चेहरों से कपड़ा हटवाने की बेदिमाग-बददिमाग कार्रवाई

30 नवंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पुलिस एक बार फिर पूरी बेदिमागी और बददिमागी से काम कर रही है, और जिले की पुलिस के ऊपर मानो न कोई अफसर बचा है, न कोई निर्वाचित और सत्ता पर काबिज नेता बचा है, और न ही मानो कोई संवैधानिक संस्था या अदालत बची हैं। कुछ महीनों के भीतर दूसरी बार राजधानी की जिला पुलिस दुपहिया गाडिय़ों पर चलने वाले लोगों के चेहरों से कपड़े हटवा रही है, यह कहकर कि कई अपराधी चेहरा ढांककर निकल जाते हैं। लोग राज्य बनने के बाद, तेरह बरस पूरे होने के बाद, और इस शहर पर सैकड़ों करोड़, या शायद हजार करोड़, खर्च हो जाने के बाद भी यहां की धूल, यहां के धुएं से बचने के लिए चेहरों पर कपड़े बांधकर चलने को बेबस हैं। इसके अलावा साल में दस महीने इस इलाके में जो धूप पड़ती है, वह सड़कों पर लोगों को झुलसा सकती है। इस इलाके में चेहरों पर कपड़े बांधकर चलना एक बेबसी है, अपनी सेहत का बचाव है। 
पुलिस अपनी इस बददिमाग हरकत को हेलमेट की तरफ लोगों को मोडऩे की एक कोशिश भी बता रही है। अगर हेलमेट लागू करना है, तो उसके लिए नियम पहले से बने हुए हैं। उनको लागू करने का हौसला न अफसरों में है, और न ही नेताओं में। जनता सड़क हादसों में थोक के हिसाब से मारी जा रही है, लेकिन वोटों की फिक्र में पड़े नेता जनता की जान बचाने के लिए भी उसके सिर पर कोई बोझ रखना नहीं चाहते। और जब ऐसे नेता और अफसर जनता के पैसों की एयरकंडीशंड गाडिय़ों में चलते हैं, तो उनको दुपहिया चलाने वालों की दिक्कत और तकलीफ समझ आने में मुश्किल रहता है। 
पुलिस को इतनी भी समझ नहीं है कि अपने चेहरे को ढंककर चलना किसी का भी बुनियादी हक है। आज अगर कोई मुस्लिम लड़की अपने चेहरे को ढंककर चलना चाहती है, तो उससे उसकी धार्मिक और सामाजिक संस्कृति पुलिस कितने चौराहों पर छीनेगी? तेज हवा, शहरी सड़कों पर धुआं, खुदी पड़ी सड़कों की धूल और गंदगी, इसके साथ-साथ तेज धूप और दूसरी गाडिय़ों को चलाते हुए थूकने वाले लोगों के थूक से बचने के लिए अगर कोई अपने चेहरे को ढंककर चल रहे हैं, तो ऐसे लोगों को परेशान करने का कोई हक पुलिस को नहीं है। लेकिन जिला पुलिस किसी राज्य में बहुत छोटी सी हस्ती रखती है। इस फैसले के ऊपर इस राज्य में नियंत्रण के कम से कम दस दर्जे और हैं। और जब नीचे का कोई अफसर ऐसी मनमानी लागू करता है, और ऊपर के लोग अखबारों में इसे देखते अपनी एयरकंडीशंड दुनिया में मस्त रहते हैं, तो वे भी इस बददिमागी में हिस्सेदार हो जाते हैं।
हमारे हिसाब से इस प्रदेश का महिला आयोग, इस प्रदेश का मानवाधिकार आयोग, इस प्रदेश की अदालतें, और यहां के राज्यपाल भी, खुद होकर भी इस निहायत गैरजरूरी और बेदिमाग फैसले के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों में यह दूसरा मौका ऐसा है, और जनता के हकों के नाम पर सुविधाएं भोगते संवैधानिक लोग आंख उठाकर इधर देख भी नहीं रहे हैं। यह निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के लिए धिक्कार की बात है कि यहां पर अफसर मनमानी नीतियां बनाते हैं, और जनता पर उनको थोपते हैं। आज प्रदूषण से बचने के लिए नाक-मुंह को ढांककर चलना एक न्यूनतम जरूरत हो गई है, लेकिन पुलिस की नजरों में यह गलत काम करने का एक रास्ता है। लोगों को चाहिए कि इस मनमानी के खिलाफ वे महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, और अदालत तक जाएं, क्योंकि एक मनमानी को बर्दाश्त करने का मतलब दूसरी मनमानी को बढ़ावा देना होता है। 
अभी कुछ दिन पहले ही एक सड़क दुर्घटना में दर्जन भर लोगों के मारे जाने के बाद हमने बड़ी कड़ी जुबान में आरटीओ और टै्रफिक पुलिस के भ्रष्टाचार को इसके लिए जिम्मेदार बताया था। हमारा यह लंबा अनुभव है कि जब-जब इन विभागों के संगठित भ्रष्टाचार की वजह से ऐसे बड़े हादसे होते हैं, तब-तब ये विभाग शायद लोगों का ध्यान बंटाने के लिए इस तरह का कोई सतही काम करने लगते हैं, जिससे खबरें ऐसा दिखाने लगें कि दुर्घटनाओं के लिए जनता जिम्मेदार रहती है, और वह हेलमेट नहीं लगाती है। चेहरों पर बांधे गए कपड़ों का हेलमेट से कोई लेना-देना नहीं है। हेलमेट को लागू करना एक अलग जिम्मेदारी है, जिसका हौसला इस राज्य के नेताओं और अफसरों में नहीं है। दूसरी तरफ हेलमेट के बाद भी लोगों को चेहरों पर कपड़ा बांधने की जरूरत बनी ही रहेगी। अगर रायपुर की जिला पुलिस के ऊपर इस प्रदेश में कोई जिम्मेदार है, तो उनको इस बारे में सोचना चाहिए। प्रदूषण से जो लोग अपनी सेहत बचाना चाहते हैं उनको अगर पुलिस इस तरह कुचलती है, तो ऐसी ही पुलिस आगे जाकर इससे अधिक बड़ी मनमानी करती है। हमारा साफ मानना है कि पुलिस की यह कार्रवाई अदालत में पल भर भी नहीं टिकेगी, किसी को वहां जाकर ऐसी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई मांगनी चाहिए। 

21वीं सदी के चारण-भाटों की साजिशों का भांडाफोड़

29 नवंबर 2013
संपादकीय
भारत में सनसनीखेज स्टिंग ऑपरेशनों के लिए मशहूर तहलका पत्रिका तो आज अखबारनवीसी से परे के जुर्म की वजह से मुसीबत में दिख रही है, लेकिन दूसरी तरफ  बरसों से स्टिंग ऑपरेशनों से भांडाफोड़ करते आ रहे कोबरा पोस्ट के अनिरुद्ध बहल ने आज फिर एक मामला सामने रखा है जिसमें इंटरनेट पर सच और झूठ को फैलाने और खड़ा करने का ठेका लेने वाली आईटी कंपनियों का भांडाफोड़ हुआ है। यह पूरी खबर पहले पेज पर है इसलिए उसकी अधिक बातों को यहां पर लिखना ठीक नहीं है, लेकिन इससे भयानक और कौन सा काम इंटरनेट पर हो सकता है कि फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल वेबसाइटों के मार्फत दंगा फैलाया जाए, अल्पसंख्यकों को वोट के दिन घरों से निकलने से रोकने का माहौल खड़ा कर दिया जाए, और यह सुझाया जाए कि इससे उनकी जगह फर्जी मतदाताओं से वोट डलवाए जा सकेंगे। इसके अलावा किसी को भी मशहूर करने के लिए, किसी को भी बदनाम करने के लिए हजारों और लाखों निंदक और प्रशंसक जुटाने का ठेका लेने वाली ये कंपनियां किस तरह खुलकर साजिशें बेच रही हैं, यह देखने लायक है। हमारा मानना है कि देश का साइबर कानून इस भांडाफोड़ के बाद उसी ईमानदारी और कड़ाई से काम करेगा, जिस कड़ाई से सत्ता के खिलाफ लिखी गई मामूली बातों पर भी लोगों की गिरफ्तारी कई पार्टियों की सरकारें, कई राज्यों में करती दिख रही हैं।
आज दुनियाभर में कम्प्यूटर, इंटरनेट, और सोशल वेबसाइटों के चलते लोकतंत्र को मनचाहे तरीके से मोडऩा आसान हो गया है। पहले तो लोगों पर असर डालने के लिए ईमानदारी के कुछ काम करने पड़ते थे, लेकिन अब तो राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से लेकर गुजरात के चर्चित मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तक, हजारों ऐसे नेता हैं जो सच और झूठ का सहारा लेकर, इंटरनेट के ऐसे ठेकेदारों की सेवाएं लेकर, अपनी वाहवाही करवाने में लगे हैं, या अपने दुश्मन को निपटाने में लगे हैं। लोगों को याद होगा कि हिन्दुस्तान के इतिहास में एक वक्त चारण और भाट हुआ करते थे जो कि अपने अन्नदाता राजाओं की वीरता और बड़ाई में रात-दिन गाया करते थे, आज टेक्नॉलॉजी ने ऐसे चारण और भाट खड़े कर दिए हैं कि एक हफ्ते के भीतर टर्की में गहलोत के लाखों प्रशंसक खड़े हो जाते हैं। झूठे तस्वीरों से किसी राज्य या नेता की उपलब्धियों का बखान फैलाने में ये ठेकेदार ऐसे जुटते हैं, कि सच सड़क किनारे बैठकर थककर दम तोड़ देता है। 
आज नौबत यह है कि सच का साथ देने वाले गिने-चुने लोग हैं, और वे शरीफ और ईमानदार भी हैं। इसलिए किसी साजिश में हिस्सा बनने का काम वे नहीं कर सकते। दूसरी तरफ बेईमान और धोखेबाज लोग हैं, धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोग हैं, भ्रष्ट और दुष्ट लोग हैं, जो खुद भी साजिशों से परहेज नहीं रखते, और अपने जैसे लोगों की भीड़ तेजी से बना लेते हैं। जो लोग ट्विटर पर देश के भले की, एकता की, बात करते हैं, जो साम्प्रदायिकता का विरोध करते हैं, उन पर साजिश का हिस्सा बने ऐसे लोग टूट पड़ते हैं। उन पर झूम जाते हैं, उनके खिलाफ गालियां लिखने लगते हैं, उनके खिलाफ झूठ फैलाने लगते हैं, और उनके बाप-दादा के लहू को भी हरामी साबित करने में जुट जाते हैं। 
कोबरा पोस्ट का यह भांडाफोड़ सबकी आंखें खोलने वाला है, और अब इसके ऊपर सरकार को तेजी से जुर्म दर्ज करने चाहिए। 

कुछ सवाल कुकुरमुत्ते ही उठा सकते हैं, बरगद नहीं

संपादकीय
24 नवंबर 2012
आज दो नई पार्टियों की चर्चा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में रहे हुए पी.ए. संगमा अब किताब छाप वाली नई राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं जिसका नाम राष्ट्रीय जनता पार्टी रखने की घोषणा उन्होंने की है। दूसरी तरफ लोग अरविंद केजरीवाल की नई पार्टी के नाम की उम्मीद सोमवार को कर रहे हैं। आने वाले चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर, और अलग-अलग प्रदेशों में भी नए राजनीतिक दल खड़े होंगे, इनमें से कुछ को चुनाव आयोग की मान्यता मिल पाएगी, और कुछ बिना मान्यता, बिना चुनाव चिन्ह मैदान में रहेंगे। ऐसे राजनीतिक दलों और उनकी चुनावी मैदान में मौजूदगी के मायने समझने की जरूरत है। 
आज जब देश के खासे बड़े हिस्से में मतदाता के सामने जो दोनों-तीनों राजनीतिक दल रहते हैं, उनके बीच नीति और सिद्धांत, साख और कार्यक्रम को लेकर कोई खास फर्क नहीं रह जाता, जब मुजरिमों के लिए तकरीबन सभी राजनीतिक दलों में एक ही किस्म का लगाव दिखता है तब मतदाता के सामने पसंद बहुत मुश्किल हो जाती है। दूसरी बात यह कि जब बड़े-बड़े संगठित दल बहुत से कमाऊ मुद्दों पर या तो एक साथ हो जाते हैं, या सत्ता के फैसलों को विपक्ष अनदेखा करने लगता है, या आम जुबान में एक नूरा-कुश्ती होने लगती है, तो जनता के सामने फिर पसंद की एक दुविधा आ खड़ी होती है, और कहीं पर लिखा जाता है कि नागनाथ और सांपनाथ में से जनता किसे चुने? ऐसा लिखने वाले अखबार वाले नाग और सांप की मासूमियत को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं। ऐसे ही मौकों पर बहुत फक्कड़ किस्म के, सनकी और सिरफिरे कहे जाने वाले ऐसे अकेले उम्मीदवार या ऐसी छोटी सी पार्टी की अहमियत सामने आती है, जिसका न अधिक कुछ दांव पर लगा होता, और न ही जिसे कुछ मिलने की उम्मीद ही होती। ऐसे ही लोग इन चुनावों में कुछ असुविधा खड़ी करने वाले सवाल उठा सकते हैं, और राजनीति के संगठित भ्रष्टाचार के लिए चुनावी दौर एक मामूली सी दिक्कत खड़ी कर सकते हैं। 
अभी हम अरविंद केजरीवाल की पार्टी को इस दर्जे की पार्टी से कुछ अधिक महत्वपूर्ण इसलिए मान रहे हैं क्योंकि उन्होंने देशभर में अभूतपूर्व सवाल खड़े किए हैं, एक नए नेता और नई पार्टी के रूप मेें लोगों में एक अभूतपूर्व जिज्ञासा पैदा की है, और वे वोटों की लड़ाई में कामयाब चाहे न हों, वे सवाल खड़े करने में तो कामयाब हो ही चुके हैं। और मीडिया के बारे में इस देश के किसी राजनीतिक तबके की चाहे जो भी सोच हो, हकीकत यह है कि अब हिन्दुस्तानी मीडिया को एकमुश्त न कोई खरीद सकता, और न ही कोई इसे एकमुश्त दबा सकता। फिर मीडिया का ढांचा भी अब परंपरागत बरगद की तरह का नहीं रह गया है, और अब इसके तले हरियाली की शक्ल लिए हुए घास भी पनपने लगी है, सोशल नेटवर्किंग के मार्फत। आज इस देश में बड़े लंबे-लंबे संपादकीय लिख कर भी हमारे जैसे लोगों को जितना उत्तेजित नहीं कर सकते, जागरूक नहीं कर सकते, उतना काम फेसबुक पर कॉलेज की एक लड़की दो लाईनें लिखकर कर सकती है, कर चुकी है। इसलिए अरविंद केजरीवाल और उनका असर कुछ बरस पहले के उनके जैसे नए चुनावी-तिनके से अलग हो सकता है। हिन्दुस्तान के मीडिया इतिहास में यह पहला मौका है जब राह चलते एक फटीचर इंसान की तरह के अरविंद केजरीवाल, जब चाहें जहां चाहें, देश के सारे मीडिया को इक_ा कर सकते हैं। और उनसे हमारी कई मायनों में असहमति अलग रही, यह हकीकत है कि उनके जैसे धारदार सवाल उठाने का काम आज देश के मीडिया में भी कोई नहीं कर रहा है। 
इसलिए उनकी राजनीतिक पार्टी हो, या संगमा की पार्टी हो, इनके महत्व को कम आंकना ठीक नहीं है। हो सकता है कि ये मौसमी फूल, या मौसमी कांटे की तरह की हों, और एक चुनाव के बाद ये खत्म हो जाएं, लेकिन एक मौसम का इस्तेमाल कम नहीं होता। कुदरत ने बहुत से ऐसे कीट-पतंग बनाए हैं, पेड़-पौधे बनाए हैं, जिनकी जिंदगी बस एक मौसम की होती है, कुछ की तो कुछ दिनों की ही होती है। लेकिन उससे उनकी भूमिका कम नहीं हो जाती। इसलिए हम आने वाले चुनावी मौसम के हिसाब से भी ऐसी नई पार्टियों और ऐसे नए लोगों के आने का स्वागत करते हैं, जो कि संसद और विधानसभाओं की तस्वीरें चाहे न बदल सकें, लेकिन जो चुनावों को बाहुबलियों की कुश्ती से परे, एक अधिक लोकतांत्रिक तस्वीर बना सकें। कुछ सवाल कुकुरमुत्ते ही उठा सकते हैं, जिनको अगले मौसम में अपनी जिंदगी की कोई परवाह नहीं होती, बरगद नहीं उठा सकते जिनको अगले सौ बरस की फिक्र होती है।  (बरगद से माफी के साथ यह मिसाल)।

मीडिया कारोबार और उसके लोगों से जुड़े हुए कुछ मुश्किल सवाल...

