राहुल, और बापू की औलादों का वंशवाद अलग कैसे?

संपादकीय 
30 अप्रैल 2014

महात्मा गांधी के परनाती श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने अमेठी में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार कुमार विश्वास का प्रचार करते हुए कहा कि राहुल गांधी, गांधी नाम का दुरुपयोग कर रहे हंै,और उन्हें इस नाम का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। उन्होंने मार्च में भी राहुल गांधी को पत्र लिखकर मांग की थी कि, वह गांधी नहीं हंै, और गांधी नाम का इस्तेमाल बंद कर दें। लेकिन तब संदर्भ यह था कि राहुल ने कहा था कि महात्मा गांधी की हत्या आरएसएस ने की थी।  राहुल का यह बयान तथ्यों के हिसाब से गलत था। तब कुलकर्णी को उन्हें यह कहने का हक था कि वह अपने राजनीतिक फायदे के लिए महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल करना बंद कर दे, लेकिन न तब, और न ही अब,  महात्मा गांधी के परिवार से किसी को भी, राहुल गांधी को अपने नाम के आगे गांधी लगाने से मना करने का हक है।
सोनिया गांधी,राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अगर अपने नाम के पीछे 'गांधीÓ  लगा होने का फायदा उठाते हंै, तो इसका संबंध महात्मा गांधी से कभी नहीं रहा, बल्कि नेहरू परिवार के बेटी इंदिरा से रहा जिन्होंने  फिरोज गांधी से शादी की थी, जिस कारण नेहरू की विरासत इस देश में इस नाम से आगे बढ़ रही है। महात्मा गांधी के परनाती को 'गांधीÓ  नाम पर अपने कुनबे का ही हक जताने से पहले यह जानना चाहिए कि भारत में अकेले मोहनदास करमचद गांधी ही अकेले गांधी नहीं थे। गुजरात के अलावा पंजाब, और मारवाड़ में भी इत्र सुगंधित चीजों का व्यापार करने वालों को गांधी कहा जाता था। महात्मा गांधी के रोबोटिक्स इंजीनियर परनाती ने अगर कबीर के दोहे पढ़े होंगे, तो उनमें भी गांधी का जिक्र है - कबीरा संगत साधु की, ज्यों गंधी की बास, जो  कुछ गंधी दे नहीं, तो भी बास सुबास।
यानि इस देश, और दुनिया में ऐसे बहुत से गांधी हंै, जो महात्मा गांधी के कुनबे में पैदा नहीं होने के बावजूद अपने नाम के आगे गांधी नाम लगाते हंै। इनमें से एक, पारसी परिवार में जन्मे फिरोज गांधी भी थे, जिनके परपोते राहुल गांधी हैं। अगर कुलकर्नी के मामा की औलादें  महात्मा गांधी के परपोते, या पर पर पोते, होने के कारण अपने नाम के आगे गांधी लगा सकते हंै, तो राहुल क्यों नहीं?
अमेठी में जा कर गांधी के परनाती ने कुछेक अच्छी बातें कहीं और की हंै- जैसे उन्होंने अमेठी में धूल खाती पड़ी  गांधी की मूर्ति को दूध से नहलाने से मना करते हुए कहा कि महात्मा गांधी के प्रति भक्ति दिखानी है तो आप पार्टी के कार्यकर्ता अमेठी की साफ सफाई करें। उन्होंने हरियाणा, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, और तमिलनाडु की  राजनीति में वंशवाद की बुराई भी  की है, लेकिन क्या उन्हें महात्मा गांधी के कुनबे के लोगों द्वारा बरता वंशवाद दिखता है? कुलकर्णी महात्मा गांधी के वंश का होने का फायदा उठाकर चुनाव के समय एक ऐसी बात कर रहे हैं, जो दरअसल कोई मुद्दा ही नहीं है। राहुल का वंशवाद महात्मा गांधी के वंश से नहीं, नेहरू के वंश से जुड़ा है। न राहुल, न उनके परिवार के किसी ने महात्मा गांधी के कुनबे का होने का दावा कभी किया है। लेकिन कुलकर्णी को यह बयानबाजी करने का मौका ही इसलिए मिला है  कि वह महात्मा गांधी के वंशज हैं। राहुल गांधी को गांधी नाम का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह देने वाले कुलकर्णी, खुद महात्मा गांधी के कुनबे का होने के कारण वंशवाद का फायदा आम आदमी पार्टी को पहुंचाने अमेठी गए हंै।
वह अमेठी जाने पर वहां के विकास में कमी की बातें करते, सक्षम होते हुए भी भ्रष्टाचार रोकने में राहुल गांधी  की नाकामी की बात  करते, अमेठी के लोगों से कथित कुव्यवस्था, कुशासन  से लडऩे गांधी के तौर-तरीके अपनाने की बात करते, तो यह मौके, और गांधी से उनके जुड़ाव के  लिहाज से अच्छा रहता। लेकिन खुद गांधी नाम को अपनी बपौती समझकर अहंकार में घूमते रहना, और राहुल गांधी को उसके इस्तेमाल से बाज आने को कहना अजीबोगरीब है, क्योंकि राहुल, और उनके परिवार में से कोई भी कभी खुद को महात्मा गांधी के साथ नहीं जोड़ता। वह खुद को  नेहरू, इंदिरा राजीव के नाम के साथ ही जोड़कर खुश हंै। ऐसे में एक गंभीर राजनीतिक मौके पर, ऐसे बेतुके अंदाज दिखाकर वह किसे बहला रहे हैं? महात्मा गांधी जब कोई नहीं थे, किसी महान हस्ती के वंशज नहीं थे, तब वह अपनी सोच, और आदर्शों पर यकीन रखते हुए उस वक्त की दुनिया की सबसे बड़ी ताकत से, अपने स्तर पर टकराते थे, अपने स्तर पर समाज और लोगों की सोच में बदलाव लाते थे। उन गांधी के नाम का बार-बार इतना घमंड दिखा रहे श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने इस देश की बुराइयों के खिलाफ अपने स्तर पर क्या करने की हिम्मत दिखाई है? राहुल गांधी को नसीहतें देने में कोई बड़प्पन नहीं। एक चुनाव हारती दिख रही पार्टी के नेता नजर आ रहे नौजवान पर तो कोई भी कुछ भी बोल सकता है, लेकिन गांधी नाम को अपनी बपौती समझने वाले, दूसरों को अपने नाम के आगे गांधी लगाने से रोकने की चेतावनी देने वाले,दूसरों से किस तरह अलग हंै? बल्कि उनकी यह हरकत उन्हें इस देश के उन लाखों आम नागरिकों से भी सामान्य बनाती हंै, जो अपने स्तर पर देश के लिए वफादारी निभाते हंै, और चुनाव के दिनों में मुद्दे तौलकर मतदान करते हंै,गैर जरूरी कोरी बयानबाजी नहीं करते। महान नेताओं की आल औलादों होने के कारण अहमियत पाने वाले ऐसे लोगों को राहुल गांधी जैसे नेताओं को नसीहतें देने का क्या हक है, जो चाहे जैसी भी, देश की तस्वीर बदलने की कोशिश तो करते हंै!

निजी जिंदगी की निजता का हक कायम करने की जरूरत

29 अप्रैल 2014
संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट में एक दिलचस्प मामला चल रहा है जिसमें जजों ने केस के दो अलग-अलग हिस्से करके, उनको सुनने की प्राथमिकता भी तय कर दी है। दूरसंचार घोटाले के अलावा कई दूसरे किस्म की दलाली के आरोपों वाले नीरा राडिया टेप पिछले कुछ बरसों से लगातार खबरों में रहे हैं। और अब इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने रतन टाटा की एक अपील पर यह तय किया है कि गैरकानूनी तरीके से की गई इस टेलीफोन टैपिंग के निजता (प्राइवेसी) वाले पहलू पर पहले सुनवाई की जाए, और उसके बाद इन रिकॉर्डिंग्स में आई बातों से सरकार के कामकाज पर असर पडऩे के बारे में देखा जाए। अदालत ने माना कि अगर इन दोनों पहलुओं के बीच प्राथमिकता तय नहीं होगी, तो यह मामला आगे नहीं बढ़ पाएगा। 
हमारे लिए भी यह एक दिलचस्प मामला इसलिए है कि हम लोगों की निजी जिंदगी की निजता के अधिकार के बारे में कई बार लिखते हैं, साथ ही जनहित में किए गए स्टिंग ऑपरेशनों के बारे में भी लिखते हैं। यह मामला स्टिंग ऑपरेशन से परे गैरकानूनी फोन टैपिंग का था, जो अपने आपमें एक बड़ा जुर्म था, और अदालत में सरकार ने यह कह भी दिया था कि यह रिकॉर्डिंग उसकी की हुई नहीं है। अब एक सवाल यह उठता है कि हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े कारोबारी जब सरकार में अपने कामों को सही या गलत तरीके से, सीधे या दलालों के मार्फत करवाने की बात करते हैं, जब वे मंत्रियों को अपनी मर्जी के विभाग दिलवाना तय करते हैं, तो ऐसी बातचीत के सुबूत को गैरकानूनी तरीके से हासिल करना जुर्म है, या कि जनहित में है, या कि जनहित में किया गया जुर्म है, या फिर बाजार की आपसी लड़ाई का नतीजा है? 
इनमें से जो भी बात लागू होती हो, या जितनी भी बातें लागू होती हों, हमारा यह मानना है कि टेलीफोन पर निजी बातचीत अगर सरकार की किसी खुफिया एजेंसी की नजर में रिकॉर्ड करने के लायक नहीं है, अगर ऐसी रिकॉर्डिंग के लिए कानूनी औपचारिकता पूरी नहीं की गई है, तो ऐसी बातचीत को सुबूत मानना, उसकी रिकॉर्डिंग के आधार पर अदालत में केस चलना, गैरकानूनी रिकॉर्डिंग को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं होगा। ऐसे में तो लोगों की निजी जिंदगी खत्म होने लगेगी, और जितने मामले अदालतों तक ले जाए जाएंगे, उससे हजार गुना अधिक मामले गैरकानूनी रिकॉर्डिंग के बाद ब्लैकमेलिंग में काम आएंगे। इसलिए निजी जिंदगी की निजता को हम एक बुनियादी हक मानते हैं, और उसे किसी भी गैरकानूनी टैपिंग या रिकॉर्डिंग से ऊपर रखना चाहिए। आज गुजरात में नरेन्द्र मोदी की सरकार जिस कानूनी या गैरकानूनी टैपिंग और निगरानी को लेकर, उसके सही या गलत होने की जांच से घिरी हुई है, वह अपने आपमें बहस का एक मुद्दा है, और पहली नजर में कानूनी तौर पर किया गया एक बड़ा गंभीर गैरकानूनी मामला है। ऐसे में टाटा हो या राडिया, कारखानेदार हो या दलाल, पत्रकार हो या नेता, जब तक टैपिंग के कानून के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे का पैमाना पूरा न होता हो, तब तक ऐसी गैरकानूनी हरकत को सुबूत नहीं, सजा का हकदार मानना ठीक होगा। 
आज टेक्नालॉजी ने सरकार में बैठे हुए लोगों, और संचार कंपनियों के मालिकों और मैनेजरों के लिए लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक को आसान बना दिया है, और इनके अलावा भी हैकरों, और जालसाजों, मुजरिमों और ब्लैकमेलरों के लिए भी टेक्नालॉजी एकदम नाजुक चीज है, जिसमें छेडख़ानी आसान है। हमारा मानना है कि ऐसी किसी भी छेडख़ानी पर बड़ी सजा का इंतजाम अगर नहीं होगा, तो धीरे-धीरे हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े लोग बड़ी-बड़ी ब्लैकमेलिंग का शिकार होकर बड़े-बड़े गलत काम करने लगेंगे, और छोटे-छोटे लोग भी ब्लैकमेलिंग से शोषण का शिकार होंगे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और यह चाहे राडिया के टेप हों, या अमित शाह की करवाई गई निगरानी हो, इन सब पर पहले तो गैरकानूनी टैपिंग और निगरानी की सजा तय होनी चाहिए, बाद में बाकी पहलुओं पर बात होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो प्राथमिकता तय की है, हम उससे सहमत हैं।

शहरों की खूबसूरती पर खर्च बंद करके, बुनियादी जरूरतों को जिंदगी के लायक बनाएं

28 अपै्रल 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पीलिया फैलने से दो मौतों के बाद सरकार और स्थानीय म्युनिसिपल के स्तर पर हड़बड़ी मची हुई है। चारों तरफ अफसर और निर्वाचित महापौर-पार्षद नालियों के बीच से गुजरती पानी की पाईप लाईनों की जांच और मरम्मत में जुट गए हैं। लेकिन आधी सदी से चले आ रहे म्युनिसिपल के इस इंतजाम का रातों-रात कोई इलाज नहीं हो सकता। चारों तरफ पानी के पाईप नालियों के बीच से, नीचे से, गंदे पानी होते हुए गुजरते हैं, और जैसा कि सरकारी सप्लाई के पाईपों में होता है, पाईप घटिया क्वालिटी के होते हैं, और उनका बिछते-बिछते ही खराब हो जाना शुरू हो जाता है, और यह तय रहता है कि नाली के पानी में डूबे हुए पाईपों का पानी खराब होगा ही होगा।
हमको हैरानी इस बात पर होती है कि कैसे इस तरह के शहरी इंतजाम के बीच दस लाख लोगों की आबादी बची रहती है, और पीलिया से होने वाली मौतें इतनी कम किस तरह रह सकती हैं। ऐसा लगता है कि लोगों के बदन में गंदे पानी से होने वाले नुकसान के खिलाफ, संक्रमण के खिलाफ, प्रतिरोधक क्षमता इतनी विकसित हो जाती है कि लोग प्रदूषित और गंदा पानी पीते भी रहते हैं, और जिंदा भी रहते हैं। यह हो सकता है कि मौत से कम दर्जे का नुकसान लोगों को होता हो, और लोग बीमार पड़-पड़कर जिंदा रहना सीख जाते हैं। लेकिन सेहत की जो बदहाली ऐसे गंदे पानी से हो सकती है, और होती ही है, उसकी सामाजिक लागत, उससे निजी उत्पादकता का नुकसान, और इलाज का खर्च, सरकारी आंकड़ों में नहीं आ पाते। 
भारत के पुराने शहरों में आबादी बढ़ती चली जाती है, और इंतजाम पुराने रहते हैं। उसी पुराने ढांचे पर बढ़ती आबादी, और हर नागरिक की बढ़ती हुई जरूरतों का बोझ और लदते जाता है, कुल मिलाकर नतीजा यह होता है कि सुविधाओं की क्षमता चुक जाती है। ऐसे में नए बनने वाले शहर तो भविष्य की जरूरतों के हिसाब से क्षमता की गुंजाइश रखकर बनते हैं, लेकिन भारत की शहरी आबादी का शायद तीन चौथाई हिस्सा पुराने ढांचे के तहत ही जीता है। ऐसे में शहरी खूबसूरती पर अंधाधुंध खर्च करने के बजाय राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं को चाहिए कि वे सबसे गरीब जनता की न्यूनतम जरूरतों को सबसे पहले पूरा करें। हम छत्तीसगढ़ के शहरों में देखते हैं कि किस तरह नेता-अफसर, और ठेकेदार बड़े-बड़े निर्माण-ठेकों में अधिक दिलचस्पी रखते हैं। सड़कों पर हर कुछ महीनों में डामर की नई तह बिछाई जाती है दिखती है, दसियों लाख की लागत से जगह-जगह स्वागत द्वार बनते हैं, और हर शहर में गौरवपथ बनाए जा रहे हैं। हमारे हिसाब से ऐसा दिखावटी काम करने के पहले सरकार और स्थानीय संस्था की पाई-पाई का इस्तेमाल नाली, पानी, और साफ-सफाई जैसी बुनियादी जरूरतों पर झोंकना चाहिए, जिससे कि सबसे गरीब की जिंदगी पर सबसे अधिक असर पड़ता है। 
आज राजधानी रायपुर में हड़बड़ी में जो मरम्मत चल रही है, उससे कुछ हासिल नहीं होना है। राज्य सरकार को तुरंत ही पानी पहुंचाने का ऐसा इंतजाम करना चाहिए जो कि नाली के बीच से होकर न गुजरता हो। इसके लिए अगर मौजूदा पाईपों को पूरी तरह भूलकर, नया इंतजाम करना पड़े, तो भी वह सस्ता इसलिए रहेगा क्योंकि वह पूरे शहर में सड़कों को खुदने से बचाएगा। जहां-जहां पाईप नालियों से जा रहे हैं, उन सभी जगहों पर खुले में ऊपर से पाईप ले जाने का काम करना चाहिए। आज की हड़बड़ी के बीच एक बहुत ही कामचलाऊ किस्म का इलाज देखा जा रहा है, ताकि मौतें और आगे न बढ़ें। लेकिन इससे परे एक पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। ऐसा न होने तक शहरों की खूबसूरती पर खर्च रोक देना चाहिए, क्योंकि एक जगह शहर को खूबसूरत बनाया जाए, और दूसरी जगह उसी शहर में नाली-पानी के मेल से पीलिया-मौतें होती रहें, तो ऐसी खूबसूरती शर्मनाक ही है।

