लालू की सजा कबीर तय कर गए थे.. हिन्दुस्तानी लोकतंत्र ने बरसों लगा दिए

विशेष संपादकीय
30 सितंबर 2013
पन्द्रह बरस से अधिक से बिहार का चारा घोटाला खबरों में रहा, और आज वह सबसे छोटी अदालत से इंसाफ की कगार पर पहुंचा है। लालू यादव समेत तीन दर्जन सरकारी-गैरसरकारी लोगों को सीबीआई की अदालत ने कुसूरवार पाया है और उनकी सजा अब सामने आनी है। यूपीए सरकार अपराधियों को बचाने के लिए जो अध्यादेश ला चुकी थी, उसका मकसद पूरा नहीं हो पाया, और यूपीए के सबसे पसंदीदा, सबसे हमदर्द, सबसे पक्के साथी लालू यादव का जेल जाना अब पक्का हो गया। कुछ महीने पहले ही हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री चौटाला बाप-बेटे भी सजा पाकर जेल गए, और देश के कुछ और मुख्यमंत्री साम-दाम-दंड-भेद से अब तक जेल जाने से बचे हुए हैं, उनकी बारी भी आने की उम्मीद अब जनता कर रही है।
बिहार पर पन्द्रह बरस तक राज करने वाले लालू यादव इस देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल बने हुए थे जो कि धर्मनिरपेक्षता का नारा लगाकर वामपंथियों तक को अपना भ्रष्टाचार बर्दाश्त करने पर सहमत करवा चुके थे, जो सोनिया गांधी के भरोसेमंद मददगार बने हुए थे, जो साम्प्रदायिकता का विरोध करने के नाम पर अपने भ्रष्टाचार की अनदेखी की उम्मीद देश से करते थे, जो सिर्फ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कुनबापरस्ती का एक नंगा नाच बरसों से करते आ रहे थे, आज एक किस्म से उनका खेल खत्म हुआ। अब यह एक अलग बात होगी कि यूपीए सरकार कोई ऐसा कानून बनाए जिसमें उसके मददगार लोगों को सात खून भी माफ हों, तो हो सकता है लालू यादव का पासा भी पलट जाए। फिलहाल उनका खेल खत्म दिखता है, और कबीर की कही यह बात सच साबित होती है कि जानवर की मरी खाल की सांस से भी लोहा भस्म हो जाता है, और जिन जानवरों के हक का लालुओं ने खाया था, वे आज कम से कम निचली अदालत से तो भस्म हो ही गए हैं।
बात सिर्फ लालू यादव की नहीं है, बात है सत्ता का बेजा इस्तेमाल करके देश को लूटने की, जनता के हक के साथ बलात्कार करने की। इसमें बहुत से प्रदेशों में लालू बिखरे पड़े हैं, जनता उनको जानती-पहचानती भी है, और यह भी देखती है कि हिन्दुस्तान का लुंज-पुंज इंसाफ उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाता, और वे एक कुर्सी के बाद दूसरी कुर्सी से बलात्कार करते ऊपर पहुंचते रहते हैं, किसी तरह किसी जांच में फंस भी गए, तो अपने घरवालों को, अपने जानवरों को कुर्सी देकर वे उनके बदन के मार्फत फिर जनता के हक से बलात्कार करते रहते हैं। बिहार में लोगों ने लालू, और लालू के बाद राबड़ी, और राबड़ी के साथ राबड़ी के भाईयों, सबकी ऐेसी ज्यादती देखी थी, और उसने देश के इस विशाल राज्य की संभावनाएं दशकों के लिए खत्म ही कर दी थी।
आज जो बेशर्म सरकार अपराधी-बचाव अध्यादेश ला चुकी है, और जो बेशर्म संसद राजनीतिक दलों का हिसाब-किताब जनता के पूछने के हक से बाहर रख रही है, जो सुप्रीम कोर्ट को उसके हर सुधारवादी फैसले पर लातें मार रही हैं, ऐसी सरकारें और ऐसी संसद इस देश में नक्सलवाद को बढ़ावा दे रही हैं। जब सरकार और संसद में बैठे डकैतों और बलात्कारियों को कोई सजा नहीं दी जा सकती, तो ऐसे लोकतंत्र को खारिज करने के लिए उग्र अतिवामपंथ हथियार उठाकर खुद सजा देने लगता है। दिक्कत यही है कि सजा के हकदार लोग सरकारी बंदूकों से घिरे हुए राजधानियों में पुलिस की सलामी लेते बैठे रहते हैं, और नक्सल मोर्चों पर बेकसूर आदिवासी, और छोटे-छोटे सिपाही मारे जाते रहते हैं। अगर इस देश में ताकतवर मवालियों के जुर्म के साथ इंसाफ की यही रफ्तार रहेगी, तो जंगलों से परे शहरों में भी किसी किस्म की नक्सल हिंसा नाजायज नहीं कही जा सकेगी। इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि अपराधियों को बचाने वाले अध्यादेश के पीछे के जो बहुरूपिया सफेदपोश लोग हैं, उनको भी खारिज किया जाए। और ऐसे कड़े कानून बनाने की वकालत की जाए जिससे कि सत्ता पर बैठे मुजरिमों के मामले-मुकदमों पर तेज रफ्तार से सुनवाई हो सके, और आम मुजरिमों के मुकाबले लालबत्तीधारी मुजरिमों को कई गुना अधिक सजा देने का इंतजाम हो।
पिछले दिनों हमने यूपीए सरकार के लाए अध्यादेश को लेकर, और फिर उसे राहुल गांधी के हाथों फाड़ दिए जाने को लेकर काफी कुछ लिखा था। उन सारी बातों को आज यहां दोहराना जरूरी नहीं है। लेकिन अब यह वक्त आ गया है कि जनता के बीच से लगातार अदालत जाकर ऐसी कोशिश हो कि संसद, सरकार, और राजनीतिक पार्टियां अपने जुर्म को सजा से बचाने की कोशिशें न कर सकें। ऐसा न होने पर इस देश के सामने जो सबसे बड़ा खतरा है, वह जनता के लुट जाने से भी बड़ा है। आज इस देश में स्वघोषित और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के भयानक विकराल भ्रष्टाचार का नतीजा है कि साम्प्रदायिक ताकतें लोगों को सुहानी लगने लगी हंै, क्योंकि वे जाहिर तौर पर कम भ्रष्ट दिख रही हैं। भ्रष्टाचार ने धर्मनिरपेक्षता को एक गैरजरूरी सामान बनाकर रख छोड़ा है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता ने अपने भ्रष्टाचार को धर्मनिरपेक्षता के लिए एक विशेषाधिकार मान लिया था। जिस देश में जनता भूखी हो, जिसे खाने का हक देने की जरूरत पड़ती हो, जिसे छब्बीस रूपये रोज में जिंदा रहने पर गैरगरीब मान लिया जाता हो, उसके जेहन में किसी भी तरह की धर्मनिरपेक्षता पेट भरने के बाद ही समझ आ सकती है। जब जनता के मुंह का चारा इस देश के ताकतवर लोग छीनकर, संसद में बैठकर जुगाली करते दिखते हैं, तो ऐसे लोगों की धर्मनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता नाम के शब्द को ही बदनाम कर देती है, और साम्प्रदायिकता नाम के शब्द का खतरा खत्म कर देती है।
लालू यादव का मामला सत्ता पर बैठकर जनता और जानवरों के हक के साथ बलात्कार करने का है, और इसके बाद अपने संसदीय बाहुबल के दम पर कांग्रेस और यूपीए से जांच और मुकदमे में ऐतिहासिक रियायत पाने का भी है। कानून की किताबों को इस मामले की मिसालों के साथ दुरूस्त करने की जरूरत पड़ेगी कि लोकतंत्र का कानून किस तरह सत्ता की गिरोहबंदी के सामने दम तोड़ देता है, और यह बताता है कि किस तरह सिर्फ बंदूक का कानून ही ऐसे लोगों के साथ वक्त पर इंसाफ कर सकता है। इस देश को अगर नक्सल हिंसा जैसी अराजकता से बचाना है, तो इस देश को लालुओं और चौटालाओं जैसे सैकड़ों बलात्कारियों से भी बचाना होगा, इसके बिना एक दिन हिन्दी फिल्मों के अंदाज में कोई पुलिस अफसर पिस्तौल से ही इंसाफ करने लग जाएगा।
लालू यादव और चौटाला जैसों के मामले अभी भी आखिरी अदालत के आखिरी फैसले से कोसों दूर हैं, और ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ही ऐसे खतरनाक मुजरिमों से संसद और विधानसभाओं को बचाने की कोशिश करता है, तो गांधी-नेहरू की पार्टी उस सुप्रीम कोर्ट के मुंह पर अध्यादेश चबाकर थूक देती है। ऐसे में देश की जनता को ही ऐसे थूकने वाले चेहरों पर फैसला करना है। लालू यादव को मिल रही सजा बेजुबान जानवरों के हक के साथ किए गए बलात्कार की सजा है, और तेज रफ्तार से देश के बाकी लालुओं को भी जेल का चारा खाने के लिए भेजना चाहिए।

आज दुनिया के दादा के दरबार में अपील ही रिवाज

संपादकीय
29 सितंबर 2013
इंटरनेट पर अभी एक बहस छिड़ी हुई है कि एक हिंदुस्तानी टीवी पत्रकार बरखा दत्त से पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने मनमोहन सिंह के बारे में क्या ऐसा कुछ कहा जिसे बरखा दत्त ने अपने दर्शकों को नहीं बताया? एक पाक पत्रकार ने यह लिखा कि नवाज शरीफ ने उनकी मौजूदगी में बरखा से कहा कि मनमोहन सिंह अमरीकी राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान एक देहाती औरत की तरह पाकिस्तान की शिकायत करने लगे, जबकि आपसी मुद्दे आपसी बातचीत से निपटाने चाहिए थे।
बात जब पत्रकारों की होती है तो फिर बोलने वाले कई हो जाते हैं। किसी ने लिखा कि आपसी बातचीत को लिखना या दिखाना नहीं चाहिए। किसी और ने कहा कि प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों का कहा हुआ कुछ भी ऑफ द रिकॉर्ड नहीं होता, इसलिए वह बातचीत बतानी चाहिए थी। लेकिन क्या लिखना या दिखाना है इसकी बारीक बहस में वह मोटी बात धरी रह जाएगी कि अमरीका से बात करते हुए भारत को पाकिस्तान की शिकायत करनी चाहिए थी, या नहीं। इस महत्वपूर्ण पहलू पर बात करते हुए अभी हम नवाज शरीफ की कही बताई जा रही उस बात को भी अनदेखा कर रहे हैं जो उन्होंने एक देहाती महिला के लिए हिकारत के साथ कही, अगर कही तो। एक तो देहाती, फिर औरत, यानी दोहरी हिकारत की हकदार।
खैर, इन तीन देशों के रिश्तों पर आएं, भारत को गर पाकिस्तान से आतंकी और फौजी हमलों की शिकायत है तो उसे इसकी बात उन देशों से भी करनी ही चाहिए थी जिनकी पाकिस्तान पर पकड़ है, जो पाकिस्तान के हिमायती हैं। दुनिया के किन्हीं भी दो देशों के मामले आज आपसी नहीं हो सकते, दुनिया के अंतरराष्ट्रीय जटिल संबंधों की एक भूमि हर कहीं होती है। पाकिस्तान के साथ अमरीका के इतने किस्म के तनाव हैं, इतने किस्म के मदद के रिश्ते हैं, ऐसी फौजी जरूरतें हैं, कि पाकिस्तान की बांह मरोडऩे के लिए अमरीकी-बाहुबल का इस्तेमाल एक सहज तरीका ही माना जाएगा। पाकिस्तानी घरेलू मामलों में अमरीका की दखल, और उसकी पकड़, इतनी अधिक है, कि भारत-पाक सरहद पर निपटने से पहले भारत को अमरीका से इस बारे में बात करनी ही चाहिए थी। इसकी एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता, आतंकी हिंसा और फौजी मनमानी की हालत ऐसी है, कि अकेले पाक प्रधानमंत्री से बात करके कोई भी बाहरी देश अधिक कुछ नहीं पा सकता। अमरीका की बात अलग है जो पाकिस्तान को जब जैसा चाहे इस्तेमाल करता है, जो वहां घुसकर लोगों को मारता है, ड्रोन बरसाकर बेकसूरों को थोक में मारता है। ऐसे ताकतवर देश से अगर भारत अपने पर होते हमलों को रूकवाने की बात करता है तो यह एक बहुत जायज अंतरराष्ट्रीय तरीका है। पाकिस्तान पर जिस अमरीका का जायज-नाजायज, घोषित-अघोषित, दबदबा है, कब्जा है, उसकी मदद मांगना, उससे पाकिस्तान की शिकायत करना, तीसरे देश की दखल को न्यौता नहीं है। यह अमरीकी मदद पर चलने वाले पाकिस्तान को अमरीकी फौजी-गैर फौजी मदद रोकने की कोशिश है।
हम नवाज शरीफ की एक पत्रकार को कही बात को महत्व नहीं दे रहे, लेकिन तीन देशों के इस त्रिकोण की बात कर रहे हैं। यह रिश्ता अमरीका के बिना पूरा नहीं होता। दरअसल आज दुनिया का कोई भी मामला अमरीका की दखल के बिना पूरा नहीं होता। अमरीकी इजाजत के बिना हिंदुस्तान परमाणु बिजली भी नहीं बना सकता। जिस तरह एक वक्त दाऊद की मर्जी के बिना मुंबई में कोई कारोबार नहीं चल सकता था, उसी तरह आज अमरीकी मर्जी के बिना दुनिया में कोई आदमी अपनी बीवी को पीट भी नहीं सकता वरना उसके मुहल्ले पर ड्रोन बरसाए जा सकते हैं। इसलिए आज कोई यह सोचे कि अमरीकी मदद पर चलते, उसकी जकड़ वाले पाकिस्तान के हमलों को बिना जंग रोकने की एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक कोशिश भी भारत को नहीं करनी चाहिए तो यह गलत सोच है। फिर पाकिस्तान के बारे में तो आज यह धारणा भी है कि वहां के कुछ ताकतवर तबके ऐसे हैं जो कि वहां की सरकार के भी काबू में नहीं हैं, लेकिन शायद अमरीका का उन पर असर हो।
कुल मिलाकर भारत की यह पहल सही है कि फौजी टकराव के बजाय वह पाकिस्तान के हिमायतियों को बताए कि पाकिस्तान उनसे मिलने वाली मदद का कैसे आतंकी इस्तेमाल कर रहा है। दुनिया के दादा के दरबार में रहम की अपील के सिवाय दुनिया में आज और कोई रिवाज रह भी कहां गया है।

Bat ke bat, बात की बात

28 sept 2013

सुनो मनमोहन सिंहजी, अभी नहीं, तो कभी नहीं...

