Bat ke bat, बात की बात

31 oct 2013

लोग वैसी ही सरकार पाते हैं.., जैसी पाने के वे हकदार होते हैं

31 अक्टूबर 2013
संपादकीय
आज पूरा हिन्दुस्तान पांच राज्यों में हो रहे चुनाव की खबरों से सराबोर है। जहां चुनाव नहीं भी हो रहे हैं, वहां के लोग भी इन राज्यों की खबरों से बुरी तरह दबे हुए हैं। और छत्तीसगढ़ के भीतर बैठे हुए हम चुनावों को अधिक करीब से देख रहे हैं। चुनाव आयोग खुले में दिखने वाले खर्च को लेकर एक ऐसी दहशत कानून तोडऩे वाले फिजूलखर्च उम्मीदवारों में फैला चुका है, कि उनसे खर्च करवाने का इंतजार कर रहे लोग एकदम से निराश हो गए हैं। लेकिन खुले के नीचे, पर्दों के पीछे, और रात के अंधेरे में वोटों के लिए नोटों से जो सौदे हो रहे हैं, उन पर चुनाव आयोग का किसी तरह का बस नहीं है। और लोकतंत्र में हर बात पर काबू किया भी नहीं जा सकता, लोकतंत्र तो क्या फौजी हुकूमत में भी हर बात पर काबू नहीं पाया जा सकता। दरअसल जब कुछ लोगों के हाथों में लूट की इतनी दौलत हो, कि वे लुट-लुटकर कमजोर हो चुके लोगों को थोक और चिल्हर में खरीदने की ताकत रखते हों, और जब लुटेरे-खरीददारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी देख-देखकर वोटर यह समझ चुके हों, कि उनकी नियति भी लगातार लुटना है, तो फिर उनको खरीदना उतना मुश्किल नहीं रह जाता। और यह देखकर दर्दभरी हंसी आती है कि किस तरह 1.8 फीसदी वोटों के फर्क से कोई पार्टी सत्ता में आ सकती है। अलग-अलग दर्जनों ऐसी सीटें हैं, जिनमें 1.8 फीसदी तो दूर, 18-18 फीसदी वोट खरीदे जाते हैं, उनसे जीत खरीदी जाती है, और उस जीत के बाद सत्ता की कुर्सी पाई जाती है, और फिर पांच बरस बाद के लिए ताकत जुटाई जाती है, लूट-लूटकर। 
चुनावों में लगातार भ्रष्टाचार की ताकत को देख-देखकर अविभाजित मध्यप्रदेश के आखिरी, दस बरस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की एक बात याद आती है कि चुनाव विकास कार्यों से नहीं, मैनेजमेंट से जीता जाता है। यह बात पूरी तरह सच चाहे न हो, लेकिन सारे विकास कार्य, जनकल्याण के सारे कार्यक्रम, उनकी कामयाबी, के बाद भी जब सत्ता पर बैठी पार्टी को एक-एक वोट के लिए नाजायज खर्च करना पड़ता है, और उसके मुकाबले विपक्ष में बैठी, सत्ता पर आने को बेचैन पार्टी के जिस तरह लगातार टक्कर का खर्च करना पड़ता है, उसे देखकर यह लगता है कि दुनिया के सबसे विशाल इस लोकतंत्र का यह सबसे निष्पक्ष और कामयाब समझा जाने वाला चुनाव क्या सबसे ताकतवर खरीददार की प्लास्टिक की बास्केट में बाजार से लाया जाने वाला सामान नहीं है? 
हिन्दुस्तानी चुनावों की हकीकत इतना हताश करने वाली है, कि अच्छा काम एक सीमा तक लोगों के काम आता है, सरकार चलाने में कामयाबी एक सीमा तक काम आती है, उसके साथ-साथ बेईमानी और भ्रष्टाचार के हथियार और औजार खुलकर चलाने पड़ते हैं, तब जाकर उनके अच्छे काम भी किसी मुकाम तक उनको पहुंचा पाते हैं। आज हिन्दुस्तान में कोई भी पार्टी बहुत अच्छे काम करने के बाद भी जब तक चुनावों में बहुत बुरे-बुरे काम नहीं करेगी, वह जीतकर नहीं आ सकेगी। ऐसे में यह लगता है कि हिन्दुस्तानी लोकतंत्र अपनी चुनावी निरंतरता पर जो फख्र करता है, वह क्या सचमुच का है, या किसी रामलीला के मुखौटे जैसा है? 
यही वजह है कि देश की संसद और विधानसभाओं में लगातार अरबपति और करोड़पति लोग बढ़ते चल रहे हैं क्योंकि पार्टियां ऐसे लोगों को टिकटें बेचती हैं, या जीत की अधिक संभावना देखते हुए मुफ्त में भी दे देती हैं, इस गारंटी पर कि उनको चुनाव का खर्च भी पार्टी से नहीं देना पड़ेगा। यह पूरा देश एक खरीदे हुए लोकतंत्र पर चल रहा है, और एक पाखंड की तरह चुनाव होते हैं, लोगों को तसल्ली रहती है कि वे वोट डाल रहे हैं, जबकि हकीकत में वे बेईमान नेता हैं जो कि चुनाव में वोटरों की जेब में नोट डालते हैं। खरीदी और बिक्री का यह खेल लोकतंत्र की पवित्रता का एक मुखौटा लगाकर चल रहा है, और जीत का हाल एक अंग्रेजी फिल्म इनडिसेंट प्रपोजल की तरह का हो गया है, जिसमें एक अरबपति एक नौजवान जोड़े को यह प्रस्ताव देता है कि खूबसूरत पत्नी अगर एक रात उसके साथ गुजारे, तो वह उसके बदले एक मिलियन डॉलर देगा। और भारी अंतद्र्वद्व के बाद यह जोड़ा इस अनैतिक प्रस्ताव को छोड़ नहीं पाता। भारत के चुनाव मतदाताओं के एक निर्णायक हिस्से को ऐसा ही अनैतिक प्रस्ताव देकर खरीदे जा रहे हैं। लेकिन यह लिखते हुए भी हमारे पास इस नौबत से बेहतर किसी और नौबत की सूझ नहीं है। शायद ऐसी ही नौबत के लिए किसी ने यह लिखा था कि लोग वैसी ही सरकार पाते हैं, जैसी सरकार पाने के वे हकदार होते हैं। 

हादसों से जो सबक नहीं लेते, वे बड़े हादसों को न्यौता देते हैं

30 अक्टूबर 2013
संपादकीय
जब कोई हादसे होते हैं, तो सबक लेने का मौका भी सामने आता है। जो समाज दूसरों को ठोकर खाते देखकर खुद संभलना नहीं सीखता, वह अपने बचाव के मौके खोता है। छोटी-छोटी बातों से बड़ी-बड़ी नसीहतें निकलती हैं, और समझदार उनका इस्तेमाल करते हैं। आज इस वक्त हमारे सामने हमारे शहर में एक बड़े व्यवसायिक कॉम्पलेक्स के बेसमेंट में लगी आग की तस्वीरें हैं। वैसे तो इस हादसे को फायर ब्रिगेड के लायक मानकर छोड़ा जा सकता है, लेकिन समझदारी यह कहती है कि ऐसे मौके पर ऐसी इमारत के वैध या अवैध होने की बात भी देखनी चाहिए। और इस आग में से धुएं भरे हुए बेसमेंट में से अपने मालिक की स्कूटर को धकेलकर बाहर लाते हुए एक नाबालिग कर्मचारी दिख रहा है जिसने मुंह पर कपड़ा भी बांध रखा है। तो इस मौके पर, ऐसी तस्वीर के सहारे यह भी जांच-परखा जा सकता है कि किस दुकान में ऐसे बच्चे काम पर रखे गए हैं, और खतरे की जगह से स्कूटर निकालने के लिए उस बच्चे को किसने झोंका है। इसी तरह इस बेसमेंट से घरेलू रसोई गैस सिलेंडर निकलते दिख रहा है, जिसके बारे में यह जांच की जरूरत है कि केन्द्र सरकार की दी गई घरेलू रियायत का बेजा इस्तेमाल यहां पर कौन सा कारोबार कर रहा था? 
हर हादसे से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है, लेकिन उसके लिए दिमाग की आंखों को खुला रखना पड़ता है, और खासकर जो लोग जिम्मेदारी की कुर्सियों पर, उन लोगों को अपने कामकाज से जुड़े, अपने दायरे जैसे हादसों को बारीकी से देखना चाहिए, और अपनी जिम्मेदारी के तहत बचाव के इंतजाम करवाने चाहिए। आज हिन्दुस्तान में हालत यह है कि जब तक मौतें बहुत अधिक न हो जाएं, जब तक खबर बहुत बड़ी न बन जाए, जब तक किसी अदालती डंडे का डर न हो, तब तक सरकार में बैठे लोग हादसों से बचने की तैयारी करते नहीं दिखते। इसके लिए केन्द्र सरकार से राज्यों को खासा पैसा मिलता है, राज्यों से जिलों, और म्युनिसिपलों को पैसा मिलता है, लेकिन कमाई करवाने वाली सामानों की खरीदी से परे बचाव की तैयारियां होते नहीं दिखतीं। और फिर सामान जो एक बार खरीद लिया जाता है, उसमें भी दिलचस्पी खरीदी और भुगतान तक रहती है, मुसीबत के वक्त के लिए उन सामानों को चालू हालत में रखने तक की दिलचस्पी लोगों की नहीं रहती। 
इसमें सिर्फ सरकार को कोसने से कुछ नहीं होगा और जनता के बीच के लोगों, जनसंगठनों को सरकारी लापरवाही या अनदेखी के मामलों को मीडिया के मार्फत या अदालत तक, मानवाधिकार आयोग तक, या ऐसे दूसरे संवैधानिक दफ्तरों तक ले जाना होगा। जनता के बीच जब तक अपने हकों को लेकर, अपनी हिफाजत को लेकर जागरूकता नहीं होगी, तब तक भारत में वही सरकारी ढर्रा जारी रहेगा, जो कि एक बदनाम शब्द बना हुआ है। सरकार में बैठे लोगों के जिस रूख को सरकारी तौर-तरीका कहा जाता है, भारत की उस ताजा गाली को गालियों की लिस्ट से बाहर निकालने की जरूरत है। हिन्दुस्तान में लोगों के बीच नियम-कायदे को लेकर एक बहुत बेफिक्री और लापरवाही भरी हुई है, और इस हालत को बदलने की जरूरत है, किसी बड़े हादसे के हुए बिना भी। 
सार्वजनिक जगहों से लेकर जनसुविधाओं तक, और कारोबारी जगहों से लेकर सरकारी जगहों तक, बदहाली और बेहाली का नजारा रहता है, और इन सबके लिए नियमों की तो लंबी-लंबी लिस्टें हैं, लेकिन उन पर अमल न करने से किसी का कुछ बिगड़ता नहीं, इसलिए लोग इन लिस्टों की परवाह नहीं करते। देश में जहां-जहां कुछ जागरूक लोग जायज मुद्दों को लेकर लड़ते हैं, वहां-वहां फर्क भी पड़ता है। बेइंसाफी और बदइंतजामी के खिलाफ जो समाज चुप रहता है, वह उसी का हकदार भी रहता है। इसलिए जब शहर में कहीं कोई हादसा हो, तो उससे जुड़े पहलुओं पर लोगों को सरकार से, बाजार से, सवाल करने चाहिए। आज अदालतों के दरवाजे पहले के मुकाबले अधिक आसानी से खटखटाए जा सकते हैं, लोगों को अपने इस लोकतांत्रिक हक का इस्तेमाल करना चाहिए। 

सुशील कुमार शिंदे के बचाव में कुछ बातें

29 अक्टूबर 2013
संपादकीय
यूं तो हिन्दुस्तान में हर दिन किसी न किसी कोने में धमाके होते हैं, और देश के भीतर के आतंकी, या बाहर के हमलावर लोगों को मारते हैं, लेकिन केन्द्र और राज्य की सरकारों का काम चलते रहता है। भारत के इतिहास में सबसे बड़ा आतंकी हमला मुंबई में हुआ, जहां पर कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार थी, और उस वक्त देश पर भी कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार थी। उससे अधिक बड़ा हमला किसी ने सोचा भी नहीं था, लेकिन फिर भी देश और प्रदेश का कामकाज चलता रहा। आज केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को इस बात के लिए कोसा जा रहा है कि जिस दिन पटना में मोदी की आमसभा के मौके पर मैदान के आसपास कई धमाके हुए, और सुशील कुमार शिंदे पहले से तय अपने एक कार्यक्रम में मुंबई में गए हुए थे, और उन्होंने वहां संगीत की एक सीडी जारी की। इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस के विरोधी लोग यह कह रहे हैं कि जिस दिन मौतें हुईं, उसी दिन गृहमंत्री फिल्मी सितारों वाले संगीत के कार्यक्रम में जा रहे हैं, पटना जाने के बजाय। 
यहां पर हम यह याद दिलाना चाहते हैं कि एक विशाल लोकतंत्र में अगर खुशी के किसी समारोह में न जाना हो, तो साल के हर दिन देश में कुछ न कुछ ऐसा अप्रिय होते रहता है कि उसकी वजह से खुशी को टाला जाए। लेकिन सार्वजनिक जीवन की विविधता की यह भी मांग रहती है कि सुख और दुख साथ-साथ चलते हैं, और जब तक कोई राष्ट्रीय शोक जैसी नौबत न आ जाए, तब तक बाकी लोगों को अपने कार्यक्रम छोड़कर हादसों की जगह दौडऩे की हड़बड़ी नहीं दिखानी चाहिए। छत्तीसगढ़ में ही साल में दस-बीस बार आधा दर्जन लोग बस्तर में मारे जाते हैं, जहां पर कि राज्य और केन्द्र सरकार दोनों के सुरक्षा बल तैनात हैं। तो उसकी वजह से ऐसे हर दिन पर गृहमंत्री के देश भर के कार्यक्रम टाल देने की बात उठ सकती है, लेकिन क्या उससे ऐसे हादसों की जांच में कोई मदद मिल सकती है? 
और दूसरी बात यह कि राज्य की सीमाओं में हिफाजत का जिम्मा राज्य सरकार का होता है, उसमें केन्द्र सरकार सीधे-सीधे न जिम्मेदार होती है, न जवाबदेह होती है, ऐसे में केन्द्रीय गृहमंत्री को कोसने से जिनका पेट भरता हो, उनके लिए तो यह ठीक है, लेकिन हमको ऐसा कोई आग्रह एक दुराग्रह ही लगता है। अगर हमलों और हादसों की जगहों पर केन्द्रीय गृहमंत्री दौड़कर शुरू के घंटों में ही पहुंच जाएं, तो हमारा यह मानना है कि उससे जांच पर बुरा असर ही पड़ेगा। जब राहत, बचाव, सुबूत जुटाने, मुजरिमों की शिनाख्त करने और पीछा करने के बोझ से स्थानीय अफसर खाली हो जाएं, उसके बाद ही केन्द्र सरकार के लोगों को वहां पहुंचना चाहिए। अमरीका का राष्ट्रपति अमरीका में आने वाले तूफान से होने वाली भारी तबाही के बाद भी तब तक वहां न जाने की घोषणा करता है जब तक कि राहत और बचाव का काम पटरी पर न आ जाए। इसलिए केन्द्रीय गृहमंत्री आनन-फानन कहीं पहुंचे, और स्थानीय अफसर उनके इंतजाम और उनको जवाब देने में लग जाएं, तो यह एक बुरी बात रहेगी। 
इसी सिलसिले में इससे बिल्कुल अलग एक और बात हम करना चाहते हैं। कल जब गृहमंत्री शिंदे की आलोचना हो रही थी तो एक टीवी चैनल पर वामपंथी पार्टी के प्रवक्ता अतुल कुमार अंजान शिंदे के खिलाफ यह बोलते दिखे कि वे एक वक्त महाराष्ट्र में सब इंस्पेक्टर थे, और उसी काबिलीयत के आधार पर उनको महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया गया था। यह सोच बहुत ही खराब है जो कि आमतौर पर शहरी, सवर्ण, और संपन्न तबकों के कुछ लोगों के बीच देखी जाती है जो कि नीचे से उठकर ऊपर तक पहुंचने वाले लोगों को हिकारत से देखते हैं कि वे कल तक कितने नीचे थे और आज कितने ऊपर आ गए हैं। यह सोच पूरी तरह से एक कुलीन और कुनबापरस्त सोच है, और वामपंथी पार्टी को ऐसी भद्दी बात कहने के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। यह एक गर्व की बात होनी चाहिए कि कोई व्यक्ति बहुत छोटे पद से आगे बढ़ते हुए, बिना किसी कुनबापरस्ती के, इतने ऊपर तक आए। इतने ऊपर तक आने के बाद फिर उनके काम का मूल्यांकन कामों के आधार पर होना चाहिए, न कि ऐसा व्यक्ति कितने नीचे से उठकर यहां तक पहुंचा है। नीचे को नीच मान लेने की एक किस्म की जो हिन्दुस्तानी सोच है, वह हर छोटे इंसान को हिकारत से देखती है। हमको वामपंथी प्रवक्ता से ऐसी उम्मीद नहीं थी, और इतने आक्रामक तरीके से यही वामपंथी नेता भारतीय लोकतंत्र के चिरागदीनों के खिलाफ कभी नहीं बोलते। उनको कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी तक, और लालू यादव का पार्टी तक, किसी की भी कुनबापरस्ती से परहेज नहीं है, लेकिन एक इंसान का पहले सब इंस्पेक्टर होना उनको हंसी-मजाक, या अपमान का सामान दिखता है। 
सुशील कुमार शिंदे की हम कई मौकों पर कई बातों की आलोचना करते आए हैं, लेकिन हम कुछ घंटों के भीतर पटना न जाने के लिए उनकी आलोचना नहीं करेंगे, पहले से तय किसी दूसरे कार्यक्रम में जाने के लिए उनकी आलोचना नहीं करेंगे, और अपनी जिंदगी में छोटे से काम से बढ़ते-बढ़ते इतने ऊपर तक आने के लिए उनकी आलोचना नहीं करेंगे। फिर पटना में छोटे-छोटे बम धमाकों में कुछ लोगों की मौतों पर मुद्दा बनाने वाले लोगों को क्या कश्मीर से लेकर बस्तर तक आए दिन होने वाली बेकसूरों की मौतों पर इतना ही बोलने की फुर्सत मिलती है? 