अंधविश्वास में हुई हत्या के पीछे भी राजनीति जिम्मेदार

27 अप्रैल 14
संपादकीय
उत्तरप्रदेश के बरेली से दिल दहलाने वाली खबर है कि एक आदमी अपनी छह बरस की भतीजी को सारे लोगों के सामने मार डाला, एक हंसिया लेकर आया और भतीजी का गला काटकर सिर अलग कर फेंक दिया। बाद में पुलिस को उसने बताया कि यह लड़की देवी काली का अवतार थी, और उसे मारने के लिए आई थी। इसके पहले कि यह भतीजी उसे मार सके, उसने भतीजी को मार डाला। 
अंधविश्वास से ऐसी हिंसा हर हफ्ते देश में कहीं न कहीं होती है, और कहीं महिलाएं टोनही कहकर मारी जाती हैं, तो कहीं किसी की बलि दे दी जाती है। छत्तीसगढ़ में भी हर बरस ऐसी बहुत सी हिंसा होती है, और पड़ोस के झारखंड में भी महिलाओं को मारने का लंबा इतिहास है। हम इसमें अलग-अलग वजहों से होने वाले अंधविश्वास पर अलग-अलग तर्कों की बात करने के बजाय यह चर्चा करना चाहते हैं कि देश में किस तरह से दकियानूसीपन को बढ़ावा दिया जा रहा है, और उसकी वजह से लोगों के बीच में आधुनिक सोच, वैज्ञानिक तर्क-वितर्क पैदा ही नहीं हो पा रहे। लोग पढ़-लिख रहे हैं, लेकिन उनके भीतर धर्मान्धता, कट्टरता, अंधविश्वास और बेइंसाफी कहीं कम नहीं हो रहीं। दरअसल देश में राजनीतिक ताकतें अपने चुनावी नफे-नुकसान को देखते हुए लोगों को दिमाग वाले इंसानों के बजाय बेदिमाग भीड़ की शक्ल में अधिक चाहते हैं, ताकि उनको जानवरों के एक रेवड़ की तरह मनचाहे रास्ते हांककर ले जाया जा सके। इसके लिए कभी धार्मिक आस्था को भड़काया जाता है, कभी जातियों के आधार पर लोगों को उकसाया जाता है, और यह कोशिश की जाती है कि लोकतंत्र और न्याय की समझ से लोगों को दूर ले जाकर किस तरह उन्हें बेसमझ बनाया जाए। भारत की राजनीतिक ताकतों में से अधिकतर पार्टियां लोगों को लोकतांत्रिक-राजनीतिक शिक्षण से परे रखना चाहती हैं, और तर्कहीन आधार पर उनका ध्रुवीकरण करने में लगी रहती हैं। राजनीतिक ताकतों से परे धार्मिक, आध्यात्मिक, और सामाजिक खाप पंचायतों जैसे संगठन जब हिंसक और अन्यायपूर्ण फैसले लेते हैं, कमजोर तबकों का शोषण करते हैं, भक्त-बच्चों के साथ बलात्कार करते हैं तो राजनीतिक नेता बलात्कारियों का साथ तब तक देते हैं, जब तक कि वे सुबूतों के घेरे में पूरी तरह, और बुरी तरह फंस न चुके हों। आसाराम नाम के आदमी का मामला इसकी एक बड़ी मिसाल है, जिसमें कि एक नाबालिग बच्ची ने जब बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई, तो देश की बड़ी-बड़ी राजनीतिक ताकतों ने पल भर में इसे आसाराम के खिलाफ साजिश करार दे दिया। 
जब देश में न्याय और वैज्ञानिक सोच, लोकतांत्रिक रूख को कुचला जाता है, और लोगों को कमसमझ बनाए रखने की राजनीतिक साजिश की जाती है, तो जनता के बीच की बाकी बुरी ताकतें अंधविश्वास को बढ़ाने में लगी रहती हैं, और वही वजह है कि ऐसी हत्याएं होती हैं, जैसी कि कल बरेली में हुई है। और आज हम इस मुद्दे पर यहां इसलिए लिख रहे हैं कि यह इतनी भयानक हत्या हो चुकी है, लेकिन हत्या से कम की हिंसा जो परिवार के भीतर महिलाओं को, लड़कियों को, अजन्मी बच्चियों को शिकार बनाती हैं, उस हिंसा पर हम आमतौर पर नहीं लिख पाते, क्योंकि वह इस घटना की तरह खबरों में नहीं आ पाती है। लेकिन आज की ही एक दूसरी खबर यह है कि देश में अजन्मी कन्याओं को मारने में सबसे आगे का हरियाणा आज कुंवारे लड़कों की दिक्कत झेल रहा है, और ऐसे लड़के वहां पर एक संगठन बनाकर अपनी परेशानी को सामने रख रहे हैं। यह भी इस देश का एक अंधविश्वास है कि लड़की को मारकर यह देश आगे बढ़ सकता है। खाप पंचायतों की हिंसक सोच, अंधविश्वास का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा है, इस तरह की हिंसा सैकड़ों अलग-अलग शक्लों में इस देश को पीछे रख रही है। 
देश की जनता में वैज्ञानिक और प्रगतिशील, सुधारवादी और न्यायवादी सोच कतरे-कतरे में नहीं आ सकती, यह जिंदगी के तमाम दायरों के लिए एक साथ ही आ सकती है, और राजनीतिक ताकतें ऐसा नहीं होने दे रहीं। 

गैरजिम्मेदार तबकों के बीच बदहाल भारतीय लोकतंत्र

26 अप्रैल 14
संपादकीय
गुजरात के एक जनसंगठन ने अभी मोदी सरकार से निकाली गई जानकारी सामने रखी है कि किस तरह वहां दलितों और गरीबों के लिए रखे गए बजट में से हजारों करोड़ खर्च ही नहीं हुए हैं। पिछले दस बरसों के इन आंकड़ों को कभी भी निकाला जा सकता था, और राज्य विधानसभा से लेकर संसद तक ने मोदी सरकार को घेरा जा सकता था, लेकिन ये आंकड़े हम पहली बार देख रहे हैं। गुजरात में कुपोषण के शिकार बच्चों का बड़ा अनुपात खबरों में रहते आया है और कई दूसरे पैमानों पर गुजरात दूसरे राज्यों से पीछे रहा है। लेकिन जब नरेन्द्र मोदी को घेरने की बात आती है तो गुजरात दंगों के अलावा अदानी को रियायती जमीन का मामला ही बार-बार खबरों में आता है। 
यूपीए, कांग्रेस, मीडिया, और जनसंगठनों की पैनी नजर नरेन्द्र मोदी पर बरसों से बनी हुई है। बहुत से सामाजिक पैमानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट बड़ी तेजी से राज्य सरकारों को नोटिस जारी करता है, और कल सामने आया यह दलित-बजट का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में किसी जनहित याचिका के रास्ते उठाया जा सकता था, या कम से कम इस बार के आम चुनाव आधे निपट जाने के पहले, मतदान शुरू होने के पहले तो इसे जनता के बीच उठाया ही जा सकता था। और कमोबेश ऐसी ही बात दूसरी पार्टियों की केन्द्र या राज्य सरकारों के बारे में ढंूढी जा सकती हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है, और राजनीतिक दल एक-दूसरे के खिलाफ, एक-दूसरे के नेताओं के खिलाफ फेंकू या पप्पू जैसी जुबान में फूहड़ लतीफे गढ़ते रहते हैं, और निरर्थक नारे लगाते रहते हैं। जब सच और आंकड़े बहुत असरदार हों, और उनका इस्तेमाल न करके सिर्फ विशेषणों और तुकबंदियों वाले नारे लगाए जाएं, तो यह साफ रहता है कि राजनीतिक दल या जनसंगठन मेहनत नहीं करते।
हम पिछले दो महीनों में कांग्रेस और भाजपा सहित बाकी पार्टियों के नेताओं के भाषणों में उन्हीं-उन्हीं बातों का दुहराव देखते आ रहे हैं। जब नेता अपने ही बयानों से थक और ऊब जाते हैं, तो फिर वे शायद गालियों और हिंसक बातों पर उतर आते हैं। ऐसे में यह समझ आता है कि बड़े-बड़े संगठनों को भी ईमानदार होमवर्क करना नहीं सुहाता, और महज लफ्फाजी उन्हें आसान लगती है। लोकतंत्र के भीतर दस-दस बरसों के आंकड़े अगर सवाल खड़े नहीं कर पाते, तो फिर यह लोकतंत्र परिपक्व नहीं है, और नारों पर चल रहा है। भारत में राजनीतिक दल पेशेवर अंदाज में ईमानदारी से मेहनत नहीं करते, यह हम उन संगठनों के घरेलू कामकाज से लेकर, उनके चुनावी तौर-तरीकों तक के बारे में पहले कई बार लिख चुके हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, लेकिन भारतीय चुनावों में जोड़तोड़, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, खरीद-फरोख्त, इन सबका इतना बोलबाला है कि चुनावों के वक्त इन्हीं पर भरोसा करने वाले नेता, और उनकी पार्टियां, पांच बरसों तक मेहनत करने पर भरोसा नहीं करतीं। जिस तरह दिल के महंगे ऑपरेशन पर भरोसा करने वाले लोग रोज के खान-पान की सावधानी नहीं बरतते, रोज की कसरत का महत्व नहीं समझते, उसी तरह चुनावों में गलत बातों से जीत हासिल करने वाले लोग पांच बरस की जिम्मेदार राजनीति को महत्वपूर्ण नहीं मानते। आज भी भारतीय राजनीति में बहुत से मुद्दों को सिर्फ जनसंगठन सामने रखते हैं, या मीडिया अपने किसी स्टिंग ऑपरेशन से एक पार्टी या सरकार के खिलाफ उसके विरोधियों को कई मुद्दे थमा देता है। लोकतंत्र में विपक्ष के भीतर जिस तरह एक छाया-मंत्रिमंडल की सोच संसदीय व्यवस्था में रहनी चाहिए, वह भारत में विकसित नहीं हो पाई है, वरना केन्द्र और राज्यों की सरकारों के मामले संसद या विधानसभा के एक सत्र से दूसरे सत्र के बीच ही पकड़ लिए जाने चाहिए थे। 
हम भारत की राजनीति में, राजनीति से परे रहकर काम करने वाले जनसंगठनों का एक बड़ा योगदान ऐसे मामलों में देखते हैं, जिनको सिर्फ मेहनत से ही सामने लाया जा सकता है, उजागर किया जा सकता है, और भांडाफोड़ किया जा सकता है। हमने पहले इसी जगह सभी पार्टियों के लिए कई बार यह नसीहत भी लिखी है कि उनको अपने कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग के लिए, कॉलेज शुरू करने चाहिए और लीडरशिप के लिए उसमें कोर्स रहने चाहिए। हमारा यह सुझाव खासी मेहनत मांगता है, और वोट के वक्त दारू और नोट जितना आसान नहीं है। लेकिन आगे चलकर वही पार्टी भारतीय लोकतंत्र में टिक पाएगी जो कि दारू और नोट के साथ-साथ अपने प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की फौज भी तैयार रखेगी। 

पाकिस्तान के घरेलू खतरे, और भारत के साथ रिश्ते

25 अपै्रल 2014
संपादकीय
पाकिस्तान में इन दिनों सरकार और अखबार के बीच की लड़ाई खतरनाक मोड़ ले चुकी है। एक बड़े मीडिया समूह के एक बड़े टीवी पत्रकार पर पिछले दिनों जानलेवा हमला हुआ और गोलियों से छिदे हुए पत्रकार की जान अभी तक अस्पताल में डांवाडोल है। इस हमले के पहले से इस पत्रकार ने पाकिस्तानी सेना की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर आरोप लगाए थे कि वह उन पर हमला कर सकती हैं। ऐसे आरोपों से फिलहाल इस मीडिया समूह ने अपने-आपको अलग रखा है, लेकिन पाकिस्तान में जागरूक तबका लगातार इस हमले को लेकर आईएसआई, सेना, और सरकार पर आरोप लगा रहा है। इसके साथ ही हर कुछ हफ्तों में पाकिस्तान से ऐसी खबरें आती हैं कि वहां तालिबानी या दूसरे आतंकियों ने किसी छोटी जगह पर किसी दूसरे अखबारनवीस को मार डाला है।
पाकिस्तान में लोकतंत्र की बदहाली है, और इसे लेकर हमको अधिक फिक्र इसलिए भी होती है कि जब तक वहां लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, निर्वाचित सरकार की पकड़ देश के मामलों में नहीं होती, तब तक पाकिस्तान के पड़ोसी देशों के साथ टकराव का खतरा भी बने रहेगा, और ऐसे कमजोर पाकिस्तान पर कभी अमरीका, तो कभी चीन जैसी बड़ी ताकतों की पकड़ भी बनी रहेगी। फिर भारत के साथ पाकिस्तान के टकराव वाले बहुत जाहिर मुद्दे को पल भर के लिए अलग भी रखें, तो भी खुद पाकिस्तान के भीतर के हालात बहुत फिक्र के हैं। वहां पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जैसी कुर्सियों पर रहे हुए लोगों के साथ वहां की सबसे बड़ी अदालत का टकराव चल ही रहा है, दूसरी तरफ वहां के फौजी तानाशाह जनरल मुशर्रफ  अदालत मुकदमे झेल रहे हैं, हिंदुस्तान की तरह वहां भी एक प्रधानमंत्री की हत्या हो चुकी है। इनसे परे हिंदुस्तान से अलग, और बहुत बड़ा खतरा यह भी है कि पाकिस्तानी फौज का वहां की चुनी हुई हुकूमत में खासा दखल रहता है, और इस फौज की खुफिया एजेंसी का पाकिस्तान की जिंदगी में भी दखल रहता है, और आरोप लगते रहते हैं कि भारत के साथ टकराव खड़ा करने में भी आईएसआई वहां की सरकार से परे अपनी हरकतें करती रहती है।
ऐसे पाकिस्तान में जब मीडिया काम करता है, मानवाधिकार संगठन और लेखक-कलाकार काम करते हैं, तो वे भारत के इन्हीं तबकों के मुकाबले अधिक खतरे उठाकर काम करते हैं। हिंदुस्तान में मीडिया पर सरकार या फौज की तरफ से किसी तरह का हिंसक हमला नहीं होता, और आतंकी भी आमतौर पर मीडिया को नहीं छूते। लोकतंत्र के अधिक मजबूत होने का यह फायदा हिंदुस्तानी मीडिया को रहता है, लेकिन बगल का पाकिस्तानी मीडिया अधिक खतरों के बीच, अधिक संघर्ष करते हुए काम कर रहा है। वहां तालिबानों का देश के खासे हिस्से पर जिस तरह का कब्जा है, या जो हिस्से उनकी मार की सीमा में हैं, वहां पर काम करने वाले लोग अधिक तारीफ के हकदार हैं। आज जब हम इस बात को यहां लिख रहे हैं, तो हिंदुस्तान में भाजपा की अगुवाई में अगली राष्ट्रीय सरकार बनने की संभावना बहुत से लोग देख रहे हैं। भाजपा और उसके साथियों के बीच कुछ लोग ऐसी उम्मीद भी रख रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान को निपटा देंगे। भाजपा के एक दूसरे प्रधानमंत्री बरसों तक हिंदुस्तान चला चुके हैं, और उस वक्त भी उनकी नीतियां देश की विदेश नीति के मुताबिक थीं, न कि हिंदुत्ववादी। इसलिए यह मानने का अभी कोई कारण नहीं है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो पाकिस्तान के साथ अनिवार्य रूप से कोई टकराव खड़ा होगा ही। यह बात तो आने वाले महीनों में सामने आएगी, लेकिन फिलहाल पाकिस्तान के भीतर आज फिक्र का जो माहौल है, लोकतंत्र पर वहां जो खतरा है, उससे उबरने में भारत को भी मदद करनी चाहिए। अड़ोस-पड़ोस में मजबूत लोकतंत्र रहे, तो सरहद पर जितनी कटौती हो सकती है, उससे दोनों देशों में गरीबी और कुपोषण के शिकार लोगों की जिंदगी बदल सकती है। इन दोनों देशों में जो भी सरकारें रहें, उनको ऐसे माहौल को बढ़ावा देना चाहिए। और ऐसे मौके का इस्तेमाल करने के लिए आज पाकिस्तान को अपने घर को सुधारने की जरूरत है, ताकि भारत के साथ वह मजबूती से बातचीत कर सके।