27 नवंबर 2013
संपादकीय
तहलका और तरूण तेजपाल के मामले में कामकाजी महिला की देह शोषण का मुद्दा इस मामले के बाकी पहलुओं को दबा गया है। एक पत्रिका किस तरह के मालिकाना हक से खड़ी हुई, उसने किस तरह से अपने आपको एक आंदोलन सा बताकर उसमें पूंजी निवेश करने वाले लोग जुटाए, किस तरह से यह पत्रिका अपने आकार से बड़े-बड़े आकार के सांस्कृतिक और बौद्धिक आयोजन करने लगी, और सबसे अधिक मायने रखने वाली आखिरी बात, कि किस तरह यह पत्रिका आज शायद सिर्फ अपने आयोजनों से कमाई कर रही थी। 
कोई अखबार या कोई मैग्जीन अपने नुकसान को पूरा करने के बहुत से तरीके इस्तेमाल कर सकते हैं, करते हैं। भारत में आज मीडिया ऐसे हाथों में है जिनमें मीडिया को एक औजार और हथियार की तरह खरीदा, गढ़ा, या खड़ा किया जाता है। इससे परे कुछ लोग मीडिया में भारी पूंजी निवेश करके उसे काबू में रखते हैं, और पिछले दिनों जब कुमारमंगलम बिड़ला पर सीबीआई का केस दर्ज हुआ तो इन तमाम किस्मों के मीडिया ने तरह-तरह से उनका साथ दिया। दूसरी तरफ तहलका ने पत्रकारिता में जितने किस्म के मील के पत्थर गाड़े, उनके चलते इसके संस्थापक, और मालक-चालक तरूण तेजपाल का प्रभावमंडल उनके छतरी तले होने वाले आयोजनों के लिए करोड़ों रूपए देने वाले प्रायोजक जुट जा रहे थे। यह एक अलग बात है कि तरूण तेजपाल के दोस्त ही आज ऐसे प्रायोजकों की अपनी साख पर गहरे शक खड़े कर रहे हैं, और यह पा रहे हैं कि ये प्रायोजक उन मूल्यों के ठीक खिलाफ हैं, जिन मूल्यों को लेकर तहलका पत्रकारिता कर रहा था। 
लेकिन आज यहां पर इस चर्चा का मकसद तहलका या तेजपाल पर चर्चा इसलिए नहीं है क्योंकि इनसे जुड़े दूसरे पहलू आज अदालतों के रास्ते पर हैं, और उनके बीच इस पत्रिका के इस पहलू पर चर्चा अधिक मायने नहीं रखती कि इसके पीछे कहां से पैसा आया, किस नीयत से आया। यहां पर मायने यह रखता है कि ताकतवर पत्रकारिता से जुड़े लोग जब अपने झंडे तले कोई आयोजन करते हैं, तो उन आयोजनों में प्रायोजकों के साथ उनके रिश्ते कैसे रहते हैं? आयोजनों से परे भी मीडिया के मालक-चालक जब कई दूसरे किस्म के अभियानों से जुड़ जाते हैं, तो उसके पीछे के दानदाताओं से लेकर, उनमें हिस्सा लेने वाले लोगों तक के साथ उस मीडिया के रिश्तों से ईमानदार अखबारनवीसी पर आंच आने लगती है। एक वक्त था जब जज सामाजिक रिश्तों से दूर रहते थे, ताकि उनके फैसले संबंधों से प्रभावित न हों। हमारे परिचित एक बहुत बड़े अफसर ऐसे हैं जिन्होंने आज तक वोट नहीं दिया, क्योंकि वे जिसे चुनकर आएंगे, उस पार्टी से जुड़े मामलों पर प्रशासनिक फैसला लेने में उनके मन में एक पूर्वाग्रह पैदा हो सकता है। 
भारत सरकार ने देश की संस्थाओं को विदेशों से चंदा मिलने को लेकर जो रोक लगाई हुई है, उसमें एक सबसे बड़ी रोक यह है कि मीडिया से किसी भी तरह जुड़े हुए किसी व्यक्ति से किसी भी तरह जुड़े हुए किसी संस्थान को कोई विदेशी दान नहीं मिल सकता। यह नियम इसलिए बनाया गया कि मीडिया की ताकत का इस्तेमाल करके लोग सामाजिक, सांस्कृतिक, या मानवीय मुद्दों पर आंदोलन या अभियान के लिए दान न जुटा सकें। लेकिन भारत के भीतर से दान पाने के लिए इस तरह की कोई रोक नहीं है, और मीडिया से जुड़े हुए लोग अपने बड़े-बड़े आयोजनों के लिए, अपनी घरेलू और जेबी संस्थाओं के लिए सरकार और बाजार से अनगिनत दान पाते हैं। आज अगर तहलका के बारे में यह खबर है कि यह पत्रिका घाटे में चल रही थी और इसकी कमाई सिर्फ इसके ऐसे आयोजन रह गए थे, जिनके पीछे बड़ी-बड़ी विवादास्पद कंपनियों के करोड़ों रूपए मिल रहे थे, तो फिर ऐसी पत्रकारिता, ऐसे प्रकाशन, ऐसे कारोबार, और ऐसे आयोजन, इन सब पर सवाल उठते हैं। और जब भारतीय लोकतंत्र में बिना किसी संवैधानिक व्यवस्था के, एक विशेष दर्जा पाने वाले मीडिया की ताकत ऐसे दान, ऐसे सहयोग, या ऐसे इश्तहारों के पीछे हो, तो यह सवाल उठना जायज है कि इसका कितना हिस्सा विज्ञापनों की शक्ल में मीडिया के जायज हक का है, और ऐसे सहयोग का कितना हिस्सा घोषित और अघोषित संबंधों से होने वाले घोषित और अघोषित आपसी या इकतरफा फायदों का है? आज बाजार के तौर-तरीके मीडिया के आयोजनों को उसका एक हिस्सा बना चुके हैं, लेकिन इससे मीडिया की रीढ़ की हड्डी, और उसकी नीयत दोनों कमजोर होते हैं। मीडिया से जुड़े हुए लोगों से जुड़े हुए संगठनों को, उनकी संस्थानों को सरकार और गैरसरकारी दान मिलने पर भी वैसी ही रोक लगनी चाहिए, जैसी कि उनके विदेशी दान पाने पर लगी हुई है। जो तर्क विदेशी दान पर रोक के हैं, वे ही तर्क देसी दान के मामलों पर भी लागू होते हैं। 
यहां पर आखिर में हम एक दूसरा सवाल यह उठाना चाहते हैं कि पाठक हों या दर्शक, क्या मीडिया के ग्राहक समाचारों और विचारों को लगभग मुफ्त पाने की अपनी सोच को छोडऩे के बारे में सोच सकते हैं? जब तक सरकार और बाजार पर मीडिया इतनी बुरी तरह टिका रहेगा, तो इसका बोझ सच पर पड़ेगा ही पड़ेगा। जब पांच-सात रूपए में छपने वाला अखबार लोगों को दो रूपए में सुहाता है, तो मीडिया के घाटे को सरकार और बाजार की वे ताकतें ही पूरा करती हैं, जो मीडिया के मार्फत लोगों की सोच को अपने मुताबिक ढालना चाहती हैं। यह सवाल तहलका से परे का है, और आज की वारदात के बहुत पहले से खड़ा हुआ है। मीडिया और उससे जुड़े लोगों का रॉबिनहुड जैसा अंदाज ठीक नहीं है कि वे सरकार और कारोबार को लूटकर जनता को सस्ते में अखबार या चैनल दे रहे हैं। रॉबिनहुड की नीयत सही हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में रॉबिनहुड की नियति सही नहीं हो सकती। इसलिए मीडिया को, उससे जुड़े लोगों को, अपने धंधों, और अपने पसंदों, के बारे में सोचना चाहिए, और अपने बुनियादी काम से परे की हरकतों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिसके लिए सरकार और बाजार से बेजा रिश्ते बनाने ही पड़ते हैं। 

Bat ke bat, बात की बात

26 nov 2013

इंसानी गोश्त किस भाव बेच रहे हैं जनाब?

26 नवंबर 2013
संपादकीय
कल छत्तीसगढ़ में एक मुसाफिर बस जिस तरह सड़क पर हादसे का शिकार हुई, उसमें दर्जन भर लोग मारे गए, और इससे दोगुने मुसाफिर अस्पताल में हैं। राजधानी रायपुर से यह मामला इतनी दूर भी नहीं हुआ है कि यहां बैठी सरकार इसका नोटिस न ले, और कुछ घंटों के भीतर राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक का शोक संदेश इस पर आ गया। 
अभी कुछ ही महीने पहले छत्तीसगढ़ सरकार के परिवहन विभाग में एक-एक चेक पोस्ट पर तैनाती के लिए तीस-चालीस लाख रूपए के लेन-देन का बाजार भाव तकरीबन दीवारों पर लिखे सरीखा उजागर था। इस खेल में लोकतंत्र की ताकत के सारे बाहुबली शामिल थे, और हादसों में गई जिंदगियों को मिलकर बेच रहे थे। सत्ता और विपक्ष, नेता और अफसर, और समाज के बाकी ताकतवर तबकों के लोग, जिसकी जितनी चली, उसने उतनी तैनाती करवा लीं। जब सड़कों पर हिफाजत के लिए जिम्मेदार ट्रैफिक पुलिस, और परिवहन विभाग, इन दोनों में तैनाती के लिए लंबी बोलियां लगती हैं, लोग पूंजी निवेश करके यहां पर तय समय के लिए वसूली का हक पाते हैं, तो यह जाहिर है कि इसका भुगतान इंसानी जिंदगियों को ही करना पड़ता है। 
लेकिन सत्ता को करीब से देखने वाले हमारे जैसे जो जानकार लोग हैं उनको इस बात की हैरानी होती है कि हजारों करोड़ की कमाई की गुंजाइश वाली सरकारों में सैकड़ों करोड़ कमाने का ऐसा बदनाम और भ्रष्ट इंतजाम बेशर्मी से जारी रखा जाता है जो कि अनगिनत मौतों के लिए अकेले जिम्मेदार है। और न सिर्फ मौतें, बल्कि सरकार की कमाई में जब लाखों की चोरी सड़कों पर होती, सड़कों की बर्बादी होती है, तब जाकर कानून तोडऩे वाले लोग कुछ हजार रूपए अफसरों और नेताओं की तरफ फेंक देते हैं। अगर ईमानदारी से उनसे वसूली की गई होती तो निजी जेबों में जितनी रिश्वत जाती है उससे सैकड़ों गुना अधिक कमाई सरकार की, यानी जनता की, होती, और हर बरस इस छोटे से छत्तीसगढ़ में हजारों जिंदगियां बचतीं। आज तो खबरों में वे ही आंकड़े आते हैं जो सड़कों पर हो चुकी मौतों के हैं, दुर्घटना के बाद कुछ हफ्तों या महीनों के इलाज के बाद मरने वालों के आंकड़े खबरों की सुर्खियों में नहीं रहते। 
क्या सरकार पर जनता का और जानकार तबकों का, किसी ईमानदार जनसंगठन का, ऐसा दबाव नहीं बन सकता कि इंसानी जिंदगियों की कीमत पर होने वाली, बच्चे-बच्चे की पहचानी हुई ऐसी बदनाम वसूली को रोका जा सके? एक झटके में जब एक दर्जन इंसान मारे गए हैं, तो उस पर भी हालात सुधारने के लिए अगर लोग नहीं जागेंगे, तो यह इंसानी गोश्त लाखों रूपए किलो में बेचने के धंधे जैसा होगा। मध्यप्रदेश के समय से हम यह देखते आ रहे हैं कि ट्रैफिक पुलिस और आरटीओ, दोनों को दूध देने वाली गाय की तरह सत्ता अपने पिछवाड़े बांधकर रखती है, और उसका लहू निकल जाने तक उसे दुहती है। सब कुछ जानते हुए भी संसद या विधानसभा, अदालत या कोई और संवैधानिक संस्था, कोई भी इस माफिया को रोकने की सोचते भी नहीं। इस सिलसिले के खिलाफ जनता के बीच से अगर जागरूकता सामने आए, अगर किसी स्टिंग ऑपरेशन में बड़े-बड़े लोग इसमें फंसें, तो ही जाकर शायद किसी सुधार की उम्मीद, सजा के बाद, की जा सकती है। अभी-अभी पूरे देश की सड़कों पर ऐसी अवैध उगाही के बारे में एक रिपोर्ट आई थी कि हर बरस भारत में सड़कों पर 22 हजार करोड़ की अवैध वसूली होती है।
फिलहाल हम इस धंधे से जुड़े सारे लोगों से चाहेंगे कि साल भर की मौतों, और साल भर की कमाई का अंदाज लगाकर यह देखें कि इंसानी गोश्त वे किस भाव बेच रहे हैं? 

तब तक जनता को वैसी ही, ऐसी-वैसी सरकारें मिलती रहेंगी जिसकी कि...

25 नवंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में चुनाव के बाद का एक ऐसा सन्नाटा पसरा हुआ है जो यहां के लोगों पर भारी पड़ रहा है। चुनावी राजनीति में नतीजों को लेकर अटकलबाजी भी एक सीमा होती है। और बीस दिन तक इस सीमा को खींचना किसी के भी इंसानी बर्दाश्त से बाहर की बात होती है। आज विधायकों से लेकर उम्मीदवारों तक, और संभावित मुख्यमंत्रियों से लेकर सत्ता के इर्द-गिर्द कारोबार करने वालों तक, सबमें एक बड़ी बेचैनी दिख रही है। लेकिन हम जब इस नौबत को देखते हैं तो लगता है कि सत्तारूढ़ पार्टी के रूप में भारतीय जनता पार्टी को रमन सरकार की तरफ से ऐसा खासा साथ मिला था कि वह ऐसी बेचैनी की नौबत में ही न पड़ती। जब पार्टी ने सरकार की उपलब्धियों का फायदा उठाने का मौका खो दिया, तो वह आज इस बेचैनी में पड़ी है। दूसरी तरफ दस बरस से छत्तीसगढ़ में विपक्ष में चली आ रही कांग्रेस पार्टी ने इस विधानसभा चुनाव में, अभी नहीं तो अगले कुछ बरस और नहीं, जैसी नौबत को खोने का काम किया है, और आज वह भी एक टक्कर की बेचैनी में पड़ी हुई है। भाजपा सरकार ने जैसे अपनी पार्टी को भरोसे का मौका दिया था, ठीक उसी तरह उसने विपक्ष को इस चुनाव को जीत जाने का मौका भी दिया था, और कांग्रेस छत्तीसगढ़ में खुद होकर तो इस मौके का इस्तेमाल नहीं कर सकी, मतदाता कांग्रेस के हक से अधिक उसे देने पर उतारू हो जाएं, तो एक अलग बात है। 
ऐसा लगता है कि पिछले दस, या कम से कम पांच बरस का कामकाज धरा रह गया, और चुनाव के पहले के कुल एक-डेढ़ महीने में ही पार्टियों ने जो किया, वही नतीजे दिखाने जा रहा है। यह एक हैरानी की बात है कि जिस राज्य में पिछले चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच कुल डेढ़ फीसदी वोटों का फर्क था, उस राज्य में आज सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों के बीच कई फीसदी के फर्क के, उतार-चढ़ाव के अंदाज लगाए जा रहे हैं, और यह बहाव एक बेकाबू सैलाब की तरह पिछले डेढ़ महीने में आया हुआ दिखता है। यह हमारी समझ से परे है कि अगर जनता को प्रभावित करना पांच बरसों के आखिरी कुछ दिनों का ही काम है, तो फिर इतने बरस की सत्ता या विपक्ष की मेहनत किस काम आती है? अगर सरकार दस या पांच बरस अच्छा काम करे, और उसके बाद भी उसे चुनाव के वक्त एक-एक वोट को जुटाने के लिए कई-कई नोट खर्च करने की बेबसी हो, तो मतदाता के लिए पांच बरस कुछ किया क्यों जाए? दूसरी तरफ जिस तरह किसी इम्तिहान में कुछ छात्र-छात्रा आखिरी रात पढ़ाई करके भी पास हो जाते हैं, उसी तरह अगर विपक्ष आखिरी के एक-दो महीनों में ही मेहनत करके सत्ता पलटने की उम्मीद कर सकता है, तो फिर यह किस तरह का लोकतंत्र है? 
लेकिन हकीकत यही है। सत्ता या विपक्ष की जिम्मेदारी से परे, आखिरी के एक-दो महीनों का मैनेजमेंट, तरकीबें और तिकड़में, खरीदी और बिक्री, इन सबसे ही अगर इतने वोटों का फर्क पड़ सकता है, जितने से कि सरकार बनती है और गिरती है, तो फिर ऐसे लोकतांत्रिक फैसले से जनता क्या साबित कर सकती है? और आज हवा में इसी तरह की सारी तिकड़में, साजिशें, और मैनेजमेंट की तरकीबें सीना ठोकते खड़ी हैं कि वे चुनाव जितवाने या हरवाने जा रही हैं। ऐसे चुनावी लोकतंत्र का कोई भी मतलब नहीं है जिसमें जनता के हक से लूटे गए पैसों से दोनों बड़ी पार्टियां चुनाव लड़ती हैं, और अपने हुनर के बल पर सत्ता में आने की उम्मीद रखती हैं। मतलब यह कि पांच बरस का काम अच्छा हो, तो भी उसे चुनाव के वक्त भ्रष्टाचार की बैसाखियों की जरूरत पड़ती है, और पांच बरस का काम बहुत बुरा हो, तो भी उसे भ्रष्टाचार की ताकत से जीतने लायक बनाया जा सकता है। 
जब जनता का एक बड़ा हिस्सा मतदान को ही लोकतंत्र मान ले, तो फिर नेताओं का काम, पार्टियों का काम आसान हो जाता है, चुनाव को मोडऩे या खरीदने की ताकत रखने वाले लोगों का काम आसान हो जाता है। दूसरी तरफ जो लोग पांच दिनों में हर बरस अच्छा काम करने की सोच रखते हैं, उनकी सोच अपने घर में ताक पर धरी रह जाती है। जनता के बीच जब तक राजनीतिक समझदारी नहीं बढ़ेगी, उसकी सोच जब तक महज इतनी रहेगी कि आखिरी दिन तक वह आखिरी पलों का अपना फायदा देखते हुए वोट दे, या जिता दे, या हरा दे, तो फिर यह भारत का लोकतंत्र नहीं, यह भारत का मतदान है। इन दोनों के फर्क को जब तक जनता समझेगी नहीं, जब तक इन दोनों का अलग-अलग इस्तेमाल नहीं करेगी, तब तक उसे वैसी ही, ऐसी-वैसी सरकारें मिलती रहेंगी, जिसकी कि वह हकदार है। 

बात की बात, Bat ke bat,

24 nov 2013

24 nov 2013

दूसरों की तस्वीर बनाने-बिगाडऩे के पहले, खुद की फिक्र करें...

24 नवंबर 2013
संपादकीय
इंटरनेट पर सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब मीडिया नाम का टापू बाकी धरती से मिल गया है, और वह कोई अलग द्वीप नहीं रह गया है। बाकी दुनिया, बाकी लोगों का भी लिखने, छपने, और दिखने का हक उतना ही हो गया है जिसे कि हिन्दुस्तान में कल तक लोकतंत्र के चौथे पाए का एकाधिकार माना जाता था। इससे दो बातें हुई हैं, पहली तो यह कि जनता के पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीधे-सीधे उसके अपने हाथ में आ गई है। और दूसरी बात यह हुई है कि मीडिया को अपने तौर-तरीकों, अपने फैसलों को बाकी जनता की राय की कसौटी पर कसना भी पड़ रहा है, और उसके मुताबिक अपने तरीकों को बदलना भी पड़ रहा है। इंटरनेट ने एक रामसेतु की तरह भारत और लंका को जोड़ दिया है, और अब कोई भी सार्वजनिक घटना, कोई भी चर्चित मुद्दा, जनता की राय के बिना अकेले मीडिया की राय के मोहताज भी नहीं रह गए हैं।
इस बारे में आज चर्चा की जरूरत इसलिए लग रही है कि एक चर्चित पत्रिका तहलका के मालक-चालक तरूण तेजपाल पर अपनी एक जूनियर सहकर्मी पर सेक्स हमला करने का जो मामला दर्ज हुआ है, उसमें उस लड़की के गोपनीयता के अपने हक से लेकर उस पत्रिका के बाकी लोगों के रूख तक बहुत सी बातों पर व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच के टकराव पर भी चर्चा हो रही है। ऐसे हमले देश में रोजाना हजारों जगह होते होंगे, लेकिन जो मामले अधिक चर्चित होते हैं, उन्हीं को लेकर अधिक बहस होती है, मिसालें कायम होती हैं, पैमाने तय होते हैं, और कभी-कभी चर्चित मामलों पर अदालती फैसलों के बाद कानून को बदलने तक का काम संसद करती है। सार्वजनिक जगहों पर किन बातों को लिखा जाए, और किन बातों को न लिखा जाए, इस पर भी बहस इन दिनों खासी होती है, और खासकर महिलाओं पर होने वाले अपराधों के मामलों में उनकी शिनाख्त बचाए रखने का तर्क इन दिनों लगातार जोर पकड़ रहा है। अभी एक अभियान तहलका-केस में चल रहा है कि सेक्स हमले या बलात्कार की शिकार इस पत्रकार ने अपने बारे में पत्रिका के मैनेजमेंट को जो लिखा था, उस चि_ी को आगे न बढ़ाया जाए क्योंकि उसमें उसकी निजी जानकारियां हैं। 
आज कम्प्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल फोन की मेहरबानी से अच्छी या बुरी कैसी भी बात को बात की बात में आगे बढ़ाना इतना आसान हो गया है, कि बहुत से लोग अपने पास आई किसी बात को ठोक बजाकर उसकी असलियत को परखना तो दूर रहा, उसे पूरी तरह पढ़े बिना भी आगे बढ़ाने का काम करने लगे हैं। मोबाइल फोन पर कुछ सुविधाएं ऐसी हैं जिनसे बिना किसी खर्च के बकवास को आगे बढ़ाना, थोक में उसे बांट देना बहुत आसान हो गया है। ऐसे में मोबाइल फोन के कुछ एप्लीकेशन कचरा ढोने वाली ट्रक की तरह का काम करते हैं, और अपने जान-पहचान के लोगों के दिल-दिमाग पर रोज सुबह से कूड़ा पहुंचाना शुरू कर देते हैं। एक समय था जब लोगों को किसी शौचालय के दरवाजे के भीतर की तरफ किसी चीज से खरोंचकर  अपने मन की बातें लिखने में कुछ मेहनत करनी पड़ती थी। आज अपने पास पहुंची किसी और के मन से उपजी गंदगी हो, या अपने खुद के मन की गंदगी हो, उसे आगे बढ़ाने में लोगों को बहुत मजा आता है। 
यहां पर इस बारे में आज लिखने का मकसद यह है कि लोगों को यह सोचने के लिए थोड़ा सा मजबूर करें कि किसी गंदगी को बांटने के पहले यह याद रखें कि आज वह किसी और के बारे में है, लेकिन अगर समाज के तौर-तरीकों में ऐसी बातों का प्रचलन बढ़ते चले गया तो किसी दिन आपके परिवार के किसी मेंबर के बारे में भी ऐसी वीडियो क्लिप, या ऐसी तस्वीरें, या उनकी कोई चि_ी चारों तरफ आंधी के साथ बिखरती बदबू की रफ्तार से फैल सकती हैं। दूसरी बात यह कि ऐसी निजी बातों से परे बहुत से लोग बहुत से झूठ, और अवैज्ञानिक बातें रात-दिन चारों तरफ फैला रहे हैं। और गणेश को दूध पिलाने का आदी यह देश ऐसे झूठ को कम्प्यूटर वायरस की तरह और तेजी से बांटने में जुट जाता है। हमारी तरह के जो मामूली समझ के लोग भी हैं, वे अपने पास पहुंचे ऐसे झूठ को लेकर भेजने वाले की अक्ल का अंदाज लगाते हैं। इसलिए किसी बात को आगे बढ़ाने के पहले यह जरूर सोच लें कि वह बात आपको एक हैवान भी दिखा सकती है, या विज्ञान से अनजान एक बेवकूफ भी साबित कर सकती है। किसी बुरे की वकालत करके भी आप अपने आपको बुरे का वकील तो साबित कर ही लेते हैं। इसलिए जो नए औजार कम्प्यूटर और संचार तकनीक ने दिए हैं, उनका इस्तेमाल अपनी तस्वीर को बेहतर बनाने के लिए करना चाहिए, अपने मुंह पर कालिख पोतने के लिए नहीं करना चाहिए। आप समाज में आज लोगों की तस्वीर ऐसी हरकतों से बनती और बिगड़ती है।

नन्हीं बच्ची से बलात्कार करके, उसके टुकड़े करने को, हाईकोर्ट नीयत से किया नहीं मानता!

संपादकीय
23 नवंबर 2013
हिंदुस्तान का माहौल चुनाव की सरगर्मी के बीच एक बार फिर गमगीन सा हो गया है। दिल्ली के एक चर्चित बलात्कार-केस के चलते देश भर से महिलाओं पर होने वाले जुर्म की खबरें फिर खबरों में हैं। टीवी चैनल बहसों से लबालब हैं। सोशल मीडिया उबल रहा है। कामकाजी महिलाओं के देह शोषण का मुद्दा, और शोषण की शिकार, या उससे उबरी हुई महिला के निजी जीवन की गोपनीयता के अधिकार को लेकर न सिर्फ चर्चा और बहस छिड़ी है, बल्कि एक अभियान भी चल रहा है कि शिकायत करने वाली लड़की को अपनी पहचान अपने तक रखने की रियायत दी जानी चाहिए। इसके साथ-साथ एक दूसरा पहलू भी चर्चा में है जिस पर हम कल इसी जगह एक पूरा लंबा संपादकीय लिख चुके हैं कि किस तरह तहलका के संस्थापक तरूण तेजपाल, और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल, एक मातहत अखबारनवीस युवती के आरोपों से लेकर अन्ना हजारे तक के आरोपों और स्टिंग ऑपरेशनों को झेल रहे हैं, और जनता के बीच प्रतिमाएं चूर-चूर होकर बिखर रही हैं। 
लेकिन देश के ऐसे माहौल के बीच आज लिखने की एक दूसरी वजह है, जो कि जरा सी दूर तक महिलाओं पर सेक्स-अपराधों से जुड़ी है, लेकिन बाकी दूर तक वह अलग है। अभी दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक फैसले में निचली अदालत द्वारा एक नौजवान को दी गई मौत की सजा को पलटकर उम्रकैद कर दिया। इसने तीन बरस की एक बच्ची के साथ बलात्कार किया था, और फिर उसके बदन के उन हिस्सों पर चाकुओं से वार किया था, उसके बदन के दो टुकड़े कर दिए थे, और उसे मार डाला था। इस पर दी गई मौत की सजा को पलटते हुए जजों ने कहा कि यह अपराध पहले से सोचा-समझा, और तय किया हुआ नहीं था, और ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं कि इस बच्ची को दो टुकड़ों में काट देने की नीयत थी।
इसे पढ़कर भी हमको कल से अब तक का वक्त लगा कि इस फैसले से पैदा हुए सदमे से उबर सकें, और इसके बारे में कुछ लिख सकें। इन दो जजों में एक महिला भी है। और सजा को घटाने का उनका तर्क यह है कि यह बलात्कारी हत्यारा वहां से भागा नहीं। इन जजों ने इस अपील को भी ठुकरा दिया कि इनको अगर वे फांसी देना नहीं चाहते, तो मौत की सजा को मरने तक जेल में रहने की सजा लिख दें। 
हमारा ख्याल है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने पर हाई कोर्ट की घटाई सजा खारिज कर दी जाएगी, और इस आदमी को फांसी दी जाएगी। तीन बरस की बच्ची को मिठाई का लालच देकर ले जाना, और उसके बाद वह सब कुछ करना, जिसे हम ऊपर लिख चुके हैं, और जिसे दुहराने की हिम्मत नहीं है, उसके बाद अगर कोई मौत की सजा का हकदार नहीं है, तो फिर किसी को भी यह सजा नहीं दी जानी चाहिए। हम किसी को भी मौत की सजा के खिलाफ हैं, लेकिन हिंदुस्तान में जब यह कानून जारी है, तब तक अगर कोई ऐसी सजा का हकदार है, तो यह आदमी तो है ही। इन जजों के निकाले गए इस नतीजे पर हम हक्का-बक्का हैं कि इस बच्ची के शरीर के दो टुकड़े किसी नीयत के साथ नहीं किए गए थे। तीन बरस की बच्ची के दो टुकड़े करने के पीछे हत्यारे की दो टुकड़े करने की नीयत के अलावा और क्या हो सकता है? 
इस फैसले के बाद भारतीय न्याय व्यवस्था पर से अगर बहुत से लोगों का भरोसा उठ जाता है, तो उस पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। जब तक देश में कोई सबसे कड़ी सजा जारी है, तब तक उससे कम किसी भी सजा की रियायत ऐसे बलात्कारी हत्यारे को देना इंसाफ के नाम पर एक मजाक करना है। आज पूरा हिंदुस्तान जिस तरह कदम-कदम पर बलात्कार, और महिलाओं पर यौन हमलों से भरा हुआ है, उसमें लोगों का हौसला पस्त करने के लिए, उन्हें अक्ल सिखाने के लिए न सिर्फ तेज रफ्तार से जांच और सुनवाई की जरूरत है, बल्कि कड़ी से कड़ी मौजूदा सजा की भी जरूरत है। हम दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले से पूरी तरह असहमत होते हुए, उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से खारिज करने के फैसले की उम्मीद करते हैं। 

एक दिन में दो मूर्तियां चूर-चूर दबकर लोगों की उम्मीदें जख्मी

22 नवंबर 2013
संपादकीय
कल का दिन भारत के लिए कुछ भारी था। भाग्य और ग्रह नक्षत्र पर भरोसा रखने वाले शायद यह मान बैठेंगे कि ग्रहों की किसी स्थिति के चलते नामी-गिरामी लोगों की बदनामी होनी थी। लेकिन ऐसे किसी अंधविश्वास पर भरोसा किए बिना भी, कल दो मूर्तियों के चूर-चूर होने से हमको कुछ तकलीफ हुई है। एक तो ईमानदारी का नारा लेकर चुनाव में उतरी आम आदमी पार्टी के कई उम्मीदवार एक स्टिंग ऑपरेशन में कुछ भ्रष्ट बातों को करते हुए दिखाए गए। इसकी सच्चाई धीरे-धीरे सामने आएगी, लेकिन जिस तरह किसी भी सच्चाई के सामने आने के पहले उसके बारे में लगातार सवाल उठाकर, सड़कों पर जन अदालत लगाकर अरविंद केजरीवाल ने लोगों के बीच व्यवस्था के खिलाफ एक हिकारत पैदा की है, तो वही हिकारत आज केजरीवाल और उनके साथियों से इस स्टिंग ऑपरेशन के आरोपों पर जवाब चाह रही है। और जिस तरह किसी से मांगे गए जवाब आने के पहले केजरीवाल लोगों को अपनी पसंद की बिना पर कुसूरवार ठहराते आए हैं, तो आज उनके शिकार लोगों और उनके विरोधियों को बराबरी का हक देते हुए आप पार्टी पर शक करने का मौका तो है ही। और जब केजरीवाल एक राजनीतिक दल बनाकर चुनावी मैदान में है तो चुनावी राजनीति की छानबीन की भारतीय संस्कृति से वे किसी रियायत की उम्मीद नहीं कर सकते। केजरीवाल की चर्चा हम इस बात पर अभी खत्म करते हैं कि उनकी पार्टी ने जब दिल्ली में अपने 45 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति तय किए, तो जाहिर है कि करोड़पतियों के कुछ ऐसे कारोबार सामने आने का खतरा तो था ही जो कि अगर कांग्रेसी और भाजपाई लोगों से जुड़कर सामने आते, तो केजरीवाल उन्हें पल भर में भूमाफिया करार दे देते। 
दूसरा मामला सामने आया है बहुत से भांडाफोड़ करने के लिए जानी-पहचानी पत्रिका तहलका के संपादक-प्रकाशक तरूण तेजपाल को लेकर। आरोप है कि उन्होंने लगातार दो दिन अपनी एक जूनियर पत्रकार पर सेक्स हमला किया, जो कि उनके दोस्त की बेटी थी, और बेटी की दोस्त थी। इस नौजवान पत्रकार ने इसके बाद जब इस पत्रिका की एक दूसरी महिला मुखिया से औपचारिक शिकायत की, तो तरूण तेजपाल ने इस घटना को अपने फैसले की एक चूक करार देते हुए अपने आपको छह महीने के लिए पत्रिका से अलग करने का प्रायश्चित अपने लिए तय किया। यहां दो बातें हैं, पहली तो यह कि दूसरे बुरे लोगों के खिलाफ लगातार सनसनीखेज भांडाफोड़ करने वाले एक अखबारनवीस के वैसे तो सैकड़ों दुश्मन हो सकते हैं, जो कि उन्हें ऐसी नौबत में फंसा हुआ देखकर बहुत खुश होते, लेकिन यह ताजा फंदा केजरीवाल का खुद का बुना हुआ है, और अपने ही एक जुर्म में वे फंसे हैं, उनको किसी ने किसी स्टिंग ऑपरेशन में नहीं फंसाया है। इसलिए हम उनके इस मामले को उनकी पत्रकाारिता के अच्छे और बुरे पहलुओं से जोड़कर नहीं देखते, लेकिन अपनी पत्रिका के सबसे बड़े ओहदे पर रहते हुए, अपनी एक जूनियर सहकर्मी पर उनका इस तरह का यौन हमला उनको चूर-चूर कर गया है। इसकी कोई सफाई नहीं हो सकती, इसकी कोई माफी नहीं हो सकती, और जो सजा उन्होंने अपने लिए तय किए, वह लोगों के मन में उनके खिलाफ गुस्सा और बढ़ा रही है। अपने जुर्म पर वे खुद ही जज भी बन गए हैं, और देश के कानून, संस्थान की जिम्मेदारी, की चर्चा भी किए बिना वे एक किस्म से अपने आपको बचाते नजर आ रहे हैं, और यह बात बिल्कुल भी मंजूर नहीं की जा सकती। इतनी कम उम्र, निजी जीवन की करीबी और पारिवारिक लड़की, ओहदे में जूनियर, और उसकी मर्जी के खिलाफ उस पर अपने बदन की ताकत के इस्तेमाल से सेक्स हमला, खुद की तय की हुई सजा के लायक नहीं है। इस बारे में राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर राज्य की पुलिस तक सबने दखल दे दी है, इसलिए हम इस मामले के कानूनी पहलुओं और संभावनाओं पर यहां पर अधिक लिखना नहीं चाहते। लेकिन तकलीफ की बात जो कि इस जुर्म से अलग भी है, वह यह कि बहुत से मुजरिमों का भांडाफोड़ करने का हौसला रखने वाली एक पत्रिका उसके संपादक के एक निजी जुर्म की वजह से आज विश्वसनीयता के संकट में पड़ गई है, जबकि आज देश में धारदार अखबारनवीसी की जरूरत है। हम यहां पर इस पत्रिका को किसी तरह का चरित्र प्रमाणपत्र नहीं दे रहे हैं, क्योंकि उसका कोई प्रसंग नहीं है, और इस पत्रिका के पीछे देश की कारोबारी दुनिया की दौलत को लेकर कई तरह की कहानियां हवा में है, लेकिन उनसे हम इस सेक्स हमले को नहीं जोड़ते, इस पत्रिका के हाथों पर्दाफाश हुए मुजरिमों के जुर्म कम नहीं गिनते, और ये बातें अलग-अलग देखने के लायक है। 
लोकतंत्र में जब जनता के बीच जनधारणाओं के ईंट-गारे से बनी हुई प्रतिमाएं इंसानी गलतियों, और गलत कामों की वजह से चबूतरों से गिरकर टूटती हैं, तो उनके तले लोगों की उम्मीदें भी चूर-चूर होती हैं। कुदरत ने इंसानों को गलतियों से किसी तरह का पूरा बचाव नहीं दिया है। गलत काम के  दर्जे, और गलतियों के बीच सिर्फ नीयत का एक फर्क होता है, और जिन लोगों का भांडाफोड़ तरूण तेजपाल की पत्रिका करती थी, उनकी नीयत और सेक्स हमले के पीछे तेजपाल की नीयत में गलती कुछ नहीं है, दोनों ही सीधे-सीधे गलत काम की मिसाल थे। और अगर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों पर लगी तोहमत सही साबित होती है, तो यह भारतीय जनभावनाओं के बीच एक और मूर्तिभंजन होगा। केजरीवाल के बारे में यह गिनाना भी जरूरी है कि किस तरह अन्ना हजारे लगातार उनसे अपना मोहभंग उजागर करते आ रहे हैं, और यह जाहिर है कि किस तरह वे अन्ना की नजरों से गिरे हैं। 
पिछले ही हफ्ते की बात है जब सुप्रीम कोर्ट के एक जज रह चुके आदमी के खिलाफ एक प्रशिक्षु युवती ने यौन शोषण की शिकायत की, और सुप्रीम कोर्ट को आनन-फानन एक जांच कमेटी बनानी पड़ी। इसके बाद जजों और वकीलों को लेकर कुछ और शिकायतें सामने आईं। इन सबसे देश की सबसे बड़ी अदालत पर से लोगों का भरोसा इसलिए टूटता है क्योंकि जिस जज या जिन जजों को मातहत महिलाओंं का यौन शोषण सूझता है, वे ऐसे जुर्म के मामलों में इंसाफ कैसे कर सकते हैं?
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि ऐसे ही मूर्तिभंजन के एक सिलसिले में हमने कुछ महीने पहले लिखा था- ...यहां पर हमें हिन्दी के एक विख्यात कहानीकार सुदर्शन की एक ऐतिहासिक कहानी 'हार की जीतÓ याद पड़ती है जिसमें एक साधू के घोड़े पर फिदा होकर एक डकैत अपाहिज बनकर आता है और उसका घोड़ा लेकर भागने लगता है। इस पर बाबा भारती कहते हैं- मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। खडग़सिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खडग़सिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, 'बाबाजी इसमें आपको क्या डर है?Ó सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, 'लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।...Ó 
यह कहानी साख की जरूरत को बताती है। और कल दिल्ली में दो चर्चित चेहरों ने यह साख कम से कम हाल-फिलहाल तो खो ही दी है। 

गुजरात का जासूसी कांड तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...।

21 नवंबर 2013
संपादकीय

जब सुप्रीम कोर्ट के बड़े नामी-गिरामी वकील किसी पार्टी के प्रवक्ता बनने के बाद उस पर लगे आरोपों को खारिज करने के लिए भारी कुतर्क की, कमसमझी और कानून के पूरी तरह खिलाफ जा रही बातें करते हैं, तो उनकी बेबसी पर तरस आता है। और राजनीतिक दलों की इस कमसमझी पर भी तरस आता है कि वे ऐसे मौकों पर भी अपने वकील-प्रवक्ताओं का इस्तेमाल जारी रखती है। जब कानूनी समझ के खिलाफ कोई बात करना मजबूरी हो, तो उसके लिए कानून के किसी गैरजानकार का इस्तेमाल एक चतुर तरीका हो सकता है। लेकिन आज भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दल, और भी बहुत सी पार्टियां और उनके नेता, इस बात के लिए बेपरवाह हो गए हैं कि जनता पर उनकी बातों का क्या असर पड़ सकता है। 
सार्वजनिक जीवन में जनता की भावनाओं और समझ के लिए ऐसी हिकारत खतरनाक है, और हमारा यह भी मानना है कि गंदगी के मुकाबले में एक-दूसरे के साथ गलाकाट स्पर्धा करते हुए पार्टियां और नेता अपने-अपने दागियों को बचाने के लिए चाहे जैसी बेशर्मी दिखाते हों, जनता इसे समझती है। लोगों को याद रखना चाहिए कि टीवी और अखबारों के बिना भी छत्तीसगढ़ के बस्तर के जंगलों के बीच बसे हुए अशिक्षित आदिवासियों में जिंदगी की समझ इतनी गहरी और सही थी कि उन्होंने 1977 के चुनाव में नेहरू की बेटी की पार्टी को एकमुश्त खारिज कर दिया था। इसलिए आज अगर राजनीतिक दलों को अपने चहेते और गौरवशाली मुजरिम को बचाने के लिए यह आड़ काम आ रही है कि उसके मुकाबले दूसरी पार्टी भी ऐसा ही तो कर रही है, तो इससे पार्टियां एक खराब सहारे पर टिक रही हैं, और दूसरी पार्टी ने अगर मुजरिमों का साथ छोड़ा, तो फिर सम्हलने में वक्त लग जाएगा। 
आज की इस बात की जरूरत इससे पड़ रही है कि गुजरात में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के मातहत गृहमंत्री रहे हुए, और मुठभेड़-हत्याओं के आरोपी होकर विचाराधीन कैदी के दर्जे में जमानत पर छूटकर उत्तर प्रदेश में मोदी की भाजपा के इंचार्ज बनकर जो अमित शाह बैठे हैं, उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंच गया है कि किस तरह एक निजी महिला पर नजर रखने के लिए उन्होंने गृहमंत्री के अपने समय, और अपनी ऊर्जा के साथ-साथ सरकार के हर मुमकिन और नामुमकिन साधनों को गैरकानूनी तरीके से कैसे झोंक दिया था। और जो टेलीफोन रिकॉर्डिंग्स सीबीआई तक पहुंची है, मीडिया में सामे आई है, और अब सुप्रीम कोर्ट में एक मामले में इसे जोड़ा जा रहा है, उससे दो बातें खड़ी होती हैं, जिन दोनों को भाजपा के दिग्गज वकील अनदेखा कर रहे हैं। 
किसी सरकार पर अगर ऐसे गैरकानूनी काम को करने के ऐसे पुख्ता आरोप लग रहे हैं, और सुबूत का दर्जा दिखती हुई टेलीफोन की बातचीत की रिकॉर्डिंग्स सामने आ रही हैं, तो उस सरकार को खुद होकर इस बारे में जवाब देना चाहिए। गुजरात की सरकार को चलाने की शपथ न तो भाजपा ने ली है, न ही उसके प्रवक्ताओं ने। यह शपथ मुख्यमंत्री, और उनके गृहमंत्री ने ली थी। इसलिए जब उनके कार्यकाल को लेकर ऐसी बात सामने आ रही है, तो न सिर्फ सार्वजनिक जीवन का तकाजा है, बल्कि यह एक संवैधानिक जिम्मेदारी भी है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह इस मामले में अपने आपको साफ साबित करें। भाजपा के ये तर्क लतीफे की तरह हैं कि एक जवान महिला के पिता के अनुरोध पर उनके निजी जानकार मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस महिला पर नजर रखने का इंतजाम किया था, और जैसा कि टेलीफोन पर बातचीत की अब तक सामने आई जानकारी सुझाती है, यह निगरानी पूरी तरह कानून के खिलाफ, उस महिला के निजी जीवन की स्वतंत्रता के खिलाफ, सार्वजनिक जीवन की नैतिकता और आचरण के खिलाफ थी। और यह एक अलग किस्म का बड़ा धब्बा है, और अगर इन आरोपों के सुबूत अदालत में खड़े होने के लायक हैं, तो मोदी और शाह कई किस्म से जवाबदेह बनते हैं। 
लेकिन आज हम बात सार्वजनिक जवाबदेही, और सरकारी जवाबदेही भर की कर रहे हैं। अभी अदालती जवाबदेही की बात हम नहीं कर रहे, क्योंकि अदालत में वैसे भी इस रिकॉर्डिंग के शिकार एक अफसर ने अर्जी दायर कर ही दी है। अदालत जब पूछे तब पूछे, आज देश की जनता प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार से यह जानना चाहेगी कि इस मामले में सच को लेकर मुख्यमंत्री के रूप में उनका क्या कहना है? मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेने वाले को अपनी सरकार के कामकाज को लेकर जवाबदेह होना ही होगा। और चूंकि नरेन्द्र मोदी हर दिन कई-कई आमसभाएं करके देश के सामने अपने मन की हर बात कह रहे हैं, दूसरी पार्टियों और नेताओं के खिलाफ हर तरह की बात कह रहे हैं, इसलिए उनसे यह उम्मीद की जाती है कि उनके खुद के बारे में उठी हुई इतनी बड़ी बात पर वे चुप्पी न साधे रखें, और इस पर कुछ बोलें, गंदगी की इस टोकरी को या तो वे सरकारी सच के हाथों घूरे पर फिंकवाएं, या फिर इसका मालिकाना हक मंजूर करें। मोदी के रात-दिन के लंबे-लंबे भाषण, और इस जासूसी-कांड पर पूरी तरह खामोशी को देखकर एक पुरानी लाईन याद आती है- तू इधर-उधर की बात न कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा...।
और भाजपा के दिग्गज वकीलों के तर्क के एक और लतीफे पर हम उन्हें कानून की एक बहुत छोटी बारीकी याद दिलाना चाहते हैं, जिसको कि भूल जाने का बेबस नाटक वे कर रहे हैं। आज अगर उस वक्त की जांच और निगरानी की शिकार महिला, और उसके आसपास के दूसरे लोगों के निजी जीवन में की गई तांक-झांक को लेकर वह महिला खुद भी अगर अपील करती है कि उस मामले को भुला दिया जाए, और वह कोई जांच नहीं चाहतीं, तो भी उससे केन्द्र और राज्य सरकार, अदालतें, इनमें से किसी की भी जांच की संवैधानिक जिम्मेदारी कम नहीं होती। 

घर बैठे थके नेता अपने-अपने घर सुधारने के बारे में सोचें...

20 नवंबर 2013

संपादकीय

छत्तीसगढ़ में कल शाम चुनाव पूरा हो गया और भारी मतदान का प्रदेश स्तर का एक नया रिकॉर्ड सामने आया। जैसी कि उम्मीद थी कि गांवों में शहरों के मुकाबले अधिक वोट पड़े, लेकिन कुल मिलाकर पिछले किसी भी चुनाव के मुकाबले पांच फीसदी से अधिक वोटों की बढ़ोत्तरी देखने लायक है। हो सकता है कि आने वाले हफ्तों में देश के बाकी राज्यों में भी वोट इसी तरह ज्यादा पड़ें, और यह साबित हो कि जनता अब राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय या चौकन्नी है, लेकिन छत्तीसगढ़ में अधिक लोगों की हिस्सेदारी में इन चुनावों को लेकर जागरूकता का एक नया सिलसिला तो शुरू किया ही है। 
नतीजों को लेकर अटकलें अभी चल ही रही हैं, और अधिक वोटों ने धुंध को अधिक गहरा भी कर दिया है। लेकिन अब जब फैसला हो ही चुका है, तो इस फैसले तक लोगों को पहुंचाने वाली बातों के बारे में आज कुछ बातें यहां पर की जा सकती हैं। छत्तीसगढ़ के इस पूरे चुनाव में दोनों बड़ी पार्टियों की टिकटों के पैमानों को देखते हुए, और चुनाव के तौर-तरीकों, तरकीबों और तिकड़मों को देखते हुए यह लगता है कि क्या सचमुच यह चुनाव जनता की ईमानदार पसंद सामने लाएगा, या फिर ताकतवर लोग इन नतीजों को जाति के बाहुबल से, धनबल से, और कानून की आंखों में मिर्च झोंकते हुए, अपनी पसंद के किनारे तक इन नतीजों को ले जाएंगे? 
चुनाव के उम्मीदवार बनाते हुए दोनों ही पार्टियों, भाजपा और कांग्रेस ने, ऐसे तमाम गलत लोगों को टिकटें दीं, जिनके बारे में भाजपा समय-समय पर शुचिता का दावा करते हुए परहेज की नीति बताती है, और कांग्रेस के राहुल गांधी जैसे लोगों से अपने कड़े परहेज की मुनादी करते रहते हैं। बुरों को टिकट मिली, भ्रष्ट और दुष्ट को टिकट मिली, कुनबों को टिकट मिली। और साथ-साथ कम से कम भाजपा के ऐसे लोगों को टिकटें मिलीं, जिनकी टिकटें वह काटना चाहती थी, लेकिन मजबूरी में उसने उन्हीं बाहुबली विधायकों-मंत्रियों को फिर टिकट दी, क्योंकि वे लोग नए उम्मीदवार को निपटा देने की ताकत रखते थे। पांच बरसों में भी ये दोनों ही पार्टियां अधिकतर विधानसभा सीटों पर कोई विकल्प तैयार नहीं कर पाई थीं, और किसी साफ-सुथरे, तर्कसंगत और न्यायसंगत पैमाने के बिना लोगों को उम्मीदवार बनाया गया। दोनों पार्टियों की यह कमजोरी इसलिए खप गई, क्योंकि दोनों एक जितनी लापरवाह हैं, और दोनों में से किसी के काम में भी पेशेवर अंदाज की उत्कृष्टता नहीं है। यह बात पूरे पांच बरस के राजनीतिक कार्यकाल पर भी लागू होती है, और चुनावों के वक्त के तौर-तरीकों पर भी उतनी ही लागू होती है। 
आज इस चर्चा का मकसद यह है कि कांग्रेस और भाजपा अपनी थकान उतारते हुए अगर आने वाले बरसों के लिए अपने हाल या बदहाल पर आत्मचिंतन और आत्ममंथन करना चाहें, तो हम उन्हें इसके लिए इसलिए उकसाना चाहते हैं, कि पार्टियों के हित से परे, यह बात लोकतंत्र के हित में भी है कि राजनीतिक दल अपने काम के तरीके बेहतर करें। यह बात शायद इसलिए भी काम आए कि छत्तीसगढ़ में अगले एक साल के भीतर इन दोनों ही पार्टियों को दो बड़े चुनावों का सामना करना है, लोकसभा के चुनाव, और पंचायत-म्युनिसिपल चुनाव। अभी से अगर इनमें से कोई भी बहुत गंभीरता से अपने काम को संगठित और योजनाबद्ध करने की कोशिश करें, तो वैसी पार्टी अपनी विरोधी पार्टी के लिए खासी परेशानी का सबब बन सकती है। जब आंकड़े ये कहते हैं कि अगर एक फीसदी वोट इधर-उधर हो जाएं, तो बारह सीटों का फर्क इस राज्य में पड़ सकता है, तब अगर पार्टियां अपने काम को गंभीरता, ईमानदारी, और पेशेवर अंदाज में करें, तो इससे एक फीसदी से अधिक का फायदा वैसी पार्टी को हो सकता है। जब एक राज्य में एक पार्टी अपने तरीके सुधारती है, तो दूसरी पार्टी भी वैसा करने को मजबूर होती है। इसकी एक बड़ी मिसाल पश्चिम बंगाल है, जहां पर लंबे वामपंथी शासन के बाद भी वहां की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई बड़े मामले सामने नहीं आए। दूसरी तरफ वामपंथियों के खिलाफ लगातार लड़ती हुई अकेली लड़ाकू नेता ममता बैनर्जी की सरकार के खिलाफ भी भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया। एक राज्य में इतनी ईमानदारी की सरकारी-राजनीतिक संस्कृति अगर विकसित हुई है, तो इसके पीछे इन दोनों ही आपसी दुश्मन पार्टियों की अलग-अलग मेहनत है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में अगर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अपने को बेहतर बनाने का काम करते हैं, तो उससे पूरे राज्य का फायदा होगा। 
अभी घर बैठे थके हुए नेताओं को अपने-अपने घर सुधारने के बारे में सोचना चाहिए, इसी उम्मीद और नसीहत के साथ हम यह बात आज यहां छेड़ रहे हैं। 

मीडिया नाम का हरकारा हकीकत नहीं दिखा सकता जनता को खुद देखना होगा

19 नवंबर 2013 
संपादकीय
पिछले महीने भर से छत्तीसगढ़ का चुनाव, और आने वाले कुछ और हफ्ते देश के कुछ दूसरे राज्यों का चुनाव निपट जाने के बाद अगले आम चुनाव के पहले देश की जनता को यह सोचना होगा कि नेताओं के भाषणों से परे वह किस तरह पूछने के अपने हक का इस्तेमाल कर सके। हालांकि आज जो चुनाव हो रहे हैं ये पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं, और 2014 में जो चुनाव होंगे, वे लोकसभा के आम चुनाव होंगे, उनमें मुद्दे राष्ट्रीय अधिक होंगे, और स्थानीय कम। लेकिन स्थानीय चुनावों में भी राष्ट्रीय मुद्दों की छाया पड़ती है, और राष्ट्रीय चुनावों में भी स्थानीय मुद्दे कुछ या अधिक दूरी तक मतदाता का मन बनाने का काम करेंगे। इसलिए आज यह लग रहा है कि कि चुनावी हल्ले के इन हफ्तों के गुजर जाने के बाद एक ठोस बातचीत जनता के बीच के जागरूक लोगों में होनी चाहिए कि कैसे जनता उन बातों को वोट के पहले पूछ सके, और जान सके, जिनको कि जानने का उसका हक है, और जिनको कि जाने बिना उसका वोट डालना फिजूल भी हो सकता है। 
छत्तीसगढ़ के चुनाव में एक पूरे महीने के अभियान के बावजूद आज हमको ही हर विधानसभा क्षेत्र में, हर पार्टी और प्रत्याशी से पूछने के दर्जनों ऐसे सवाल सूझ रहे हैं जिनके बिना एक असली तस्वीर सामने नहीं आ सकती थी, और न ही आई। कुछ तो चुनाव आयोग की सख्ती के चलते चुनाव अभियान में कटौती रही, कुछ यह हुआ कि पेड न्यूज पर चुनाव आयोग की निगरानी के चलते अखबारों में नाजुक मुद्दे छुए ही नहीं गए। इस बारे में एक दिलचस्प बात यह रही कि अखबारों में समर्थन में खबरों को छपने न देने को पेड न्यूज रोक देना मान लिया गया। लेकिन असली पेड न्यूज तो वे थीं, जिनके न छपने के लिए पेमेंट किया गया, और जिसे किसी भी तरह चुनाव आयोग या प्रेस कौंसिल स्थापित नहीं कर सकते, पकड़ नहीं सकते। खैर, इसके चलते यह हुआ कि समर्थन में छपना बंद हो गया, और विरोध में छापना बंद हो गया। नतीजा यह हुआ कि बहुत से मुद्दे जनता के सामने नहीं आ पाए।
मीडिया का होने के बावजूद आज हम इस हकीकत को यहां मानना बहुत जरूरी मानते हैं कि बहुत दिक्कत खड़ी करने वाले, पैने और असुविधाजनक सवाल करना मीडिया ने तकरीबन छोड़ ही दिया है। एक वक्त था जब अखबारनवीस अपने घेरे में आए किसी नेता से वे हर सवाल कर लेते थे, जिनको जानने की जनता के मन में जिज्ञासा होती थी। आज मीडिया के तेवर कारोबार के चलते तीखे नहीं रह गए, और लोकतंत्र में मीडिया का जो जिम्मा था, उस जिम्मे के नीचे अब कोई कंधे नहीं रह गए। लंबी-लंबी ऐसी प्रेस कांफ्रेंस निपट जाती हैं जिनमें दिक्कतों वाले सवाल पूछे ही नहीं जाते। तो फिर इन सवालों को पूछेंगे कौन? अभी हमारी समझ यह कहती है कि स्थापित मीडिया से परे एक नया ऐसा जागरूक हिस्सा जनता के बीच उठकर खड़ा होना चाहिए जो कि सवाल करने का हौसला रखे। दिल्ली में जिस तरह कुछ महीनों के लिए अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, और प्रशांत भूषण जैसे लोग सवाल करते थे, वैसे सवालों की जरूरत देश भर में है, और यह भी हो सकता है कि दिल्ली की तरह वे सवाल कुछ महीने कोई पूछे, कुछ महीने कोई और पूछे। लेकिन खेतों में बाड़ की तरह जब तक सवाल सरहद पर खड़े नहीं हो जाएंगे, फसल को लूट ले जाने वाले भीतर घुसते रहेंगे, और वोट लूटकर संसद और विधानसभाओं में पहुंच जाएंगे। 
इक्कीसवीं सदी के भारतीय लोकतंत्र में अब चुनाव ईमानदार सवालों से दूर होते जा रहे हैं, बड़े मंचों से कही जाने वाली बड़ी बातों को नोट करके मीडिया उन्हें पेश करता है, और फिर अगले दिन या कुछ घंटों के भीतर उनका जवाब दूसरों से लेकर उसको पेश करता है। एक हरकारे की तरह काम करता हुआ मीडिया मतदाताओं के सामने हकीकत को पेश नहीं कर सकता। और आज भारतीय लोकतंत्र की एक दिक्कत यह भी है कि कई दर्जन हरकारे अपनी अधिक अक्ल का इस्तेमाल किए बिना, एक की कही बात को लोगों तक पहुंचा रहे हैं, फिर उसके जवाब में दूसरे की कही बात को फिर जनता तक पहुंचा रहे हैं। 
ऐसे जनसंगठन अगले कुछ महीनों में खड़े होने की जरूरत है जो कि चुभने वाले  सवाल पूछने का हौसला रखें, और एक ऐसा माहौल खड़ा करें कि उनकी खुर्दबीनी से गुजरे बिना कोई वोट पाने तक न पहुंच सके। यह काम चुनाव के वक्त, और बाकी वक्त, सरकार से और बाजार से, नेताओं से और पार्टियों से इश्तहारी-नोट पाने वाला मीडिया नहीं कर सकता। इसके लिए जनता को सामने आना पड़ेगा, और जब जनता अपने सवाल और उसके मिलने वाले, या न मिले हुए जवाब मीडिया के सामने रख देगी, तो फिर उनको दिखाना और छापना शायद मीडिया की मजबूरी हो जाएगी। इसलिए यह भी जरूरी नहीं है कि ऐसे जनसंगठन स्थायी हों, ऐसे जनसंगठन जब तक चले तब तक चलें, लेकिन जब तक चलें, ईमानदारी और दम-खम से चलें। छत्तीसगढ़ का यह चुनाव तो ऐसे जरूरी सवालों के बिना निपट गया है, लेकिन ऐसे सवालों के बिना जनता की पसंद उतनी सही नहीं हो पाई है, जितनी कि होनी चाहिए थी। देश के आम चुनावों के पहले राजनीतिक दलों से परे के लोगों को ऐसी पहल करनी चाहिए। 

...मुर्दों को कब्र से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती, इसलिए वोट डालें

18 नवंबर 2013
संपादकीय
यह अखबार छत्तीसगढ़ के लोगों के हाथों में पहुंचने के कुछ घंटों बाद वोट डालना शुरू हो जाएगा। इन वोटों से अगले पांच बरस के लिए लोग अपने इलाके के विधायक छांटेंगे और पाएंगे। और फिर उन विधायकों से राज्य की सरकार चुनी जाएगी जो कि मतदाताओं, और वोट न डालने वाले छत्तिसगढिय़ों पर भी राज करेगी। हमारी इस बात पर थोड़ा सा मतभेद हो सकता है कि वह राज करेगी, या सेवा करेगी। किसी पार्टी को सत्ता मिलती है, या सेवा करने का मौका मिलता है, यह उस पार्टी की अपनी सोच, और उसके नेताओं की सोच पर टिका रहता है। छत्तीसगढ़ में जनता को वोट डालते हुए जिन बहुत सी बातों पर सोचना-विचारना है उनमें से एक बात यह भी है कि वह विधायक चुनने जा रही है, या कि राज्य की सरकार चुनने, या फिर राज्य की सरकार का मुखिया? 
मामला बहुत उलझन वाला है, और जनता के वोट देने के हक से इस मौके पर हमको कोई जलन नहीं होती। जिसके दिल-दिमाग पर इतने जटिल फैसले का बोझ हो, उससे भला ईष्र्या कैसे हो सकती है? यह वोट डालने का हक नहीं है, यह वोट डालने की जिम्मेदारी है। और फिर वोट की मशीन को देखें, तो उसमें उम्मीदवार का तो नाम होगा, लेकिन निशान तो पार्टी का होगा। एक अच्छी पार्टी के बुरे उम्मीदवार को, या बुरी पार्टी के अच्छे उम्मीदवार को, जनता कैसे चुनेगी, इस पर लंबे-चौड़े शोध हो सकते हैं, और उसके नतीजे दिलचस्प हो सकते हैं। वोटों की गिनती से तो सिर्फ यही पता लगेगा कि लोगों ने किस नाम और निशान की जोड़ी को वोट दिया है, यह तो कभी पता नहीं लगेगा कि उम्मीदवार को कितने वोट मिले, और कितने वोट पार्टी के निशान को मिले। इसलिए यह पढऩे के बाद जब जनता को वोट देना है, तो उसे अपने सामने आने वाले कई नामों, और कई निशानों के, उसे पेश होने वाले जोड़ों के बारे में सोचना होगा। इसके साथ-साथ उसे यह भी सोचना होगा कि उसका वोट आज के इस चुनाव में इस प्रदेश को कैसा और कौन सा मुखिया देगा, और कुछ महीनों बाद फिर चुनाव में देश को कैसा और कौन सा प्रधानमंत्री देगा। 
मतदाताओं के भीतर सतह के नीचे जो एक लहर चलती है, उसका अंदाज कम से कम हम तो नहीं लगा पाते। इसलिए किस सीट पर किसकी फतह होगी, इस अटकलबाजी में हम नहीं पड़ते। लेकिन लोगों को अपने मन की, अपनी समझ की, सुनते हुए, अपने अनुभवों को याद करते हुए, चेहरों के बारे में सोचते हुए, वोट जरूर डालना चाहिए। और जिन लोगों की ताकत मतदान केन्द्र तक एक फेरा लगाने से अधिक हो, उनको अपने आसपास के कमजोर तन वालों को, और खासकर कमजोर मन वालों को, जरूर साथ ले जाकर उनके वोट भी डलवाने की कोशिश करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में ही जिन बीस फीसदी सीटों पर एक हफ्ते पहले वोट डले हैं, वहां कुछ फीसदी वोट ज्यादा पड़े तो नेता और पार्टियां सन्न रह गए। किसी को समझ नहीं आया कि इतने अधिक वोटर सोते से जाग क्यों गए। इनको उम्मीद थी कि अजगर सोते रहेंगे, लेकिन जब उनमें से कुछ फीसदी और ने उठकर फन दिखाया, तो नेता और पार्टियां गश खा गए। भ्रष्ट और दुष्ट नेताओं और पार्टियों को, लोकतंत्र की ऐसी बदहाली को अक्ल सिखाने के लिए वोटरों को जागना होगा, वोटिंग मशीन की बटन दबाने वाली अपनी उंगलियों को फन की तरह इन लोगों को दिखाना होगा, तभी जाकर लोकतंत्र का हाल सुधरेगा। 
कल के वोट के बारे में इस बात को पढ़ते ही सोचना शुरू करना चाहिए, आसपास के लोगों से इस पर बात करनी चाहिए, उनकी राय सुननी चाहिए, अपनी राय उनके साथ बांटनी चाहिए, और यह तय करना चाहिए कि अधिक से अधिक लोग जाकर वोट डालें। जो पार्टी ठीक लगे, उसमें वोट डालें, या जो उम्मीदवार ठीक  लगे, उसे वोट दें, या फिर जिसे अगला मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं, उसकी पार्टी के निशान पर वोट दें। अगर आपके इलाके के सारे नामों, और सारे निशानों से आप की नापसंदगी हो, तो भी एक नया बटन इस बार की वोटिंग मशीन पर रहेगा, और जाकर इनमें से कोई नहीं के लिए बनाए गए नोटा नाम के बटन पर उंगली दबाएं। जाएं जरूर, अपने साथ के लोगों को, आसपास के लोगों को ले जाएं जरूर, और किसी को इस बात पर खुश न होने दें कि चूंकि आप मुर्दा हैं, इसलिए वे आसानी से जीत सकते हैं। जो अभी से कुछ घंटों बाद वोट नहीं डालेंगे, उनको अगले पांच बरस झींकने का कोई हक भी नहीं रहेगा। इसलिए जो वोट डालने की जिम्मेदारी पूरी करते हैं, उन्हीं को अगले पांच बरस कुछ बोलने का हक भी रहता है। मुर्दों को कब्र से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती। 

Bat ke bat, बात की बात

17 nov 2013

मौका चुनाव का है, इसलिए पार्टियों के तौर-तरीकों पर...

17 नवंबर 2013
संपादकीय
आज जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ कुछ दूसरी छोटी पार्टियों और बागी या निर्दलीय उम्मीदवार का सार्वजनिक प्रचार बंद हो गया है, और दर-दर भटकना शुरू हो गया है, तो हम भी कुछ ठंडे दिल से चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों के बारे में सोच रहे हैं। यहां की बातचीत से किसी का इस चुनाव में भला नहीं होने वाला है, लेकिन मतदाताओं को यह सोचने का मौका इससे मिल सकता है कि किस पार्टी या किस उम्मीदवार ने उनके सामने अपनी बात रखने के लिए क्या किया, और क्या नहीं किया? इसलिए हमारी आज की यहां की चर्चा से मतदाता को अपना मन बनाने में एक किस्म की मदद मिल सकती है।
पिछले पांच-दस चुनावों का हमारा अनुभव यह कहता है कि भारत के इस हिस्से में चुनाव प्रचार में राजनीतिक दल और ताकतवर उम्मीदवार भी, किसी तैयारी से नहीं रहते हैं। अपनी बहुत सामान्य समझबूझ से सोचकर ही हमको यह लगता है कि आखिरी के हफ्तों में आसपास तैरते हुए जो मुद्दे इनको दिखते हैं, उन्हीं को लेकर ये अपने विरोधी या विपक्षी पर चढ़ बैठते हैं। जिस तरह रोजाना संपादकीय का मुद्दा छांटते हुए हम पर कई बार पिछले कुछ मिनटों में टीवी पर आई हुई खबर का ताजा-ताजा असर कायम रहता है उसी तरह चुनाव के करीब ऐसे ही मुद्दे इस्तेमाल होते हैं, जो कि उस वक्त चर्चा में है, या किसी ने लाकर थमा दिए हैं। 
जिस ब्रिटिश संसदीय प्रणाली के नक्शे कदम पर भारत में लोकतंत्र का ढांचा डिजाइन किया गया, उसमें विपक्ष एक छाया मंत्रिमंडल की तरह पूरे वक्त काम करता है। शैडो केबिनेट के लोग सत्ता के अलग-अलग लोगों, विभागों पर नजर रखते हैं, और यह बारहमासी काम होता है, सिर्फ चुनाव के वक्त, सिर्फ चुनाव के नजरिए से यह नहीं होता। हम तो अपने पाठकों के साथ अपने दिल-दिमाग की बातें, और अपनी सोच को बांटने का काम पूरी ईमानदारी से इसी जगह रोज करते हैं। लेकिन हमको हर दिन इस प्रदेश से जुड़े रहने की वजह से जो मुद्दे सूझते हैं, दिमाग में बने रहते हैं, वे मुद्दे न तो कांग्रेस को, और न ही भाजपा को एक-दूसरे के खिलाफ सूझते। दोनों के सामने मानो औजारों से लेकर लोकतांत्रिक-हथियारों तक ढेर लगा है, अखबारों में अनगिनत ऐसी खबरें हैं जिनको सुबूत की तरह ये दो बड़ी पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन जो हम देख रहे हैं, उसमें हमारी समझ से ऐसा इस्तेमाल पांच फीसदी भी नहीं होता। जो भारतीय जनता पार्टी मोदी की अगुवाई में इंटरनेट पर एक आधुनिक-आक्रामकता के लिए जानी जा रही है, उस पार्टी को भी  अपने कामकाज और अपने हमलों में असर लाने का एक बहुत बड़ा मौका चूकते हुए हम देखते हैं। कांग्रेस का हाल उसके मुकाबले कुछ और अधिक खराब है। 
किसी राजनीतिक दल को काम करना सिखाना हमारा मकसद नहीं है, न ही हमारा ऐसा कोई इरादा है। लेकिन भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो भी ऐसे ताकतवर और असरदार तबके हैं, जो भी अहमियत रखने वाले दफ्तर हैं, और ऐसी कुर्सियां हैं, उन सबके बेहतर काम करने की बात हम इसलिए सोचते हैं क्योंकि उनके बेहतर काम से ही लोकतंत्र बेहतर हो सकता है। जिस तरह किसी एक शहर में दो ही बड़े अखबार हों, और उनमें से कोई एक मेहनत न करे, तो दूसरे को भी मेहनत की कोई जरूरत नहीं रहती। इसी तरह अगर एक राजनीतिक  दल अपने कामकाज को पेशेवर अंदाज में बेहतर करने की कोशिश करेगा, तो उसे दूसरी पार्टियों को भी मेहनत करना सूझेगा। हमको हैरानी यह होती है कि जब इन बड़ी-बड़ी पार्टियों के अलावा भी बाकी बहुत सी पार्टियों को बड़े-बड़े पेशेवर दिग्गज, अनुभवी और कामयाब सफल कामकाजी लोग नसीब हैं, तो उनका अंदाज पेशेवर क्यों नहीं होता, और लोकतंत्र में वे अपने किरदार को अधिक असरदार क्यों नहीं बना पाते? कई बार हमको यह लगता है कि ऐसी पार्टियां हम जैसे कमसमझ लोगों से भी कुछ राय ले लें, तो भी हम उनको उनके काम में बेहतरी सुझा सकते हैं, लेकिन फिर हमारा अनुभव यह रहा है कि पार्टियां यह मानकर चलती हैं कि उनको कुछ और सीखने की जरूरत उसी तरह नहीं है, जिस तरह मछली के बच्चे को तैरना सीखने की जरूरत नहीं होती।

निजी जिंदगी में सरकारी जासूसी लोकतंत्र के खतरे का सामान

16 नवंबर 2013
संपादकीय
आज जब दिल्ली से उठी हुई दो खबरें एक-दूसरे के सामने तलवारें लेकर खड़ी हैं, तो उन दोनों का जिक्र करते हुए हम देश में निजी स्वतंत्रता के कुछ बुनियादी सवाल उठाना चाहेंगे। पिछले दो दिनों में दिल्ली में अरूण जेटली के टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड्स निकालने के जुर्म में कुछ और गिरफ्तारियां हुईं, और उन पर जेटली का बयान भी सामने आया। जेटली ने कहा था कि यह निजी स्वतंत्रता को कुचलना है, और गिरफ्तार लोगों के पीछे कौन सी ताकतें हैं, वे उजागर होनी चाहिए। दूसरी खबर भी है गुजरात की, लेकिन उसे दिल्ली में पेश किया गया, कि किस तरह वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृहमंत्री रहते हुए अमित शाह ने एक युवती की रात-दिन, पल-पल की जासूसी कराई, और उसमें पुलिस के सारे विशेषाधिकार, पुलिस अधिकारियों को झोंक दिया, और यह सब अमित शाह ने अपने किसी 'साहेबÓ के लिए करना बार-बार बताया। इसकी लंबी-चौड़ी, बहुत बार की टेलीफोन की बातचीत की रिकॉर्डिंग अभी सामने आई है, और इसके मुताबिक राज्य सरकार ने जासूसी करने के लिए मिले हुए अधिकारों का बेजा इस्तेमाल एक लड़की की निजी जिंदगी में तांकझांक के लिए किया। 
पाठकों को याद होगा कि कई महीने पहले हमने अमरीका की एक फिल्म के बारे में लिखा था, एनेमी ऑफ द स्टेट, नाम की इस फिल्म में वहां की सरकार अपने कुकर्मो को दबाने के लिए, उसके जुर्म के गवाहों और सुबूतों को खत्म करने के लिए आज की मौजूदा सारी टेक्नालॉजी, साधन और सुविधाओं को लोगों की निजी जिंदगी में जासूसी के लिए झोंक देती है, और अपने हाथ की ताकत को एक तानाशाह और मुजरिम के अंदाज में इस्तेमाल करती है। दिल्ली में जेटली के टेलीफोन के कॉल रिकॉडर््स किसने निकलवाए हैं, यह अभी तक साबित नहीं हुआ है, लेकिन गुजरात के इस मामले में जो सुबूत सामने आए हैं, उनके अदालत में खड़े होने के पहले ही ऐसे बयान सामने आ रहे हैं जिनसे कि जासूसी का यह मामला सही साबित होता है। इसकी शिकार युवती के पिता की ओर से एक बयान सामने आया है जिसमें उसने कहा है कि उसने मोदी से अपनी लड़की की हिफाजत के लिए उसकी निगरानी को कहा था। और मोदी समर्थक कुछ पत्रकार इंटरनेट पर यह जानकारी डाल रहे हैं कि इस युवती का कुछ गलत किस्म के अफसरों के साथ उठना-बैठना था, इसलिए उसके पिता उस पर नजर रखना चाहते थे। 
केन्द्र हो या राज्य, सरकार को निजी जिंदगी में तांकझांक का हक इसलिए नहीं मिलता, कि किसी के संबंधों पर नजर रखी जाए। पूरी तरह से राज्य के हित में जब बहुत जरूरी हो, तब ही न्यायसंगत और तर्कसंगत आधार पर तांकझांक की जा सकती है। लेकिन अगर सरकार लोगों के रिश्तों को रोकने के लिए लोगों की निजी जिंदगी में झांकने लगे, तो ऐसे कानून का ऐसा इस्तेमाल एक बड़े जुर्म से कम कुछ भी नहीं है। किसी बाप को भी यह हक नहीं होता कि वह अपने वयस्क बच्चों की जिंदगी में ऐसी तांकझांक करवाए, और न ही किसी मुख्यमंत्री का यह हक होता कि वह अपने मातहत सरकारी मशीनरी का ऐसा इस्तेमाल कर सके। इसलिए यह मामला भयानक किस्म का है, और इससे आम जनता के लोकतांत्रिक अधिकार, बुनियाद अधिकार पूरी तरह से कुचल दिए गए हैं। 
अरूण जेटली के मामले में अब तक सरकार का हाथ सामने नहीं आया है, लेकिन गुजरात के मामले में बहुत सी रिकॉर्डिंग भाजपा के उस वक्त के गृहमंत्री, और उसके किसी और बड़े का हाथ इसमें जाहिर करती है। न सिर्फ इन दोनों मामलों का, बल्कि ऐसे और तमाम मामलों में अदालत को दखल देनी चाहिए, क्योंकि अगर लोगों की बातचीत और उनकी जिंदगी पर सरकार या कोई कारोबार इस तरह नजर रख रहे हैं, तो यह देश में लोकतंत्र खतरे में डालने का मामला है। ऐसी नौबत में लोगों की आपसी बातचीत भी नहीं हो पाएगी, और सरकारें, ताकतवर तबके ऐसी निगरानी के बाद अपनी साजिशों को आसानी से पूरा कर सकेंगे। यह मामला अदालत की तुरंत दखल का है, और इन तर्कों का कोई मतलब नहीं है कि ऐसी सीडी कई बरस बाद आज चुनाव के वक्त क्यों सामने आ रही है। हिन्दुस्तान के इतिहास में भ्रष्टाचार और जुर्म के बहुत से सुबूत बरसों बाद उजागर होते रहे हैं, और इस देश में हर समय कोई न कोई चुनाव होते रहते हैं, या कोई न कोई राजनीतिक हलचल होती रहती है। इसलिए किसी भांडाफोड़ के मौके के बजाय, उसके कानूनी वजन को आंकना बेहतर होगा। और यहीं पर हम अदालती दखल की सिफारिश करते हैं। 
दूसरी बात यह भी कि आज जो लोग सत्ता हाथ में होने पर, ताकत हाथ में होने पर इस तरह की तांकझांक, जासूसी, गुजरात और दिल्ली से परे भी बाकी देश में जगह-जगह कर रहे हैं, उनको भी सबक मिले, इसके लिए सामने आए इन दोनों मामलों पर तुरंत और कड़ी कार्रवाई जरूरी है। और कम से कम आज अरूण जेटली इस बात से पूरी तरह सहमत होंगे। 

बात की बात, Bat ke bat

15 nov 2013

छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र को टोनही की तरह मारना...

15 नवंबर 2013
संपादकीय
ओडिशा के बाद अब बिहार में नमक सौ-दो सौ रूपए किलो तक पहुंच गया। लोगों के बीच अफवाह फैली कि नमक का अकाल पडऩे जा रहा है, और लोगों की कतारें लग गईं। अधिक वक्त नहीं गुजरा है जब इस देश ने गणेश की प्रतिमाओं को दूध पिलाने की होड़ कुछ घंटों के भीतर कश्मीर से कन्या कुमारी तक शुरू कर दी थी। एक अफवाह फैली थी, और लोग कामधाम छोड़कर कहीं किसी मंदिर में तो कहीं किसी के घर पर गणेश प्रतिमा से करिश्मे की उम्मीद लगाए पहुंच गए थे। अगर उतना दूध कुपोषण के शिकार बच्चों को पिलाने लोग अपने ही आसपास थोड़ी सी कोशिश करते, थोड़ी सी दरियादिली दिखाते तो देश से कुपोषण खत्म हो जाता, और मालदार तबके के दिल की धमनियां चर्बी से तंग होकर मालदारों की जान लेना कम कर देतीं। लेकिन यह देश तर्क और समझ, तथ्य और जिम्मेदारी पर काम करने के बजाय धर्मान्धता और कट्टरता पर काम करता है, अंधविश्वास और टोटकों पर काम करता है। जो लोग 21वीं सदी में भी झारखंड जैसे छोटे राज्य में आठ महीनों में चालीस महिलाओं को टोनही बताकर मार देते हैं, वे लोग किसी भी अवैज्ञानिक बात पर, अफवाह पर तेजी से भरोसा कर सकते हैं और आज देश की राजनीतिक ताकतें जनता को ऐसे ही अंधेरे में रखने को अपने लिए रौशनी मानती हैं। 
आज लोगों को यह भी लग सकता है कि छत्तीसगढ़ में इस विधानसभा चुनाव के आखिरी मतदान के दो-तीन दिन पहले हम ऐसे मुद्दे पर क्यों लिख रहे हैं। लेकिन इस चुनाव में पार्टियां और नेता जिस अंदाज में काम कर रहे हैं, वह अंधविश्वास के शिकार मतदाताओं को दुहने जैसा ही है। आज भी छत्तीसगढ़ के मतदाताओं को जाति के आधार पर, खोखले नारों के आधार पर सहमत कराने का काम हमारे हिसाब से अंधविश्वास जैसा ही है। लोग हैं कि राज्य बने तेरह बरस हो गए, अब तक उनको अच्छे और बुरे की शिनाख्त नहीं हो पाई, भ्रष्ट और दुष्ट से परहेज नहीं हो पाया, नेताओं के हाथों चुनाव के वक्त रिश्वत लेने से उनको परहेज नहीं हो पाया, एक-एक ताकतवर उम्मीदवार के खड़े किए हुए कई-कई फर्जी, नकली, और झांसे सरीखे उम्मीदवारों से सवाल करना उनको नहीं आया। आज भी छत्तीसगढ़ में आधी सीटों पर लोग जाति के आधार पर जीत और हार को तय करने पर आमादा हैं, लोकतंत्र के भीतर 21वीं सदी में यह हाल एक धार्मिक अंधविश्वास से कम कुछ नहीं है। 
छत्तीसगढ़ में आज दिल दहलाने वाली एक खबर ऐसी है जो लोकतंत्र में खाए हुए नमक के साथ दगाबाजी है। यहां पर राजधानी रायपुर और हाईकोर्ट वाले शहर बिलासपुर से हजारों मुस्लिमों को मतदान के दिन यहां से हटाने के लिए टिकट कटाकर तीर्थयात्रा करवाने अजमेर भेजने की साजिश है। इस काम में मुस्लिम समाज के ही कुछ भाजपाई नेता लगे हुए हैं। इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र में अगर बहुत ताकतवर और दमदार, जीतने की मजबूत संभावना वाले उम्मीदवार भी इस तरह की घोर साम्प्रदायिक हरकत करते हैं, और उनकी पार्टी इसको बर्दाश्त करती है, और इस लोकतंत्र के पास ऐसी हरकत को रोकने का कोई इंतजाम नहीं दिखता है, तो यह ओडिशा और बिहार के लोगों के बीच नमक की अफवाह, या पूरे देश में गणेश के दूध पीने की अफवाह के दर्जे की ही बात है। इस देश का न विज्ञान पर भरोसा है, न लोकतंत्र पर। और इस तंत्र का किसी पर कोई काबू नहीं है, खासकर उन लोगों पर जो कि इसकी आंखों में मिर्च झोंककर संसद और विधानसभा तक पहुंचते हैं। 
छत्तीसगढ़ में आज जो किया जा रहा है, उस मामले को हम यहां लिखकर आगे इस उम्मीद के साथ छोड़ रहे हैं कि राजनीतिक दल, सरकारें, चुनाव आयोग, और अदालतें इस नौबत पर कार्रवाई करने की अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी करेंगे। यह एक आसान बात नहीं है। और झारखंड से लेकर छत्तीसगढ़ तक बेकसूर महिलाओं को टोनही बताकर जिस तरह से मारा जा रहा है, यह उसी तरह से लोकतंत्र को टोनही साबित करके उसे पत्थर मार-मारकर मार डालने जैसी घटना है। जो लोग वोट के बजाय इस तरह की साजिश वाले तीर्थ पर जाने को तैयार हो रहे हैं, उनको भी यह समझना चाहिए कि ऐसा तीर्थ उनकी बिरादरी के फायदे का नहीं है, भारी नुकसान का है। और भारतीय लोकतंत्र में इससे एक बहुत ही खतरनाक सिलसिला बढ़ाया जा रहा है, और इस पर छत्तीसगढ़ के भाजपा नेताओं को खुद भी आत्ममंथन करना चाहिए। कुल मिलाकर हमारे कम लिखे को अगर इस लोकतंत्र की ताकतें अधिक समझें, और कार्रवाई करें, तो ही बेहतर है।  

मोदी के चाय बेचने को गाली की तरह इस्तेमाल करने वालों से...

14 नवंबर 2013
संपादकीय
भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी पर हमला बोलते हुए समाजवादी पार्टी के उत्तरप्रदेश के एक बड़े नेता नरेश अग्रवाल ने कहा है कि एक चाय बेचने वाले की सोच कभी राष्ट्रीय नहीं हो सकती। अग्रवाल ने कहा कि नरेंद्र मोदी पीएम बनना चाहते हैं। लेकिन जो चाय की दुकान से निकला हो उसकी सोच कभी राष्ट्रीय नहीं हो सकती। अग्रवाल ने कहा कि जैसे किसी सिपाही को कप्तान बना देने पर उसकी सोच कप्तान जैसी नहीं हो सकती, वो कांस्टेबल जैसा ही व्यवहार करेगा। इससे पहले भी नरेश अग्रवाल मोदी पर आपत्तिजनक बयान दे चुके हैं। उस बयान को लेकर अग्रवाल की खासी किरकिरी भी हुई थी। तब उन्होंने मोदी और बीजेपी की तुलना गांव की विधवा से की थी। मोदी ने पटना की रैली में कहा था- मैं एक गरीब घर में पैदा हुआ और मैंने गरीबी को करीब से देखा। मैं रेलवे स्टेशन और ट्रेनों में चाय बेचता था। जो लोग ट्रेनों में चाय बेचते हैं वो मंत्रियों से ज्यादा रेलवे के बारे में जानते हैं। उन्होंने कहा था कि गुजरात के वाडनगर रेलवे स्टेशन पर मोदी 6 साल की उम्र में अपने पिता के साथ चाय बेचते थे।
हम कल ही कुछ दूसरे तरह की गाली-गलौज के खिलाफ लिख चुके हैं लेकिन आज की बात थोड़ी सी अलग है, जरूरी है, और चुनाव से परे की भी है। भारतीय समाज की जुबान में किसी भी किस्म के कमजोर तबके के लिए खूब सारी गालियों वाली कहावतें हैं, और मुहावरे हैं। ये सैकड़ों बरसों से चली आ रही लोकोक्तियां हैं, जो बताती हैं कि समाज की जुबान किस तरह ताकतवर की जुबान रहती है, वे जुबान कमजोरों की जुबान नहीं रहतीं। जो समाजवादी नेता मोदी के चाय बेचने से लेकर यहां तक पहुंचने को लेकर आज उनको शर्मिंदा करना चाहते हैं, उनको यह समझाने की जरूरत है कि मोदी ने अगर बचपन से अपने मां-बाप के साथ मेहनत करके रोटी कमाई है, तो वह रोटी समाजवादी पार्टी के मालिक मुलायम सिंह यादव के कुनबे के पास जमा हो गई अनुपातहीन संपत्ति की शर्मिंदगी के उल्टे, एक गौरव की बात है। कोई बच्चा अगर मजदूरी करके बड़ा हुआ है, अपने कुनबे की वजह से आगे नहीं आया है, अपने खुद के बूते आगे बढ़ा है, तो उसे गाली देने का काम उस समाजवादी पार्टी का नेता कर रहा है, जिसके मालिक का बेटा विरासत में देश के सबसे बड़े प्रदेश को एक खिलौने की तरह पाकर बैठा है, और जिसका पूरा का पूरा लंबा-चौड़ा कुनबा समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का लोकतंत्र चला रहा है। जो लोग नरेन्द्र मोदी के आलोचक हैं, जो उनको नीचा दिखाना चाहते हैं, उनके लिए मोदी के इतिहास में बहुत सी दूसरी बातें हैं, जिनका इस्तेमाल आसान है, और बरसों से हो रहा है। जो लोग मोदी के चाय बेचते बचपन को हिकारत की नजर से देख रहे हैं, वे लोकतंत्र और इंसानियत दोनों की नजर से हिकारत के ही हकदार हैं। 
हम सिर्फ मोदी की वजह से यह बात नहीं लिख रहे हैं, भारत की जुबान में मेहनत का काम करने वाले हर इंसान को नीची नजरों से देखा जाता है, और उनको समाज में प्रतिष्ठा का हकदार नहीं माना जाता। इस देश में सफाई कर्मचारी को भंगी या जमादार कहकर गाली दी जाती है, जिन जूतों और चप्पलों के बिना ऊंची समझी जाने वाली जातियों और पैसों वालों के पैर जमीन पर नहीं पड़ सकते, उन्हीं जूते-चप्पल बनाने वालों को चमार कहकर भारत का सवर्ण समाज उनको अछूत बनाते आया है। किसी बीमार को, किसी विकलांग को, किसी अकेली महिला को, किसी विधवा महिला को, जिस तरह की गालियों भरी कहावतों और मुहावरों का सामान बना दिया जाता है, वह बताता है कि भारत की भाषाओं और बोलियों के पीछे की सामाजिक राजनीति कितनी बेइंसाफ और कितनी हिंसक है। यही वजह है कि इस देश में दलितों को हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध होना पड़ा, या मुस्लिम होना पड़ा। यही वजह है कि आदिवासियों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में हिन्दू धर्म अपनाने के बजाय, ईसाई धर्म अपनाया, और जिसे जातिवादी सवर्ण हिन्दू धर्मांतरण कहते हैं। 
आज देश में भाषा को लेकर, उसके पीछे की राजनीति को लेकर, उसकी हिंसा को लेकर एक जागरूकता की जरूरत है। जहां औरत को बोलचाल की भाषा में पूरी तरह अनदेखा करके आम आदमी के भीतर का एक हिस्सा गिन लिया जाता है, वहां पर बहुत मेहनत करने की जरूरत है, तब जाकर शायद आधी-चौथाई सदी में इस देश के प्रधानमंत्री लालकिले से आम आदमी के बजाय आम इंसान कहेंगे, और आम आदमी पार्टी जैसे नाम की पार्टी के नाम पर कानूनी रोक लगेगी। 
समाजवादी पार्टी से परे भी देश की कई दूसरी पार्टियां हैं जो कि सोने-चांदी के चम्मचों के साथ पैदा हुए राजकुमारों और राजकुमारियों से लदी हुई हैं। ऐसे में चाय बेचकर कोई अपने दम पर लालकिले की दीवार तक पहुंचते दिख रहा है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के भीतर इतने गरीब लोगों को मिलने वाले बहुत सीमित मौकों की इज्जत बढऩे की बात है, न कि चाय बेचने वाले को हिकारत देखने की। जो समाजवादी पार्टी लोकतंत्र को बेचकर अपने मालिक का घर अनुपातहीन संपत्ति से भर चुकी है, वो कभी भी चाय बेचकर आगे नहीं बढ़ पाएगी, और वह अपने नेता और मार्गदर्शक राममनोहर लोहिया के नाम का सम्मान कभी नहीं बढ़ा पाएगी। समाजवादी पार्टी के नेताओं की संपन्न सोच बहुत स्वाभाविक है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट तक जिस तरह से मुलायम सिंह के कुनबे की अनुपातहीन संपत्ति कटघरों में खड़ी है, वह तो पूरे कुनबे के हजार बरस तक चाय बेचने के बाद भी नहीं जुट सकती थी। 
लोकतंत्र में मेहनत के काम के लिए ऐसी हिकारत रखने वालों के साथ वोटरों को अपनी हिकारत दिखानी चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तान के अधिकतर वोटर, तकरीबन सारे ही वोटर मेहनत से रोजी कमाने वाले ईमानदार लोग हैं, ऐसे समाजवादी नहीं है।

घटिया सोच की दो किस्में

13 नवंबर 2013
संपादकीय
मुंबई में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष ने कल वही किया जो कि कुछ महीने पहले भाजपा के राज्यसभा सदस्य और टीवी बहस के खास चेहरे चंदन मित्रा ने किया था। चंदन मित्रा ने उस वक्त मोदी का विरोध करने की वजह से अमत्र्य सेन से भारत रत्न वापिस लेने की मांग की थी, और कल मुंबई कांग्रेस के मुखिया ने मोदी का समर्थन करने की वजह से लता मंगेशकर से भारत रत्न वापिस लेने की मांग की है। इन दोनों के बीच मानो अफसर बकवास में पीछे न रह जाएं, और नेताओं से नीचे न गिन लिए जाएं, सीबीआई प्रमुख ने अपने एक बयान में एक मिसाल देते हुए एक बहुत ही भद्दी और गंदी बात कही कि... जिस तरह बलात्कार को जब रोका न जा सके, तो उसका मजा क्यों न लिया जाए...। 
नेताओं की बकवास तो आम हो चली है, लेकिन दूसरी तरफ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से लेकर, देश के दूसरे हिस्सों के आला अफसरों तक, और अब सीबीआई के मुखिया तक ने महिलाओं के बारे में जितनी ओछी बात कही है, उससे इस देश में महिलाओं पर छाए हुए खतरे का सुबूत मिलता है। जब बड़ी-बड़ी वर्दियां, और बड़े-बड़े बिल्ले इस तरह की बात करें, तो फिर खाप पंचायतें महिलाओं को मार डालने का काम क्यों नहीं करेंगी? यह सिलसिला बताता है कि किस तरह हिन्दुस्तान के ताकतवर लोग महिलाओं को बलात्कार और मजे का सामान मानते हैं, और उनके लिए एक हिंसक और अन्यायपूर्ण जुबान इस्तेमाल करते हैं। 
आज 21वीं सदी में आकर अगर बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग यह भी नहीं समझ पा रहे कि अब लोकतंत्र को आए पौन सदी हो चुकी है, और अब महिलाओं का हक बराबरी का, तो ऐसे लोगों को ऊंचे ओहदों पर रहने का हक क्यों होना चाहिए? अभी कुछ ही दिनों पहले हमने एक जज की लिखी हुई बातों पर इसी जगह लिखा- देश की राजधानी दिल्ली में द्वारिका में महिलाओं पर होने वाली यौन अपराधों की सुनवाई के लिए बनी एक विशेष अदालत के जज की सोच सोचने लायक है। वीरेन्दर भट्ट नाम के इस जज ने अपने परिवार के भीतर एक युवती से बलात्कार करने के एक आरोपी को बरी करते हुए अपने फैसले में लिखा था- ''लड़कियां नैतिक और सामाजिक रूप से बंधी होती हैं कि वे अपनी शादी के पहले यौन संबंधों में न उलझें। और अगर वे ऐसा करती हैं तो फिर बाद में उनको यह कहते हुए रोना नहीं चाहिए कि यह बलात्कार था। ....अदालत की कुर्सी पर बैठकर एक पुरूषप्रधान, दकियानूसी, और घटिया सोच को दर्शनशास्त्र की तरह लिखने का काम करने वाले जज को अगर इस कुर्सी पर जारी रखा जाता है, तो यह अदालती प्रशासन देखने के लिए जिम्मेदार सरकार या ऊंची अदालत का ऐसे जुर्म में भागीदार होना हो जाएगा।.... आज देश में पुलिस से लेकर गवाहों तक, और सरकारी वकीलों से लेकर अखबारनवीसों तक, मर्दाना सोच का ही बोलबाला है, और बलात्कार की शिकार लड़की या महिला को आमतौर पर गुनहगार मान लिया जाता है, और इसी दिल्ली शहर में पुलिस कमिश्नर जैसी कुर्सी पर काबिज लोग, लड़कियों को कपड़े-लत्तों से लेकर अकेले न निकलने तक की नसीहतों की एक लंबी फेहरिस्त गिना देते हैं....भारत में महिलाओं के खिलाफ पूर्वाग्रह बहुत बुरी तरह हिंसक है, और बहुत बुरी तरह हावी भी है। इसलिए इस देश में महिलाओं के साथ बेइंसाफी करने वाले किसी बयान का भी खुलकर विरोध होना चाहिए, ताकि समाज में एक जागरूकता आ सके...ÓÓ
आखिरी में हम उस बात पर लौटना चाहते हैं जिसकी शुरूआत भाजपा के चंदन मित्रा ने की थी, और जिसे कल मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष ने दुहराया है। भारत रत्न किसी को देना सरकार का एक फैसला होता है। उसे देने के बाद वापिस मांगने की बात करना एक बहुत घटिया काम है, चाहे उसे भाजपा करे, चाहे कांग्रेस। भारत के गरीबों के लिए दुनिया भर का काम करने वाले अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन अगर मोदी के खिलाफ हैं, तो यह उनका हक है। और दूसरी तरफ अगर लता मंगेशकर मोदी की प्रशंसक हैं, तो यह उनका हक है। उनके इस बुनियादी हक के खिलाफ जाकर उनसे सम्मान वापिस की मांग करे। ये दो बातें बिल्कुल अलग-अलग हैं, लेकिन एक ही तरह की हिंसक सोच की हैं, सीबीआई प्रमुख ने अपनी गलत बात पर अफसोस जाहिर कर दिया है, लेकिन अफसोस के पहले उनकी सोच जाहिर हो चुकी है। 

