जनता की जिंदगी पर सरकारी लगाम खत्म करने की जरूरत

31 दिसंबर 2013
संपादकीय

नए साल के आने की खुशी में हर तबका अपने-अपने तरीके से जश्न या खुशियां मनाता है। इसमें सरकार या प्रशासन के नियम यह तय करते हैं कि कोई दावत कितने बजे तक चले। मुम्बई में ऐसी दावतों के लिए पुलिस ने रात डेढ़ बजे तक का वक्त तय किया हुआ है। इसके खिलाफ होटल वालों ने हाईकोर्ट में अपील की और वहां से यह आदेश हुआ है कि पार्टियां सुबह पांच बजे तक चल सकेंगी। इस पर देश के एक बड़े संविधान विशेषज्ञ वकील हरीश साल्वे ने ट्वीट किया है कि यह कैसी नौबत आ गई है कि शराबखानों और पार्टियों को बंद करने का वक्त अदालतों को तय करना पड़ रहा है, राजनीतिक व्यवस्था अलोकप्रिय फैसले लेने से बचते हुए जिम्मेदारी की जगह अदालतों के लिए खुद खाली कर रही है। 
हिन्दुस्तान आजादी के बाद से एक ऐसी अजीब से तानाशाह सरकारी इंतजाम का शिकार रहा है जिसमें सरकार हर किस्म के हक अपने हाथ में रखते हुए लोगों की जिंदगी को, कारोबार को, जीने के तौर-तरीकों की लगाम अपने हाथों में रखने की शौकीन रही है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम हर बरस एक-दो बार इस बारे में लिखते हैं कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही पुलिस रात साढ़े दस बजे से लाठियां लहराकर, गालियां देकर, पानठेलों तक को बंद करवाने पर उतारू हो जाती है। आधी रात काम से लौटते किसी मजदूर को, किसी रिक्शेवाले को कहीं भी एक प्याली चाय भी नहीं मिल सकती। दूसरी तरफ जो महंगे होटल हैं, उनको अपने सितारा दर्जे के नियमों के मुताबिक चौबीसों घंटे चाय-कॉफी और नाश्ते का इंतजाम रखना पड़ता है, और उतना खर्च उठाने की ताकत रखने वाले कोई भी वहां जाकर खा-पी सकते हैं। बेदिमाग और बददिमाग शासन और प्रशासन को यह समझ नहीं आता कि बाजार में काम करने वाले न सिर्फ कारोबारी-कर्मचारी, बल्कि खुद कारोबारी ही रात नौ-दस बजे के पहले अपने खुद के घर नहीं लौट पाते, और फिर अगर वे चाहें कि परिवार के साथ कुछ देर बाहर निकलें, तो उनको एक चाय ठेला भी खुला नहीं मिल सकता। 
बाम्बे हाईकोर्ट ने जो आदेश सिर्फ नए साल की दावत के लिए दिया है, उसे व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। यह सिर्फ एक दिन की दावत का हक नहीं है, यह रोज की बात है, और आज जब शहरीकरण की वजह से लोगों का रात-दिन काम करना होता है, तो फिर उनकी जरूरतों को भी रात-दिन पूरी होने से रोकने का हक किसी सरकार को नहीं है। जनता के हक के खिलाफ सरकारें अपनी बददिमागी दिखाती हैं, और चूंकि आम जनता संगठित नहीं है, इसलिए उसके रोज के हक को कुचलने के खिलाफ भी वह अदालत नहीं जा पाती। जिस कारोबार को सरकारी रोक से नुकसान हो रहा था, वह कारोबार मुम्बई में तो अदालत तक चले गया, बाकी जगहों पर भी देश का वही कानून लागू है, और देश के कानून में अमीर और गरीब ग्राहकों के बीच कोई फर्क भी नहीं है। इसलिए जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकार यह तय करती है कि शराबखानों में किस रेट से अधिक सस्ती शराब नहीं बेची जाएगी, तो फिर ऐसा नियम सस्ती शराब पीने की ही ताकत रखने वाले तबके के हक के खिलाफ है। लेकिन जनता में जागरूकता न होने से पुलिस अपने अंदाज में रात साढ़े दस बजे से बाजार का कफ्र्यू लगा देती है, और आम लोग अपने परिवार सहित बाहर निकलकर जिंदगी जीने का हक भी खो बैठते हैं। ठेले-खोमेचे वालों को रात साढ़े दस बजे से लाठियों से भगा दिया जाता है, और बड़े होटलों में खाने को कुछ न कुछ तो चौबीसों घंटे मिलता है। 
शहरीकरण और पर्यटन की मामूली समझ रखने वाले लोग भी यह समझ सकते हैं, कि जिस प्रदेश या शहर में रात कुछ खाने-पीने भी न मिले, वहां पर बाहर से आए हुए लोग उस जगह को किस तरह मरघटी सन्नाटे वाली पाते होंगे। अगर किसी देश-प्रदेश, शहर या इलाके को पर्यटकों को बढ़ावा देना है, कारोबार को बढ़ाना है, रोजगार के मौके बढ़ाने हैं, दिन के ट्रैफिक जाम के घंटों की भीड़ को रात तक फैलाना है, तो उसके लिए हर शहर में रात की जिंदगी को जीने का हक देना होगा। छत्तीसगढ़ सहित देश के बाकी जिस हिस्से में भी ऐसी रोक लगती है, उसके खिलाफ स्थानीय जनता या स्थानीय कारोबार अदालतों में जाकर सरकारी मनमानी के खिलाफ इंसाफ पा सकते हैं। यह बात लोकतंत्र में अतिसरकारीकरण, या अतिनियंत्रण है, और इसे खत्म किया जाना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ के बारे में हम यह सकते हैं कि यहां बाहर से आने वाले पर्यटक कुछ गिनी-चुनी जगहों को देखने के अलावा रात में सब-कुछ मुर्दा पाते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। अगर रात में बाजार और मनोरंजन के घंटे बढ़ेंगे, तो उससे कर्मचारियों के नए रोजगार भी खड़े होंगे, और शाम की भीड़ देर रात तक खिसककर सड़कों से ट्रैफिक जाम भी कम करने में मदद करेगी। जो लोग यह सोचते हैं कि रात में बाजार जल्द बंद करवाने से जुर्म कम होते हैं, उनको यह रिकॉर्ड देख लेना चाहिए कि जब तक सड़कों पर चहल-पहल रहती है, कारोबार जारी रहता है, तब तक जुर्म कम होते हैं। जुर्म उस समय बढ़ते हैं, जब सड़कों और बाजारों में सन्नाटा छा जाता है। छत्तीसगढ़ में किसी को इस बात को समझना चाहिए, और यहां की जनता को देर रात तक अपने परिवार के साथ बाहर निकलकर कुछ खाने-पीने के लिए ठेले या रेस्तरां नसीब होने देना चाहिए। 

गरीब के नोटदान के फैसले से वोटदान का अंदाज भी लगाकर सुधरने की जरूरत...

30-12-2013
संपादकीय 
छत्तीसगढ़ के पहले चिकित्सा दीक्षांत समारोह में राज्यपाल शेखर दत्त ने एक घटना का जिक्र किया कि किस तरह एक छत्तीसगढ़ी किसान अपनी जिंदगी भर की कमाई 21 लाख रूपए राज्य सरकार को अस्पताल के लिए देनी तय की थी। बाद में उसने यह रकम एक स्कूल के लिए दे दी। उस किसान से कुछ महीने पहले की अपनी बातचीत की चर्चा करते हुए शेखर दत्त ने बताया कि अभनपुर का यह किसान पहले गांव में अस्पताल चाहता था लेकिन फिर उसने स्वास्थ्य विभाग का कामकाज देखकर इरादा बदल दिया। उसकी जिंदगी भर की मेहनत की कमाई का सदुपयोग हो, इसलिए उसने इसे स्वास्थ्य विभाग को न देकर शिक्षा विभाग को दिया। राज्यपाल ने बताया कि उसने कुछ महीने पहले के शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कार्यकाल से प्रभावित होकर अपना फैसला बदला।
छत्तीसगढ़ के जिस डी के अस्पताल में इस राज्य का पहला चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल चलता था, उसे भी एक दानदाता, दाऊ कल्याण सिंह, ने दिया था। और सन् 2000 में जब राज्य बना, तब यही अस्पताल भवन राज्य सरकार का मंत्रालय बना, और अब तेरह बरस बाद एक बार फिर वह दानदाता की भावना के मुताबिक अस्पताल बना है। छत्तीसगढ़ के लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह रायपुर में सब्जी बेचने वाली बिन्नी बाई ने अपने बुढ़ापे में बड़ा दान देकर इसी डी के अस्पताल के मरीजों के साथ के लोगों के लिए धर्मशाला बनवाई थी।
इन दो-तीन बातों के साथ आज हम यहां यह याद दिलाना चाहते हैं कि जब कभी समाजसेवा के काम के लिए भरोसेमंद लोग आगे आते हैं, तो उनको दान या चंदे की कमी नहीं रहती। लोग जुटते जाते हैं और काम आगे बढ़ते जाता है। समाजसेवा से परे भी आज दिल्ली में आम आदमी पार्टी के चंदे का जो पारदर्शी हिसाब जनता के बीच है, वह बताता है कि किस तरह दिल्ली में केन्द्रित इस पार्टी के इस दिल्ली चुनाव के लिए दिल्ली के बाहर के उन बहुत पढ़े-लिखे, कामयाब और पेशेवर, आमतौर पर राजनीति को गंदा समझने वाले, उससे दूर रहने वाले, लोगों ने चंदा भेजा। अब ऐसी भी खबरें हैं कि बड़ी-बड़ी नौकरियों और कामकाज को छोड़कर लोग इस पार्टी से जुड़ रहे हैं, और इसे शायद जरूरत के लायक पैसे की कभी कमी नहीं रहेगी। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपने हिमायतियों के नाम अपील जारी की थी कि उनके पास चुनाव का पूरा खर्च आ चुका है, और लोग अब चंदा न भेजें।
जिस देश में कारगिल के शहीदों की पत्नियों को मकान देने के नाम पर देश का सबसे आदर्शहीन घोटाला होता है, उस देश में लोग अगर किसी नेक काम के लिए चंदा देने की सोचें भी, तो किसको दें? आज सरकार और बाजार से मिले सैकड़ों करोड़ के दान-अनुदान से चलने वाले ट्रस्ट और संगठनों में से कुछ अगर बेईमानी करते हैं, तो उससे दान की पूरी सोच जख्मी होती है। लोगों का उत्साह और हौसला टूटता है। हमको प्रधानमंत्री राहत कोष में पहुंचने वाले दान के आंकड़े नहीं मालूम हैं, और न ही बहुत से राज्यों में मुख्यमंत्री राहत कोष या सहायता कोष में पहुंचने वाले आंकड़े। लेकिन हमारा पुख्ता अंदाज है कि जिस प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की, जिसकी सरकार की, साख बेहतर होगी, उसको लोग अधिक दान खुलकर देंगे। और अगर कोई पीएम-सीएम राहत कोष को चाहे ईमानदारी से चलाते हों, अगर वे सरकारी कामकाज में बेईमानी के लिए जाने जाते हैं, तो उनको कोई गरीब तो ट्रस्ट के लिए भी अपनी रकम नहीं भेजेंगे।
इसलिए सार्वजनिक जीवन में जो लोग किसी ट्रस्ट में काम करते हों, या राजनीतिक दल के हों, उनको जनता के पैसों में बेईमानी करने से उतनी रकम नहीं मिल सकती, जितनी कि ऐसी बेईमानी के बीच ईमानदारी के लिए मशहूर किसी मुखिया को मिल सकती है। छत्तीसगढ़ के राज्यपाल के बताए हुए उनके अनुभव, और दिल्ली में आम आदमी पार्टी का गढ़ा गया इतिहास, इन दोनों से हर किसी को साख की सबक लेनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवा का हाल पिछले दस बरसों में सबके सामने है। हमारे पास भी इसके बारे में लिखने को कुछ भी नया नहीं बचा है। और पुराने लिखे हुए का कोई असर होने का कोई आसार भी नहीं बचा है। लेकिन राज्य सरकार को इस बारे में ईमानदारी से सोचना चाहिए कि उसके कामों की साख जनता के दिल पर किस तरह से दर्ज होती है। उस छोटे से किसान ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई दान में देने का फैसला कर लेने के बाद भी अगर सरकार के सबसे बड़े जनसुविधा के विभाग, स्वास्थ्य विभाग को न देना तय किया, तो उसकी भावना राज्य सरकार के लिए एक सर्टिफिकेट है, और उस पर क्या लिखा है, यह सबको मालूम है, क्यों लिखा है, यह भी सबको मालूम है। लेकिन जिस तरह स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान में फेल पर्चों में पास होने के लिए एक पूरक परीक्षा होती है, एक श्रेणी सुधार का मौका रहता है, उस तरह राज्य सरकार को, खासकर उसके स्वास्थ्य विभाग को कोशिश करनी चाहिए। वरना आज तो उस किसान ने एक विभाग की जगह दूसरे विभाग को अपना नोटदान किया है, कल के दिन अगर इसी आधार पर वह एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी को अपना वोटदान करने को मजबूर होगा, तो क्या होगा? और हम पिछले कुछ दिनों में कई बार जो बात राज्य की भाजपा सरकार को याद दिला चुके हैं, उसे आज यहां पर फिर दुहराने की जरूरत है, कि राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी का है, एक फीसदी से भी कम का है। और भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक झाड़ू ने आधी और एक सदी पुरानी पार्टियों के दबदबे को बुहारकर अभी-अभी फेंका है।