संपादकीय
28 सितंबर 2013
एक अच्छा-भला प्रोफेसर आज इस जगह पहुंच गया है जिस जगह आपातकाल में संजय गांधी की चप्पलों को उठाने वाले राज्यपाल-मुख्यमंत्री पहुंच गए थे। फर्क महज इतना है कि राहुल गांधी, संजय गांधी नहीं हैं, इसलिए वे हिंसक हरकतें नहीं करते, वे जुबानी हिंसा करके कल रूक गए। अपनी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के लाए एक अध्यादेश को कूड़ेदान में फेंकने का उनका गुस्सा दरअसल मनमोहन सिंह को कचरे की टोकरी में फेंकता है, यूपीए सरकार को बकवास कहता है, इस अध्यादेश को लाने का फैसला करने वाली कांगे्रस कोर कमेटी को खारिज करता है, और यूपीए के भागीदार दलों को बेइज्जत करता है। राहुल का गुस्सा यह भी साबित करता है कि वे अपनी ही पार्टी से ऊपर हैं, अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री से ऊपर हैं। उनका गुस्सा यह भी साबित करता है कि वह महीनों लेट भी आ सकता हैं, और महीनों देर से टूटी अपनी इस नींद के दौरान पार्टी और सरकार के फैसले को वे कभी भी कचरे की टोकरी में फेंक सकते हैं।
राहुल की असहमति और उनके गुस्से से यह भी साबित होता है कि यूपीए और कांगे्रस के भीतर चाहे जो भी हो जाए, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह उसे इस्तीफा देने के लायक नहीं मानेंगे। यह पक्का इरादा मनमोहन सिंह से रही-सही इज्जत भी छीन ले गया है और वे एक घरेलू नौकर की तरह हो गए हैं जिसके साथ परिवार कैसा भी सुलूक कर सकता है।
अपराधियों को बचाने और संसद-विधानसभा में बनाए रखने के शर्मनाक अध्यादेश का राहुल गांधी का विरोध पहली नजर में भला लगता है, लेकिन यह अध्यादेश तो कांगे्रस की ही पहल पर सर्वदलीय बैठक के रास्ते होकर हफ्तों की चर्चा बाद राष्ट्रपति भवन पहुंचा था। इस पूरे दौर में राहुल गांधी कहां थे? उनकी अच्छी नीयत उस दिन अच्छी लगती जिस दिन वे प्रधानमंत्री को बेइज्जत किए बिना इसे पार्टी के भीतर रोकते। सब कुछ हो जाने के हफ्तों बाद अब उनकी नाटकीय दखल प्रधानमंत्री के अलावा कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी नीचा दिखाती है।
लेकिन जिन लोगों की पूरी काबिलीयत महज राजनीति है, उनके बारे में हम कुछ नहीं कहते। मनमोहन सिंह तो एक वक्त जाने-पहचाने अर्थशास्त्री थे। उनको पढ़ाने के लिए बुलाया जाता था। यूपीए के अंतहीन अपराधों में वे एक चुप बैठे सरगना की तरह अपनी पूरी इज्जत खो बैठे हैं। अब इस कुर्सी पर बने रहने के लिए वे और भी अधिक अपमान बर्दाश्त किए चले जा रहे हैं, यह एक तकलीफ की बात है। इस विशाल लोकतंत्र के मुखिया का स्वाभिमान ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह हिंदी फिल्मों में किसी घर में सेवा करने वाला रामू काका हो, जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी सब बर्दाश्त करते हुए भी काम पर बना रहे। इस देश के प्रधानमंत्री की जगह अगर कूड़ादान तय किया जाए, तो उससे उसकी बेइज्जती हो या न हो, देश की बेइज्जती तो हो ही रही है। किसी भी लोकतंत्र के साथ ऐसा सुलूक कुनबातंत्र ही कर सकता है, जो कि कल किया गया है।
वक्त निकल जाने के बाद अपने-आपको बागी तेवरों वाला यंग एंग्री मैन साबित करने का कल का राहुल का काम कांगे्रस पार्टी के ढांचे की कमजोरी भी बताता है। पार्टी के भीतर अधिकारों और जिम्मेदारियों का ऐसा अस्थिर और मनमानी बंटवारा कांगे्रस के लिए भी घातक है, और वह जिस देश में सत्ता या विपक्ष में रहे, उस देश के लिए भी घातक है। बिना जिम्मेदारी और जवाबदेही के सिर्फ अधिकार और अधिकार, महज खतरनाक और खतरनाक होते हैं।
कांगे्रस के भीतर राहुल गांधी का दर्जा अगली पीढ़ी का हो सकता है लेकिन प्रधानमंत्री के पद से दो-चार कदम दूर रहने वाले किसी व्यक्ति का दर्जा समय पर जागने, समय पर सही काम करने वाले का होना चाहिए। अपने प्रधानमंत्री, पार्टी, और सरकार, सहयोगी-भागीदार दल, सबको नीचा दिखाकर खुद ढाई मिनट में वाहवाही पाना, गंभीरता और परिपक्वता का सुबूत नहीं है। उन्होंने एक अच्छे काम को बहुत बुरी तरह करके एक सुर्खी तो बटोरी है, लेकिन मनमोहन सिंह में अब शायद एक सुर्खी बटोरने का भी हौसला नहीं है। क्या एक अर्थशास्त्री-प्राध्यापक कितनी ही बेइज्जती और कितनी ही तोहमतें झेलकर गांधी-नेहरू परिवार के लिए सीट गरम रखने को जिंदगी का मकसद बना चुका है?
यह अध्यादेश तो कूड़े की टोकरी में जा ही चुका है, अब मनमोहन सिंह अपनी थोड़ी सी बची-खुची इज्जत को कूड़ेदान में जाने से बचा लें।

इसे बकवास कहना काफी न होगा राहुल

27 सितंबर 2013
विशेष संपादकीय
-सुनील कुमार
दिल्ली प्रेस क्लब में अचानक पहुंचे राहुल गांधी ने अपराधी बचाओ अध्यादेश को बेवकूफी भरा कहा और कहा कि इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए। उन्होंने इसे अपना निजी विचार कहा, लेकिन अपनी निजी जागीर के मामलात में किसी के विचारों में क्या निजी हो सकता है? उन्होंने अपनी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के लाए इस अध्यादेश को जिस तरह से खारिज किया है, उसे देखकर बहुत से सवाल खड़े होते हैं, जो कि इस अध्यादेश से परे के हैं, और जो कई किस्म के शक भी पैदा करते हैं।
दागी-अपराधी सांसदों-विधायकों को बचाने के लिए लाया गया यह अध्यादेश किस कदर, किस दर्जे का जुर्म है, इस पर हमने कल ही संपादकीय लिखा था। और उसमें हमने लोकतंत्र के एक हिस्से की मौत पर दो मिनट मौन रखकर श्रद्धांजलि देने की राय दी थी। इस संपादकीय को पढ़कर गांधी के वंशज और शांतिप्रिय गांधीवादी तुषार गांधी ने कल ही ट्विटर पर लिखा कि अब दो मिनट मौन नहीं, संसद पर हथगोले फेंकने का वक्त आ गया है।
अब जब गांधीवादी लोग भगत सिंह की तरह सोचने को मजबूर हो गए हैं, जब लोकतांत्रिक चुनावों से चुनी गई सरकार के खिलाफ हथगोले की सोचने लगे हैं, तब राहुल गांधी एक नाटकीय अंदाज में आकर अपने आपको यूपीए सरकार के जुर्म के खिलाफ स्थापित करते हैं। यहां पर कई सवाल खड़े होते हैं।
क्या यह राहुल गांधी को एक बहुत ही शरीफ, भला नीयत वाला नेता स्थापित करने के लिए किया गया नाटकीय काम है? क्या यह सरकार को बुरा बताकर राहुल गांधी को भला बताने की सोची-समझी साजिश थी? अगर ऐसा कभी सामने आया तो भी हमको हैरानी नहीं होगी। हिंदी फिल्मों में पहले से तय गुंडा हीरोइन का पर्स छीनकर भागता है, और फिर हीरो उसे पीटकर पर्स लाकर देता है। भारतीय राजनीति में ऐसे सोचे-समझे काम पहले भी हुए हैं। जरा सा ध्यान से देखें तो सोनिया गांधी अपनी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के साथ कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ खड़ी दिखती रही हैं। वे सारे ही मुद्दे व्यापक जलकल्याण के, जनहित के, और साथ-साथ लुभावने भी, मुद्दे थे। उनको लेकर सोनिया की छवि गरीबों की हिमायती की बनी, और मनमोहन सिंह पूंजीवादी खलनायक की तरह पेश आए। लोगों को याद होगा कि किस तरह राजीव गाँधी ने अपनी दो घंटे की एक प्रेस कांफ्रेंस में अपने विदेश सचिव को कुर्सी से हटा दिया था आज राहुल गाँधी ने अपनी दो मिनट की प्रेस कांफ्रेंस में अपने प्रधानमंत्री को हटा दिया है।  ऐसे कई मौकों पर भी सोनिया और उनकी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सामाजिक कार्यकर्ता विजेता की तरह साबित हुए, या साबित किए गए।  राहुल की आज की मुनादी से एक और बात उठती है, वह यह कि क्या इस पार्टी में दायें हाथ को यह पता नहीं है कि बायाँ हाथ क्या कर रहा है?  
क्या राहुल गांधी की मनमोहन-मंत्रिमंडल को यह फटकार उसी तरह की छवि-सुधारो-अभियान की कड़ी है, या एक भले अधेड़-नौजवान की सचमुच की भड़ास है, यह कहना मुश्किल है। लेकिन इसे अगर हम बिना किसी शक के मंजूर करें, तो हमको राहुल की बात अच्छी लगी क्योंकि कल के हमारे अखबार में हमने यही बात लिखी थी। मुजरिमों से भरी पार्टी और सरकार में अगरे आज राहुल गांधी के फट पडऩे के बाद भी अगर कोई फेरबदल आ सकता है, तो भी उसमें क्या बुराई है? डाकू से भला बनने की शुरूआत कभी भी हो, कहीं से भी हो। 
लेकिन राहुल गांधी, और उनकी मां सोनिया गांधी को भी आज के इस विरोध के बाद यह भी साबित करना होगा कि उनके सिद्धांत इस अध्यादेश से परे भी अपराध-विरोधी हैं। आज तो उनकी पार्टी को मुजरिमों से कोई परहेज दिखता नहीं। हर किस्म के मुजरिम कांगे्रस टिकट पाकर विधानसभा और लोकसभा लड़ रहे हैं, और आगे लडऩे के लिए अपने हथियारों में तेल डालकर तैयार बैठे हैं। सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी और सवा सौ बरस से अधिक पुरानी पार्टी, इसके बाद भी कांगे्रस को बेदाग उम्मीदवारों का टोटा पड़ा दिखता है। ऐसे दागी जब तक देश की आखिरी अदालत से बेकसूर साबित न हो जाएं, तब तक क्या उनकी जगह कोई शरीफ सोनिया-राहुल की पार्टी को नहीं मिलता? आज राहुल अगर देश भर में अपराधी-अध्यादेश के विरोध को देखकर इसे बकवास बता रहे हैं, तो उनके आनेवाले चुनावों में अपने को इस बयान के प्रति ईमानदार भी साबित करना होगा। पांच राज्यों के चुनाव में उनकी पार्टी कुछ सौ गैर-दागी, गैर-मुजरिम उम्मीदवार ढूंढ पाते हैं या नहीं, इसको देखना होगा। राहुल-सोनिया की पार्टी में अपराधियों को किनारे किया गया हो, ऐसा लगता नहीं है, और आने वाले महीनों में कांगे्रस उम्मीदवारों के चेहरे, राहुल की आज की मासूमियत को असली या नकली साबित करने को काफी होंगे। अपराधी बचाने का यह अध्यादेश वापिस लेना काफी नहीं होगा। 
फिलहाल, जैसा कि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत सुझाता है, हम राहुल गांधी को संदेह का लाभ देते हुए उनकी नीयत को ईमानदार और अपराध-विरोधी मानते हैं। और आगे राह देखेंगे कि वे अपने-आपको अपराध-विरोधी साबित भी करें।  ऐसा न होने पर कांगे्रस के अपराधी-दागी उम्मीदवार यही साबित करेंगे कि यह राहुल-सोनिया की छवि अच्छी बनाए रखने की कवायद भर थी। आज लाख रुपये का सवाल यह है कि क्या इस अध्यादेश को लाने वाले मंत्रिमंडल के मुखिया मनमोहन सिंह इसके बाद भी क्या फेविकोल का इश्तहार बने रहेंगे?

यह तस्वीर बहुत उदासी पैदा करने वाली है...

27 सितंबर 2013
संपादकीय
आंध्र में जगनमोहन रेड्डी जमानत पर जेल के बाहर आया तो प्रशंसक और समर्थक टूट पड़े। इसके पहले भी सोलह महीनों तक जगन जेल में था, उसके पिता के राज में उसका साथ देने वाले कई मंत्री सीबीआई के घेरे में थे, और जनता जगन के साथ थी। जगन की मां, बीवी, बहन, आंध्र का दौरा करते थे और लोग उमड़ पड़ते थे। जगन के खिलाफ उसके पिता के राज में अपनी कंपनियों के लिए हजारों करोड़ जुटाने के मामले हैं, सीबीआई अदालत में है, लेकिन जनता जगन के साथ है। पिता वाईएसआर रेड्डी कांगे्रसी मुख्यमंत्री थे जिसके राज में सत्ता के बेजा इस्तेमाल से जगन ने हजारों करोड़ बनाए, पर जनता इस कदर उसके साथ है कि कांगे्रस भी जगन के चुनावी साथ के फेर में है।
तो ऐसे में देश-प्रदेश को लूटने पर जनता क्या सोचती है?
यह बात सिर्फ जगन मोहन रेड्डी की नहीं, पूरे हिंदुस्तान की है। छत्तीसगढ़ में ही जिनके बारे में सैकड़ों करोड़ की कमाई की चर्चा रहती है, जनता उनके साथ है, उनका चुनाव जीतना तय है, और वो तो अभी अनुपातहीन संपत्ति में जेल भी नहीं गए हैं। उत्तरप्रदेश की जनता अनुपातहीन संपत्ति वाले माया-मुलायम के साथ है, बिहार में वह चारा प्रसाद के साथ है, तमिलनाडु में वह उस जयललिता के साथ है जिसके भ्रष्टाचार के मुकदमे राज्य के बाहर ले जाने पड़े। रिश्वत की सीडी और मुकदमे के चलते हिमाचल में जनता फिर वीरभद्र सिंह के साथ है।
तो आखिर जनता की सोच क्या है? भ्रष्टाचार के हिमायती नेता पौराणिक काल से कहते आए हैं कि भ्रष्टाचार किसी चुनाव में मूल मुद्दा नहीं रहता। तो फिर भ्रष्टाचार से दिक्कत है किसको? कुछ सिरफिरे विचारकों को? कुछ जिद्दी ईमानदारों को?
चुनावों में सबसे भ्रष्ट की सबसे बड़ी रकम आमतौर पर नतीजा खरीद लेती है। कुछ नतीजे न भी बिक पाते होंगे, लेकिन संसद या विधानसभा की बहुत सी सीटें जनता को रिश्वत देकर खरीदी जाती हैं। यही वजह है कि वामपंथियों को छोड़कर बाकी पार्टियों की टिकटों में भी करोड़पतियों-अरबपतियों का अनुपात तेजी से बढ़ चुका है। यही वजह है कि अब किसी को अपनी नाजायज दौलत से परहेज नहीं रह गया। न कमाने से, न दिखाने से, न खर्चने से। लेकिन कमाई और खर्च के अनुपात को देखें तो लगता है कि नेता ने शिकार की हड्डियों से चिपके गोश्त के कुछ टुकड़े जनता के लिए छोड़ दिए हैं, और जनता इसी में खुश है।
दरअसल लोगों में गरीबी और राजनीतिक नासमझी को इस कदर बनाए रखा गया है कि गरीब वोटर का बहुमत खरीदा जा सकता है। और अमीर वोटरों के अल्पमत को कोई परहेज नहीं रहता कि किन हाथों पर कितना लहू है, जब तक उनको नेता या पार्टी का रूख कारोबारी लगता है। गुजरात इस बात की मिसाल है जहां पर 2002 के दंगों के बाद मोदी दो बार जीतकर आए। जनता का धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण हो जाता हे, जाति के आधार पर धु्रवीकरण हो जाता है, और भारत की विविधता वाली सभ्यता किनारे बैठी रह जाती है।
इसलिए हिंदुस्तानी चुनाव जनता के रूख को भांपने की सबसे अच्छी मशीन होते हुए भी, अच्छी मशीन नहीं हैं। बात कुछ अटपटी लग सकती है लेकिन हकीकत यही है कि सबसे अच्छे में भी अच्छा कुछ नहीं है। देश की संसद ऐसे लोगों से बनती है जिनका बहुतायत संसद में नहीं होना चाहिए। बुरों में कम बुरे, लुटेरों में अधिक खुले हाथ वाले लुटेरे, धर्म और जाति में अधिक नफरत के आधार पर बंटवारा करवाने वाले, ऐसे लोगों की बहुतायत संसद और सरकार बनाती है। तो फिर लोकतंत्र किस तरह के लोगों द्वारा चुना गया किस तरह का तंत्र है? यह तस्वीर बहुत उदासी पैदा करने वाली है।
कल हमने इसी जगह लिखा था कि अपराधियों के बचाने वाले अध्यादेश का विरोध करते हुए जनता को दो मिनट मौन रखकर लोकतंत्र के एक हिस्से की मौत पर श्रद्धांजलि देनी चाहिए। उस पर महात्मा गांधी के वंशज और शांतिप्रिय गांधीवादी तुषार गांधी ने लिखा है- अब दो मिनट मौन नहीं, संसद पर हथगोले फेंकने का वक्त आ गया है...!