पटना धमाकों के आगे-पीछे

28 अक्टूबर 2013
संपादकीय

कल पटना में मोदी की ऐतिहासिक भीड़ भरी रैली में आधा दर्जन धमाके हुए, और करीब उतने ही लोगों की मौत भी हुई। एक बार फिर केन्द्र और राज्य की सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज पर सवाल उठने लगे, आपस में हादसे के पहले की तैयारियों को लेकर भी केन्द्र, बिहार, और गुजरात पुलिस खबरों में है। अभी इन धमाकों को लेकर पार्टियों के बीच और सरकारों के बीच बहुत अधिक कड़ी और कड़वी बात तो नहीं हो रही है, लेकिन चुनाव के पहले के इन महीनों में इन सबके राजनीतिक समर्थकों के बीच बढ़-चढ़कर बहस हो रही है। 
आने वाले महीनों में बहुत सी सभाएं होंगी, अपने राज के प्रदेशों में भी होंगी, और दूसरी पार्टियों के राज वाले प्रदेशों में भी होगी। जिन लोगों को आज यह लगता है कि नीतीश कुमार की सरकार ने मोदी की सभा की हिफाजत के लिए पर्याप्त कार्रवाई नहीं की थी, उन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि भारत जैसे बड़ी आबादी वाले लोकतंत्र में जब एक या दो दिनों के भीतर, पांच-दस लाख लोगों की आवाजाही होती है, तो उनकी हिफाजत की तैयारी की एक सीमा ही हो सकती है। उससे अधिक हिफाजत लोकतंत्र में मुमकिन नहीं है, और दुनिया का आज का माहौल बताता है कि जहां पर पूरी फौजी हुकूमत का काबू है, वहां भी छोटे-मोटे हमले हो ही सकते हैं। अपने घरों में लोग घरेलू और खुले बाजार के सामानों को जोड़कर जब मामूली धमाकों वाले बम बना लें, और लाखों की भीड़ के बीच उनको ले जाकर छोड़ दें, तो सुरक्षा एजेंसियां एक सीमा से अधिक कामयाब नहीं हो सकतीं। यही हो सकता है कि ऐसे हादसों के बाद बचाव तेजी से हो, और मुजरिम तेजी से पकड़े जाएं, इन दो में से एक बात पटना में होते दिख रही है, जहां पर मुजरिम शायद पकड़े जा चुके हैं। 
इस बात पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि हमलों के तुरंत बाद अगर राजनीतिक बयानबाजी होती है, तो राजनीतिक हमलों के जवाब में राजनीतिक बचाव भी होता है, और उससे जांच पर असर पड़ता है। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी कई बार की ऐसी लापरवाही के बाद अब चुप रहना सीख चुकी हैं। भाजपा के जिन लोगों को पटना नीतीश कुमार की लापरवाही दिखती है, उनको छत्तीसगढ़ में कुछ महीने पहले कांग्रेस के एक काफिले पर हुए नक्सल हमले को याद रखना चाहिए। एक ही हमले में कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं सहित ढाई दर्जन लोग मारे गए थे। उस काफिले की खबर सरकार को पहले से थी, और उस इलाके में नक्सल हमला होने की खुफिया जानकारी राज्य सरकार की तरफ से ही राज्य की ही जिला पुलिस को गई थी। उसकी अभी जांच चल ही रही है, इसलिए उसकी जिम्मेदारी को लेकर अधिक अटकलें लगाने की जरूरत नहीं है, लेकिन हम इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि आतंकी हमलों को लेकर केन्द्र और राज्य के बीच, राजनीतिक दलों के बीच, राजनीति नहीं छिडऩी चाहिए, उससे देश का माहौल अधिक जहरीला होता है, और देश के संघीय ढांचे में भी दरार आती है। 
आज हिन्दुस्तान में मीडिया के चलते, अदालतों की सक्रियता के चलते, किसी बात को छुपाना, और जांच से परे रखना आसान नहीं है, मुमकिन नहीं है। खुद मोदी का गुजरात इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है कि किस तरह दंगों, हत्याओं, और पुलिस की अनदेखी, राज्य सरकार की साजिश, ये सब कुछ आखिर में जाकर अदालत में बिना कपड़ों के खड़े होने को बेबस हो जाते हैं। इसलिए आतंकी हमलों की आग पर कुछ घंटों के भीतर वोटों की रोटी नहीं सेंकना चाहिए, उसमें देश का बहुत सा वक्त खराब होता है, और लोगों के मुंह का स्वाद भी बिगड़ता है। हिन्दुस्तानी मीडिया भी अपने खाली दिमाग के साथ, अपने खाली बुलेटिन, खाली पन्ने भरने के लिए लोगों की भड़काने और उकसाने वाली बातें सिर्फ एक हरकारे जैसी जिम्मेदारी के साथ दूसरों तक पहुंचाकर, उनका जवाबी हमला ढोकर, इन सबको पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाने का काम कर रहा है। ऐसा बेदिमाग और गैरजिम्मेदारी का काम मीडिया नहीं है, और मीडिया के लोगों को अपनी अकल के इस्तेमाल से पूरी तरह परहेज नहीं करना चाहिए। सनसनी फैलाने का काम कुछ गिने-चुने टीवी चैनलों के घोषित सनसनी वाले कार्यक्रमों के लिए छोड़ देना चाहिए, और अपने बुलेटिनों को जिम्मेदारी के साथ भरना चाहिए, वरना समाचारों की जगह नाच-गाना या कॉमेडी कुछ अधिक देर दिखाना चाहिए। देश की जनता को भी लापरवाही और बदनीयत से फैलाई जा रही बातों को खारिज करना सीखना चाहिए। 

झूठ किसी भी नेता का भी हो, उसे उजागर करने की जरूरत

संपादकीय
27 अक्टूबर
भारत में अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव शुरू हो चुके हैं। हर दिन बड़ी-बड़ी चुनावी सभाएं हो रही हैं, और दो बड़ी पार्टियां खबरों में छाई हुई हैं। पिछला हफ्ता बयानों और उनके जवाबों का रहा। हमने भी राहुल गांधी के बयान से लेकर दूसरे बयानों तक पर लिखा। अब सवाल यह है कि अगले दो महीनों के विधानसभा चुनावों से लेकर आने वाले लोकसभा आम चुनाव तक, अगले दो सौ दिन क्या बयानों में उलझकर ही रह जाएंगे? या नीतियों और कार्यक्रमों की ठोस बात भी हो पाएगी? 
राहुल गांधी ने एक बयान दिया कि उनको एक खुफिया एजेंसी के अफसर ने कहा है कि उत्तरप्रदेश में दंगों के शिकार मुस्लिम नौजवानों से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई संपर्क कर रही है। इसे लेकर बहुत से सवाल उठे कि राहुल गांधी को किस हैसियत से खुफिया अफसरों से कोई जानकारी मिल सकती है? दूसरा सवाल यह उठा कि ऐसा बयान देकर क्या राहुल गांधी दंगों के शिकार मुस्लिम नौजवानों का ही बुरा नहीं कर रहे हैं? इस पर सरकार की एजेंसियों की तरफ से यह खुलासा आया कि भारत की खुफिया एजेंसियों के पास ऐसी कोई जानकारी नहीं है। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार में उत्तरप्रदेश के कांग्रेस नेता और देश के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी के बचाव में कहा कि उनकी भावनाओं को समझना चाहिए। 
अब सवाल यह उठता है कि देश की सुरक्षा, और देश की भावनात्मक एकता पर ऐसी नाजुक और खतरनाक बात को खुफिया एजेंसी के हवाले से आमसभा के मंच से अगर प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी कहता है, तो उसकी बात के तथ्यों को अनदेखा करके उसकी सिर्फ भावनाओं को समझने की क्या मजबूरी देश की हो सकती है? आज का वक्त नाजुक मुद्दों पर, नाजुक मौकों पर सिर्फ भावनाओं का नहीं है, तथ्यों और तर्कों का भी है, और जिम्मेदारी का भी है। 
आज इस मुद्दे को छूते हुए यहां लिखने की जरूरत इसलिए भी आ गई है कि कल नरेन्द्र मोदी का एक इंटरव्यू एक प्रमुख अखबार दैनिक भास्कर में छपा है जिसमें उन्होंने सरदार पटेल के प्रति जवाहर लाल नेहरू की नापसंदगी की चर्चा करते हुए कहा कि नेहरू पटेल की शवयात्रा में भी शामिल नहीं हुए थे। इस बात पर आज कांग्रेस पार्टी के सबसे अधिक बोलने वाले नेता दिग्विजय सिंह ने तुरंत ही जवाब किया है कि मोरारजी देसाई की आत्मकथा को पढ़कर यह देख लें कि नेहरू पटेल के अंतिम संस्कार में गए थे। हमने जब इतिहास के तथ्यों को आज तलाशा, तो जगह-जगह बहुत से पत्रकारों के लिखे हुए संस्मरण हैं कि किस तरह नेहरू न सिर्फ पटेल के अंतिम संस्कार में मुंबई गए थे, बल्कि उनकी बीमारी के वक्त जब दिल्ली से उनको इलाज के लिए मुंबई ले जाया गया, तो उनको छोडऩे के लिए वे दिल्ली एयरपोर्ट पर भी गए थे। इतिहास के इन दो नेताओं की असहमति बहुत जगह दर्ज है, लेकिन नरेन्द्र मोदी को आज गुजरात में सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने के लिए गुजर चुके नेहरू के कद को छोटा करने के लिए तथ्यों से परे की बात नहीं करनी चाहिए। इतिहास, और खासकर भारत का समकालीन ताजा इतिहास कई तरह से दर्ज है, और नेहरू के शवयात्रा में शामिल न होने की बात कहकर नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल का कद तो नहीं बढ़ा पाए, उनका खुद का कद तथ्यों से परे की इस बात की वजह से कुछ कम जरूर हो गया है। 
राहुल और मोदी के बयानों पर लिखते हुए आज यहां पर कांग्रेस के एक ऊल-जलूल बयान देने वाले केन्द्रीय मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा का जिक्र करना हमको खुद को अच्छा नहीं लग रहा है, लेकिन साम्प्रदायिक दंगों के नाजुक मामलों पर अगर कोई केन्द्रीय मंत्री कोई बहुत सनसनीखेज बात कहता है, तो उसका जिक्र जरूरी भी है। समाजवादी पार्टी से अपनी नफरत को एक बार फिर उजागर करते हुए बेनीप्रसाद वर्मा ने अभी यह बयान दिया है कि उत्तरप्रदेश के ताजा साम्प्रदायिक दंगे समाजवादी पार्टी और भाजपा ने मिलकर करवाए, और इसके लिए गुजरात से दो सौ लोग उत्तरप्रदेश आए, और उन लोगों ने हत्याएं कीं। यह बात आसानी से छोडऩे लायक नहीं है। इसको लेकर समाजवादी पार्टी, भाजपा, अदालत, जांच एजेंसियां सबको देखना चाहिए कि बेनीप्रसाद वर्मा के पास इस बात के कौन से सुबूत हैं, और यह देखना इंसाफ के लिए जरूरी भी होगा। और अगर उनकी इस बात में सच्चाई साबित नहीं होती है, तो साम्प्रदायिकता भड़काने का मुकदमा उनके ऊपर चलना चाहिए। गुजरात और मोदी की अप्रिय चर्चा बहुत सी और तथ्यात्मक बातों को लेकर हो सकती है, समाजवादी पार्टी को गालियां भी उसकी कुछ दूसरी बातों के लिए दी जा सकती है, लेकिन आरोपों को तथ्यों की शक्ल में ढालकर उनको पेश करने वालों को सार्वजनिक और अदालती जवाबदेही के लिए तैयार रहना चाहिए। 
हिन्दुस्तान में जनता के सामने बहुत सी और दिक्कतें हैं। उनके सामने अगर राहुल, मोदी, या बेनीप्रसाद, कोई भी तथ्यों का झूठ रखकर उसे उलझाते हैं, तो यह एक गैरजिम्मेदारी की बात है। जनता को असत्य, अर्धसत्य, और अंशसत्य का फर्क दिखता रहे, इसलिए हम इन बयानों की आज यहां चर्चा कर रहे हैं। लोगों को झूठ को उजागर करना चाहिए, उसके बिना सच का सम्मान नहीं हो पाएगा। 