Bat ke bat 
30 Dec 2013

कांग्रेस को ऐतिहासिक चुनौती, और उसकी ऐतिहासिक गलतियां

29 दिसंबर 2013
संपादकीय
बीच में कई दिन लगातार दूसरे मुद्दे इतने अधिक हावी रहे कि कांग्रेस की बहुत सी बातों पर हमको लिखने का मौका ही नहीं मिला। ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस ने मौका नहीं दिया, लेकिन कभी अरविंद केजरीवाल, तो कभी कोई और अधिक जरूरी मुद्दा सामने खड़े होकर कांग्रेस को धकेलकर पीछे करते रहा। आज जब बाकी मुद्दों से जरा सी सांस मिली है, तो फिर कांग्रेस की बारी है। 
महाराष्ट्र में देश के सबसे आदर्शहीन आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट को महाराष्ट्र की कांग्रेस अगुवाई वाली कांग्रेस-एनसीपी केबिनेट ने जिस तरह से खारिज किया, उसने मानो अपने ही भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के ताजा सार्वजनिक रूख और हाल ही में घोषित नीति-सिद्धांतों को खारिज कर दिया। अब यहां पर यह भी याद रखने की बात है कि महाराष्ट्र के जिस मंत्रिमंडल ने तथ्यों और सच से भरी हुई इस आदर्श जांच रिपोर्ट को खारिज किया, उसके मुखिया, कांग्रेस के मुख्यमंत्री, पृथ्वीराज चौहान भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले महाराष्ट्र में सामने आने के बाद कांग्रेस की इज्जत बचाने के अंदाज में प्रधानमंत्री कार्यालय से महाराष्ट्र भेजे गए थे। उनको एक धीमा ही सही, लेकिन ईमानदार माना जाता था। और उनकी ईमानदारी उस दिन साबित हुई जिस दिन उन्होंने कांग्रेस की ऐतिहासिक बेईमानी को उजागर करने वाली आदर्श जांच रिपोर्ट को खारिज करने का काम किया। 
हिन्दुस्तान में किसी केबिनेट का फैसला वैसे तो लोकतंत्र का अंत नहीं होता, और उसके खिलाफ अदालत के दरवाजे हमेशा ही खुले रहते हैं, लेकिन अभी तो सवाल यह है कि जिस पार्टी का भविष्य दिल्ली की प्रेस कांफ्रेंस में अपराधियों को बचाने वाला अध्यादेश, यूपीए मंत्रिमंडल से मंजूर हो जाने के बाद भी फाड़कर फेंक देता है, और न सिर्फ कांग्रेस बल्कि पूरा यूपीए गठबंधन अपने ही फैसले को फटे कागज के इन टुकड़ों की इज्जत करते हुए, वापिस ले लेता है, वह पार्टी आदर्श की जांच रिपोर्ट को खारिज करते हुए क्या कर रही है?! दूसरी बात यह कि पिछले बरस लोकपाल को खतरनाक बताते हुए संसद में विरोध करने वाले राहुल गांधी इस बार जब देश का रूख देखते हुए संसद में लोकपाल को पास करवाने की अगुवाई करते हैं, तो उनकी पार्टी अपने ही मुख्यमंत्रियों के भयानक भ्रष्टाचार वाली जांच रिपोर्ट कैसे खारिज कर सकती है?!
इसलिए आज कांग्रेस पार्टी का हाल बेकाबू सा दिख रहा है। एक पार्टी के रूप में, यूपीए सरकार के मुखिया के रूप में, राज्यों में सरकार की शक्ल में, उत्तरप्रदेश के दंगा शिविरों की मौतों जैसे मामलों में केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी की शक्ल में, जगह-जगह कांग्रेस पार्टी एक गैरपार्टी जैसा बर्ताव कर रही है। उसके नेता राहुल गांधी अपनी पार्टी से बाहर काम कर रहे एक नेता की तरह काम कर रहे हैं, जो कि एक बाहरी व्यक्ति की तरह कांग्रेस की खामियों को सुधारने का काम तब करते हैं जब कांग्रेस भयानक खामियां कर चुकी होती है। 
पाठकों को याद होगा कुछ अरसा पहले हमने सोनिया गांधी की इस बात के लिए तारीफ की थी कि समलैंगिकता को जुर्म बताने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उन्होंने एक राष्ट्रीय नेता की हैसियत से खुलकर विरोध किया था, और एक सुधारवादी, आधुनिक, वैज्ञानिक, लेकिन अलोकप्रिय, रूख को सामने रखा था। लेकिन वह मामला सुप्रीम कोर्ट का था, वहां से फैसला आने से पहले कांग्रेस या उसकी अगुवाई वाली यूपीए सरकार के पास और कोई चारा, उस वक्त, नहीं था। इसलिए फैसला आने के बाद भी उन्होंने जब दूसरी पार्टियों के दकियानूसी रूख के खिलाफ एक वैज्ञानिक नजरिया सामने रखा था, तब हमने उनकी तारीफ की थी। 
लेकिन आज महाराष्ट्र के मामले में एक बार फिर कांग्रेस की ऐसी नौबत सामने आई है, जिसमें इस पार्टी के भीतर के ढांचे में जगह-जगह शून्य नजर आता है। एक ऐसा खोखलापन जो कि दाएं हाथ को बाएं हाथ तक खबर भेजने से रोक देता है। आज के मुश्किल वक्त में इस पार्टी को अपने तौर-तरीकों को एक संगठित संगठन की तरह करना होगा, उसके बिना इसका कोई भविष्य नहीं हो सकता। और यह हिन्दुस्तान के लोकतंत्र में एक ऐतिहासिक हादसा होगा कि संगठन के ढांचे के भीतर ऐसे शून्य के चलते इतनी बड़ी पार्टी हाशिए पर चली जाए। कांग्रेस को अपनी ऐतिहासिक भूमिका को, ऐतिहासिक जिम्मेदारी को, और ऐतिहासिक चुनौती को सिर्फ इसलिए अनदेखा नहीं कर देना चाहिए, क्योंकि इस पार्टी के मुखिया के रूप में एक परिवार के फैसलों और सोच को किसी तरह की कोई चुनौती, उससे भी कम, कोई भी असहमति नहीं झेलनी पड़ती। जब असहमति की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है, तो कोई भी संगठन, कोई भी संस्था ऐतिहासिक गलतियां करने की खतरनाक कगार पर पहुंच जाती है। 
आज हिन्दुस्तान की जनता किसी भी पार्टी को गलत काम करते, और फिर उसके नेता को उसकी मरम्मत करते देखना नहीं चाहती। ऐसा सिलसिला लोकतंत्र का अपमान भी रहता है। महाराष्ट्र के आदर्श घोटाले ने पहले ही कांग्रेस की खासी बदनामी कर दी है, और अब उस बदनामी को बूट तले कुचलकर खत्म कर देने की कोशिश से वह बदनामी और अधिक बढ़ी है। ऐसा मुमकिन नहीं है कि महाराष्ट्र केबिनेट का फैसला होने के पहले कांग्रेस हाईकमान से कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने चर्चा न की हो, उसके बाद अगर ऐसी नौबत सामने आई है, तो कांग्रेस को एक गहरे आत्मचिंतन की जरूरत है। 

दीवार पर बड़े-बड़े हर्फों में लिखा केजरीवाल न पढ़ पाने वाली बड़ी पार्टियां ऐसी ही रहें, ताकि ...

28-12-2013
संपादकीय 
दिल्ली में आज अरविंद केजरीवाल के शपथ लेने के साथ वहां पहले से घोषित जिस तरह का नजारा देखने को मिला उसके बारे में बात करना जरूरी है। वे कुछ वामपंथी मुख्यमंत्रियों और ममता बैनर्जी जैसे एकाध और मुख्यमंत्री की तरह के किफायती तौर-तरीकों के साथ सार्वजनिक मैट्रो से शपथ लेने पहुंचे। दिल्ली के राजसी मिजाज में यह एक बड़ी अटपटी सी बात थी, लेकिन जो हाथ में झाडू लेकर चलते हैं, उनके पांव अगर सड़क की धूल को छूते हुए चल रहे हैं, तो गांधी के देश में सादगी और किफायत की एक बात है। आज हम केजरीवाल और उनके साथियों को लेकर इतनी बड़ी उम्मीद नहीं जगाना चाहते कि वे हमेशा ऐसे ही बने रहेंगे, ईमानदार बने रहेंगे, या कामयाब रहेंगे। हो सकता है कि वे इनमें से कुछ बरस बाद कुछ भी न रह जाएं, लेकिन आज उनको आज गांधी के देश में किफायत लागू करने की एक मिसाल पेश करने का हक है। 

दिल्ली हिन्दुस्तान का सबसे भ्रष्ट और सबसे हरामखोर शहर है। ऐसी जगह पर केजरीवाल के तौर-तरीके सत्ता पर जोंक की तरह आधी सदी से चिपके चले आ रहे नेताओं और अफसरों के मुंह पर एक तमाचा है, लेकिन गरीब जनता के हक पर ऐश करते नेताओं और अफसरों, जजों और वैसे बाकी ताकतवर लोगों का ऐसे ही तमाचे का हक बनता है। आज के दिल्ली के माहौल को देखते हुए हमको ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के बहुत से मैट्रो के सफर याद पड़ते हैं जिनमें कोई मुसाफिर उठकर उनको अपनी सीट भी नहीं देते, और वे खड़े-खड़े बाकी आम लोगों की तरह अखबार पढ़ते सफर करते हैं। योरप के बहुत से देशों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बसों से या साइकिल से भी दफ्तर आते-जाते हैं। ऐसे देशों ने हिन्दुस्तान के अलग-अलग हिस्सों पर अलग-अलग वक्त पर राज किया था, कल के उन कब्जाधारियों के तौर-तरीकों उनके अपने देशों में तो आज अधिक लोकतांत्रिक  बने हुए हैं, लेकिन जिस राज को वे छोड़कर गए थे, उस राज में आज लोकतंत्र के नाम पर सत्ता चूसते लोग सामंती और राजसी खर्चीली हिंसा गरीब जनता के पैसों से करते हैं। 
हम यह चाहते हैं कि सभी राज्यों में एक-एक बार इस तरह की झाडू लगे और जनता के सामने यह बात खुलकर आए कि सरकार चलाते हुए मनमानी का खर्च करने वाले लोगों को हटाकर किफायती और ईमानदार लोगों को लाया जा सकता है। इस लोकतंत्र को एक बार फिर लोकतंत्र बनाना जरूरी है, जो कि आज राजतंत्र के अंदाज में मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को असीमित फिजूलखर्ची का हक देता है। अरविंद केजरीवाल की आज की सबसे बड़ी कामयाबी यही है कि उन्होंने देश के सामने एक ईमानदार और सादगी भरे विकल्प को मुमकिन बनाकर साबित कर दिया है। उनके सामने जो लोग यह चुनौती रखते थे कि सत्ता को गाली देने से, राजनीति को गाली देने से कुछ साबित नहीं होता, और दम है तो वे चुनाव लड़कर जीतकर दिखाएं, वैसे लोगों को उन्होंने अपनी जीत से एक जवाब दिया है, जिसका कोई जवाब इस देश की बड़ी और भ्रष्ट राजनीतिक पार्टियों द्वारा भ्रष्ट की गई चुनाव व्यवस्था के पास नहीं है। 
आप की सरकार कितनी चलती है, यह महत्वहीन है, बहुत सी बड़ी पार्टियों की सरकारें भी खरीद-फरोख्त के बावजूद गिरते आई हैं। ऐसे में कल को अगर कांग्रेस और भाजपा केजरीवाल नाम के ईमानदार विकल्प को असंभव साबित करने के लिए गिरा देते हैं, तो भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। केजरीवाल अपनी कामयाबी को साबित कर चुके हैं, और अपनी मौजूदा सादगी के साथ वे पूरे देश के सामने एक विकल्प हैं। दीवारों पर लिखी इस बड़ी-बड़ी इबारत को जो बड़ी पार्टियां नहीं पढ़ पा रही हैं, उनकी यह लापरवाही जारी रहे, वही लोकतंत्र के लिए बेहतर है, और वही हम उनके लिए चाहते हैं। 

बेकसूरों और बेबसों की कब्र की मिट्टी, साजिश का बारूद नहीं है

27 दिसंबर 2013
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगों के शिकार अल्पसंख्यक मुस्लिम  लोगों को राहत शिविर में लगातार मरते देखते हुए यह देश चल रहा है। बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े कारखानेदार, बड़े-बड़े अफसर अपने रोज के काम में लगे हुए हैं। दंगों के बाद के इन दसियों हजार लोगों की यह बदहाली, और मौत, देश की सबसे बड़ी अदालत की निगरानी में, केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की मिलीजुली जिम्मेदारी के तहत, देश के दो संभावित प्रधानमंत्रियों, राहुल गांधी और मुलायम सिंह यादव के बावजूद चल रही है। ठंड से लोग मर रहे हैं और वहां के अफसर एक जुर्म की तरह का बयान दे रहे हैं कि ठंड से मौत नहीं होती। इसके पहले मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वहां कोई दंगा प्रभावित नहीं है, और जो लोग वहां टिके हुए हैं वो कांग्रेस और भाजपा के षडय़ंत्रकारी हैं जो कि उत्तरप्रदेश की सपा सरकार को बदनाम करने की साजिश में हिस्सेदार हैं। और अब वहां से खबरें आ रही हैं कि पुलिस जबर्दस्ती लोगों को राहत शिविरों से घर भेज रही है, कहीं किसी कब्रिस्तान में तंबू लगाकर रह रहे लोगों के खिलाफ अवैध कब्जे का केस दर्ज किया जा रहा है। 
ऐसा देश चल रहा है, ऐसा लोकतंत्र चल रहा है, और जो लोग इन राहत शिविरों में दफन हो रहे हैं, वे तकरीबन बेनाम हैं, बेचेहरा हैं, और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के लिए चुनाव के पहले तक वे शायद बेमतलब भी हैं। यह देश एक भयानक लोकतंत्र हो गया है, जहां पर मुलायम सिंह यादव अपने बेटे के हाथ एक खिलौने की तरह देश का सबसे बड़ा प्रदेश देकर इसे लोहिया का समाजवाद, और इसे धर्मनिरपेक्षता भी साबित कर रहे हैं। दूसरी तरफ अपने गांव में वे अंतरराष्ट्रीय स्पोटर््स कॉम्पलेक्स बनवा रहे हैं, और उसमें देर होने पर एक अफसर को निलंबित करवा रहे हैं। दूसरी तरफ उनका एक दूसरा अफसर ठंड से मौतों को नामुमकिन बता रहा है। यह बहुत अजीब सा देश है, और यह बहुत अजीब सा उत्तरप्रदेश भी है जहां पर लोग इस तरह के काम करके, इस तरह की बातें करके, चुन भी लिए जाते हैं, और बाकी हिन्दुस्तान के भी प्रधानमंत्री बनने के काबिल अपने को मानते हैं, बताते हैं, और मनवाते हैं। 
कई बार हमको लगता है कि सरकार और संसद के साथ-साथ देश की अदालतें भी एक सीमा से अधिक लोकतंत्र की बदहाली को रोक नहीं पा रही हैं। ठंड में दर्जनों बच्चों की मौत दंगा राहत शिविरों में हो चुकी है, और इस उत्तरप्रदेश की अनगिनत इमारतों में इनके लिए जगह भी नहीं है। यह किस तरह का लोकतंत्र है जहां पर अखबारों में कुछ खबरों, और कुछ बयानों से परे राहत शिविरों की ऐसी मौतों को रोकने के लिए और कुछ भी नहीं हो सकता। इस लोकतंत्र को हांकने वाले लालबत्ती ताकतें अगर इन मौतों को नहीं रोक सकतीं, तो वे लालबत्तियां भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक ताकत का प्रतीक नहीं हैं, वे इस लोकतंत्र की देह और आत्मा को बेचने वाले पेशे का प्रतीक हैं। आजादी के बाद पौन सदी होने को है, लेकिन इस मुल्क में अलग-अलग तबके हैं, उनके अलग-अलग हक हैं, और इन फासलों के बीच खाई सी गहराई है। एक बार भी यह लगता है कि बाकी देश में जहां-जहां सत्ता ने इस तरह का हाल करके रखा है, वहां-वहां जिम्मेदार लोगों के मुंह पर झाड़ू पडऩी चाहिए, और एक ऐसी सरकार आनी चाहिए जो कि हो सकता है कि तस्वीर बदलने की एक कोशिश करें, हो सकता है कि उसे ठंड से मरते हुए बच्चे षडय़ंत्रकारी न लगें। हम चाहते हैं कि एक-एक बार ऐसे तमाम बददिमाग नेताओं की पार्टियों को, ऐसे अफसरों को झाड़ू से बुहारकर घूरे पर डाला जाए। पिछले चार-छह दिनों को अगर देखें तो मुलायम सिंह यादव और उनके अफसर झाड़ू से सम्मानित करने के सबसे बड़े हकदार लग रहे हैं। जिन सत्तारूढ़ लोगों को बेकसूर और बेजुबान, सरकारी नालायकी और साम्प्रदायिकता के शिकार लोगों की कब्र की मिट्टी साजिश का बारूद लगती है, उनके लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

बात की बात, Bat ke bat,

26 dec 2013

जनता के लहू से सींचकर अपनी यादों के पौधे लगाना

26 दिसंबर 2013
संपादकीय
यूपीए सरकार ने अपना दसवां साल खत्म होते-होते एक बड़ा काम किया है, एक वक्त बाबू जगजीवनराम के पास रहा बंगला 1986 में उनकी मौत के बाद से उनकी बेटी मीरा कुमार, या परिवार के लोगों के कब्जे में रहा, उसे बाबू जगजीवनराम ट्रस्ट के लिए मांगा गया, मीरा कुमार को दिल्ली में दूसरा बंगला मिला लेकिन यह बंगला भी उनके कब्जे में रहा, इसके करोड़ों के किराए का बिल वापिस ले लिया गया। और अब एक शानदार फैसले के तहत इसे अगले पच्चीस बरसों के लिए मीरा कुमार को दे दिया गया है। कहने को इसे इस ट्रस्ट के लिए दिया गया है, लेकिन दिल्ली में शायद अरबों की यह सरकारी संपत्ति मीरा कुमार के निजी कब्जे में, शायद उनकी बाकी पूरी जिंदगी रहेगी। 
जनता की संपत्ति का यह इस्तेमाल दिल्ली में उस दिन हुआ है, जिस दिन एक छोटा सा सड़कछाप आदमी अरविंद केजरीवाल वहां सरकार बनाने की घोषणा के साथ-साथ यह फैसला भी घोषित करता है कि उसकी सरकार के मंत्री सरकारी बंगलों में नहीं रहेंगे, निजी मकान में, या छोटे सरकारी फ्लैट में ही रहकर काम करेंगे। आज जब देश के भीतर भारत की तथाकथित पाखंडी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सत्ता के लोग देश की देह में दांत गड़ाकर लहू चूस ले रहे हैं, तब अगर एक बिल्कुल ही मामूली से इंसान ने इस पूरे पाखंडी लोकतंत्र के सामने सुधरने के लिए एक मिसाल पेश की है, तो मानो उसका मखौल उड़ाते हुए यूपीए सरकार ने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को यह तोहफा दिया है। 
इस खबर के आते ही बहुत से लोगों को यह याद आने लगा है कि किस तरह बाबू जगजीवनराम मंत्री रहते हुए ग्यारह बरसों तक टैक्स पटाना भूल गए थे। कुछ और लोग इस बात को इसके साथ जोड़कर देख रहे हैं कि पिछले इतने बरसों में लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए मीरा कुमार ने यूपीए के साथ जो बर्ताव किया है, क्या उसके एवज में इस सरकार ने यह तोहफा दिया है? कुछ लोगों को इसी बरस जुलाई में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला याद पड़ रहा है जिसमें लोग सरकारी बंगलों का हक खत्म हो जाने के बाद भी वहां बने रहते हैं, और उनको बेदखल करने के लिए, उनसे वसूली करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक लंबा आदेश दिया था। लेकिन इन सबसे परे, आज देश का जो माहौल है, वह सत्ता का बेजा इस्तेमाल के खिलाफ लोगों की नफरत का है। इस हकीकत को समझे बिना जो लोग जनता के पैसों पर अपने कुनबे के लिए या तो ऐशगाह, या फिर यादगाह बना रहे हैं, वे बहुत से दूसरे केजरीवालों को पैदा करने का काम भी कर रहे हैं। छोटे से दिल्ली राज्य में देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों पर जो झाड़ू चली है, वह चुनिंदा नेताओं के चेहरों पर, कई दूसरे राज्यों में, कई राजनीतिक दलों के ऊपर भी चल सकती है। 
जहां तक किसी नेता के नाम पर ट्रस्ट बनाने के लिए किसी सरकारी इमारत को देने की बात है, तो सरकार को ऐसे फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुलकर सामने आना चाहिए। ऐसे में तो हर सरकार अपने पसंदीदा कुछ गुजर चुके चेहरों के नाम पर  पच्चीस-पच्चीस बरस के लिए जनता की दौलत दे सकती है, और दिल्ली और अधिक मकबरों का शहर हो सकता है। दिल्ली में मुगलों के वक्त के मकबरे कम नहीं हैं कि आज वहां पर और मकबरों के लिए सरकारी जमीन और मकान दिए जाएं। हमारा तो यह भी मानना है कि नेताओं के लिए बड़ी-बड़ी समाधियां बनाना, उसके लिए बड़े-बड़े अहाते सरकारी जमीन पर छोडऩा, उनको सरकारी खर्च से ढोना, ये सब बंद होना चाहिए। जिस कुनबे को, जिस राजनीतिक दल को, या जिस संगठन को अपने मुखिया की स्मृतियों को ऐसे बनाए रखने की चाह हो, उनको खुद चंदा इक_ा करके यह काम करना चाहिए। जनता के लहू से सींचकर यादों के पौधे लगाना और उनको पेड़ बनाने के लिए बाकी जिंदगी इस मुल्क के गरीबों की देह से लगातार लहू खींचना, लोकतंत्र नहीं है। और इस देश में लोकतंत्र को हांकने का दावा करने वाले, उस पर किसी दैत्य के दानवाकार बदन की तरह बैठकर उसे कुचलने वाले लोग ही अपने मुखिया की स्मृतियों के ऐसे स्मारक पर गर्व कर सकते हैं। हम इसे सिर्फ शर्म और धिक्कार की बात मानते हैं। 

बात की बात, Bat ke bat

25 dec 2013

एक फटीचर का झाड़ू सामंतवादी सोच पर...

25 दिसंबर 2013
संपादकीय
कई बार गहरी जड़ें जमा चुके सामंतवाद का चेहरा लोगों को दिखाने के लिए कुछ सड़क छाप, फुटपाथी, फटीचर, दो कौड़ी के आम लोगों की भी जरूरत होती है। क्योंकि गहरी जड़ों पर खड़े हुए बड़े-बड़े पेड़ उन्हीं को हकीकत साबित करने लगते हैं। दिल्ली में आज आम आदमी पार्टी ऐसा ही फटीचर काम कर रही है। 
आज-कल में उसके मुख्यमंत्री बनने जा रहे अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में बहुत सारी ऐसी अलोकतांत्रिक और सामंती बातें टूटने जा रही हैं, जिनको भारतीय लोकतंत्र में लोकतांत्रिक मान लिया गया था। इनमें बंगले, लालबत्ती की गाडिय़ां, और बहुत से ऐसे ऐशोआराम हैं, जिनको सत्ता पर आते ही लोग अपना पैदाइशी हक मान लेते हैं, और हाल के हिन्दुस्तान को देखें तो सत्ता पर बैठे लोग अपने मां-बाप की याद में सरकारी बंगलों को स्मारक बनवाने का काम भी करने लगे हैं। हरामखोरी इस देश की राजनीतिक संस्कृति की एक बड़ी सोच बन गई है, और इसके लिए बाकी सोच में  जो हिंसा और बेशर्मी लगती है, वह भी खूब गहरी जड़ें जमा चुकी है। जिस देश में नेताओं और अफसरों के कुत्ता-बिल्ली भी लालबत्ती गाडिय़ों में घूमते हों, जिनको साफ करने के लिए वर्दीधारी पुलिस लगाई जाती हो, जिनके बंगलों पर सरकार के करोड़ों रूपए सालाना खर्च होते हों, वैसे देश में अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों जैसे, कम से कम आज तक तो, फटीचर लोगों की जरूरत है जो कि इस गरीब देश की जनता के हक की पाई-पाई को दुह लेने वाले, चूस लेने वाले नेताओं के सामने एक मिसाल की तरह खड़े हो सकें। 
हम अरविंद केजरीवाल के भविष्य को लेकर कोई बात नहीं कर रहे, हो सकता है कि कुछ बरस बाद वे भी दूसरे बहुत से नेताओं की तरह भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हों, हो सकता है कि कुछ अरसा बाद वे भी सत्ता की हरामखोरी में पड़ जाएं, और कुपोषण के शिकार बच्चों के मुंह से दूध की बूंदें छीनकर अपने लिए खीर बनवाने लगें, लेकिन हम आज की बात कर रहे हैं, जिस दिन वे एक मिसाल हैं, और चाहे कुछ महीनों की ही मिसाल क्यों न हो, यह मिसाल आज जनता को यह एहसास करवाने के लिए काफी है कि बाकी नेताओं के तौर-तरीके उनके अपने घर से नहीं आए हैं, वे जनता के पैसों का बेजा इस्तेमाल करते हुए ही हैं। 
अगर देश की बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं को अब भी समझ बाकी है, तो बिना झिझक और बिना शर्म के उनको अपने तौर-तरीकों के लिए, कामकाज के लिए, आम आदमी पार्टी से कुछ सीखना चाहिए। और हम सिर्फ चुनावी कामयाबी की तरकीबें सीखने की बात नहीं कर रहे, क्योंकि आम आदमी पार्टी के पास तिकड़मों जैसी तरकीबें थी भी नहीं। देश के जिस अविश्वास और निराशा के माहौल में अरविंद केजरीवाल ने एक अविश्सनीय सी चुनावी कामयाबी हासिल की है, वह सिर्फ एक फटीचर के लिए मुमकिन थी, वरना दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव जीतने की रूपए-पैसे और कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी ताकत तो भाजपा के पास ही थी। वो सारी ताकत एक झाड़ू के आगे नहीं टिकी, और केन्द्र सरकार की जांच की सारी ताकत के बावजूद आज अगर केजरीवाल और उनके साथी जिंदा हैं, तो यह जाहिर है कि उनके कामकाज मोटे तौर पर जुर्म से परे हैं। एक तरफ जब आदर्श घोटाले में आधा दर्जन मुख्यमंत्री-मंत्री कटघरे में खड़े हैं, तब अगर कोई पार्टी ईमानदारी की बात करती है, और लोगों के सामने एक चुनौती की तरह अपने को जांच के लिए खुला रखती है, तो यह क्या कम बड़ी बात है? कल तक के येदियुरप्पा को आज फिर अगर भाजपा वापिस लेने की कगार पर है, और ऐसे में केजरीवाल अगर पारदर्शिता की कसम खाते हुए अपने को हर किस्म की छानबीन के लिए पेश करते हैं, तो यह क्या कोई छोटी बात है? और ऐसा काम, जैसा कि हमने शुरू में कहा है, कोई सड़क छाप, फुटपाथिया, दो कौड़ी का आदमी ही कर सकता था, जो झाड़ू लेकर चलने में फख्र हासिल करता है। 
केजरीवाल सत्ता में आने के बाद जिस तरह की सादगी को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं, वही सोच लोकतंत्र में होनी चाहिए। सरकार अच्छी चले तो बहुत अच्छी बात है, अच्छी न चले तो भी यह उम्मीद की जा सकती है कि वह दूसरी सरकारों से कम भ्रष्ट होगी, और राजनीतिक सोच की जो कमी आम आदमी पार्टी में आज दिखती है, वह भी रोज कोई न कोई नौबत सामने आने पर अनुभव से दूर हो सकती है। इसलिए आज हम इस पार्टी की सादगी को ही असली गांधीवादी सोच की सादगी मानकर उसकी तारीफ कर रहे हैं। ऐसा भी नहीं है इसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं है। हमने त्रिपुरा में वामपंथी मुख्यमंत्रियों को मजदूरों की तरह की सादगी से जीते, और ईमानदारी से काम करते देखा हुआ है। अब जब कांग्रेस गांधी को और गांधीवादी सादगी को छोड़ चुकी है, जब भाजपा के लोग आरएसएस की सुझाई हुई सादगी को छोड़ चुके हैं, तब कोई सादगी की बात करने वाला सामने आया है, तो हम ऐसे अरविंद केजरीवाल को इस हौसले को कायम रखने के लिए, और देश भर में छाए हुए सामंतवाद पर झाड़ू चलाने के लिए शुभकामनाएं देते हैं। 

इस देश में इंसानी भावनाओं को चोट पहुंचाने के खिलाफ भी कोई कानून है?

24 दिसंबर 2013
संपादकीय
धर्मों से भरे हुए हिन्दुस्तान में एक बड़ा सख्त कानून है, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आस्तिक है, लेकिन कम से कम थोड़ा सा समझदार हिस्सा तो ऐसा भी होगा जो कि नास्तिक होगा। और ऐसे नास्तिक लोग धार्मिक भावनाओं को ठेस से बचाने के लिए बनाए गए कानून का कभी इस्तेमाल नहीं कर सकते। लेकिन इंसानों के रूप में इनकी जो भावनाएं हैं, उनको लगने वाली ठेस पर क्या कोई कानून है? धर्म से परे, इंसानियत कही जाने वाली, बातों को लेकर क्या किसी बकवासी के खिलाफ ऐसा मुकदमा चल सकता है कि उसने हिन्दुस्तान के इंसानों की इंसानी भावनाओं को ठेस पहुंचाई है? या फिर सामने मौजूद इंसानों को ठेस लगना मानो हो ही नहीं सकता, और नामौजूद ईश्वर को ही ठेस लग सकती है, उसे मानने वालों के मार्फत? 
हमारे मन में यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि जिस उत्तरप्रदेश सरकार की नालायकी की वजह से, और साथ-साथ कुछ साम्प्रदायिक ताकतों की साजिश की वजह से भी वहां मुजफ्फरनगर में जो भयानक दंगे हुए, और उसके शिकार हुए गरीब मुस्लिम जिस तरह से आज महीनों बाद भी सर्द आसमान तले शिविरों में पड़े हैं, दम तोड़ रहे हैं, और जिनको अपने घर लौटने का कोई आसार नहीं दिख रहा है, उनको इसी उत्तरप्रदेश सरकार के मुखिया के बाप मुलायम सिंह यादव एक साजिश कह रहे हैं। जिन्होंने अपनी जिंदगियां खोईं, अपनी लड़कियों की इज्जत और देह खोई, जिन्होंने घर और कारोबार खोए, और अब जो दंगा राहत शिविरों में अपने बच्चों को खो रहे हैं, उनको अगर कोई उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को बदनाम करने की साजिश कह रहा है, तो ऐसे हिंसक और हैवानी बयान से हमारे जैसे लोगों की इंसानी कही जाने वाली भावनाओं को ठेस पहुंच रही है, किसी की धार्मिक भावनाओं को जितनी ठेस पहुंच सकती है, उससे हजार गुना अधिक पहुंच रही है, लेकिन क्या हम जैसे लोगों के लिए कोई कानून है? मुजफ्फरनगर के दंगों के शिकार इन लोगों के जख्मों से हमारी तकलीफ का कोई मुकाबला नहीं हो सकता। लेकिन थोड़ी-बहुत जितनी भी तकलीफ हम जैसे नास्तिक लोगों को है, इंसानी कही जाने वाली सोच रखने वालों को है, कमजोर को इंसाफ दिलाने वालों को है, क्या उस तकलीफ को लेकर मुलायम सिंह यादव पर मानवीय कही जाने वाली भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई मुकदमा चल सकता है? 
समाजवादी होने का दावा करने वाले, धर्मनिरपेक्षता का दिखावा करने वाले, देश के सबसे बड़े कुनबापरस्त, और अनुपातहीन संपत्ति के मामलों से घिरे हुए मुलायम सिंह यादव अपने ही बेटे के राज की नाकामी के बाद अब तोहमत का घड़ा अगर दम तोड़ते मुसलमानों के सिर फोड़ रहे हैं, उनको साजिश बता रहे हैं, तो फिर वे किस मुंह से मुसलमानों के रहनुमा होने का दावा भी करते हैं? दरअसल वे जो कुछ होने का दावा करते हैं, उस तमाम सोच पर वे ऐसे बयान के साथ वे सिर्फ शौच कर रहे हैं। इस देश में कल के दिन अगर साम्प्रदायिक ताकतों का राज आता है, तो उसके लिए उनकी कामयाबी के सिर पर सेहरा बांधना सही नहीं होगा, उसके लिए समाजवादी पार्टी, या ऐसी दूसरी कई स्वघोषित साम्प्रदायिकता-विरोधी पार्टियों के मुंह पर कालिख पोतना सही होगा। लोकतंत्र के चुनावों में जीत और हार ये अलग-अलग नहीं चलते, इनका ऊपर-नीचे होना बच्चों के किसी खेल के बगीचे के सी-सा सरीखा होता है, जिसमें जब कुछ ताकतें अपने खुद के बोझ से नीचे गिरने लगती हैं, तो उनकी विरोधी ताकतें बिना किसी कोशिश के भी ऊपर आसमान की तरफ पहुंच जाती हैं। तब देश में मुलायम सिंह यादव और उनके कुनबे की पार्टी और सरकार इस बात पर आमादा हैं कि देश में धर्मनिरपेक्षता की साख गड्ढे की तरफ जाए, और उनके सारे जुबानी जमा-खर्च के बाद भी, धर्मनिरपेक्षता की विरोधी ताकतें ऊपर ही जाती रहें। 
हमारा यह भी मानना है कि देश की बड़ी अदालतें इस दंगा राहत शिविर में सरकारी नाकामयाबी को रोजाना देख रही हैं, उत्तरप्रदेश की सपा सरकार को लगातार नोटिस जारी करके जवाब मांग रही हैं, वहां होती बच्चों की मौतों पर फिक्र जता रही हैं, और लगातार वहां की जिंदगियों की निगरानी कर रही हैं। हमारा यह मानना है कि ऐसी अदालतों में अगर जज अपनी जिम्मेदारी पूरी करते हैं, तो उनको तुरंत ही मुलायम सिंह यादव को कटघरे में बुलाकर उनसे पूछना चाहिए कि ऐसे दम तोड़ते, तकलीफ में जीते, बच्चे गंवाते लोगों को राजनीतिक साजिश कहने के लिए उनके पास क्या सुबूत हैं? आज दंगों के शिकार, सब कुछ खो चुके ये बेजुबान लोग खुद शायद सत्तारूढ़ ताकतवर तबकों के खिलाफ अदालत न जा सकें, लेकिन लोकतंत्र में यह अदालतों की जिम्मेदारी होती है, कि वे तानाशाह हो चुके, हैवान कहे जाने वाले लोगों सरीखे बर्ताव करने वाले, इंसानी कही जाने वाली भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले बयान देने वालों को कानून समझाए। 
क्या मुलायम सिंह यादव ऐसा बयान किसी अदालत के खिलाफ देकर कटघरे के बाहर रह सकते थे? और अगर नहीं, तो फिर ऐसी अदालतों की निगरानी में कुछ जिंदा बचते, और कुछ मरते लोगों को अगर साजिश कहा जा रहा है, तो क्या यह एक किस्म से अदालत और देश के कानून की तौहीन नहीं है? इस देश में लोकतंत्र से इंसाफ न पाने वाले लोगों की इस किस्म की बेइज्जती पूरे लोकतंत्र की बेइज्जती है, और जो राजनीतिक ताकतें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुलायमों के साथ जुड़ती हैं, उनको यह समझ लेना चाहिए कि ऐसे हिंसक और अपराधी बयान पर अगर वे खुलकर ऐसे मुलायमों के खिलाफ नहीं आते हैं, तो वे ऐसी हिंसा में हिस्सेदार रहते हैं। कांग्रेस से लेकर वामपंथी दलों तक, मुलायम के सारे हिमायतियों के नाम इस बयान के बाद चुप्पी के लिए भी इतिहास में दर्ज हो सकते हैं। 

बात की बात, Bat ke bat


अरविंद केजरीवाल पर शक करने वाले हिकारती लोगों से...