सपा की शर्मनाक गुंडागर्दी, लंबी नाम, शर्म जरा भी नहीं

26 सितंबर 2013
संपादकीय
कई समाचार चैनलों पर एक खबर देखें तो लगता है कि केन्द्र सरकार को गिरने से बचाने के एवज में समाजवादी पार्टी देश की राजधानी दिल्ली में परले दर्जे की गुंडागर्दी कर सकती है, और केन्द्र सरकार की पुलिस देश की राजधानी में सुप्रीम कोर्ट की नाक तले इसे अनदेखा कर सकती है। इस टीवी खबर को देखें तो एक दवा-दूकान में एक दवा न होने पर खरीदने आया ड्राइवर अपनी मालकिन से फोन पर दूकानदार की बात करवाता है जो कि गालियां बकना शुरू कर देती है। कुछ ही देर में उत्तरप्रदेश पुलिस की वर्दी में स्टेनगन लिए हुए लोग उस ड्राइवर के साथ आते हैं, और दवा दूकानदार को बुरी तरह मारते हैं। यह सब कुछ दूकान के वीडियो कैमरे पर रिकॉर्ड हुआ, फोन नंबर से पता लग गया कि वह समाजवादी पार्टी के सांसद मुलायम सिंह यादव के भाई, रामगोपाल यादव की बहू का है। इसके बाद दिल्ली पुलिस को लकवा मार गया।
सत्ता की गुंडागर्दी के लिए उत्तरप्रदेश और समाजवादी पार्टी खासे बदनाम हैं। अब अगर मुलायम कुनबे की बहुओं की ओर से उत्तरप्रदेश की हथियारबंद पुलिस देश की राजधानी के भरे बाजार में इस तरह गुंडागर्दी करते कैमरे पर कैद होती है तो यह शर्मनाक बात है। दिक्कत यह है कि यह दिल्ली पुलिस के लिए भी इतना ही शर्मनाक है कि वह इस जुर्म के हफ्ते भर बाद भी कोई कार्रवाई करने से मुंह चुराए। लेकिन उत्तरप्रदेश से लेकर केन्द्र सरकार तक, सरकारों के पास अब न शर्म रह गई है, न नाक रह गई है। इसलिए सत्ता की एक शर्मनाक वारदात के बाद दूसरी शर्मनाक वारदात के बीच कुछ दिनों का फासला भी नहीं रह जाता। कार्टूनिस्टों की नजर में मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक की जो लंबी, पैनी नाक दिखती है, वह है कहां?
केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा कि वीडियो कैमरों पर कैद और विभिन्न समाचार चैनलों पर आ चुकी इस गुंडागर्दी के बाद हो सकता है कि कोई अदालत दखल दे और दिल्ली पुलिस को उसकी साजिशी चुप्पी पर नोटिस जारी करे। अगर समाजवादी पार्टी के नेता यह समझते हैं कि उनकी और उनके कुनबों की ऐसी हरकतों के बाद भी उनके राज में उत्तरप्रदेश का विकास हो सकेगा, तो वे खुशफहमी में हैं। कोई भी कारोबार कारखानेदार या पेशेवर लोग ऐसे राज में काम करना क्यों चाहेंगे जहां सत्ता की ऐसी गुंडागर्दी चलती हो, जहां समाजवादी पार्टी के मंत्री रात-दिन साम्प्रदायिकता की बात करते हों? जहां ईमानदार अफसर सूली पर चढ़ाए जाते हों? जहां सत्ता की बददिमागी और बेदिमागी एक दूसरे से गलाकाट मुकाबला करते हों।
उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी समाजवाद के नाम पर कलंक साबित हो रही है। राम मनोहर लोहिया ने कभी ऐसे कुनबाकेंद्रित समाजवाद की कल्पना भी नहीं की होगी, कभी यह नहीं सोचा होगा कि उनका नाम लेकर समाजवाद की दूकान चलाने वाले लोग अनुपातहीन संपत्ति के मामले में अदालती कटघरों में चोर-सिपाही का खेल खेलेंगे।
यह मुलायम कुनबे की अनुपातहीन सम्पत्ति का मामला नहीं है, यह यूपीए सरकार की अनुपातहीन कमजोरी का मामला है, यह मुलायम जैसे लोगों पर यूपीए की अनुपातहीन बेबसी का मामला है। अनुपातहीन सम्पत्ति के साथ-साथ देश की सरकार पर अनुपातहीन शिकंजा और ऐसे में अपने घर के बच्चे के हाथ में उत्तरप्रदेश का झुनझुना। बेदिमागों को बददिमागी के लिए और क्या लगता है?

सुप्रीम कोर्ट को लात मारकर..., मुजरिमों का नागरिक अभिनंदन

25 सितंबर 2013
संपादकीय
केंद्र की यूपीए सरकार ने कल एक शर्मनाक काम किया है, दागी और मुजरिम करार दिए जा चुके सांसदों और विधायकों की सदस्यता खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए वह एक अध्यादेश ले आई है। अध्यादेश उन कानूनों के लिए लाया जाता है जिन पर किसी वजह से संसद के भीतर चर्चा न हो सकी हो, न हो पा रही हो, और जिन कानूनों को लाने की बहुत ही जरूरत हो। संसद का कानून बनाने का, उनमें संशोधन का विशेष अधिकार जब सरकार अपने इस संवैधानिक हक का इस्तेमाल करके छीनती है, तो यह माना जाता है कि वैसी किसी हड़बड़ी की जरूरत थी। आज जिस तरह मुजरिम सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया है, उससे दो बातें साबित होती हैं। एक तो यह कि अपने-आपको बचाने के लिए यूपीए सरकार को मुजरिम पार्टियों के मुजरिमों को बचाना जरूरी हो गया था, दूसरा यह कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लात मारने के लिए यूपीए सरकार के पास मुजरिम पार्टियों का जरूरत जितना साथ संसद के भीतर है। अगर ऐसा नहीं है, तो यह यूपीए के इस जुर्म को और भी परले दर्जे का जुर्म साबित करता है। 
इस देश में राजनीति की गंदगी को दूर करने के लिए, चुनावों से मुजरिमों को दूर रखने के लिए, जुर्म करने और कानून बनाने, दोनों का हक एक ही हाथों में रखने के मौजूदा इंतजाम को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वह पहल की थी जो कि इस देश में सरकारों और संसद को खुद करनी थी। लेकिन खरीद-फरोख्त पर जिंदा रहने वाली सरकारों को अब नगद भुगतान के बजाय जुर्म करते हुए कानून बनाने की रियायत का भुगतान यूपीए ने किया है, और उसके दाएं-बाएं जो बैसाखियां हैं, वैसे लालू-मुलायम, माया-डीएमके, इन सबको इस यूपीए-रहम की जरूरत थी। इसलिए अब झारखंड मुक्ति मोर्चा या अमर सिंह से नगद-सौदों के बजाय यह मुफ्त का सौदा यूपीए ने किया है। आज का दिन इस अध्यादेश के साथ निकला है, और यह हिंदुस्तान की राजनीति के लिए एक काला दिन है। एक वक्त इसी यूपीए की आज की मुखिया कांगे्रस पार्टी ने संसद में शाहबानो का अपने ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल से कत्ल किया था, और आज राजनीति में किसी भी तरह की ईमानदारी की किसी भी तरह की संभावना का कत्ल इस अध्यादेश से कर दिया है। उस वक्त शाहबानो को मारने के लिए भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा गया था, और आज मुजरिमों को बचाने के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा गया है। 
हम ऐसे किसी मामले में अध्यादेश लाने को भी एक बहुत बड़ा जुर्म मानते हैं, क्योंकि ऐसे मामले में संसद के भीतर चर्चा होनी चाहिए थी, और हमारे हिसाब से ऐसी चर्चा के बाद इस प्रस्तावित कानून को बुरी तरह निंदा करके पूरी तरह खारिज कर देना था। लेकिन अब सरकार में और उसके समर्थक-साथी दलों में शर्म और हिचक पूरी तरह खत्म दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट देश के संविधान के हिसाब से अगर सरकार और नेताओं को, संसद और विधानसभाओं को अगर एक सही राह दिखा रहा था, तो उसकी उंगली को इस अध्यादेश से मरोड़कर तोड़ दिया गया है। 
यह अध्यादेश इस देश के ईमानदार लोगों के मुंह पर थूकने के बराबर है। और इससे यह भी पता लगता है कि यूपीए और उसका साथ देने वाली पार्टियों में ईमानदारी का दीवाला निकल गया है, क्योंकि अब उनको मुजरिम साबित हुए लोगों को जारी रखने के लिए संविधान संशोधन की बेशर्मी भी जरूरी लग रही है। यूपीए में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित जिन लोगों के बारे में भी लोगों के मन में यह खुशफहमी थी कि उनमें शराफत है, उनकी खुशफहमी इस अध्यादेश के साथ खत्म हो जानी चाहिए। भारत की राजनीति के लिए यह फैसला गंदगी को बढ़ाने वाला है, और संसद की ताकत को मुजरिम गिरोह के बाहुबल सरीखा बताने वाला है। यह अध्यादेश संसद की कसौटी पर होकर ही आगे चलेगा, या खारिज हो जाएगा, लेकिन आज तो संसद के भीतर की अग्निपरीक्षा से बचकर यूपीए ने अपने प्यारे मुजरिमों को यह तोहफा दे ही दिया है। इस पर जनता को दो मिनट मौन रखकर लोकतंत्र के एक हिस्से की मौत पर श्रद्धांजलि देनी चाहिए।

बात की बात, Bat ke bat

24 sept 2013

जनरल वी.के. सिंह की गद्दारी

संपादकीय
24 सितंबर 2013
अभी-अभी रिटायर हुए थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह पहले तो सरकार विरोधी आंदोलन में अन्ना हजारे के साथ आए और फिर बीजेपी के साथ आ गए। इस तेज रफ्तार से सेनाध्यक्ष अगर राजनीति में आएंगे, और अगर मुल्क के राज को लेकर उनका हाजमा कमजोर होगा, तो वे तबाही का सैलाब लेकर आएंगे। बाकी बातों को छोड़ भी दें तो पिछले दो दिनों में उनकी कही दो बड़ी खतरनाक बातों पर देश के जिम्मेदार लोगों को बड़ी फिक्र होना जरूरी है। उन्होंने अपनी बनाई हुई एक फौजी-खुफिया यूनिट के बारे में कहा कि उसने देश के बाहर ऑपरेशन किए। दूसरी बात उन्होंने कही कि सेना कश्मीर के अधिकतर मंत्रियों को पैसे देती है जो कि जनहित के कामों के लिए दिए जाते हैं। कश्मीर की सरकार ने वीके सिंह के इस आरोप को गलत ठहराया है। जनरल सिंह ने नाम लेकर एक आंदोलन का कहा कि उसे सेना ने पैसे दिए, चलाया। उन्होंने कश्मीर में स्थिरता के लिए सेना द्वारा खर्च करने की बात कही।
हिंदुस्तान को लोकतांत्रिक इतिहास में देश को इतना नुकसान पहुंचाने वाले रिटायर्ड फौजी कम ही रहे होंगे। ऐसा नहीं है कि थलसेनाध्यक्ष रहने के बाद भी वी.के. सिंह कश्मीर की नाजुक हालत को न जानते हों। उनकी बात को अगर सच भी मान लें, तो सेना खुफिया तरीके से कश्मीर में अमनचैन के लिए खर्च करती आई है। अगर उन्होंने खुद भी ऐसा किया है, तो आज महज भाजपा में आ जाने भर से वे ऐसे खुफिया राज उगलने लगेंगे? नारों से परे की मामूली समझ रखने वाले भी यह समझते हैं कि भारत-पाक की सरहद पर बसे कश्मीर का मामला भारत के बाकी राज्यों से अलग है। वहां तो भारत की सरकारें फौजी जरूरतों के मुताबिक भी कई किस्म की राजनीतिक और नागरिक रियायतें करती आई हैं। विदेश नीति और फौजी जरूरतों के ऐसे बारीक पहलुओं से नरेन्द्र मोदी तो नासमझ हो सकते हैं, लेकिन रिटायर्ड थलेसनाध्यक्ष नहीं। और ऐसा आदमी आज चुनावी राजनीति के चलते अगर देश को नुकसान पहुंचाने वाले राज उजागर कर रहा है, तो भाजपा को अपने इस नए सितारे को राष्ट्रवाद की अपनी कसौटी पर कसना चाहिए। एक चुनाव के पहले केंद्र की सरकार को नीचा दिखाने की जनरल सिंह की कोशिश तो चली ही आ रही थी, अब अस्थिरता और हमलों को झेल रहे कश्मीर पर रिटायर्ड फौजी भी हमला करने लगे तो यह एक घटिया बात है, गद्दारी है।
फौज की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने के बाद कोई भी देश के लिए शर्मिंदगी खड़ी करने वाली ऐसी नौबत ला सकता है। वीके सिंह यही घटिया काम कर रहे हैं। जिन लोगों को पारदर्शिता हर मामले में हर हद तक सुहाती है, वे यह सोचें कि क्या अपनी निजी जिंदगी को वे बिग बॉस टीवी शो की तरह कैमरों और माइक्रोफोन के सामने उजागर कर सकते हैं? क्या वे पारदर्शी पॉलीथीन का तौलिया लपेटकर सड़क पर घूम सकते हैं? दुनिया के हर लोकतंत्र में सरकारों के अपने राज रहते हैं। इनमें से राष्ट्रीय सुरक्षा के राज सरकारों की आवाजाही से उजागर नहीं किए जाते। जनरल सिंह आज न पिछली सरकार में हैं, न अगली सरकार में। इसलिए उनके भांडाफोड़ से भाजपा अलग बैठकर मजा ले रही है। लेकिन कश्मीर के हर मंत्री को पैसे देते आई है तो इस पर जवाब देने के लिए भाजपा भी जिम्मेदार है जो सरकार चला चुकी है। एक बार फिर सरकार पर आने के लिए अगर भाजपा संवेदनशील खुफिया जानकारी का ऐसा चुनावी इस्तेमाल कर रही है, तो इससे उसका राष्ट्रवाद भी हैरान हो रहा होगा कि उसके नामतले यह क्या हो रहा है।
आज यह वक्त भी है कि सेना के आला अफसरों, खुफिया एजेंसियों के बड़े अफसरों के रिटायर होने के बाद राजनीति में आने पर रोक लगाने पर सोचना चाहिए। जनरल सिंह ने सेना के राज उजागर करके या झूठ बोलकर देश के साथ गद्दारी की है, एक घटिया काम किया है। उनकी बातों से देश की शांति और सुरक्षा खतरे में पड़ रही है। भाजपा के अपने राष्ट्रवाद के साथ जनरल सिंह को एक बार और तौलना चाहिए।

...तो हिन्दुस्तान कई कीनिया और कई पाकिस्तान देखेगा..

