस्क मनोरंजन पर रोक का यह सिलसिला इसलिए खतरनाक है क्योंकि भारत में समाज और सरकार इस हकीकत को मानने से ही इंकार कर देते हैं कि इस देश में वेश्यावृत्ति मौजूद है। जब कभी वयस्क मनोरंजन को खत्म किया जाएगा, ऐसी जरूरत वाले वयस्क लोग किसी अधिक गंभीर बुराई की तरफ मुड़ेंगे। जब चकलाघरों पर पुलिस के छापे बढ़ जाते हैं या बाजार में शरीर का मिलना मुश्किल होने लगता है तो बलात्कार या छेडख़ानी, या देहशोषण के मामले बढऩे लगते हैं। हमने बार-बार यह लिखा है कि सरकारों को समझदारी के जो फैसले करने चाहिए, उसका बोझ सरकारों ने अदालतों पर छोड़ रखा है। जजों से कड़वे फैसले करवाए जाते हैं, और नेता मतदाताओं के सामने चापलूस बने खड़े रहते हैं। इस देश में समलैंगिकता, पोर्नोग्राफी, शराब, जुआ, वयस्क मनोरंजन, ऐसे बहुत से मुद्दों पर सरकारें अपने को संस्कृति का ठेकेदार बनाए रखती हैं, और जजों को सामाजिक मुद्दों पर फैसले देने पड़ते हैं। महाराष्ट्र सरकार के मुंह पर यह अदालती तमाचा पडऩे के इन 6-7 बरसों में लाखों पेट क्या-क्या करके जिए होंगे, यह सोचना भी मुश्किल है। 

भड़ास से भरी हवा

15 जुलाई 2013
संपादकीय
आज सुबह यह तय किया था कि अंगे्रजी के चार अक्षरों वाला जो नाम आज हिंदुस्तान में सबसे अधिक चर्चा और खबरों में है उसे छोड़कर ही किसी मुद्दे पर लिखना है। इसलिए दूसरे मुद्दे की तलाश करनी पड़ी। इन दिनों हिंदुस्तान में मध्यम वर्ग के लोग आर्थिक विकास से उपजे, और आक्रामक बाजारवाद के थोपे हुए खतरे को झेल रहे हैं। लोगों को अब कपड़े, फोन, मोटरसाइकिलें या स्कूटर, रहन-सहन की शहरी शैली, इन सबको लेकर एक बड़ा तनाव हो रहा है। मध्यमवर्गीय मां-बाप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अपने बच्चों की हसरतों को कैसे पूरा करें। इन गिनीचुनी बातों से परे भी रसोई के रोज के सामानों से लेकर कभी-कभार बाहर के खाने तक, इतने खर्चीले विकल्प चारों तरफ से हमले कर रहे हैं कि घर चलाने वाले लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि इसे कैसे पूरा करें। और जो न्यूनतम जरूरतें हैं, वे भी महंगाई की मार से इतनी बढ़ गई हैं कि उनको पूरा करना भी खासा मुश्किल है। नतीजा यह हुआ है कि एक तरफ महंगाई की मार, दूसरी तरफ हसरतों की मार, और तीसरी तरफ देखा-देखी चलने वाले सामाजिक प्रतिष्ठा के मुकाबले की मार। यह मुद्दा किसी एक खबर की सुर्खी में नहीं आ सकता, इसलिए इस पर अलग से कोई चर्चा नहीं हो पा रही है। लेकिन भारतीय समाज इसे लेकर एक खासे बड़े तनाव से गुजर रहा है। लोगों को सारी उम्मीदें सरकार से हो चली हैं, और इसलिए सारी नाउम्मीदी की मुजरिम भी सरकार ही है। लेकिन सरकार के पास ऐसे सामाजिक मर्जों की कोई दवाई नहीं है, और लोगों को अपनी कुंठाओं को, अपनी भड़ास को खुद ही काबू में करना पड़ेगा, अपनी हसरतों के साथ-साथ। 
बाजार रात-दिन चौबीसों घंटे लोगों पर हमला करते रहता है, और उन्हें अपने मौजूदा रंग से, ढंग से, अपने सामानों से नापसंदगी देते चलता है। ऐसे में अतृप्त इच्छाएं स्थाई हो गई हैं। पहले कहा जाता था कि किसी के मरने पर वे अतृप्त आत्माएं बन जाते हैं। आज भारतीय समाज जीते-जी अतृप्त आत्मा बन चुका है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों में लोगों की हसरतें नहीं होतीं, लेकिन हिंदुस्तान में हर मर्ज की दवा को लोग सरकार नाम के हकीम से पाने की उम्मीद करने लगे हैं। सरकार चाहे देश की हो, चाहे किसी प्रदेश की, वह सीधा फायदा अगर किसी को दे सकती है, तो सबसे गरीब तबके को खाने के हक जैसे बुनियादी फायदे ही दे सकती है। इसके अलावा दूसरे तबकों में वह किसी को साइकिल और किसी को लैपटॉप दे सकती है। लेकिन इन सबसे भी आबादी के लगभग पूरे हिस्से की हसरतों का एक छोटा हिस्सा भी पूरा नहीं हो सकता। और उदार बाजार-व्यवस्था के चलते सरकार का दखल उतना अधिक हो भी नहीं सकता।