आने वाले दिन राजनीति और लोकतंत्र के लिए दिलचस्प

24 अपै्रल 2014
संपादकीय

लोकसभा चुनाव का एक बड़ा हिस्सा निपट जाने के बाद अब यह अटकल भी लगने लगी हैं कि अगली सरकार किस गठबंधन की बन सकती है, और उसका नेता कौन हो सकता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मानकर चलते दिख रहा है कि नरेन्द्र मोदी अगले प्रधानमंत्री हैं, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि भाजपा की सीटें कम आने पर एनडीए को ऐसे साथियों की जरूरत पड़ सकती है जो कि मोदी के नाम पर तैयार न हों। ऐसे लोगों में कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सीटों की कमी पडऩे पर भाजपा के पास मोदी के अलावा किसी दूसरे नाम को सामने रखने में दिक्कत होगी, लेकिन यूपीए की मुखिया कांगे्रस पार्टी मोदी को रोकने के लिए किसी भी तीसरे मोर्चे के किसी भी गैरभाजपाई को बाहर या भीतर से साथ देने पर अधिक आसानी से तैयार हो सकेगी।
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर भाजपा और एनडीए ने इस बार मोदी को अगला मुखिया घोषित करके उन्हीं के नाम पर पूरा दांव लगा दिया, और वोट मांगे। और सच तो यही है कि भाजपा और एनडीए के पास मोदी के मुकाबले न कोई दूसरा नाम था, न कोई दूसरा चेहरा। इसलिए मोदी जिन बातों के लिए भी विख्यात हों, या कुख्यात हों, उन बातों के साथ-साथ वे ही यूपीए के खिलाफ सबसे दमदार उम्मीदवार थे और हैं। लेकिन ऐसे में भी इस बार के लोकसभा चुनाव भाजपा-एनडीए के पक्ष का वोट, या कांगे्रस-यूपीए के विपक्ष का वोट नहीं है। मामला इससे कुछ अधिक जटिल है, और उसकी गुत्थी वोटों की गिनती के बाद ही कुछ हद तक सुलझ पाएगी। यूपीए और एनडीए, इन दोनों गठबंधनों से परे की पार्टियां इतनी अधिक हैं, और उन्होंने कहीं पर त्रिकोणीय, तो कहीं चतुष्कोणीय मुकाबला बनाकर मतदाता के सामने से सिक्का उछालने जैसी सहूलियत हटा दी थी। अब देश के एक बड़े हिस्से में लूडो के पांसे की तरह तीन या चार, और कहीं-कहीं पांच विकल्पों में से किसी एक को छांटने की नौबत है। और हम जिस तरह लिख रहे हैं, उस तरह मतदाता फैसले नहीं करते, और वे बहुत सी बातों को सोचकर, या कई अच्छी बुरी बातों से प्रभावित होकर अपना वोट तय करते हैं। 
लेकिन आज एनडीए के अधिकतर उम्मीदवारों के मुकाबले देखें, तो यूपीए, और बाकी पार्टियों के उम्मीदवार वोटों को आपस में बांटते दिख रहे हैं। हम अगर बिल्कुल लुहारी अंदाज में दो हिस्सों में लोहे के टुकड़े को काटें, तो साम्प्रदायिकता के खिलाफ वोट, बहुत से राज्यों में ऐसी पार्टियों में बंट रहे हैं, जो धर्मनिरपेक्ष होने का दावा तो करती हैं, लेकिन जिनके तेवर, और जिनके चाल-चलन धर्मनिरपेक्षता को जगह-जगह चकमा देते भी दिखते हैं। इसलिए यह चुनाव सीधे-सीधे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के बीच की पसंद का चुनाव नहीं है। एक तरफ से देखें, तो यह बेईमानी के खिलाफ, और ईमानदारी की उम्मीद के बीच का चुनाव भी लग रहा है। और इस चुनाव के और भी कई पहलू हैं, जिनकी चर्चा हम पिछले दिनों में अलग-अलग मुद्दों पर लिखते हुए करते आए हैं। 
आज यहां चर्चा का एक बचा हुआ पहलू यह है कि भारतीय चुनावी राजनीति में सीधे-सीधे दो पार्टियों के दिन लद जाने के साथ-साथ, अब दो गठबंधनों के दिन भी लद गए दिखते हैं, और बिना बना हुआ, बेचेहरा, एक तीसरा मोर्चा चुनाव के पहले न सही, चुनाव के बाद सामने आएगा, जो अपने-आपमें हो सकता है कि किसी गठबंधन की शक्ल में न हो, लेकिन हो सकता है कि उसके बिना अगली सरकार बनना मुश्किल हो। यह नौबत देश में स्थिरता के लिए अच्छी रहेगी या खराब, उसके बारे में यहां की इतनी कम जगह में लिखना मुश्किल है, और साथ-साथ यह लिखना भी मुश्किल है कि स्थिरता हर मौके पर, और हर हद तक लोकतंत्र के फायदे की रहती है या नहीं। इसलिए बहुत सी पार्टियों ने मैदान में दो बड़े गठबंधनों से बाहर रहकर तस्वीर को जिस तरह धुंधला किया है, हो सकता है कि उस धुंध के बीच से एक ऐसी तस्वीर सामने आए, जो कि खालिस यूपीए, और खालिस एनडीए की सरकार के मुकाबले बेहतर हो, और जो कि अगली सरकार को भीतरी या बाहरी समर्थन देकर, उसी तरह सही पटरी पर रखे, जिस तरह वामपंथियों ने बाहरी समर्थन देते हुए यूपीए-1 को सही पटरी पर रखा था। आने वाले दिन बड़े दिलचस्प होंगे, भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में दिलचस्पी रखने वाले हर किसी के लिए।

सजायाफ्ता और संभावना के बीच हो रहे ये चुनाव

23 अप्रैल 14
संपादकीय
भारत के आम चुनाव में मतदान के बीच बहुत से जागरूक और समझदार लोगों के बीच मुद्दा यह है कि साम्प्रदायिकता की आशंका के साथ भाजपा-एनडीए को जिताया जाए, मोदी को प्रधानमंत्री बनाया जाए, या फिर भ्रष्टाचार में गले-गले तक डूबी यूपीए सरकार को फिर से चुना जाए? कई लोग इस बात पर हैरान हैं कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद भी मोदी न सिर्फ गुजरात में लगातार किस तरह जीते, बल्कि आज देश में अगर किसी एक नेता की सबसे अधिक शोहरत है, तो वह मोदी की है, और दंगों के दाग के साथ गुजरात के इस नेता की देश के और भी हिस्सों में कितनी शोहरत कैसी हुई? 
दरअसल इसे समझने के लिए साम्प्रदायिकता और भूख, इन दो बातों को एक साथ समझना होगा। साम्प्रदायिकता का दर्द उस तबके को ही आमतौर पर होता है जो कि साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार होता है। उससे परे के दूसरे तबके के लोगों को एक हमदर्दी हो सकती है, लेकिन उनका दर्द जख्मों जितना बड़ा नहीं हो सकता। यह एक वजह है कि गुजरात में जिस बहुसंख्यक हिन्दू तबके ने साम्प्रदायिक हिंसा के जख्म उतने नहीं झेले हैं, उसे देश के बाकी हिस्सों में साम्प्रदायिकता उतना बड़ा खतरा नहीं दिखती है। अल्पसंख्यकों को साम्प्रदायिकता के जख्म भुलाए नहीं भूलते, और वे इस बात को लेकर मोदी को कभी माफ भी नहीं करते, और भाजपा को वोट भी नहीं देते। लेकिन इन सीधे जख्मों से परे के बाकी के जो समुदाय हैं, उनकी भूख, और उनकी गरीबी, अल्पसंख्यकों के जख्मों के दर्द से अधिक है, और उनको यूपीए-कांग्रेस के भ्रष्टाचार, जिंदगी पर हावी गरीबी, और कांग्रेस नेताओं के बर्ताव का घमंड अधिक दर्द देते हैं। इसलिए साम्प्रदायिकता कुछ लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो सकती है, और बाकी बहुत से लोगों के लिए भूखी जिंदगी की गरीबी से लड़ाई उससे कहीं अधिक बड़ा मुद्दा हो सकती है। 
देश के बहुत से हिस्से ने साम्प्रदायिक हिंसा को रूबरू नहीं देखा है, जैसे छत्तीसगढ़। इसलिए यहां पर न उसके जख्म हैं, न उसका दर्द है। लेकिन गरीबी का दर्द है, और यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार की खबरें हैं। अब तो यूपीए के एक बड़े ईमानदार समझे जाने वाले नेता, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने भी यह मंजूर किया है कि यूपीए के भ्रष्टाचार की खबरों ने उसकी उपलब्धियों को ढांक दिया। इसलिए आज जब देश की आधी गरीब आबादी साम्प्रदायिकता के खतरे, उसके इतिहास, उसके जख्म और दर्द से नावाकिफ रहते हुए, एक साफ-सुथरी और ईमानदार, भ्रष्टाचार विरोधी मोदी सरकार की हिमायती दिखती है, तो उसे साम्प्रदायिक कहना गलत होगा। और जो लोग साम्प्रदायिकता को देश का सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं, जाहिर है कि उनके पेट भरे हुए हैं। खाली पेट पर कोई साम्प्रदायिकता और गरीबी में से पहले गरीबी से छुटकारा पाना ही चाहेंगे। मोदी के पैदा होने के भी जमाने पहले से यह बात चली आ रही है कि भूखे भजन न होए गोपाला। 
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली ताकतें जब गरीबों के मुंह के कौर को बेच-बेचकर अपने लिए माल-मेवा जुटाने लगती हैं, तो उस डकैती के खिलाफ खड़ी होने वाली ताकतें अगर साम्प्रदायिक इतिहास वाली भी रहती हैं, तो भी उनके दाग-धब्बों को भूखी जनता नजरअंदाज कर देती है। आज देश में वही नौबत है। कल जब आम आदमी पार्टी की सबसे चर्चित महिला नेता शाजिया इल्मी कैमरे के सामने मुस्लिमों से बार-बार कम्युनल (साम्प्रदायिक) बनने को कहते कैद होती हैं, तब एक तबके की साम्प्रदायिकता, और दूसरे तबके की साम्प्रदायिकता में कौन सा सतही फर्क बच जाता है? ये चुनाव भारत के लोकतंत्र की विविधता वाली संस्कृति को लेकर नहीं हो रहे, ये चुनाव बेईमानी, और बेईमानी के खिलाफ एक संभावना के बीच हो रहे हैं। ये चुनाव अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली पार्टियों की साम्प्रदायिकता और हिंसा की वजह से धुंधले हो गए हैं।  
जिन पार्टियों को दस या अधिक बरसों से सरकार चलाने का मौका मिला, और जिन्होंने देश-प्रदेशों को लूटने का काम किया, वे अब साख खोने के बाद भूखी जनता के बीच वोट पाने का हक खो चुकी हैं। इसलिए ये चुनाव साम्प्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, ध्रुवीकरण, या हिन्दू-मुस्लिम के आधार पर नहीं हो रहे, ये चुनाव भूखे-गरीब की नजर में एक सजायाफ्ता और एक संभावना के बीच हो रहे हैं। 

मीडिया और राजनीति, एक कारोबार के दूसरे कारोबार से रिश्ते का मामला...

22 अपै्रल 2014
संपादकीय
चुनाव के इस अंधड़ में न तो चुनाव से परे किसी दूसरे मुद्दे को लिखने लायक ढूंढ पाना आसान है, और न ही चुनाव से जुड़े मुद्दे पर बार-बार दुहराना अच्छा है। इसलिए इसके बीच का एक रास्ता यही निकल सकता है कि कुछ किनारे के मामलों पर लिखा जाए। ऐसा एक मामला कल शाम सामने आया है जब समाचार चैनल जी न्यूज ने भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी का एक लंबा समाचार दिखाया कि किस तरह एक इंटरव्यू में अपनी ही कही बातों को बाद में जोर डालकर, दबाव डालकर, धमकी देकर कैमरे के टेप पर से उन्होंने मिटवाया, और उसके बाद ही टीवी के एक सीनियर पत्रकार को वहां से जाने दिया। मजे की बात यह रही कि टीवी चैनल का एक और कैमरा मुरली मनोहर जोशी के पीछे चालू था, और वह उनकी सारी धमकी-चमकी को रिकॉर्ड कर रहा था, और बाद में चैनल ने उसका इस्तेमाल भी किया। 
अब आज यहां लिखने की बात चुनाव से परे की यह है कि एक इंटरव्यू देने के साथ-साथ क्या इंटरव्यू देने वाले नेता की यह जिद जायज है कि दिए जा चुके जवाबों को वो मिटवाए, और उसके बाद दुबारा रिकॉर्ड करने के लिए यह शर्त रखे कि सवालों की दिशा वह तय करेगा? इस मामले में मुरली मनोहर जोशी की बहुत दुर्गति हुई है कि उन्होंने अपने ही दिए हुए जवाबों से हड़बड़ाकर, टीवी चैनल को धमकाकर, रिकॉर्डिंग मिटाए बिना घर से बाहर न निकलने देने की धमकी दी। लोग यहां पर दो बातों को देख सकते हैं, एक तो यह कि मोदी के बारे में पूछे गए सवाल के, अपने ही दिए गए जवाब से जोशी किस तरह दहशत में आ गए। और दूसरी बात यह कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रहे चुके, एक भूतपूर्व प्राध्यापक, किस तरह मीडिया को धमका सकते हैं। 
इससे राजनीति और मीडिया के बीच के संबंधों पर भी सोचने का मौका मिलता है, क्योंकि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा शायद एक या दूसरे राजनीतिक दल, एक या दूसरे नेता, के लिए बेरहम या रहमदिल होने का दर्जा पा चुका है। ऐसे में लोग यह भी सोचते हैं कि लंबे इंटरव्यू में भी जब सबसे जलते और सुलगते हुए मुद्दों पर सवाल नहीं पूछे जाते, तो उसके पीछे किस तरह के समझौते रहते हैं? क्या कुछ लोगों की खरीदी-बिक्री की चर्चा सच रहती है? या फिर कुछ सवालों को न पूछने की शर्त पर भी बाकी इंटरव्यू पाने की पेशे की मजबूरी लोगों को कुछ सवालों से परे रहने को मजबूर करती है? इन दोनों में से कोई एक बात कई मामलों में लागू हो सकती है, क्योंकि मीडिया की आजादी कोई आदर्श स्थिति नहीं है, और वह जिंदगी के बाकी दूसरे दायरों की तरह समझौतों से घिरी रहती है, बहुत से समझौते अनचाहे रहते हैं, बहुत से चाहकर किए जाते हैं। 
हम उन अखबारनवीसों, और नेताओं को बेहतर मानते हैं, जो हर सवाल को पूछने का हौसला रखते हैं, और पूछे गए हर सवाल का जवाब देने का। पिछले महीनों में राहुल गांधी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक ऐसे इंटरव्यू के लिए सामने आए, जैसे कि उन्होंने पहले दिए नहीं थे। और इस बीच में ही मीडिया के बीच भी यह बात भी उठी कि किस इंटरव्यू में किसके साथ नरमी बरती गई। लगे हाथों यह अटकल भी लगने लगी कि कौन से कारखानेदारों ने मीडिया के कौन-कौन से हिस्से को खरीद लिया है, और उनके दबाव में किस चैनल या अखबार का रूख, किस नेता के लिए कैसा रह गया है, या हो गया है। 
इसमें भी हमको किसी तरह की हैरानी नहीं होती, क्योंकि मीडिया की आजादी का इस्तेमाल न तो आजादी की लड़ाई की तरह आज हो सकता है, और न ही उसकी जरूरत है। दरअसल लोगों को इस बारे में सोचने-विचारने की जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि मीडिया ने अपने-आपको एक कारोबार मानने से इंकार करते हुए अपने-आपको लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की खुद की बनाई हुई तख्ती से सजा रखा है। हकीकत यह है कि मीडिया की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी बातें मीडिया के मालिकों पर ही लागू होती हैं, न कि अखबारनवीसों पर, चैनलों के संपादकों या, रिपोर्टरों पर। हिंदुस्तानी लोकतंत्र में जिस तरह राजनीति एक कारोबार बन चुकी है, उसी तरह मीडिया भी एक पूरा कारोबार रहते आया है, और रहेगा भी। इसलिए दो उद्योगों या दो व्यापारों के बीच आपस में जैसे व्यापारिक संबंध रहते हैं, वैसे संबंध अगर मीडिया और राजनीति के बीच हैं, तो उसमें कुछ अटपटा नहीं है, और न ही हैरानी की कोई बात है। पवित्रतावादी-आदर्शवादी लोगों को हमारी यह व्याख्या कुछ घटिया लग सकती है, लेकिन हकीकत यही है। इससे परे किसी और लोकतांत्रिक रिश्ते की कल्पना करके कुछ लोग खुश रह सकते हैं।
एक बार फिर कल के उस टीवी प्रसारण पर लौटें, जिसमें मुरली मनोहर जोशी ने अपनी फजीहत करवाई है, तो यह साफ है कि बीते कल के एक नेता का, आज की हकीकत से कोई संपर्क नहीं रह गया है, और उनको आज के मीडिया की समझ भी नहीं रह गई है।

