औरतों की बदहाली, और नवरात्रि

संपादकीय
31 मार्च 2014

देश में आंध्र प्रदेश, मणिपुर, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में नए साल की शुरुआत के साथ ही चैत्री नवरात्रि का पर्व आज से शुरू हो रहा है। देवी के शक्ति स्वरूप की पूजा के लिए तरह-तरह के अनुष्ठान करके देश का एक बड़ा वर्ग इन नौ दिनों में अपने-अपने परिवार के लिए सुख-सफलता, स्वास्थ्य, और तरह-तरह की कामना करता है। रात-रात भर जागकर देवी की मूर्ति, तस्वीरों के आगे भजन, दिन-दिन भर पूजा का यह सिलसिला 8 वें या 9 वें दिन कुमारी कन्याओं को भोजन करवाकर, उन्हें दक्षिणा देकर, उनका सम्मान कर के पूरा होता है। पर त्यौहार की यह भावना यह भक्ति रोजमर्रा के जीवन में उतरती शायद नहीं दिखती। देश में औरतों की हालत पर गौर करें, तो लगता है कि क्या साल में दो बार इस तरह देवी के रंग में रंगने का कोई असर हम पर पड़ता है?
अभी दो दिन भी नहीं हुए, दिल्ली में फिर एक बार एक महिला से सामूहिक बलात्कार, और दो से छेड़छाड़ की खबर आई। सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को बीरभूम सामूहिक बलात्कार पर उसके रवैये के लिए फटकारा। मजलूम अकेली लड़कियों के बलात्कार की ही बात नहीं है- बॉलिवुड की सबसे कामयाब अभिनेत्रियों में शुमार होती कैटरीना कैफ ने कहा कि वक्त के साथ बॉलीवुड फिल्मों में बहुत कुछ बदला, सिवाय अभिनेत्रियों को दिए जाने वाले मेहनताने के। देश सबसे बड़ी दलित नेता मानी जाती मायावती हो, या सोनिया गांधी, या हेमामालिनी, किसी के भी खिलाफ मनमानी जुबान बोलने  से लोगों को गुरेज नहीं दिखता। सोचकर ताज्जुब होता है कि, क्या यही देश है, जो साल में दो- दो बार औरत के शक्ति स्वरूप की पूजा करता है?
भारत में औरतों के साथ जन्मने से भी पहले से लेकर, मौत की दहलीज तक पहुंचने तक भेदभाव, दुव्र्यवहार होते रहता है। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे काफी नहीं हो, तो पति की मौत के बाद उनकी अकेली बच गई पत्नियों को या तो वृन्दावन का रास्ता दिखा देने, या घर से बाहर फेंक दिए जाने की घटनाओं पर इस देश में किसी को ताज्जुब नहीं होता। यह सब इसके  बावजूद है कि देश  के एक बड़े हिस्से में वह कभी शक्ति  के रूप में,तो कभी लक्ष्मी के रूप में, तो कभी सरस्वती के रूप में पूजी जाती है।
त्यौहार जब केवल मनाने की खातिर मनाए जाते हंै, उनका सार जीवन में जब उतारा नहीं जाता, तो जनजीवन से उनका सरोकार खत्म हो जाने, और उनके  केवल आडम्बर तक ही सीमित रह जाने का डर पैदा हो जाता है। औरत केवल दुर्गा या लक्ष्मी के रूप में ही वरदान नहीं देती, भला नहीं करती- एक बेटी के रूप में, एक पत्नी, बहन, और मां के रूप में उसका योगदान इतना तो होता ही है, कि उस पर देवी की किसी मूर्ति या फोटो जितनी श्रद्धा दिखाई जाए। जरूरत बस उसकी कीमत आंकने की है, उसकी हिस्सेदारी मानने की है।
नये साल की शुरुआत अगर औरतों के प्रति नजरिये में इस सुधार के साथ की जाए, तो नवरात्रि  के पर्व को एक नई सार्थकता, और  जन जन की आस्था को एक नई ताकत मिलेगी। वर्ना हर साल  राक्षसों को मारने की ताकत रखने वाली, सारी दुनिया का पेट भरने वाली  के रूप में उसका गुणगान करने का, दशहरे पर रावण मारने का, और रामनवमी पर रामजन्म मनाने का यह सिलसिला यंू ही जारी रहेगा, और  देश में  यूं ही बदस्तूर जारी रहेंगे, उनकी इज्जत लूटने, उनकी हत्या करने, और उनके साथ भेदभाव करने जैसे राक्षसी ज़ुल्म।

भाजपा में आज मोदी को सेल डिस्ट्रीब्यूटरशिप...

30 मार्च 2014
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी अपने जनसंघ के दिनों से लेकर अब तक के सबसे तेज, और शायद पहले, अंधड़ से गुजर रही है। यह पहला ही मौका है जब पार्टी ने किसी को इस तरह प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाया है, और पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के बहुत से महत्वाकांक्षी नेता एक प्रादेशिक नेता की इस ताजपोशी को देखते ही रह गए। इसके बाद भी यह सिलसिला आगे बढ़ा और भाजपा के भीतर दिग्गजों की बदलती सीटों से लेकर उनकी कटती उम्मीदवारी तक, बहुत से फैसले ऐसे हुए कि लोगों को लगा कि ये नरेन्द्र मोदी के मनमाफिक काम किया जा रहा है। यह सिलसिला अडवानी को नए ढांचे में उनकी जगह दिखाने से शुरू हुआ था, और उन्हीं पर जाकर खत्म भी हो गया। इस चुनाव में लालकृष्ण अडवानी को भी जब उनकी मर्जी की सीट से टिकट नहीं मिली, और मन मसोसकर उनको मोदी के गुजरात से ही लडऩे को बेबस किया गया, तो पार्टी पर मोदी का एकाधिकार पूरी तरह कायम हो गया। 
दरअसल भारतीय जनता पार्टी जनसंघ से लेकर आज तक, अपने इतिहास की सबसे मजबूत स्थिति में है। देश में सरकार बनाने के लिए एक गठबंधन के नेता के रूप में उसकी संभावनाएं इतनी मजबूत इसके पहले कभी नहीं थीं। और दूसरी दरअसल बात यह है कि केन्द्र की किसी सरकार की इतनी बदहाली पहले कभी नहीं थी। किसी राज्य में ऐसे दंगों के बाद उसके दागों से चुनावों में उबरना भी इसके पहले कभी नहीं हुआ था, और लगातार तीन चुनाव जीतकर वैसे गहरे दागों को धोने का काम भी पहले कभी नहीं हुआ था। नरेन्द्र मोदी की शक्ल में भाजपा, और भारत की राजनीति एक अभूतपूर्व आंधी को देख रहे हैं और इससे चुनावी नतीजों के आसार का अंदाज भी लोग लगा रहे हैं।
हम अभी चुनावी नतीजों पर अटकलबाजी करना नहीं चाहते, क्योंकि 2004 में भी जब अटल सरकार के प्रचार अभियान इंडिया शाइनिंग की चकाचौंधी में सभी आंखों को कमल खिलता दिख रहा था, तब कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए जीतकर आई थी, और दस बरस से सत्ता पर है। इसलिए मोदी की आंधी कितनी कारगर होती है यह आने वाले दिन बताएंगे। लेकिन एक बात साफ है कि इन चुनावों में अगर भाजपा की लीडरशिप में सरकार बनती है, तो देश और पार्टी दोनों पर मोदी की अकेले की ऐसी मर्जी हावी रहेगी, जैसी किसी ने देखी-सुनी नहीं होगी। ऐसी नौबत से परे कुछ लोगों को एक छोटी सी ऐसी संभावना दिखती है कि चुनाव के बाद भाजपा के साथी दल मोदी से परे किसी दूसरे नाम पर ही सहमत हों, और मोदी को नकार दें। 
जो भी हो, भाजपा एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जो खुद उसके ही काबू से परे है। आज पार्टी मोदी के कंधों पर सवार होकर संसद तक पहुंचने के फेर में है, और ऐसे में बाजार की जुबान में मोदी को पार्टी की सोल डिस्ट्रीब्यूटरशिप दे दी गई है, तो उसमें अटपटा कुछ नहीं है। 

...ऐसे में जनता को राजनीति से नफरत नहीं होगी, तो क्या होगा?

29 मार्च 2014
संपादकीय

भाजपा से जदयू का नाता टूटने के बाद लगातार नरेन्द्र मोदी पर सबसे तीखे हमले  करने वाले साबिर अली कल जब भाजपा में शामिल हुए, तो भाजपा के गिने-चुने बड़े नाम वाले अल्पसंख्यक नेताओं में से एक मुख्तार अब्बास नकवी ने नाराजगी जाहिर करते हुए सार्वजनिक रूप से कहा कि अब बस दाऊद (उनका इशारा माफिया डॉन की तरफ था) को भाजपा में लाना बचा है। उनके इस विरोध के साथ-साथ शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी नाराजगी जाहिर की है। और इसके पहले जब एक वक्त के अखबारनवीस एमजे अकबर भाजपा में गए, तो भाजपा में तो विरोध नहीं हुआ, लेकिन देश में भाजपा विरोधी, और धर्मनिरपेक्ष लोगों के बीच बड़ी खलबली मची। 
भारत जैसे लोकतंत्र में चुनावी राजनीति के चलते नीति-सिद्धांत जैसी कोई बात अब बच नहीं गई है। जिस जुबान में भाजपा के वरूण गांधी हाथ काटने की बात करते हैं, उसी जुबान में कांगे्रस का उम्मीदवार बोटी-बोटी कर देने की बात करता है। यह तस्वीर उन लोगों को राजनीति से एक हिकारत की तरफ धकेलती है, जो अब तक हिम्मत और उत्साह जुटाकर वोट डालने जाते हैं। जब इस कदर गंदगी की बातें हों, जब इस कदर दल-बदल की धोखाधड़ी हो, सौदेबाजी हो, जहां पर अपने घोषित सिद्धांत और अपनी आत्मा को मंडी में खड़े-खड़े बेच दिया जाता हो, वहां पर लोगों के मन में राजनीति के लिए नफरत उपजना जाहिर बात है। 
छत्तीसगढ़ से लेकर बिहार तक, और उत्तरप्रदेश से लेकर आंध्र तक, जिस तरह से लोग पार्टियों को तोड़ते हैं, नीति-सिद्धांत छोड़ते हैं, उसके खिलाफ एक जनजागरण शुरू करने की जरूरत है। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि लोगों को जलते हुए सवाल उठाने का हौसला दिखाना चाहिए। लोगों को आज इंटरनेट की मेहरबानी से ऐसे पुराने बयान आसानी से पल भर में मिल सकते हैं जिनको दिखाकर लोगों से पूछना चाहिए कि अपनी उगली ऐसी बातों को निगलने के लिए वे इतने बेशर्मी कहां से खरीदकर लाए हैं, और इस खरीदी के लिए भुगतान उन्होंने कहां से जुटाया? अकबर ने एक वक्त दंगों में नरेन्द्र मोदी की जिम्मेदारी गिनाते हुए लिखा था कि उन्हें पाकिस्तान सरकार से वहां का सबसे बड़ा सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान मिलना चाहिए। अब वे भाजपा में आने का तर्क गिनाते हैं कि पटना में धमाकों के बीच अपनी आमसभा में नरेन्द्र मोदी ने जो संतुलन बनाए रखा, उससे वे प्रभावित हुए। अब अकबर अपने लिए किस देश की किस सरकार से कौन से निशान की उम्मीद रखते हैं? आने वाले बरसों में हमारा अंदाज है कि वे भाजपा की तरफ से राज्यसभा में जाकर बैठेंगे, और हो सकता है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर वे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार भी रहें।
भारत की लोकतांत्रिक राजनीति जिस तरह मूल्यविहीन हो गई है, उसके भीतर वामपंथी दलों के अलावा उम्मीद की और कोई रौशनी दिखाई नहीं देती। अंधेरी सुरंग के आखिर में टिमटिमाती यह अकेली रौशनी ऐसी हिंसक हवाओं के झोंकों के बीच पता नहीं कब तक जिंदा रह पाएगी। हम कांगे्रस या भाजपा, इन दोनों के चाल-चलन में कोई बुनियादी फर्क नहीं देख रहे हैं, और मुलायम और लालू जैसे अश्लील कुनबापरस्तों में कोई फर्क नहीं देख रहे हैं। भारत की राजनीति गंदगी से उबरने के कोई आसार इसकी विविधता के साथ, विविधता के जिंदा रहते हुए नहीं दिख रहे। और जब विविधता नहीं रहेगी, तो फिर लोकतंत्र भी नहीं रहेगा। उत्तर-भारत के समाजवादी में से बाहर निकलकर लोग जिस तरह सीधे भाजपा की गोद में जाकर गिरते हैं, उससे समझ आता है कि ऐसे लोगों की समाजवादी जड़ें जमीन के नीचे कभी घुस भी नहीं पाई थीं। देश की जनता को अपने इलाके के ऐसे तमाम लोगों का सामना करने के लिए सवाल तैयार रखने चाहिए।

हिंसा और साम्प्रदायिकता की बात करने वाले उम्मीदवार को कांग्रेस तुरंत हटाए

28 मार्च 2014
संपादकीय

उत्तरप्रदेश के एक मुस्लिम कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी को लेकर भाषण दिया कि वे उनकी बोटी-बोटी कर देंगे। इसे लेकर इंटरनेट पर उनके भाषण का वीडियो तैर रहा है, और मोदी समर्थकों को तो एक मुद्दा मिला ही है, लेकिन देश भर के मोदी विरोधियों का भी यह रूख सामने आ रहा है कि ऐसी हिंसक और साम्प्रदायिक बात कहने वाले कांग्रेस उम्मीदवार को हटाने का काम कांग्रेस को बिना देर किए करना चाहिए। लोग यह भी याद कर रहे हैं कि किस तरह मुस्लिम समुदाय के लोगों की तरफ इशारा करते हुए जब भाजपा के एक नौजवान और बड़े बना दिए गए नेता वरूण गांधी ने हाथ काट देने की बात कही थी, तो उन्हें पार्टी के कुछ पदों से कुछ समय के लिए कैसे हटा दिया गया था। चुनावी राजनीति में भाषण देते समय बहक जाने की बातें कई बार होती हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि लोगों को उनकी कीमत भी चुकाने पर मजबूर करना चाहिए। कांग्रेस पार्टी अगर अपने ऐसे हिंसक और बेदिमाग उम्मीदवार को हटाती नहीं है, तो देश की हर सीट पर इस वीडियो का उसके खिलाफ इस्तेमाल होगा, और उसे नाजायज भी नहीं कहा जा सकेगा। 
लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले हैदराबाद में एक भाषण देते हुए एक मुस्लिम पार्टी के एक आक्रामक और विवादास्पद सांसद ने बहुत किस्म की हिंसक बातें कही थीं, और उनको लेकर उसके खिलाफ शायद राजद्रोह का मुकदमा भी दर्ज हुआ था, और देश में हिन्दू-मुस्लिम राजनीति करने वाले लोगों को उससे एक बड़ा मुद्दा मिला था। आज अगर भारत में कोई बेदिमाग राजनेता इस नाजुक पहलू को समझता नहीं है कि एक हिन्दू को मुस्लिम के खिलाफ, या एक मुस्लिम को हिन्दू के खिलाफ कैसी हिंसक बातें नहीं करनी चाहिए, तो ऐसे लोगों का सार्वजनिक जीवन में कोई काम नहीं होना चाहिए। हिंसक बातें तो किसी एक बिरादरी के भीतर भी नहीं होनी चाहिए, और इसके लिए चुनाव आयोग से लेकर अदालत तक सबके हाथ एक ताकत है कि ऐसे लोगों पर कार्रवाई करे। लेकिन हमारा यह मानना है कि इसके पहले ऐसे नेताओं की पार्टी को खुद कार्रवाई करनी चाहिए, खुद अपनी भलाई के लिए कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसा न करने पर उनको न सिर्फ आज चारों तरफ नुकसान झेलना होगा, बल्कि लंबे समय तक ऐसी मिसालें उन पार्टियों के खिलाफ काम आती हैं। 
देश में आज राजनीतिक तनातनी का जो माहौल है, उसको देखते हुए ऐसे बयान देने वालों के खिलाफ कानून के तहत जो सबसे कड़ी कार्रवाई हो सकती है, वह स्थानीय प्रशासन को करनी चाहिए, और अगर शासन-प्रशासन अपना जिम्मा पूरा नहीं करते, तो अदालतों को दखल देना ही चाहिए। आज शासन-प्रशासन राजनीति में हिस्सेदार बनकर काम करने लगे हैं, और लोकतंत्र में जब कोई एक स्तंभ अपना जिम्मा पूरा नहीं करे, तो उसके लिए दूसरे स्तंभ को हक दिए गए हैं। 
कांग्रेस पार्टी के नेता, उसके उम्मीदवार, उसके प्रवक्ता अगर साम्प्रदायिक और हिंसक बातें करते हैं, तो फिर वे दूसरी पार्टी पर साम्प्रदायिकता और हिंसा भड़काने की तोहमत लगाने का हक खो बैठते हैं। कांग्रेस को अपने घर को सम्हालना चाहिए, ऐसा उसके दुबारा सत्ता में आने के लिए जरूरी हो ऐसी भी बात नहीं है, उसके विपक्ष में बैठने पर भी उसके पास बोलने के लिए मुंह बचा रहे, इसके लिए भी जरूरी है कि अपनी पार्टी के ऐसे बड़बोले मुंह बंद करवाना वह सीखे। देश में आज हिंसा की बात करने वालों कोई जगह नहीं हो सकती, और वीडियो सुबूतों को देखकर तुरंत कड़ी कार्रवाई की जरूरत है, और इस मामले में हमको लगता है कि बकवास करने वाले इस हिंसक कांग्रेसी उम्मीदवार को तुरंत जेल भेजना चाहिए। उसके बाद अगर कांग्रेस पार्टी जिद पर आमादा रहती है, तो वह जेल से भी अपने उम्मीदवार को चुनावी मैदान में बनाए रख सकती है, और पूरे देश में उसका नुकसान झेल सकती है। 

ताकतवर लोगों के मुकदमे देखें तो लोकतंत्र बोगस लगता है...