इसलिए आज जरूरी यह है कि बड़े और छोटे सभी उम्र के लोग अपनी हसरतों को पहले तो अपने चादर की लंबाई तक समेटकर रखें, और फिर उन हसरतों को पूरा करने के लिए सरकार से परे अपने खुद के रास्ते तलाशें। और जब तक ऐसे रास्ते निकल न जाएं, तब तक लोगों को अपने को बहुत काबू में रखना पड़ेगा, क्योंकि हसरतों को पूरा करने के लिए कहीं पर लोग जुर्म कर रहे हैं, तो कहीं पर लोग अपनी देह को बेच रहे हैं। ये बहुत खतरनाक नौबत है, लेकिन यह तो फिर भी सतह पर आकर दिखने वाले जुर्म के आंकड़ों की तरह साफ-साफ हैं। असल खतरा तो वह भड़ास और कुंठा है, हीनभावना है जो कि अपूरित इच्छाओं की वजह से लोगों मेें घर कर चुकी है। उसकी वजह से पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्पादकता घट रही है, और लोग आगे बढऩे की संभावना भी खो रहे हैं। यह मुद्दा कुछ गंभीर है, लेकिन आज की सनसनीखेज खबरों से परे हटकर जिन असल मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, यह उनमें से एक है। इस देश में महावीर से लेकर गांधी तक बहुत से लोगों ने किफायत और संयम की बात कही थी। आज उस बात पर गंभीर चर्चा की जरूरत है, क्योंकि गरीबी के बीच सिर्फ मन पर काबू से ही काम चल सकता है। इस मुद्दे पर लोगों को सोचना चाहिए, क्योंकि इसके बिना उसके आसपास की हवा हमेशा भड़ास से भरी रहेगी।

सार्वजनिक बहस में भी प्रतिद्वंद्वी को वॉकओवर देना ठीक नहीं

संपादकीय
14 जुलाई 2013
देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में अपनी संभावना मजबूत करने के लिए गुजरात के मौजूदा मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज महाराष्ट्र के पुणे में एक पुराने और महत्वपूर्ण कॉलेज में लंबा भाषण दिया। उनके भाषण में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की जटिलताएं नहीं रहतीं, क्योंकि उनसे उनका वास्ता नहीं पड़ा है। राष्ट्रीय समस्याओं पर भी वे भाजपा के दर्जनों नेताओं से बहुत पीछे हैं, लेकिन किसी का अनुभव उनको आम चुनाव में एक बड़ी पार्टी या बड़े गठबंधन का मुखिया नहीं बना पाता। इसके लिए जनता के सामने नेता जैसी एक तस्वीर भी पेश करने का दमखम होना चाहिए, और आज वह भाजपा में जिन दो नेताओं में है, उनमेें नरेन्द्र मोदी अडवानी से खासे आगे हैं। लेकिन इस जनधारणा के सही या गलत होने पर हम आज चर्चा नहीं कर रहे। हम मोदी की अपनी ताजपोशी के लिए अपनी तैयारियों और कोशिशों पर बात करना चाहते हैं। 
मोदी ने जिस तरह धीरे-धीरे करके भाजपा को हाशिए पर धकेल दिया है, और एक निर्विवाद-सर्वसम्मत पार्टी-प्रत्याशी की अपनी हैसियत को वे स्थापित कर चुके हैं, उससे यह साफ है कि अगला चुनाव भाजपा और एनडीए शायद उन्हीं की अगुवाई में लड़ेंगे। और घोषित या अघोषित ऐसी नौबत को अब भाजपा के साथ-साथ एनडीए के बाकी भागीदार भी मंजूर करते दिख रहे हैं। लेकिन आज सवाल यह है कि मोदी के झंडे को उठाकर भाजपा और एनडीए के लोग जिस तरह भारतीय संसदीय चुनाव को राष्ट्रपति-प्रणाली वाले अमरीकी चुनावों की तरह करना चाहते हैं, क्या भारत में उसकी कोई संभावना है? या फिर कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए के पास ऐसी कोई सहूलियत न होने से, उस बेबसी का फायदा उठाने के लिए मोदी और उनके साथी इसे दो व्यक्तियों का टकराव बनाने पर आमादा हैं। अगर इस माहौल में कांग्रेस के भीतर के सोनिया-राहुल के करीबी दिग्विजय सिंह के कल-परसों के बयान देखें, तो वे राहुल गांधी को चुनाव के पहले प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने से कतराने वाले हैं, और उनकी इस बात को भी गंभीरता से लेना होगा कि हो सकता है कि अगली बारी आने पर फिर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनाए जाएं। 
भारत जैसे लोकतंत्र में दो पार्टियों के बीच, या कि दो गठबंधनों के बीच चुनाव में कितनी बहस होनी चाहिए, इन दोनों के चुनावपूर्व उम्मीदवार घोषित होने चाहिए, या कि चुनाव के बाद लीडर चुना जाना चाहिए? इनमें से हर हाल में आज मोदी की एक बात ठीक लगती है कि वे उद्योगपतियों के बीच, छात्र-छात्राओं के बीच, एनआरआई लोगों के बीच, पहुंचकर अपनी बात को खुलकर कह रहे हैं। उनकी बातें नारों से भरी हुई हैं, उनमें ठोस बुनियाद पर टिकी हुई दूरदृष्टि नहीं है, लेकिन चुनाव प्रचार में ऐसी दूरदृष्टि की बहुत जरूरत भी नहीं होती। लोगों के बीच जब मंच और माइक से कुछ कहा जाता है, तो वह बात चुनावी मूड बनाने के लिए कही जाती है। और इसमें मोदी कांग्रेस के किसी भी नेता के मुकाबले अधिक माहिर हैं। और इसीलिए शायद दिग्विजय सिंह राहुल गांधी को मुकाबले में खड़ा करने से बचते हुए, पूरी पार्टी को, यूपीए गठबंधन को मोदी के खिलाफ मैदान में रखना चाहते हैं। कांग्रेस के लंबे बाकी भविष्य की उम्मीदों को मोदी जैसे अतिचतुर और अतितेज नेता के हमलों से बचाकर अपने नेता की संभावनाओं को घायल होने से बचाने की सोच गलत नहीं है। मीडिया यह कोशिश कर भी रहा है कि मोदी और राहुल को आमने-सामने पेश किया जाए, लेकिन कांग्रेस में जिस किसी ने भी ऐसे सार्वजनिक मुकाबले के उकसावे को खारिज करने की सोची है, उसमें अपनी पार्टी और अपने नेता के भविष्य के हिसाब से ठीक ही सोची है। 
लेकिन देश के भावी नेता को लोगों के बीच घुसकर बोलना अगर आता है तो हमे इसे एक बेहतर नौबत मानते हैं। मोदी जब लोगों के बीच बोलते हैं, तो अपनी बातों पर लोगों से सवाल भी पाते हैं। और पुणे के एक बड़े कॉलेज में सिर्फ महाराष्ट्र के बच्चे नहीं पढ़ते, वहां पर पूरे देश से आए हुए बच्चे पढ़ते हैं, जो अपने-अपने लोगों तक मोदी पर अपनी राय आगे भी बढ़ाना शुरू कर चुके होंगे। अमरीका में दोनों बड़े उम्मीदवार राष्ट्रपति की अपनी दावेदारी के तर्क और तथ्य पेश करते हुए पूरा देश घूमते हैं, और वह एक अच्छा सिलसिला भी रहता है। इसके लिए भारत जैसे देश में अगला प्रधानमंत्री घोषित करना भी जरूरी नहीं है, यूपीए की मुखिया तो घोषित रूप से और औपचारिक रूप से सोनिया गांधी हैं ही, प्रधानमंत्री भी अगले चुनाव तक कुर्सी पर दस बरस पूरे कर चुके होंगे। इसलिए इन दोनों को देश की जनता के सामने खुलकर आना चाहिए, और अपनी बात रखनी चाहिए, जनता के सवालों का सामना करना चाहिए। उनमें अगर ऐसी सार्वजनिक क्षमता की कमी है, तो यह जनता के राजनीतिक शिक्षण में कांग्रेस की संभावनाओं को घटाता भी है। मोदी को सिर्फ साइबर-शेर करार देने से कुछ भी नहीं होगा। कांग्रेस, यूपीए, और उसके बाहर की साम्प्रदायिकता-विरोधी ताकतों को आमने-सामने टकराव मोल लेना होगा, सार्वजनिक बहस में भी प्रतिद्वंद्वी को वॉकओवर देना ठीक नहीं।

मासूमियत के हक़दार भला कैसे हो सकते हैं मोदी?

