सोनिया की राजस्थान सरकार बच्ची की शिकायत के बाद भी आसाराम को छूने से बची रही!

31 अगस्त 2013
संपादकीय
पिछले कई दिनों से हिंदुस्तान, और खासकर कांगे्रस सरकार वाला राजस्थान पूरी दुनिया की नजरों में एक मखौल बन गए हैं। हिंदुस्तान के भीतर के लोगों को केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार से इस बात पर नफरत हो गई है कि एक बच्ची की रिपोर्ट के बाद भी आसाराम नाम का पहले से बदनाम चले आ रहा प्रवचनकर्ता फरार घूम रहा है, मीडिया को धमका रहा है, और राजस्थान की पुलिस उसको छूने में भी हिचकिचा रही है। केंद्र सरकार की मुखिया और राजस्थान की सत्तारूढ़ कांगे्रस पार्टी की अध्यक्ष एक महिला होने के बाद भी अगर एक बच्ची की पुलिस रिपोर्ट पर पुलिस का यह रूख है, तो इसका मतलब साफ है कि देश में आगे कोई बलात्कार की रिपोर्ट करवाने की न सोचे, क्योंकि किसी भी किस्म की ताकत वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई होने से रही। 
जिस मध्यप्रदेश में आसाराम घूम रहा है, वहीं पर राजस्थान की पुलिस पहुंची हुई है। मध्यप्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गज लोग बलात्कार के आरोपी आसाराम को बचाने में सार्वजनिक रूप से लग गए हैं, और उनके हिंसक बयान छाए हुए हैं कि आसाराम एक साजिश का शिकार है। किसी बच्ची की बलात्कार की शिकायत को एक साजिश कहना हमारे हिसाब से एक जुर्म है। लोकतंत्र में किसी को भी यह हक नहीं पहुंचता कि वे किसी बच्ची की शिकायत को जांच के पहले ही साजिश करार दे दें, ऐसा करना उस बच्ची की मानहानि है, तमाम महिलाओं की मानहानि है, लोकतंत्र के खिलाफ एक गंदा और हिंसक हमला है। जो लोग आसाराम को एक प्रवचनकर्ता होने की वजह से बचाना चाहते हैं, उन लोगों को संसद में दिए गए वे बयान भी सुनने चाहिए जिनमें आसाराम को फांसी देने की मांग की गई है। हम किसी को भी मौत की सजा देने के खिलाफ हैं, इसलिए हम फांसी की मांग से सहमत नहीं हैं, लेकिन एक बच्ची की ऐसी शिकायत जांच के बाद अगर अदालत में खरी साबित होती है, तो ऐसे बलात्कारी को पूरी जिंदगी जेल में रखने को हम अधिक नहीं मानेंगे। 
राजस्थान की पुलिस ने अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय मुंह चुराने का काम किया है। आज देश भर में जगह-जगह यह पता लगता है कि बलात्कार के आरोपियों को कुछ घंटों के भीतर, या कुछ दिनों में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। ऐसे में आसाराम नाम के इस आदमी को अब तक क्यों छोड़ा गया है? क्यों पुलिस उसके दरबार में हाजिरी बजाने के अंदाज में एक नोटिस देने के लिए घंटों खड़ी रही है, और उसकी गिरफ्तारी अब तक नहीं की गई है। यह सोनिया गांधी की पार्टी की राजस्थान सरकार द्वारा शिकायत करने वाली छोटी बच्ची के साथ हिंसा है। यहां पर हम एक बार फिर जदयू के लोकसभा के नेता शरद यादव के बयानों की तारीफ करेंगे जो कि खुलकर लोकसभा के भीतर यह सवाल उठा रहे हैं कि आसाराम को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? दूसरी तरफ उन्हीं में यह हौसला है कि वे विपक्ष की ही नेता सुषमा स्वराज से खुलकर यह सवाल करते हैं कि वे जब मुंबई बलात्कार कांड के आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रही हैं, तो वे आसाराम पर कार्रवाई की मांग क्यों नहीं करतीं? 
इस पूरे सिलसिले में ऐसी खबरें आ रही हैं कि भाजपा के भविष्य नरेन्द्र मोदी ने पार्टी के भीतर यह कहा है कि भाजपा नेता आसाराम का बचाव बंद करें। अगर यह खबर सच है तो हम मोदी की इस बात के लिए तारीफ करेंगे। पहले भी यह बात रिकॉर्ड में दर्ज है कि गुजरात में आसाराम के अवैध आश्रम को मोदी ने तुड़वा दिया था। जो लोग आज आसाराम का साथ दे रहे हैं, उनको यह बात सोचना चाहिए कि उनके परिवार की किसी बच्ची को ऐसे किसी बड़े आदमी के हाथों ऐसा बर्ताव झेलना पड़े, बलात्कार का शिकार होना पड़े, तो भी क्या वे लोग उस बड़े आदमी को बचाने के लिए ऐसे ही बयान देंगे? लोगों को किसी बच्ची को साजिश कहने के पहले इंसानियत नाम के उस शब्द की बात भी सोच लेनी चाहिए जिसका प्रचलित अर्थ अब तक अच्छा माना जाता है। हालांकि हम इंसानियत को तथाकथित हैवानियत से परे का नहीं मानते। अच्छी से अच्छी, और बुरी से बुरी, दोनों किस्म की बातें इंसानों के भीतर ही हैं। और इनमें से आसाराम किस्म के लोगों को तुरंत ऐसे कड़े मुकदमे तक पहुंचाना चाहिए जहां से एक छोटी और गरीब बच्ची को इंसाफ मिल सके, जिससे अंधश्रद्धा के शिकार हिंदुस्तानियों के साथ बलात्कार करने के पहले ढोंगी बाबाओं को सौ बार सोचने का सबक मिले।

Bat ke bat, बात की बात

30 august 2013 

ब्रिटिश संसद से सीटों के रंग से अधिक सीखने की जरूरत

30 अगस्त 2013
संपादकीय
कल शाम कई घंटे तक पश्चिमी समाचार चैनलों पर ब्रिटिश संसद के निचले सदन की बहस दिखाई जाती रही। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक प्रस्ताव रखा था कि ब्रिटेन अमरीका के साथ मिलकर सीरिया में फौजी कार्रवाई करे, ताकि वहां पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल दुबारा न किया जा सके। इस मामले में सरकार को संसद में शिकस्त मिली, और सांसदों ने इस प्रस्ताव को बहुमत से खारिज कर दिया। यहां पर दो मुद्दे हैं, एक तो मुद्दा सीरिया का है कि वहां पर चल रहे जनआंदोलन, या बगावत, या विदेशी दखल से फैलाई गई बेचैनी, जो भी हो, उस पर बाकी दुनिया को क्या करना चाहिए। और दूसरा मुद्दा यह कि किसी देश की संसद के भीतर एक दूसरे देश के अंदरूनी मामलों को लेकर किस तरह की बहस हो सकती है, और सरकार किस तरह हार सकती है। 
इस बात पर आज लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि पिछले बहुत से बरसों से हिंदुस्तान में संसद के कामकाज को लेकर जनता के बीच एक बड़ी हिकारत खड़ी हो गई है, और लोग सांसदों को निठल्ला और मुफ्तखोर मानने लगे हैं। फिर किसी भी देश में यह भी दिक्कत रहती है कि राष्ट्रीय संसद का असर प्रांतीय विधानसभाओं पर भी होता है और वहां भी काम करने की संस्कृति खत्म होने लगती है। कल के लंदन के इस प्रसारण से भारत की तुलना जायज इसलिए है क्योंकि भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली के नक्शेकदम पर बनी है, और उसकी नकल इस हद तक हुई है कि ब्रिटेन के उच्च और निचले सदन में कुर्सियों का जो रंग है, वैसा ही रंग भारत में राज्यसभा और लोकसभा की कुर्सियां का रखा गया है। 
इस मामले में ब्रिटेन के निचले सदन की कल की बहस को अगर देखें, तो घंटों की बहस में एक मिनट भी हंगामे में खराब नहीं हुआ, पल-पल इस रफ्तार से सांसद बहस करते रहे, अपनी बात रखते रहे, अपनी बात के बीच दूसरों को बोलने का मौका देते रहे, और प्रधानमंत्री से लेकर विपक्ष के नेता तक अपने लंबे भाषणों के बीच दर्जनों लोगों को बोलने देने के लिए बैठते रहे। यह पूरा सिलसिला देखने लायक था कि एक नाजुक मुद्दे पर, विदेशी, अंतरराष्ट्रीय, और ब्रिटेन के हितों से जुड़े हुए इस मुद्दे पर किस तरह के ठोस और वजनदार तर्कों के साथ बात हो सकती है। हिंदुस्तान की संसद को बरसों से देखने के बाद हमको यह लगता है कि यहां पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर इस देश की किसी वजनदार भूमिका की तो कोई बात होती ही नहीं, घरेलू मुद्दों पर भी जब बात होती है, तो बहस का स्तर वैसा ही रहता है जैसा कि सांसदों की पार्टियों का सड़क की बहस में हो सकता है। 
जिस तरीके से ब्रिटिश संसद बहस करके किसी नतीजे पर पहुंचते दिखी, उससे लगता है कि वहां पर संसद की कार्रवाई से भारत की संसद को अभी सीखने के लिए बहुत कुछ है। हमारा ऐसा अंदाज है कि हिंदुस्तानी संसद के मुकाबले ब्रिटिश संसद साल में बहुत अधिक दिन और बहुत अधिक घंटे काम करती है, और अगर कल शाम का नमूना कोई सुबूत है, तो फिर उस संसद के कामकाज की उत्कृष्टता भी हिंदुस्तानी संसद के मुकाबले बहुत ऊपर है। यह एक ऐसा मुद्दा था जिस पर उस संसद के भीतर पिछली सरकार के वक्त इराक पर हुए हमले को लेकर उस वक्त लिए गए फैसले को लेकर बहस पटरी से उतर सकती थी, लेकिन कई घंटों तक जिस तरह ब्रिटिश संसद सिर्फ मुद्दे पर, और उसके सिर्फ जरूरी पहलुओं पर अपने एक-एक शब्द को तौलकर इस्तेमाल करते रहे, वह देखने लायक था। जिन लोगों ने इस पूरे प्रसारण को देखा-सुना होगा, उनके दिमाग में अफगानिस्तान, इराक से लेकर आज के सीरिया के मामले तक, ब्रिटेन के भीतर की दो या अधिक विचारधाराओं की तस्वीर एकदम से साफ हो गई होगी।
हिंदुस्तान की जनता सिर्फ ऐसी हसरत कर सकती है कि यहां की संसद भी देश और दुनिया के मुद्दों पर काम की ऐसी बहस करे, बजाय काम न करने के, बजाय हंगामा करने के, और बजाय तंगदिल और तंगनजरिए से किए जाने वाले ओछे हमलों के। एक संसद का काम मुद्दों पर जिस तरह से वैचारिक बहस का है, वह इस मामले में कल ब्रिटिश संसद में देखने मिला। और यह अफसोस भी हुआ कि हिंदुस्तानी संसद में सीटों के रंग से अधिक इस संसद से कुछ नहीं सीखा है। 

कल तक की बिना इंटरनेट की नौबत के मुकाबले बहुत बेहतर

29 अगस्त 2013
संपादकीय
इन दिनों अखबारों की खबरों में जगह-जगह इंटरनेट की कुछ वेबसाईटों का जिक्र आता है। एक समय था जब अमिताभ बच्चन जैसे लोगों से बात करना मुश्किल था, आज दिन में कम से कम दो दर्जन बार अमिताभ बच्चन अपने ट्विटर, फेसबुक खातों पर, और अपने ब्लॉग पर अपनी राय खुद होकर लिखते हैं। और वहीं से अखबारनवीस खबर बना लेते हैं। टेक्नालॉजी ने न सिर्फ मीडिया के काम के तरीकों को बदला है, बल्कि दुनिया के तमाम किस्म के रिश्तों में एक फर्क ला दिया है। अब हिंदुस्तान में ही शायद करोड़ों लोग रात-दिन किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईट पर कुछ न कुछ लिखते रहते हैं, लिखे हुए पर प्रतिक्रिया डालते रहते हैं। नतीजा यह है कि जिन लोगों को कल तक अपनी भड़ास अपने मन में रखने की बेबसी थी, उनको आज अपने मन की बात जगजाहिर करने का एक बड़ा मौका मिला है। और यह मौका सबसे दबे-कुचले, सबसे बेजुबान तबके के लिए मौके सरीखा है, और इससे लोकतंत्र में एक नया पन्ना जुड़ा है। 
हिंदुस्तान में लोगों की जिंदगी से हास्य और व्यंग्य धीरे-धीरे करके कम हो चले हैं। लोग सिर्फ तनाव और भड़ास की बात करते थे। अखबारों और टीवी की खबरें भी लोगों को सिर्फ तनाव के लिए तैयार करती थीं। ऐसे माहौल में पिछले कुछ बरसों में लगातार बढ़ते चले गए इंटरनेट आधारित संबंधों की वजह से अब बात निकलती है, तो दूर तलक चली जाती है। लोगों को अपनी ऐसी पैनी बातें कहने का ऐसा मौका मिलता है, जो कि किसी अखबार के पाठकों के पत्रों के कॉलम में नहीं मिलता था। अब तक शौचालयों के दरवाजों के भीतरी तरफ लिखने की जो बेबसी थी, वह अब इंटरनेट ने खत्म कर दी है, और तेज धार वाली चुभने वाली बातों से लेकर घटिया और गंदी बातों तक, सबके लिए एक लोकतांत्रिक मौका अब हर किसी को मुफ्त हासिल हो गया है। नतीजा यह निकला है कि कोई घटना होती नहीं है, कि उस पर अपनी राय रखने वाले दसियों हजार लोग मिनटों में ही पिल पड़ते हैं। इससे जहां लोगों को एक तरफ अभिव्यक्ति की एक नई स्वतंत्रता मिली है, वहीं पर दूसरी तरफ जो जिम्मेदार नेता या मुखिया हैं, उनको भी जनता के कम से कम एक तबके की प्रतिक्रिया को जानने का एक ऐसा मौका मिला है जो दुनिया के इतिहास में पहले कभी नहीं था। 
आज इन दोनों तबकों के लिए नई टेक्नालॉजी एक नई संभावना लेकर आई है। अब जनता के बीच के लोग, कम से कम इंटरनेट तक पहुंच वाले लोग, बेजुबान नहीं हैं, और उनका लिखा हुआ नरेन्द्र मोदी के लिखे हुए के ठीक बगल में आ सकता है, और उसे प्रधानमंत्री कार्यालय पढ़ भी सकता है, शायद पढ़ता भी होगा। ऐसे में लोगों को इस मौके को दुहकर अपने विचारों को दूसरों के साथ बांटने का एक काम करना चाहिए, ताकि उनकी जो सोच है उसे दूसरों की कसौटी पर वे खड़ा भी करें, दूसरों को प्रभावित भी करें, और दूसरों की प्रतिक्रियाओं से वे खुद आत्ममंथन भी करें। इनमें से कोई भी बात अभी कुछ बरस पहले तक किसी को हासिल नहीं थी, और अब एक किस्म से इंटरनेट बिना चुनावी नतीजों वाले मतदान केंद्र सरीखे हो गए हैं जिनमें मतदाता अपने विचारों का दान करते हैं, और समझदार नेता, समझदार मुखिया अगर चाहें तो उनसे लोगों की राय की गिनती खुद निकाल सकते हैं।
आज दरअसल सामाजिक-राजनीतिक मोर्चे के बजाय बाजार अधिक चौकन्ना है, और वह इंटरनेट पर लोगों की पसंद, पहल, और उनका रूख भांपकर अपने सामान और अपनी सेवाएं बेचने के मामले में बहुत ही चतुर साबित हुआ है। बात की बात में बाजार लोगों के दिल और दिमाग के शब्द भांप लेता है, और इंटरनेट पर मौजूद लोगों को ग्राहक बनाने के लिए मेहनत करने लगता है। आज राजनीतिक और सामाजिक मोर्चे के दिग्गज लोगों को भी चाहिए कि आसान इंटरनेट औजारों के इस्तेमाल से वे लोगों के साथ एक बेहतर बातचीत शुरू करें, जारी रखें, और बढ़ाएं। इस काम में जो लोग पिछड़ जाएंगे, वे सचमुच की जिंदगी में भी शायद पिछड़ जाने का कुछ खतरा उठाएंगे। धीरे-धीरे हिंदुस्तान की आबादी का इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला तबका बढ़ते चल रहा है, और इससे पैदा संभावना को होशियार लोग छोड़ेंगे नहीं। हम इससे लोकतंत्र में एक अभूतपूर्व नौबत देखते हैं, कल तक की बिना इंटरनेट की नौबत के मुकाबले बहुत बेहतर।