Bat ke bat, बात की बात,

21 april 2014

प्रवीण तोगडिय़ा मोदी के हिमायती हैं या दुश्मन?

21 अप्रैल 14
संपादकीय
जहर भरी और घोर साम्प्रदायिक बातें करने के लिए कुख्यात, विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिय़ा ने गुजरात में अभी एक हिन्दू बहुल बस्ती में एक मुस्लिम के मकान खरीदने के विरोध में वहां किए जा रहे आक्रामक धार्मिक प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए कहा कि हिन्दू संगठनों के लोगों को इस मकान पर कब्जा कर लेना चाहिए और हिन्दू बस्तियों में मुस्लिमों को मकान नहीं खरीदने देना चाहिए। इस खबर के सुबह आ जाने के बाद से लगातार इसके खिलाफ प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन अपने मिजाज के मुताबिक इस बात को कहने वाले प्रवीण तोगडिय़ा की तरफ से इसका कोई खंडन आठ घंटे बाद भी नहीं आया है, और इस वजह से यह मानने की कोई वजह नहीं है कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा होगा। 
यही मानकर हम इस बात पर आज यहां लिख रहे हैं कि ऐसी घोर साम्प्रदायिक बात न सिर्फ चुनाव के मौके पर बल्कि किसी भी मौके पर नहीं की जानी चाहिए, और इसके लिए चुनाव आयोग की जरूरत नहीं है, गुजरात के जिस शहर में मकान खरीदने वाले मुस्लिम के खिलाफ रामधुन और राम दरबार लगाकर ऐसा विरोध किया जा रहा है, उस शहर के अफसरों को बिना देर किए हुए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। पिछले दो-चार दिनों के भीतर देश के मुस्लिमों के खिलाफ आक्रामक हिन्दू नेताओं की कही हुई यह दूसरी-तीसरी बात है, और इसका भयानक असर देश के लोगों पर होना तय है। बाकी लोग तो जुबानी बयान देकर रह जा रहे हैं, लेकिन गुजरात में अगर मुस्लिम के मकान खरीदने पर भी सार्वजनिक हमलावर-हिंसक तेवरों से अगर हिन्दू संगठन दबाव डाल रहे हैं, तो इससे यह जाहिर है कि उस प्रदेश में कानून की हालत खराब है, और वैसी नहीं है, जैसी कि वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी देश भर में घूम-घूमकर बता रहे हैं। 
यहां पर इंसाफ के लिए, हमको यह चर्चा करना भी जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी से तोगडिय़ा के मतभेद और खराब रिश्ते बरसों से जगजाहिर हैं, और हम इसके पीछे अगर तोगडिय़ा की ऐसी कोई साजिश हो कि जिससे नरेन्द्र मोदी को नुकसान पहुंचता हो, तो हम उस खतरे से भी इंकार नहीं करेंगे। राजनीतिक दलों में, और उनके सहयोगी संगठनों में ऐसी कोई साजिश अनहोनी बात नहीं रहती, और तोगडिय़ा जैसे लोगों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए भी हो सकता है कि मोदी को हराना जरूरी हो। इसलिए हम अभी तोगडिय़ा की कही बात को मोदी की कही बात सीधे-सीधे नहीं मान रहे, क्योंकि अपनी पिछली साख के खिलाफ जाकर भी मोदी ने दो दिन पहले एक इंटरव्यू में यह कहा था कि वे धर्म के नाम पर वोट मांगने के बजाय हार जाना बेहतर समझेंगे। हमारे विचार इस पूरे मुद्दे पर अपने हैं, लेकिन सच के साथ इंसाफ के लिए यह जरूरी है कि हिन्दुत्व से जुड़े इन अलग-अलग मुद्दों को जोड़कर एक तस्वीर यहां रखी जाए, ताकि पाठक उसे पूरा समझ सकें। आज भी तोगडिय़ा के बयान के खिलाफ जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें बहुत से ऐसे हिन्दू लोग हैं जो कि अब तक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वे किसे वोट देंगे, लेकिन अब तोगडिय़ा की ऐसी हिंसक बात के बाद उन्होंने अपना दिमाग बना लिया है। 
आज हिन्दुस्तान के चुनाव में एक ऐसी तस्वीर बन रही है, और बनाई जा रही है कि लोग नरेन्द्र मोदी को एक हिन्दू नेता के रूप में साथ दे रहे हैं। हकीकत यह है कि आज का वोट केन्द्र की कांग्रेस अगुवाई वाली यूपीए सरकार के खिलाफ वोट है, राज्यों में मुलायम सिंह जैसे लोगों के खिलाफ वोट है, और जगह-जगह यूपीए के साथियों के खिलाफ वोट है। भाजपा और एनडीए की इतनी ताकत नहीं थी, और इतनी ताकत नहीं है कि वे देश में अपने बूते पर इतना माहौल बना पाते। लेकिन कांग्रेस और यूपीए के कुकर्मो ने देश में एक ऐसा शून्य खड़ा किया है कि उसमें नरेन्द्र मोदी टहलते हुए ही जा खड़े हुए हैं, और उन्होंने वह खाली जगह भर दी है। इसलिए आज जो लोग कांग्रेस से नाराज हैं, उन तमाम लोगों को हिन्दुत्ववादी, या मोदीवादी मानना ठीक नहीं है। कांग्रेस-यूपीए ने आम जनता को तकलीफ दे-देकर उनको एक ऐसे कोने में धकेल दिया है कि उनके पास मोदी और एनडीए के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। ऐसे में हम चुनावी नतीजों पर अटकल लगाए बिना भी, यह बात लिखना चाहते हैं कि इस चुनाव के नतीजों को हिन्दुत्व पर जनमत संग्रह नहीं माना जाना चाहिए। देश की जनता धर्म के आधार पर बंटी हुई नहीं है, और आने वाले चुनावी नतीजे मोटे तौर पर राजनीतिक मुद्दों पर फैसला सामने रखेंगे। 

Bat ke bat, बात की बात,

20 april 2014

बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इतिहास में बुद्धूजीवी दर्ज होंगे

20 अप्रैल 14
संपादकीय
भाजपा के उत्तर भारत के एक बड़बोले और हिंसक जुबान बोलने वाले नेता गिरिराज किशोर ने अपनी पार्टी के लिए एक नई दिक्कत खड़ी की है। जिस दिन नरेन्द्र मोदी एक टीवी इंटरव्यू में यह कह रहे हैं कि वे धर्म के नाम पर वोट मांगने के बजाय हार जाना पसंद करेंगे, उसी दिन गिरिराज किशोर ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके विरोधियों को पाकिस्तान जाना होगा। और ये ऐसी गंदी और राष्ट्रविरोधी बात कहने वाले वे अकेले नहीं हैं, उनकी पार्टी के नेता वरूण गांधी के हाथ काटने वाले वीडियो लोगों को याद हैं, और दूसरी भी कई पार्टियों के नेताओं ने तरह-तरह की हिंसक बातें पिछले दिनों में की हैं। और तो और जम्मू-कश्मीर पर तीन पीढ़ी से राज करते आ रहे फारूख अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि उनके हाथ अगर आतंकी होते, तो वे विरोधियों पर हमले करवाते। समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह ने और कई किस्म की गंदी और संविधान विरोधी बातें कहीं, और पूरी हवा ऐसी हो गई है कि मानो पूरा देश सबसे बुरी गंदगी का घूरा बन गया है। 
हमने अभी कल-परसों ही लिखा कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को चुनाव सुधार के लिए कुछ कोशिशें करनी चाहिए, लेकिन अब यह लग रहा है कि कानून जहां-जहां कार्रवाई न भी कर पाए, वहां-वहां मीडिया को और समाज के लोगों को खुद होकर गंदी बातों का खतरा उजागर करते हुए उसके खिलाफ खुलकर सामने आना चाहिए। जब एक राजनीतिक दल के बयान के खिलाफ दूसरे राजनीतिक दल की तरफ से कुछ कहा जाता है, तो उसका वजन कम होता है। जब राजनीति का हिस्सा न रहने वाली बाकी ताकतें, अपनी विश्वसनीयता के साथ हिंसक जुबान के खिलाफ कुछ कहेंगी, तो उसका वजन बहुत अधिक होगा, और ऐसा करना जरूरी भी है। 
समाज में जो लोग सोचना-विचारना जानते हैं, जो राजनीति और जिंदगी के बाकी मुद्दों की बारीकियों को समझते हैं, जो लोकतंत्र के पहलुओं को जानते हैं, और लोकतंत्र को बचाने में दिलचस्पी रखते हैं, वैसे लोगों को अलग-अलग छोटे-छोटे अनौपचारिक समूह बनाकर भी, अलोकतांत्रिक बयानों और हरकतों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। लोकतंत्र ने जब हर किसी को आजादी से जीने का हक दिया है, तो ऐसा हक बिना जिम्मेदारी के नहीं मिल सकता। और जो तबके अपने आपको पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी, और जिम्मेदार मानते हैं, उनकी चुप्पी मानो हिंसक बातों को मौन सहमति रहती है, देश में ऐसा लगता है कि ऐसी हिंसक और नाजायज बातों को देश मान रहा है। इसलिए चुप्पी को खत्म करने की जरूरत है, लोगों को खुलकर बोलने और लिखने की जरूरत है। 
राजनीति तो अपनी रफ्तार से, और अपने गैरजिम्मेदार तौर-तरीकों से चलती ही रहेगी, लेकिन राजनीति से परे के लोगों को इस देश को बचाने के लिए, इस लोकतंत्र को बचाने के लिए, गांधी की अहिंसा की सोच को बचाने के लिए, देश की धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए, गरीबों के हक को बचाने के लिए, मुंह खोलना पड़ेगा। वरना इतिहास याद रखेगा कि किस तरह लोकतांत्रिक अधिकार रहते हुए भी तथाकथित बुद्धिजीवियों ने नाजुक और जरूरी मौके पर अपना मुंह नहीं खोला। उतना भी नहीं बोला जितना कि सैकड़ों बरस पहले बिना लोकतंत्र, बिना अदालत, बिना मीडिया, बिना मानवाधिकार आयोग के कबीर ने कहा था। आज शायद ही ऐसे लोग सक्रिय दिखते हैं, जिनमें कबीर जितना कहने का हौसला हो। आज और कुछ नहीं, तो लोग कम से कम कबीर को पढ़ लें, और उस बारे में दूसरों से चर्चा ही कर लें। गांधी, भगतसिंह को पढ़ लें, और दूसरों से उस पर चर्चा कर लें। ऐसा न करने वाले बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इतिहास में बुद्धूजीवी दर्ज होंगे। 

अनचाहे चुनावी संदेशों से लेकर बदनीयत जुर्म वाले संदेशों तक

19 अप्रैल 14
संपादकीय
अभी चल रहे भारतीय आम चुनावों में ट्विटर पर अगर किसी ने मोदी शब्द भी लिख दिया, तो कम्प्यूटर की मदद से मोदी समर्थक ऐसे लोगों को मोदी के पक्ष में संदेश भेजना शुरू कर देते हैं। और लोगों को मशीनी मदद से ऐसे संदेशों से लाद दिया जा रहा है। यह कुछ उसी तरह का है, जिस तरह की लोगों के फोन पर घंटी बजती है, और नेताओं के रिकॉर्ड किए हुए संदेश उन्हीं की आवाज में आने लगते हैं। आज फोन, ई-मेल, और सोशल वेबसाईटों पर लोगों के अकाउंट की जानकारी आसानी से मिल जाती है, और उनको जिस तरह बाजार अपने विज्ञापनों से और अनचाही जानकारी से लाद देता है, उसी तरह राजनीतिक दल और उम्मीदवार यह काम कर रहे हैं। 
यह चुनाव निपट जाए इसके बाद चुनाव आयोग को, और शायद सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देकर लोगों को अनचाहे प्रचार के हमले का शिकार होने से बचाना चाहिए। आज टेक्नॉलाजी की वजह से यह आसान हो गया है कि लाखों-करोड़ों फोन नंबरों पर एक साथ प्रचार के संदेश भेज दिए जाएं। लेकिन इससे लोगों का सुख-चैन छिनता है, और उनको बार-बार अपना फोन उठाकर बाजारू प्रचार का यह हमला देखना पड़ता है। जब कोई देश और समाज टेक्नॉलाजी के विकास का फायदा उठाने की हालत में आते हैं, तो उसी वक्त इस तरह के हमले भी बढ़ते हैं, और ऐसे नाजायज और अनचाहे हमलों को रोकने के लिए सरकार को दखल देनी चाहिए, अदालत को भी पहल करनी चाहिए, और दूरसंचार को नियमित करने के लिए बनाए गए नियामक आयोग को भी अपना जिम्मा निभाना चाहिए। 
आज का जमाना सूचना के बोझ का है। बहुत से लोग अपने खुद के काम के बोझ से इतने दबे रहते हैं, कि उनकी जिंदगी में फालतू के प्रचार को झेलने का वक्त नहीं रहता। चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों से यह जवाब मांगना चाहिए कि जिन फोन नंबरों, ई-मेल खातों, और ट्विटर या फेसबुक अकाउंट पर वे संदेश भेज रहे हैं, वहां क्या वे पाने वालों को यह भी बता रहे हैं कि प्रचार का यह कूड़ा वे कैसे रोक सकते हैं? जिस तरह चुनाव आयोग ने दीवारों को रंगना बंद करवाया है, उसी तरह की डिजिटल गंदगी भी रोकनी चाहिए। टेक्नॉलाजी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने देने की इजाजत किसी को नहीं देनी चाहिए। 
इससे लगी हुई एक दूसरी बात यह है कि इंटरनेट, और फोन पर जो लोग झूठी जानकारी फैलाते हैं, गुमनाम अफवाहें फैलाते हैं, और दूसरों को बदनाम करने के लिए गढ़ी हुई तस्वीरें फैलाते हैं, दंगों के वक्त दूसरे देशों के दंगों को हिन्दुस्तान की हिंसा बताकर वीडियो फैलाते हैं, उनके खिलाफ चुनाव आयोग से लेकर सरकार तक, और अदालत तक, सबको तेजी से कार्रवाई इसलिए करनी चाहिए क्योंकि डिजिटल सुबूत आसान होते हैं, और उनके मार्फत ऐसे मुजरिमों को पकड़कर जब तक तेजी से सजा नहीं मिलेगी, तब तक बाकी लोगों को यह अंदाज भी नहीं लगेगा कि उनकी ऐसी हरकतें उन्हें जेल भेज सकती हैं। अभी तक हमने आईटी एक्ट के तहत सजा पाते हुए लोगों को नहीं देखा है, और कुछ लोग अदालती कार्रवाई तक ही पहुंच पाए हैं। भारतीय अदालतों की धीमी रफ्तार और डिजिटल टेक्नॉलाजी की तेज रफ्तार के चलते ऐसे मुजरिम और ऐसे जुर्म बढ़ते ही चले जाएंगे। इसलिए बाजार से लेकर राजनीति तक अनचाहे संदेशों से लेकर बदनीयत जुर्म वाले संदेशों तक पर तेजी से कार्रवाई की जरूरत है। भारत की संवैधानिक संस्थाएं अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। 

लोकतंत्र को बचाने के लिए चुनाव सुधार की जरूरत...