27 मार्च 2014
संपादकीय
भारतीय क्रिकेट को नियंत्रित करने वाली संस्था बीसीसीआई खबरों में हैं, और दुनिया के सबसे व्यस्त और बोझ से लदे हुए भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के भीतर भी हैं। दुनिया के कुख्यात मुजरिमों के साथ मिलकर भारत में क्रिकेट मैचों को फिक्स करने, और सट्टेबाजी का धंधा करने में देश के बड़े-बड़े दिग्गज और क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी पकड़ाए जा चुके हैं, और यह पूरी तरह उजागर हो चुका है कि खेल के नाम पर जुर्म का यह धंधा बीसीसीआई जैसी संस्था के मातहत चल रहा है, और इसके मुखिया का दामाद इसमें पकड़ा जा चुका है। इससे परे भी देखें तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के बड़े पदाधिकारियों में कांग्रेस, भाजपा और एनसीपी, जैसी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता शामिल हैं, और शायद यही वजह है कि किसी राजनीतिक मंच पर क्रिकेट के नाम पर चल रहा यह जुर्म जूते नहीं खाता। अब जाकर सुप्रीम कोर्ट की दखल इस मामले में हुई है, वरना बीसीसीआई अपने आपको भारतीय लोकतंत्र के भीतर एक आजाद टापू की तरह बताता है, और अपने पर सूचना का अधिकार भी लागू नहीं होने देता है। 
आज हम न चाहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए एक दूसरे मामले को देखते हैं जिसमें दुनिया के इतिहास की सबसे महंगी जमानत-शर्त सुब्रत राय सहारा पर लगाई गई है। पिछले दो बरसों में सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अपनी जुबानी अपनी बेबसी जाहिर की है कि सहारा कंपनी के मालिक सुब्रत राय अदालत की एक नहीं सुन रहे हैं, अदालत का अपमान कर रहे हैं। अब सहारा और बीसीसीआई इन दोनों को देखें, तो सरकार से लेकर संसद तक, और सेबी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, किसी का भी कोई बस जब इन पर चलते नहीं दिखता है तो यह साफ होता है कि देश का जो कानून गरीबों के लिए है, उस कानून का कोई असर सबसे अमीर तबके पर नहीं है। इन्हीं के टक्कर का एक दूसरा मामला विजय माल्या का है, जिसने कि अपनी किंगफिशर एयरलाईंस के कर्मचारियों को बरसों से तनख्वाह नहीं दी है, और जो अपनी शान-शौकत की अश्लील और हिंसक फिजूलखर्ची के साथ खबरों में बना हुआ है, और उस पर देश का कोई मजदूर कानून मानो लागू ही नहीं होता है। 
हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि अमीरों के साथ, बड़े ओहदों पर बैठे हुए ताकतवर लोगों के साथ लड़ाई लडऩा उनके मुकाबिले कमजोर लोगों की ताकत के बाहर है। इन मामलों से यह साफ होता है कि ऐसे लोगों के साथ लड़ाई लडऩा एक किस्म से सुप्रीम कोर्ट की ताकत से भी कुछ हद तक बाहर ही है। सुप्रीम कोर्ट बीसीसीआई के अध्यक्ष श्रीनिवासन को सीधे हटाने के बजाय जब इस्तीफा देने का वक्त और मौका देता है, जब वह सुब्रत राय सहारा को बरसों तक मौका देता है, तो लोगों को यह लगता है कि क्या आम लोगों के मामलों में भी, देश की सबसे निचली अदालतें भी इस तरह की कोई रियायत कभी दिखाती हैं? एक तरफ संजय दत्त जैसे ताकतवर और रईस को लगातार एक के बाद एक पैरोल मिलते चलती है, तो दूसरी ओर उसी के साथ गिरफ्तार, और उसी की तरह की सजा पाए हुए मरणासन्न लोग जेल में बिना पैरोल पड़े हुए हैं। हमने उस वक्त भी लिखा था कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल आरोपों में गिरफ्तार, विचाराधीन कैदी, जिसे कि सजा भी नहीं हुई थी, उस सोनी सोढ़ी को अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए भी जेल से बाहर आने को जमानत नहीं मिली थी। और दूसरी तरफ संजय दत्त जैसे लोग सजा पाने के बाद भी लगातार पैरोल पर महीनों तक बाहर रहते हैं। 
ऐसा लोकतंत्र गरीबों के नजरिए से, कमजोर लोगों के नजरिए से, एक बिल्कुल बोगस बात रह गया है। ऐसा लोकतंत्र सिर्फ अमीरों की सेवा-खातिरी करता है, और मौका मिलते ही गरीबों पर उसी तरह टूट पड़ता है, जिस तरह सड़क पर किसी गरीब पर खफा होने पर पुलिस की लाठियां टूट पड़ती हैं। ऐसा लोकतंत्र देख रहा है कि पैसों का नंगा नाच इस देश में धड़ल्ले से चलता है, और उसके साथ-साथ चलते हुए जुर्म पर काबू पाने में सुप्रीम कोर्ट को किस तरह बरसों लग जाते हैं। 

Bat ke bat, बात की बात

26 march 2014

राजनीति के सबक राजनीति से परे जिंदगी में भी काम के

26 मार्च 2014
संपादकीय

कांग्रेस पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र इस समय जारी हो रहा है, और उसमें अगले पांच बरस के लिए सौ किस्म के वायदे देश से किए जा रहे हैं। वैसे देखा जाए तो पिछले पांच या दस बरसों में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए सरकार ने बहुत से ऐतिहासिक कानून, और ऐतिहासिक जनकल्याणकारी कार्यक्रम लागू किए, और भाजपा या एनडीए राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के सामने जनहित की वैसी कोई नीतियां या कार्यक्रम नहीं रख पाए। फिर भी आज जब इस पल टीवी पर कांग्रेस पार्टी का घोषणापत्र आ रहा है, तो शायद ही कोई उसे गंभीरता से देख रहा होगा। 
हम पिछले दस बरसों में कांग्रेस के लिए हुए अच्छे सरकारी फैसलों, और अगले पांच बरस के लिए उसके अच्छे वायदों की बारीकियों पर यहां गौर करना नहीं चाहते। लेकिन हम इस मुद्दे पर लिख इसलिए रहे हैं कि अच्छा काम करने के बाद भी बातों में वजन क्यों नहीं आ पाता, इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। लाख रूपए की साख, गई तो फिर खाक। कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी, और उसके भीतर कुछ बहुत काबिल और बहुत अच्छे नेता-मंत्री, आजादी की लड़ाई से लेकर बांग्लादेश बनाने तक का योगदान, देश के कमजोर तबकों के लिए जनकल्याणकारी कार्यक्रम, गांधी और नेहरू की शोहरत, इन सबके बाद भी आज जब कांग्रेस का घोषणापत्र आ रहा है, तो उसकी बातों पर शायद ही कोई भरोसा करे। कांग्रेस की इस हालत से देश के लोगों को राजनीति से परे भी सबक लेना चाहिए, कि कोई अपने वक्त कितने ही बड़े और ताकतवर क्यों न हों, उनको यह नहीं मानना चाहिए कि उनकी ताकत और उनके आकार की हमेशा इज्जत होगी। इज्जत कामों को लेकर होती है, आकार को लेकर नहीं। 
अब मिसाल के लिए अरविंद केजरीवाल को लें, हमारे पास उनकी आलोचना के लिए सौ मुद्दे हैं, लेकिन सड़क से आकर जिस तरह दिल्ली राज्य की प्रादेशिक संसद में उन्होंने कब्जा किया, वह देखने लायक था। उनकी पार्टी के पास महज एक झाड़ू था, लेकिन लोग जुड़ते गए, कारवां बढ़ता गया। उन्होंने देश की जनता के दिल-दिमाग में यह बात कामयाबी से बिठाई कि भ्रष्ट राजनीति में वे एक उम्मीद साबित हो सकते हैं। हमारी आज उनसे कितनी ही नाउम्मीदी हो, वे यह मिसाल तो साबित हो ही चुके हैं कि किस तरह बिना अपने किसी ढांचे के, बिना अपने इतिहास के, बिना अपने कुनबे के, बिना किसी दौलत के, महज साख से वे धरती से आसमान तक पहुंच गए थे। इस तरह साख की अहमियत को कांग्रेस को समझना था, जिसने कि पिछले दस बरसों में लगातार इसको खोते हुए अपना यह घमंड दिखाना जारी रखा कि देश के मतदाताओं की मानो यह बेबसी है कि वे नेहरू-गांधी परिवार को चुनें, कांग्रेस को चुनें। 
जिंदगी के दूसरे दायरों में भी लोगों को अपनी साख का ख्याल रखना चाहिए। कारोबार की दुनिया को देखें तो ऊंची साख के लोगों को बाजार में जिस ब्याज पर पैसा मिल जाता है, खोई हुई साख के लोगों को उससे तीन गुना ब्याज पर भी रकम नहीं मिलती। इसलिए कांग्रेस की इस नौबत से हर किसी को सबक लेना चाहिए, कि आज न तो दस बरस के उसके अच्छे काम किसी को याद हैं, और न ही अगले पांच बरस के लिए उसके वायदों को कोई सुनना चाहते। कांग्रेस के गलत काम उसके बीते कल और आने वाले कल के चेहरे पर कालिख पोत गए हैं, और इस चुनाव में जो आसार दिखते हैं, वे 2014 में इस कालिख के धुलने के नहीं दिखते। कांग्रेस के अलावा केजरीवाल को देखकर भी लोगों को जिंदगी में सीखना चाहिए, और मोदी युग में भाजपा के दिग्गजों का क्या हाल हो रहा है, उनकी पार्टी का क्या हाल हो रहा है, उसे देखकर भी सबक लेना चाहिए। राजनीति के सबक राजनीति से परे भी काम के होते हैं। 

राजनीतिक गंदगी के बीच जनता खुद हवा साफ करे

25 मार्च 2014
संपादकीय
कल के कल कर्नाटक में कांग्रेस और भाजपा दोनों की शर्मिंदगी देखने लायक थी। एक तरफ श्रीराम सेने नाम के धर्मान्ध और हिंसक हिन्दू संगठन के मुखिया को भाजपा में प्रवेश देने के आधे घंटे के भीतर ही देश भर से उसके विरोध को देखते हुए पार्टी से निकालना पड़ा, और मानो इसके मुकाबले कांग्रेस पार्टी पीछे रहना नहीं चाहती थी, तो उसने कर्नाटक में लड़के-लड़कियों पर हमला करने वाले इसी संगठन के एक दूसरे हिंसक पदाधिकारी को कांग्रेस में एक जिला स्तर पर प्रवेश दिया। 
दरअसल ये दोनों पार्टियां, बाकी कुछ और पार्टियों के साथ-साथ इतनी हड़बड़ी में हैं, कि इनके नीति-सिद्धांत सारे के सारे धरे रह गए हैं। एक-एक करके अपनी पार्टी के हर कुख्यात और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए लोगों को या तो ये पार्टियां टिकट दे रही हैं, या पार्टी के भीतर वापिस दाखिला दे रही हैं, और बहुत से मामलों में तो ये दोनों ही फायदे कुछ बदनाम नेता पा रहे हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी से लेकर जदयू तक, और लालू यादव के राजद तक से निकलकर लोग सीधे भाजपा में जा रहे हैं, भाजपा के लोग धर्म निरपेक्ष पार्टियों में जा रहे हैं। कुल मिलाकर हालत यह है कि चुनाव की इस आंधी में जिसके हाथ जो लग रहा है, उसे ही थामकर लोग गंगा पार करने की कोशिश कर रहे हैं। यह ऐसा मौका है जब जनता को अपने नेताओं से उनकी नीतियों को लेकर, उनके पुराने बयानों को लेकर, उनके कस्मों-वायदों को लेकर सवाल करने चाहिए। अकेले मीडिया से सवाल पूछने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। 
हमने दल-बदल के खिलाफ कानून को संसद और विधानसभाओं से बाहर चुनाव नियमों तक बढ़ाने के बारे में लगातार लिखा है। लेकिन जब लोग चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, और किसी पार्टी में आ-जा रहे हैं, उसका प्रचार कर रहे हैं, तो उन पर चुनाव आयोग की बंदिश भी उम्मीदवार के रूप में तो लागू नहीं हो सकती। ऐसे में जनता के बीच से लोगों को, जनसंगठनों को कड़वे और कड़े सवाल लेकर सामने आना चाहिए, जनता के सवालों को अगर मीडिया न भी छापे, तो भी उन्हें पोस्टर और पर्चे बनाकर, आमसभाओं में जाकर सवाल उठाकर, या जनचर्चा में इन बातों को फैलाकर लोकतंत्र में विचारों की आजादी का इस्तेमाल करना चाहिए। 
मीडिया या ऐसे दूसरे औजार, लोकतंत्र में सिर्फ औजार हैं। और किसी को औजार नसीब न हों, तो उनको अपने आपको बेबस और कमजोर नहीं समझना चाहिए। नए-नए औजार बनाए जा सकते हैं। अभी कुछ दिन पहले ही एक खबर आई थी कि कैसे एक जेल में वहां के कैदी पखाना पोंछने के कागज के रोल पर अखबार निकालते थे, और एक-दूसरे तक लिखा हुआ वह अखबार पहुंचाते थे। आज तो इंटरनेट और एसएमएस, फोन और उसके दूसरे मुफ्त के एप्लीकेशनों की मेहरबानी से लोग अपनी बातों को मीडिया के बिना भी दूर-दूर तक पहुंचा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि मीडिया जैसे-जैसे एक बड़ा कारोबार बनते गया है, उसकी कारोबारी मजबूरियां उसकी आजादी और उसकी निष्पक्षता को खत्म करती चली गई हैं। ऐसे में जनता को मीडिया के हिस्से अब तक चले आ रहे जिम्मे का कुछ हिस्सा खुद भी उठाना पड़ेगा। 
आज चुनाव की आंधी के बीच पार्टियों से बहुत से सवालों के जवाब मिलने वाले नहीं हैं। लेकिन जनता को आपस में ऐसे सवाल उठाकर, उनके जवाब सोच-विचार कर, उन पर लोकतंत्र और जनता के हित का, अपने इलाके और अपनी आने वाली पीढिय़ों के हित का फैसला लेना चाहिए। पूरे देश में कोई आंधी चल रही हो, ऐसा मानकर किसी एक निशान पर वोट देने के बजाय, लोगों को अपने इलाके से बेहतर लोगों को चुनकर भेजना चाहिए। और सिर्फ बड़े उम्मीदवारों को चुनने की बेबसी लोकतंत्र में नहीं रहती, लोकतंत्र में लोग कम चर्चित, छोटी पार्टियों के, या निर्दलीय उम्मीदवारों को भी वोट देकर अच्छे लोगों को वजनदार साबित कर सकते हैं, और दूसरी तरफ अब तो वोटिंग मशीन पर सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के लिए नोट का बटन भी है। इसलिए आज राजनीतिक गंदगी के बीच लोगों को हवा साफ करने की कोशिश अपने स्तर पर भी करनी चाहिए। 

लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत

संपादकीय
24 मार्च 2014
लोकसभा चुनाव के लिए वोट के दिन पखवाड़े भर रह गए हैं। हम लगातार अधिक से अधिक, सभी मतदाताओं से मतदान की जो अपील कर रहे हैं, वह लोकतंत्र में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाकर, अधिक लोकप्रिय उम्मीदवार या पार्टी को चुनने की बात है। पिछले विधानसभा चुनाव में बस्तर में जहां नक्सल हिंसा और देश भर से आए हुए सुरक्षा कर्मचारियों के बीच, धमकियों के आतंक में भी इतना भारी मतदान हुआ कि चुनावी राजनीति को करीब से देखने वाले भी हक्का-बक्का रह गए। दूसरी तरफ राजनांदगांव जिले में नक्सल हिंसा के बगल की सीटों पर भी भारी वोट डले।  मुख्यमंत्री के गृह जिले राजनांदगांव में इसके पहले के चुनाव से करीब सात फीसदी ज्यादा मतदान हुआ।  प्राय: सत्ता पक्ष बढ़ते मतदान को सत्ता परिवर्तन मानकर चलता है,लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में यह बात गलत साबित हुई।  चुनावों में अधिक मतदान किसकी तरफ है, या किसके खिलाफ है, इसको लेकर हर चुनाव में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तर्क रहते हैं, लेकिन बस्तर के मतदान को लेकर लोगों को एक नसीहत लेनी चाहिए। हमने इसी बारे में लिखा था, और आज फिर हम इस बारे में इसलिए लिख रहे हैं कि छत्तीसगढ़ की 11 सीटों पर पखवाड़े भर बाद जो वोट डलने हैं, उसे लेकर बाकी मैदानी छत्तीसगढ़ को बस्तर और राजनांदगांव के वोटरों की चुनौती मंजूर करनी चाहिए। अगर सभी जगहों पर वोट बढ़ेंगे, तो खोट घटेगी, नोट की लूट कम होगी, क्योंकि बेहतर लोग चुनकर आएंगे, और कम मतदान में अपने लायक वोट खरीदकर जीत जाने वाले हड़बड़ाएंगे। 
चुनाव आयोग की सख्ती के चलते अब उम्मीदवारों और पार्टियों की गाडिय़ां वोटरों को ढोने का काम नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में जब लोग खुद होकर वोट डालने जाते हैं, तो आने-जाने के एहसान से परे रहकर वे एक अधिक ईमानदार फैसला ले पाते हैं। छत्तीसगढ़ के चुनाव में चुनाव आयोग ने इस बार अंधाधुंध खर्च को सड़कों पर नहीं उतरने दिया है। जो उम्मीदवार कई-कई करोड़ खर्च करने के लिए जाने जाते थे, उनका भी हाल इस बार कम से कम सड़कों पर काबू में है। इस तरह से ये दो बातें मिलकर अगर असर करती हैं, तो ये चुनाव पिछले चुनावों के मुकाबले थोड़े से अधिक लोकतांत्रिक हो सकते हैं। खर्च काबू में हो, और मतदाता उत्साही हो, तो ये मिलकर बाहुबली, दबंग, और पैसों की राजनीति करने वाले लोगों को अगले पांच बरस अपने तौर-तरीके सुधारने पर बेबस भी करेंगे। 
राजनांदगांव जिले में वहां की एक नौजवान आईएएस अधिकारी प्रियंका शुक्ला ने अधिक मतदान के लिए चुनाव आयोग की दी गई जिम्मेदारी के तहत एक मौलिक अभियान चलाया था। प्रतिज्ञा नाम के इस अभियान में गांव-गांव में लोगों की बैठकें लीं , और लोगों ने खुद होकर शपथ ली थी कि वे वोट जरूर डालेंगे। इसके तहत कहीं कार्टून का अभियान, तो कहीं छात्र-छात्राओं की कोशिशें भी चलती रहीं। इसलिए यह भी हो सकता है कि इस जिले का अधिक मतदान इन कोशिशों का नतीजा हो, और बाकी प्रदेश से इसकी तुलना होने पर ही इसका सही अंदाज लगेगा। लेकिन किसी एक जिले को ऐसे मुकाबले में आगे बढऩे देने के बजाय, पूरे प्रदेश में यह कोशिश होनी चाहिए कि कैसे अधिक मतदान हो। जहां प्रत्याशियों का जीत-हार का फासला कुछ सौ वोटों का रहता हो, वहां पर अगर पांच-दस हजार वोट अधिक डल जाएंगे, तो दबंग उम्मीदवारों के होश ही उड़ जाएंगे। 
मतदान का बढ़ता रुझान लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। इससे लोकतंत्र की मजबूती की आस जग रही है।  एक बहुत पुरानी बात है कि जनता को वैसी ही सरकार मिलती है, जैसी सरकार की वह हकदार होती है। आज छत्तीसगढ़ और बाकी चुनावी-प्रदेशों की जनता को इस बात को साबित करके दिखाना है, वरना लुटेरों के लूटकर चले जाने के बाद फिर हिफाजत का ख्याल बेमानी होगा। 

तेईस बरस की उम्र में गांधी और नेहरू भी, भगत सिंह जितने ऊंचे नहीं पहुंचे थे

23 मार्च 2014
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
आज भगत सिंह के शहादत दिवस पर भारत भर में जगह-जगह उनको याद किया जा रहा है। और भारत से बाहर पाकिस्तान में भी वामपंथी विचारधारा के बहुत से लोग हैं जो भगत सिंह के नाम पर वहां पर एक चौराहे का नाम रखने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। ऐसे में इन दोनों देशों की आजादी में भगत सिंह का जो योगदान था, वह गांधी और नेहरू जैसे दिग्गजों के नाम के आगे दब गया, और बहुत से लोग भगत सिंह के गैरअहिंसक तौर-तरीकों को सही नहीं भी मानते थे, और इसलिए उनका मूल्यांकन इतिहास में कम किया गया। लेकिन हम इस शहादत से परे के एक पहलू पर बात करना चाहते हैं जिसे समझना आज की नौजवान पीढ़ी के लिए बहुत जरूरी है।
जिस वक्त भगत सिंह को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के बाद कैद, अदालती सुनवाई, और फांसी हो चुकी थी, तब वे कुल 23 बरस के थे। आज हम हिन्दुस्तान में इस उम्र की नौजवान पीढ़ी को अगर देखें, तो उसकी अधिकतर जानकारी मोबाइल फोन के सबसे ताजा मॉडल तक सीमित रहती है, और उसी के इर्द-गिर्द रहती है। इस उम्र तक आम और अधिकतर हिन्दुस्तानी नौजवान अपनी कॉलेज की किताबों को भी ठीक से नहीं पढ़ते हैं। दुनिया की राजनीतिक विचारधाराओं, और दुनिया के हालात की समझ तो छोड़ ही दें, औसत हिन्दुस्तानी नौजवान को अपने देश के आज के हालात की समझ भी कम ही है, और किसी को इस बात का अफसोस भी नहीं है। दरअसल न तो आज की हिन्दुस्तानी नौजवान पीढ़ी के सामने आजादी की लड़ाई जैसी कोई चुनौती है, और न ही भगत सिंह या गांधी जैसे कोई प्रेरणास्रोत हैं। उसके सामने भ्रष्टाचार और चापलूसी से जुटने वाली नौकरी की संभावना है, और उससे भी अधिक बेरोजगारी की आशंका है। इसलिए उसकी जिंदगी की सोच सिर्फ शहरी और आधुनिक सामानों की सहूलियत तक होकर रह गई है। 
इस बात पर हम जोर देकर इसलिए कहना चाह रहे हैं कि 23 बरस की उम्र में फांसी पर चढऩे के वक्त उस वक्त का भगत सिंह जितना लिख गया था, उतना तो आज 23 बरस की उम्र वाले नौजवान पढ़ भी नहीं पाते हैं। देश में शायद एक फीसदी नौजवान भी ऐसे नहीं होंगे, जो कि भगत सिंह के लिखे हुए का एक फीसदी भी पढ़े होंगे, भगत सिंह के पढ़े हुए का मुकाबला तो दूर रहा। राजनीतिक समझ और आर्थिक-सामाजिक जिम्मेदारी से अनजान नौजवान पीढ़ी देश के लिए कुछ कुर्बान भी नहीं कर सकती। भगत सिंह ने उस वक्त उस उम्र में, बिना इंटरनेट और कम्प्यूटर के, महज किताबों के साथ और खतो-किताबत से जितना पढ़ा था, समझा था, समझाया था, और लिखा था, वह हैरतअंगेज काम था। उस वक्त वामपंथ की जो समझ भगत सिंह की थी, उस वक्त साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई की जो समझ उनकी थी, उस वक्त धर्म और ईश्वर के खिलाफ जो समझ उनकी थी, और उनके भीतर जितने ऊंचे दर्जे का नास्तिक सिर उठाए खड़ा था, उसकी कोई मिसाल हिन्दुस्तान में नहीं है। सच कहें तो किसी दूसरे से तुलना करने की नीयत न होने पर भी, आज अगर हम उस शहीद की तुलना करना ही चाहें, तो 23 बरस की उम्र में गांधी और नेहरू भी भगत सिंह के मुकाबले किसी किनारे नहीं पहुंचे थे, भगत सिंह का जो योगदान उस कच्ची उम्र में देश के लिए था, गांधी-नेहरू शायद उस उम्र में कानून की पढ़ाई करने में लगे हुए थे। 
लेकिन आज भारत और पाकिस्तान में भगत सिंह की शहादत को याद करके उनके बुतों पर फूल चढ़ाने से, और उनको समझे बिना आज का दिन गुजार देने से बड़ी बेइज्जती उनकी कुछ नहीं हो सकती। अगर भगत सिंह को याद ही करना है, उनकी शहादत की इज्जत करनी है, तो भगत सिंह के लिखे हुए को पढऩे की जहमत उठानी चाहिए, और उनका लिखा हुआ हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, और उर्दू, कम से कम इतनी जुबानों में तो चारों तरफ मौजूद है। आज की नौजवान पीढ़ी मरने तक अनपढ़ ही रहेगी, अगर वह भारत और पाकिस्तान में जीते हुए, भगत सिंह को पढ़े बिना, जाने बिना, उस शहीद को समझते हुए अपने रौंगटे खड़े होते हुए देखे बिना अगर बूढ़ी हो जाती है, तो यह उसके लिए धिक्कार की बात है। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान इतनी कम उम्र का इतना हौसलामंद, इतना समझदार, और इतनी बड़ी राह दिखाने वाला और कोई इंसान नहीं है, इसलिए जिसने भगत सिंह को नहीं पढ़ा, उसने कुछ नहीं पढ़ा। 

पार्टियां तो दलबदलुओं को सिर पर बिठा रही हैं, मतदाता उन्हें खारिज करे

संपादकीय
22 मार्च 2014

दलबदल पर हम कल ही लिख चुके हैं, लेकिन आज इससे जुड़े हुए एक दूसरे पहलू पर लिखना चाहते हैं कि मतदाता ऐसे लोगों के बारे में क्या सोचें? पार्टियां तो ठीक है कि दूसरी पार्टी को कमजोर करने के लिए, या किसी जाति या धर्म को संतुष्ट करने के लिए, या अपनी सीटों को बढ़ाने के लिए दलबदल करवाती हैं, लेकिन मतदाता के सामने इसके बाद भी यह रास्ता खुला रहता है कि ऐसे चुनावी मौसम के ऐसे दलबदलुओं के साथ क्या सुलूक किया जाए? 
हमारे यह लिखने से आज देश में किसी एक पार्टी को कम और किसी दूसरी पार्टी को ज्यादा फर्क पड़ रहा हो ऐसा नहीं है, क्योंकि सभी पार्टियां इसमें लगी हुई हैं। हमारा आज इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यह है कि मतदाताओं को एकमुश्त ऐसे तमाम लोगों को खारिज कर देना चाहिए जो कि सिर्फ चुनाव लडऩे के लिए पार्टी बदलकर फिर से मतदाताओं के सामने हैं। छत्तीसगढ़ में करूणा शुक्ला हों, या राजस्थान में बाड़मेर सीट से कल तक का कांग्रेसी और आज का भाजपाई उम्मीदवार हो, ऐसे तमाम लोगों को सिरे से खारिज करना चाहिए, क्योंकि इनका दलबदल लोकतंत्र और मतदाता के खिलाफ एक बहुत बड़ी हिकारत बताता है। जहां जो दलबदलू हो, उसके खिलाफ कम से कम एक चुनाव हराने की जिम्मेदारी तो जिम्मेदार मतदाताओं को निभानी ही चाहिए। 
कल टीवी पर एक बहस के दौरान उठाया गया एक सवाल जायज था कि भाजपा के इतने बड़े नेता रहे जसवंत सिंह उस सीट के लिए टिकट मांगते हुए गिड़गिड़ाते रहे, जिस सीट पर भाजपा ने कल ही कांग्रेस छोड़कर आए हुए एक नेता को टिकट दी है। अब सवाल यह है कि भाजपा की नीति क्या है? पार्टी में रहे पुराने नेता को मौका न देकर, कल तक पार्टी की नीति के खिलाफ कांग्रेस की तरफ से लड़ाई लडऩे वाले को आज उम्मीदवार बनाना, एक किस्म की खरीद-फरोख्त है, जिसमें नगदी का लेन-देन भर अभी सामने नहीं आया है। आज देश में जनता के बीच यह जागरूकता जरूरी है कि कैसे उम्मीदवारों को हराया जाए, चुनाव प्रचार में आने वाले उम्मीदवारों से क्या-क्या सवाल पूछे जाएं। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि चुनाव के दौरान मीडिया भी पार्टियों और नेताओं से असुविधाजनक सवाल पूछने से बड़े रहस्यमय ढंग से बचता है, और जनता की तरफ से उसके मन के सवाल पूछने की अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करता। 
हमने कल ही यह लिखा है कि किस तरह चुनाव कानून में सुधार के दौरान यह बात भी उठनी चाहिए कि किस तरह दलबदल करने वाले लोगों के नई पार्टी से चुनाव लडऩे पर कुछ बरस की रोक रहनी चाहिए। बिहार के एक किसी नेता की खबर अभी कुछ हफ्ते पहले ही हमने छापी थी, जिसने शायद पौन दर्जन चुनाव हर बार नई-नई पार्टी से लड़े थे। धर्म और जाति के आधार पर, पैसों के दबदबे के आधार पर पार्टियां बहुत से ऐसे लोगों को दलबदल के बाद टिकट देती है। सुषमा स्वराज जैसी प्रधानमंत्री पद की एक वक्त की दावेदार भाजपा नेता के खुले सार्वजनिक विरोध के बावजूद कर्नाटक के कुख्यात और बदनाम नेताओं को भाजपा न सिर्फ पार्टी में वापिस लाई, बल्कि उनको उम्मीदवार भी बनाया। नरेन्द्र मोदी के भाषणों में ईमानदारी की जितनी बातें रहती हैं, वे कर्नाटक जैसी कई मिसालों में दम तोड़ते दिखती हैं। और रूपए-पैसे की बेईमानी के अलावा हम दलबदल के बाद उम्मीदवार बनाने को भी बेईमानी मानते हैं, और कोई भी पार्टी जो नीति-सिद्धांत की बात करती है, उसको ऐसे हथकंडों से दूर रहना चाहिए। चूंकि देश भर में फैली कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां एक ही जैसे गलत काम एक ही स्तर तक करने में लगी हुई हैं, इसलिए किसी एक निशान को पूरी तरह खारिज करना मुमकिन नहीं है। ऐसे में मतदाता को अपनी सीट पर खड़े हुए उम्मीदवार को देखकर भी तय करना चाहिए, कि लोकतंत्र की हेठी करने वाले लोगों को कैसे हराया जाए। 