बात की बात, Bat ke bat

28 august 2013

गरीबों के हक की सब्सिडी और रास्ते के अमीर हरकारे

संपादकीय
28 अगस्त 2013
यूपीए सरकार की पहल पर चाहे-अनचाहे संसद में पार्टियों को बहुमत से खाद्य सुरक्षा विधेयक पास करना पड़ा। इसके साथ ही देश के सबसे गरीब लोग अब बहुत रियायती दर पर अनाज मिल सकेगा। बहुत कम शब्दों में आंकड़े गिनाएं, तो 67 फीसदी आबादी को 3, 2, 1 रूपए प्रति किलो के रेट पर हर महीने प्रति व्यक्ति 5 किलो अनाज मिल सकेगा। इससे सरकार पर सवा लाख करोड़ (1 लाख 24 हजार 723 करोड़) रूपए का सालाना बोझ पड़ेगा। हिन्दुस्तान का संपन्न तबका और दुनिया के कारोबारी, पूंजीवादी देश, पूंजीवादी वित्तीय संस्थाएं, सभी इसके खिलाफ हैं। इन सबका यह मानना है कि यह हिन्दुस्तानी आबादी को खुश करने के लिए देश को दीवालिया बनाने का काम है, और यह एक ऐसा काम भी रहा जिसका कि संसद में बहुत अधिक विरोध कोई पार्टी नहीं कर पाई क्योंकि इसे रोकना मतदाताओं के बीच खुदकुशी सरीखा होता। 
अभी हम देश की अर्थव्यवस्था और गरीबों की जरूरत पर लंबी बात किए बिना, यहां पर एक दूसरी बात करना चाहते हैं। केन्द्र सरकार से निकली यह रियायत उसके हाथों से किसी गरीब तक सीधे पहुंचने में देर है। जब नगद ट्रांसफर शुरू होगा, तब तक तो राज्यों के मार्फत ही रियायती अनाज गरीब तक पहुंचेगा। और ऐसी रियायत में देश भर में दहशत पैदा करने की हद तक चोरी होती। छत्तीसगढ़ की मिसाल कुछ हैरान करने वाली है, जहां की अनाज-रियायत की चोरी देश में सबसे कम है, और लोगों तक अनाज पहुंचने का इंतजाम देश में सबसे अच्छा है। लेकिन अगर छत्तीसगढ़ की ही बात करें, तो अनाज की रियायत से परे बाकी रियायतों में यहां भी लूट और डकैती चल रही है। राजधानी के बगल में ही एक ऐसी गैस एजेंसी पकड़ाई जाती है जो अकेले ही पिछले कुछ बरसों में सैकड़ों करोड़ का घपला कर चुकी है। रियायती रसोई गैस से छत्तीसगढ़ के कारोबार चलते हैं, कारखाने चलते हैं, और सरकार का इस पर कोई काबू नहीं है। मजे की बात यह है कि सरकार के जिस विभाग के जिम्मे अनाज है, उसी के जिम्मे रसोई गैस भी है। और चूंकि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने रियायती अनाज को अपना निजी मुद्दा बनाया है, इसलिए वह तो गरीब तक पहुंच रहा है, लेकिन उन्होंने रसोई गैस के बारे में कोई नारा नहीं दिया है, इसलिए वह रियायत भारी-भरकम चोरी का शिकार है। यही नहीं, केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाएं, इलाज की योजनाएं, और दिल्ली से निकलकर राज्यों में आने वाली हर रूपए में अगर तीन चौथाई हिस्सा सरकारी खर्च और सरकारी भ्रष्टाचार में निकल जा रहा है, तो गरीब को मिला कुछ नहीं, सिवाय गैरगरीबों के तानों के। आज हिन्दुस्तान में गैरगरीब तबका पेट्रोल की महंगाई का रोना रोता है, और सरकार से उम्मीद करता है कि वह पेट्रोल सब्सिडी जारी रखे, लेकिन वह गरीब के अनाज की सब्सिडी के खिलाफ है। 
आज देश में जब विपन्न तबके को मिलने वाले रियायत के खिलाफ संपन्न तबके में भारी नाराजगी है, तब यह सोचने की जरूरत है कि इस रियायत में दिल्ली से गरीब के बीच के सफर में लूट कौन करता है? क्या गरीब इसे लूटता है? नेता, अफसर, ट्रांसपोर्टर, दुकानदार, इनमें से कोई भी इस रियायत का हकदार गरीब नहीं है, ये सारे के सारे ताकतवर तबके के लोग हैं, कम से कम गरीब के मुकाबले ये लोग अधिक ताकतवर हैं। और जब इन्हीं तबकों में से लोग लूट में लग जाते हैं, तो देश को डुबाने की तोहमत गरीबों की गरीबी पर लगती है, कि उनके पेट भरते देश का दीवाला निकल रहा है। देश का दीवाला गरीब को जाने वाली सब्सिडी से नहीं निकल रहा, देश की प्राकृतिक संपदा की लूट से निकल रहा, भ्रष्टाचार से निकल रहा, देश की सुनहरी संभावनाओं को मिट्टी के मोल एकाधिकार में बेच देने से निकल रहा है। इसलिए आज अगर केन्द्र सरकार के बनाए इस कार्यक्रम से सौ करोड़ के करीब गरीब लोगों के पेट भरकर सोने का एक रास्ता निकल रहा है, तो इस रास्ते में जो लुटेरे, डकैत, और ठग खड़े हैं, उन सबको रोकने का जिम्मा तो राज्य सरकारों का है। राज्यों को इतनी बड़ी सब्सिडी में अपने-अपने इलाकों में चोरी रोकनी होगी, क्योंकि उनकी जनता का पेट अगर ठीक से भर सकेगा, तो इससे वाहवाही अकेली केन्द्र सरकार को नहीं मिलेगी, भरे पेट की जनता का रूख राज्य सरकार के लिए भी बेहतर होगा। और जनता के रूख की बात छोड़ भी दें, सत्ता पर बैठे हर इंसान की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे सबसे गरीब के हक के लिए सबसे अधिक चौकन्ना हों। छत्तीसगढ़ का हाल तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में अनाज के मामले में पूरे देश में सबसे अच्छा है, बाकी राज्यों को भी यहां से सबक लेना चाहिए, और सवा लाख करोड़ रूपए सालाना की इस भारी-भरकम रियायत के अधिक से अधिक सही इस्तेमाल का इंतजाम करना चाहिए। भारत की संघीय व्यवस्था में केन्द्र सरकार कोई भी योजना बना सकती है, लेकिन उसका अमल अगर राज्यों के मार्फत होना है, तो उनको भी इन योजनाओं को पूरी कड़ाई और ईमानदारी से लागू करना होगा। वरना गरीबों के हक की सब्सिडी रास्ते के अमीर हरकारे खा लेंगे, और देश को दीवालिया बनाने की तोहमत फिर गरीबों पर आ जाएगी। 

Bat ke bat, बात की बात

27 august 2013

जब सोना सिर चढ़कर बोलता है, तो देश की तरक्की भी सो जाती है

संपादकीय
27 अगस्त 2013
भारत में रूपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार की लगभग एकाधिकार वाली अमरीकी करेंसी डॉलर के मुकाबले जिस तरह गिर रही है, उससे हिन्दुस्तान के इतिहास में आज तक सबसे अधिक गिनती में लतीफे बने हैं। जिस किसी के पास थोड़ा सा हास्य-बोध है, उसने कुछ न कुछ जरूर गढ़ा है। इस नौबत की जटिलता, इसके खतरे, इसके पीछे की वजहें, और इससे उबरने की संभावना, इन सबसे परे जनभावना यह है कि देश की हालत खस्ता है, और दुनिया की नजरों में भारत मजाक का सामान बन गया है। ऐसी हालत में जब रूपए की कीमत टका सेर सी रह गई है, जब शेयर बाजार औंधे मुंह गिर गया है, तो सोना आसमान पर जा रहा है। सरकार कोशिश कर रही है कि हिन्दुस्तानियों का सोने का मोह कुछ कम हो, लेकिन अब सोना खरीदने और रखने पर चूंकि कोई कानूनी सीमा नहीं है इसलिए लोग अंधाधुंध सोना खरीदकर रख चुके हैं, और सरकार की नसीहत की न कोई साख है, और न ही कोई असर उसका हो रहा है। 
अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ ऐसी नौबत पर बहुत कुछ लिख रहे हैं, लेकिन हम यहां पर बड़ी साधारण कुछ बातें करना चाहते हैं। जब देश में लोगों का सरकार से लेकर कारोबार तक किसी पर भरोसा नहीं रहता तो लोग सोना खरीदकर रखने लगते हैं जिसके बारे में दुनिया का इतिहास यह बताता है कि उसे कहीं भी आधी रात को बेचकर पैसे खड़े किए जा सकते हैं। ऐसे में भारत में सिर्फ महिलाओं के मोह की चर्चा गलत होगी, उनके बदन पर और उनकी आलमारियों में सोना रखकर हिन्दुस्तानी मर्द अपना एक बड़ा सुरक्षित पूंजी निवेश भी करते हैं, क्योंकि आड़े वक्त पर वे गहने आदमियों के ही काम आते हैं। लेकिन सोने के साथ एक दिक्कत रहती है, उससे आर्थिक चक्का रूक जाता है। सिर्फ सोना लॉकर में बंद नहीं होता, उतने दाम की पूंजी से देश में तरह-तरह के कारोबार आगे बढऩे का जो सिलसिला रहता है, वह सिलसिला अपनी सारी संभावनाओं के साथ गहनों की शक्ल में लॉकर में बंद हो जाता है। इसलिए जब लोग बैंकों में नगद जमा करने के बजाय, शेयर बाजार में लगाने के बजाय, खुद कोई व्यापार करने के बजाय, जमीन-जायदाद खरीदने-बेचने के बजाय, सोने जैसे एक मुर्दा पूंजी निवेश की तरफ बढ़ जाते हैं, तो देश की आर्थिक हलचल थम जाती है। आज हिन्दुस्तान इसी नौबत का शिकार है। 
और जब दस बरस इस देश को एक बड़ा अर्थशास्त्री चला रहा है, उसका पसंदीदा आदमी योजना आयोग पर काबिज है, उसका पसंदीदा दूसरा आदमी वित्त मंत्री है, तो फिर देश की इस बदहाली के लिए वही जिम्मेदार है। यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी अपनी सत्ता के दसवें बरस में किसी बहाने का इस्तेमाल करके अपने को नहीं बचा सकते। आज देश में महंगाई से लोगों का बुरा हाल है, भ्रष्टाचार को देख-देखकर लोग थके हुए हैं, और ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख गिरती चली जा रही है, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां हिन्दुस्तान को पूरक परीक्षार्थी की तरह फेल करार दे रही हैं, तो जनता अपना भरोसा मुर्दा सोने पर अधिक दिखा रही है। जब सोना सिर चढ़कर बोलता है, तो देश की तरक्की भी सो जाती है। 
ऐसे में देश के कई लोगों का यह सोचना ठीक लगता है कि अब अगली सरकार का वक्त आ गया है, और इस सरकार के जारी रहने से गिरावट का यह रूख अगर जारी रहा तो यह देश इससे उबरने में नाकामयाब भी हो सकता है। यह बहुत बुरा अंधेरा चल रहा है, और यूपीए सरकार के आने वाले महीने अगर देश को और अधिक गड्ढे में ले जाते हैं, तो भारत के बाजार में लोगों का दीवालिया होना शुरू हो चुका है, बढ़ता चले जाएगा। लिखने को और भी बहुत कुछ है, लेकिन जगह-जगह भी कम है, और समय भी कम है। इसलिए हम मनमोहन सिंह को बस इतना लिख सकते हैं कि चि_ी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना...

समझदारी की बात कहने वाले शरद यादव जैसे लोग कम

संपादकीय
26 अगस्त 2013
आसाराम नाम के एक तथाकथित संत के खिलाफ एक नाबालिग बच्ची द्वारा लिखाई गई रिपोर्ट पर कार्रवाई करने में केन्द्र सरकार से लेकर राजस्थान सरकार तक के हाथ-पांव ठंडे पड़े दिख रहे हैं। किसी और के खिलाफ यह शिकायत होती तो रातों-रात पुलिस किसी शिकारी की तरह छापे मार-मारकर लोगों को पकड़ लेती, लेकिन यहां एक चर्चित और विवादास्पद, बदनाम और अनुयायियों वाले आसाराम का मामला है इसलिए पुलिस का हाल बेहाल है। 
इस देश में हर कुछ महीनों में कोई न कोई ऐसा चर्चित व्यक्ति बलात्कारों के मामलों में पकड़ाता है जो कि धर्म या आध्यात्म की दुकान चलाने वाला रहता है। उसे बचाने के लिए भक्तों की फौज लग जाती है, और इन दिनों खासे प्रचलित हो गए धार्मिक और आध्यात्मिक टीवी चैनल भी जुट जाते हैं। आसाराम के मामले में तो स्वघोषित साध्वी उमा भारती ने इस बच्ची के आरोप को झूठा करार देते हुए इसे सीधे सोनिया गांधी की साजिश बता दिया है। मतलब यह कि इंसाफ की गुंजाइश तब नहीं रह जाती जब ताकतवर लोग जुर्म करते हों। 
आज लोकसभा में जब मुम्बई के सामूहिक बलात्कार को लेकर विपक्ष की नेता, भाजपा की सुषमा स्वराज सरकार पर हमला बोल रही थीं, तब विपक्ष के ही जदयू नेता शरद यादव ने सुषमा के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वे बलात्कार की निंदा तो करती हैं, लेकिन उस साधू के कृत्य की निंदा क्यों नहीं करतीं, जिसने एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया। यह साधू तमाशा कर रहा है, इस पर आप क्यों कुछ नहीं कहती, चुप क्यों हैं। शरद यादव संसद में जब बोलते हैं, तर्क की बात करते हैं, इंसाफ की बात करते हैं, और उनका कहा एक-एक शब्द छापने के लायक रहता है। आज जब राजनीतिक दलों के नेता धर्म, जाति और आध्यात्मिक गिरोहों से जुड़े हुए मवालियों के खिलाफ कुछ बोलने से डरते हैं, तब शरद यादव जैसे लोग वामपंथियों के अलावा अकेले रहते हैं जो कि धर्मांधता के खिलाफ बोलते हैं। 
भारत में धार्मिक कपड़े पहने हुए लोग मासूम लोगों के सेक्स-शोषण में बड़ी संख्या में लगे रहते हैं। इनके प्रति लोगों की एक अंधश्रद्धा रहती है जिसके चलते शिकायतें भी शायद ही कभी होती हैं, और जब होती हैं, तो उनको बचाने वाले लोग पुलिस से लेकर अदालतों तक में बैठे रहते हैं। नेताओं में बहुत से ऐसे रहते हैं जो ऐसे पाखंडियों से वोटों की मदद पाते हैं, और अंधश्रद्धालु इनके कहे शायद वोट भी डाल देते हैं। यह तो भला हो वीडियो तकनीक का, जिसके चलते कई पाखंडियों की वीडियो क्लिप बन जाती है, और उनका भांडाफोड़ होता है। समाज के भीतर एक अधिक जागरूकता की जरूरत है जिससे धर्म-आध्यात्म के भीतर होने वाले देह शोषण के खिलाफ लोग मुंह खोलें, औरों को चौकन्ना करें, और संत-साधू, धर्म गुरू कहलाने वाले लोगों को अंदर करवाएं।
आसाराम का मामला इसी तरह का है, गले-गले तक आरोपों से घिर जाने के बाद भी यह आदमी सार्वजनिक कार्यक्रमों में मंच पर से माईक पर जिस तरह की बातें कर रहा है, वह सिलसिला कानूनी कार्रवाई से थम सकता है, लेकिन अभी उस तक पहुंचने के लिए पुलिस के पांव ही थमे हुए हैं। यह देश इक्कीसवीं सदी में आकर भी पाखंड का सम्मान करने में लगा हुआ है, और अंधविश्वास के खिलाफ, पाखंड के खिलाफ जो लोग आंदोलन चलाते हैं, उनके कत्ल करने में लगा हुआ है। इस शर्मनाक नौबत में जी रहे इस लोकतंत्र के भीतर शरद यादव ने समझदारी की एक बात कही है, उसे आगे बढ़ाना चाहिए। कल उन्होंने आसाराम बापू पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि आसाराम तमाशा राम और नौटंकी राम हैं और उन्हें तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जब वह जेल जाएंगे तो सुधर जाएंगे। उन्होंने आसाराम को ड्रामैटिक करार देते हुए कहा कि मुझे समझ नहीं आ रहा है कि राजस्थान सरकार उन्हें गिरफ्तार करवाने में कामयाब क्यों नहीं हो पाई। उनकी बातों पर समाज के समझदार तबकों को मुंह खोलना चाहिए, वरना भगवा-सफेद, या किसी और धार्मिक रंग के चोलों से किसी के बच्चे सुरक्षित नहीं रहेंगे। 