23 दिसंबर 2013
संपादकीय
अब जब कई दिनों के असमंजस के बाद, धुंध छंटी, और अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, तो हिन्दुस्तान का बड़बोला तबका, और परंपरागत राजनीतिक दल, सभी लोग अपने तमाम शक-शुबहों के साथ, अटकलबाजी के साथ, और  आम आदमी पार्टी को मानो नाकामयाब देखने की हसरत के साथ जुबानी हमलों में जुट गए हैं। कुछ लोग इस बात को अनैतिक मान रहे हैं कि जिस कांग्रेस पार्टी के खिलाफ केजरीवाल यह चुनाव जीता, आज उसी की बाहरी मदद से वे सरकार बना रहे हैं। जितने मुंह उतनी बातें, और मुंह जितने बड़े, बातें उतनी ही कड़वीं। 
भारतीय राजनीति में सड़क से सीधे विधानसभा तक पहुंचने वाली आम आदमी पार्टी से सहमति, या असहमति, एक अलग बात है। लेकिन इस संसदीय लोकतंत्र में नौजवानों की इस पार्टी ने चुनावों से लेकर राजनीति के मुद्दों तक, तौर-तरीकों तक, आम जनता की भागीदारी की सोच तक, हर बात में ठहरे हुए पानी की परंपरागत तस्वीर को मानो कई टप्पे खाने वाले, उछाले हुए पत्थर के अंदाज में, एकदम से अशांत कर दिया है। और यह शांति बहुत लोकतांत्रिक या संसदीय शांति नहीं थी। यह कुनबापरस्ती, चोरी-डकैती और बेईमानी, भ्रष्टाचार और हिंसा से बनाई गई शांति थी। वह ठहरा हुआ पानी अधिकतर पुरानी और जमी हुई पार्टियों को माकूल बैठता था। इसलिए अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाला यह विशाल पाखंड किसी फेरबदल की सोच भी नहीं रहा था, और अब नौजवानों की एक टोली ने आकर इस पाखंड को खंड-खंड करने की एक कोशिश की है, तो हर पाखंडी अपने शक लेकर सड़कों पर है, इंटरनेट पर है, मीडिया में है। 
अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने जनता से चाहे आसमान छूते वायदे क्यों न किए हों, आज दिल्ली में जब जनता ने एक खंडित मत से उन्हीं के सामने यह मौका रखा है, और उनके कंधों पर यह जिम्मेदारी रखी है कि वे सरकार चलाएं, तो उनको काम करने का एक मौका देना चाहिए। यह मौका भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी, और भ्रष्ट हो चुकीं पार्टियों के लिए असुविधा का हो सकता है, क्योंकि ये पार्टियां त्रिशंकु विधानसभा या संसद की नौबत में खरीद-फरोख्त, दल-बदल, पार्टी तोडऩे, या साजिशों की आदी हो चुकी हैं। इनको यह एकदम से बर्दाश्त भी नहीं होने जा रहा कि कल का आया छोकरा देश की राजधानी पर राज करे। और इसके साथ-साथ इन दोनों ही पार्टियों की चुनावी-ठेकेदारियों पर झाड़ू फिर जाने का एक खतरा भी है, क्योंकि जैसा कि अरविंद केजरीवाल ने कहा है, सरकार चलाने में कोई रॉकेट साईंस नहीं लगता, आम आदमी पार्टी एक अच्छी सरकार चला सकती है। यह एक और बात होगी कि वह अच्छे लंबे समय तक सरकार चला सकती है, या नहीं, यह उसके अपने हाथ में नहीं है। भारतीय देश-प्रदेश में ऐसी नौबत आने पर बाहरी या भीतरी समर्थन देने वालों को उसकी घोषित या अघोषित कीमत देने की जो लंबी परंपरा रही है, उसे तोड़ते हुए आम आदमी पार्टी को अपनी घोषित नीतियों के मुताबिक सरकार चलानी चाहिए, और फिर वह चाहे जितने हफ्ते या महीने चले।
आज के इस मौके पर भाजपा और कांग्रेस के जो नेता, जो अखबारनवीस, जो बड़बोले-अक्लमंद लोग बिना मौका दिए अभी से केजरीवाल को कोसना शुरू कर रहे हैं, वे अपनी खुद की तस्वीर बिगाड़ रहे हैं। लोकतंत्र का तो नाम ही विविधता के बीच सहमति है, सहनशक्ति है, और जनहित में मिलकर काम करना है। इसलिए इस देश की सड़ चुकी राजनीति के बीच ताजी हवा का एक झोंका अगर आया है, तो उसे दिल्ली में बेबुनियाद खारिज करने वाली पार्टियां, देश भर में झाड़ू खाएंगी। आज का वक्त जनता के मन की उस नफरत को समझने का है, जो कि लोकतंत्र के ठेकेदार-कुनबों को उखाड़कर फेंकने पर आमादा है, और उसके लिए काफी भी है। इस बदले हुए हालात को आंकते हुए लोगों को चाहिए कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को काम करने का एक मौका दे, ऐसा मौका देने के बाद उनकी कामयाबी की तो कोई गारंटी नहीं है, लेकिन ऐसा मौका न देने पर धोखा देने वाली पार्टियों की बाकी जगहों पर चुनावी नाकामयाबी अधिक दिखती है।

मोदी-राहुल मुकाबला, जाहिर से परे भी देखने की जहमत की जरूरत

22 दिसंबर 2013
संपादकीय
कांग्रेस के घोषित या अघोषित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी राहुल गांधी ने कल देश के उद्योगपतियों के सामने अर्थव्यवस्था के बारे में अपनी बात रखी। और शायद जो बात भारत के कारखानेदारों को सबसे अधिक परेशान कर रही है, उसे हवा से हटाने के लिए केन्द्र सरकार के न सिर्फ पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को हटा दिया गया, बल्कि उसका जिम्मा एक ऐसे पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली को दिया गया, जो कि कारखानों के हिमायती माने जा रहे हैं, और जिनकी तरफ से रिलायंस को मिल रही रियायत पर वामपंथी सांसद लगातार प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को लिख रहे हैं। राहुल गांधी उद्योगपतियों के बीच पहुंचें, उसके ठीक पहले का यह फेरबदल बहुत अनायास और मासूम नहीं लगता है। यह उस उद्योग जगत की शिकायत कम करने का एक तरीका लगता है, जो कि आज मोदी के साथ समझा जा रहा है। यूपीए सरकार की तरफ से पर्यावरण के मुद्दों पर कारखानों और खदानों को, कई दूसरे तरह के प्रोजेक्टों को मिलने वाली मंजूरी में होने वाली देरी को लेकर ऐसा माना जा रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था चौपट होने में इसका खासा हिस्सा रहा है। इसलिए अगर उद्योगपति और कारोबारी उद्योग-मित्र समझे जाने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री देखना चाहते भी हैं, तो यह कारखानों-कारोबार के अपने अस्तित्व का सवाल भी है। 
अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनाव के लिए सीधा मुकाबला शुरू हो गया है, और भाजपा के पास अब कुछ नया साबित करने की कोई चुनौती नहीं बची है। एक पार्टी के रूप में उसने चार बड़े राज्यों में अपनी ताकत साबित कर दी है, और उसके प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी पूरी पार्टी से ऊपर जाकर, अपने आपको एक सबसे कामयाब नेता साबित करने में लगे हुए हैं, जिसमें उनको अधिक मेहनत भी नहीं करनी पड़ रही है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी व्यक्तित्वों के टकराव में मोदी से पिछड़ते दिख रही है, लेकिन जैसा कि क्रिकेट के खेल में होता है, आखिरी ओवर की आखिरी बॉल तक उम्मीद छोडऩे की जरूरत नहीं होती, वैसा ही अभी यूपीए को चुनाव मैदान छोडऩे की कोई जरूरत नहीं है, न ही हौसला छोडऩे की जरूरत है। 
ऊपर लिखी गई इस तस्वीर के सामने अब हम देश के नक्शे को रखकर देखते हैं, और राजनीतिक विश्लेषण करते हैं, तो ऐसा लगता है कि देश का नक्शा इन व्यक्तित्वों के कद के फर्क के बजाय एक दूसरे किस्म का फर्क भी सामने रख सकता है। देश के दो बड़े गठबंधनों के रूप में यूपीए और एनडीए के बीच का मुकाबला देश के कुछ राज्यों में तो आज साफ है, लेकिन बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर ताकतवर पार्टियां आज इन दोनों गठबंधनों से बाहर हैं। और ऐसे माहौल में जब कहीं त्रिकोण, तो कहीं चौकोन चुनाव होंगे, तो उनके नतीजों में से यूपीए और एनडीए का साथ देने वाले किस तरह के कितने लोग होंगे, यह तस्वीर अभी साफ नहीं है। और फिर यह भी साफ नहीं है कि उन नतीजों में जीतकर आने वाली पार्टियों में से कौन सी एनडीए के भीतर नरेन्द्र मोदी के नाम पर असहमत होंगी, और शायद किसी और नाम पर वे एनडीए में आने पर सहमत भी हो जाएंगी? इस तरह आज के चुनावी माहौल को सिर्फ मोदी और राहुल, कांग्रेस और भाजपा, इनके बीच की सीधी लड़ाई मानकर चलना ठीक नहीं होगा। ये दोनों पार्टियां देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां बनकर सामने आएंगी, लेकिन इनके गठबंधन अपने खुद के बूते शायद अगली केन्द्र सरकार न बना सकें। 
इसलिए जो लोग आज यूपीए के लिए उम्मीद पूरी छोड़ चुके हैं, उनको बहुत से ऐसे राज्यों की पार्टियों को देखना चाहिए, जो कि मोदी की अगुवाई वाले एनडीए में शायद जाना न चाहें। आज इन दो गठबंधनों के बाहर जो सीटें दिख रही हैं, वे काफी अधिक हैं, और वे गठबंधन, पार्टी, और नेता को लेकर पसंद और नापसंद पर आज अपनी राय खुलकर सामने रख भी नहीं रही हैं। कल तक यह किसने सोचा था कि जिस कांग्रेस सत्ता को अरविंद केजरीवाल ने उखाड़ फेंका है, जिस कांग्रेस कुनबे को देश के इतिहास में सबसे अधिक केजरीवाल ने कोसा है, आज वही केजरीवाल कांग्रेस के समर्थन से देश की राजधानी में सरकार बना सकता है? आज हिन्दीभाषी भारत पर केन्द्रित मीडिया जो तस्वीर पेश कर रहा है, वह भारत की आधी तस्वीर भी नहीं है। और इस आधी तस्वीर में भी आधी से अधिक ताकतें मोदी और राहुल के टकराव का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए मीडिया को जो टकराव पेश करने में आज आसान पड़ रहा है, वह टकराव हो सकता है कि 2014 में भारत की अगली सरकार बनाने में काम न आए, और तबका सत्तारूढ़ गठबंधन इन दो लोगों से परे, गठबंधन के दूसरे मुद्दों पर बने। लोगों के साथ दिक्कत दरअसल यह है कि जो विकल्प सबसे अधिक आसानी से सामने पेश हैं, उनसे परे जाने की जहमत लोग आमतौर पर नहीं उठाते। और जिंदगी की हकीकत तो यह होती है कि शब्दों के बीच के खाली फासले के भी मायने होते हैं, और उस मतलब को निकाले बिना सही मतलब नहीं निकल पाता। इसलिए आज हम यहां पर सिर्फ एक सिरा शुरू करके छोड़ रहे हैं, कि टीवी के पर्दे का लोकप्रिय टकराव, 2014 का निर्णायक टकराव शायद न भी हो। लोगों को जाहिर से परे देखने की जहमत भी उठानी चाहिए। 