18 अप्रैल 14
संपादकीय

महाराष्ट्र की खबर है कि किस तरह वहां के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने अपनी भतीजी, और शरद पवार की बेटी, सुप्रिया सुले के लिए वोट मांगते हुए खुली धमकी दी कि अगर वोट नहीं मिला तो गांव के लोगों को पानी मिलना भी बंद हो जाएगा। देश भर में जगह-जगह नेता हिंसक बातें कर रहे हैं, दूसरों को गंदी गालियां दे रहे हैं, और चुनाव प्रचार को लेकर एक हिंसक और बदबूदार माहौल खड़ा कर रहे हैं। ऐसे में चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं पर मामूली रोक लगाई है, लेकिन आज की गंदगी पर इससे कोई फर्क पड़ते नहीं दिख रहा है। ऐसे में जरूरत एक ऐसे कारगर कानून की है, या कि मौजूदा कानून के भीतर ऐसी कारगर कार्रवाई की है कि जिससे गंदी बातों का यह सिलसिला, धमकी, और साम्प्रदायिकता, नफरत, इन सबको रोका जा सके। 
भारत में चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया पर मतदान और मतगणना की हद तक तो काबू कर लिया है, लेकिन चुनाव प्रचार की गंदगी, चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल, बेईमानी और भ्रष्टाचार, खरीद-बिक्री पर कोई भी काबू नहीं हो पाया है, और इसी का नतीजा है कि धीरे-धीरे राजनीति में अब हिंसक-मुजरिम उम्मीदवार कम हो रहे हैं, और आर्थिक-अपराधी-कारोबारी उम्मीदवार बढ़ते चले जा रहे हैं। लगातार करोड़पति और अरबपति लोग न सिर्फ चुनावों में टिकट अधिक पा रहे हैं, बल्कि संसद और विधानसभाओं में भी उनकी आबादी बढ़ती जा रही है। नतीजा यह हो रहा है कि चुनाव के वक्त तो चुनाव को खरीदने की ताकत एक बड़ा पैमाना मान ली गई है, और उसके बाद का नतीजा यह होता है कि संसद और विधानसभाओं में गरीबी की समझ रखने वाले लोग घटते चले जा रहे हैं, और उनसे जुड़े मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। भारत का चुनाव आयोग दुनिया भर में जिस बात के लिए वाहवाही पा रहा है, उससे अधिक करने की जरूरत है। सिर्फ मतदान केन्द्रों पर कब्जा रोकना काफी नहीं है। मतदान को खरीदने की ताकत का हिंसक और अश्लील इस्तेमाल भी रोका जाना चाहिए, वरना लोकतंत्र का बाजारीकरण भी हो रहा है, और बाजारूकरण भी हो रहा है। कारोबार ने अपने ही एक डिपार्टमेंट की तरह देश की संसदीय राजनीति को खरीदकर रखने का काम किया है, और भारत के चुनाव कानून, संसदीय कानून, ये सब मिलकर भी इसे रोक नहीं पा रहे हैं। एक तरफ संसद अपनी विशेषाधिकार को इंसाफ के ऊपर लेकर चल रही है और यही वजह है कि जब झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को खरीदकर नरसिंह राव की सरकार बचाई गई थी, तब सब कुछ साबित हो जाने के बाद भी मामला संसद के भीतर का होने की वजह से देश की अदालत बिके हुए लोगों का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई थी। 
लोकतंत्र के तहत संसदीय व्यवस्था को, लोकतंत्र से भी पहले के प्राकृतिक और बुनियादी इंसाफ के ऊपर मान लेना एक गलती है। भारत में चुनाव सुधार के लिए न सिर्फ चुनाव कानूनों को सुधारने की जरूरत है, बल्कि संसद और विधानसभा के ऐसे विशेषाधिकार खत्म करने की भी जरूरत है जो कि भ्रष्ट सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। कुल मिलाकर आज की तस्वीर यह है कि जो पार्टियां चुनाव के पहले कारोबारियों के हाथ नहीं बिकतीं, वे संसद बन जाने के बाद, विधानसभा बन जाने के बाद वहां के मतदान के मौकों पर बिक जाती हैं, सवाल पूछने के मौकों पर बिक जाती हैं। यह नौबत सुधारना अधिकतर राजनीतिक दलों को गैरजरूरी लग सकता है क्योंकि ऐसा भ्रष्टाचार विपक्ष में बैठी पार्टियों को भी भ्रष्टाचार का मौका देता है, और उनकी भी कीमत लगती है। लेकिन हिन्दुस्तान को बचाने की फिक्र जिन लोगों को है, उनको चुनावों में पैसों के बोलबाले को खत्म करना होगा, वरना लोकतंत्र खत्म हो रहा है, और गरीबों का हक खत्म हो चुका है। 
चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को संविधान के बुनियादी ढांचे के भीतर इस सुधार की कोशिश करनी होगी क्योंकि संसद में बिके हुए लोग ऐसा होने नहीं देंगे। हमारा यह मानना है कि भारतीय संविधान को बनाने वाले उस वक्त के महान नेताओं ने इस संविधान की भावना में ऐसे सुधार की गुंजाइश रखी है, और आज सुप्रीम कोर्ट को उसका इस्तेमाल करना चाहिए। 

अपने वोट के हक से और आगे बढ़कर एक हक और

17 अप्रैल 2014
संपादकीय

भारत जैसे चुनाव पर आधारित संसदीय लोकतंत्र में बहुत समय तक तो आम जनता को सिर्फ सुनना या पढऩा नसीब होता था। लेकिन अब वक्त बदल गया है, कम्प्यूटर, फोन, इंटरनेट, और सोशल मीडिया में लोगों को सही मायनों में मुफ्त और बड़ा आसान हक दे दिया है, अभिव्यक्ति की आजादी का। इसलिए आज चुनाव के बीच में भी हम बचे हुए मतदान को लेकर यह बात लिख रहे हैं कि इस हक का इस्तेमाल करते हुए लोगों को अपनी पसंद और नापसंद से दूसरे लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे लोग अपनी खुद की सोच को आगे बढ़ा सकते हैं, और देश की अगली सरकार को अपनी मर्जी का लाने की कोशिश कर सकते हैं। 
लेकिन ऐसा करते हुए लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि उनकी कही हुई या फैलाई गई बातों के साथ-साथ उनकी अपनी साख भी जुड़ी रहती है, इसलिए कभी सच का साथ न छोड़ें, कभी झूठ का ढिंढोरा न पीटें। आज का वक्त इंटरनेट की मेहरबानी से झूठ को बहुत रफ्तार से पकड़ लेता है, और उसे नंगा करके चौराहे पर बांध भी देता है। ऐसे झूठ के साथ अगर आपका नाम जुड़ा रहे, तो इससे आपकी साख इस हद तक चौपट हो जाती है कि आपकी कही बाकी की सच बातें भी लोगों का भरोसा नहीं जीत पातीं। झूठे इंसानों का कहा हुआ सच भी उनकी खराब साख की वजह से राख सा हो जाता है। 
लोकतंत्र में लोगों को अपनी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, और आर्थिक सोच को फैलाने का काम करना चाहिए, इसलिए भी कि अगर सोच के रास्ते से कोई विचारधारा आगे नहीं बढ़ती, तो फिर वह हिंसा के रास्ते आगे बढ़ती है। इसलिए अहिंसक और न्यायप्रिय तरीका विचारों से दूसरों को सहमत कराने का होता है। आज यह बात इसलिए जरूरी है कि बचे हुए मतदान के लिए भी अगर लोग अपने आसपास के दायरे को प्रभावित करके, या कम से कम उसकी कोशिश करके, और लोगों को भी वोट डालने के लिए ले जाते हैं, तो वे भ्रष्ट नेताओं और पार्टियों के नोटों की कोशिशों के मुकाबले एक अच्छी कोशिश होगी। विचारों का फैलाव आज संगठन और बड़े नेता एक सोची-समझी योजना और रणनीति के तहत करते हैं। लेकिन जब आम लोग अपने-अपने दायरों के भीतर, उसके बाहर भी आसपास के लोगों तक ऐसी कोशिश करेंगे, तो वह तरीका अधिक लोकतांत्रिक होगा, अधिक विविधताओं से भरा हुआ होगा, और उसका नतीजा समाज के व्यापक हित में अधिक दूर तक काम आएगा। 
विधानसभा चुनाव के समय हमने यह बात लिखी थी कि हममें से हर कोई अगर आसपास के दस घर बैठे लोगों को भी वोट डालने के लिए ले जाने में कामयाबी हासिल करे, तो उससे पूरी तस्वीर ही बदल सकती है। ऐसे लोग अपनी इस कोशिश के साथ-साथ अपनी पसंद और अपनी विचारधारा भी लोगों के दिमाग में बिठा सकते हैं, और ऐसा काम नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। खुद के वोट का हक तो एक चुनाव में महज एक बार मिलता है, लेकिन दूसरों को प्रभावित करने का हक तो बाकी के पूरे दिन अपने इलाके में मिलता है, और फोन पर, इंटरनेट पर किसी भी दिन किसी भी दूसरे इलाके में भी अपनी बात पहुंचाने के लिए मिलता है। इसलिए  हर किसी को आज न सिर्फ अपने खुद के वोट को डालना अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए, बल्कि दूसरे लोगों के वोट डलवाने को भी अपनी जिम्मेदारी मानना चाहिए। एक नए लोकतंत्र के लिए सत्ता के चले आ रहे ढांचे के ढर्रे को तोडऩा जरूरी है, और यह काम आम जनता ही कर सकती है। जिस तरह अपनी मौत के बाद के लिए लोग अपनी आंखें दूसरे जरूरतमंद के लिए छोड़कर जा सकते हैं, और उस तरह उनकी आंखें किसी दूसरे बदन में एक नई जिंदगी पा सकती हैं, उसी तरह अपने वोट के अलावा दूसरे वोट प्रभावित करने से आप एक ऐसा हक पा सकते हैं, जो कि कानून ने आपको नहीं दिया है, लेकिन आपकी कोशिश और आपका असर दूसरों की ऊंगलियों के मार्फत आपको यह हक दिला सकता है। 

यह आम मीडिया है, या महज राजनीति मीडिया?

16 अप्रैल 2014
संपादकीय
भारत के मीडिया को देखें, तो पिछले कई महीनों से राजनीति खबरों पर, और विचारों के पन्नों पर भी इस कदर हावी है कि जिंदगी में मानो और कोई बात ही नहीं है। चुनाव अहमियत जरूर रखते हैं, लेकिन चुनावों से परे भी बहुत सी ऐसी बातें होती हैं, जिनके बारे में अखबारों को पढऩे वालों, और टीवी की खबरों को देखने वालों को मालूम होना चाहिए। हम खुद अखबार और टीवी के भरोसे दिन नहीं गुजार पाते, और इस अखबार को तैयार करते हुए ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क को लगातार देखने पर मजबूर रहते हैं, जहां पर कि भारतीय राजनीति से परे खबरें भी भरी रहती हैं। यह हालत मीडिया के कारोबार का एक बहुत आक्रामक तेवर बताती है कि जो सबसे अधिक बिक सकता हो, उसे सबसे अधिक दुह लिया जाए। राजनीति ऐसे ही सबसे अधिक बिकने वाले दो-तीन सामानों में से एक है।
ऐसे में हम उम्र गुजार चुके लोगों के बारे में अधिक फिक्रमंद नहीं हैं, लेकिन जो नई पीढ़ी राजनीति से परे भी बहुत कुछ जानना चाहती है, जिसके लिए दुनिया और जिंदगी के हर पहलू की जानकारी आगे के मुकाबले के लिए जरूरी रहती है, उस पीढ़ी को हिंदुस्तान का आज का मीडिया बहुत ही सीमित दायरे में जानकारी देकर अधर में छोड़ दे रहा है। जिस तरह हिंदुस्तान का खेल क्रिकेट के बोझ से दबकर बाकी लगभग तमाम खेलों को बच्चों के स्तर पर खो सा चुका है, उसी तरह राजनीति में खबरों को दबाकर, कुचलकर, उन पर लगभग एकाधिकार कायम कर लिया है।
यह नौबत इसलिए ठीक नहीं है, कि राजनीति महज राजनीतिक दलों, नेताओं, और चुनावों की बात नहीं होनी चाहिए। राजनीति के साथ जिंदगी के बाकी तमाम पहलुओं का भी एक रिश्ता होना चाहिए, लेकिन आज मानो वह सब खत्म हो चुका है। कला, संगीत, साहित्य, इतिहास, पढ़ाई-लिखाई, टेक्नॉलॉजी, समाज, ऐसे तमाम पहलुओं के बारे में इतना कम पढऩे मिल रहा है, और इतना कम देखने मिल रहा है, कि भारत के मूलधारा के मीडिया को राजनीति मीडिया कहना शायद ज्यादा सही होगा। जिस तरह कुछ अखबार कारोबार के अखबार रहते हैं, और कारोबार की ही खबरों को अधिक छापते हैं, उन अखबारों के पाठकों को बाकी बातों से अधिक लेना-देना नहीं रहता, उसी तरह आज आम अखबार राजनीति की खबरों पर जाकर थम जा रहे हैं। जिंदगी के बहुत से इतने अच्छे पहलू रहते हैं, कि उनके बारे में जानकर लोग राजनीति कडुवाहट से उबर भी सकते हैं, लेकिन उनके लिए मीडिया में कोई जगह नहीं रह गई। हो सकता है कि मीडिया का एक हिस्सा इन आम चुनावों के निकल जाने के बाद एक नए किस्म का मीडिया बनने की कोशिश करे और वह ताजी हवा का एक झोंका हो सकता है, और यह भी हो सकता है कि वह मीडिया के कारोबार के लिए भी एक बेहतर नौबत रहे।