लोकतंत्र में पनप चुके शून्य में तूफानी हवा सी आ बसी हिंसा

26 अगस्त 2013
हिंदुस्तान के कोने-कोने से ऐसी तस्वीरें आती हैं कि गरीब बच्चे किस तरह मजदूरी कर रहे हैं, और किस तरह खाने का हक पाने की राह देख रहे हैं। पिछले कुछ बरसों में सुप्रीम कोर्ट की रात-दिन की दखल से, और कई राज्यों के मुख्य सचिवों की कटघरे में पेशी से अब राशन की हालत कुछ सुधर रही है, और गरीबों के भूख से मरने की खबरें कुछ घट रही हैं। स्कूलों में दोपहर का भोजन, कहीं अच्छा, कहीं कम अच्छा मिलते चल रहा है, और सरकार पर पडऩे वाले इसके बोझ के लिए हिंदुस्तान के कारखानेदारों से लेकर विश्व बैंक तक के माथे पर बल पड़ गए हैं। 
दरअसल गरीबों की गिनती बनी रहे, या न बनी रहे, इससे बाजार का अधिक लेना-देना नहीं होता। बाजार यह देखता है कि आबादी का एक हिस्सा कम से कम दाम पर सामान बनाते चले, और आबादी का दूसरा हिस्सा अधिक से अधिक दाम पर, अधिक से अधिक खपत करता चले। चीन से जो खबरें आती हैं वे बताती हैं कि एप्पल और सैमसंग जैसी दुनिया की सबसे कामयाब इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां किस तरह मजदूरों को पन्द्रह-पन्द्रह घंटे एक ही जगह पर खड़े रखकर उनसे काम करवा रहीं हैं, और इमारत के आसपास जाल लगाकर रखे गए हैं कि थके हुए मजदूर तनाव में कूदकर जान न दे दें। उनकी हालत किसी पोल्ट्री फॉर्म के दड़बों की तरह हो गई है जिनमें मुर्गियां खड़े रहकर सिर्फ अंडे देने और कटने का इंतजार करती हैं।
ऐसी अंतरराष्ट्रीय हिंसक बाजारू सोच के बीच जब हिंदुस्तान में गरीबों को किसी रियायत को देने या बढ़ाने की बात होती है तो गरीबी से ऊपर के लोग हिंदुस्तान के भीतर, और बाहर, हर जगह उबल पड़ते हैं। जब पेट्रोलियम की रियायत कम होने की बात होती है तो भी लोग इतने ही उबल पड़ते हैं। औरों की जिंदा रहने की न्यूनतम जरूरत और अधिकतम सहूलियत के बीच इंसानियत भटकती रहती है। जो लोग तीस फीसदी इनकमटैक्स देने के दायरे में आते हैं, उनको भी अपनी कमाई से तसल्ली नहीं होती, जो टैक्स जाता है उसका दर्द ही रहता है। 
कुछ दिन पहले पंजाब के एक पे्रस फोटोग्राफर प्रकाश फुलारा की खींची एक तस्वीर छपी जिसमें लुधियाना में स्कूल से घर जाते हुए वह अपने पिता की घोड़ागाड़ी पर उनके साथ काम पर निकल जाती है, और पढ़ती भी रहती है। कुछ वक्त पहले की एक दूसरी तस्वीर, शायद मुंबई की थी जिसमें सड़क किनारे रखे एक पाईप के भीतर पलता हुआ परिवार दिख रहा है, और उसमें एक महिला अपनी बच्ची को स्कूल के लिए तैयार कर रही है। ऐसी तस्वीरों को देखें तो लगता है कि इनका हक आखिर जा कहां रहा है? क्या इस देश का भविष्य पाईपों में पलने के लिए ही बना है? या इनके हक के छोटे-छोटे घरों को हड़पकर बड़े लोगों के महल बनते हैं? 
लूटे हुए और लूटते हुए लोगों के बीच फासला बढ़ते चल रहा है। जो ताकत जिस जगह पर हैं, वे उस ताकत को पूरे नाखूनों और दांतों के साथ कमजोर बदनों पर धंसाते चल रहे हैं। देश का कोई कानून गरीब को उसका हक दिला नहीं पा रहा है। किसी दूकान के शो-केस की तरह कुछ टुकड़े गरीबों के लिए सजाए जाते हैं, लेकिन असली माल सरकार और बाकी किस्म की सत्ता पर काबिज लोग खाकर डकार भी नहीं लेते हैं। सत्ता पर बैठे लोग जिस बेशर्मी के साथ लूटने में लगे हैं, यह देखना हो तो देश की राजधानी से लेकर कर्नाटक की राजधानी तक कांगे्रस और भाजपा, और उनके साथी दलों का इस कदर नंगा नाच चल रहा है कि उसे देखकर जंगल के बिना कपड़ों के जानवरों से लेकर नागा साधुओं तक सबको शर्म आ जाए, कि राजधानियों के इन लुटेरों के मुकाबले उनका नंगापन तो कुछ भी नहीं है। चमचमाती, कलफ और नील लगी खादी से गर्दन से पांव तक ढंके रहकर भी कोई कितना नंगा हो सकता है, यह देखना हो तो देश की राजधानियों में देखना होगा। 
आज इस मुद्दे पर लिखने को दिल इसलिए चाह रहा है कि कल झारखंड में सड़क पर एक मौत के बाद लोगों ने एक दर्जन से ज्यादा ट्रकों को जला दिया। हरियाणा में कल महिलाओं ने बसों और गाडिय़ों को लाठियों से तोड़ते दिख रही थीं, पुलिस पर पथराव कर रही थीं क्योंकि उनके दलित तबके की एक लड़की की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी, और वे लोग उसकी लाश के साथ सड़कों पर थे। 
सड़कों पर यह हिंसा उसी लोकतंत्र में होती है जहां पर सड़कों के किनारे बनी महलनुमा इमारतों में संसद, विधानसभाएं, सरकारें, और अदालतें अपना काम ठीक से नहीं करतीं। और सरकारों की नीयत अगर काम ठीक से करने की होती तो देश के हाईकोर्टों में जजों की तीन सौ के करीब कुर्सियां खाली नहीं होतीं। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ पकड़ाए गए मामलों में भी बरसों तक कानूनी कार्रवाई की इजाजत टलती नहीं जाती, घूम-फिरकर वे ही भ्रष्ट अफसर बार-बार कमाऊ कुर्सियों पर नहीं लाए जाते। छोटे राज्य बनाने की वकालत करते हुए हम ही बार-बार यह तर्क देते हैं कि छोटे राज्यों में फैसले तेजी से हो सकते हैं। यह बात सही है कि सबसे कमजोर और गरीब के खिलाफ फैसले तेजी से हो सकते हैं, लेकिन सबसे ताकतवर, भ्रष्ट, और सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोगों के खिलाफ फैसले शायद कभी भी नहीं होते।
ये दोनों-तीनों बातें, अलग-अलग भी हैं, और जुड़ी हुई भी हैं। और इन्हीं से जुड़ी हुई है नक्सल हिंसा। जब लोकतंत्र देश के भीतर अपनी गैरजिम्मेदारी से एक बड़ा शून्य खड़ा कर देता है, तब समुद्री हवाओं की तरह नक्सल हिंसा आकर वहां जम जाती है। लोग सड़कों पर कानून हाथ में लेने लगते हैं। जहां पर कमजोरों के हक छीनना एक स्थाई व्यवस्था बन जाता है, वहां पर हिंसा को नाहक कैसे कहा जा सकता है? यही वजह है कि सत्ता से परे के बहुत से सोचने-विचारने वाले अब यह मानते हैं कि हिंदुस्तान में सबसे कमजोर को इंसाफ बिना हिंसा के नहीं मिल सकता। यह अलग बात है कि शहरी लोगों में ऐसी सोची-समझी राजनीतिक-हिंसा का हौसला नहीं रहता, इसलिए नक्सल हिंसा शहरों से दूर-दूर पनप रही है। लेकिन दुनिया के इतिहास में बहुत सी ऐसी मिसालें हैं जिनमें अलोकतांत्रिक और हिंसक आंदोलन शहरी सड़कों पर भी हुए हैं। छत्तीसगढ़ जैसी सड़कों पर इनमें वक्त भी लग सकता है, क्योंकि शहरी लोग आरामतलब हैं, और शहरों की सड़कें पूरी की पूरी उधड़ी पड़ी हैं। उन पर जरूरत से अधिक चलने का संघर्ष शहरी लोग नहीं करेंगे। लेकिन यह नौबत हमेशा बनी रहेगी, यह भी जरूरी नहीं है। 
हिंदुस्तानी लोकतंत्र को अपने तौर-तरीकों को सुधारने की कोई जल्दबाजी इसलिए नहीं है क्योंकि ताकतवर कुर्सियों ने अपने-अपने लिए सरकारी बंदूकों के घेरे जुटा रखे हैं, और उनकी अगली पीढिय़ां अगर सरकारी घेरा नहीं पातीं, तो भी वे निजी बंदूकों का घेरा जुटा लेती हैं। लेकिन सत्ता की हिंसा के मुकाबले किसी दिन गैरलोकतांत्रिक हिंसा राजधानियां तक भी पहुंच सकती है।

अपने वोटरों के बीच बड़े स्कोर के लिए

25 अगस्त 2013
संपादकीय
अयोध्या में आज फिर तनाव है। कुछ महीनों बाद देश में चुनाव है, और ऐसे मौके के कुछ महीने पहले राम की याद आना जायज है। भगवा चोलों और जटाओं के साथ विश्व हिंदू परिषद खबरों में है, और उसने यह सवाल उछाला है कि एक तीर्थयात्रा से रोकने वाली सरकार क्या मुगलिया सल्तनत की वापिसी है? 
अभी अयोध्या और विश्व हिंदू परिषद पर हम नहीं लिख रहे। क्योंकि चुनाव तक इन मुद्दों पर लिखने का बहुत सा वक्त आएगा। आज जिस दूसरी बात पर लिखने की जरूरत है वह अयोध्या से परे, उत्तरप्रदेश से परे, पूरे देश की बात है। इस बात की शुरूआत यहीं से करना ठीक है क्योंकि मुलायम सिंह सरकार के मुस्लिम चेहरे कहे जाने वाले, उत्तरप्रदेश के नगर विकास मंत्री आजम खान ने कहा कि अयोध्या में चौरासी कोसी परिक्रमा पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगाई गई रोक बिलकुल जायज हैं। आजम खान ने कहा कि चौरासी कोसी परिक्रमा की आड़ में कुछ संगठन अपने राजनीतिक मकसद पूरा करना चाहते हैं। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश का माहौल बिगाडऩे का प्रयास कर रहे हंै जिसे पूरा नहीं होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्य में किसी भी दल या संगठन को सांप्रदायिक माहौल बिगाडऩे की इजाजत नहीं दी जा सकती है।
जैसा कि जाहिर है, आजम खान उत्तरप्रदेश के नगर विकास मंत्री हैं और वे राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के जिम्मेदार मंत्री नहीं हैं। हिंदू धर्म से जुड़े हुए एक आक्रामक, और पहले हिंसक-विध्वंसकारी हो चुके आंदोलन के बारे में जब उत्तरप्रदेश के बड़े अफसर कैमरों पर सरकार की रोक के बारे में खुलकर कह रहे हैं, तब एक मुस्लिम मंत्री को क्या इस मौके पर इस हिंदू धार्मिक आंदोलन के खिलाफ कुछ कहना जरूरी था? क्या यह बयान विश्व हिंदू परिषद के लिए था, या कि मुस्लिम समुदाय के लिए था? हिंदुस्तान में इस बात को अनदेखा करने की नासमझी नहीं करनी चाहिए कि लोगों के बयान उनकी पार्टी के आधार पर, उनके धर्म और उनकी जाति से जोड़कर देखे जाते हैं। इस हकीकत के बीच कई बार यह देखने में आता है कि हिंदू साम्प्रदायिकता से जुड़े मामलों में कुछ राजनीतिक दलों के गैरहिंदू प्रवक्ता बयान देने लगते हैं। इसी तरह कुछ नाजुक मुस्लिम मुद्दों पर गैरमुस्लिम प्रवक्ता बयान देने लगते हैं। जबकि हर राजनीतिक दल ने अलग-अलग धर्मों के, अलग-अलग प्रदेशों के कई प्रवक्ता बना रखे हैं, और देश की राजनीतिक हवा के लिए भी बेहतर बात यह होती कि प्रवक्ता और नेता ऐसे मुद्दों पर बयान देने का जिम्मा अपनी पार्टी के दूसरों लोगों पर छोड़ते जिन पर उनके अपने धर्म और जाति की छाप देखी जाएगी। 
हमारा यह मानना है कि जब कोई नेता-प्रवक्ता किसी नाजुक मुद्दे पर कुछ कहते हैं, तो उसका मकसद अपनी खुद की जाति या अपने मजहब के वोटर-तबके को लुभाने का नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे एक छोटे तबके के बीच वाहवाही मिल सकती है, लेकिन एक बड़ा तबका ऐसा होगा जो ऐसे बयानों के साथ धर्म और जाति को जोड़कर ही देखेगा। जनता की राजनीतिक समझ की सीमा को समझना चाहिए, उसकी संवेदनशीलता को समझना चाहिए, और सार्वजनिक जीवन में संगठन को व्यक्तियों से ऊपर रखना चाहिए। भारत आज साम्प्रदायिक दंगों से बचा हुआ चाहे हो, यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि लोगों की सोच में साम्प्रदायिकता, धर्मांधता, या जातिवाद का खात्मा हो गया है। आज भी लोग इन पैमानों पर नेताओं को, पार्टियों को और बयानों को तौलते ही हैं। यहां तक कि किसी बलात्कार के बाद लोग यह देखने लगते हैं कि बलात्कार की शिकार लड़की किस जाति की है, किस धर्म की है, और बलात्कारी किस धर्म या जाति का है। 
आजम खान के जिस बयान को लेकर हम यह बात कर रहे हैं, उस बात से बचा जाना चाहिए था, और समाजवादी पार्टी या मुलायम सिंह सरकार की मुस्लिमों के बीच साख को इतना कमजोर नहीं मानना चाहिए था कि उसे बचाने के लिए उनके एक मुस्लिम मंत्री को एक नाजुक हिंदू मुद्दे पर बोलने की जरूरत पड़े। हम यह भी नहीं मानते कि पार्टियां और नेता ऐसे बेमेल बयानों के खतरों को नहीं समझते। लेकिन इसके बाद भी अपने मतदाताओं के बीच एक बड़ा स्कोर खड़ा करने के लिए जब ऐसी आपा-धापी की बल्लेबाजी की जाती है, तो उसकी दूसरे बड़े तबके के बीच बड़ी उग्र, आक्रामक, और हिंसक प्रतिक्रिया होती है। देश के माहौल को ठीक-ठाक बनाए रखने के लिए भी यह जरूरी है कि तंगदिली और हड़बड़ी से बचा जाए।