संपादकीय
23 सितंबर 2013
एक ही दिन में दो खबरें दिल दहला रही थीं। अफ्रीका के कीनिया में इस्लामी आतंकी एक मॉल में घुसकर गैरमुस्लिमों को छांट-छांटकर मार रहे थे, और अब तक शायद पौन सौ लोग मारे जा चुके हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान के पेशावर में कल एक ईसाई चर्च पर हुए इस्लामी आतंकी हमले में भी पौन सौ से अधिक लोग अब तक खत्म करार दिए गए हैं। ये दोनों ही मामले इस्लामी आतंकी संगठनों के हैं। बहस के लिए यहां पर कोई कह सकता है कि ये इस्लाम की नसीहत और सीख पर बने हुए संगठन नहीं हैं, और मजहब का सिर्फ नाम लेते हैं। लेकिन जब मजहब के नाम पर चारों तरफ ऐसे बहुत से हमले होते हैं, ऐसे बहुत से आतंकी संगठन खड़े हो जाते हैं, तो उनको पूरा मजहब न मानते हुए भी, उस मजहब से जुड़े हुए लोगों के बनाए हुए संगठन तो मानना ही पड़ता है। यह भी सोचना पड़ता है कि किसी एक मजहब, या किसी भी धर्म का नाम लेकर लोग कितने हमलावर हो सकते हैं, कितने हत्यारे हो सकते हैं। और उस मजहब के तहत ऐसे कातिलों के बने रहने की कितनी गुंजाइश मजहब के बाकी लोग दे सकते हैं, उन देशों का कानून उन्हें कितना बर्दाश्त कर सकता है, कब तक खुला रख सकता है।
यह बात सिर्फ इस्लाम का नाम लेकर जिहाद छेडऩे वालों की नहीं है, दूसरे धर्मों में भी कम या अधिक पैमाने पर इस तरह की बातें होती हैं, और हो सकता है कि उनमें लहू कम बहता हो या अधिक बहता हो, तबाही कम होती हो, या अधिक होती हो, लेकिन ऐसे धर्म कम नहीं है जो अपने आपको किसी देश या दुनिया के कानूनों से ऊपर मानते हों, और लोकतंत्र को नकार देते हों। आज न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि दुनिया के बहुत से लोकतांत्रिक देश धर्मान्धता की हिंसा के खतरे से गुजर रहे हैं। इसमें पश्चिम के बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर लोकतांत्रिक-सामाजिक उदारता के साथ धार्मिक कट्टरता का टकराव चले आ रहा है, और भारत सहित ऐसे कई देश अपने लोकतंत्र के भीतर ऐसी कट्टरता से निपटना मुश्किल पा रहे हैं। 
कुछ लोग इसे संस्कृतियों का टकराव कहते हैं, लेकिन बात संस्कृतियों और पीछे तक जाती है, और ऐसी धार्मिक मान्यताओं पर पहुंच जाती है, जिनके साथ लोकतंत्र का सहअस्तित्व खासा मुश्किल है, असंभव भी है। जब धार्मिक मान्यताओं के आधार पर लोग अपने अलग और खास लोकतांत्रिक अधिकारों का दावा करने लगते हैं और अपने अधिकारों को दूसरों के अधिकारों से ऊपर करार देने लगते हैं, तब जो टकराव होता है, उसे सिर्फ संस्कृतियों का टकराव कहना ठीक नहीं होगा। भारत में हमने गांधी को मारने से लेकर, बाबरी मस्जिद गिराने तक, शाहबानो को मारने तक, स्वर्ण मंदिर में भिंडरावाले के डेरे तक, इंदिरा गांधी की हत्या तक, गुजरात के दंगों तक, बहुत से ऐसे मामले देखे हैं, जिनमें लोगों ने अपने धार्मिक अधिकारों को न सिर्फ दूसरों के धार्मिक अधिकारों के ऊपर माना, बल्कि देश के लोकतंत्र के, और संविधान के भी ऊपर माना। ऐसे में धार्मिक टकराव और साम्प्रदायिक तनाव को रोकना खासा मुश्किल हो जाता है। 
आज कीनिया और पाकिस्तान में हुए इन हमलों को भारत के पुराने हादसों से जोड़कर भी समझने की जरूरत है। कश्मीर से जिस तरह कश्मीरी पंडितों को भगाया गया, और जो आज भी शरणार्थियों की तरह दिल्ली में रह रहे हैं, अपनी जमीन पर लौट नहीं पा रहे हैं। जिस तरह पंजाब के आतंक के दिनों में बसों और रेलगाडिय़ों से हिन्दुओं को उतारकर कतार में खड़ा करके एक साथ भून दिया जाता था, उसके सबक को आज याद रखने की जरूरत है। ऐसे और भी मामले जगह-जगह हिन्दुस्तान में हुए हैं, और हो रहे हैं। आज जरूरत दुनिया और इस देश में एक ऐसी वैज्ञानिक-लोकतांत्रिक सोच की है जो कि लोगों को लोकतंत्र के भीतर अपनी धार्मिक आस्था के साथ बिना हिंसा के जीना सिखा सके। धार्मिक-आतंकियों को यह भी समझना चाहिए कि वे अपनी ऐसी हरकतों से अपने देश पर दुनिया के ताकतवर गुंडा-देशों को कब्जे का न्यौता भी देते हैं। इनको यह भी समझना चाहिए कि अपने धर्म के नाम पर हिंसा करके वे अपने धर्म की बेइज्जती भी करवाते हैं, और उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती। 
कीनिया और पाकिस्तान के हमलों को उन देशों का मामला मानकर हिन्दुस्तान अगर उनकी अनदेखी करेगा, तो यह सबक से परहेज के बराबर होगा। हमने अभी-अभी उत्तरप्रदेश में धार्मिक आधार पर बड़े पैमाने पर न सिर्फ हिंसा और कत्ल देखे हैं, बल्कि हैवानियत कहा जाने वाला वह दर्जा भी हिंसा का देखा है, जिसे लोग इंसान का मानने से ही मना कर देते हैं। उत्तरप्रदेश में जिस तरह लोगों ने दूसरे धर्म के लोगों को मारा है, वह खूंखार तौर-तरीका तो कीनिया और पाकिस्तान के इन बड़े दिखते और लगते हमलों में भी सामने नहीं आया है। जब लोग अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को भी टुकड़े-टुकड़े कर दें, तो उसे सिर्फ मौत के आंकड़ों में गिनना खतरनाक हकीकत की अनदेखी होगी। आज हिन्दुस्तान अपने मौजूदा चुनावी-राजनीतिक माहौल के चलते कई किस्म के अनदेखे और अनसुने खतरों की तरफ भी बढ़ रहा है। आने वाले दिन कई किस्म की नई नफरत की फसलों के हो सकते हैं। इसलिए कीनिया और पाकिस्तान के खतरों को वहीं के मौत के आंकड़े मानकर खबरों के अगले दिन भुला देना ठीक नहीं होगा। और भारत अलग-अलग कई धर्मों, बोलियों, सम्प्रदायों और क्षेत्रीयता से भरा हुआ है, यहां पर सांस्कृतिक विविधता भी इतनी अधिक है कि उन्हें कोई टकराव मानना चाहे, तो कदम-कदम पर टकराव ही टकराव हो सकते हैं। और यह नौबत किसी राष्ट्रीय एकता परिषद में सुलझाने की नहीं है, इसके लिए ऐसी किसी बैठक के बाहर की हवा में घुले हुए, और घोले जा रहे जहर से निपटना पड़ेगा, और इसके लिए देश की धर्मनिरपेक्ष और सुधारवादी ताकतों को साथ आना पड़ेगा। यह ऐसा वक्त है जब वोटरों के बाहुबल के बिना भी वामपंथी दल अगुवाई करने की एक समझ रखते हैं, हक रखते हैं। अगर वामपंथियों द्वारा हमेशा से अमल में लाई जा रही धार्मिक उदारता और बराबरी की अहमियत आज नहीं समझी गई, तो हिन्दुस्तान कई कीनिया और कई पाकिस्तान देखेगा। 

आज की बात सोचने का सामान छोड़कर जा रही है

22 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत के महाधिवक्ता मोहन पाराशरण ने सुप्रीम कोर्ट में रामसेतु को लेकर सरकार की ओर से खड़े होने से इंकार कर दिया है। उन्होंने अदालत को यह बतला दिया है कि उनकी आस्था भगवान राम में है, और उन्होंने इस पुल का उपयोग किया था इसलिए वे इस मामले में इसके खिलाफ सरकार की तरह से पैरवी नहीं करेंगे। ऐसी खबर है कि सरकार ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक दूसरे बड़े वकील राजीव धवन को खड़े होने के लिए कहा है। 
अदालती पेशे को लेकर आज यहां चर्चा की जरूरत इसलिए है कि आसाराम का मुकदमा लडऩे की वजह से देश के सबसे बड़े वकीलों में से एक राम जेठमलानी की चारों तरफ आलोचना हो रही है। उनकी अधिक आलोचना इस वजह से हो रही है क्योंकि उन्होंने आसाराम पर आरोप लगाने वाली नाबालिग लड़की के बारे में बहुत ही अपमानजनक और आपत्तिजनक बातें कही हैं। लेकिन यह पहला मौका नहीं है जब राम जेठमलानी ने बहुत ही खराब किस्म के अपराधी समझे जाने वाले लोगों का मामला लिया हो। इंदिरा-राजीव के हत्यारों से लेकर, कई तरह के बलात्कारियों, दंगाईयों, और तस्करों के मामले वे लड़ते आए हैं। ऐसे में वे जिस भाजपा में लंबे समय तक रहे, उसे भी कई बार दिक्कत झेलनी पड़ी। 
हमारा यह मानना है कि एक वकील को अपने काम के सिलसिले में जितने किस्म की तिकड़म करनी पड़ती है, वह वकालत के लिए तो बुरी नहीं होती, लेकिन अगर वकील किसी राजनीतिक दल से जुड़ा है, तो उस पार्टी को दिक्कत हो सकती है। इसे हम वकालत के पेशे की बेईमानी या उसमें कुछ गलत काम करना नहीं गिनते, लेकिन वकालत से परे का जो पहलू किसी व्यक्ति से जुड़ा हुआ है, उसके हिसाब से वह काम गलत कहा जा सकता है। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान पर हमला करने वाला आतंकी अजमल कसाब भी अच्छी पैरवी का हकदार था, और कुछ वकीलों ने अगर अपनी निजी विचारधारा और सिद्धांतों के चलते उसका केस नहीं लिया था, तो भी कुछ दूसरे वकील उसके लिए तैयार थे। यह मामला कुछ उसी तरह का है कि गोलियों से जख्मी होकर कोई मुजरिम भी अगर किसी डॉक्टर के पास पहुंचे तो उसे इलाज का हक रहता है, और उसका इलाज करना डॉक्टर की जिम्मेदारी रहती है। इसलिए जेठमलानी के केस लडऩे में हमको कोई बुराई नहीं लगती, और वे अगर अपने मुवक्किल आसाराम को बचाने के लिए नाबालिग आरोपी लड़की के खिलाफ सौ किस्म की बातें करते हैं, तो यह भी उनकी वकालत का हिस्सा है, और इसी वजह से इस पेशे को कुछ लोग खराब भी मानते हैं।
आज जिस बात से इस पर लिखना शुरू किया, उसे देखें, तो राम और रामसेतु पर आस्था रखने वाले वकील ने सरकार का केस लडऩे से अगर इंकार कर दिया है, तो यह ईमानदारी की बात है। अपनी खुद की आस्था के खिलाफ कोई काम करना भी नहीं चाहिए। कुछ महीने पहले कर्नाटक में एक जैन मंत्री ने मछली पालन विभाग का काम संभालने से मना कर दिया था कि वह काम उनकी निजी धार्मिक आस्था के खिलाफ है। लोगों को यह समझना चाहिए कि अगर सरकारी या संवैधानिक जिम्मेदारी किसी को ऐसी जगह बिठाती है कि वहां पर उसे ही अपनी आस्था के खिलाफ भी काम करना जरूरी हो, तो एक अलग बात है। लेकिन जहां आस्था के खिलाफ काम करने की नौबत आए, और दूसरे लोग उसके लिए मौजूद हों, वहां पर लोगों को पीछे हट जाना चाहिए। न सिर्फ वकील को, बल्कि जज को भी ऐसे मामले से अपने को अलग कर लेना चाहिए जिसमें उनकी आस्था उनके विवेक पर हावी हो, और उनके फैसले को प्रभावित करने की हालत में हो। लोगों को अपनी निजी आस्था के खिलाफ जाकर आधे-अधूरे मन से कुछ करना भी नहीं चाहिए। कल ही यह खबर भी आई हैै कि पोप ने कैथोलिक डॉक्टरों से यह कहा है कि वे गर्भपात न करवाएं। हमारा मानना है कि अगर जान बचाने के लिए ऐसा करना किसी समय जरूरी हो, और वही एक डॉक्टर मौजूद हो, तो उसे धर्म के बजाय पेशे के सिद्धांतों को अधिक मानना चाहिए, और अगर ऐसी नौबत न हो, तो डॉक्टर अपने को ऐसे काम से अलग भी कर सकते हैं।
और इसी के साथ-साथ राम जेठमलानी जैसे लोगों को देखकर यह भी समझना चाहिए कि किस तरह लोग अपने पेशे को किसी भी नीति-सिद्धांत से अलग रखकर सिर्फ अपने काम को करने में जुट जाते हैं, फिर चाहे वह काम किसी हैवान दिखते इंसान को बचाने के लिए किसी घायल के जख्मों पर नमक छिड़कने का ही क्यों न हो। पेशे की जरूरत, और इंसानियत की जरूरत कभी-कभी अलग भी हो सकती है, और कुछ लोग इन दोनों को अलग-अलग करके अपनी पसंद का रास्ता तय कर सकते हैं। आज की यहां की बात किसी एक राह को सुझाने वाली नहीं है, यह बात सोचने का सामान छोड़कर खत्म हो रही है।

बाबा की बेबुनियाद बकवास और हरकारे जैसा मीडिया...

21 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत से ब्रिटेन पहुंचे बाबा रामदेव को वहां पर अफसरों ने कई घंटों तक पूछताछ के लिए रोका, उनकी तलाशी ली, और पहली खबरों में यह आया है कि उनको आज भी जांच के लिए बुलाया गया है। इस बारे में रामदेव का पहला ही बयान यह था कि उन्हें क्यों रोका गया इस बारे में सोनिया गांधी से पूछा जाए, उन्हीं को मालूम होगा। अभी तक ऐसा आरोप सोनिया गांधी पर नरेन्द्र मोदी ने भी नहीं लगाया था, जिनको 2002 के दंगों के बाद से अब तक अमरीका का वीजा नहीं मिला है। उन्होंने भी, या उनकी पार्टी ने भी इसकी तोहमत सोनिया गांधी पर नहीं लगाई। और कल आई एक राजनीतिक खबर अगर सही है, तो नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी की एक दिग्गज नेता, लोकसभा में विपक्ष की नेता, सुषमा स्वराज के उस बयान पर नाराजगी जाहिर की है, जिसमें सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा फिर उठाया गया है।
पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले जब मध्यप्रदेश में आसाराम को गिरफ्तार करने की कार्रवाई चल रही थी तो उसने खुलकर मीडिया से यह कहा था कि इसके पीछे मां-बेटे हैं। इसके पहले बहुत से मौकों पर रामदेव और आसाराम सोनिया गांधी का नाम ले-लेकर आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन जो मीडिया इनके रूबरू हो पाता है, वह इनसे सिर्फ इस सनसनीखेज लाईन को लेकर संतुष्ट हो जाता है, और उनसे यह बहुत जरूरी और जायज सवाल किए बिना लौट आता है कि ऐसे निजी और गंभीर आरोप को लेकर उनके पास क्या सुबूत हैं? मीडिया अपने काम को किसी कूरियर एजेंसी के काम जैसा मान बैठा है कि किसी एक के दिए लिफाफे को दूसरे तक पहुंचाना। इसी अंदाज में मीडिया एक बयान को अपनी अक्ल का इस्तेमाल किए बिना पाठकों तक पहुंचा देता है, और फिर उसका जवाब दूसरी ओर से आने पर उसे भी लोगों तक पहुंचा देता है। इसे मीडिया के कुछ लोग अपनी निष्पक्षता मान लेते हैं, और करार देते हैं। हकीकत यह है कि अक्ल को किनारे रखकर एक कलम या माईक्रोफोन, या कैमरा, किसी तरह से पत्रकारिता नहीं कर सकते। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए अपनी अक्ल और अपने सामाजिक सरोकार का इस्तेमाल भी करना पड़ेगा, इसके बिना वह सिर्फ हरकारे जैसा हो जाएगा, हो चुका है।
अब वक्त आ गया है कि मीडिया के पाठक और दर्शक यह सवाल करें कि तथ्यों को पेश करते हुए भी, पाठक और दर्शक की बहुत अस्वाभाविक जिज्ञासा को मीडिया जरूरत की जानकारी क्यों नहीं देता? क्यों बाबा-बापू-अन्ना-केजरीवाल से यह पूछता कि उनके पास आरोपों के समर्थन में कौन से सुबूत हैं, कौन से तथ्य हैं? बेबुनियाद बातों को लेकर अपने खुद के पापी-पेट को चलाना मीडिया ने पहले अपनी बेबसी की तरह पेश किया था, अब यह उसकी आदत हो गई है। मीडिया को करीब-करीब मुफ्त में पाने के शौकीन ग्राहकों को भी यह समझना चाहिए कि अगर वे जिम्मेदार मीडिया चाहते हैं, सच को पढऩा चाहते हैं, शब्दों के बीच छुपी हुई हकीकत को देखना चाहते हैं, तो उनको अच्छे, जिम्मेदार मीडिया, और बुरे, गैरजिम्मेदार मीडिया के बीच फर्क करना होगा। आज भगवा कपड़े पहने हुए एक आदमी रात-दिन गैरजिम्मेदारी की बातें करता है, और मीडिया उसे तश्तरी में पेश कर देता है, बेच देता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और मीडिया से भी उसके काम को लेकर सवाल होने चाहिए। 

फौज की मनमानी को लेकर आई खबरें, जनता को जानने का हक

संपादकीय
20 सितंबर 2013
दिल्ली में आज एक प्रमुख अखबार इंडियन एक्सप्रेस में यह रिपोर्ट छपी है कि पिछले थलसेनाध्यक्ष वी.के. सिंह ने सेना की खुफिया यूनिट का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर में सरकार पलटने की कोशिश की थी। इस यूनिट को जनरल सिंह ने ही खड़ा किया था, और इसके बारे में कई आरोप सामने आए हैं कि किस तरह इसने गड़बडिय़ां कीं, और सिंह के बाद थलसेनाध्यक्ष बनने की संभावना रखने वाले जनरल बिक्रम सिंह को रोकने की कोशिश की। यह खबर इसलिए बहुत गंभीर है कि भारत के लोकतंत्र में सेना की जगह निर्वाचित राजनीतिक प्रक्रिया के मातहत, उसके कहे मुताबिक ही काम करने की है, न कि अपनी मर्जी से कुछ करने की। भारत का लोकतंत्र इसी आधार पर गढ़ा गया है, और चल रहा है कि यहां सेना की कोई राजनीतिक महत्वाकाक्षाएं न रहें। 
दरअसल इस खबर के आने का वक्त कुछ ऐसा है कि लोगों को यह शक होता है कि केन्द्र की यूपीए सरकार ने भाजपा के नरेन्द्र मोदी के साथ अभी आमसभा में मंच पर जाने वाले जनरल वी.के.सिंह के खिलाफ किसी साजिश के तहत ऐसी कोई खबर लीक की हैं, या ऐसी कोई जांच बैठाई है जिससे कि मोदी के इस फौजी साथी को नीचा देखना पड़े। लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले भी एक बार इंडियन एक्सप्रेस ने ही जनरल सिंह के खिलाफ एक बड़ी रिपोर्ट इसी तरह की छापी थी कि कैसे वे सेना में एक बगावती बेचैनी के पीछे थे, और किस तरह उनके उकसावे पर फौज की एक टुकड़ी दिल्ली की तरफ बढ़ भी गई थी। वह वक्त शायद जनरल सिंह का अन्ना हजारे के साथ जाने का था, और शायद उसी वक्त वे अपने बाद आने वाले थलसेनाध्यक्ष को लेकर कुछ असहमति भी रख रहे थे। 
भारतीय राजनीति में आज मीडिया का इस्तेमाल आम बात हो गई है, और इसके चलते मीडिया के अच्छे हिस्से ही ईमानदार मेहनत भी शक की नजर से देखी जाती है। इंडियन एक्सप्रेस ने पिछले एक-दो बरस में कुछ नाजुक मौकों पर ऐसी बड़ी धमाकेदार रिपोर्ट छापी हैं, जिनसे उस वक्त केन्द्र की यूपीए सरकार को मदद मिलते, या यूपीए के विरोधी लोगों को नुकसान पहुंचते दिखता था। अभी हम इस अखबार की नीयत पर शक नहीं कर रहे, क्योंकि आपातकाल के वक्त इसी अखबार ने इसी कांग्रेस पार्टी की प्रताडऩा सबसे अधिक झेली थी। रामनाथ गोयनका के वक्त से यह अखबार लड़ाकू तेवरों के साथ चलने वाला बना हुआ था, लेकिन हाल के बरसों में इसका रूख कभी-कभी लोगों को समझ नहीं भी आया। जिस तरह सरकार, विपक्ष, और राजनीति के फैसलों, और फैसलों के वक्त को लेकर लोगों के मन में शक होते हैं, उसी तरह मीडिया को लेकर भी शक नाजायज नहीं है। मीडिया का एक हिस्सा हमेशा से राजनीति का औजार या हथियार बनने में फख्र हासिल करते आया है, और भुगतान भी। इसलिए मीडिया के किसी अभियान के पीछे उसकी अपनी साख भी जरूरी होती है। 
जो लोग मीडिया के कामकाज के जानकार हैं, वे इस बात को समझते हैं कि जब ऐसी कोई बहुत बड़ी रिपोर्ट आती है, बहुत बड़ा सनसनीखेज भांडा फूटता है, तो उसके बाद बहुत से और खुलासे सामने आने की उम्मीद भी की जाती है। किसी एक मौके पर धमाकेदार खुलासे के बाद, उसे हवा में छोड़कर मीडिया अगर आगे बढ़ जाए, तो उसकी साख कमजोर भी पड़ती है, और उस ब्रांड के अलावा मीडिया के पूरे पेशे और कारोबार की साख भी मार खाती है। इसलिए जनरल वी.के. सिंह के बारे में आई हुई इस रिपोर्ट की और जानकारियां सामने आना जरूरी है। यह सरकार के लिए भी जरूरी है, और मीडिया के लिए भी जरूरी है। जनरल सिंह के लिए तो जरूरी है ही। देश के लिए किसी पार्टी के नफे-नुकसान से ऊपर यह बात है कि फौज सरकार से परे अपनी मर्जी के काम तो नहीं करने लगी है? हिन्दुस्तान में पाकिस्तान की जमीन से होने वाली किसी भी साजिश के पीछे वहां की फौज की खुफिया एजेंसी आईएसआई का नाम उसी तरह लिया जाता है, जिस तरह घर के किसी शरारती बच्चे का नाम किसी भी गलत काम के लिए जोड़ दिया जाता है। अब अगर हिन्दुस्तानी फौज के भीतर भी उसके जनरल की साजिश या मनमानी से, खुफिया यूनिट लोकतंत्र के खिलाफ काम करती है, तो यह मुद्दा मोदी या भाजपा की संभावनाओं से कहीं अधिक अहमियत रखता है, और खतरनाक है। इस देश को कुछ महीने पहले के सेना के बगावती रूख और कार्रवाई का दावा करने वाली रिपोर्ट पर भी आज तक सफाई नहीं मिली है, और यह दूसरी खतरनाक बात सामने आ गई है। लोकतंत्र ऐसी खतरनाक बातों पर जवाब के बिना नहीं चल सकता, इसलिए बेहतर यह होगा कि यूपीए सरकार इन दोनों घटनाओं को लेकर एक श्वेत पत्र सामने रखे। 

बात की बात, Bat ke bat

19 sept 2013

बाजार का हमला और इंसानी समझदारी

19 सितंबर 2013
संपादकीय
ट्विटर पर किसी एक धारदार सोच वाले ने लिखा है कि उसने आईफोन का नया मॉडल खरीदना तय कर लिया है, क्योंकि जिंदा तो एक किडनी के सहारे भी रहा जा सकता है। आज बाजार से नए-नए सामान खरीदने की दीवानगी देखने लायक है। जिनके पास अधिक पैसा है, उनके पास सामानों को लेकर एक अंतहीन बेचैनी भी है। और बाजार है कि अपने हमलावर तेवरों के साथ हर सुबह लोगों की जिंदगी में एक नई बेचैनी बो देता है कि उनके पास आज जो सामान हैं, वे अब पुराने पड़ चुके हैं, और उनसे अधिक खूबियों वाले नए सामान आ गए हैं।
इस नौबत के कई पहलू हैं। एक तो यह कि बिना जरूरत सामानों को बदलते चलने से धरती पर कई किस्म का प्रदूषण बढ़ता है और ऐसा कचरा या कबाड़ अगले दस-बीस हजार बरस तक के लिए धरती पर बढ़ जाता है। दूसरा पहलू यह कि लोग अपना बहुत सा वक्त नए सामानों को इंटरनेट पर, या बाजार में देखने में लगाते हैं, और इसकी उनको कोई असल जरूरत नहीं रहती, बाजार की बोई हुई बेचैनी का शिकार होकर लोग लगातार नए सामान देखते चलते हैं। और जो देश जितने अधिक संपन्न हैं, जितने अधिक हमलावर बाजार के शिकार हैं, वहां पर ऐसे नए सामानों के लिए ग्राहकों की कतारें उतनी ही लंबी लगती हैं। 
आज हालत यह है कि लोग अपने मौजूदा कैमरे, मौजूदा मोबाइल फोन, मौजूदा म्यूजिक प्लेयर की क्षमता का पांच फीसदी भी इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं, और उसे बदलने की जरूरत बाजार खड़ी कर देता है। लोगों के ऐसे डिजिटल उपकरणों और कम्प्यूटरों की क्षमता, उनकी खूबियां, ग्राहक ठीक से समझ भी नहीं पाते, और नई खूबियों के साथ, अधिक क्षमता के साथ एक नई बेचैनी पेश कर दी जाती है। नतीजा यह होता है कि लोगों के पास जो है, उसका मजा लेने के बजाय, उसकी खूबियों का फायदा लेने के बजाय, लोग एक स्थाई बेचैनी में जीते हैं, और हासिल की हिकारत करते हुए, सपनों के पीछे दौड़ते हैं। ऐसे हमलावर बाजार का एक यह नुकसान भी लोगों को हो रहा है, किताबें जिंदगी से बाहर हो गई हैं, और पढऩे की डिजिटल स्लेट बढ़ती जा रही हैं। संगीत की समझ खत्म होती जा रही है, और संगीत बजाने की क्वालिटी बढ़ती जा रही है, उसे समाकर रखने की क्षमता बढ़ती जा रही है। जिंदगी में अपने भीतर जिन खूबियों को बढ़ाने पर लोगों का ध्यान होना चाहिए था, उसकी बजाय अब बढ़ी हुई खूबियों वाले सामान खरीदने पर लोगों का ध्यान खींचकर, घसीटकर, धकेलकर बाजार ले जाता है। इसलिए आज जिंदगी में उन बातों की अहमियत बाजार ने बढ़ा दी है जिनको कि खरीदा जा सकता है, और उन इंसानी खूबियों को एक किस्म से गैरजरूरी, या कम जरूरी साबित कर दिया गया है, जिनको पाने के लिए इंसानों को बाजार में कोई भुगतान नहीं करना पड़ता। 
आज ग्राहकों की कई पीढिय़ों को देख लें, तो लोगों को फोटोग्राफी की समझ नहीं है, कैमरों की खूबियों की जानकारी है। समझ की जगह अब जानकारी ने ले ली है। संगीत की समझ गैरजरूरी हो गई है, और संगीत का उपकरण जरूरी हो गया। बाजार को मूर्खों की ऐसी ही बस्ती सुहाती है जो मोटे बटुए वाली हो, और मोटी अक्ल वाली हो। आज ऐसे कितने मां-बाप हैं जो अपने बच्चों को सामानों के दामों के बजाय, जिंदगी के मूल्यों, कला और साहित्य की समझ, संगीत और फोटोग्राफी के पहलुओं की समझ की तरफ मोड़ पाएं? ऐसा करने में उनको खुद को भी अपनी समझ बढ़ानी पड़ेगी, अपने आपको जानकार और समझदार बनाना पड़ेगा। इसके बजाय बच्चों को एटीएम का कार्ड दे देना, या के्रडिट कार्ड दे देना अधिक आसान है, और ताकतवर तबका यही कर भी रहा है। लेकिन किसी भी आर्थिक क्षमता वाले तबके के चारों तरफ उससे कम क्षमता वाला ऐसा एक बड़ा दायरा भी ऐसी बेचैनी में जीता है जो कि अपने ऊपर के सामानों को देखकर खरीद न पाने की बेबसी में कुंठा और भड़ास का शिकार हो जाता है। सामानों की वजह से आज कहीं पर देह खरीदने की नौबत मिलती है, और कुछ लोग देह बेचते भी दिखते हैं। बाजार के इस हमले के मुकाबले इंसानी समझदारी भला कैसे जिंदा रह पाएगी? 