बात की बात
21 Mar 2014

दलबदल के तुरंत बाद नई पार्टी से चुनाव लडऩे पर रोक लगे

21 मार्च 2014
संपादकीय
जिस रफ्तार से एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में लोग जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि पार्टियों के भीतर इसके खिलाफ बगावत हो, या न हो, देश के लोकतंत्र में ऐसी बेशर्मी, या मौकापरस्ती, या धोखाधड़ी, के खिलाफ एक बगावत जरूर होनी चाहिए। लोगों के विचार बदल सकते हैं, उनकी नीतियां बदल सकती हैं, अपनी पार्टी से उनको चिढ़ हो सकती है, दूसरी पार्टी उनको अधिक पसंद आ सकती है, और ऐसे में दलबदल एक पूरी तरह से लोकतांत्रिक हक है, लेकिन इसके बाद नई पार्टी की टिकट पर चुनाव लडऩे के लिए कुछ समय की रोक जरूर रहनी चाहिए। ऐसा होने पर लोग पार्टी छोडऩे के पहले सोचेंगे, पार्टियां ऐसे लोगों को ऐन चुनाव के पहले, चुनाव लड़वाने के लिए लेने के पहले सोचेंगी, और राजनीति में गंदगी, खरीद-फरोख्त कुछ कम होगी। 
लोकतंत्र में दरअसल बहुत सी बातें परंपरा के आधार पर चलनी चाहिए, लेकिन हकीकत इससे ठीक उल्टे है, और भारतीय लोकतंत्र में तो परंपरा दूर रही, कानून को भी बेवकूफ बनाने के लिए नेता और पार्टियां आखिरी दम तक कोशिश करते हैं। यह उम्मीद अब किसी से नहीं की जा सकती कि भ्रष्ट को, संदिग्ध आरोपी को, बुरे इंसान को पार्टी टिकट न दे। अकाली दल जैसी पार्टियों ने तो कई टिकटें देकर संसद में कुछ लोगों को महज इसलिए भेजा कि उनके परिवार के लोगों ने इंदिरा की, या कुछ और लोगों की हत्या की थी। जिस लोकतंत्र में ऐसी गैरजिम्मेदारी को रोकने का न कानून है, न ऐसी कोई परंपरा है, उस लोकतंत्र में दलबदल को अगर घटाना है, तो दलबदल के बाद नई पार्टी, नए निशान पर चुनाव लडऩे के लिए कुछ बरस की रोक रहनी चाहिए।
हमने कुछ दिनों पहले ही इस मुद्दे को छेड़ा था, और हमारा यह भी मानना है कि जज रहे हुए लोग, सीएजी की कुर्सी पर बैठे हुए लोग, फौज से रिटायर हुए लोग, नौकरशाह रहे हुए लोग, ऐसे लोगों पर नौकरी छोडऩे या रिटायर होने के बाद कुछ बरस तक चुनाव न लडऩे की एक रोक रहनी चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि अभी-अभी भाजपा में गए भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह राजनीति में उतरते ही जिस अंदाज में सरकार के खिलाफ बोलना शुरू कर चुके थे, उससे लगता था कि यह देश की सुरक्षा के लिए, और फौज के माहौल के लिए ठीक बात नहीं है। अब अगर कल के दिन सीबीआई का मुखिया राजनीति में उतर आए, तो वह बहुत सी गोपनीय जानकारियों का राजनीतिक इस्तेमाल कर सकता है। कुछ महीने पहले ही भाजपा में शामिल हुए भूतपूर्व गृहसचिव ने जिस अंदाज में अपने गृहमंत्री रहे हुए कांग्रेसी नेता पर हमले किए, उससे भी सरकार के कामकाज, और उसकी जिम्मेदारियों की साख गिरी थी। 
हो सकता है कि देश के कानून के तहत सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तों में यह फेरबदल करना होगा कि कौन-कौन सी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के कितने बरस तक चुनाव लडऩे पर रोक रहेगी। कुछ लोगों को हमारी यह सलाह अलोकतांत्रिक लग सकती है, और यह लग सकता है कि यह उन अफसरों या जजों के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है, लेकिन हमारा यह मानना है कि नौकरी देते समय ही अगर ऐसी शर्त रख दी जाए, तो फिर लोग यह तय कर सकते हैं कि वे सरकारी नौकरी में जाएं, या राजनीति में जाने का अपना रास्ता खुला रखें। लोकतंत्र को आज जिस गैरजिम्मेदारी के साथ लिया जा रहा है, वह बिल्कुल भी ठीक नहीं है। सिर्फ जीत की संभावना को देखते हुए राजनीति की जा रही है, और उसी वजह से उसमें बेहिसाब समझौते हो रहे हैं। चुनाव सुधार के लिए बहुत मुद्दों पर कानून बनाने की बात हो रही है, और यह मुद्दा उसमें जोड़ा जाना चाहिए कि पार्टी छोडऩे के बाद कितने वक्त तक लोगों को दूसरे निशान से चुनाव लडऩे न मिले। 

राह का रोड़ा बनने के बजाय मील का पत्थर बनें अडवानी

20 मार्च 2014
संपादकीय
दिल्ली में इस वक्त भाजपा के सबसे बुजुर्ग नेता लालकृष्ण अडवानी की टिकट को लेकर हवा में असमंजस तैर रहा है। पार्टी ने उन्हें गुजरात से लडऩे को कहा है, और वे मध्यप्रदेश से लडऩा चाहते हैं। इसके पीछे की राजनीति को समझना एक बात है, लेकिन एक दूसरी बात यह भी है कि जिस तरह वक्त के साथ कुदरत नए पत्ते लाती है, और पुराने पत्तों को जाना होता है, उसी तरह राजनीति में भी होता है, और कभी-कभी यह अधिक तकलीफ की बात भी होती है। 
अब भाजपा की राजनीति को देखें, तो यह जाहिर है कि उसने अपना सब कुछ मोदी के नाम पर दांव पर लगा दिया है। और उतनी ही जाहिर यह बात भी है कि मोदी के अलावा इस पार्टी के पास इस बार चुनाव जितवाने की ताकत रखने वाला इतना बड़ा कोई दूसरा नेता नहीं था। अब यह एक अलग बात हो सकती है कि भाजपा की सीटें कमल छाप पर बढ़ जाएं, और एनडीए के भागीदारों की कुल सीटें कम हो जाएं, क्योंकि या तो भागीदार कम हो सकते हैं, या फिर मोदी की अगुवाई में उन भागीदारों की सीटें कम हो सकती हैं। लेकिन यह एक राजनीतिक अटकल की बात है, और हम इस जगह उस पर अपनी सोच खर्च करना नहीं चाहते। अब ऐसे में जिन लालकृष्ण अडवानी ने मोदी के खिलाफ पार्टी से इस्तीफा तक दे दिया था, उन्हें गुजरात से ही फिर टिकट देने के कई मतलब हैं। वे अपनी जीत के लिए मोदी के मोहताज भी रहेंगे, और पूरे चुनाव के दौरान मोदी की वाहवाही करना उनकी मजबूरी भी रहेगी। दूसरी तरफ वे अगर अपनी पसंद की मध्यप्रदेश की सीट से चुनाव लड़ते हैं, तो मोदी के पार्टी के भीतर के आतंक, उनके दबदबे, और उनके असर से परे रहकर भी मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मदद से वे चुनाव जीत सकते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रधानमंत्री पद के लायक समझी जाने वाली सुषमा स्वराज मध्यप्रदेश से लोकसभा में पहुंचने की कोशिश कर रही है। अब मोदी के लिए यह बात पार्टी के भीतर और जनता के बीच में हेठी की होती कि अडवानी उनका गुजरात छोड़कर शिवराज के मध्यप्रदेश जाते, जो शिवराज सिंह भाजपा और एनडीए के भीतर मोदी के एक विकल्प के रूप में भी गिने जाते हैं।  इस नौबत से मोदी को कुछ ठेस भी लगती, और हो सकता है कि मोदी से परे भी भाजपा के बाकी कुछ नेता इस मौके पर अडवानी और मोदी के बीच मोदी की जीत दर्ज करवाना चाहते हों, और देश के सामने इस बात को रखना चाहते हों। 
आज हकीकत यह है कि नरेन्द्र मोदी के सामने भाजपा के भीतर किसी भी नेता की कोई हस्ती नहीं रह गई है, और पहले पार्टी ने उनको अपने कंधे पर चढ़ाया, और अब पार्टी मानो उनके कंधे पर सवार होकर संसद की तरफ बढ़ रही है। राजनीति में एक वक्त ऐसा आता है जब बुजुर्गियत के मुकाबले जीत की संभावना को भी तौला जाता है। और यह शायद भाजपा के भीतर की एक अधिक पारदर्शी, और अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था है, कि कांग्रेस के मुकाबले, या घरों से चलती हुई दर्जन भर और बड़ी पार्टियों के मुकाबले, इस पार्टी में लीडरशिप को लेकर चर्चा तो होती है। यही वजह है कि अब तक मोदी और अडवानी दोनों की अहमियत पर चर्चा हो रही है, और बैठकें हो रही हैं। 
अब सवाल लालकृष्ण अडवानी का है कि गुजरात से ही टिकट मिलने पर उनको क्या करना चाहिए? हो सकता है कि जब तक हमारी लिखी यह बात छपने के लिए जाए, अडवानी का फैसला, या अडवानी पर फैसला सामने आ सकता है। लेकिन हम ऐसी किसी खबर से परे, यह सोचते हैं कि आज अगर अडवानी को एक टिकट का मोहताज होना पड़ रहा है, तो अब उन्हें अपने बुढ़ापे को खराब करने के बजाय चुनाव नहीं लडऩा चाहिए, और अपनी बची-खुची इज्जत को लेकर घर बैठना चाहिए। ऐसा करने वाले वे पहले नेता नहीं होंगे, न अपनी पार्टी के भीतर, न भारतीय राजनीति में। लेकिन अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, और पार्टी के सामने झुककर, उनके सामने डाली गई गुजरात की सीट को वे मंजूर करते हैं, तो वे एक बड़ी बेइज्जती के ही हकदार माने जाएंगे। एक वक्त आता है जब नई पीढ़ी के लिए, दूसरे नेताओं के लिए, दूसरे गुटों के लिए रास्ता खाली करना पड़ता है। लालकृष्ण अडवानी को अगर राह का रोड़ा माना जा रहा है, या वे सचमुच राह का रोड़ा बन गए हैं, तो उनको अब राह के किनारे मील का पत्थर बनने के लिए हाशिए पर जाकर बस जाना चाहिए। 

विमान लापता होने को लेकर, आने वाले खतरों पर एक चर्चा

19 मार्च 2014
संपादकीय
आज टेक्नालॉजी की मेहरबानी से एक-एक टेलीफोन कॉल और एसएमएस से बड़े-बड़े मुजरिम पकड़ा जाते हैं, और एक डीएनए जांच से ओसामा-बिन-लादेन जैसे आतंकी को ढूंढ लिया जाता है। लेकिन ऐसे में ही सैकड़ों मुसाफिरों वाला एक बड़ा सा हवाई जहाज मानो हवा में घुल गया, या समंदर के पानी में समा गया, या फिर किसी साजिश के तहत वह जाकर कहीं ले जाकर छुपा दिया गया, और धरती से लेकर अंतरिक्ष तक की आधुनिक टेक्नालॉजी को उसकी हवा भी नहीं लगी है। मलेशियाई विमान के इस तरह गायब हो जाने से आज दुनिया में टेक्नालॉजी की सीमा भी समझ आती है, कि विज्ञान हर परेशानी का इलाज पेश नहीं कर सकता, और इंसान को उस पर एक सीमा तक ही भरोसा करना चाहिए। 
एक हवाई जहाज को इतनी तरफ से, इतने देशों के इतने उपकरणों से पता लगाने, नजर रखने, और ढूंढने का पल-पल का इंतजाम है, लेकिन वह कुछ भी काम नहीं आया। इसी तरह जब अमरीका के न्यूयॉर्क में वल्र्ड ट्रेड सेंटर की इमारतों में जाकर मुसाफिर विमान घुस गए, और आतंकी हमले का एक नया इतिहास लिखा, तो दुनिया के सबसे ताकतवर देश की फौजी निगरानी की सारी ताकत धरी रह गई, और आतंकियों ने उस पर इतनी बड़ी शर्मिंदगी भी थोपी। खुद ऐसा बड़ा आतंकी हमला झेलने के बाद भी अमरीका ने दुनिया के बाकी देशों के साथ आतंक के मोर्चे पर साझेदारी से काबू का काम नहीं किया, और मुंबई हमलों के पीछे के एक आतंकी को अपने कब्जे में रखते हुए भी अमरीका ने भारत का साथ नहीं दिया। इसी तरह जिस पाकिस्तान की जमीन से भारत पर लगातार आतंकी हमले होते हैं, उस पाकिस्तान पर आर्थिक रोक लगाने का काम अमरीका ने नहीं किया, यह जरूर किया कि जिन आतंकियों से उसे अमरीका के खिलाफ खतरा दिखता है, उनको उसने पाकिस्तान में घुसकर मारा। 
एक तरफ तो आतंकियों और मुजरिमों को सबसे आधुनिक टेक्नालॉजी आसानी से हासिल है, दूसरा यह कि सरकारों की नाजुक जगहों पर बैठे हुए लोग अपनी धार्मिक या राजनीतिक विचारधारा के चलते कई बार सरकारी जिम्मेदारी से बगावत कर सकते हैं, और कहीं वे इंदिरा को मार सकते हैं, तो कहीं परमाणु रहस्य दूसरे देशों को दे सकते हैं। इसी तरह यह खतरा भी लोगों को लगता है कि लोग सरकार या लोकतंत्र के खिलाफ अपनी सोच के चलते अपनी सरकारी या फौजी ताकत का इस्तेमाल लोकतंत्र के खिलाफ कर सकते हैं। इसीलिए आज मलेशियाई विमान लापता होने की जांच करते हुए यह भी देखा जा रहा है कि क्या इसके पायलट अपनी किसी निजी सोच के चलते इस विमान को कहीं ले गए, या उसे खत्म कर दिया? 
इस बिखरे हुए मुद्दे पर लिखते हुए हम दो अलग-अलग बातों को जोड़कर देखना चाहते हैं, एक तो यह कि टेक्नालॉजी की सीमाएं और संभावनाएं, दूसरी यह कि इंसान की सोच और उसकी हिंसा की संभावनाएं। इन दोनों को मिलाकर अगर देखें, तो दुनिया आगे बढ़ते हुए भी एक ऐसे खतरे की तरफ, खतरे के साथ कदम मिलाते हुए बढ़ रही है, जिसमें तबाही आने पर उसे रोकने का कोई रास्ता मिल जाना जरूरी नहीं होगा। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि आने वाले दिनों में निजी या किसी तबके की सोच के चलते लोगों के भीतर हिंसा तो काबू में रखा जा सकेगा, तो यह भी एक सपने की बात होगी। दुनिया में आर्थिक और धार्मिक टकराव, सामाजिक और राजनीतिक टकराव, ये तो चलते ही रहेंगे, निजी स्तर पर भी इंसान भीतर की हिंसा से लदे हुए भी हो सकते हैं। और हर कहीं, जहां कहीं हथियारों की टेक्नालॉजी की ताकत होगी, तो उसके पीछे उसे इस्तेमाल करने के लिए औजारों की तरह तैनात इंसान भी होंगे। और जब तक इंसानों के भीतर से शिकायत दूर नहीं होगी, तब तक वे सब्जी काटने के लिए बनाए गए चाकू से इंसानी गले भी काटते चलेंगे। 
आज हम यहां जो बात लिख रहे हैं, वह इस पूरे खतरे के किसी इलाज की तरफ नहीं ले जा सकती। लेकिन उस खतरे को कुछ कम करने का एक जरिया यह हो सकता है कि दुनिया में बेइंसाफी घटे, ताकि लोगों के भीतर बेइंसाफी के जवाब में हिंसा न उपजे, या कम उपजे। सिर्फ टेक्नालॉजी की सावधानी कभी भी काफी नहीं हो सकती। लेकिन न्यूयॉर्क पर हुए हमले से लेकर अब तक अगर देखें, तो दुनिया ने कोई सबक लिया हो ऐसा नहीं लगता। हिन्दुस्तान में अलग-अलग वक्त पर हुई हिंसा, और उसके बाद के फैसलों से भी यह नहीं लगता कि भारतीय लोकतंत्र में कोई सबक लिया हो। इस तरह हम एक ऐसे दिन की तरफ बढ़ रहे हैं, जो अधिक खतरनाक टेक्नालॉजी के अधिक खतरों से भरा हुआ हो सकता है। 