Bat ke bat, बात की बात


बलात्कारियों को उनके खतरे भी गिनाने-समझाने की जरूरत

24 अगस्त 2013
संपादकीय
देश में बलात्कार की कोई भी अधिक चर्चा होने पर उससे निपटने और जूझने के कई तरह के रास्ते चर्चा में आ जाते हैं। इनमें से अधिकतर पुलिस पर निशाना बनाने वाले रहते हैं, जो कि आमतौर पर हर बलात्कारी को पकड़ लेती है और अदालत तक तो ले ही जाती है। ऐसे में पुलिस से परे समाज को क्या करना चाहिए इसकी चर्चा हमने दो दिन पहले ही इसी जगह की है। लेकिन कुछ और बातें समाज और सरकार मिलकर कर सकते हैं जिससे कि बलात्कार की हसरत रखने वाले लोगों का हौसला कुछ कम हो।
ऐसा लगता है कि अपनी हिंसक सोच और बदन की जरूरत के चलते मौका मिलने पर बहुत से लोग बलात्कार की दिमागी हालत में आ जाते हैं। उनमें से कुछ लोग ऐसा कर भी बैठते हैं, और उसके बाद उनका पूरा परिवार जिंदगी भर इसके एवज में तकलीफ पाने के लिए खतरा झेलने की हालत में आ जाता है। यह एक अलग बात है कि बलात्कार की शिकार लड़की या महिला तो सीधे-सीधे खुद इस हिंसा को झेलती है, और उसकी तकलीफ की बराबरी तो बलात्कारी का परिवार कभी भी नहीं कर पाता, लेकिन कई मामलों में बलात्कारी के घरवाले भी बरसों कई तरह की तकलीफ पाते हैं।
ऐसे में समाज में लोगों को यह बात समझाने की जरूरत है कि कुछ मिनटों के मजे के नाम पर हिंसा करने वाले लोगों को किस-किस तरह की सजा होती है, और उनके बेकसूर घरवालों को भी कैसी सामाजिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती है, कैसी आर्थिक दिक्कत झेलनी पड़ती है। किस तरह बलात्कारी के परिवार का कई जगह सामाजिक बहिष्कार सा हो जाता है, और अपने परिवार के एक मर्द के इस हिंसक जुर्म की लंबी सजा घरवाले भी काटते हैं। ऐसे में लड़कों से लेकर बुजुर्ग मर्दों तक यह बात इन सबके दिमाग में बिठाने की जरूरत है कि न तो ऐसी हिंसा कोई मजा हो सकती है, और न ही ऐसी हिंसा के बाद सजा से बचने की अधिक गुंजाइश रहती। अदालत का फैसला आने में वक्त लग सकता है, सुबूतों की कमी से कुछ लोग छूट भी सकते हैं, लेकिन सजा पाने का खतरा ही अधिक रहता है और ऐसे मामलों में तो पहली बार नाम आने से लेकर आखिरी अदालत के फैसले तक शर्मिंदगी भी एक सजा रहती है।
समाज में लोगों के बीच उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा और उनकी पारिवारिक जरूरत की अहमियत ठीक से सामने रखने की जरूरत है। और इसके लिए एक जागरूकता का अभियान समाज के लोग भी शुरू कर सकते हैं, और सरकार भी इसकी पहल कर सकती है। बलात्कारियों के परिवारों की शिनाख्त के बिना, उनके सजा तक पहुंचने के मामलों को सामने रखते हुए समाज को झकझोरने की जरूरत है ताकि ऐसा गलत काम करने के पहले लोग सोच सकें। फिर यह भी समझाने की जरूरत है कि बलात्कार और उसके बाद कत्ल से भी मुजरिम छुप नहीं सकते, और किस तरह जांच देर-सबेर उन तक पहुंच ही जाती है। आज भी भारत में अदालती रफ्तार और मुजरिमों के छूट जाने को लेकर जो जनधारणा है, उसके चलते बहुत से लोग यह सोच सकते हैं कि बलात्कार के बाद भी उनके फंसने की गुंजाइश कम ही रहेगी। ऐसे में हर परिवार को अपने जवान होते लड़कों से लेकर, किसी दफ्तर को अपने कर्मचारियों तक, किसी संगठन को अपने सदस्यों तक, महिलाओं का सम्मान सिखाने के साथ-साथ, ऐसे खतरनाक जुर्म से बचना भी सिखाना चाहिए। बलात्कार पर सजा बढ़ाने से कुछ नहीं होगा, बलात्कार की मौजूदा सजा का खतरा लोगों को समझाने का असर अधिक होगा।
एक दूसरा पहलू और भी है जिस पर हम कई बार लिखते हैं, समाज में लोगों की वयस्क मनोरंजन की जरूरतों से लेकर, एक स्वस्थ सामाजिक वातावरण भी जरूरी है जिसमें लड़के-लड़कियों को आपस में मिलने का मौका मिले। जो लड़के लड़कियों के साथ उठने-बैठने का मौका पाते हैं, उनके ऐसे हिंसक मुजरिम होने का खतरा शायद कुछ कम रहता हो। ऐसी बहुत सी बातें हैं, और इन पर परिवार, समाज, और सरकार, सबको अलग-अलग, और मिलकर भी, काम करना होगा, जागरूकता पैदा करनी होगी, नुकसान गिनाने होंगे, तभी जाकर समाज में खतरा घटेगा। आज तो लोगों को इस बात का भी ठीक से अंदाज नहीं है कि जेल के भीतर के पांच-दस बरस कैसी तकलीफ के होते हैं, और वहां जाकर किस तरह दूसरे पुराने कैदियों के हाथों बलात्कार झेलना पड़ सकता है। इसी एक बात का अहसास अगर ठीक से लोगों को हो जाए, तो उनकी बलात्कार की हसरत ठंडी पड़ जाएगी।

बात की बात

23 august 2013

हर बलात्कार के बाद नहीं, उसके पहले चर्चा जरूरी...

23 अगस्त 2013
संपादकीय
मुंबई में एक महिला प्रेस फोटोग्राफर के साथ शाम के वक्त शहर के बीच एक पुरूष साथी के साथ रहने के बावजूद जिस तरह से सामूहिक बलात्कार किया गया है, उससे एक बार फिर भारत में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा, यहां पर महिलाओं की हिफाजत, और बलात्कार जैसे मामलों की भी धीमी अदालती सुनवाई को लेकर चर्चा शुरू हुई है। महिलाओं के खिलाफ यह हिंसा देश भर में हो रही है, और जब बड़े शहरों में ऐसा कोई चर्चित मामला सामने आता है, तो उसे लेकर संसद से लेकर सड़क तक एक बार फिर लोगों की नाराजगी, भड़ास, और बेबसी दिखाई पड़ती है।
कुछ दकियानूसी लोग बलात्कार की हर वारदात के वक्त यह सवाल उठाते हैं कि महिलाओं को अपने कपड़ों का ख्याल रखना चाहिए, उनको अपनी हिफाजत का ख्याल रखना चाहिए। कुछ कम दकियानूसी या नासमझ लोग पुलिस से उम्मीद करते हैं कि वह बलात्कार को रोके। हकीकत यह है कि हिंदुस्तान में मर्दों की सोच को कतरा-कतरा बदलने की जरूरत है। एकदम से मर्द के दिमाग से बलात्कार को निकाला नहीं जा सकता, जब तक कि वे अपने बचपन से अपने घरों के भीतर अपनी मां और दूसरी महिलाओं को इज्जत पाते देखते हुए बड़े नहीं होते। इसके बाद बड़े होते-होते अगर वे स्कूल-कॉलेज में, मुहल्ले-सड़क पर लड़कियों और महिलाओं का सम्मान नहीं देखते, तो वे उसी दिमागी ढांचे में ढलते जाते हैं जो कि महिलाओं को छेडख़ानी से लेकर बलात्कार तक के लायक समझता है, और घर के भीतर भी महिला को गुलामी और हिंसा के लायक समझता है। 
आज भारत के समाज में बलात्कार जैसे जुर्म कम करने के लिए भी मेहनत नहीं हो रही है, तमाम मेहनत इस बात पर होती है कि किस तरह बलात्कारियों को पकड़ा जाए, और उनको सजा दिलवाई जाए। दूसरी तरफ उमा भारती जैसे नेताओं के शर्मनाक बयान आते हैं जिनमें वे आसाराम बापू के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने वाली बच्ची को झूठा करार देती हैं, और उसे कांगे्रसी साजिश का हिस्सा बताती हैं। इससे यह भी साबित होता है कि राजनीति या सत्ता की, ताकत की या शोहरत की किसी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद बहुत सी महिला नेता भी पुरूषों की तरह ही सोचने लगती हैं, और जिस महिला तबके की बुनियाद पर वे ऊंचाई तक पहुंचती हैं, उसे ही लात मारना शुरू कर देती हैं। ऐसे बयान वक्त-वक्त पर ममता बैनर्जी भी देती आई हैं, और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष की कुर्सी पर कांगे्रस द्वारा बिठाई गई महिला भी कई किस्म की बकवास करते आई है। इसलिए आज बलात्कार के पीछे की सामाजिक वजहों पर चर्चा के बजाय बात इस पर आ टिकती है कि किस पार्टी के राज में बलात्कार हुआ है, किस जाति या धर्म के व्यक्ति ने बलात्कार किया है, किस पार्टी से जुड़े हुए लोग बलात्कारी हैं। ऐसे में बलात्कार होते रहेंगे, बढ़ते रहेंगे, और अधिक से अधिक अगर कुछ होगा, तो बलात्कारियों में से किसी-किसी को सजा हो जाएगी। लेकिन इससे हिंदुस्तानी गांव-शहर में महिला को हिफाजत नहीं मिलेगी। 
बलात्कार के पीछे के सामाजिक कारणों की अगर बात करें तो समाज में लड़के-लड़कियों को बराबरी के हक सिखाने से लेकर, उनकी सेक्स शिक्षा तक को एक जरूरत मानना पड़ेगा। आज सेक्स शब्द को एक गंदी गाली की तरह जो लोग सोचते हैं, वे हकीकत के सामने खड़े होकर आंखें बंद किए हुए हकीकत को नामौजूद मानते हुए लोग हैं। दूसरी बात भारतीय समाज में लड़के-लड़कियों, औरत-मर्दों के मिलने-जुलने की एक बेहतर जरूरत की है। जब लोग साथ रहते हैं, तो हिंसा की ऐसी वारदातें कम होती हैं। तीसरी बात जो कि ऐसे जुर्म हो जाने के बाद की है, इनमें मुजरिमों को कड़ी से कड़ी सजा, तेज रफ्तार से मिलनी चाहिए, ताकि एक मिसाल की तरह वह कुछ और लोगों के दिल-दिमाग से जुर्म को निकाल सके। 
एक बड़े शहर की बड़ी चर्चित वारदात के बहाने इस मुद्दे पर हर कुछ महीनों में लिखना होता है, लेकिन समाज में ऐसी चर्चाएं पुलिस और अदालत से परे नहीं निकल पातीं। हिंसा हो जाने के बाद तो सिर्फ सजा बची रहती है। हिंसा के पहले उसे रोकने के लिए कानून से परे एक सामाजिक समझ और माहौल की जरूरत है और यह चर्चा खासी तकलीफदेह होने से, शुरू ही नहीं हो पाती। जो लोग बलात्कार रोकने का जिम्मा पुलिस पर डालते हैं, वे खुद जिम्मेदारी से बचकर एक आसान से लगते निशाने पर हमला करते हैं। अगर बलात्कारी वर्दीधारी नहीं है, तो फिर वह पुलिस के दायरे के बाहर का बाकी समाज का हिस्सा है, और उसे बलात्कार से रोकने के लिए पुलिस को नहीं समाज को काम करने की जरूरत है।

तुर्की में लोकप्रियता से कांग्रेस भारत में चुनाव कैसे जीतेगी?

संपादकीय
22 अगस्त 2013
कांग्रेस पार्टी की तरफ से कल ही यह खबर आई है कि वह आने वाले चुनाव प्रचार के लिए इंटरनेट पर ट्विटर या फेसबुक जैसे सोशल मीडिया का अधिक से अधिक इस्तेमाल करेगी। और अब यह खबर आई है कि किस तरह उसके नेता एक के बाद एक पकड़ा रहे हैं, अपने इंटरनेट पेज दूसरे देशों में थोक में लोकप्रिय बनवाते हुए। जो लोग कम्प्यूटर और इंटरनेट तकनीक को जानते हैं, वे यह भी समझते हैं कि किस तरह ऐसी लोकप्रियता खरीदी जा सकती है, और यह भी समझते हैं कि खरीदी गई लोकप्रियता किस तरह पकड़ में आ सकती है। कई हफ्ते हुए जब राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के फेसबुक पेज पर दो-चार दिनों में ही बढ़ गए लाखों प्रशंसक तुर्की के निकले थे, और अब राजधानी दिल्ली में बैठे कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता अजय माकन की लोकप्रियता इसी तरह भारत से अधिक तुर्की में मिली है। 
सार्वजनिक जीवन में जो लोग हैं उनको जालसाजी करने के पहले कई बार यह सोच लेना चाहिए कि उसके पकड़ में आने के बाद न सिर्फ उनका बल्कि उनकी पार्टी का कितना नुकसान होता है, साख कितनी गिरती है, और थोड़ी-बहुत जो कुछ भी असली लोकप्रियता रहती है, उसकी साख भी चौपट हो जाती है। आज धोखाधड़ी और जालसाजी से काम करने का वक्त निकल गया है, क्योंकि छोटे-छोटे बच्चे भी इंटरनेट के जानकार हो गए हैं और बहुत आसानी से यह जानकारी निकल आती है कि किस नेता या पेज के प्रशंसक किस-किस देश में कितने-कितने फीसदी हैं, और वे कब-कब बने हैं। दरअसल इंटरनेट पर ऐसी लोकप्रियता को जुटाकर देने वाली कंपनियां टके सेर मौजूद हैं, और वे आपको लाखों-करोड़ों पसंद दिलवा देती हैं। बाजार का कारोबार ऐसी कई तरह की जालसाजी पर टिका रहता है, और फिल्मी सितारों से लेकर, कुछ कंपनियों के सामानों तक की लोकप्रियता इसी तरह जुटाई जाती है। 
यह एक अच्छी बात है कि कांग्रेस की नींद खुल रही है, और वह सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर जाकर उनका मुफ्त का इस्तेमाल करने की सोच रही है। लेकिन अगर वह भुगतान करके जालसाजी से लोकप्रियता जुटाती है, तो इससे उसे नफे के बजाय नुकसान ही होगा। वैसे कांग्रेस को अपनी इंटरनेट रणनीति तय करने के लिए सोचने-विचारने का सामान गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की इंटरनेट वेबसाइटों पर मिल जाएगा, जो एक राज्य में रहते हुए देश के किसी भी पार्टी के किसी भी नेता के मुकाबले इस आधुनिक तकनीक  का बेहतर और असरदार इस्तेमाल करते आ रहे हैं। और अब वे प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए, अपनी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए देश की कई भाषाओं में लोगों तक पहुंच रहे हैं। जब तक प्रधानमंत्री कार्यालय का ताला नहीं खुलता है, तब तक मोदी सुबह जल्दी काम शुरू करके इंटरनेट पर छा चुके होते हैं। अपने दुश्मन की जाहिर तरकीबों से भी अगर कोई सबक न ले, तो यह उसके लिए खासे नुकसान की बात होती है। तुर्की में खरीदकर जुटाई गई लोकप्रियता से कांग्रेस भारत में चुनाव कैसे जीतेगी?