13 जुलाई 2013
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी की बात से देश में फिर एक बवाल खड़ा हो गया है, और यह सोचना गलत होगा कि उनको इस बवाल का अंदाज़ नहीं रहा होगा। उन्होंने गुजरात दंगों में मारे गए हजारों मुस्लिमों के संदर्भ में एक सांस में दो बातें कहीं, एक हिस्से में अपने को कार में पीछे की सीट पर बैठा बताया और दूसरे में कार से कुत्ते के पिल्ले  के कुचलकर मर जाने पर भी दु:ख होने की बात कही। इन दो मिसालों ने देश को भड़का दिया। बयान तो नेताओं के ही सामने आते हैं इसलिए अलग-अलग पार्टी के नेताओं ने मोदी को धिक्कारा है, और मोदी की पार्टी की आम तौर पर हमलावर तेवरों वाली प्रवक्ता ने  लोगों से विनती की है कि वे मोदी की बात का गलत मतलब नहीं निकालें।
मोदी की यह बात राजनीति  के किसी नवजात पिल्लै ने नहीं कही है। यह बात गुजरात दंगों के मुख्यमंत्री ने कही है और इसीलिए इसे मासूमियत से नहीं देखा जा सकता। न दंगे मासूम थे, न कत्लेआम मासूम था, और न ही दंगों में लोगों को छांट -छांटकर मारना मासूम था। मासूम सिर्फ पिल्ला होता है और पिल्लों की उम्र के बाकी प्राणी। राजनीति और दंगानीति मासूमियत के  हकदार नहीं होते। मोदी जितना बड़ा धाकड़, दिग्गज और एक दशक पहले का मुख्यमंत्री मासूमियत का हकदार नहीं होता। एक इंटरव्यू देते हुए एकदम ठंडे खून से जवाब देते हुए, खुद मिसाल देते हुए मोदी जितना बड़ा नेता गलत मिसाल की मासूमियत का हकदार भी नहीं होता। इसलिए कल के इंटरव्यू में उनकी दी हुई मिसाल बहुत सोचे समझे शब्दों से कम कुछ भी नहीं थी, और इसीलिए हिंदुस्तानी लोकतंत्र में वह पूरी तरह खारिज कर देने के अलावा और किसी बात की हकदार नहीं है।
मिसालें मासूम नहीं होतीं, मोदी से अधिक और किसको याद होना चाहिए कि एक धोबी की दी हुई मिसाल से सीता के साथ कैसा बर्ताव करने का तर्क राम को मिल गया था। अभी दुनिया भर में जब मुस्लिमों का सबसे बड़ा त्यौहार रमजान चल रहा है, तब मोदी के यह मिसाल देश को ठीक वही बता रही है जो मोदी बताना चाहते हैं, एक दशक पहले के दंगों से भी, और इस इंटरव्यू से भी। आज कुछ हफ्ते पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कही एक बात याद पड़ती है- यह देश जानता है कि मोदी किन मूल्यों के साथ खड़े हैं।
मोदी जब अपने को हिन्दू राष्ट्रवादी कहते हैं, तो कुछ लोगों को वह बात चौंका सकती है, लेकिन आज भाजपा के भीतर मोदी की जो जगह बनाई गई है, वह और किस काबिलियत की वजह से है? मोदी की यह सोच न तो भाजपा की सोच से अलग है, ना ही संघ के सोच से और ना ही  संघ-परिवार की सोच से। इसलिए यह ठीक से समझ लेने की जरूरत है कि आने वाला चुनाव राष्ट्र और हिन्दू राष्ट्रवाद के बीच होने जा रहा है, ना कि राहुल गांधी और