सत्ता अब तक, जनता की नफरत समझ नहीं पा रही

31 जनवरी 2014
संपादकीय
दो-तीन अलग-अलग बातें मिलकर एक मुद्दे पर सोचने को मजबूर कर रही हैं। दो-तीन दिन पहले महाराष्ट्र के महिला आयोग की एक सदस्य ने अपने एक लापरवाह और गैरजिम्मेदार बयान से, बलात्कार की शिकार लड़कियों को उन पर हुए जुर्म के लिए, उन्हीं के तौर-तरीकों को एक किस्म से जिम्मेदार ठहरा दिया था, और उस पर बाद में माफी भी मांगनी पड़ी। एक दूसरी घटना यह है कि दिल्ली में जब राज्य महिला आयोग आम आदमी पार्टी के एक मंत्री सोमनाथ भारती को विदेशी महिलाओं के साथ बदसलूकी के मामले में नोटिस दिया, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने महिला आयोग की सदस्य को ही हटाने के लिए मुहिम छेड़ दी। 
एक अलग मामला यह है कि भारतीय सांसद अभी सरकारी एयरलाईंस में जिस तरह की खातिरदारी पाते हैं, वैसी ही खातिरदारी निजी एयरलाईंस में पाने के लिए उन्होंने सरकार से हुक्म जारी करवाया है। और तीसरा मामला यह है कि देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके, और अब गुजर चुके जस्टिस जे.एस. वर्मा को घोषित पद्मभूषण सम्मान उनके परिवार ने लेने से मना कर दिया है, और इस सम्मान को जस्टिस वर्मा का अपमान कहते हुए जस्टिस राजेन्दर सच्चर ने लिखा है कि वे इससे बड़े सम्मान के हकदार थे, और उनके लिए यह सम्मान एक तुच्छ फैसला है। 
इन तीनों बातों को मिलाकर हमको लगता है कि देश में आज खास और आम इंसानों के बीच फासले को लेकर जनता के बीच जो नाराजगी और नफरत है, उसे समझने की कोशिश भी सरकारें नहीं कर रही हैं, और न ही राजनीतिक दल कर रहे हैं। इन तीनों बातों में जो रिश्ता दिखता है, वह यह है कि महाराष्ट्र और दिल्ली, और देश के बाकी राज्यों के भी महिला आयोग राजनीतिक मनोनयन से भरे हुए हैं, उनमें सत्तारूढ़ पार्टी की पसंद से सदस्य बनाए गए हैं। यह जाहिर है कि ऐसे सदस्य, न सिर्फ महिला आयोग में, बल्कि किसी भी आयोग में रहते हुए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने के बजाय अपने को कुर्सी पर बिठाने वाली सरकार के राजनीतिक हितों की फिक्र करते हैं। पूरे देश में हमारा यह देखा हुआ है कि संवैधानिक आयोगों पर बैठे लोग उन आयोगों पार्टी के एक प्रकोष्ठ की तरह बनाकर रख देते हैं। ऐसे में एक तरफ तो केजरीवाल का यह आरोप सही है कि आयोग से ऐसे लोगों को हटाया जाए, लेकिन दूसरी तरफ अपने आपको आम आदमी की टोपी पहनाने वाले केजरीवाल अपने कुसूरवार मंत्री को बचाने के लिए देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ एक आपराधिक गैरजिम्मेदारी वाला धरना देते हैं, अपने मंत्री के बचाव में घटिया बातें करते हैं। इस तरह आम आदमी का नाम लेकर सत्ता में आने वाले केजरीवाल अपने खुद के लोगों को खास बनाकर रख छोड़ते हैं। 
आज की इस चर्चा का तीसरा मुद्दा राष्ट्रीय सम्मानों का है जिनमें फिर से बार-बार यह बात सामने आती है कि देश की सत्ता हांक रही पार्टी अपनी पसंद से लोगों को ऐसे राष्ट्रीय सम्मान देती है, और बहुत से ऐसे लोग सम्मान पाते हैं जिनसे ऐसे तथाकथित राष्ट्रीय सम्मानों का अपमान ही होता है। बहुत से जिम्मेदार लोग लंबे वक्त से यह मांग करते आ रहे हैं कि राष्ट्रीय सम्मानों को देने का सरकारी धंधा बंद होना चाहिए। हम भी बहुत बार इसके खिलाफ लिख चुके हैं, और कम वजनदार लोगों को अधिक वजनदार राष्ट्रीय सम्मान देकर सरकार समाज के मुंह में एक कड़वा स्वाद ही छोड़ती है, जिसकी कि कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। 
देश में आज आम और खास के बीच फर्क खत्म करने की जनभावना बहुत मजबूत हो चुकी है। इसी तरह संवैधानिक कुर्सियों पर राजनीतिक मनोनयन इस तरह सीमित और काबू किया जाना चाहिए कि आयोगों के काम के दायरे में लंबे समय से जो सामाजिक कार्यकर्ता काम करते आए हैं, उन्हीं का मनोनयन होना चाहिए, न कि राजनीतिक लोगों का, बिना किसी पिछले अनुभव और काम के। देश के सांसदों के बारे में हमारा यही कहना है कि अगर उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर, सार्वजनिक सेवाओं के भीतर इस तरह से अपने खास दर्जे का इस्तेमाल जारी रखा, तो आम नफरत और आम हिकारत उनको बहुत भारी पड़ेगी। अभी भी हिन्दुस्तानी सांसद, विधायक, और सत्ता पर बैठे बाकी लोग जनता की नफरत को समझ नहीं पा रहे हैं, और आने वाले कोई भी चुनाव, आम आदमी पार्टी ही नहीं, किसी भी पार्टी या उम्मीदवार के एक झाड़ू से बदल सकते हैं। 

देश के ऐतिहासिक जख्मों और रेत-कागज की कहानी

30 जनवरी 2014
संपादकीय

दिल्ली आज फिर तनाव देख रहा है। राहुल गांधी ने 1984 के दंगों को लेकर कांग्रेस के लोगों की जितनी भी जिम्मेदारी मानी है, उसे लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उपराज्यपाल से मिलकर इन दंगों की हत्याओं पर विशेष जांच दल बनाने की मांग की है, और दिल्ली में रिसते जख्मों वाला सिक्ख समाज आज फिर सड़कों पर है। कांग्रेस मुख्यालय के सामने सिक्खों का प्रदर्शन हो रहा है, और बहुत से नेता बयान दे रहे हैं कि राहुल गांधी जिनको कुसूरवार मानते हैं, उनके नाम बताएं। 
दरअसल राहुल गांधी के टीवी इंटरव्यू के साथ एक दिक्कत यह हो गई कि उनकी तैयारी जवाबों को लेकर नहीं थी। जिन दंगों को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पहले ही माफी मांग चुके हैं, उस माफी का कोई जिक्र भी राहुल गांधी ने कई सवालों, और कई जवाबों के दौरान नहीं किया। किसी भी सार्वजनिक नेता से ऐसी उम्मीद नहीं की जाती कि वे नाजुक मुद्दों पर अधूरी बात कहें, अहमियत वाली कही जा चुकी बातों का जिक्र न करें, और एक गलत तस्वीर बनने दें। इस इंटरव्यू को लेकर दिल्ली से ऐसी खबरें रिस रही हैं कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं की सहमति और तैयारी के बिना ही, ऊपर-ऊपर विज्ञापन एजेंसियों ने यह अंग्रेजी इंटरव्यू तय किया था। हम इस अंदरुनी बात पर यहां पर कुछ कहना नहीं चाहते, चाहे वह सच हो, चाहे गलत हो, हम सिर्फ जो जाहिर बातें हैं, उन्हीं पर यहां लिखना चाहते हैं। 
यह देश कुछ ऐतिहासिक जख्मों से भरा हुआ है। गांधी की हत्या के पहले से भारत और पाकिस्तान के विभाजन के जख्म, फिर गांधी की हत्या, और फिर बाबरी मस्जिद को गिराना, उसके बाद मुंबई के आतंकी हमलों में सैकड़ों मौतें, स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई, इंदिरा गांधी की हत्या, सिक्ख विरोधी दंगे, गुजरात के दंगे वगैरह। ये सारे जख्म वक्त-वक्त पर रिसने लगते हैं, और अगर ये सूखते दिखते हैं, तो इनको कुरेदकर चुनावी मुद्दा बनाया जाता है। लोकतंत्र ऐसे ऐतिहासिक जख्मों को न तो अनदेखा कर सकता है, और न ही उन्हीं को थामे हुए आगे बढ़ सकता है। अब यहां पर हमारी सोच जवाब दे जाती है, कि कौन से ऐतिहासिक जुर्म, और कौन से ऐतिहासिक मुजरिम, कब तक, किन-किन कटघरों में रहना चाहिए, या फिर किसी एक पन्ने के हिसाब को एक वक्त के बाद चुकता मानकर, आगे की सोचनी चाहिए। हम ऐसी कोई एक रीति-नीति नहीं सोच पा रहे, कि क्या करना चाहिए? और हिन्दुस्तान अकेला ऐसा देश नहीं है जहां पर कि ऐसे ऐतिहासिक जख्म पीढिय़ों तक आगे बढ़ते चलते हैं, और उनका कोई इलाज नहीं हो पाता। 
ऊपर की लिस्ट में हमने कई बातों को शामिल नहीं भी किया है, जो अब लिखते-लिखते याद आ रही हैं, जैसे कि कश्मीर से पंडितों को निकालना। वहां की वादियों से लाखों हिन्दू पंडितों को भगाना, और दशकों के बाद भी आज उनका शरणार्थियों की तरह अपनी जमीन-जायदाद, अपने शहर-प्रदेश से दूर दिल्ली या और दूसरी जगहों पर रहना। अपने ही देश के भीतर अगर कोई इतनी बड़ी बिरादरी सिर्फ धर्म के आधार पर बेदखल कर दी गई है, तो यह किसी तरह एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं है, और हिन्दुस्तान ने मानो, कश्मीर और पंडितों से परे के हिन्दुस्तान ने मानो, इस बेदखली के साथ जीना सीख लिया है। आज इस पूरे मुद्दे पर लिखने को सिर्फ दिल्ली के सिक्ख-प्रदर्शनों की वजह से जरूरी नहीं लग रहा है, आज गांधी की हत्या की सालगिरह भी है। और हिन्दुस्तान के इतिहास की इस सबसे बड़ी हत्या के पीछे की सोच आज भी फल-फूल रही है। 
लोकतंत्र के भीतर कब किस जख्म पर मरहम पट्टी करके उससे आगे बढ़ा जाए, यह उस लोकतंत्र के भीतर भी परस्पर विरोधी ताकतें भी तय करती हैं। हिन्दुस्तान में ऐसी राजनीतिक ताकतें हाथ में रेत-कागज लेकर चलती हैं, कि जख्म हल्के से भरते दिखें, तो उनको तुरंत रगड़ दिया जाए। ऐसे में लिखते-लिखते आखिर में एक ही बात सूझती है कि ऐसी तमाम ताकतों को अदालती इंसाफ पर अब तक भरोसा है, और अगर देश की अदालतों ने वक्त पर अपना काम पूरा किया होता, तो शायद हिन्दुस्तानी पीढिय़ां उठकर आगे बढ़ सकती थीं। लेकिन इसके साथ-साथ हिन्दुस्तान की राजनीतिक पार्टियों को देखने पर भी शर्म आती है, कि कहीं पर टाईटलर और सज्जन कुमार की ताजपोशी होती है, तो कहीं पर अमित शाह की। राजनीतिक दल अपनी सोच को जनता के लिए हिंसक बनाकर चलने में कुछ बुरा नहीं मानते। 

सामाजिक संपत्ति के बेहतर प्रबंधन की एक अच्छी सोच राष्ट्रीय वक्फ विकास निगम

29 जनवरी 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज राष्ट्रीय वक्फ विकास निगम लिमिटेड नाम के एक पब्लिक सेक्टर की शुरुआत की है, जो कि देश भर में वक्फ की बिखरी हुई जमीन-जायदाद को देखेगा, और उसके बेहतर इस्तेमाल, उससे कमाई का इंतजाम भी करेगा। अल्पसंख्यकों के हाल का अध्ययन करके सच्चर कमेटी ने जो रिपोर्ट दी थी उसमें भारत को दुनिया भर में सबसे अधिक वक्फ-जमीन-जायदाद वाला देश पाया गया था और ऐसी करीब पांच लाख संपत्तियों से बारह हजार करोड़ रूपए सालाना तक की कमाई का अंदाज कमेटी ने लगाया था। आज उनसे सालाना कमाई कुल 163 करोड़ रूपए ही है, क्योंकि कहीं स्थानीय वक्फ बोर्ड और कमेटियों में बदइंतजामी है, तो कहीं उसकी जमीन-जायदाद पर अवैध कब्जे हैं।  यह अपने किस्म का एक पहला काम है, जिसमें किसी धर्म से, उसके संगठनों से जुड़ी हुई धार्मिक और सामाजिक जमीन-जायदाद के रख-रखाव और उसकी कमाई की संभावनाओं को देखते हुए उनको संगठित और योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने के लिए ऐसा एक राष्ट्रीय निगम बनाया गया है। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम कई बार धार्मिक और सामाजिक, राजनीतिक और समाजसेवी संगठनों को लेकर ऐसी बात लिखते हैं कि सरकार या जनता के दिए हुए दान या सहयोग से जो संगठन चलते हैं, उनके कामकाज, हिसाब-किताब, और उनकी दौलत को लेकर एक पारदर्शिता रहनी चाहिए, और उनके बेजाइस्तेमाल के खिलाफ एक अधिक कड़ा कानून असरदार तरीके से इस्तेमाल करना चाहिए। अभी कुछ वक्त पहले ही एक खबर आई थी कि एक विदेशी दानदाता अफ्रीका में किसी ईमानदार नेता को छांटकर उसको दान देना चाह रहा है, लेकिन उसे ऐसा कोई नेता अफ्रीकी देशों में मिल नहीं रहा। भारत में भी लोग दान देने की नीयत रखते हुए भी कई बार दान नहीं दे पाते क्योंकि उनको कोई भरोसेमंद समाजसेवी संगठन नहीं मिलता। यह सिर्फ मुस्लिम समाज के वक्फ की जमीन-जायदाद का मामला नहीं है, हिन्दू समाज में भी जगह-जगह गौशाला से लेकर मंदिर तक, और मठ से लेकर आश्रम तक की जमीनों के बेजा इस्तेमाल, उनमें अवैध कब्जे, उनकी अवैध बिक्री के मामले बिखरे पड़े हैं। इसी तरह चर्च की संपत्ति या ईसाई मिशनों की संपत्ति पर चारों तरफ अवैध कब्जे होते हैं, और हम छत्तीसगढ़ में ही चर्च की संपत्ति की अवैध बिक्री के मामले देख चुके हैं, जो कि अदालतों में चल रहे हैं।
इसलिए आज अगर मुस्लिमों की सामाजिक संपत्ति के रख-रखाव के लिए, और उसके बेहतर इस्तेमाल के लिए केन्द्र सरकार ने ऐसा एक निगम बनाया है, तो यह एक अच्छी पहल है। इसी तरह हिन्दुओं के मंदिरों और मठों के रख-रखाव के लिए भी अगर केन्द्र या राज्य सरकारें कोई पहल कर सकती हैं, तो उससे धर्म स्थानों के प्रति धर्मालु लोगों का भरोसा बढ़ेगा, वहां का काम बेहतर होगा, और वहां पर दान भी बढ़ेगा। देश के सबसे बड़े हिन्दू धर्म स्थानों में से एक, आन्ध्र के तिरूपति में राज्य सरकार का ट्रस्ट ही सारा इंतजाम देखता है, और वहां की कमाई से सरकार जनकल्याण के बहुत सारे काम भी करती है। धर्म, आध्यात्म, जाति, या आस्था के किसी और किस्म के केन्द्र पर से मनमानी और एकाधिकार का इंतजाम खत्म होना चाहिए, और वहां पर एक पारदर्शिता सार्वजनिक जीवन के हित में आनी चाहिए। आज हम देख रहे हैं कि किस तरह आसाराम नाम के जेल में बंद आदमी के बनाए हुए कानूनी और गैर कानूनी आश्रमों में हजारों करोड़ की दौलत लगी हुई है, लेकिन उसकी कोई सामाजिक जवाबदेही नहीं है। इसी तरह हम छत्तीसगढ़ के बहुत से मठों की संपत्ति देखते हैं, जिन पर कब्जा करने के लिए गुंडे-मवाली जुट जाते हैं, और वहां गद्दियों पर बैठे हुए लोग दान से मिली हुई दौलत को अपने जेब के निजी सिक्कों की तरह खर्चते हैं, बांटते हैं, दबा लेते हैं। हिन्दू समाज में जब-जब मंदिरों की दौलत को एक सीमा से बढ़ते हुए देखकर उस पर सरकारी इंतजाम की बात उठती है, तो उसका विरोध भी होता है। दक्षिण भारत के एक प्रमुख मंदिर के सोने के खजाने को लेकर बड़ी अदालतों तक मामला गया, कि सरकार को उस दौलत को तौलने का हक भी नहीं है। दरअसल सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए नेताओं और अफसरों की साख इतनी कम रहती है, कि बहुत सी जगहों पर लोगों को लगता है कि धर्म स्थानों को लूटने वाले मौजूदा मुखिया सरकारी लोगों के मुकाबले फिर भी कम बेईमान होंगे। सरकार की साख कम होने का यह एक नुकसान होता है। 
ऐसे माहौल में अगर मुस्लिम समाज के वक्फ की जमीन-जायदाद का एक बेहतर प्रबंधन हो सकता है, और उसकी कमाई से समाज का भला हो सकता है, तो आगे चलकर इससे बाकी धर्म के लोगों को भी एक राह सूझ सकती है।

हिन्दुस्तानी नेताओं की बातों के संपादन की जरूरत...

28 जनवरी 2014
संपादकीय
राहुल गांधी का कल रात टीवी पर आया पहला बहुत लंबा इंटरव्यू जितने जवाब पेश कर सका, उससे अधिक सवाल छोड़ गया। देश के सबसे हमलावर टीवी पत्रकार अर्नब गोस्वामी ने टाईम्स नाऊ टीवी चैनल के लिए यह इंटरव्यू लिया था, और आज के हमारे अखबार के पन्नों पर इसका खासा बड़ा हिस्सा जा रहा है, इसलिए उसकी बातों को इस संपादकीय में हम नहीं दुहरा रहे। 
हर नेता का अपना-अपना व्यक्तित्व होता है, और राहुल गांधी के काम करने का, बात करने का अपना एक तरीका है। वे ही अकेले ऐसे नहीं हैं जो कि बहुत तेज-तर्रार बात न करें, बहुत से और भी नेता बहुत सी पार्टियों में रहते हैं, जो कि विनम्रता छोड़ नहीं पाते, राहुल गांधी उनमें से ही एक हैं। लेकिन कल के इंटरव्यू से बहुत से ये सवाल खड़े हुए हैं कि अगर कांग्रेस को अगले संभावित प्रधानमंत्री के पास बहुत सीधे और साफ सवालों के कोई जवाब नहीं हैं, और वे बहुत से सवालों के जवाब में सैद्धांतिक बातों को दुहराने लगते हैं, तो ऐसा भी लगता है कि इस इंटरव्यू की तैयारी करवाने वाले कांग्रेस के उनके सलाहकार और मददगार भी कमजोर थे। 
हमको कांग्रेस के इस भविष्य से कुछ और साफगोई की उम्मीद थी। देश की जनता बातों को जिस जुबान में समझती है, वह सीधी और सपाट जुबान कोई बुरी बात नहीं है। और सामाजिक जीवन में जब लोगों को खासे मुद्दों पर बोलना पड़ता है, खासा बोलना पड़ता है, तो उनको जनसंचार के, लोगों पर असर डालने के तरीके सीखना भी चाहिए। यह दिक्कत सिर्फ राहुल गांधी के साथ हो ऐसा भी नहीं है। कुछ ही दिन पहले जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी ने एक जनसभा में बहुत ही अधिक लंबा भाषण दिया, तो भी हमको लगा कि उनके प्रचार सलाहकार ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, और हर दूसरे-तीसरे दिन जिस नेता के बहुत ही लंबे-लंबे भाषण आते हैं, उस नेता को अपने एक भाषण की लंबाई और चौड़ाई, उसमें जिक्र होने वाले मुद्दों की गिनती का ख्याल भी रखना चाहिए। मोदी के उस भाषण को सुनते हुए जब कोई आधा-एक घंटा गुजर गया, तो अखबार के पन्ने तैयार करते हुए हमको यह समझ नहीं आया कि मोदी के आज के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा क्या है, वे किस बात को अखबार की सुर्खियां बनवाना चाहते हैं? 
लोकतंत्र में चूंकि नेताओं की बातों का जनता पर असर का सीधा मकसद होता है, इसलिए अब नेताओं का ऐसा प्रशिक्षण जरूरी है जिससे कि उनकी पार्टी का सैकड़ों करोड़ का प्रचार का बजट भी असरदार हो सके। नेता किस मौके पर, किन मुद्दों पर, किस मीडिया के मार्फत, किन लोगों से मुखातिब हो रहे हैं, और पिछले कुछ दिनों में उन लोगों से वे क्या-क्या बोल चुके हैं, इसका ख्याल अगर वे नहीं रखते हैं, तो उनकी कही बातें असर पैदा नहीं कर पातीं। दुनिया के अमरीका जैसे कई देश हैं जहां पर सरकारी सलाहकार या राजनीतिक दलों के रणनीतिकार अपने नेता के भाषण तय करते समय पहले से यह हिसाब लगा लेते हैं कि अगले दिन वे कौन सी बात को अखबारों की हेडलाईन में चाहते हैं। उसी मुताबिक बातों पर जोर दिलवाया जाता है, भाषा और वाक्यों को उसी हिसाब से तय किया जाता है। आज हमारा यह मानना है कि टीवी के जीवंत प्रसारण पर भी कोई नेता लोगों को घंटे भर तक नहीं बांध सकते, चाहे वे नरेन्द्र मोदी ही क्यों न हों। और हमारा दूसरा यह भी मानना है कि एक नेता के हफ्ते भर में, या महीने भर में, भाषणों, साक्षात्कारों और बयानों की एक सीमा भी होनी चाहिए, अगर वे चाहते हैं कि पाठक, श्रोता, दर्शक, या जनता उनकी बातों को ध्यान से सुनें। जिस तरह समंदर के किनारे रेत में दूर-दूर बिखरी मोतियों वाली सीप भी अनदेखी रह सकती है, उसी तरह शब्दों की रेत अगर बहुत अधिक हो जाती है, तो फिर जिन बातों पर नेता जोर देना चाहते हैं, वह जोर कहीं खो जाता है। 
जिस तरह अखबारों में खबरों के संपादक होते हैं, टीवी पर संपादक होते हैं, और अंग्रेजी भाषा में तो कविता और उपन्यास के भी संपादक होते हैं, उसी तरह हमारा ख्याल है कि नेताओं के भाषणों, और बयानों के भी संपादक होने चाहिए। हिन्दुस्तान में आज ऐसा नहीं दिखता है, और उससे जनता का वक्त तो खराब होता ही है, खुद नेता की मेहनत और उनकी संभावनाएं भी खराब होती हैं। 

प्रणब मुखर्जी के राष्ट्र के नाम संदेश में गलत कुछ भी नहीं...

27 जनवरी 2014
संपादकीय
गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का यह भाषण, इस दिन का उनका पहला भाषण था, और यूपीए सरकार के इस कार्यकाल का आखिरी गणतंत्र दिवस भी यही था। इसलिए लोग राष्ट्रपति के राष्ट्र के नाम संदेश को एक राजनीतिक और चुनावी संदेश की तरह भी देख रहे हैं, और एक व्याख्या यह हो रही है कि उन्होंने परंपरागत विवादहीन संदेश के बजाय एक जीता जागता संदेश दिया है जो एक नजरिए से देखने पर आम आदमी पार्टी पर हमला करते हुए भी लगता है, दिखता है। उनके भाषण को हम विस्तार से छाप रहे हैं इसलिए पूरी बातों को यहां लिखना गैरमुनासिब होगा, लेकिन आम आदमी पार्टी पर हमले की तरह जो लाईन दिख रही है, वह यह है- ''लोकलुभावन अराजकता, शासन का विकल्प नहीं हो सकती।ÓÓ 
उनकी यह बात जाहिर तौर पर इस पार्टी पर भी लागू होती है, लेकिन यह बात सिर्फ इसी पर लागू नहीं होती। इसी सांस में उन्होंने कुछ और बातें भी कही हैं- ''सार्वजनिक जीवन में पाखंड का बढऩा भी खतरनाक है। चुनाव किसी व्यक्ति को भ्रांतिपूर्ण अवधारणाओं को आजमाने की अनुमति नहीं देते हैं। जो लोग मतदाताओं का भरोसा चाहते हैं, उन्हें केवल वही वादा करना चाहिए जो संभव है। सरकार कोई परोपकारी निकाय नहीं है। ÓÓ इन बातों को देखें तो यह साफ है कि कल तक वित्त मंत्री रहे हुए प्रणब मुखर्जी ने देश की अर्थव्यवस्था की आज की बदहाली, और राजनीतिक दलों, राज्य और केन्द्र सरकारों द्वारा जनता को रियायतों के तोहफों के बारे में एक ऐसी बात कही है, जो कि देश को डूबने से बचाने के लिए कोई भी अर्थशास्त्री, या कोई भी वित्त मंत्री कह सकते हैं, या अर्थव्यवस्था की समझ रखने वाले लोग ऐसा कहते ही रहते हैं। यह बात उसी सांस में कही गई है, और यह सिर्फ केजरीवाल पर लागू नहीं होती। दूसरी बात यह कि लोकलुभावन अराजकता के खिलाफ उन्होंने जो कहा है, वह बात तो बहुत से सामाजिक संगठनों पर लागू होती है, और इसमें केजरीवाल-विरोधी संगठन भी शामिल हैं, जो कि सड़कों पर हैं। कल की ही बात लें, तो महाराष्ट्र में राज ठाकरे के भड़काऊ और हिंसक बयान के बाद महाराष्ट्र में कई जगहों पर उनके कार्यकर्ताओं ने टोल टैक्स देने के बजाय टोल नाकों पर तोडफ़ोड़ और हिंसा की। इसलिए लोकलुभावन अराजकता के एक नायक, या खलनायक, अरविंद केजरीवाल का कोई एकाधिकार इस अराजकता पर नहीं है। देश में गैरराजनीतिक ताकतों ने भी कई मौकों पर ऐसे आंदोलन किए हैं जो जनता को लुभाने वाले थे, लेकिन अराजक थे। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, आरक्षण के नाम पर, क्षेत्रीयता के नाम पर कितने ही ऐसे अराजक आंदोलन होते रहते हैं। इसलिए आज ऐसी अराजकता के सबसे बड़े मुजरिम अरविंद केजरीवाल पर ही यह निशाना लगा हो, ऐसा नहीं है। यह जरूर हो सकता है कि वे आज इस अराजकता के सबसे बड़े झंडाबरदार हैं, और इसलिए राष्ट्रपति की बात उन्हीं पर सबसे अधिक लागू होती है। 
अगर बहस के लिए, कुछ देर के लिए हम यह मान भी लें कि केजरीवाल का नाम लिए बिना राष्ट्रपति ने उन पर हमला किया है, तो भी हमको एक मुर्दा भाषण के बजाय एक जिंदा भाषण बेहतर लगता है, जो कि भारतीय लोकतंत्र के खतरों पर हमला करता है, जनता को आगाह करता है। राष्ट्रपति ने तो देश के भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना कुछ कहा है, और यह भी कहा है कि अगर सरकारें भ्रष्टाचार को खत्म नहीं करेंगी तो मतदाता उनको हटा देंगे। पहली नजर में कोई प्रणब मुखर्जी की इस बात को यूपीए पर हमला भी करार दे सकते हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के सबसे बड़े आरोप आज यूपीए सरकार पर ही लगे हैं। लेकिन जैसा उन्होंने लोकलुभावनी अराजकता, और रियायतों के नामुमकिन से वायदों के खिलाफ कहा है, उसी तरह यह बात भी कही है। और हम इसे देश के हालात की कई अलग-अलग मिसालों पर हमला मानते हैं, सिर्फ आम आदमी पार्टी, या यूपीए पर नहीं। 
15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे मौकों पर परंपरागत मुर्दा भाषणों का कोई मतलब नहीं है। देश की हकीकत, और आज के हालात को देखते हुए, सच से मुंह मोड़े बिना, ठोस बात करनी चाहिए, और प्रणब मुखर्जी ने वैसा ही किया है। 

Bat ke bat, बात की बात,

25 jan 2014

लोकतंत्र चलाते लोग विवेक का इस्तेमाल करें, और विवेक का विशेषाधिकार खत्म करें

25 जनवरी 2014
संपादकीय
महाराष्ट्र के सेवाग्राम में कल दर्जन भर राज्यों से आए पंचायत-प्रतिनिधियों से बात करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि 50 फीसदी सांसद सांसद स्थानीय क्षेत्रीय विकास निधि (एमपीलैड) के पक्ष में नहीं हैं। केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा ने पिछले महीने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर योजना के प्रावधानों में बदलाव या इसकी जगह नया कार्यक्रम लाने की मांग की थी। राहुल ने कहा कि इस योजना में इतना धन नहीं मिलता कि पूरे संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य कराया जा सके। इससे लोकसभा क्षेत्रों में सदस्यों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस बारे में सोचना चाहिए। 
कुछ वक्त पहले एक प्रमुख जनसंगठन मास फॉर अवेयरनेस की रिपोर्ट में यह सामने आया था कि पिछले तीन बरस में लोकसभा के सांसद अपनी सांसदनिधि की एक तिहाई रकम भी खर्च नहीं कर पाए हैं। गरीबों के लिए संसद में सबसे अधिक बढ़-चढ़कर जो लोग बोलते हैं उनमें से एक, बिहार के छपरा के सांसद लालू प्रसाद यादव ने तीन बरस में मिले चौदह करोड़ रूपए में से एक पैसा भी खर्च नहीं किया है। इतनी ही रकम हर सांसद को मिली है लेकिन एनडीए के संयोजक शरद यादव उसमें से कुल पैंसठ लाख खर्च कर पाए। इस अध्ययन का एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि हिमाचल में भ्रष्टाचार के मामले में अदालत में खड़े हुए वहां के भूतपूर्व मुख्यमंत्री ने सांसद रहते हुए अपनी सांसदनिधि से सबसे अधिक आबंटन किया था। दिल्ली की खबर है कि बड़े-बड़े नेताओं ने सांसद निधि से उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र ने सार्वजनिक काम करवाने के लिए मिलने वाली बड़ी रकम खर्च करने की जहमत ही नहीं उठाई है। 
सांसदनिधि की चर्चा होने पर यह याद पड़ता है कि किस तरह कुछ समय पहले कुछ सांसद इस बजट से आबंटन करने के लिए कमीशन के विवाद में घिरे थे, और इस पर संसद में चर्चा भी हुई थी। इसी तरह राज्यों में विधायकों के लिए विधायक निधि बना दी गई है जिससे कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने चुनाव क्षेत्रों के कुछ कामों के लिए रकम मंजूर कर सकें। दरअसल पंचायत व्यवस्था लागू होने के बाद शहरी संस्थाओं और पंचायतों के अलग-अलग स्तरों पर सारा खर्च उन्हीं के मार्फत होता है और सांसद-विधायक खाली हाथ, चुनाव क्षेत्र में बिना अधिकार रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि ये लोग सांसद और विधायक को वित्तीय अधिकार मिलने की वकालत करते हैं ताकि अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों को कुछ संतुष्ट कर सकें। 
हम पहले भी कई मौकों पर सांसद-निधि या इसी तरह के विवेक के दूसरे अधिकारों के खिलाफ लिखते आए हैं। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि संसदीय व्यवस्था में सांसदों और विधायकों का काम सदन में सरकार के कामकाज, सार्वजनिक मुद्दों और दीगर बातों को उठाने का रहता है और नए कानून बनाने या पुराने कानून में संशोधन की जरूरत पडऩे पर उन पर विचार रखने और वोट डालने का रहता है। सरकार से संबंधित कई किस्म की रिपोर्ट सदन में रखी जाती है, सरकार वहां बजट रखती है, टैक्स प्रस्ताव रखती है, और उस पर भी सांसद और विधायक अपने-अपने सदनों में बात करते हैं। यह काम अपने चुनाव क्षेत्र में किसी रकम मंजूर करने से बिल्कुल अलग है, और ऐसे किसी बजट की जरूरत कानून निर्माताओं को होनी भी नहीं चाहिए। सांसद और विधायक को अपने इलाके में स्थानीय संस्थाओं के साथ ऐसे संबंध रखने चाहिए कि वे चुनाव क्षेत्र की दिक्कतों और संभावनाओं पर स्थानीय संस्थाओं से बात कर सकें। लेकिन अपने हाथों, अपने विवेक से कुछ बांटने की सामंती और राजसी आदत भारत जैसे देश में सैकड़ों बरस से चली आ रही है, और किसी व्यवस्था के तहत बंधकर ही काम करना लोगों को बेबसी सा लगता है। इसलिए किसी समय स्कूटर और टेलीफोन का सांसद कोटा होता था, अभी भी शायद रसोई गैस कनेक्शनों का सांसद कोटा है, केन्द्रीय विद्यालयों में प्रवेश का कोटा है, ट्रेन में आरक्षण का कोटा है जिसके बाजार में बिकने की बहुत चर्चा रहती है। 
लोकतंत्र में विवेक का अधिकार कम से कम होना चाहिए, और सांसदनिधि और विधायकनिधि लोकतांत्रिक सोच के ठीक खिलाफ है। बहुत सी जगहों पर यह चर्चा भी रहती है कि इससे आबंटन करने के लिए जनप्रतिनिधि या उनके सहायक कमीशन भी लेते हैं। बिना किसी सुबूत के इस बात को ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं है, लेकिन इस तरह के सारे फंड खत्म होने चाहिए, विवेक के सारे अधिकार खत्म होने चाहिए। किस बच्चे को स्कूल में दाखिला दिया जाए, इसे सांसद के विवेक के अधिकार पर क्यों छोड़ा जाए? ऐसे में सबसे अधिक हकदार बच्चे स्कूल के बाहर रह जाएंगे और सांसद की सिफारिश पर उनके पसंदीदा बच्चे केन्द्रीय विद्यालय में पहुंच जाएंगे। विवेक के अधिकार की हसरत का तो कोई अंत नहीं हो सकता, यह बढ़ते हुए नौकरी बांटने तक भी जा सकती है, और खदान बांटने तक भी जा सकती है। आज देश की जो हालत है उसमें सार्वजनिक जीवन के लोगों को, जनता के पैसों का, समानता के अधिकारों का अपने विवेक से इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। काफी समय से देश में यह चर्चा चल रही है कि विवेक के ऐसे अधिकार खत्म हों, और अब जब संसद पर लोगों का भरोसा न रह जाने की बात हो रही है, तो ऐसे अविश्वास के जो भी कारण हो सकते हैं उनको दूर करना भी जरूरी है। 

बात की बात, Bat ke bat,

24 jan 2014

जनजीवन को बंधक बनाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कुछ करे

24 जनवरी 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट से आज दो ऐसे आदेश निकले हैं जिनके बारे में हम पिछले कुछ दिनों से लगातार लिख रहे थे कि अदालत को खुद होकर ऐसी दखल देनी चाहिए। पश्चिम बंगाल में एक जाति-पंचायत ने एक महिला पर जिस तरह से सामूहिक बलात्कार करवाया, उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर बंगाल सरकार को नोटिस दिया है और उस जिले के जज को भी आदेश दिया है। दूसरी तरफ दिल्ली में बदअमनी फैलाने वाले वहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के गैरजिम्मेदाराना धरने को लेकर भी दायर एक जनहित याचिका को मंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार, दिल्ली पुलिस, और केजरीवाल को नोटिस दिया है। 
आज जब खाप पंचायतों से लेकर आदिवासी पंचायतों तक में भयानक जुर्म के दर्जे के जुल्म महिलाओं पर हो रहे हैं, देश के सामाजिक माहौल को हजारों बरस पहले की कट्टरता तक ले जाने की कोशिश हो रही है, और जब चुनावी राजनीति करने वाली ताकतें ऐसी कोशिशों के खिलाफ मुंह खोलने से भी कतराती हैं, तो अदालत की दखल जरूरी हो जाती है क्योंकि जजों के सामने चुनाव लडऩे की मजबूरी नहीं होती और वे भीड़ को कड़वे लगने वाले फैसले ले सकते हैं, दे सकते हैं। जो खबर बंगाल के आदिवासी इलाके से निकली है, वह इतनी भयानक है, कि दिल्ली की सड़कों पर चलती गाडिय़ों में होने वाले गैंगरेप भी उसके सामने कहीं नहीं टिकते। जब एक गांव की जाति पंचायत फैसला लेकर गैरजात में प्रेम या शादी करने वाली लड़की पर सार्वजनिक रूप से, लोगों की मौजूदगी में दर्जन भर लोगों से सामूहिक बलात्कार करवाती है, और उसे सामाजिक सजा करार देती है, तो यह मामला देश के माहौल की एक झलक भी बतलाता है। जब आम बलात्कारी एक जुर्म के तहत बलात्कार करते हैं, तो वह जुर्म भी ऐसे सामाजिक फैसले वाले जुर्म के मुकाबले छोटे जुर्म लगते हैं। 
किसी गांव की जात पंचायत वहां की बेबस महिला के साथ जो कर रही है, कमोबेश वैसी ही हरकत केजरीवाल जैसे, बददिमाग नेता सत्तारूढ़ रहते हुए भी शहरी जिंदगी के साथ कर रहे हैं, उनके मंत्री कानून मंत्री रहते हुए जाहिर तौर पर गैरकानूनी काम कर रहे हैं, पहली नजर में जुर्म दिखने वाला काम कर रहे हैं, रंगभेदी काम कर रहे हैं, महिला विरोधी काम कर रहे हैं, और इस देश में बाहर से आए हुए विदेशियों के खिलाफ काम कर रहे हैं। और ऐसे जुर्म के बाद भी केजरीवाल और उनकी पार्टी अपने ऐसे मुजरिम मंत्री को बचाते हुए उसे सर्टिफिकेट देते हुए शहर की जिंदगी तबाह कर रहे हैं। जैसा कि इस पार्टी का नाम है, इसमें औरतों के लिए इज्जत की कोई जगह नहीं है, इस पार्टी से अन्ना हजारे के वक्त से जो लोग जुड़े हैं उन्होंने लोकपाल मसौदा कमेटी में किसी महिला को नहीं रखा था, इसलिए जब पार्टी बनी तो उसके नाम में आदमी शब्द उसी सोच को आगे बढ़ाने वाला था। आज जब इस पार्टी का एक पढ़ा-लिखा, वकालत करने वाला, कानून समझने वाला, कानून मंत्री सड़क पर आधी रात विदेशी महिलाओं से बदसलूकी की अगुवाई करता है, उनको घर से निकालकर उन पर वेश्यावृत्ति और नशे के धंधे के आरोप लगाता है, कानून हाथ में लेता है, तो यह इस पार्टी की उसी सोच का हिस्सा है जिसके तहत इसके मुख्यमंत्री कानून तोड़ते हुए सड़कों पर एक निहायत गैरजरूरी धरना देते हैं, और देश की राजधानी की जिंदगी तबाह करते हैं। हमारा मानना है कि मीडिया के कई हिस्सों में आ रहे चुनावी सर्वे में इस पार्टी को जितने भी वोट मिलने की बात कही जा रही है, वे अंदाज दिल्ली के इन दो ताजा तानाशाह मामलों के पहले के होंगे, और आज अगर देश में फिर से सर्वे होगा, तो थकी-हारी जनता इस पार्टी के खिलाफ ही जाएगी। 
सुप्रीम कोर्ट और देश के कई हाईकोर्ट जनजीवन से जुड़े हुए मामलों को लेकर दशकों से ऐसे फैसले और आदेश देते आ रहे हैं जो कि धरना-प्रदर्शन, बंद और जुलूस, ध्वनि प्रदूषण जैसे मामलों में जनता का ख्याल रखने वाले हैं। यह एक अलग बात है कि राजनीतिक दल सत्ता या विपक्ष कहीं भी रहते हुए इन फैसलों की इज्जत नहीं करते। ऐसे में दिल्ली के ताजा धरना को लेकर केजरीवाल से लेकर केन्द्र सरकार तक जारी नोटिसों पर जब आगे सुनवाई हो, तो सुप्रीम कोर्ट को यह साफ कर देना चाहिए कि राजनेता, राजनीतिक दल अपनी मनमानी से जनता के जिंदगी को बंधक नहीं बना सकते। 

बात की बात, Bat ke bat,

23 jan 2014

जिंदगी और मौत तय करने का सरकारी हक खत्म होना चाहिए

23 जनवरी 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले एक महत्वपूर्ण फैसले में फांसी के इंतजार में जेलों में बरसों से बंद दर्जन भर से अधिक लोगों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, क्योंकि सरकार ने उनके मामलों में फैसले लेने में बरसों लगा दिए थे। लोगों को याद होगा कि पिछले दो-तीन बरस में केन्द्र सरकार ने अपने बचाव में यह तर्क दिया था कि यूपीए ने कितने बरसों में फांसी के कितने मामलों में रहम की अर्जी पर फैसले लिए और राष्ट्रपति को भेजे, और यूपीए के पहले एनडीए ने इस पर धीमी रफ्तार से काम किया था। 
भारत की अदालतों में कामकाज को लेकर तो लोगों के मन में यह बात बैठी भी है कि कई किस्म के मामलों में फैसला आने में पीढिय़ां निकल सकती हैं, अभी किसी ने हिसाब किया था कि दिल्ली हाईकोर्ट में खड़े हुए मामलों, और हाईकोर्ट में निपटारे की रफ्तार को देखते हुए सारे मामले निपटने में चार सौ से बहुत अधिक बरस लग जाएंगे। अब सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि केन्द्र सरकार में भी कामकाज की क्या रफ्तार है, खासकर ऐसे मामलों में जहां जेलों में बंद सजायाफ्ता कैदी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, और बाहर उनका परिवार ऐसी ही मानसिक यातना और अनिश्चितता से गुजरते हैं। ऐसे मामलों में भी केन्द्र सरकार फैसले लेने और सिफारिश राष्ट्रपति को भेजने में बरसों लगाती है। लेकिन अदालत या सरकार की यह देरी आज की इस चर्चा का मकसद नहीं है। हमारा सोचना यह है कि देश की निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट होते हुए जो मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं और वहां पर आखिरी फैसला होने के बाद अगर केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के हाथ फांसी की सजा से माफी का हक है, तो फिर अदालती कार्रवाई का, और इंसाफ के लिए बनाए गए ढांचे का क्या महत्व है? 
पिछले बरसों में कश्मीर या पंजाब के फांसी के कुछ मामलों में उन प्रदेशों में भारी तनाव का सामना करना पड़ा, और केन्द्र सरकार के खिलाफ विपक्षी राजनीतिक दलों ने अल्पसंख्यकों को फांसी देने में देरी का आरोप लगाया, और देश में एक निहायत गैरजरूरी कड़वाहट हवा में घुली। केन्द्र सरकार को माफी के इस पूरे सिलसिले से अपने को अलग रखना चाहिए, और देश के कुछ राष्ट्रपतियों ने  केन्द्र सरकार के रहम की अर्जी पर भेजी सिफारिश पर कोई फैसला लेने से इंकार भी कर दिया था। देश के पूरे अदालती ढांचे से परे चुनावों में जाने वाली राजनीतिक ताकतों को किसी तरह के विवेक का अधिकार नहीं देना चाहिए जिससे कि वे जिंदगी और मौत तय कर सकें। सत्ता हांकने वाले लोगों को विवेक के अधिकार बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन यह सोचें कि मौत की सजा पाए हुए, जेल में बंद कैदी अगर किसी छोटे और कमजोर प्रदेश के हैं, उनके पीछे कोई राजनीतिक ताकतें नहीं हैं, उनके पीछे किसी जाति या धर्म की भीड़ नहीं है, तो फिर उनके मामलों में केन्द्र सरकार रियायत क्यों करेगी? राजनीतिक ताकतों के हाथ चुनावी मजबूरी के पहले ऐसे कोई हक नहीं दिए जाने चाहिए। 
सुप्रीम कोर्ट को केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के माफी के हक के बारे में भी खुलकर कहना चाहिए, कि इससे इंसाफ के बाद राजनीतिक मनमर्जी से फैसले होते हैं, और यह बराबरी के अधिकार के खिलाफ है। पूरे देश में आज सत्ता के विवेक के अधिकार, विशेषाधिकार, सामंती मनमानी के अधिकार के खिलाफ एक हवा चल रही है। और सरकारों या राष्ट्रपति-राज्यपाल को भी विवेक के अधिकारों को खत्म करना चाहिए, क्योंकि इनके बेजा इस्तेमाल का खतरा कभी खत्म नहीं हो सकता। 

बात की बात
22 Jan, 2014

आज की दुनिया के साथ चलने जरूरी है अंग्रेजी

22 जनवरी 2014
संपादकीय

कुछ दिन पहले की एक खबर के मुताबिक अंग्रेजी जानने वाले, अंग्रेजी नहीं जानने वालों के मुकाबले रोजगार के ज्यादा मौके पाते हैं और उनकी आय में 34 फीसदी का फर्क होता है। हम अपने अखबार में हमेशा से अंग्रेजी की जानकारी की हिमायत कई कारणों से करते रहे हंै।  रोजगार के अवसर, कमाने के ज्यादा मौके उनमें से एक है। आज के उदारीकरण के जमाने में जब सस्ते श्रम के कारण भारत के लोगों के लिए विदेशों में रोजगार के मौके मिल रहे हंै, अंग्रेजी की जानकारी बेरोजगारी से जूझ रहे देश के लिए बहुत काम की साबित होती, लेकिन इस खबर में यह भी कहा गया है कि देश की केवल 20 फीसदी आबादी को ही अंग्रेजी आती है, उसमें भी 13 फीसदी ठीक ठाक, काम चलाऊ अंग्रेजी बोल पाती हैं और केवल 4 फीसदी ही ऐसे हंै, जो फर्राटेदार अंग्रेजी बोल पाते हैं। खबर में यह भी बताया गया है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में उच्च शिक्षा पाने वाले 75 फीसदी लोग अंग्रेजी बोल पाते है, जबकि उत्तर और मध्य भारत के ऐसे 25 फीसदी से भी कम लोग अंग्रेजी बोल पाते हैं। यह हालत न केवल भारत में पढ़ाई-लिखाई का स्तर बताती है, बल्कि इसके अलग-अलग राज्यों में अब तक अपनाई गई नीतियों और बरती गई अदूरदर्शिता भी बयान करती है ।
आजादी मिलने के बाद, बरसों अंग्रेजों के गुलाम रहे देश में उनसे जुड़ी हर चीज की मुखालफत को देशभक्ति माना जाता रहा। इस भावना का शिकार हुआ यहां के लोगों का अंग्रेजी ज्ञान। चीन, जर्मनी जैसे देशों की मिसाल दी जाती थी कि कैसे वह अपनी भाषा को बढ़ावा देकर भी आगे बढ़  रहे हैं। शुक्र है उस दौर में भी देश में कुछ लोग ऐसे थे, जिन्होंने अंग्रेजी की अहमियत समझी और ऐसे लोगों की बदौलत आज भारत के अंग्रेजी के जानकार लोग चीन हांगकांग जैसे देशों में लोगों को अंग्रेजी पढ़ाकर रोजगार पा रहे हंै। दरअसल बात केवल रोजगार पाने के हिसाब से कोई भाषा सीखने की नहीं है। अंग्रेजी ही क्यों, कोई भी दूसरी भाषा की जानकारी किसी को दूसरों के मुकाबले ज्यादा पढ़ा-लिखा और काबिल बनाती है, लेकिन अंग्रेजी दुनिया के दूसरे हिस्सों के साथ जुडऩे का आसान जरिया है। वहां हासिल किए गए ज्ञान विज्ञान को सीख पाने, उनके यहां शिक्षा विज्ञान सामाजिक स्तर पर आए बदलाव को जानने सीखने का एक माध्यम है। आज जमाने में जब ज्ञान को ही असली धन दौलत माना जा रहा है, भारत में तकनीकी ज्ञान आयोग बनाया गया है, दुनिया के दूसरे हिस्सों से जुडऩे अंग्रेजी की जानकारी जरूरी है। खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में, जहां बाजार में टिके रहने की बुनियादी शर्त ही जमाने के मुताबिक हुनर सीखते जाना है, अंग्रेजी की जानकारी नहीं रखना लोगों के लिए खासकर नौ जवानों के लिए बहुत नुकसानदेह, कुंठित करने वाला है।
हम क्षेत्रवादी हुए बिना यह याद दिलाना चाहते है कि किस तरह दक्षिण भारत से कामकाज की तलाश में आए लोग, अंग्रेजी की जानकारी और शिक्षा के कारण दूसरे राज्यों में जाकर वाईट कॉलर नौकरिया करते रहे हैं, जबकि उत्तर और मध्यभारत के लोग, जिनमें छत्तीसगढ़ के लोग भी शामिल हैं, दूसरे राज्यों में जाकर मेहनत मजदूरी के काम कर असंगठित क्षेत्र में तरह तरह के खतरे उठाते हुए अपना और अपने परिवार का पेट पालने को मजबूर है। कुछ दिनों पहले हमने अपने व्य्ंाग्य चित्र 'पिक्स टूनÓ में छापा था कि किस तरह भारत से मंगलयान भेजने वाले वैज्ञानिकों में दक्षिण भारतीय नामों की भरमार थी। हम यह नहीं कहते कि अंग्रेजी जानने भर से कोई वैज्ञानिक बन जाता है, लेकिन इस विदेशी भाषा की जानकारी लोगों को खुद को ज्ञान, टेक्नालॉजी और हुनर सीखने में ज्यादा मदद तो करती है, इसमें शक नहीं ।
भारत के कई राज्यों में दुनिया के दूसरे हिस्सों की सोच से प्रभावित हो कर वहां रोजगार के मौके देख अब देश में लोग अंग्रेजी सीखने की तरफ झुके है। गुजरात जैसे राज्यों में सरकार ने युवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर की अंग्रेजी सिखाने के लिए बड़े पैमाने पर पहल की, हालांकि उसके मनचाहे नतीजे नहीं निकल पाए, जिसकी अपनी वजह थीं, लेकिन अंग्रेजी सीखने के लिए जनता में जागरुकता तो फैली। केवल नौकरियां पाने के लिए ही अंग्रेजी सीखना ही काम नहीं आता। एक विदेशी भाषा की जानकारी लोगों को जिंदगी के दूसरे मुद्दों पर भी अपना नजरिया बदलने, उन्हें सोचने में, उदारता बरतने में मददगार होती है। इसकी मिसाल केरल से ली जा सकती है, जहां अंग्रेजी कामकाज की दूसरी भाषा है। केरल मानव विकास सूचकांकों के मामलों में भारत सबसे  बेहतर राज्य है। वहां का लिंगानुपात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन है, वहां शिक्षा का स्तर अच्छा रहा है, कामकाज में पारदर्शिता का स्तर देश में सबसे बेहतर है। शिक्षा, सुशासन, स्वास्थ्य जैसे मामलों में केरल का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा। इन सबमें वहां की जनता में अंग्रेजी की जानकारी का क्या योगदान है यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन सामान्य समझबूझ से यह तो कहा ही जा सकता है कि अंग्रेजी ज्ञान के कारण वहां के लोगों के अपने राज्य से देश के दूसरे हिस्सों और विदेश में भी जाने के कारण केरल के समाज पर इसका कुछ सकारात्मक असर तो हुआ ही होगा।
 कहा जा रहा है कि आने वाले समय में भारत दुनिया का सबसे युवा देश होगा। ऐसे देश के युवा धन का ज्ञान के किसी एक क्षेत्र में कमजोर रह जाना देश की तरक्की के लिए ठीक नहीं। यहां की जनता की खुशहाली के लिए बुरा है, इसलिए राज्यों की सरकारों को अपने-अपने यहां अंग्रेजी के स्तर में सुधार लाने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चहिए, फिर उसमें अंग्रेजी शिक्षक तैयार करना हो या सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी की बेहतर पढ़ाई को बढ़ावा देना। यह समय दुनिया के साथ चलने का है अंग्रेजी की जानकारी के बिना देश की 80 फीसदी आबादी इस दौड़ में पीछे क्यों रह जाए। 

सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली सरकार के रूख पर कड़े फैसले की जरूरत

21 जनवरी 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई तय की है कि अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से दिल्ली जिस तरह अस्त-व्यस्त हो रही है उसे देखते हुए इस आंदोलन पर रोक लगाई जाए। और दूसरी याचिका है कि केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने विदेशी महिलाओं से जिस तरह का सुलूक किया है उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। दो दिन बाद सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओं पर तर्क सुनेगा। 
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बहुत से ऐसे मामलों को लेकर लिखते हैं कि देश की अदालतों को खुद होकर भी वीडियो रिकॉर्ड हो चुके, और प्रसारित हो चुके मामलों पर सरकारी चुप्पी देखते हुए अदालती दखल देना चाहिए। मुजफ्फरनगर दंगों के शिकार लोगों के बारे में भी हमने यह तर्क दिया था, कि उत्तरप्रदेश सरकार के मालिक मुलायम सिंह यादव जिस तरह की हिंसक बातें दंगाग्रस्त लोगों के खिलाफ कर रहे थे, उसके खिलाफ अदालत को उनको नोटिस देना था। अदालतों के तौर-तरीकों को लेकर लोकतंत्र में कई बार यह बहस चलती है कि न्यायिक सक्रियता कितनी हो, और कितनी नहीं, उससे कितना भला होता है और कितने खतरे होते हैं? ऐसे में अलग-अलग सोच काम करती है, और सुप्रीम कोर्ट में भी बैठे हुए बहुत से जजों का अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग रूख रहा है, और कुछ जज जनहित याचिकाओं को मंजूर करने के मामले में तंगदिल भी रहते हैं, और कुछ जज अखबारी खबरों को भी जनहित याचिका मानकर खुद होकर सुनवाई शुरू करने वाले भी रहे हैं। 
हमारी सोच इस बारे में यह है कि अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग मामलों में, लोकतंत्र के बाकी स्तंभ अगर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते हैं, तो अदालतों को खुद होकर उस जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लेना चाहिए, क्योंकि जनता के हाथ में यह नहीं है कि वह हर मामले को लेकर अदालत तक जा सके। उसे हक तो है, लेकिन उसके पास इतनी ताकत नहीं है कि वह बड़ी अदालत में पहुंचकर, जनहित याचिका लगाकर, तुरंत सुनवाई पा सके। ऐसे में अदालत को खुद होकर पहल करनी होगी। मिसाल के तौर पर मुजफ्फरनगर में हत्या और बलात्कार के शिकार, जली हुई बस्तियों से बेदखल, और राहत शिविरों में ठंड में अपने बच्चे खो रहे लोगों के बारे में कोई अगर यह सोचे कि अदालत तक पहुंचना उनका हक है, तो यह कागजी हक उनके किसी काम का नहीं है, क्योंकि उनके पास अदालती लड़ाई की ताकत ही नहीं है। इसी तरह दिल्ली में बार-बार एक बहुत गैरजिम्मेदार अराजक तरीके से, तानाशाह अंदाज में, बिना जरूरत जिस तरह से अरविंद केजरीवाल आंदोलन करके, शहर की जिंदगी को अस्त-व्यस्त करके, सड़कों पर कभी इस सरकार को, तो कभी उस सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं, उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर भी पहल करनी थी, और उसने इस पर जनहित याचिका मंजूर की है, तो हम इसे एक सही अदालती फैसला मानते हैं। 
जब देश में सरकारी, कानूनी, और संवैधानिक विकल्प सारे के सारे बचे हुए हैं, उस वक्त अगर केजरीवाल जैसे लोग भीड़ के बाहुबल से सरकारों से फैसला चाहते हैं, बिना जांच सजा दिलवाना चाहते हैं, लोगों की निजी जिंदगी को कुचलते हुए अपने आरोपों और शक के आधार पर इज्जत की धज्जियां उड़ाना चाहते हैं, तो वे सड़क पर सोने के हकदार नहीं हैं, जेल में सोने के हकदार हैं। और सुप्रीम कोर्ट को यह तय भी करना चाहिए कि दिल्ली का कानून मंत्री हो या कि कोई और, फुटपाथ पर भीड़ को लेकर इंसाफ तय करने का हक इस लोकतंत्र में कैसे दिया जा सकता है, किसे दिया जा सकता है, और वह कैसा लोकतंत्र होगा? क्या यह मौके पर मनमानी का इंसाफ और सजा कुछ उसी तरह के नहीं होंगे, जैसे कि कहीं पर तालिबान करते हैं, और कहीं पर नक्सली? सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में तय करना होगा, और हमारा मानना है कि दिल्ली सरकार के मंत्री-मुख्यमंत्री इस मोर्चे पर सजा के हकदार हो सकते हैं। 

Bat ke bat, बात की बात,

20 jan 2014

20 jan 2014

केजरीवाल आत्ममुग्ध होकर अपने ही नारों के सैलाब पर...

20 जनवरी 2014
संपादकीय

अरविंद केजरीवाल पर हम आज फिर से लिखना नहीं चाहते थे, लेकिन कोई दूसरा बड़ा मुद्दा नहीं है, और दिल्ली में केजरीवाल ने केन्द्र सरकार के खिलाफ आज जो धरना दिया है उस पर देश भर की जो प्रतिक्रिया इंटरनेट और टेलीविजन पर अब तक सामने आई है, उसे देखते हुए हम केजरीवाल से जुड़ी कुछ बातों पर लिखना चाहते हैं। इनमें से कुछ बातें हो सकता है महज उन पर ही लागू होती हों, और कुछ बातें हो सकता है कि और लोगों पर भी लागू हों। 
पहली बात तो यह कि अपने अलावा हर किसी को बेईमान मानना, अपनी ईमानदारी के पक्ष में कोई सुबूत नहीं होता, कोई तक भी नहीं होता, और यह निहायत बेइंसाफी की बात भी होती है। दिल्ली पुलिस को भ्रष्ट कहना, केन्द्र सरकार के गृहमंत्री को पैसे लेने वाला कहना, अफ्रीकी महिलाओं को पेशा करने वाली कहना, नशे का धंधा करने वाली कहना, सारे राजनीतिक दलों को भ्रष्ट कहना, यह तरीका लोकतांत्रिक नहीं है। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को सत्ता सम्हाले अभी जरा से दिन हुए हैं, उनके नेताओं के खिलाफ जो स्टिंग ऑपरेशन सामने आए थे, उस पर इस पार्टी ने टीवी चैनलों से पूरे का पूरा फुटेज पाए बिना किसी कार्रवाई से इंकार कर दिया था, और बाद में भी उसके आधार पर कोई कार्रवाई करना जरूरी या मुनासिब नहीं समझा। दूसरी तरफ जब दिल्ली जल बोर्ड के कुछ अफसरों के स्टिंग ऑपरेशन सामने आए, तो हाथ में टेप आए बिना भी सबको निलंबित कर दिया गया। और यह अकेला मामला नहीं था। अपने खुद के बारे में बिल्कुल अलग किस्म के नैतिकता के पैमाने बनाकर चलना, और दूसरे हर किसी को चोर कहना, यह लोकतंत्र में नहीं चल सकता। 
जहां तक दिल्ली में आज केजरीवाल के प्रदर्शन की बात, तो यह निहायत बेवकूफी और एक नाजायज जिद्द की बात है। जिन अफसरों से वे नाखुश हैं, उनको जांच के भी पहले निलंबित न करने पर वे केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के सामने गणतंत्र दिवस तक धरने पर बैठकर क्या साबित कर रहे हैं? आम आदमी पार्टी के एक बड़े नेता, देश के एक बड़े वकील प्रशांत भूषण की कानूनी समझ इस बारे में क्या कहती है, कि जांच के पहले ही लोगों को निलंबित कर देना चाहिए? अफ्रीकी महिलाओं के साथ दिल्ली सरकार के आम आदमी मंत्री और उनके साथियों की कथित बदसलूकी को लेकर देश के एक बड़े वकील हरीश साल्वे अदालत तक गए हैं, मौके पर मौजूद दिल्ली पुलिस ने इस कानून मंत्री के बुरे बर्ताव को उजागर करने वाला बयान दर्ज कराया है। अफ्रीकी महिलाओं ने केजरीवाल के कानून मंत्री और उसकी भीड़ की बदसलूकी का बयान दिया है। ऐसे में अपने घर को ठीक करने के बजाय केजरीवाल गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का घर ठीक करने का बयान दे रहे हैं। 
लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार अगर इस दर्जे की अराजकता दिखा रही है, तो इसे देखकर भारतीय जनता पार्टी आज सबसे अधिक खुश होगी, कि मोदी का खेल बिगाडऩे का खतरा बनने के पहले ही केजरीवाल नाम का यह धूमकेतु जनता के बीच आसमान से गिरकर मिट्टी में मिल जाएगा। बिना किसी मुद्दे के आज जब केजरीवाल एक सनकी और तानाशाही टकराव यूपीए सरकार से खड़ा कर रहे हैं, तो लोगों के मन में यह जायज शक खड़ा होता है कि क्या वे दिल्ली की सरकार को गिराकर अगले लोकसभा चुनाव में एक मुद्दा बनाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं? जिस तरह कुछ लोग कहानियों में उसी पेड़ की डाल काटते दिखते हैं, जिस पर कि वे बैठे रहते हैं, केजरीवाल उसी तरह हाथ में छेनी-हथौड़ी लेकर चबूतरे पर चढ़ाई गई अपनी ही प्रतिमा को चूर-चूर करते दिख रहे हैं। नारों की जुबान में अपने अलावा हर किसी के लिए उनकी गालियों की कोई जगह प्राकृतिक न्याय में भी नहीं है। ऐसा लगता है कि वे आत्ममुग्ध होकर अपने ही नारों के सैलाब पर चढ़-उतर रहे हैं, और ऐसी सर्फिंग उनको कहा ले जाकर छोड़ेगी, पता नहीं। 

असम में हिंदीभाषियों की हत्या, और दिल्ली में अफ्रीकी महिला...

19 जनवरी 2014
संपादकीय
असम में कल बोडो उग्रवादियों ने एक बस में सवार मुसाफिरों में से हिंदीभाषी लोगों को उतारा, और उनको गोली मार दी। उन्होंने कहा है कि अगर असम सरकार उनके बेकसूर साथियों को मुठभेड़ों में मारना बंद नहीं करती है तो वे हिंदीभाषी लोगों की ऐसी हत्या और भी करेंगे। अभी मारे गए लोगों में बिहार के मजदूर हैं जो वहां काम करने गए हुए थे। 
यह एक बहुत भयानक बात इसलिए है कि भारत एक संघ के रूप में बहुत से प्रदेशों से बना हुआ एक ऐसा देश है जिसमें हर प्रदेश के लोग बेरोक-टोक दूसरे प्रदेशों में जाकर काम कर सकते हैं, करते हैं, और कामकाज से लेकर रिश्तों तक, इस तानेबाने में पूरा देश एक है। अब अगर एक प्रदेश में भाषा या क्षेत्रीयता के आधार पर, रंग या धर्म, जाति या वैचारिक आधार पर लोगों को मारा जाएगा, तो यह पूरा देश तानेबाने खोकर धागों का एक बेमतलब गुच्छा ही रह जाएगा। हमने पिछले महीनों में कई मौकों पर ऐसी नौबत के खिलाफ लिखा है, और उनमें से कुछ तर्क, हमारी सोच आज भी असम के इस आतंकी हमले पर लागू हैं। 
और इसी वक्त देश की राजधानी दिल्ली में अफ्रीकी महिलाओं के साथ आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री और उनकी भीड़ ने जो बदसलूकी की है, और दिल्ली पुलिस इस बदसलूकी की गवाह भी है, उसके नतीजे आम आदमी पार्टी की सीमित म्युनिसिपल-समझ में अभी नहीं आ रही। अफ्रीकी देशों में हिंदुस्तान के जो लोग पीढिय़ों से बसे हुए हैं, वहां कमा-खा रहे हैं, उनके साथ अगर कोई जवाबी-हिंसक बर्ताव शुरू हो गया, तो क्या उसे दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती संभाल सकेंगे? तंग नजरिए और कमसमझ के लोग खुद हिंसा करने के पहले उस हिंसा की प्रतिक्रिया के बारे में नहीं सोच पाते। 
कुछ समय पहले गुजरात की खबर आई थी कि वहां पर बरसों से खेती कर रहे पंजाबी-सिख किसानों को मोदी सरकार ने नोटिस दिया था कि वे अपने खेत बेचकर चले जाएं, क्योंकि 1948 का मुंबई किरायादारी और खेतिहर जमीन कानून गुजरात में गैरगुजरातियों को खेती की इजाजत नहीं देता। इस मामले की शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंची और अभी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार पहली नजर में ऐसे सैकड़ों सिख किसानों के साथ भेदभाव की दोषी लगती है। आयोग ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति की है कि वहां की सरकार यह मानती है कि गैरगुजराती वहां जमीन के मालिक नहीं रह सकते, और सिख किसानों की ऐसी जमीनों के खाते सरकार ने अभी रोक रखे हैं।
एक दूसरी खबर उसी दौरान यह आई थी कि जम्मू-कश्मीर में एक कट्टरपंथी और अलगाववादी नेता सईद अली शाह गीलानी ने वहां के स्थानीय लोगों से कहा है कि वे बाहर से आकर काम करने वाले पांच लाख से अधिक मजदूरों को आने की इजाजत न दें, क्योंकि वे स्थानीय संस्कृति बिगाड़ते हैं। कश्मीर में खेती और दूसरे कामों में मजदूरों की कमी की वजह से बिहार, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, और छत्तीसगढ़ से लाखों मजदूर काम पाने जाते हैं। वर्ष 2008 में भी गीलानी ने बिहार के मजदूरों राज्य छोड़ जाने को कहा था, और ऐसे कुछ मजदूरों की हत्याओं के बाद दहशत में बाकी मजदूर छोड़कर चले गए थे। इस बार भी इस नई धमकी से दूसरे राज्यों के मजदूरों मेें कश्मीर में दहशत है। कश्मीर के लोगों का यह मानना है कि ऐसी धमकी से और मजदूरों के चले जाने से कश्मीर की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। 
भारत अपने-आपमें इतनी विविधताओं से भरा हुआ, इतने प्रदेशों वाला, इतनी भाषाओं और संस्कृतियों वाला, इतने पड़ोसी देशों से रोटी-बेटी के रिश्तों वाला, इतने धर्मों वाला, इतने किस्म के काम-धंधों वाला देश है कि यहां पर अगर इनमें से किसी एक आधार पर लोगों की आवाजाही रोकी जाती है, तो देश के भीतर बहुत बुरा तनाव हो सकता है। लोगों को याद है कि महाराष्ट्र में बाल ठाकरे से लेकर राज ठाकरे तक शिवसेना की सोच ने दूसरे प्रदेशों से आए हुए लोगों पर हमले किए, उनको वहां काम करने से रोका, दहशत फैलाई, और अपने लिए स्थानीय वोटरों की हमदर्दी बटोरी। अब अगर एक-एक करके अलग-अलग राज्य दूसरे राज्यों के लोगों से परहेज करने लगेंगे, तो इससे दूसरे राज्यों के गरीब मजदूरों का नुकसान तो कम होगा, परहेज करने वाले राज्यों का नुकसान ही अधिक होगा। पसीना बहाकर रोजी कमाने वाले लोग तो कहीं भी रोजी कमा लेंगे, लेकिन उनकी मेहनत इस्तेमाल करके जो राज्य अपनी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ाते हैं, उनका क्या होगा? अभी कुछ वक्त पहले की ही एक तस्वीर हमको याद पड़ती है जिसमें पंजाब के एक रेलवे प्लेटफार्म पर एक स्थानीय सिख किसान बोर्ड लिए बैठा है कि बाहर से आने वाले मजदूरों को उसके खेतों पर काम करने पर क्या-क्या सहूलियतें मिलेंगी। 
कुछ महीने पहले कर्नाटक में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों पर हमले की अफवाह फैली तो बात की बात में दसियों हजार लोग रेलवे स्टेशन पर इक_ा हो गए और असम की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी में पांव धरने की जगह भी नहीं बची। यह उस वक्त हुआ था जब असम झुलसा हुआ था, जल रहा था और अपने घर से बेदखल था। यह उस वक्त हो रहा था जब मुंबई में मुसलमानों ने असम-म्यांमार की मुस्लिम मौतों के खिलाफ एक हिंसक प्रदर्शन वहां किया, यह उस वक्त हो रहा था जब असम को लेकर दिल्ली में एक राजनीति भी चल रही थी और लगी आग के बीच हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के मुद्दे भी उठाए जा रहे थे। ऐसे में कर्नाटक छोड़कर भाग रहे उत्तर-पूर्वी लोगों को वहां की सरकार, वहां की सत्तारूढ़ भाजपा, आरएसएस से लेकर असम सरकार और केंद्र सरकार तक, हर किसी ने यह दिलासा दिया थौ कि इन लोगों को कर्नाटक में कोई खतरा नहीं है और वे छोड़कर न जाएं। लेकिन अपनी जान पर जिनको खतरा लगता था वे छोड़कर भाग रहे थे। कर्नाटक की अफवाह वहां पहुंचते ही वहां हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया था, और यह जख्म जल्दी भरने वाले भी नहीं थे। 
आज गुजरात में नरेन्द्र मोदी हों, या कश्मीर में वहां के अलगाववादी नेता, उनकी सोच इस मामले में एक दिखती है। कश्मीर में तो गीलानी को चुनाव नहीं लडऩा है, लेकिन आज जब नरेन्द्र मोदी पूरे देश के नेता बनने की राह पर चल रहे हैं, तो वे पंजाब के लोगों को, अपने अकाली भागीदारों को इस बात के लिए क्या जवाब देंगे? राष्ट्रीय नेता बनने के लिए सोच भी राष्ट्रीय रखनी पड़ती है, और समझ अंतरराष्ट्रीय रखनी पड़ती है। केंद्र सरकार इस नौबत के लिए इसलिए जिम्मेदार है क्योंकि पूरे देश के लोगों को अपनी हिफाजत का जो भरोसा एक मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे हो सकता है, वह देश से गायब है। मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी तक, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन में एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी नीयत पर, जिसकी ताकत पर और जिसकी लीडरशिप पर पूरे देश को भरोसा हो। इसलिए विश्वास की यह कमी भी इस दहशत के पीछे है जो आज असम में हिंदीभाषी मजदूरों को छांट-छांटकर इस तरह मारने की नौबत की जिम्मेदार है।

Bat ke bat, बात की बात

18 jan 2014

आम आदमी पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधारने होंगे

18 जनवरी 2014
संपादकीय
देश की राजधानी दिल्ली एक शहर भी है, और एक शहरवाला राज्य भी है। यह एक म्युनिसिपल भी है, और यहां पर दिल्ली विकास प्राधिकरण का डीडीए नाम का साम्राज्य भी है। और इन सबसे ऊपर, यहां पर पुलिस केंद्र सरकार की है। ऐसे एक शहरवाले राज्य में आम आदमी पार्टी एक धूमकेतु की तरह आई, और कांगे्रस के खिलाफ जनता की नाराजगी से जो एक भारी-भरकम शून्य पैदा हुआ था, उसको उसने भर दिया। बहुमत न होने पर भी उसकी सरकार बन गई, क्योंकि उससे अधिक सीटों वाली भाजपा भी सरकार बनाने को तैयार नहीं थी। अब इस सरकार के चलते कुछ हफ्ते हो चुके हैं, और इसके बावजूद इस पार्टी के तौर-तरीके सड़क के आंदोलनकारियों वाले बने हुए हैं। इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है, अगर इस पार्टी की समझ परिपक्व होती चले। वैसे तो कहने के लिए इसके साथ योगेन्द्र यादव जैसे अनुभवी और जानकार समाजशास्त्री हैं, लेकिन इसके तौर-तरीके अभी ऐसे बने हुए हैं कि यह पार्टी म्युनिसिपल के एक वार्ड की राजनीति कर रही है, जिसके सामने सिर्फ नाली-पानी, और बिजली जैसे मुद्दे रहते हैं। 
आम आदमी पार्टी के बारे में आज यह चर्चा इसलिए करनी पड़ रही है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों को छोड़ भी दें, तो भी राष्ट्रीय मामलों पर भी इस पार्टी की सोच और समझ अब तक सामने नहीं है, जबकि यह पार्टी लोकसभा की चार सौ सीटों पर चुनाव लडऩे की सोच रही है। साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर, क्षेत्रीयता के मुद्दे पर, आर्थिक नीतियों के मुद्दे पर इस पार्टी का रूख आना बचा हुआ है। इससे परे, समलैंगिकता के मुद्दे पर, महिला अधिकार के मुद्दे पर भी अब तक इस पार्टी का कोई घोषित रूख जनता तक नहीं पहुंचा है। दिल्ली के स्थानीय मुद्दों तक सीमित रहने के साथ-साथ अभी जो ताजा मामला हुआ है उसमें आम आदमी पार्टी के दिल्ली राज्य के कानून मंत्री ने जिस अराजक तरीके से कानून हाथ में लेते हुए अफ्रीका की कुछ महिलाओं के साथ सड़क पर जिस तरह का सुलूक किया है, वह एकदम ही भयानक है। और इस पर केजरीवाल से लेकर योगेंद्र यादव तक की चुप्पी भी भयानक है। इसे लेकर इस पार्टी की सरकार ने केंद्र सरकार के तहत आने वाली दिल्ली पुलिस पर हमला बोल दिया है, लेकिन ऐसे अराजक तरीके से कोई राज नहीं चलता। और सच तो यह है कि राज से भी परे, विपक्ष भी अराजकता से नहीं चलता, कोई संगठन या कोई आंदोलन भी अराजकता से नहीं चलता।
अरविंद केजरीवाल की पार्टी को वामपंथियों ने तुरंत ही समर्थन तो दे दिया है, लेकिन अन्ना हजारे की सोच से लेकर आज आम आदमी पार्टी के तौर-तरीकों तक लोगों को एक शक हो रहा है कि यह भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर, ईमानदार-सरकार चलाने के नाम पर एक प्रतिक्रियावादी, दकियानूसी पार्टी तो नहीं बन जाएगी, जो कि ईमानदारी के मुद्दे पर समर्थन पाकर सत्ता में आई है। हम अभी आनन-फानन ऐसे किसी शक का साथ देना नहीं चाहते, लेकिन इस पार्टी को कागजी घोषणापत्र से परे अपने तौर-तरीकों से, अपने बयानों और अपनी हरकतों से यह जाहिर और साबित करना पड़ेगा कि भ्रष्टाचार से परे बाकी के मुद्दों पर इस पार्टी की सोच क्या है। जो भी पार्टी देश भर में जाना चाहती है, और देश भर से होकर संसद में आना चाहती है, उसे तीखे तेवरों, नारों, और आम हुलिए से परे भी जलते हुए मुद्दों पर अपनी राय साफ-साफ सामने रखनी होगी। अगर केजरीवाल और उनके मंत्री-साथी दिल्ली राज्य को एक विपक्षी बागी तेवरों के साथ एक म्युनिसिपल की तरह चलाना चाहते हैं, तो देश भर में समर्थन पाने के सपने उनके सपने ही रह जाएंगे। 
आम आदमी पार्टी को अपने तौर-तरीके सुधारने होंगे, अफ्रीकी महिलाओं के साथ जो बर्ताव इस पार्टी के मंत्री ने किया है, वह बिल्कुल भी बर्दाश्त के लायक नहीं है, और सड़कों पर कानून से परे अपने खुद के कानून को लागू करने का यह तरीका किसी लोकतंत्र में नहीं चलेगा।

अय्यर का घटिया-हिंसक बयान चाय बेचना न जुर्म है, न शर्म

17 जनवरी 2014
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी के साथ पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि जब उसके कुछ नेता समझदारी का काम करते रहते हैं, कुछ दूसरे नेता अपने बड़बोलेपन में, और बेदिमाग तरीके से ऐसी फूहड़ बातें करते हैं, कि बैठे-ठाले पार्टी की फजीहत होती है। अब कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान उसके एक बड़े नेता मणिशंकर अय्यर ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के बारे में कहा कि वे 21वीं सदी में प्रधानमंत्री नहीं बन सकते, और वे चाहें तो कांग्रेस के इस अधिवेशन में आकर चाय बांट सकते हैं। मणिशंकर अय्यर इस बात पर हमला कर रहे थे कि नरेन्द्र मोदी ने अपना जीवन चाय बेचते हुए भी आगे बढ़ाया है। 
यह बात न सिर्फ नरेन्द्र मोदी के खिलाफ, न सिर्फ भाजपा और एनडीए के खिलाफ, बल्कि यह बात हिन्दुस्तान के मेहनतकश गरीबों के भी खिलाफ है। जो पार्टी चाय बेचने को बेइज्जती समझती है, उसके लिए सिर्फ भाजपा के मन में यह बात नहीं आएगी कि चाय बेचना देश बेचने से बेहतर है, बल्कि देश के हर मेहनतकश इंसान यह सोचेंगे कि ईमानदारी और मेहनत के किसी काम को गाली की तरह इस्तेमाल करने वाले कांग्रेस के ये नेता क्या उसी गांधी की पार्टी के हैं, जो कि अपना पखाना खुद साफ करते थे, अपने कपड़ों के लिए धागा खुद कातते थे, अपनी चप्पलें खुद बनाते थे? जाहिर है कि यह पार्टी अपने घमंड में चूर-चूर हो चुकी है, और उसके भीतर ऐसी फूहड़ बातों के खिलाफ कोई सोच भी नहीं रह गई है। हर कुछ हफ्तों में कांग्रेस के नेता आत्मघाती बातें करते हैं, और कांग्रेस पार्टी अधिक से अधिक उनमें से कुछ बयानों से अपने आपको अलग करती है, और फूहड़ बयानों का सिलसिला आगे बढ़ते रहता है। 
आज जब कांग्रेस पार्टी के इस बड़े कार्यक्रम के मौके पर हमको इस पार्टी के फैसलों और घोषणाओं को लेकर यहां लिखना था, तो हमको उसके एक नेता की कही एक गंदी और हिंसक बात पर लिखना पड़ रहा है, क्योंकि यह हमला देश के मेहनतकश और ईमानदार लोगों पर है। भाजपा या मोदी हमारी फिक्र का सामान नहीं है, लेकिन अगर गांधी-नेहरू की पार्टी, देश की सबसे बड़ी पार्टियों में से एक, देश की सबसे पुरानी पार्टी, अगर पसीना बहाकर ईमानदार जिंदगी जीने वाले लोगों के खिलाफ ऐसी सोच जाहिर करती है, या कम से कम बर्दाश्त करती है, ऐसी हिंसक बातों को जगह देती है, तो यह देश के लिए बहुत ही फिक्र की बात है। और यह बात एक ऐसे वक्त पर आई है जब कांग्रेस पार्टी और उसकी अगुवाई वाली यूपीए की सरकार पिछले दस बरसों के अपने कामकाज को लेकर अनगिनत अदालतों के कटघरों में खड़ी है, देश में जगह-जगह खारिज की जा रही है, भ्रष्टाचार और घोटाले के आसमान छूते आदर्श खड़े कर रही है। ऐसे में अगर इसके पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी होने का दावा करने वाले, लेखक के रूप में संसद में मनोनीत किए जाने वाले मणिशंकर अय्यर चाय बेचने को एक जुर्म समझते हैं, घटिया काम समझते हैं, और इस बयान के घंटों बाद तक कोई निंदा कांग्रेस की तरफ से नहीं आई है, तो हम इसे लोकतंत्र में एक बहुत लापरवाह, खतरनाक, और अपमानजनक सोच मानते हैं। और इस पार्टी को अपने ऐसे रूख के लिए दाम भी चुकाना होगा। हमको पक्का भरोसा है कि नेहरू और गांधी ऊपर बैठे हुए कांग्रेस के ऐसे बयान, ऐसे रूख, और उस पर पार्टी की चुप्पी को देखकर हक्का-बक्का होंगे। 

बेचैन विधायक और हड़बड़ी वाले मीडिया को सोचने की जरूरत

16 जनवरी 2014
संपादकीय
दिल्ली में आज सुबह आम आदमी पार्टी के 28 में से एक विधायक के बेचैनी और नाराजगी पिछले एक पखवाड़े में दूसरी बार खबरों में आई है। इसके पहले जब विनोद कुमार बिन्नी नाम के इस भूतपूर्व कांग्रेसी और वर्तमान आप विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया तो भी बेचैनी की खबरें थीं। आज दिल्ली के मीडिया ने घंटे भर तक इस असंतुष्ट विधायक की बहुत आम बातों को खास की तरह सीधे प्रसारित किया, और उसके बाद पार्टी की तरफ से उसके एक विचारक और नेता योगेन्द्र यादव ने इसका जवाब भी दिया। 
इस बहुत मामूली बात पर हम लिखना नहीं चाह रहे हैं, लेकिन इससे जुड़े हुए दो दूसरे पहलू हैं जिन पर चर्चा अधिक मायने रखेगी। एक तो यह कि कल तक जब बिना सत्ता, बिना अहमियत, आम आदमी पार्टी के लोग कांग्रेस और भाजपा जैसी सत्ताओं के खिलाफ एक जन आंदोलन कर रहे थे, तब तक उसके भीतर ऐसी बेचैनी और ऐसे मतभेद नहीं थे। लेकिन अब सरकार बनाने के बाद आप एक सत्तारूढ़ पार्टी हो गई है, और सत्ता की ताकत के साथ-साथ जो-जो खामियां आ सकती हैं, आती हैं, उनका सामना अरविंद केजरीवाल की इस नई-नई पार्टी को करना पड़ रहा है। दूसरी बात यह है कि दिल्ली राज्य तक सीमित इस पार्टी के घरेलू मुद्दों को लेकर मीडिया ने इसे जिस तरह का महत्व दिया है, वह दिल्ली स्थानीय मीडिया के लिए तो ठीक हो सकता था, लेकिन जो मीडिया दिल्ली में अपनी जड़ों की वजह से पूरे देश तक अपनी डालोंं के फैलने का दावा करता है, उसका यह रूख बिल्कुल ही गैरपेशेवर और स्थानीय पत्रकारिता का है, जिसका कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं हो सकता। देश में इतने किस्म के, इतने मुद्दे हैं, कि मीडिया की नजर में आज सुबह एक असंतुष्ट विधायक द्वारा लगाए गए महत्वहीन, और अर्थहीन आरोपों को ऐसी जगह नहीं मिलनी चाहिए थी। मीडिया ने जिस तरह दिल्ली सरकार पर कुछ हफ्तों में कई तरह के काम न करने के जो एक सत्तारूढ़ असंतुष्ट विधायक के मुंह से दिखाए हैं, उनका कोई वजन नहीं दिखता। लेकिन लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक-दूसरे को पीछे छोडऩे की होड़ में, या एक-दूसरे से पीछे न रह जाने की हड़बड़ी में हर छोटी-छोटी बात को जिस तरह जीवंत प्रसारित करता है, उससे देश-प्रदेश, दुनिया के असल मुद्दे हाशिए पर इंतजार करते खड़े रह जाते हैं, गायब हो जाते हैं।
दुनिया में ऐसी कौन सी सरकार हो सकती है जो अपने चुनावी घोषणा पत्र पर कुछ हफ्तों के भीतर ही पूरा अमल कर सके? आम आदमी पार्टी जाहिर तौर पर, और घोषित रूप से सरकार चलाने के तजुर्बे के बिना पहली बार चुनाव लडऩे वाली पार्टी रही है। और उसने अब तक बिना किसी भ्रष्टाचार के ठीक-ठाक तरीके से ही पहले कुछ हफ्ते गुजारे हैं। कांग्रेस और भाजपा के लोग, या मीडिया के लोग उससे हर चौबीस घंटे में सोने के एक अंडे की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन जब किसी किस्म की खोखली उम्मीद खुद इस पार्टी का एक विधायक बड़े भांडाफोड़ की तरह सामने रखे, तो उससे उस विधायक का बेचैन खोखलापन जाहिर होता है। हो सकता है कि केजरीवाल की सरकार दिल्ली की सबसे नाकामयाब सरकार साबित हो, हो सकता है कि इस सरकार के मंत्री और इस पार्टी के नेता भी भ्रष्ट ही साबित हों, लेकिन इनको काम करने का मौका देना चाहिए। हम आम आदमी पार्टी को लेकर मीडिया के सुनामी रूख को किसी के भले का नहीं मानते। कभी केजरीवाल को नायक, और फिर किसी एक के कहे खलनायक की तरह पेश करने को अखबारनवीसी तो नहीं कहा जा सकता, और वैसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने आपको अखबारनवीस या पत्रकार कहता भी नहीं है। टीवी समाचार चैनलों ने अखबारों की दुनिया को मीडिया बनाकर रख दिया है, और इसके साथ-साथ अखबारों की परंपरागत जिम्मेदारी की शैली भी खत्म कर दी है। कोई हैरानी नहीं होगी कि लोग गंभीरता से खबरों को पाने के लिए एक बार फिर अखबारों की तरफ रूख करेंगे। आम आदमी पार्टी के बेचैन विधायक, और उसे घंटे भर तक दिखाने वाले इलेक्ट्रॅनिक मीडिया, इन दोनों को बराबरी का आत्मविश्लेषण करना चाहिए। 

तीस बरस पुरानी अंग्रेज चि_ियों से हिन्दुस्तानी जख्म फिर हरे..

15 जनवरी 2014
संपादकीय
स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को बाहर करने के लिए इंदिरा सरकार द्वारा की गई फौजी कार्रवाई को लेकर एक नया बवाल खड़ा हो गया है कि क्या उसमें इंदिरा ने ब्रिटेन की मदद ली थी? ब्रिटेन के नियमों के मुताबिक तीस बरस पूरे होने पर जो गोपनीय सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक कर लिए जाते हैं, उन दस्तावेजों में से ब्रिटिश सरकार की ऐसी चि_ियां सामने आई हैं, जो ऐसी मदद की चर्चा करती हैं। ऑपरेशन ब्लूस्टार, उसके बाद उसकी प्रतिक्रिया में इंदिरा गांधी की हत्या, और उसकी प्रतिक्रिया में देश के कई हिस्सों में सिक्ख विरोधी दंगों और हत्याओं के जख्म भरते दिख नहीं रहे हैं। दिल्ली की अदालतों में चौथाई सदी गुजर जाने के बाद भी इंसाफ की कोई खबर नहीं है। कांग्रेस पार्टी इन दंगों के वक्त की अपनी जवाबदेही को समझने के बजाय इन दंगों के दागी अपने नेताओं को बचाती रही, बढ़ाती रही, चुनाव लड़वाती रही, और मंत्री बनाती रही। ये राजनीतिक फैसले हजारों लोगों को खोने वाली सिक्ख बिरादरी के जख्मों पर नमक घिसने सरीखे थे, और वे जख्म अब तक रिस ही रहे हैं। 
हालांकि हम इस बात को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते कि भारत में स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई करने के पहले ब्रिटेन से ऐसी कार्रवाई के तजुर्बे की मदद मांगी थी या नहीं। इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि आतंकियों को मारने के लिए कौन किससे मदद लेते हैं? अगर इंदिरा सरकार ने ब्रिटेन से ऐसी मदद मांगी थी, तो उसके पीछे यह सोच भी हो सकती है कि कम से कम नुकसान के साथ यह कार्रवाई पूरी हो जाए। और अगर ऐसी सोच थी, तो उसके लिए दूसरे देश से फौजी तजुर्बा लेने में क्या गलत था? पूरी दुनिया के देश जुर्म और दहशतगर्दी से जूझने में एक-दूसरे की मदद लेते हैं, एक-दूसरे को मदद देते हैं। इसलिए आज जाहिर हुए ब्रिटिश दस्तावेज एक चर्चा छेड़ रहे हैं, लेकिन हमारा मानना है कि इस मुद्दे में कोई वजन नहीं है। इससे लोगों को पुरानी चर्चा नए सिरे से छेडऩे में तो मदद मिल रही है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र इस बात से बदनाम नहीं होता कि वह किसी और देश की फौजी खूबियों का इस्तेमाल अपने लोगों के नुकसान को कम करने के लिए कर रहा था। 
आज दरअसल दुनिया में आतंक का कारोबार देशों की सरहदों की इज्जत नहीं करता। इसीलिए बहुत से देश दूसरे देशों पर कार्रवाई करने में गिरोहबंदी भी करते हैं, और दूसरे देशों के अपने हक को कुचलते हुए भी जाकर कार्रवाई करते हैं। अमरीका जैसे देश कितने ही देशों पर, कितने ही बेकसूर देशों पर आतंक के खात्मे के नाम पर फौजी कार्रवाई करते हैं, और लाखों बेकसूरों को मारते हैं। आज पश्चिम की दुनिया में, खासकर अमरीका में वहां की अदालत 1984 के दंगों के लिए सोनिया गांधी को नोटिस भेज चुकी है, क्योंकि वहां सिक्खों के एक संगठन ने इंदिरा परिवार में होने की वजह से सोनिया को भी 1984 की इस हिंसा के लिए जवाबदेह ठहराया है। लेकिन सोनिया गांधी की जवाबदेही से बहुत पहले खुद अमरीका के राष्ट्रपति की जिन फौजी कार्रवाईयों में आए दिन कई देशों में दर्जनों बेकसूर मारे गए, उनके बारे में अमरीकी अदालतों के पास करने को शायद कुछ नहीं है। ऐसे में ब्रिटिश सरकार के कुछ अंदरूनी दस्तावेजों के इस्तेमाल से कांग्रेस के खिलाफ हिन्दुस्तान में एक बार फिर अगर एक समाज को भड़काया जा सकता है, तो ऐसी कोशिश से कोई किसी को लोकतंत्र में रोक नहीं सकते। 
लेकिन हम 1984 के दंगों, उसके पहले इंदिरा गांधी की हत्या, और उसके पहले स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई के बारे में सोचें, तो फिर यह भी सोचने की जरूरत है कि स्वर्ण मंदिर पर किस तरह हत्यारे-आतंकियों का कब्जा हो चुका था, और उसके बारे में कोई दूसरी सरकार, सिक्खों की कोई दूसरी संस्था, कोई धार्मिक संगठन, कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। और इंदिरा सरकार को एक ऐसी कार्रवाई करनी पड़ी थी जिसमें उनको और उनके परिवार को न सिर्फ हत्यारों के, बल्कि राजनीतिक हत्या के खतरे के सामने भी खड़ा कर दिया था। हमको नहीं लगता कि इंदिरा गांधी के लिए भी स्वर्ण मंदिर पर फौजी कार्रवाई का फैसला आसान या सहूलियत का था, लेकिन सरकार को कुछ कड़वे फैसले भी लेने पड़ते हैं। इस फैसले के बाद, और इसके पहले भी, सरकार से परे राजनीतिक रूप से इंदिरा गांधी को, और फिर राजीव गांधी को जो कुछ करना था, उसमें कांग्रेस पार्टी ने बड़ी चूक की थी, और उसी का नतीजा है कि आज ब्रिटिश सरकार के ये दस्तावेज फिर भावनाओं को भड़काने का सामान बन रहे हैं। 

Bat ke bat, बात की बात,

14 jan 2014

कल तक सत्ता में रहते चुप, आज राजनीति में बड़े दावे

14 जनवरी 2014
संपादकीय
भारत के भूतपूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह नौकरी पूरी होते ही भाजपा में शामिल हो गए हैं, और अब सक्रिय राजनीति में बयान भी देने लगे हैं। कल ही उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा है कि केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम के एक करीबी पर हाथ डालने से दिल्ली पुलिस को रोका था। उन्होंने कहा कि आईपीएल मैच फिक्सिंग में एक बिजनेसमैन का नाम आ रहा था। यह व्यक्ति दाऊद का करीबी हो सकता था। मगर जब पुलिस ने उसकी जांच करने की पहल की, तो शिंदे उसके बचाव में आ गए। सिंह ने दावा किया कि वह ऐसी कई बैठकों में मौजूद थे, जब शिंदे ने दिल्ली पुलिस के काम में हस्तक्षेप किया। सिंह के मुताबिक शिंदे के दफ्तर से पुलिस मुख्यालय को दिल्ली के थानों में एसएचओ की तैनाती तक के निर्देश जाते थे। उन्होंने दावा किया कि इसके एवज में रुपये तक लिए गए। नौकरशाह से नेता बने आरके सिंह ने यूपीए और कांग्रेस के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। 
अब सवाल यह उठता है कि देश के गृह सचिव रहते हुए अगर आर.के. सिंह दाऊद इब्राहिम के करीबी का शक होने पर भी ऐसे इंसान पर हाथ डालने से गृहमंत्री की दखल पर पीछे हट जाएं, और इस बात को लेकर सरकार की फाइलों में अपनी असहमति, अपना विरोध, और अपना शक जाहिर न करें, तो उनको आज अपनी इस ताजा-ताजा सरकारी-गैरजिम्मेदारी को शहादत की तरह पेश करने का क्या हक है? देश के सबसे बड़े अफसरों में से एक, केन्द्रीय गृह सचिव में भी अगर किसी मंत्री की गलत बात का विरोध करने का हौसला न हो, और यह हौसला आज एक विपक्षी पार्टी में आने के बाद राजनीतिक चुनाव अभियान के हिस्से की तरह एकदम से जाग जाए, तो ऐसे अफसर, ऐसे भूतपूर्व अफसर के लिए हमारे मन में कोई इज्जत पैदा नहीं होती। 
भारतीय लोकतंत्र में बहुत से छोटे-छोटे कर्मचारी भी ऐसे हुए हैं जिन्होंने सत्ता पर काबिज अपने ऊपर के नेताओं या अफसरों की मनमानी का विरोध किया है। गुजरात से लेकर हरियाणा तक, और भी दूसरी जगहों पर ऐसे छोटे-छोटे अफसर रहे हैं, जिन्होंने अपनी कानूनी सरकारी जिम्मेदारी को निभाते हुए सत्ता की भारी नाराजगी झेली है। ऐसे में जो केन्द्रीय गृह सचिव, गृह सचिव बन जाने के बाद समय रहते नेताओं के गलत कामों का विरोध नहीं करता, अपने सामने मौजूद संवैधानिक और सरकारी विकल्पों का इस्तेमाल नहीं करता, उसे आज सरकारी कामकाज को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें कहने का नैतिक हक कैसे मिल सकता है? और फिर जहां तक दाऊद इब्राहिम से रिश्तों का शक किसी पर होने की बात है, तो उसके लिए तो आर.के. सिंह के सामने राष्ट्रीय हित में ऐसी बातों को किसी विपक्षी पार्टी के मार्फत गुमनाम तरीके से उजागर करने का रास्ता खुला था। देश के बहुत से मंत्री और अफसर इस तरह का गुमनामी का काम व्यापक जनहित में करते हैं, और आर.के. सिंह तो किसी को सुझाकर सूचना के अधिकार के माध्यम से भी ऐसी जानकारी दे सकते थे, लीक कर सकते थे। ऐसा करना उनके सरकारी नियमों के खिलाफ तो होता, लेकिन ऐसा करना दाऊद जैसे आतंकी की जांच के राष्ट्रीय हित में भी होता। आज हमको अधिक खुशी होती अगर आर.के. सिंह इस इंटरव्यू में यह कह पाते कि उन्होंने अपना शक जाहिर करते हुए गृहमंत्री से ऊपर के किसी विकल्प तक कोशिश की थी, और आज वे राष्ट्रहित में अपनी वैसी किसी कोशिश को उजगार भी करते। 
जब तक सत्ता में बने हैं, तब तक सत्ता का हिस्सा बने रहना, और फिर जब सत्ता के बाहर हो गए, तो अपनी हिस्सेदारी की चर्चा भी न करते हुए सिर्फ दूसरों को कोसना ठीक बात नहीं है, और इससे आज की ताजा नीयत उजागर भी होती है। हमारा यह भी मानना है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका, सेना और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के कार्यकाल पूरे होने के बाद सक्रिय राजनीति में उनके आने पर कुछ बरसों की रोक रहनी चाहिए। एक किस्म की वर्दी को उतारकर, आनन-फानन में चुनावी कुर्ता-टोपी पहन लेना, और अपने कार्यकाल की बातों को लेकर चुनावी बयान देना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। इस पर संसद को सोचना चाहिए। 

बात की बात, Bat ke bat

13 jan 2014

पोलियो मुक्त हिन्दुस्तान, बड़ी कामयाबी का मौका

13 जनवरी 2014
संपादकीय
रोजाना बुरी बातों पर लिखते हुए और बुराई के खिलाफ लिखते हुए हमको कई बार इस वक्त इस जगह पर थकान होने लगती है। आज का दिन थोड़ा सा अलग है कि हिन्दुस्तान की एक बहुत बड़ी उपलब्धि को लेकर लिखने का मौका मिला है। पिछले कुछ महीनों में कम से कम दो ऐसे मौके आए जब हिन्दुस्तान ने अंतरिक्ष अभियानों में बड़ा मुकाम तय किया, बड़ी कामयाबी पाई, और आज एक दूसरी मुनादी विश्व स्वास्थ्य संगठन करने जा रहा है कि भारत पोलियो मुक्त हो गया। पिछले तीन बरसों में इस देश में पोलियो का एक भी नया केस सामने नहीं आया, और इस वजह से भारत को यह दर्जा मिल रहा है। 
यह बात इसलिए भी बहुत अधिक मायने रखती है कि हिन्दुस्तान में सरकार इस पूरे अभियान के पीछे थी, और केन्द्र और राज्य सरकारों की साख अच्छी नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं में भारी भ्रष्टाचार है, सरकारी कामकाज में बड़ा निकम्मापन है, लापरवाही है, नसबंदी शिविरों में इसी देश में महिलाएं फर्श पर धूल की तरह पड़ी रहती हैं, ऐसे हालात के बावजूद अगर पोलियो इस देश में खत्म हो पाया है, तो यह एक बड़ी खुशी, राहत, और कामयाबी के फख्र का मौका है। इस देश में इस कामयाबी का एक दूसरा महत्व इसलिए भी है कि अभी तीन बरस पहले तक दुनिया के आधे पोलियोग्रस्त लोग हिन्दुस्तान में ही थे। पड़ोस के पाकिस्तान में अमरीका में बने पोलियो ड्रॉप्स को लेकर जनता के मन में जो शक है, उसे लेकर वहां लोग इस टीके से अपने बच्चों को दूर भी रख रहे हैं, और तालिबानी आतंकी पोलियो-कार्यकर्ताओं को मार भी रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान और भारत के बीच की हर तरह की आवाजाही के चलते हुए भारत को अलग-थलग रख पाना भी भारत के लिए मुुश्किल काम था। और भारत के भीतर भी कुछ बरस पहले मुश्किल बिरादरी में अमरीका के खिलाफ एक ऐसा शक फैला था, और लोग पोलियो ड्रॉप्स से परे रहने लगे थे क्योंकि अफवाह की अमरीकी दवा लेने वालों की आगे की पीढिय़ां पैदा नहीं हो पाएंगी। ऐसी सामाजिक अफवाह से उबर पाना भी एक कामयाबी है। फिर दूसरी तरफ बांग्लादेश से दसियों लाख गरीब लोगों का भारत में आना-जाना लगा ही रहता है, भारत में शायद करोड़ से अधिक बांग्लादेशी बसे हुए हैं, इनमें से अधिकतर बहुत गरीब हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं। भारत के भीतर भी गरीब और अनपढ़ लोगों की आबादी बहुत है, जंगलों में बसे हुए लोग हैं। ऐसे देश में एक-एक बच्चे को कई-कई बार पोलियो ड्रॉप्स देना कोई मामूली कामयाबी नहीं है। 
लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि यह बड़ी कामयाबी सिर्फ सरकार के अकेले दम पर नहीं हुई है। रोटरी जैसी एक बड़ी संस्था ने पूरे देश में पोलियो ड्रॉप्स के अभियान में बड़ी हिस्सेदारी की थी, और देश भर में स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ स्कूलों के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने, गांव-गांव तक फैले सरकारी कर्मचारियों ने, और दूसरी कई संस्थाओं के लोगों ने इस राष्ट्रीय अभियान में हिस्सा लिया था। मुश्किल सरकारी ढांचे के भीतर भी देश के हर बच्चे तक पहुंचना आसान नहीं था, और हर बच्चे तक पहुंचे बिना यह कामयाबी पाना मुमकिन भी नहीं था। भारत अपने पड़ोसी देशों के बीच एक सबसे बड़ा देश होने की वजह से बाकी देशों के लिए एक मिसाल भी बनता है, और यह एक अच्छी मिसाल है। भारत को पड़ोसियों को भी इस मिसाल के साथ-साथ हर किस्म की मदद करनी चाहिए, क्योंकि पोलियो को सिर्फ नक्शे पर सरहद से परे रखना मुमकिन नहीं है। जब तक पड़ोसी देशों की सरहदों के भी बाहर पोलियो को नहीं निकाल दिया जाएगा, तब तक भारत अकेले चैन से नहीं रह पाएगा। एक बड़े देश होने के नाते भारत पड़ोस से यहां कानूनी और गैरकानूनी तरीके से आने वाले लोगों को भी बहुत कड़ाई से नहीं रोक पाता, और ऐसे में पड़ोस की सेहत के बिना हिन्दुस्तान की सेहत अच्छी नहीं रह सकती। 
पोलियो मुक्त हिन्दुस्तान एक बड़ी कामयाबी है, और इस अभियान से जुड़े हर किसी को हमारी बहुत बधाई। 

नक्सलियों को प्रशांत भूषण के न्यौते में गलत कुछ नहीं

12 जनवरी 2014
संपादकीय
आम आदमी पार्टी के एक प्रमुख नेता, सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील, और मानवाधिकारवादी प्रशांत भूषण ने एक बार फिर लोगों के बीच अपने बयान से बहस छेड़ी है। कश्मीर के मुद्दों पर जनमत संग्रह के बयान के बाद अब उन्होंने नक्सल इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती के पहले वहां के स्थानीय, आदिवासी लोगों से रायशुमारी की वकालत की है। उनकी इस बात का तो कोई अधिक काम आज नहीं है, क्योंकि नक्सल हिंसा के शिकार इलाकों में सुरक्षा तैनाती राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है, और उनका अधिकार है। इसके लिए किसी जनमत संग्रह या रायशुमारी की बात अभी तक न तो किसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत उठाई गई थी, और न ही आदिवासियों के बीच से ही ऐसी कोई मांग उठी है। नक्सल जरूर ऐसी तैनाती के खिलाफ चेतावनी जारी करते रहते हैं। लेकिन प्रशांत भूषण की बात का एक दूसरा हिस्सा अहमियत रखता है, वह यह  कि अगर नक्सली मूलधारा की राजनीति में आने के लिए आम आदमी पार्टी से जुडऩा चाहते हैं, तो उनका स्वागत है। इस संदर्भ में प्रशांत भूषण ने आदिवासी इलाकों में जमीन से लेकर बेदखली जैसे मुद्दों की चर्चा की है कि नक्सल नौबत क्यों आती है।
हम प्रशांत भूषण की इस राय से सहमत हैं कि नक्सलियों को लोकतांत्रिक राजनीति की मूलधारा में आना चाहिए, चाहे वे आम आदमी पार्टी के मार्फत आएं, या फिर अपनी खुद की एक अतिवामपंथी नीतियों वाली पार्टी बनाकर आएं। लेकिन हिंसा की राह छोड़कर नक्सलियों को लोकतांत्रिक राजनीति में आना चाहिए, और आज जिन इलाकों में उनकी पकड़ मजबूत है, वे इलाके आम आदमी पार्टी की अब तक की शहरों तक सीमित पहुंच से खासे दूर के, और खासे अलग इलाके हैं। इसलिए अगर शहरों में आम आदमी पार्टी एक विकल्प पेश कर चुकी है, और अगर जंगलों और आदिवासी आबादी इलाकों में माओवादी नक्सली लोकतांत्रिक चुनावों में हिस्सा लेते हैं, तो इससे सामाजिक बदलाव का सिलसिला दो अलग-अलग इलाकों में, अलग-अलग हाथों से शुरू हो सकता है। इतने बड़े देश में नक्सल हिंसा से कभी भी राजनीतिक बदलाव नहीं आ सकता, खासकर सत्ता का बदलाव। यह जरूर है कि नक्सली नहीं होते, तो बहुत से मुद्दों पर बात भी शुरू नहीं हुई होती, और जमीन अधिग्रहण जैसे कुछ कानून शायद न ही बने होते। नक्सलियों ने लोकतांत्रिक ताकतों के सामने, और लोकतंत्र के स्तंभों के सामने एक कड़ी और बड़ी चुनौती पेश करके उनको जनता के हित में कई फैसले लेने को बेबस किया, जिनमें से भूमि अधिग्रहण शायद सबसे बड़ा और सबसे ताजा मामला है। 
प्रशांत भूषण नक्सलियों को न्यौता देकर अपने आपको कुछ और अखबारी सवालों के निशाने पर खड़ा कर चुके हैं, लेकिन देश में ऐसी कौन सी पार्टी है, और कौन सी सरकार है, जिसने समय-समय पर नक्सलियों को लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति की मूलधारा में आने का न्यौता नहीं दिया है? यह जरूर है कि सीधे अपनी पार्टी में बुलावा देने की बात शायद किसी पार्टी ने इस वजह से भी नहीं की, कि नक्सलियों को उनकी पार्टी कैसे पचाएगी, और शायद इस वजह से भी नहीं बुलाया कि उनको यह पक्का मालूम था, और है, कि नक्सली उनकी पार्टी की नीतियों को खारिज ही करेंगे, उनमें आने के बजाय। ऐसे में आम आदमी पार्टी अपने इतिहास का कोई बोझ ढोकर नहीं चल रही है। यह पार्टी इतनी नई है, इसकी नीतियां इतनी कम है, इतनी पारदर्शी और साफ हैं, इसका दिल और इसकी बांहें अभी सबके लिए खुली हुई हैं, इसलिए यह पार्टी नक्सलियों को भी अपने साथ आने का न्यौता दे पा रही है। चाहे अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी की एक बहुत ही असाधारण साख की वजह से नक्सली या कोई और उनकी पार्टी में आना ठीक समझेंगे, या फिर उनकी सलाह पर अपनी खुद की पार्टी बनाकर चुनाव लडऩा चाहेंगे, लोकतांत्रिक चुनाव हथियारबंद लड़ाई से हमेशा ही बेहतर होंगे। आन्ध्र में अभी-अभी एक बड़े नक्सल नेता ने पुलिस के सामने समर्पण किया है, देश में ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है कि लोकतांत्रिक राजनीति भी एक असल फर्क ला सकती है, और वैसे माहौल के बाद ही नक्सल आंदोलन से लोकतांत्रिक होने की उम्मीद की जा सकेगी। प्रशांत भूषण की राय से हम सहमत हैं, और यह राय अधिक मायने इसलिए रखती है कि माओवादी विचारकों से प्रशांत भूषण के बातचीत के रिश्ते हैं, और एक मानवाधिकारवादी वकील की हैसियत में प्रशांत भूषण की साख भी है। ऐसे ही लोगों के दिए हुए न्यौते का कोई वजन हो सकता है, और देश के तमाम लोकतांत्रिक नक्सल हिमायतियों को इस बात को आगे बढ़ाना चाहिए। 