बात की बात

19 august 2013

20 august 2013

21 august 2013

शहीद नरेन्द्र दाभोलकर

संपादकीय
21 अगस्त 2013
महाराष्ट्र के पुणे में कल सुबह-सुबह शहर के बीच प्रदेश के सबसे बड़े अंधविश्वास-विरोधी-आंदोलनकारी नरेन्द्र दाभोलकर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वे लंबे समय से धार्मिक आडंबरों और अंधविश्वासों के खिलाफ एक बहुत आक्रामक जनआंदोलन चला रहे थे, और तंत्र-मंत्र के नाम पर ठगने वाले लोगों से लेकर, धार्मिक कट्टरपंथियों और पाखंडियों तक के खिलाफ वे लगे हुए थे। शायद उन्हीं की कोशिशों का नतीजा था कि महाराष्ट्र में अंधविश्वास के खिलाफ एक कानून बनने की राह पर था, विधेयक विधानसभा में आठ बरस पहले पास हो चुका था, और विधान परिषद उस पर बैठी हुई थी, है। ऐसे कानून के आने से पाखंडियों के पेट पर लात पड़ती, और जनता धोखा खाने से बचती। इस कानून को बनाने की कोशिशों में नरेन्द्र दाभोलकर का बड़ा योगदान था, और वे एक वैज्ञानिक नजरिए वाले तर्कवादी  के रूप में धर्म के ढोंग वाले हिस्से के खिलाफ खुलकर लिखते-बोलते थे, और आंदोलन छेड़ते थे। उन्होंने बहुत से पाखंडी गुरूओं का भांडाफोड़ करने का काम किया था, इसलिए उनकी हत्या के पीछे कई लोग हो सकते हैं। कुछ संगठन लगातार उन्हें धमकियां देते थे, और महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का यह बयान मायने रखता है कि जिन लोगों ने गांधी की हत्या की थी, उन्हीं लोगों ने इस समाज सुधारक की हत्या भी की है। यह बयान याद दिलाता है कि नाथूराम गोडसे ने पुणे का ही रहने वाला था, जहां पर नरेन्द्र दाभोलकर के खिलाफ कट्टरपंथी धर्मान्धता लगी हुई थी। 
इस मौत को सिर्फ एक कत्ल मान लेना, गैरजिम्मेदारी और नासमझी होगी। आज हिन्दुस्तान में तर्क की, न्याय की, लोकतंत्र की, वैज्ञानिक बातें करने वालों को नास्तिक और धर्म विरोधी मान लिया जाता है। राजनीति और बाजार की ताकतों को धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता, कट्टरपंथ और अंधविश्वास पसंद आता है क्योंकि इससे उनको लूटने के लिए भीड़ एक साथ मिल जाती है। फिर ऐसी भीड़ से वोट लूटना हो, या कि नोट लूटना हो। अब तो इस बात को लंबा समय हो गया है कि इस देश में ऐसे समाज सुधारक आए हों जिन्होंने सतीप्रथा को खत्म करवाया, बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता पैदा की, छुआछूत को खत्म करने की कोशिश की, विधवा विवाह शुरू करवाने का काम किया, और दलितों को समाज का हिस्सा स्थापित करने की कोशिश की। ऐसी कोशिशों की एक सदी पूरी हो जाने के बाद आज अगर देखें तो आज देश में इतने खुलकर काम करने वाले, इतना व्यापक असर रखने वाले समाज सुधारक नहीं दिखते। आज राजनीतिक ताकतें वोटरों को पालतू जानवरों के रेवड़ों की तरह एक साथ इक_ा करके उनके दिमागों को एक अहाते में कैद रखने को अपने फायदे का पाती हैं। इस वजह से कांग्रेस के विदेश के पढ़े हुए खरबपति और नौजवान सांसद नवीन जिंदल तक खाप पंचायतों की हिंसा का साथ देते हैं, और नेहरू-गांधी की कांग्रेस पार्टी आज सोनिया-राहुल की पीढ़ी में उसको अनदेखा करती है। यही हाल बहुत सी दूसरी पार्टियों का है जो कि कट्टरपंथ को बढ़ावा देकर देश में वैज्ञानिक सोच का कफन-दफन करने में लगी रहती हैं। कोई अगर यह सोचता है कि हिन्दुस्तान में शिक्षा बढऩे के साथ-साथ लोगों में वैज्ञानिक सोच भी बढ़ा हो, तो यह गलत अंदाज होगा। यह याद रखना चाहिए कि प्रवीण तोगडिय़ा मेडिकल डॉक्टर है, और मुरली मनोहर जोशी साइंस के प्रोफेसर रहे हैं। और इन दोनों का बाबरी मस्जिद गिराने में बराबरी का पसीना बहा है। इसलिए शिक्षा ने और शहरीकरण ने कुछ लोगों के बीच जरूर अंधविश्वास कम किया है, लेकिन इसका सीधा-सीधा रिश्ता उनकी पढ़ाई से न होकर, उनके आसपास के माहौल से मिली सोच का रहा होगा, ऐसा हमारा अंदाज है। 
पुणे की इस हत्या के पीछे देश के वे सारे बाबा-माफिया हो सकते हैं जिनके टीवी के पर्दों पर बिखरे हुए जाल में फंसते लोगों के बीच तर्कपूर्ण-भांडाफोड़ से जालसाजी का धंधा मंदा होता हो। इस देश का कानून टीवी पर कुछ सेकेंड के इश्तहार बढ़ाने या घटाने पर तो बहस कर रहा है, लेकिन इसी टीवी पर घंटे-घंटे बाबासाजी नाम की जालसाजी चलती है, तो उसके खिलाफ देश में कोई कानून नहीं दिखता। भारत की राजनीति में ऐसे नेता और पार्टियां कम ही हैं जो कि धर्म और बाबाओं के पाखंड को लात मारने की हिम्मत रखते हों। ऐसे में पाखंड के भांडाफोड़ में लगे हुए एक हौसलामंद नरेन्द्र दाभोलकर का कत्ल पाखंड के कारोबार को बड़ा सस्ता पड़ा होगा। उनके कातिलों के लिए दस लाख रूपए का ईनाम रखना महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार का काफी काम नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये ही पार्टियां, दूसरी पार्टियों की टक्कर में देश भर में अंधविश्वास फैलाने में लगी हुई हैं, धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता फैलाने में लगी हुई हैं, कट्टरपंथ फैलाने में लगी हुई हैं। इन सबके बीच अहातों की कोई चारदीवारियां नहीं हैं और इस किस्म की तमाम किस्म की सोच एक-दूसरे को बढ़ावा देने का काम करती हैं। कोई शाहबानो नाम की एक जिंदा इमारत को गिराते हैं, तो कोई बाबरी मस्जिद को, कोई गांधी को, तो कोई दाभोलकर को। इंसाफ के खिलाफ हिंसा का हमला नया नहीं है, और हिन्दुस्तान का कानून कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वालों पर काबू पाने की ताकत भी नहीं रखता। आज हम यहां पर नरेन्द्र दाभोलकर को सलाम करते हैं कि अक्ल के खिलाफ बागी माहौल वाले इस देश में उन्होंने हौसले के साथ जिंदगी भर लड़ाई लड़ी, और शहीद हुए। 

भ्रष्टाचार ने साम्प्रदायिकता के दाग-धब्बे धो डाले हैं...

संपादकीय
20 अगस्त 2013
हिन्दुस्तान में एक अजीब सी गमी छाई हुई है। और यह काला बादल दिल्ली से उठकर पूरे देश में छाया है। एक के बाद एक घोटाला, कहीं सुबूत गायब, तो कहीं फाईलें, कहीं यूपीए सरकार बदनीयत से वकील बदलती है तो कहीं जांच अफसर। नरेन्द्र मोदी की तरह खून के धब्बों से घिरा हुआ नेता आज अदालतों के बाहर उन धब्बों के मुकाबले यूपीए सरकार के नोट-पानी के धब्बे गिनाते घूम रहा है, और यूपीए की मुखिया कांग्रेस पार्टी मोदी के खिलाफ सिर्फ कुतर्क और नारों को हथियार बनाकर चल रहे हैं। 
इस माहौल में आज यह लगता है कि गुजरात दंगों की लाशों से घिरे हुए मोदी के खिलाफ देश में जो माहौल होना चाहिए था, उसे भी लोग भूल गए हैं, क्योंकि उन्हें यूपीए सरकार और कांग्रेस के रोजाना के घोटाले बुरी तरह याद हैं। मोदी की शोहरत को लेकर कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि भारत के लोगों के बीच इतनी आक्रामक साम्प्रदायिकता किस तरह जगह पा रही है। लेकिन आम लोगों की नजरों में जब उनके हकों की खुली लूटमार हो, तो फिर उनको साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार के बीच के मुकाबले में रास्ता भूलने लगता है। आम लोगों का राजनीतिक शिक्षण इतना मजबूत नहीं रहता कि वे इन दो बुराइयों में से कम और अधिक वजन तय कर पाएं। और इन दोनों का आपस में कोई मुकाबला भी नहीं किया जा सकता। इसलिए आज मोदी का हाल अपने दंगों के दागों को लेकर भी एक साबुन के इश्तहार की तरह है जिसमें नारा है- दाग अच्छे हैं...। 
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक-एक करके बहुत सी पार्टियों को देश के लोगों ने देख लिया। अपने धर्मनिरपेक्षता के नारे को अपने भ्रष्टाचार को न्यायसंगत और तर्कसंगत साबित करने वाली कांग्रेस को भी देख लिया, समाजवादी पार्टी की कुनबापरस्ती, गुंडागर्दी, सामंतवाद, और उसके भ्रष्टाचार को भी देख लिया, लालू का चारा भी देख लिया, मायावती की हाथी-काठी प्रतिमाएं भी देख लीं, और ममता बैनर्जी की तानाशाही भी देख ली। ऐसे में कोई बेदाग सा दिखता है, तो वह वामपंथी खेमा है, जो भ्रष्टाचार से भी लड़ते आया है, और साम्प्रदायिकता से भी। इस तरह आज इस देश में साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनता के बीच जो जागरूकता होनी चाहिए थी, और जो माहौल होना चाहिए था, वह अगर गायब है तो भ्रष्ट-धर्मनिरपेक्ष लोगों की वजह से गायब है। मेरे मुंह का कौर छीनकर, अपने महल खड़े करने वाले लोग अगर अपने को धर्मनिरपेक्ष कहेंगे, तो उस पर मुझे भरोसा क्यों हो? और धर्मनिरपेक्षता की वजह से देश को लूटने का लाइसेंस क्यों मिले, ऐसे सवाल जनता के मन में हैं। आज जब कांग्रेसी नेताओं के कोयला-भ्रष्टाचार की फाइलें सरकारी दफ्तरों से गायब मिल रही हैं, तो ये फाइलें गायब नहीं हैं, यह ईमानदारी गायब है, नैतिकता गायब है, और शर्म गायब है। 
सिर्फ यूपीए और कांग्रेस मुजरिम नहीं हैं। अलग-अलग प्रदेशों में भाजपा के भी ढेरों भ्रष्टाचार हैं, और कर्नाटक में तो उसकी सरकार ने एक किस्म से एक राष्ट्रीय कीर्तिमान ही स्थापित किया है। इसलिए जब देश में अकेले ईमानदार रह गए वामपंथियों की मौजूदगी सिमटकर जरा सी रह गई है, तो देश में जनता की उम्मीद भी खत्म हो गई है। भूखी जनता के खाली पेट के ऊपर के दिल और दिमाग धर्मनिरपेक्षता जैसे भारी-भरकम शब्द की परिभाषा नहीं सोच पाते। इसलिए अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली ताकतों ने अपने भ्रष्टाचार से देश का एक बहुत बड़ा नुकसान किया है, उन्होंने साम्प्रदायिकता के दाग-धब्बे धो डाले हैं। देश के मतदाताओं के सामने यह एक इतनी बुरी पसंद की नौबत है, कि इसके बीच से वे कैसे एक बेहतर सरकार चुनेंगे इसकी कल्पना करना भी हमारे लिए आज मुश्किल है। 

रेल हादसे से सबक लें

संपादकीय
19 अगस्त 2013
बिहार में हुए रेल हादसे में जिस तरह दर्जनों तीर्थयात्री खत्म हुए हैं वह बात  बहुत ही तकलीफदेह है। ऐसी दुर्घटना बिना किसी त्यौहार या तीर्थ के भी हो सकती थी, और तब भी वह ऐसी ही तकलीफदेह रहती, लेकिन आज धर्मालुओं का एक जत्था होने की वजह से इससे जुड़े कुछ पहलुओं पर सोचने की, और सबक लेने की जरूरत है। रेल की पटरियों पर कांवरियों की भीड़ थी, और वे एक रेलगाड़ी के नीचे आ गए। एक दूसरी तकलीफदेह बात यह भी रही कि जिस ट्रेन से यह हादसा हुआ उसके ड्राइवर को बहुत बुरी तरह मारा गया, और ट्रेन में आग लगा दी गई। 
भारत आस्थावानों का देश है। और धार्मिक कैलेंडर के हिसाब से सभी धर्मों के कार्यक्रम होते हैं, और महूरत देखकर शादियां होती हैं। ऐसे में स्टेशनों पर इक_ा लाखों की भीड़ में भगदड़ में लोग मारे जाते हैं, सड़क पर गाडिय़ों पर ऊपर तक लदकर चलते तीर्थयात्री या बाराती कहीं बिजली के तारों से जल जाते हैं, तो कहीं गाडिय़ां पलटने से मारे जाते हैं। यह सिलसिला दो बातों को बताता है, एक तो यह कि लोगों के मन में अपनी खुद की जिंदगी के लिए एक लापरवाही है, और जिंदा रहने के लिए जो सबसे अधिक चौकन्नापन खुद में होना चाहिए, वह नहीं है, कम से कम अधिकतर आबादी में नहीं है। दूसरी बात यह कि जैसे ही हिन्दुस्तानी एक भीड़ की शक्ल में इक_ा हो जाते हैं, उनके मन में नियमों के लिए, सार्वजनिक जीवन के इंतजाम के लिए एक बहुत ऊंचे दर्जे की हिकारत पैदा हो जाती है। यह हिकारत ऐसी बारातों में भी दिखती है जो कि सड़कों पर गोलियां चलाकर जान ले लेती हैं, ट्रेनों में मारपीट करती हैं, और राह पर चलते हुए पूरे ट्रैफिक को रोकना अपना हक मानती हैं। और खबर भी तब बनती है जब एक साथ कई मौतें हो चुकी रहती हैं, मौतों के पहले जिंदगी को जितना तबाह हिन्दुस्तानी भीड़ करती हैं, उनकी कोई खबर नहीं बनती। 
तीर्थयात्री सावधान रहें, तो उससे उनकी आस्था या भक्ति पर कोई आंच नहीं आती। बल्कि धर्म और ईश्वर की जितनी तरह की धारणा प्रचलित है, उनमें परोपकार करना, दूसरों का भला करना एक बड़ी धारणा है। ऐसे में धार्मिक कार्यक्रमों में सार्वजनिक सुविधाओं को तोडऩा एक सही बात नहीं है। और खुद की लापरवाही से अगर लोगों की जान जाती है, तो उसके लिए किसी ट्रेन के ड्राइवर को मारना, ट्रेन में आग लगाना, यह एक धर्मान्धता है, जिसके तहत लोग अपने धार्मिक मौकों पर अपने हक दूसरे लोगों के हकों से अधिक मान लेते हैं। धर्म का ऐसा आक्रामक तेवर भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसी के चलते जगह-जगह दो धर्मों के लोगों के बीच, या एक धर्म के दो सम्प्रदायों के लोगों के बीच टकराव होता है, और उसे काबू करने में देश की वही पुलिस लगती है, जो जेलों में बंद बेकसूर विचाराधीन कैदियों को अदालत तक नहीं ले जा पाती, क्योंकि उसके पास कर्मचारी कम हैं। इसलिए देश के हर नागरिक की, देश के हर तबके की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने को ऐसे हादसों से बचाएं, ऐसे हादसों की नौबत न आने दें, और किसी भी नौबत में कानून अपने हाथ में न लें। 
दूसरी तरफ यह राज्य सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि ऐसे जाने-पहचाने भीड़ भरे मौकों पर, और जगहों पर ऐसा इंतजाम रखें कि जिससे ऐसे हादसों के खतरे खड़े न हों। हमारा यह भी मानना है कि एक राज्य के ऐसे हादसे के बाद दूसरे राज्यों में भी शासन-प्रशासन सावधानी बरत सकते हैं और अपने राज्य के खतरों का अंदाज लगा सकते हैं। 

फर्जी रंग दे बसंती...