मोदी के बीच। और दिक्कत यह है कि राष्ट्र एक भ्रष्ट की तरह पेश है, और मोदी एक बेहतर आर्थिक प्रशासक की तरह। बेहतर प्रशासक की तस्वीर के साथ वे अपने को दंगों के दागों से भी धुला हुआ बता रहे हैं। जहाँ तक कुत्ते के पिल्लों की मिसालों की बात है, मोदी और अमित शाह की ताजपोशी के दिन से ही इन सारी मिसालों की जमीन बन चुकी थी जो कि मोदी अब एक-एक कर पेश करते जाएंगे।
लेकिन मोदी इस देश के समझदार लोगों की उम्मीदों से परे का कुछ नहीं  कर रहे। उनसे यही उम्मीद थी कि वे चुनाव के आते-आते देश को साफ साफ हिन्दू और मुस्लिम के बीच बांटकर रख देंगे। एक सांस में अपने को पीछे की सीट पर बैठा बताकर और मुस्लिमों के बारे में पिल्लै की मिसाल देकर मोदी ने अपने को मासूमियत का तमगा भी देने की कोशिश की, और मुस्लिमों के लिए बेइज्जती का एक लफ्ज भी इस्तेमाल किया। हिंदुस्तान के इतने ताजा इतिहास का इतना बेजा इस्तेमाल मुमकिन नहीं। कुछ लोग यह सोच सकते हैं कि मोदी आज बाकी भाजपा से बेकाबू हो गए हैं, लेकिन उसकी गुंजाईश नहीं लगती है। मोदी ही शायद भाजपा का चुनावी भविष्य हो गए हैं, और इसलिए वे भाजपा का वर्तमान भी हो गए हैं, और इसलिए वे अपने ताजा भूतकाल के भूतों से छुटकारा पाने का हकदार भी अपने को मान रहे हैं,  लेकिन यह मुमकिन नहीं। गुजरात के दंगे शिलालेखों पर खोदे नहीं गए थे कि जिनका कोई सुबूत नहीं हो, वे फिल्मों और तस्वीरों  में भी कैद हैं।

ऐसा समाज किसी शहादत का हकदार नहीं हो सकता

12 जुलाई 2013
संपादकीय
चार बरस पहले आज के ही दिन छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले मेें नक्सलियों से आमने-सामने की लड़ाई लड़ते हुए उस जिले के बहादुर एसपी विनोद चौबे सहित उन्तीस पुलिस वाले मारे गए थे। ये लोग किसी नक्सल धमाके में अचानक खत्म नहीं हुए थे बल्कि बंदूकों से उनका सामना करते हुए शहीद हुए थे। अपने किस्म की यह छत्तीसगढ़ के इतिहास की सबसे बड़ी शहादत थी। इनमें से कई लोगों के पास नक्सल मोर्चे में दुबारा घुसने की बेबसी नहीं थी, और वे बाहर रहकर अपनी जान बचा सकते थे, लेकिन वे बहादुरी से अपने साथियों का साथ देने के लिए गोलियों के बीच फिर घुसे, और लड़ते-लड़ते शहीद हुए। आज जब यह राज्य उस दिन की तरह ही नक्सल हिंसा को झेल रहा है, तब मानो वह शहादत आई-गई हो गई है। 
मीडिया के सामने और जनता से लेकर नेताओं तक के सामने रोजाना ही नए-नए मुद्दे रहते हैं, और सुर्खियां बटोरने को, वोट बटोरने के इन सब के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई भी चलती रहती है। लेकिन उस बीच एक सवाल यह उठता है कि शहादत का ऐसा दिन आए और चले जाए, उस पर इस प्रदेश में उन लोगों के बीच भी अगर आज शहादत के लिए एहसान की कोई सोच न हो, तो ऐसे नाशुकरे