अफसरों और सरकार के बीच क्यों न हो करार

संपादकीय 
15 अप्रैल 2014
यूपीए-1 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू, और कोलगेट के दौरान कोयला सचिव रह चुके पीसी परख की किताब से सहमी कांग्रेस, यह खैर मना सकती है कि, अपनी ऑडिट रिपोर्टों से यूपीए-2 के पैरों तले कालीन खींचने वाले कैग विनोद राय ने, अपने किताब चुनाव पूरे हो जाने के बाद लाने का फैसला किया है। इन दोनों पूर्व अफसरों की किताबों के सामने आने के वक्त पर, उनमें लिखी बातों के सच, या झूठ होने के अलावा यह मुद्दा भी उठाया जा रहा है कि इन्होंने किसी ओहदे में रहने के कारण मिली सरकार की भीतरी बातों तक अपनी पहुंच का गलत फायदा पैसे कमाने, या राजनीतिक मकसद के लिए उठाया। जहां तक इन किताबों में लिखी बातों में से किसी के झूठ होने का डर है, तो इसके लिए देश में कई कानून है, जिनका सहारा लेकर, कांग्रेस पार्टी लेखक बने इन पुराने अफसरों से निबट सकती है। लेकिन अगर यह मुद्दा किसी अहम ओहदे पर होने की वजह से किसी गोपनीय, या निजी जानकारी को बेचने का है, तो यह देखना सरकार की जिम्मेदारी है, कि वह ऐसी बातें कैसे रोके। पुराने साथियों के लिखे संस्मरणों से दो पक्षों में आपसी मनमुटाव, या कड़वाहट उनका आपसी मामला हो सकता है, लेकिन जनता के पैसों से तनख्वाह पाने वाले अफसर, अगर अपनी किताबों के जरिये ,किसी संवैधानिक स्थिति के कारण मिले अधिकारों का  निजी फायदा उठाए, या देश के भीतर संवैधानिक ढांचे को नुकसान पहुंचाए, या सरकारी तनख्वाह पाते हुए इक_ा की गई जानकारी का इस्तेमाल जनता की बजाए किसी निजी पक्ष के फायदे के लिए करे, तब यह सोचना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, कि इसे कैसे रोका जाए।
पिछले कुछ सालों में सेना, न्यायपालिका, सरकारी कंपनियों, पुलिसबल वगैरह में अपनी नौकरियां छोड़कर अफसरों के सीधे चुनाव में कूदने, या सरकार के मुकाबले खड़ी कंपनियों में ऊंचे ओहदों पर चले जाने पर काफी बहस हुई, और एक "कूलिंग ऑफ पीरियड" की जरूरत का भी चर्चा हुआ। बहुत से मामलों में देखा गया कि अफसर ऐसी व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए किसे कंपनी में कोई पद लेने की बजाय उसके सलाहकार बनाया, कायदे तोड़ते मरोड़ते रहे। गोपनीयता की जिम्मेदारी वाले पदों पर रहे अफसर नौकरी छोड़ सीधे विरोधी दलों में शामिल हो गए, और सरकार की  संवेदनशील जानकारियों पर खुली बयानबाजी करने लगे। यह भी देखा गया कि, सेना में हथियारों की खरीद से जुड़े महकमे में रहे अफसर, हथियार  या रक्षा सामान बेचने वाली कंपनियों के जन संपर्क एजेंट या अफसर बन गए, दूरसंचार विभाग के अफसर टेलिकॉम कंपनियों के अफसर या सलाहकार बन गए।
हमारा मानना है कि ऐसी बातों के नुकसान उठाने से बचने के लिए, सरकार जिन्हें नौकरी दे, उनके साथ कानूनी करार कर ले कि, वह नौकरी छोडऩे के कितने समय तक, किस किस तरह की कंपनियो में,  किस किस तरह के पद नहीं ले सकते, क्या-क्या नहीं लिख सकते, और अगर उन्होंने ऐसा किया, तो उसकी सजा, या जुर्माना क्या क्या हो सकताहै? सरकारी पदों पर जनता के पैसों से तनख्वाह पाने वाले अफसरों को सरकार के साथ  यह करार करना  जरूरी कर दिया जाए।  ऐसा नहीं कि, बोलने लिखने की आजादी से हमारा कोई विरोध है, बल्कि हम यह भी कहते हैं कि अहम ओहदों पर रहते हुए जिम्मेदार लोग अगर अपने कामों का दस्तावेजीकरण करें, अपने ओहदे से जुड़ी अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्हें दर्ज भी करें, तो यह एक अच्छी बात होती है। इससे एक  सामयिक इतिहास दर्ज होते चलता है , लेकिन जब इसमें किसी दूसरे के बारे में किसी की राय दर्ज होने लगती है, तो यह एक संजीदा मसला बन जाता है। तब किसी ओहदे पर रहने के कारण कहीं तक मिली पहुंच को उजागर करने की इजाज़त देने की आजादी को कानूनी तराजू में तौलना जरूरी हो जाता है। सरकार चाहे तो किसी सरकारी अफसर के पद छोडऩे के एक तय समय तक, ऐसी कोई जानकारी उजागर करने के लिए किसी इतने तगड़े जुर्माने की शर्त भी करार में लगा सकती है, जिसके बाद संगीन जानकारियां उजागर करने का उत्साह, या लालच दोनों खत्म ही हो जाए। इसके बाद भी अगर किसी को लगता है कि देश, जनता के  फायदे के लिए उसका मुंह खोलना जरूरी है, तो वह जनता के लिए अपनी वफादारी की खातिर, करार में तय रकम अदाकर वह यह राज उजागर कर सकता है।

अमूमन संवैधानिक संस्थाओं, जैसे संसद, नगरपालिकाओं, पंचायतों के कार्यकाल 5 बरस के होते हैं, इसलिए राजनीतिक दल अक्सर उनके हितों के खिलाफ काम करने वालों को 6 साल के लिए निकालते हंै, ताकि कम से कम एक कार्यकाल तक ऐसे लोग दल में ना लौट सकें। हमारा भी सुझाव है कि सरकार अफसरों पर, नौकरी छोडऩे के 6 साल तक संस्मरण लिखने, सरकार के मुकाबले व्यापार कर रही कंपनियों, या  सरकार से फायदे उठाने वाली कंपनियों में नौकरियां लेने पर रोक लगा सकती है। ऐसा करने पर एक सरकार 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और ओहदे के कारण किसी जानकारी तक पहुंच रखने वालों से उसे नुकसान उठाने का डर भी नहीं रहेगा। हम इसे सरकार बनाम निजी आजादी के मुद्दे की तरह नहीं देखते। अगर सरकारी ओहदों पर आने वालों को लगता है कि ऐसी शर्तों से उनका नुकसान होता है, तो वह सरकार से, ऐसा करार करने के पहले ज्यादा तनख्वाह या सुविधाओं की मांग कर सकते हंै। हमारी समझ से सरकार या संवैधानिक संस्थाओं की साख खराब होने, या जनता के पैसे से तनख्वाह पाने की जवाबदेही भूलने के खतरे से, यह कीमत कम होगी।

मुजरिमों की चपेट में समलैंगिक-यह तो होना ही था

संपादकीय
14 अप्रैल 2014

मुंबई से खबर है कि जब से सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को उलट कर, इसे एक जुर्म करार देने वाली धारा 377 को  सही ठहराया है, तब से समलैंगिकों के साथ हिंसा, लूट और उनके ब्लैकमेल की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। समलैंगिकों को निशाना बनाने वाले  अपराधी गुट सक्रिय हो गए हैं। इनकी जांच करने पर देश में समलैंगिकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने पाया कि यह अपराधी गुट एक ही जैसे तौर तरीके अपना कर समलैंगिकों को निशाना बनाते हंै,और जब वह पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने जाते हंै, तो पुलिस उनसे ही उल्टा पूछती है कि कहीं वह समलैंगिक तो नहीं। पिछले साल दिसम्बर में जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ फैसला देते हुए, समलैंगिकता के निरपराधीकरण का जिम्मा संसद पर डाल दिया था, तभी समलैंगिकों के साथ ऐसे हादसे होने का डर जताया गया था। आज वह डर सच साबित हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की कई विशेषज्ञों ने  कड़ी आलोचना की थी। खुद यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस फैसले पर चिंता जताई  थी, लेकिन चुनाव के साल में, जब जाति धर्म के सहारे  वोट बटोरे जाते हंै, अल्प संख्यकों की भलाई की बातें की जाती हंै, तब देश का कौन सा राजनीतिक दल धर्मगुरुओं की नाराजग़ी मोल लेकर, देश के इन अल्पसंख्यकों के हक में खड़ा होगा?    
मजे की बात यह है कि, समलैंगिकता  को जिन अंग्रेजों ने 16 वीं सदी में भारत में जुर्म करार दिया, उन्होंने 1967 में ही अपने देश में इसे जुर्म मानना बंद कर दिया था। लेकिन हिन्दुस्तान में जैसा कहते हंै- अंग्रेज  चले गए, यह पाखंड छोड़ गए, जिसे यहां जाने किसलिए निभाया जा रहा है। वर्ना दिल्ली हाई कोर्ट ने तकरीबन पांच साल पहले के अपने फैसले में साफ कहा था कि दो बालिगों की आपसी रजामंदी  से बनने वाले ऐसे  संबंधों को जुर्म मानना भारतीय संविधान में दिए गए कई बुनियादी अधिकारों की अवहेलना है। अदालत ने इस फैसले में, संविधान सभा में, जवाहरलाल नेहरु की कही उस बात का भी हवाला दिया था, जो हमारे संविधान की आत्मा कही जाने वाली उसकी प्रस्तावना की नींव है। इसके मुताबिक समाज में हर एक व्यक्ति की अपनी एक अहम जगह है, और किसी को सिफऱ् इसलिए अलग थलग नहीं किया जा सकता कि बहुमत की राय में वह 'दूसरों से अलगÓ है। अदालत ने तब यह भी कहा था कि  भेदभाव समानता का दुश्मन है,और हर एक के आत्मसम्मान के लिए समानता का अधिकार की जरूरी है। यही नहीं, अदालत ने यह भी माना था कि  चिकित्सा, और मनोविज्ञान के विशेषज्ञ समलैंगिकता को बीमारी, या मानसिक असंतुलन नहीं, बल्कि यौन-व्यवहार का एक प्रकार मानते हैं।
समलैंगिकता को दुनिया भर में कानूनी मान्यता देने का दौर चल रहा है। ऐसे समय में, जब भारत में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत से मामलों में अपने दायरे से चार कदम आगे बढ़कर दखल दिया है, एक ऐसे काम में उसका एक जरूरी जिम्मेदारी से पीछे हटना, जिसे वह अपने दायरे में रहकर कर सकता था,बहुत ही निराश करने वाला है। उसके बुरे नतीजे हम देख रहे हैं।
समलैंगिकता,और इससे जुड़े कुछ दूसरे सेक्स-पहलुओं पर बना यह कानून,अपने ही देश में न सिर्फ समलैंगिक, बल्कि आम पति-पत्नी किस तरह सेक्स न करें, यह हुक्म देने वाला एक अंग्रेज-ईसाई कानून है। यह न केवल समलैंगिकों के लिए एक काला कानून है, बल्कि इसमें पति-पत्नी के बीच भी बहुत सी बातों को जुर्म ठहराया गया है, और इसके लिए उनको सजा दी जा सकती है। यह एक बहुत ही घटिया सोच है, और धर्म जैसी घटिया संस्था ही अपने सदस्यों पर ऐसे कानून लाद सकती है। और धर्म के तहत काम करने वाले अंग्रेज राजा ही अपने गुलामों पर ऐसे कानून लादते थे। समता को संविधान में बुनियादी हक के रूप में अपने नागरिकों को देने वाले भारत के प्रजातंत्र में, इस तरह  कानून के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपनी सीमा में रहते हुए एक सुधारवादी, और अच्छा फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने देश की जनता के बुनियादी हकों के खिलाफ फैसला देते हुए नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वालों को तो सदमा दिया ही, अब मुंबई  से आ रही खबरें पढ़कर पता चल रहा है कि इससे अपराधी मानसिकता वालों को एक नई शह मिली है। पहले से ही समाज में अलगाव और तिरस्कार झेल रहे समलैंगिकों की मुसीबतें बढ़ गई हैं।
आज जब पूरी दुनिया में लोगों की निजी जिंदगी की आज़ादी को बढ़ावा दिया जा रहा है, ऐसे में हिन्दुस्तान में एक अजीब स्थिति यह पैदा हो गई है कि अपने अपने धर्म को दूसरे के धर्म से बढ़कर मानने वाले, किसी भी बात पर एक दूसरे से सहमत नहीं होने वाले तकरीबन तमाम धर्मों के नेता, चर्च के लादे  इस कानून के हिमायती होकर, देश के नागरिकों से, संविधान में मिले उनके अधिकार छीन लेना चाहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसला आने पर हमने यह कहा था कि यह मामला महज समलैंगिकता का नहीं है, यह निजी आजादी का मामला है। आज अगर एक ऐसा दकियानूसी कानून जायज करार दिया जा रहा है, जिसे खुद चर्च भी कब का खारिज कर चुका है, तो फिर देश की ऐसी अदालतें, और ऐसे जज, ऐसे और भी बहुत से कट्टरतावादी, पाखंडी, और स्वतंत्रता-विरोधी फैसले ला सकते हैं। इस फैसले से समलैंगिकता पर रोक नहीं लग रही है, लेकिन निहत्थे, बेकुसूर समलैंगिक लूट, हिंसा, और ब्लैकमेल का शिकार हो कर एक नए डर में धकेल दिए गए है। आज  सुप्रीम कोर्ट को यह समझने की जरूरत है,कि वह इस मामले पर  एक अधिक बड़ी बेंच बैठा कर, पिछले साल दो जजों की बेंच  द्वारा दिए गए इस फैसले मे की गई गलती सुधारने की पहल करे। इसके लिए ऐसे जजों की नियुक्ति करे, जो लोगों की निजी आजादी की अहमियत समझते हों। सुप्रीम कोर्ट मानवता और बुनियादी अधिकारों के हक में जितनी आसानी से यह मामला सुलझा सकेगा, मत बैंकों के दबाव में राजनीति करने को मजबूर राजनीतिक दलों का पाखंड संसद में उतनी आसनी से उन्हें ऐसा करने की इजाज़त नहीं देगा। इसलिए हम चाहते हंै कि समाज में नाइंसाफी झेलते इस तबके की तरफ, सुप्रीम कोर्ट अपनी जिम्मेदारी समझे, और संविधान, समाज, विज्ञान, और मनोविज्ञान, सबके लिहाज से एक गलत फैसला देने के इल्जाम से उबर जाए। मुंबई से आई खबर दीवार पर लिखी एक इबारत की तरह जितनी जल्दी पढऩे में, और हालात सुधारने  में काम आए, देश के लिए उतना ही बेहतर होगा।