संपादकीय
18 अगस्त 2013
इंटरनेट पर आज अन्ना हजारे की तस्वीरों के साथ बिकिनी पहनी हुई कुछ लड़कियों की तस्वीरों को पाया गया कि ये न्यूयॉर्क में होने वाले भारत के सालाना स्वतंत्रता परेड की तस्वीरें हैं। इनमें लड़कियां तीन रंगों की बिकिनी पहनी हुई हैं, और यह भी लिखा गया कि ये इस परेड के रंग दे बसंती चोला नाम के कार्यक्रम की हैं। यह बात सही है कि अन्ना हजारे इस परेड के लिए अमरीका गए हुए हैं। लेकिन जब इस परेड की तस्वीरें ढूंढी गईं, तो इंटरनेट पर सिर्फ पिछले बरस तक की तस्वीरें थीं। जब अन्ना के साथ की इस तस्वीर को अमरीका भेजकर हमने पता लगाया, तो वहां पता लगा कि वह परेड अभी हुई ही नहीं है, और वह कल होने वाली है। 
यह अकेली ऐसी फर्जी गढ़ी हुई तस्वीर नहीं है जो कि किसी बदनीयत से बनाई और फैलाई जाती है। अभी कश्मीर में जब साम्प्रदायिक तनाव हुआ तो देश-विदेश की बहुत सी पुरानी हिंसक घटनाओं की तस्वीरों को निकालकर, जोड़-तोड़कर, गढ़कर, भड़काने वाली झूठी बातों के साथ जोड़कर इंटरनेट पर फैला दिया गया, और जो लोग साम्प्रदायिकता, जातिवाद, हिंसक राष्ट्रवाद, नफरत फैलाने के लिए ऑनलाईन ओवरटाईम करते हैं, वे बात की बात में फेसबुक और ट्विटर जैसी वेबसाइटों पर जुट गए। इसी तरह की तस्वीरें गांधी को लेकर गढ़ी जाती हैं, नेहरू को लेकर गढ़ी जाती हैं, और बहुत से दूसरे लोगों के खिलाफ कम्प्यूटर तकनीक का इस्तेमाल करके उन पर झूठ का कीचड़ उछाला जाता है। बहुत से लोग इस बात से अनजान भी रहते हैं कि किसी देश में किसी पार्टी में गांधी के हुलिए में कोई व्यक्ति वहां की किसी महिला के साथ नाच रहा था। उसे गांधी को घटिया साबित करने के लिए आज इस्तेमाल किया जाता है। 
जैसे-जैसे कम्प्यूटर और इंटरनेट पर झूठ बनाना और झूठ फैलाना आसान होते जा रहा है, वैसे-वैसे भले लोगों को ऐसे बुरे झूठ की तरफ से चौकस रहने की भी जरूरत है। कम्प्यूटर-इंटरनेट की यही तकनीक झूठ को पकडऩे में भी मदद करती है, और कुछ मिनटों के भीतर ऐसी भड़काने वाली, हिंसा फैलाने वाली बातों का दूध-पानी अलग-अलग किया जा सकता है। लेकिन सनसनी को आगे बढ़ाने में जो मजा आता है, वह शायद सनसनी को खत्म करने में नहीं आता। इसलिए बहुत से लोग बिना जांचे हुए, या जांचने की नीयत भी दबाकर रखने के बाद झूठ को फैलाने में लग जाते हैं। और चूंकि बेवकूफों की आबादी दुनिया में अधिक है, इसलिए लोग उसको  मानने भी  लग जाते हैं, क्योंकि झूठ को परखने में थोड़ी सी मेहनत लगती है, और झूठ को सच मान लेने में मजा आता है। लेकिन लोगों को यह याद रखना चाहिए कि आज अगर झूठ गढऩे और फैलाने से किसी और की चरित्र हत्या हो रही है, तो कल वही स्वभाव आपकी चरित्र हत्या भी कर सकता है। दूसरी बात यह कि जो लोग झूठ फैलाने में मददगार होते हैं, उन लोगों को लोग धीरे-धीरे पहचान भी लेते हैं, और उसके बाद उनके फैलाए सच पर भी समझदार लोग भरोसा करना छोड़ देते हैं। लेकिन नसीहत की इन बातों से परे आज यह भी याद रखने की जरूरत है कि भारत में सूचना तकनीक का कानून किसी भी दूसरे कानून के मुकाबले बहुत अधिक कड़ा है, और अलोकतांत्रिक है। झूठ फैलाने वाले बदनीयत हों, या अनजान हों, उनके खिलाफ इतनी कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सकती है कि उनके आसपास के लोग जिंदगी भर झूठ फैलाना भूल जाएं। आज हम यहां पर इस साधारण से लगते मुद्दे पर इसलिए लिख रहे हैं कि इंसान का सनसनीखेज मिजाज, आसान तकनीक, और कड़ा कानून मिलकर लोगों की जिंदगी में एक बड़ा खतरा खड़ा कर चुके हैं। और ऐसे में हर किसी को कोई एसएमएस, कोई तस्वीर, कोई वीडियो, कोई जानकारी आगे बढ़ाने के पहले उसके सच को तौल लेना चाहिए, और यह भी देख लेना चाहिए कि उससे कोई कानून तो नहीं टूट रहा है। देश में इक्का-दुक्का मामले ही ऐसे हो सकते हैं जिनमें गिरफ्तारी के खिलाफ आंदोलन खड़े हों, आज अगर किसी गैरचर्चित इंसान के हाथों सोच-समझकर या अनजाने में कोई आईटी-जुर्म होता है, तो उस पर बहुत लंबा भुगतना पड़ सकता है।

जगजीवनराम-मीरा कुमार के घर दलितों की बदहाली

संपादकीय
17 अगस्त 2013
बिहार का सासाराम, जहां से हिन्दुस्तान के सबसे बड़े दलित नेताओं में से एक बाबू जगजीवनराम आते थे, और अब जहां से उनकी बेटी मीरा कुमार चुनकर आई हैं, और लोकसभा की अध्यक्ष हैं, वहां पर दलितों का हाल आजादी की सालगिरह पर देखने लायक है। वहां दलितों ने अपने गुरू रैदास के सामने तिरंगा झंडा फहराना तय किया, जिसके खिलाफ गांव के सवर्ण ठाकुरों ने पहले से धमकी देकर रखी थी। झंडा फहराया जाने लगा तो दबंग सवर्णों ने हमला किया, और तीन दलितों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। एक खबर में कहा गया है कि एक दलित को पत्थरों से मार डाला गया। दलित बस्ती के मकानों को जलाया गया और गुरू रैदास के मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया। एक खबर में यह है कि एक गर्भवती दलित महिला को मारा गया, जिससे उसका गर्भपात हो गया। 
इससे अधिक जानकारियों से आज के मुद्दे का अधिक लेना-देना नहीं है, क्योंकि इतनी जानकारियां हिन्दुस्तान में दलितों का हाल बताने के लिए काफी हैं। जिस बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने समाजवादी इतिहास, और एक पूरे कार्यकाल के बाद भी दलितों को हिफाजत नहीं दे पा रहे, और जिस वक्त वे बिहार में ही आजादी का झंडा एक महादलित बस्ती में फहरा रहे थे, उस वक्त इस गांव में दलितों को इस तरह मारा जा रहा था। जिस सासाराम से जगजीवनराम पूरी जिंदगी नेतागिरी करते रहे, और दलित समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में से एक रहे, जिनकी बेटी को इस नेतागिरी की विरासत मिली और आज वह हिन्दुस्तान के दर्जन भर सबसे ताकतवर संवैधानिक नेताओं में से एक है, उसके दलित इलाके में आजादी की सत्तर के करीब पहुंचती सालगिरह पर दलितों के लहू से रंग कर सिर्फ सवर्ण आजादी के झंडे फहराए गए। 
जिन लोगों को इस देश में आरक्षण खटकता है, उनको ऐसे मामलों को देखना चाहिए। दलित प्रताडऩा, आदिवासी प्रताडऩा रोज की बात है, गांव-गांव, कस्बे-कस्बे की बात है। लेकिन जिस तरह एक बहू की मौत के बाद भी दहेज प्रताडऩा की खबर बनती है, उसी तरह दलित प्रताडऩा, आदिवासी प्रताडऩा की खबरें बलात्कार और मौतों के बाद ही बनती हैं। ये तबके आजाद भारत की पौन सदी पूरी होने पर भी इस सामाजिक ज्यादती से उबर पाएंगे, ऐसे कोई आसार नहीं हैं। देश के बहुत से हिस्सों में देश के कड़े कानूनों के बावजूद दलित ही सबसे अधिक नफरत झेलते हैं, इसकी वजह यह है कि देश के पैसे वाले तबके में, दूसरी किस्म के ताकत वाले तबकों में गैरदलितों का, सवर्णों का ही बोलबाला है। यह खबर बिहार के उस गांव से निकलकर देश में ठीक तरह से अगर नहीं फैल पाई, तो इसकी एक वजह यह है कि हिन्दुस्तानी मीडिया में मालिकान से लेकर अखबारनवीसों तक में गैरदलितों, गैरआदिवासियों, गैरअल्पसंख्यकों, गैरगरीबों का ही बोलबाला है। दलित मुद्दों को समझने के लिए जिस सामाजिक समझ की जरूरत होती है, उस तकलीफदेह दौर से मीडिया के लोगों की देह कभी गुजरी ही नहीं होती। इसके साथ-साथ तकलीफ की एक दूसरी बात यह है कि आरक्षित तबकों के जो लोग ताकत की जगहों पर पहुंच जाते हैं, वे अपने जन्म के तबकों की फिक्र धीरे-धीरे खो भी बैठते हैं। यह कुछ उसी तरह की बात है कि सोनिया गांधी से लेकर सुषमा स्वराज तक महिला नेता, अब महिला आरक्षण का नाम भी लेते नहीं दिखतीं। 
इस लोकतंत्र में अगर आदिवासियों के हकों के लिए नक्सलियों को बंदूकें उठानी पड़ती हैं, इस लोकतंत्र में अगर दलित लेखक उपन्यास भी लिखते हुए मां-बहन की गालियों का इस्तेमाल करते हैं, तो यह भारत के मनुवादी समाज के सवर्ण हिस्से की हिंसा के जवाब में है। धर्म की हिंसा, जाति की हिंसा, सामाजिक-आर्थिक असमानता की हिंसा, इन सबका कोई अंत नहीं है, और इन किस्मों की हिंसा के जवाब में जब दबे-कुचले तबकों के हाथ हथियार आते हैं, तो इलाके के इलाके नक्सली हिंसा के हवाले हो जाते हैं। आज यह देश दलित-हिंसा से इसलिए बचा हुआ है कि दलित जंगलों में नहीं बसते, वे गांव-कस्बों और शहरों में बसते हैं, और वहां की खुली जगह गुरिल्ला लड़ाई के लिए माकूल नहीं रहती। लेकिन देश के इतने बड़े दलित तबके के जख्म जब हजारों बरस से चले आ रहे हैं, और लगातार ताजा किए जाते हैं, उन पर नमक छिड़का जाता है, तो फिर हिन्दुस्तान जैसे समाज को अंबेडकर जैसे होनहार की समझ का कोई फायदा भी नहीं मिल सकता। अपने ही देश के एक बड़े हिस्से को कुचलकर जो समाज गौरव हासिल करता है, वह समाज लोकतंत्र नहीं है। आज सारे कानून के बावजूद दलितों की जो प्रताडऩा हो रही है वह सत्ता हांक रही पार्टियों और नेताओं के चेहरे पर कालिख है। 

लालकिले से निराशा

संपादकीय
16 अगस्त 2013
स्वतंत्रता दिवस पर भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण के पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के देश के सबसे बड़े दावेदार नरेन्द्र मोदी ने आने वाले भाषण खिल्ली उड़ाई, उसे लेकर कांग्रेस से परे भी बहुत से लोग खफा हुए कि आजादी की सालगिरह का यह एक दिन प्रधानमंत्री को सुनने का होना चाहिए, न कि राजनीतिक कटुता के तहत छीछालेदर करने का। मोदी का बयान और उस पर प्रतिक्रियाएं स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण के पहले ही इंटरनेट पर छा चुके थे। लेकिन जब भाषण आया तो उसके बाद लगा कि मोदी ने गलत क्या कहा था? 
दस बरस पूरे करने के बाद हिन्दुस्तान का प्रधानमंत्री लालकिले से अपने इस कार्यकाल का आखिरी भाषण देते हुए भी अगर लोगों की न तो दिलचस्पी जगा पा रहा, और न ही कोई हौसला बढ़ा पा रहा, तो यह किसी सरकारी बाबू का लिखा हुआ भाषण था, दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का सालाना-ऐतिहासिक मौके का भाषण नहीं। हैरानी इस बात की भी है कि भाषण का यह मौका तो पिछले साल भर से तय था, और यह भी तय था कि इसके कुछ महीनों के बाद ही देश के कई प्रदेशों में चुनाव होने हैं, और उसके कुछ महीनों के बाद पूरे देश में लोकसभा के चुनाव होने हैं। इसके बावजूद अगर एक दमदार, छू लेने वाला, हौसला बढ़ाने वाला भाषण तैयार नहीं किया जा सकता, तो इसे हम यूपीए सरकार की खासी बड़ी नाकामयाबी मानते हैं। मनमोहन सिंह के भाषण को कई बार पढ़ लेने के बाद भी उसे लेकर इससे अधिक नर्म और कोई बात लिखने की गुंजाइश नहीं दिखती। 
आज देश का राजनीतिक और आने वाला चुनावी माहौल बड़ी अटपटी नौबत में फंसा हुआ है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी के पास बाजीगर और मदारी के अंदाज में कहने को बहुत सी चटपटी बातें हैं। और वे एक पल भी मुद्दों को भुनाने में देर नहीं करते। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के तीन चेहरे उसके पोस्टरों पर हैं। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, और राहुल गांधी। इन तीनों से ही देश के लोगों को, वोटरों को जलते और सुलगते हुए मुद्दों पर कभी वक्त पर कुछ सुनने नहीं मिलता। जब ये बोलते भी हैं, तो उसमें सुनने लायक कुछ नहीं रहता, या कम से कम असरदार तो कुछ रहता ही नहीं। ऐसे में मतदाताओं के मन में चाहे जो हो, देश की हवा की लहरों पर मोदी सवारी किए जा रहे हैं, अपनी ही पार्टी के बहुत से दिग्गज नेताओं की मर्जी के खिलाफ सवारी किए जा रहे हैं, और एक अखबार ने आज सुबह मोदी को लेकर यह सुर्खी लगाई कि स्वतंत्रता दिवस पर मोदी ने अपना झंडा फहराया। ऐसे हाल में कांग्रेस के तीनों बड़े चेहरे अपनी बात को लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकारी या कांग्रेसी जुबानों के मोहताज हैं, दूसरी तरफ मोदी हैं, कि उन्होंने पूरी की पूरी भाजपा को हाशिए पर धकेल कर पन्ने के बीच अकेले कब्जा कर लिया है। ऐसे में देश के लोगों के सामने किसी वैचारिक बहस, सवाल-जवाब, को पाने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। 
यह जरूर है कि भारत के संसदीय चुनाव अमरीका के राष्ट्रपति प्रणाली के तहत होने वाले ऐसे चुनाव नहीं है जिनमें कि दोनों बड़ी पार्टियों के उम्मीदवार आमने-सामने अपने पूरे व्यक्तित्व को लेकर चुनाव लड़ते हैं। लेकिन आज हिन्दुस्तान अपने भीतर, और अपनी सरहदों के बाहर भी जितने किस्म के मुद्दों से घिरा हुआ है, लदा हुआ है, उस नौबत को देखते हुए ऐसा लगता है कि यूपीए और कांग्रेस पार्टी के इन तीन सबसे बड़े नेताओं में से कम से कम कोई एक तो सरकार या गठबंधन, या संगठन, की सोच को रोजाना ही सामने रखे। लोकतंत्र में देश को चलाने वाले बड़े नेता प्रवक्ताओं और बड़बोले नेताओं के मार्फत देश से बात करें, यह बात बिल्कुल भी गवारा नहीं की जा सकती। हर दिन यूपीए और कांग्रेस एक मौके को खो रहे हैं, और एक के बाद दूसरे चुनावी सर्वे में मोदी के जादू की धारणा के गलत साबित होने के बावजूद, अपनी बात सामने ही नहीं रख पा रहे हैं। 
लालकिले से एक नीरस, बेजान, और आधा-अधूरा सा भाषण सुनकर जो निराशा हुई है, वह शायद आने वाले महीनों में दूर होते नहीं दिखती। यह कांग्रेस और यूपीए का खासा बड़ा नुकसान है कि उसके पास अपनी बात को दम-खम से रखने वाले ऐसे लोग ही नहीं हैं, जो उसके भावी प्रधानमंत्री हो सकते हैं। 