खुशियों और हक के रंग बिखेरने न संसद की जरूरत पड़ी, न सुप्रीम कोर्ट की

18 मार्च 2014
संपादकीय

भारत के वृन्दावन को यूं तो हिन्दू धर्म के सबसे रसिक और रंगारंग भगवान कृष्ण के नाम से जाना जाता है। लेकिन मंदिरों और प्रतिमाओं से परे, वृन्दावन की असल जिंदगी की हकीकत सभी रंगों से दूर, सफेद रंग की कैद में रखी गई महिलाओं की है, जो कि पति को खोने के बाद विधवा कहलाते हुए बची जिंदगी जिंदा लाश की तरह विधवाश्रमों में छोड़ दी जाती हैं। उनके लिए बाकी के दिन मौत का इंतजार करने के रहते हैं, न ठीक से पहनना, न ठीक से खाना, न ठीक से रहना। 
पिछले कुछ बरसों में धीरे-धीरे करके वृन्दावन की इन दबी-कुचली महिलाओं की तस्वीरें खबरों में आती रही हैं, और कल जो अच्छी खबर आई, वह यह कि इन महिलाओं को होली में शामिल करने की एक पहल हुई है। देश भर में साफ-सुथरे सार्वजनिक शौचालयों का आंदोलन चलाने वाली सुलभ इंटरनेशनल के मुखिया डॉ. बिन्देश्वरी पाठक ने यह काम किया है, और यह हिन्दुस्तान की हिन्दू संस्कृति की हैवानियत को सुधारने की एक पहल है, और इसमें हर किसी को साथ देना चाहिए। सामाजिक सुधार जो कि हिन्दू समाज में सौ बरस पहले सार्वजनिक रूप से शुरू हुए थे, वे कानून की मदद से महिलाओं को सती होने से तो बचा पाए, लेकिन बालविवाह रोकने और विधवा विवाह शुरू करने जैसे सुधार नहीं हो पाए। वक्त के साथ धीरे-धीरे हालात थोड़े से सुधरे, लेकिन कम उम्र लड़कियों और पति खो बैठी महिलाओं के लिए हिन्दू समाज के दिल में कोई अधिक रहम नहीं जुट पाई। 
एक महिला के पति के गुजर जाने से उसे जिंदा लाश बना देने वाला समाज उस महिला के योगदान को भी नहीं पा सकता, और ऐसी हिंसक और अमानवीय परंपरा को, रस्म-रिवाज को जिंदा रखकर लोग अगली पीढिय़ों तक उसे विरासत में भी छोड़ जाते हैं। हमारा मानना है कि कानून और समाज, इन दोनों ही मोर्चों पर एक बहुत ही आक्रामक तरीके से सुधार की जरूरत है। भारत में महिलाओं के साथ हिंसा सिर्फ बलात्कार में नहीं होती, अजन्मी बेटी को गर्भ में ही मार डालने से लेकर विधवा कही जाने वाली महिला को मरने तक मरे जैसा रखने की कई किस्म की हिंसा भारत में प्रचलन में है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और यह बात सिर्फ हिन्दू धर्म के भीतर हो, ऐसा भी नहीं। जब एक मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके जायज हक दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था, तो एक नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी की ऐतिहासिक बहुमत वाली पार्टी ने संसद के भीतर उस फैसले को पलटने के लिए संविधान को ही बदल दिया था। इसलिए औरत के हक छीनने के लिए वह पार्टी भी अगुवा बन गई थी, जो कि इंदिरा गांधी की पार्टी थी। इसलिए दूसरी बहुत सी पार्टियों से बहुत सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। यही वजह है कि दशकों से महिला आरक्षण की चर्चा ही चल रही है, और संसद के भीतर एक तरफ सोनिया गांधी मुखिया रहती है, तो दूसरी तरफ सुषमा स्वराज, और इसके बाद भी महिलाओं को संसद-विधानसभा आरक्षण नहीं मिल पाता। 
डॉ. बिन्देश्वरी पाठक ने वृन्दावन में सुधार का जो काम शुरू किया है, उससे देश के बहुत से दूसरे लोगों को सबक लेना चाहिए, नसीहत लेनी चाहिए। देश भर में जगह-जगह, अलग-अलग धर्म और जातियों में महिलाएं बेइंसाफी झेलती हैं, यह तस्वीर बदलनी चाहिए। और वृन्दावन में सफेद कपड़ों पर खुशियों और हक के रंग बिखेरने के लिए न संसद की जरूरत पड़ी, न सुप्रीम कोर्ट की। एक सामाजिक पहल से यह सुधार शुरू हुआ है। इसे देश भर में आगे बढ़ाने की जरूरत है। 

केजरीवाल का डिनर-चंदा, एक अच्छी पारदर्शी शुरुआत

16 मार्च 2014
संपादकीय

अरविंद केजरीवाल बीस हजार रूपए प्लेट का डिनर रखकर चुनावी चंदा इक_ा करने का काम किया, तो उनके आलोचकों को एक मौका मिला। यह सवाल खड़ा किया गया कि बीस हजार रूपए देकर उनके साथ खाना खाने की क्षमता कितने लोगों की हो सकती है? उनके जवाब में नागपुर में सड़क पर दस-दस रूपए में खाना खिलाकर एक राजनीतिक जवाब दिया गया। चुनावी चंदा इक_ा करने की इस पुरानी अमरीकी तरकीब से अधिक पारदर्शी चंदा उगाही और कुछ नहीं हो सकती। 
हम किसी भी राजनीतिक दल, या सामाजिक संस्था के लिए इस तरह से पैसा जुटाने को सही मानते हैं, क्योंकि हर देश में लोगों का एक तबका ऐसा होता है जो कि दूसरों के मुकाबले कुछ अधिक चंदा दे सकता है। और भारत जैसे लोकतंत्र में अगर कुछ राजनीतिक दल सैकड़ों करोड़ रूपए चंदा जुटाते हैं, लेकिन सूचना के अधिकार के तहत इसके पीछे के दानदाताओं के नाम जाहिर करने से परहेज करते हैं, तो उसके मुकाबले राजनीतिक दावत रखकर इस तरह खुलकर चंदा लेने का काम अधिक ईमानदार और अधिक बेहतर है। फिर यह भी याद रखने की जरूरत है कि केजरीवाल को इंटरनेट के माध्यम से देश-विदेश से लोगों ने खुद होकर चंदा भेजा, और उन्होंने इसके हिसाब उजागर भी किया है। 
दरअसल भारत में राजनीतिक दल चुनावों के लिए हमेशा से कालेधन पर टिकते आए हैं। चुनाव आयोग की खर्च की सीमा से कई गुना अधिक का खर्च कालेधन से ही होता है, और वामपंथियों को छोड़कर शायद ही कोई ऐसे दल होंगे, जो कि किफायत से और कानूनी सीमा के भीतर चुनाव खर्च करते हों। ऐसे में केजरीवाल की आलोचना करने के बजाय इस बात को समझना चाहिए कि देश की जनता राजनीति से कालेधन का खात्मा भी चाहती है, और एक पारदर्शिता की मांग भी कर रही है। लोग इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि परदे के पीछे जो कारोबारी राजनीतिक दलों को सैकड़ों करोड़ का चंदा देते हैं, वे दरअसल एक पूंजीनिवेश करते हैं, और आने वाली सरकार, या आने वाले विपक्ष, दोनों से अपनी मर्जी के काम करवाने, या अपने किए कामों पर चुप रहने की उम्मीद रखते हैं। सत्ता और विपक्ष की यह मिलीजुली कुश्ती लोग खूब जानते हैं, और कई मौकों पर तो ऐसा होता है कि देश और प्रदेश सरकारें किसी कारोबारी के साथ सौदा करते हुए खुद ही उसे यह सलाह भी दे देती हैं कि उसे विपक्ष को भी सेट कर लेना चाहिए, ताकि बाद में कोई विवाद खड़ा न हो। सत्ता और विपक्ष दोनों पर पूंजीनिवेश करने का कारोबार भारत में इतना जमा हुआ है, कि बड़े चंदे के मोहताज न दिखने वाले केजरीवाल से लोगों को कुछ असुविधा हो रही है। बड़े लोगों को यह लग रहा है कि अगर केजरीवाल की तरह के लोग बढ़ गए, और बड़े चंदे के एवज में बड़े काम करवाने की संभावना कम हो गई, तो यह बात कारोबार के हिन्दुस्तानी तौर-तरीके के खिलाफ हो जाएगी। 
लेकिन हम राजनीति में एक पारदर्शिता की तारीफ करते हैं, और जिन लोगों की क्षमता अधिक राजनीतिक चंदा देने की है, उनसे इसी तरह खुलकर चंदा लेना चाहिए, इससे एक जवाबदेही का जिम्मा पूरा होता है। 