एम्बुलेंस, और नक्सल हमले पर कड़वे फैसले की जरूरत

13 अप्रैल 2014
संपादकीय
बस्तर में कल फिर नक्सल हमला हुआ, और मतदान की ड्यूटी में लगे हुए लोगों में से दर्जन भर लोग शहीद हो गए। इनमें से आधे मतदान कर्मचारी, और बाकी आधे ऐसे सुरक्षा कर्मचारी थे जो कि सड़कों की जांच-पड़ताल करके रास्ते के खतरे के बीच लौट रहे थे, और उन्होंने वहां से गुजरती हुए एक एम्बुलेंस में लिफ्ट ले ली थी। नक्सलियों ने इस एम्बुलेंस पर भी हमला किया, और इससे यह बात जाहिर है कि उनकी नजर इसके भीतर के सुरक्षा कर्मचारियों पर भी बनी हुई थी। यहां पर हम दो-तीन बातों पर लिखना नहीं चाहते हैं, क्योंकि इन पहलुओं पर हम लगातार लिखते आए हैं। नक्सलियों को हिंसा न करने की कोई ताजा नसीहत देने का कोई नया इस्तेमाल अभी नहीं दिखता है, इसलिए हम हमेशा से लिखी आ रही अपनी बातों पर कायम हैं। दूसरी बात यह कि ऐसी शहादत को देखते हुए प्रदेश और देश के बाकी हिस्सों में बचा हुआ मतदान अधिक से अधिक होना चाहिए, क्योंकि जिस देश में लोग दूसरों के वोट डालने के इंतजाम में अपनी जान दे रहे हैं, वहां भी अगर बाकी वोटर अपने इस हक की अहमियत न समझें, तो यह उनके लिए डूब मरने की बात होगी। तीसरी बात जो हम आज यहां लिखना नहीं चाहते, वह यह है कि छत्तीसगढ़ सरकार के खुफिया विभाग, और मैदानी पुलिस के बीच तालमेल की कोई कमी है, या नहीं, इस पर भी इस जगह लिखने को हमारे पास कोई ताजा विचार नहीं हैं। 
अब बस्तर की कल की इस घटना के साथ एक बहुत ही बुरी यह जानकारी भी जुड़ी हुई है कि दो बरस पहले इसी दिन इसी बस्तर में इन्हीं नक्सलियों ने बीमार बच्चों को अस्पताल ले जा रही एक और एम्बुलेंस पर हमला किया था। अब कल उन्होंने जिस एम्बुलेंस पर हमला किया, वह सुरक्षा कर्मचारियों से भरी हुई थी, और उसे विस्फोट से उड़ाने के पीछे नक्सलियों का एक अलग तर्क हो सकता है। लेकिन यहां दो बातों को सोचने की जरूरत है। एक तो यह कि बस्तर जैसी भयानक नौबत के बीच, जान के खतरे के बीच भी अगर सुरक्षा कर्मचारी एम्बुलेंस का इस्तेमाल करते हैं, तो फिर वे बस्तर की बाकी एम्बुलेंस भी खतरे में डालते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के बीच भी ये नियम कायम रहते हैं कि एम्बुलेंस पर हमले न किए जाएं, लेकिन इसके साथ-साथ ये शर्त भी जुड़ी रहती है कि एम्बुलेंस का फौजी या पुलिसिया इस्तेमाल न हो। इस बात को हम अच्छी तरह समझते हैं कि जब बस्तर जैसे खतरनाक मोर्चे पर सुरक्षा कर्मचारी कदम-कदम पर जान जोखिम में डालकर रास्ता तय करते हैं, तो एम्बुलेंस के इस्तेमाल न करने की बात शहरी, कागजी, और दफ्तरी बात होकर रह जाती है। सबसे बड़ी बात जब अपनी जिंदगी को बचाना रहता है, तो फिर किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के बारे में सोचना मुमकिन नहीं रहता। लेकिन ऐसी आत्मरक्षा के साथ जुड़े हुए खतरों के बारे में भी सोचना होगा जब बाकी एम्बुलेंस भी निशाने पर आ सकती हैं। 
छत्तीसगढ़ में ही पिछले विधानसभा चुनाव को लेकर अभी बिना किसी सुबूत वाली ऐसी बात सुनने मिली है कि पूरे प्रदेश में चलने वाली 108 नंबर की एम्बुलेंस में चुनावी शराब ढोई गई थी। इसी तरह लोगों को याद होगा कि पाकिस्तान में जब ओसामा-बिन-लादेन की शिनाख्त तय करने के लिए अमरीकी खुफिया एजेंटों ने पाकिस्तानी टीकाकरण कार्यक्रम के कर्मचारियों का इस्तेमाल किया था, तो भी हमने उस चर्चा के संदर्भ में कई बार लिखा था कि वह काम चूंकि एक सरकार सोचा-समझा काम था, इसलिए टीकाकरण जैसे कार्यक्रम की विश्वसनीयता खत्म करने वाला यह फैसला युद्ध अपराध माना जाना चाहिए, और उसके लिए अमरीका के खिलाफ मुकदमा चलना चाहिए। छत्तीसगढ़ में एम्बुलेंस के कल के इस वर्दीधारी-हथियारबंद जवानों द्वारा इस्तेमाल के पीछे सरकार की कोई मंजूरी नहीं थी, और यह नक्सल इलाकों में पैदल चलकर थके हुए लोगों द्वारा मौके पर लिया एक तात्कालिक और स्थानीय फैसला था, और उसके लिए जिम्मेदार लोग अपनी जान खो ही चुके हैं। इसलिए अब राज्य सरकार को और केन्द्र सरकार की सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे कड़े फैसले लेने पड़ेंगे कि एम्बुलेंस का किसी तरह का हथियारबंद, या गैरमरीज इस्तेमाल न हो। यह बात सुझाते हुए हमको अच्छा नहीं लग रहा है, और यह बात सुनने वालों को भी यह सलाह बहुत बेरहमी की लगेगी, लेकिन हकीकत यह है कि आने वाले वक्त में बाकी एम्बुलेंस बची रहें, इसके लिए सरकार को यह कड़वा फैसला लेना ही पड़ेगा। यह बात याद रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध को लेकर जो नियम सभी देशों ने माने हैं, वे नियम देशों की सरकार तो मानती हैं, लेकिन आतंकवादी, उग्रवादी और हिंसक-हथियारबंद गिरोह इन नियमों की बंदिशों की इज्जत नहीं करते, इसलिए उनसे कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
बस्तर के इस खूनी हमले के बाकी पहलुओं पर हम पहले भी लिख चुके हैं, और आगे भी लिखते रहेंगे। उन बातों पर आज यहां चर्चा से एम्बुलेंस का मुद्दा वजन खो बैठता, इसलिए हम सिर्फ उसी पर बात खत्म कर रहे हैं। वोट डलवाने के लिए ऐसी शहादत के बाद अगर जिंदा बचे बाकी लोग वोट नहीं डालते हैं, तो वे मुर्दों से भी गए-गुजरे होंगे।

मोदी की बीवी के मुद्दे पर अब लिखना ही पड़ रहा है

12 अप्रैल 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी की बीवी की फिक्र में आज कांग्रेस पार्टी इस कदर डूबी हुई है, कि अपने खुद के डूबने का खतरा उसे इसके मुकाबले कम अहमियत का लग रहा है। किसी बेनीप्रसाद वर्मा ने नहीं, खुद राहुल गांधी ने कल एक चुनावी सभा में मोदी की बीवी को लेकर यह फिक्र जाहिर की, कि वे चुनाव घोषणापत्र में पत्नी का जिक्र क्यों नहीं करते थे, और अब उन्होंने जिक्र क्यों किया है? दूसरी तरफ कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे सोनिया गांधी के निजी सिपहसालार लगातार मोदी की बीवी के मामले को कुरेदते रहते थे, और पिछले बरसों में उनके मुंह से किसी महिला के लिए सबसे अधिक फिक्र सुनाई पड़ी, तो वह मोदी की बीवी जशोदा बेन ही थीं। 
इस चर्चा में कोई हर्ज इसलिए नहीं है कि जो सार्वजनिक जीवन में आते हैं, उनको चुनाव आयोग के नियमों से परे, जनता के मन में उठते सवालों के कॉलम में भी जवाब भरने पड़ते हैं, और नरेन्द्र मोदी ने पिछले चुनावों में जीवन-साथी का कॉलम खाली छोड़ा था, इस बार उन्होंने उसे भरा है, और पिछले चुनाव से इस चुनाव के बीच जशोदा बेन ने कुछ इंटरव्यू देकर यह धुंध साफ भी की थी कि नरेन्द्र मोदी से उनके शादी के कैसे संबंध थे, और उसके बाद से वे किस तरह अलग रहती हैं, मोदी से उनका कोई नाता नहीं बचा है, वे एक स्कूल में पढ़ाती हैं, और मोदी के प्रधानमंत्री बनने की कामना में उन्होंने बहुत सी मनौतियां मानी हुई हैं। वे एक मध्यम वर्ग की जिंदगी जी रही हैं, और पति के जीवन से अलग रहते हुए भी वे लगातार पति की शुभकामना करती हैं। 
नरेन्द्र मोदी और उनकी बीवी के मामले को आंकते हुए इन तमाम बातों पर गौर करना जरूरी है। चूंकि कांग्रेस के सबसे बड़े उम्मीदवार राहुल गांधी ने खुद होकर मोदी के इस निजी जीवन पर सार्वजनिक सवाल आमसभा में उठाए हैं, इसलिए मोदी की निजी जिंदगी का यह पहलू अब न सिर्फ सार्वजनिक जवाबदेही का हो गया है, बल्कि ऐसी ही जवाबदेही अब सार्वजनिक राजनीति के बाकी लोगों की भी बन गई है, खासकर उन लोगों की, जो लोग इन सवालों को उठा रहे हैं। कांग्रेस जब मोदी की बीवी की फिक्र कर रही है, और बार-बार यह कह रही है कि जो अपनी बीवी का ख्याल नहीं रख सका, वह देश की बाकी महिलाओं का, और बाकी देश का ख्याल कैसे रखेगा। इसके साथ-साथ कांग्रेस एक और बात को जोड़ रही है कि नरेन्द्र मोदी के राज में गुजरात में एक महिला का जिस तरह से टेलीफोन-टैपिंग और खुफिया पुलिस का इस्तेमाल करके पीछा किया गया, उससे यह सवाल उठता है कि मोदी अपनी बीवी को तो बरसों से अलग रख रहे हैं, या उससे अलग रह रहे हैं, और एक दूसरी महिला के पीछे पड़े हैं। मोदी की निजी जिंदगी और उसमें बीवी या दूसरी महिला का कोई इतना ही जिक्र बाजार में है। इसलिए हम इससे परे जाकर और किसी अटकलबाजी को जायज नहीं समझते। 
नरेन्द्र मोदी पर लगी इस सिलसिले की सबसे बुरी तोहमत यही है कि उन्होंने अपनी गृहमंत्री का इस्तेमाल करके एक महिला की निजी जिंदगी के पल-पल पर निगरानी रखवाई। अब इस मामले में कानूनी हालत यह है कि पहली नजर में यह काम गैरकानूनी दिखता है, लेकिन महीनों की मशक्कत के बावजूद केन्द्र की यूपीए सरकार देश में एक भी रिटायर्ड जज को इस बात के लिए तैयार नहीं कर पाई कि वह मोदी के खिलाफ इस जासूसी कांड की जांच के लिए बने आयोग का जिम्मा सम्हाले। केन्द्र सरकार ऐसे आयोग कम ही बनाती है, लेकिन ऐसा आयोग बना, केन्द्रीय मंत्रिमंडल के फैसले से बना, और उसकी जांच को कोई नहीं मिला। इसलिए जो कुछ खबरों में पहले आ चुका है, उसमें एक ही बात और जुड़ी है कि इस खुफिया निगरानी की शिकार महिला, और उसके पिता, दोनों ने इसे लेकर मोदी के खिलाफ कोई आरोप लगाने से इंकार कर दिया है, और उन्हें एक क्लीन चिट दी है। दूसरी तरफ मोदी की बीवी जशोदा बेन का मामला है जिन्होंने मोदी से कोई भी शिकायत न रखते हुए बार-बार उनके लिए मनौती, व्रत, और तीर्थयात्रा करने की बात कही है, और अगर कोई बीवी अपने आदमी के लिए प्रधानमंत्री बनने तक नंगे पैर रहने की बात करती है, उस पर अमल करती है, तो हमारे पास यह सोचने की कोई वजह नहीं है कि उस बीवी को मोदी से कोई शिकायत है, या प्रधानमंत्री बनने के बाद कोई उम्मीद है। 
अब सवाल पूछने वाली, तोहमत लगाने वाली कांग्रेस पार्टी अपने आपको इन सवालों के साथ, अपनी खुद की जिंदगी को लेकर जवाबों की जवाबदेही ढो लेती हैं। और अगर कांग्रेस के नेताओं के चाल-चलन की बात की जाए, तो मोदी की निजी जिंदगी के चाल-चलन के मुकाबले कांग्रेस नेताओं के कुकर्म भयानक है। एक तरफ नरेन्द्र मोदी की बीवी उनकी मंगलकामना करते हुए नंगे पैर जी रही हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के दिग्गज नेता ऐसे भी हैं जिनकी औलाद अदालतों में डीएनए जांच से खून का रिश्ता साबित करती है, और ऐसे नेताओं के सेक्स वीडियो इंटरनेट पर लोगों को हक्का-बक्का कर देते हैं, दवा कंपनियां बुढ़ापे में ताकत बढ़ाने के लिए अपनी दवाओं की मॉडलिंग उनसे करवाने की सोचने लगती हैं। आज कांग्रेस के जो फूहड़ और बेसमझ नेता मोदी की घरेलू जिंदगी के इस बहुत मामूली पहलू को एक चुनावी मुद्दा बना रहे हैं, उनकी हरकत का जवाब देने के लिए हम कांग्रेस के गुजर चुके बड़े नेताओं की मिसालों का इस्तेमाल करना नहीं चाहते, क्योंकि उन लोगों ने शायद अपनी निजी जिंदगी भी दिल खोलकर जी थी, और दूसरों की निजी जिंदगी को चुनावी माइक्रोफोन से इस तरह उछाला भी नहीं था। इसलिए कांग्रेस के आज के कमसमझ नेताओं की बातों का इस्तेमाल हम उन्हीं के गुजर चुके बड़े और भले नेताओं के खिलाफ नहीं होने देना चाहते। 
नरेन्द्र मोदी महिला की जासूसी में जांच और अदालत के लिए खुले हुए हैं। लेकिन उनके और उनकी बीवी के बीच कैसे रिश्ते हैं, इसे लेकर इन दोनों के अलावा किसी तीसरे को तब तक बकवास का हक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि इन दोनों में से कोई एक, या दोनों ही, कानून या समाज के सामने कोई शिकायत लेकर न जाएं। राजनीति को इतना घटिया बनाना नाजायज है कि जिससे बिना शिकायत की निजी जिंदगी को कुरेदने वाले बेवकूफ मोदी के सार्वजनिक जिंदगी के लहूलुहान ताजा इतिहास की तरफ से भी लोगों का ध्यान बंटाए। हमारा ख्याल है कि मोदी की जाती जिंदगी को लेकर ऐसे हमले से कांग्रेस न सिर्फ मोदी की सबसे बड़ी गलतियों, और गलत कामों को रियायत दे रही है, बल्कि हिन्दुस्तान के ताजा इतिहास कीकई तरह की प्रेम और सेक्स कहानियों को एक बार फिर खबरों में ला रही है। राजनीति में अगर कोई जनता को इतना बेवकूफ बना रहा है कि बीवी से अलग रहने वाला, देश का ख्याल कैसे रख सकेगा, तो जनता इतनी बेवकूफ नहीं है, और शायद चुनावी नतीजे जनता को समझदार साबित भी करेंगे। 
नरेन्द्र मोदी जैसे घिरे हुए नेता को चुनाव घोषणापत्र में लिखे गए एक नाम को लेकर अगर अब तक चले आ रहे बदनाम से दूर खिसक जाने का मौका कांग्रेस दे रही है, तो फिर कांग्रेस आत्ममंथन के लिए लंबे बनवास की हकदार रखती है। 

आज लोहिया शर्म से डूबकर एक बार फिर मर गए होंगे...