आजादी पाने की सालगिरह नहीं, यह महज अंगे्रजों की गुलामी खत्म होने की सालगिरह

14 अगस्त 2013
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार

आजादी की एक और सालगिरह आ गई है। लाल किले से एक और भाषण, जगह-जगह झंडे, और दिन भर लाउडस्पीकर पर देशभक्ति के गाने। सरकारी कामकाज, कारखानों, और बाजार में छुट्टी, स्कूल-कॉलेज बंद। इतने में आजादी की सालगिरह पूरी हो जाती है, और आजादी की वजह से लोकतंत्र की ताकत की कुर्सियों पर काबिज लोगों की जिम्मेदारी भी पूरी हो जाती है। इस दिन की शान बनाए रखने के लिए देश भर में शराब की दुकानें बंद रहेंगी। यह इस देश का एक अजीब सा पाखंड है कि दारू को बंद रखकर समझ लिया जाता है कि किसी सालगिरह की इज्जत बढ़ाई जा रही है। इस दिन के लिए दो दिन पहले से लोग दारू खरीदकर रखेंगे, या लुका-छिपी से बिकती दारू पा लेंगे। और इसे आजादी का सम्मान समझा जाता है।
दरअसल न सिर्फ आजादी की सालगिरह के जलसे को, बल्कि सभी किस्म के समारोहों को ठीक उसी किस्म के आडंबर में, रीति-रिवाजों के पाखंड में बांधकर रख दिया गया है, जैसे कि कोई धार्मिक पूजा-पाठ को बांधकर रख दे। इस दुनिया के इतिहास में जो सबसे बड़े समाज-सुधारक हुए, सबसे सुधारवादी और उदारवादी धार्मिक या सामाजिक नेता हुए, उनको भी पंथ में, सम्प्रदाय में, या किसी संगठन के ढांचे में बांधकर पाखंड बनाने का काम समाज ने किया है। हिंदुस्तान में आजादी के जलसों को अगर देखें तो वे इसी किस्म और इसी दर्जे के पाखंड के शिकार दिखते हैं। देश भर में डंडों पर झंडे फहराते, और माईक पर बच्चों को देशभक्ति की नसीहत देते वे लोग ही अधिक दिखेंगे जिनकी देशभक्ति पर लोगों को भारी और पक्का शक है। ऐसे ही लोग कल सजधजकर बड़ी-बड़ी बातें करते दिखेंगे जिन्होंने इस देश की आजादी को आज खतरे में डाल दिया है। और आजादी की एक और सालगिरह पूरी हो जाएगी। गांधी को आज इस देश में सिर्फ चबूतरों पर जगह मिली है, और अपनी ईमानदारी की, किफायत की, इंसाफ की सोच के साथ उनको चबूतरों से नीचे उतरने की इजाजत नहीं है। नेहरू को इस मुल्क में आज सिर्फ कुनबे की सरकार की शक्ल में जगह मिली है, उनके नाम को तख्तियों में जगह मिली है, लेकिन उनकी सोच को इससे बाहर आने की इजाजत नहीं है।
और ऐसे हिंदुस्तान में बहुत से लोग अपने-आपको आजाद मानकर संतुष्ट हैं। लोगों की आत्मसंतुष्टि का यह सिलसिला बहुत खतरनाक है। भारत जैसे बदहाल लोकतंत्र में मन में एक बेचैनी बनी रहना जरूरी है, असहमति जरूरी है, और इनकी आजादी के बिना कोई आजादी पूरी नहीं हो सकती। आज जब आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने खुद के जिंदा रहने से परे कुछ सोच पाने की हालत में नहीं है, तब इस आजादी का कोई मतलब भी नहीं है। एक शायर अदम गोंडवी ने लिखा है- 'सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पे रखकर हाथ कहिये देश क्या आजाद है,... जल रहा है देश यह बहला रही है कौम को, किस तरह अश्लील है संसद की भाषा देखियेÓ?
लेकिन इस देश में दिल पर हाथ रखने की नौबत आने ही नहीं दी जाती क्योंकि लोगों के हाथ उनके खाली पेट पर रखे मिलते हैं। भारत की त्रासदी यह है कि चुनावों की निरंतरता को लोकतंत्र की निरंतरता मान लिया गया है, आजादी का सुबूत मान लिया गया है। लेकिन इस देश के अधिकतर लोगों को इंसाफ पाने का न कोई मौका है, न कोई हक है। एक कागजी हक का जमीनी हकीकत से कोई भी लेना-देना नहीं है। ऐसे देश में आजादी की सालगिरह खुश होने की जो वजहें लेकर आती है, उससे कई गुना अधिक अफसोस लेकर आती है कि क्या इसी आजादी के लिए, ऐसी ही आजादी के लिए इस देश में दसियों हजार लोगों ने जिंदगी गंवाई थी?
प्रतीक के रूप में जब पाखंड की परंपरा बन जाती है, तो उससे फायदे से अधिक नुकसान होता है। पन्द्रह अगस्त या स्वतंत्रता दिवस पर आजाद भारत में आजादी की बदहाली पर बहस होनी चाहिए, शहर-शहर, गांव-गांव होनी चाहिए, पूरा दिन लोगों को गंभीर बातचीत में निकालना चाहिए, लेकिन इस जरूरत और जिम्मेदारी को एक झंडे और डंडे में तब्दील करके सत्ता और ताकतवर तबका लोगों के मन की बेचैनी को  फीका और खत्म करते हैं। जिस तरह एक धार्मिक कीर्तन लोगों के सोचने-समझने की ताकत को खत्म करने की साजिश होता है, उसी तरह लोकतांत्रिक जलसे और इनमें बड़ी-बड़ी बातें, और आजाद होने का झांसा जनता को धोखे में रखने की साजिश से परे कुछ नहीं। हिंदुस्तान में आजादी की जो बदहाली है, उसी का सुबूत है कि एक तरफ नक्सल हिंसा जैसे खतरे खड़े हुए हैं, दूसरी तरफ सबसे गरीब और कमजोर तबकों की पसलियों पर शहरों में उदारवादी अव्यवस्था की आसमान छूती इमारतें खड़ी हुई हैं। नक्सलग्रस्त जंगलों से लेकर कांक्रीट के शहरी जंगलों तक आजादी की नाकामयाबी कहीं धमाकों से उजागर होती है, तो कहीं शहरी सन्नाटों से। वह आजादी सिर्फ एक झांसा है जिसमें लोगों के हक के लिए लडऩे के हक को सिर्फ चुनावी राजनीति में उलझाकर रख दिया गया है, और एक असल लड़ाई की गुंजाइश खत्म कर दी गई है।
गुलामी के मुकाबले आजादी का एक झांसा अधिक खतरनाक होता है, और आज हिंदुस्तान की आबादी इसी का शिकार है। आजादी के पहले अंगे्रजों के शक्ल में कब्जा किया हुआ दुश्मन उजागर था। आज इस देश के दुश्मन, यहां की जनता के दुश्मन, यहां की आजादी के दुश्मन यहीं की चमड़ी के हैं। उनकी अलग से शिनाख्त मुमकिन नहीं है। इसलिए यह खतरा 1947 के पहले के खतरे के मुकाबले अधिक बड़ा है, अधिक खतरनाक है। अंगे्रज अगर इस देश को लूटकर बाहर ले जा रहे थे, तो आज के हिंदुस्तानी शासक उनके मुकाबले अधिक लूटकर बाहर ले जा रहे हैं, या इसी देश के भीतर दौलत की अपनी ऐसी रियासतें बना रहे हैं जो कि उनको इस लोकतंत्र में लुटेरे गिरोह का सरगना बने रहने की ताकत देती हैं। ऐसे माहौल में  आजादी का यह जलसा बेमायने है। यह पन्द्रह अगस्त 1947 की सालगिरह की शक्ल में तो ठीक है, लेकिन इसे अगर कोई भारत में आज आजादी का जलसा कहे, तो वह बात झूठी ही होगी।
रंगारंग तिरंगे जलसे के बीच ऐसी जली-कटी बातें कुछ लोगों को हिंसक लग सकती हैं, लेकिन वक्त ऐसा आ गया है कि इस देश की आजादी को हांकने वाले सरकार और कारोबार की हिंसा को कानूनी इजाजत है, और जनता को अपने जख्मों के साथ कराहने की भी आजादी नहीं है। किसी सालगिरह को जयंती कहा जाता है, और किसी सालगिरह को पुण्यतिथि। ये दोनों एक सालगिरह के ही नाम हैं, और दोनों के मायने अलग-अलग हैं। हिंदुस्तान की आजादी की इस सालगिरह को इस देश का लगभग पूरा वंचित तबका एक नजरिए से देखता है, और जिसके पास इस देश की आजादी के चलते दूसरे लोगों के हक को अपने घर संचित करने की ताकत है, वह इसे एक दूसरे नजरिए से देखता है। सौ में सत्तर लोगों के नजरिए से देखें तो यह एक पुण्यतिथि है, जयंती नहीं। आज के हाल को देखें तो यह न महज लगता है, बल्कि दिखता है कि आज आजादी पाने की सालगिरह नहीं है, आज महज अंगे्रजों की गुलामी खत्म होने की सालगिरह है, उसके बाद की आजादी रोज कतरा-कतरा लूटी जा रही है, यह तो मुल्क बहुत बड़ा है, आसमान से लेकर जमीन के भीतर तक इसमें बहुत कुछ बचा हुआ है, इसलिए इसमें अभी लुटने की और ताकत बची हुई है।
आज के तिरंगे जलसे के बीच यह बात अटपटी तो है, लेकिन दुनिया में जब भी कोई बेहतर बदलाव आया है, तो उसकी बात पहली नजर में उस वक्त के इतिहास में अटपटी सी लगती ही दर्ज हुई है।

ताकतवर का औजार और हथियार बन चुके सुप्रीम कोर्ट की फिक्र

संपादकीय
13 अगस्त 2013
गुजरात में फर्जी मठभेड़ के मामले में लगातार फरार चल रहे उस वक्त के एक आईपीएस अफसर के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भारी अफसोस और नाराजगी जाहिर की है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का पूरा वक्त रसूखदार अभियुक्तों के लगाए हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं के हाथों बर्बाद हो जाता है। उन्हें लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय उनका सुरक्षित ठिकाना है आम जनता को अपनी शिकायतें सामने रखने का वक्त ही नहीं मिलता। निचली अदालतों के हर आदेश को सर्वोच्च न्यायालय तक चुनौती देने वाले रईस और रसूखदार अभियुक्तों की याचिकाओं पर वक्त और ऊर्जा बर्बाद करते सर्वोच्च न्यायालय जज इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या आपरधिक मामलों में उच्च  न्यायालय को सर्वोच्च सत्ता दे दी जानी चाहिए। निचली अदालतों द्वारा दिए गए आदेशों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचती याचिकाओं  की बाढ़ पर जस्टिस चौहान ने कहा -मंै कसम खा कर कह सकता हंू कि आम जनता को हमारा वक्त मिल ही नहीं पाता, यह बेहद अफसोस की नौबत है। हम अग्रिम जमानत याचिकाओं और आरोपपत्रों व सम्मानों के संज्ञान में दायर अपीलों का ही निपटारा करते रहते हैं। इनकी वजह से सर्वोच्च न्यायालय निचली अदालत के स्तर पर आ गया है।
हमारे अखबार के नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से इस बात पर लिखते आ रहे हैं कि किस तरह हिन्दुस्तान का ताकतवर तबका अदालतों का ऐसा बेजा इस्तेमाल करता है कि उसके खिलाफ किसी फैसले की नौबत ही अमूमन नहीं आ पाती। हमने कई बार यह भी सुझाया है कि सरकार, राजनीति या पैसों की ताकत वाले लोगों के मामलों की सुनवाई के लिए अलग तेज रफ्तार अदालत बननी चाहिए। हमने यह भी कई बार लिखा कि जब ताकतवर कोई जुर्म कमजोर तबके के खिलाफ करे, तो उसमें अधिक बड़ी और कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए क्योंकि कमजोर तबका ताकतवर के खिलाफ अदालती लड़ाई लडऩे के लायक भी नहीं रहता। 

हम पिछले बरसों और महीनों में लिख चुके हैं- ''...इस देश में अब एक अलग कानून की जरूरत है, जिसकी वकालत हम लंबे समय से करते आ रहे हैं। जो लोग बहुत ही गरीब और कमजोर लोगों के खिलाफ जुर्म करते हैं, उनके लिए एक अलग सजा का इंतजाम होना चाहिए। ऐसा जुर्म करने वाले अगर ताकतवर हैं, तो उनके खिलाफ और भी कड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए। ऐसा न होने पर बेजुबान और बेबस गरीब को कोई सामाजिक न्याय नहीं मिल सकता। जिस तरह से इस देश के संविधान में दलितों और आदिवासियों को ज्यादती से बचाने के लिए अलग से कानूनी बचाव दिया गया है, उनके साथ ज्यादती करने वालों को कड़ी सजा का इंतजाम किया गया है, वैसा ही इंतजाम गरीबों के खिलाफ जुर्म करने वाले गैरगरीबों के लिए किया जाना चाहिए। और ऐसा इंतजाम महिलाओं के लिए भी किया गया है जिनको कानून में अतिरिक्त सुरक्षा दी गई है। इसी तरह गरीब को भी सीधे-सीधे एक अलग दर्जा देने की जरूरत है।...ÓÓ
आज अगर ताकतवर तबके के लोग गरीबों के खिलाफ जुर्म या ज्यादती करते हैं, और उनके मामलों की सुनवाई भी दस-बीस, पचीस बरस तक चलती है, तो कोई गरीब ऐसी लंबी सुनवाई नहीं झेल सकते। इसलिए इस देश में अगर फास्ट ट्रैक कोर्ट की जरूरत है, तो दलित-आदिवासी की तरह, महिलाओं की तरह, गरीबों के लिए अलग अदालत होनी चाहिए। जिस तरह एक गैरदलित-आदिवासी अगर दलित-आदिवासी पर हिंसा करते हैं, तो उसकी तेज रफ्तार सुनवाई अलग अदालत में होती है, उसी तरह गरीब के खिलाफ जुर्म करने वाले गैरगरीब को तेजी से सजा मिलनी चाहिए।

हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था का क्या हाल है। अगर जुर्म करने वाले लोग ताकतवर होते हैं, तो अदालतें उनको बाइज्जत बरी करने का सामान बनकर रह जाती हैं, क्योंकि कहीं सुबूत खत्म हो जाते हैं, कहीं गवाह मिटा दिए जाते हैं, और कहीं गवाहों की याददाश्त खत्म हो जाती हैं।  अदालत में जो फरियादी पहुंचते हैं, उनमें से शायद तीन चौथाई बेइंसाफ पाकर बाहर आते हैं, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था पूरी तरह खोखली है और बेअसर है। अब सवाल यह उठता है कि ऐसे अदालती ढांचे के साथ लोग पीढिय़ों तक बेचैनी से जिएं? इंसाफ की हसरत के साथ मर जाएं? या मरने-मारने पर उतारू हो जाएं? यह नौबत ऐसी है कि जख्मी तबकों को अपने दर्द के साथ-साथ भारत की हकीकत को भी समझना होगा। अदालती फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत तक तो जाया जा सकता है, उसके खिलाफ और ऊपरी अदालत तक जाया जा सकता है, लेकिन इंसाफ के लिए अदालतों के अलावा और कोई लोकतांत्रिक जरिया भारत में नहीं है। इस व्यवस्था पर चाहे कितना ही अविश्वास किया जाए, इसके तहत ही किसी तरह की उम्मीद की जा सकती है। इसके बाहर तो वह एक चौथाई उम्मीद भी खत्म हो जाएगी जो कि आज शायद गैरताकतवर तबकों को सजा देकर इंसाफ देती है। 
आज भारत में ताकतवर मुजरिमों का शायद ही कुछ बिगड़ सकता है। यह देश अब कमजोर तबकों का विश्वास खो बैठा है। ऐसे में आज सुप्रीम कोर्ट ने जो फिक्र सामने रखी है वह जायज है, लेकिन दिक्कत यह है कि देश की पूरी संसद और विधानसभाएं ऐसे लोगों से भरी पड़ी हैं, जो कि सुप्रीम कोर्ट तक का लगातार बेजा इस्तेमाल करके आज जेल के बाहर हैं। ऐसे में अपनी ही जिंदगी के खिलाफ कानून कोई कैसे बनाए? 