बात की बात, Bat ke bat

21 dec 2013

21 dec 2013

चाहे न्यूयॉर्क से शुरू हुई हो, घरेलू कामगारों पर यहां भी चर्चा और कानून की जरूरत

21 दिसंबर 2013
संपादकीय

बड़े शहरों में जब बड़े जुर्म होते हैं, तो उनकी गूंज बाकी दुनिया में भी फैलती है। दिल्ली में एक ऐसा बलात्कार हुआ, जिसने पूरे हिंदुस्तान को झकझोर कर रख दिया। देश में नया कानून बना, हजार करोड़ का एक निर्भया फंड बना, और भी बहुत कुछ हुआ, संसद से लेकर सरकार तक, और अदालतों से लेकर मीडिया तक, महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन-हमलों पर लोगों की सोच बदली, एक नई जागरूकता आई। कुछ लोग इसे शहर-केंद्रित, या राजधानी-केंद्रित सोच भी कह सकते हैं, लेकिन हम अभी उस पर न जाकर यह देख रहे हैं कि ऐसे मामलों का असर कहां तक होता है, और क्या-क्या होता है। ऐसा ही एक मामला है अमरीका में एक भारतीय अफसर पर वहां के कानून के तहत दर्ज मुकदमे का, जिसमें उसे घरेलू कामगार के शोषण का कुसूरवार करार दिया गया है। वहां पर भारतीय और बाकी देशों के ऐसे घरेलू कामगार प्रदर्शन भी कर रहे हैं, और यह पूछ भी रहे हैं कि भारत सरकार सिर्फ अपने आरोपी अफसर को बचाने में क्यों लगी है, और भारत की ही नागरिक, शोषण की शिकार, शिकायतकर्ता के हक भारत सरकार के लिए मायने क्यों नहीं रखते हैं?
इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम आज भारत में घरेलू कामगारों की हालत पर कुछ चर्चा करना चाहते हैं। देश भर में यह सबसे बड़े असंगठित मजदूर-कर्मचारी तबकों में से एक है, और ऐसे करोड़ों लोग सरकार के किसी कानून के तहत न कोई हिफाजत पाते, न कोई हक पाते। उनकी तनख्वाह को लेकर कोई कानून नहीं है, काम के घंटे, हफ्तावार छुट्टी जैसी कोई बात भी नहीं है। देश के मजदूर संगठनों की नजरों में भी घरेलू कामगार शायद मौजूद नहीं हैं, इसलिए इस असंगठित वर्ग की जरूरतों पर कोई चर्चा भी नहीं होती। यही तबका बाल मजदूरों का भी है, बंधुआ मजदूरों का भी है, हिंसा का शिकार भी है, और देह-शोषण का सबसे बड़ा खतरा भी झेलता है। आज हिंदुस्तान में घरेलू कामगारों की हालत अधिक चर्चा की जरूरत है, और ऐसा न करके राज्य सरकारें और केंद्र सरकार ऐसे कामगारों के मध्यम और उच्च वर्गीय लोगों पर तो मेहरबानी कर रही है, लेकिन उनसे अधिक बड़ी संख्या में जो कामगार और मजदूर हैं, उनको अनदेखा भी कर रही है।
 भारत में मजदूर संगठनों की एक दिक्कत यह भी है कि वे संगठित मजदूरों के आसानी से पहचाने जाने वाले तबके पर परजीवी की तरह पलते हैं, और उसी संगठित मजदूर आंदोलन को वे अपनी जिम्मेदारी और कामयाबी दोनों बताते हैं। देश में निजीकरण के साथ-साथ मजदूर आंदोलन कमजोर हुआ, और आर्थिक मंदी के साथ-साथ वह एक किस्म से अप्रासंगिक सा हो चला है। जबकि जरूरत की हकीकत इसके ठीक उल्टे है, और जैसी-जैसी सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र का दखल कारखानों-कारोबारों से कम होते चल रहा है, वैसे-वैसे निजी शोषण के खिलाफ मजदूर आंदोलन की जरूरत पहले के मुकाबले अधिक है। इसी तरह घरेलू कामगारों जैसे बड़े तबके को संगठित करने की भी जरूरत है ताकि लोग अपने आराम के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दूसरों की मजदूरी का सही दाम देने पर मजबूर किए जाएं। आज लोगों के गंदे कपड़ों को धोने, उनके जूठे बर्तनों को मांजने, उनकी फर्श पोंछने वाले लोगों को भी साधारण मजदूरी भी नसीब नहीं होती है। इसी तरह जब सरकार कर्मचारियों को बढ़ी हुई तनख्वाह मिलती है, तो वे अपने कामगारों को अधिक तनख्वाह देने की जरूरत नहीं समझते। 
न्यूयॉर्क से ही सही, जागरूकता का मुद्दा कहीं से भी शुरू हो, उस पर आगे बात होनी चाहिए। और भारत के भीतर के घरेलू कामगारों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, ऐसा इसलिए भी अधिक जरूरी है क्योंकि समाज में जाति, ओहदे, और कमाई की वजह से जो तबके ताकतवर हैं, वे कभी भी ऐसी जिम्मेदारी न खुद निभाते, न ही वे चाहते कि सरकार ऐसा कुछ करे। बिना किसी छुट्टी या रियायत, बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने वाले घरेलू कामगारों को भी इंसान और भारतीय नागरिक समझने की जरूरत है।

लोकपाल और बच्चापाल, आज असली दलित कौन?

20 दिसंबर 2013
संपादकीय
अमरीका में भारतीय विदेश सेवा की एक अफसर के साथ वहां की सरकार के बर्ताव को लेकर भारत उबला हुआ है। अमरीका की शक्ल में भारत को एक ऐसा दुश्मन दिख रहा है जिसके पुतले को सड़कों पर घसीटकर अपने देश के लोगों की भावनाओं को भड़काकर, और फिर शांत किया जा सकता है। भारत सरकार वही कर रही है, जो कि सरकार चलाने की जिम्मेदारी से परे का भारतीय विपक्ष कर रहा है। और भारत के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सभी तरह के द्विपक्षीय मामलों में एकदम से राष्ट्रवादी रूख लेने का आदी हो गया है, इस नाते वह भी यूपीए सरकार, कांग्रेस, भाजपा, दलित नेताओं के साथ-साथ खुद भी लाठी लिए हुए अमरीका पर पिल पड़ा है। इस पूरी भीड़ में वह आवाज कहीं खो गई है, जिसके बारे में दो दिन पहले ही हमने इसी जगह पर एक संपादकीय लिखा था। आज उस पर दुबारा लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि भारत में इन दिनों चल रहे एक दूसरे मुद्दे लोकपाल से उसका लेना-देना है। 
जिस लोकपाल के लिए यही पूरा का पूरा यूपीए, यही कांग्रेस पार्टी, यही भारतीय विपक्षी पार्टियां, यही मीडिया, और यही सामाजिक आंदोलनकारी, सारे के सारे लोग लगे हुए थे, वह क्या है? सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए नेताओं और अफसरों के भ्रष्टाचार के मामलों पर मौजूदा कानून नाकाफी साबित हो रहे थे, इसलिए यह एक नया अधिक ताकतवर लोकपाल खड़ा किया गया है। इसका काम ही ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोगों के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करना है। अब हम अमरीका में इस भारतीय अफसर पर हुई कार्रवाई को देखें, उसके ओहदे को देखें, और उसके खिलाफ शिकायत करने वाली भारतीय नागरिक एक घरेलू नौकरानी को देखें, तो ऐसा लगता है कि लोकपाल के लिए पहला मामला तो यही सामने खड़ा हुआ है जिसमें भारतीय विदेश सेवा की एक अफसर घरेलू नौकरानी के शोषण का मामला झेल रही है। इस देश की पूरी सरकार आज अमरीकी कार्रवाई के तौर-तरीकों को लेकर एक युद्धोन्माद के अंदाज में खड़ी हुई है, और दिल्ली में अमरीकी दूतावास के सामने से अमरीकी रंगों वाले डिवाइडरों को इस तरह घसीट रही है, मानो अमरीका को घसीट रही हो। 
लोकपाल पास करते-करते यह संसद भारत की इस दलित महिला अफसर के साथ अमरीका में हुए सुलूक पर फिक्र करने लगी, उसके खिलाफ नाराजगी दिखाने लगी। लेकिन हमको इस सुलूक के पीछे की कानूनी वजह जो घरेलू नौकरानी है, और जो किसी राजनयिक के मुकाबले बिल्कुल ही बेआवाज, कमजोर कर्मचारी है, उसके हकों की बात करते कोई नहीं दिख रहा। न तो अचानक ही लोकपाल का झंडा उठा लेेने वाले राहुल गांधी की नजर में इस नौकरानी की जगह दिख रही, न केन्द्र सरकार को यह नौकरानी अपने देश की नागरिक लग रही, और न ही विपक्ष को इससे कोई लेना-देना रह गया। यह पूरा मामला एक दूसरे देश को दुश्मन करार देकर उस पर हमले करने का हो गया है, लेकिन दूसरी तरफ जो दुश्मन भारतीय समाज के भीतर है, उसके बारे में कोई बात न करना, जुबानदार ताकतवर तबके के लिए वर्गहित की बात है। घरेलू नौकरानियों का कोई संगठन देश भर में नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर अमरीका के खिलाफ बयान जारी करने के लिए भारतीय विदेश सेवा अधिकारी संघ तो सामने आ गया है, लेकिन इसी नौकरानी की तरह जो और हजारों कर्मचारी दूसरे देशों में इसी तरह भारतीय राजनयिकों, और विदेश सेवा के अफसरों के शिकार हैं, उनके हाथों पिस रहे हैं, उनकी बात भी अभी तक सरकार या विपक्ष की जुबान पर भी नहीं है। सत्ता पर बैठे जुबानदार-ताकतवर लोग इस बात को बहुत सहूलियत के साथ भुला चुके हैं कि इसी अमरीका में पिछले दो बरसों में कम से कम दो और राजनयिक अपनी घरेलू नौकरानी के ऐसे ही शोषण के मामले झेल चुके हैं। 
यह हिन्दुस्तान अपने देश के भीतर घरेलू नौकर-नौकरानियों को न तो कोई हक दिला सका है, न ही उनके लिए कोई कानून बना सका है, और इस हिन्दुस्तान को अमरीका में ऐसे कमजोर तबके के हक के लिए बने हुए कानून के इस्तेमाल पर हर किस्म की कूटनीतिक रियायतें याद पड़ रही हैं। हम अमरीकी सरकार द्वारा भारत के किसी अफसर के खिलाफ की गई किसी बदसलूकी के साबित होने पर उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई के हिमायती हैं। हम इस बात के भी हिमायती हैं कि पहली नजर में अगर ज्यादती लगती है तो भी भारत को अपनी इस अफसर के हकों को लेकर अमरीका में विरोध दर्ज करना चाहिए। लेकिन भारत के आला अफसरों के हाथों अगर भारत के गरीब और कमजोर लोगों का शोषण हो रहा है, तो ऐसी शिकायतें कई महीने पहले मिलने के बाद भारत सरकार को खुद होकर इस पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। 
जैसे ताकतवर तबके के गलत कामों पर मौजूदा कानून को नाकाफी मानते हुए लोकपाल नाम की नई संस्था का कानून बन रहा है, और जिस लोकपाल को बनाने की वाहवाही में अपने आपको हकदार बताते हुए कांग्रेस से लेकर भाजपा तक हर कोई दावा कर रहे हैं, ऐसे ही दावेदार इसी हिन्दुस्तान की एक बच्चापाल नौकरानी के शोषण पर उसे पूरी तरह अनदेखा कर रहे हैं। यह सोच साबित करती है कि हिन्दुस्तान में सत्तारूढ़ तबका किस तरह एक है, और सत्तारूढ़ ताकतवर दलित को एक कमजोर दलित मानने की जरूरत नहीं है, उसके बजाय एक कमजोर और गरीब नौकरानी अपने हकों को लेकर सचमुच की दलित है। 

खरीद-बिक्री पर चलते भारतीय संसदीय लोकतंत्र में नया झोंका

19 दिसंबर 2013
संपादकीय
दिल्ली में सरकार बनाने की दहलीज पर खड़े हुए अरविंद केजरीवाल जिस तरह से एक अभूतपूर्व और विशाल जनमतसंग्रह करके यह मालूम करने की कोशिश कर रहे हैं उसे देखकर लोगों को अटपटा लग रहा है कि हर बात पर जनता से पूछने का यह कौन सा तरीका है? और राजनीतिक दल यह सवाल कर रहे हैं कि अगर सरकार बनाने की ताकत नहीं थी, तो फिर आप पार्टी ने चुनाव क्यों लड़ा था?
लेकिन अगर भारत के संसदीय इतिहास को देखें तो बहुत से राज्यों में ऐसी नौबत आने पर विधायकों की थोक में खरीदी हुई, दल-बदल हुए, राजभवनों से साजिशें हुईं, और मामले-मुकदमे बने। इससे ठीक उलटे आप ने ऐसी कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई, और बात-बात में जनता की राय लेने की अपनी सोच को यहां भी जारी रखा है। जिस संसदीय लोकतंत्र में खरीदी-बिक्री को देश की सबसे बड़ी अदालत भी सजा नहीं दे पाई, उस लोकतंत्र में अगर आज कोई नाटक के लिए ही सही, जनता के बीच जाने की बात करते हैं, तो यह सांसदों और विधायकों की खरीद-बिक्री के मुकाबले एक साफ-सुथरा काम है, बेहतर तरीका है, और लोकतांत्रिक है। केजरीवाल ने भारतीय लोकतंत्र में चले आ रहे बहुत से तौर-तरीकों को तोड़ा है, और इसकी वजह से कई लोगों को लगता है कि वे नाटक जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं। 
हमको भी अक्सर यह लगता है कि वे अपनी सोच को जरूरत से ज्यादा शब्दों में कहते हैं, अपने अलावा बाकी पूरी दुनिया को बेईमान और भ्रष्ट कहते हैं, और इसकी ताजा मिसाल है उनका यह कहना कि अन्ना और आप के बीच मतभेद पैदा करने के लिए कुछ ताकतें सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च कर रही हैं। अब अगर सैकड़ों करोड़ खर्च हो रहे हैं, तो ऐसा खर्च करने वाले लोग भी भ्रष्ट और बेईमान होंगे, और इस खर्च का फायदा पाने वाले लोग भी उसी दर्जे में आएंगे। लेकिन केजरीवाल या किसी और के पास ऐसे कोई सुबूत नहीं हैं। यह बात घोर अविश्वनीय भी लगती है कि अन्ना हजारे सैकड़ों करोड़ के चक्कर में आकर लोकपाल के मौजूदा मसौदे से संतुष्ट हो जाएंगे, और राहुल गांधी की तारीफ करने लगेंगे। अन्ना की बहुत सी बातों से असहमत रहते हुए भी हमारा यह मानना है कि उनके बारे में ऐसा कोई इशारा करना केजरीवाल की बेइंसाफी है, और जैसा कि हमने कुछ दिन पहले ही यहां लिखा था, केजरीवाल को अन्ना से अपने भूतपूर्व संबंधों और भूतपूर्व प्रेम से परे देखना चाहिए। 
लेकिन जिन लोगों को यह लग रहा है कि दिल्ली में सरकार बनने में यह लंबी देर लग रही है, उनको केजरीवाल के तौर-तरीकों को बर्दाश्त इसलिए करना चाहिए, कि वे कम से कम खरीद-फरोख्त से सरकार नहीं बना रहे, वे अब तक भ्रष्टाचार के आरोपों से बचे हुए हैं, और भारत की राजनीति में यह एक ताजी हवा का झोंका है। लेकिन हम आज उनके तौर-तरीकों के बारे में जब लिख रहे हैं, तो उनको भी यह बात समझनी चाहिए कि जनता का फैसला एक बार हो जाने के बाद संसदीय लोकतंत्र में हर मुद्दे पर फिर जनमतसंग्रह के लिए दौडऩा, संसदीय लोकतंत्र के तालमेल और आपसी समझ, सामूहिक जनकल्याण के विकल्पों को अछूत मानने जैसा है। अपनी छवि और अपनी साख को बाकी राजनीतिक दलों से ऊपर रखने के लिए, बिल्कुल बेदाग रखने के लिए वे जनता से राय मांगने का जो काम कर रहे हैं, वह बेमतलब है। उनको ऐसा करने का हक तो पूरा है, लेकिन यह सिलसिला उनकी लोकप्रियता को ही खत्म करेगा, और इससे धीरे-धीरे संसदीय लोकतंत्र में उनको बाकी पार्टियों के मजबूरी और बेबसी के मिल रहे समर्थन की संभावना भी खत्म हो जाएगी। लोकतंत्र में एक-दूसरे को अछूत मानकर राजनीति नहीं की जा सकती। नीतियों और सिद्धांतों का विरोध एक अलग बात होती है, लेकिन व्यापक जनकल्याण के लिए लोगों को साथ आकर काम करना आना चाहिए, और अरविंद केजरीवाल अभी इस बात को सीखने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। फिलहाल खरीद-बिक्री पर चलता भारत का संसदीय लोकतंत्र यह एक नया ढर्रा देख रहा है, और आगे इसका क्या होता है, यह आने वाले दिन बताएंगे।