करूणा शुक्ला का इस्तीफा और कुदरत से नसीहत की जरूरत

संपादकीय
26 अक्टूबर 2013
छत्तीसगढ़ में मतदान के दो हफ्ते पहले आज भाजपा को एक तगड़ा झटका लगा है, भूतपूर्व सांसद करूणा शुक्ला के इस्तीफे की शक्ल में। अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला पिछले तीन दशक से अधिक से भाजपा में सक्रिय थीं, और पार्षद से लेकर विधायक तक, और फिर सांसद तक के चुनाव उन्होंने पार्टी टिकट पर जीते, पार्टी के महिला मोर्चा की वे राष्ट्रीय अध्यक्ष रहीं, और अब विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने की वजह से वे आज नाराजगी जाहिर करते हुए पार्टी छोड़ गईं। 
कुछ दिनों पहले तक छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के भीतर गुटबाजी, नाराजगी, और तोडफ़ोड़ का जो माहौल दिख रहा था, वह पिछले दस दिनों में एक अभूतपूर्व और अविश्वसनीय दर्जे की एकता में बदला हुआ दिख रहा है। दूसरी तरफ भाजपा जो कि भारी भरोसे से भरी हुई थी, वह कई किस्म की बगावत देख रही है, और इसके बड़े नेता दमकलों की तरह सायरन बजाते हुए प्रदेश भर में दौड़ रहे हैं। इन दोनों बातों को जब एक साथ मिलाकर देखें, तो लगता है कि पिछले चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच दो फीसदी से कम वोटों का जो फासला था, वह इस बार कपूर की तरह धुआं हो रहा है। लेकिन हम चुनाव के पहले के पखवाड़े में एक-एक घटना से, एक-एक इस्तीफे से, किसी पार्टी की जीत और हार की अटकलबाजी में पडऩा नहीं चाहते। आज इस मुद्दे पर लिखने का मकसद कुछ और है। 
अटल बिहारी वाजपेयी और दिये का निशान एक वक्त एक ही हुआ करते थे। उसके बाद पिछले लोकसभा चुनाव तक भाजपा अटल छाप पर चुनाव लड़ती थी, और चुनाव आयोग की शर्तों के लिए ही उसने कमल निशान रखा था, वरना पार्टी का निशान अटल बिहारी वाजपेयी ही थे। उन्होंने अपना सब कुछ पार्टी को दिया, और पार्टी ने भी उनको जो इज्जत दी, जो महत्व दिया, वह भाजपा के इतिहास, वर्तमान, और शायद भविष्य भी, में किसी दूसरे को न मिल सके। ऐसे नेता की भतीजी को पिछले तीन दशकों में पार्टी ने बहुत कुछ दिया, और कई मौकों पर ऐसा भी लगता था कि अटलजी की भतीजी होने की वजह से उन्हें हक से कुछ अधिक अहमियत भी मिलती थी। अब साठ की उमर पार होने के बाद, पार्टी प्रत्याशी की हैसियत से बड़े-बड़े चुनाव लडऩे, जीतने और हारने के बाद, राष्ट्रीय स्तर की कुर्सी पर मनोनीत होने के बाद अब अगर विधानसभा की एक टिकट न मिलने पर वे पार्टी छोड़ रही हैं, तो पार्टी के उनके प्रति रूख के साथ-साथ उनके पार्टी के प्रति रूख को भी देखने की जरूरत है।
आखिर कोई पार्टी या कोई संगठन किसी को कितना कुछ दे सकते हैं? और क्या किसी एक कुनबे या किसी एक व्यक्ति को दशकों तक लगातार महत्व देने के बाद क्या आखिरी दिन तक चुनावी टिकट या कुर्सी देते रहना किसी संगठन की जिम्मेदारी मानी जा सकती है? आखिर किसी भी बड़ी पार्टी में, या संगठन में बाकी लोगों को मौका आखिर कब मिलेगा? आखिर किसी संस्था में नया खून कब आ सकेगा? नई पीढ़ी को जगह कब मिल सकेगी? कुदरत से भी कुछ सीखने की जरूरत है जिसमें पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं, नए पत्ते आते हैं, उसके बीज दूर-दूर तक जाते हैं, और पेड़ यह परवाह भी नहीं करते कि उनके फल खाने वाले लोग उनका शुक्रिया अदा करके जाते हैं या नहीं। लोग अगर कुछ सीटों पर, कुर्सियों पर अपने कुनबे की, अपनी जागीरदारी मानकर चलें, तो यह लोकतंत्र के तो सीधे-सीधे खिलाफ है ही, यह किसी भी संगठन के हित में भी नहीं है। 
हमारा मानना है कि जैसे अमरीकी राष्ट्रपति को चार बरस के दो कार्यकालों के बाद किसी भी सरकारी जगह पर बैठने की कोई छूट नहीं रहती, वैसा भारत में भी सरकारी कुर्सियों पर, पार्टी की कुर्सियों पर, संसद और विधानसभाओं में होना चाहिए। अगर नए-नए लोग लोकतंत्र में नए मौके नहीं पाएंगे, तो लोकतंत्र में वक्त के साथ जरूरी ताजगी नहीं आ पाएगी। कोई कांग्रेस पार्टी छोड़े, या भाजपा, हर पार्टी को इसके लिए तैयार भी रहना चाहिए कि वे इस्तीफों की फिक्र न करके नए लोगों को मौका दें। इसके अलावा करूणा शुक्ला जैसे वरिष्ठ और अनुभवी लोगों को एक वक्त आने पर यह मानना चाहिए कि पार्टी से उन्हें बहुत कुछ मिला है, और एक वक्त ऐसा आता है, जब और अधिक पाने की चाह के बजाय, पार्टी को कुछ देने की राह ढूंढनी चाहिए। आज पूरे देश के चुनावी नतीजे इस बात का गवाह हैं कि नए चेहरे बेहतर नतीजे देते हैं, और दुनिया इस बात की गवाह है कि नई कल्पनाएं, नई सोच, नई संभावनाएं लाती हैं। ऐसे मौकों पर पार्टी छोडऩे वाले लोगों को कुदरत से नसीहत लेनी चाहिए कि कुछ पाने की उम्मीद किए बिना, देने की दरियादिली भी रहनी चाहिए, और खासकर तब, जब पार्टी ने दशकों तक दिया ही दिया है। 

कांग्रेस पार्टी को अपने भीतर इस पर सोचने की जरूरत है

25 अक्टूबर 2013
संपादकीय
पिछली दो-तीन चुनावी सभाओं में राहुल गांधी मध्यप्रदेश और राजस्थान के मतदाताओं के बीच मंच और माईक से जो बातें कहीं, उनको देश ने ध्यान से सुना,  और उसके बारे में चारों तरफ चर्चा भी हो रही है। लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर, कांग्रेस पार्टी के हमदर्द, राहुल गांधी की बातों को लेकर कुछ परेशान हैं, और कुछ हैरान हैं। हैरानी इस बात की है कि वे जितने खुलासे से अपने परिवार के त्याग को लेकर, पिता और दादी की कुर्बानियों लेकर, निजी यादों की चर्चा कर रहे हैं, उनमें से कितनी बातें आज की चुनावी तैयारियों के बीच प्रासंगिक हैं, जरूरी हैं, या सही हैं? 
कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी की स्थिति बिल्कुल ही अनोखी है। वे अपनी पार्टी, पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधन, यूपीए, इस गठबंधन की सरकार, और सरकार के कांग्रेसी प्रधानमंत्री, सबको खारिज करते हुए अपने मन का कर सकते हैं, और उस पर पार्टी का कोई बस नहीं है, सहयोगी दलों का भी कोई बस नहीं है। इसलिए जब राहुल गांधी राजनीति के भीतर इतने बड़े फेरबदल की बात करते हैं, सब कुछ इतना अच्छा करने की बात करते हैं, जितना कि, जैसा कि, उनकी पार्टी ने आधी सदी में नहीं किया है, तो उनकी बातें अच्छी होने के बावजूद अटपटी लगती हैं। उनको कांग्रेस के भीतर निर्वाचित सांसद के रूप में भी करीब दस बरस हो चुके हैं, और इन बरसों में सत्ता के केन्द्र में निर्णायक भूमिका में रहने के बाद भी राहुल गांधी ने अपनी आज कही जा रही बातों जैसा करने का कोई ताजा इतिहास छोड़ा नहीं है। इसलिए उनकी कही अच्छी बातों का साथ देने के लिए, अपनी पार्टी और सरकार के भीतर उनके उठाए गए अच्छे कदम दिखते नहीं हैं। उनकी नीयत सही हो सकती है, लेकिन इसके सुबूत के तौर पर उन्होंने पिछले दस बरसों में अपनी पार्टी की गलतियों और गलत कामों के खिलाफ कुछ किया हो ऐसा किसी ने देखा नहीं है। 
यह बात सही है कि जिस परिवार ने अपने दो-दो लोगों को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खोया है, उसका दर्द बची पूरी जिंदगी, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहेगा। इस नाते जब राहुल गांधी अपने बचपन से लेकर अब तक की दर्द भरी यादों को चुनावी सभा में विस्तार से बांटते हैं, तो उनमें झूठ कहीं भी नहीं लगता। लेकिन आज जब कांग्रेस ने उनको प्रधानमंत्री पद का अगला प्रत्याशी पेश कर दिया है, और यूपीए ने उसे मान लिया है, तो उनकी सारी बातों को भावी प्रधानमंत्री की कही बातों की तरह ही देखा जाएगा, और देश की जनता उसी तरह उनकी बातों को देख भी रही है। यहां पर आकर राहुल गांधी से देश का समझदार तबका यह उम्मीद करता है कि यादों से परे, सपनों से परे, जमीनी हकीकत की बात वे करें, और नारों से परे वे आगे की ठोस योजना की बात भी करें। यह देश न तो मोदियों के मुंह से धर्म और नारों की बात सुनना चाहता, और न ही राहुल गांधी या किसी और नेता के मुंह से निजी यादों को सुनना चाहता है। 
एक दूसरी नाजुक बात जो राहुल गांधी ने छेड़ी है, वह इंदिरा गांधी की हत्या के पीछे सिक्ख सुरक्षा कर्मचारियों की है, और यह कि कैसे उन्हें बचपन की अपनी नाराजगी से उबरने में लंबा वक्त लगा। उनकी बात पूरी तरह जायज है, लेकिन दिक्कत यह है कि जिन सिक्ख सुरक्षा कर्मचारियों के हाथों हत्या की चर्चा वे कर रहे हैं, उसी सिक्ख समाज के उसी दौर के जख्म बहुत बुरी तरह आज भी उधड़े हुए हैं, इंसाफ के लिए लड़ते हुए वह समाज अदालतों के बाहर सड़कों पर छातियां पीट रहा है। ऐसे में अपनी निजी यादों की कितनी और कौन-कौन सी बातों की चर्चा देश की चुनावी राजनीति, और खासकर कांग्रेस पार्टी की मददगार होगी, यह अंदाज लगाना कम से कम हमारे लिए आज मुश्किल है। 
एक दूसरी बात जो राहुल गांधी ने कल ही कही है, और उसके बाद ही आज इन बातों पर यहां मिलाकर लिखने की सूझी है, वह है उत्तरप्रदेश के दंगाग्रस्त मुस्लिम नौजवानों के बारे में उनकी कही बात। राहुल ने कल यह कहा कि उत्तरप्रदेश के दंगा प्रभावित मुस्लिम नौजवानों से पाकिस्तान की आईएसआई के संपर्क बनाने की बात उनको एक खुफिया अफसर ने बताई है। उनके इस एक बयान ने बहुत से सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें से कुछ भाजपा चुनाव आयोग के सामने उठा रही है, सरकार से जवाब मांग रही है, और कुछ सवाल हमारे जैसे लोगों के मन में भी उठ रहे हैं। एक खुफिया अफसर ऐसी संवेदनशील जानकारी किस तरह और क्यों एक सांसद के साथ बांटता है? और जिस देश में मुस्लिम नौजवानों की पूरी पीढ़ी कुछ लोगों की नजरों में शक से घिरी रहती है, और जिस शक के खिलाफ खुद कांग्रेसी गृहमंत्री राज्यों को चि_ी लिखते हैं, वैसे मुस्लिम नौजवानों के बीच आईएसआई की पहुंच की बात, कितनी जायज थी, कितनी जरूरी थी, इसका अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। लेकिन  पहली नजर में लगता है कि ऐसी नाजुक बात को सार्वजनिक बहस में लाना शायद उन मुस्लिम नौजवानों के भी हित में नहीं है, जिनकी फिक्र में राहुल गांधी ने यह चर्चा छेड़ी है। 
आज मीडिया में यह सवाल भी उठ रहा है कि राहुल गांधी के ऐसे बयानों, और ऐसे भाषणों, उनके अध्यादेश फाडऩे जैसे कामों के पीछे उनका मार्गदर्शक कौन है? हमको ऐसे किसी मार्गदर्शक के नाम महत्वपूर्ण नहीं लगते, लेकिन इस विशाल भारतीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद के किसी भी अगले प्रत्याशी, संभावित व्यक्ति की बातें हमारे लिए दिलचस्पी और फिक्र दोनों ही खड़ी करती हैं। और ऐसे में हमको लगता है कि लोकसभा के अगले आम चुनाव महीनों दूर रहते हुए भी कांग्रेस की उम्मीद के मुंह से बहुत भावनात्मक बातें शायद उन्हीं के निजी हित में नहीं हैं। कांग्रेस पार्टी को अपने भीतर इन बातों पर सोचने की जरूरत है। 

Bat ke bat, बात की बात

24 oct 2013

24 oct 2013

शून्य छोड़कर कोई नहीं जाते

संपादकीय
24 अक्टूबर 2013
मन्ना डे के गुजर जाने पर उसी तरह की श्रद्धांजलियां सुबह से सामने आ रही हैं जैसी कि किसी भी महान कलाकार के गुजरने के बाद आती हैं। उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो पाएगी, वे बहुत बड़ा शून्य छोड़कर गए हैं, किस्म की अनगिनत बातें हमेशा कही जाती हैं, और आज भी कही जा रही हैं। लेकिन पश्चिमी दुनिया के एक हिस्से में श्रद्धांजलि और निधन के बाद के मूल्यांकन की पत्रकारिता इतनी मायने रखती है कि बहुत से ब्रिटिश अखबार अपने इन पन्नों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन  घिसी-पिटी बातों और गैरगंभीर विशेषणों वाली पत्रकारिता सिवाय कहने वाले, और मृतक के आसपास के लोगों के, किसी और के काम की नहीं होती। इसलिए कुछ ऐसे समझदार लेखक और पत्रकार होते हैं, जो अभिनंदन ग्रंथों, और श्रद्धांजलि-प्रकाशनों में न लिखने के सोचे-समझे सिद्धांत पर चलते हैं। 
यह पूरी बात मन्ना डे के बारे में नहीं है, किसी भी गुजर जाने वाले के बारे में कही जाने वाली, लिखी जाने वाली, आम बातों के बारे में है। ऐसी बातें आमतौर पर तो सच से दूर होती हैं, और उनको सुनने या पढऩे में भी वक्त सिर्फ बर्बाद होता है। फिर मृतक को आसमान पर बिठाने वाली ऐसी बातों से ऐसा भी लगता है कि मानो मृतक की जिंदगी में, उसके कामकाज में, तारीफ के लायक सच कुछ भी नहीं था। खासकर राजनीति में जब कोई नेता गुजर जाते हैं, तो उनके करीबी, और उनके चापलूस इस तरह का माहौल बना देते हैं कि मानो अब दुनिया अनाथ हो जाएगी। और ऐसा कभी भी कुछ नहीं होता। हिंदुस्तान के इतिहास में नेहरू भी चले गए, और हिंदुस्तान का वर्तमान भी चलते रहा, उसका भविष्य भी आ गया, और नेहरू के बाद की करीब आधी सदी आज इतिहास भी बन गई है। 
शून्य वे ही लोग छोड़कर जाते हैं जो सार्वजनिक जीवन में अपने योगदान के रूप में सिर्फ अपना कुनबा छोड़ जाते हैं, और वह भी ऐसा कुनबा जिसकी सारी खूबी सिर्फ डीएनए होता है। ऐसे लोग शून्य नहीं, खासा बोझ छोड़ जाते हैं। जो महान कलाकार होते हैं, वे अपनी कलाकृतियां छोड़ जाते हैं, शैली छोड़ जाते हैं, शिष्य छोड़ जाते हैं, और कला के रसिक-जानकार शिक्षित करके उनको छोड़ जाते हैं। अगर कोई महान हैं, तो वे शून्य कैसे छोड़ सकते हैं? अगर कोई महान नहीं भी हैं, और किसी ऊंची जगह पर पहुंचे हुए हैं, तो भी ऐसी संभावना या आशंका रहती है कि वे अपने जुर्म छोड़ जाते हैं, जुर्म की कमाई छोड़ जाते हैं, और जुर्म की उस कमाई से संसद या विधानसभा तक पहुंचने वाली अपनी औलादें छोड़ जाते हैं। 
शून्य दरअसल कोई छोड़ भी नहीं सकते। जिनको दफन किया जाता है, वे भी जमीन में खाद छोड़ जाते हैं, हड्डियों की शक्ल में कैल्शियम छोड़ जाते हैं। जिनको जलाया जाता है, वे भी गर्मी और राख छोड़ जाते हैं, प्रदूषण छोड़ जाते हैं। जिनको बहाया जाता है वे मछलियों और नदी-समंदर के प्राणियों के लिए खाना बन जाते हैं। इसी तरह हर कोई कुछ न कुछ छोड़ ही जाते हैं। शून्य कोई नहीं छोड़ सकते।
इसलिए किसी भी के मूल्यांकन के वक्त शून्य तलाशने का काम ईमानदारी और अकल से शून्य लोग ही कर सकते हैं। जो लोग ईमानदार होते हैं, और समझदार होते हंै, वे मृतक का मूल्यांकन स्वर्गीय से शुरू करके कीर्तन पर ले जाकर खत्म नहीं करते। दुनिया में जो सबसे महान होते हैं, ऐसे नेहरू और गांधी सरीखे, नेल्सन मंडेला सरीखे लोगों की चर्चा स्तुति पर न शुरू हो सकती, और न खत्म हो सकती। नेहरू को अपने प्रेम-प्रसंग के लिए दुनिया के सबसे अच्छे इतिहासकारों और पत्रकार-लेखकों के विश्लेषणों का सामान बनना पड़ा, और गांधी के गुजरने के बाद से ऐसा कौन सा बरस गुजरा जब सेक्स के उनके प्रयोगों को लेकर उनकी चर्चा नई किताबों में नहीं हुई। हिंदुस्तान के कुछ और ऐसे प्रमुख लोग भी रहे, जिन्होंने अपनी आत्मकथाओं में जिंदगी की अपनी कमजोरियों और खामियों को खुलकर लिखा। सर्वपल्ली राधाकृष्णन के दूसरी महिलाओं से सेक्स संबंधों के बारे में उनके ही बहुत विद्वान लेखक-इतिहासकार बेटे एस गोपाल ने खुलासे से लिखा है।
आज यहां इन बातों का मकसद यही है कि किसी को भी अपनी मौत के पहले प्रशंसकों, चापलूसों, और भाड़े के चारण-भाटों के इंतजाम पर तसल्ली करके नहीं मरना चाहिए। लोगों को सच में कुछ ऐसा करना चाहिए कि उनके जाने के बाद कुनबा, दोस्त, और भाड़े के लोगों से परे भी लोग उनको याद करें, उनकी तारीफ करें। इसके लिए यह भी जरूरी है कि भारत की श्रद्धांजलि-शब्दावली को झूठ से बाहर निकालकर उसे सच की तरफ घसीटा जाए, क्योंकि सच बातों तक ही श्रद्धांजलि को सीमित रखने की परंपरा शुरू हुए बिना लोगों को सचमुच ही अच्छे काम करने की मजबूरी समझ नहीं आएगी। 
लंबी उम्र जी कर किसी भी अच्छे के जाने पर, किसी भी अच्छे कलाकार या लेखक के जाने पर आंसू बहाने के बजाय उनके अच्छे काम को लेकर उनको याद करना चाहिए। मन्ना डे का छोड़ा हुआ इतना कुछ है, कि आज विज्ञान और तकनीक मिलकर उसे दुनिया के आखिरी दिन तक संभालकर रखने का पक्का और सच्चा वायदा कर रहे हैं। उनको श्रद्धांजलि यही हो सकती है कि उनके अच्छे संगीत को लोग दूसरों तक बांटें, और खरीदा हुआ या चुराया हुआ, लोगों के पास जिस शक्ल में भी उनका संगीत हो उसे दूसरों के साथ बांटते हुए याद रख सकते हैं कि वे शून्य नहीं बहुत कुछ छोड़ गए हैं। 
और यह भी याद रखना चाहिए कि जो लोग अच्छे काम छोड़कर नहीं जाते हैं, उनको भी कुदरत इस तरह तो याद रखती ही है कि वे दफन होकर खाद छोड़कर जाते हैं, या जलकर प्रदूषण छोड़कर जाते हैं। शून्य छोड़कर कोई नहीं जाते।

आज हकीकत यह है कि हकीकत की दुनिया से परे साइबर दुनिया एक हकीकत

23 अक्टूबर 2013
संपादकीय
एक सर्वे आया है जो बताता है किस तरह भारत की शहरी मतदाताओं में से एक तिहाई से अधिक की इंटरनेट तक पहुंच है। इसके साथ-साथ यह बात भी जाहिर है कि इंटरनेट एक नया औजार और खिलौना होने की वजह से भारत में उसे इस्तेमाल करने वाले लोग उसके बारे में चर्चा भी कुछ अधिक करते हैं। इस तरह शहरों में पांच बरस पहले के चुनाव के मुकाबले इस बार प्रचार के लिए यह एक नया तरीका भी असरदार हो सकता है। इस तरीके के साथ खूबी यह भी है कि यह न तो शहरों में शोरगुल करता, न दीवारें गंदी करता, और न ट्रैफिक जाम करता। इसलिए आने वाले दिनों में इस टेक्नालॉजी के अधिक इस्तेमाल की साफ-साफ दिखती हुई संभावनाओं के चलते अब राजनीतिक दलों और नेताओं को अपने आपको इंटरनेट-शिक्षित भी बनाना पड़ रहा है, और चुनावी नतीजों को इंटरनेट पर प्रचार इतना प्रभावित कर सकता है कि उससे आसपास के मुकाबले डांवा-डोल हो जाएं। 
वक्त के साथ-साथ अब ऐसी तकनीक ढूंढना जरूरी है जो कि धरती पर बोझ न बढ़ाए, प्रदूषण न फैलाए, खर्च को कम करे, और अधिक खर्च न कर पाने वाले लोगों को भी एक लोकतांत्रिक मौका दे। परंपरागत प्रचार के तरीकों में छोटे उम्मीदवारों, गरीब पार्टियों को यह सहूलियत नहीं रहती थी। पांच बरस पहले के चुनाव में आज के अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी जैसी किसी संभावना की कल्पना नहीं की जा सकती थी। लेकिन आज सिर्फ इंटरनेट के बदौलत, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रभावित करके, जनता तक पहुंचने का एक जरिया नौजवान पीढ़ी ने निकाल लिया है, और बूढ़ी हो चुकी पार्टियां अब तक यह समझ ही नहीं पा रही हैं कि जेब में रखे मोबाइल फोन के पीछे का दिल किस तरह उस फोन पर आती-जाती छोटी-छोटी बातों से प्रभावित हो सकता है। 
भारत के चुनाव कालेधन के इस्तेमाल का एक बड़ा मौका रहते हैं, और इस पर रोक लगाने के कानूनों को धोखा देने के लिए बड़े-बड़े नेता और बड़ी-बड़ी पार्टियां, तरह-तरह की तरकीबें निकालती हैं। लेकिन जो समझदार लोग हैं वे वक्त के साथ अनायास ही हाथ लग गए औजारों को चुनावी हथियारों की तरह इस्तेमाल करने की तरकीब समझते हैं, और सस्ते में रस्ता बना लेते हैं। सच तो यह है कि आज दुनिया भर में मोदी के समर्थकों ने जिस अंदाज में साइबर स्पेस पर कब्जा किया है, उससे अब तक कांग्रेस भी नहीं सम्हल पाई है, और पार्टी के रूप में वामपंथी पार्टियां अब तक झंडे और डंडे थामे हुए ही चल रही हैं, वे नौजवान पीढ़ी को अपनी सोच से वाकिफ भी नहीं करा पा रही हैं। आज की पीढ़ी और उसकी टेक्नालॉजी से अनजान और अछूते रहकर सार्वजनिक जीवन से लेकर राजनीति तक किसी का कोई भविष्य नहीं है। आज हकीकत यह है, कि हकीकत की दुनिया से परे, साइबर दुनिया एक हकीकत बन चुकी है। इसको अनदेखा करने वाले वर्तमान में ही इतिहास बनने जा रहे हैं। 
इन चुनावों के बाद कुछ महीनों में देश की संसद के आम चुनाव होने जा रहे हैं। आज जो लोग नहीं सम्हल पाए हैं, उनको भी यह एक मौका मिलेगा कि भविष्य के साइबर वार के लिए अपने औजार और हथियार तैयार कर लें। हिन्दुस्तान में संचार तकनीक, कम्प्यूटर तकनीक, शिक्षा, तीनों चीजें बढ़ती चल रही हैं, और जनता के बीच इन तीनों का इस्तेमाल भी बढ़ते चल रहा है। इस बात को ठीक से न समझे लोग वक्त के प्लेटफॉर्म पर खड़े रह जाएंगे और ट्रेन निकल जाएगी।

गैरबराबरी और बेइंसाफी की हिन्दुस्तानी परंपराएं खत्म हों

22 अक्टूबर 2013
संपादकीय
उत्तर भारत और देश के कुछ दूसरे हिस्सों में महिलाएं आज करवा चौथ मना रही हैं। जाने कब से चली आ रही इस सामाजिक परंपरा के तहत इसे मानने वाली महिलाएं आज चांद निकलने के बाद अपने पति का मुंह देखकर ही दिन भर का उपवास तोड़ेंगी, और खाना खाएंगी। हिन्दू धर्म के बहुत से दूसरे त्यौहारों, और भारतीय सनातनी संस्कृति की बहुत सी दूसरी सामाजिक परंपराओं की तरह करवा चौथ भी मर्दों के भले के लिए औरतों पर थोपा गया त्यौहार है। इस देश में एक भी ऐसा त्यौहार नहीं है जिसमें मर्द अपनी औरत के लिए भूखा रहे, पूजा करे, और उसका चंद्रमुखी चेहरा देखने के बाद उपवास तोड़े। 
अब वक्त आ गया है कि सैकड़ों बरस पहले से चली आ रही मर्दाना साजिशों को विसर्जित किया जाए। औरत और मर्द के बीच बराबरी के हक हिन्दुस्तान जैसे देश में शायद अभी एक सदी या उससे और अधिक दूर हैं, लेकिन ऐसे सिलसिले की शुरूआत तो करनी ही पड़ेगी जिसे कि आधी-पौन सदी पहले भारत में कुछ हिन्दू समाज सुधारकों ने ही शुरू किया था, और विधवा विवाह शुरू करवाए थे, सतीप्रथा खत्म करवाई थी। लेकिन वह वक्त देश की आजादी के पहले का अंग्रेज राज का था, जब हिन्दुस्तान के नेता चुनावी कमाई के लिए वोटरों के तलुवे सहलाने वाले नहीं थे, और उनमें समाज सुधार का हौसला था। आजादी के बाद जब देश का संविधान महिलाओं को बराबरी के हक की बात करने लगा, उसे लागू करने लगा, तो देश की सुप्रीम कोर्ट से शाहबानो को मिले हक को कुचलने के लिए राजीव गांधी जैसे नौजवान प्रधानमंत्री की सरकार ने अपने ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल से शाहबानो का गला घोंट दिया था, और कट्टरपंथी मुसलमानों को खुश किया था। देश की महिलाओं के हक पर नेहरू-गांधी की पार्टी का यह सबसे बड़ा वार था, और दुनिया के इतिहास में कांग्रेस का नाम, राजीव गांधी का नाम इस जिक्र के बिना कभी नहीं लिखाएगा। दूसरी तरफ अपने आपको लोहियावादी और समाजवादी कहने वाली उत्तर भारत की बड़ी पार्टियों ने महिला आरक्षण का इस कदर विरोध किया, कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को देश में अपनी आबादी के मुकाबले आधे का भी हक नहीं मिल पाया। जब हिन्दुस्तानी औरत के हक कुचलने का मौका मिला, तो महिलाओं की अगुवाई वाली कांग्रेस, बसपा, एडीएमके, तृणमूल कांग्रेस, इन सबने भी मर्दों की दादागिरी के सामने चुप्पी साध ली, और महिला आरक्षण हकीकत नहीं बन पाया। हिन्दुस्तान मेें महिलाओं की नौबत सुधारने के लिए संविधान संशोधन भी जरूरी है, मौजूदा कानून का ईमानदार और बेहतर इस्तेमाल भी जरूरी है, इस देश की सरकारी, अदालती, मीडिया की, और सार्वजनिक जुबान को भी न्यायपूर्ण बनाने की जरूरत है, धर्म और समाज में महिलाओं के खिलाफ जो सोच शुरू से चली आ रही है उसको खत्म करने के लिए सामाजिक आंदोलनों की भी जरूरत है। 
भारत में शादीशुदा महिला के माथे पर बिन्दी, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र जैसे बहुत से प्रतीक हैं, जिनमें से किसी का भी बोझ आदमी नहीं ढोते। एक महिला के साथ सरकारी और कानूनी कागजात में पहले पिता का नाम जुड़ा होता है, फिर पति का नाम जुड़ जाता है, आदमी के साथ पत्नी के नाम जुडऩे की कोई सामाजिक व्यवस्था ही नहीं है। देश का प्रधानमंत्री आजादी की सालगिरह पर लालकिले से भाषण देते हुए एक दर्जन बार आम आदमी कहता है, लेकिन आम औरत जैसा शब्द न संसद की जुबान पर है, न मीडिया की जुबान पर है, और भारतीय कानून की जुबान में तो आदमी को ही नागरिक मान लिया गया है, औरत की कोई जगह ही वहां नहीं है। आज देश में महिलाओं के हक के लिए जो लोग भी आंदोलन चला रहे हैं, उनकी नजरों में भी धार्मिक, सामाजिक, सरकारी, कानूनी, और संसदीय, कई किस्म के अन्याय अब तक अनदेखा हैं। देश में खबरों में सबसे अधिक छाने वाले अरविंद केजरीवाल की पार्टी का नाम आम आदमी पार्टी रखा जाता है, और इस पर दिल्ली में बैठे लोगों को कुछ भी अटपटा नहीं लगता। 
करवा चौथ के मौके पर आज देश के न्यायप्रिय लोगों को महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के लिए अपने-अपने दायरे में हो रही गैरबराबरी के खिलाफ बात करनी चाहिए, विचार-विमर्श करना चाहिए, और लोगों को ऐसी बेइंसाफी बतानी भी चाहिए। जिस दिन राम ने सीता को घर से निकाला था, उस दिन से महिलाओं के साथ चली आ रही बेइंसाफी हिन्दुस्तानी आदमियों को बेइंसाफी लगती भी नहीं है, इसलिए समाज को इन बातों की तरफ जगाना भी होगा। इसके लिए करवा चौथ से बेहतर और कौन सा मौका हो सकता है?

बात की बात, Bat ke bat

21 oct 2013

देह सुख का हक, और सरकारी दखल

21 अक्टूबर 2013
पिछले हफ्ते दिल्ली में पुलिस ने बाजार पर छापा मारकर दुकानदारों को सेक्स-खिलौने बेचते हुए गिरफ्तार किया। भारत में दूसरे देशों से सेक्स-खिलौने लेकर आने पर भी रोक है, और बिक्री पर भी। इसे लेकर इंटरनेट पर दुनिया के समझदार देशों के बीच भारत में दिलचस्पी रखने वालों में बहस छिड़ी, कि यह किस तरह का बेदिमाग देश है जहां पर लोगों को अपने देह सुख का मासूम सा सामान इस्तेमाल करने का भी हक नहीं है। लेकिन हिन्दुस्तान के भीतर एक बहुत चर्चित रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने हिन्दुस्तान में ऐसे खिलौनों की बिक्री के खिलाफ कड़ी और कड़वी बात लिखी। 
दरअसल वात्सायन के इस देश में अंग्रेजी राज आकर जाने के बाद से सेक्स एक अनैतिक सा शब्द मान लिया गया है। इस पर चर्चा लोगों को तुरंत बदचलन करार देने का सामान बन जाती है, और जब-जब में अपने कॉलम में, या अखबार के संपादकीय कॉलम में एक स्वस्थ सेक्स के लिए स्वस्थ माहौल की वकालत करता हूं, तो अपने लोगों के बीच भी हिकारत का सामान बन जाता हूं। लोगों को लगता है कि जिस तरह स्कूल और कॉलेज में यौन शिक्षा की जरूरत नहीं है, उसी तरह देश के वयस्क लोगों के बीच भी सेक्स पर चर्चा गैरजरूरी है, और सेक्स-सुख के लिए अगर कोई खिलौनों का इस्तेमाल करता है, उपकरणों का इस्तेमाल करता है, तो वह तो शर्तिया तौर पर जुर्म है ही। 
हिन्दुस्तान अपने खुद के इतिहास को भूलकर, अंग्रेजी ईसाई चर्च की थोपी गई नैतिकता को ढो रहा है, और अपनी जिंदगी से सेक्स के सुख, प्रेम के सुख, और श्रंृगार रस के आनंद को उसी तरह आज बाहर कर दिया जा रहा है, जिस तरह चर्च ने सेक्स को सिर्फ बच्चों की पैदाइश तक ही जायज माना है। न सिर्फ ईसाई, बल्कि हिन्दू धर्म के भी मौजूदा तौर-तरीकों में जिंदगी के लिए एक बहुत स्वाभाविक जरूरत, सेक्स, को काम-वासना, बुरी भावना, पाप, जैसे कई लेबलों से सजाकर उसे प्रायश्चित का सामान बना दिया गया है। हिन्दू धर्म की बहुत सी आरतियों को देखें, तो उसमें काम वासना के लिए ईश्वर से माफी मांगी जाती है, अपने आपको पापी बताया जाता है। और अंग्रेजों के पहले से, चर्च के पहले से इस देश में जो कामदेव हुआ करते थे, कृष्ण की जो रासलीला होती थी, जो गंधर्व विवाह होते थे, पति के अलावा जरूरत पडऩे पर दूसरों से गर्भवती होने के लिए जो नियोग प्रथा थी, जिस तरह वात्सायन ने जोड़ों के बीच विविधता वाले सुख के लिए चौरासी आसनों पर विश्वविख्यात ऐतिहासिक  किताब लिखी थी, उन सबको भुलाकर आज के आक्रामक और हिंसक नवशुद्धतावादी नैतिकता के ठेकेदार सेक्स के दुश्मन हो गए हैं। और यह सोच कांग्रेस की सरकारों तक, और उनकी पुलिस तक समाई हुई है, जिसकी वजह से मुंबई में डांस बार बंद होते हैं, और दिल्ली में सेक्स के खिलौने जब्त होते हैं। 
विकीपीडिया के मुताबिक- 'कामसूत्र के रचियता वात्सायन ने एक शक्तिवर्धक अपद्रव्यास के बारे में बताया था। यह सोने, हाथीदांत, चांदी, लकड़ी के मिश्रण से बनी होती है। यह दवा चीनी मिट्टी के बर्तन बनने (7वीं सदी), जीरो की खोज (9वीं सदी) और रोम के पतन से भी पहले बन चुकी थी। दूसरी तरफ डिल्डो (कृत्रिम लिंग) का आविष्कार पूरी मानवजाति के लिए उपहार के समान था। पत्थर की गांठ या फिर लकड़ी के आकार कृत्रिम शिश्न बनाया जाता था। जर्मनी में 2005 में 8 इंच का लंबा पत्थर मिला था। उसकी आयु करीब 26,000 साल आंकी गई. इतनी पुराने समय के डिल्डो की आज के समय में हूबहू नकल बताती है कि उस दौरान भी सेक्स सबसे ज्यादा कौतूहल का विषय था। कुछ साल पहले पुरातत्वविदों ने कुछ प्रागैतिहासिक प्रतिमाएं खोजी थीं। इस पर विशाल हाथीदांत पर नक्काशी की गई प्रतिमा थीं। हालांकि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता था, इसकी जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है, इसे 35,000 साल पुराना बताया जाता है। हो सकता है कि यह धर्म की उत्पत्ति के आने से पहली की चीज हो।Ó
फिलहाल हम पुरानी बातों को छोड़कर आज की बात करें, तो सेक्स खिलौने लोगों के लिए उसी तरह हैं जिस तरह लोग अपनी देह के बाकी हिस्सों को सुख देते हैं। कोई अच्छा खाकर जुबान को सुख देते हैं, कोई अच्छे संगीत को सुनकर कानों को सुख देते हैं, कोई खुशबू का इस्तेमाल करके अपनी नाक को सुख देते हैं, कोई अच्छी फिल्म देखकर अपनी आंखों को सुख देते हैं, इसी तरह देह के सेक्स से जुड़े हुए हिस्सों को सुख देना न सिर्फ हर किसी का हक है, बल्कि यह कुदरत की तरफ हर किसी की जिम्मेदारी भी है। कुदरत ने जो देह लोगों को दी है, उसे सेहतमंद रखने के लिए उसे उसके हक के ऐसे सुख देना सबकी जिम्मेदारी है जिससे किसी और का कोई नुकसान न होता हो, किसी और को कोई तकलीफ न पहुंचती हो। 
आज भारत में शहरीकरण के चलते, गरीबी के चलते, शादी न होने से, या शादी टूट जाने से, या जोड़ों के बीच तालमेल ठीक न होने से, वयस्क आबादी का खासा बड़ा हिस्सा देह सुख के बिना रहने को मजबूर होता है। लेकिन यह नौबत लोगों की जरूरत को खत्म नहीं कर सकती। नतीजा यह होता है कि लोग बाजार से देह सुख खरीदने पर मजबूर होते हैं जो कि खतरनाक बीमारियों के साथ, और कानून के खतरे के साथ ही मिलता है। बहुत से लोग ऐसे संबंधों में पड़ते हैं, जिनको अनैतिक या/और गैरकानूनी माना जाता है।   बहुत से लोग देह सुख पाने के लिए जबर्दस्ती पर उतर आते हैं, और बलात्कार जैसे मामले होते हैं। इन सबके मुकाबले एक और बड़ी आबादी ऐसी रहती है जो देह सुख की जरूरत पूरी न होने पर एक कुंठा का शिकार हो जाती है, और उसकी सामाजिक और राष्ट्रीय, पारिवारिक और सार्वजनिक, उपयोगिता-उत्पादकता घट जाती है। वयस्क कुपोषण का शिकार ऐसा भारतीय समाज आज दुनिया में वयस्क जरूरत की जरूरी खुराक पाने वाले देशों का मुकाबला नहीं कर सकता, क्योंकि लोगों के दिमाग से सेक्स की अपूरित जरूरत उतर नहीं पाती। उत्पादकता से परे लोगों को सामाजिक संबंध प्रभावित होने लगते हैं, और देश की मानसिक सेहत खराब होने लगती है। 
ऐसे में सेक्स खिलौनों से लोगों को जुर्म से परे का, खतरों से परे का एक ऐसा निजी मनोरंजन और निजी देह सुख मिलता है जिसे रोकने का हक किसी भी लोकतांत्रिक कानून को नहीं हो सकता। भारत में अंग्रेजों के वक्त के पादरियों के असर में बनाए गए नैतिक कानूनों को जिस हिंसा के साथ आज अंग्रेज-विरोधी और ईसाईयत-विरोधी आक्रामक हिन्दूवादी लोग लागू करवा रहे हैं, वह रोने के लायक नौबत है। अपने ही वात्सायन को छोड़कर जो मूर्ख हिंसक हिन्दू संगठन यौन शिक्षा से लेकर कंडोम तक का विरोध करते हैं, कृष्ण की कहानियों को अनदेखा करके, आज प्रेम का विरोध करते हैं, उनके विरोध की प्रेरणा किस तरह चर्च बना हुआ है, इसे देखकर सिर्फ चर्च मुस्कुरा सकता है। 
और यह वह देश है जहां पर हिन्दू धर्म में शिवलिंग की पूजा सबसे अधिक आम और प्रचलित प्रतीकों में से एक है, और इस पर औरत-मर्द किसी के भी जाकर पूजा करने पर कोई रोक नहीं है। ऐसे देश में आज सेक्स की जरूरत के निजी प्रतीकों, निजी सामानों को एक जुर्म करार देना एक सरकारी और कानूनी हिंसा के सिवाय कुछ नहीं। 
इस देश के कानूनों में फेरबदल करके अब यह मंजूर करने की जरूरत है कि इस देश में वयस्क बसते हैं। अठारह बरस की उम्र से जो हिन्दुस्तानी इस देश की सरकार चुनते हैं, उनको अपने देह सुख की आजादी चुनने का हक भी नहीं है, इससे अधिक अलोकतांत्रिक बात निजी जिंदगी में सरकारी दखल की शक्ल में और क्या हो सकती है? जब-जब अदालतों में सेक्स से जुड़े हुए मामले पहुंचे हैं, भारत के संविधान में अंग्रेज और ईसाई असर की बातों ने अदालती लात खाई है। सेक्स के खिलौनों को ले जाकर सुप्रीम कोर्ट की मेज पर रखने की जरूरत है, और सरकार पर एक और लात पडऩा तय है। 

सत्ता के दसवें बरस के नुकसान कमल तले कीचड़ कायम...

संपादकीय
21 अक्टूबर 2013
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की पहली छोटी लिस्ट डेढ़ दर्जन लोगों की थी, और उसमें लोगों को बहुत से नए चेहरे दिखे, इसके साथ ही उनकी जीत की संभावना भी अधिक दिखी। दूसरी तरफ कल भाजपा की पांच दर्जन से अधिक लोगों की जो लिस्ट आई, उसे देखकर लोगों को यह निराशा हुई है कि उसमें बहुत से चेहरे, नामी-गिरामी, और वजनदार चेहरे, हारने को तैयार दिख रहे हैं, इसके बावजूद भाजपा ऐसे नामों को हटा नहीं पाई जिनका हारना लंबे समय से तय माना जा रहा था। इस तरह यह लिस्ट लोगों को निराश करती है। लेकिन नाम तय करने के पीछे जो लोग शामिल हैं, उनका तर्क यह है कि अपने-अपने इलाकों में जो लोग इतने ताकतवर हैं, कि उनके अलावा किसी और को पार्टी का उम्मीदवार बनाने पर उनको हरवाना उनके लिए आसान होता, ऐसे लोगों को टिकट देना भाजपा की मजबूरी थी। 
छत्तीसगढ़ में भाजपा की हालत कर्नाटक में पार्टी की हालत के मुकाबले बहुत बेहतर है क्योंकि लोहे के भंडार कर्नाटक में भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की मेहरबानी से राज्य में इतने बड़े-बड़े कारोबारी-दानव खड़े हो गए थे, जो कि पार्टी से बड़े हो गए थे। वे खरबपति हो गए थे, और लोगों ने एक ऐसा वक्त भी देखा था जब कर्नाटक की जनता बाढ़ में तबाह थी, और मुख्यमंत्री बदलने के अभियान में वहां के विधायक ऐसे खरबपति बेचैन-दानवों की मेजबानी में दूसरे प्रदेशों के सात सितारा होटलों में ऐश कर रहे थे। किसी भी पार्टी के लिए यह बहुत खतरनाक नौबत रहती है जब उस पर पलकर उसके नेता इतने बड़े हो जाते हैं कि पार्टी की अस्तित्व के लिए खतरा, या कम से कम चुनौती बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा का कोई भी नेता पार्टी के अस्तित्व के लिए चुनौती तो नहीं है, लेकिन किसी विधानसभा सीट पर पार्टी के फैसले के लिए चुनौती, और खतरा तो दर्जनों दानव हैं। इसलिए भाजपा अपने बहुत से मंत्रियों और विधायकों के हारने के आसार देखते हुए भी उनकी टिकटें नहीं काट पाई जिनके चेहरे कटने से प्रदेश के वोटरों के बीच भाजपा का सम्मान बढ़ता। आज छत्तीसगढ़ भाजपा की लिस्ट एक राजनीतिक दल की समझदार लिस्ट के मुकाबले कीचड़ के ऊपर खड़े कमल की तरह अधिक दिख रही है, और दस बरसों के राज के बाद भी भाजपा कीचड़ न धो पाने पर किसी रियायत की हकदार नहीं है। अभी कांग्रेस में जितनी लिस्ट आई है, उतनी ही भाजपा की बची है, और भाजपा की जितनी आई है, करीब उतनी ही कांग्रेस की बची है। बड़ी लिस्ट से बड़ी निराशा देने की पहली तोहमत कल शाम भाजपा के नाम दर्ज हो गई है, और इससे छत्तीसगढ़ कांग्रेस का चेहरा खिल भी गया है। 
आज टिकटें बांटते हुए दस बरस की सत्तारूढ़ भाजपा को जो दिक्कतें हुई हैं, उनका कोई इलाज आज की तारीख में तो नहीं निकल सकता, लेकिन इससे भाजपा को एक सबक जरूर लेना चाहिए। भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी जरूर है, लेकिन अलग-अलग प्रदेशों में उसका अलग-अलग तौर-तरीका रहा है, काम की अलग-अलग संस्कृति रही है, और इसी तरह उसका भविष्य भी अलग-अलग किस्म का, अलग-अलग प्रदेशों में है। ऐसे में अगर दस बरसों की लगातार सत्ता से दस बरसों में लगातार कमाकर ताकतवर हुए भाजपा के नेता और मंत्री अगर आज पार्टी को मुंह बंद रखकर भी आंखें दिखाने के लायक हैं, तो कम से कम अगले पांच बरस इनकी आंखों में और अधिक लहू उतरने देने से भाजपा को बचना चाहिए। दरअसल इस नौबत पर भाजपा को बेबसी की कोई रियायत नहीं दी जा सकती क्योंकि इन दस बरसों में इस पार्टी के भीतर छत्तीसगढ़ में पार्टी के फैसलों को चुनौती देने लायक, पार्टी को ब्लैकमेल करने लायक, कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं सरीखे कोई छत्तीसगढ़ी नेता नहीं थे। ऐसे में अगर कुछ सीटों पर जाति के आधार पर, कुछ सीटों पर मौजूदा बाहुबली विधायकों से खतरे के आधार पर, और कुछ सीटों पर विकल्प न होने के आधार पर अगर भाजपा ने टिकटें दी हैं, तो इसके पीछे पार्टी की पिछले दस बरसों की एक अनदेखी और एक नाकामयाबी भी हम देखते हैं कि शर्तिया हारते दिखते लोगों की जगह पर इन दस बरसों में भी भाजपा विकल्प खड़े नहीं कर सकी। 
आज से कुल बीस दिन पहले मतदान को बचे हैं। आजकल में ही कांग्रेस के बाकी तमाम नाम आ जाएंगे, और भाजपा के भी थोड़े से बचे हुए नाम आ जाएंगे।  भाजपा ऐसे में अब महज यही उम्मीद कर सकती है कि कांग्रेस के बाकी नाम खराब हों, और उसके अपने बाकी नाम कल शाम आए नामों के मुकाबले बेहतर हों। इसके बिना चुनावी मुद्दों के पहले का माहौल भाजपा के निराशा के लायक बना है, और भाजपा के भीतर भी दुष्ट और भ्रष्ट कल शाम से बहुत खुश हैं कि पार्टी में उनको हटाने की ताकत नहीं है। लेकिन यहां पर हम प्रदेश की जनता को याद दिलाना चाहते हैं, कि भाजपा हो, या कांग्रेस, या कोई और पार्टी हो, या किसी पार्टी के बागी, या निर्दलीय उम्मीदवार। जनता के पास उम्मीदवारों को छांटने के पीछे कोई बेबसी नहीं होती, जनता को किसी को जवाब नहीं देना होता। वह भाजपा या कांग्रेस की लीडरशिप की तरह किसी बेबसी को बेबस नहीं होती। वह सीधे-सीधे दुष्ट को हराने लायक, भ्रष्ट को हराने लायक उम्मीदवार को वोट दे सकती है, और अगर सारे उम्मीदवार ऐसे ही हों, तो इस बार उसके हाथ कौन बनेगा करोड़पति की तरह एक नया ऑप्शन भी है, वह 'इनमें से कोई नहींÓ पर भी बटन दबा सकती है। यह नया ऑप्शन वोटरों को अमिताभ बच्चन नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिया है, चुनाव आयोग ने उपलब्ध कराया है, और जहां-जहां लोगों को इसकी जरूरत लगे, लोगों को खुलकर इसका इस्तेमाल करना चाहिए। इसी से पार्टियां अगले चुनावों में दुष्टों और भ्रष्टों को जनता पर थोपने के पहले सौ बार सोचेंगी। 

Bat ke bat, बात की बात

20 oct 2013

टीवी पर इकतरफा जाता कतरा-कतरा मनोरंजन, अचानक या सोचा-समझा?

20 अक्टूबर 2013
संपादकीय
हिंदुस्तान के हिन्दी टेलीविजन को देखें तो उस पर शेखर कपूर जैसे गंभीर निदेशक का बनाया हुआ एक राजनीतिक सीरियल, प्रधानमंत्री, चल रहा है जो भारतीय इतिहास के सारे प्रधानमंत्रियों की कहानी बता रहा है। यह सीरियल पिछली पौन सदी की ताजा ऐतिहासिक जानकारियों पर बना है, और उसकी बातें काल्पनिक न होकर ऐतिहासिक तथ्यों पर हैं, इसलिए उनकी विश्वसनीयता अधिक है, और उनका असर और भी अधिक है। शेखर कपूर खुद ही प्रधानमंत्रियों की कहानी पेश कर रहे हैं, इसलिए यह सीरियल अधिक रोचक भी बन पड़ा है। दूसरी तरफ इन्हीं दिनों अलग-अलग चैनलों पर जोधा-अकबर से लेकर महाभारत तक की कहानियों पर सीरियल चल रहे हैं, और भारत की सरहद पर युद्ध और लड़ाई की शहादत की कहानियां भी कबीर बेदी जैसे एक असरदार प्रस्तुतकर्ता दिखा रहे हैं। 
इन सबको किसी एक कोशिश का हिस्सा बताने की कोशिश भी हम नहीं कर रहे, लेकिन यह एक बड़ा अजीब सा मौका आया है जब हिंदुस्तान पर राज करने वाले सारे प्रधानमंत्रियों की कहानी टीवी पर चल रही है, और इनमें से जाहिर है कि अधिकतर प्रधानमंत्री कांगे्रस के ही रहे हैं, और जाहिर है कि सत्ता की खामियां, सत्ता के लिए खामियां, इन सबका टीवी के पर्दे पर एक सैलाब सा इस सीरियल में आ रहा है। नतीजा यह हो रहा है कि किसी देश में सरकार की खामियों का जो भुगतान हर पांच बरस में जनता कर देती है, वह भुगतान करने का अगला मौका आने तक आजाद भारत की सारी खामियों को कुछ महीनों में फिर याद करा दिया जा रहा है। पता नहीं कांगे्रस पार्टी में किसी ने इस सीरियल को ऐसी नजर से देखा हो, या नहीं, हमको इससे पैदा होने वाला असर कांगे्रस के खिलाफ जाते दिख रहा है। इसी तरह सरहद पर जंग और शहादत के सीरियल, या मुगलों के हिंदू राजकुमारियों से शादी के सीरियल, इन सबसे एक खास किस्म की राजनीतिक संस्कृति की हवा बन रही है। इतिहास तो लिखा हुआ है, लेकिन जब पांच-पांच, दस-दस बरस के इतिहास को घंटे भर में पेश किया जाता है, तो पेश करने वाले के एक-एक शब्द, और पेश की जा रही है घटनाओं को छांटने के पीछे की सोच मायने रखती है। यह कुछ अजीब सा एक संयोग या दुर्योग है जब भारत के कारोबार की दुनिया मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है, और कारोबार का हिस्सा बने हुए, कारोबार के इश्तहारों से चलते हुए टीवी चैनल लगातार ऐसे सीरियल दिखा रहे हैं, जिनका कुल जमा असर कांगे्रस के खिलाफ होते दिख रहा है। हो सकता है कि यह बिल्कुल अनायास हो, लेकिन हो सकता है कि यह उस कारोबारी योजना का एक हिस्सा हो जो कि भारत में एक हिंदू सोच, एक पाकिस्तानी-विरोधी आक्रामक राष्ट्रवादी सोच, एक मुस्लिम-विरोधी सोच, एक कांगे्रस-विरोधी सोच पैदा करने के लिए मनोरंजन की दुनिया के मार्फत अमल में लाई जा रही हो। 
कुछ लोगों को यह विश्लेषण कांगे्रस की फिक्र करता लग सकता है, लेकिन कांगे्रस की फिक्र ही हमारी कोई नीयत नहीं है, और कांगे्रस अब देश की जनता की फिक्र की तरफ से बेफिक्र भी हो चुकी लग रही है। इसलिए अब कांगे्रस को न शायद किसी की फिक्र की जरूरत है, और न ही किसी की फिक्र अब उसका अधिक भला भी कर सकती। हम लोकतंत्र के आने वाले सबसे बड़े जलसे के माहौल के बारे में सोचते हुए हिंदुस्तानी हिन्दी दर्शकों पर आज चारों तरफ से पड़ रहे असर के बारे में सोच रहे हैं। लोगों को याद होगा कि मीडिया के कारोबार पर बढ़ते हुए बाजारू एकाधिकार के बारे में हम समय-समय पर अपनी फिक्र जाहिर करते आए हैं, और अब मीडिया का धंधा अपने-आपमें एक बड़ा कारोबार बन गया है। ऐसे में देश की सोच को कब किस तरह, किस तरफ झुकाना चाहिए, इसके लिए हो सकता है कि भारत की राजनीतिक ताकतों के साथ मिलकर बाजार की ताकतों ने पहले से यह तय किया हो कि चुनाव के पहले के महीनों में देश की जनता को इतिहास की कौन-कौन सी चुनिंदा नाइंसाफी याद दिलाई जाए, किस-किस तरह देश की रामायण-महाभारत से अब तक कि कौन-कौन सी कहानी दिखाई जाए, कैसे-कैसे देश के किस पड़ोसी देश के साथ हुई जंग की शहादत की कहानियां दिखाई जाएं।
अगर भारत के चुनावी लोकतंत्र का विश्लेषण किया जाए, तो इस बार के आम चुनाव के पहले भाजपा और उसके उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी बहुत सी ऐसी तरकीबें आजमा रहे हैं जो कि पहले किसी ने देखी-सुनी नहीं थीं। इसलिए बाजार अपने पसंदीदा उम्मीदवार के लिए अगर मनोरंजन के रास्ते माहौल बनाने में जुटा हो, और इसमें अखबार से लेकर इश्तहार तक का बाजार एक हो गया हो, तो भी हमको कोई हैरानी नहीं होगी। लेकिन बीमारी के लक्षण पहचानने की ताकत कांगे्रस में मानो खत्म ही हो गई है, इसलिए अब वह अनायास या सायास (अचानक या सोचा-समझा), उसे टीवी परदों पर रोज हो रहे ऐसे नुकसान की न खबर है, न फिक्र है। भारतीय चुनावों के इतिहासकारों में से शायद कोई समाजशास्त्री हमारे आज के उठाए मुद्दों को सोचने का सामान मानेंगे।

सोना मिले न मिले, मीडिया और राजनीति का पाखंड उजागर हुआ

संपादकीय
19 अक्टूबर 2013
हिन्दुस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, यहां के वैज्ञानिक सोच वाले बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता, और गैरकांग्रेसी नेताओं का कल से बहुत बुरा हमला यूपीए सरकार पर चल रहा है कि वह एक साधू के सपने के आधार पर सोने की तलाश में खुदाई करवा रही है। खुदाई तो हो रही है, इसलिए देश के हर समाचार चैनल को अपने बुलेटिनों के लिए आधे से अधिक वक्त का सामान मिल गया है। इस मुकाबले में कोई पीछे नहीं है, और टीवी के स्टूडियो को खजाने में बदलकर भी समाचार बुलेटिन बनाए जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी इसे पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान के लिए शर्म की बात बता रहे हैं कि एक साधू के सपने को देखकर सोने के लिए खुदाई करवाई जा रही, और उन्होंने मंच से ही एक हजार टन सोने के दाम का हिसाब करके यह बता दिया कि इससे अधिक काला धन देश के बाहर भारत के लोगों ने जमा कर रखा है, और पहले उसे देश लाना चाहिए। 
यहां पर दो अलग-अलग बातों पर चर्चा जरूरी है। एक तो यह कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लगभग पूरे का पूरा एक वैज्ञानिक-तकनीकी जानकारी को दबाकर, नारों की शक्ल में सरकार पर अंधविश्वासी होने की तोहमत लगा रहा है। यह जानकारी है- भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण संस्था द्वारा इस जगह की जांच के बाद दी गई रिपोर्ट, कि यहां पर ऐसी धातु की मौजूदगी लग रही है, जो कि सोना-चांदी भी हो सकती है। इस आधार पर किसी भी ऐतिहासिक, या पुरातत्व के महत्व की खुदाई करने की जानकार और अधिकृत संस्था भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यहां पर अपने हिसाब से खुदाई कर रही है। अब सवाल यह है कि एक पुराने महल या मंदिर वाली जगह पर चाहे एक साधू के सपने से यह जानकारी सामने आई हो कि वहां नीचे सोने का खजाना है, या कहीं और से यह जानकारी आई हो। इस पर किसी भी सरकार की क्या जिम्मेदारी बनती है? ऐसी किसी संभावना के साथ सोना चाहे न जुड़ा हो, ऐसी पुरानी जगहों पर मिट्टी के बर्तनों के लिए भी पुरातत्व विभाग खुदाई करता है, और देशभर में जगह-जगह ऐसा काम आजादी के पहले से चलते आ रहा है। इसलिए इस जगह पर किसी भी वजह से, किसी भी सूचना के आधार पर, किसी भी सपने के आधार पर अगर भारत सरकार ने अपनी एक एजेंसी से जांच कराई, और उसकी रिपोर्ट के आधार पर भारत सरकार की दूसरी एजेंसी खुदाई कर रही है, तो इसमें अंधविश्वास कहां से आ गया? कोई भी सरकार पहली जांच रिपोर्ट में संभावना की बात पता लगने पर इसके अलावा और क्या करती? अगर सरकार खुदाई नहीं करवाती, तो कल के दिन मीडिया और विपक्ष कूद-कूदकर उसे लात मारते कि देश की दौलत को केन्द्र सरकार ने लापरवाही से लुटेरों के लिए छोड़ दिया था। अब अगर एक बहुत मामूली और सस्ती खुदाई से सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही है, तो वीडियो तस्वीरों में कोई चैनल कुदाली-फावड़ा, और घमेला दिखाते हुए सरकार का मजाक उड़ा रहा है कि खेती के औजारों से हजार टन सोना ढूंढा जा रहा है, और टाईम्स नाऊ जैसा बड़ा और हमलावर चैनल सरकार पर हमला कर रहा है कि एक सपने के आधार पर उसने सरकार के इतने सारे साधन-स्रोत झोंक दिए हैं। अब किसी भी तरह की पुरातत्व की खुदाई में कुदाली-फावड़ा कितना बड़ा रिसोर्स कहा जाए? 
इसलिए जिनके पास मुंह है, वे यूपीए सरकार को बेदिमाग बताने के लिए अपना दिमाग अलग रखकर लगातार टीवी चैनलों पर बड़बड़ाते जा रहे हैं। पत्रकारिता के पैमानों पर ऐसे समाचार चैनलों में सबसे बड़ी बेईमानी यह की जा रही है कि भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण द्वारा दी गई संभावना की रिपोर्ट वाले पहलू को दबाकर सरकार को सिर्फ अंधविश्वासी कहा जा रहा है, यह अर्धसत्य भी नहीं है, यह पूरी तरह से बदनीयत से फैलाया जा रहा अंशसत्य है, जिसके खिलाफ बड़ा सा सत्य मौजूद है, लेकिन उसे छुपाकर समाचार चैनल अपने नाटकीय और सनसनीखेज बुलेटिनों को गलाकाट मुकाबले में इस्तेमाल कर रहे हैं। 
अब इस मुद्दे से जुड़ी हुई दूसरी बात। भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने यूपीए सरकार के इस खुदाई के फैसले पर खुला हमला करते हुए एक साधू के सपने के आधार पर सोना तलाशी की आलोचना की है। उनकी बाकी पार्टी भी इसमें पीछे नहीं है। हमको यह देखकर आज बहुत तसल्ली हो रही है कि किसी साधू-संत के सपने को वैज्ञानिक आधार पर भाजपा खारिज कर रही है। लोगों को पिछले कुछ दशकों से देश में चले आ रहे राजनीतिक आंदोलन और अदालती मुकदमे की याद जरूर होगी, जिसमें अयोध्या की उस जगह को राम की जन्मभूमि बताया गया है, और उसके आधार पर देश का एक सबसे बड़ा और लंबा, सबसे हिंसक और जानलेवा आंदोलन चलाया गया। अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने के साथ देश में जो हिंसा हुई, उसमें सैकड़ों जानें गई थीं। लेकिन उसके बाद भी आज तक मोदी और उनकी पार्टी का यही रूख है कि राम का जन्म स्थान वही था। अब दुनिया की कोई खुदाई भी राम के जन्म स्थान को साबित नहीं कर सकती। सिर्फ मान्यताओं को लेकर वह मस्जिद गिराई गई, और आस्था को कानून के ऊपर माना गया। कमोबेश ऐसा ही आंदोलन राम सेतु को लेकर चला, और आज तक वह अदालत में चल रहा है। राम ने लंका जाने के लिए यह पुल बनाया था, ऐसी आस्था को आज की देश की समुद्री जरूरत के ऊपर ठहराया जा रहा है। ऐसी दो बातों को अपना नारा बनाकर चलने वाले नरेन्द्र मोदी आज यूपीए सरकार को अंधविश्वासी ठहरा रहे हैं? और एक वैज्ञानिक संकेत के बाद करवाई जा रही मामूली, और वैज्ञानिक तरीके की सस्ती खुदाई को दुनिया में भारत का सिर नीचे दिखाने वाला काम बतला रहे हैं? 
राजनीति और मीडिया के धंधे की अपनी मजबूरियां हो सकती हैं। लेकिन आज जो लोग भी सरकार की जिम्मेदारी, वैज्ञानिक तरीकों से जांच के नतीजे की अहमियत, और खुदाई के वैज्ञानिक आधार को अनदेखा करके इसे सोच-समझकर साजिश के तहत महज सपने के आधार पर किया जा रहा काम बता रहे हैं, उनकी बातें एक झूठ से अधिक खतरनाक हैं, क्योंकि वे एक सपने की चर्चा के सच को इस झूठ पर लपेटकर उसे बेच रहे हैं। केन्द्र सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रही है, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के मुखिया ने कल यह साफ भी किया है कि उनकी खुदाई में सोना निकलता है, या मिट्टी के बर्तन निकलते हैं, वे सब उनके लिए बराबर पुरातत्व-महत्व के हैं। देश की राजनीति, और मीडिया की टीआरपी की गलाकाट स्पर्धा इतनी गंदी नहीं हो जानी चाहिए कि देश की वैज्ञानिक संस्थाओं की बातों को अनदेखा करके सिर्फ झूठ फैलाने का काम किया जाए। 
फिलहाल हम नरेन्द्र मोदी और भाजपा के मुंह से साधुओं की कही बातों को अवैज्ञानिक-अंधविश्वासी कहे जानेे का मजा ले रहे हैं। और जो मीडिया आज एक सपने की चर्चा को इस खुदाई पर थोपकर खुद सोना बटोर रहा है, वह कैसे पाखंड के साथ वैज्ञानिक सच को छुपा रहा है, यह मीडिया के इतिहास में भी दर्ज होगा। देश के सबसे बड़ा मीडिया समूह के टीवी चैनल को किस तरह कुदाली-फावड़ा केन्द्र सरकार का इतना बड़ा स्रोत झोंक देना लग रहा है, यह भी गुदगुदाने लायक मजेदार बात है। 

Bat ke bat, बात की बात


ऐसी घटिया सोच वाले जज का इंसाफ के अंगने में क्या काम है?

18 अक्टूबर 2013
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली में द्वारिका में महिलाओं पर होने वाली यौन अपराधों की सुनवाई के लिए बनी एक विशेष अदालत के जज की सोच सोचने लायक है। वीरेन्दर भट्ट नाम के इस जज ने अपने परिवार के भीतर एक युवती से बलात्कार करने के एक आरोपी को बरी करते हुए अपने फैसले में लिखा था- लड़कियां नैतिक और सामाजिक रूप से बंधी होती हैं कि वे अपनी शादी के पहले यौन संबंधों में न उलझें। और अगर वे ऐसा करती हैं तो फिर बाद में उनको यह कहते हुए रोना नहीं चाहिए कि यह बलात्कार था। 
यौन अपराधों पर सुनवाई के लिए बनी हुई विशेष अदालत के जज का अगर ऐसा सोचना है, तो ऐसी खराब सोच वाले जज को इस जगह से तुरंत हटाना चाहिए। ऐसे जज के सामने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कभी इंसाफ की उम्मीद नहीं की जा सकती। अदालत की कुर्सी पर बैठकर एक पुरूषप्रधान, दकियानूसी, और घटिया सोच को दर्शनशास्त्र की तरह लिखने का काम करने वाले जज को अगर इस कुर्सी पर जारी रखा जाता है, तो यह अदालती प्रशासन देखने के लिए जिम्मेदार सरकार या ऊंची अदालत का ऐसे जुर्म में भागीदार होना हो जाएगा। यह मामला दिल्ली के अखबारों में आज छपा है, और जो सुप्रीम कोर्ट खुद होकर महिलाओं पर जुल्म के मामलों में बहुत सी पहल कर रहा है, हमको उम्मीद है कि वह खुद होकर इस जज को हटाने का आदेश देगा, और इसे मिसाल बताकर देश के बाकी जजों को भी कहेगा, कि वे महिला विरोधी, गैरबराबरी की, अन्यायपूर्ण सोच का इस्तेमाल अदालती मामलों में न करें। 
इस खबर को पढ़कर याद पड़ता है कि किस तरह अमरीका में जब वहां की सर्वोच्च अदालत के लिए किसी जज को नियुक्त करने की नौबत आती है, तो वहां संसद की कमेटी उस कुर्सी के लिए उम्मीदवारों के साथ बहुत लंबी बैठकें करती है, और उनसे उनके निजी जीवन से लेकर, उनकी सार्वजनिक सोच तक, धर्म और गर्भपात जैसे मुद्दों पर उनके विचारों को लेकर, उनके पुराने फैसलों या उनकी छपी हुई बातों को लेकर, उनसे कई-कई दिन तक सवाल-जवाब करती है। चूंकि यह संसद की कमेटी रहती है, इसलिए उसके संसदीय विशेषाधिकार रहते हैं, और शायद अमरीकी जज बनने वाले लोगों को इससे किसी बात को छुपाने की मनाही भी होती है। जो जज बनने वाले हैं, उनकी निजी मान्यताएं, उनके निजी पूर्वाग्रह, उनके नीति और सिद्धांत जानकर ही उनके बारे में फैसला लिया जाता है। हिन्दुस्तान में इस तरह की कोई परंपरा नहीं है, और इसी का नतीजा होता है कि कभी हाईकोर्ट का कोई जज सतीप्रथा की वकालत करने लगता है, तो कभी कोई जज कमजोर तबकों के खिलाफ एक शहरी-संपन्न सोच की बात करने लगता है।
अभी जिस मामले से हमने आज की बात शुरू की है, वह तो एक छोटी सी अदालत का है, और वहां का छोटा सा जज इस देश की लड़कियों के अधिकारों के खिलाफ एक बहुत ही दकियानूसी और हिंसक सोच का नैतिक भाषण अपने फैसले में लिख रहा है। ऐसे में उससे ऊंची अदालतें तो और भी अधिक दकियानूसी, अधिक हिंसक, और अधिक लंबे नैतिक भाषण देने वाली साबित हो सकती हैं। हमारा मानना है कि अगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग में बैठे हुए लोग अपनी जिम्मेदारी जरा भी निभाते हैं, तो अदालत की इस टिप्पणी के खिलाफ उनको एक वर्गहित का मामला ऊंची अदालत में दायर करना चाहिए, और निचली अदालत की इस निहायत नाजायज बात को गलत करार करवाना चाहिए। ऐसा न होने पर आज देश में पुलिस से लेकर गवाहों तक, और सरकारी वकीलों से लेकर अखबारनवीसों तक, मर्दाना सोच का ही बोलबाला है, और बलात्कार की शिकार लड़की या महिला को आमतौर पर गुनहगार मान लिया जाता है, और इसी दिल्ली शहर में पुलिस कमिश्नर जैसी कुर्सी पर काबिज लोग, लड़कियों को कपड़े-लत्तों से लेकर अकेले न निकलने तक की नसीहतों की एक लंबी फेहरिस्त गिना देते हैं। 
भारत में महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह बहुत बुरी तरह हिंसक है, और बहुत बुरी तरह हावी भी है। इसलिए इस देश में महिलाओं के साथ बेइंसाफी करने वाले किसी बयान का भी खुलकर विरोध होना चाहिए, ताकि समाज में एक जागरूकता आ सके। अपने इस अखबार में हम लगातार भाषा में महिलाओं को अनदेखा करने, उन पर हमला करने के खिलाफ लिखते आए हैं, और दिल्ली की अदालत के एक फैसले की ऐसी रद्दी बात पढ़कर हम हक्का-बक्का हैं। दिल्ली में काम कर रहे महिला संगठनों को भी इसके खिलाफ अदालत में जाकर इस जज को न सिर्फ ऐसी विशेष अदालत की कुर्सी से हटवाना चाहिए, बल्कि किसी भी महिला से जुड़े किसी भी मामले की सुनवाई से उसे अलग करवाना चाहिए। यह भी संभव है कि ऐसी सोच इस जज की बर्खास्तगी के लिए पर्याप्त कारण हो, और उस संभावना को भी टटोलना चाहिए। दिल्ली की एक वामपंथी महिला आंदोलनकारी कविता कृष्णन ने यह मांग की है कि इस जज को अदालत छोड़कर खाप पंचायत में नौकरी कर लेनी चाहिए। 

जनता के अधिक समझदार हुए बिना कोई भविष्य नहीं

संपादकीय
17 अक्टूबर 2013
देश के पांच राज्यों में चुनाव अब सिर्फ कुछ हफ्ते दूर है, और टीवी की बहसों, अखबारों की रिपोर्ट, देखें तो लगता है कि अब तक जनता के सामने कई मुद्दे साफ नहीं हैं। केंद्र और राज्य सरकार की अलग-अलग भूमिकाएं, विधायकों की बुनियादी जिम्मेदारियां, उनके अधिकार, और उनकी सीमाएं, स्थानीय संस्थाओं के जिम्मे के काम, इन सबकी जनता की समझ बड़ी सीमित दिखती है। जब भी कोई चुनाव सामने आता है तो राष्ट्रीय स्तर की असफलताओं, या प्रदेश स्तर की सफलताओं, या स्थानीय स्तर की असफलताओं जैसे पैमानों पर जनता कुछ तय नहीं कर पाती है कि संसद, विधानसभा, या म्युनिसिपल-पंचायत के चुनाव किस काम को करने के लिए हो रहे हैं। कई बार सरकारों और पार्टियों के खिलाफ लोगों की जानकारी निकलती है, और अच्छे उम्मीदवार हरा दिए जाते हैं। कई बार बुरे उम्मीदवार चुनावों को पूरी तरह, और बुरी तरह, खरीद लेते हैं। लेकिन यह खरीदी एक अलग किस्सा है, उसके बारे में फिर कभी। आज का मुद्दा यह है कि जनता की राजनीतिक समझ क्या उसकी भावनाओं से परे विकसित कभी हो भी सकेगी, या फिर उसे उकसाकर, भड़काकर, या गुदगुदाकर उसकी भावनाओं को तोडऩे का काम नेता करते रहेंगे? 
आज भारत में मोदी और राहुल के नाम के बीच एक मुकाबला इस तरह से करवाया जा रहा है कि अमरीका के राष्ट्रपति का सीधा चुनाव होने जा रहा है। भारत की संसदीय चुनाव प्रणाली देश के मतदाताओं को सीधे देश का मुखिया चुनने का मौका देने वाली नहीं है। यहां पर सांसद चुने जाते हैं, और उनका बहुमत सरकार तय करता है, प्रधानमंत्री तय करता है। ऐसे में किसी एक चेहरे या व्यक्तित्व को लेकर चुनाव को इन दो लोगों के बीच जनमत संग्रह की तरह तब्दील कर देना भारत की संसदीय प्रणाली के लायक नहीं है। लेकिन लोग इस पैमाने पर सोचने लगे हैं। दूसरी बात यह कि पार्टियों की नीतियां, उनका नया या पुराना अनुभव, उसकी आने वाली संभावनाएं या उसके खतरे, इनके बारे में जनता को समझाने का कोई सिलसिला भारतीय लोकतंत्र में शुरू ही नहीं हो पाया। ऐसे में हकीकत पर भावनाओं का राज होने लगता है, और हकीकत के नफे-नुकसान से नावाकिफ वोटरों का बहुमत अपने वोट बेचने को तैयार रहता है। ऐसे में पार्टियां और सरकारें वोटरों से लुभावने वायदे करके ऐसे आर्थिक कार्यक्रम लागू करती हैं, जिनसे कि वोटरों का ही लंबे वक्त के लिए फायदा नहीं होता, और देश का नुकसान तो होता ही है। 
इस नौबत के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार देश का समझदार समझा जाने वाला वह तबका है जो कि राजनीति और शासन-प्रशासन की बारीकियों को समझता है, लेकिन अपनी समझ को तंगदिली के साथ अपने ही पास गठरी बांधकर घर बैठे रहता है। अगर मुद्दों को बेहतर समझने वाले लोग, अपने आसपास के लोगों से नारों से परे की जुबान में असलियत की बात अगर करें, तो देश में एक राजनीतिक शिक्षण आगे बढ़ सकता है। मतदाताओं का राजनीतिक शिक्षण राजनीतिक दल इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि जागरूक मतदाता पार्टियों के लिए नुकसान वाले साबित हो सकते हैं। इसलिए पार्टियां और नेता यह मानकर चलते हैं कि अनजान और कमसमझ वोटर ही अपने काबू में लाने के हिसाब से बेहतर होते हैं, और अगर वोटर ही जागरूक और समझदार हो गए तो फिर उन पर असर डालने के लिए लंबी मेहनत से बेहतर काम करना होगा।
भारत एक बहुत ही जटिल और उलझी हुई संस्कृति और राजनीति वाला देश है। यहां का संघीय ढांचा केंद्र और राज्य सरकारों के बीच, राज्य और स्थानीय संस्थाओं के बीच बहुत तरह के अधिकार और जिम्मेदारी के बंटवारे वाला है। ऐसे में मतदाताओं के बीच एक बेहतर समझ के बिना देश के आज के चुनावों का ढर्रा कभी इस लोकतंत्र को सबसे अच्छी मुमकिन सरकार नहीं दिला पाएगा। और हम नेताओं से, पार्टियों से इस बारे में कोई उम्मीद नहीं करते। लोगों को ही आपसी बातचीत से समझ बढ़ानी होगी, अनौपचारिक विचार-विमर्श करना होगा, मुद्दों को समझना सीखना होगा, उसके बिना हम आने वाली पीढ़ी को एक बहुत खराब लोकतंत्र विरासत में देकर जाएंगे। 

अंग्रेजों की बनाई क्रिमिनल-ट्राईब और आज की क्रिमिनल-ट्राईब...

16 अक्टूबर 2013
संपादकीय
पिछले कई बरसों का हिन्दुस्तान का हाल देखें तो याद पड़ता है कि नेहरू के समय से लेकर आज तक, जो सबसे बड़े-बड़े घपले और घोटाले हुए हैं, आर्थिक अपराध हुए हैं, जिसमें देश की दौलत लूटा गया है, और गरीब जनता को भूख और कुपोषण से मरने के लिए धकेला गया है, उन सबके पीछे वे जातियां नहीं थीं, जो कि कदम-कदम पर गालियों का शिकार होती हैं। भारत में अपराधों के लिए कभी अल्पसंख्यकों को कोसा जाता है, तो आर्थिक पिछड़ेपन के लिए दलितों और आदिवासियों को कोसा जाता है, देश में प्रतिभा का हौसला खत्म करने के लिए आरक्षण को कोसा जाता है। भारत में जाति के आधार पर होती राजनीति को भी कोसा जाता है, जो कि धर्म, जाति के लोगों को एक करके की जाती है। ऐसे में जाहिर तौर पर दलित-आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक देश की बदहाली के लिए जिम्मेदार ठहराए जाते हैं, क्योंकि इन तबकों को सरकारी, राजनीतिक, और आर्थिक छूट मिलती है, या रियायत मिलती है। भारत के जातियों के ढांचे में जो ऊंची जातियां कही जाती हैं, वे देश की बदहाली के लिए अपने से नीचे की जातियों को जिम्मेदार मानती हैं। 
अब जरा सौ साल पहले चलें। अपने वक्त में अंग्रेजों ने भारत में कुछ जनजातियों को अपराधी करार देते हुए उनको क्रिमिनल-ट्राईब करार दिया था, और भारतीय कानून में यह दर्जा आजादी के बाद भी अभी हाल के दशकों तक चले आ रहा था। पूरी की पूरी जाति को मुजरिम-जात करार दे देना, उस वक्त की अंग्रेज सोच को ठीक लगता था, और वह बात ताजा भारतीय इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। अब दूसरी तरफ आजाद भारत में सबसे बड़े घोटाले, जालसाजी, और भ्रष्टाचार करने वाले लोगों में से जो लोग पकड़ में आए, जिन पर जुर्म पहली नजर में साबित होते दिखे, उनको अगर देखें, तो वे हिन्दुस्तान में सवर्ण लोगों में सबसे अधिक ताकतवर, और अपने आपको इज्जतदार बताते हुए लोग रहे। हालत यह रही कि कल जो बिड़ला कोलगेट घोटाले में एफआईआर के लायक पाया गया है, उस बिड़ला के नाम पर देश भर में बड़े-बड़े शहरों में मंदिर चलते हैं, जबकि भीतर एक ईश्वर बैठता है। मंदिर के नाम ईश्वर के नाम पर नहीं रखे गए, बिड़ला के नाम पर रखे गए। इसी तरह एक-एक करके अनगिनत ऐसे घोटाले जिनमें देश को पूरी तरह लूट लिया गया, पूरी तरह खोखला कर दिया गया, उनके पीछे सवर्ण तबका रहा, और सबसे तकलीफदेह बात  यह रही, कि इन लोगों ने जिंदा रहने की किसी बेबसी में ये भ्रष्टाचार नहीं किए, इन्होंने अरबपति से खरबपति बनने के लिए, और फिर खरबपति से भी अधिक कुछ और बनने के लिए ये भ्रष्टाचार किए। इन्होंने अपने पसंद की सत्ता बनाई, नेता खरीदे, अफसर खरीदे, संसद की कुर्सियां खरीदीं, पार्टियों में पद खरीदे, मीडिया खरीदा, अदालतों का इंसाफ खरीदा, और ईमानदार बने रहने की जो सहूलियत इन अरबपतियों को थी, उस ईमानदारी को बेच दिया। 
अंग्रेजों के वक्त की मुजरिम-जातियों की चर्चा आज हम यहां इसलिए कर रहे हैं, कि उन जातियों को, उस किस्म की दूसरी गरीब और कमजोर जातियों को, आज हिन्दुस्तान की ऊंची जातियां रात-दिन कोसती हैं। दूसरी तरफ इन्हीं ऊंची जातियों के भीतर आज अपने आर्थिक बाहुबल से एक नई मुजरिम-जात उठ खड़ी हुई है, जो पूरी तरह सवर्ण है, जो पूरी तरह गैरबेबस है, जो पूरी तरह ताकतवर है, और जिसने ईमानदार रहने की सारी नौबत को पिघलाकर उससे हथियार बनाए, और देश को लूट लिया। इसलिए आज जब हिन्दुस्तान में लोग गरीबों के पेट में जाते दाने को गिनने की कोशिश करते हैं, और आबादी से लेकर गरीबों के मुंह तक, गरीबों की जाति और धर्म तक को कोसते हैं, इनको दी जा रही रियायत को देश के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, तब ऐसे कोसते-झींकते, हिकारत-नफरत करते, ऊंची जात के लोगों को यह नई मुजरिम-जात देखना चाहिए, कि जिन जातियों को जाति व्यवस्था में व्यापार का हकदार माना गया था, उन्होंने मुंह पर नकाब बांधे बिना किस तरह राजा के साथ गिरोहबंदी करके देश को लूट लिया। ऐसी नई मुजरिम-जात के नाम हममें से हर कोई याद करके एक फेहरिस्त बना सकते हैं, और उसमें अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, और पिछड़ों को अगर जोडऩा होगा, तो उनको इस फेहरिस्त में आरक्षण देने के बाद ही जोड़ा जा सकेगा। देश में आज सबसे बड़े लुटेरों की मुजरिम-जात को कानूनी दर्जा देने के लिए अंग्रेज भी तो यहां नहीं रह गए हैं। 

भारत में शास्त्रार्थ की परंपरा से शस्त्र तक यह कैसा सफर?