कुल डेढ़ फीसदी का फासला, और सात फीसदी अधिक वोट

12 नवंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के पांचवें हिस्से में कल मतदान हुआ तो बस्तर की बारह और राजनांदगांव जिले की छह विधानसभा सीटों पर मतदान के आंकड़े आज सुबह तक आते रहे। बस्तर में जहां नक्सल हिंसा और देश भर से आए हुए सुरक्षा कर्मचारियों के बीच, धमकियों के आतंक में भी इतना भारी मतदान हुआ कि चुनावी राजनीति को करीब से देखने वाले भी हक्का-बक्का रह गए। दूसरी तरफ राजनांदगांव जिले में नक्सल हिंसा के बगल की सीटों पर भी भारी वोट डले। बस्तर में दूर-दूर से अभी मतदान दलों का जिला मुख्यालय पर लौटना चल रहा है, इसलिए वहां के आखिरी आंकड़े आना बचे हैं, लेकिन राजनांदगांव जिले में पिछले चुनाव से करीब सात फीसदी ज्यादा मतदान हुआ है। अब अगर इन आंकड़ों को देखें, और पिछले चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटों का फासला देखें, तो यह साफ है कि सात फीसदी ज्यादा मतदान, पिछले चुनाव के करीब डेढ़ फीसदी के फर्क को किसी भी तरफ उठाकर पटक सकता है। इसलिए हम लगातार अधिक से अधिक, सभी मतदाताओं से मतदान की जो अपील कर रहे हैं, वह लोकतंत्र में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाकर, अधिक लोकप्रिय उम्मीदवार या पार्टी को चुनने की बात है। 
चुनावों में अधिक मतदान किसकी तरफ है, या किसके खिलाफ है, इसको लेकर हर चुनाव में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तर्क रहते हैं, लेकिन कल के बस्तर के मतदान को लेकर लोगों को एक नसीहत लेनी चाहिए। दो दिन पहले भी हमने इसी बारे में लिखा था, और आज फिर हम इस बारे में इसलिए लिख रहे हैं कि छत्तीसगढ़ की 72 सीटों पर हफ्ते भर बाद जो वोट डलने हैं, उसे लेकर बाकी मैदानी छत्तीसगढ़ को बस्तर और राजनांदगांव के वोटरों की चुनौती मंजूर करनी चाहिए। और अगर सभी जगहों पर वोट बढ़ेंगे, तो खोट घटेगी, नोट की लूट कम होगी, क्योंकि बेहतर लोग चुनकर आएंगे, और कम मतदान में अपने लायक वोट खरीदकर जीत जाने वाले हड़बड़ाएंगे। 
राजनांदगांव जिले में वहां की एक नौजवान आईएएस अधिकारी प्रियंका शुक्ला ने पिछले महीनों में लगातार अधिक मतदान के लिए चुनाव आयोग की दी गई जिम्मेदारी के तहत एक मौलिक अभियान चलाया था। प्रतिज्ञा नाम के इस अभियान में गांव-गांव में लोगों की बैठकें ली गई थीं, और लोगों ने खुद होकर शपथ ली थी कि वे वोट जरूर डालेंगे। इसके तहत कहीं कार्टून का अभियान, तो कहीं छात्र-छात्राओं की कोशिशें भी चलती रहीं। इसलिए यह भी हो सकता है कि इस जिले का अधिक मतदान इन कोशिशों का नतीजा हो, और बाकी प्रदेश से इसकी तुलना होने पर ही इसका सही अंदाज लगेगा। लेकिन किसी एक जिले को ऐसे मुकाबले में आगे बढऩे देने के बजाय, पूरे प्रदेश में यह कोशिश होनी चाहिए कि कैसे अधिक मतदान हो। जहां प्रत्याशियों का जीत-हार का फासला कुछ सौ वोटों का रहता हो, वहां पर अगर पांच-दस हजार वोट अधिक डल जाएंगे, तो दबंग उम्मीदवारों के होश ही उड़ जाएंगे। 
चुनाव आयोग की सख्ती के चलते अब उम्मीदवारों और पार्टियों की गाडिय़ां वोटरों को ढोने का काम नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में जब लोग खुद होकर वोट डालने जाते हैं, तो आने-जाने के एहसान से परे रहकर वे एक अधिक ईमानदार फैसला ले पाते हैं। छत्तीसगढ़ के चुनाव में चुनाव आयोग ने इस बार अंधाधुंध खर्च को सड़कों पर नहीं उतरने दिया है। जो उम्मीदवार कई-कई करोड़ खर्च करने के लिए जाने जाते थे, उनका भी हाल इस बार कम से कम सड़कों पर काबू में है। इस तरह से ये दो बातें मिलकर अगर असर करती हैं, तो ये चुनाव पिछले चुनावों के मुकाबले थोड़े से अधिक लोकतांत्रिक हो सकते हैं। खर्च काबू में हो, और मतदाता उत्साही हो, तो ये मिलकर बाहुबली, दबंग, और पैसों की राजनीति करने वाले लोगों को अगले पांच बरस अपने तौर-तरीके सुधारने पर बेबस भी करेंगे। आज इन बातों की चर्चा इसी कॉलम में पिछले कुछ हफ्तों में लिखी गई बातों का दुहराव भी है, लेकिन यह जरूरी इसलिए है कि छत्तीसगढ़ में अगली सरकार कैसी बनती है, उसे तय करने के लिए यही एक हफ्ता यहां की जनता के पास बचा है। एक बहुत पुरानी बात है कि जनता को वैसी ही सरकार मिलती है, जैसी सरकार की वह हकदार होती है। आज छत्तीसगढ़ और बाकी चुनावी-प्रदेशों की जनता को इस बात को साबित करके दिखाना है, वरना लुटेरों के लूटकर चले जाने के बाद फिर हिफाजत का ख्याल बेमानी होगा। 

बस्तर से धमाकों के बीच शहरों के लिए एक नसीहत

11 नवंबर 2013
संपादकीय
पिछले कुछ हफ्तों से हम लगातार मतदाताओं को झकझोरने का काम कर रहे हैं कि उनमें से जो लोग वोट के दिन घर से नहीं निकलते, वे लोग कुछ घंटों के लिए जिंदा होकर जाएं, और वोट डालकर आएं। लेकिन हम तो हिफाजत से भरे हुए शहर में बैठे यह बात कर रहे हैं, और इसका असर लोगों पर चाहे जितना हो, आज छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली धमाकों, और हमलों के बीच, जान खोने का खतरा उठाकर जो लोग वोट डालने जा रहे हैं, उनकी खबरों का असर हमारे लिखे के मुकाबले शहरी जनता पर अधिक होना चाहिए। इसलिए कि हम तो सिर्फ कह रहे हैं, लेकिन वे आदिवासी मतदाता यह करके दिखा रहे हैं, जिनको शहरी-शिक्षित लोग अनपढ़ कहते हैं, और पिछड़ा हुआ समझते हैं। इन्हीं आदिवासियों ने 1977 में बिना किसी टीवी-अखबार के एकमुश्त वोट डालकर नेहरू की उस बेटी को हरा दिया था जिस इंदिरा को आदिवासियों का सबसे चहेता नेता माना जाता था। ऐसे आदिवासी नक्सली धमकियों के बीच वोट डालने जा रहे हैं, जिनको पोस्टर लगा-लगाकर यह धमकी दी गई है कि जिस उंगली पर वोट की स्याही लगी दिखेगी, उस हाथ को काट दिया जाएगा। लगातार संगीनों के साये में, धमाकों से हिलते हुए, जिंदगियां खोते हुए  आदिवासी हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को एक राह दिखा रहे हैं। और इसके लिए उनका पढ़ा-लिखा होना भी जरूरी नहीं है, शहरी होना भी जरूरी नहीं है, और उनको ऐसी शहरी सरकारों की भी गरज नहीं है, जो नक्सलियों की हिंसा से उनको बचाने की ताकत नहीं रखतीं। 
आज जब हम यह लिख रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ की उन 18 विधानसभा सीटों पर वोट डल रहे हैं जहां पर नक्सलियों का हथियारबंद दखल इतना अधिक है कि देश भर से दसियों हजार बंदूकों ने आकर मोर्चा संभाला है। एक तरफ सरकारी बंदूकें, दूसरी तरफ नक्सलियों की बंदूकें, उनकी विस्फोटक सुरंगें, और हिंसा का उनका लंबा इतिहास, इसके बीच जिन लोगों को वोट देने का हौसला है, उन बहादुरों को आज हम यहां पर सलाम करना चाहते हैं। अगर हिन्दुस्तान में लोकतंत्र जिंदा है, तो ऐसे ही लोगों के दम पर है। दरअसल जिनके पास और कुछ भी नहीं होता, उनको अपने वोट की कीमत अधिक होती है। और जिनके हाथों में शहरों में अपने आरामदेह घरों में कई किस्म के रिमोट कंट्रोल हासिल होते हैं, उनको वोट के दिन भी अपनी मुर्दानगी सुहाती है। 
इस बात को हम लगातार कई-कई बार लिख रहे हैं, मीडिया के दूसरे लोग भी अपने-अपने स्तर पर कुछ न कुछ कर रहे हैं, चुनाव आयोग भी अधिक मतदान को बढ़ावा दे रहा है, और पिछले बरसों में देश-प्रदेश में सरकार और राजनीति, लोकतंत्र और चुनाव का जो हाल देखने मिला है, उसको देखते हुए लगता है कि अब भी जो लोग वोट डालना जरूरी नहीं समझते, इसे महज हक मानकर चुप बैठना अपना हक समझते हैं, और गंदगी को दूर करना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं, उनके लिए अनिवार्य-मतदान जैसी कोई बात क्यों नहीं सोची जानी चाहिए? हम अभी अनिवार्य-मतदान के नफे-नुकसान को तौलकर यह बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम जान की बाजी लगाकर वोट डालते आदिवासियों के मुकाबले शहरी मुर्दों को देखकर यह जरूर कह रहे हैं, खासी हिकारत के साथ, खासे गुस्से के साथ। 
अभी छत्तीसगढ़ के एक चौथाई से भी कम हिस्से में वोट चल रहे हैं। तीन चौथाई से अधिक छत्तीसगढ़ अभी बचा हुआ ही है। आज इस बचे हुए हिस्से को एक हफ्ते बाद के मतदान के लिए सबक लेना चाहिए, लहूलुहान बस्तर से आती हुई नसीहत की इज्जत करनी चाहिए। इसलिए कि मतदाताओं के कब्रिस्तान में ही भूत-पिशाच चुनकर आते हैं। अगर वोटर जागरूक रहें, लोकतंत्र न सही, अपने हक की इज्जत करें, तो बड़े-बड़े धाकड़ों, और दबंगों के होश ठिकाने आ जाएंगे। और हम लगातार लोगों को याद भी दिला रहे हैं कि अपनी आने वाली पीढिय़ों के लिए दौलत और इमारत छोड़कर जाना काफी नहीं है, एक बेहतर और मजबूत लोकतंत्र छोड़कर जाना भी उतना ही जरूरी है। 

मतदान का दिन अपने साथ औरों को भी लेकर जाने का, तीर्थयात्रा की तरह

10 नवंबर 2013
संपादकीय
आज का यह अखबार छत्तीसगढ़ के एक हिस्से में मतदान के ठीक पहले पहुंचने वाला रहेगा। इसे पढऩे के कुछ घंटों के भीतर लोग वोट डालने जाएंगे, और बाकी छत्तीसगढ़ में भी हफ्ते भर बाद लोगों का यह पांचसाला मौका आने जा रहा है। चूंकि इस वोट से छत्तीसगढ़ की दशा और दिशा तय होगी, आगे चलकर बाकी देश के साथ यह राज्य भी देश की दशा और दिशा तय करेगा, इसलिए आज यहां पर मतदाताओं से यह बातचीत जरूरी है। 
जो लोग यह मानते हैं कि वोट डालना एक बटन दबाने जितना आसान है, उन लोगों के मन में भी यह बात आनी चाहिए कि बिजली की बटन तो हर कोई अपने घर में शायद दर्जन भर बार दबाते हों, सरकार को चुनने के लिए बटन पांच बरसों में एक बार ही दबाने मिलती है। इसलिए जो लोग मुर्दा बने घरों में बैठे रहते हैं, उनको यह समझना चाहिए कि खराब और गलत विधायक और सांसद इसलिए चुने जाते हैं, इसलिए वे मंत्री बनते हैं, इसलिए वे सरकार चलाते हैं, क्योंकि अच्छे और सही लोग वोट डालने के बजाय घर बैठे रहते हैं। पिछले चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में लगभग सारे विधायक चालीस फीसदी से भी कम वोटों को पाकर जीते थे, और चालीस फीसदी से अधिक वोटर घर बैठे हुए थे, जिनकी वजह से खराब लोग जीतकर आ गए। 
आज जरूरत इस बात की है कि लोग न सिर्फ खुद वोट डालने जाएं, बल्कि आसपास के लोगों को भी लेकर जाएं। कुछ लोगों को कोई पार्टी नापसंद होती है, कुछ लोगों को कोई उम्मीदवार नापसंद होता है, कुछ लोगों को कोई अगला संभावित मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नापसंद होता है, लेकिन इसके बीच भी वोटर को एक मिलाजुला फैसला लेना होता है। यह फैसला एक बटन दबाने के मुकाबले बहुत अधिक बड़ा फैसला होता है, और इसी पर हमारी वह दुनिया बनती या बिगड़ती है, जो हमें अपने बच्चों के लिए विरासत में छोड़कर जाना चाहते हैं। यह याद रखें कि जब हम किसी भ्रष्ट या दुष्ट को चुनते हैं, तो हमारी इस मौके की इस पसंद के पीछे चाहे जो भी वजहें हों, उसका नुकसान यह होता है कि ऐसे लोग अगले चुनाव तक, अगले चुनाव में, इतने ताकतवर हो जाते हैं कि हम चाहकर भी तब उनको नहीं हरा पाते।  इसलिए आज लापरवाही से किसी दुष्ट या भ्रष्ट को वोट देने का मतलब अपनी आने वाली पीढिय़ों को एक दानव के हवाले करने जैसा होता है। 
इसलिए यह मुश्किल फैसला करना भी है, तुरंत करना है, और कल के सोमवार को जिन इलाकों में वोट है, वहां के लोगों को इसे पढऩे के तुरंत बाद अपने आसपास के वोटरों से बात करनी है कि किसे वोट देना इस प्रदेश के हित में होगा। लोगों के सामने दो बड़ी पार्टियां हैं जिनमें से एक दस बरस से छत्तीसगढ़ सरकार चला रहे हैं, और दूसरी करीब इतने ही वक्त से यह देश चला रही है। हम अपनी तरफ से लोगों को इन दो में से किसी तरफ धकेलना नहीं चाहते, क्योंकि यह पब्लिक है, यह सब जानती है। लोगों के सामने यह अंदाज भी है कि इस राज्य के अगले पांच बरस के लिए किस पार्टी को चुनने से इसका क्या हाल हो सकता है। कौन-कौन लोग मुख्यमंत्री बनने की गुंजाइश रखते हैं, किनकी संभावनाएं हैं, इन बातों को भी लोग जानते हैं। लेकिन हम वोटरों के कंधों पर से इस जिम्मेदारी को कम करना नहीं चाहते कि वे किसे विधायक बनाना चाहते हैं। अगर किसी पार्टी ने खराब लोगों को उम्मीदवार बनाया है, तो वह पार्टी उसका भुगतान करने का जिम्मा भी रखती है। लेकिन भारत की जटिल व्यवस्था यह कहती है कि कैसे लोग विधायक बनें, यह चुनते हुए भी लोग इस बात पर भी नजर रखें कि उससे कौन सी पार्टी की सरकार बनेगी, कौन से लोग मुख्यमंत्री बनने की संभावना रखेंगे। क्योंकि अगली सरकार के पांच बरसों में लोगों को न सिर्फ अपने स्थानीय विधायक से जूझना होगा, बल्कि राज्य को चलाने वाली पार्टी, और उसके मुख्यमंत्री से भी राज्य के भविष्य पर खासा फर्क पड़ेगा। 
इसलिए वोटिंग मशीन पर नाम तो उम्मीदवार का रहेगा, लेकिन पार्टी का निशान साथ जुड़ा रहेगा जो बताएगा कि किस उम्मीदवार को वोट देने से किस पार्टी की सरकार बनेगी, और फिर वोटर खुद अंदाज लगा सकते हैं कि उससे किसके मुख्यमंत्री बनने के आसार रहेंगे। यह लिखते हुए हमको खुद यह हैरानी होती है कि कैसे लोग इन दोनों पैमानों का एक साथ इस्तेमाल करते हुए एक सही फैसला ले पाते होंगे, क्योंकि जब हम यहां लिखने के साथ-साथ अपने खुद के वोट के बारे में सोच रहे हैं, तो यह फैसला एक टन वजन का बोझ सरीखा लग रहा है कि कैसे इसे तय किया जाएगा। अगर अच्छे मुख्यमंत्री को चुनने का मतलब एक खराब उम्मीदवार को वोट देने की बेबसी हो, तो वोटर क्या करे? और अगर एक अच्छे उम्मीदवार को वोट देने का मतलब एक खराब मुख्यमंत्री हो, या एक खराब पार्टी हो, तो वोटर क्या करे? वोटर के दिल-दिमाग पर यह जो बोझ है, पहाड़ की चट्टान सी जो जिम्मेदारी है, उसको देखकर हमको दहशत होती है कि कोई कैसे फैसला करेंगे? 
फिर भी आज बड़ी बात यह है कि अधिक से अधिक लोग वोट डालने जाएं, और अच्छे लोगों के वोटों के बिना बुरे लोगों, बुरी पार्टियों, के जीतकर आ जाने के खतरे को घटाएं। जो लोग वोट डालना तय कर चुके हों, वे ही इस जिम्मेदारी को उठाने के लायक हैं कि आसपास के कुछ और लोगों को वोट डालने ले जाएं। आज भी बहुत से धर्मों में इस बात को बड़े पुण्य का सामान माना जाता है कि लोग अपने साथ दूसरों को भी तीर्थयात्रा पर ले जाएं। वोटिंग का दिन कुछ वैसा ही होता है। अपना खुद का मतदान काफी नहीं होता। अगर हममें से हर कोई दो-दो, चार-चार लोगों को साथ ले जाने की कोशिश करें, थोड़ी सी मेहनत करें, तो दुनिया के सबसे विशाल भारतीय लोकतंत्र से गंदगी दूर हो सकती है। ऐसा न करने पर आने वाली पीढिय़ों के लिए हम एक ऐसा लोकतंत्र छोड़कर जाएंगे जो कि दुनिया के सबसे विशाल दानवाकार घूरे के सिवाय कुछ नहीं होगा।