अमरीका में भारतीय अफसर से बर्ताव के कई पहलू

18 दिसंबर 2013
संपादकीय
भारत की विदेश सेवा की एक महिला अधिकारी पर अमरीका में हुई सरकारी कार्रवाई को लेकर इन दोनों देशों के बीच राजनयिक तनातनी हो गई है, और भारत में इसे लेकर खासी नाराजगी है। इसके खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए भारत ने यहां मौजूद अमरीकी राजनयिकों, और अमरीकी सरकार के यहां के कर्मचारियों को दी गई ऐसी खास रियायतें वापिस ले ली हैं, जो कि अमरीका में भारत सरकार के लोगों को मिलती ही नहीं थीं। लेकिन यह पूरा मामला इस तनातनी से परे कुछ दूसरे पहलुओं से जुड़ा हुआ भी है। 
जिस महिला अधिकारी की बात हो रही है, उस पर अमरीका में यह आरोप लगाया गया है कि उसने घरेलू काम के लिए भारत से वहां ले जाई गई नौकरानी को वहां के न्यूनतम मजदूरी कानून से कम तनख्वाह दी, लेकिन उसके वीजा कागजात में तनख्वाह अधिक दिखाई। अभी की खबरों में जो जानकारी आई हैं उनके मुताबिक विदेश सेवा की इस अफसर के खिलाफ इस नौकरानी ने शिकायत की थी, इस पर वहां की सरकार ने कार्रवाई की। अब यह विवाद इस मुद्दे को छोड़कर, इन पहलुओं से घिर गया है, कि गिरफ्तारी होनी थी या नहीं? इस अफसर को कूटनीतिक छूट हासिल थी या नहीं? घरेलू नौकरानी के मामले में यह छूट लागू होती है या नहीं? उसे कब, कैसे, कहां से गिरफ्तार किया गया, उसकी तलाशी कैसे ली गई, उसे हिरासत में किन दूसरे लोगों के साथ रखा गया? अभी भारत सरकार, संसद, पार्टियों, इन सबकी फिक्र इन्हीं पहलुओं पर है। और इस नौकरानी के हकों की बात अभी छुई भी नहीं जा रही, कि क्या भारतीय विदेश सेवा की एक अधिकारी अपने से कमजोर उस अधिकारी के हक छीन रही थी या नहीं? दूसरी बात यह सामने आई है कि अमरीकी सरकार ने भारतीय दूतावास को महीनों पहले वहां के कानून के इस उल्लंघन के बारे में इस अफसर के बारे में बता दिया था। इसके बाद से अब तक उस नौकरानी के हकों के लिए भारत सरकार ने क्या किया, यह अभी तक साफ नहीं है। लेकिन अगर सही कार्रवाई की गई होती, तो शायद इस महिला अफसर को, और कुछ नहीं तो अमरीकी कार्रवाई से बचाने के लिए, भारत वापिस बुला लिया गया होता। 
भारत सरकार के मंत्रियों से लेकर यहां के राष्ट्रपति रह चुके डॉ. अब्दुल कलाम के साथ भी अमरीका में सुरक्षा जांच को लेकर बदसलूकी की बात पहले उठी है। अमरीका का पूरा बर्ताव बाकी तमाम दुनिया के लिए हिकारत से भरा हुआ हमेशा रहता है। और भारत जैसे देश इस हिकारत के हकदार इसलिए हैं कि इराक पर हमला करने वाले अमरीकी राष्ट्रपति बुश को भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जाकर सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि भारत की जनता उनसे बहुत प्यार करती है। हमारी समझ यह है कि अमरीकी संपन्नता के सपने देखने वाले गिने-चुने हिंदुस्तानियों से परे बाकी हिंदुस्तानी अगर अमरीका को जानते हैं, उसके बारे में सोचते हैं, तो वे उससे सिर्फ नफरत करते हैं। पूरी दुनिया में बेकसूर लोगों को थोक में मारने वाले अमरीका के बारे में चापलूसी का ऐसा झूठ बोलने वाले भारतीय प्रधानमंत्री अपने देश को अमरीकी बदसलूकी के लिए पेश भी कर देता है। कल दिल्ली में भारत सरकार ने जिस अंदाज में अमरीका पर जवाबी हमले करने के नाम पर अमरीकी दूतावास के बाहर से सड़क को घेरने वाले कांक्रीट-ब्लॉक हटाए हैं, वह अमरीकी अहंकार की चट्टान पर कंकड़ फेंकने से अधिक कुछ नहीं है।
अमरीकी सरकार ने जो कार्रवाई की है, वह पूरी की पूरी रिकॉर्ड पर है, और उसमें अगर ज्यादतियां हुई हैं, तो उसका विरोध होना चाहिए, उस पर कार्रवाई करनी चाहिए। दूसरी तरफ इस बात की जांच भी जरूरी है कि विदेश सेवा की यह महिला अफसर क्या अमरीकी कानून को तोड़ रही है? क्या वह अपनी मातहत घरेलू नौकरानी को उसके हक से कम भुगतान कर रही थी? दूसरी सरकार की कार्रवाई का विरोध करने के साथ-साथ भारत सरकार को इस पहलू पर भी देखना चाहिए कि क्या उसके अफसरों ने, उसके दूतावास ने सोच-समझकर, जानबूझकर, जानते हुए नियमों को ऐसे तोडऩे का काम किया है? और क्या इस गलती, या गलत काम को समय रहते  सुधारा नहीं जा सकता था, ताकि दो देशों के बीच टाले जा सकने वाले इस तनाव को टाला जाता, और सबको इंसाफ मिलता, लोगों की ऊर्जा इस एक मामले में इतनी अधिक नहीं उलझती। हम अमरीका के बर्ताव को कम बताने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, लेकिन दूसरे देश को एक दुश्मन या निशाने की तरह पेश करके भारत के भीतर अगर नेता और पार्टियां चुनाव के इस माहौल में अपने-आपको अधिक राष्ट्रवादी साबित करने की हड़बड़ी में हैं, तो एक देश के रूप में यह रूख भारत की सेहत के लिए खराब है। 

लोकपाल कानून बनते-बनते उससे जुड़े मुद्दों पर कुछ बातें

17 दिसंबर 2013
संपादकीय
इस वक्त भारतीय संसद में आधी सदी से घिसटते चले आ रहे लोकपाल विधेयक के कानून बनने का आसार दिख रहा है। बड़ी अजीब सी बात है कि जिस कानून के लिए अन्ना हजारे के साथ अरविंद केजरीवाल से लेकर प्रशांत भूषण तक सरकार के खिलाफ लंबा आंदोलन चलाते रहे, उनमें से आज अन्ना यूपीए सरकार के साथ हैं, भाजपा कांग्रेस के साथ है, और केजरीवाल-प्रशांत भूषण अन्ना हजारे के खिलाफ हैं। भारतीय राजनीति में वैसे तो उतार-चढ़ाव चलते रहते हैं, लेकिन इतने बड़े एक सामाजिक आंदोलन का अंत जब इस कानून की शक्ल में होते दिख रहा है, तो इसके लिए चले हुए आंदोलन की वैचारिक बुनियाद आज एक धुंध खड़ी करती है। सरकार सही है, या कि केजरीवाल? अन्ना सही हैं, या कि इतने दशकों तक इस कानून को बनाने की जहमत न उठाने वाली पार्टियां? लेकिन इसके साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की एक मजबूती भी इससे सामने आती है, कि किस तरह सामाजिक आंदोलन सरकार और संसद में एक कानून बनाने के लिए मजबूर कर सकते हैं। 
आज इस मौके पर हमको केजरीवाल-प्रशांत भूषण की यह जिद ठीक नहीं लग रही है कि उनकी मांगों के मुताबिक सारे के सारे प्रावधान लोकपाल कानून में आज ही जोड़ दिए जाएं। अभी देश के संघीय ढांचे की उनकी समझ कुछ कम लगती है, और राज्यों के अधिकारों के बारे में उनके मन में सम्मान भी कुछ कम लगता है, जबकि वे एक राज्य में सरकार बनाने से सिर्फ एक कदम दूर हैं। राज्यों में लोकपाल की कैसी शक्ल हो सकती है, इसे सिर्फ संसद में तय कर लेना ठीक नहीं है, भारतीय लोकतंत्र में राज्यों के अपने दायरे हैं, और उनको विश्वास में लिए बिना उन पर असर डालने वाले कानून को सिर्फ कांग्रेस-भाजपा के बाहुबल से बना लेना ठीक नहीं होगा। दूसरी तरफ केजरीवाल-प्रशांत भूषण यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि भारतीय संसदीय इतिहास में बहुत से कानून ऐसे बने हैं, जिनमें बाद में संशोधन हुए हैं, और यह कोई बहुत मुश्किल काम भी नहीं होता। 
लेकिन आज यहां पर हम बात लोकपाल से ऊपर की भी करना चाहेंगे। इस कानून की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि देश में सत्ता हांकने वाले लोगों के बीच भ्रष्टाचार बहुत ताकतवर हो चुका है। ऐसे में मौजूदा कानून इन भ्रष्ट सत्ताधारियों को छू भी नहीं पा रहा था। और जनता अब ऐसे लोगों से हिकारत करते-करते, नफरत करने लगी थी। इसीलिए अन्ना और केजरीवाल जैसे लोग रातों-रात हाथों-हाथ लिए गए थे, और देश भर में एक ऐसी लहर दिखाई पड़ी थी जिससे कि राजनीतिक ताकतें कांप उठी थीं। और यह लहर दिल्ली के चुनाव में एक हकीकत बनकर सामने आई जब उसने एक सुनामी के अंदाज में, झाड़ू के एक वार से कांग्रेस और भाजपा जैसी दोनों पार्टियों की चुनावी संभावनाओं को बहाकर किनारे फेंक दिया है। ऐसे में लोकपाल से परे भी देश के नेताओं और उनकी पार्टियों को यह समझने की जरूरत है कि अब उनके तौर-तरीके पहले की तरह नहीं चलते रह सकते। अब जनता उनकी मनमानी, उनकी डकैती को बर्दाश्त नहीं करने वाली है, और आज किसी झाड़ू ने आधी और सवा सदी पुरानी पार्टियों के चेहरों से रंग झाड़ दिया है, कल कोई लाठी आकर इन पार्टियों की हड्डी-पसली एक कर सकती है। समाजवादी पार्टी जैसे लोग अब तक यह समझ नहीं पा रहे हैं कि देश की जनता का रूख क्या है और वे उत्तरप्रदेश जैसे इलाके में मतदाताओं को जाति और धर्म, बाहुबल और धनबल से काबू में करने को स्थायी व्यवस्था मानकर चल रहे हैं। उनकी यह खुशफहमी अगले किसी भी चुनाव में टूट जाएगी, और भारतीय लोकतंत्र में करवट लेती हुई नई राजनीति सपा को, वैसी और पार्टियों को उसी तरह खारिज कर देगी जैसा कि दिल्ली में कांग्रेस को किया गया है। लोकपाल के इस मौके पर हम पार्टियों के अलावा सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए अफसरों से भी यह उम्मीद करते हैं कि वे देश में आए हुए एक नए ईमानदारी-पसंद माहौल की नब्ज को समझने की जहमत उठाएंगे। लोकपाल कानून बन जाने के बाद इससे जुड़े हुए बाकी मुद्दों पर लिखने का मौका और आएगा, फिलहाल इतनी चर्चा ही।

न हटने पर आमादा गांगुली को पद से निकाल फेंकने की जरूरत

16 दिसंबर 2013
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए ए.के. गांगुली ने अपनी एक प्रशिक्षु वकील के साथ जो बर्ताव किया, और इस बर्ताव को जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बनाई हुई एक जांच समिति ने भी गलत ठहराया, अपनी जांच रिपोर्ट दी, उसके बाद भी कुछ बातें हैरान करने वाली थीं। उनमें से एक तो यह कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही इस हाल तक के साथी के खिलाफ कोई कार्रवाई खुद करना जरूरी नहीं समझा, जबकि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट से नीचे की अदालतें भी खुद होकर पुलिस को जुर्म दर्ज करने के लिए कहती ही रहती हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत की इस शर्मनाक चुप्पी, और मुंह चुराने के बाद एक दूसरी भयानक बात यह रही कि इन आरोपों से जांच में भी दोषी पाए गए ए.के. गांगुली ने हर तरफ की मांग के बाद भी पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर अपनी मौजूदा नियुक्ति से इस्तीफा देने से साफ इंकार कर दिया। 
यहां पर सवाल सबसे पहले तो गांगुली की नैतिकता का उठता है जिन्होंने कि अपनी एक प्रशिक्षु के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ इस तरह की हरकत की, और सेक्स-हमला किया। दूसरी बात संवैधानिक उठती है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराया। तीसरी बात यह उठती है कि सारी जानकारी उजागर हो जाने के बाद, दोषी ठहराए जाने के बाद भी गांगुली इस तरह से एक संवैधानिक पद पर चिपके रहने पर अड़ा हुआ है। यह संवैधानिक पद उसे सुप्रीम कोर्ट के जज के पद से रिटायर होने की वजह से मिला था, और जैसा कि नाम से जाहिर है, इस कुर्सी की जिम्मेदारी लोगों के मानवाधिकार की रक्षा है। ऐसा जज जो खुद सेक्स-हमले का दोषी पाया गया है, जिसके पास अपनी सफाई के लिए कुछ नहीं है, वह आज न तो शर्म में डूबकर इस कुर्सी को छोडऩे के लिए तैयार है, और न ही अपनी ऐसी हिंसक सोच का मानवाधिकार-रक्षा की जिम्मेदारी के साथ एक सीधे टकराव को मानने के लिए तैयार है। 
संवैधानिक पदों पर जो लोग रहते हैं, उनको हटाने का तरीका खासा लंबा और जहमत भरा है। आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि जो लोग इतनी ऊंची कुर्सियों तक पहुंचते हैं, या मनोनयन से बिठाए जाते हैं, वे लोग सार्वजनिक जीवन में सिर्फ पेशेवर मुजरिम की तरह कानून की आड़ लेकर अपने जुर्म को छुपाने के बजाय खुद होकर ऐसी जगहों से हट जाएं। लेकिन गांगुली ने ऐसी नौबत ला दी है कि उसको हटाने के लिए अब पश्चिम बंगाल की सरकार, या देश के प्रधानमंत्री को दखल देकर राष्ट्रपति को यह मामला भेजना पड़ेगा, और इसको हटाने का काम करना पड़ेगा। 
संवैधानिक पदों से बर्खास्तगी के लिए भारत में महाभियोग जैसी जो प्रक्रिया है, उसके बारे में भी हो सकता है फिर सोचना पड़े, अगर अधिक लोग गांगुली जैसे निकलने लगें। आज देश का माहौल आधी सदी पहले के आजाद भारत जैसा नहीं है, जब बहुत किस्म के सामंती जुर्म सत्ता की ताकत की आड़ में खप जाते थे। देश में आज महिला अधिकारों को लेकर, लोकतांत्रिक बारीकियों को लेकर एक बहुत अलग किस्म की जागरूकता आई हुई है, और समाज के भीतर एक बड़ी सक्रियता भी आई हुई है। इसलिए अब लोगों को पुराने वक्त सरीखी आड़ नसीब नहीं है। गांगुली ने जो किया है, वैसा करने वाले सैकड़ों और लोग हो सकते हैं, लेकिन मिसाल तो उन्हीं मामलों से कायम होती हैं जो कि उजागर होते हैं, जिनको लेकर शिकायत होती है, जिन पर जांच होती है, जिनमें कुसूर पाया जाता है। जब बात यहां तक पहुंचती है तो फिर उससे जो मिसाल बनती है, या बनने का मौका आता है, उसी से समाज के भीतर एक जागरूकता आती है। मुजरिम बनने की खामियां रखने वाले लोगों की आंखें भी इससे खुलती हैं, और जुर्म का शिकार होने वाले लोगों को भी शिकायत का हौसला इससे मिलता है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे कुसूर और सजा के मामले बढ़ते हैं, वैसे-वैसे समाज के दूसरे लोगों में चौकन्नापन आता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तो बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी दिखाई है, उसके मुकाबले हमको यह देखना होगा कि केन्द्र सरकार की दूसरे नंबर की सबसे बड़ी सरकारी वकील इंदिरा जयसिंह ने हौसले के साथ इस मामले को उठाया है, और गांगुली को हटाने की कोशिश शुरू की है। आज इंदिरा जयसिंह के साथ और लोगों को भी खड़े होने की जरूरत है। 

कल को काल न बनने दें

15 दिसंबर 2013
संपादकीय
अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की टोलियों के बीच जिस तरह की तनातनी और खींचतान चल रही है, उसके चलते हमको हैरानी इस पर हो रही है कि दो जाहिर तौर पर समझदार लोग अपने आसपास के लोगों को एक दूसरे से उलझने से रोक क्यों नहीं पा रहे हैं। एक तरफ किरण बेदी दिल्ली की सरकार बनाने में मध्यस्थता की बात करते दिखती हैं, जिसका कि कोई स्वागत नहीं कर रहा, दूसरी तरफ केजरीवाल के साथी अन्ना के गांव जाकर उनके अनशन में जबर्दस्ती शामिल हो रहे हैं, और वहां से उनको धक्के मारकर बाहर किया जा रहा है। अन्ना बार-बार चेतावनी और धमकी दे रहे हैं कि केजरीवाल और उनकी पार्टी उनके (अन्ना के) नाम का इस्तेमाल न करें। भारत का मीडिया पिछले साल भर में इन दो चर्चित चेहरों के बीच चल रही तनातनी को लेकर खासे पन्ने, और एयर टाईम बर्बाद कर चुका है, और इनके बीच की बात किसी किनारे पहुंचती नहीं है। जब दो लोगों को एक-दूसरे को अनदेखा करके एक निहायत ही गैरजरूरी और कड़वी कटुता को खत्म करना चाहिए, तब ये दोनों ही बिना बात आए दिन उलझे हुए दिखते हैं। 
भारत के लोकतंत्र में, चुनावी राजनीति में, और सामाजिक आंदोलनों में, हर विचारधारा और उसके लोगों के लिए, उसके संगठनों के लिए खासी लंबी-चौड़ी जगह मौजूद है। ऐसे में जो लोग अपनी ताकत को अपने ही पुराने साथियों, संगठनों, और विरोधियों पर बर्बाद करते हैं, वे कोई अच्छी मिसाल पेश नहीं करते। न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि जगह-जगह यह इंसानी कमजोरी दिखती है कि लोग अपने भूतकाल को भुला नहीं पाते। लोग अपने भूतपूर्व जीवनसाथी, भूतपूर्व मालिक, भूतपूर्व नौकर, भूतपूर्व साथी, भूतपूर्व संगठन, भूतपूर्व पार्टी, या भूतपूर्व कुछ भी, इससे परे उठने में खासा वक्त लगा देते हैं, कभी-कभी पूरी जिंदगी भी। पिछले दो बरसों का अन्ना हजारे का आंदोलन देखें, या अरविंद केजरीवाल का उदय, इन दोनों में ही राहें अलग होने के पहले भी बहुत से मतभेद सामने आते थे, लेकिन उसमें कोई बुराई नहीं थी। जो संगठन किसी एक गुलामी का शिकार न हो, उसमें तो अलग-अलग विचार सामने आएंगे ही। लेकिन जब राहें अलग हो गईं, तो एक-दूसरे के घर घुसकर, दूसरे की मर्जी के खिलाफ मान न मान, मैं तेरा मेहमान, जैसी बात अच्छी नहीं रहतीं। 
खासकर अरविंद केजरीवाल के लोगों को अन्ना और उनके लोगों के बिना जीना सीखना चाहिए। सामाजिक आंदोलनों में एक-दूसरे के संगठन में जाकर जबरिया भागीदारी करने से आंदोलनकारियों की साख तो नहीं बढ़ती, बल्कि सामाजिक मुद्दों की साख घटती है। अन्ना हजारे का आज दांव पर बहुत अधिक नहीं लगा हुआ है, लेकिन अरविंद केजरीवाल एक ऐसी सक्रिय राजनीति में हैं, कि उन्हें जबर्दस्ती रिश्ते जारी रखने से परहेज करना चाहिए, और नए साथी ढूंढने चाहिए। कुदरत का एक नियम हर किस्म को समझना चाहिए, कि उसने इंसानों को सिर्फ सामने आंखें दी हैं, पीछे नहीं। ऐसा इसलिए किया है कि लोगों का सारा ध्यान आगे बढऩे की तरफ रहना चाहिए, न कि बीते हुए कल को देखते हुए। सड़क पर गाडिय़ां चलाते हुए भी पीछे देखने के लिए लगे शीशे का एक बहुत सीमित उपयोग रहता है, और जो लोग लगातार पीछे देखकर चलते हैं, वे सामने टकराने का खतरा भी उठाते हैं। 
हम अन्ना और केजरीवाल से परे भी जब देखते हैं तो कारोबार से लेकर, जिलों की कलेक्टरी तक, और छोड़ी गई पार्टी तक, लोग अपने अतीत से उलझे रहते हैं, और उन फंदों में जब तक उनके पैर फंसे रहते हैं, तब तक वे रफ्तार से आगे बिल्कुल नहीं बढ़ सकते। यह बात हमने शुरू तो अन्ना और केजरीवाल को लेकर की है, लेकिन यह हमारे सहित हर किसी पर लागू होती है। इसलिए अपने कल को काल न बनने दें। 

केजरीवाल का यह अडिय़ल रवैया, ठीक कि पहले दोनों पार्टियां सवालों के जवाब दें

14 दिसंबर 2013
संपादकीय
दिल्ली में कुदरत ने जितना घना कोहरा चारों तरफ बिखराया है, उतना ही घना कोहरा वहां के वोटरों ने भी बिखरा दिया है। चुनाव के नतीजे आए कुछ दिन हो गए हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी और कांग्रेस-भाजपा के बीच जिस तरह की कड़वी और तीखी, तेजाबी और फुंफकारती हुई बहस चल रही है, उसे देखते हुए दिल्ली के वोटर शायद एक और चुनाव की राह देखना शुरू कर चुके होंगे। बहुत से लोगों को यह भी लग रहा है कि इन तीनों में से कोई भी दो मिलकर एक सरकार क्यों नहीं बना रहे? लेकिन आज दिल्ली में सवाल सरकार से बड़ा भी है। 
अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को हम सरकार चलाने के लिए बहुत काबिल मानें, या न मानें, करीब एक तिहाई या उससे अधिक वोटरों का भरोसा उन पर रहा। आप और भाजपा इन दोनों को जो कांग्रेस विरोधी वोट मिले, उसमें मुख्य विपक्षी भूमिका केजरीवाल की ही रही, यह एक और बात है कि वे अगर मैदान में नहीं होते, तो भाजपा की सरकार सीधे-सीधे बन गई होती। लेकिन आज जब किसी के बाहरी या भीतरी समर्थन से दिल्ली की सरकार बनाने का सवाल उठता है, तो यह बात समझ आती है कि चिकित्सा विज्ञान के पास भी हर मर्ज का कोई इलाज नहीं होता। दिल्ली में इन तीनों पार्टियों के बीच जितना ऊंचे दर्जे का अविश्वास बाकी दोनों के लिए है, उसके चलते किसी तरह के भीतरी या बाहरी समर्थन की गुंजाइश दिखती नहीं है। दिल्ली में खालिस कमल छाप की सरकार बनने की जो संभावनाएं केजरीवाल ने खत्म की हैं, और आने वाले आम चुनावों में भाजपा को उनसे दिल्ली के बाहर भी नुकसान पहुंचने का जो खतरा दिख रहा है, उसके चलते समर्थन की बात कहते-कहते भी भाजपा से बहुत से बयान गुब्बारे में पिन घोंपने जैसे आ रहे हैं। एक बयान केजरीवाल को साथ देने का रहता है, और दूसरा बयान केजरीवाल को लात देने का रहता है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो उसके एक मुखिया राहुल गांधी हैं जिस तरह आप से सीखने की बात कही है, तो उसके बाद कांग्रेस के बड़बोले नेता केजरीवाल के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे हैं। लेकिन इससे भी कांग्रेस पार्टी ऐसी नौबत में एक भरोसेमंद पार्टी बन गई हो, ऐसा नहीं लगता है। 
केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के अध्यक्षों को चि_ी लिखकर बहुत से मुद्दों पर उनके सार्वजनिक जवाब मांगें हैं, और उसके बाद ही इन पार्टियों के द्वारा घोषित समर्थन पर विचार करने की बात कही है। दिल्ली में ऐसा लगता है कि चुनाव के बाद भी अभी चुनाव अभियान जारी है। पहली नजर में हमको यह लग रहा था कि केजरीवाल आज भी जिस अंदाज में इन दोनों पार्टियों पर हमले कर रहे हैं, वह लोकतंत्र में सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भागने सरीखा है। लेकिन फिर इस पर दोबारा सोचते-सोचते कुछ मिनटों के भीतर अब हमको लगता है कि सरकार बनाने की किसी हड़बड़ी के बजाय यह राजनीतिक ईमानदारी बेहतर है कि जनता के बीच जिन मुद्दों पर वोट मांगे गए थे, उन मुद्दों पर पहले सवाल-जवाब हो जाएं, और फिर उसके बाद सरकार बनाने, न बनाने, या चुनाव में जाने की बात सोची जाए। यह सिलसिला भारतीय लोकतंत्र में थोड़ा अटपटा इसलिए लग रहा है कि देश ने ऐसी नौबत में अक्सर विधायकों की खरीदी-बिक्री, दलबदल या पार्टियों में विभाजन देखा हुआ है, और सत्ता को दूर धकेलने वाले लोग शायद ही कभी देखें। लेकिन अरविंद केजरीवाल के पूरे तौर-तरीकों को देखें, तो यह बात साफ होती है कि वे भारतीय चुनावी राजनीति के परंपरागत ढर्रे को तोड़ते हुए चल रहे हैं, और इसीलिए आगे भी बढ़ रहे हैं। वे कांग्रेस या भाजपा की बी-टीम की तरह कामयाब नहीं हो सकते थे, उनको एक नई पगडंडी शुरू करनी थी, बजाय पहले के राजपथों पर चलने के। और उन्होंने यही किया है। और उनके इसी अंदाज से कांग्रेस और भाजपा के भीतर दहशत भी है, नफरत भी है, और उलझन भी है। 
कांग्रेस और भाजपा को केजरीवाल नाम की भारतीय लोकतंत्र की यह नई बीमारी ऐसी दिख रही है, जिसका कि कोई आसान और जल्द इलाज उनकी नजर में नहीं है। और हम अभी केजरीवाल के मुद्दों की बारीकियों में गए बिना इस बात को बेहतर समझ मान रहे हैं कि नीति-सिद्धांत और मुद्दों पर खुलकर चर्चा जरूरी है, बजाय समर्थन लेने-देने के। आने वाले आम चुनाव में केजरीवाल की आम पार्टी कांग्रेस और भाजपा को कहां-कहां किस तरह का नुकसान पहुंचाएगी, इसका अंदाज लगाना अभी नामुमकिन है। लेकिन हम छत्तीसगढ़ के मामले में पहले भी लिख चुके हैं कि किस तरह कांग्रेस और भाजपा के बीच इस विधानसभा चुनाव में वोटों का फासला एक फीसदी से भी कम, कुल पौन फीसदी रहा है, और एक झाड़ू किस तरह इस पौन फीसदी को इधर से उधर कर सकता है, इसका कोई अंदाज कम से कम हमको तो नहीं लगता। इसलिए अरविंद केजरीवाल की शक्ल में भारतीय चुनावी राजनीति में आज जो असमंजस और हड़बड़ाहट आ खड़े हुए हैं, वे लोकतांत्रिक हैं, और उनको सरकार बनाने की किसी हड़बड़ी में खत्म करने की जरूरत नहीं है। इस देश में कई राज्यों ने छह-छह महीनों से अधिक लंबे राष्ट्रपति शासन देखे हैं, और दिल्ली में अगर ऐसी नौबत आती है, तो इस राज्य के चुनाव दुबारा हो सकते हैं, कुछ महीनों बाद के आम चुनाव के साथ हो सकते हैं। अरविंद केजरीवाल के इस अडिय़ल रवैये को हम ठीक मानते हैं, कि पहले दोनों पार्टियां उनके सवालों के जवाब दें। दानदाता की शिनाख्त, उसकी नीयत की शिनाख्त किए बिना सहयोग नहीं लेना चाहिए। 

सोनिया की एक साहसी और जरूरी पहल...

13 दिसंबर 2013
संपादकीय
किसी बहुत नाजुक मुद्दे पर यह पहली बार हो रहा है कि देश की एक बड़ी, और मध्यमार्गी पार्टी खुलकर सामने आई है। समलैंगिकता के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही कांग्रेस पार्टी के दो-दो, तीन-तीन बड़े नेताओं ने तो इसके खिलाफ कहा ही, खुद सोनिया गांधी ने जब इस फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए लोगों के अपने निजी जीवन के हक की वकालत की, और उम्मीद जताई कि संसद अदालत के इस फैसले के खिलाफ कुछ करेगी, तो इसे हम भारत के पाखंड के बीच हिम्मत का एक मामला मानते हैं। सोनिया गांधी के शब्द, राहुल गांधी के गोलमोल शब्दों के मुकाबले भी अधिक साफ, और न्यायसंगत थे। एक पार्टी के रूप में कल कांग्रेस ने वह किया है जो कि एक सरकार के रूप में उसकी यूपीए को कुछ बरस पहले ही कर देना था, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता-विरोधी कानून को असंवैधानिक करार दिया था। उस वक्त ही यूपीए सरकार की जिम्मेदारी थी कि उसने अदालत में अपने वकील के मार्फत अदालत से जो सहमति रखी थी, उस सहमति की नीयत के तहत वह कानून में फेरबदल की पहल संसद में करती। लेकिन उस वक्त कांग्रेस ने यह तर्क लिया कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ चूंकि सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है इसलिए यूपीए सरकार ने इस अंग्रेज कानून को खारिज करने के लिए उस वक्त संसद में पहल नहीं की। हमारे हिसाब से यह तर्क खोखला है, और सुप्रीम कोर्ट में चल रहा कोई मामला सरकार को संसद के मार्फत कानून को बदलने से नहीं रोकता। उस वक्त शायद कांग्रेस पार्टी या यूपीए मंत्रिमंडल का इतना हौसला नहीं जुटा कि वह खुद पहल करे, और जैसा कि आमतौर पर राजनीतिक दल करते हैं, कांग्रेस शायद इस उम्मीद में चुप बैठी रही कि सुप्रीम कोर्ट को ही भारतीय पाखंड के खिलाफ यह अप्रिय काम करने दिया जाए। 
खैर, जो भी हो, उस वक्त कांग्रेस की चाहे जो भी नीयत रही हो, हमको आज इसकी एक बात तारीफ के लायक लगती है कि एक नाजुक मुद्दे पर कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी ने खुद होकर बयान दिया है, और उनकी कही बात यूपीए के किसी भी दूसरे नेता की कही बात के मुकाबले अधिक वजन रखती है। यहां पर हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि हम हमेशा से यह लिखते आए हैं कि देश के प्रधानमंत्री को, और यूपीए की मुखिया या कांग्रेस अध्यक्ष को अधिक मुद्दों पर, अधिक बोलना चाहिए। सरकार और पार्टी के, गठबंधन के प्रवक्ताओं की कही हुई बात, न तो वजन रखती है, और न ही विश्वसनीयता। ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें केन्द्र सरकार या यूपीए की तरफ से बयान देने वाले कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं की बातों का कांग्रेस पार्टी को ही खंडन करना पड़ा है, खासकर कांग्रेस की तरफ से बोलते हुए दिखने वाले लोग अपने घमंड और अपने तेवरों की वजह से जनता के मुंह में कड़वाहट ही घोलते हैं। भारतीय लोकतंत्र के लिए भी यह जरूरी है कि प्रधानमंत्री, और गठबंधन या पार्टी के मुखिया अधिक बोलते हुए दिखें, ताकि जनता के बीच उनकी सोच विश्वसनीय तरीके से जाए। 
यूपीए के भागीदार दल, या सहयोगी दल सोनिया गांधी की इस बात से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में जनता के बीच किसी भी सोच का खुलकर सामने आना जरूरी है, न कि सिर्फ संसद के भीतर, या फिर टीवी चैनलों पर पार्टी के गैरजिम्मेदार बकवासी नेताओं के बयानों में। आज देश भर में कांग्रेस की जो बदहाली और फटेहाली सामने आई है, उसकी खबरों में ऐसी जानकारी भी छप रही है कि अब सोनिया गांधी कांग्रेस के मामलों को अपने हाथ ले रही हैं, और फिसलती हुई रस्सी को थामने की कोशिश कर रही हैं। अपनी सोच और अपनी बातों में सोनिया गांधी कांग्रेस के बाकी तकरीबन सारे ही लोगों से बेहतर हैं, और उनको अपनी इस खूबी का लोकतांत्रिक इस्तेमाल करना चाहिए। जब कांग्रेस अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ खुलकर कहा, तब जाकर कांग्रेस का यह पूछने का भी हक बनता है कि नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी समलैंगिकता के मामले पर क्या सोचते हैं, इस पर वे बयान क्यों नहीं दे रहे हैं। और अब बारी इस मुद्दे पर कुछ कहने की बाकी पार्टियों की है। भाजपा के हमेशा ही बहुत मुखर रहने वाले, और साफ-साफ बोलने वाले प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर से जब समलैंगिकता पर आए फैसले के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब बहुत ही हंसी के लायक था कि वे ऐसे मामले पर कुछ भी नहीं बोलते। 
देश के जरूरी, या महत्वपूर्ण मुद्दों पर पार्टियों को खुलकर सामने आना चाहिए, और हम इसे कांग्रेस पार्टी की एक अच्छी पहल इसलिए मानते हैं, क्योंकि समलैंगिक तबका इतना बड़ा, या संगठित, नहीं है कि उसके वोटों की फिक्र करके सोनिया गांधी को खुद यह बयान देना पड़ता। इसके साथ-साथ कांग्रेस को दूसरे बहुत से सामाजिक मुद्दों पर एक प्रगतिशील, सुधारवादी, आधुनिक, और लोकतांत्रिक रूख सामने रखना चाहिए, और अपनाना चाहिए। 

लोगों के निजी सेक्स जीवन को काबू करता यह कैसा लोकतंत्र?

12 दिसंबर 2013
संपादकीय
जो लोग भारत के सुप्रीम कोर्ट के कल के फैसले के सिर्फ समलैंगिकता पर एक  फैसला मानकर अखबार के पन्ने को पलट दे रहे हैं, उनको आने वाले दिनों में ऐसा ही रूख जारी रहने पर कई दूसरे किस्म के दकियानूसी, कट्टरपंथी, और गुफाकालीन सोच वाले फैसलों के लिए तैयार रहना चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2009 में एक फैसला दिया था और भारतीय संविधान के तहत समलैंगिकता और उससे जुड़े हुए कुछ दूसरे किस्म के सेक्स-संबंधों को जुर्म ठहराने वाली धारा 377 को असंवैधानिक ठहराया था। कल के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की एक बेंच ने उस फैसले को पलट दिया है और गेंद को फिर सरकार या संसद के पाले में डाल दिया है। दुनिया भर में इसका भारी विरोध हो रहा है और कानून के बड़े-बड़े जानकार, भारतीय संविधान के सबसे बड़े विशेषज्ञ, खुलकर इसके खिलाफ बोल रहे हैं, और सुप्रीम कोर्ट के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने अपने जिम्मेदारी से मुंह चुराया है, और जब दूसरे सौ किस्म के मामलों में वह अपने दायरे से चार कदम आगे बढ़कर दखल देने का काम रात-दिन कर रहा है, तो इस मामले में अपने दायरे के भीतर ही मुमकिन और जरूरी जिम्मेदारी से पीछे हटना बहुत ही निराशा की बात मानी गई है। 
हिन्दुस्तान के इस कानून के बारे में हम सिर्फ यह कह सकते हैं कि यह अपने आपमें एक जुर्म है। यह कानून हिन्दुस्तान में राज करने वाले अंग्रेज अपने साथ लाए हुए चर्च के सिद्धांतों के आधार पर यहां पर लादकर गए थे। खुद उन अंग्रेजों के राज में लंबे वक्त पहले समलैंगिकता और इससे जुड़े कुछ दूसरे सेक्स-पहलुओं पर बना यह कानून खारिज किया जा चुका है, यहां पर अब न अंग्रेज राज रहा, न ही चर्च राजा का धर्म है। अंग्रेजों और चर्च के आने के पहले हिन्दुस्तान में कभी भी समलैंगिकता का, और धारा 377 के तहत जुर्म करार दी गई कुछ और बातों का कोई विरोध नहीं था। लेकिन यह देश आजादी की पौन सदी के करीब आने पर भी आज अंग्रेजों की गुलामी का इस कदर शिकार है, कि अपने ही देश में न सिर्फ समलैंगिक, बल्कि आम पति-पत्नी किस तरह सेक्स न करें, यह हुक्म देने वाला अंग्रेज-ईसाई कानून ढोए जा रहा है। 
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी सीमा में रहते हुए एक सुधारवादी और अच्छा फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कल का अपना फैसला देश की जनता के बुनियादी हकों के खिलाफ दिया और अपनी जिम्मेदारी को लेकर देश को सदमा भी दिया है। आज जब पूरी दुनिया में लोगों की निजी जिंदगी की स्वतंत्रता को बढ़ाने का काम चल रहा है, हिन्दुस्तान में इन दो जजों ने समाज को एक बहुत बड़ा झटका दिया है। जो लोग यह सोचते हैं कि यह कानून सिर्फ समलैंगिक लोगों के खिलाफ है, उनको इसकी बारीकियों को समझना चाहिए। इसमें पति-पत्नी के बीच भी बहुत सी बातों को जुर्म ठहराया गया है, और इसके लिए उनको सजा दी जा सकती है। यह एक बहुत ही घटिया सोच है, और धर्म जैसी घटिया संस्था ही अपने सदस्यों पर ऐसे कानून लाद सकती है, और धर्म के तहत काम करने वाले अंग्रेज राजा ही अपने गुलामों पर ऐसे कानून लादते थे। आज लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान किसको अपना बाप मानकर चल रहा है? अंग्रेजों को, या चर्च को? और इस देश के लिए एक बहुत बड़ी बेहूदा नौबत यह है कि जो हिन्दू संगठन चर्च का विरोध करते हैं, वे चर्च के लादे गए इस कानून के इस देश में आज सबसे बड़े हिमायती हो गए हैं। 
यह केस सिर्फ समलैंगिकता का नहीं है, यह निजी आजादी का मामला है, और आज अगर एक ऐसा दकियानूसी कानून जायज करार दिया जा रहा है, जिसे खुद चर्च भी आज खारिज कर चुका है, तो फिर देश की ऐसी अदालतें, और ऐसे जज, ऐसे और भी बहुत से कट्टरतावादी, पाखंडी, और स्वतंत्रता-विरोधी फैसले ला सकते हैं। इस एक मामले में सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि दो जजों की बेंच को इसे देने का अपना गलत फैसला वह सुधारे, और इस पर एक अधिक बड़ी बेंच बैठे, और उसमें ऐसे जज रखे जाएं जो लोगों की निजी आजादी की अहमियत समझते हों। सुप्रीम कोर्ट को समाज के लिए अपनी जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए, और ऐसे मामलों को संसद की तरफ धकेलना एक गैरजिम्मेदारी है जिसे अदालत खुद तो आसानी से सुलझा सकती थी, लेकिन संसद पाखंडी नेताओं और पार्टियों के चलते उतनी आसानी से इसे नहीं सुलझा पाएगी। लंबे अरसे बाद सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला संविधान के, समाज के, विज्ञान और मनोविज्ञान के, जानकार लोगों की नजरों में भी इतना खराब दिया जा रहा है। 

बात की बात, Bat ke bat

11 dec 2013

सुप्रीम कोर्ट के जजों से लेकर छत्तीसगढ़ सरकार तक लालबत्ती के सारे आशिकों से...

11 दिसंबर 2013
संपादकीय
छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनने के मौके पर हम कुछ दिनों तक लगातार इस जगह पर उससे जुड़े मुद्दों पर ही लिखना चाहते थे, और कल सुप्रीम कोर्ट का एक ऐसा आदेश आया है कि उस पर भी लिखना था, यह एक ऐसा मामला है जिस पर ये दोनों जरूरतें पूरी हो रही हैं, और हम हिन्दुस्तान की लालबत्ती सोच और छत्तीसगढ़ की नई सरकार, इन दोनों पर एक साथ लिख पा रहे हैं। 
हमारे नियमित पाठकों को मालूम होगा कि हम हर कुछ महीनों में लालबत्तियों के खिलाफ और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में कुख्यात और बदनाम हो चुके, जनता के बीच नफरत का सामान बन गए वीआईपी नाम के शब्द के खिलाफ लिखते आए हैं, और जब सुप्रीम कोर्ट ने लालबत्ती के बारे में कुछ महीने पहले भी नोटिस जारी किए थे, तब हमने अदालत के खिलाफ भी लिखा था। आज भारतीय लोकतंत्र के लिए बुरा यह है कि अदालत अपनी सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ पाई है, और हमारे लिए आज लिखने का एक अच्छा मुद्दा फिर तैयार है। 
लोकतंत्र के भीतर इस तरह की सोच पर हमें तरस आता है और शर्म भी आती है कि देश की जनता ऐसे प्रतिनिधियों को ढोने के लिए बेबस है जो कि अपने-आपको जनता से बिल्कुल ही अलग, बिल्कुल ही ऊपर देखना चाहते हैं। यह सोच हमें मनुवादी जिंदगी जीते भारत के उस हिस्से की लगती है जहां पर कि अपने-आपको ऊंची जाति का मानने वाले लोग कुछ दूसरों को नीची जाति का मानते हुए उन पर जुल्म करते हैं, उनके दूल्हों को घोड़ों पर नहीं चढऩे देते, उन्हें जूते पहनकर नहीं चलने देते और गांवों में उनको ऐसी जगहों पर ही बस्तियां बनाने देते हैं जहां पर तथाकथित ऊंची जात के गुरूर वाले लोगों की बस्तियों से निकली नालियों का पानी बहकर पहुंचता हो। 
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि एक निर्वाचित नेता को जनता से इस कदर कटने की जरूरत क्या है, वह जनता के मन में अपने लिए नफरत खड़ी करने से बिना डरे कैसे रहता है, और लोकतंत्र के भीतर सत्ता-सवर्णों का एक नया दर्जा कैसे बनाया जा सकता है? यह एक भयानक हालत है जिसके पीछे सत्ता की अंधी ताकत से उपजी बददिमागी है और जो देश के भीतर राजा और प्रजा जैसे दो अलोकतांत्रिक और सामंती फर्क वाले दर्जे खड़े कर रही है। हमें उन जजों और अफसरों पर भी तरस आता है जो कि लालबत्ती जलाकर या सायरन बजाते हुए या पायलट गाड़ी सामने-सामने चलवाकर जनता के बीच से आते-जाते हैं। हम इसे सुविधा नहीं एक आतंक मानते हैं और उसका कोई तर्क हमें नहीं दिखता सिवाय इसके कि सत्ता पर काबिज लोग धीरे-धीरे करके अपने लिए सुविधाएं और खास अधिकार जुटाते चलते हैं। इस पर रोक न लगे इसलिए ऐसे तमाम हक सत्ता पर बैठे लोग, संसद को चला रहे लोग जजों को भी देते चलते हैं, वरना बड़ी अदालत का एक जज क्यों सायरन बजाते हुए कहीं आए-जाए? 
सड़क पर हड़बड़ी की जरूरत तो आग बुझाने जाती दमकल, मरीज को या घायल को लेकर जाती एम्बुलेंस, किसी अपराध को रोकने या अपराधी को तलाशने के लिए जाती पुलिस को ही पड़ सकती है। जजों, मंत्रियों, अफसरों, सांसदों या संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे लोगों की जिंदगी में ऐसी कौन सी हड़बड़ी है जो कि रोज मजदूरी करने आते-जाते, सड़क से गुजरते किसी बूढ़े या कमजोर इंसान के हक को कुलचते हुए भी जरूरी है? साइकिल पर जाते हुए मजदूरों की जिंदगी की जरूरत, लालबत्ती और सायरन से लैस जिंदगियों से कम क्यों आंकी जाती है? एक मंत्री के लिए मंत्रालय या बंगले पहुंचना, रफ्तार से पहुंचना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी स्कूल जाती एक बच्ची का समय पर पहुंचना है। आम लोगों को रोककर खास लोगों को लालबत्ती, सायरन, पायलट गाड़ी के सहारे पहले आगे निकालना, चौराहों पर लालबत्ती से छूट देना पूरी तरह सामंतवाद है और इसकी कोई जगह लोकतंत्र में नहीं होनी चाहिए।
आज हमको इस बात पर बहुत अफसोस है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ पाया, और एक पाखंडी शब्द-संवैधानिक पद, उछालते हुए उसने देश के हाईकोर्ट तक के जजों को, मंत्रियों और राज्यपालों को, और हर प्रदेश की राजधानी में औसतन दर्जनों लोगों को लालबत्तियां दे दी हैं। यह बहुत ही खराब फैसला है, और देश के मुख्य न्यायाधीश को यह जवाब देना चाहिए कि उनका काम सड़क किनारे फेरी लगाने वाले इंसान से अधिक महत्वपूर्ण कैसे है? फेरी वाले की जिंदगी में उसका अपना काम उतना ही मायने रखता है, उससे अधिक मायने रखता है, जितना मायने एक राष्ट्रपति के लिए उसका काम रखता है, या मुख्य न्यायाधीश के लिए उसका काम रखता है। 
यहां पर हम छत्तीसगढ़ सरकार को आज तीसरे कार्यकाल के मौके पर यह याद दिलाना चाहते हैं कि भाजपा के पीछे जिस आरएसएस का हाथ रहा है, और जिसकी मेहनत के बिना भाजपा छत्तीसगढ़ में यह चुनाव नहीं जीती होती, उसकी सोच एक सादगी की सोच है। इस पूरे देश में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सादगी की सोच रही है। और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने आज यह चुनौती और संभावना दोनों एक साथ हैं कि वे किफायत का एक नया सिलसिला शुरू करें, अपनी सरकार के बददिमाग लोगों की सामंती सोच को खत्म करके उनको इन पांच बरसों में जनता के पांच कदम करीब लाने की कोशिश उनको करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी अदालत से खारिज होने के लायक है, और सिर पर लाल कलगी का हक सिर्फ मुर्गों को होना चाहिए। 
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को, भाजपा को, और प्रदेश के मंत्रियों को यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के सबसे बड़े नेता, गुजर चुके लखीराम अग्रवाल ने 2003 में भाजपा सरकार बनने के वक्त सार्वजनिक रूप से कहा था कि भाजपा सरकार को लालबत्तियां खत्म कर देनी चाहिए। हम इस प्रदेश में राज्यपाल शेखर दत्त से भी यह उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की बनाई लिस्ट के अधिकारों का इस्तेमाल करने के बजाय, उनको आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का इस्तेमाल करना चाहिए, और लालबत्ती-सायरन का अलोकतांत्रिक-सामंती आतंक खत्म करना चाहिए। संविधान या किसी अदालत ने अगर कोई अलोकतांत्रिक अधिकार दिए हैं, तो भी लोकतांत्रिक सोच वाले लोग उन अधिकारों के इस्तेमाल के बिना भी रह सकते हैं, और जनता की नजर में अधिक इज्जत के हकदार बन सकते हैं। 
आज छत्तीसगढ़ सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि उसकी यह जीत स्थायी नहीं है, और भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का फासला कुल पौन फीसदी है, एक फीसदी भी नहीं। और इस देश की राजधानी में अभी-अभी यह साबित हुआ है कि किस तरह एक झाड़ू, लंबी-चौड़ी जीत को, दसियों फीसदी वोटों को झड़ाकर फेंक सकती है। छत्तीसगढ़ की सरकार, यहां के संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग उस लालबत्ती, सायरन, और खास दर्जे की हवस को छोड़ें, जो कि सिर्फ कुर्सी के चलते हासिल हैं, और ऐसे इंसान बनने की कोशिश करें, जो कुर्सी के बाद भी इज्जत के हकदार रहते हैं। जनता के मन में हर सायरन, हर लालबत्ती, और हर बार चौराहों पर रोके जाने पर लोकतंत्र के इन बड़े चेहरों के लिए जो हिकारत और नफरत उठ खड़ी होती है, उसका असर जरूर होता होगा।