15 अक्टूबर 2013
संपादकीय
पहली नजर में जो जानकारी खबरों से मिलती है, उनके बाद उन खबरों को पिछली घटनाओं से, नियम-कायदे से, दूसरे प्रसंगों से जोड़कर उनका विश्लेषण किया जाता है। और आखिर में जानकार लोग, अनुभवी या विशेषज्ञ लोग उन पर अपने विचार सामने रखते हैं। भारत में आज टीवी से लेकर अखबारों तक, और सार्वजनिक जीवन की बातचीत से लेकर इंटरनेट पर होने वाली बहसों तक, लोगों ने अलग-अलग झंडों और डंडों को थाम लिया है, अपनी पसंद के बैनरतले अब लोग तर्क, तथ्य, और सत्य, इन सबसे परे, महज नारों की जुबान में बात करने लगे हैं। यही हाल संसद और विधानसभाओं के भीतर हो गया है, यही हाल केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच की बातचीत में हो गया है। नतीजा यह हुआ है कि हिन्दुस्तान जैसे विविधता वाले, कई किस्म की सोच से संपन्न देश में, विचार-मंथन खत्म हो गया है। सोचने वाले लोग अब खेमों में या तो बंट गए हैं, या फिर उनकी बिना खेमों वाली बातचीत भी खेमों के साथ जोड़कर ही देखी जा रही है। जो विचारक हैं, जिनको समझदार लोगों का बड़ा तबका बुद्धिजीवी जैसे एक सामंती-तमगे के साथ देखता है, उनकी जगह समाज में तब तक नहीं गिनी जा रही, जब तक वे किसी एक विचारधारा के प्रचारक न हो गए हों। 
किसी विचारधारा के प्रचारक होने में कोई बुराई नहीं है, वह एक किस्म की ईमानदारी रहती है, कि लोग खुलकर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता मंजूर करते हैं, और उसके तहत काम करते हैं। आज दिक्कत यह खड़ी हो गई है कि किसी पार्टी, संगठन, धर्म, या जाति की सोच के साथ प्रतिबद्धता न रखकर, लोकतंत्र और न्याय के मूल्यों के साथ प्रतिबद्धता रखने वाले गालियों के लायक मान लिए गए हैं। आज एक खेमे के लिए चारण और भाट की तरह तारीफ गाने वाले लोग कम से कम उस खेमे में इज्जत पाते हैं, और दूसरे खेमे के लिए गालियां देने वाले भी उसके विरोधी खेमे में महत्व पाते हैं। जो लोग बड़ी गंभीरता और ईमानदारी से मुद्दों की बात करते हैं, व्यक्तिवाद से परे की बात करते हैं, उनको शक की नजर से देखा जाता है, कि वे आखिर किसके साथ हैं? कोई सही या सच के साथ है, या नहीं, यह बात अधिक लोगों के लिए अब मायने नहीं रखती। किसी पार्टी, या मजहब के हर गलत या झूठ का भी साथ देने वाले प्रतिबद्ध माने जाते हैं। 
आज एक दिक्कत यह है कि टीवी चैनलों का इस देश में सार्वजनिक बहस पर लगभग एकाधिकार हो गया है। और ऐसे में वहां पर एक-एक वाक्य में नारों की जुबान में खेमेबाज नेता या अखबारनवीस जो बात कहते हैं, उसी को आम जनता का लगभग पूरा हिस्सा विचार-विमर्श और विचार-मंथन मान लेता है। टीवी के स्क्रीन पर  चैनलों के अपने कारोबार के हिसाब से वहां मौजूद लोगों की जुबान पर लगाम लगाते हुए एक एंकर की मौजूदगी दर्शकों को बांधने के लिए होती है, न कि किसी गंभीर बहस के लिए। ऐसे में किताबों में, अखबारों में, पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली गंभीर बातचीत के स्तर का कोई विचार-मंथन भारतीय सार्वजनिक जीवन से अब अमूमन गायब हो गया है। लोगों का बर्दाश्त गायब हो गया है, दो खेमों के बीच एक तीसरी अलग सोच की मौजूदगी लोगों को बर्दाश्त नहीं रह गई है, और जिस तरह इराक के मामले में अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने दुनिया को धमकी दी थी कि दुनिया के देश या तो हमले में अमरीका के साथ हैं, या फिर वे सद्दाम के साथ हैं। भारत में भी आज मोदी और राहुल के समर्थन और विरोध में लोगों को इन्हीं दो खेमों में बांटकर देखा जा रहा है। राहुल, कांग्रेस, या यूपीए की किसी खामी के बारे में लिखने का मतलब मोदी का साम्प्रदायिक एजेंट होना लगाया जाता है, और मोदी की किसी खामी के बारे में लिखते ही लोग ऐसे विचारकों को कांग्रेस का पेड एजेंट लिखने लगते हैं। 
भारत के इतिहास में लंबी-लंबी बहसों का बड़ा पौराणिक इतिहास रहा है।  बड़े-बड़े शास्त्रार्थों की कहानियां दर्ज हैं। लेकिन आज अगर कोई तर्क और न्याय की बात करे, तो उसे शास्त्रार्थ की उदार परंपरा की कड़ी मानने के बजाय लोग उसके खिलाफ शस्त्र निकालने लग जाते हैं। ऐसी कट्टरता, और आक्रामकता से भारत जैसे विविधता वाले देश में एक वैचारिक परिपक्वता आने की संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं, और अब सार्वजनिक गाली-गलौज से यह लगता है कि न्याय पर आधारित लोकतंत्र से भारत अब गुफा की तरफ वापिस खिसक रहा है। 
पूरी दुनिया में जो देश आज अपने इंसानों की वजह से विकसित हुए हैं, उनमें लोगों की विविधता, विचारों की विविधता, और सांस्कृतिक-संगम की बहुत संपन्न परंपरा रही है। भारत की विविधतावादी संपन्नता अब बुरी तरह से लुट चुकी दिख रही है, और विविधता की विपन्नता आने वाली सदियों तक इस देश को भारी पड़ेगी। चूंकि लोकतांत्रिक-सांस्कृतिक विकास को राष्ट्रीय आय जैसे आंकड़ों में गिना नहीं जा सकता, इसलिए यह घाटा आज समझ नहीं आ रहा है, लेकिन यह सांस्कृतिक-दीवाला, आने वाली पीढिय़ों को सदियों पीछे पहुंचा रहा है। 

Bat ke bat, बात की बात

14 oct 2013

एक दिन विज्ञान का, और धर्म का भी...

14 अक्टूबर 2013
संपादकीय
कल का दिन उत्तराखंड के बाद देश के सबसे बड़े कुदरती हादसे का हो सकता था, लेकिन कुछ तो कुदरत की मार उतनी कड़ी नहीं रही, और कुछ ओडिशा सरकार और केन्द्र सरकार की तैयारी अधिक रही कि वहां पर समंदर के किनारे से नौ लाख लोगों को एक दिन में दूर ले जाया गया। वरना पिछले समुद्री तूफान में दस हजार लोग इसी ओडिशा में मारे गए थे। दूसरी तरफ कल मध्यप्रदेश के लिए नवरात्रि की नवमीं की पूजा का दिन एक बड़े हादसे से भरा हुआ रहा, वहां दतिया में एक मंदिर में इक_ा हुए लाखों लोगों के बीच यह अफवाह फैली कि कांक्रीट का बना नया पुल गिरने जा रहा है, और उस भगदड़ में सौ से अधिक दर्शनार्थी कुचलकर मारे गए। 
ये दो हादसे यह सोचने पर भी मजबूर करते हैं कि धर्म और विज्ञान की कैसी जगह आज की दुनिया में है, और होनी चाहिए। एक तरफ विज्ञान ने हिन्दुस्तान को बताया कि ऐसे तूफान का एक खतरा है, और सरकार ने सारी तकनीक का इस्तेमाल करके लोगों को खतरे से दूर करने का काम किया, और शायद दसियों हजार जिंदगियां बच गईं। दूसरी तरफ धर्म है जो कि लोगों को किसी एक दिन, किसी एक महूरत पर, किसी एक जगह इतनी भीड़ में इक_ा होने को धकेलता है, या खींचता है, कि उसका इंतजाम करना खासा मुश्किल होता है। इसलिए धार्मिक तीर्थ अक्सर ऐसे हादसों के शिकार होते हैं, और दुनिया में जो सबसे अधिक कड़े कानून वाला सऊदी अरब है, वहां भी हज यात्रियों के बीच हादसों में एक-एक बार में सैकड़ों या शायद हजारों लोग मारे गए हैं। 
धर्म और आस्था ने लोगों की वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का काम किया है। लोगों की तर्कशक्ति खत्म कर दी है, और उनको आंखों से वे खतरे दिखने खत्म हो जाते हैं, जो कि सामने खड़े रहते हैं। आस्थावानों से भरा हुआ ओडिशा अगर आस्था पर ही टिका होता, तो वहां समंदर के किनारे को दस लाख लोगों को अपनी जगह ही बसा रहना था कि ईश्वर जो करेगा, वह ठीक करेगा। लेकिन विज्ञान ने एक खतरे से आगाह किया, और विज्ञान पर आस्था ने लोगों को किनारा छोडऩे की सलाह दी, और उसे छोडऩे से जिंदगियां बचीं। वरना इन नौ-दस लाख लोगों के घरबार का जो हाल आज दिखाई पड़ रहा है, वहां अगर ये रहते, तो आज उसी ईश्वर के पास जा चुके रहते जो कि ऐसी सारी तबाही को बेकसूरों पर टूटते हुए देखता है, और उसका गवाह बने चुपचाप बैठे रहता है। 
ऐसे कुछ मौके आते हैं जब लोगों को ईश्वर, धर्म, अपनी आस्था, और उसके सार्वजनिक प्रदर्शन के बारे में सोचना चाहिए। यह त्यौहारों का मौसम चल रहा है, और आज अलग-अलग बहुत से धर्मों के त्यौहारों को देखें, तो उनका मिजाज इतना हिंसक और अराजक हो गया है, कि मानो कानून को तोड़े बिना, दूसरों को तकलीफ पहुंचाए बिना, जिंदगी को मुश्किल बनाए बिना आस्थावानों का ईश्वर खुश ही नहीं होता। रात-दिन शोरगुल करके, शहरों में आना-जाना मुश्किल करके आस्थावान जिस तरह से अपने त्यौहार मनाते हैं, उनसे सैकड़ों बरस पहले कबीर की कही हुई यह बात याद पड़ती है कि कंकड़ पत्थर जोड़कर मस्जिद बना ली गई है, और उसके ऊपर चढ़कर मुल्ला इस तरह से बांग देता है कि मानो खुदा बहरा हो गया है। यह कबीर का ही हौसला था जो कि उसने उस वक्त बिना कोई अदालती सुरक्षा मिले हुए ऐसी खरी-खरी और ऐसी कड़वी बात इतने खुले शब्दों में कही थी। अगर कबीर के नाम के साथ यह बात प्रचलित नहीं होती, तो आज हमारा इतना हौसला नहीं हो सकता था कि हम इन शब्दों को, ऐसे शब्दों को किसी भी धर्म का बारे में लिख सकते। रात-दिन लाउडस्पीकर बजाकर आस्थावान कौन सी देवी तक अपनी बात पहुंचाते हैं? ऐसा करने वाले आस्थावानों को आसपास जीने वाले बुजुर्ग, बीमार, या किसी और तरह की तकलीफ से गुजर रहे, शांति की जरूरत वाले, लोगों की फिक्र जब न रह जाए, तो उनके इस हिंसक मिजाज से उनका कैसा ईश्वर, कैसा खुश हो सकता है, यह उनको सोचना चाहिए। 
आज अगर विज्ञान और टेक्नालॉजी, तर्क और ज्ञान, लोकतंत्र और मानवाधिकार  के बीच भी अगर लोग अपनी कट्टरता को हिंसक और खतरनाक बनाए बिना अपने ईश्वर को खुश नहीं कर सकते, तो ऐसे आस्थावानों, उनकी आस्था, और उनके ईश्वर की पसंद, इन सब पर हमको सिर्फ तरस आता है। 

...अगर वोटिंग बढ़ेगी, तो इस बददिमागी के होश उड़ जाएंगे

संपादकीय
12 अक्टूबर 2013
2014 के आम चुनाव के पहले देश के पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव एक नए माहौल में हो रहे हैं। सामाजिक संगठनों से लेकर मीडिया तक, और सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक, देश में एक नया माहौल दागी नेताओं को लेकर, राजनीति में मुजरिम और जुर्म को लेकर खड़ा हो चुका है। पांच बरस पहले के आम चुनाव को अगर देखें तो उस वक्त इंटरनेट का सोशल मीडिया इतना सक्रिय नहीं था, और तब से लेकर अब तक जो नए वोटर जुड़े हैं, वे टेलीफोन, इंटरनेट, और सोशल मीडिया से अधिक वाकिफ हैं, उनके मिजाज का अंदाज लगाना अधिक मुश्किल भी है। इसलिए 2014 के आम चुनावों के पहले के ये मिनी आम चुनाव प्रचार की नई तकनीकों के इस्तेमाल का एक नया तजुर्बा लेकर भी आएंगे, और देश में राजनीति और चुनाव के मुद्दों को भी कुरेदकर, खड़ा करके जाएंगे। 
हिंदुस्तान के संसद या विधानसभा के चुनावों को देखें, तो करीब एक तिहाई मतदाता ऐसे होते हैं जो कि लापरवाही से या मौजूद न रहने पर वोट डालने नहीं जाते। दूसरी तरफ जीतने वाले उम्मीदवार आमतौर पर पूरी वोटर संख्या के आधे से भी कम वोट पाकर सांसद या विधायक बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य को कुछ और बारीकी से देखें तो यहां पर कांगे्रस और भाजपा, इन दोनों प्रमुख पार्टियों के बीच एक फीसदी से लेकर पांच फीसदी तक का ही फर्क वोटों में रहा है। ऐसे में आधे फीसदी से लेकर ढाई फीसदी तक वोट अगर किसी एक पार्टी के खाते में पलट जाएं, तो प्रदेश में सत्ता दूसरी पार्टी के हाथ जा सकती है। कुल मिलाकर हमारी बात का मतलब यह है कि जो वोटर घर बैठे रहते हैं, उनमें से आधे या चौथाई भी अगर निकलकर वोट डालने आएं, तो चुनावी नतीजे कहीं के कहीं पहुंच सकते हैं। इसलिए आज के चुनावी नतीजे सिर्फ डाले हुए वोटों की पसंद या नापसंद रहते हैं। दोनों बड़ी पार्टियों के बीच इस पैमाने पर जो फर्क रहता है, वह फर्क घर बैठे हुए वोटरों की अलाली का नतीजा होता है। इसलिए लोगों को चाहिए कि वे कसम खाकर घर से निकलें, कि वे वोट डालकर आएंगे, और अड़ोस-पड़ोस, जान-पहचान के किसी को भी बिना वोट डाले नहीं रहने देंगे।
जो लोग चुनाव प्रचार और चुनावी रणनीति को और करीब से देखते हैं, उनको मालूम है कि बड़े उम्मीदवार या बड़ी पार्टियों का सारा गणित अब तक पडऩे वाले औसत वोटों पर ही चलता है। वे मानकर चलते हैं कि बाकी वोटर घर बैठे रहेंगे, या किसी और वजह से वोट नहीं डालेंगे। ऐसे में ताकतवर पार्टियां और ताकतवर उम्मीदवार ऐसे असली या नकली वोटरों की गैर मौजूदगी को फर्जी वोटिंग में तब्दील करने की साजिश भी करके रखते हैं। इसलिए हर किसी को वोट डालने के दिन अपने-आपको खाली रखना चाहिए, और अपने आसपास के लोगों को तैयार भी रखना चाहिए। 
यह पहला मौका है जब वोटरों के सामने, 'इनमें से कोई नहींÓ (नोटा), की बटन भी रहेगी। और अब तो यह बहाना भी नाजायज ही रहेगा कि सारे ही उम्मीदवार बदमाश हैं, इसलिए वोट डालने क्यों जाएं। अब इस नई बटन के साथ लोगों को एक नया लोकतांत्रिक अधिकार भी मिल रहा है, कि वे सारे उम्मीदवारों को खारिज करते हुए, एक नया इतिहास गढ़ें। ऐसे में अगर घर बैठे लोग निकलकर आकर मतदान दस-बीस फीसदी बढ़ा सकते हैं, तो यह बात जमे-जमाए बाहुबली नेताओं, और उनकी बददिमाग हो गई पार्टियों की अक्ल ठिकाने लगा देने वाली होगी। आज बहुत से नेता और कुछ पार्टियां अपने-आपको वोटर के हक के ऊपर गिनकर इसलिए चलती हैं, क्योंकि परंपरागत रूप से एक तिहाई वोटर घर बैठे रहते हैं। अगर वोटिंग बढ़ेगी, तो इस बददिमागी के होश उड़ जाएंगे।
जो लोग अपने-आपको एसएमएस, फेसबुक, ट्विटर जैसी जगहों पर जागरूक मानते हैं, उनकी भी यह कुछ अधिक जिम्मेदारी है कि वे अपनी जागरूकता को औरों तक फैलाएं। लोकतंत्र कुछ गिनी-चुनी पार्टियों, और जमे हुए पुराने पापियों, काबिज कुनबों का एकाधिकार नहीं रहने देना चाहिए। अगर लोग कमर कसकर वोट डालने निकलेंगे, तो भारतीय लोकतंत्र का बाप बने बैठे नेताओं का नाड़ा ढीला हो जाएगा। जो लोग पांच बरसों में एक बार मिलने वाले ऐसे मौके का इस्तेमाल नहीं करेंगे, उनको अगले पांच बरस तक देश की बदहाली पर झींकने का कोई हक भी नहीं रहेगा।