गरीब की भूख के दुख-दर्द की समझ रखने वाले हाशिए पर

संपादकीय
25 जुलाई 2013
आज देशभर से ऐसी खबरें आने लगी हैं कि स्कूलों में दोपहर के भोजन में कहां छिपकली निकल रही है, और कहां मेंढक निकल रहा है। यह भी खबर आ रही है कि बिहार में जहां दो दर्जन बच्चे खाने में मिलाए गए जहर, या जहरीले तेल की वजह से मारे गए हैं, वहां पर स्कूली शिक्षक पढ़ाई से परे का खिलाने का यह काम करना नहीं चाहते। सरकार की बहुत सी जनकल्याणकारी योजनाओं को लेकर नाकामयाबी की ऐसी कहानियां किसी भी सरकार के तहत निकल सकती हैं, लगातार निकलती हैं। लेकिन जब इनको गरीबों के हक से जोड़ दिया जाता है, जब इन योजनाओं को लेकर एक ऐसी तस्वीर बनाई जाती है कि इनमें जितना भला गरीबों का होता है, उससे कहीं अधिक नुकसान उनका होता है, तो गरीबी से परे के लोग यह सोचने लगते हैं कि ऐसी योजनाओं को बंद कर देना ठीक है। 
आज यह सोचने की जरूरत है कि जब सरकार, समाज, और राजनीतिक ताकतें मिलकर गरीब और कमजोर तबकों को उनका हक देने में नाकामयाब हैं, तब  क्या इस नाकामयाबी, बेईमानी, चोरी की सजा इन गरीब और कमजोर लोगों को दी जाए? जब ताकतवर तबके की नीयत लूटने की हो, और जब सत्ता का सुख पाने वाले लोग नालायक साबित हों, तो फिर योजनाओं को अव्यवहारिक करार देना आसान होता है। यह कुछ उसी किस्म का है कि जब मौजूदा कानून पर अमल ठीक से नहीं हो पाता, तो फिर कानून नया बनाने की बात होने लगती है। यह सिलसिला खतरनाक है, और सबसे कमजोर तबके के लिए सबसे खतरनाक है। जिन लोगों ने भूख देखी नहीं है, ऐसे लोगों को गरीब बच्चों के खाने की योजना बनाने में शामिल किया जाता है। अब सांसदों की जो सलाहकार समिति दोपहर के भोजन किस्म के खाने के अधिकार पर विचार करती है, उसमें खरबपति कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल को रखा गया है। यह तो सरकार और संसद, पार्टी और सांसद, इनका विशेषाधिकार है कि किस कमेटी में कौन रहे, लेकिन जब ऐसे लोग भूख पर बात करने के लिए मनोनीत किए जाते हैं, या मनोनयन को ऐसे लोग मंजूर कर लेते हैं, तो यह खबर अपने आप में एक बहुत पैना और धारदार कार्टून लगती है। 
कुछ लोगों को यह भी लगता है कि गरीबी को जिंदा रखने के लिए लोगों को रोजगार देने के बजाय भीख की तरह खाना दिया जाता है। लेकिन ऐसे लोगों ने भी कभी भूख भोगी नहीं है। भूख जब पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को कुपोषण में किसी तरह खींचतान कर जिंदा रखती है, तो समाज में मुकाबले की लड़ाई में ऐसे कुनबों के लोग पिछड़े हुए ही रह जाते हैं। जो लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही खान-पान, जात-पात और संपन्नता की ताकत से आगे चले आते हैं, उनको भूखे तबके के मुंह और पेट के दाने खटकने लगते हैं। रोजगार रातों-रात नहीं मिल सकते। इसलिए जब तक लोगों को अपनी मेहनत की कमाई से बाजार भाव का खाना जुटाने की ताकत न मिले तब तक उनको सरकारी रियायत देना जरूरी है। इसी से जुड़ा हुआ मामला स्कूलों में दोपहर का भोजन का है, महिलाओं और बच्चों के पोषण आहार का है, वृद्धावस्था पेंशन का है, और ऐसी ही बहुत सी दूसरी गरीब-कल्याण की योजनाओं का है। भूखे पेट कोई पढ़ाई भी नहीं हो सकती, और जब खाना जुटाने के लिए बच्चे बाल मजदूरी को बेबस हों, तो वे स्कूल भी नहीं पहुंच सकते। इसलिए आज भारत में संवेदनशील और समझदार ऐसे लोगों की जरूरत है जिनको भूख की समझ हो। आज न सिर्फ संसद बल्कि देश की हर विधानसभा अरबपतियों से भरती चल रही है। ऐसे में गरीब को दी जा रही रियायत इन संपन्न आंखों में किरकिरी की तरह खटकती है। आज जब दोपहर के भोजन को लेकर देशभर में चर्चा चल रही है, तो गरीबों की बात को रखने वाले लोग भी होने चाहिए, जो कि अब संपन्न मीडिया में भी घटते चले गए हैं। जो लोग  ऐसी समझ रखते हैं, वे बाजार के दबाव में चलने वाले मीडिया में भी हाशिए पर हैं, और अपनी-अपनी पार्टी के भीतर भी।

1 टिप्पणी: