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Bat ke bat, बात की बात,

28 feb 2014

हिन्दुस्तान के हालात बताते हैं कि लोकतंत्र को सहारा चाहिए

28 फरवरी 2014
संपादकीय
हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट से लेकर मीडिया को देखने-पढऩे वाली जनता तक का इतना वक्त एक विवादास्पद खरबपति के लिए बर्बाद हो रहा है, कि वह देखते ही बनता है। सुब्रत राय सहारा का जिक्र हमने अभी-अभी इसी जगह किया था, लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत से लेकर अपने घर तक वे जिस तरह खबरों में बने हुए हैं, और जिस तरह देश के सैकड़ों अखबारों में पूरे-पूरे पेज के सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च करके छपवाए गए ईश्तहारों के मार्फत सुप्रीम कोर्ट से बात कर रहे हैं, वह भी एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक तरीका है। देश का लोकतंत्र मानो पैसों की ताकत के सामने बेबस हो गया है, और हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत भी इस आदमी से न तो पूंजीनिवेशकों का पैसा वापिस करवा पा रही है, न ही उसे अपने सामने वक्त पर पेश कर पा रही है। पैसों की ताकत देखते ही बन रही है। जिस तरह से अपनी मां की उम्र से जुड़ी बीमारी को सुब्रत राय सहारा खबरों, ईश्तहारों, और अदालती अर्जी में इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे वे अपनी निजी जिंदगी पर लोगों को कहने का हक भी दे रहे हैं। देश में ऐसा कौन सा मुजरिम या मुलजिम हो सकता है जिसकी मां न हो, जिसके घर कोई बीमार न हो, और जिसे अपने परिवार में रहने की कोई न कोई वजह न हो। सुब्रत राय तो बहुत ताकतवर हैं, इस देश की नब्बे फीसदी आबादी को तो अपने घरवालों की बीमारी में तीमारदारी के लिए भी कोई नसीब नहीं हो सकता, और वैसे तमाम लोगों का तो अपने घरों में रहना उतना ही जरूरी है जितना कि आज सुब्रत राय अपना घर पर रहना बता रहे हैं।
यह एक मामला अपने आपमें बहुत अहमियत नहीं रखता, और किसी एक की पारिवारिक त्रासदी को लेकर हम इस जगह कोई विचार रखना भी नहीं चाहते। लेकिन यह एक परिवार से कहीं अधिक बड़ी त्रासदी पूरे देश के साथ है, पूरे लोकतंत्र के साथ है, जो कि ऐसे दसियों लाख लोगों को जेलों में विचाराधीन कैदियों के रूप में देखते आ रहा है, और ऐसे लोग उन पर चल रहे मामलों में अधिकतम संभव सजा से अधिक वक्त जेल में गुजार चुके हैं, क्योंकि वे जमानत या वकील का इंतजाम नहीं कर पाते। उनके मामले बरस-दर-बरस आगे बढ़ते चलते हैं क्योंकि उन्हें अदालत में पेश करने के लिए पुलिस की कमी रहती है, और छोटे-छोटे जजों के पास भी उनके मामले सुनने के लिए वक्त नहीं रहता। कुछ सौ रूपये की रिश्वत का मामला तीस-तीस बरस बाद अभी जाकर निपटने की खबर भी पिछले पखवाड़े ही आई थी। ऐसे में जब देश की सबसे बड़ी अदालत बार-बार एक कारोबारी के सामने अपनी बेबसी खुलकर जाहिर करती है, बहुत-बहुत शब्दों में बखान करती है, तो लोकतंत्र हक्का-बक्का रह जाता है, और देश की तकरीबन तमाम आबादी का भरोसा ऐसे लोकतंत्र पर खत्म हो जाता है। 
हिन्दुस्तान का लोकतंत्र पैसे वालों के लिए, पैसे वालों द्वारा हांका जाता, पैसे खर्च करके खरीदे गए चुनावों से बनी संसद और सरकार का लोकतंत्र है। ऐसे देश में अदालत तक इंसाफ का रास्ता दो किस्म का है, एक तो चिकनी, चौड़ी, और शानदार सड़क का रास्ता है जिस पर पैदल को मनाही है, और सिर्फ बड़ी गाडिय़ों को इजाजत है। दूसरा रास्ता कांटों और कंकड़ों का है, जिस पर चलकर अदालत भी इंसाफ तक पहुंचने का हक सिर्फ नंगे पैर पैदलों को दिया गया है। यह तो अच्छा है कि हिन्दुस्तान के लोकतंत्र में शहरों में नक्सलियों का ढांचा नहीं है, और शहरी इलाकों में उनका कब्जा नहीं है। वरना भारतीय लोकतंत्र ने ऐसी गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि शहरी लोग नक्सलियों से हमदर्दी न करें। आज जंगलों के जिन आदिवासी इलाकों में नक्सलियों का कब्जा है, यह जाहिर है वहां पर जनता के कम से कम एक हिस्से की हमदर्दी उनके साथ है, क्योंकि इस हिस्से में लोकतंत्र के नाम पर सिर्फ शोषण और बेइंसाफी को झेला है। कमोबेश ऐसी ही दिमागी हालत शहरी आबादी की भी होते चल रही है, और अगर सहारा जैसे और मामले इस आबादी के सामने आते चले गए, तो अधिक दिन नहीं लगेंगे जब नक्सलियों को बिन मांगें सहारा मिलने लगेगा, और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र को खुद के लिए सहारा ढूंढना पड़ेगा। 

सीधी जिम्मेदारी या चूक बिना नैतिक-इस्तीफे ठीक नहीं

27 फरवरी 2014
संपादकीय
भारतीय नौसेना की दो पनडुब्बियों के साथ साल भर में हुए दो हादसों के बाद नौसेना प्रमुख एडमिरल वी.के. जोशी ने कल कुछ घंटों के भीतर ही इस्तीफा दे दिया, और केन्द्र सरकार ने बिजली की रफ्तार से उसे सीधे-सीधे मंजूर भी कर लिया। नौसेना के जानकार बताते हैं कि एडमिरल जोशी अपने मातहतों से ऊंची उम्मीदें रखते थे, और कड़ी कार्रवाई के लिए जाने जाते थे। उन्होंने शायद अपने उसी ऊंचे पैमाने के तहत यह इस्तीफा दिया है, लेकिन उसे जिस रफ्तार से मंजूर किया गया, वह कुछ हैरान करता है। 
केन्द्र और राज्य सरकारों में मंत्रियों या अफसरों के ऐसे इस्तीफे पुरानी कहानियां बन गए हैं। एक बार एक रेल दुर्घटना के बाद रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दिया था, एक बार माधव राव सिंधिया ने एक विमान दुर्घटना के बाद इस्तीफा दिया था, और ऐसे कुछ और मामले भी बहुत पहले नैतिकता के आधार पर होते थे। लेकिन हाल के बरसों में नैतिकता के आधार पर इस्तीफे तो दूर रहे, अब तो लोग भ्रष्टाचार के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार होने के बाद भी जेल के भीतर पहुंच जाने पर भी मंत्री बने रहने की हसरत रखते हैं। इसलिए विभाग के मुखिया होने के नाते नैतिकता का इस्तीफा अब पुराने फैशन की बात हो गई है। 
लेकिन हम ऐसे इस्तीफों के बहुत हिमायती भी नहीं हैं। सरकार चलाने में मंत्री या अफसर का एक महत्व होता है, और उनकी निरंतरता सरकार में अधिकतर जगहों पर मायने भी रखती है। एकाएक मुखिया मंत्री या अफसर छोड़कर निकल जाएं, तो उससे एक छोटा या बड़ा शून्य पैदा होता है, और काम रूकता है। इसलिए जब तक कोई जिम्मेदारी न बने, हम महज नैतिकता के आधार पर इस्तीफे के पक्ष में नहीं हैं। होना तो यह चाहिए कि जब तक दूसरे लोग, कोई जांच, सरकार के मुखिया, अदालत, किसी विभाग के मुखिया मंत्री-अफसर को जिम्मेदार न पाएं, तब तक हादसे पर इस्तीफे ठीक नहीं हैं। 
सरकार में बहुत अधिक स्थायित्व, और निरंतरता भी कुछ खतरे की बात होती हैं, लेकिन निरंतरता न होना भी खतरे की बात होती है। भारत जैसे लोकतंत्र में जब अलग-अलग राज्यों में हर कुछ बरस में लोकसभा, विधानसभा, पंचायत-म्युनिसिपल के चुनाव होते हैं, और उनमें मंत्रियों से लेकर अफसरों तक, और निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधियों तक में फेरबदल होता है, तो उससे नीतियों, फैसलों, और उनके अमल पर फर्क पड़ता है। कभी निर्वाचित प्रतिनिधि बदलते हैं, कभी उनकी पसंद और नापसंद के आधार पर अफसर बदलते हैं, और कभी पूरी की पूरी निर्वाचित संस्था बदल जाती है। हर बरस दो बरस में अगर ऐसे बड़े बदलाव होते हैं, तो उसका नुकसान इसलिए होता है क्योंकि वे मतदाताओं की पसंद-नापसंद से लेकर निर्वाचित नेताओं और बड़े अफसरों की पसंद-नापसंद से होने वाले बदलाव होते हैं। इसलिए इसके साथ-साथ अगर नैतिकता के आधार पर बड़े नाजुक और अहमियत वाले ओहदों पर बैठे लोग तुरंत इस्तीफा दे दें, तो उनको उसी रफ्तार से मंजूर करना हमारे हिसाब से एक गलत फैसला है। 
फौज के बहुत से मामले ऐसे होते हैं, जिनमें चाहकर भी हादसों को रोकना हर वक्त मुमकिन नहीं होता। हम तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में नक्सल मोर्चे पर तैनात पुलिस को देखते हैं, जिनके साथ में कई केन्द्रीय सुरक्षा बल काम कर रहे हैं, और तमाम सावधानियों के बावजूद नक्सलियों के हाथ बहुत से लोग शहीद होते हैं। लेकिन ऐसे में हर बार बड़े या छोटे, मंत्री या अफसर अगर इस्तीफा देने लगें, तो उससे कोई हल नहीं निकलेगा। जो जिम्मेदारी के काम करते हंै, उन्हीं के मातहत तो चूक या हादसा हो सकता है। और ऐसे में मुखिया को डटकर खड़े रहना चाहिए, जब तक कि मुखिया की खुद की लापरवाही, चूक में हिस्सेदारी का सीधा जिम्मा उस पर न आता हो। हमने बात की शुरुआत नौसेनाध्यक्ष के इस्तीफे से की है, लेकिन हमारा मकसद इसे भारत जैसे देश में केन्द्र और राज्य के बाकी नेताओं-अफसरों के बारे में भी अपनी राय रखना है। ऐसे इस्तीफे कोई इलाज नहीं हैं, और गैरजरूरी भी हैं। 

Bat ke bat, बात की बात,

26 feb 2014

यह लोकतंत्र है, या लोकतंत्र की पैकिंग में बिकता हुआ जुर्म है?

26 फरवरी 2014
संपादकीय
हिन्दुस्तान में हर बारह बरस में एक बार आस्था का कुंभ इलाहाबाद में जुटता है। लेकिन अनास्था का कुंभ हर पांच बरस में पूरे देश में लगता है। नेताओं और पार्टियों के जो चाल-चलन चुनाव के वक्त देखने मिलते हैं, मंडी में जिस तरह नेताओं की खरीद-फरोख्त होती है, लोग जिस तरह हैरतअंगेज कर देने वाले साथियों के साथ हमबिस्तर होते नजर आते हैं, जिस तरह शेर और बंदर मिलकर भागीदारी फर्म खोलते हैं, वह सब देखते ही बनता है। अब हर दिन देश में अनास्था को बढ़ावा देने वाला रहेगा, क्योंकि पांच बरस बाद आ रहे आम चुनाव का मौका आ गया है। 
नरेन्द्र मोदी को गाली देने के लिए जब कांग्रेस के केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद उनको नपुंसक कहते हैं, तो इस बात पर हैरानी होती है कि इंदिरा और सोनिया की पार्टी का एक नेता मर्द होने को ताकत का सुबूत मानता है, और विरोधी को गाली देने के लिए नामर्द कहता है, और इंदिरा-सोनिया की पार्टी में ऐसे फूहड़ बयान के खिलाफ किसी माथे पर शिकन भी नहीं पड़ती। कहीं बिहार में विधायकों की खरीद-फरोख्त हो रही है, कहीं मोदी के गुजरात में कांग्रेस के विधायकों का भाजपा प्रवेश हो रहा है, और कहीं कल तक संवैधानिक कुर्सियों पर बैठे हुए लोग सीधे राजनीति में छलांग लगा रहे हैं। लोकतंत्र पर आस्था जारी रखने के लिए चुनाव नाम का जो वोट-पर्व होता है, वह पर्व अनास्था के एक जलसे में बदल गया है, पांचसाला जलसे में। 
कल रही-सही कसर तब पूरी हो गई जब देश की दर्जन भर चुनावी सर्वे एजेंसियों में से एक छोड़कर बाकी सभी ऐेसे स्टिंग ऑपरेशनों में फंसीं, जिनमें वे कालाधन लेकर सर्वे करने की बात करती हैं, और फिर ऊपरी पैसा लेकर झूठे नतीजे देश के सामने रखने की बात भी करती हैं। देश के सबसे बड़े समाचार चैनलों, और प्रकाशन समूहों के चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसियां जब खुलकर अपने तन और मन को बेचने की बात करते हुए खुफिया कैमरों पर पकड़ाती हैं, तो यह लगता है कि इसके बाद लोकतंत्र में आस्था क्यों और कैसे बची रहे? चुनाव तो भ्रष्ट हो चुके हैं, पार्टियां और नेता कालेधन पर सवार होकर, साम्प्रदायिकता और जातिवाद भड़काते हुए, संसद और विधानसभाओं में पहुंचते हैं, और वे इन जगहों को भ्रष्ट करोड़पतियों, अरबपतियों से भरते जा रहे हैं। ऐसे में सवा सौ करोड़ से अधिक आबादी में अस्सी करोड़ से अधिक मतदाताओं की आस्था लोकतंत्र पर कैसे और क्यों बनी रहे?
दूसरी तरफ मुंबई के हाईकोर्ट को वहीं की निचली अदालत और सरकार से पूछना पड़ रहा है कि संजय दत्त जैसे ताकतवर खरबपति फिल्मी सितारे को लगातार पैरोल कैसे मिल रही है? और बाकी लोगों को यह क्यों नहीं नसीब हो रहा? उधर देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट, देश के सबसे चर्चित और विवादास्पद खरबपति कारोबारियों में से एक सुब्रत राय सहारा के मामले में अदालत में खुलकर बार-बार कह रही है कि डेढ़ बरस से सुब्रत राय अदालत के आदेश-निर्देश अनसुने कर रहे हैं, और किसी भी बात पर अमल नहीं कर रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में ऐसे कितने लोग हैं जिनको सुब्रत राय की तरह का खास दर्जा मिला हुआ हो, और जो सुप्रीम कोर्ट के बरस-दर-बरस खराब करते हुए, देश की सबसे बड़ी अदालत के हुक्म को अनसुना करते हुए अपनी मनमानी करते रहें? 
कुल मिलाकर संसद, विधानसभाएं, देश और प्रदेश की सरकारें, कारोबारी और देश के नेता, पार्टियां, और मीडिया, इन सबका जो हाल देखने मिल रहा है, उससे ऐसा लगता है कि चोर तो सभी हैं, कुछ पकड़ाए जा चुके हैं, और बाकी का पकड़ाना अभी बाकी है। ऐसे देश में सचिन तेंदुलकर जैसे लोग भारत रत्न बन रहे हैं, जो करोड़ों की टैक्स रियायत पाने के लिए अपने आपको ईश्तहारों की मॉडलिंग में खिलाड़ी नहीं, अभिनेता साबित करते हैं, करोड़ों की महंगी कारों से लेकर पानी साफ करने वाले वॉटर फिल्टर तक की बिक्री बढ़ाते हैं, और देश की संसद में बैठकर गरीबों की मौत के जिम्मेदार गंदे पानी के बारे में कभी सोचते भी नहीं। भारत तो ऐसे रत्न बना सकता है, लेकिन ऐसे रत्न कभी भारत नहीं बना सकते। 
और बात किसी एक व्यक्ति की नहीं है, एक संस्था की नहीं है, एक चुनाव या एक प्रदेश की भी नहीं है। अगर सोचें कि पूरे देश में पूरे एक दिन में एक ऐसी खबर कौन सी उठी है जिससे कि लोकतंत्र और इंसाफ के प्रति भरोसा खड़ा हो, या दम तोड़ते भरोसे को एक-दो सांसें और मिल जाएं, तो एक भी खबर ऐसी दिखाई नहीं पड़ती। 
संजय दत्त से लेकर सुब्रत राय तक के साथ जो हो रहा है, उससे साबित होता है  यह देश कमाई और दूसरे किस्म की ताकत के आधार पर अलग-अलग तबकों में बंटा और कटा हुआ देश है। और ऐसे लोकतंत्र पर आस्था की कोई वजह किसी को दिखती हो, तो हम भी उसे जानना चाहेंगे। खरीदे गए चुनावी सर्वे, चुनाव, चुनावी नतीजे, खरीदे गए सांसद और विधायक, खरीदी गई सरकार, और खरीदा गया इंसाफ, यह लोकतंत्र है, या लोकतंत्र की पैकिंग में बिकता हुआ जुर्म है? 

पुलिस और जज के तनाव से लेकर लाशों तक कई सवाल

25 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके बस्तर में तैनात एक डीएसपी ने जिले के एक जज से सड़क पर हुए झगड़े के बाद निलंबित होते ही अपनी पत्नी और बच्चों को गोलियां मारीं, और खुद को भी। जगदलपुर शहर में पुलिस कार्रवाई के दौरान सड़क पर लगे जाम में जिला अदालत के एक एडीजे भी अपनी कार में फंस गए थे, और इसी दौरान कहा गया कि देवनारायण पटेल नाम के इस सीएसपी के साथ उनका झगड़ा बढ़ा, और उनकी शिकायत के मुताबिक पुलिस ने उन्हें पीटा। एक आदिवासी जज होने की वजह से, और उनका नाम-परिचय उजागर होने के बाद भी उनके साथ ऐसा बर्ताव होने को लेकर एसटी-एससी एक्ट की कुछ धाराएं भी लगी थीं, और जिला अदालत से लेकर वकीलों तक, और शायद हाईकोर्ट ने भी, इसमें दखल दिया, और पुलिस ने तुरंत इस अफसर को निलंबित करके पुलिस मुख्यालय अटैच कर दिया था। इसके तुरंत बाद इस अफसर की ऐसी आत्मघाती कार्रवाई को फिलहाल इसी विभागीय कार्रवाई, और अदालती प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा सकता है। इस सिलसिले में यह बात भी तकलीफदेह है कि इसी गणतंत्र दिवस पर इस अफसर को राज्यपाल ने वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। नक्सल मोर्चे पर जो कामयाब रहा, वह शहरी सड़क पर अपनी या किसी और की गलती के सामने नाकामयाब हो गया। 
यहां दो-तीन मुद्दों पर सोचने की जरूरत है। एक तो यह कि पुलिस अपनी कार्रवाई में कई मौकों पर ज्यादती करने पर उतर आती है, और जब तक उसका विरोध करने वाले ताकतवर न हों, तब तक पुलिस ज्यादती करके भी बची रहती है। दूसरी तरफ न्यायपालिका सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर तो सादगी की हिमायती होती चल रही हैं, लेकिन नीचे के स्तर पर अदालतों और जजों का बर्ताव अपनी कुर्सी की ताकत की बददिमागी भी बहुत से मौकों पर दिखाता है। जगदलपुर की सड़क पर हुई इस घटना में इन दोनों में से कोई एक बात तनाव और टकराव के पीछे थी, या दोनों ही बातें थीं, यह अभी साफ नहीं है, जांच में जब यह सामने आएगा, तब आएगा, अभी तो इस घटना के बाद कुछ जिंदगियां खत्म हो गईं, वही सबसे तकलीफ की बात है।  इस तकलीफदेह मौके पर एक तीसरी बात जो सोचने की है, वह यह कि अदालत ने अपने एक जज के साथ हुए इस मामले पर किस रफ्तार से कितनी कार्रवाई की, कितनी जरूरी थी, और कितनी जायज थी, और इसके बाद पुलिस विभाग ने अपने अफसर पर जो कार्रवाई की, क्या उस कार्रवाई से कुछ कम या कुछ अधिक करने की जरूरत या गुंजाइश थी? 
इस लहूलुहान तस्वीर को अलग-अलग तरफ से देखें, तो अलग-अलग बातें सही या गलत लगेंगी, न्यायोचित या जरूरी, बेइंसाफ या गैरजरूरी लगेंगी। लेकिन हम भारतीय लोकतंत्र में जी रहे आम लोगों के नजरिए से देखें, तो इस लोकतंत्र से मिले हक को इस्तेमाल करने वाले लोग जब लोकतंत्र की जरूरतों से परे अपने खुद के इस्तेमाल के लिए, अपनी खुद की मनमानी से इन हकों पर उतारू हो जाते हैं, तो आम जनता के पास इनकी मार को, इनके वार को झेलने के अलावा कुछ नहीं बचता। भारत में जजों को अपने अदालती कामकाज की जरूरतों के लिए भी जिस तरह के विशेषाधिकार दिए गए हैं, उनसे उनके बददिमाग हो जाने का एक खतरा हमेशा रहता है। अदालत की अवमानना के कानून को हटाने की बात लंबे समय से चल रही है, लेकिन न्यायपालिका उसे छोडऩा नहीं चाहते। अदालती मामलों की जानकारी रखने वाले लोगों को यह भी मालूम है कि किस तरह जजों के निजी चाल-चलन गड़बड़ रहने पर भी बरसों तक उनके प्रशासनिक मुखिया, हाईकोर्ट की तरफ से उन पर किसी कार्रवाई की शुरुआत भी नहीं होती। हम अभी जगदलपुर के इस मामले को लेकर अधिक कहना नहीं चाहते, लेकिन छत्तीसगढ़ ने जिलों के बहुत से छोटे जजों के खिलाफ तरह-तरह की शिकायत और जांच की रिपोर्ट हाईकोर्ट के पास पड़े रहने की चर्चा अदालती गलियारों से आती हैं। 
इसी तरह पुलिस की ज्यादती भी सड़कों पर आए दिन दिखती है, और जिले के एक जज के साथ जो हुआ है, वह गरीब और कमजोर लोगों के साथ तकरीबन हर शहर में औसतन हर घंटे होता होगा, और चूंकि पुलिस ऐसे लगभग हर मामले में अपनी हिंसा के बावजूद बच जाती हैं, इसलिए उसका बर्ताव धीरे-धीरे दूसरे लोगों के साथ भी ऐसा होने लगता है। 
अभी हुई मौतों की तकलीफ हमको बहुत है। और यही मौका है कि जुड़े हुए सभी ताकतवर ओहदों को ऐसी नौबत के बारे में सोचना चाहिए। पुलिस को भी सोचना चाहिए, प्रशासन को भी सोचना चाहिए, शासन को भी सोचना चाहिए, और हाईकोर्ट को भी देखना चाहिए कि उसके मातहत इन जजों का अपना सार्वजनिक जीवन विवादों से परे का है या नहीं। अदालत को यह भी सोचने की जरूरत है कि जिस रफ्तार से एक जज के मामले में उसने कार्रवाई की है, क्या इस रफ्तार से बाकी पुलिस-हिंसा की रिकॉर्डिंग भी खबरों में आने के बाद अदालत उतनी सक्रिय होती है? यह भी सोचने की बात है कि क्या पुलिस के बड़े अफसरों ने इस मंझले अफसर पर इतनी रफ्तार से कार्रवाई अदालती असर या दबाव में की है, या यह एक सामान्य प्रक्रिया है, और ऐसा दूसरे बहुत से मामलों में पहले भी होते आया है? पुलिस के अफसरों को निजी तौर पर यह सोचने की जरूरत है कि क्या उनको सड़क पर कोई भी कानून अपने हाथ में लेकर हिंसा करने का हक है? क्या उसके बिना काम नहीं चल सकता? और हर वयस्क व्यक्ति को यह सोचने की जरूरत है कि जिंदगी तनाव के ऐसे वक्त आने पर क्या उनको परिवार के लोगों, और खुद को इस तरह मारना चाहिए, या मुसीबत का सामना करना चाहिए? ऐसे बहुत से सवाल तकलीफ के इस मौके पर खड़े हो रहे हैं, और हम गुजारिश करते हैं कि सारे लोग इन पहलुओं पर थोड़ा सा सोचें ताकि आगे ऐेसी तकलीफ की नौबत न आए। 

बलात्कारी के परिवार की यातना देख लोग संभलें

24 फरवरी 2014
संपादकीय
देश भर से रोज बलात्कार की इतनी खबरें आती हैं कि दिल दहल उठता है। जब बलात्कार हो चुका रहता है तब मुजरिम या मुजरिमों की पकड़़-धकड़ शुरू होती है। कई मामलों में गिरफ्तारी होती है, कुछ मामलों में सजा। लेकिन इसे रोकने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है?
बलात्कार के बाद गिरफ्तारियों के आंकड़ें देखें तो पता लगता है कि काफी मामले परिवार के जानकार लोगों के ही किए हुए हैं या कामकाज के जानकार लोगों ने बलात्कार किए। बहुत से मामलों में दोस्त ने या उसके साथ मिलकर उसके दोस्तों ने बलात्कार किए। ऐसे मामलों को पुलिस कैसे रोक सकती है? किसी सुनसान जगह पर किसी लड़की या महिला को अकेले पाकर कोई बलात्कार करे, तो ऐसी हर अकेली लड़की या सुनसान जगह की निगरानी दुनिया की कोई भी पुलिस नहीं कर सकती। तो फिर बलात्कार रोकने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है, या कुछ भी नहीं?
यह मुद्दा लिखने के लिए बहुत आसान और सीधा नहीं है। इसके तार हर तरफ दूर तक जुड़े हुए हैं, फिर भी कुछ पहलुओं पर बात की जानी चाहिए, और हो भी सकती है। इनमें से कुछ बातें सरकार और अदालत के जिम्मे की हैं कि सरकार को लड़कियों और महिलाओं के लिए घर, समाज, और कामकाज की जगहें महफूज बनानी चाहिए। मामूली छेडख़ानी की शिकायत पर भी गंभीरता से कार्रवाई हो, तो भी ऐसे लोग बलात्कारी बनने से रूक सकते हैं। इसके बाद पुलिस की जांच, तेज रफ्तार सुनवाई और जल्द फैसला हो, तो भी उसका असर समाज के आगे बलात्कारी बनने वालों के हौसले पर पड़ सकता है। लेकिन जाहिर तौर पर दिखने वाली इन बातों से परे की कुछ बातों की चर्चा के लिए आज हम यहां इस मुद्दे पर लिख रहे हैं। 
बलात्कार करने वालों को अपने जुर्म से कुछ देर के लिए हो सकता है कि देह-सुख मिलता हो, एक अंदाज यह भी है कि बलात्कारी सेक्स-सुख के अलावा, या उसके बजाय, मर्दानी-हिंसा का सुख पाते हैं। इनमें से जो भी बात लागू होती हो, या कोई तीसरी-चौथी बात इसके पीछे हो, यह समझने की जरूरत है कि इस हिंसक-जुर्म के बाद खुद बलात्कारी का क्या होता है, उसके परिवार का क्या होता है? शायद ही कोई ऐसा बलात्कार होता होगा जिसमें परिवार के लोग इस जुर्म में बलात्कारी का साथ देते होंगे। और बलात्कारी अपने जिस किस सुख के लिए यह हिंसा करता है, उस सुख का कोई हिस्सा भी बलात्कारी के परिवार को नहीं मिलता। इसलिए एक तरफ बलात्कारी इस जुर्म के बाद बरसों के जेल, बरसों की कैद, और उसके बाद का अंधकार भरा भविष्य पाता है, उसका परिवार भी इन पूरे बरसों में निजी तकलीफ, सामाजिक अपमान की प्रताडऩा, आर्थिक तकलीफ, अदालत और जेल, मुकदमे के खर्च, इन सबको झेलता है।
यहीं पर हमारा मानना है समाज के भीतर एक जागरूकता की जरूरत है। जिन लोगों के बलात्कारी होने का खतरा रहता है, तकरीबन हर मामले में मर्द, उनके बीच खतरों को ठीक से पेश करने की जरूरत है। ऐसा नहीं लगता कि खतरों का पूरा अंदाज रहते हुए भी बलात्कारी यह जुर्म करेंगे। अधिकतर बलात्कारी शायद यह मानकर चलते हैं कि न तो शिकायत होगी, और न ही पुलिस कभी उन तक पहुंच पाएगी। इस खुशफहमी को भी तोडऩे की जरूरत है। और बलात्कारी शायद अपनी इसी खुशफहमी के चलते यह हौसला करते हैं। लेकिन शायद ही बलात्कारी उस मुसीबत और तबाही का अंदाज लगा पाते होंगे जो उनके परिवार पर इस जुर्म के बाद टूटना तय होता है। ऐसी आर्थिक, सामाजिक, और दिल-दिमाग की तबाही की तस्वीर अगर समाज के सामने पेश की जाए, तो शायद अधिकार संभावित बलात्कारी जुर्म के पहले ही थम जाएंगे। समाज के भीतर की तबाही की ऐसी कहानियों को बिना नाम के सबके सामने रखना जरूरी है। आज बलात्कार की खबर गिरफ्तारी, मुकदमे, और सजा के बाद खत्म हो जाती हैं। बलात्कारी के परिवार की यातना और तबाही की मिसालें, बिना शिनाख्त के, लोगों के सामने रखनी चाहिए। इससे पैदा होने वाली जागरूकता लोगों को पटरी पर बने रहने में मदद मिल सकती है। 

शुक्रिया, माफ करो, और माफ किया...

23 फरवरी 2014
संपादकीय
वेलेंटाईन डे के दिन ईसाईयों के सबसे बड़े धर्मगुरू पोप फ्रांसिस ने शादी के बंधन में बंधने जा रहे 25 हजार जोड़ों से बहुत मार्के की बातें कही। खबर है कि इनमें से कुछ जोड़ों ने ईसाई धर्म के मुताबिक शादी निभाने को लेकर अपनी चिंताओं पर पोप से सवाल किए थे। पोप ने साफगोई के साथ कुबूल किया कि प्रश्नोत्तरी जैसे दिख रहे इस नजारे के सवाल दरअसल उन्हें पहले से बताए गए थे, और वह जवाब तैयार करके आए थे। यह अगर वेटिकन का कोई नाटक भी था, तो भी बुरा नहीं था। पोप ने जो कहा, और जैसे कहा, वह सब कुछ अलग-अलग संदर्भों में कई लंबी दिलचस्प  चर्चाओं का मसाला है, लेकिन उसके कुछ मुद्दों पर बात करने जैसी है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में आदर्श पति, पत्नी, सास और परिवार जैसा कुछ नहीं होता, लेकिन लोग शुक्रिया, माफ करो, और माफ किया, बोलना सीखें, तो शादी को जिंदगी भर निभाने का वायदा पूरा किया जा सकता है, लेकिन क्या केवल कुछ अल्फाज बोल देने भर से शादी में, जिंदगी में खुशियां आ जाएंगी? हम किसी का शुक्रिया अदा तब करते हंै, जब हम उसकी जगह खुद को रखकर देख सकते हंै, कि हमारे लिए कुछ करते समय उसने क्या सोचा, और किया। जब इस तरह साथ रहने वालों की कद्र की जाएगी, तो रिश्ते को सहेजने का काम खुद ब खुद होने लगेगा, और अगर रिश्ते सहेजने में कहीं कमी है, तो क्या लोग एक दूसरे का शुक्रिया अदा करने के मौके तलाश कर इसे दूर कर सकते हैं, यह भी सोचने की बात है।
इसी तरह पोप ने माफी मांग लेने की भी सलाह दी है। चूंकि वह कहते हंै कि आदर्श परिवार, पति, पत्नी, सास जैसा कुछ नहीं होता, लिहाजा इंसान से गलतियां होनी लाजिमी है, लेकिन अपनी गलती की माफी मांग लेने से उसके कारण दूसरों को हुई तकलीफें कम होती है, इसके बाद दोबारा वैसी गलती नहीं करने के लिए इंसान चौकन्ना रहता है। हम माफी मांगकर जब दूसरों को अपने से बड़ा बनने का मौका देते हंै, तो दरअसल हम भविष्य में अपने लिए एक खैरख्वाह खड़ा कर रहे होते हंै। माफी मांगने पर हमारे देश के दो बड़े दलों कांग्रेस और भाजपा में अक्सर बहुत बहसें होती हंै। दोनों माफी मांगने से कतराते हुए अपनी अपनी दलीलें देते हंै, या इस तरह माफी मांगते हैं, जिससे चोट खाने वालों के जख्म और गहरे हो जाते हंै। यह सोच न परिवार में, न समाज में कोई सकारात्मकता, कोई बड़प्पन ला सकती है, और छोटी सोच लेकर चलने वाला समाज दिमागी संकरेपन का खामियाजा भुगतता है। लोगों में अपनी गलतियों का अहसास नहीं जागे, तो समाज में जुर्म बढ़ते हंै, इंसानियत शर्मसार होती है, कानून व्यवस्था कमजोर होती है। दिल्ली में उत्तरपूर्व के लोगों के साथ होने वाला बर्ताव ऐसे ही दिमागी संकरेपन का नमूना है, जिसके चलते इस शहर के कुछ लोगों को अपनी गलतियां नजर नहीं आती, और वह उन्हें दोहराते जाने में शर्म महसूस नहीं करते। उनके कारण देश के दो इलाकों में अलगाव की खाई बढ़ती चली जा रही है।
पोप ने माफी मांगने के अलावा माफ करने की भी सलाह दी है। किसी रिश्ते में हर समय हर पक्ष समझदारी दिखाए, यह मुमकिन नहीं है। ऐसे में लोगों को माफ करने की समझदारी दिखानी चाहिए। रिश्ता रखना है, या तोड़ देना है यह फैसला आपसी बर्ताव का आधार होना चाहिए। अगर अरविंद केजरीवाल की तरह रिश्ता तोड़ देना है, कांग्रेस को मौका देने का बड़प्पन, सब्र नहीं दिखाना है, तो सरकार 49 दिन में गिर जाती है। अगर सोनिया गांधी की तरह अपना विरोध करने वाले शरद पवार, और राजीव की हत्या के आरोपी तमिल टाईगरों से हमदर्दी रखने वाले डीएमके को मौका दिया जाता है, तो सरकार दस साल भी चल जाती है। पारिवारिक, शादी के रिश्ते, सरकारों जैसे पांच साला मतदान के मोहताज नहीं होते, या उनमें पांच सालों में फैसला सुनाने की सुविधा नहीं होती, इसलिए अक्सर माफ नहीं करने वालों को भी लोग बहुत सी मजबूरियों में ढो जाते हंै, लेकिन क्या यह वैसा रिश्ता रहता है जिसकी हसरत इसके शुरू होने के समय की गई थी?
पोप ने माफ करने की सलाह देते हुए यह कहा है कि माफ कर देने से रिश्ता अमर हो जाता है। इसका दूसरा पहलू यह है कि अपने जीते जी अगर रिश्ता जिंदा रखना है, तो माफ करने की समझदारी जरूरी है। इसमें किसी बड़प्पन के घमंड के लिए जगह नहीं, क्योंकि रिश्ता जिंदा रखने का फैसला जो किया है!
पोप ने एक और भी बहुत अच्छी बात कही कि आज का झगड़ा आज निपटा लो, रात सोने जाने के पहले तनाव खत्म कर लो, वरना अगली सुबह उठोगे, तो चैन कहीं नहीं मिलेगा। क्या इसका एक अर्थ यह नहीं हो सकता कि रात बीतने के साथ ही झगड़ा भी बीता हुआ मान लिया जाए! अगली सुबह जिंदगी को एक नया मौका मिले। समय रहते तनाव खत्म करने से अगर शादी बच सकती है, खुशहाल रह सकती है, तो समय रहते तनाव खत्म करने से समाज, देश खुश क्यों नहीं रह सकता? आज का झगड़ा जब आज ही निपटा लिया जाता है, तो अगली सुबह जिंदगी को पीछे की ओर ले जाने में वक्त, ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी पड़ती, हम अपने लिए नया सवेरा, नया दिन, नया भविष्य बुन सकते हैं।
पोप की यह बेलाग सलाह शादी करने जा रहे जोड़ों के लिए इसलिए बहुत काम की है, क्योंकि इन जोड़ों से ही कल का समाज बनना है, और यह सोच ही उस समाज को सही दिशा दे सकती है। पोप फ्रांसिस भी बहुत से दकियानूसी कट्टरपंथी धर्मगुरुओं की तरह नौजवानों को अतार्किक, अव्यवहारिक भाषण पिला सकते थे, लेकिन उन्होंने नौजवानों के साथ बेलाग होने का, ईमानदार होने का रास्ता चुना। बेशक वेटिकन बहुत सी बातों को लेकर बहुत कड़वे उलाहनों का सामना कर रहा है। बाल यौन शोषण और भ्रष्टाचार की खबरों से नई पीढ़ी के दूर हो जाने के डर से भी शायद नौजवान पीढ़ी में चर्च के प्रति दिलचस्पी बनाए रखने की एक कोशिश के तहत पोप का यह रूप पेश किया गया हो, लेकिन अगर दूसरे धर्मगुरू भी नई पीढ़ी के साथ ऐसी काम की बातें करें, तो उनकी यह दलील कुछ गले भी उतरे कि, धर्म जिंदगी जीने का एक तरीका है।

गैरजिम्मेदार-नासमझ लोगों को बचाने की पहल सरकार करे

22 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की सड़कों पर रोज ही लहू बिखर रहा है। छोटे-छोटे दुपहिया वालों से लेकर बड़े-बड़े लोगों तक की गाडिय़ां हादसों की शिकार हो रही हैं। और केंद्र सरकार के बारे में यह पता लग रहा है कि वह सड़कों पर नशे में गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ एक बहुत कड़ा कानून बनाने जा रही है। लेकिन नशे से परे भी, होश में भी सड़कों पर एक्सीडेंट के लिए जिम्मेदार लोगों पर आज कोई रोक नहीं है। और चूंकि सड़कों पर हिफाजत का इंतजाम राज्य का अधिकार है, और राज्य की जिम्मेदारी है इसलिए केंद्र सरकार का बनाया कानून यहां पर तब तक कागज का एक पुलिंदा ही बना रहेगा, जब तक राज्य सरकार में लोगों को समझ देने का हौसला नहीं जुटेगा।
हमारे अखबार में हादसों की जो तस्वीरें आती हैं, उनसे समझ आता है कि अगर दुपहियों पर सवार लोग हेलमेट लगाए होते, तो बहुत सी मौतें, शायद अधिकतर मौतें, टल जातीं। इसी तरह अगर बड़ी गाडिय़ों में चलने वाले लोग सीट-बेल्ट का इस्तेमाल करते, रफ्तार को काबू में रखते, तो भी बहुत सी मौतें टल चुकी होतीं। लेकिन लोगों को उनकी खुद की हिफाजत की समझ जब नहीं होती, जब आम लोग भारी गैरजिम्मेदार होते हैं, और नियमों को मानने के खिलाफ उनके मन में एक अहंकार बैठा होता है, तब एक जनकल्याणकारी सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और लोगों की नाराजगी, और वोटों की फिक्र किए बिना नियम लागू करके लोगों को बचाने का काम करना चाहिए। 
हिंदुस्तान में बहुत से छोटे-छोटे ऐसे प्रदेश और शहर हैं, जहां पर बड़ी आसानी से राज्य सरकार हेलमेट को अनिवार्य कर चुकी हैं, और कुछ हफ्तों के विरोध के बाद लोगों को खुद ही समझ आ जाता है कि जब घर से निकले लोग दुपहियों पर हेलमेट के साथ जाते हैं, तो उनके लौटने की आस भी पूरी रहती है। लेकिन छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे बकवासी बयानबाजों के विरोध की वजह से हेलमेट अनिवार्य नहीं हो पाया। जबकि यहीं के एक जिले दुर्ग में, वहां के पुलिस अधीक्षक ने अपनी समझ और अपनी कोशिश से उसे बहुत हद तक कामयाबी से लागू करके दिखा दिया था। 
आज जब हिंदुस्तान का सुप्रीम कोर्ट कई बार इस बारे में कह चुका है कि दुपहिया गाडिय़ों के साथ हेलमेट अनिवार्य रूप से देकर भी अगर लोगों को बचाया जा सकता है, तो वह करना चाहिए। हम सड़कों पर बुरी तरह से जख्मी लोगों को मरने के आंकड़ों में तो देख लेते हैं, लेकिन मौत से कम जिस तरह की तकलीफ के साथ ऐसे जख्मी लोग जिंदगी भर लंगड़ाने या घिसटने को मजबूर रहते हैं, उस तकलीफ को मौतों के आंकड़ों में जगह नहीं मिलती, और इसीलिए सड़कों पर खतरा हकीकत जितना बड़ा कभी दिखता नहीं है। लेकिन जब किसी परिवार के लोग सिर की चोट के बाद बाकी जिंदगी उसकी तकलीफ के साथ मरने की तरह जीने को मजबूर रहते हैं, तो उन लोगों को आसपास के लोगों तक यह समझ भी पहुंचानी चाहिए कि हेलमेट इस्तेमाल न करने का क्या नतीजा होता है।
एक दूसरी बात यह भी है कि जो लोग किसी एक नियम-कानून को नहीं मानते, या उसे तोडऩे में मजा पाते हैं, वैसे ही लोग दूसरे नियम-कायदे भी तोड़ते हैं। इसलिए हेलमेट का, या सीट-बेल्ट का अनुशासन, दूसरे कई किस्म के अनुशासन को भी बढ़ावा देता है। आज हेलमेट के नियम लागू न होने से दुपहियों पर आवारागर्दी करते लोग टै्रफिक के हर तरह के नियम तोड़ते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार को बिना हिचक, बिना देर किए, सड़कों पर लोगों को जिम्मेदार बनाना शुरू करना चाहिए, और हेलमेट इस तरफ पहला कदम होगा, जो कि हर बरस सैकड़ों जानें बचाएगा।

Bat ke bat, बात की बात,

21 feb 2014

परिवार की हत्या और आत्महत्या के पहले के तनाव का अंदाज...

21 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां हम बैठे हुए हैं वहां एक दिल दहलाने वाली खबर आई है, एक गरीब मुस्लिम नौजवान ने अपनी बीवी, दो बच्चों को मार डाला, और फिर पुलिस को फोन करके, पुलिस के पहुंचने के पहले खुद भी फांसी पर झूल गया। इसके पीछे कई किस्म की वजहों में से कोई एक या एक से अधिक हो सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर सवाल यह है कि इस कदर तनाव, इस कदर तकलीफ, और इस कदर हिंसा का शिकार हुआ यह परिवार जिस घनी बस्ती में अड़ोस-पड़ोस के बीच रहता था, वह पड़ोस किसी काम नहीं आया, जात-बिरादरी किसी काम नहीं आई, रिश्तेदार किसी काम नहीं आए, और परिवार के भीतर इतनी बड़ी हिंसा हो गई। 
हिन्दुस्तान में आज बहुत बड़े हिस्से के सामने गरीबी की दिक्कत है, बहुत से लोगों के सामने बेरोजगारी, बीमारी, या निजी किस्म के तनाव हैं। परिवारों के भीतर तनाव कम नहीं रहता। और ऐसे में जब समाज और आसपास का अधिकतर हिस्सा अपनी-अपनी रोजाना की दिक्कतों से जूझता हुआ एक-एक दिन गुजारता है, तो पास के किसी दूसरे तकलीफजदा की मदद करने का न तो शायद वक्त होता, और न ही शायद ताकत बचती। अब ऐसे में लोगों को ऐसी हत्या और आत्महत्या से पहले की तनाव से भरी हुई नौबत से उबारने के लिए सरकार और समाज क्या कर सकते हैं? और यह बात तय है कि जिस देश या समाज के लोग इतने अधिक तनाव की हद तक पहुंचते हैं, तो उसके पहले भी बरसों से या महीनों से उनकी उत्पादकता देश को नहीं मिल पाती, समाज को उनका रचनात्मक योगदान नहीं मिल पाता। 
हमको आत्महत्या और ऐसी निजी हिंसा के हर मामले के वक्त एक बात खटकती है कि हिन्दुस्तान में लोगों को निजी परामर्श देने के लिए मनोचिकित्सक या मनोपरामर्शदाता नहीं हैं। गिने-चुने जो लोग हैं, उनके पास इतनी भीड़ है, कि किसी गरीब की बारी वहां कभी नहीं आ सकती है। इसके अलावा मनोचिकित्सकों के पास जाना भारत में एक सामाजिक अपमान की बात भी रहती है, कि लोग ऐसे लोगों को पागल समझते हैं, और कहते हैं। इसलिए भी बहुत से लोग मनोचिकित्सा की जरूरत, और बात को दबा जाते हैं। दूसरी तरफ समाज के भीतर हिन्दी टीवी सीरियलों की मेहरबानी से दुष्टता, कमीनापन, साजिश, और बाकी कई किस्म की नकारात्मक भावनाएं इस कदर बढ़ चुकी हैं, कि लोग सामान्य नहीं रह पा रहे हैं। टीवी पर इस किस्म की बिना खून-खराबे वाली लेकिन तनाव वाली कहानियों को रोज देख-देखकर लोग अपनी जिंदगी को इन कहानियों से जोडऩे लगते हैं, और फिर कई ऐसे मौके आते हैं, जब ऐसे तनाव हिंसा की हद तक पहुंच जाते हैं। 
हम यहां पर सरकार के साथ-साथ समाज की भी एक हिस्सेदारी चाहते हैं, ताकि सरकार तो मनोचिकित्सक और परामर्शदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए कॉलेज और नौकरियों का इंतजाम करे, लेकिन समाज को भी इसके साथ-साथ तमाम लोगों के दिल-दिमाग को सेहतमंद रखने के लिए कुछ करना चाहिए। आज बहुत संगठित सामाजिक कार्यक्रमों से परे, हमको ऐसी अनौपचारिक कोशिशें नहीं दिखतीं, जिनसे आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच लोग जाकर सकारात्मक और रचनात्मक भावनाओं को बढ़ाने के लिए कुछ करते हों। 
भारत एक तरफ तो अपने आर्थिक ढांचे को लेकर गरीबी से उबर जाने की बात करता है, लेकिन दूसरी तरफ उसका मानवीय ढांचा फटेहाल हैं। और चूंकि मानसिक स्थिति, तनाव और कुंठा, हताशा और मानसिक हिंसा को आंकड़ों में गिना नहीं जा सकता, इसलिए समाज की सतह के ठीक नीचे की यह खराब हालत सिर चढ़कर नहीं बोल पाती, और देश में मानसिक अशांति के खतरों का अंदाज नहीं लगता। इसलिए हम पहले कई बार लिखी गई इस बात को दुहराना चाहते हैं कि सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और मनोपरामर्शदाता, और मनोचिकित्सक बढ़ाने के लिए कॉलेजों में इनकी सीटें बढ़ानी चाहिए। दूसरी तरफ समाज के भीतर के लोगों को समाज के सभी लोगों के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए कोशिश करनी चाहिए। 

मौत की सजा खत्म हो, और... जानबख्शी का केन्द्र का हक भी

20 फरवरी 2014
संपादकीय
राजीव गांधी के हत्यारों को जेल से रिहा करने का रास्ता वैसे तो सुप्रीम कोर्ट ने ही खोला, लेकिन फिर नियम-कायदों की फिक्र किए बिना तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता ने तमिल भावनाओं को दुहने के लिए आनन-फानन रिहाई का फैसला लिया, और इसकी घोषणा कर दी। देश के बाकी हिस्सों में इसके खिलाफ काफी नाराजगी हुई है, क्योंकि देश की नीति, संसद के फैसले, पर अमल करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री को जब श्रीलंकाई-तमिल आतंकियों ने मारा, तो वह देश पर भी हमला था, और राजीव गांधी के साथ-साथ दर्जन भर से अधिक और लोग भी उसमें मारे गए थे। इन हत्यारों की फांसी में जो बरसों की देर हुई, उसका फायदा पाते हुए, आज वे रिहाई की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन एक राजनीतिक फायदा पाने के लिए जयललिता ने जिस आपाधापी में कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा किए बिना रिहाई का फैसला लिया, उस पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से आज एक नोटिस जारी हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद तमिलनाडू से ठीक दूसरे सिरे पर बसे हुए कश्मीर में भारी नाराजगी हुई है क्योंकि अफजल गुरू नाम के जिस कश्मीरी को आतंकी घटनाओं के जुर्म में फांसी दी गई, उसे भी जेल में बरसों हो चुके थे, और केन्द्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट मिलकर अगर कुछ महीने पहले ऐसे किसी नतीजे या फैसले पर पहुंच पाते, तो उस कश्मीरी की जान भी बच सकती थी, जिसे फांसी देने के लिए भाजपा सहित बहुत से दूसरे लोग बरसों से लगे हुए थे। 
लेकिन हम इस मौके पर दो बातें कहना चाहते हैं। पहली तो यह कि मौत की सजा का टलना ठीक है, और उसका खत्म होना बेहतर होता। दूसरी बात कि फांसी कतार में लगे हुए इन कैदियों के मामलों में देर केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के स्तर पर हुई, बरसों की देर हुई। और यह नौबत इसलिए आई कि सुप्रीम कोर्ट के आखिरी फैसले के बाद भी केन्द्र सरकार और राष्ट्रपति के हाथ में माफी देने का संवैधानिक हक है, और उसका इस्तेमाल बहुत से सामाजिक-राजनीतिक पहलुओं को देखते हुए किया जाता है। हम पहले भी इसके खिलाफ लिख चुके हैं कि वोटों की मोहताज सरकारें कभी तटस्थ फैसले नहीं ले पातीं, और किसकी फांसी को टालने या माफ करने से वोटरों का कौन सा तबका, कितना बड़ा तबका, कितना खुश होगा, इस नजरिए से सोचे बिना केन्द्र सरकार कभी फैसला नहीं ले सकती। ऐसे में फांसी को टालने में बरस-दर-बरस निकलते चले जाते हैं, और उसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने आज कतार में लगे हुए लोगों को जानबख्शी दी है। 
लोकतंत्र में व्यक्तियों के विवेक पर ऐसे फैसले नहीं छोडऩे चाहिए जो कि पूरी तरह से कानून के दायरे के हैं, और जिन फैसलों के लिए कानून की कुर्सियों पर काबिल लोग बैठे हुए भी हैं। भारतीय न्यायव्यवस्था में जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक हजारों आरोपियों में से कोई एक ही शायद ऐसा होता होगा जिसे कि मौत की सजा मिल पाती होगी। और भारतीय न्यायव्यवस्था की भावना और प्रक्रिया के चलते यह बात बहुत साफ है कि हजारों गुनहगार छूट सकते हैं, लेकिन किसी एक बेगुनाह को फांसी होने का खतरा न के बराबर रहता है। ऐसी लंबी-चौड़ी अदालती व्यवस्था के बाद, भारतीय कानून के मुताबिक दुर्लभतम मामले में दी जाने वाली मौत की सजा के बाद भी अगर केन्द्र सरकार उसे माफ करने का हक रखती है, तो यह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक बात है, और इससे देश की न्यायव्यवस्था पर पानी भी फिर जाता है। और इससे देश के अलग-अलग तबकों के बीच भेदभाव बरतने के आरोप भी केन्द्र सरकार को झेलने पड़ते हैं। 
आज जरूरत दो हैं। पहली तो यह कि मौत की सजा खत्म की जाए, जैसा कि दुनिया के अधिकतर विकसित और सभ्य देशों में हो चुका है, या होते चल रहा है। दूसरी बात यह कि जानबख्शी का अधिकार सरकार और राष्ट्रपति से खत्म होना चाहिए। दिक्कत यह है कि सरकार, संसद, और राष्ट्रपति, कोई भी शायद अपने अधिकार कम करना नहीं चाहते, और इसीलिए विवेक के ऐसे अधिकार जारी हैं, जो कि लोकतंत्र के खिलाफ हैं। इस बारे में जनता के बीच से चर्चा उठकर ऊपर तक जानी चाहिए। 

केन्द्र सरकार अब देर किए बिना राज्य पुनर्गठन आयोग बनाए

19 फरवरी 2014
संपादकीय
इस वक्त राज्यसभा में धक्का-मुक्की के बीच तेलंगाना विधेयक पर चर्चा चल रही है, आन्ध्र का तेलंगाना से परे का हिस्सा बंद झेल रहा है, और कहीं खुशी कहीं गम का माहौल बना हुआ है। पिछले पांच बरस में, आधी सदी पुरानी तेलंगाना-मुद्दे को लेकर जो बदअमनी देखने मिली है, और जितने किस्म की गलतियां देखने मिली हैं, उनके बाद अब यह लगता है कि केन्द्र सरकार को बिना देर किए हुए राज्य पुनर्गठन आयोग की घोषणा करनी चाहिए, ताकि देश के बाकी हिस्सों में तेलंगाना जैसी नौबत न आए। 
आज जो राज्य अपने विभाजन के खिलाफ हैं, वहां का हाल भी अगर देखें तो इसी पखवाड़े उत्तरप्रदेश के मालिक मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि इतनी बड़ी आबादी वाले राज्य में अपराधों पर पूरी तरह से काबू नहीं पाया जा सकता। उनका यह बयान, और उत्तरप्रदेश की बदहाली, इन दोनों को मिलाकर देखें, तो साफ समझ आता है कि किस तरह छोटे राज्यों की जरूरत है। और जो लोग यह समझते हैं कि छोटे राज्य ठीक से काम नहीं कर सकते, उनको यह भी यह समझना होगा कि छत्तीसगढ़ के साथ-साथ जो दो नए राज्य डेढ़ दशक पहले बने थे, उनके भीतर संभावनाओं की सीमा से अधिक बड़ी दिक्कत वहां की राजनीतिक अस्थिरता थी, राजनीतिक भ्रष्टाचार था, और सत्तारूढ़ पार्टियों के भीतर की अराजकता थी। इन्हीं तीन राज्यों में से एक, छत्तीसगढ़ ने लगातार जो तरक्की की है, वह देश के सामने एक मिसाल है। 
भारत में बहुत बड़े-बड़े राज्य रखने की जरूरत नहीं है। भाषा या बोली के हिसाब से, राजधानी से दूरी के हिसाब से, भूगोल और आर्थिक स्थिति के हिसाब से, बहुत से बड़े राज्यों को बांटने की जरूरत है। लेकिन जो नौबत तेलंगाना में आई है, वह नौबत अगर बाकी देश में बरसों तक चलती रही, तो उससे यह देश भी बिखर जाएगा, और भारी तबाही भी होगी। इसलिए केन्द्र और राज्यों में जिन पार्टियों की सत्ता चल रही है, उनकी राजनीतिक पसंद-नापसंद, या साजिश के मुताबिक नए राज्य न बनाकर, इनको एक वैज्ञानिक आधार पर बनाने की जरूरत है, और इसके लिए निर्विवाद तरीका सिर्फ यही हो सकता है कि राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया जाए। 
भारत में जितनी आबादी के प्रदेश हैं, उससे दस फीसदी आबादी वाले तो योरप में एक-एक देश हैं। इसलिए बेहतर शासन-प्रशासन के हिसाब से, जनता की भावनाओं के हिसाब से, सत्ता के भ्रष्टाचार के विकेन्द्रीकरण के हिसाब से, कुनबापरस्ती और जातिवाद को तोडऩे के हिसाब से, कई हिसाब से देश में दर्जन भर नए राज्यों की जरूरत है। बड़े राजनीतिक दलों के अलावा छोटे राज्यों में क्षेत्रीय दलों के खड़े होने की एक नई संभावना भी बनेगी, और उससे भी राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी पार्टियों का एकाधिकार टूटेगा। भारतीय लोकतंत्र ने अब यह अच्छी तरह देख लिया है कि किस तरह देश पर गठबंधनों का ही राज रहने वाला है। और गठबंधन में एक दर्जन पार्टियां रहें, या डेढ़ दर्जन, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह आज के बड़े राज्य कल अगर प्रदेश सरकारों में भी गठबंधन देखते हैं, तो उससे भी कोई नुकसान नहीं है। 
न सिर्फ प्रशासनिक नजरिए से बल्कि आर्थिक विकास के लिए भी देश में ऐसे छोटे राज्य जरूरी हैं जो कि आर्थिक विकास की संभावनाओं, और पैमानों पर राज्य बनने का हक रखते हों। इस काम में केन्द्र सरकार को देर नहीं करनी चाहिए, और हमारा ऐसा ख्याल है कि अपने कार्यकाल के आखिरी महीनों में राज्य पुनर्गठन आयोग का फैसला लेना, उसे अस्तित्व में लाना यूपीए सरकार के लिए नैतिक अधिकार के बाहर की बात नहीं होगी। कुछ पार्टियां इस सिलसिले के खिलाफ रहेंगी, लेकिन छोटे राज्यों के बनने से ही यह बड़ा देश एक रह सकेगा, और हर इलाके को विकास की अपनी संभावनाओं को पाने का मौका मिलेगा। 

कांग्रेस ने तेलंगाना की इमारत पहले बनाई, सहमति की नींव बनाने की कोशिश अब जाकर

18 फरवरी 2014
संपादकीय
तेलंगाना पर आज आन्ध्र से लेकर दिल्ली तक, और संसद से लेकर जंतर-मंतर तक जो बेचैनी दिख रही है, उसकी जिम्मेदार सिर्फ यूपीए सरकार है। और यूपीए सरकार के भीतर भी खासकर कांग्रेस पार्टी, क्योंकि आन्ध्र में उसी की सरकार, उसी के छांटे हुए राज्यपाल ने आन्ध्र की रणनीति तैयार की है, और संसद में कांग्रेस ही आन्ध्र के अपने ही लोगों की बगावत को रोक नहीं पा रही है। पिछले दो बरस से यह प्रदेश जल रहा है, लोग बेचैन हैं, जान दे रहे हैं, कांग्रेस बिखरती जा रही है, और आज वह संसद में सहमति जुटाने की कोशिश कर रही है। 
दरअसल कांग्रेस का तेलंगाना राज्य बनाने का फैसला, उसकी घोषणा, और उस पर अमल देखें, तो एक बहुत आम और बुनियादी तकनीक याद आती है। किसी छोटे से मकान को ही बनाने के पहले उसके लिए जमीन तैयार की जाती है, नींव बनाई जाती है, और फिर उस मजबूत नींव पर दीवारें खड़ी की जाती हैं, और फिर छत डाली जाती है। तेलंगाना के मामले को देखें तो कांग्रेस ने पहले इमारत खड़ी कर दी, उसके गृहमंत्री रहते हुए पी. चिदंबरम ने हैदराबाद जाकर वक्त के पहले एक ऐसी अधपकी घोषणा कर दी थी जिसकी उस वक्त कोई संभावना तैयार नहीं की गई थी। चार-पांच बरस पहले 2009 में उन्होंने इसकी मुनादी की थी और फिर उनके इस कहे हुए पर कुछ होने के आसार न होने की हकीकत सामने आ गई थी। सरकार के भीतर ही उस समय इस राज्य को बनाने पर बात हो रही थी, और संसद का सत्र चलते हुए, संसद के बाहर चिदंबरम ने यह घोषणा कर दी थी। लेकिन हम संसद की तकनीकियों में यहां की जगह खराब करना नहीं चाहते और कुल मिलाकर आज हम इसलिए यहां लिख रहे हैं कि यूपीए-2 का करीब पूरा कार्यकाल तेलंगाना पर आन्ध्र को जलते-सुलगते देखते हुए गुजर जा रहा है। 
यह एक राजनीतिक परिपक्वता और गंभीरता की बात होती, कि आज संसद में जो हो रहा है, आज आन्ध्र की राजधानी में, और वहां के अलग-अलग इलाकों में जो हो रहा है, उन सबको तेलंगाना की घोषणा के पहले टटोल लिया जाता, और उसके बाद एक सहमति तैयार करके राज्य को बनाने का काम किया जाता। आज यूपीए के बाहर की पार्टियों का तेलंगाना पर जितना विरोध नहीं है, उतना विरोध तो यूपीए के भीतर, गठबंधन की मुखिया कांग्रेस पार्टी के भीतर है, जिसके मुख्यमंत्री के बारे में आज यह खबर आ रही है कि किसी भी वक्त वे इस्तीफा दे सकते हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस के हाथ आज न सिर्फ खाली हैं, बल्कि उसके हाथ तेलंगाना की आग में झुलस भी गए हैं। 
यहां पर यह भी याद रखना जरूरी है कि 2000 में जब अटल बिहारी बाजपेयी की  सरकार ने देश में तीन नए राज्य बनाए थे, तो वे विवादहीन सहमति के आधार पर थे, और कुछ हफ्तों के भीतर ही तीनों राज्यों का अस्तित्व बिना किसी आगजनी के साफ हो गया था। लेकिन तेलंगाना का मामला अधिक जटिल था, मुश्किल था, खतरनाक था, और मानो इस दलदली जमीन पर, जलती हुई आग के बीच, कांग्रेस ने बिना किसी नींव के, लकड़ी का मकान खड़ा करना शुरू कर दिया था, और आज वह जलते-जलते धसक भी रहा है। यह नौबत राजनीतिक सूझ-बूझ की कमी तो बताती ही है, यह एक सामान्य समझबूझ की कमी भी बताती है, और इससे यह भी साफ होता है कि इस पार्टी, और इसकी अगुवाई वाली केन्द्र सरकार के बीच प्रधानमंत्री और गठबंधन के मुखिया के स्तर पर राजनीतिक लीडरशीप और काबू की कमजोरी है। इसलिए इसके अलग-अलग मंत्री-मुख्यमंत्री, और इसके नेता, तेलंगाना को अलग-अलग तरफ खींचते चले गए, और अब तेलंगाना इन सबको एक खाई की तरफ खींच रहा है। 
हम छोटे राज्यों के हिमायती हैं, और हम तेलंगाना को राज्य बनते देखना भी चाहते हैं। लेकिन छोटे राज्यों को बनाने के लिए एक बड़ी सोच के साथ-साथ एक व्यापक समझ भी जरूरी होती है, उसकी कमी ने आज दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक, और आन्ध्र के गांव-गांव तक को सुलगाकर रख दिया है। 

जनता का सोना लुटता रहे, और लोहे की नाप-तौल वाला बजट महज लोकतांत्रिक पाखंड...

17 फरवरी 2014
संपादकीय

यूपीए सरकार के इस आखिरी बजट में छोटी-मोटी कुछ रियायतों को लेकर टीवी पर मोटी-मोटी बहसें चल रही हैं, और लोग इसका आर्थिक विश्लेषण कर रहे हैं। कुल मिलाकर एक-दो फीसदी का फेरबदल तौला जा रहा है कि इससे जनता को क्या फर्क पड़ेगा, और इससे कम या अधिक करने की गुंजाइश थी या नहीं? वैसे तो यह बजट एक अंतरिम बजट है जो कि चुनाव तक के कुछ महीनों के लिए ही है, और उसके बाद अगली सरकार के वित्त मंत्री को बाकी महीनों के लिए बजट पेश करना होगा, लेकिन फिर भी इस केंद्रीय बजट, और बाकी राज्यों के आए बजटों पर हम एक दूसरी तरह से देखना चाहते हैं। 
जब भारत और इसके प्रदेशों की अर्थव्यवस्था गिने-चुने दो-चार फीसदी के टैक्स फेरबदल तक सीमित हैं, तब यह सोचकर हैरानी होती है कि बजट का आधे से अधिक हिस्सा जब सरकारें अपने खुद पर खर्च करती हैं, तो उस खर्च में कटौती और किफायत बरतने से कितना बड़ा फर्क पड़ सकता है, और ऐसी किफायत के बारे में बजट के मौके पर कोई बात भी नहीं होती। दूसरी बात जो बजट के मौके पर एक अर्थशास्त्री न होने की वजह से हमको सूझती है, वह यह है कि सरकार के भ्रष्टाचार और कमाई में चोरी से कितना बड़ा फर्क पड़ता है, और वह अगर न हो तो एक अंक वाली टैक्स कटौती शायद दो अंकों वाली भी हो सकती है। 
सरकारों के बजट अर्थशास्त्र के जानकारों के लिए तो काम के हो सकते हैं, लेकिन हमको यही दो-तीन बातें परेशान करती हैं। सरकार में किफायत, फिजूलखर्ची का खात्मा, टैक्स की चोरी बंद, और भ्रष्टाचार में कमी, इतनी बातों पर अगर ध्यान दिया जाए, तो हमारी सामान्य समझ यह कहती है कि सरकार की कमाई दोगुनी हो सकती है, और खर्च आधा हो सकता है। लेकिन बजट के आंकड़ों में ऐसी सोच की कोई जगह नहीं होती, और वित्त मंत्री आंकड़ों के खेल और फेरबदल को ही कामयाबी मानते हैं, और विपक्ष या आलोचक खेल में वित्त मंत्री के इसी प्रदर्शन को नाकामयाबी मान लेते हैं। दरअसल बजट के एक दिन देश में कुछ भी साबित नहीं होता, और साल के बाकी दिनों में सरकार की सोच, जनता की सोच, और देश की फिक्र, उन्हीं से सब कुछ साबित होता है। 
बजट एक ऐसा सालाना रिवाज बनकर रह गया है कि लोग उससे बड़ी-बड़ी उम्मीदें बांध लेते हैं, जबकि बजट की ऐसी कोई ताकत ही नहीं होती कि सरकार के भारी-भरकम स्थापना व्यय की भरपाई कर सके, या टैक्स चोरी की भरपाई कर सके, या भ्रष्टाचार का पेट भर सके। इस सालाना जलसे से परे जनता के बीच से ऐसा दबाव आना जरूरी है जिससे कि हर बरस का यह कागजी फर्जीवाड़ा जरूरी न रह जाए। बजट नाम के दस्तावेज को देश और प्रदेशों में जरूरत से अधिक अहमियत का दर्जा दे दिया गया है, और उसे सरकारों की बाकी खामियों और कमियों का इलाज मान लिया गया है। यह सिलसिला थमना चाहिए। अगर सरकार और जनता ईमानदारी से काम करें, तो हर बरस कागज की यह बर्बादी जरूरी ही नहीं रह जाएगी। देश की जनता की जो दौलत खदानों से लेकर खेतों तक, और पानी से लेकर आसमान की तरंगों तक बिखरी पड़ी हैं, उनकी लूटपाट को अगर देखें, तो इस बात पर हंसी आएगी कि एक-दो फीसदी की कमी या बढ़ोतरी वाले टैक्स को आज महत्वपूर्ण माना जा रहा है, और देश की दौलत पसंदीदा खरबपतियों को चांदी की तश्तरी में रखकर पेश की जा रही है। बजट के मौके पर हम बजट से परे की इन बातों को ही कहना चाहते हैं, क्योंकि देश का सोना लुटता रहे, और लोहे के नाप-तौल वाले बजट को राष्ट्रीय महत्व का मान लिया जाए, यह एक बहुत बड़ा लोकतांत्रिक पाखंड है।

अपने कुएं से बाहर न देख पाने, और वक्त के साथ न बदलने वालों के साथ यह दिक्कत रहती है...

16 फरवरी 2014
संपादकीय
भारत की राजनीति में क्षेत्रीय और प्रांतीय दलों को भी बहुत से मुद्दों पर न सिर्फ अपनी राय सामने रखनी पड़ती है, बल्कि वक्त आने पर इन मुद्दों पर, इनके मोर्चों पर डटना भी पड़ता है। आज हम लगातार तीसरे दिन दिल्ली की आम आदमी पार्टी के बारे में लिखने नहीं जा रहे, लेकिन हम जिस मुद्दे पर लिखने जा रहे हैं, वह आम आदमी पार्टी पर भी लागू होता है। भारत जैसे दो दर्जन से अधिक राज्यों वाले, आधा दर्जन देशों से घिरे हुए, दर्जनभर धर्मों वाले, और दर्जनों पार्टियों वाले देश में सैकड़ों बोलियों, और सैकड़ों जातियों के साथ-साथ सैकड़ों ऐसे मुद्दे भी रहते हैं, जिन पर पांच बरस के लंबे दौर में बहुत से संघर्ष होते हैं, और राजनीतिक दलों, सरकारों को, और नेताओं को इन पर अपनी राय भी रखनी पड़ती है। 
जो पार्टियां लंबे समय तक मैदान में रहती हैं, सत्ता में आती और जाती रहती हैं, उनको अपने रूख को कुछ लचीला भी बनाए रखना होता है, और मुद्दों पर भी समझौते करने पड़ते हैं, या बिना समझौतों के भी वक्त की बदलती हुई नजाकत के मुताबिक अपनी सोच बदलनी होती है। मिसाल के तौर पर भाजपा को लें, तो एक वक्त लोकसभा में इसके पास दो सीटें थीं, आज चौथाई सदी के भीतर इसके पास दो सौ सीटें होने का अंदाज सामने आ रहा है। एक वक्त था जब इसके पास सिर्फ एक झंडा और एक डंडा था, कि मंदिर वहीं बनाएंगे। आज इसके प्रधानमंत्री-प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी, जो कि देश में हिन्दुत्व के सबसे आक्रामक नेता माने जाते हैं, उनके पिछले सौ भाषण सुन लें, किसी एक में भी मंदिर का जिक्र नहीं है। अयोध्या में रामलला की प्रतिमाएं आज भी भाजपा के इंतजार में हैं, बाबरी मस्जिद को गिराए दो दशक से अधिक हो चुके हैं, सैकड़ों जानें जा चुकी हैं, लेकिन आज भाजपा के हाथ अयोध्या का झंडा-डंडा कुछ भी नहीं है। 
सिर्फ यही एक पार्टी, और यही एक मुद्दा नहीं है, जिसने कि हालात के साथ ख्यालात बदले हों। किसने सोचा था कि यूपीए-1 सरकार वामपंथियों के भारी समर्थन से पांच बरस पूरे करेगी, किसने सोचा था कि सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोडऩे वाले शरद पवार आज कांग्रेस के सबसे बड़े एक सहयोगी दल बने रहेंगे? ऐसी बहुत सी बातें वक्त के साथ-साथ होती हैं, और इनमें से हर कोई घटिया समझौता हो, यह जरूरी भी नहीं है। हम फिर भाजपा के मुद्दे पर लौटें, तो भाजपा ने मंदिर को देश का चुनावी मुद्दा हटाकर जब मोदी के बेहतर प्रशासन, और आर्थिक विकास को देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया, तो हमारे हिसाब से वह एक राजनीतिक समझदारी का फैसला था, और वह लचीलापन जरूरी भी था। चुनावी भाषणों में हो सकता है कि लोग भाजपा को फिर कोंचना चाहें कि मंदिर का क्या हुआ, लेकिन देश की कोई दिलचस्पी आज आम चुनावों को मंदिर के मुद्दे पर जनमत संग्रह में बदलने में नहीं है। 
ईमानदारी की राजनीति की बात करने वाले दो लोगों की बात हम यहां पर छेड़ेंगे, जिन्होंने इसी एक मुद्दे को तांगे में जोते गए घोड़े की आंखों पर दोनों तरफ लगाई गई रोक के अंदाज में काम किया ताकि उनको दाएं-बाएं की कोई दूसरी बात विचलित न कर सके। एक तो अरविंद केजरीवाल हैं ही, ऐसे ही दूसरे नेता हैं आन्ध्रप्रदेश में जयप्रकाश नारायण नाम के भूतपूर्व आईएएस अफसर। जेपी ने वहां पर लोकसत्ता नाम की एक पार्टी बनाई है, और वे खुद वहां से विधायक भी हैं। उन्होंने चुनाव सुधार और सूचना के अधिकार के मोर्चों पर काम भी किया, लेकिन अपनी पार्टी को वे न तो आन्ध्रप्रदेश में बहुत से मुद्दों पर सक्रिय रख पाए, और न ही आन्ध्र के बाहर उसका कोई विस्तार हुआ। इस पार्टी को बने आज करीब आठ बरस हो रहे हैं, और इसने भी साफ-सुथरी राजनीति और ईमानदारी के मुद्दे पर चुनाव लडऩा शुरू किया, लेकिन सिर्फ ये दो मुद्दे भारत की राजनीति में, जनजीवन में काफी नहीं हो सकते। इसलिए आम आदमी पार्टी और लोकसत्ता पार्टी से बाकी देश को यह सबक लेना है, कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, गिने-चुने मुद्दों को लेकर राजनीति बहुत दूर तक सफर नहीं कर सकती। किसी स्थानीय संस्था में, म्युनिसिपल या पंचायत में तो बहुत सीमित नजरिए के साथ राजनीति हो सकती है, लेकिन किसी प्रांतीय या राष्ट्रीय दल को बहुत से राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना नजरिया खुलकर सामने रखना पड़ता है, और हिस्सेदारी निभानी पड़ती है। आने वाले दिनों में आम आदमी पार्टी के दिल्ली से बाहर कामकाज को लेकर लोगों की उत्सुकता बनी हुई है। इसकी संभावनाएं इसी पर टिकी रहेंगी, कि यह अपने कुएं से बाहर देख सकेगी या नहीं, और बाकी मुद्दों पर मुंह खोलना यह सीख सकेगी या नहीं। 

तानाशाह अहंकार में भारत की एक लोकतांत्रिक संभावना खत्म

15 फरवरी 2014
संपादकीय
दिल्ली में केजरीवाल सरकार का जाना, एक राज्य में हाफ सेंचुरी भी किए बिना एक सरकार का जाना भर नहीं है, यह देश में एक अलग तरह की राजनीति की संभावना का भी चला जाना है। अरविंद केजरीवाल ने जैसी बददिमागी के साथ अपनी सरकार का इस्तीफा दिया, और विधानसभा भंग करने की मांग की, वह बददिमागी देखते ही बनती है। लोकतंत्र का नाम ले लेकर जिस परले दर्जे की तानाशाही केजरीवाल और उनके नामी-गिरामी साथियों ने दिखाई है, उससे ऐसा लगता है कि कम नारे लगाने वाले लोग शायद बेहतर होते हैं। 
सार्वजनिक जीवन में आने के बाद से, राजनीति, चुनाव, और फिर सत्ता में पहुंचते हुए जिस तरह से अरविंद केजरीवाल और उनके प्रशांत भूषण जैसे समझदार साथियों में देश में सिर्फ अपने आपको ईमानदार मानते हुए बाकी सबके खिलाफ एक बेदिमाग अभियान चलाया, बाकी हर किसी को गालियां बकीं, हर किसी पर अंधाधुंध आरोप लगाए, वैसा भारतीय राजनीति में किसी ने कभी देखा नहीं था। हर किसी को भ्रष्ट कहने को लेकर केजरीवाल की पूरी टोली अदालतों में मुकदमे झेल रही है, लेकिन उसका नतीजा चाहे जो हों, आज तो इन लोगों ने देश की जनता के सामने यह साबित कर दिया है कि उनको न तो लोकतंत्र में मौजूद संवैधानिक तरीकों पर कोई भरोसा है, और न ही वे दूसरों के साथ मिलकर कोई रास्ता निकालने में भरोसा रखते हैं। लोकतंत्र के भीतर इस तरह अकेले चलना, औरों से बात भी नहीं करना, संवैधानिक विकल्पों को कोई मौका भी नहीं देना, नहीं चल सकता। इसलिए हमारा यह मानना है कि आम आदमी पार्टी की शक्ल में देश के सामने एक बेहतर राजनीति की जो संभावना बनी थी, वह संभावना केजरीवालों के पलायनवादी साबित होने के साथ कमजोर हो गई है। 
अगर कोई खुद बेईमान नहीं हैं, ईमानदार हैं, तो इसका यह मतलब नहीं होता कि अपने अलावा हर किसी को रात-दिन गालियां दी जाएं। लोकतंत्र में किसी के बेईमान साबित होने के बहुत से रास्ते होते हैं, जो कि जांच एजेंसियों से होते हुए अदालतों तक जाते हैं, और इंसाफ का वही एक रास्ता मुमकिन और जायज होता है। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने पिछले बरसों में देश में एक ऐसा माहौल बनाया कि उनके दर्जन भर लोगों के अलावा बाकी हर प्रमुख व्यक्ति चोर है, बेईमान है। लोकतंत्र में किसी को भी ईमानदारी और सच्चाई की एक्सक्लूजिव सोल डिस्ट्रीब्यूटरशिप नहीं मिल सकती। बाकी लोगों का भी ईमानदार होने का हक होता है, और जो लोग केजरीवाल से असहमत हों, वे सारे लोग बेईमानों के साथी हों, ऐसा भी जरूरी नहीं होता। हमने कुछ अरसा पहले इसी अखबार में किसी जगह लिखा था कि जिस तरह अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक पर हमला करते वक्त दुनिया में यह मुनादी की थी कि बाकी देश या तो अमरीका के साथ हैं, या फिर आतंकियों के साथ हैं। यही तानाशाह रूख केजरीवाल का देखने मिला है। 
अगर उनको मुख्यमंत्री का ओहदा और सरकार, सिर्फ हिकारत के सामान दिखते हैं, तो इनको लातें मारने के बजाय, उनको चुनावी राजनीति से दूर रहना था। हर छोटी-छोटी बात पर सरकार को एक घटिया सामान बताते हुए उससे नफरत जाहिर करना, कोई लोकतांत्रिक रूख नहीं है। सरकार सिर्फ एक अधिकार नहीं देती, वह एक जिम्मेदारी भी देती है, और केजरीवाल जिम्मेदारी से मुंह चुराकर भागे हैं, और अपने आपको ऐसा शहीद साबित कर रहे हैं कि उन्होंने अधिकार त्याग कर सरकार छोडऩा बेहतर समझा। कोई जिम्मेदार मुख्यमंत्री हो, तो उसे अधिकारों से अधिक जिम्मेदारियों की फिक्र होगी, और एक राज्य को दोबारा चुनाव में झोंकने के पहले वह मुख्यमंत्री अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए लोकतांत्रिक-संवैधानिक विकल्पों को तलाशने की कोशिश करेगा। आज पहली नजर में ऐसा लगता है कि केजरीवाल-टोली दिल्ली की सरकार को लात मारकर अपने आपको लोकसभा चुनाव की तरफ ऊपर उछालने की कोशिश कर रही है। यह अहंकार जनता से अनदेखा नहीं रहता। और दिल्ली के बाजार से खरीदे लाल रंग को माथे पर लगाकर केजरीवाल उसे शहादत का टीका नहीं बता सकते। एक बड़ी संभावना का ऐसा बुरा अंत बहुत तकलीफदेह है, और लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है। जिनमें भले बने रहने की संभावना थी, वैसे लोग आज अगर गैरजिम्मेदारी का ऐसा काम कर रहे हैं, तो उनसे भारतीय राजनीति के बुरे लोग, कम बुरे दिखने लगते हैं। केजरीवाल ने आज दिल्ली और देश के सामने कांग्रेस और भाजपा को कम बुरा, अधिक समझदार, और अधिक जिम्मेदार साबित करने का काम किया है। 

Bat ke bat, बात की बात,

14 feb 2014

लोकसभा सुबूत है कि कांग्रेस के हाथ से रस्सी पूरी तरह खिसक चुकी है

14 फरवरी 2014
संपादकीय
लोकसभा में कल जो हिंसा और हंगामा देखने मिले, उनके बारे में कल हम यहां पर लिख चुके हैं। लेकिन अब जब संसद की हवा से मिर्च की गंध कुछ कम हो गई है, तब आज की संसदीय नौबत के बारे में सोचें, तो लगता है कि यूपीए के हाथ से रस्सी पूरी तरह, और बुरी तरह फिसल चुकी है। चुनावी सर्वेक्षणों को हम अभी मतदान के सौ दिन पहले का भी मान लें, मीडिया को मोदी के दबदबे में दब चुका भी मान लें, देश की जनता को साम्प्रदायिकता के झांसे में आया हुआ भी मान लें, तब भी यूपीए की मुखिया के रूप में कांग्रेस पार्टी संसद के भीतर और बाहर एक बदहाली का शिकार है। 
सदन में विधेयक पास करवाना सत्तारूढ़ गठबंधन या पार्टी की जिम्मेदारी होती है। उसके लिए बहुमत जुटाना, सहमति जुटाना, माहौल बनाना भी उसी की जिम्मेदारी होती है। पिछले बरसों में हम तेलंगाना को लेकर यूपीए और कांग्रेस का दीवालियापन देखते आ रहे हैं, एक तरफ आन्ध्र जल रहा है, तो दूसरी तरफ संसद का एक के बाद दूसरा सत्र तेलंगाना के नाम पर बर्बाद हुए जा रहा है। और तेलंगाना के मुद्दे को अलग से भी देखें, तो वहां पर कांग्रेस की सरकार है, कांग्रेस के ही पसंदीदा गवर्नर हैं, और संसद के भीतर कांग्रेस को ही इसे हकीकत बनाना था। लेकिन मानो यह पार्टी कुछ भी सही नहीं कर पा रही है, पार्टी भी आन्ध्र में चूर-चूर हो गई है, राज्य भी लपटों में है, और संसद के भीतर भी कांग्रेस कुछ भी काबू नहीं कर पा रही है। ऐसे में जब रात के टीवी प्रसारणों में कुछ लोग यह सुझाते हैं कि अब वक्त आ गया है कि यूपीए सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करने के बजाय अब सरकार को छोड़ देना चाहिए, तो यह लगता है कि इस नसीहत के पीछे कोई बदनीयत नहीं है, सिर्फ हकीकत है। 
हम तेलंगाना से लेकर दूसरे बहुत से विधेयकों को देखते हैं, जो कि संसद में अटके हुए हैं, और आने वाले दिनों में जिनके कानून बनने के आसार कमजोर हैं, या शायद हैं ही नहीं, तो लगता है कि दसवें बरस के आखिर में आकर यह नौबत माफी के लायक नहीं है। एक ही पार्टी जब लगातार दो कार्यकाल गठबंधन की मुखिया बनी हुई है, और गठबंधन के भीतर जब इस मुखिया की मर्जी रोड-रोलर की तरह चलती है, तो फिर इतने विधेयक आखिरी के दिनों में आकर डूबी सड़क पर ट्रैफिक जाम की तरह क्यों फंसे हुए हैं? यूपीए के बाकी साथियों के बीच तो कांग्रेस का इतना दबदबा है कि अपराधियों को बचाने वाला विधेयक यूपीए मंत्रिमंडल से पास हो जाने के बाद भी राहुल गांधी उसे फाड़कर फेंक सकते हैं, और मंत्रिमंडल भी उसे फाड़कर फेंक देता है, तो फिर ऐसे मुखिया का बाहुबल, और साथियों के बीच उसका दबदबा मिलकर भी इन विधेयकों को पास कराने का इंतजाम क्यों नहीं कर पाए? 
आज जब अलग-अलग बहुत से चुनावी सर्वे आने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की सीटों के सौ से भी नीचे सिमट जाने की बात कह रहे हैं, तो ऐसे अंदाज के पीछे कांग्रेस की दस बरसों की खासी मेहनत दिखती है। न सिर्फ नाकामयाबी, बल्कि हर नाकामयाबी के बाद, हर गलती और हर गलत काम के बाद इसके नेताओं की बददिमागी जितनी तीखी जुबान से सामने आती है, वह देश की जनता के लिए एक अपमानजनक बात रही है। और कांग्रेस के लोग अपने इस नुकसान को समझने से भी इंकार करते हैं। जनता के साथ-साथ विपक्ष, और अपने ही साथी दलों के लिए कांग्रेस के नेताओं की जुबान से हिकारत जिस तरह बरसती है, उससे यह बात साफ ही थी, कि आने वाले चुनावों में इस पार्टी की ऐसी नौबत आ सकती है। हम कुछ महीनों के भीतर होने वाले चुनावों की बात नहीं कर रहे, हम पांच बरस बाद के, 2019 के चुनावों की बाद भी अगर करें, तो उस वक्त भी कांग्रेस पार्टी अपनी खूबियों की वजह से सत्ता में आने के किसी मूड में नहीं दिखती, उसकी सबसे बड़ी उम्मीद भाजपा, मोदी, या एनडीए की खामियों से फायदा पाने की हो सकती है। यह नौबत कांग्रेस के लिए नुकसानदेह है, लेकिन हमारी फिक्र इस बात को लेकर नहीं है। हमारी फिक्र तो इस पर है कि देश के एक बड़े दल के रूप में कांग्रेस एक विश्वसनीय विपक्ष भी नहीं रहते दिख रही। यह पार्टी कब अपने बददिमाग से बाहर आकर जागेगी?

एक और किताब, रोक के पहले ही रद्दी बनने जा रही

12 फरवरी 2014
संपादकीय
अंग्रेजी का एक प्रमुख प्रकाशक, पेंगुइन इंडिया, हिंदू धर्म पर लिखी गई एक अमरीकी लेखक की पुस्तक को वापस लेने और उसकी बाकी बची प्रतियों को नष्ट करने के लिए सहमत हो गया है। दिल्ली की एक अदालत में दोनों पक्षों के बीच हुए करार को मंजूरी दे दी गई। वेंडी डोनीगर की किताब 'द हिंदूज:एन अल्टरनेटिव हिस्ट्रीÓ को ये कहते हुए कानूनी रूप से चुनौती दी गई थी कि इससे हिंदुओं की भावनाओं को ठेस लगी है। इस विवादास्पद किताब को दो साल पहले रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया था और बीते चार बरसों से ये किताब बिक रही है और तभी से इसके खिलाफ अभियान भी चल रहा है। किताब का विरोध करने वालों का तर्क है कि हिन्दू धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली ये किताब 'सेक्स और कामुकताÓ पर आधारित है, किताब के मुख्य पृष्ठ पर छपी तस्वीर आपत्तिजनक है, साथ ही किताब में देवी-देवताओं और महापुरुषों के बारे में भी ओछी टिप्पणियां की गई हैं। 
इस एक किताब के बारे में भारत में अलग से लिखने का कोई महत्व इसलिए नहीं है कि किताब, फिल्म, कला, तस्वीर, नाटक, और बाकी कई किस्म की चीजों पर रोक लगाने के लिए हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में बदनाम हो चुका है, और इस देश में जिस तबके का जितना अधिक बाहुबल है, वह तबका उतने ही अधिक रोक के लिए जुट जाता है। कहने के लिए इस देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बुनियादी हक है, लेकिन दूसरी तरफ इससे जुड़ा हुआ मुद्दा बाकी लोगों की भावनाओं का है, जिसके आहत होने का बहुत ही आम मामला हो गया है, और लोग मानो बिना देखे, बिना पढ़े, बिना चखे, बुरा मानने को तैयार बैठे हैं। 
किसी भी देश की संस्कृति, वहां के इतिहास, वहां की विचारधाराओं की जब दुनिया भर के लोग तरह-तरह से व्याख्या करते हैं, उन पर शोध कार्य करते हैं, तो उनसे उस देश के भीतर एक बौद्धिक संपन्नता बढऩे की संभावना भी आती है। भारत में दुनिया के इतिहासकारों की लिखी बातों का आनन-फानन विरोध करना एक ऐसा शगल हो गया है जिसमें ताकतवर तबके जुटे रहते हैं, और धर्मान्धता, कट्टरपंथ, दकियानूसी बातों को भड़काकर अपने समर्थकों को अपने साथ जोड़े रखने की धूर्तता दिखाते हैं। और वोटों के मोहताज नेता, उनकी पार्टियां, और उनकी सरकारें, इनकी दहशत देखते ही बनती है। कोई मांग शुरू होती नहीं है, कि वह पूरी होने लगती है।
हम भारत जैसे विविधता वाले देश में धार्मिक और साम्प्रदायिक, जातीय और बाकी किस्म की भावनाओं के भड़कने के खतरे को कम नहीं आंक रहे, लेकिन देश के भीतर एक सहनशीलता और परिपक्वता को बढ़ाने के बजाय, उत्तेजना को भड़काने से यह देश गुफाकाल की तरफ बढ़ते चले जा रहा है। हिन्दू समाज के नाम पर जो मु_ी भर लोग इस किताब का विरोध करते आ रहे हैं, वे बहुत ही लचीले और सहनशीलता वाले, आंतरिक विविधता वाले हिन्दू समाज की एक गलत तस्वीर दुनिया के सामने पेश करते हैं। धीरे-धीरे करके भारत में यह माहौल बन रहा है कि यहां किसी भी गंभीर शोधकार्य में भी किसी अलोकप्रिय तथ्य को लिखना आसान नहीं है, और ऐसा करने पर रोक और प्रतिबंध के लिए, जुर्माने और सजा के लिए तैयार रहना चाहिए। इस देश की हुसैन जैसे विश्वविख्यात चित्रकार एक घोषित और गैरकानूनी, नाजायज और शर्मनाक देशनिकाले पर ही भेज दिया था, क्योंकि हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरों को उन्होंने नग्न दिखाया था, जो कि हिन्दुस्तान के मंदिरों के भीतर और मंदिरों की दीवारों पर एक आम बात है। 
सैकड़ों बरस पहले इस देश में जो सहनशीलता थी, वह भी अब खत्म हो चली है। यह एक बहुत निराशाजनक तस्वीर है, और सिर्फ बेवकूफ समाज ऐसे विरोध को अपनी ताकत मान सकता है। भारत में ऐसे राष्ट्रीय नेताओं की जरूरत है जो कि लोगों को कुछ कहें, तो लोग उनकी सुनें।

समाज सुधार के लिए समाज और कानून, दोनों तरफ से पहल जरूरी

11 फरवरी 14
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर की खबर है कि वहां एक जाति पंचायत ने यह फैसला लिया है कि शादियों में बैंड बाजे का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, और ऐसा करने वाली शादियों का सामाजिक बहिष्कार होगा। ऐसे फैसले के कई पहलू हैं। एक तो यह कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी शादी का जलसा अपनी मर्जी से तब तक करने की छूट है, जब तक कि उसकी वजह से दूसरे लोगों के कोई हक न छिनें। बैंड बाजे से आसपास के इलाके के लोगों को शोर झेलना पड़ता है, लेकिन ऐसे शोर को रोकने की जिम्मेदारी सरकार की होती है, न कि किसी जाति पंचायत की। इसलिए यह एक सुधारवादी, किफायती, और समझदारी का फैसला होते हुए भी एक खतरे से भरा हुआ है कि आज एक समझदारी की बात पर बहिष्कार का फैसला हो रहा है, कल किसी गलत बात पर भी जाति पंचायत इस तरह का फैसला कर सकती है। हमने हरियाणा की खाप पंचायतों से लेकर पश्चिम बंगाल की आदिवासी पंचायत तक कई तरह के हिंसक फैसले देखे हंै, और हत्याओं से लेकर बलात्कार तक करवाए जाते देखे हैं। इसलिए कानून से परे जब भी कहीं धर्म या जाति के आधार पर, समाज या गांव के आधार पर फैसले होते हैं, तो उनके आगे चलकर अलोकतांत्रिक, हिंसक, तानाशाह हो जाने के खतरे बने ही रहते हैं। 
लेकिन यह कहते हुए भी हम इस बात के हिमायती हैं कि समाज में आज किफायत की जरूरत है, क्योंकि जो आर्थिक असमानता आ चुकी है, उसके चलते पैसों की ताकत वाले लोग शादी या किसी भी दूसरे मौके पर इतना खर्च कर लेते हैं, कि उनके देखा-देखी गरीब को भी सुख और दुख के मौकों पर कर्ज लेकर भी खर्च करना पड़ता है। प्रेमचंद के समय से लेकर अब तक समाज में ऐसी कहानियां रोजाना ही सामने आती हैं, जिनमें गरीब तकलीफ झेलते हैं। इसलिए शादी-ब्याह में कम खर्च का सामाजिक फैसला बहुत अच्छा भी है, और इसका विस्तार भी होना चाहिए। समाज में दिखावे के लिए जो भारी-भरकम खर्च किया जाता है, वैसी परंपराएं, रीति-रिवाज खत्म होने चाहिए। 
दरअसल समाज में सुधार का काम न तो सिर्फ कानून से हो सकता है, और न ही उसके लिए समाज को कानून से परे कोई हक दिया जा सकता है। ऐसे में इन दोनों सिरों के बीच की जिम्मेदारी राजनीतिक और सामाजिक नेताओं की आती है, जिनको अपने असर का इस्तेमाल करके, कानूनी दायरे के भीतर, समाजसुधार की कोशिश करनी चाहिए। भारत में एक लंबा इतिहास है जिसमें सतीप्रथा को खत्म करवाने से लेकर, विधवा विवाह तक, और बाल विवाह रोकने तक, समाज ने कभी कानून की मदद से सुधार किया, तो कभी नए कानून बनवाकर उनकी मदद से सुधार को लागू करवाया। इसलिए भारत जैसे विविधता वाले लोकतंत्र में सिर्फ कानून या सिर्फ समाज सुधार से अकेले कोई बड़े सुधार नहीं हो सकते, और समाज के जिन लोगों का भी असर है, उनको लगातार इसका इस्तेमाल सुधार के लिए करना चाहिए। 
भारत में एक दिक्कत और भी है। धर्म और जाति, स्थानीय रीति-रिवाज और समुदाय की परंपराओं का कई बार कानून के साथ छोटा या बड़ा टकराव होता है। ऐसे में लोगों की भावनाओं को भड़काकर उनको लोकतांत्रिक कानूनों के सामने खड़ा करने में बहुत से लोगों की नेतागिरी चलती है। ऐसी नेतागिरी की संभावना तब अधिक रहती है जब समाज में असरदार लोग कम होने लगते हैं, और अराजक लोग उस शून्य को भरते हुए काबिज हो जाते हैं। इसलिए समाज में भले लोगों का असरदार होना भी जरूरी है। और जिस जाति पंचायत के जिस फैसले को लेकर हम यहां लिख रहे हैं, वैसे फैसले हमारे आसपास भी होना जरूरी है, क्योंकि आर्थिक असमानता के अलावा भी शादी जैसे समारोह आज शहरी जिंदगी पर हिंसक हो गए हैं, और परिवारों के बाहर के लोगों के साथ ज्यादती करने वाले साबित हो चुके हैं। यहां पर कानून को भी कड़ाई से ऐसी हिंसा को रोकना चाहिए।

राष्ट्रीय एकता के खिलाफ राजनीतिक बैंड-एड इलाज

10 फरवरी 14
संपादकीय

देश की राजधानी दिल्ली में उत्तर-पूर्व के एक नौजवान को पीट-पीटकर मार डालने की बात आज पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साबित हुई है। चूंकि कुछ महीने बाद देश भर में चुनाव है, इसलिए हर हादसे पर अलग-अलग रंगों के आंसू तेजी से बह रहे हैं, मानो आंखों में मिर्च डल गई हो। इसलिए उत्तर-पूर्व के एक नौजवान की हत्या को लेकर दिल्ली में ऐसी प्रतिक्रिया हुई, जिसे अंग्रेजी में नी जर्क रिएक्शन कहते हैं। घुटनों पर मार पड़ी, तो बिलबिलाकर बदन ने प्रतिक्रिया की। अब ऐसी प्रतिक्रिया हमेशा ही बहुत तर्कसंगत, न्यायसंगत, और अक्ल की नहीं होती। इसलिए कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक अब एकाएक ऐसी खबरें आने लगीं कि उत्तर-पूर्वी छात्र-छात्राओं के लिए अलग से हॉस्टल बनाए जाएंगे। 
ढाई दर्जन प्रदेशों वाले, दर्जन भर धर्मों वाले, दर्जनों बोलियों वाले इस देश में अगर हर हादसे, हर हिंसा, या भेदभाव वाले हर हमले के बाद इसी तरह की हमदर्दी सामने आएगी, तो यह देश चूर-चूर हो जाएगा। किसी प्रदेश में दंगे होंगे, तो वहां दंगों के शिकार धर्म के लोगों के लिए अलग धर्म की बस्ती बनाने की बात होने लगेगी, किसी प्रदेश के लोगों पर हमले होंगे तो उस प्रदेश के लिए अलग हॉस्टल की बात होने लगेगी। इससे देश के लोग एक होकर रहना सीखने के बजाय अलग-अलग टापुओं में रहना अधिक महफूज समझेंगे। लोगों को याद होगा कि धार्मिक आधार पर दंगों के बाद असुरक्षा के शिकार वैसे धर्मों के लोग धीरे-धीरे, बिना सरकारी योजना और कोशिश के भी अपनी बहुतायत वाली बस्तियों की तरफ खिसकने लगते हैं। इसे बहुत जाहिर तौर पर 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों के बाद देखा गया, जब देश के बहुत से शहरों में हिंसा के शिकार सिक्खों ने अपने धर्म के अधिक लोगों वाली बस्तियों में मकान बनाने शुरू कर दिए, और इससे 20वीं-21वीं सदी में सदियों पहले की एक कबीलाई नौबत आने लगी। 
आज इस मुद्दे पर लिखने की एक और वजह यह है कि दिल्ली में पुलिस की तरफ से एक बड़े अफसर के नाम, फोन नंबर, ई-मेल पते, और उसकी तस्वीर के साथ यह छपवाया गया है कि अगर उत्तर-पूर्व के किसी को भी किसी खतरे या भेदभाव का सामना करना पड़ता है, तो वे लोग बेझिझक, बिना देर किए इस अफसर से संपर्क करें। और तस्वीर और नाम से यह जाहिर है कि यह अफसर उत्तर-पूर्व का है। अब अगर देश की राजधानी में उत्तर-पूर्व के लोगों को खतरों से बचाने के लिए उत्तर-पूर्व से आए हुए, वहां के स्थानीय मूल वाले एक आला अफसर की जरूरत पड़ रही है, या इसे जरूरी समझा जा रहा है, तो यह आज दिल्ली पुलिस पर राज करने वाली यूपीए सरकार की राष्ट्रीय सोच का दीवालियापन है। क्या कोई नेहरू-गांधी के वक्त ऐसा सोच सकते थे कि किसी प्रदेश के लोगों को बचाने के लिए, उसी प्रादेशिकता के अफसर को तैनात किया जाए? यह बात बहुत भयानक नासमझी की है। 
जब देश के बड़े अफसरों को जाति और धर्म के आधार पर, नस्ल और प्रादेशिकता, बोली और संस्कृति के आधार पर तैनात किया जाएगा, तो दो धर्मों के लोगों के बीच देश में कई जगहों पर होने वाले साम्प्रदायिक दंगों और टकराव की जगहों पर इन दो में से किस धर्म के अफसर को तैनात किया जाएगा? इस मुद्दे पर आज हम इसलिए लिख रहे हैं कि आज देश में राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने की फिक्र करने वाले लोगों का एक अकाल सा दिख रहा है, और इसीलिए उत्तर-पूर्वी छात्र-छात्राओं के अलग हॉस्टल की सरकारी घोषणाएं हो चुकी हैं, और ऐसा अफसर तैनात किया गया है, घोषित किया गया है। 
राष्ट्रीय एकता का काम धागा कातकर, उससे फिर ताने और बाने से कपड़े बुनने जैसा होता है। हर हादसे या हमले के बाद ट्रेन की तत्काल टिकट की तरह, या चोट लगने पर जरूरी इलाज के पहले के बैंड-एड जैसी रेडीमेड पट्टी से फस्र्ट एड करने की तरह के सरकारी इलाज बहुत खतरनाक हैं। हिन्दुस्तान जैसे बड़े देश में आज अगर नेताओं को ऐसे अलगाव के खतरे समझ नहीं आ रहे हैं तो वे देश के नेता बनने लायक नहीं हैं, वे महज एक चुनाव में एक वक्त उम्मीदवार बनने लायक गैरजिम्मेदार लोग हैं। इस बारे में देश में सोचने-विचारने वाले तबके को खुलकर मुंह खोलना चाहिए, और चुनावी राजनीति को धिक्कारना चाहिए। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट में अभी चल रहे रेप केस निपटेंगे 631 बरस में

9 फरवरी 2014
संपादकीय
वकीलों के एक संगठन की 150वीं सालगिरह पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस बात पर फिक्र जाहिर की कि देश की अदालतों में 3 करोड़ 10 लाख मामले चल रहे हैं। दूसरी तरफ एक अलग खबर में दो-तीन दिन पहले ही यह जानकारी आई कि आज देश में फिक्र का सबसे बड़ा मामला, बलात्कार, देश के उच्च न्यायालयों में बहुत बड़ी संख्या में पड़े हुए हैं। उच्च न्यायालयों में 24 हजार, और सर्वोच्च न्यायालय में 8 हजार। इन आंकड़ों को देखें तो अकेले इलाहाबाद हाईकोर्ट में बलात्कार के 8 हजार 215 मामले चल रहे हैं, और पिछले तीन बरसों में इस हाईकोर्ट में बलात्कार के कुल 39 मामले निपटे हैं। इस हिसाब से अगर देखें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट में आज चल रहे बलात्कार के मामले 631 बरस (छह सौ इकत्तीस बरस) में जाकर निपट पाएंगे। अब इसे कोई भारतीय लोकतंत्र के तहत इंसाफ माने तो मान लें। और ये आंकड़े सिर्फ हमने केलकुलेटर पर नहीं निकाले हैं, अभी-अभी दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहे मामलों को लेकर दिल्ली में मुख्य न्यायाधीश ने यह कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट एक मामले की सुनवाई में औसतन 4 मिनट 55 सेकंड लगा रहा है, और इसके बाद भी आज वहां पर जो मामले चल रहे हैं, उनको इस रफ्तार से निपटाने में 466 साल (चार सौ छैंसठ साल) लगेंगे। 
कोई हैरानी नहीं है कि भारतीय लोकतंत्र में लोगों का भरोसा न्याय व्यवस्था पर से पूरी तरह से खत्म है। और लोग अगर बातचीत की जुबान में यह कहते हैं कि अदालतों से ईश्वर बचाए, तो वह ठीक ही कहते हैं। इसके अलावा देश के कई लोगों को मुंबई में माफिया सरगनाओं के किए गए निजी इंसाफ ठीक लगते हैं, चंबल में लोगों को डकैतों का किया हुआ इंसाफ ठीक लगता था, कई जगहों पर नक्सलियों का किया हुआ इंसाफ लोगों को ठीक लगता है, तो वह इसीलिए है कि भारत में न्याय व्यवस्था बुरी तरह, और पूरी तरह नाकामयाब साबित हुई है। अब इसके पीछे की वजहों को देखें, तो देश के उच्च न्यायालयों में ही जजों के करीब पौने चार सौ पद खाली पड़े हुए हैं। बहुत सी बड़ी अदालतों में न तो जरूरत जितनी इमारतें हैं, और न ही जरूरत जितना ढांचा है। नतीजा यह होता है कि एक-एक, छोटा-छोटा मामला दस-दस, बीस-बीस बरस तक खिंच जाता है, और लोग कई मामलों में तो पीढिय़ों तक अदालतों के चक्कर काटते हैं, और कई मामलों में गरीब विचाराधीन कैदी, उन पर चल रहे मामलों में अधिकतम संभव सजा से भी अधिक वक्त फैसले के पहले जेल में काट चुके रहते हैं। 
भारतीय अदालतों से जिनका भी वास्ता पड़ता है, वे भारतीय न्याय व्यवस्था से ही नहीं, भारतीय लोकतंत्र से भी विश्वास खो बैठते हैं। और हमारा यह मानना है कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोगों की एक दिलचस्पी अदालतों को ठप्प रखने में इसलिए रहती है क्योंकि सत्ता का बेजा इस्तेमाल भारत में एक बहुत आम बात है, और अदालतों से अगर रफ्तार से इंसाफ होने लगेगा, तो सत्ता पर बैठे लोग अगले दस-दस चुनाव लडऩे के पहले दसियों बरस के लिए जेल चले जाएंगे। इसलिए सत्ता का फायदा इसमें रहता है कि इंसाफ घिसटता रहे, कभी मंजिल पर पहुंच ही न सके, और इस दौरान सत्ता पर काबिज मुजरिम अपने-आपको जनता की अदालतों में सही साबित करते हुए चुनाव जीत-जीतकर सत्ता पर अपना कब्जा बनाए रख सकें। भारत में अगर लोकतंत्र पर जनता का भरोसा वापिस लाना है, तो इंसाफ के हाथ-पैर चलने जितना इंतजाम करना होगा। और हमारा यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्य सरकारों की बेरूखी के खिलाफ खुद होकर सुनवाई कर सकता है, और तय समय के भीतर सारी कुर्सियों को भरने, सारा इंतजाम करने का हुक्म भी दे सकता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट को अपनी इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए।

तीसरा मोर्चा मतदाता की जागरूकता की संभावना

8 फरवरी 2013
संपादकीय
लोकसभा चुनाव के पहले देश में पिछले कुछ मौकों से तीसरा मोर्चा सामने आ रहा है। इस बार भी लालू-मुलायम से परे, ममता-नीतीश से परे, वामपंथियों ने जयललिता के साथ मिलकर एक ऐसा मोर्चा सामने रखा है जो कि गैरकांग्रेसी और गैरभाजपाई भी है। आज देश की चुनावी राजनीति की तस्वीर बहुत धुंधली है, और ऐसे में यह तीसरा मोर्चा तस्वीर को और मुश्किल बना रहा है। दरअसल देश के कई राज्य आपस में टकराते हुए ऐसे क्षेत्रीय दलों वाले हैं, कि उनमें से कोई भी दो दल एक गठबंधन में आना मुश्किल रहते हैं। ऐसे में वामपंथियों ने साम्प्रदायिकता के विरोध के मुद्दे पर गैरभाजपाई-गैरकांग्रेसी मोर्चा सामने रखा है, और उससे उत्तर भारत के दिग्गज क्षेत्रीय नेताओं का नाराज होना, असहमत होना जायज है, क्योंकि इस मोर्चे में उनकी जगह नहीं है।
अगले लोकसभा चुनाव के पहले तस्वीर और साफ तो होगी, लेकिन फिर भी आज जो नजारा बना हुआ है, वह मोदी और राहुल के बीच मुकाबला, कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला, एनडीए और यूपीए के बीच मुकाबला होते हुए दिख रहा है। और जहां पर इन दोनों तबकों के बीच आमने-सामने की टक्कर नहीं है, वैसे बहुत से राज्यों में इनसे परे की तस्वीर अलग बननी है। और वहीं पर जाकर गैरएनडीए-गैरयूपीए सीटों की संभावना बनेगी, और वैसी सीटों से ही हो सकता है कि देश का अगला सत्तारूढ़ गठबंधन तय हो, और यह भी हो सकता है कि वैसे गठबंधन का मुखिया भी गैरएनडीए-गैरयूपीए सांसदों के समर्थन से तय हो। इस बात को कुछ और साफ करें, तो देश में एक अंदाज यह भी लग रहा है कि एनडीए का बहुमत होने पर भी एक नौबत ऐसी भी आ सकती है कि नरेन्द्र मोदी के नाम पर बाहर के दल आकर जुडऩे, साथ देने को तैयार न हों, और चुनाव जीतने के बाद भी भाजपा को एनडीए का कोई गैरमोदी मुखिया चुनना पड़े। 
लेकिन इन दो गठबंधनों से परे जो तीसरा मोर्चा बन रहा है, वह इसलिए भी जरूरी है या इसलिए भी बेहतर है, क्योंकि वह मतदाताओं के सामने इन दो बड़े सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधनों से परे एक तीसरी राय रख सकेगा। और जनता के सामने न सिर्फ पार्टियों, न सिर्फ उम्मीदवारों, बल्कि विचारधाराओं और मुद्दों का विकल्प भी खुला रहना चाहिए। ऐसे विकल्प की वजह से देश की जनता का राजनीतिक शिक्षण होता है, और इसके बाद चाहे जनता तीसरे मोर्चे को न चुने, लेकिन ऐसी शिक्षित जनता, ऐसी अधिक जागरूक जनता जिस किसी पार्टी या उम्मीदवार को चुनेगी, वह अनजानी जनता की पसंद के मुकाबले बेहतर पसंद होंगे। 
आज भारतीय राजनीति में आधा दर्जन ऐसी ताकतें हो गई हैं, कि जिनके संसदीय वोटों के बिना देश की सरकार नहीं बन सकती। और ऐसा लगता है कि गठबंधनों के भीतर, और उनके बाहर से, चुनावी नतीजों के बाद एक ऐसी हलचल हो सकती है, जैसी कि धरती के भीतर प्लेटों के खिसकने से भूकंप आने, या धरती हिलने के वक्त होती है। ऐसा हमेशा बुरा ही नहीं होता, और हो सकता है कि देश के भीतर वामपंथियों की यह पहल उसी तरह का एक नया संतुलन खड़ा करे, जैसा कि यूपीए-1 के वक्त वामपंथियों ने सत्ता से बाहर रहते हुए, लेकिन गठबंधन का साथ देते हुए किया था। आज नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के बीच जो मुकाबला सामने रखा जा रहा है, वह लोकतंत्र में कोई बराबरी का मुकाबला नहीं है। और ऐसे मुकाबले के बीच देश की जनता को राजनीतिक मुद्दों पर जागरूक करके उसके फैसले को एक बेहतर फैसला बनाने का काम तीसरा मोर्चा कर सकता है। ऐसे तीसरे मोर्चे को हमेशा सत्ता की संभावना से जोड़कर आंकना ठीक नहीं होता। बहुत से मोर्चे, बहुत सी पार्टियों, और बहुत से नेता सत्ता पर चाहे खुद न आ सकें, लेकिन वे बेहतर लोगों के, बेहतर पार्टियों के, और बेहतर गठबंधनों के सत्ता में आने का सामान बनते हैं, कई बार उनका हिस्सा बने बिना भी। इसलिए हम तीसरे मोर्चे को मतदाता-जागरूकता की एक संभावना के रूप में देख रहे हैं, और उसे खारिज करने को राजनीतिक अदूरदर्शिता मानते हैं। 

Bat ke bat, बात की बात,

7 feb 2014

आर्थिक मोर्चे पर अविश्वसनीय कामयाबी वाला राज्य छत्तीसगढ़

7 फरवरी 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य की जो विकास दर बताई गई है, वह राष्ट्रीय विकास दर से खासी अधिक है, दो गुना से कुछ कम। कृषि विकास दर राष्ट्रीय कृषि विकास दर से चार-पांच गुना अधिक है। औद्योगिक विकास दर राष्ट्रीय औसत से छह गुना अधिक है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वित्त मंत्री की हैसियत से 2013-14 का आर्थिक सर्वेक्षण आज विधानसभा में पेश किया और इसमें प्रदेश की औसत आय 2011-12 के मुकाबले 44 हजार 505 से बढ़कर 2012-13 में 50 हजार 691 हो गई है और 2013-14 में इसके करीब 57 हजार तक पहुंचने का अनुमान सामने रखा गया है। पिछले करीब 8 बरस से मुख्यमंत्री ही प्रदेश के वित्त मंत्री भी हैं, और इसलिए किसी भी तरह की आर्थिक उपलब्धि, उसके लिए सम्मान और पुरस्कार, केन्द्र सरकार या योजना आयोग से तारीफ के लिए वे अपनी सरकार के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से भी तारीफ के हकदार हैं। इन बरसों में लगातार रिजर्व बैंक ने भी छत्तीसगढ़ को वित्तीय अनुशासन वाला राज्य पाया है, और यूपीए सरकार के पिछले दस बरसों में छत्तीसगढ़ को अनगिनत मोर्चों पर तारीफ मिली है। 
प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय अपने आप में बहुत बड़ा पैमाना नहीं होती। क्योंकि प्रदेश की कमाई का बंटवारा अगर गैरबराबर होता है, तो उससे गरीबों का कुछ भला नहीं होता। लेकिन इस राज्य की हालत कुछ अलग है। यहां पर राज्य सरकार ने रियायती अनाज से लेकर, रियायती बिजली तक, और दर्जनों किस्म की दूसरी ऐसी रियायतें पिछले बरसों में लागू की हैं, जिनका सीधा फायदा गरीबों को पहुंचा है। आमतौर पर जनकल्याणकारी और लोकलुभावनी, रियायतों की योजनाएं देश या प्रदेश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाली रहती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका एक बहुत ही कामयाब संतुलन देखने मिला है जिसके तहत राज्य का ढांचा भी विकसित हुआ है, शहरी विकास भी हुआ है, और जनकल्याणकारी योजनाओं पर बजट का खासा बड़ा हिस्सा खर्च भी हुआ है। और यह तब हुआ है जबकि देश में कोयला घोटाले के बाद कोयला खदानों से लेकर बिजली और फौलाद के कारखानों की हालत खराब है, दुनिया और देश मंदी की अर्थव्यवस्था से गुजर रहे हैं, और औद्योगिक उत्पादन, पूंजी निवेश, सब कुछ मंदा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसा राज्य, जो कि मोटे तौर पर खनिजों की अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ है, उस पर भारी उल्टा असर पडऩा तय था, और इस राज्य में ही कारखानों का लगना इसलिए रूक सा गया है, क्योंकि कोयले को लेकर देश में एक अनिश्चितता बनी हुई है। 
ऐसे में छत्तीसगढ़ में आर्थिक मोर्चे पर एक अभूतपूर्व और अविश्वसनीय सी कामयाबी दिखाई है। अगर बिना रियायतों को दिए यह राज्य सिर्फ कमाई करके दिखा देता, तो वह अधिक बड़ी बात नहीं होती। इसी तरह अगर वह भारी घाटा झेलकर, प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट करके, सिर्फ लोकलुभावनी रियायतें बांट देता, तो भी वह गैरजिम्मेदारी होती। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कई बड़े विभागों के मंत्री रहने के साथ-साथ वित्त मंत्री की हैसियत से आज जो आर्थिक सर्वेक्षण सामने रखा है, वह प्रभावशाली है। राज्य में सत्ता की इस तीसरी पारी में उन्होंने जनकल्याण की रियायती योजनाओं को आगे ही बढ़ाया है, और देश के दूसरे राज्यों में इतने लंबे समय तक मंदी के बीच ऐसी कामयाबी आमतौर पर देखने नहीं मिलती है। 
अर्थशास्त्रियों के दो अलग-अलग सोच वाले खेमे होते हैं। एक खेमा पूंजीवादी विकास का हिमायती होता है, जो कि रियायतों की लुभावनी अर्थव्यवस्था को तबाही मानता है। दूसरा खेमा जनकल्याणकारी रियायतों का, गरीबों का हिमायती होता है, जो कि सामाजिक पैमानों पर इंसानों के विकास के लिए रियायतों को जरूरी मानता है। छत्तीसगढ़ में इन दोनों खेमों को शिकायत का कोई मौका न मिलना एक बड़ा अविश्वसनीय संतुलन है। इसका एक सुबूत यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक में छत्तीसगढ़ की खाद्यान्न नीति, और उस पर अमल की तारीफ बरसों से चली आ रही है। और दूसरी तरफ इस राज्य में अधिक फसल के राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहे हैं, फसल की रिकॉर्ड खरीदी दर्ज हो रही है। अब अगर देश में औद्योगिक माहौल बदलता है, कोयले की खदानों पर मंडराता कानूनी खतरा टलता है, तो यह राज्य कारखानों से भी और अधिक कमाई कर सकेगा। 

सोच की जगह जाकर, रियायती खाकर, बिना कोई काम किए, महज शौच करके वापिस...

6 फरवरी 2014
संपादकीय
लोकसभा का यह आखिरी सत्र शुरू हुआ है, और शायद अपनी जिम्मेदारी पूरी किए बिना खत्म भी हो जाएगा। दरअसल कई मुद्दों को लेकर संसद में जैसा हंगामा चल रहा है, वैसा हंगामा भारत जितने बड़े लोकतंत्र में साल के हर दिन चल सकता है। कभी तेलंगाना पर, तो कभी किसी आतंकी हमले पर, तो कभी सरहद पर किसी फौजी की शहादत को लेकर, किसी न किसी मुद्दे को लेकर संसद को रोका जा सकता है। लेकिन ऐसे हंगामों के बीच अगर देखें कि सचमुच में रूक क्या रहा है, तो यह संसद नहीं रूक रही है, क्योंकि ये पन्द्रहवीं संसद तो चलाचली की बेला में है ही, उसका कार्यकाल खत्म हो ही रहा है। रूक रहा है तो महिला आरक्षण रूक रहा है, भ्रष्टाचार के खिलाफ कहीं कोई प्रस्तावित कानून रूक रहा है, और कई किस्म के दूसरे जरूरी काम रूक रहे हैं। हम यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि संसद में जो प्रमुख विपक्षी दल भाजपा है, और उसके साथ एनडीए के उसके दूसरे साथी दल हैं, वे भी संसद के भीतर के हंगामों में शामिल होकर ऐसे कानूनों को रोक रहे हैं जो कि बरसों से संसद में खिंचते चले आ रहे हैं। महिला आरक्षण तो तब से चले आ रहा है जब एनडीए की सरकार थी, और लोकसभा में आज विपक्ष की नेता एक महिला है, फिर भी इसे हकीकत बनाने में सुषमा स्वराज का हाथ नहीं दिख रहा। 
लोकतंत्र लोगों को इतनी आजादी देता है कि वे कोई भी काम अमूमन कहीं भी कर सकते हैं। लोग दफ्तरों में काम करने के बजाय सो सकते हैं, बगीचों में घूमने के बजाय वहां सिगरेट पी सकते हैं, साफ जगहों को थूककर गंदा कर सकते हैं, हर कोने पर पेशाब कर सकते हैं, और हर खुली जगह पर पखाना कर सकते हैं। लोकतंत्र में लोग स्टेडियम में जाकर कानून बना सकते हैं, सरकार चलाने के बजाय आंदोलन कर सकते हैं, जेल में रहते हुए राजनीतिक दल के मुखिया रह सकते हैं, बड़े-बड़े जुर्म के दाग लगने के बाद भी विधानसभा और संसद में जा सकते हैं। ऐसे में संसद के भीतर कानून बनाने के जिम्मेदार लोग, बहुत थोड़े से बचे वक्त में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय हंगामा कर सकते हैं। इस देश में लोकतंत्र इतनी आजादी देता है कि सांसद सोच की जगह पर जाकर, रियायती खाकर, बिना कोई काम किए, महज शौच करके वापिस आ सकते हैं, और मोटा भत्ता ले सकते हैं, विशेषाधिकारों की जिंदगी जी सकते हैं। हमको यह भी हैरानी होती है कि अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को पूरा करने के बजाय, बाकी हर किस्म के गैरजरूरी हंगामे खड़े करने के बाद लोग लौटकर चैन से किस तरह सो जाते हैं? शायद मुफ्त के बंगले, मुफ्त के गद्दे, मुफ्त का ऐशोआराम उनको ऐसे सोने में मदद करता होगा, और उनके सीने पर कोई बोझ भी नहीं आने देता होगा। 
आज दिक्कत यह है कि संसद के भीतर ऐसी गैरजिम्मेदारी की तोहमत किस पर लगाई जाए, और किस पर नहीं, यह तय कर पाना कुछ मुश्किल लगता है। लेकिन हम चूंकि सत्ता की बेंचों, और विपक्ष की बेंचों, दोनों से परे बैठे हैं, इसलिए हमको इन दोनों पर मिला-जुलाकर इस तोहमत को डालने में कोई दिक्कत नहीं है। संसद हो या विधानसभाएं, ये न सत्ता की जागीर होतीं, न ही विपक्ष की। और हम इस बात को भी नहीं मानते कि किसी प्रस्तावित विधेयक को कानून बनवाना अकेले सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है। यह जिम्मा ऐसे सदनों में बैठे हुए हर किसी का होता है, और यह संसद विपक्ष को भी यह हक देती है कि वे भी वहां कोई प्रस्ताव रख सकते हैं, जिस पर चर्चा हो सकती है, मतदान हो सकता है। ऐसा अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि विपक्ष वहां हंगामा करते रहे, और जरूरी काम रूका रह जाए। आज अगर लोकसभा के इस आखिरी सत्र में भी महिला आरक्षण जैसे विधेयक कानून और हकीकत नहीं बन सकते, तो हम देश की इस आधी आबादी की तरफ से ही नहीं, देश में इंसाफपसंद हर किसी की तरफ से ऐसी संसद के भीतर के लोगों को धिक्कारते हैं। अपना जिम्मा पूरा किए बिना इस गरीब देश की गरीब जनता के पैसों से खाना, इसके लिए हिन्दी, ऊर्दू, और बाकी जुबानों में भी एक गाली है। सांसद खुद ही डिक्शनरी में अपने लिए इस शब्द को ढूंढ लें।