Bat ke bat, बात की बात

18 sept 2013

रात-दिन चलता भ्रष्टाचार, सरकार को सब बर्दाश्त

संपादकीय
18 सितंबर 2013
छत्तीसगढ़ में केन्द्र सरकार और देश कुछ दूसरे राज्यों की तरह इतने बड़े भ्रष्टाचार नहीं हुए हैं, या अधिक सही यह कहना होगा कि अभी तक नहीं पकड़ाए हैं, कि जिनकी वजह से कोई मुख्यमंत्री या मंत्री हटाया जाए, या जेल जाए। लेकिन यहां के अखबारों को उठाकर देखें तो राष्ट्रीय स्तर के चर्चा के लायक न होने वाले, लेकिन स्थानीय खबर बनने वाले भ्रष्टाचार गिनती में तकरीबन उतने दिखते हैं, जितनी कि सरकारी कुर्सियां दिखती हैं। हैरानी की बात यह है कि राज्य के प्रशासन के अफसरों में आज जो सबसे ताकतवर कुछ अफसर हैं, वे अपनी ईमानदारी और काबिलीयत के लिए जाने जाते हैं। वे अपने हौसले के लिए भी मशहूर हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि उनकी आंखों के नीचे भी भ्रष्टाचार थम नहीं पा रहा है। जब छोटे-बड़े अफसरों से लेकर छोटे-छोटे कर्मचारियों तक भ्रष्टाचार को रोकने का कोई जरिया नहीं दिखता, तब लगता है कि अगर दुर्लभ होते जा रहे ईमानदार अफसर भी खत्म हो जाएंगे, तो इस राज्य में लूटपाट का क्या हाल होगा? 
राज्य के गृहमंत्री आबकारी विभाग पर रिश्वतखोरी की बात विधानसभा के भीतर और बाहर दस बरसों से कहते आए हैं। राज्य का स्वास्थ्य विभाग गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, और लोग अर्जियां लेकर मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर तक पहुंचते हैं, और दिल दहला देने वाला एक नजारा दो-चार दिन पहले देखने मिला जब राजधानी के एक सरकारी अस्पताल का नंबर डली हुई पहियों वाली कुर्सी एक बदहाल मरीज को लेकर मुख्यमंत्री निवास से बाहर निकलते दिखी। अगर सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार न होता, भ्रष्ट लोगों को बचाने में सरकार हांक रहे लोग ओवरटाईम न करते होते, तो अस्पताल के चक्कों पर अपने मरीज को धकेलते हुए गरीब घरवाले मुख्यमंत्री निवास पहुंचते? यही हाल स्कूल शिक्षा का है, तकनीकी शिक्षा का है, दूसरे विभागों में खरीदी का है, सड़क निर्माण का है, मकान निर्माण का है। कदम-कदम पर जनता के पैसे का इतना बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में जा रहा है, कि उसका अंदाज लगाना मुश्किल है। और यह सिलसिला बेधड़क इसलिए चलता है कि पहले जो भ्रष्ट पकड़ाए हुए हैं, वे आज दस-दस बरस बाद भी कुर्सियों पर जमे हैं, और बेधड़क आगे भ्रष्टाचार जारी रखे हुए हैं। जांच हो जाती है, और बरसों तक उन पर कार्रवाई की इजाजत सरकार से नहीं मिलती। ऐसे में ईमानदार लोगों को काम करने का मौका इसलिए नहीं मिलता, क्योंकि काम करने और वहां पर भ्रष्टाचार करने की तमाम कुर्सियां पहले के भ्रष्टाचार से बाहुबली बने हुए अफसर खरीद लेते हैं। 
इस राज्य में अभी तक भ्रष्टाचार में इतना बड़ा हिस्सा बर्बाद होने को लेकर जनता के बीच कोई हड़कम्प इसलिए नहीं मचा है कि यहां पर इस भ्रष्टाचार के बाद भी काम करने के लिए पैसों की कमी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह भ्रष्टाचार, और इतना भ्रष्टाचार न हुआ होता, तो सरकार उन पैसों से और कितना अधिक काम करवा सकती थी। अभी कुछ दिनों से अखबारों में पाठ्य पुस्तक निगम के कागज खरीदी घोटाले की चर्चा है। जांच में यह पूरा मामला करोड़ों रूपए के भ्रष्टाचार का दिख रहा है, लेकिन इसमें शामिल लोगों पर कोई कार्रवाई होते नहीं दिख रही है। राज्य में कुर्सियों पर मनोनीत नेताओं, और कमाऊ दफ्तरों में अपनी तैनाती पाने वाले अफसरों ने मिलकर ऐसी गिरोहबंदी कर ली है कि वे खुलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं, क्योंकि यह सबका देखा हुआ है कि जिनका पूरा कार्यकाल, और अब तक की पूरी नौकरी दाग-धब्बों से भरी हुई है, उनको भी आज कमाऊ जगहों पर मौका मिला हुआ है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में आर्थिक अपराध जांच ब्यूरो से लेकर लोकायुक्त या लोक आयोग जैसे दफ्तरों का कोई मतलब नहीं है। जब आंकड़ों को लेकर बैठें तो दिखता है कि सरकार से किसी भ्रष्ट पर कार्रवाई की कोई इजाजत ही नहीं मिलती। इसी राज्य में लंबे समय तक खबरों में बना हुआ आरा मिलों में स्टॉक की जांच के नाम पर किया गया करोड़ों का मजदूरी-घोटाला फाइलों में दबा हुआ है, और उन फाइलों के ऊपर बैठकर अफसर और ऊंचे बने हुए हैं। 
यह हाल भ्रष्ट लोगों के लिए तो अच्छा है, लेकिन जो लोग ईमानदार हैं, और अपनी ईमानदारी पर फख्र करते हैं, उनके लिए कैसा है, इसे वे ही जानें। यह राज्य चूंकि पिछले तेरह बरसों के अपने अस्तित्व में तरक्की कर गया है, इसलिए यहां की चोरी-डकैती अभी जन आक्रोश का मुद्दा नहीं है, लेकिन इसी राज्य में अफसरों के विदेश दौरे पर पैंतीस-चालीस लाख रूपए खर्च करने की शिकायतें आती हैं, और जनता के पास ऐसी शिकायतों को सही मानने का ठोस अनुभव भी है। यह माहौल भले लोगों को बहुत बुरा लगता है, और जाहिर है कि बुरे लोगों को बहुत भला लगता ही होगा, लगता ही है। सरकार के भीतर के ईमानदार लोगों को ऐसी बेईमानी की अनदेखी करने पर ईमानदार कहलाने का कितना हक है, इस पर उनको सोचना चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात,

17 sept 2013

सोने की चिडिय़ा के पैरों और पंखों पर तनाव-कुंठा की जंजीरें

संपादकीय
17 सितंबर 2013
लोगों के बीच निजी जिंदगी के तनाव से लेकर सार्वजनिक मुद्दों पर तनाव तक, बहुत से ऐसे मामले होते हैं जो कि बड़ी-बड़ी हिंसा में तब्दील हो जाते हैं। हिन्दुस्तान में हर बरस पुलिस और सुरक्षा बलों में, सेना में सैकड़ों वर्दीधारी आत्महत्या करते हैं। इसमें सबसे बड़ी गिनती सीआरपीएफ के जवानों की है जो कि परिवार से दूर बहुत ही खराब हालत में देश भर में तैनात रहते हैं, और हिंसाग्रस्त इलाकों में स्थानीय लोगों का तनाव भी झेलते हैं। छत्तीसगढ़ में ही ऐसी बहुत सी आत्महत्याएं हुई हैं। ऐसे तनाव के मामले दुनिया के अधिकतर देशों में होते हैं और कल अमरीका में एक भूतपूर्व नौसैनिक ने जिस तरह नौसेना के एक बड़े ठिकाने पर गोलीबारी करके एक दर्जन से अधिक लोगों को मार डाला, वह वहां के समाज में चल रहे तनाव का एक सुबूत है। इसके पहले भी वहां के स्कूलों और कॉलेजों में, अलग-अलग उम्र के हमलावरों ने बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में लोगों को भून डाला है। 
हिन्दुस्तान से अमरीका की हालत अलग इसलिए है कि वहां पर हथियार रखना न सिर्फ हर नागरिक का अधिकार है, बल्कि एक-एक नागरिक हमलावर किस्म के बहुत से हथियार रखने का हक रखते हैं। इसलिए वहां पर जब कोई घर के भीतर नाराज होता है तो भी कहीं और जाकर अनगिनत लोगों को भून डालता है। इस मामले पर आज यहां लिखने की जरूरत इसलिए लग रही है कि कल ही एक खबर आई थी कि अमरीका के मुकाबले भारत में मनोचिकित्सकों का अनुपात कितना कम है। और हमारा तो अनुभव यह है कि भारत में मनोचिकित्सक और मनोपरामर्शदाता हैं ही गिनती के, और उसके ऊपर बुरी नौबत यह कि उनका वक्त गिने-चुने शहरी और संपन्न लोगों पर ही खर्च हो जाता है। नतीजा यह रहता है कि देश की अधिकतर आबादी बाबा, औघड़, काला जादू, तांत्रिक, मजार, ऐसी जगहों पर अपना इलाज ढूंढती है। यही नतीजा रहता है कि कई किस्म के चोलाधारी लोग मानसिक रूप से परेशान लड़कियों और महिलाओं से, बच्चों से, बलात्कार की नौबत तक पहुंच पाती हैं। 
हम पहले भी कई बार इस बात को यहां उठा चुके हैं कि भारत में मनोचिकित्सकों और मनोपरामर्शदाताओं की पढ़ाई की क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। आज इम्तिहान में फेल होने पर छोटे-छोटे बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं। घरों में बच्चे पसंद का मोबाइल फोन न मिलने पर फांसी लगा लेते हैं, प्रेमी जोड़े हर प्रदेश में एक साथ आत्महत्या करते दिखते हैं, दो दिन पहले की ही खबर है कि देश में सबसे अधिक हत्याएं प्रेम और सेक्स संबंधों को लेकर होती हैं। अभी भारत का सामाजिक तनाव हमला करके आसपास के लोगों को मार डालने तक तो नहीं पहुंचा है, लेकिन पिछले हफ्ते ही इंदौर के एक किसी डॉक्टर की खबर थी जिसने अपने पूरे परिवार को मार डाला था। इसके अलावा छत्तीसगढ़ में भी जगह-जगह तनाव को लेकर अपने ही कुनबे को मार डालने की कितनी ही घटनाएं हुई हैं। अमरीका और भारत में तनाव की वजहें, और उनकी वजह से होने वाली हिंसा के मामलों में फर्क हो सकता है लेकिन यह समझने की जरूरत है कि समाज के भीतर, परिवार के भीतर तनाव को कम करना जरूरी क्यों है, और कितना जरूरी है।
भारत में सरकारी दफ्तरों और अदालतों में जिनकी पूरी जिंदगी खप जाती है, जिन परिवारों की लड़कियां छेडख़ानी से परेशान होकर आग लगाकर जान दे रही हैं, जिनकी पेंशन नहीं मिल पा रही है, जिनको अपने आपको जिंदा साबित करने में बरसों लग रहे हैं, जिनको हक का इलाज नहीं मिल पा रहा है, जिनके बच्चे रिश्वत न देने पर नौकरी नहीं पा सक रहे हैं, जो अपनी मर्जी के लड़के-लड़कियों से दोस्ती नहीं कर पा रहे हैं, शादी नहीं कर पा रहे हैं, ऐसे तमाम मामले एक परले दर्जे का सामाजिक तनाव खड़ा कर रहे हैं। यहां पर दो तरफ से सामाजिक तनाव से निपटने की जरूरत है। एक तो जो लोकतांत्रिक और सामाजिक बेइंसाफी चल रही है, उसे खत्म करना होगा, वरना शहरों में भी नक्सलियों की तरह कोई दूसरी ताकतें बेइंसाफी के खिलाफ खड़ी होने लगेंगी। दूसरी तरफ व्यक्तिगत तनाव को कम करने के लिए मानसिक विशेषज्ञों की गिनती बढ़ानी होगी, और उस इलाज या सलाह-मशविरे की सहूलियत भी जनता तक पहुंचानी होगी। अगर हिन्दुस्तान में अमरीका की तरह थोक में हत्याओं से ऐसे तनाव सामने नहीं आ रहे हैं, तो उसे अच्छी नौबत मानना ठीक नहीं होगा। यह समझने की जरूरत है कि तनाव, कुंठा, और भड़ास के साथ जीने वाला समाज कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को छू नहीं सकता, अपने देश को अपनी पूरी उत्पादकता दे नहीं सकता। भारत आज वैसा ही एक समाज है, सोने की चिडिय़ा के पैरों और पंखों पर तनाव और कुंठा की जंजीरें कसी हुई हैं। 

धर्म-आध्यात्म, समाजसेवा के नाम पर अंतहीन लूटमार

संपादकीय
16 सितंबर 2013
आसाराम के किस्से पहले पन्ने से खिसककर भीतर चले गए हैं, क्योंकि अडवानी की मेहरबानी से नरेन्द्र मोदी और बड़ी खबर बन गए। लेकिन अलग-अलग कई प्रदेशों में, कई पार्टियों के कई मुख्यमंत्रियों की मेहरबानी से आसाराम को आश्रमों के लिए मुफ्त में जमीनें मिलीं, उन पर उसने आश्रम भी बनाए, आसपास की और जमीनों पर कब्जा भी किया, और अवैध निर्माण भी किया। अब जब वे एक पुख्ता मामले में बुरी तरह फंसकर जेल में हैं, तो चारों तरफ से सरकारें भी उनके गलत कामों के खिलाफ कार्रवाई में लगी हुई हैं। जमीन-जायदाद को लेकर अंदाज है कि आसाराम के पास हजारों करोड़ की दौलत है, और इससे अधिक पर उनके अवैध कब्जे हैं। 
दरअसल हिन्दुस्तान में धर्म, आध्यात्म, जाति-संगठन, और समाजसेवी संस्थाओं के नाम पर दौलत इक_ा करने, और उसे हड़पने की एक बहुत लंबी परंपरा रही है। जब तक राजाओं का राज था, तब तक वे ही अकेले लुटेरे हुआ करते थे। राज खत्म होने के बाद जब लोकतंत्र आया, तब कानून के प्रति थोड़ी सी जवाबदेही आई, और ट्रस्ट-संस्थाओं को हिसाब-किताब रखने पर मजबूर किया गया। लेकिन यह मजबूरी सिर्फ कागजों पर रही, मंदिरों, वक्फ बोर्डों, और चर्चों के पास की लाखों करोड़ की दौलत लोग लूट खा रहे हैं, और उस पर रोकथाम की सत्ता की कोई नीयत इसलिए नहीं रहती, क्योंकि सत्ता पर काबिज लोग इस लूट में हिस्सेदार भी रहते हैं। मिसाल के लिए अगर हम अपने आसपास के छत्तीसगढ़ को ही देखें, तो चर्च की और ईसाई मिशनों की बड़ी-बड़ी जमीन-जायदाद ताकतवर ईसाई लोग बेच रहे हैं, ताकतवर और दौलतमंद हिन्दू-मुस्लिम खरीद रहे हैं, और सबके ईश्वर बैठे इस लूटमार को चुपचाप देख रहे हैं। यहां तक की बूढ़ी और बेबस, बीमार गायों के लिए लोगों की दी हुई दान की जमीन, योग विद्यालय के लिए दी गई दान की जमीन, अनाथ बच्चों के लिए दी गई अनाथाश्रम की जमीन, इन सब पर छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर लोग काबिज हैं, और इस पूरी दौलत को लूट खा रहे हैं। न कोई कानून इन पर लागू होता, और न ही अदालतों में इनके खिलाफ कभी-कभार हो गए कुछ फैसलों पर कोई कार्रवाई हो पाती है। कुल मिलाकर जो काम आसाराम ने जगह-जगह किया है, वही काम धर्म-आध्यात्म और समाज सेवा के निरासाराम देश भर में कर रहे हैं, हर धर्म में कर रहे हैं। 
हमारा मानना है कि ऐसे ताकतवर तबके के किए गए ऐसे जुर्म के लिए बहुत बड़ी सजा का इंतजाम होना चाहिए क्योंकि यह लूटमार लोगों के दान और आस्था की हो रही है, सरकार की संपत्ति की हो रही है। और ऐसे मुजरिम जिंदा रहने के लिए ऐसे जुर्म नहीं करते, सिर्फ अपनी ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं। और ऐसी बढ़ी हुई ताकत से उनका बाहुबल इतना बढ़ जाता है कि वे कानून के सिलसिले की बांह मरोड़़कर रख देते हैं। हमारा यह भी मानना है कि ऐसा लूटमार करने वाले लोगों के खिलाफ समाज के बीच से एक आंदोलन उठना चाहिए, और सड़कों पर ऐसे लोगों का विरोध होना चाहिए। अगर कोई अरबपति अनाथ बच्चों के लिए दान में किसी संस्था को मिली जमीन पर अपनी दौलत की फसल उगाता है, काटता है, और इस डकैती के साथ अनाथ बच्चों को, तो कहीं और भूखी गायों को मरने के लिए छोड़ देता है, तो पड़ोस के चीन में ऐसे कामों के लिए मौत की सजा है। हिन्दुस्तान में हम मौत की सजा के तो खिलाफ हैं, लेकिन ऐसी सार्वजनिक संपत्ति लूटने वालों की, उनके परिवार की पूरी निजी संपत्ति नीलाम करके जनता के इस्तेमाल में लाने का कानून बनना चाहिए। 