छत्तीसगढ़ विशेष


सुनील कुमार
रायपुर, 16 मार्च (छत्तीसगढ़)। बस्तर से सोनी सोढ़ी के आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार बनने के साथ ही यह आदिवासी सीट एक अलग मायने वाली हो गई है। यहां पर कांग्रेस और भाजपा तो आधी सदी से चुनाव लड़ते आई हैं, लेकिन इस बार हो सकता है कि यह महिला एक नए किस्म का त्रिकोण खड़ा कर सके। 
कुछ लोगों को यह लग सकता है कि आम आदमी पार्टी का तो अस्तित्व ही महानगरों में है, और बस्तर लोकसभा सीट का उस असर से क्या लेना-देना? लेकिन नक्सल आरोपों में गिरफ्तार विचाराधीन कैदी, और फिलहाल जमानत पर रिहा बस्तर की इस आदिवासी महिला सोनी सोढ़ी का मामला शहरी आम आदमी पार्टी से अलग जरूर है, लेकिन वह कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों से भी अलग है, और एक बहुत नए किस्म की चुनौती खड़ी करने की ताकत रखता है। 
वैसे तो आने वाले दो महीनों के भीतर यह तस्वीर साफ हो जाएगी कि बस्तर की इस आदिवासी स्कूल शिक्षिका की वजह से छत्तीसगढ़ में चले आ रहे दो पार्टी वाले राजनीतिक ढांचे में कोई खराश पड़ सकती है, या नहीं, लेकिन जमे-जमाए पथरीले ढांचे में गहरी दरार खड़ी करने की एक संभावना इस महिला की उम्मीदवारी से बनती है। 
लोगों को याद होगा कि पिछले तीन बरसों में इस महिला के बारे में लगातार जो खबरें छपीं, उनके मुताबिक वह या तो नक्सलियों की हिमायती थी, या उस पर लगाए गए आरोप झूठे थे। लेकिन इन दोनों में से चाहे जो नौबत हो, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उसकी जो मेडिकल जांच हुई थी, उनमें पाया गया था कि उसके गुप्तांगों में पत्थर या वैसी दूसरी चीजें डाली गई थीं। उस पर जुल्म हुए थे। 
इस बारे में बीबीसी की एक रिपोर्ट में कुछ बुनियादी बातें इस तरह थीं- '...छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर के एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका, सोनी सोरी को पांच अक्तूबर 2011 को क्राइम ब्रांच और छत्तीसगढ़ पुलिस के संयुक्त अभियान में दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया था। सोनी सोरी के खिलाफ राज्य सरकार ने नक्सल गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया था और उनके खि़लाफ आठ अलग-अलग मुक़दमे दर्ज किए गए थे। इनमें से पांच मामलों में सोनी सोढ़ी को पहले ही निर्दोष कऱार दे दिया गया है। इसके अलावा एक मामला बंद हो चुका है और एक मामले में उन्हें पहले ही ज़मानत मिल चुकी है। 
सात फरवरी 2014 को उसे सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में जमानत दी, जिसमें उस पर कथित तौर पर एस्सार समूह से माओवादियों की तरफ से पैसा लेने का आरोप है। सोनी सोढ़ी का मामला तब चर्चा में आया, जब अक्तूबर 2011 में कोलकाता के एक अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने सर्वोच्च अदालत को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें सोढ़ी के शरीर में कुछ बाहरी चीज़ें पाई गईं, लेकिन यह टीम यह नहीं तय कर पाई कि ये चीज़ें कैसे उनके जननांगों में डाली गईं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को एक खत लिखकर सोनी सोढ़ी के उन आरोपों की जांच की मांग की थी जिनमें उन्होंने हिरासत के दौरान यौन शोषण और हिंसा का आरोप लगाया था। एमनेस्टी के अनुसार 8 और 9 अक्टूबर, 2011 को पुलिस हिरासत में सोनी सोढ़ी को पीटा गया, उनसे यौन हिंसा की गई और बिजली के झटके दिए गए।...Ó
इन तथ्यों के साथ-साथ जब यह देखें कि सोनी सोढ़ी की गिरफ्तारी के वक्त बस्तर के दंतेवाड़ा जिले का एसपी कौन था, तो एक नौजवान आईपीएस अंकित गर्ग का नाम सामने आता है, जो कि शहरी, सवर्ण, शिक्षित, और सरकार की ऊंची सर्विस वाला अफसर था। उस पर इस महिला से ज्यादती करवाने, उसे प्रताडि़त करने के आरोप लगे थे। अंकित गर्ग पर लगे आरोप, और सरकारी जुल्म की शिकार की प्रतीक बनी सोनी सोढ़ी का यह मामला ग्रामीण-गरीब-कमजोर-आदिवासी और शहरी-संपन्न-ताकतवर-सवर्ण के बीच के वर्गभेद का एक प्रतीक भी बन सकता है। यह बात पढऩे में कुछ अधिक कठिन लग सकती है, लेकिन भारत में बहुत से इलाकों में मतदाताओं ने ऐसी जटिल सामाजिक स्थितियों पर अपनी बहुत साफ-साफ राय चुनावों में सामने रखी हैं। 
अभी अदालतों में सोनी सोढ़ी पर प्रताडऩा और ज्यादती किए जाने के आरोप साबित होने बाकी हैं, लेकिन हमारा यह मानना है कि मतदाता अदालती फैसलों के बाद अपना रूख दिखाने के लिए नहीं जाने जाते, वे जनधारणा के आधार पर भी अपना रूख दिखाते हैं। आपातकाल के बाद शाह जांच आयोग की रिपोर्ट आने में तो बरसों लग गए थे, लेकिन 1977 में टीवी और मीडिया से दूर बस्तर के मतदाताओं ने आजाद हिन्दुस्तान की इतिहास में पहली बार नेहरू की बेटी को खारिज कर दिया था। पूरे के पूरे बस्तर में कांग्रेस को हरा दिया था। इसलिए बस्तर के आदिवासी मतदाताओं को शहरी प्रचार से दूर रहने की वजह से कम जागरूक या कम समझदार मानना परले दर्जे की बेवकूफी होगी। उसका फैसला शहरी लोगों के फैसलों के मुकाबले अधिक सही और तर्कसंगत होता है। 
इस बार यह एक असल खतरा कांग्रेस और भाजपा दोनों के ऊपर एक साथ खड़ा हो सकता है कि इन दोनों से नाराज लोगों के सामने सोनी सोढ़ी की शक्ल में एक ऐसी महिला, एक ऐसी आदिवासी महिला, एक ऐसी आम महिला का विकल्प मौजूद है, जो कि बस्तर के प्रताडि़त आदिवासियों का प्रतीक भी है। 
कल बस्तर में आम आदमी पार्टी की एक भीड़ भरी सभा में सोनी सोढ़ी ने यह कहा है- गांधीजी के आदर्शों पर चलकर बस्तर का माहौल बदलूंगी। यहां कलम की जगह बंदूक थमाई जा रही है, बस्तर के महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है, बस्तर के महिलाओं को अत्याचार के खिलाफ लडऩा होगा।
लोगों को यह याद रखना चाहिए कि नक्सली और गांधीवादी दो बिल्कुल अलग-अलग विचारधाराओं के तो हैं, लेकिन आज नक्सलियों के उठाए गए बहुत से मुद्दों के साथ देश के गांधीवादी भी खड़े हुए हैं। वे हिंसा के तो खिलाफ हैं, लेकिन वे नक्सलियों के कई मुद्दों के साथ हैं। सोनी सोढ़ी में गांधीवादियों से लेकर नक्सलियों तक को, ऐसे आदिवासी मुद्दों को संसद में उठाने की एक संभावना दिख सकती है। 
अब बस्तर लोकसभा सीट की आज की तस्वीर देखें तो कांग्रेस ने वहां पर सलवा-जुड़ूम के सबसे बड़े नेता, और नक्सलियों से मोर्चा लेने वाले, उसी अभियान के दौरान जान गंवाने वाले महेन्द्र कर्मा के बेटे को उम्मीदवार बनाया है। आदिवासी मतदाताओं के सामने यह बात साफ रहेगी कि दीपक कर्मा किस तबके के प्रतिनिधि हैं, उनकी सोच क्या है, और उनको कांग्रेस उम्मीदवारी मिलने की वजह क्या है। इस तरह वे बस्तर लोकसभा सीट के वोटरों और उस सीट पर खासी पकड़ रखने वाले नक्सलियों, दोनों के सामने एक खुली किताब की तरह हैं, कि सलवा-जुड़ूम की विरासत पर इस लोकसभा चुनाव में मतदाता और नक्सलियों की क्या सोच रहेगी। 
दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में पिछले दस बरसों से सरकार चला रही भाजपा के उम्मीदवार दिनेश कश्यप हैं, जो कि अपने पिता बलीराम कश्यप के गुजरने के बाद उनके राजनीतिक वारिस के रूप में बस्तर सीट से सांसद बने, और अब फिर वहीं से भाजपा उम्मीदवार हैं। दिनेश कश्यप के छोटे भाई केदार कश्यप दस बरसों से राज्य में मंत्री हैं, और इस तरह उनका परिवार भाजपा और छत्तीसगढ़ सरकार, इन दोनों का प्रतिनिधि है, और यह मिलाजुला तथ्य बस्तर सीट के मतदाताओं, और नक्सलियों, दोनों के सामने है। 
इस बार जो तीसरी उम्मीदवार सामने आई है, वह बस्तर की एक आम आदिवासी की प्रतीक है, आदिवासी महिला की प्रतीक है, और उसने अदालतों में हलफनामे पर जो बयान दिए हैं, उनके मुताबिक वह राज्य सरकार की पुलिस की जुल्म की एक शिकार रही है, और उस नाते वह नक्सल प्रभावित बस्तर के ऐसे आदिवासियों की प्रतिनिधि, और प्रतीक भी है, जो कि वहां पर मौजूद दोनों तरफ की बंदूकों के साये में अपनी जिंदगी और जीने के तौर-तरीकों को खो बैठे हैं। 
आप पार्टी तो किसी को खबरों में ला सकती हैं, लेकिन सोनी सोढ़ी का मामला आप से ऊपर है, और बस्तर में पहली बार यह महिला एक ऐसा प्रतीक बनकर उभर सकती है, जो कि सलवा-जुड़ूम जैसे आक्रामक नक्सल-विरोधी अभियान के खिलाफ खड़ी हुई भी है, और दस बरसों में जिन ज्यादतियों की आरोपी राज्य की भाजपा सरकार है, उसके खिलाफ भी एक प्रतीक के रूप में अदना सी दिखती यह आम औरत तस्वीर बदल देने की संभावना रखती है। तीसरी बात यह कि बस्तर में लगातार सत्तारूढ़ जिस परिवार के दबदबे और कब्जे को कांग्रेस पार्टी तोड़ नहीं पाई है, उस कश्यप परिवार के खिलाफ भी मतदाताओं को एक मौका देने की संभावना सोनी सोढ़ी रखती हैं। 
अब देखना यह है कि लोकसभा चुनाव में बस्तर संसदीय सीट की इस उम्मीदवार में वहां के मतदाता ये संभावनाएं टटोलते हैं या नहीं, और पहली बार उन्हें सलवा-जुड़़ूम के दो भागीदारों, कांग्रेस और छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ वोट देने का जो एक मौका मिला है, उस मौके को वे इस नजर से देखते हैं या नहीं। 
टुकड़ा-टुकड़ा जो कुछ बातें यहां पर दिखती हैं, उनमें से एक यह है कि नक्सल अपने दबदबे का इस्तेमाल मतदाताओं पर सोनी सोढ़ी के लिए कर सकते हैं, चाहे वह खुद नक्सलियों की हिमायती हों, या पुलिस के किसी फर्जी केस की शिकार हों। दोनों ही नौबतों में कांग्रेस और भाजपा के मुकाबले नक्सली इस महिला का साथ दे सकते हैं। 
दूसरी बात जो यहां पर लगती है, वह है देश भर के आदिवासी-समर्थकों, महिला समर्थकों, मानवाधिकारवादियों, और मीडिया के एक खासे बड़े तबके की हमदर्दी की। इन तबकों के बहुत से लोग इस महिला को देश-विदेश में एक चर्चित प्रतीक के रूप में खड़ा कर सकते हैं, और उसके मामूली से दिखते कद से कई गुना बड़ा कर सकते हैं। बस्तर की इस सीट पर बहुत मामूली लगती इस महिला की संभावना अगर आसमान तक पहुंचे, तो भी हमें हैरानी नहीं होगी। 
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में अविभाजित मध्यप्रदेश की जिस एक सीट पर पूरी दुनिया के मीडिया की निगाह थी, वह थी सेंसरशिप के खलनायक विद्याचरण शुक्ल की महासमुंद सीट की। देश-विदेश के आला अखबारनवीस आते थे और सिर्फ महासमुंद का दौरा करके लौट जाते थे। आज इंटरनेट और आंदोलनकारियों की वजह से सोनी सोढ़ी की सीट उसी तरह की चर्चित सीट हो सकती है। इस तरह उसे उतना चुनावी खर्च भी जुट सकता है जितना कि चुनाव आयोग ने बढ़ाकर अभी कर दिया है। और इसके साथ-साथ उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी जुट सकता है। आपातकाल के बाद के दिनों से आज एक फर्क यह भी हो गया है कि अब बस्तर में भी गांव-गांव तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पहुंच गया है, और उसके लिए सोनी सोढ़ी का दर्जा एक स्टार-उम्मीदवार का रहेगा। ऐसे में अगर सचमुच यह महिला इतनी खबरों में आ जाती हैं, तो नक्सल और पुलिस बंदूकों से लहूलुहान आदिवासियों को वह संसद में अपनी आवाज बनाने के लायक लग सकती है। 
छत्तीसगढ़ की ग्यारह लोकसभा सीटों में से यह एक सीट सबसे अधिक दिलचस्प चुनाव वाली हो सकती है, सबसे अधिक दिलचस्प त्रिकोण, और सबसे अधिक हैरान करने वाले नतीजे की संभावना वाली सीट भी यह हो सकती है। 


माल्या, सहारा और रेनबैक्सी पर काबू कैसे होगा?

15 मार्च 2014
संपादकीय

भारत की सबसे बड़ी दवा कंपनियों में से एक, रेनबैक्सी को लेकर अमरीका से बार-बार खबरें आती हैं कि किस तरह उसकी दवाईयां वहां पर प्रतिबंधित हो रही हैं। यह भी पता लगता है कि उसकी कितनी बड़ी खेप वहां से भारत लौटी है। अब यह खबर आ रही है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने इस कंपनी को मिलावटी दवा बनाने के लिए दायर की गई एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है। इसके बाद इस कंपनी के शेयर बाजार में गिर गए हैं। पिछले कुछ हफ्तों में हमने एक से अधिक बार सहारा के बारे में लिखा है कि किस तरह वह कंपनी सेबी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को अनसुना करते हुए अपनी मनमानी कर रही थी, और है। इसके बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट लगातार सुब्रत राय सहारा को जेल भेजने की चेतावनी दे रहा था, और भेज चुका भी है। इसी तरह एक दूसरे बड़े कारोबारी विजय माल्या को लेकर ये खबरें पिछले एक-दो बरस से बनी हुई हैं कि किस तरह यह शराब कारोबारी अपनी एयरलाइंस को दीवालिया बनाकर उसके हजारों कर्मचारियों को बिना तनख्वाह दिए, अब कहीं क्रिकेट टीम खरीदता है, तो कहीं करोड़ों में रेस का घोड़ा खरीदता है।
अब वक्त आ गया है कि भारत में पैसों की ताकत रखने वाले लोगों के जुर्म पर एक अलग दर्जे की सजा का इंतजाम करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ ही दिनों  पहले सांसदों और विधायकों के बारे में नीचे की अदालतों को कहा है कि उनके मामले एक बरस में निपटा लिए जाएं। ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों के बारे में हमारी ऐसी सलाह बरसों से चली आ रही थी, और अब उस पर सुप्रीम कोर्ट ने वही रूख अपनाया है। इसी तरह हमने एक सीमा से अधिक के दौलतमंद लोगों के बारे में भी अलग अदालत और अलग सजा की बात कही थी, और उसी को हम आज यहां दुहराना चाहते हैं। भारत एक इतना भ्रष्ट लोकतंत्र हो गया है कि यहां जुर्म से लेकर सजा के बीच का सफर बड़ी आलीशान गाडिय़ों में तय करने वाले लोग रास्ते में और लोगों को कुचलते हुए चल सकते हैं, और उससे उनको रोकने की कोई ताकत इस लोकतंत्र के पास नहीं है। संविधान को अपने पांवपोंछने की तरह इस्तेमाल करते हुए ताकतवर लोग कभी अंबानी की शक्ल में दिखते हैं, तो कभी खरबपतियों की दलाल नीरा राडिया की शक्ल में। ऐसे में देश में जब तक अलग कानून नहीं बनेगा, तब तक दूध में दो लीटर पानी मिलाने वाले छोटे से मुजरिम के साथ भीड़ भरी अदालत में ताकतवर लोगों के मुकदमे उनकी मर्जी से ही आगे बढ़ पाएंगे, या वहीं थमे रह जाएंगे।
अब यह बार-बार साबित हो चुका है कि कारोबार का ऐसा ताकतवर तबका संसद में अपने लोगों को बिठाता है, अपनी मर्जी के सवाल उठवाता है, मर्जी की सरकारी नीतियां बनवाता है, मर्जी से देश की जमीन और खदान, पानी और आसमान सब पर कब्जा करता है, गैस से लेकर दूसरी चीजों तक अपनी मर्जी के रेट तय करता है, और कुल मिलाकर सरकार को अपने एक मुनीम की तरह इस्तेमाल करता है। यह तो थोड़ी बहुत ताकत, और थोड़ी बहुत ईमानदारी अब अदालतों में कुछ स्तरों पर दिखती है, जिसकी वजह से लोगों का भरोसा अब तक लोकतंत्र पर थोड़ा सा बचा हुआ है। यह नौबत बदली जानी चाहिए, और ताकतवर लोगों को महंगे-महंगे वकीलों की मदद से अदालती रियायत पाने का सिलसिला भी खत्म किया जाना चाहिए। अलग अदालत और अलग सजा के इंतजाम के बिना यह नहीं हो पाएगा। 

अरविंद केजरीवाल रात-दिन अपनी ही कब्र खोद रहे हैं..

14 मार्च 2014
संपादकीय
कुछ महीने पहले भी हमने अरविंद केजरीवाल की नाजायज बयानबाजी को लेकर, और उनके बेसिर-पैर के तौर-तरीकों को लेकर कई बार यहां पर लिखा था, और लिखते-लिखते हम खुद ही थक गए थे, क्योंकि उनके अलोकतांत्रिक बयान और वैसे ही रूख की खबरें रोजाना आती थीं। अभी फिर वे उसी तरह की हरकतों पर उतरे हुए हैं, और भारत के चुनावी लोकतंत्र उनसे जो संभावनाएं बंधी थीं, ये सारी की सारी खत्म होते दिख रही हैं। ऐसा लगता है कि सामने कुछ श्रोता, कुछ कैमरे, और कुछ माईक देखते ही वे आपा खो दे रहे हैं, और उटपटांग बातें करने लगे हैं। 
कल टीवी की खबरों में उन्हीं की आवाज में, उन्हीं की रिकॉर्डिंग जो हमको सुनने मिली, उसके मुताबिक उन्होंने देश के मीडिया को बिका हुआ कहा, और कहा कि यह बहुत बड़ी साजिश है, उनकी सरकार बनती है तो इसकी जांच होगी। मीडिया वालों के साथ सभी दोषियों को जेल भेजेंगे। केजरीवाल ने कहा कि पिछले एक साल में आपलोगों के दिमाग में मोदी...मोदी....मोदी भर दिया गया है। कुछ चैनल वाले कह रहे हैं कि करप्शन खत्म हो गया है। राम राज्य आ गया है। गुजरात में ये हुआ...वो हुआ। जानते हैं क्यों? पैसे दिए गए हैं। टीवी चैनलों को मोदी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए पैसे मिले हैं। पिछले 10 साल में गुजरात में 800 किसानों ने आत्महत्या कर ली। ये कोई नहीं बताएगा। अडाणी को एक रुपये में जमीन दे दी गई। ये किसी चैनल ने नहीं दिखाया। अरविंद ने सिक्योरिटी ले ली है। उसने सिक्योरिटी नहीं ली है। जेड सिक्योरिटी ले ली... वाई सिक्योरिटी ले ली। अरे, भाड़ में गई तेरी सिक्योरिटी। मोदी के बारे में कोई सच नहीं बताएंगे।
दरअसल पहले दिन से ही अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों का यह रूख रहा है कि भारतीय लोकतंत्र में वे ही अकेले ईमानदार हैं, और बाकी तमाम लोग बेईमान हैं। बाकी लोगों में भी उन्होंने सारी-सारी पार्टियों को, सभी बड़े नेताओं को, और पूरे के पूरे मीडिया को भ्रष्ट, बेईमान, और बिका हुआ कहना जारी रखा। यह सिलसिला वे लोकसभा चुनाव तक जारी रखेंगे, और यही उनके लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। देश की जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि हर तबके में कुछ अच्छे लोग हैं, और कुछ खराब लोग हैं, यही हाल मीडिया का भी है। आज जो अरविंद केजरीवाल पूरे देश के मीडिया पर एकमुश्त तोहमत लगा रहे हैं, वे इस बात को भूल रहे हैं कि उनको खुद को देश की बाकी राजनीति मीडिया की उपज कहती है। लोग यह मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल को जीरो से हीरो बनाने का काम मीडिया ने ही किया था। और उसी मीडिया की पीठ पर मुफ्त की सवारी करते हुए वे दिल्ली के मुख्यमंत्री के दफ्तर तक पहुंचे थे, यह एक अलग बात है कि उनकी राजनीति और उनका मिजाज किसी काम को करने में भरोसा नहीं रखते, किसी भी काम का विरोध करने में भरोसा रखते हैं। 
हम इस बात से इंकार नहीं करते कि मीडिया का कुछ हिस्सा बेईमान हो सकता है, होगा, और बड़े नेताओं, बड़ी पार्टियों के असर में आकर खबरों में ऊंच-नीच करता होगा, लेकिन इससे परे भी ईमानदार हिस्से की मीडिया में कोई कमी नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि संसद में भी ईमानदार हैं, जजों में भी ईमानदार हैं, और अपनी खुद की नौकरी वाले जिस आयकर विभाग को केजरीवाल बार-बार भ्रष्ट साबित करते हैं, उस आयकर विभाग में भी ईमानदार लोग रहते हैं, हैं। हमारी केजरीवाल के साथ आपत्ति यही है कि वे बिना किसी बुनियाद के, बिना किसी सुबूत के, किसी को भी संदेह का लाभ दिए बिना, पूरे-पूरे तबके को एकमुश्त बेईमान करार देते हैं, और अपने आपको, अपनी पार्टी और अपने साथियों को ईमानदारी का अकेला ठेकेदार बताते हैं। उनकी सारी बातें लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत न्याय पाने के हक से दूर रखने वाली रहती हैं, और वे मानों नक्सलियों की तरह सड़क पर अपनी मर्जी का फैसला करके, अपने शक के आधार पर किसी का भी गला रेतने में लगे रहते हैं। यह लोकतांत्रिक तरीका नहीं है, और केजरीवाल रात-दिन अपने इन तौर-तरीकों से अपनी ही कब्र खोद रहे हैं। 