समाज के लिए आगे लोग क्यों जान देंगे? दरअसल शहरी समाज अपने-आपको नक्सल खतरे से दूर पाते हुए संवेदनाओं से भी परे का हो चुका है। न तो उसे जंगलों के बीच बसे आदिवासियों के जीने-मरने से फर्क पड़ता, और न ही उसे इस बात का फर्क पड़ता कि नक्सल हिंसा को शहरों तक आने से रोकने के लिए कितने लोग अपनी जान देते हैं। आज अगर गैरशहरी इलाकों में शोषण और अत्याचार से लडऩे के लिए कुछ लोग नक्सली बनकर खड़े होते हैं, और कुछ लोग उनका साथ देते हैं, तो इसके पीछे उन इलाकों के गरीब लोगों के भीतर शोषण के खिलाफ लडऩे की एक जागरूकता है। लोग जैसे-जैसे शहरी और शिक्षित होते जाते हैं, जैसे-जैसे आर्थिक विकास की संपन्नता का और शहरी सुविधाओं का सुख उनको मिलने लगता है, उनके भीतर  संघर्ष का कोई भी हौसला नहीं बच जाता, और सफेदपोश लोग सबसे कमजोर आंदोलनकारी होते हैं। न वे हिंसक आंदोलन में सामने आते, और न ही अहिंसक आंदोलन में। इसके अलावा ऐसे लोग शहादत की ओर शुक्रगुजार होना भी नहीं जानते।
आज जब हिंदुस्तान का मीडिया नेताओं की एक-एक गंदी हरकत और एक-एक गंदी जुबान पर टूट पड़ता है, जब समाज के पढ़े-लिखे और शहरी कहे जाने वाले लोग अपना सारा खाली वक्त गंदगी को देखने और सुनने में झोंक देते हैं, तब उस शहादत को याद करना भी लोगों को याद नहीं रहता, जिसकी वजह से वो आज की ताजा राजनीतिक गंदगी को देखने के लिए जिंदा हैं। समाज की ऐसी मतलबपरस्त सोच एक ऐसा खतरा है, जिसमें लहू बहते नहीं दिखता, लेकिन इससे एक ऐसा देश, एक ऐसा प्रदेश, बन चुका है जिसमें लोगों को संघर्ष और शहादत के लिए कोई प्रेरणा नहीं मिलती। जो लोग आज अपने भीतर की आवाज को सुनकर सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए सुख या जान कुर्बान करने को तैयार रहते हैं, बस वे ही लोग सामने आ रहे हैं। समाज लोगों को ऐसे हौसले की राह दिखाए, वह बात खत्म हो गई है। अब भगत सिंह के सिर पर हैट या पगड़ी की बहस अहमियत रखने लगी है, और इस बात को यह देश भूल गया है कि भगत सिंह ने सिर्फ सिखों को बचाने के लिए, सिर्फ सिखों को आजाद करने के लिए शहादत नहीं दी थी। इसलिए वह दिन भी शर्म से सिर झुकाने का हो जाता है जिस दिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के चौराहे पर भगत सिंह की शहादत की सालगिरह पर मौजूद लोगों में अधिकतर सिख ही रहते हैं, और गैरसिखों को मानो उससे कोई लेना-देना नहीं रहता। शहादत की एक बड़ी बेइज्जती यह भी है कि भगत सिंह के प्रतिमा स्थल का रखरखाव इस प्रदेश की संपन्न सरकार खुद नहीं कर सकती और एक बिल्डर को इसके लिए प्रायोजक बनाया गया है। ऐसा समाज किसी की शहादत का हकदार नहीं हो सकता।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट अब क्या महिला आरक्षण भी लागू करेगा?