11 अप्रैल 2014
संपादकीय

समाजवाद की खाल ओढ़कर परिवारवाद चलाते हुए मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार पर कहा है कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, इस पर फांसी की सजा नहीं देनी चाहिए, और सपा की सरकार आएगी तो कानून बदल दिया जाएगा। दूसरी तरफ उनकी पार्टी के महाराष्ट्र के अध्यक्ष अबू आजमी ने बयान दिया है कि बलात्कार करने वाले, और बलात्कार की शिकार लड़की, दोनों को फांसी देनी चाहिए। 
अगर चुनाव आयोग के तहत राजनीतिक दलों का दर्जा पाने के लिए कोई लोकतांत्रिक शर्तें हो सकती हैं, और चुनाव लडऩे के हक का इस्तेमाल करने के साथ कोई प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, तो समाजवादी पार्टी पर इस लोकतंत्र में आज एक कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन लचीला भारतीय लोकतंत्र बकवास को खुली छूट देता है, और इस हद तक देता है कि इस लोकतंत्र को कुचल दिया जाए, कमजोर तबकों के हक छीन लिए जाएं। यह नौबत बहुत ही खराब है, और आज जब इस देश में बलात्कार एक बड़ा मुद्दा है, बहुत ही शर्मनाक और खतरनाक मुद्दा है, तब भारतीय लड़कियों और महिलाओं के साथ होती हुई इस ज्यादती, बेइंसाफी को लेकर इस कदर गंदी जुबान बोलना, और खतरनाक राजनीतिक वायदे करना, इस देश को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। हमारा यह मानना है कि मुलायम सिंह यादव जैसे लोग जैसे फर्जी समाजवाद और जैसी फर्जी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करते हैं, उसे पूरी तरह खारिज करना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता तो धर्म के बाद आया हुआ एक मुद्दा है। लेकिन औरत और मर्द के बनने के साथ ही औरत के साथ जो गैरबराबरी और नाइंसाफी शुरू हुई है, उसे पहले खत्म करना चाहिए। यह नहीं हो सकता कि जो लोग महिलाओं के साथ गैरबराबरी की बात करें, वे धर्मों के साथ बराबरी की बात कर सकेंगे। सोच में इंसाफ, कतरे-कतरे में नहीं आ सकता, उसके लिए सोच या तो पूरी तरह इंसाफपसंद हो सकती है, या फिर वह नाइंसाफ ही रहेगी। 
आज समाजवादी पार्टी के साथ कहीं वामपंथी जुड़े रहते हैं, तो कहीं कांग्रेस पार्टी। आज यह मौका है कि लोगों को, मीडिया को, और जनसंगठनों को मुलायम और उनकी पार्टी से उसी तल्ख जुबान में सवाल करने चाहिए जिस जुबान में भाजपा और मोदी से गुजरात दंगों को लेकर सवाल किए जाते हैं, कांग्रेस से 1984 के दंगों को लेकर सवाल किए जाते हैं, और यूपीए से उसके अभूतपूर्व-ऐतिहासिक भ्रष्टाचार को लेकर सवाल किए जाते हैं। मुलायम सिंह की पार्टी के नेता पहले भी महिलाओं को लेकर, उन पर होने वाले मर्दाना जुर्मों को लेकर गंदी जुबान में बात करते आए हैं, और उनकी पार्टी के नेता और तो कोई हैं नहीं, उन्हीं के घर के ही हैं, उन्हीं के कुनबे के ही हैं। इसलिए इस पार्टी के नाम पर एक कुनबे की जो हिंसक और घटिया सोच है, उसके बारे में इस पार्टी के साथी दलों को सोचना चाहिए। 
आज हो सकता है कि देश और महाराष्ट्र प्रदेश, इन दोनों में कांग्रेस पार्टी के बनाए हुए महिला आयोग इन बातों का नोटिस न लें, क्योंकि ये आयोग उन्हें बनाने वाले सत्तारूढ़ दल के ही एक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। लेकिन अदालत को ऐसे लोगों को नोटिस देना चाहिए, और ऐसी पार्टियों के चुनाव लडऩे पर रोक लगनी चाहिए, ऐसे लोगों के चुनाव लडऩे पर कड़ाई से कानूनी रोक लगनी चाहिए। इस देश की संसद और प्रदेशों की विधानसभाओं को ऐसी गंदगी की जरूरत नहीं है। 
आज ऊपर बैठे हुए राम मनोहर लोहिया शर्म से डूबकर एक बार फिर मर गए होंगे। 

Bat ke bat, बात की बात

10 april 2014

बस्तर से सबक लें...

10 अप्रैल 2014
संपादकीय

नक्सल हिंसा, धमकी, और धमाकों के बीच आज जिस तरह बस्तर में वोट डल रहे हैं, उसे देखकर छत्तीसगढ़ के बाकी इलाकों, और देश के दूसरे प्रदेशों को भी सोचना चाहिए। खासकर उन शहरी, संपन्न, और शिक्षित तबकों को देखना चाहिए कि लोकतंत्र के इस जलसे में जान का खतरा उठाकर किस तरह गैरशहरी, गैरसंपन्न, और गैरशिक्षित तबके वोट डालते हैं, और शहरी लोग घर बैठे टीवी पर चुनाव देखते हैं या पिकनिक पर निकल जाते हैं। 
हम अपनी ही पुरानी बातों को दुहराने का खतरा उठाते हुए एक बार फिर मतदान शुरू होने के बाद, बाकी सीटों को ध्यान में रखते हुए इस बात को यहां लिख रहे हैं कि हर किसी को न सिर्फ खुद वोट डालने जाना चाहिए, बल्कि आसपास के लोगों को भी लेकर जाना चाहिए। अभी पिछले हफ्ते ही अफगानिस्तान की एक खबर आई थी कि किस तरह वहां बच्चे चुनाव का खेल खेलते हुए कतार लगाकर खड़े हैं, और कोई बच्चा बाकी लोगों की उंगलियों पर स्याही का निशान लगा रहा है। जिस अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के चलते लोकतंत्र का बुरा हाल है, सरकार का ठिकाना नहीं है, वहां पर बच्चे खेल-खेल में मतदान कर रहे हैं। उसे देखकर लगता है कि भारत में भी बच्चों को अगर इस तरह खेल में लगाया जाए, कुछ ऐसा किया जाए कि बच्चे भी मां-बाप के साथ मतदान केन्द्र में जाएं, तो एक अलग किस्म की जागरूकता उनके भीतर वोटर बनने के पहले भी खड़ी हो सकेगी। यह तो एक लंबी बात है, लेकिन आज जिन लोगों को वोट डालने का हक है, उनको अपनी लापरवाही और गैरजिम्मेदारी छोड़कर आने वाले दिनों में वोट डालने जाना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच वोटों का फासला पौन फीसदी था। एक फीसदी से भी कम के इस फासले को पाटने का काम मतदाताओं के पांच-दस फीसदी अधिक सक्रिय हो जाने से हो सकता है। उससे देश और प्रदेश को अलग सरकार मिल सकती है, और पार्टियों और नेताओं के होश उड़ सकते हैं। अफगानिस्तान से लेकर बस्तर तक खतरों में जीते हुए लोग शहरी हिन्दुस्तान के सामने एक मिसाल पेश कर रहे हैं, और उससे सबक लेना चाहिए। 

एक महत्वहीन थप्पड़

9 अप्रैल 2014
संपादकीय
अरविंद केजरीवाल पर कल दिल्ली में हुए एक थप्पड़-हमले को लेकर बहुत कुछ कहा और लिखा जा रहा है, और भूखे-प्यासे समाचार चैनलों को मानो भरी हुई थाली मिल गई हो, वे टूट पड़े हैं। लेकिन ऐसी किसी घटना को सही संदर्भ में, और सही अनुपात में देखने की जरूरत रहती है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी ने किसी नेता को थप्पड़ मारा हो। कुछ ही महीने हुए हैं जब शरद पवार पर किसी ने हाथ उठाया था, सुब्रत राय सहारा पर स्याही फेंकी थी, योगेन्द्र यादव के मुंह पर स्याही पोती थी, चिदम्बरम पर जूता फेंका था। और यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि दिल्ली में कुछ महीने पहले जब विधानसभा चुनाव हुआ तो इसी जूता फेंकने वाले को आम आदमी पार्टी ने अपना टिकट दिया था। अब अगर कांग्रेस पार्टी विमान अपहरण करने वाले को अपना उम्मीदवार बनाती है, समाजवादी पार्टी दर्जनों हत्याओं की जिम्मेदार कही जाने वाली फूलन को अपना उम्मीदवार बनाती है, तो जनता के मन की नाराजगी भी किसी तरह सामने आ सकती है। ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी के लोगों को कुछ नाराजगी झेलनी पड़ रही है तो उसके पीछे की स्थितियों को देखने की जरूरत भी है। 
दरअसल अन्ना हजारे के साथ शुरू करके अरविंद केजरीवाल ने एक गैरराजनीतिक आंदोलन को जिस रफ्तार से राजनीतिक बनाया, राजनीतिक दल बनाया, चुनाव लड़ा, सरकार बनाई, और सरकार भंग कर दी, इतनी रफ्तार से अब तक लोगों ने सिर्फ सीडी को फास्ट फारवर्ड करते देखा था, और राजनीति में ऐसी रफ्तार किसी ने नहीं देखी थी। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल दो साल की अपनी राजनीति में जितनी बार, जितने किस्म के यू-टर्न लिए हैं, उससे भी लोग हक्का-बक्का थे, और हैं। ऐसे में केजरीवाल को लोगों ने हाथों-हाथ ऊपर ले जाकर आसमान पर बिठाया था, और अब निराश होकर वे ही हाथ उनके गालों पर पड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति में केजरीवाल एक धूमकेतु की तरह आए हैं, और वे कितनी लंबी राजनीतिक जिंदगी जीते हैं, इसका अभी अंदाज लगाना मुश्किल है। लेकिन वे जनभावनाओं को जिस तरह ऊपर और नीचे ले जाने का काम कर रहे हैं, उसके चलते कभी-कभी लोगों के मन में, कभी खुशी-कभी गम, किस्म की भावनाएं आती ही रहेंगी।
आज जब हिन्दुस्तान में एक नई सरकार को चुनने का सिलसिला शुरू हो गया है, तब ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं की अहमियत तब तक नहीं है, जब तक ये किसी के लिए खतरा न बन जाएं। आज मुद्दे कुछ अलग हैं, और अलग होना भी चाहिए। आज हिन्दुस्तान की राजनीति में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा, और भाजपा की अगुवाई में एनडीए के दो दर्जन दल जिस तरह सत्ता की तरफ बढ़ रहे हैं, उसको देखते हुए धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली पार्टियां फिक्र तो जाहिर कर रही हैं, लेकिन मोदी को रोकने की सोच इनमें नहीं है। चुनाव मतदाताओं के सामने नेता, पार्टी, और गठबंधन को पेश करने का मौका रहता है, इसमें आज एनडीए कामयाब है, और कांग्रेस, यूपीए, या तीसरा, चौथा, और पांचवां मोर्चा बिखरे हुए हैं। किसी प्रदेश में तीन, किसी में चार कोनों वाले मुकाबले हो रहे हैं, और ऐसे में सबसे कम बिखराव, सबसे कम टकराव अगर किसी में है, तो वह एनडीए में है। ऐसे में केजरीवाल बाकी भाजपाविरोधी और एनडीएविरोधी मोर्चों में एक और बिखराव खड़ा कर चुके हैं। सोनिया गांधी की यह अपील कि धर्मनिरपेक्ष वोट न बंटें, किसी संभावना वाली अपील नहीं लगती है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता की दावेदार पार्टियां मोदी विरोध के नाम पर भी एक नहीं है। ऐसे में केजरीवाल को लगी थप्पड़ मुद्दा नहीं होना चाहिए, बल्कि देश की अगली सरकार बनने की संभावना, या आशंका, मुद्दा होना चाहिए। लेकिन यह फिक्र मानो हाशिए पर धकेल दी गई है।  
जूता फेंकने वालों को टिकट देने वालों को थप्पड़ पडऩे में हैरानी क्यों होनी चाहिए?

सड़क हादसे घटने चाहिए, और मौतें थमनी चाहिए...

8 अप्रैल 2014
संपादकीय
आज जब पूरे छत्तीसगढ़ में नवरात्रि और रामनवमीं के मौके पर होने वाले धार्मिक कार्यक्रम चल रहे हैं, और जगह-जगह लोग खुशियां मना रहे हैं, तब आदिवासी इलाके सरगुजा में एक सड़क हादसे में गांव के आदिवासी समाज के पन्द्रह लोग मारे गए। एक निजी पारिवारिक समारोह में ये लोग एक मालवाहक गाड़ी पर सवार होकर जा रहे थे, और गाड़ी के पलट जाने से उस पर सवार लोगों में से करीब आधे लोग खत्म हो गए। 
छत्तीसगढ़ में आए दिन सड़क हादसों में लोग इसी तरह बहुत बड़ी संख्या में मारे जाते हैं, और ऐसी खबरें आती और चली जाती हैं। जो लोग खत्म हो जाते हैं, वे तो आगे की तकलीफ से बरी हो जाते हैं, लेकिन जो लोग जिंदा रह जाते हैं और बुरी तरह जख्मी रहते हैं, उनकी बाकी जिंदगी पता नहीं कैसे गुजरती है। इसके अलावा उनके परिवार भी बुरी हालत में आ जाते हैं, अगर वहां कोई और कमाने वाले न हों, अगर उनके पास इलाज का जरिया न हो। ऐसे हादसों के बाद कई तरह की बड़ी दिक्कतें जिंदा लोगों के सामने रहती हैं, इसलिए सारे बीमा और इलाज से परे भी लोगों को हादसों से बचना चाहिए, और सरकार को इसमें अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए। 
आज चुनाव के बीच में एक बहुत नीरस किस्म के मुद्दे को लेकर हमारा यहां लिखना कुछ लोगों को बेमौके का लग सकता है, लेकिन हमारा यह मानना है कि जिंदगी को बचाने के लिए, उसकी कोशिशों के लिए, उसके लिए जागरूकता पैदा करने के लिए किसी मौके की राह देखने की जरूरत नहीं रहती। आज छत्तीसगढ़ की सरकार सड़कों पर हिफाजत को लेकर मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की बात भी नहीं कर सकती, क्योंकि जनता का एक बड़ा तबका इस धोखे में रहता है कि लापरवाही उसका पैदाइशी हक है, और उस पर किसी तरह के नियमों को लागू करना उसकी आजादी छीनने के बराबर है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में अलग-अलग वक्त पर विपक्ष में बैठी भाजपा, और कांग्रेस, दोनों के नेताओं को देख चुके हैं कि किस तरह सरकार की नियम लागू करने की कोशिश विपक्षी राजनीतिक आंदोलन खड़ा कर देती है। कांग्रेस ने तो और भी गजब किया था जब चरणदास महंत और रविन्द्र चौबे जैसे बड़े नेताओं ने हेलमेट अनिवार्य करने के भाजपा सरकार के अभियान का खुलकर समर्थन किया था, और रायपुर शहर के कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसे पोस्टर-बैनर लेकर आंदोलन किया था जिन पर लिखा था- हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को...।
सड़कों पर मौतों को रोकना इसलिए भी जरूरी है कि सरकार या निजी अस्पतालों की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा ऐसे हादसों के बाद इलाज में लग जाता है, और दूसरे लोगों के इलाज में क्षमता की कमी आड़े आती है। इसके अलावा बीमा कंपनियों को जब भुगतान देना पड़ता है, तो बाकी लोगों के बीमे की किस्तें बढ़ जाती हैं, सरकार पर इलाज का नगद खर्च भी पड़ जाता है। लेकिन रूपए-पैसे से परे भी सड़क हादसों में जिंदगियों का जाना रोकने की हर कोशिश इसलिए भी की जानी चाहिए कि एक हादसा जिन लोगों की लापरवाही, गलती, या किसी मशीनी चूक की वजह से होता है, उस हादसे में सड़क से गुजरने वाले बहुत से चौकन्ना, गलती न करने वाले, और बेकसूर लोग भी मारे जाते हैं। 
इसलिए सरकार को सड़क सुरक्षा को लेकर अपने विभागों का काम सुधारना चाहिए, और जनता को भी नियमों का पालन करना चाहिए। शादी-ब्याह या तीर्थ जैसे माहौल में जब लोग गाडिय़ों पर सवार होकर निकलते हैं, तो सावधानी उनके दिमाग के किसी कोने में नहीं रहती। खुशी और उत्साह कभी शराब के साथ, तो कभी शराब के बिना भी लोगों सिर पर सवार रहते हैं, और कभी-कभी ऐसी गाडिय़ों के ड्राइवर भी खुशी या गम की दारू पाने के बाद गाड़ी चलाते हैं। यह पूरा सिलसिला थमना चाहिए, मौतें थमनी चाहिए। और इन सबमें सरकार और समाज की कोशिशों से एक बहुत बड़ी कमी आ सकती है।