Bat ke bat, बात की बात,

13 march 2014

तेज रफ्तार जिंदगी के खतरे बांधने वाली खबरों से लेकर दौड़कर आने वाले खाने तक

संपादकीय
13 मार्च 2014

छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मोर्चे पर 15 लोगों की शहादत के बाद जब देश के टीवी चैनलों पर इस खबर को बहुत कम जगह देकर नेताओं की बकवास को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा था तो इंटरनेट पर बहुत से अखबारनवीसों सहित दूसरे लोगों ने इसके बारे में लिखा, इसकी आलोचना की, और पूछा कि देश के लिए जान देने वाले लोगों के साथ मीडिया का यह कैसा बर्ताव है? 
बात सिर्फ टीवी चैनलों की नहीं है, अखबारों की भी है, और दर्शकों-पाठकों को यह समझने की जरूरत है कि जिंदगी के असल मुद्दों को छोड़कर गैरजरूरी बातों को खबर बनाकर दिखाने और छापने वाले मीडिया के लिए उनका क्या रूख रहता है? वैसे तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद अब खबरों और मनोरंजन के बीच का फासला खत्म कर दिया गया है, और टीवी समाचार बुलेटिन बहुत कम खबरों के साथ लोगों का बहुत सारा वक्त, उनका बहुत सारा ध्यान खा जाते हैं। ऐसे में बाजार के इश्तहार भी ऐसे ही चैनलों को, या ऐसे ही प्रिंट मीडिया को अधिक मिलते हैं जो तकलीफदेह असल मुद्दों के बजाय, सतही, चटपटे, और सनसनीखेज मुद्दों को अधिक उठाते हैं। इसलिए आज दर्शक-पाठक से लेकर विज्ञापनदाता तक, और मीडिया में फैसले लेने वाले लोगों तक, कड़वे मुद्दों को कम उठाने, सुनने-देखने, या पढऩे का चलन बढ़ गया है। ऐसे में भारत के लोगों की सामाजिक समझ कम होने लगी हैं, उनकी जिम्मेदारी गायब होने लगी है, और राजनीतिक चुनाव भी मुद्दों से परे, सोच से दूर, व्यक्तियों पर केन्द्रित होने लगे हैं। 
इस चर्चा से हमको बहुत अधिक असर की उम्मीद नहीं है। लोगों का स्वाद इतना बिगड़ चुका है कि उनके दिल-दिमाग के लिए सेहतमंद चीजों को परोसने का काम मीडिया के कारोबार के लिए घाटे का हो चुका है। और यह सिलसिला बढ़ते भी चल रहा है। लोगों की पसंद को बिगाड़ो, और फिर उन्हें बिगड़ी पसंद के मनमाफिक और परोसो, और फिर यह सिलसिला चलते चले जा रहा है। लेकिन बात सिर्फ मीडिया की क्यों की जाए? यह गिरावट समाज के बाकी तबकों में भी आई है, और लोगों की जिंदगी से बहुत से दायरों में जिम्मेदारी घटती चली गई है, और कहीं पर लुभावनी, कहीं पर भ्रष्ट, और कहीं पर तात्कालिक फायदे की जिंदगी लोग अपनाते जा रहे हैं। लोग रोज की कसरत के बजाय जिंदगी के आखिर में जाकर जिस तरह वजन कम कराने की सर्जरी करवा रहे हैं, दवाइयों के सहारे सेहत को ठीक रख रहे हैं, दिल का ऑपरेशन करवा रहे हैं, लेकिन जिंदगी के ढर्रे को सेहतमंद नहीं बना रहे। उसी तरह का रवैया जिंदगी के बाकी पहलुओं के लिए भी हो गया है। 
लोग एक वक्त चूल्हे पर धीरे-धीरे पका हुआ खाना बेहतर समझते थे, अब तेज रफ्तार से पका हुआ, अधिक नुकसान करने वाला फास्टफूड, तेज रफ्तार से मोटरसाइकिल पर चलकर आधे घंटे के भीतर घर पर पहुंच जाता है, और ऐसे खाने और ऐसी रफ्तार के नुकसान से निपटने के लिए जिंदगी के आखिर में जाकर बड़ी-बड़ी अस्पतालों का सहारा भी है। ऐसा ही हाल तेज रफ्तार खबरों का हो गया है, उन खबरों में लोगों का ध्यान खींचने, और उन्हें बांधे रखने की बेबसी, जिंदगी के असल मुद्दों को उसी तरह धकेलकर दूर कर दे रही है, जिस तरह सेहतमंद सब्जियों को दूर करके बाजार से आया हुआ फास्टफूड काबिज हो गया है। 

शिंदेजी, अपने नागरिकों से बदला नहीं लिया जाता, चाहे वे नक्सली क्यों न हों...

12 मार्च 2014
संपादकीय
बस्तर में कल के नक्सल हमले के बाद आज छत्तीसगढ़ पहुंचे केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने शायद अपनी आदतन लापरवाही से एक बात कही, जो कि उनको सार्वजनिक या संवैधानिक रूप से भारी भी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि जवानों की शहादत का नक्सलियों से बदला लिया जाएगा। हम उनकी इस एक लाईन पर यह पूरी जगह खराब करना नहीं चाहते, लेकिन नक्सल हमले के इस पहलू से हम आज की बात शुरू करना जरूर चाहते हैं। सुशील कुमार शिंदे हिन्दी अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन लोग भी उन्हें लापरवाह बातों के लिए उतनी ही अच्छी तरह जानते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कुचल देने की धमकी दी थी, लेकिन बाद में बात बढ़ जाने पर उन्होंने उसे सोशल मीडिया के बारे में कही गई बात बताकर पीछा छुड़ाया था। अब वे नक्सलियों से बदला लेने की बात कैमरों पर कह गए हैं।
ऐसी हिंसा करने वाले नक्सलियों से किसी तरह की हमदर्दी, या उनके साथ किसी रियायत की हमारी नीयत नहीं है, लेकिन लोकतंत्र में हर बात की एक सीमा होती है, किसी के जुर्म पर उसे सजा देने की भी एक सीमा होती है। और भारतीय लोकतंत्र सरकार को अपने किसी नागरिक से बदला लेने की इजाजत नहीं देता, चाहे वे किसी धर्म के नाम पर आतंकी हिंसा करने वाले लोग हों, चाहे वे नक्सलियों जैसे हथियारबंद आंदोलनकारी हों, चाहे वे प्रधानमंत्री के हत्यारे ही क्यों न हों। लोकतंत्र बदले की भावना पर काम नहीं करता। नक्सली जितने भी बुरे हों, वे हिन्दुस्तानी हैं, हिन्दुस्तान की जमीन पर हिंसा कर रहे हैं, और हिन्दुस्तानी कानून उनसे निपटने की ताकत रख सकता है, अगर सरकार की यह ताकत हो कि उन्हें पकड़कर अदालत तक पहुंचाए। गृहमंत्री शिंदे की बात से हम खुद एक यह मतलब निकालते हैं कि नक्सलियों के खिलाफ पुलिस और सुरक्षा बलों की कड़ी कार्रवाई हो। लेकिन ऐसी कड़ी कार्रवाई ही लोकतांत्रिक सरकार बदले की भावना से नहीं कर सकती। अगर बदला भुनाने के लिए बंदूकों की कार्रवाई करनी है, तो ऐसी कार्रवाई नक्सली करते ही रहते हैं, वैसे में सरकार और नक्सलियों के बीच, लोकतांत्रिक ताकतों, संवैधानिक संस्थाओं, और लोकतंत्र उखाड़ फेंकने के लिए लगे हुए हथियारबंद लोगों के बीच फर्क ही क्या रह जाएगा? इसलिए हम केन्द्रीय गृहमंत्री की ऐसी सोच, ऐसी भाषा, और ऐसे बयान पूरी तरह अलोकतांत्रिक पाते हैं, और उनको अपना यह बयान वापिस लेना चाहिए। इस वक्त जब हम यह बात लिख रहे हैं, उस वक्त हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार के भीतर कुछ लोग इस बात का नोटिस ले भी चुके हों। 
अब हम इसी हमले से जुड़े हुए एक दूसरे पहलू पर बात करना चाहते हैं जिसे लेकर दिल्ली से लेकर रायपुर तक बहुत सी खबरें और बहसें हवा में तैर रही है। इनमें यह है कि केन्द्र सरकार से छत्तीसगढ़ सरकार को नक्सल खतरे, और हमले को लेकर ऐसी खुफिया जानकारी भेजी गई थी, और उस पर राज्य कार्रवाई कर पाया या नहीं। दूसरी बहस यह छिड़ी है कि छत्तीसगढ़ के खुफिया विभाग ने बस्तर के इन जिलों को समय रहते खुफिया जानकारी भेजी या नहीं। दोनों ही सरकारों की अपनी मशीनरी को सुधारने के लिए तो यह जांच जरूरी है कि अगर कोई चूक हुई है, तो वह कहां पर हुई है। लेकिन ऐसे किसी नतीजे के सामने आने के पहले आज जिस तरह की बहस चल रही है, उससे ऐसा लगता है कि पुलिस या खुफिया तंत्र नक्सल खतरे को लेकर लापरवाह थे। बहस में शामिल लोगों को हम याद दिलाना चाहेंगे कि नक्सल मोर्चे पर जिनकी जिंदगियां दांव पर लगी होती हैं, उनसे लापरवाह होने की उम्मीद रखना गलत होता है। आखिरकार उनकी लापरवाही से सबसे पहले उनकी खुद की जिंदगी जाती है, इसलिए वे लोग वैसे मुश्किल हालात में किस तरह काम करते हैं, किस तरह पहले अपनी जान बचाते हैं, फिर दूसरों की जान बचाते हैं, इसको वे ही लोग जानते हैं। और आज छत्तीसगढ़ पुलिस की जो खुफिया जानकारी मौजूद है, वह बताती है कि राज्य  बस्तर के नक्सल खतरे के किसी भी पहलू को लेकर लापरवाह नहीं था। इसी तरह हम यह भी मानते हैं कि जिन लोगों की जिंदगी उस जंगल-जमीन पर धमाकों के बीच चल रही थी, वे लोग भी अपनी क्षमता की हद तक तो लापरवाह नहीं रहे होंगे। इसलिए ऐसे हर मौके पर लापरवाही और जिम्मेदारी तय करने की हड़बड़ी मीडिया और नेताओं को, बयानबाजों को नहीं करनी चाहिए। आने वाली जांच सारी बातों को सामने रखेगी, और शहादत के मौके पर, एक मुश्किल लड़ाई के मौके पर सनसनीखेज खबर बनाने के लिए, चुनावी राजनीति का हिसाब तय करने के लिए अटकलबाजी से खड़े किए गए आरोप ठीक नहीं हैं। उन लोगों के बारे में सोचना चाहिए जो अपनी जिंदगी खोकर आज तक मीडिया और राजनीति को धमाकों से दूर रखे हुए हैं, और जिंदा रखे हुए हैं। 

नक्सल मोर्चे पर शहादत, जनता को भी शहीद परिवारों के काम आना चाहिए

11  मार्च 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के बस्तर में आज फिर नक्सल मोर्चे पर सीआरपीएफ के 20 जवानों की शहादत की खबर है। अभी जानकारी आती ही जा रही है, इसलिए गिनती कम या ज्यादह हो सकती है, लेकिन यह एक बड़ी वारदात है, और इसके जख्म पूरे देश में फैलेंगे, क्योंकि सीआरपीएफ जैसे केन्द्रीय सुरक्षा बलों में लोग देश भर से आते हैं। बस्तर में इसके पहले भी इससे अधिक संख्या में लोग शहीद हुए हैं, जिनमें राज्य की पुलिस के लोग भी रहते आए हैं, और देश भर से यहां पर आकर बहुत मुश्किल और खतरनाक, जानलेवा ड्यूटी करने वाले केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारी भी। 
नक्सल मोर्चे पर किस तरह की चूक से, या किस तरह की नाकामयाबी से इतना नुकसान हुआ है, यह तो आगे चलकर पता लगेगा, लेकिन हम इस मौके पर इस मामले से जुड़े हुए एक ऐसे पहलू की तरफ बात ले जाना चाहते हैं, जिस पर कोई चर्चा नहीं होती। छत्तीसगढ़ में आज अगर शहरों में लोग चैन की नींद सोते हैं, तो वह इसलिए कि प्रदेश भर में नक्सल मोर्चों पर वर्दीधारी जवान जान हथेली पर रखकर रात भर जागते हैं, विस्फोटकों के बीच, बमों के बीच, बरसों गुजारते हैं। और छत्तीसगढ़ की ही बात नहीं है, देश के बाकी हिस्सों में भी जहां लोग चैन से जी पा रहे हैं, तो इसलिए कि उस चैन के लिए कुछ दूसरे सुरक्षा कर्मचारी देश की सरहद से लेकर घरेलू मोर्चों तक पर जान देते हैं। ऐसे शहादत पर केन्द्र और राज्य सरकारों की तरफ से एक मुआवजे का इंतजाम तो है, लेकिन क्या देश-प्रदेश की जनता का और समाज का भी कोई ऐसा जिम्मा बनता है, जिसे पूरा करने से लोगों के बीच देश की हालत के बारे में एक फिक्र और सोच भी पैदा होगी? 
हमारा ख्याल है कि जब कभी छत्तीसगढ़ के किसी मोर्चे पर इस तरह से राज्य या केन्द्र के जवान शहीद होते हैं, तो यहां की जनता को भी उनके परिवारों की मदद करने के लिए आगे आना चाहिए। सरकार तो अपनी नियमों के तहत जो करना है, वह करती है, और लोग यह भी कह सकते हैं कि सरकार भी जो मुआवाजा देती है वह जनता के पैसों से ही जाता है, लेकिन हम सरकारी मुआवजे से परे जनता की सीधी भागीदारी से ऐसे परिवार की मदद की एक पूरी तरह से सामाजिक पहल सुझाते हैं, जिससे कि शहीदों के परिवारों को यह भी लगे कि जिस प्रदेश की जनता के लिए उनके घर के कमाऊ व्यक्ति ने अपनी जान दी, उस शहादत का सम्मान करने के लिए प्रदेश की जनता ने भी एक पहल की। कहने के लिए तो देश और प्रदेश की हर बात के लिए सरकारें जिम्मेदार होती हैं, लेकिन समाज सेवा के काम तो जनता के बीच से ही होते हैं। 
आज हमारा अनुभव यह है कि छत्तीसगढ़ जैसे नक्सल वारदातों से अक्सर लहूलुहान होने वाले राज्य में भी शहरी जनता के बीच ऐसी शहादत, और बेकसूर आदिवासियों के मारे जाने को लेकर कोई फिक्र नहीं है, उन्हें खबरों के आंकड़ों से अधिक कोई परवाह नहीं है। ऐसे में जनता के बीच एक सामाजिक जिम्मेदारी पनपाने के लिए भी ऐसी एक पहल जरूरी है, जो कि साल-दो साल में प्रदेश की राजधानी में मोमबत्तियां जलाकर की जाने वाली श्रद्धांजलि सभा से अधिक जिम्मेदारी की बात शुरू करे। दुनिया में बहुत से ऐसे देश और समाज हैं जहां पर लोग दूसरों के दर्द के साथ महज हमदर्द नहीं होते, हमकदम, और मददगार भी होते हैं। छत्तीसगढ़ की जनता को संवेदनशील बनाने के लिए जनता के बीच ही भरोसेमंद और साखदार लोगों को सरकार और राजनीति से परे रहकर यह काम करना चाहिए और हमारा यह भी सोचना है कि सीधे स्कूल और कॉलेज के बच्चों के बीच से ऐसी पहल करनी चाहिए। देश भर में जहां से भी आए हुए जवान यहां शहीद होते हैं, उनके परिवारों तक पहुंचकर इस राज्य की जनता के कुछ लोगों को सीधे उनके काम आना चाहिए। यह बात सिर्फ नक्सल मोर्चे पर शहादत की नहीं है, जुबानी हमदर्दी से अधिक जब लोगों को असल जिम्मेदार बनाया जाएगा, तो वह जिम्मेदारी देश-प्रदेश और दुनिया की हर जरूरत के वक्त उठकर खड़ी होगी।