पे्रम, सेक्स, और हत्याएं

15 सितंबर 2013
संपादकीय
भारत के जुर्म के आंकड़ों को देखें, तो सरकारी रिकॉर्ड बताता है कि प्यार और यौन-संबंधों में होने वाली हत्याएं, देश में हत्याओं की तीसरी सबसे बड़ी वजह है। पिछले बरस हुई साढ़े तेरह हजार हत्याओं में से ढाई हजार से अधिक हत्याएं इसी वजह से हुई हैं। और ये मामले बाकी मामलों से कुछ अलग इसलिए भी होते हैं कि  ऐसी हत्याओं को रोक पाना पुलिस के बस में नहीं होता। जहां पर पति-पत्नी को मार रहा हो, या मां-बाप पे्रम विवाह करने वाली लड़की को मार रहे हों, वहां पर पुलिस किस तरह अपराध को रोक सकती है? इसलिए आज समय इस बात का है कि भारतीय समाज में किस तरह ऐसे सामाजिक तनाव को कम किया जाए जिससे कि ऐसी मौतें रूकें। यहां यह भी समझने की जरूरत है कि पे्रम और सेक्स संबंधों की वजह से अगर हत्याएं होती हैं, तो पे्रम और सेक्स को भारतीय लोगों की जिंदगी में एक स्वाभाविक छूट मिलने की जरूरत है। इसके बिना तनाव के चलते, झूठी शान के चलते ऐसी हत्याएं होती हैं। 
कल ही दिल्ली में निर्भया बलात्कार कांड के मुजरिमों के वकील ने बहुत ही गंदी जुबान में यह कहा कि उसकी लड़की अगर पे्रम करती, या रात में अपने लड़के-दोस्त के साथ बाहर निकलती तो वह अपनी बेटी को जलाकर मार डालता। एक वकील जब ऐसे नाजुक मौके पर ऐसा भयानक हिंसा सार्वजनिक बयान देता है, तो उससे देश के मां-बाप के एक तबके की सोच तो दिखती ही है। इसके अलावा हम हर कुछ हफ्तों में देखते हैं कि किस तरह कहीं खाप पंचायतें, तो कहीं कोई और जाति संगठन किस तरह बलात्कार से लेकर कत्ल तक की हिमायत करते हैं, और सामाजिक सजा सुनाते हुए किसी को मौत देते हैं, तो किसी को बलात्कारी से शादी की सजा देते हैं। यह देश एक बहुत दकियानूसी सोच का शिकार है, और जिन लोगों को भारतीय संस्कृति पर बहुत गर्व है, वे लोग भी कृष्ण की पे्रम-लीलाओं के हजारों लाखों बरस बाद भी उससे कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं, न रास लीला उन्हें सुहाती, और न ही गंधर्व विवाह। 
हम अधिक फिक्रमंद इसलिए हैं कि पे्रम और सेक्स को लेकर अगर देश में हर बरस ढाई हजार से अधिक कत्ल हो रहे हैं, तो इससे दसियों हजार गुना अधिक, यानी करोड़ों लोग पे्रम और सेक्स को लेकर भड़ास में जी रहे होंगे। जहां समाज लोगों को अपनी मर्जी के रिश्तों की इजाजत नहीं देता, धर्म और जाति के बाहर जाकर पे्रम और शादी करने की इजाजत नहीं देता, वैसा हिंसक रूख इस देश में जाति-व्यवस्था को तोडऩे भी नहीं देता, और उसे बनाए रखने का काम करता है। दिक्कत यह है कि जिन राजनीतिक दलों का सत्ता पर कब्जा होता है, और सत्ता के साथ-साथ विपक्ष पर कब्जा होता है, उन सबको कट्टरपंथी लोग अधिक सुहाते हैं, क्योंकि वे भीड़ को एक जुट करके किसी गड्ढे की तरह ले जाने की ताकत रखते हैं। उनके मुकाबले उदारवादी लोग, खुली समझ वाले प्रगतिशील लोग कम असर रखते हैं, कम सक्रिय होते हैं, और वोटों के लिए काम के नहीं होते हैं। 
भारत में लोगों की जरूरत पे्रम और सेक्स को लेकर जैसी है, वैसी उनकी जरूरत पूरी होने की सामाजिक संभावनाएं नहीं हैं। लोग वयस्क मनोरंजन नहीं पा सकते, देश के अधिकांश हिस्से में पे्रमी-जोड़े बाग-बगीचों में बैठ नहीं सकते, पैसे देकर देह पाना इस देश में गैरकानूनी है, नतीजा यह होता है कि पे्रम से लेकर सेक्स तक की जरूरत के लिए सामाजिक या कानूनी अपराध करना एक किस्म से जरूरी हो जाता है। यह तस्वीर बदलने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है, इसके लिए राजनीतिक दलों में एक सुधारवादी इच्छाशक्ति भी होना जरूरी है। इस बारे में अगर सोचा नहीं गया, तो हो सकता है कि अगले कुछ बरसों में पे्रम और सेक्स की वजह से होने वाली हत्याएं देश में सबसे अधिक हत्याएं गिनी जाएंगी।

मोदी के कुछ मायने (बाकी बाद में)

14 सितंबर 2013
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी के साथ अब भाजपा में अटल-अडवानी युग खत्म हुआ और एक नया जमाना शुरू हुआ। इस पार्टी के इतिहास के दो सबसे बड़े नेता आज अपनी बुजुर्गियत के साथ दिल्ली में अपने घरों में रहेंगे, और आने वाले कल के लिए उम्मीद जगाने वाले नरेन्द्र मोदी देश को जीतने की कोशिश करेंगे। लालकृष्ण अडवानी की असहमति के पीछे उनकी कोई वैचारिक हिचक थी या प्रधानमंत्री बनने की आखिरी संभावना हाथ से निकल जाने का दर्द, यह राज शायद उन्हीं के साथ चला जाएगा। लेकिन ऐसी व्यक्तिगत बात बहुत मायने भी नहीं रखती, जब एक बड़ी पार्टी तकरीबन एक राय से ऐसा फैसला लेती है।
दरअसल वक्त की रफ्तार और हवा के रूख का अंदाज लोगों को लग नहीं पाता। कुछ लोग उम्रदराज होने के साथ भी मरने तक रोज दौडऩा जारी रखते हैं, बहुत से लोग नौकरी से रिटायर होने के बाद महज अखबारी पन्नों पर ही दौड़ते हैं। ऐसे में किसी पार्टी, सरकार, या संगठन, किसी को भी नई पीढ़ी की जरूरत पड़ती है। आज इसी नजारे में कांगे्रस पार्टी भी अपने सैकड़ों और सफल लोगों को छोड़कर एक नौजवान राहुल गांधी को झंडा थमा चुकी है। हालांकि राहुल गांधी को अपने कुनबे की इस पीढ़ी के राजनीति में अकेले मेम्बर होने से यह मौका मिला है, लेकिन वंशवाद के बारे में अलग से हमने कल ही लिखा है, इसलिए यहां पर आज उस पहलू पर कुछ और नहीं। और मोदी को तो आज किसी वंश की रियायत भी नहीं मिली है।
नरेन्द्र मोदी एक ऐसे वक्त भारत की राष्ट्रीय राजनीति में आए हैं जब दिल्ली से पिछले दस बरसों में उड़ी कोयले की गर्द तले लोगों को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है। इन लोगों में दक्षिण, पूर्व, और उत्तर-पूर्व सहित कश्मीर जैसे सरहदी इलाकों के लोग भी शामिल हैं, जो शायद मोदी के साथ न हों, लेकिन दस बरसों का अंधेरा जिनको थका चुका है। ऐसे लोगों के बीच गर मोदी का जादू काम नहीं करेगा तो यूपीए का राहुल गांधी का जादू भी काम नहीं करेगा। और बीच के हिस्से का भारत, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, बिहार, वगैरह, मोदी और राहुल के बीच सीधे मुकाबले वाले इलाके होंगे, सहयोगी दलों के साथ मिलकर।
मोदी के बाकी पहलुओं को आगे की चर्चा के लिए छोड़ दें लेकिन आज भारतीय चुनावी राजनीति में एक नए धु्रवीकरण का मौका आया है। आज जो पार्टियां देश में जाहिर तौर पर भाजपा की विरोधी हैं, उनको 2014 के चुनाव के समीकरणों को फिर तौलना होगा। जो पार्टियां एनडीए में नहीं हैं, और यूपीए को धर्मनिरपेक्ष कहती हैं, उनको तय करना होगा कि वे मोदी के हमले का मुकाबला कैसी धर्मनिरपेक्षता से, किस तरह करेंगे? यूपीए के साथ किसी अधिक व्यापक तालमेल की गुंजाइश भी लोगों को देखनी पड़ेगी। ऐसा ही कुछ एनडीए भी अपने इर्द-गिर्द सोचेगा। पार्टियों के बीच एक बड़े गठबंधन के भीतर आकर साथ चुनाव लडऩे से लेकर तालमेल तक, और चुनाव के बाद के तालमेल तक, कई तरह की बातें अभी होंगी। और यह सब मोदी की दहशत में होगा।
नरेन्द्र मोदी की चर्चा ने ही भारतीय राजनीति को अमरीका की व्यक्ति-केन्द्रित राष्ट्रपति प्रणाली जैसा कर दिया है, और देश की चुनावी लहर ऐसी ही शुरू हो रही है क्योंकि मीडिया को यह फार्मूला बेहतर बैठता है। लेकिन संसदीय सीटों के स्तर पर होने वाले फैसले इस लहर से कुछ अलग भी हो सकते हैं।
जो भी हो, नरेन्द्र मोदी एक साधारण चाय ठेले से उठकर गुजरात के बार-बार मुख्यमंत्री बनकर अब इस उम्मीदवारी तक पहुंचे हैं, और बिना किसी राजनीतिक कुनबे के पहुंच हैं, यह कम बड़ी बात नहीं है। 

खानदानी चिरागों के चापलूसों को मोदी-विरोध का क्या हक?

13 सितंबर 2013
संपादकीय
भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी में होती देर से एक बात साफ है कि इस पार्टी में इस मुद्दे पर महीनों की सोच के बाद अब भी कुछ घंटों या दिनों की सोच बाकी है। ऐसा किसी पार्टी में ही हो सकता है। सोनिया की कांगे्रस, लालू की राजद, पासवान की लोजपा, मुलायम की सपा, फारूख की नेशनल कांफे्रंस, ममता की तृणमूल कांगे्रस, पवार की एनसीपी, करूणानिधि की डीएमके, जया की एडीएमके, ठाकरों की शिवसेना, पटनायक की बीजू जनता दल, बादलों का अकाली दल, चौटालाओं के आईएनएलडी जैसे दलों में कोई कल्पना कर सकता है कि उनके मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री प्रत्याशियों के लिए पार्टी में कोई चर्चा भी हो सकती है?
ऊपर की फेहरिस्त के अलावा और भी ऐसी कुछ पार्टियां हो सकती हैं, हैं, जैसे जगन मोहन रेड्डी की पार्टी। इनमें से एक भी ऐसी पार्टी है जिसमें मुखिया या उसके कुनबे से परे किसी और नाम की चर्चा भी गद्दारी नहीं मान ली जाएगी? आज मोदी के अलावा जिस दूसरी ताजपोशी की चर्चा है, वह है राहुल गांधी की। राहुल के अलावा किसी और नाम की चर्चा भी करके कांगे्रस में कोई जिंदा रह सकता है? भाजपा में कम से कम महीनों तक अडवानी-सुषमा को मनाने का काम चल रहा है। कांगे्रस में तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जिंदा रहते, कुर्सी पर रहते, चापलूसों ने राहुल की ताजपोशी शुरू कर दी थी। आज भी पार्टी के किसी औपचारिक फैसलों के बिना राहुल गांधी को पार्टी का अगला प्रधानमंत्री मान लिया गया है, ठीक वैसे ही जैसे इंदिराजी की हत्या के बाद बिना संसदीय दल के किसी फैसले के राष्ट्रपति जैलसिंह ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी थी।
मतलब यह कि अगर कोई अच्छी या बुरी पार्टी, किसी अच्छे या बुरे को अपना उम्मीदवार बनाने में महीनों की मेहनत करती है, तो वह कांगे्रस के लिए मखौल का सामान हो जाती है? लोकतंत्र के भीतर एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाना कहां तक जायज है? मोदी का इतिहास दागदार है लेकिन वे अभी तक मुलायम की तरह अनुपातहीन सम्पत्ति के केस में नहीं फंसे हैं, वे जयललिता, माया, लालू की तरह भ्रष्टाचार में कटघरों में नहीं हैं, वे कुनबापरस्त नहीं हैं, वे बादलों की तरह फिजूलखर्च नहीं हैं, राज्य को दीवालिया बनाने की कीमत पर। वे चौटाला भी नहीं हैं कि जेल जाने के बाद भी वे पार्टी के मुखिया बने रहें, वे खरबपति जगन मोहन भी नहीं हैं, जो कि कांगे्रसी-मुख्यमंत्री बाप की संदिग्ध दौलत के साथ जेल में हैं।
मोदी को कोसने के पहले इसे भी देखना चाहिए कि वे डीएनए से मुख्यमंत्री नहीं बने, और न ही अपने डीएनए की वजह से प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बन रहे, न ही वे अपने बाद अपने डीएनए को वारिस बनाकर जाने वाले। इसलिए वे कांगे्रस के लिए मखौल बन गए?
मोदी की हजार दूसरी खामियां हो सकती हैं, लेकिन उन पर अलग से बात होनी चाहिए, उनकी उम्मीदवारी से उन बातों का आज क्या लेना-देना? जिन खामियों के बावजूद आज तक जो कटघरों के बाहर हैं, उनकी उम्मीदवारी पर कटघरों के भीतर से लोग किस नैतिक ताकत से बोल सकते हैं? आज तो जब अदालतों से सजा पाए लोगों को संसद के भीतर लाने के लिए पार्टियां सुप्रीम कोर्ट को संसद के भीतर लात मार रही हैं, वहां पर मोदी तो अब तक कटघरे में भी नहीं हैं। आज जब सिखों के खिलाफ 1984 के दंगों को लेकर सोनिया के नाम भी एक अमरीकी अदालत से समन्स जारी हो गया है, तब तक मोदी तो 2002 के दंगों में किसी समन्स से भी बचे हुए हैं। ऐसे में मोदी की उम्मीदवारी को खारिज करने का हक भाजपा के भीतर है, एनडीए के भीतर है, एनडीए के बाहर नहीं। उम्मीदवार मोदी को खारिज करने का हक जनता को हो सकता है, खानदानी चिरागों के चापलूसों को नहीं।
मोदी की खामियों को अलग मुद्दों पर उठाने की जरूरत है और भारत के इतिहास में मोदी सबसे अधिक कोसे गए इंसान हैं। जब फर्जी या सतही मुद्दों को लेकर मोदी के खिलाफ अभियान चलता है, तो उससे उनकी असल खामियां दब ही जाती हैं। हिंदुस्तान में शायद वामपंथी दलों के अलावा अकेली जदयू अभी दिखाई पड़ती है जो रक्त-परंपरा के बिना काम कर रही है।

Bat ke bat, बात की बात

12 sept 2013

भाजपा के भीतर अडवानी की जमानत जब्त हो चुकी है आगे-आगे देखें, होता है क्या...