जो लोग इस बच्ची के जख्मों पर भी चुप हैं, उनके लिए...

संपादकीय
12 अगस्त 2013
हर कुछ दिनों में इंसानों के भीतर भी उस हिंसा पर हमको यहां बड़ी तकलीफ के साथ लिखना पड़ रहा है जिसे इंसान बड़ी आसानी से इंसानियत से परे की हैवानियत कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। और जब तक यह पल्ला झाडऩा जारी रहेगा तब तक बेकसूर लोगों को इंसानों में आम ऐसी हिंसा, या किसी दूसरी तरह की हिंसा से बचना मुमकिन नहीं हो पाएगा। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दो दिन पहले सड़क पर आठ बरस की एक बच्ची बुरी हालत में मिली, जिसके साथ शायद चलती ट्रेन में किसी ने बलात्कार करके उसे शहर में सड़क किनारे फेंक दिया था। अभी तक बलात्कारी तो है, लेकिन जब इस बच्ची को बिलासपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल, सिम्स, ले जाया गया, तो वहां पुलिस को ही कहा गया कि इस बच्ची को पहले जिला अस्पताल ले जाएं, और फिर वहां से रेफर करवाकर लाएं। इसके बाद प्रशासन के अफसरों से लिखित आदेश लाया गया, तब कहीं जाकर दो घंटे बाद इस बच्ची को इलाज नसीब हुआ। 
छोटी बच्ची के साथ ऐसी हिंसा करने वाले एक बलात्कारी को तो मानसिक रोगी या विकृत मानसिकता का कहा जा सकता है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री के अपने शहर में सरकारी मेडिकल कॉलेज के अस्पताल का ऐसा रूख अगर बलात्कार की शिकार आठ बरस की बच्ची के लिए है, तो उसी शहर में बैठे हुए हाईकोर्ट को क्या किसी बाहरी व्यक्ति की जरूरत है कि ऐसी खबरों पर सरकार को नोटिस दे? जो लोग बलात्कारी नहीं हैं, वे लोग किस तरह एक छोटी सी जख्मी बच्ची के साथ ऐसा सरकारी और डॉक्टरी बलात्कार कर सकते हैं, यह किस्से-कहानी में पढऩा भी भयानक है, और यहां तो यह आंखों से देखने मिल रहा है। और कुछ महीनों में होने वाले जिस चुनाव को लेकर आज पार्टियों और नेताओं में मुद्दों को लेकर छीनाझपटी हो रही है, उनको भी शायद इस सिलसिले में कोई गलती नहीं दिखती है। 
यही वजह है कि भारत में सेक्स हिंसा के शिकार लोग पुलिस और अदालत तक जाने से कतराते हैं। और यही वजह है कि इस देश के दसियों लाख सेक्स अपराधी पुलिस में कहीं दर्ज होने से भी बचे हुए हैं। इंसानों के समाज में अगर ऐसी हिंसा और ज्यादती लड़कियों और औरतों के खिलाफ न होकर, उनकी तरफ से लड़कों और आदमियों पर होने लगती, तो सदियों पहले से उसके खिलाफ कड़े कानून बनते, और उन पर कड़ाई से अमल होता। आज कानून को बनाने का काम, और उनको लागू करने, उन पर अमल करवाने का काम मोटे तौर पर मर्दों के हाथ है, इसलिए उनके तहत लड़कियों और महिलाओं को कोई इंसाफ नहीं मिल सकता। कानून को कड़ा बनाते चलने का जो नाटक संसद में देखने मिलता है, समाज और नेताओं के बीच सुनने मिलता है, वह पूरा नाटक इसलिए फिजूल का है क्योंकि उसको बेअसर करने की बारहमासी साजिश चलती ही रहती है। 
पिछले दो दिनों में छत्तीसगढ़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज के अस्पताल के इस हिंसक रवैये के खिलाफ जनता के बीच से कोई आवाज नहीं उठ रही, सरकार की तरफ से कोई शर्मिंदगी सामने नहीं आई है, जिस बिलासपुर की सड़क पर बच्ची ऐसी हालत में मिली, और जिस रायपुर शहर की यह बच्ची है, वहां पर इस पूरे मामले में अखबारी खबरों से परे कोई आवाज भी नहीं है। ऐसी बेरूखी के बारे में मन में यह सवाल उठता है कि आज एक बच्ची के साथ हुए ऐसे जुल्म और जुर्म पर अगर लोग चुप हैं, तो कल उनके अपने बच्चे कितने सुरक्षित रहेंगे? क्योंकि बलात्कारी तो आज नहीं तो कल अदालत से छूट जाने की ही अधिक उम्मीद रखते हैं। पकड़ाने के पहले  और बरी हो जाने के बाद बलात्कारी पूरे समाज पर खतरा रहेंगे, और जब बाकी लोगों के जख्मी बच्चे सरकारी अस्पताल में ले जाएंगे, और उनके साथ ऐसा ही सुलूक होगा, तो उस नौबत की कल्पना सारे लोगों को अपने और अपने बच्चों को इस तस्वीर में रखकर करनी चाहिए। और फिर सोचना चाहिए कि क्या आज की उनकी चुप्पी हिंसा नहीं है? जुर्म नहीं है? 
एक विश्वविख्यात कविता है, और उसी के तर्ज पर इस मामले को अगर सोचें तो लगता है- आज उस बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, और मैं चुप था क्योंकि वह मेरी बच्ची नहीं थी। कल किसी और बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, मैं फिर भी चुप था, क्योंकि वह भी मेरी बच्ची नहीं थी। इन बच्चियों को अस्पताल में मरहम नहीं मिला, फिर भी मैं चुप था क्योंकि जब मेरी बच्ची के बदन के नहीं थे। फिर एक दिन मेरी बच्ची से बलात्कार हुआ, और उसे रोकने वाले कोई नहीं थे, क्योंकि वह आसपास मौजूद किसी की बच्ची नहीं थी, और फिर अस्पताल में उसे मरहम नहीं मिला, क्योंकि वह किसी डॉक्टर की बच्ची नहीं थी...।

गरीबों की फिक्र में खतोकिताबत

संपादकीय
11 अगस्त 2013
देश में गरीबों की गिनती पर बार-बार घिरती रही यूपीए सरकार की एक अहम मंत्री, सामाजिक न्याय मंत्री ने अब मांग की है कि अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों में से मलाईदार और करदाता तबका निकालकर उन्हें खुद ब खुद गरीबों में शामिल कर लिया जाए। ऐसे समय में, जब चुनाव सामने माने जा रहे हंै, सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के नतीजे आने के महीने भर पहले केंद्र सरकार की सामाजिक न्याय मंत्री का मांटेक सिंह अहलुवालिया को ऐसा खत लिखना बहुत से सवाल पैदा करता है। खासकर तब, जब सरकार पर देश में गरीबों की तादाद कम बताने, गरीबी को 27 रुपये और 32 रुपये के खर्च पर माप कर संवेदनहीनता दिखाने के हंगामेदार आरोप लग चुके हंै। सरकार गरीबों, सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए काम करने, सोचने वालों के भारी  विरोध के चलते ही, गरीबों के फायदों में कमी करने के अपने मंसूबों से अनमनेपन से पीछे हटने को मजबूर हुई है। सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि देश पर कांग्रेस के  दसियों साल के राज, और यूपीए के तकरीबन दस साल के राज के बाद भी सरकार, गरीब कौन है, और उन्हें जीने के लिए रोज कम से  कम कितने रुपये चाहिए, यही नहीं समझ पाई है? शैलजा कुमारी कोई आम मंत्री नहीं हैं। वह कांग्रेस के एक कद्दावर दलित नेता की बेटी है, छात्र जीवन से ही नेता रही हंै। खुद पार्टी के भीतर सबसे बड़े दलित नेताओं में गिनी जाती हंै, और सामाजिक न्याय मंत्री बनने के पहले यूपीए की पहली पारी में वह आवास और शहरी गरीबी निवारण मंत्री रह चुकी हंै। दलितों के लिए उनके आवाज उठाने का, उनके सियासी मकसदों से क्या रिश्ता हो सकता है, इसका पता कुछ हद तक इस बात से चलता है कि उनके खिलाफ  हरियाणा के बहुचर्चित मिर्चीपुर दलित अत्याचार कांड में दलित समुदाय के लोगों को जाट नेताओं के खिलाफ उकसाने की आपराधिक  शिकायत  दर्ज है। इसलिए हाल ही में निहायत ही संवेदनहीन गरीबी रेखा सामने रखकर उससे पीछे हटने को मजबूर हुई यूपीए सरकार की सामाजिक न्यायमंत्री का प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष को गरीबी रेखा के बारे में ऐसा पत्र लिखने के कई मायने हो सकते हैं।
लेकिन हम इन मायनों में ना जाते हुए शैलजा की मांग पर गौर करते हैं। हमने भी मलाईदार तबके को रियायतें देने का विरोध हमेशा करते हुए उन्हें इस वर्ग से अलग करने की मांग इस जगह कई बार की है। हमने पहले भी साफ तौर पर लिखा है कि आरक्षित तबकों के भीतर मलाईदार तबकों के ताकतवर हो चुके उन जातियों के, धर्मों के लोगों को अलग करने की साधारण सी समझ सरकार ने बांधकर ताक पर रखी हुई है, और कमज़ोर वर्गों के लिए दी जाने वाली रियायतों के पैमाने तय करने बैठते वक्त सत्ता सोच-समझकर नासमझ बन जाती है। आरक्षण हो, या रसोईगैस रियायत की बात हो, जिस मलाईदार तबके को नौकरी के आरक्षण के फायदे के हक से बाहर करना चाहिए, वही तबका तो संसद और विधानसभाओं पर काबिज है, नौकरीशाही और सरकार पर काबिज है, पार्टी संगठनों और पार्टी के चंदादाता तबके पर काबिज है। इसलिए जाति की हो या गैस की, गरीब के हक को अलग करने का आत्मघाती काम, फैसले का हक रखने वाला मलाईदार सत्तारूढ़ तबका कभी नहीं करता,  और गरीब को रियायत देने के नाम पर यह तबका खुद उस पंगत में बैठकर खाने और डकारने लगता है।
आरक्षित तबके में वास्तव में जिनको गरीबों के लिए सरकार की योजनाओं का फायदा मिलना चाहिए, वह आजादी के 60 साल बाद अपने पिछड़ेपन से उबरे नहीं। अब ऐसे लोगों की सही पहचान करने के लिए सरकारों को महादलित, अति पिछड़े जैसे अल्फाज इस्तेमाल करने पड़ते हैं। ऐसा कभी नहीं था कि जनता के प्रतिनिधि, कानून निर्माताओं को अपनी गरीब रियाया  की हकीकत मालूम नहीं हो , लेकिन उससे उसका हक जितना ज्यादा छीना जा सके, जितने ज्यादा दिन उसे वंचित रख कर काम चलाया जा सके,राजनीतिक दलों ने आज तक चलाया है। वर्ष 2011 में जाकर यूपीए सरकार को समझ आया कि देश में आर्थिक-सामाजिक जाति जनगणना करवाया जाए। गरीब दलित पिछड़े लोगों के लिए उसकी गंभीरता का यह स्तर है। उसकी इच्छशक्ति इतनी कमजोर है कि यह जनगणना अपने निर्धारित समय से डेढ़ साल देर से पूरी हो रही है। इसके बाद भी सरकार गरीबी रेखा से नीचे  रह रहे लोगों का आंकड़ा तो जारी नहीं ही कर पाएगी, लेकिन  इतना जरूर है कि इसके आधार पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, इंदिरा आवास योजना, सार्वजनिक वितरण व्यवस्था जैसी योजनाओं के तरह मिलते फायदे पाने वालों का अंदाज लग सकेगा। लेकिन क्या यह जनगणना दलितों, पिछड़े वर्गों के लोगों को, मलाईदार तबके के चंगुल से अपने हक छुड़ाकर ले पाने की ताकत दे पाएगा? सदियों से कुचले गए यह बेआवाज कमजोर लोग अपने बूते यह हक हासिल नहीं कर सकते, इसके लिए उन्हें सरकार की इच्छाशक्ति का सहारा चाहिए।
गरीबों को ऊपर लाने में, इस देश के संसाधनों में उन्हें उनका हक दिलवाने के लिए यूपीए ने योजनाएं तो बहुत बनार्इं, लेकिन  इन योजनाओं के अमल में सरकार की इच्छाशक्ति कभी नजर नहीं आई। एक तरफ छत्तीसगढ़ की सरकार है जिसने देश भर में चोरी के लिए बदनाम पीडीएस से चोरी खत्म करके, गरीबों के पेट में उनके हक का अनाज पहुंचाकर दिखाया है, तो दूसरी तरफ यूपीए है जिसके भीतर गरीब कौन है इसकी पहचान करने की कवायाद अभी चल ही रही है। सरकार के मंत्री इसके लिए सरकार के भीतर खतोकिताबत कर के जनता को उनकी फिक्र करने का झांसा देने की कोशिश कर रहे हैं, और सरकार है कि अदालतों में हलफनामे देने पर ही अटकी है कि 32 रुपये खर्च करने वाला गरीब है कि 27 रुपये खर्च करने वाला। छत्तीसगढ़ सरकार अगर सिर्फ एक योजना को पूरी इच्छाशक्ति के साथ अमल करके गरीबों तक उनका हक पहुंचा सकती है, तो यूपीए सरकार के हाथ किसने बांधे हंै कि वह गरीबों, पिछड़ों, दलितों, वंचितों की पहचान फुर्ती से न कर सके? और  रियायत  के हकदार लोगों तक उनका हक ना पहुंचा सके? अगर वह सुधार योजनाएं लागू करने में, परमाणु संधि करने में अपनी मजबूती, चालाकी  दिखा सकती है तो इन मुद्दों पर तेजी से काम करने में उसे क्या दिक्कत है?