बात की बात

11 March, 2014

सांसदों-विधायकों के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने वह आदेश दिया जो हम बरसों से मांग रहे थे...

10 मार्च 2014
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों एवं विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई पूरी करने के लिए निचली अदालतों पर एक वर्ष की समय सीमा तय की है, और कहा कि अगर निचली अदालत आरोप तय करने के एक वर्ष के भीतर सुनवाई पूरी करने में विफल रहती है, तब उसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को इसका कारण बताना होगा। न्यायालय ने कहा कि सांसदों एवं विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई दिन-प्रतिदिन आधार पर की जाए। एक जनिहत याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया। जनहित याचिका में राजनीति को अपराधीकरण को मुक्त कराने की मांग की गई है। विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ट्रायल में बहुत देरी के कारण दोषी करार देने और ढाई साल से ज्यादा की सजा होने पर अयोग्यता निष्प्रभावी हो जाती है। 
हमारे नियमित पाठकों को अच्छी तरह याद होगा कि हम बरसों से हर कुछ महीनों में यह मांग करते आ रहे हैं कि भारत में सांसदों और विधायकों सहित सरकार की ताकतवर कुर्सियों, संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ चलने वाले मामलों में अलग से अदालत की जरूरत है, और अलग से अधिक सजा के इंतजाम की भी जरूरत है। हम बहुत बार इस बात को उठाते हैं कि ताकतवर लोगों के सामने अदालत कमजोर पड़ जाती है, क्योंकि जांच से लेकर सुबूत तक, और गवाहों से लेकर वकीलों तक को तोडऩे-मरोडऩे में ताकतवर लोग भारतीय लोकतंत्र से अधिक ताकतवर साबित होते हैं। इसी बात को पिछले कुछ हफ्तों में दो-चार बार हमने सुब्रत राय सहारा के बारे में भी लिखा, कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट देश के एक सबसे बड़े, और एक सबसे विवादास्पद कारोबारी के सामने बेबस सी खड़ी महीनों गुजारते रही। 
सुप्रीम कोर्ट से लेकर चुनाव आयोग तक इस बात पर भारी फिक्र चल रही है कि अपराधियों को चुनाव लडऩे से कैसे रोका जाए। और यह फिक्र पूरी तरह से बेमानी इसलिए है कि जिन लोगों के हाथ में कानून को कड़ा करने या नया कानून खड़ा करने की ताकत है, उनमें बहुतायत ऐसे लोगों की है जिनके हाथ रंगे हुए हैं, रिश्वत के पैसों से रंगे हैं, बेईमानी से रंगे हैं, और तरह-तरह के लहू से भी रंगे हैं। ऐसे में यह लोकतंत्र अमरीका के एक वक्त के माफिया-राज की तरह का हो गया है जिनका सभी किस्म के गैरकानूनी कारोबार पर एकाधिकार था। आज भारत में हर किस्म के कारोबार में राजनीति के लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से घुसे हुए हैं। किसी में उनके कुनबे काम कर रहे हैं, और किसी में उनके भागीदारों के नाम हैं। ऐसे में जब बरसों तक सत्ता पर काबिज लोग बरसों पुराने मामलों में सजा पाते हैं, तो लगता है कि ऐसे भ्रष्ट और चोर-डकैत इन मामलों के बाद के सत्ता के इन बरसों में क्या यही सब नहीं करते रहे होंगे? और फिर यह तो पहली अदालत की सजा है, इसके बाद तो ऐसे नेता हाईकोर्ट जाएंगे, सुप्रीम कोर्ट जाएंगे, और अगर वहां से भी दस-बीस बरस बाद यही सजा कायम रहेगी, तो तब तक वे लोग फिर राज करते रहेंगे। 
पिछले बरस इसी तरह के एक मामले में मौजूदा कानून के खिलाफ बहस करते हुए देश के सबसे बड़े संविधानवेत्ताओं में से एक फली एस नरीमन ने कहा था कि भारत के जनप्रनिधित्व कानून के तहत ऐसे अपराधी सांसदों और विधायकों को अलग बर्ताव मिलने की व्यवस्था की गई है। श्री नरीमन ने आगे कहा-और ऐसे में जब लोकसभा के 547 सांसदों में से 274 अपराधों के मुकदमों में फंसे हुए हों तो उनसे मौजूदा कानून में किसी फेरबदल की उम्मीद नहीं की जा सकती। आज का भारतीय कानून मौजूदा सांसदों और विधायकों को यह छूट देता है कि वे किसी अदालत से मिली सजा के खिलाफ तीन महीनों में अपील कर सकते हैं, और उनके मामलों पर आखिरी फैसला हो जाने तक उनकी सदस्यता जारी रहेगी। 
उसी दौरान केंद्रीय मंत्री कमलनाथ ने यह राय दी थी कि गंभीर अपराधों में फंसे हुए नेताओं के लिए तेज रफ्तार अदालतें होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि ऐसा होने से जनता नेताओं को नीची निगाह से देखने के बजाय ऊंची निगाह से देखेगी। लेकिन कमलनाथ की राय का उनकी ही पार्टी ने विरोध कर दिया था और कहा था कि मामलों की तेज रफ्तार सुनवाई आरोपी के पद या स्थिति से तय नहीं होनी चाहिए, बल्कि अपराध को देखते हुए तय होनी चाहिए। और मजे की बात यह है कि भाजपा ने भी कमलनाथ से असहमति जाहिर करते हुए अपराधियों का ऐसा दर्जा बनाने का विरोध किया था। वामपंथी दलों ने भी इस बात को इस तर्क के साथ खारिज कर दिया था कि सुनवाई जुर्म के आधार पर तय होनी चाहिए। 
लेकिन हमारा बहुत साफ मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में सबसे गरीब और सबसे कमजोर तबके के हक जिस तरह गटर में पड़े हुए हैं, उनको देखते हुए गरीब या कमजोर को ताकतवर मुजरिम के खिलाफ तब तक कोई इंसाफ नहीं मिल सकता, जब तक कि ऐसी तेज रफ्तार अदालतें न हों। किसी अपराध का आखिरी फैसला आने तक अगर सांसद या विधायक कानून निर्माता बनकर विधानसभा और संसद में बैठते रहेंगे तो ऐसी संसद और ऐसी विधानसभाएं क्या खाकर राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण के खिलाफ कुछ कर सकेंगी? जो बात सुप्रीम कोर्ट में देश के एक सबसे बड़े वकील ने उठाई है, वह पूरी तरह एक ऐसे लोकतांत्रिक न्याय की है, जो कि ताकतवर  अपराधी नेताओं के खिलाफ रहेगी और उनको अपराध करने के विशेषाधिकार से दूर रखेगी। दूसरी तरफ ऐसा इंतजाम होने से ही देश की गरीब जनता, कमजोर जनता का भरोसा कानून पर रहेगा, वरना नक्सलियों और दूसरे किस्म के अपराधियों को अधिक ताकत मिलते चलेगी। 
भारत का लोकतंत्र आज उसी तरह की सामंती और राजशाही मनमानी से ग्रस्त और त्रस्त है जिससे आजाद होने के लिए आजादी की लड़ाई हुई थी। अंगे्रजों और राजाओं से देश को आजादी मिल जाने के बाद आज के सत्तारूढ़ सांसदों, विधायकों, नेताओं और अफसरों ने एक नए किस्म का सामंतवाद अपने जुर्म को बचाने के लिए खड़ा कर लिया है। जुर्म करने के विशेषाधिकार के खिलाफ आवाज उठनी चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस बहस को सड़कों तक भी लाना चाहिए ताकि पूरे देश में इसके खिलाफ एक जनमत खड़ा हो सके। हाल के बरसों से यह बात सामने आई कि जब जनमत सड़कों पर उतरता है, तो बेबसी में सरकार और राजनीतिक दल उसी बात को सुनते हैं, या कम से कम सुनने का दिखावा तो करते हैं। लोकतंत्र के भीतर से लोकतंत्र को सुधारने का यह काम अगर नहीं छिड़ेगा, तो फिर प्रधानमंत्री नक्सल-हिंसा को भारत का सबसे बड़ा आतंरिक खतरा तो बतला ही चुके हैं।

दल-बदल के बाद नई पार्टी से तुरंत उम्मीदवारी रोकी जाए

09 मार्च 2014
संपादकीय

बिहार के किसी नेता के बारे में खबर है कि वो अब तक नौ पार्टियों में रह चुके हैं। बिहार की ही दूसरी खबर कुछ दिन पहले रामविलास पासवान के बारे में थी कि पिछले पन्द्रह-बीस बरसों में वे एक बार छोड़कर हर बार जीतने वाले गठबंधन के साथ रहे हैं। भारत की राजनीति में हरियाणा से दशकों पहले दल-बदल को लेकर एक शब्द भाषा में आया था, आयाराम-गयाराम, और फिर इस शब्द ने यहीं घर कर लिया। छत्तीसगढ़ में शायद छत्तीस बरस भाजपा में रहने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला अब कांग्रेस की उम्मीदवार हैं, और मध्यप्रदेश में कल जिस रिटायर्ड आईएएस अफसर भागीरथ प्रसाद को कांग्रेस ने लोकसभा उम्मीदवार बनाया, उनके बारे में इस पल टीवी पर खबर आ रही है कि वे भाजपा में जा रहे हैं। 
दल-बदल बहुत किस्म के होते हैं, और भारत जैसी जिंदा राजनीति में लोगों का हृदय परिवर्तन होना भी एक स्वाभाविक बात है। कई बार पार्टी की नीतियों से, नेताओं से, और फैसलों से असहमति के बाद लोग दल-बदल कर सकते हैं, और करते हैं। कई बार खरीद-बिक्री के तहत भी दल-बदल होता है। कई बार सीबीआई की सोचकर दल-बदल होता है, या होते-होते रूक जाता है। चुनावों के वक्त दल-बदल कुछ अधिक होता है, और राम के उपासक कुछ घंटों के भीतर रावण-चालीसा पढऩे में लग जाते हैं। अब यह ऐसा वक्त है कि भारत में दल-बदल को लेकर संसद और विधानसभा के बाहर भी एक कानून की जरूरत है। 
भारत में यह चर्चा लंबे समय से चल रही है, और हम भी इसके हिमायती हैं, देश के कुछ महत्वपूर्ण ओहदों पर बैठे हुए लोगों के कुर्सी छोडऩे के बाद कुछ अरसे तक राजनीति में हिस्सा लेने, चुनाव लडऩे, या राजनीति से परे की कहें, तो कारोबार करने पर रोक लगनी चाहिए। यह शर्त नौकरी शुरू होने के वक्त ही जोड़ देनी चाहिए, और अगर कानूनी रूप से अब भी मुमकिन हो, तो अभी भी जोड़ देनी चाहिए। फौज के बड़े ओहदों पर, खुफिया एजेंसियों या जांच एजेंसियों की बड़ी कुर्सियों पर, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की कुर्सियों पर रहने वाले लोगों को तुरंत ही राजनीति में आने से रोकना चाहिए। इसी तरह दल-बदल को लेकर आज हमारा यह मानना है कि एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने वाले लोगों पर कुछ अरसे तक इस नई पार्टी के चुनावी उम्मीदवार बनने पर रोक लगनी चाहिए। लोकतंत्र को लेकर बहुत से लोगों का यह मानना है कि इसको लिखे हुए कानूनों से बहुत अधिक बांधना ठीक नहीं होता, और अच्छी परंपराओं के सहारे ही लोकतंत्र विकसित हो सकता है। लेकिन भारत में हमारा यह देखा हुआ कि अच्छी परंपराएं धीरे-धीरे करके कूड़ादान के रास्ते घूरे पर पहुंच गई हैं, और इनके अधिक मजबूत विकल्प के रूप में जो नियम-कानून बनाए गए हैं, उनको भी लोकतंत्र के भागीदार पेशेवर मुजरिमों के अंदाज में धोखा देने में कामयाब होते ही रहते हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना कि नैतिकता के पैमानों के प्राचीन इतिहास को गिनाकर लोगों को गलत काम करने से रोका जा सकेगा, यह बहुत ही मासूमियत की उम्मीद होगी। राजनीति में ऐसी मासूमियत की जगह अब नहीं रह गई है। 
इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि दल-बदल के बाद नई पार्टी से उम्मीदवार बनने के पहले कम से कम एक बरस की एक कानूनी रोक लागू की जाए। वैसे तो राजनीतिक दलों के भीतर अपनी आचार संहिता रहनी चाहिए थी, और उसके तहत ऐसा काम बेहतर होता, लेकिन राजनीतिक दलों ने तो महिलाओं को टिकट देने के लिए भी महिला आरक्षण कानून बनने के पहले तक अपने घर के भीतर ही ऐसा इंतजाम करने की कोई जहमत नहीं उठाई। और तो और, सोनिया, जया, माया, ममता, जैसी महिला-मुखिया वाली पार्टियों ने भी पार्टी के भीतर टिकटों पर खुद का महिला आरक्षण लागू करने के बारे में सोचा तक नहीं। इसलिए लोगों से खुद से ऊंची नैतिकता और ईमानदारी की उम्मीद बहुत कागजी और किताबी बात होगी। आज जरूरत यह है कि चुनाव सुधार के कानूनों के तहत ही दल-बदल पर ऐसी रोक लगानी चाहिए कि एक पार्टी से इस्तीफे के बाद कम से कम साल भर कोई दूसरी पार्टी से उम्मीदवार न बन सके।