11 जुलाई 2013
संपादकीय
कल और आज देश की अदालतों के दो फैसले ऐसे आए हैं जिनके अदालत में जाने का कोई काम नहीं बनता था। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई भारतीय राजनीति, और देश की संसद-विधानसभाओं में लगातार अपराधों के आरोपों पर अदालती कटघरों में खड़े हुए आरोपियों की बढ़ती भीड़ पर जब सरकार और संसद ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला देना पड़ा कि दो बरस की कैद पा जाने वाले सांसद और विधायकों की सदन की सदस्यता खत्म हो जाएगी। इस फैसले पर भी भ्रष्टाचार के खासे मामलों से घिरी हुई बसपा की मुखिया मायावती ने तो उसका स्वागत किया है, लेकिन यूपीए और कांगे्रस के केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने उस पर गोलमोल प्रतिक्रिया दी है कि अगर इस फैसले को पढऩे के बाद वह ठीक नहीं लगेगा, तो उसे बदलने पर भी विचार किया जाएगा। हो सकता है कि बदलने के इस विचार पर संसद में एक कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए सांसदों और उनकी पार्टियों का बहुमत आसानी से जुट जाएगा, क्योंकि अपने-अपने मुजरिम सबको सुहाते हैं। लेकिन यह नौबत भयानक है कि जिन जजों को जनता के सामने कभी वोट मांगने नहीं जाना पड़ता, वे जज तो सामाजिक और राजनीतिक सुधार, संसदीय सफाई के काम कर रहे हैं, लेकिन संसद और सरकार भारतीय लोकतंत्र और उसके संविधान के लचीलेपन को चुइंग-गम की तरह खींच-खींचकर उसका बेजा इस्तेमाल कर रही हैं। यही वजह है कि संसद और विधानसभाओं में एक-एक करके खरबपति बढ़ते जा रहे हैं, करोड़पति ठसा-ठस हो चुके हैं, और देश में हर वोट को खरीदकर चुनाव जीतने, और फिर चुनावी-पूंजीनिवेश के नोटों के पेड़ हिलाकर तिजोरियां भरने का माहौल बना हुआ है। चूंकि भ्रष्टाचार को बचाने के लिए सारे राजनीतिक दल एक होते दिख रहे हैं, इसलिए हो सकता है कि शाहबानो की तरह इस देश के हक भी एक कानून बनाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटाकर हमेशा के लिए कुचल दिए जाएं। अभी कुछ ही दिन पहले इतिहास ने दर्ज किया है कि जब राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाया गया, तो भाजपा से लेकर वामपंथियों तक हर किसी ने अपने झंडे-डंडे को इस तरह एक साथ करके विरोध किया कि मानो गुजरात में नवरात्रि पर डांडिया नृत्य हो रहा हो। जब पारदॢशता के खिलाफ, ईमानदारी के खिलाफ लाल झंडा भी केसरिया और हरे के साथ मिलकर खड़ा हो जाता है, तो फिर इन सब रंगों के मेल से काले रंग की कालिख ही तो बनना है। 
आज का जो दूसरा फैसला अभी कुछ देर पहले ही आया है, वह इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक आदेश है जिसमें अदालत ने प्रदेश में जातियों की रैलियां निकालने पर रोक लगा दी है, और राजनीतिक दलों को नोटिस जारी किया है। वामपंथी बंगाल और केरल से लेकर, दक्षिणपंथी मुंबईया शिवसैनिकों तक, हर किसी की आदत देश भर में अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में सड़कों पर कब्जा करके जुलूस निकालने, और हिंसा के साथ बंद करवाने की पड़ी हुई है। इसके खिलाफ अलग-अलग अदालतों में समय-समय पर कई तरह के फैसले दिए हैं, लेकिन उनमें से किसी का भी अमल नहीं हो पाता, क्योंकि सत्ता की पार्टी और विपक्ष दोनों के बीच सड़कों पर मुकाबले की होड़ लगी रहती है। इस सिलसिले को रोकने के लिए जब सरकार और संसद-विधानसभा में कोई इच्छाशक्ति नहीं रह गई है, तो फिर अदालत को सामने आकर यह कड़वा काम करना पड़ रहा है। 
यह देश पिछले कई बरस से अदालत की निगरानी में गरीबों के अनाज के हक, स्कूलों में दोपहर के खाने, और महिला-बच्चों को पोषण आहार का काम देख ही रहा है। अब सरकार के हिस्से के बाकी कामों को करते-करते अदालतें एक खतरनाक कगार पर आकर खड़ी हो गई हैं। लोकतंत्र में न्यायपालिका, कार्यपालिका, और विधायिका, इन तीन पर बंटी हुई जिम्मेदारियों वाली तिपाई के दो पांव भ्रष्ट नीयत की दीमक ने खोखले कर दिए हैं, और अब अदालत पर लगभग पूरी तरह टिका हुआ यह लोकतंत्र अदालती तानाशाही के एक खतरे के सामने है। यह नौबत बदलनी चाहिए, भारतीय लोकतंत्र इस तरह से नहीं गढ़ा गया था कि अदालतें ही किसी दिन महिला आरक्षण लागू करने पर भी बेबस हों। आने वाले दिनों में हमको यही एक फैसला बाकी दिख रहा है, क्योंकि संसद पुरूष प्रधान राजनीतिक बेईमानी की नीयत से लबालब है, और उसका कोई इरादा महिला आरक्षण का नहीं दिख रहा है।