मप्र के गृहमंत्री का महिलाओं के खिलाफ हिंसक-धर्मान्ध बयान

11 जनवरी 2014
संपादकीय
मध्यप्रदेश में महिलाओं के बारे में भाजपा के मंत्रियों के गैरजिम्मेदार बयान खत्म होने का नाम ही नहीं लेते। हर कुछ महीनों में कोई न कोई मंत्री देश की संवैधानिक व्यवस्था को अनदेखा करके, महिलाओं के बराबरी के दर्जे को अनदेखा करके, उनके बारे में गैरजिम्मेदारी की बात कर ही देता है। इस बार बारी है मध्यप्रदेश के गृहमंत्री बाबूलाल गौर की। उन्होंने महिलाओं के पहनावे को लेकर कहा है कि चेन्नई में अपराध कम इसलिए होते हैं, क्योंकि वहां की जनता धर्मप्रिय है और महिलाएं पूरे कपड़े पहनती हैं। राजधानी भोपाल में एक थाने का उद्घाटन करते हुए गौर ने कहा कि वे चेन्नई गए थे। वहां की जनसंख्या 85 लाख है और 147 पुलिस थाने हैं, मगर अपराध कम होते हैं। जब उन्होंने इसकी वजह जानी तो पता चला कि यहां की महिलाएं धार्मिक प्रवृत्ति की हैं, बाहर निकलती हैं तो माथे पर टीका लगाए होती हैं। पूरे कपड़े यानी सलवार सूट व साड़ी पहनती हैं, इसीलिए अपराध कम होते हैं। 
मध्यप्रदेश को पिछले दस बरसों के भाजपा राज के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराधों से छुटकारा नहीं मिला है, और यह प्रदेश देश में महिलाओं पर हिंसा और जुर्म की राजधानी बना हुआ है। बाबूलाल गौर के बयान के बारे में जब चेन्नई के एक बड़े पुलिस अफसर से पूछा गया तो उसने कहा कि मप्र के गृहमंत्री के आने पर बातचीत में उन्होंने बतलाया था कि चेन्नई में पुलिस ने महिलाओं की हिफाजत के लिए कौन से कदम उठाए हैं। श्री गौर को बताया गया था कि चेन्नई में 32 महिला थाने हैं जो महिलाओं के खिलाफ होने वाले किसी भी तरह के जुर्म पर कार्रवाई करते हैं। इसके अलावा चेन्नई पुलिस ने उनको यह भी बतलाया कि वह स्वयंसेवी संगठनों से विचार-विमर्श करती है और वारदात होने पर तुरंत पहुंचने के लिए मोबाइल यूनिटों का इस्तेमाल करती है। इसके अलावा वहां की पुलिस महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित भी करती है और इससे वहां की जनता का रूख बदला है। चेन्नई पुलिस ने बाबूलाल गौर के धर्म के असर वाले बयान पर कुछ कहने से मना कर दिया। 
दरअसल संविधान की शपथ लेकर भारतीय लोकतंत्र में सरकार की या किसी और संवैधानिक पद की जिम्मेदारी सम्हालने वाले लोगों को अपनी धार्मिक मान्यताओं को, अपनी सामाजिक सोच को, और अपने हिंसक दिल-दिमाग को, अपनी सार्वजनिक जिम्मेदारियों से परे रखना चाहिए। जिस मध्यप्रदेश में महिलाओं पर सबसे अधिक जुर्म होते हों, उस प्रदेश में अगर थाने के उद्घाटन के मौके पर गृहमंत्री महिलाओं पर होने वाले हिंसक जुर्म के लिए उन्हीं के रहन-सहन, उन्हीं के कपड़े, और उन्हीं की धार्मिक मान्यताओं की कमी को जिम्मेदार ठहरा दे, तो फिर यह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के खिलाफ बात करना है। जिस देश-प्रदेश में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार होते हों, बुजुर्ग महिलाओं से बलात्कार होते हों, घरेलू कपड़ों में रहने वाली महिलाओं से बलात्कार होते हों, जहां पर बच्चों से घर के लोग, रिश्तेदार या पारिवारिक-परिचित लोग बलात्कार करते हों, वहां पर धार्मिक रीति-रिवाज, और कपड़ों को जिम्मेदार ठहराना बहुत ही गैरजिम्मेदारी की बात है, और यह सोच बहुत हिंसक भी है, बहुत बेइंसाफ है, और यह मुजरिमों को रियायत देने वाली भी है। 
एक मर्द कैसे कपड़े पहने, वह आस्तिक रहे या नास्तिक रहे, माथे पर तिलक लगाए, या न लगाए, इस बारे में बाबूलाल गौर का कुछ भी नहीं कहना है, क्योंकि भारतीय संस्कृति में, हिन्दू धर्म में, कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक, और सती होने से लेकर विधवा का जीवन जीने तक, हर किस्म की हिंसा झेलना सिर्फ औरत का एकाधिकार बना दिया गया है। अब अगर उसे बलात्कार से बचना है, तो उसे मंदिर जाना होगा, तिलक लगाना होगा, और पूरे कपड़े पहनने होंगे। इसके बिना उसको बलात्कार का हकदार मान लिया गया है। क्या बाबूलाल गौर यह बताने की कोशिश करेंगे कि आसाराम और उसके बेटे नारायण सांई ने जितने लोगों से बलात्कार किया था, क्या वे नाबालिग लड़कियां और महिलाएं खुले कपड़ों में इन बाप-बेटे के सामने जाती थीं? या फिर उनमें धार्मिक भावना की कोई कमी थी? लोगों को याद होगा कि जब आसाराम को गिरफ्तार किया गया था, तो इसी मध्यप्रदेश के एक दूसरे भाजपाई मंत्री ने इसे इस नाबालिग लड़की की साजिश करार दिया था।
जब भी धार्मिक आस्था को लोग लोकतांत्रिक सोच से ऊपर रखते हैं, तब तक लोकतंत्र पर हिंसक हमला होता है। ऐसा इसलिए होता है कि धर्म की सोच में कुछ भी लोकतांत्रिक नहीं है, और हर किस्म की हिंसा को पिछले जन्मों के पाप से जोड़कर उसको बर्दाश्त करने की नसीहत दी जाती है। आज देश भर में महिलाओं पर हिंसा के मामले में लोगों के बीच जो नाराजगी है, उसे न समझकर जो मंत्री ऐसे बयान देते हैं, उनको और उनकी पार्टी को चुनाव के वक्त इन्हीं कतरनों को दिखाना चाहिए, और न सिर्फ महिला मतदाताओं को, बल्कि महिलाओं के हक की इज्जत करने वाले पुरूष मतदाताओं को भी याद दिलाना चाहिए कि वे क्या ऐसे लोगों को, क्या ऐसे लोगों की पार्टी को दुबारा चुनना चाहेंगे? हमारा ख्याल है कि लोकतांत्रिक चुनावों में बहुत ही असरदार तरीके से ऐसी तमाम कतरनों का, वीडियो रिकॉर्डिंग्स का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, और उससे मतदाता को अपना मन बनाने में आसानी होगी। 
बाबूलाल गौर का बयान नेता के लायक नहीं है, यह उनको इस संवैधानिक पद पर रखने के खिलाफ एक मजबूत तर्क और तथ्य है। हो सकता है कि भारतीय संविधान के तहत ऐसा करना आसान न हो, लेकिन ऐसे बयान को आसानी से भूलना नहीं चाहिए, और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री-मंत्रियों को जब हर जगह लगातार इसके बारे में पूछा जाएगा, तब जाकर शायद उनको सरकार के एक मंत्री के हिंसक बयान का जुर्म समझ आएगा। 

गरीबी पर सत्ता और सदन में संवेदनशीलता अब पहले की तरह नहीं

10 जनवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ विधानसभा में राज्य सरकार की तरफ से तैयार सालाना अभिभाषण राज्यपाल पढ़ते हैं, और इसमें राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की चर्चा रहती है। इस पर विपक्ष को सरकार की आलोचना का मौका मिलता है और फिर सरकार भी आलोचना का जवाब देती है। कल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ऐसे ही जवाब में  अपनी सरकार की गरीब हितैषी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन योजनाओं का मजाक उड़ाने का अधिकार किसी को भी नहीं है। छत्तीसगढ़ का गरीब आदमी चावल बेचकर शराब नहीं पीता। कुछ लोग अगर यह कहते हैं कि एक रूपए किलो चावल लेकर  गरीब लोग अपनी आमदनी शराब खर्च में कर देते हैं, तो ऐसा कहने वाले उन गरीबों का मजाक उड़ाते हैं, उन्हें जनता कभी माफ  नहीं करेगी।
दरअसल यह बात न सिर्फ छत्तीसगढ़ में है, और न सिर्फ एक रूपए किलो चावल को लेकर है। गरीबों को मिलने वाली रियायत ताकतवर और संपन्न तबकों के मुंह में खुशबूदार चावल के बीच आए कंकड़ की तरह खटकती है। लोग समझते हैं कि इससे गरीब लोग कामचोर हो जाते हैं, सरकार की रोजगार योजनाओं, जनकल्याण की योजनाओं का फायदा अर्थव्यवस्था को सीधे नहीं मिल पाता। दरअसल हिन्दुस्तान में ही नहीं, सारी पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में इंसानों को एक आंकड़े की तरह देखने और इस्तेमाल करने की बुनियादी सोच रहती है। और ऐसे में किसी इंसान के पेट में सरकारी लागत से कितना जा रहा है, और उस इंसान से अर्थव्यवस्था में कितना योगदान मिल रहा है, इसका हिसाब करते हुए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के केलकुलेटर दुनिया के देशों को यह हुक्म देते हैं कि उनको खेती और खाने पर रियायतों को कितना कम करना है, तभी उनको अंतरराष्ट्रीय कर्ज मिल सकेंगे। 
ये सारे आंकड़े मशीनी होती जा रही उस दुनिया के हिसाब से तैयार होते हैं जिनमें इंसानों की गिनती सिर्फ गिनती के लिए होती है, एक जिंदगी की तरह नहीं। ऐसे में जब अभी कुछ बरस पहले तक ही छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों से भूख से मौतों की खबरें आती थीं, तो उसे लेकर विधानसभा से लेकर संसद तक हल्ला होता था। लेकिन आज जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में फसल की खरीदी की सरकारी जिम्मेदारी, और अनाज पर गरीब का हक, इन दोनों को बढ़ाते हुए कुल मिलाकर गरीबों का भला जब होता है, तो संपन्न और शहरी तबका उसके मायने नहीं समझ पाता। जिस राज्य में गरीबों को पीढ़ी दर पीढ़ी आधे पेट खाकर ही सोना पड़ता था, जहां पर कुपोषण की वजह से पीढिय़ों से लोगों को कमजोर बन जाना एक नियति बनी हुई थी, वहां पर आज अगर राज्य सरकार के बजट के बहुत थोड़े से हिस्से से आधी गरीब आबादी के सामने से भूख खत्म हो गई है, तो ऐसी योजनाओं का मजाक उड़ाना एक हिंसा है। 
शहरी बिल्डरों और कारखानेदारों को आज छत्तीसगढ़ में पहले जैसी मजदूरी पर मजदूर नहीं मिलते। लेकिन जब लोगों के काबू से सोने का रेट बाहर है, हवाई सफर की टिकटों का दाम बाहर है, जब पेट्रोल और डीजल का दाम उनके काबू से बाहर है, तो फिर गरीब के खून और पसीने के दाम को वे क्यों काबू में रखना चाहते हैं? आज मजदूर न मिलने, या शराबखोरी बढऩे की शिकायत वे लोग करते हैं जो कि आज बाजार के नीति-सिद्धांतों के मुताबिक मांग और आपूर्ति के आधार पर अधिक मजदूरी देना नहीं चाहते। गरीब को चावल सस्ता मिलता है तो वह अपनी कमाई से दारू पी लेता है, यह एक बहुत ही गैरगरीब सोच है। अगर कोई गरीब ऐसा करता भी है, तो दारू पीने का उसका हक उतना ही है, जितना कि किसी अमीर का है। और छत्तीसगढ़ में आज अगर पूरे परिवार का, बच्चों का पेट भरना शुरू हुआ है, कुपोषण कम हुआ है, शिशु मृत्यु दर घटी है, सेहत के बाकी पैमाने अगर बेहतर हुए हैं, तो इसकी वजह गरीबों को मिलने वाला रियायती अनाज है। केन्द्र सरकार की रोजगार योजनाओं, और राज्य सरकार के अमल को मिलाकर अगर गरीब को अपने आसपास पहले से अधिक रोजगार मिल रहा है, प्रदेश के बाहर बेबसी में मजदूरी करने जाना अब पहले के मुकाबले बहुत कम हुआ है, तो कम से कम इंसान की तरह जीने का उसका ऐसा हक आज उसे कुछ या अधिक सीमा तक मिल रहा है। 
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में दो बार के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पार्टी को अगर तीसरी बार सत्ता पर लेकर आए हैं, तो उसके पीछे बहुत सी दूसरी वजहों के साथ-साथ एक बड़ी वजह यह भी है कि प्रदेश के गरीबों की जिंदगी पिछले दस बरसों में बहुत बदल गई है। चुनाव में जीत-हार की और दूसरी वजहें तो आती-जाती रहती हैं, लेकिन हमारा चुनाव के पहले भी यही मानना था कि सबसे गरीब का सबसे अधिक साथ डॉ. रमन सिंह को मिलेगा, और राज्य में भाजपा की जीत के आंकड़ों में सबसे बड़ा योगदान इसी बात का था। यह छत्तीसगढ़ का भरे पेट वाला गरीब ही था जिसने अपनी पूरी ताकत से भाजपा के हार के खतरे को पीछे धकेल दिया। 
हमारा मानना है कि गरीब का हक देश और प्रदेश के प्राकृतिक साधनों पर नहीं दिया जा रहा, और ताकतवर तबके उसका हक लूट ले रहे हैं। जंगल से लेकर जमीन तक, और खेतों से लेकर पानी तक, खदानों से लेकर आसमान तक, सत्ता जिन चीजों को मनमानी रियायतों पर खरबपतियों को बेचती है, उसमें इन चीजों के साथ-साथ गरीब की धड़कनें भी बिक जाती हैं। जिस तरह देश की संसद और विधानसभाओं में करोड़पतियों और अरबपतियों का अनुपात बढ़ते चल रहा है, उससे जाहिर है कि इतनी गरीबी को लेकर सत्ता और सदन में संवेदनशीलता पहले की तरह की अब नहीं रह गई है। ऐसे में कोई भी पार्टी, कोई भी नेता, अगर गरीबों के भले के लिए कोई अच्छी रियायती योजना बनाते हैं, उस पर ईमानदार अमल करवाते हैं, तो यह सिर्फ इंसाफ की बात है। इसका विरोध करने वाले लोगों को अपनी सोच का खतरा समझना चाहिए।