12 सितंबर 2013
संपादकीय
भाजपा के भीतर नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी की घोषणा आखिरी दौर में दिखती है। पार्टी से छनकर बाहर आने वाली खबरें अगर सही मानकर उस पर लिखें, तो लगता है कि भाजपा के आज के सबसे बड़े, और चलते-फिरते नेता लालकृष्ण अडवानी पूरी तरह, और बुरी तरह अकेले हो गए हैं। उनकी बातें पार्टी के हित की और देश के हित की हो सकती हैं, लेकिन वे नदी के बहाव के खिलाफ तैर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने पिछले बरसों में जिस तरह अपने-आपको इस पार्टी का, आक्रामक हिंदुत्व का, सबसे कामयाब नेता साबित किया है, उस अंधड़ के सामने अडवानी ही नहीं, भाजपा के मोदी से बड़े कई दूसरे दिग्गजों के पांव भी पूरी तरह से उखड़ चुके हैं। आज की भाजपा न तो पार्टी के व्यापक हित पर किसी बहस के लिए तैयार है, और न ही एनडीए के भविष्य पर। इन दोनों को एक खतरे में डालने की कीमत पर भी आज भाजपा के बहुमत को, सिर्फ मोदी की चाह है। और भाजपा के बाहर जो लोग हिंदुत्व की विचारधारा वाले हैं, कांगे्रस और यूपीए से थके हुए हैं, भारत के बीच के हिंदीभाषी हिस्से में रहते हैं, जिनको धर्मनिरपेक्षता के मुकाबले अर्थव्यवस्था अकेले ही लोकतंत्र के लिए काफी लगती है, जिनके मन में पड़ोसियों को लेकर युद्धोन्माद है, ऐसे सारे लोगों को अकेले मोदी में उम्मीद का सूरज दिखता है। ऐसी चकाचौंध रौशनी के बीच भाजपा के भीतर अडवानी तकरीबन अकेले रह गए हैं, और शायद वक्त के सैलाब के खिलाफ उनका यह रूख आने वाले दिनों में उनके पांव पूरी तरह उखाड़ देगा। जिंदगी की कड़वी हकीकत में सही और गलत अगर वोटों की गिनती से तय होते हैं, तो भाजपा के भीतर अडवानी की जमानत जब्त हो चुकी है।
मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने से भाजपा और एनडीए के अलग-अलग चुनावी नतीजों पर किस तरह का फर्क पड़ेगा, इसकी चर्चा का माहौल भाजपा के भीतर नहीं रह गया है। और एनडीए के भीतर बाकी पार्टियों का इतना वजन नहीं है कि वे मोदी का विरोध करते हुए एनडीए के बाहर जाएं, और अपनी कोई दूसरी जगह तलाश लें। इसलिए एनडीए गठबंधन की सबसे बड़ी भागीदार भाजपा के फैसले को नामंजूर करने वाले नीतीश जैसे लोग अब गठबंधन में नहीं बचे हैं, और बाकी साथी की इसी बेबस चुप्पी, या सहमति, को गिनते हुए भाजपा मोदी को कंधे पर चढ़ा चुकी है। वंशवाद पर आधारित पार्टियों को छोड़कर बाकी हर पार्टी की जिंदगी में एक वक्त ऐसा आता है जब उसे बुजुर्गियत की सफेदी को सम्मान सहित विसर्जित करना पड़ता है। आज भाजपा ऐसे ही कगार पर आ खड़ी है। इतनी बड़ी यह पार्टी अपने भले और बुरे को बेहतर समझती है, इसलिए उसके इस फैसले पर हम यहां कुछ कहना नहीं चाहते। अधिक से अधिक राजनीतिक विश्लेषण के किसी कॉलम में शायद इस बारे में कुछ लिखा जाए, लेकिन मोदी अब भाजपा की नियति बन चुके थे, इसलिए उनकी अपनी नीयत चाहे जो हो, उनके अलावा भाजपा के पास इस दौर में अगुवाई करने वाले दूसरे कोई नेता बचे नहीं थे, या कम से कम पार्टी को पूरे देश में मतदाताओं का धु्रवीकरण करने के लिए मोदी के टक्कर का कोई दूसरा नेता पार्टी के भीतर दिख नहीं रहा था। इसलिए राष्ट्रीय मामलों की सबसे अधिक समझ रखने वाले कई नेताओं को छोड़कर भाजपा ने मोदी को अपना चुनाव चिन्ह बनाया है। 
देश में मोदी के भावी प्रधानमंत्री बनने को लेकर एक हड़कंप मचा हुआ है। साम्प्रदायिकता से नफरत करने वाले लोग मोदी की शक्ल में पूरे हिंदुस्तान में मुजफ्फरनगर बनते देख रहे हैं। लोगों की नजरों का यह खतरा सही साबित होगा, या गलत, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन पकते हुए चावल की हांडी का एक दाना, अमित शाह की शक्ल में उत्तरप्रदेश में एक मुजफ्फरनगर के पीछे खड़ा हुआ दिख तो रहा है। लेकिन लोकतंत्र अदालती सजा के पहले तक हर किसी को जनता की अदालत में जोर-आजमाईश का हक देता है, और मोदी हों या अमित शाह, किसी का यह हक छीना तो नहीं जा सकता। इसलिए एक वक्त अटल-अडवानी में से अधिक कट्टर समझे जाते लालकृष्ण अडवानी आज मोदी के मुकाबले नरम माने जाकर कांगे्रस तक की जुबानी हमदर्दी पा रहे हैं। आगे-आगे देखें, होता है क्या...

तेज रफ्तार इंसाफ की राह पर तख्तियां लगेंगी...

11 सितंबर 2013
संपादकीय
दिल्ली में एक चर्चित बलात्कार पर बहुत इंतजार के बाद कल फैसला आया, और आज कुछ घंटों में सजा आ जाएगी। इसमें नौ महीनों का वक्त लगा, और इतने में यह फैसला इसलिए आ पाया क्योंकि निर्भया से बलात्कार ने पूरे देश को हिला दिया था, और पुलिस से लेकर अदालत तक ने इसे तेज रफ्तार से नतीजे तक पहुंचाया। लेकिन देश की जनता के बड़े हिस्से से आवाज आ रही है कि सजा फांसी से कम नहीं होनी चाहिए, और सुनवाई में इतना वक्त नहीं लगना चाहिए। लोगों की भावना ठीक है कि ऐसे अपराधियों के मारे जाने से उनके फिर जुर्म करने का खतरा खत्म हो जाएगा। दूसरी बात भी सही है कि मुजरिम को सजा जल्द होनी चाहिए।
लेकिन इन दोनों को तौलने की जरूरत है। फांसी की सजा से अगर यह माना जा रहा है कि उसकी दहशत से और लोग भी वैसे जुर्म से बिदकेंगे, तो यह भी समझना चाहिए कि अगर ऐसा कोई डर होगा भी, तो लोग खतरे को खत्म करने के लिए बलात्कार की शिकार को भी खत्म कर देंगे। इससे जितने बलात्कारी मारे जाएंगे, उससे कई गुना अधिक हत्याएं बढ़ जाएंगी। आधा दर्जन बलात्कारी अपनी फांसी टालने के लिए बलात्कार की शिकार महिला को मार ही डालेंगे। दूसरी बात यह कि सभ्य समाज अब मौत की सजा से दूर जा रहा है। दुनिया में किसी को भी दूसरों को मारने का हक नहीं होना चाहिए, अदालत को भी नहीं। अब दूसरी बात पर आएं कि अदालती फैसला तेज रफ्तार से होना चाहिए। तेज रफ्तार से जितने किस्म के खतरों की तख्तियां खतरनाक सड़कों पर लगी रहती हैं, उतनी ही तख्तियां इंसाफ की राह के किनारे भी लगाई जा सकती हैं। अदालत तो इंसाफ का चेहरा है। लेकिन इंसाफ तक पहुंचने के पहले किसी मामले का ढांचा गवाहों, बयानों, सुबूतों, जिरह, जांच, किस्म की जितनी बातों से होकर गुजरता है, उन पर अदालत का कोई बस नहीं चलता। ऐसे में सिर्फ अदालत से रफ्तार की उम्मीद वैसी ही होगी जैसी कि किसी पुरानी, फटीचर, फटफटी से तय समय में मंजिल पर पहुंचने की हो, जिसके पुर्जे-पुर्जे गड़बड़ हों, जिसमें मिलावटी पेट्रोल भरा हो, हवा कम हो, बे्रक कमजोर हो, बत्ती बंद हो। ऐसी मंजिलें तय करने का कोई मतलब नहीं हो सकता। इससे हादसा ही होगा। बेकसूर फांसी पर चढ़ाए जाएंगे, और असल मुजरिम इस आपाधापी के बीच बचने की राह खरीद लेंगे।
इसी देश में उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर में सरकारी जवानों के लिए बलात्कारों पर बरसों से कोई सजा नहीं हो पाई है। उत्तर-पूर्व की महिलाएं इस नौबत के खिलाफ पूरे कपड़े उतारकर सड़कों पर, सैनिक-अहातों के सामने प्रदर्शन करती आ रही हैं, लेकिन बाकी का भारत इन खबरों को शायद पढ़ भी नहीं रहा। इस देश में किसी जुर्म से तब तक देश नहीं हिलता जब तक कि वह महानगरों के करीब न हुआ हो, टीवी कैमरों के करीब न हुआ हो। दूर क्यों जाएं, छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षा बलों और सलवा जुडूम के लोगों पर बलात्कार के आरोप लगते आए हैं, जो किसी अदालती किनारे तक नहीं पहुंचे हैं। ऐसे में नौ महीने से कम में इंसाफ पैदा होने की उम्मीद बादलों पर बनी इमारत सरीखी होगी।
किसी हादसे से उत्तेजित या विचलित होकर तत्काल-इंसाफ की उम्मीद करना ठीक नहीं है। जब जनता का बड़ा हिस्सा ऐसे विचलित हो, तो सरकार, संसद, और कई बार अदालतें भी, एक दबाव के तहत काम करते हैं, ऐसे काम हमेशा ही अच्छे नहीं होते, ऐसे में गलत फैसले भी होते हैं।
जरूरत देश की पूरी व्यवस्था को सुधारने की है। समाज के माहौल को, पुलिस के काम को, जांच को, कानून को, अदालती कार्रवाई को। तब जाकर इंसाफ ठीक होगा।

घने अंधेरे में रौशनी के लिए खिड़की तो खोलो

संपादकीय
10 सितंबर 2013
आए दिन हत्या बलात्कार, भ्रष्टाचार, जनता की लाचारी की खबरें पढ़-पढ़कर खिन्न हुए मन को कुछ खबरें बहुत सुकून दे गई। इनमें से एक भारत की एक देवदासी की बेटी श्वेता कट्टी का न्यूयॉर्क के एक कॉलेज में मनोविज्ञान पढऩे के लिए कोई 33 लाख रुपये की छात्रवृत्ति जीतने की खबर थी। कोलकाता में देह व्यापार की मंडी सोनागाछी से एक नशेडी बाप और यौनकर्मी मां के बच्चे के, अमरीका में स्कूली और कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद हॉलीवुड फिल्मों के निर्माण में लग जाने की खबर भी या झारखंड में गरीब परिवार की लड़कियों के तमाम मुश्किलें पार करके किशोरियों का विश्व फुटबॉल मुकाबला जीत लेने की खबर। पंजाब में होजियरी फैक्ट्री में काम करने वाले एक गरीब कामगार गुरनाम सिंह के तीन बच्चों में से एक एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करके डॉक्टर बन गई, जबकि उनकी एक और बेटी और बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके गुडगांव की बड़ी फर्मों में अच्छी नौकरियां कर रहे हैं। पिछले दिनों पंजाब के ही एक दिहाड़ी मजदूर की बेटी के 13 बरस की उम्र में ही एमएससी तक पहुंच जाने की खबर थी, तो बंगलौर में, घरों में सालों तक सुबह का अखबार पहुंचाने वाले युवक के इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके आईआएएम कोलकाता, और चेन्नई में  इडली बेचकर घर चलाने वाली एक महिला के बेटे के आईआईटी मद्रास होते हुए आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ निकलने के किस्से भी सुने हुए हैं। मुश्किलों के बीच कड़ी मेहनत के बूते जिंदगी में कहीं पहुंचने वाले इन बच्चों के अलावा उन लोगों के किस्से भी है, जो इनका हाथ थामकर इन्हें आगे बढऩे में अपनी छोटी-बड़ी भूमिकाएं अदाकर रहे हैं। चाहे वह यौन कर्मियों के बच्चों पर फिल्में बनाने वाले अमरीकी फिल्मकार हो, इन बच्चों के स्कूली शिक्षक हो, या भारतीय, विदेशी उद्यमी, कोच। सबमें एक बात समान है, कि वह किसी मुश्किल के लिए हालात का रोना रोने की बजाए सही दिशा में कड़ी मेहनत करते हंै, और अपनी और दूसरों की जिंदगियां बदल देते हैं।
ऐसे हालात में जब भारत में हर तरफ निराशा का माहौल है, जब युवकों के पास ऊंची पढ़ाई के बाद भी मनमाफिक नौकरियां नहीं है, अपने समाज पर शर्मिन्दा होने के लिए बड़े नेताओं, हस्तियों की काली करतूतें हैं, ऐसे में इस तरह की खबरें ऑक्सीजन की तरह लगती है, और यह भी बताती है कि जिंदगी में अपनी मुश्किलों से उबरने, हालात सुधारने के लिए सुविधाओं से ज्यादा इरादों, और हौसलों, की जरूरत होती है। आज बात-बात पर आरक्षण के कारण अपने हक छिन जाने की बात करने वाले, इन युवाओं की मिसाल ले सकते हैं, जिन्होंने किसी आरक्षण की मदद लिए बिना मिसाले पेश की है। हरियाणा की बहुत सी महिला खिलाडिऩे ऐसी हैं, जो खेतों में अपने माता-पिता के साथ मजदूरी करते हुए अपना अभ्यास जारी रखती है, और राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही है। स्कूल की बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे आने पर एक न एक ऐसी मिसाल सामने आ ही जाती है जिसमें किसी बहुत छोटा-मोटा काम करने वाले व्यक्ति के बच्चे के बिना कोई सुविधा, कड़ी मेहनत और अध्यापकों के सहयोग से मेरिट में आने का जिक्र होता है। अफसोस की बात यह है कि इन मु_ीभर लोगों से प्रेरणा बहुत कम लोग लेते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजे आने पर ही मीडिया इन्हे ढूंढकर लोगों के सामने  इनकी कहनियां पेश करता तो है, लेकिन बहुत जल्द इन्हें भुला दिया जाता है और  अपनी बदतर स्थिति, नाकामियों के लिए बहाने खोजने का सिलसिला फिर शुरू हो जाता है।
हम यह नहीं कहते कि देश के युवाओं की बदहाली के लिए देश चलाने वालों, या कानून बनाने वालों का कोई कुसूर नहीं। लेकिन यह नहीं भूला जा सकता कि इन्हीं हालात से ऊपर उठकर अपने सपने सच करने वाले लोग भी हमारे आसपास ही है। उनके जितनी कड़ी मेहनत नहीं कर पाने वाले उन्हें अपवाद या किस्मतवाला करार देकर अपना रोना जारी रखना चाहे, यह अफसोसनाक है। आगे बढऩे के मौके मिलना जरूरी है, इसमें शक नहीं, लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कड़ी मेनहत से, सबसे श्रेष्ठ , सबसे बेहतर काम करने की लगन हो, और वह ऐसा कर पाए। वरना मौका मिलने पर भी कोई कुछ नहीं कर सकता। ऐसा करने वालों को अपवाद कहकर परे रख देने की बजाए, उनकी कहानियां प्रचारित करने की जरूरत है, क्योंकि इनसे प्रेरणा लेकर आगे बढऩे वाले किसी एक में दूसरे सैकड़ों लोगों की जिंदगियां संवार देने की संभावना छिपी हो सकती है। इन दुर्लभ लोगों में कोई अब्राहम जॉर्ज भी हो सकता है जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बूते नाम और दौलत कमाने के बाद देश के गरीब दलित  बच्चों की जिंदगियां संवारने का मौका उठाया है, या हजारों गरीब आदिवासी बच्चों को गरीबी अशिक्षा से उबार रहे अच्युत सामंता भी। समाज से जो पाया उसमें से कुछ वापस देने और प्रतिभा, और कड़ी मेहनत की कद्र करने के साथ ही सबसे बेहतर तरीके से काम करने की ललक को भी हासिल करने लायक खासियत के रूप में प्रचरित करना जरूरी है। तभी देश में दोयम दर्जे की जगह बेहतरीन दर्जे के काम करने वाले पनप सकेंगे।  
हमारा मानना है कि स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में ऐसे प्रेरित करने वाले किस्सों को जगह मिलनी चाहिए बच्चों के साथ काम करते एनजीओ, या स्कूल भी अपने स्तर पर इस दिशा में बहुत कुछ कर सकते हंै- जैसे स्थानीय स्तर पर ऐसी कोई मिसाल बच्चों के आगे पेश करना, उसका सम्मान करना महिलाओं के लिए काम करती संस्था सेवा में ऐसी महिलाओं की जीवनियों का दस्तावेजीकरण करके उन्हें एक किताब की शक्ल में पेश किया भी है, जिन्होंने भयंकर गरीबी और पिछड़ेपन से, केवल अपने पक्के इरादे, हौसले, कड़ी मेहनत और सूझबूझ के बूते अपनी ही नहीं, अपने परिवारों की आने वाली पीढिय़ों तक का भविष्य बदल डाला। अमूमन ऐसी कहानियां एनजीओ केवल अपने दानदाताओं को रिझाने, या अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इनमें देश में बदलाव लाने का माद्दा है। इनकी ताकत को पहचान कर इनसे प्रेरणा लेने, और देने, दोनों की जरूरत है। स्कूलों, एनजीओ के अलावा महिला क्लब भी अपने रोजाना के ढर्रे से अलग ऐसे कोई काम हाथ में ले सकते हंै। यह आज निराशा भरे माहौल में सुबह की उजली किरण की तरह, भ्रष्टाचार, अपराधों से खदबदाते देश की सडांध में ताजा हवा के झोंके से है, जिनमें बहुत कुछ करने की ताकत है। इस औजार को आजमाने की जरूरत है।